परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

हमारी पिछली कुछ संगतियों का तुममें से हर एक पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। फ़िलहाल, अंतत: लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को महसूस कर सकते हैं और यह भी कि परमेश्वर वास्तव में मनुष्य के बहुत निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया हो सकता है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और मतों को वास्तव में उस तरह से कभी भी नहीं समझा था, जिस तरह से वे अब समझते हैं, और न ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कर्मों को वास्तव में उस तरह से अनुभव किया था, जैसे वे अब करते हैं। चाहे वह ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ प्राप्त की है, और उन्होंने अतीत की अपनी खोजों की त्रुटियों का एहसास किया है, अपने अनुभव के उथलेपन का एहसास किया है और यह एहसास किया है कि उनके अनुभव का अधिकांश परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है, और यह एहसास किया कि जिस बात की मनुष्य में सबसे ज़्यादा कमी है, वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान। लोगों में यह ज्ञान केवल एक प्रकार का धारणा-आधारित ज्ञान है; तर्कसंगत ज्ञान के स्तर तक ऊँचा उठने के लिए उसका व्यक्ति के अनुभवों के जरिये धीरे-धीरे गहरा और मज़बूत होना आवश्यक है। इससे पहले कि मनुष्य सचमुच परमेश्वर को समझें, व्यक्तिपरक ढंग से यह कहा जा सकता है कि वे अपने हृदय में परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास तो करते हैं, किंतु उन्हें विशिष्ट प्रश्नों की वास्तविक समझ नहीं है, जैसे कि वह वास्तव में किस प्रकार का परमेश्वर है, उसकी इच्छा क्या है, उसका स्वभाव क्या है, और मानवजाति के प्रति उसका वास्तविक रवैया क्या है। यह परमेश्वर पर लोगों के विश्वास को बहुत जोखिम में डाल देता है, और उसे शुद्धता और पूर्णता प्राप्त नहीं करने देता। भले ही तुम परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हो जाओ, या यह महसूस करो कि तुमने अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर से भेंट की है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि तुम उसे पूर्णत: समझते हो। चूँकि तुम परमेश्वर के विचारों को नहीं जानते, न यह जानते हो कि वह किससे प्रेम करता है और किससे नफ़रत, कौन-सी चीज़ उसे क्रोधित करती है और किससे उसे खुशी मिलती है, इसलिए तुम्हें उसकी सही समझ नहीं है। तुम्हारा विश्वास तुम्हारी व्यक्तिपरक इच्छाओं के आधार पर अस्पष्टता और कल्पना की नींव पर बना हुआ है। वह अभी भी प्रामाणिक विश्वास होने से दूर है, और तुम अभी भी सच्चे अनुयायी बनने से दूर हो। बाइबल की इन कहानियों के उदाहरणों की व्याख्याओं ने मनुष्यों को परमेश्वर के हृदय को जानने में मदद की है, और यह जानने में भी कि अपने कार्य के हर कदम पर वह क्या सोच रहा था और उसने यह कार्य क्यों किया, ऐसा करते समय उसका मूल इरादा और योजना क्या थी, उसने अपने विचार कैसे हासिल किए, और उसने अपनी योजना कैसे तैयार की और उसे कैसे विकसित किया। इन कहानियों के माध्यम से हम परमेश्वर के छह हज़ार वर्षों के प्रबंधन के कार्य के दौरान उसके प्रत्येक विशिष्ट इरादे और प्रत्येक वास्तविक विचार, और विभिन्न समयों पर और विभिन्न युगों में मनुष्यों के प्रति उसके रवैये की एक विस्तृत और विशिष्ट समझ प्राप्त कर सकते हैं। अगर लोग यह समझ सकें कि परमेश्वर क्या सोच रहा था, उसका दृष्टिकोण क्या था, और हर परिस्थिति का सामना करते हुए उसने कैसा स्वभाव प्रकट किया था, तो इससे प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अधिक गहराई से एहसास करने में, तथा परमेश्वर की व्यावहारिकता और प्रामाणिकता को और अधिक गहराई से महसूस करने में मदद मिल सकती है। इन कहानियों को बताने का मेरा उद्देश्य लोगों को बाइबल का इतिहास समझाना नहीं है, न ही उन्हें बाइबल के पदों से या उसमें वर्णित लोगों से परिचित होने में उनकी सहायता करना है, और विशेष रूप से लोगों को परमेश्वर द्वारा व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की पृष्ठभूमि समझने में सहायता करना तो बिलकुल भी नहीं है। बल्कि यह परमेश्वर की इच्छा, उसके स्वभाव, और उसके छोटे-से-छोटे भाग को समझने में, और परमेश्वर के बारे में और अधिक प्रामाणिक तथा सटीक समझ और ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करने के लिए है। इस तरह, लोगों का हृदय थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के प्रति खुल सकता है, परमेश्वर के निकट हो सकता है और वे उसे, उसके स्वभाव को, उसके सार को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, और सच्चे स्वयं परमेश्वर को बेहतर ढंग से जान सकते हैं।

परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप के ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह परमेश्वर पर और अधिक विश्वास रखने और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उनकी सहायता कर सकता है। तब वे आँख मूँदकर उसका अनुसरण या आराधना नहीं करते रहते। परमेश्वर को मूर्ख या आँख मूँदकर भीड़ का अनुसरण करने वाले नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे लोगों का एक समूह चाहिए, जिनके हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान हो और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हों, ऐसे लोग जो परमेश्वर की मनोहरता की वजह से, उसके स्वरूप की वजह से और उसके धार्मिक स्वभाव की वजह से उसका कभी परित्याग नहीं करेंगे। परमेश्वर के अनुयायी के रूप में, यदि तुम्हारे हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मानवजाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अस्पष्टता या भ्रम है, तो तुम्हारा विश्वास परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और वह इस प्रकार के लोगों का अपने सामने आना पसंद नहीं करता। चूँकि इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझते, इसलिए वे अपना हृदय परमेश्वर को देने में असमर्थ हैं—उनका हृदय उसके लिए बंद है, इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धताओं से भरा हुआ है। उनका परमेश्वर का अनुसरण केवल अंधानुसरण ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और केवल तभी सच्चे अनुयायी बन सकते हैं, जब उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उनके भीतर परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय उत्पन्न करता हो। केवल इसी तरह से वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं और उसे उसके लिए खोल सकते हैं। परमेश्वर यही चाहता है, क्योंकि जो कुछ भी वे करते और सोचते हैं, वह परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर सकता है और परमेश्वर की गवाही दे सकता है। परमेश्वर के स्वभाव या स्वरूप, या जो कुछ भी वह करता है उसमें उसकी इच्छा और उसके विचारों के बारे में जो कुछ भी मैं तुम लोगों से कहता हूँ, और जिस भी परिप्रेक्ष्य से, जिस भी कोण से मैं इसके बारे में बात करता हूँ, वह सब परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व के बारे में तुम लोगों को और अधिक निश्चित होने, मानवजाति के लिए उसके प्रेम को वास्तव में और अधिक समझने और सराहने, और मनुष्यों के लिए परमेश्वर की चिंता और मानवजाति को बचाने और उसका प्रबंधन करने की उसकी ईमानदार इच्छा को वास्तव में और अधिक समझने और सराहने में तुम लोगों की सहायता करने के लिए है।

आज हम पहले मानवजाति के सृजन के बाद से परमेश्वर के विचारों, मतों और उसकी प्रत्येक गतिविधि का सार सारांश प्रस्तुत करेंगे। हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि उसने संसार की रचना करने से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक आरंभ तक कौन-सा कार्य किया है। तब हम यह पता लगा सकते हैं कि परमेश्वर के कौन-से विचार और मत मनुष्य के लिए अज्ञात हैं, और वहाँ से हम परमेश्वर की प्रबंधन योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस संदर्भ को अच्छी तरह से समझ सकते हैं, जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबंधन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और यह भी अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबंधन-कार्य से कौन-से परिणाम चाहता है—अर्थात् उसके प्रबंधन-कार्य का मर्म और उद्देश्य। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें एक सुदूर, स्थिर और शांत समय में जाने की आवश्यकता है, जब मनुष्य नहीं थे ...

जब परमेश्वर अपनी सेज से उठा, तो पहला विचार जो उसके मन में आया, वह यह था : एक जीवित व्यक्ति—एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—ऐसा मनुष्य, जो उसके साथ रहे और उसका निरंतर साथी बने; वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने मुट्ठीभर धूल उठाई और अपने मन में की गई कल्पना के अनुसार सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया, और फिर उसने उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को बना चुकने के बाद परमेश्वर ने कैसा महसूस किया? पहली बार उसने एक प्रियजन, एक साथी होने का आनंद महसूस किया। पहली बार उसने पिता होने के उत्तरदायित्व और उसके साथ आने वाली चिंता को भी महसूस किया। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनंद लेकर आया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था, जो परमेश्वर ने कभी किया था, जो परमेश्वर के विचारों या वचनों से संपन्न नहीं हुआ था, बल्कि जो उसने अपने हाथों से किया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, जो शरीर और आकार के साथ मांस और लहू से बना था, और जो परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने ऐसा आनंद महसूस किया, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। परमेश्वर ने वास्तव में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी-सी चेष्टा ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया। जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उसे उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार आया। यही घटनाओं की वह शृंखला थी, जो परमेश्वर को आए इस पहले विचार के साथ आरंभ हुई। परमेश्वर के लिए ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किंतु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा भी महसूस किया हो—आनंद, उत्तरदायित्व, चिंता—उसे साझा करने के लिए उसके पास कोई नहीं था। उस पल से आरंभ करके, परमेश्वर ने सच में ऐसा एकाकीपन और उदासी महसूस की, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। उसे लगा कि मनुष्य उसके प्रेम और चिंता को, या मनुष्य के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकता या समझ नहीं सकता, इसलिए उसे अभी भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने ये चीज़ें मनुष्य के लिए की थीं, किंतु मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे समझा नहीं था। प्रसन्नता के अलावा जो आनंद और संतुष्टि मनुष्य उसके लिए लाया था, वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आया। उस समय परमेश्वर के ये ही विचार और भावनाएँ थीं। जब परमेश्वर ये सब चीज़ें कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनंद से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, और ये सब भावनाएँ चिंता से घुल-मिल गईं। जो कुछ वह करना चाहता था, वह था इस व्यक्ति, इस मनुष्य को यह ज्ञात करवाना कि परमेश्वर के हृदय में क्या है, और शीघ्रता से अपनी इच्छाओं को समझवाना। तब वे लोग उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसकी इच्छा के अनुरूप हो सकते हैं। वे अब केवल परमेश्वर को बोलते हुए नहीं सुनेंगे और मूक नहीं बने रहेंगे; वे अब इस बात से अनजान नहीं रहेंगे कि परमेश्वर के साथ उसके कार्य में कैसे जुड़ें; इन सबसे ऊपर, वे अब परमेश्वर की अपेक्षाओं से उदासीन लोग नहीं रहेंगे। परमेश्वर द्वारा की गई ये पहली चीज़ें बहुत अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन-योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों का सृजन करने के बाद परमेश्वर ने आराम नहीं किया। वह अपने प्रबंधन को कार्यान्वित करने के लिए और उन लोगों को प्राप्त करने के लिए बेचैन और उत्सुक था, जिन्हें उसने मानवजाति के बीच बहुत प्रेम किया था।

आगे, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल-प्रलय आया। जल-प्रलय के अभिलेख में नूह का उल्लेख है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था, जिसने परमेश्वर का एक कार्य पूरा करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए उसका बुलावा प्राप्त किया था। निस्संदेह, यह भी पहली बार ही था, जब परमेश्वर ने अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए पृथ्वी पर किसी इंसान का आह्वान किया था। जब नूह ने जहाज़ बनाने का काम पूरा कर लिया, तो परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल-प्रलय किया। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल-प्रलय से नष्ट कर दिया, तो मनुष्यों का सृजन करने के समय से अब तक पहली बार ऐसा हुआ कि उसने अपने आप को उनके प्रति घृणा के वशीभूत महसूस किया था; इसी ने परमेश्वर को इस मानवजाति को जल-प्रलय द्वारा नष्ट करने का दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल-प्रलय द्वारा पृथ्वी को नष्ट देने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी, यह दर्शाने वाली वाचा कि वह दुनिया को फिर कभी जल-प्रलय से नष्ट नहीं करेगा। उस वाचा का चिह्न इंद्रधनुष था। यह मानवजाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इसलिए इंद्रधनुष परमेश्वर द्वारा दी गई वाचा का पहला चिह्न था; इंद्रधनुष एक वास्तविक, भौतिक चीज़ है, जो मौजूद है। यह इंद्रधनुष की मौजूदगी ही है, जो परमेश्वर को पूर्ववर्ती मानवजाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अकसर उदासी महसूस करवाता है, और उसके लिए एक निरंतर अनुस्मारक के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था...। परमेश्वर अपनी गति धीमी नहीं करना चाहता था—वह अपने प्रबंधन में अगला कदम उठाने के लिए बेचैन और उत्सुक था। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने संपूर्ण इस्राएल में अपने कार्य के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में अब्राहम को चुना। यह भी पहली बार था कि परमेश्वर ने ऐसे किसी उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने इस व्यक्ति के माध्यम से मानवजाति को बचाने का अपना कार्य शुरू करने और इस व्यक्ति के वंशजों के बीच अपना कार्य जारी रखने का संकल्प लिया। हम बाइबल में देख सकते हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ यही किया। तब परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी प्रथम चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों, के माध्यम से व्यवस्था के युग का अपना कार्य आरंभ किया। एक बार फिर पहली बार, परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान कीं, जिनका पालन मानवजाति को करना चाहिए, और उसने उन्हें विस्तार से समझाया। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, मानकीकृत नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें कौन-से त्योहार और दिन मनाने चाहिए, और अपने हर कार्य में उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को इस बारे में इतने विस्तृत, मानकीकृत विनियम और सिद्धांत दिए थे कि उन्हें अपना जीवन किस प्रकार जीना चाहिए।

