8. आप इसकी गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों के परमेश्वर ने एक महिला के रूप में देहधारण किया है। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। बाइबल में लिखा है कि यीशु ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता कहकर पुकारा, और स्वर्ग के परमेश्वर ने यीशु को प्रिय पुत्र कहा। क्या पिता और पुत्र पुरुष नहीं हैं? बाइबल यह भी कहती है कि, “स्त्री का सिर पुरुष है” (1 कुरिन्थियों 11:3)। इसलिए महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं है, तो आप यह क्यों कहते हैं कि अंतिम दिनों के परमेश्वर ने एक महिला के रूप में देहधारण किया है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यावहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, तो वह पुरुष रूप में आया, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर, स्त्री रूप में आता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री, दोनों का ही सृजन उसके कार्य के काम आ सकता है, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करती है; चाहे पुरुष हो या स्त्री जब तक यह उसका देहधारी शरीर है, यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यदि यीशु जब आया तब वह स्त्री के रूप में प्रकट होता, यानी अगर पवित्र आत्मा द्वारा लड़के के बजाय लड़की गर्भ में आई होती तो भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। और यदि ऐसा होता, तो कार्य का वर्तमान चरण पुरुष के द्वारा किया जाता, लेकिन कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। प्रत्येक चरण में किए गए कार्य का अपना अर्थ है; कार्य का कोई भी चरण दूसरे चरण को दोहराता नहीं है, लेकिन वे एक-दूसरे का विरोध भी नहीं करते हैं। उस समय जब यीशु कार्य कर रहा था, तो उसे इकलौता पुत्र कहा गया, और “पुत्र” का अर्थ है पुरुष लिंग। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग को लेकर कोई अंतर नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह की कोई बाधा भी नहीं होती है, बल्कि वह विशेष रूप से स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यावहारिक मायने होते हैं। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और यह स्वतः प्रमाणित है कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम है। वह अपने सभी कर्मों का खुलासा करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह देहधारण नहीं करता और व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं करता जिसे मनुष्य देख सके, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही धारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है, किसी स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सारी मानवजाति मानती थी कि पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार होता है। वे मानते थे कि किसी स्त्री के पास अधिकार नहीं हो सकता, अधिकार सिर्फ पुरुष के पास ही हो सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मुखिया होता है, स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। अतीत में जब ऐसा कहा गया कि पुरुष स्त्री का मुखिया है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था—न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा ने रचा था। निस्संदेह, स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना आना चाहिए। ये वे नियम और संविधियाँ हैं जिन्हें यहोवा ने बनाया था, जिनका इंसान को धरती पर अपने जीवन में पालन करना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, “तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” उसने यह सिर्फ इसलिए कहा ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व में सामान्य जीवन जी सकें, ताकि मानवजाति के जीवन की एक संरचना हो और वह अपने व्यवस्थित क्रम में ही रहे। इसलिए यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, हालाँकि यह पृथ्वी पर रहने वाले सारे सृजित प्राणियों के सन्दर्भ में था और देहधारी परमेश्वर के देह से कोई संबंध नहीं रखता था। परमेश्वर अपने ही सृजित प्राणियों के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा रची गई मानवजाति के लिए थे; पुरुष और स्त्री के लिए उसने ये नियम इसलिए स्थापित किए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने दो प्रकार के मनुष्य बनाए, पुरुष और स्त्री; इसलिए, उसके देहधारी देहों में पुरुष और स्त्री का भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर निर्धारित नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार निर्धारित किया गया जब उसने प्रारंभ में मानवजाति की रचना की थी; अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। सर्प द्वारा छले गये आदम और हव्वा से कहे गए यहोवा के वचनों को यदि मनुष्य परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसा कि उसे करना चाहिए था? इस तरह, क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह तब भी अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री होना गलत है, तो क्या परमेश्वर का स्त्री की रचना करना भी भयंकर भूल नहीं थी? यदि लोग अब भी मानते हैं कि परमेश्वर का स्त्री के रूप में देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया या अपनी पत्नी से प्रेम नहीं किया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसा कि वर्तमान देहधारण है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु को मापने के लिए यहोवा द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या वे दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु को उस पुरुष के हिसाब से