2. हमने हमेशा यह माना है कि प्रभु यीशु में हमारे विश्वास के माध्यम से हमारे पापों के लिए क्षमा पाना, उद्धार की कृपा को प्राप्त करना है, फिर भी आप कहते हैं कि "बचाए जाने" का अर्थ सच्चा उद्धार नहीं है। तो फिर बचाए जाने का क्या अर्थ है, और पूरी तरह से बचाए जाने का क्या मतलब है? बचाए जाने और पूरी तरह से बचाए जाने के बीच सारभूत अंतर क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"जो विश्‍वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्‍वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा" (मरकुस 16:16)।

"क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है" (मत्ती 26:28)।

"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)।

"ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:4-5)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम उस पर विश्वास करते हो, तो वह तुम्हें छुटकारा दिलाएगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते, तो तुम पाप के नहीं रह जाते, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते हो। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध का भाव था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पापी नहीं रह गया है, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया है। अगर तुम विश्वास करते हो, तो तुम फिर कभी भी पापी नहीं रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)' से उद्धृत

जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से बचाने (अर्थात मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। मोटे तौर पर, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ने वास्तविक कार्य किया था, उसने पापमय देह के समान बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापमय देह की समानता के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो चिह्न और चमत्कार स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक इस बात का संबंध था कि मनुष्य को उसके भीतर के शैतानी स्वभावों से कैसे मुक्त किया जाए, तो यह कार्य अभी किया जाना बाकी था। मनुष्य को उसके विश्वास के कारण केवल बचाया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु उसका पापी स्वभाव उसमें से नहीं निकाला गया था और वह अभी भी उसके अंदर बना हुआ था। मनुष्य के पाप देहधारी परमेश्वर के माध्यम से क्षमा किए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया था। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए जा सकते हैं, परंतु मनुष्य इस समस्या को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह आगे कैसे पाप न करे और कैसे उसका भ्रष्ट पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया और रूपांतरित किया जा सकता है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए थे और ऐसा परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से हुआ था, परंतु मनुष्य अपने पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीता रहा। इसलिए मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना आवश्यक है, ताकि उसका पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया जा सके और वह फिर कभी विकसित न हो पाए, जिससे मनुष्य का स्वभाव रूपांतरित होने में सक्षम हो सके। इसके लिए मनुष्य को जीवन में उन्नति के मार्ग को समझना होगा, जीवन के मार्ग को समझना होगा, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझना होगा। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता होगी, ताकि उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल सके और वह प्रकाश की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वह अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और इसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अनिश्चित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का पुत्र माना, और उसके एक महान नबी और उदार प्रभु होने की घोषणा की, जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपने विश्वास के बल पर केवल उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सकते थे, यहाँ तक कि मृतक भी जिलाए जा सकते थे। कितु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार को आशीष, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उसकी ईश्वर के अनुरूप दिखावट थी; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था, तो उसे एक स्वीकार्य विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें बचा लिया गया है। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिलकुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने और उसके परिणामस्वरूप उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति को दूर करने में असफल रहता और मनुष्य केवल अपने पापों की क्षमा पर आकर रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का पूर्णतः समापन किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से परिपूर्ण है, यह दुखद रूप से गंदी है, और यह कुछ ऐसी है जो अस्वच्छ है। लोग देह के आनंद के लिए बहुत अधिक ललचाते हैं और देह की कई सारी अभिव्यंजनाएँ हैं; यही कारण है कि परमेश्वर मनुष्य की देह से एक निश्चित सीमा तक घृणा करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट चीज़ों को निकाल फेंकते हैं, तब वे परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करते हैं। परंतु यदि वे गंदगी और भ्रष्टता से स्वयं को अब भी नहीं छुड़ाते हैं, तो वे अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रह रहे हैं। लोगों की धूर्तता, छल-कपट, और कुटिलता सब शैतान की चीज़ें हैं। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार तुम्हें शैतान की इन चीज़ों से छुड़ाने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अंधकार से बचाने के लिए किया जाता है। जब तुमने एक निश्चित बिंदु तक विश्वास कर लिया है और देह की भ्रष्टता से अपने को छुड़ा सकते हो, और इस भ्रष्टता की बेड़ियों में अब और जकड़े नहीं हो, तो क्या तुम बचाए गए नहीं होगे? जब तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हो, तब तुम परमेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करने में असमर्थ होते हो, तुम कोई गंदी चीज़ होते हो, और परमेश्वर की विरासत प्राप्त नहीं कर सकते हो। एक बार जब तुम्हें स्वच्छ कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तुम पवित्र हो जाओगे, तुम सामान्य व्यक्ति हो जाओगे, और तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाओगे और परमेश्वर के प्रति आनंद से परिपूरित होओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

