747 अय्यूब ईश्वर का आदर कैसे कर पाया?

1

अय्यूब ने ईश्वर को नहीं देखा था, न ही उसकी शिक्षाओं को सुना था,

पर ईश्वर के लिए वो और उसका दिल ज़्यादा अनमोल थे

उनसे जो महज डींग हांक सकते थे,

बलि चढ़ाने और गहन सिद्धांत की बात कर सकते थे;

उन्हें ईश्वर का सच्चा ज्ञान कभी न था,

उन्हें ईश्वर का सच्चा भय कभी न था।

अय्यूब ईश्वर का आदर कैसे कर पाया?

उसका दिल निर्मल था, ईश्वर से छिपा न था।

उसकी इंसानियत सच्ची थी, दयालु थी।

अय्यूब को प्रिय था न्याय और वो जो सकारात्मक था।

ऐसा ही इंसान ईश्वर-मार्ग का अनुसरण कर सकता था,

ईश्वर का भय मानकर, बुराई से दूर रह सकता था।

ये अय्यूब था, ये अय्यूब था!

2

ऐसा ही इंसान ईश्वर की संप्रभुता देख सकता था;

उसका अधिकार और सामर्थ्य देख सकता था।

वो ईश्वर की संप्रभुता और आयोजनों का अनुपालन कर पाया।

ऐसा इंसान ही ईश्वर-नाम की सच्ची स्तुति कर सकता था।

क्योंकि उसने कभी सोचा नहीं,

ईश्वर उसे आशीष देगा या ईश्वर उस पर आपदा लाएगा।

हर चीज़ ईश्वर के हाथों में है, अय्यूब जानता था,

इंसान की चिंता बेवकूफ़ी की निशानी है,

इंसान की चिंता अज्ञान की निशानी है,

अविवेक, ईश्वर-प्रभुता के प्रति शक की निशानी है।

ये ईश्वर का आदर न करने की निशानी है।

ईश्वर अय्यूब का यही ज्ञान चाहता था।

अय्यूब ईश्वर का आदर कैसे कर पाया?

उसका दिल निर्मल था, ईश्वर से छिपा न था।

उसकी इंसानियत सच्ची थी, दयालु थी।

अय्यूब को प्रिय था न्याय और वो जो सकारात्मक था।

ऐसा ही इंसान ईश्वर-मार्ग का अनुसरण कर सकता था,

ईश्वर का भय मानकर, बुराई से दूर रह सकता था।

3

अय्यूब ने ईश-कार्य का अनुभव नहीं किया था

न उसके वचन सुने, न उसका चेहरा देखा था।

ईश्वर के प्रति उसका रवैया

उसकी इंसानियत और लक्ष्य का परिणाम था,

जो नहीं है आज के इंसान में।

तो ईश्वर ने कहा "उसके जैसा सच्चा और पूर्ण इंसान, नहीं कोई धरती पर।"

अय्यूब ईश्वर का आदर कैसे कर पाया?

उसका दिल निर्मल था, ईश्वर से छिपा न था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से रूपांतरित

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