हर बार जब मैं कहता हूँ "पहली बार", तो यह कार्य के उस प्रकार को संदर्भित करता है, जो परमेश्वर ने पहले कभी नहीं किया था। यह उस कार्य को संदर्भित करता है, जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मानवजाति और सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों का सृजन किया था, फिर भी उसने इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं किया था। इस समस्त कार्य में परमेश्वर द्वारा मनुष्यों का प्रबंधन शामिल था; यह सब मनुष्यों और परमेश्वर द्वारा उनके उद्धार और प्रबंधन से संबंधित था। अब्राहम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिर एक अन्य प्रथम कार्य किया—उसने अय्यूब को ऐसे व्यक्ति के रूप में चुना, जो व्यवस्था के अधीन रहता था और निरंतर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और परमेश्वर की गवाही देते हुए शैतान के प्रलोभनों का सामना कर सकता था। यह भी पहली बार ही था कि परमेश्वर ने शैतान को किसी इंसान को प्रलोभित करने दिया था, और पहली बार उसने शैतान के साथ शर्त लगाई थी। अंतत:, पहली बार उसने किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त किया, जो शैतान का सामना करते हुए परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम था, ऐसा व्यक्ति शैतान को पूर्णत: शर्मिंदा कर सकता था। जब से परमेश्वर ने मानवजाति को बनाया, तब से यह पहला व्यक्ति था, जिसे उसने प्राप्त किया था जो उसके लिए गवाही देने में सक्षम था। जब परमेश्वर ने इस व्यक्ति को प्राप्त कर लिया, तो अपने प्रबंधन को आगे बढ़ाने और अपने कार्य के अगले चरण के लिए स्थान और लोगों के चयन की तैयारी करते हुए वह अपने प्रबंधन को जारी रखने और अपने कार्य के अगले चरण को कार्यान्वित करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया।

इस सबके बारे में संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा की सही समझ प्राप्त हुई है? परमेश्वर अपने मानवजाति के प्रबंधन और उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता, केवल अपने वचनों से नहीं करता, और निश्चित रूप से आकस्मिक रवैये के साथ नहीं करता—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, मानकों के साथ और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मानवजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। कार्य चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, बाधाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने भी कमज़ोर क्यों न हों, या मानवजाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, इनमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपना श्रमसाध्य प्रयास करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है, उसका प्रबंधन करते हुए परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और उन सभी लोगों पर, जिन पर वह कार्य करेगा, और उस कार्य पर, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, अपनी संप्रभुता लागू कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है, जब परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मानवजाति को बचाने और उसका प्रबंधन करने की इस बड़ी परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है। कार्य करते हुए परमेश्वर थोड़ा-थोड़ा करके बिना किसी दुराव के मनुष्य के सामने अपने श्रमसाध्य प्रयास को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को व्यक्त और जारी कर रहा है। वह इन चीज़ों को उस तरह से जारी और व्यक्त करता है, जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है। इसलिए, पूरे ब्रह्मांड में, उन लोगों को छोड़कर जिन्हें परमेश्वर बचाने और जिनका प्रबंधन करने का उद्देश्य रखता है, कोई प्राणी कभी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग संबंध हो। उसके हृदय में मानवजाति, जिसका वह प्रबंधन और बचाव करना चाहता है, सबसे महत्वपूर्ण है; वह इस मानवजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह कभी उनका त्याग नहीं करता और बिना किसी शिकायत या पछतावे के अनथक रूप से अपना कार्य जारी रखता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह जानता है कि देर-सबेर लोग उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उसके वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उसकी ओर लौट आएँगे ...

आज यह सब सुनने के बाद तुम लोग यह महसूस कर सकते हो कि हर चीज़, जो परमेश्वर करता है, बिलकुल सामान्य होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य से मनुष्यों ने हमेशा उसके कुछ इरादे महसूस किए हैं, लेकिन उनकी भावनाओं या उनके ज्ञान, और परमेश्वर जो सोच रहा है, उनके बीच हमेशा एक निश्चित दूरी रही है। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि सभी लोगों के साथ इस बारे में संवाद करना आवश्यक है कि परमेश्वर ने मानवजाति को क्यों बनाया, और उन लोगों को प्राप्त करने की उसकी इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी, जिनकी उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ साझा करना आवश्यक है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। चूँकि परमेश्वर का हर एक विचार और मत, और उसके कार्य का हर एक चरण और हर अवधि उसके संपूर्ण प्रबंधन-कार्य से बँधे और निकटता से जुड़े हैं, इसलिए जब तुम परमेश्वर के कार्य के हर कदम में उसके विचारों, मतों और उसकी इच्छा को समझ लेते हो, तो यह इस बात को समझने के समान है कि उसकी प्रबंधन-योजना का कार्य किस प्रकार घटित हुआ। इसी बुनियाद पर परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ गहरी होती है। यद्यपि वह सब-कुछ, जो परमेश्वर ने पहली बार संसार को बनाते हुए किया, जिसका जिक्र मैंने पहले किया था, अब सत्य की खोज के लिए अप्रासंगिक, "जानकारी" मात्र प्रतीत होता है, किंतु तुम्हारे अनुभव के दौरान एक ऐसा दिन आएगा, जब तुम नहीं सोचोगे कि यह जानकारी के कुछ टुकड़ों के समान इतना साधारण है और न ही यह मात्र किसी किस्म का रहस्य है। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, या जब परमेश्वर तुम्हारे हृदय में थोड़ी जगह ले लेगा, या जब तुम और अच्छी तरह से और गहराई से उसकी इच्छा को समझ जाओगे, तब तुम उसके महत्व और उसकी आवश्यकता को सच में समझ पाओगे, जिसके बारे में मैं आज कह रहा हूँ। चाहे तुम लोग जिस भी हद तक इसे स्वीकार करो; तुम लोगों का इन चीज़ों को समझना और जानना फिर भी आवश्यक है। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपना कार्य संपन्न करता है, चाहे वह उसे अपने विचारों से करे या अपने हाथों से, चाहे उसे उसने पहली बार किया हो या अंतिम बार, अंततः परमेश्वर की एक योजना है, और हर चीज़ जो वह करता है, उसमें उसके उद्देश्य और विचार होते हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं और उसके स्वरूप को प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़ें—परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप—हर एक व्यक्ति को समझनी चाहिए। जब व्यक्ति उसके स्वभाव और स्वरूप को समझ जाता है, तो वह धीरे-धीरे यह समझ सकता है कि परमेश्वर जो करता है, वह क्यों करता है और वह जो कहता है, वह क्यों कहता है। इससे उनमें तब परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य की खोज करने और अपने स्वभाव में परिवर्तन करने के लिए और अधिक विश्वास हो सकता है। अर्थात्, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसका विश्वास एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।

यदि लोग जिसके बारे में जानते हैं या जिसकी समझ प्राप्त करते हैं, वह परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है, तो वे जो प्राप्त करते हैं, वह जीवन होगा जो परमेश्वर से आता है। जब यह जीवन तुम्हारे भीतर गढ़ दिया जाएगा, तो तुममें परमेश्वर का भय अधिक से अधिक होता जाएगा। यह एक ऐसा लाभ है, जो बहुत स्वाभाविक रूप से आता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते, यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केंद्रित करना तक नहीं चाहते, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास का अनुसरण कर रहे हो, वह तुम्हें कभी भी उसकी इच्छा पूरी करने या उसकी प्रशंसा प्राप्त करने नहीं दे सकता। इतना ही नहीं, तुम कभी वास्तव में उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते—ये अंतिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, तो वे रुचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरंभ कर देते हैं। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-कपट नहीं है, कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, अनुकंपा और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे अनुभव कर सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में तुम्हें घेरे रहने वाले लोग, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे शायद ही उल्लेखनीय हों। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, या कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, और तुम उसका धैर्य, उसकी सहनशीलता और अपने बारे में उसकी समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग और तुम्हारे जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता भी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सबसे ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

हमने अभी-अभी परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य, उसके द्वारा संपन्न की गई अभूतपूर्व कार्यों की शृंखला के बारे में बात की। इनमें से हर एक चीज़ परमेश्वर की प्रबंधन-योजना और परमेश्वर की इच्छा के लिए प्रासंगिक है। ये स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार के लिए भी प्रासंगिक हैं। यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को और अधिक समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग पर नहीं रुक सकते—हमें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में उठाए गए कदमों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इसलिए, जिस प्रकार परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अंत और अनुग्रह के युग का आरंभ किया था, उसी प्रकार हमारे अपने कदम भी उसी का अनुसरण करते हुए अनुग्रह के युग में आ जाएँ—एक ऐसा युग, जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में परमेश्वर ने पुन: एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया, जो पहले नहीं किया गया था। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मानवजाति दोनों के लिए एक नया प्रारंभिक बिंदु था—ऐसा प्रारंभिक बिंदु, जिसमें परमेश्वर द्वारा किया गया एक और नया कार्य शामिल था, जो पहले कभी नहीं किया गया था। यह नया कार्य अभूतपूर्व था, जो मनुष्यों और समस्त प्राणियों की कल्पना-शक्ति से परे था। यह ऐसा कार्य है, जिसे अब सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं—पहली बार परमेश्वर एक मनुष्य बना, और पहली बार उसने एक मनुष्य के रूप, मनुष्य की पहचान के साथ, नया कार्य आरंभ किया। इस नए कार्य ने प्रकट किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया था, और कि वह व्यवस्था के अधीन अब और कुछ नहीं करेगा या बोलेगा। न ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के सिद्धांतों या नियमों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसका समस्त कार्य हमेशा के लिए रुक गया था और जारी नहीं रह गया था, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य आरंभ करना और नई चीज़ें करना चाहता था। उसकी योजना का एक बार फिर से एक नया प्रारंभिक बिंदु था, और इसलिए परमेश्वर को मानवजाति की एक नए युग में अगुआई करनी थी।

यह मनुष्य के लिए आनंददायक समाचार था या अशुभ, यह प्रत्येक व्यक्ति के सार पर निर्भर करता था। ऐसा कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह आनंददायक समाचार नहीं था, बल्कि अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो जिन लोगों ने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, जिन्होंने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था किंतु परमेश्वर का भय नहीं माना था, वे परमेश्वर के पुराने कार्य का उपयोग उसके नए कार्य पर दोष लगाने के लिए करने की ओर प्रवृत्त होने लगे। इन लोगों के लिए यह एक अशुभ समाचार था; परंतु हर उस व्यक्ति के लिए, जो निर्दोष और साफ़दिल था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके द्वारा छुटकारा पाने का इच्छुक था, परमेश्वर का पहला देहधारण बहुत आनंददायक समाचार था। क्योंकि जबसे मनुष्य अस्तित्व में लाए गए हैं, यह पहली बार था जब परमेश्वर एक ऐसे रूप में मानवजाति के बीच प्रकट हुआ और रहा था; जो पवित्रात्मा का रूप नहीं था; इस बार वह मनुष्य से जन्मा था और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच रहता था और काम करता था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला; यह सभी कल्पनाओं से परे था। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों को एक वास्तविक लाभ प्राप्त हुआ। परमेश्वर ने न केवल पुराने युग को समाप्त किया, बल्कि उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया। उसने अब अपने संदेशवाहकों को अपनी इच्छा संप्रेषित करने के लिए नहीं कहा, अब वह बादलों में छिपा हुआ नहीं रहा, और न ही अब वह गर्जना के माध्यम से आज्ञा देते हुए मनुष्यों के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला। पहले की किसी भी चीज़ के असदृश, एक ऐसी पद्धति के माध्यम से जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय थी और जिसे समझना और स्वीकार करना उनके लिए कठिन था—देह बनना—वह उस युग का कार्य शुरू करने के लिए मनुष्य का पुत्र बना। परमेश्वर के इस कार्य से मानवजाति हक्की-बक्की रह गई; इसने उन्हें शर्मिंदा कर दिया, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया, जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था। आज हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि परमेश्वर ने इस नए युग में कौन-सा नया कार्य शुरू किया, और हम इस पर विचार करेंगे कि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की दृष्टि से इस नए कार्य में हमारे लिए सीखने को क्या है?

