5. बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है। यह बाइबल के माध्यम से है कि वे सब जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इसे स्वीकार करते हैं कि आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा बनाई गईं थीं। यह बाइबल के कारण है कि वे परमेश्वर के कार्यों के आश्चर्य, महानता और सर्वशक्तिमानता को देखते हैं। इसके अतिरिक्त, बाइबल में परमेश्वर के कई वचन हैं और मनुष्य की अनुभवात्मक गवाहियाँ हैं जो मनुष्य के जीवन के लिए प्रावधान प्रदान करने में सक्षम हैं, और मनुष्य के लिए बहुत अधिक शिक्षाप्रद हैं। क्या हम बाइबल को पढ़ने से अनंत जीवन पा सकते हैं? या क्या बाइबल में अनंत जीवन का मार्ग नहीं है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते” (यूहन्ना 5:39-40)

“मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

बाइबल को पढ़ने से लोग जीवन के अनेक मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं जो अन्य पुस्तकों में नहीं मिल सकते। ये मार्ग पवित्र आत्मा के कार्य के जीवन के मार्ग हैं जिनका अनुभव नबियों और प्रेरितों ने बीते युगों में किया था, बहुत से वचन अनमोल हैं, जो लोगों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। इस प्रकार, सभी लोग बाइबल पढ़ना पसंद करते हैं। क्योंकि बाइबल में इतना कुछ छिपा है, इसके प्रति लोगों के विचार महान आध्यात्मिक हस्तियों के किसी लेखन के प्रति उनके विचारों से भिन्न हैं। बाइबल पुराने और नए युग में यहोवा और यीशु की सेवा-टहल करने वाले लोगों के अनुभवों और ज्ञान का अभिलेख एवं संकलन है, और इसलिए बाद की पीढ़ियाँ इससे अत्यधिक प्रबुद्धता, रोशनी और अभ्यास करने के मार्ग प्राप्त कर रही हैं। बाइबल किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती के लेखन से उच्चतर है, तो उसका कारण यह है कि उनका समस्त लेखन बाइबल से ही लिया गया है, उनके समस्त अनुभव बाइबल से ही आए हैं, और वे सभी बाइबल ही समझाते हैं। इसलिए, यद्यपि लोग किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती की पुस्तकों से पोषण प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी वे बाइबल की ही आराधना करते हैं, क्योंकि यह उन्हें ऊँची और गहन प्रतीत होती है! यद्यपि बाइबल जीवन के वचनों की कुछ पुस्तकों, जैसे पौलुस के धर्मपत्र और पतरस के धर्मपत्र, को एक साथ लाती है। यद्यपि ये पुस्तकें लोगों को पोषण और सहायता प्रदान कर सकती हैं, किन्तु फिर भी ये पुस्तकें अप्रचलित हैं और पुराने युग की हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे केवल एक कालखंड के लिए ही उपयुक्त हैं, चिरस्थायी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर का कार्य निरन्तर विकसित हो रहा है, यह केवल पौलुस और पतरस के समय पर ही नहीं रुक सकता या हमेशा अनुग्रह के युग में ही बना नहीं रह सकता जिसमें यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया था। अतः, ये पुस्तकें केवल अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, अंत के दिनों के राज्य के युग के लिए नहीं। ये केवल अनुग्रह के युग के विश्वासियों को पोषण प्रदान कर सकती हैं, राज्य के युग के संतों को नहीं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे अब भी अप्रचलित ही हैं। यहोवा के सृष्टि के कार्य या इस्राएल के उसके कार्य के साथ भी ऐसा ही है : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कार्य कितना बड़ा था, यह अब भी अप्रचलित हो जाएगा, और वह समय अब भी आएगा जब यह व्यतीत हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य भी ऐसा ही है : यह महान है, किन्तु एक समय आएगा जब यह समाप्त हो जाएगा; यह न तो सृष्टि के कार्य के बीच और न ही सलीब पर चढ़ाने के कार्य के बीच हमेशा बना रह सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सलीब पर चढ़ाने का कार्य कितना विश्वास दिलाने वाला था या शैतान को पराजित करने में यह कितना कारगर था, कार्य आख़िर कार्य ही है, और युग आख़िर युग ही हैं; कार्य हमेशा उसी नींव पर टिका नहीं रह सकता, न ही ऐसा हो सकता है कि समय कभी न बदले, क्योंकि सृष्टि थी और अंत के दिन भी अवश्य होंगे। यह अवश्यम्भावी है! इस प्रकार, आज नया नियम—प्रेरितों के धर्मपत्र और चार सुसमाचार—में जीवन के वचन ऐतिहासिक पुस्तकें बन गए हैं, वे पुराने पंचांग बन गए हैं, और पुराने पंचांग लोगों को नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? चाहे ये पंचांग लोगों को जीवन प्रदान करने में कितने भी समर्थ हों, वे सलीब तक लोगों की अगुआई करने में कितने भी सक्षम हों, क्या वे पुराने नहीं हो गए हैं? क्या वे मूल्य से वंचित नहीं हैं? इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम्हें आँख बंद करके इन पंचांगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ये अत्यधिक पुराने हैं, ये तुम्हें नए कार्य में नहीं पहुँचा सकते, ये केवल तुम्हारे ऊपर बोझ लाद सकते हैं। केवल यही नहीं कि ये तुम्हें नए कार्य में और नए प्रवेश में नहीं ले जा सकते, बल्कि ये तुम्हें पुरानी धार्मिक कलीसियाओं में ले जाते हैं—और यदि ऐसा हो, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में पीछे नहीं लौट रहे हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)

