2. हम मानते हैं कि प्रकाशितवाक्य में जिसकी भविष्यवाणी की गई है उस महान श्वेत सिंहासन का लक्ष्य वे अविश्वासी हैं जो शैतान के होते हैं। जब प्रभु आता है, तो जो लोग उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें स्वर्ग में उठाया जाएगा, जिसके बाद परमेश्वर अविश्वासियों को नष्ट करने के लिए आपदाओं की वृष्टि करेंगे। यही महान श्वेत सिंहासन का न्याय है, फिर भी आप गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों के परमेश्वर का न्याय पहले ही शुरू हो चुका है। तो हमने परमेश्वर को अविश्वासियों का नाश करने के लिए आपदाओं को बरसाते क्यों नहीं देखा है? यह महान श्वेत सिंहासन का न्याय कैसे हो सकता है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्वर के घर से न्याय शुरू किया जाए” (1 पतरस 4:17)।
“यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो वचन बोले हैं वे ही अंत के दिन उसका न्याय करेंगे” (यूहन्ना 12:47-48)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
अंत के दिनों का कार्य सभी को उनके स्वभाव के आधार पर छाँटना और परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जो उसके राज्य में प्रवेश करते हैं—उन सभी को जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं—स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। फिर भी, स्वयं परमेश्वर के युग के आगमन से पूर्व, परमेश्वर का कार्य मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य के जीवन की जाँच-पड़ताल करना नहीं, बल्कि मनुष्य की विद्रोहशीलता का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करता है जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी, जिन्होंने आज तक परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण किया है, वे लोग हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आते हैं और ऐसा होने से हर वह व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करने वाला हर व्यक्ति परमेश्वर के न्याय का पात्र होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर को अस्वीकार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे होते हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को समझने और साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उद्घाटित करने का कार्य है, जिनकी उसमें आस्था है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है
कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर किसी अनजान समय पृथ्वी पर आकर लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह व्यक्तिगत रूप से संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, एक-एक करके सबकी परीक्षा लेगा, कोई भी नहीं छूटेगा। जो लोग इस ढंग से सोचते हैं, वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर एक के बाद एक लोगों का न्याय नहीं करता, न ही उन्हें एक-एक करके परीक्षा से गुजारा जाता है; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या पूरी मनुष्यजाति का सार समान नहीं है? न्याय किया जाता है इंसान के भ्रष्ट सार का, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसानी सार का, और इंसान के सारे पापों का। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता। न्याय का कार्य निरूपक है, और किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता। बल्कि यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करके, इस कार्य का उपयोग संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है, जिसके बाद यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य ऐसा ही है। परमेश्वर किसी व्यक्ति-विशेष या लोगों के किसी समूह-विशेष का न्याय नहीं करता, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है, जैसे कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या मनुष्य का उसका भय न मानना, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान। जिसका न्याय किया जाता है वो है इंसान का परमेश्वर-विरोधी सार, और यह न्याय का कार्य अंत के दिनों का विजय-कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिनकी गवाही इंसान देता है, वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसे इंसान ने अतीत से अपनी धारणाओं में पाल रखा था। देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और कार्य, और इस देह का समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि इस देह के कार्य का दायरा सीमित है, और उसमें सीधे तौर पर संपूर्ण विश्व शामिल नहीं है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—यह कार्य केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए नहीं, न ही यह थोड़े-से लोगों के लिए है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य के दायरे में संपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है, फिर भी यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे में उस कार्य को समाप्त कर लेगा तो उसके बाद, वह तुरन्त ही इस कार्य को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी तरह से फैला देगा जैसे यीशु के पुनरूत्थान और आरोहण के बाद उसका सुसमाचार सारी दुनिया में फैल गया था। चाहे यह पवित्रात्मा का कार्य हो या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे में किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों में, परमेश्वर देहधारी रूप में प्रकट होकर अपना कार्य करता है, और देहधारी परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। चाहे वह आत्मा हो या देह, जो न्याय का कार्य करता है वही ऐसा परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके कार्य के आधार पर परिभाषित किया जाता है, न कि उसके बाहरी रंग-रूप या दूसरी बातों के आधार पर। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, लेकिन कोई भी देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता। इंसान चाहे कुछ भी सोचे, मगर तथ्य आखिरकार तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि “कार्य परमेश्वर द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।” यह भ्रांति है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय और कोई नहीं कर सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है
आज के विजय कार्य का अभिप्राय यह स्पष्ट करना है कि मनुष्य का अन्त क्या होगा। ऐसा क्यों कहा जाता है कि आज की ताड़ना और न्याय, अंत के दिनों के महान श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात को प्रकट करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को, ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान, अपना असली रंग दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह उस बात को दर्शाना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का अन्त किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने के बारे में है और फिर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों को उजागर करना और इस प्रकार यह निर्णय करना है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक हैं। विजय-कार्य के पश्चात धार्मिक को पुरस्कृत करने और दुष्ट को दण्ड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णतः समर्पण करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से जीत लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें जीता नहीं गया उनको अन्धकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार मनुष्य को उसकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, दुष्टों को दुष्टों की जमात में रखा जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा, और धर्मियों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए भले लोगों के साथ रखा जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
अंत के दिन वे हैं जब सभी वस्तुएँ विजय के जरिए अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाएँगी। विजय, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों की छँटाई उनकी किस्म के अनुसार कैसे की जा सकेगी? तुम लोगों के बीच किस्म के अनुसार की जाने वाली छँटाई का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, सभी देशों के लोगों और तमाम लोगों को भी विजय कार्य को स्वीकारना होगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति की किस्म के अनुसार छँटाई करनी होगी, और उसे न्याय किए जाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसका उसकी किस्म के अनुसार छँटाई नहीं की जाती; प्रत्येक व्यक्ति की छँटाई की जाएगी, क्योंकि समस्त वस्तुओं का परिणाम निकट आ रहा है और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत पर पहुँच गए हैं। मनुष्य उस दिन से कैसे बचेगा जिस दिन मानवीय अस्तित्व का अंत होगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
मैं राज्य में शासन करता हूँ, और इतना ही नहीं, मैं पूरे ब्रह्मांड में शासन करता हूँ; मैं राज्य का राजा और ब्रह्मांड का मुखिया दोनों हूँ। अब से मैं उन सभी को इकट्ठा करूँगा, जो चुने हुए नहीं हैं और अन्यजातियों के बीच अपना कार्य आरंभ करूँगा, और मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करूँगा, ताकि मैं सफलतापूर्वक अपने कार्य के अगले चरण की शुरुआत कर सकूँ। अन्यजातियों के बीच अपने कार्य को फैलाने के लिए मैं ताड़ना का उपयोग करूँगा, जिसका अर्थ है कि मैं उन सभी के विरूद्ध “बल” का उपयोग करूँगा, जो अन्यजातियाँ हैं। स्वाभाविक रूप से, यह कार्य उसी समय किया जाएगा, जिस समय मेरा कार्य चुने हुए लोगों के बीच किया जाएगा। जब मेरे लोग पृथ्वी पर शासन करेंगे और सामर्थ्य का उपयोग करेंगे, तो यही वह दिन भी होगा जब पृथ्वी के सभी लोगों को जीत लिया जाएगा, और, इससे भी बढ़कर, यही वह समय होगा जब मैं विश्राम करूँगा—और तभी मैं उन सबके सामने प्रकट होऊँगा, जिन्हें जीता जा चुका है। मैं पवित्र राज्य के लिए प्रकट होता हूँ, और अपने आपको मलिनता की भूमि से छिपा लेता हूँ। वे सभी, जिन्हें जीता जा चुका है और जो मेरे सामने समर्पित हो गए हैं, अपनी आँखों से मेरे चेहरे को देखने और अपने कानों से मेरी वाणी सुनने में समर्थ हैं। यह उन लोगों के लिए आशीष है, जो अंत के दिनों में पैदा हुए हैं, यह मेरे द्वारा पहले से ही नियत किया गया आशीष है, और यह किसी भी मनुष्य के द्वारा अपरिवर्तनीय है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 29