बाइबल के नए नियम में निम्नलिखित वचन दर्ज़ हैं :

1. मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2. मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ, पहले इस अंश पर नज़र डालें : "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

मैंने यह अंश क्यों चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या संबंध है? इस पाठ में पहली चीज़ जो हम जानते हैं, वह है कि यह सब्त का दिन था, लेकिन प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को मकई के खेतों में ले गया। इससे भी ज्यादा "विश्वासघाती" बात यह रही कि वे मकई की "बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते—बहुत-सी चीज़ें थीं, जो सब्त के दिन नहीं की जा सकती थीं। प्रभु यीशु द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए पेचीदा था, जो एक लंबे समय से व्यवस्था के अधीन रहे थे, और इसने आलोचना भी भड़काई। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया, उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले इस बात की चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने सभी दिनों में से सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था, जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है, जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु आया, तो उसने लोगों को यह बताने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा कह दिया है और नया कार्य शुरू किया है, और इस नए कार्य में सब्त का पालन करना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर का सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आना उसके नए कार्य का बस एक पूर्वाभास था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना बाकी था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारंभ किया, तो उसने व्यवस्था की बेड़ियों को पहले ही पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विनियम और सिद्धांत तोड़ दिए थे। उसमें व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का कोई निशान नहीं था; उसने उसे पूरी तरह से छोड़ दिया था और अब उसका पालन नहीं करता था, और उसने मानवजाति से आगे उसका पालन करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया; वह बाहर काम कर रहा था और आराम नहीं कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह अब व्यवस्था के अधीन नहीं रह रहा था, और उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया था और एक नई कार्यशैली के साथ वह मानवजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ था। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है, जो व्यवस्था के अधीन रहने से उभरने और सब्त से अलग होने से आरंभ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य किया, तो वह अतीत से चिपका नहीं रहा, और वह अब व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में चिंतित नहीं था, न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन भी उसी तरह से कार्य किया, जैसे वह दूसरे दिनों में करता था, और सब्त के दिन जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब परमेश्वर की निगाहों में बिलकुल सामान्य था। परमेश्वर अपना बहुत-सा नया कार्य करने के लिए, जिसे वह करना चाहता है, और नए वचन कहने के लिए, जिन्हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरुआत कर सकता है। जब वह एक नई शुरुआत करता है, तो वह न तो अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है, न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के अपने सिद्धांत हैं, जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानवजाति को अपने कार्य के एक नए चरण में ले जाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश करता है। यदि लोग पुरानी कहावतों या नियमों के अनुसार काम करते रहते हैं या उनसे चिपटे रहते हैं, तो वह इसे याद नहीं रखेगा या इसका अनुमोदन नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह पहले ही एक नया कार्य ला चुका है, और अपने कार्य के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह नया कार्य आरंभ करता है, तो वह मानवजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है, ताकि लोग उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुरानी चीज़ों से चिपका नहीं रहता या पुराने मार्ग पर नहीं चलता; जब वह कार्य करता और बोलता है, तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता, जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में सब-कुछ स्वतंत्र और मुक्त है, और कोई निषेध नहीं है, कोई बाधा नहीं है—वह मानवजाति के लिए आज़ादी और मुक्ति लाता है। वह एक जीवित परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर, जो वास्तव में, सच में मौजूद है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिलकुल भिन्न है, जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवंत है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए संपूर्ण जीवन और ज्योति, संपूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति लेकर आते हैं, क्योंकि वह सत्य, जीवन और मार्ग धारण करता है—वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता। लोग चाहे कुछ भी कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से देखें या कैसे भी उसका आकलन करें, वह बिना किसी आशंका के अपना कार्य पूरा करेगा। अपने कार्य और वचनों के संबंध में वह किसी की भी धारणाओं या उस पर उठी उँगलियों की, यहाँ तक कि अपने नए कार्य के प्रति उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिंता नहीं करेगा। परमेश्वर जो करता है, उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, नष्ट-भ्रष्ट करने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें, कोई निषेध नहीं है, वह किसी मनुष्य, घटना या चीज़ द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, न ही उसे किसी विरोधी ताक़त द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और सभी विरोधी ताक़तें और मानवजाति के सभी पाखंड और भ्रांतियाँ उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिए जाते हैं। वह अपने कार्य का चाहे जो भी नया चरण संपन्न कर रहा हो, उसे निश्चित रूप से मानवजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, और उसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाध रूप से कार्यान्वित किया जाएगा, जब तक कि उसका महान कार्य पूरा नहीं हो जाता। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, उसका अधिकार और सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु सब्त के दिन खुले तौर पर बाहर जा सकता था और कार्य कर सकता था, क्योंकि उसके हृदय में मानवजाति से उत्पन्न कोई नियम, ज्ञान या सिद्धांत नहीं थे। उसके पास केवल परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था। उसका कार्य मानवजाति को स्वतंत्र करने, लोगों को मुक्त करने, उन्हें प्रकाश में रहने देने और उन्हें जीने देने का मार्ग था। इस बीच, जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं, वे सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बंधनों में जीते हैं—आज एक चीज़ निषिद्ध होती है, कल दूसरी—उनके जीवन में कोई स्वतंत्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं, जिनके जीवन में कहने को कोई खुशी नहीं है। "निषेध" क्या दर्शाता है? यह विवशता, बंधन और बुराई दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है, तो वह एक झूठे ईश्वर और बुरी आत्मा की आराधना कर रहा होता है। इस तरह की गतिविधियाँ शामिल होने पर निषेध साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते, आज तुम बाहर नहीं जा सकते, कल तुम अपना खाना नहीं बना सकते, परसों तुम नए घर में नहीं जा सकते, विवाह और अंत्येष्टि के लिए, यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिन ही चुनने होंगे। इसे क्या कहा जाता हैं? इसे निषेध कहा जाता है; यह मानवजाति का बंधन है, और ये शैतान और बुरी आत्माओं की जंज़ीरें लोगों को नियंत्रित कर रही हैं, और उनके हृदय और शरीर को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबंध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? परमेश्वर की पवित्रता की बात करते समय तुम्हें पहले यह सोचना चाहिए : परमेश्वर के साथ कोई निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में सिद्धांत हैं, किंतु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि स्वयं परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।

आओ, अब पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश देखें : "पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मंदिर" किसे संदर्भित करता है? आसान शब्दों में कहें तो, यह एक भव्य, ऊँची इमारत को संदर्भित करता है, और व्यवस्था के युग में मंदिर याजकों के लिए परमेश्वर की आराधना करने का स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," तो "वह" किसे संदर्भित करता है? स्पष्ट रूप से "वह" देह में मौजूद प्रभु यीशु है, क्योंकि केवल वही मंदिर से बड़ा था। इन वचनों ने लोगों को क्या बताया? उन्होंने लोगों को मंदिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही मंदिर को छोड़ चुका है और अब उसमें कार्य नहीं कर रहा, इसलिए लोगों को मंदिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्न ढूँढ़ने चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तो उसके वचनों के पीछे एक आधार था और वह यह कि व्यवस्था के अधीन लोग मंदिर को स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा समझने लगे थे। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाय मंदिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि उनके बजाय परमेश्वर की आराधना करें, क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहा : "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकतर लोग अब यहोवा की आराधना नहीं करते थे, बल्कि बेमन से केवल बलिदान करते थे, और प्रभु यीशु ने तय किया कि यह मूर्ति-पूजा है। इन मूर्ति-पूजकों ने मंदिर को परमेश्वर से बड़ी और ऊँची चीज़ समझ लिया था। उनके हृदय में केवल मंदिर था, परमेश्वर नहीं, और यदि उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ता, तो उनका निवास-स्थान भी छूट जाता। मंदिर के अतिरिक्त उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी, और वे अपने बलिदान नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित "निवास-स्थान" वह था, जहाँ वे यहोवा परमेश्वर की आराधना करने का झूठा दिखावा करते थे, ताकि वे मंदिर में रह सकें और अपने खुद के क्रियाकलाप कर सकें। उनका तथाकथित "बलिदान" मंदिर में सेवा करने की आड़ में अपने खुद के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहार कार्यान्वित करना भर था। यही कारण था कि उस समय लोग मंदिर को परमेश्वर से भी बड़ा समझते थे। प्रभु यीशु ने ये वचन लोगों को चेतावनी देने के लिए बोले थे, क्योंकि वे मंदिर का उपयोग एक आड़ के रूप में, और बलिदानों का उपयोग लोगों और परमेश्वर को धोखा देने के एक आवरण के रूप में करते थे। यदि तुम इन वचनों को वर्तमान में लागू करो, तो ये अभी भी उतने ही वैध और प्रासंगिक हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों की तुलना में परमेश्वर के एक भिन्न कार्य का अनुभव किया है, किंतु उनकी प्रकृति का सार एक-समान है। आज के कार्य के संदर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ें करेंगे, जो इन वचनों में दर्शाई गई हैं, "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपना कर्तव्य निभाने को अपने कार्य के रूप में देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के लिए मानवाधिकारों की रक्षा हेतु किए जाने वाले राजनीतिक आंदोलनों के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को अपने कौशलों का उपयोग आजीविका में करने की ओर मोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं, बल्कि धार्मिक सिद्धांत के एक अंश के पालन के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या ये व्यवहार बिलकुल "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है" के समान नहीं हैं? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय भौतिक मंदिरों में कर रहे थे, जबकि आज लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय अमूर्त मंदिरों में करते हैं। जो लोग नियमों को महत्व देते हैं, वे नियमों को परमेश्वर से बड़ा समझते हैं; जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं, वे हैसियत को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं; जो लोग अपनी आजीविका से प्रेम करते हैं, वे आजीविका को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने के लिए बाध्य करती हैं : "लोग अपने वचनों से परमेश्वर को सबसे बड़ा कहकर उसकी स्तुति करते हैं, किंतु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बड़ी है।" ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने या अपना व्यवसाय या अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलता है, वे परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अपने आप को अपनी प्यारी आजीविका में झोंक देते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, उसे और उसकी इच्छा को बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। इन लोगों की स्थिति और दो हज़ार वर्ष पहले मंदिर में अपना व्यवसाय करने वाले लोगों की स्थिति में क्या अंतर है?

आगे, आओ इस अंश के इस अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का कोई व्यावहारिक पक्ष है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पक्ष को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है, उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? हो सकता है, तुम लोग अब इस वाक्य का अर्थ समझ पाओ, लेकिन जब यह कहा गया था, तब बहुत लोग नही समझे थे, क्योंकि मानवजाति बस व्यवस्था के युग से बाहर निकली ही थी। उनके लिए सब्त से अलग होना बहुत कठिन बात थी, सच्चा सब्त क्या होता है, इसे समझने की तो बात ही छोड़ो।

"मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" वाक्य लोगों को बताता है कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ भौतिक प्रकृति की नहीं है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, लेकिन जब तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों से मिलने वाली संतुष्टि तुम्हारी सत्य की खोज का स्थान ले सकती है? यह स्पष्टत: संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप, जिसके बारे में हमने संगति की है, दोनों सत्य हैं। इनका मूल्य भौतिक वस्तुओं से नहीं मापा जा सकता, चाहे वे कितनी भी मूल्यवान हों, न ही इनके मूल्य की गणना पैसों में की जा सकती है, क्योंकि ये कोई भौतिक वस्तुएँ नहीं है, और ये हर एक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन अमूर्त सत्यों का मूल्य ऐसी किसी भी भौतिक चीज़ से बढ़कर होना चाहिए, जिसे तुम मूल्यवान समझते हो, या नहीं? यह कथन ऐसा है, जिस पर तुम लोगों को सोच-विचार करने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा है, उसका मुख्य बिंदु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उससे संबंधित हर चीज़ प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और उन्हें किसी भौतिक चीज़ से बदला नहीं जा सकता। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगा : जब तुम भूखे होते हो, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन कमोबेश अच्छा हो सकता है, या कमोबेश असंतोषजनक हो सकता है, किंतु यदि उससे तुम्हारा पेट भर जाता है, तो भूखे होने का वह अप्रिय एहसास अब नहीं रहेगा—वह मिट जाएगा। तुम चैन से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम महसूस करेगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किंतु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हें उसके बारे में कोई समझ नहीं है, तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे? क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हो और उसकी इच्छा तुम्हारी समझ में नहीं आती, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का उपयोग कर सकते हो? परमेश्वर के माध्यम से उद्धार के अपने अनुभव की प्रक्रिया में, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश करने के दौरान, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझते हो या यह नहीं जानते कि सत्य क्या है, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो क्या तुम बहुत व्याकुल महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने हृदय में ज़बरदस्त भूख और प्यास महसूस नहीं करोगे? क्या ये एहसास तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति महसूस करने से रोकेंगे नहीं? तो तुम अपने हृदय की उस भूख की भरपाई कैसे कर सकते हो—क्या इसके समाधान का कोई तरीका है? कुछ लोग खरीददारी करने चले जाते हैं, कुछ लोग मन की बात कहने के लिए मित्रों को खोजते हैं, कुछ लोग लंबी तानकर सो जाते हैं, अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ते हैं, या वे अपने कर्तव्य निभाने के लिए और कड़ी मेहनत और प्रयास करते हैं। क्या ये चीज़ें तुम्हारी वास्तविक कठिनाइयों का समाधान कर सकती हैं? तुम सभी इस प्रकार के अभ्यासों को पूर्णत: समझते हो। जब तुम शक्तिहीन महसूस करते हो, जब तुम परमेश्वर से प्रबुद्धता पाने की दृढ़ इच्छा महसूस करते हो जो तुम्हें सत्य की वास्तविकता और उसकी इच्छा ज्ञात करा सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवश्यकता होती है? तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, वह भरपेट भोजन नहीं है, और वह कुछ उदार वचन नहीं हैं, देह का क्षणिक आराम और संतुष्टि का तो कहना ही क्या—तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह यह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताए कि सत्य क्या है। जब तुम इसे समझ लेते हो, चाहे थोड़ा-सा ही क्यों न समझो, तो क्या तुम अपने हृदय में उससे अधिक संतुष्ट महसूस नहीं करोगे, जितना कि अच्छा भोजन करने पर महसूस करते हो? जब तुम्हारा हृदय संतुष्ट होता है, तो क्या तुम्हारा हृदय और तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व सच्ची शांति प्राप्त नहीं करता? इस उपमा और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोग अब समझे कि क्यों मैं तुम लोगों के साथ इस वाक्य को साझा करना चाहता था, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है"? इसका अर्थ है कि जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब-कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर हैं, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर तुम किसी समय विश्वास करते थे कि उसे तुमने सबसे अधिक सँजोया है। अर्थात्, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के मुँह से वचन प्राप्त नहीं कर सकता या उसकी इच्छा को नहीं समझता, तो वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता। अपने भविष्य के अनुभवों में तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब सत्य और जीवन होता है। सत्य वह चीज़ है, जिसकी लोग अपने जीवन में कमी नहीं कर सकते, और यह वह चीज़ है, जिसके बिना उनका कभी काम नहीं चल सकता; तुम यह भी कह सकते हो कि यह सबसे बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; यही वह एकमात्र चीज़ है, जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

हम अभी जिस बारे में संवाद कर रहे हैं, वह सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में है। इन कहानियों के माध्यम से, और घटित हुई इन चीज़ों के विश्लेषण के माध्यम से, लोग उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को, जो उसने प्रकट किया है, समझ सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के हर पहलू को और अधिक व्यापकता से, अधिक गहराई से, अधिक विस्तार से और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है। तो क्या परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका इन कहानियों के माध्यम से जानना ही है? नहीं, यह एकमात्र तरीका नहीं है! क्योंकि राज्य के युग में परमेश्वर जो कहता है और जो कार्य वह करता है, वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में, और उसे पूरी तरह से जानने में लोगों की बेहतर सहायता कर सकते हैं। किंतु मुझे लगता है कि बाइबल में दर्ज कुछ उदाहरणों और कहानियों के माध्यम से, जिनसे लोग परिचित हैं, परमेश्वर के स्वभाव को जानना और उसके स्वरूप को समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं तुम्हें परमेश्वर को जानने में सक्षम करने के लिए न्याय और ताड़ना के उन वचनों और सत्यों को, जिन्हें आज परमेश्वर प्रकट करता है, शब्दशः लेता हूँ, तो तुम इसे बहुत उबाऊ और थकाऊ महसूस करोगे, और कुछ लोग तो यहाँ तक महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन सूत्रबद्ध प्रतीत होते हैं। परंतु यदि मैं बाइबल की इन कहानियों को उदाहरणों के रूप में लेता हूँ, ताकि परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को मदद मिल सके, तो वे इसे उबाऊ नहीं पाएँगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करने के दौरान, उस समय जो परमेश्वर के हृदय में था, उसका विवरण—उसकी मनोदशा या मनोभाव, या उसके विचार और मत—लोगों को मनुष्य की भाषा में बताए गए हैं, और इस सबका उद्देश्य उन्हें यह समझाना और महसूस कराना है कि परमेश्वर का स्वरूप सूत्रबद्ध नहीं है। यह कोई पौराणिक या कुछ ऐसा नहीं है, जिसे लोग देख और छू नहीं सकते। यह कुछ ऐसा है, जो सचमुच मौजूद है, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि इस युग में रहने वाले लोग धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्य की विस्तृत समझ प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उसके द्वारा किए गए कार्य से उसके स्वभाव को देख सकते हैं; वे उसके द्वारा व्यक्त किए गए इन स्वभावों से मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और उसकी पवित्रता की ठोस अभिव्यक्तियों और मनुष्यों के लिए उसकी देखरेख को समझ सकते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर के स्वभाव के अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि तुम सभी लोग अब इसे महसूस कर सकते हो!