बहुत से लोग मानते हैं कि बाइबल को समझना और उसकी व्याख्या कर पाना सच्चे मार्ग की खोज करने के समान है—परन्तु वास्तव में, क्या बात इतनी सरल है? बाइबल की इस वास्तविकता को कोई नहीं जानता कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख और उसके कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और इससे तुम्हें परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों की कोई समझ हासिल नहीं होती। बाइबल पढ़ने वाला हर व्यक्ति जानता है कि यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को लिखित रूप में प्रस्तुत करता है। पुराने नियम सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग के अंत तक इस्राएल के इतिहास और यहोवा के कार्य करने के तरीके को लिपिबद्ध करता है। पृथ्वी पर यीशु के कार्य को, जो चार सुसमाचारों में है, और पौलुस के कार्य नए नियम में दर्ज किए गए हैं; क्या ये ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं? अतीत की चीज़ों को आज सामने लाना उन्हें इतिहास बना देता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सच्ची और यथार्थ हैं, वे हैं तो इतिहास ही—और इतिहास वर्तमान को संबोधित नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास नहीं देखता! तो यदि तुम केवल बाइबल को समझते हो और परमेश्वर आज जो कार्य करना चाहता है, उसके बारे में कुछ नहीं समझते और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, किन्तु पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते, तो तुम्हें पता ही नहीं कि परमेश्वर को खोजने का क्या अर्थ है। यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए, परमेश्वर द्वारा समस्त लोकों और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास की खोज करने के लिए बाइबल पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और जीवन का अनुसरण करते हो, चूँकि तुम परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो और मृत शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के आज के इरादे खोजने चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम पुरातत्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। अच्छा होगा तुम परमेश्वर के आज के इरादों की खोज करो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)

शायद अब तुम जीवन प्राप्त करना चाहते हो या शायद तुम सत्य प्राप्त करना चाहते हो। जो भी हो, तुम परमेश्वर को खोजना चाहते हो, उस परमेश्वर को खोजना चाहते हो जिस पर तुम निर्भर रह सको, और जो तुम्हें अनंत जीवन प्रदान कर सके। यदि तुम अनंत जीवन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अनंत जीवन के स्रोत को समझना चाहिए और पहले यह जानना चाहिए कि परमेश्वर ठीक कहाँ है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि केवल परमेश्वर ही स्थिर जीवन है, और केवल परमेश्वर के पास ही जीवन का मार्ग है। चूँकि परमेश्वर स्थिर जीवन है, इसलिए वह अनंत जीवन है; चूँकि केवल परमेश्वर ही जीवन का मार्ग है, इसलिए स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन का मार्ग है। अतः सबसे पहले तुम्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर कहाँ है, और अनंत जीवन का यह मार्ग कैसे प्राप्त करें। अब हम इन दोनों विषयों पर अलग-अलग संगति करते हैं।

