262 क्या तुमने सर्वशक्तिमान को आहें भरते सुना है?

1 जैसे-जैसे भोर होती है, एक सुबह का तारा पूर्व में चमकने लगता है। यह एक ऐसा सितारा है जो पहले वहाँ कभी नहीं था, यह शांत, जगमगाते आसमान को रोशन करता है, मनुष्यों के दिलों में बुझी हुई रोशनी को फिर से जलाता है। तुम्हारे और अन्य लोगों पर समान रूप से चमकने वाले इस प्रकाश के कारण मनुष्य अब अकेला नहीं रह गया है। फिर भी तुम इकलौते हो जो कि अंधेरी रात में सोये रहते हो। तुम न कोई ध्वनि सुनते हो और न ही कोई प्रकाश देखते हो; तुम एक नए युग के, एक नए स्वर्ग और पृथ्वी के आगमन से अनजान हो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुमसे कहता है, "मेरे बच्चे, उठो मत, अभी भी रात है। मौसम ठंडा है, इसलिए बाहर मत जाओ, ऐसा न हो कि तलवार और भाले तुम्हारी आंखों को बेध दें।" तुम केवल अपने पिता की चेतावनियों पर भरोसा करते हो, क्योंकि तुम्हारा मानना है कि केवल तुम्हारा पिता सही है, क्योंकि वह तुमसे उम्र में बड़ा है और वह तुमसे बहुत प्यार करता है।

2 इस तरह की चेतावनी और प्रेम तुम्हें इस पौराणिक कथा पर विश्वास नहीं करने देते कि दुनिया में प्रकाश है; वे तुम्हें इस बात की परवाह करने से रोक देते हैं कि सत्य अभी भी इस दुनिया में मौजूद है या नहीं। अब तुम सर्वशक्तिमान द्वारा बचाये जाने की आशा नहीं करते। तुम यथास्थिति से संतुष्ट हो, अब तुम प्रकाश के आगमन की प्रतीक्षा नहीं करते, पौराणिक कथाओं में सर्वशक्तिमान के जिस आगमन के बारे मे बताया गया है तुम उसकी राह नहीं देखते। तुम्हारे अनुसार जो भी सुंदर है उसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता, वह अस्तित्व में नहीं हो सकता। तुम्हारी नज़र में, मानवजाति का आने वाला कल, मानवजाति का भविष्य, बस गायब हो जाता है, मिट जाता है। यात्रा के अपने साथी या सूदूर की यात्रा की दिशा को खोने के गहरे डर से और कष्टों को साझा करने के लिए प्रफुल्लित, तुम अपने पिता के कपड़ों से पूरी ताकत से चिपके रहते हो। मनुष्यों की विशाल और धुंधली दुनिया ने तुम जैसे कइयों को बनाया है, जो इस दुनिया की विभिन्न भूमिकाओं को निभाने में निर्भीक और निडर हैं। इसने कई "योद्धाओं" को बनाया है जिनमें मृत्यु का भय नहीं है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इसने सुन्न और लकवाग्रस्त मनुष्यों के एक के बाद एक कई जत्थे तैयार किए हैं जो अपनी रचना के उद्देश्य से अनभिज्ञ हैं।

3 सर्वशक्तिमान की आंखें गहराई से पीड़ित मानवजाति के प्रत्येक सदस्य का अवलोकन करती हैं। सर्वशक्तिमान को पीड़ितों की कराहें सुनायी देती हैं, उसे पीड़ितों की बेशर्मी दिखायी देती है, और वह उस मानवजाति की लाचारी और खौफ को महसूस करता है जो उद्धार का अनुग्रह खो चुकी है। मानवजाति परमेश्वर की देखभाल को अस्वीकार कर, अपने ही रास्ते पर चलती है; उसकी आँखों की जांच से बचने का प्रयास करते हुए, आखिरी सांस तक दुश्मन की संगति में गहरे समुद्र की कड़वाहट का स्वाद लेना पसंद करती है। अब मनुष्य को सर्वशक्तिमान की आह सुनाई नहीं देती; अब इस दु:खद मानवजाति को सहलाने के लिए सर्वशक्तिमान के हाथ तैयार नहीं हैं। वह बार-बार पकड़ता है, और बार-बार गँवा देता है, इस तरह उसका किया कार्य दोहराया जाता है। उस क्षण से, वह थकान महसूस करने लगता है, उकताने लगता है और इसलिए वह उस काम को बंद कर देता है जो उसके हाथ में है और मानवजाति के बीच में चलना बंद कर देता है...। मनुष्य इनमें से किसी भी परिवर्तन से अनजान है, सर्वशक्तिमान के आने और जाने से, उसकी उदासी और विषाद से अनजान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सर्वशक्तिमान की आह' से रूपांतरित

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