प्रभु यीशु द्वारा अनुग्रह के युग में पूर्ण किए गए कार्य के दायरे में तुम परमेश्वर के स्वरूप का एक अन्य पहलू देख सकते हो। यह पहलू उसके देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के कारण लोग उसे देखने और समझने में सक्षम थे। मनुष्य के पुत्र में लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता को जीया, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता देखी। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिलकुल सच्चा परमेश्वर दिखाया, और इनसे वे परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बना सके। किंतु संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अंत के बीच की समयावधि में, अर्थात् अनुग्रह के युग से पहले, लोगों द्वारा जो पहलू देखे, सुने और अनुभव किए गए, वे थे परमेश्वर की दिव्यता, परमेश्वर द्वारा अभौतिक क्षेत्र में की और कही गई चीज़ें, और वे चीज़ें, जो उसने अपने वास्तविक व्यक्तित्व से, जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता था, व्यक्त की थीं। प्रायः, ये चीजें लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर अपनी महानता में इतना बुलंद है कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते। परमेश्वर ने सामान्यतः लोगों पर जो प्रभाव छोड़ा, वह यह था कि वह स्वयं को समझने-बूझने की उनकी क्षमता के भीतर और बाहर झिलमिलाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमय और मायावी हैं कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं है, यहाँ तक कि वे उन्हें समझने-बूझने का प्रयास भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ बहुत दूर थी, इतनी दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिलकुल भी अस्तित्व में नहीं है। अत: लोगों के लिए परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना अलभ्य था, यहाँ तक कि उनकी पहुँच से बाहर था। भले ही परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए, और उसने कुछ विशेष वचन भी जारी किए और कुछ विशेष स्वभाव व्यक्त किए, ताकि लोग उसके बारे में कुछ सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकें और उसे समझ-बूझ सकें, फिर भी अंतत:, परमेश्वर के स्वरूप की ये अभिव्यक्तियाँ एक अभौतिक क्षेत्र से आई थीं, और लोगों ने जो समझा, जो उन्होंने जाना, वह फिर भी उसके स्वरूप का दिव्य पहलू ही था। इस अभिव्यक्ति से मानवजाति उसके स्वरूप की ठोस अवधारणा प्राप्त नहीं कर सकी, और परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा अभी भी "एक आध्यात्मिक देह, जिसके करीब जाना कठिन है, जो अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है" के दायरे में ही अटकी हुई थी। चूँकि लोगों के सामने प्रकट होने के लिए परमेश्वर ने भौतिक क्षेत्र की किसी विशिष्ट वस्तु या छवि का उपयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा का उपयोग करके उसे परिभाषित करने में असमर्थ थे। अपने हृदय और मस्तिष्क में लोग परमेश्वर के लिए एक मानक स्थापित करने, उसे मूर्त मानवीय बनाने के लिए हमेशा अपनी भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना ऊँचा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह ठीक-ठीक क्या पसंद करता है और उसका व्यक्तित्व कैसा है। वास्तव में, अपने हृदय में परमेश्वर जानता था कि लोग इस तरह से सोचते हैं। वह लोगों की आवश्यकताओं के बारे में बहुत स्पष्ट था, और निस्संदेह वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए अनुग्रह के युग में उसने एक अलग तरीके से अपने कार्य को अंजाम दिया। यह नया तरीका दिव्य और मानवीय दोनों था। जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उसमें लोग देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था और उनके साथ विभिन्न मामलों में चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत-सा ऐसा कार्य भी पूरा किया, जो उसकी दिव्यता दर्शाता था, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। इस दौरान, चूँकि परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण देह में उस रूप में साकार हुई थी, जिसे लोग देख और छू सकते थे, इसलिए अब उन्होंने यह महसूस नहीं किया कि वह अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है, या वे उसके करीब नहीं जा सकते। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हर गतिविधि, उसके वचनों और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। मनुष्य के देहधारी पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता व्यक्त की और परमेश्वर की इच्छा को मानवजाति तक पहुँचाया। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को भी प्रकट किया, जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता और जो आध्यात्मिक क्षेत्र में रहता है। लोगों ने स्वयं परमेश्वर को मूर्त रूप में, माँस और रक्त से निर्मित देखा। तो मनुष्य के देहधारी पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। भले ही परमेश्वर की छवि के संबंध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, किंतु उसका सार और स्वरूप स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—केवल अभिव्यक्ति के रूप में कुछ भिन्नताएँ थीं। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता और दिव्यता, दोनों रूपों में स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाई। हालाँकि इस दौरान परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की और मानवजाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और इसने लोगों को मानवजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य को देखने-सुनने और अनुभव करने का अवसर दिया। इसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और महानता के संबंध में अंतर्दृष्टि और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारंभिक समझ और परिभाषा भी प्रदान की। भले ही प्रभु यीशु द्वारा पूर्ण किया गया कार्य, कार्य करने के उसके तरीके और उसके बोलने का परिप्रेक्ष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व से भिन्न थे, फिर भी उसकी हर चीज़ वास्तव में स्वयं परमेश्वर को दर्शाती थी, जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था—इससे इनकार नहीं किया जा सकता! अर्थात्, परमेश्वर चाहे किसी भी रूप में प्रकट हो, वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में बात करे, या किसी भी छवि में वह मानवजाति के सामने आए, वह अपने सिवाय किसी को नहीं दर्शाता। वह न तो किसी मनुष्य को दर्शा सकता है, न ही भ्रष्ट मानवजाति को दर्शा सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा दिए गए एक दृष्टांत पर नज़र डालेंगे।

3. खोई हुई भेड़ का दृष्टांत

मत्ती 18:12-14 तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।

यह अंश एक दृष्टांत है—यह लोगों को किस प्रकार की भावना देता है? यहाँ उपयोग किया गया अभिव्यक्ति का यह तरीका—दृष्टांत—मानवीय भाषा में एक अलंकार है, और इस प्रकार यह मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर आता है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा ही कुछ कहा होता, तो लोगों को लगता कि ये वचन वास्तव में परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं, लेकिन जब अनुग्रह के युग में मनुष्य के पुत्र ने ये वचन कहे, तब लोगों को ये सुकून देने वाले, गर्मजोशी से भरे और अंतरंग महसूस हुए। जब परमेश्वर देह बन गया, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने अपने हृदय की वाणी व्यक्त करने के लिए अपनी मानवता से आए एक बहुत ही उचित दृष्टांत का उपयोग किया। इस वाणी ने परमेश्वर की अपनी वाणी और उस कार्य का प्रतिनिधित्व किया, जो वह उस युग में करना चाहता था। इसने अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये को भी दर्शाया। लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के परिप्रेक्ष्य से देखें तो, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए वह जो कुछ भी कर सकता है, सो करेगा। इसने उस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को दर्शाया, जब वह देह में था। परमेश्वर ने उस कार्य में अपने संकल्प और रवैये को दर्शाने के लिए इस दृष्टांत का उपयोग किया। यह परमेश्वर के देह बनने का लाभ था : वह मानवजाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने और अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्य को अपनी गहन, दिव्य भाषा, जिसे समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था, मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से समझाई या "अनुवादित" की। इससे लोगों को उसकी इच्छा को समझने और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता है। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके मानवीय परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और लोगों के साथ उस तरीके से बातचीत कर सकता था, जिसे वे समझ सकते थे। यहाँ तक कि वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग करके बोल और कार्य कर सकता था, ताकि लोग परमेश्वर की दयालुता और घनिष्ठता महसूस कर सकें, ताकि वे उसके हृदय को देख सकें। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? क्या परमेश्वर के वचनों और कार्यों में कोई निषेध है? लोग समझते हैं कि ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे परमेश्वर यह बताने के लिए कि स्वयं परमेश्वर क्या कहना चाहता है, कौन-सा कार्य करना चाहता है, या अपनी स्वयं की इच्छा व्यक्त करने के लिए वह मनुष्यों के ज्ञान, भाषा या बोलने के तरीकों का उपयोग कर सके। किंतु यह गलत सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के दृष्टांत का उपयोग इसलिए किया, ताकि लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी महसूस कर सकें, और उस समयावधि के दौरान लोगों के प्रति उसके रवैये को देख सकें। इस दृष्टांत ने लंबे समय से व्यवस्था के अधीन जी रहे लोगों को स्वप्न से जगा दिया, और इसने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेरित किया। इस दृष्टांत वाले अंश को पढ़कर लोग मानवजाति को बचाने में परमेश्वर की ईमानदारी को जानते हैं और परमेश्वर के हृदय में मानवजाति को दिए गए वजन और महत्व को समझते हैं।

आओ, इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के अपने वचन थे या उसके स्वर्गिक पिता के वचन थे? सतही तौर पर ऐसा लगता है कि यह प्रभु यीशु है जो बोल रहा है, किंतु उसकी इच्छा स्वयं परमेश्वर की इच्छा को दर्शाती है, इसीलिए उसने कहा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गिक पिता को ही परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते थे, और यह मानते थे कि यह व्यक्ति, जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते हैं, बस उसके द्वारा भेजा हुआ है और यह स्वर्गिक पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसीलिए प्रभु यीशु को इस दृष्टांत के अंत में यह वाक्य जोड़ना पड़ा, ताकि लोग वास्तव में मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा अनुभव कर सकें, और उसके कथन की प्रामाणिकता और सटीकता महसूस कर सकें। भले ही यह वाक्य कहना एक साधारण बात थी, किंतु यह बहुत परवाह और प्रेम के साथ बोला गया था और इसने प्रभु यीशु की विनम्रता और प्रच्छन्नता प्रकट की। चाहे परमेश्वर देह बना या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य किया, वह मनुष्य के हृदय को सर्वोत्तम ढंग से जानता था, और सर्वोत्तम ढंग से समझता था कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, और जानता था कि लोग किस बात से चिंतित हैं और क्या चीज़ उन्हें भ्रमित करती है, इसीलिए उसने यह वाक्य जोड़ा। इस वाक्य ने मानवजाति में छिपी एक समस्या उजागर कर दी : मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ कहा, लोगों को उस पर संशय था, अर्थात्, जब प्रभु यीशु बोल रहा था, तो उसे यह जोड़ना पड़ा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो," और केवल इस आधार पर ही उसके वचन लोगों को अपनी सटीकता का विश्वास दिलाने और उनकी विश्वसनीयता बढ़ाने में सफल हो सकते थे। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य का पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मानवजाति के बीच एक बड़ा असहज संबंध था, और कि मनुष्य के पुत्र की स्थिति बड़ी उलझनभरी थी। इससे यह भी पता चलता है कि उस समय मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की हैसियत कितनी मामूली थी। जब उसने यह कहा, तो यह वास्तव में लोगों को यह बताने के लिए था : तुम लोग निश्चिंत हो सकते हो—ये वचन मेरे अपने हृदय की बात नहीं दर्शाते, बल्कि ये उस परमेश्वर की इच्छा हैं, जो तुम लोगों के हृदय में है। मानवजाति के लिए, क्या यह एक विडंबना नहीं थी? भले ही देह में रहकर काम कर रहे परमेश्वर को अनेक ऐसे फायदे थे, जो उसके अपने व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके संदेहों और अस्वीकृति को और साथ ही उनकी संवेदनशून्यता और मूढ़़ता को भी सहन करना पड़ा। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मनुष्य की अस्वीकृति और उसके द्वारा अपने साथ प्रतिस्पर्धा किए जाने का अनुभव करने की प्रक्रिया थी। इससे भी अधिक, यह मानवजाति के भरोसे को निरंतर जीतने और अपने स्वरूप और सार के माध्यम से मानवजाति पर विजय पाने के लिए कार्य करने की प्रक्रिया थी। यह इतना ही नहीं था कि देहधारी परमेश्वर शैतान के विरुद्ध जमीनी लड़ाई लड़ रहा था; इससे भी अधिक यह परमेश्वर का एक सामान्य मनुष्य बनकर अपने अनुयायियों के साथ संघर्ष शुरू करना था, और इस संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी विनम्रता के साथ, अपने स्वरूप के साथ और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूरा किया। उसने उन लोगों को प्राप्त किया जिन्हें वह चाहता था, वह पहचान और हैसियत प्राप्त की जिसका वह हकदार था, और अपने सिंहासन की ओर "लौट" गया।