परमेश्वर में आस्था का अर्थ बचाया जाना है, तो बचाये जाने के क्या मायने हैं? "बचाया जाना," "शैतान के अंधकारपूर्ण प्रभाव से मुक्त होना"—लोग अक्सर इन विषयों के बारे में बात करते हैं, लेकिन वे बचाये जाने का अर्थ नहीं जानते। बचाए जाने का क्या अर्थ है? इसका संबंध परमेश्वर की इच्छा से है। सीधे-सादे ढंग से कहें, तो बचाए जाने का अर्थ है कि तू जीता रह सकता है, और तुझे जीवन में वापस लाया गया है। तो इससे पहले, क्या तू मरा हुआ है? तू बोल सकता है, और तू साँस ले सकता है, तो तुझे मरा हुआ कैसे कहा जा सकता है? (प्राण मर चुका है।) ऐसा क्यों कहा जाता है कि यदि लोगों के प्राण मर गए हैं तो वे मर गए हैं? इस कहावत का आधार क्या है? उद्धार प्राप्त कर लेने से पहले लोग किसके अधिकार क्षेत्र में जीते हैं? (शैतान के अधिकार क्षेत्र में।) और शैतान के अधिकार क्षेत्र में जीने के लिए वे किस पर निर्भर करते हैं? वे जीने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभावों का सहारा लेते हैं। जब कोई व्यक्ति इन चीज़ों के अनुसार जीता है, तो उनका संपूर्ण अस्तित्व—उनकी देह, और उनके प्राण और उनके विचार जैसे सभी अन्य पहलू—जीवित है या मृत? परमेश्वर के दृष्टिकोण से वे मृत हैं। ऊपर से तू साँस लेते हुए और सोचते हुए दिखाई देता है, लेकिन हर चीज़ जिसके बारे में तू लगातार सोचता है वह दुष्टता है; तू उन चीज़ों के बारे में सोचता है जो परमेश्वर की अवहेलना करती हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती हैं, ऐसी चीजें जिनसे परमेश्वर नफ़रत करता है, घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है। परमेश्वर की नजर में, ये सभी चीज़ें न केवल देह से संबंधित हैं, बल्कि वे पूरी तरह शैतान और दुष्टात्माओं से संबंधित हैं। तो परमेश्वर की नज़र में लोग क्या हैं? क्या वे इंसान हैं? नहीं, वे नहीं हैं। परमेश्वर उन्हें हैवानों के रूप में, जानवरों के रूप में, और शैतानों, जीवित शैतानों के रूप में देखता है! लोग शैतान की चीज़ों और उसके सार के अनुसार जीते हैं, और परमेश्वर की नज़र में, वे स्वयं मानव देह धारण किए हुए जीवित शैतान हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को चलती-फिरती लाशों के रूप में; मरे हुए लोगों के रूप में परिभाषित करता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को—इन चलती-फिरती लाशों को जो अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों और अपने भ्रष्ट शैतानी सार के अनुसार जीती हैं—ऐसे कथित मृत लोगों को ले कर उन्हें जीवित में बदल देने के लिए अपना उद्धार का वर्तमान कार्य करता है। बचाए जाने का यही अर्थ है।

