8. आप इसकी गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों के परमेश्वर ने एक महिला के रूप में देहधारण किया है। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। बाइबल में लिखा है कि यीशु ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता कहकर पुकारा, और स्वर्ग के परमेश्वर ने यीशु को प्रिय पुत्र कहा। क्या पिता और पुत्र पुरुष नहीं हैं? बाइबल यह भी कहती है कि, "स्त्री का सिर पुरुष है" (1 कुरिन्थियों 11:3)। इसलिए महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं है, तो आप यह क्यों कहते हैं कि अंतिम दिनों के परमेश्वर ने एक महिला के रूप में देहधारण किया है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण का एक व्यवहारिक महत्व है। जब यीशु का आगमन हुआ, वह पुरुष था, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर स्त्री है। इससे, तुम देख सकते हो कि परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए पुरुष और स्त्री दोनों का सृजन किया और वह लिंग के बारे में कोई भी भेदभाव नहीं करता है। जब उसका आत्मा आगमन करता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वह देह उसका ही प्रतिनिधित्व करता है। चाहे यह पुरुष हो या स्त्री, दोनों ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि यह उसका देहधारी शरीर है। यदि यीशु एक स्त्री के रूप में आ जाता और प्रकट हो जाता, दूसरे शब्दों में, यदि पवित्र आत्मा के द्वारा एक शिशु कन्या का, न कि एक लड़के का, गर्भधारण किया गया होता, तब भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। यदि ऐसी बात होती तो, कार्य का यह स्तर एक पुरुष के द्वारा पूरा किया जाता और तब भी वह कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। दोनों ही चरणों में किया गया कार्य महत्वपूर्ण है; कोई भी कार्य दोहराया नहीं जाता है या एक-दूसरे का विरोध नहीं करता है। अपने कार्य के समय में, यीशु को इकलौता पुत्र कहा गया, "पुत्र" पुरुष लिंग का संकेत करता है। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो कि यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग के बारे में कोई भी भेदभाव नहीं करता है। उसका कार्य वैसे ही होता है जैसी वह इच्छा करता है और किसी प्रतिबंध के अधीन नहीं है, विशेषकर यह स्वतंत्र है, परन्तु प्रत्येक चरण का एक व्यवहारिक महत्व होता है। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और कहने की आवश्यकता नहीं कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम बार है। वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह स्वयं कार्य करने के लिए देह धारण नहीं करता जिसे मनुष्य देखे, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही अवधारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है और कि एक स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि सभी पुरुष को स्त्री पर अधिकार रखने वाला मानते थे। वे मानते थे कि कोई भी स्त्री अधिकार को धारण नहीं कर सकती है, सिर्फ पुरुष ही धारण कर सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मालिक है और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। अतीत में जब ऐसा कहा गया था कि पुरुष स्त्री का मालिक है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था, न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा द्वारा सृजन किया गया था। निस्संदेह, एक स्त्री को अपने पति की आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह से एक पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना अवश्य सीखना चाहिए। यही वे नियम और आदेश हैं जो यहोवा के द्वारा निर्धारित किए गए हैं जिनका पालन मानवजाति के द्वारा पृथ्वी पर अपने जीवन में किया जाना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, "तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" यह सिर्फ इसलिए कहा गया था ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व के अधीन सामान्य जीवन जी सके, ताकि मानवजाति के जीवन की संरचना हो और उसका जीवनक्रम व्यवस्थित रहे। इसलिए, यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, परन्तु ये सब मात्र पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों के सन्दर्भ में थे न कि देहधारी परमेश्वर की देह के सन्दर्भ में। परमेश्वर अपनी ही सृष्टि के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा सृजन की गई मानवजाति के लिए ही थे; ये नियम पुरुष और स्त्री के लिए निर्धारित किए गए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानव जाति का सृजन किया, तो उसने पुरुष और स्त्री दोनों को बनाया; इसलिए, उसका देहधारी शरीर का भी पुरुष या स्त्री में भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर तय नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार था जब उसने सबसे पहले मानवजाति की रचना की थी। अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। यदि मनुष्य उन वचनों को जो यहोवा के द्वारा आदम और हव्वा से कहे गए थे जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था, परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसे कि उसे करना चाहिए था? क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री बनना गलत है, तो क्या जब परमेश्वर ने स्त्री की रचना की तो यह एक बड़ी गलती नहीं रही होती? यदि मनुष्य अब भी मानता है कि परमेश्वर का स्त्री देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया और इसलिए अपनी पत्नी से प्रेम नहीं कर पाया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसी कि वर्तमान देहधारण की है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु के बारे में राय बनाने के लिए यहोवा के द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु के बारे में उस पुरुष के हिसाब से राय बनाते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम वर्तमान देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से राय नहीं बना सकते हो जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह अनुचित है! यदि तुम ऐसी राय बनाते हो, तो यह तुम्हारे विवेक के अभाव को साबित करता है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से सम्बंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था। उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचें कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। वे दोनों पूरी तरह से असम्बंधित है, और भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा नहीं हो सकता है कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मालिक है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह परमेश्वर स्वयं है, वह न सिर्फ स्त्री का मालिक है बल्कि पुरुष का भी मालिक है। वह सभी प्राणियों का प्रभु और सभी प्राणियों का मालिक है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मालिक का प्रतीक होना कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु एक पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम कैसे कह सकते हो कि वह एक ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा यीशु के भीतर आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट कर सकता था जिसे छला गया था? क्या वर्तमान में देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता है क्योंकि यह स्त्री थी जो सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि "स्त्री हमेशा पुरुष की आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त या प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है?"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

यदि परमेश्वर केवल एक पुरुष के रूप में देह में आए, तो लोग उसे पुरुष के रूप में, पुरुषों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित करेंगे, और कभी विश्वास नहीं करेंगे कि वह महिलाओं का परमेश्वर है। तब पुरुष यह मानेंगे कि परमेश्वर पुरुषों के समान लिंग का है, कि परमेश्वर पुरुषों का प्रमुख है—लेकिन फिर महिलाओं का क्या? यह अनुचित है; क्या यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं है? यदि यही मामला होता, तो वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया, उसके समान पुरुष होते, और एक भी महिला नहीं बचाई गई होती। जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने आदम को बनाया और उसने हव्वा को बनाया। उसने न केवल आदम को बनाया, बल्कि पुरुष और महिला दोनों को अपनी छवि में बनाया। परमेश्वर केवल पुरुषों का ही परमेश्वर नहीं है—वह महिलाओं का भी परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

यदि अंत के दिनों में इस चरण के पूरक के बिना ही यीशु का कार्य किया गया होता, तो मनुष्य ने हमेशा के लिए यह अवधारणा बना ली होती कि केवल यीशु ही परमेश्वर का पुत्र है, अर्थात्, परमेश्वर का सिर्फ एक ही पुत्र है, और यह कि उसके बाद कोई भी जो किसी दूसरे नाम से आता है वह परमेश्वर का एकमात्र पुत्र नहीं होगा, परमेश्वर स्वयं तो बिल्कुल भी नहीं होगा। मनुष्य की अवधारणा यह है कि वह जो पापबलि के रूप में सेवा करता है या जो परमेश्वर स्वयं में सामर्थ्य ग्रहण करता है और समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाता है, वही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है। कुछ ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि जब तक आने वाला कोई पुरुष है, उसे ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र और परमेश्वर का प्रतिनिधि समझा जा सकता है। यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं यीशु यहोवा का पुत्र है, उसका एकमात्र पुत्र। क्या यह मनुष्य की वाकई अतिशयोक्तिपूर्ण अवधारणा नहीं है? यदि कार्य का यह चरण अंत के युग में न किया गया होता, तो जब परमेश्वर की बात आती तो समस्त मानवजाति एक परछाई में ढक गई होती। यदि ऐसा होता, तो मनुष्य अपने बारे में एक स्त्री की तुलना में एक उच्च हैसियत वाला होना सोचता, और स्त्रियाँ कभी भी अपना सिर ऊँचा उठाने में सक्षम नहीं होतीं, ऐसी स्थिति में कोई भी स्त्री बचाई न गई होती। लोग हमेशा यही माना करते हैं कि परमेश्वर एक पुरुष है, और वह हमेशा स्त्री से घृणा करता है और स्त्री को उद्धार प्रदान नहीं करेगा। यदि ऐसा होता, तो क्या यह सत्य नहीं है कि सभी स्त्रियों को जो यहोवा के द्वारा बनाई गई हैं और भ्रष्ट भी हैं कभी भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिला होता? तो फिर क्या यहोवा के लिए स्त्री को बनाना, अर्थात्, हव्वा का बनाया जाना, व्यर्थ नहीं होता? और क्या स्त्री अनंतकाल के लिए नष्ट नहीं हो जाती? इसलिए, अंत के दिनों में कार्य का यह चरण समस्त मानवजाति को बचाने के लिए है, न कि सिर्फ स्त्री को। यदि कोई यह सोचता है कि अगर परमेश्वर ने स्त्री के रूप में देहधारण किया, तो वह मात्र स्त्रियों को बचाने के लिये होगा, तो वह व्यक्ति सचमुच बेवकूफ़ है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देहों का कोई सम्बंध नहीं है, किन्तु हमारी पवित्रात्माएँ एक ही हैं; यद्यपि हम जो करते हैं और जिस कार्य को हम वहन करते हैं वे एक ही नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम समान हैं; हमारी देहें भिन्न रूप धारण करती हैं, और यह ऐसा युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकता के कारण है; हमारी सेवकाई सदृश्य नहीं है, इसलिए जो कार्य हम लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और प्राप्त करता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनकी देहों के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और यद्यपि वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे थे, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु उनके आत्मा एक हैं। यद्यपि उनकी देहें किसी भी तरीके से रक्त या देह का सम्बंध साझा नहीं करती हैं, किन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर का देहधारण हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं, यद्यपि वे एक ही व्यक्ति के वंशज या सामान्य मानव भाषा (एक पुरुष था जिसने यहूदियों की भाषा बोली और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है) को साझा नहीं करते हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद भी वे एक ही आत्मा हैं, उनका सार एक ही है, उनके देहों के बाहरी आवरणों के बीच बिल्कुल भी पूर्ण समानताएँ नहीं है। वे मात्र एक ही मानजाति को साझा करते हैं, परन्तु उनके देहों का प्रकटन और जन्म समान नहीं हैं। इनका उनके अपने-अपने कार्य या मनुष्य के पास उनके बारे में जो ज्ञान है उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि, आखिरकार, वे एक ही आत्मा हैं और कोई भी उन्हें अलग नहीं कर सकता है। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं हैं, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्माओं के द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य देते हैं और उनके देह को अलग-अलग रक्त-संबंध से जोड़ते हैं। उसी तरह, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, वैसे ही जैसे कि यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है। वे एक ही आत्मा हैं। ठीक वैसे ही जैसे आज का देहधारी परमेश्वर और यीशु हैं। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं हैं; वे एक ही हैं; क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। वह दया और करुणा का, और साथ ही धर्मी न्याय का और मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य पर श्राप लाने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता है? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

परमेश्वर न केवल पवित्रात्मा, वह आत्मा जो सात गुना तीव्र पवित्रात्मा, सर्व-व्यापी पवित्रात्मा है, बल्कि एक व्यक्ति, एक साधारण व्यक्ति, अपवादात्मक रूप से एक सामान्य व्यक्ति भी है। वह न सिर्फ़ नर, बल्कि नारी भी है। वे इस बात में एक समान हैं कि वे दोनों ही मनुष्यों से जन्मे हैं, और इस बात पर असमान हैं कि एक का पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण किया गया है और दूसरा, मानव से जन्मा है, परन्तु प्रत्यक्ष रूप से पवित्रात्मा से ही उत्पन्न है। वे इस बात में एक समान हैं कि परमेश्वर के दोनों शरीर परमपिता परमेश्वर पिता का कार्य करते हैं और इस बात में असमान हैं कि एक तो छुटकारे का कार्य करता है और दूसरा जीतने का कार्य करता है। दोनों परमेश्वर पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं, परन्तु एक छुटकारे का प्रभु है जो करुणा और दया से भरा हुआ है और दूसरा धार्मिकता का परमेश्वर है जो क्रोध और न्याय से भरा हुआ है। एक छुटकारे के कार्य को शुरू करने के लिए सर्वोच्च सेनापति है और दूसरा जीतने के कार्य को पूरा करने के लिए धार्मिक परमेश्वर है। एक आरम्भ है और दूसरा अंत है। एक निष्पाप शरीर है, दूसरा वह शरीर है जो छुटकारे को पूरा करता है, कार्य को जारी रखता है और कभी भी पाप नहीं करता है। दोनों एक ही पवित्रात्मा हैं, परन्तु वे भिन्न-भिन्न देहों में निवास करते हैं और भिन्न-भिन्न स्थानों में पैदा हुए हैं। और वे कई हज़ार वर्षों से अलग-अलग हैं। फिर भी उनका सम्पूर्ण कार्य पारस्परिक रूप से पूरक है, कभी भी विरोधाभासी नहीं है, और एक ही साँस में बोला जा सकता है। दोनों ही लोग हैं, परन्तु एक बालक शिशु है और दूसरी एक नवजात बालिका है। इन कई वर्षों तक, लोगों ने न सिर्फ़ पवित्रात्मा को और न सिर्फ एक पुरुष, एक नर को देखा है, बल्कि कई ऐसी चीजों को भी देखा है जो मनुष्य की अवधारणाओं की हँसी नहीं उड़ाती हैं, और इस प्रकार वे कभी भी मेरी पूरी तरह थाह पाने में समर्थ नहीं हैं। वे मुझ पर आधा विश्वास और आधा संदेह करते हैं, मानो कि मेरा अस्तित्व है और फिर भी मैं एक मायावी स्वप्न हूँ। यही कारण है कि आज तक, लोग अभी भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर क्या है। क्या तुम वास्तव में एक वाक्य में मेरा सारांश दे सकते हो? क्या तुम सचमुच में यह कहते हो "यीशु परमेश्वर के अलावा कोई और नहीं है, और परमेश्वर यीशु के अलावा कोई और नहीं है"? क्या तुम वास्तव में यह कहने का साहस रखते हो "परमेश्वर पवित्रात्मा के अलावा कोई और नहीं है, और पवित्रात्मा परमेश्वर के अलावा कोई और नहीं है"? क्या तुम सहजता से कह सकते हो कि "परमेश्वर सिर्फ़ देह में प्रकट एक व्यक्ति है"? क्या तुममें सचमुच दृढ़तापूर्वक कहने का साहस है कि "यीशु की छवि परमेश्वर की महान छवि मात्र है"? क्या तुम वचनों के अपने उपहार की ताक़त पर परमेश्वर के स्वभाव और उसकी छवि को अच्छी तरह से समझाने में समर्थ हो? क्या तुम वास्तव में यह कहने की हिम्मत रखते हो कि "परमेश्वर ने सिर्फ़ पुरुष को अपनी स्वयं की छवि में बनाया, महिला को नहीं"? यदि तुम ऐसा कहते हो, तो फिर मेरे चुने हुए लोगों के बीच कोई महिला नहीं होगी और मानवजाति के भीतर स्त्री का और कोई प्रकार तो बिल्कुल भी नहीं होगा। क्या अब तुम वास्तव में जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या परमेश्वर एक मनुष्य है? क्या परमेश्वर एक पवित्रात्मा है? क्या परमेश्वर वास्तव में एक पुरुष है? क्या केवल यीशु ही उस कार्य को पूरा कर सकता है जिसे मैं करना चाहता हूँ? यदि तुम मेरे सार का सारांश करने के लिए उपरोक्त बातों में से केवल एक को चुनते हो, तो फिर तुम एक अत्यंत अज्ञानी निष्ठावान विश्वासी होगे। यदि मैं देहधारी के रूप में एक बार और केवल एक बार ही कार्य करूँ, तो क्या तुम लोग मेरी सीमा निर्धारित कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में एक झलक में मुझे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम बस उन चीजों के कारण, जिनके प्रति तुम अपने जीवनकाल के दौरान अनावृत हुए हो, वास्तव में मेरा सम्पूर्ण सारांश प्रस्तुत कर सकते हो? और यदि मैं अपने दोनों देहधारणों में एक समान कार्य करता हूँ, तो तुम कैसे मुझे समझोगे? क्या संभवतः तुम मुझे हमेशा के लिए सलीब पर चढ़ाया हुआ छोड़ सकते हो? क्या परमेश्वर इतना साधारण हो सकता है जितना तुम कहते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

पिछला: 7. आप कहते हैं कि प्रभु यीशु देह में, एक चीनी व्यक्ति के रूप में, लौट आया है। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। बाइबल में जो लिखा गया है उसके अनुसार, प्रभु यीशु एक यहूदी के रूप में विदा हुआ था, इसलिए हम मानते हैं कि जब प्रभु अंतिम दिनों के दौरान लौटता है, तो यह भी एक यहूदी के रूप में ही होना चाहिए। वह एक चीनी व्यक्ति के रूप में कैसे आ सकता था?

अगला: 1. हम मानते हैं कि महान श्वेत सिंहासन के न्याय का तात्पर्य स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा स्थापित एक महान मेज से है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन भर में किए गए पापों को स्वीकार करने के लिए जमीन पर घुटने टेकता है, जिसके बाद परमेश्वर इसका निर्धारण करता है कि वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करें, या नरक में उतरें। बहरहाल, आप गवाही देते हैं कि परमेश्वर पृथ्वी पर देह में आ गया है और यह कि वह सत्य को व्यक्त कर रहा और अंतिम दिनों के न्याय का कार्य कर रहा है। यह हमारी अपनी समझ से भिन्न क्यों है? परमेश्वर का अंतिम दिनों का न्याय आखिर किस बारे में है?

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