आगे, आओ पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित दो अंश देखें।

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में से एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में। ये दोनों विषय वास्तव में उस कार्य पर प्रकाश डालते हैं, जिसे प्रभु यीशु अनुग्रह के युग में करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह अपने साथ अपने कार्य का एक चरण, जो कि एक विशिष्ट कार्य था, और उस स्वभाव को लेकर आया, जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में जो कुछ भी मनुष्य के पुत्र ने किया, वह सब उस कार्य के चारों ओर घूमता था, जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न तो उससे कुछ ज़्यादा करता, न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया, वह सब इस युग से संबंधित था। चाहे उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से, और चाहे उसने ऐसा किसी भी तरह से या किसी भी परिप्रेक्ष्य से किया हो, उसका उद्देश्य लोगों को यह समझने में मदद करना था कि वह क्या करना चाहता है, उसकी क्या इच्छा है और लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं। वह अपनी इच्छा समझने और जानने, और मानवजाति को बचाने के अपने कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम प्रभु यीशु को यह व्यक्त करने के लिए कि वह मानवजाति को क्या बताना चाहता है, अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए देखते हैं। इससे भी अधिक्, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ बात करते हुए, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए और उनके अनुरोध के अनुसार उनकी सहायता करते हुए देखते हैं। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में नहीं देखा गया था, जो अनुग्रह के युग से पहले आया था। वह मानवजाति के साथ अधिक अंतरंग और उनके प्रति अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणाम प्राप्त करने में अधिक सक्षम हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने का रूपक इस बिंदु को वास्तव में स्पष्ट करता है। इस रूपक में प्रयुक्त संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा था, उस समय उसका क्या इरादा था। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" के विचार के भीतर किस प्रकार का विचार निहित है? वह विचार यह है कि लोग क्षमा को अपना खुद का उत्तरदायित्व बना लें, ऐसी चीज़ जो उन्हें अवश्य सीखनी चाहिए, और ऐसा मार्ग जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। हालाँकि यह मात्र एक रूपक था, किंतु इसने एक महत्त्वपूर्ण बिंदु को उजागर करने का काम किया। इसने उसका आशय गहराई से समझने और अभ्यास के उचित तरीके, सिद्धांत और मानक खोजने में लोगों की सहायता की। इस रूपक ने लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझने में सहायता की और उन्हें एक सही धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, किंतु दूसरों के प्रति सहनशीलता और समझदारी के रवैये के साथ। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में "सात बार के सत्तर गुने" की संख्या के बारे में सोच रहा था? नहीं, वह उसके बारे में नहीं सोच रहा था। क्या परमेश्वर दवारा मनुष्य को क्षमा किए जाने की कोई संख्या है? ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो यहाँ उल्लिखित "बारियों की संख्या" में बहुत रुचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या का उद्गम और अर्थ समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। किंतु वास्तव में यह सिर्फ मनुष्य की बोली की एक संख्या थी, जिसका परमेश्वर ने उपयोग किया था। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानवजाति से प्रभु यीशु की अपेक्षाओं के साथ लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब लोग उसके कथन को अधिक नहीं समझते थे, क्योंकि उसके वचन पूर्ण दिव्यता से आते थे। उसके कथन का परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मानवजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से व्यक्त होता था, जिसे लोग देख नहीं सकते थे। वे लोग जो देह में जीते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परंतु देह बनने के बाद परमेश्वर ने मानवजाति से मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उसे पार कर गया। वह अपना स्वभाव, अपनी इच्छा और अपना रवैया उन चीज़ों के माध्यम से, जिनकी मनुष्य कल्पना कर सकते थे, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा था और जो उनके सामने आई थीं, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, और ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा व्यक्त कर सका, जिसे वे ग्रहण कर सकते थे, ताकि मानवजाति अपनी क्षमता के दायरे के भीतर और अपनी योग्यता की सीमा तक परमेश्वर को समझ और जान सके, और उसके इरादे और अपेक्षित मानक समझ सके। यह मानवता में परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत था। यद्यपि देह में कार्य करने के परमेश्वर के तरीके और सिद्धांत मुख्यतः मानवता के द्वारा या उसके माध्यम से प्राप्त किए गए थे, फिर भी इसने सचमुच ऐसे परिणाम प्राप्त किए, जिन्हें सीधे दिव्यता में कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक और लक्ष्यित था, उसकी पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में वह व्यवस्था के युग से आगे निकल गया।

आगे, आओ प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह सीधे दिव्यता में व्यक्त की गई चीज़ है? नहीं, स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़ें थीं, जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल मनुष्य ही ऐसी बात कहेंगे, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से उसी तरह प्रेम कर, जिस तरह तू अपने जीवन को सँजोता है।" बोलने का यह तरीका केवल मनुष्य का है। परमेश्वर ने कभी इस तरह बात नहीं की। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं है, क्योंकि उसे मनुष्य के प्रति अपने प्रेम को विनियमित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकाशन है। तुम लोगों ने कभी परमेश्वर को ऐसा कुछ कहते हुए सुना है : "मैं मनुष्य से उसी तरह प्रेम करता हूँ, जिस तरह मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? तुमने नहीं सुना होगा, क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार और स्वरूप में है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम, उसका रवैया और लोगों के साथ उसके व्यवहार का तरीका उसके स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और प्रकाशन हैं। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित पद्धति या किसी नैतिक संहिता का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हो? जब परमेश्वर ने मानवता में काम किया, तो उसकी बहुत-सी पद्धतियाँ, वचन और सत्य मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परंतु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, स्वरूप और उसकी इच्छा भी लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा, वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत दर्शाते हैं। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव सटीक तरीके से व्यक्त किया। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतःक्रिया में कोई व्यवधान या बाधा नहीं थी, बल्कि वास्तव में वह मानवजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। अब, इस बिंदु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण में अनेक समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण भी परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषा का उपयोग करता है, और यह स्वयं परमेश्वर की इच्छा व्यक्त करने के लिए मनुष्य के दैनिक जीवन और उसके ज्ञान में से ढेर सारी भाषा और पद्धतियों का प्रयोग करता है। जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात करे या दिव्य परिप्रेक्ष्य से, अभिव्यक्ति की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ मनुष्य की भाषा और पद्धतियों के माध्यम से आती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर होता है। जब परमेश्वर देह बना, तो मानवता में बड़े होते हुए उसने मानवजाति के ज्ञान, सामान्य ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर में ये चीज़ें उन मनुष्यों से आई थीं, जिन्हें उसने सृजित किया था। वे देहधारी परमेश्वर के लिए अपने स्वभाव और दिव्यता को व्यक्त करने के साधन बन गए, जिससे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा के उपयोग द्वारा मानवजाति के बीच कार्य करते हुए अपने कार्य को अधिक प्रासंगिक, अधिक प्रामाणिक और अधिक सटीक बना पाया। इससे उसका कार्य लोगों के लिए अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बन गया, और इस प्रकार उसने वे परिणाम प्राप्त किए, जो परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, तो ऐसा तब हुआ जब वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त कर सकता था, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरुआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब कोई "पीढ़ी का अंतर" नहीं रहा था, कि परमेश्वर शीघ्र ही संदेशवाहकों के माध्यम से संवाद करने का अपना कार्य रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर देह में वे सभी वचन और कार्य व्यक्तिगत रूप से व्यक्त कर सकेगा, जिन्हें वह व्यक्त करना चाहता है। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है, वे उसके अधिक करीब थे, और उसके प्रबंधन-कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और संपूर्ण मानवजाति का सामना एक नए युग से होने वाला था।

जिस किसी ने भी बाइबल पढ़ी है, वह जानता है कि जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ था, तो बहुत-सी चीज़ें घटित हुई थीं। उन घटनाओं में से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा द्वारा उसका शिकार किया जाना, जो इतनी चरम घटना थी कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उससे कम उम्र के सभी बच्चों की हत्या कर दी गई थी। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह धारण कर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम उठाया था; और मानवजाति को बचाने के अपने प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई, वह भी स्पष्ट है। परमेश्वर द्वारा देह में मानवजाति के बीच किए गए अपने कार्य से रखी गई बड़ी आशाएँ भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मानवजाति के बीच अपना कार्य करने में सक्षम हुआ, तो उसे कैसा लगा? लोगों को इसे थोड़ा-बहुत समझने में सक्षम होना चाहिए, है न? कम से कम, परमेश्वर प्रसन्न था, क्योंकि वह मानवजाति के बीच अपना नया कार्य आरंभ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई पूरी करने का अपना कार्य आरंभ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनंद से अभिभूत हो गया, क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद वह अंततः एक सामान्य मनुष्य की देह धारण कर सका था और मांस और रक्त से बने मनुष्य के रूप में, जिसे लोग देख और छू सकते थे, अपना नया कार्य आरंभ कर सका था। अंततः वह मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। अंततः परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मानवजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानवजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठकर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को देख भी सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और हर चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं, और वह भी अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में अपने कार्य की उसकी पहली विजय थी। यह भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—निस्संदेह परमेश्वर इससे सबसे अधिक प्रसन्न था। तबसे परमेश्वर ने मानवजाति के बीच अपने कार्य में पहली बार एक प्रकार का सुकून महसूस किया। घटित होने वाली ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और स्वाभाविक थीं, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया, वह भी बहुत ही वास्तविक था। मानवजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्ट महसूस करता है, तो ऐसा तब होता है, जब मनुष्य परमेश्वर और उद्धार के निकट आ सकता है। परमेश्वर के लिए यह उसके नए कार्य की शुरुआत भी है, अपनी प्रबंधन-योजना में आगे बढ़ना भी है, और इसके अतिरिक्त, ये वे अवसर भी होते हैं, जब उसके इरादे पूर्णता की ओर अग्रसर होते हैं। मानवजाति के लिए, ऐसे अवसर का आगमन सौभाग्यशाली और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर के उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य का एक नया चरण कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरुआत करता है, और जब इस नए कार्य और नई शुरुआत का सूत्रपात और प्रस्तुति मानवजाति के बीच की जाती है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण का परिणाम पहले से ही निर्धारित और पूरा कर लिया जाता है, और उसका अंतिम परिणाम और फल परमेश्वर द्वारा पहले ही देख लिया गया होता है। साथ ही, ऐसा तब होता है, जब ये परिणाम परमेश्वर को संतुष्टि महसूस कराते हैं, और निस्संदेह ऐसा तब होता है, जब उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, क्योंकि अपनी नज़रों में उसने पहले ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर लिया है जिनकी उसे तलाश है, और वह पहले ही इस समूह को प्राप्त कर चुका है, ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने और उसे संतुष्टि प्रदान करने में सक्षम है। इस प्रकार, वह अपनी चिंताएँ एक ओर रख देता है और प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरंभ करने में समर्थ होता है, और वह उस कार्य को बिना किसी बाधा के करना आरंभ कर देता है जो उसे करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब-कुछ पूरा किया जा चुका है, तो अंत उसकी नज़र में पहले से ही होता है। इस कारण से वह संतुष्ट होता है और उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग सोच सकते हो कि इसका क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? यदि हाँ, तो वह कौन-सा गीत गाएगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुंदर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनंद और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता हो। वह उसे मनुष्य के लिए गा सकता है, अपने लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब सामान्य है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनंद और दुःख हैं, और उसकी विभिन्न भावनाएँ विभिन्न तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। यह उसका अधिकार है, और इससे अधिक कुछ भी सामान्य और उचित नहीं हो सकता। लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] का उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, और इस प्रकार उसकी खुशी या कोई भी अन्य भावना सीमित नहीं करनी चाहिए। लोगों के विचार में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता, आँसू नहीं बहा सकता, रो नहीं सकता—वह कोई मनोभाव व्यक्त नहीं कर सकता। इन दो संगतियों के दौरान हमने जो बातचीत की है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतंत्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग परमेश्वर की उदासी के बारे में सुनकर सचमुच उसकी उदासी महसूस कर पाओ, और उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनकर तुम लोग सचमुच उसकी प्रसन्नता महसूस कर पाओ, तो कम से कम तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर को क्या चीज़ प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उदास करती है। जब तुम परमेश्वर के उदास होने पर उदास महसूस कर पाओ और उसके प्रसन्न होने पर प्रसन्न महसूस कर पाओ, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और अब उसके और तुम्हारे बीच में कोई बाधा नहीं होगी। तुम परमेश्वर को अब मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं और ज्ञान से विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम लोगों की इस प्रकार की आकांक्षा है? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम इसे हासिल कर सकते हो?