यदि तुम सचमुच अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त करना चाहते हो, और यदि तुम उसे खोजने के लिए आतुर हो, तो पहले इस प्रश्न का उत्तर दो : आज परमेश्वर कहाँ है? शायद तुम उत्तर दो, “निस्संदेह, परमेश्वर स्वर्ग में रहता है—वह तुम्हारे घर में तो रहेगा नहीं, है न?” शायद तुम कह सकते हो कि परमेश्वर स्पष्टतः सारी चीजों में रहता है। या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है, या परमेश्वर आध्यात्मिक क्षेत्र में है। मैं इनमें से किसी से भी इनकार नहीं करता, परंतु मुझे मुद्दा स्पष्ट कर देना चाहिए। यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय में रहता है, किंतु यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के विश्वासियों में ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास सच्चा है, और ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास झूठा है, ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति नहीं देता, ऐसे लोग भी हैं जिनसे वह प्रसन्न होता है और ऐसे लोग भी हैं जिनसे वह घृणा करता है, और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह पूर्ण बनाता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह हटा देता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि परमेश्वर बस कुछ ही लोगों के हृदय में रहता है, और ये लोग निस्संदेह वे हैं जो परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है, जो उसे प्रसन्न करते हैं, और जिन्हें वह पूर्ण बनाता है। ये वे लोग हैं, जिनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है। चूँकि उनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है, इसलिए ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनंत जीवन का मार्ग पहले ही सुन और देख चुके हैं। जिनका परमेश्वर में विश्वास झूठा है, जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जो परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं—उन्हें परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत किया जाना तय है, उनका जीवन के मार्ग से विहीन रहना तय है, और उनका इस बात से अनभिज्ञ रहना तय है कि परमेश्वर कहाँ है। इसके विपरीत, जिनके हृदय में परमेश्वर रहता है, वे जानते हैं कि वह कहाँ है। ये ही वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर अनंत जीवन का मार्ग प्रदान करता है, और ये ही परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। अब क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय में भी है और मनुष्य की बगल में भी है। वह न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में है, और सभी चीजों के ऊपर है, बल्कि उस पृथ्वी पर तो वह और भी अधिक है जिस पर मनुष्य रहता है। और इसलिए अंत के दिनों का आगमन परमेश्वर के कार्य के कदमों को नए क्षेत्र में ले आया है। परमेश्वर सभी चीजों पर प्रभुसत्ता रखता है और वह मनुष्य के हृदय में उसका सहारा है और इससे भी अधिक, वह मनुष्यों के बीच विद्यमान है। केवल इसी तरह से वह मनुष्य-जाति के लिए जीवन का मार्ग ला सकता है, और मनुष्य को जीवन के मार्ग में ला सकता है। परमेश्वर पृथ्वी पर आया है और मनुष्यों के बीच रहता है, ताकि मनुष्य, मनुष्य के अस्तित्व की खातिर जीवन का मार्ग प्राप्त कर सके। साथ ही, परमेश्वर सभी चीजों के बीच हर चीज को आदेश भी देता है, ताकि मनुष्य के बीच वह जो प्रबंधन करता है उसमें सहयोग को सुविधाजनक बनाया जा सके। और इसलिए, यदि तुम केवल इस सिद्धांत को स्वीकार करते हो कि परमेश्वर स्वर्ग में है और मनुष्य के हृदय में है, किंतु मनुष्यों के बीच परमेश्वर के अस्तित्व के सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम कभी जीवन प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी सत्य का मार्ग प्राप्त करोगे।

