1. आप कहते हैं कि हमें अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि केवल तभी हमारे भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को शुद्ध और परिवर्तित किया जाएगा, और उसके बाद ही हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे। इसलिए, जैसा कि परमेश्वर द्वारा अपेक्षित है, हम विनम्र और सहनशील हैं, हम अपने शत्रुओं से प्रेम करते हैं, हम अपने क्रूस को सहन करते हैं, हम अपने शरीर को अनुशासित करते हैं, हम सांसारिक चीज़ों को त्यागते हैं, हम काम करते हैं और प्रभु के लिए प्रचार करते हैं, इत्यादि। क्या ये सभी वो परिवर्तन नहीं जो हमारे अंदर हुए हैं? क्या आप कह रहे हैं कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए यह फिर भी पर्याप्त नहीं है? मेरा मानना है कि जब तक हम इस तरह से प्रयास करते रहेंगे, हम पवित्र होने लगेंगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)

“सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अधिकांश लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष जोर देते हैं और परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ निश्चित परिवर्तन आते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद वे धूम्रपान और मदिरापान बंद कर देते हैं और वे दूसरों से होड़ नहीं करते और नुकसान होने पर भी सहन करना पसंद करते हैं। उनमें कुछ व्यवहार संबंधी परिवर्तन आते हैं। कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने के बाद परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, कुछ सत्य को समझते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं और अपने हृदय में बहुत आनंद महसूस करते हैं और इस प्रकार परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के इच्छुक होते हैं और यहाँ तक कि कुछ भी त्यागने और कोई भी कष्ट सहने में सक्षम होते हैं। लेकिन यदि कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद लोग लगातार सत्य का अनुसरण करने में विफल रहते हैं तो उनके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन न होने के कारण वे अनिवार्य रूप से वही पुरानी गलतियाँ करते रहते हैं। वे न केवल अपने शैतानी स्वभाव को त्यागने में विफल रहते हैं बल्कि यह और भी बदतर हो जाता है। वे सत्ता और लाभ के लिए होड़ करने के लिए अपनी वरिष्ठता पर भरोसा करते हैं, वे कलीसिया के धन का लालच करते हैं और जब भी वे किसी और को परमेश्वर के घर का लाभ उठाते देखते हैं तो वे ईर्ष्या करते हैं, बस अपने लिए अधिक लाभ हासिल करने की उम्मीद करते हैं—वे परमेश्वर के घर के भीतर परजीवी और कीड़े बन जाते हैं। परिणामस्वरूप कुछ लोग नकली अगुआ और मसीह-विरोधी बन जाते हैं और उन्हें प्रकट किया जाता है और हटा दिया जाता है। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? केवल व्यवहार संबंधी परिवर्तन टिकाऊ नहीं हैं; यदि लोगों के जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो देर-सबेर वे अपना असली रंग दिखा देंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यवहार संबंधी परिवर्तनों का स्रोत उत्साह है और इसके अलावा पवित्र आत्मा इस समय कुछ कार्य कर रहा है और इसलिए लोगों के लिए उत्साही होना या थोड़े समय के लिए कुछ दयालुता प्रदर्शित करना बेहद आसान हो जाता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, “एक अच्छी चीज करना आसान है; मुश्किल तो जीवन भर अच्छी चीजें करते रहना है।” लोग अपने पूरे जीवन भर अच्छी चीजें करने में अक्षम क्यों हैं? क्योंकि प्रकृति से लोग दुष्ट, स्वार्थी और भ्रष्ट होते हैं। किसी व्यक्ति का व्यवहार उसकी प्रकृति से निर्देशित होता है; उस व्यक्ति की प्रकृति जो भी हो, वैसे ही उसके स्वाभाविक प्रकटन होते हैं और केवल वही जो वे स्वाभाविक रूप से प्रकट करते हैं, वे उनकी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिखावा टिक नहीं सकता। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, तो यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार से सजाने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को बदलना है, उन्हें उनकी हड्डियों तक बदलना है और उन्हें नए लोगों में बदलना है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन सभी उसके स्वभाव को बदलने का काम करते हैं ताकि वह परमेश्वर के प्रति समर्पण और वफादारी प्राप्त कर सके और वास्तव में उसकी आराधना कर सके। यह वह परिणाम है जिसे परमेश्वर अपने कार्य में प्राप्त करना चाहता है और यह परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य भी है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोगों को पवित्र आत्मा का थोड़ा-बहुत प्रबोधन और मार्गदर्शन मिलता है, यह उनके जीवन का खुलासा नहीं है। उन्होंने अभी तक सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं किया है और उनके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है। चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, इससे यह साबित नहीं होता कि वह परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है या वह सत्य का अभ्यास करता है। व्यवहार संबंधी बदलावों का मतलब यह नहीं है कि जीवन स्वभाव में परिवर्तन आ गया और इन्हें जीवन के खुलासे नहीं माना जा सकता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