आगे, आओ पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश पढ़ें।

6. यीशु का पहाड़ी उपदेश

धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)

नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)

व्यवस्था की शिक्षा (मत्ती 5:17-20)

क्रोध और हत्या (मत्ती 5:21-26)

व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)

तलाक (मत्ती 5:31-32)

शपथ (मत्ती 5:33-37)

प्रतिशोध (मत्ती 5:38-42)

शत्रुओं से प्रेम (मत्ती 5:43-48)

दान (मत्ती 6:1-4)

प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)

7. प्रभु यीशु के दृष्टांत

बीज बोने वाले का दृष्टांत (मत्ती 13:1-9)

जंगली बीज का दृष्टांत (मत्ती 13:24-30)

राई के बीज का दृष्टांत (मत्ती 13:31-32)

खमीर का दृष्टांत (मत्ती 13:33)

जंगली बीज के दृष्टांत की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)

छिपे हुए खजाने का दृष्टांत (मत्ती 13:44)

अनमोल मोती का दृष्टांत (मत्ती 13:45-46)

जाल का दृष्टांत (मत्ती 13:47-50)

8. आज्ञाएँ

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

आओ, पहले "यीशु का पहाड़ी उपदेश" के विभिन्न भागों में से प्रत्येक भाग को देखें। ये विभिन्न भाग किस चीज़ से संबंध रखते हैं? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि ये सभी विभिन्न भाग व्यवस्था के युग के नियमों की तुलना में अधिक उन्नत, अधिक ठोस और लोगों के जीवन के अधिक निकट हैं। आधुनिक शब्दों में कहें तो, ये चीज़ें लोगों के वास्तविक अभ्यास के लिए अधिक प्रासंगिक है।

आओ, निम्नलिखित विशिष्ट सामग्री को पढ़ें : तुम्हें धन्य वचनों को किस प्रकार समझना चाहिए? तुम्हें व्यवस्था के बारे में क्या जानना चाहिए? क्रोध को किस प्रकार परिभाषित किया जाना चाहिए? व्यभिचारियों से कैसे निपटा जाना चाहिए? तलाक के बारे में कैसे बोला जाता है, और उसके बारे में किस प्रकार के नियम हैं? कौन तलाक ले सकता है और कौन नहीं ले सकता? शपथ, प्रतिशोध, शत्रुओं से प्रेम, दान इत्यादि के बारे में क्या कहेंगे? आदि-आदि। ये सब चीज़ें मनुष्य द्वारा परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण करने के अभ्यास के प्रत्येक पहलू से संबंध रखती हैं। इनमें से कुछ अभ्यास आज भी लागू हैं, हालाँकि वे लोगों से वर्तमान में जो अपेक्षित है, उसकी तुलना में उथले हैं—फिर भी वे काफी प्राथमिक सत्य हैं, जिनका सामना लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में करते हैं। जिस समय से प्रभु यीशु ने काम करना आरंभ किया, उससे पहले ही वह मनुष्यों के जीवन-स्वभाव पर काम शुरू करना कर चुका था, परंतु उसके कार्य के ये पहलू व्यवस्था की नींव पर आधारित थे। क्या इन विषयों पर बोलने के नियमों और तरीकों का सत्य के साथ कोई संबंध था? निस्संदेह था! पिछले सभी विनियम और सिद्धांत, और साथ ही अनुग्रह के युग के ये उपदेश भी, परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप से, और निस्संदेह सत्य से, संबंधित थे। परमेश्वर चाहे जो कुछ भी प्रकट करे, और चाहे वह अभिव्यक्ति का कोई भी तरीका या भाषा इस्तेमाल करे, उसके द्वारा अभिव्यक्त की जाने वाली सभी चीज़ों की नींव, उद्गम और प्रस्थान-बिंदु उसके स्वभाव और स्वरूप के सिद्धांतों में हैं। यह पूर्णत: सत्य है। इसलिए यद्यपि उसके द्वारा कही गई ये चीज़ें अब थोड़ी उथली दिखाई देती हैं, लेकिन तुम अभी भी यह नहीं कह सकते कि वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे ऐसी चीज़ें थीं जो अनुग्रह के युग में लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा पूरी करने और अपने जीवन-स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपरिहार्य थीं। क्या तुम ऐसा कह सकते हो कि इनमें से कोई भी उपदेश सत्य के अनुरूप नहीं है? नहीं, तुम नहीं कह सकते! इनमें से प्रत्येक उपदेश सत्य है, क्योंकि ये सभी मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ थीं; ये सभी परमेश्वर द्वारा दिए गए सिद्धांत और गुंजाइश थी, जो यह दर्शाते थे कि व्यक्ति को कैसा आचरण करना चाहिए, और वे परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं। हालाँकि, उस समय जीवन में विकास के स्तर के आधार पर केवल ही चीज़ें थीं, जिन्हें वे स्वीकार करने और समझने में सक्षम थे। चूँकि अभी तक मानवजाति के पापों का समाधान नहीं हुआ था, इसलिए प्रभु यीशु केवल ये ही वचन जारी कर सकता था, और वह केवल इस प्रकार के दायरे के भीतर शामिल सरल शिक्षाओं का उपयोग करके ही उस समय के लोगों को यह बता सकता था कि उन्हें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें किन सिद्धांतों और दायरे के भीतर चीज़ों को करना चाहिए, और उन्हें किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए और उसकी अपेक्षाएँ पूरी करनी चाहिए। यह सब उस समय मानवजाति की कद-काठी के आधार पर निर्धारित किया गया था। व्यवस्था के अधीन जीने वाले लोगों के लिए ये शिक्षाएँ ग्रहण करना आसान नहीं था, इसलिए जो प्रभु यीशु ने सिखाया, उसका इसी दायरे में रहना आवश्यक था।

आगे, आओ "प्रभु यीशु के दृष्टांतों" की विभिन्न सामग्रियों पर एक नज़र डालें।

पहला बीज बोने वाले का दृष्टांत है। यह एक बहुत ही रोचक दृष्टांत है; बीज बोना लोगों के जीवन में एक सामान्य घटना है। दूसरा जंगली बीज का दृष्टांत है। जिसने भी फसलें लगाई हैं, और निश्चित ही सभी वयस्कों ने लगाई होंगी, वे जान जाएँगे कि "जंगली बीज" क्या होते हैं। तीसरा राई के बीज का दृष्टांत है। तुम सभी लोग जानते हो कि राई क्या होती है, है न? यदि तुम नहीं जानते, तो तुम लोग बाइबल में देख सकते हो। चौथा खमीर का दृष्टांत है। अब, अधिकतर लोग जानते हैं कि खमीर को किण्वन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, और यह ऐसी चीज़ है, जिसका लोग अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। अगले दृष्टांत, जिनमें से छठा छिपे हुए खजाने का दृष्टांत, सातवाँ अनमोल मोती का दृष्टांत और आठवाँ जाल का दृष्टांत है, लोगों के वास्तविक जीवन से लिए गए हैं। ये दृष्टांत किस प्रकार की तसवीर चित्रित करते हैं? यह परमेश्वर के एक सामान्य व्यक्ति बनने और मनुष्यों के साथ रहने, मनुष्यों से बात करने और उन्हें उनकी आवश्यकता की चीज़ें प्रदान करने के लिए जीवन की भाषा, मनुष्य की भाषा का उपयोग करने की तसवीर है। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लंबे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन-शैलियों का अनुभव करने और उन्हें देखने के बाद, ये अनुभव उसकी शिक्षण-सामग्री बन गए, जिसके जरिये उसने अपनी दिव्य भाषा को मानवीय भाषा में रूपांतरित कर लिया। निस्संदेह, इन चीज़ों ने भी, जो उसने जीवन में देखीं और सुनीं, मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव को समृद्ध किया। जब वह लोगों को कुछ सत्य, परमेश्वर की कोई इच्छा समझाना चाहता था, तो वह लोगों को परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं के बारे में बताने के लिए उपर्युक्त जैसे दृष्टांत इस्तेमाल कर सकता था। ये सभी दृष्टांत लोगों के जीवन से संबंधित थे; एक भी दृष्टांत ऐसा नहीं था जो मनुष्य के जीवन से अछूता था। जब प्रभु यीशु मनुष्यों के साथ रहता था, तो उसने किसानों को अपने खेतों की देखभाल करते हुए देखा था, और वह जानता था कि जंगली बीज कौन-से होते हैं और खमीर उठना क्या होता है; वह समझता था कि मनुष्य खजाने को पसंद करते हैं, इसलिए उसने खजाने और मोती दोनों रूपकों का उपयोग किया। जीवन में उसने बार-बार मछुआरों को जाल फैलाते हुए देखा था; प्रभु यीशु ने इसे और मनुष्यों के जीवन से संबंधित अन्य गतिविधियों को देखा; और उसने उस प्रकार के जीवन का अनुभव भी किया। किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य के समान ही उसने मनुष्यों की दिनचर्या और उनके तीन वक्त भोजन करने का अनुभव किया था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत व्यक्ति के जीवन का अनुभव किया और दूसरों की ज़िंदगी को भी देखा। जब उसने यह सब देखा और व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव किया, तो उसने यह नहीं सोचा कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार से अधिक स्वतंत्रता और आराम से जी सकता है। इसके बजाय अपने प्रामाणिक मानव-जीवन के अनुभव से प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन में कठिनाई देखी, उसने शैतान के अधिकार-क्षेत्र में और उसकी भ्रष्टता के अधीन पाप का जीवन जी रहे लोगों की कठिनाई, दुर्दशा और विषाद को देखा। जब वह व्यक्तिगत रूप से मानव-जीवन का अनुभव ले रहा था, तब उसने यह भी अनुभव किया कि भ्रष्टता के बीच जी रहे लोग कितने असहाय हैं, और उसने पाप में जीने वाले मनुष्यों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया, जो शैतान और बुराई द्वारा दी गई यातना में हर दिशा खो बैठे थे। जब प्रभु यीशु ने ये चीज़ें देखीं, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता से देखा या अपनी मानवता से? उसकी मानवता सचमुच मौजूद थी और वह बहुत अधिक जीवित थी; वह इस सबका अनुभव कर सकता था और इसे देख सकता था। किंतु निस्संदेह, उसने इन चीज़ों को अपने सार में भी देखा, जो उसकी दिव्यता है। अर्थात्, स्वयं मसीह, प्रभु यीशु, जो एक मनुष्य था, ने इसे देखा, और उसके द्वारा देखी गई हर चीज़ ने उसे उस कार्य का महत्व और आवश्यकता महसूस कराई, जिसे उसने उस समय हाथ में लिया था, जब वह देह में रहा था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि जो उत्तरदायित्व उसे देह में लेना आवश्यक है, वह बहुत बड़ा है, और वह जानता था कि जिस पीड़ा का वह सामना करेगा, वह कितनी दारुण होगी, फिर भी जब उसने पाप में जी रहे मनुष्यों को असहाय देखा, जब उसने उनकी ज़िंदगी की दुर्दशा और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने अधिकाधिक पीड़ा का अनुभव किया, और वह मानवजाति को पाप से बचाने के लिए अधिकाधिक व्याकुल हो गया। चाहे उसे किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़े या किसी भी प्रकार की पीड़ा सहनी हो, वह पाप में जी रही मानवजाति को बचाने के लिए और अधिक कृतसंकल्प हो गया। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना आरंभ कर दिया था, जो उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। वह उस कार्य को पूरा करने के लिए अधिकाधिक उत्सुक भी हो गया, जो उसे करना था—मानवजाति के समस्त पाप ग्रहण करना, मनुष्यों के लिए प्रायश्चित करना ताकि वे अब पाप में न जीएँ, और साथ ही परमेश्वर पापबलि की वजह से मनुष्य के पाप क्षमा कर सके, जिससे उसे मानवजाति को बचाने का अपना कार्य आगे बढ़ाने की अनुमति मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि अपने हृदय में प्रभु यीशु अपने आप को मानवजाति के लिए अर्पित करने, अपना बलिदान करने के लिए तैयार था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने, सूली पर चढ़ाए जाने के लिए भी तैयार था, और निस्संदेह, वह इस कार्य को पूरा करने के लिए उत्सुक था। जब उसने मानव-जीवन की दयनीय दशा देखी, तो वह बिना एक भी क्षण या क्षणांश की देरी के, जल्दी से जल्दी अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए और अधिक इच्छुक हो गया। ऐसी अत्यावश्यकता महसूस करते हुए उसने यह भी नहीं सोचा कि उसका अपना दर्द कितना भयानक होगा, न ही उसने कोई और आशंका पाली कि उसे कितना अपमान सहना होगा। उसके हृदय में बस एक ही दृढ़ विश्वास था : यदि वह अपने को अर्पित करेगा, यदि वह पापबलि के रूप में सूली पर चढ़ जाएगा, तो परमेश्वर की इच्छा पूरी हो जाएगी और परमेश्वर अपना नया कार्य शुरू कर पाएगा। मनुष्य का जीवन और पाप में उसके अस्तित्व की स्थिति पूर्णत: रूपांतरित हो जाएगी। उसका दृढ़ विश्वास और जो कुछ करने के लिए वह कृतसंकल्प था, वे मनुष्य को बचाने से संबंध रखते थे, और उसका एक ही उद्देश्य था : परमेश्वर की इच्छा पर चलना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरुआत कर सके। उस समय प्रभु यीशु के मन में बस यही था।