स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसके जीवन और सत्य का सह-अस्तित्व होता है। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे कभी जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और प्रावधान के बिना तुम केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है और उसके सत्य और जीवन का सह-अस्तित्व होता है। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं खोज सकते तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का प्रावधान प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा; तुम्हारा संपूर्ण शरीर कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारी देह—तुम्हारी बदबूदार देह—के सिवा कुछ नहीं होगी। यह जान लो कि किताबों के शब्द जीवन नहीं माने जाते, इतिहास के अभिलेख सत्य की तरह प्रतिष्ठित नहीं जा सकते और अतीत के विनियम परमेश्वर के मौजूदा वचनों के लेखे का काम नहीं कर सकते। जो वचन परमेश्वर पृथ्वी पर आकर और मनुष्य के बीच रहकर अभिव्यक्त करता है केवल वे ही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और यही उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका है। यदि तुम अतीत के युगों के दौरान परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के अभिलेखों को लेते हो और आज उनका पालन करते हो तो यह तुम्हें पुरातत्ववेत्ता बना देता है, ऐसे में तुम्हारे बारे में बताने का सर्वोत्तम तरीका तुम्हें ऐतिहासिक धरोहर का विशेषज्ञ कहना होगा। तुम हमेशा परमेश्वर द्वारा विगत युगों में किए गए कार्य के संकेतों पर विश्वास करते हो, तुम केवल पूर्व में मनुष्यों के बीच कार्य करते समय छोड़ी गई परमेश्वर की परछाई में विश्वास करते हो और केवल पिछले युगों में परमेश्वर द्वारा अपने अनुयायियों को दिए गए मार्ग में विश्वास करते हो, लेकिन तुम परमेश्वर के आज के कार्य की दिशा में विश्वास नहीं करते, परमेश्वर के आज के महिमामय मुखमंडल में विश्वास नहीं करते और परमेश्वर द्वारा इस समय व्यक्त किए जा रहे सत्य के मार्ग में विश्वास नहीं करते। इसलिए तुम निर्विवाद रूप से एक दिवास्वप्नदर्शी हो जो पूरी तरह वास्तविकता से दूर है। यदि तुम अब भी उन शब्दों से चिपके रहते हो जो मनुष्य को जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं तो तुम एक निर्जीव काठ के बेकार टुकड़े हो,[क] क्योंकि तुम अत्यंत रूढ़िवादी, अत्यंत दुसाध्य, अत्यंत विवेकशून्य हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

फुटनोट :

क. निर्जीव काठ का टुकड़ा : एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—“निकम्मा कुछ नहीं हो सकता।”


अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके पास सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह विशाल और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, अपनी मूर्खता से चिपके हो और कुछ नहीं करते। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, उसे उस परमेश्वर के रूप में सही कैसे ठहरा सकते हो, जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के कदमों को ढूँढ़ने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं दे सकते। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं और वे फलसफे के वे शब्द नहीं हैं, जो मानव-जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग देने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों का बोध नहीं करवाती? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा सुझाव यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो, जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

पिछला: 4. मैं बीस साल से अधिक समय से बाइबल का अध्ययन करता रहा हूँ। मैंने जाना है कि हालाँकि बाइबल अलग-अलग समय में 40 से अधिक अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गई थी, इसमें एक भी भूल नहीं है। इससे साबित होता है कि परमेश्वर बाइबल का वास्तविक लेखक है, और यह कि समस्त पवित्र शास्त्र पवित्र आत्मा से आता है।

अगला: 6. आप इस बात की गवाही देते हैं कि वचन देह में प्रकट होता है, मेम्ने के द्वारा खोला गया छोटा वो स्क्रॉल है जिसकी प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में भविष्यवाणी की गई है। हम ऐसा नहीं मानते। हम मानते हैं कि “छोटा स्क्रॉल” बाइबल को संदर्भित करता है, बाइबिल ही छोटा स्क्रॉल है, और यह पर्याप्त है कि हम केवल बाइबल पढ़ते रहें।

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