भले ही कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास रखना शुरू करने के बाद से बड़ी संख्या में अच्छे व्यवहारों में संलग्न रहा हो, फिर भी वह कई चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है, सत्य की समझ पा लेना तो दूर की बात है। फिर भी अपने कई अच्छे व्यवहारों के कारण उसे लगता है कि वह पहले से ही सत्य का अभ्यास कर रहा है, पहले ही परमेश्वर के प्रति समर्पण कर चुका है और पहले ही उसके इरादों को पूरा कर चुका है। जब तुम्हारे साथ कुछ भी घटित नहीं होता है, तो तुमसे जो कुछ कहा जाता है तुम वह सब करने में सक्षम होते हो और तुम बिना किसी संकोच और बिना किसी प्रतिरोध के अपना कर्तव्य करते हो। जब तुमसे सुसमाचार प्रचार करने के लिए कहा जाता है, तो तुम शिकायत नहीं करते और इस कठिनाई को सहन कर सकते हो और जब तुमसे दौड़-भाग करके कार्य करने या कोई खास काम पूरा करने को कहा जाता है, तो तुम वैसा करते हो। इस वजह से तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हो और सचमुच सत्य का अनुसरण करते हो। फिर भी अगर तुम्हारी गंभीरता से जाँच की जाए और पूछा जाए, “क्या तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है? ऐसे व्यक्ति हो जिसका स्वभाव बदल चुका है?”—अगर हर व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों के सत्य की कसौटी पर तौला जाए—तो कहा जा सकता है कि मानक के अनुरूप कोई नहीं है, और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने में कोई सक्षम नहीं है। इसलिए सारी भ्रष्ट मानवजाति को आत्म-चिंतन करना चाहिए। मनुष्यों को उन स्वभावों पर चिंतन करना चाहिए जिनके अनुसार वे जीते हैं, शैतान के उन फलसफों, तर्कों, झूठों और भ्रांतियों पर चिंतन करना चाहिए जो उनके सारे व्यवहारों और कर्मों का आधार बनते हैं। उन्हें इसके मूल कारण पर चिंतन करना चाहिए कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव क्यों प्रकट करते हैं, उनके मनमाने ढंग से कार्य करने का सार क्या है, और वे किस लिए और किसके लिए जीते हैं। अगर इसे सत्य की कसौटी पर कसा जाए तो फिर सभी लोगों को निंदा झेलनी पड़ेगी। इसका कारण क्या है? इसका कारण यही है कि मानवजाति बहुत भ्रष्ट है। लोग सत्य को नहीं समझते, और वे सब के सब अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हैं। उन्हें रत्तीभर भी आत्म-ज्ञान नहीं है, वे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, अपनी प्राथमिकताओं और तौर-तरीकों के आधार पर कर्तव्य निभाते हैं, और परमेश्वर की सेवा करने के तरीके में धार्मिक सिद्धांतों का अनुकरण करते हैं। इतना ही नहीं, वे अभी भी मानते हैं कि वे आत्मविश्वास से भरे हैं, उनके कार्य बहुत ही उचित हैं, और अंत में उन्हें लगता है कि वे बहुत कुछ हासिल कर चुके हैं। इसका एहसास किए बिना ही वे सोचने लगते हैं कि वे पहले ही परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य कर रहे हैं और इन्हें बखूबी पूरे कर चुके हैं, कि वे पहले ही परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हैं और उसकी इच्छा के अनुसार चल रहे हैं। अगर तुम्हें ऐसा लगता है या अगर तुम सोचते हो कि परमेश्वर में कई वर्षों के विश्वास के दौरान तुम कुछ लाभ हासिल कर चुके हो, तो फिर तुम्हें ध्यानपूर्वक अपनी जाँच करने के लिए परमेश्वर के सामने और भी ज्यादा आना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर में विश्वास के इन वर्षों के दौरान अपनी यात्रा को देखना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या तुम्हारे कार्य और कर्म सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं और साथ ही तुम्हारी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर के विरोध में हैं, कौन-सी परमेश्वर के प्रति समर्पण में हैं, कौन-सी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करती हैं, कौन-सी परमेश्वर की गवाही देने वाली हैं और किन क्षेत्रों में तुम परमेश्वर के ऋणी हो। तुम्हें इन सभी चीजों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए—केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुममें आत्म-जागरूकता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है