देह में रहते हुए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता थी; उसके अंदर एक सामान्य व्यक्ति की भावनाएँ और चेतना थी। वह जानता था कि खुशी क्या होती है, पीड़ा क्या होती है, और जब उसने मनुष्य को इस प्रकार का जीवन जीते देखा, तो उसने गहराई से महसूस किया कि लोगों को मात्र कुछ शिक्षाएँ देने, कुछ प्रदान करने या कुछ सिखाने से पाप से बाहर नही निकाला जा सकता। न ही उनसे कुछ आज्ञाओं का पालन करवाने से उन्हें पाप से छुटकारा दिया जा सकता था—केवल मानवजाति के पाप अपने ऊपर लेकर और पापमय देह के समान बनकर ही वह मानवजाति की स्वतंत्रता जीत सकता था और बदले में मानवजाति के लिए परमेश्वर की क्षमा प्राप्त कर सकता था। इसलिए जब प्रभु यीशु ने लोगों की पापमय ज़िंदगी का अनुभव कर लिया और उसे देख लिया, तो उसके हृदय में एक प्रबल इच्छा प्रकट हुई—मनुष्यों को उनकी पाप में संघर्ष करती ज़िंदगी से छुटकारा दिलाने की। इस इच्छा ने उसे अधिकाधिक यह महसूस करवाया कि उसे यथाशीघ्र सूली पर चढ़ना चाहिए और मानवजाति के पाप अपने ऊपर ले लेने चाहिए। लोगों के साथ रहने और उनके पापमय जीवन की दुर्गति देखने, सुनने और महसूस करने के बाद उस समय प्रभु यीशु के ये विचार थे। देहधारी परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए इस प्रकार की इच्छा करना, उसके द्वारा इस प्रकार का स्वभाव व्यक्त और प्रकट करना—क्या यह कोई औसत व्यक्ति कर सकता है? इस प्रकार के परिवेश में रहते हुए कोई औसत व्यक्ति क्या देखेगा? वह क्या सोचेगा? यदि किसी औसत व्यक्ति ने इस सबका सामना किया होता, तो क्या वह समस्याओं को उच्च परिप्रेक्ष्य से देख पाता? निश्चित रूप से नहीं! यद्यपि देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप-रंग ठीक मनुष्य के समान है, और यद्यपि वह मानवीय ज्ञान सीखता है और मानवीय भाषा बोलता है, और कभी-कभी अपने विचार मनुष्य की पद्धतियों या बोलने के तरीकों से भी व्यक्त करता है, फिर भी, जिस तरीके से वह मनुष्यों को और चीज़ों के सार को देखता है, वह भ्रष्ट लोगों द्वारा मनुष्यों को और चीज़ों के सार को देखने के तरीके के समान बिलकुल नहीं है। उसका परिप्रेक्ष्य और वह ऊँचाई, जिस पर वह खड़ा है, किसी भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा अप्राप्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर सत्य है, क्योंकि उसके द्वारा धारित देह में भी परमेश्वर का सार है, और उसके विचार तथा जो कुछ उसकी मानवता के द्वारा प्रकट किया जाता है, वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वह देह में व्यक्त करता है, वह सत्य और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवजाति के लिए हैं। किसी भ्रष्ट व्यक्ति के हृदय में केवल वे थोड़े-से लोग ही होते हैं, जो उससे संबद्ध होते हैं। वह केवल उन मुट्ठीभर लोगों की ही परवाह करता है और उन्हीं के बारे में चिंता करता है। जब आपदा क्षितिज पर होती है, तो वह पहले अपने बच्चों, जीवनसाथी, या माता-पिता के बारे में सोचता है। अधिक से अधिक, कोई ज्यादा दयालु व्यक्ति किसी रिश्तेदार या अच्छे मित्र के बारे में कुछ सोच लेगा; पर क्या ऐसे दयालु व्यक्ति के विचार भी इससे आगे जाते हैं? नहीं, कभी नहीं! क्योंकि मनुष्य अंततः मनुष्य हैं, और वे सब-कुछ एक मनुष्य की ऊँचाई और परिप्रेक्ष्य से ही देख सकते हैं। किंतु देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णत: अलग है। देहधारी परमेश्वर का देह कितना ही साधारण, कितना ही सामान्य, कितना ही निम्न क्यों न हो, या लोग उसे कितनी ही नीची निगाह से क्यों न देखते हों, मानवजाति के प्रति उसके विचार और उसका रवैया ऐसी चीज़ें है, जो किसी भी मनुष्य में नहीं हैं, जिनका कोई मनुष्य अनुकरण नहीं कर सकता। वह मानवजाति का अवलोकन हमेशा दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, सृजनकर्ता के रूप में अपनी स्थिति की ऊँचाई से करेगा। वह मानवजाति को हमेशा परमेश्वर के सार और मानसिकता से देखेगा। वह मानवजाति को एक औसत व्यक्ति की निम्न ऊँचाई से, या एक भ्रष्ट व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से बिलकुल नहीं देख सकता। जब लोग मानवजाति को देखते हैं, तो मनुष्य की दृष्टि से देखते हैं, और अपने पैमाने के रूप में वे मनुष्य के ज्ञान और मनुष्य के नियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों का उपयोग करते हैं। यह उस दायरे के भीतर है, जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं; उस दायरे के भीतर है, जो भ्रष्ट लोगों द्वारा प्राप्य है। जब परमेश्वर मानवजाति को देखता है, तो वह दिव्य दृष्टि से देखता है, और पैमाने के रूप में अपने सार और स्वरूप का उपयोग करता है। इस दायरे में वे चीज़ें शामिल हैं जिन्हें लोग नहीं देख सकते, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्य पूरी तरह से भिन्न हैं। यह भिन्नता मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न-भिन्न सार से निर्धारित होती है—ये भिन्न-भिन्न सार ही उनकी पहचान और स्थिति को और साथ ही उस परिप्रेक्ष्य और ऊँचाई को निर्धारित करते हैं, जिससे वे चीज़ों को देखते हैं। क्या तुम लोग प्रभु यीशु में स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकाशन देखते हो? तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने जो किया और कहा, वह उसकी सेवकाई से और परमेश्वर के अपने प्रबंधन-कार्य से संबंधित था, कि वह सब परमेश्वर के सार की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति मानवीय थी, किंतु उसके दिव्य सार और उसकी दिव्यता के प्रकाशन को नकारा नहीं जा सकता। क्या यह मानवीय अभिव्यक्ति वास्तव में मानवता की ही अभिव्यक्ति थी? उसकी मानवीय अभिव्यक्ति अपने मूल सार में, भ्रष्ट लोगों की मानवीय अभिव्यक्ति से पूर्णत: भिन्न थी। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था। यदि वह वास्तव में एक सामान्य, भ्रष्ट मनुष्य रहा होता, तो क्या वह पापमय मानवजाति के जीवन को दिव्य परिप्रेक्ष्य से देख सकता था? बिलकुल नहीं! मनुष्य के पुत्र और एक सामान्य मनुष्य के बीच यही अंतर है। सभी भ्रष्ट लोग पाप में जीते हैं, और जब कोई पाप को देखता है, तो उसमें उसके बारे में कोई विशेष भावना उत्पन्न नहीं होती; वे सब एकसमान होते हैं, ठीक कीचड़ में रहने वाले सूअर के समान, जो बिलकुल भी असहज या गंदा महसूस नहीं करता—इसके विपरीत, वह अच्छी तरह से खाता है और गहरी नींद में सोता है। यदि कोई सूअरों के बाड़े को साफ करता है, तो सूअर वास्तव में बेचैनी महसूस करेगा, और वह साफ-सुथरा नहीं रहेगा। जल्दी ही वह दोबारा पूरी सहजता से कीचड़ में लोट लगा रहा होगा, क्योंकि वह एक गंदा जीव है। मनुष्य सूअर को गंदा समझते हैं, किंतु यदि तुम सूअर के रहने की जगह को साफ करो, तो उसे अच्छा नहीं लगता—इसीलिए कोई भी सूअर को अपने घर में नहीं रखता। मनुष्य सूअरों को जिस तरह से देखते हैं, वह हमेशा उससे भिन्न होगा, जैसा सूअर खुद महसूस करते हैं, क्योंकि मनुष्य और सूअर एक ही तरह के नहीं होते। और चूँकि देहधारी मनुष्य का पुत्र उसी तरह का नहीं है जैसे भ्रष्ट मनुष्य हैं, इसलिए केवल देहधारी परमेश्वर ही दिव्य परिप्रेक्ष्य में, परमेश्वर की ऊँचाई पर खड़ा हो सकता है, जहाँ से वह मानवजाति और सभी चीज़ों को देखता है।

जब परमेश्वर देह बनता है और मानवजाति के बीच रहता है, तो वह किस प्रकार की पीड़ा अनुभव करता है? क्या कोई सचमुच इस बात को समझता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर बड़ी पीड़ा सहता है, और यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर है, फिर भी लोग उसके सार को नहीं समझते और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार करते हैं, जिससे उसे दुःख और अन्याय महसूस होता है—वे कहते हैं कि इन कारणों से परमेश्वर की पीड़ा सचमुच बहुत बड़ी है। अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परंतु वह मनुष्य के समान पीड़ा भुगतता है और मानवजाति के साथ रहकर उत्पीड़न, बदनामी और अपमान का सामना करता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियाँ और अवज्ञा भी सहता है—इस तरह, वे कहते हैं कि परमेश्वर की पीड़ा को सचमुच मापा नहीं जा सकता। अब, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझते। वास्तव में यह पीड़ा, जिसके बारे में तुम लोग बात करते हो, परमेश्वर के लिए वास्तविक पीड़ा नहीं है, उसकी पीड़ा इससे कहीं बड़ी है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? देहधारी परमेश्वर के देह के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? परमेश्वर के लिए, मानवजाति का उसे नहीं समझना पीड़ा नहीं गिनी जाता, और न ही लोगों में परमेश्वर के बारे में कुछ ग़लतफहमियाँ होना और उनका उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखना पीड़ा गिना जाता है। हालाँकि, लोग प्रायः महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने अवश्य ही बहुत बड़ा अन्याय सहा है, कि जितने समय तक परमेश्वर देह में रहता है, वह अपना व्यक्तित्व मानवजाति को नहीं दिखा सकता और लोगों को अपनी महानता नहीं देखने दे सकता, और कि परमेश्वर विनम्रता से एक मामूली देह में छिपा रहता है, जो उसके लिए बहुत बड़ी यातना होनी चाहिए। लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझ सकते हैं और जो कुछ देख सकते हैं, उसे गंभीरता से ले लेते हैं, और परमेश्वर पर हर प्रकार की सहानुभूति प्रक्षेपित कर देते हैं, यहाँ तक कि उसकी पीड़ा के लिए उसकी थोड़ी स्तुति भी प्रस्तुत कर देते हैं। वास्तव में, इसमें एक अंतर है; लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझते हैं और वह वास्तव में जो महसूस करता है, उसके बीच एक अंतर है। मैं तुम लोगों को सच बता रहा हूँ—परमेश्वर के लिए, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या देहधारी परमेश्वर का देह, ऊपर वर्णित पीड़ा सच्ची पीड़ा नहीं है। तो फिर वह क्या है, जिसे परमेश्वर वास्तव में भुगतता है? आओ, केवल देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पीड़ा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बनकर, मानवजाति के बीच लोगों के साथ-साथ रहकर क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं और फ़लसफ़ों को देख और महसूस नहीं कर सकता? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? वह घृणा क्यों महसूस करेगा? मानवजाति के जीने की क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में समाहित हैं? वे किस चीज़ पर आधारित हैं? मानवजाति की पद्धतियाँ, नियम इत्यादि, जिन्हें वे जीवन के तरीके से जोड़ते हैं—वे सब शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े पर निर्मित हैं। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सत्य नहीं होता—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं और परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। ऐसे सार वाले और ऐसी मानवजाति के बीच रहने वाले परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? वह अपने हृदय में क्या महसूस करता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, ऐसा दर्द जिसे कोई व्यक्ति समझ या महसूस नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिसका भी वह सामना या मुक़ाबला करता है या जो भी वह सुनता, देखता और अनुभव करता है, वह सब मानवजाति की भ्रष्टता, दुष्टता और सत्य के प्रति उनका विद्रोह और प्रतिरोध है। जो कुछ भी मनुष्यों से आता है, वह सब उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, चूँकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के सार के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाता है, जिसकी भाषा उसके समान हो? ऐसा व्यक्ति मानवजाति में नहीं पाया जा सकता। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल सकता, जो परमेश्वर के साथ संवाद या विचार-विनिमय कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे भागते हैं और जिनकी लालसा करते हैं, वे सभी पाप और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर जब इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में कटार जैसा नहीं लगता? इन चीज़ों का सामना करके क्या उसे अपने हृदय में आनंद मिल सकता है? क्या वह सांत्वना पा सकता है? उसके साथ जो रह रहे हैं, वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता? वास्तव में कितनी बड़ी है यह पीड़ा, और कौन इस बारे में परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इसे समझ पाने में सक्षम है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा ऐसी है, जिसे समझ पाने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवजाति की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा कर देती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो मसीह की दुर्दशा पर अकसर सहानुभूति दिखाते हैं, क्योंकि बाइबल में एक पद है जिसमें कहा गया है : "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे गंभीरता से ले लेते हैं और मान लेते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहन करता है। अब, इसे तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से देखने पर, क्या मामला ऐसा ही है? नहीं; परमेश्वर इन कठिनाइयों को पीड़ा नहीं मानता। उसने कभी देह की पीड़ाओं के कारण अन्याय के विरुद्ध चीख-पुकार नहीं की है, और उसने कभी मनुष्यों को प्रतिफल या पुरस्कारस्वरूप कोई चीज़ देने के लिए बाध्य नहीं किया है। किंतु जब वह मानवजाति की हर चीज़ और मनुष्यों का भ्रष्ट जीवन और उनकी बुराई देखता है, जब वह देखता है कि मानवजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान द्वारा क़ैद कर ली गई है और बचकर नहीं निकल सकती, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते कि सत्य क्या है, तो वह ये सब पाप सहन नहीं कर सकता। मनुष्यों के प्रति उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किंतु उसे यह सब सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाएँ व्यक्त तक नहीं कर सकता, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश तक नहीं करता, जो दिन-प्रतिदिन, साल-दर-साल, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इस सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों को जो कुछ दिया है, उसके बदले में वह उनसे कुछ नहीं चाहता, किंतु अपने सार की वजह से वह मानवजाति की दुष्टता, भ्रष्टता और पाप बिलकुल भी सहन नहीं कर सकता, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसके देह को अनंत पीड़ा की ओर ले जाती हैं। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? ज़्यादा संभावना इस बात की है कि तुम लोगों में से कोई भी इसे नहीं देख सकता, क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझ सकता। समय के साथ तुम लोगों को धीरे-धीरे इसे अपने आप समझना चाहिए।

आगे, आओ पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंशों को देखें।

9. यीशु चमत्कार करता है

1) यीशु पाँच हज़ार लोगों को खिलाता है

यूहन्ना 6:8-13 उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

2) लाज़र का पुनरुत्थान परमेश्वर को महिमामंडित करता है

यूहन्ना 11:43-44 यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ!" जो मर गया था वह कफन से हाथ पाँव बँधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, "उसे खोल दो और जाने दो।"

प्रभु यीशु द्वारा किए गए चमत्कारों में से हमने सिर्फ इन दो को ही चुना है, क्योंकि ये उस चीज़ को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त हैं, जिसके बारे में मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ। ये दोनों चमत्कार वास्तव में आश्चर्यजनक हैं और अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए गए चमत्कारों के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