मापते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम आज के देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से नहीं माप सकते जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह तो अनुचित होगा! परमेश्वर को इस प्रकार मापना यह साबित करता है कि तुममें कोई विवेक नहीं है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से संबंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था; उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचो कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का था, जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। उन दोनों का कोई संबंध नहीं है, दोनों भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा तो नहीं हो सकता कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मुखिया है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह स्वयं परमेश्वर है, वह न सिर्फ स्त्री का मुखिया है बल्कि पुरुष का भी मुखिया है। वह सभी सृजित प्राणियों का प्रभु है, सभी सृजित प्राणियों का मुखिया है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मुखिया का प्रतीक कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु ऐसा पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा ने यीशु के भीतर उस आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट किया होगा जिसे सर्प द्वारा छला गया था? क्या वर्तमान देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता क्योंकि स्त्री ही सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह कहने की हिम्मत कर सकते हो कि चूँकि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध होती है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता? क्या तुम अब भी यह कहते जाने की हिम्मत कर सकते हो कि “स्त्री हमेशा पुरुष का आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त नहीं कर सकती है या प्रत्यक्ष रूप से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है”?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
यदि परमेश्वर केवल एक पुरुष के रूप में देह में आए, तो लोग उसे पुरुष के रूप में, पुरुषों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित करेंगे, और कभी विश्वास नहीं करेंगे कि वह महिलाओं का परमेश्वर है। तब पुरुष यह मानेंगे कि परमेश्वर पुरुषों के समान लिंग का है, कि परमेश्वर पुरुषों का प्रमुख है—लेकिन फिर महिलाओं का क्या? यह अनुचित है; क्या यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं है? यदि यही मामला होता, तो वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया, उसके समान पुरुष होते, और एक भी महिला नहीं बचाई गई होती। जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने आदम को बनाया और उसने हव्वा को बनाया। उसने न केवल आदम को बनाया, बल्कि पुरुष और महिला दोनों को अपनी छवि में बनाया। परमेश्वर केवल पुरुषों का ही परमेश्वर नहीं है—वह महिलाओं का भी परमेश्वर है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
यदि मात्र यीशु का कार्य किया गया होता और अंत के दिनों में इस चरण का कार्य इसका पूरक न होता, तो मनुष्य हमेशा के लिए इस अवधारणा से चिपका रहता कि केवल यीशु ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है, अर्थात्, परमेश्वर का सिर्फ एक ही पुत्र है, यदि उसके बाद कोई किसी दूसरे नाम से आता है तो वह परमेश्वर का एकमात्र पुत्र नहीं होगा, स्वयं परमेश्वर तो बिल्कुल भी नहीं होगा। मनुष्य की यह धारणा है कि जो कोई भी पापबलि बनता है या जो परमेश्वर की ओर से सत्ता हाथ में लेता है और समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाता है, वही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है। कुछ ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि यदि आने वाला कोई पुरुष है, तो उसे ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र और परमेश्वर का प्रतिनिधि समझा जा सकता है। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि यीशु यहोवा का पुत्र है, उसका एकमात्र पुत्र है। क्या ये मनुष्य की बेहद गंभीर धारणाएँ नहीं हैं? यदि परमेश्वर कार्य का यह चरण करने के लिए अंतिम युग में नहीं आता, तो जब परमेश्वर की बात आती तो समस्त मानवजाति एक काली परछाईं में ढकी होती। यदि ऐसा होता, तो पुरुष अपने आपको स्त्री से श्रेष्ठ समझता, और स्त्रियाँ कभी अपना सिर ऊँचा नहीं उठा पातीं, और तब एक भी स्त्री को बचाना संभव न होता। लोग हमेशा यही मानते हैं कि परमेश्वर पुरुष है, वह हमेशा से स्त्री से घृणा करता रहा है और कभी उसका उद्धार नहीं करेगा। यदि ऐसा होता, तो क्या यह सच नहीं है कि यहोवा द्वारा रची गयी सभी स्त्रियाँ, जो भ्रष्ट भी की जा चुकी हैं, उन्हें कभी भी बचाए जाने का अवसर न मिलता? तो क्या यहोवा के लिए स्त्री यानी हव्वा की रचना करना व्यर्थ नहीं हो गया होता? और क्या स्त्री अनंतकाल के लिए नष्ट नहीं हो जाती? इसलिए, अंत के दिनों में कार्य का यह चरण समस्त मानवजाति को बचाने के लिए किया जाता है, न कि सिर्फ स्त्री को। यदि कोई यह सोचता है कि अगर परमेश्वर ने स्त्री के रूप में देहधारण किया होता, तो वह मात्र स्त्रियों को बचाने के लिए होता, तो वह व्यक्ति और भी बड़ा मूर्ख होगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देह एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी हमारा सार एक समान है; हमारी देह भिन्न रूप धारण करती हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं। यद्यपि उनके देह किसी प्रकार के रक्त या भौतिक संबंध साझा नहीं करते, पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के द्वारा धारित देह हैं। यद्यपि वे रक्त से संबंधित नहीं हैं या एक ही भाषा साझा नहीं करते (एक पुरुष था जो यहूदियों की भाषा बोलता था और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है)। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए, उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद वे एक ही आत्मा के हैं—यानी उनका सार एक ही है—लेकिन उनकी देह के बाहरी आवरणों में कोई समानता नहीं है। बस उनकी मानवता समान है, परन्तु जहाँ तक उनकी देह के बाहरी स्वरूप और उनके जन्म की परिस्थितियों की बात है, वे दोनों समान नहीं हैं। इन चीजों का उनके अपने-अपने कार्य या उनके बारे में मनुष्य का जो ज्ञान है, उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अंतिम विश्लेषण में, वे एक ही आत्मा के हैं और उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं है, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और उनकी देह के अलग-अलग रक्त-संबंध हैं। उदाहरण के लिए, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है : वे एक ही और समान आत्मा के हैं। उसी तरह, आज के देहधारी परमेश्वर और यीशु में कोई रक्त-संबंध नहीं है, लेकिन वे हैं एक ही—क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। परमेश्वर दया और करुणा का, और साथ ही धार्मिक न्याय का, मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य को श्राप देने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
परमेश्वर केवल पवित्र आत्मा, आत्मा, सात गुना तीव्र आत्मा या सर्व-समावेशी आत्मा ही नहीं है, बल्कि एक मनुष्य भी है—एक साधारण मनुष्य, एक अत्यधिक सामान्य मनुष्य। वह नर ही नहीं, नारी भी है। वे इस बात में एक-समान हैं कि वे दोनों ही मनुष्यों से जन्मे हैं और इस बात में असमान हैं कि एक पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया और दूसरा मनुष्य से जन्मा, किंतु सीधे आत्मा से उत्पन्न है। वे इस बात में एक-समान हैं कि परमेश्वर के दोनों देहधारी शरीरों ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का बीड़ा उठा लिया है और असमान इस बात में हैं कि एक ने छुटकारे का कार्य किया, जबकि दूसरा विजय का कार्य करता है। दोनों परमपिता परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन एक प्रेममय-करुणा और दयालुता से भरा मुक्तिदाता है और दूसरा कोप और न्याय से भरा धार्मिकता का परमेश्वर है। एक सर्वोच्च सेनापति है जिसने छुटकारे का कार्य आरंभ किया, जबकि दूसरा धार्मिक परमेश्वर है जो विजय का कार्य संपन्न करता है। एक आरंभ है, दूसरा अंत। एक निष्पाप देह है, दूसरा वह देह जो छुटकारे को पूरा करता है, कार्य जारी रखता है और कभी भी पापी नहीं है। दोनों एक ही आत्मा हैं, लेकिन वे भिन्न-भिन्न देहों में वास करते हैं और भिन्न-भिन्न स्थानों पर पैदा हुए थे और उनके बीच कई हजार वर्षों का अंतर है। फिर भी उनका संपूर्ण कार्य एक-दूसरे का पूरक है, कभी परस्पर-विरोधी नहीं है, और एक-दूसरे के तुल्य है। दोनों ही मनुष्य हैं, लेकिन एक बालक था और दूसरी बालिका। इन तमाम वर्षों में लोगों ने न सिर्फ आत्मा को और न केवल एक मनुष्य, एक पुरुष को देखा है, बल्कि बहुत सारी ऐसी चीजें भी देखी हैं, जो मानव-धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं; इसलिए मनुष्य कभी मेरी पूरी तरह थाह नहीं ले पाते हैं और वे मुझ पर आधा विश्वास और आधा संदेह करते रहते हैं—मानो मैं विद्यमान तो हूँ, लेकिन मैं एक भ्रामक सपना भी हूँ—यही कारण है कि आज तक भी लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है। क्या तुम वास्तव में मुझे एक सरल वाक्य में समेट सकते हो? क्या तुम सचमुच यह कहने का साहस करते हो, “यीशु और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है, और परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि यीशु है”? क्या तुम सचमुच इतने निर्भीक हो कि यह कह सको, “परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि आत्मा है, और आत्मा और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है”? क्या तुम यह कहने का साहस करते हो, “परमेश्वर केवल देह ओढ़े हुए एक मनुष्य है”? क्या तुममें सचमुच दृढ़तापूर्वक यह कहने का साहस है, “यीशु की छवि परमेश्वर की महान छवि है”? क्या तुम अपनी साहित्यिक प्रतिभा का उपयोग करके परमेश्वर के स्वभाव और उसकी छवि को पूरी तरह समझा सकते हो? क्या तुम वास्तव में यह कहने की हिम्मत करते हो, “परमेश्वर ने अपनी छवि के अनुरूप सिर्फ नरों की रचना की, नारियों की नहीं”? अगर तुम ऐसा कहते हो, तो फिर मेरे चुने हुए लोगों के बीच कोई नारी नहीं होगी, नारियाँ मानवजाति का एक वर्ग तो बिल्कुल भी नहीं होंगी। अब क्या तुम वास्तव में जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या परमेश्वर मनुष्य है? क्या परमेश्वर आत्मा है? क्या परमेश्वर वास्तव में एक पुरुष है? क्या जो कार्य मुझे करना है, वह केवल यीशु ही पूरा कर सकता है? अगर तुम मेरा सार संक्षेप में बताने के लिए उपर्युक्त में से केवल एक को ही चुनते हो तो तुम एक ऐसे समर्पित विश्वासी हो जो अत्यंत अज्ञानी है। अगर मैं केवल एक बार देहधारण का कार्य करता, क्या तुम लोग मुझे सीमित कर देते? क्या तुम सचमुच एक झलक में मुझे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम अपने जीवनकाल में जिन बातों से रूबरू हुए हो उनके आधार पर मुझे सचमुच पूरी तरह समेट सकते हो? अगर मैंने अपने दोनों देहधारणों में एक समान कार्य किया होता तो तुम लोग मुझे किस रूप में देखते? क्या तुम मुझे हमेशा के लिए सलीब पर कीलों से ठोंका हुआ छोड़ दोगे? क्या परमेश्वर उतना सरल हो सकता है जितना तुम दावा करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?