तुम जैसा कोई पापी, जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है और जो बदलाव या परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने से होकर नहीं गुजरा है—क्या तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी अपने पुराने स्वरूप वाले हो, यह सच है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और परमेश्वर के उद्धार की वजह से अब तुम पाप के नहीं हो, परंतु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पाप या घिनौनेपन से रहित हो। यदि तुम बदलाव से होकर नहीं गुजरे हो तो तुम पावनीकृत कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम घिनौनेपन से भरे हुए हो और तुम स्वार्थी और नीच हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ उतरना चाहते हो—सपने देखते रहो! तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो; तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परंतु तुम बदलाव से होकर नहीं गुजरे हो। तुम्हें परमेश्वर के इरादों के अनुसार होने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; वरना तुम्हें केवल छुटकारा मिला होगा और तुम किसी भी तरह से पावनीकृत नहीं हो सकते। उस स्थिति में तुम परमेश्वर के साथ अद्भुत आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य होते हो, क्योंकि तुम मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य से एक कदम पीछे छूट गए हो, जो कि मनुष्य को परिवर्तित करने और पूर्ण बनाने का महत्वपूर्ण कदम है। इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर प्राप्त करने में असमर्थ हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में

यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। ... मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर निर्धारित नहीं करता और इस आधार पर तो और भी नहीं कि वह कितना दयनीय है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उसके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब निरपवाद रूप से दंडित किए जाएँगे। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता। इसलिए जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

तुम लोग सोचते होगे कि बरसों अनुयायी बने रहकर तुमने बहुत मेहनत कर ली है, और बात चाहे जो भी हो, तुम श्रमिक हो सकते हो और तुम्हें परमेश्वर के घर में गारंटीयुक्त जीवनयापन का स्रोत मिल जाएगा। मैं कहूँगा कि तुममें से अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं, क्योंकि तुम लोगों ने हमेशा चीज़ों का फ़ायदा उठाने के सिद्धांत का पालन किया है, न कि अपना फायदा उठाने देने का। इस प्रकार, मैं तुम लोगों को अब पूरी गंभीरता से बता रहा हूँ : मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि यदि तुमने बहुत कड़ी मेहनत की है और प्रमुख योगदान दिए हैं, कि तुम बहुत अधिक वरिष्ठ हो, कि तुम मेरा निकटता से अनुसरण करते हो, कि तुम बहुत प्रसिद्ध हो या कि तुम्हारा रवैया सुधर गया है; अगर तुमने मेरी माँगों के अनुसार कार्य नहीं किया है, तो तुम कभी भी मेरी स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे। तुम लोगों के लिए बेहतर होगा कि तुम जल्द से जल्द अपने उन सभी विचारों और योजनाओं को त्याग दो और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लो। अन्यथा मैं सभी को राख में बदल दूँगा, इस प्रकार अपने काम को समाप्त कर दूँगा; ज़्यादा से ज़्यादा, मेरे वर्षों के काम और कष्ट व्यर्थ हो जाएँगे—क्योंकि मैं अपने दुश्मनों और उन लोगों को, जिनसे बुराई की दुर्गंध आती है और जिनमें वही पुरानी शैतानी छवि है, अपने राज्य में नहीं ला सकता या उन्हें अगले युग में नहीं ले जा सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे

पिछला: 2. पहले, पादरी लोग अक्सर उपदेश देते थे कि जब प्रभु आएगा, तो आपदाओं से पहले ही हमारा स्वर्गारोहण हो जाएगा, लेकिन अब हम हर तरह की बड़ी आपदा को धरती पर आते हुए देख रहे हैं और हमारा स्वर्गारोहण नहीं हुआ है। पादरियों का कहना है कि हमारे स्वर्गारोहण के नहीं होने का मतलब है कि प्रभु अभी तक लौटा नहीं है, कि आपदाओं के बीच प्रभु हमारे सामने प्रकट होगा, और हम आपदाओं के दौरान स्वर्गारोहण करेंगे। मुझे समझ में नहीं आता : क्या हमारा स्वर्गारोहण आपदाओं से पहले किया जाएगा, या उनके दौरान?

अगला: 2. प्रेरित पौलुस ने कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। हमने कई वर्षों से प्रभु पर विश्वास किया है, और हर समय, हमने इस राह पर चलने और प्रभु के लिए काम करने में पौलुस का अनुकरण किया है। हमने सुसमाचार का प्रसार और कलीसियाओं का निर्माण किया है, और हम प्रभु के नाम और प्रभु के मार्ग के प्रति एकनिष्ठ रहे हैं। कोई संदेह नहीं है कि धार्मिकता का ताज़ हमारे लिए तैयार रखा जाएगा। जब तक हम प्रभु के लिए अपने प्रयास में परिश्रमी हैं और प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा करने में सजग हैं, हमारा स्वर्ग के राज्य में सीधे ही स्वर्गारोहण किया जाएगा। क्या आप यह कह रहे हैं कि हम जो अभ्यास करते हैं उसमें कोई त्रुटि है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, “मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो” (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता : स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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