परमेश्वर पर विश्वास करने का मकसद उद्धार प्राप्त करना है। बचाए जाने का अर्थ है कि तू मृत व्यक्ति से जीवित व्यक्ति में बदल जाता है। इससे तात्पर्य है कि तेरी साँस पुनर्जीवित हो जाती है, और तू जीवित हो जाता है; तू परमेश्‍वर को पहचान पाता है, और तू उसकी आराधना करने के लिए सिर झुकाने में सक्षम है। तेरे हृदय में परमेश्वर के विरुद्ध कोई और प्रतिरोध नहीं होता है; तू अब और उसकी अवहेलना नहीं करता है, उस पर हमला नहीं करता है, या उसके विरुद्ध विद्रोह नहीं करता है। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर की नज़र में असलियत में जीवित हैं। यदि कोई केवल कहता है कि वह परमेश्वर को स्वीकार करता है, तो क्या वे जीवितों में से हैं? (नहीं, वे जीवित नहीं हैं।) तो किस प्रकार के लोग जीवित हैं? जीवित प्राणी किस प्रकार की वास्तविकता को धारण करता है? कम से कम, जीवित प्राणी मानव भाषा बोल सकते हैं। वह क्या होती है? इसका अर्थ है कि जिन शब्दों को वे बोलते हैं उसमें मत, विचार, और विवेक शामिल होते हैं। जीवित प्राणी किन चीज़ों के बारे में बार-बार सोचता है। वे मानवीय गतिविधियों में संलग्न होने, और अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम होते हैं। उनकी कथनी और करनी की प्रकृति क्या है? वह वो सब कुछ है जो वे प्रकट करते हैं, सोचते हैं, और करते हैं, वो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की प्रकृति के साथ किया जाता है। इसे अधिक उपयुक्त रूप से कहें, तो जीवित प्राणियों में से एक होने के नाते, तेरे हर कर्म और हर विचार की परमेश्वर द्वारा निंदा नहीं की जाती है या उनसे नफ़रत नहीं की जाती है या उन्हें अस्वीकार नहीं किया जाता है; बल्कि, उनका परमेश्वर द्वारा अनुमोदन और प्रशंसा की जाती है। यही जीवित व्यक्ति करता है, और यही वह है जो जीवित व्यक्ति को करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वास्तव में आज्ञाकारी होना ही एक यथार्थ विश्वास है' से उद्धृत

अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना चाहिए, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जो जीवित हैं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके होते हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राण परमेश्वर के लिए न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पित कर देते हैं। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देते हैं, तभी शैतान शर्मिन्दा हो सकता है। केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के साए में रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्मा मृत हो चुके हैं जिनमें आत्मा नहीं है, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों की रचना की थी, वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने बनाया था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थीं, उसने उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसके प्रकाश में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होकर परमेश्वर-विरोधी हो गए हैं। मुख्यतः, सबसे आगे वही लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती। जीवित वे लोग हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं। इनमें सत्य और गवाही होती है, और यही लोग परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

पिछला: 1. आप कहते हैं कि लोगों को केवल तभी परिशुद्ध किया और पूरी तरह से बचाया जा सकता है, जब वे परमेश्वर का अंतिम दिनों का न्याय का कार्य स्वीकार करते हैं। हम ऐसा नहीं मानते। बाइबल कहती है: "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10)। "अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं" (रोमियों 8:1)। पहले से ही हमारे पापों को क्षमा कर दिया गया है और प्रभु यीशु में आस्था के कारण हमारे विश्वास को धर्मी ठहराया गया है। एक ही बार में और हमेशा के लिए हमारा उद्धार किया गया है, और जब प्रभु लौटता है, तो हमें सीधे स्वर्ग में ले जाया जाएगा। फिर आप यह क्यों कहते हैं कि पूरी तरह से बचाए जाने के लिए हमें अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा?

अगला: 1. बाइबल कहती है: "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। हम मानते हैं कि एक बार जब परमेश्वर आ जाता है, तो बादलों में उससे मिलने हेतु, हमारा सीधे आकाश में स्वर्गारोहण हो जाएगा। आप गवाही देते हैं कि प्रभु वापस लौट आया है, तो हमारा स्वर्गारोहण क्यों नहीं हुआ है?

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, "मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता: स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :"हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी...

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