पहले, आओ प्रथम अंश पर एक नज़र डालें : यीशु पाँच हज़ार लोगों को खिलाता है।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" का क्या विचार है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ आम तौर पर कितने लोगों के लिए पर्याप्त होंगी? यदि तुम एक औसत व्यक्ति की भूख के आधार पर मापो, तो ये केवल दो व्यक्तियों के लिए ही पर्याप्त होंगी। "पाँच रोटियों और दो मछलियों" का मूलत: यही विचार है। किंतु इस अंश में, पाँच रोटियों और दो मछलियों से कितने लोगों को खिलाया गया? पवित्रशास्त्र में यह दर्ज है : "उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इतनी बड़ी संख्या क्या दर्शाती है? मानवीय परिप्रेक्ष्य से पाँच हज़ार लोगों में पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ बाँटना असंभव होगा, क्योंकि लोगों और भोजन के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक छोटा-सा टुकड़ा भी मिलता, तब भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी न होता। परंतु यहाँ प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने न केवल यह सुनिश्चित किया कि पाँच हज़ार लोग भरपेट खा लें, बल्कि कुछ भोजन बच भी गया। पवित्रशास्त्र में लिखा है : "जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, 'बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।' अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।" इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और हैसियत देखने में सक्षम बनाया, और यह भी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—इस तरह उन्होंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त थीं, परंतु यदि वहाँ कोई भोजन न होता, तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को खिला सकता था? निस्संदेह वह खिला सकता था! यह एक चमत्कार था, इसलिए अनिवार्य रूप से लोगों को लगा कि यह समझ से बाहर, अविश्वसनीय और रहस्यमय है, परंतु परमेश्वर के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं थी। जब परमेश्वर के लिए यह एक सामान्य चीज़ थी, तो इसे अब व्याख्या करने के क्यों चुना है? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे प्रभु यीशु की इच्छा निहित है, जिसे मानवजाति द्वारा कभी देखा नहीं गया है।

पहले, आओ यह समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्रशास्त्र से हम जानते हैं कि वे उसके अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? निश्चित रूप से नहीं! कम से कम, वे यह नहीं जानते थे कि जो व्यक्ति उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु है, या हो सकता है कि कुछ लोग केवल इतना जानते हों कि उसका नाम क्या है, और वे उसके द्वारा की गई चीज़ों के बारे कुछ जानते हों या उनके बारे में उन्होंने कुछ सुना हो। प्रभु यीशु के बारे में उनकी उत्सुकता केवल तभी जाग्रत हुई थी, जब उन्होंने उसके बारे में कहानियाँ सुनी थीं, पर तुम लोग निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि वे उसका अनुसरण करते थे, और यह तो बिलकुल भी नहीं कह सकते कि वे उसे समझते थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, तो वे भूखे थे और केवल अपना पेट भरने के बारे में ही सोच सकते थे, इसलिए यह इस संदर्भ में था कि प्रभु यीशु ने उनकी इच्छा पूरी की। जब उसने उनकी इच्छा पूरी की, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसका रवैया क्या था, जो केवल अपना पेट भरना चाहते थे? इस समय प्रभु यीशु के विचार और उसका रवैया परमेश्वर के स्वभाव और सार से संबंधित थे। इन लोगों का सामना करने पर, जो खाली पेट थे और केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे, और जो उसके प्रति उत्सुकता और आशा से भरे थे, प्रभु यीशु ने केवल उन पर अनुग्रह करने के लिए इस चमत्कार का उपयोग करने के बारे में सोचा। किंतु उसने यह आशा नहीं की कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे केवल मौज-मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए उसने वहाँ जो कुछ उसके पास था, उसका सर्वोत्तम उपयोग किया, और पाँच हज़ार लोगों को खिलाने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखें खोल दीं, जिन्हें रोमांचक चीज़ें देखने में मज़ा आता था, जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा, जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूरी कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ मूर्त चीज़ों का उपयोग किया, किंतु वह अपने हृदय में पहले से जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस अच्छा भोजन करना चाहते हैं, इसलिए उसने उन्हें उपदेश नहीं दिया, बल्कि उनसे कुछ भी नहीं कहा—उसने बस उन्हें वह चमत्कार घटित होता देखने दिया। वह इन लोगों के साथ ठीक उसी तरह से व्यवहार नहीं कर सकता था, जिस तरह से वह अपने उन शिष्यों के साथ करता था जो वास्तव में उसका अनुसरण करते थे, परंतु परमेश्वर के हृदय में सभी प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और आवश्यकता पड़ने पर वह अपनी दृष्टि में सभी प्राणियों को परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने देता है। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन है या वे उसे समझते नहीं थे या रोटियाँ और मछली खाने के बाद भी उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था या उसके प्रति उनमें कोई कृतज्ञता नहीं थी, यह ऐसा कुछ नहीं था जिसका परमेश्वर ने मुद्दा बनाया हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने का एक अद्भुत अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसमें उसके सिद्धांत होते हैं, कि वह अविश्वासियों पर नज़र नहीं रखता या उनकी सुरक्षा नहीं करता, और कि, विशेष रूप से, वह उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद नहीं उठाने नहीं देता। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे ऐसे जीवित प्राणी हैं जिन्हें उसने स्वयं बनाया है, वह उनका प्रबंधन और उनकी परवाह करेगा; और अनेक तरीकों से वह उनके साथ व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा और उन पर शासन करेगा। सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के यही विचार और यही रवैया है।

यद्यपि रोटी और मछली खाने वाले पाँच हज़ार लोगों ने प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं बनाई, फिर भी उसने उनसे कोई कठोर माँग नहीं की; जब उन्होंने भरपेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया? क्या उसने उन्हें ज़रा भी उपदेश दिया? ऐसा करने के बाद वह कहाँ गया? पवित्रशास्त्र में दर्ज नहीं है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; बस अपना चमत्कार पूरा करके वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कोई अपेक्षा की? क्या उसके मन में उनके प्रति कोई नफ़रत थी? नहीं, ऐसा कुछ नहीं था। वह बस इन लोगों पर अब और ध्यान देना नहीं चाहता था, जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे, और इस समय उसके हृदय में दर्द था। क्योंकि उसने मानवजाति की भ्रष्टता को देखा था और उसके द्वारा नकारे जाने का अनुभव किया था, जब उसने इन लोगों को देखा और जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता से वह बहुत दुःखी हुआ और उसके हृदय को पीड़ा पहुँची, वह बस इन लोगों को जल्दी से जल्दी छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु ने अपने हृदय में उनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं कीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, और इससे भी अधिक, वह अपनी ऊर्जा उन पर व्यय नहीं करना चाहता था। वह जानता था कि वे उसका अनुसरण नहीं कर सकते, किंतु इस सबके बावजूद, उनके प्रति उसका रवैया अभी भी बिलकुल स्पष्ट था। वह बस उनके साथ दयालुता का बरताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह प्रदान करना चाहता था, और निस्संदेह, यह अपने शासन के अधीन प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर का रवैया था—प्रत्येक प्राणी के साथ दयालुता का व्यवहार करना, उनका भरण-पोषण करना, उनका पालन-पोषण करना। जिस मुख्य कारण से प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, उस कारण से उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकट किया और इन लोगों के साथ दयालुता का बरताव किया। उसने उनके साथ परोपकार और सहनशीलता वाले हृदय से व्यवहार किया, और ऐसे हृदय से उसने उन पर दया दिखाई। चाहे इन लोगों ने प्रभु यीशु को जैसे भी देखा, और चाहे इसका जैसा भी परिणाम होता, उसने हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु की अपनी स्थिति के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो कुछ भी प्रकट किया, वह बिना किसी अपवाद के परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप था। प्रभु यीशु ने चुपचाप यह काम किया, और फिर चुपचाप चला गया—परमेश्वर के स्वभाव का यह कौन-सा पहलू है? क्या तुम कह सकते हो कि यह परमेश्वर की प्रेममय करुणा है? क्या तुम कह सकते हो कि यह परमेश्वर की निस्स्वार्थता है? क्या कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे, जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलाईं? क्या तुम कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे, जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे प्रभु यीशु के बिलकुल भी अनुरूप नहीं थे, और उनका सार परमेश्वर के प्रति एकदम शत्रुतापूर्ण था। परंतु परमेश्वर ने उनके साथ कैसा बरताव किया? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों का विरोध शांत करने के लिए एक तरीके का उपयोग किया था—इस तरीके को "दयालुता" कहते हैं। अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा, किंतु परमेश्वर की नज़रों में वे फिर भी उसकी रचना थे, इसलिए उसने इन पापियों के साथ फिर भी दयालुता का व्यवहार किया। यह परमेश्वर की सहनशीलता है, और यह सहनशीलता परमेश्वर की अपनी पहचान और सार से निर्धारित होती है। इसलिए, यह ऐसी चीज़ है, जिसे करने में परमेश्वर द्वारा सृजित कोई भी मनुष्य सक्षम नहीं है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसके रवैये को समझने में वास्तव में समर्थ होते हो, जब तुम प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को वास्तव में समझ सकते हो, तब तुम सृजनकर्ता द्वारा सृजित हर एक मनुष्य पर व्यय की गई उसकी लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तब तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे। वे कौन-से दो शब्द हैं? कुछ लोग कहते हैं "निस्स्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "परोपकारी।" इन दोनों में से "परोपकारी" शब्द परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। इस शब्द का उपयोग लोग किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए करते हैं, जो उदारमना या व्यापक सोच वाला हो। मैं इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, बिना सिद्धांतों की परवाह किए दान देने को संदर्भित करता है। यह एक अत्यधिक भावुकतापूर्ण झुकाव है, जो मूर्ख और भ्रमित लोगों के लिए आम है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास यहाँ दो शब्द हैं, जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं। वे दो शब्द कौन-से हैं? पहला शब्द है "विशाल।" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा शब्द है "अनंत।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है, जिसका मैं परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" शब्द किसी चीज़ की मात्रा और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो, वह ऐसी होती है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मौजूद है—वह कोई अमूर्त चीज़ नहीं है, बल्कि ऐसी चीज़ है, जो लोगों को अपेक्षाकृत सटीक और व्यावहारिक रूप में विचार दे सकती है। चाहे तुम इसे द्विआयामी दृष्टिकोण से देखो या त्रिआयामी दृष्टिकोण से; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में मौजूद है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करना उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित करने का प्रयास लग सकता है, किंतु यह इस बात का एहसास भी देता है कि उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित किया जा सकता, क्योंकि उसका प्रेम खोखला नहीं है, और न ही वह कोई किंवदंती है। बल्कि वह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा शासित सभी प्राणियों द्वारा साझा किया जाता है, ऐसी चीज़, जिसका सभी प्राणियों द्वारा विभिन्न मात्राओं में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से आनंद लिया जाता है। यद्यपि लोग उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी यह प्रेम सभी के जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रकट होकर उनके लिए पोषण और जीवन लाता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम का मान करते और उसकी गवाही देते हैं, जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य ऐसी चीज़ है, जिसकी थाह पाना मनुष्यों के लिए कठिन है, और ऐसे ही सभी चीज़ों के लिए, और विशेष रूप से मानवजाति के लिए, परमेश्वर के विचार हैं। अर्थात्, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए बहाए गए लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता। उस मानवजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और वज़न को कोई नहीं बूझ सकता, कोई नहीं समझ सकता, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया है। परमेश्वर के प्रेम को विशाल बताना उसके अस्तित्व के विस्तार और सच्चाई को समझने-बूझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है, ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग "सृष्टि" नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "अनंत" शब्द आम तौर पर किस चीज़ का वर्णन करता है? यह सामान्यतः महासागर या ब्रहांड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे "अनंत ब्रहांड", या "अनंत महासागर"। ब्रहांड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है; वह ऐसी चीज़ है, जो मनुष्य की कल्पना को पकड़ लेती है, जिसके प्रति वे बहुत प्रशंसा महसूस करते हैं। उसका रहस्य और गहराई दृष्टि के भीतर हैं, किंतु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तो तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और चीज़ों को धारण करने की उसकी महान क्षमता महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "अनंत" शब्द का उपयोग किया है, ताकि लोगों को यह महसूस करने में मदद मिल सके कि उसके प्रेम की अगाध सुंदरता महसूस करना कितना बहुमूल्य है, और कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनंत और व्यापक है। मैंने इस शब्द का प्रयोग लोगों को परमेश्वर के प्रेम की पवित्रता, और उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी गरिमा और अनुल्लंघनीयता महसूस करने में सहायता करने के लिए किया। अब क्या तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "अनंत" एक उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर के प्रेम का मापन इन दो शब्दों "विशाल" और "अनंत" से हो जाता है? पूर्ण रूप से! मानवीय भाषा में केवल ये दो शब्द ही कुछ उपयुक्त, और परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोगों को ऐसा नहीं लगता? यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का उपयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग न करते, क्योंकि परमेश्वर के प्रेम की तुम लोगों की समझ-बूझ एक द्विआयामी परिप्रेक्ष्य तक ही सीमित है, और वह त्रिआयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँची है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो तुम लोगों को लगता कि तुम्हारे पास शब्दों का अभाव है या शायद तुम लोग अवाक् भी रह जाते। आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने बात की है, उन्हें समझना तुम लोगों के लिए कठिन हो सकता है, या शायद तुम लोग उनसे सहमत ही न हों। यह केवल यही दर्शाता है कि परमेश्वर के प्रेम के बारे में तुम लोगों की समझ-बूझ सतही और एक संकीर्ण दायरे तक सीमित है। मैंने पहले कहा है कि परमेश्वर निस्स्वार्थ है; तुम लोगों को यह शब्द "निस्स्वार्थ" याद है। क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर के प्रेम का केवल निस्स्वार्थ के रूप में वर्णन किया जा सकता हो? क्या यह बहुत संकीर्ण दायरा नहीं है? तुम लोगों को इस मुद्दे पर और अधिक चिंतन करना चाहिए, ताकि तुम इससे कुछ प्राप्त कर सको।

ऊपर हमने प्रथम चमत्कार से परमेश्वर के स्वभाव और सार को देखा। भले ही यह एक कहानी है, जिसे लोग कई हज़ार वर्षों से पढ़ते आ रहे हैं, इसका एक सरल कथानक है, और यह लोगों को एक साधारण घटना दिखाती है, फिर भी इस सरल कथानक में हम कुछ अधिक मूल्यवान चीज़ देख सकते हैं, जो कि परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप है। ये चीज़ें, जो उसका स्वरूप हैं, स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती हैं और स्वयं परमेश्वर के विचारों की एक अभिव्यक्ति हैं। जब परमेश्वर अपने विचार व्यक्त करता है, तो यह उसके हृदय की आवाज़ की अभिव्यक्ति होती है। वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे, जो उसे समझ सकते हैं, उसे जान सकते हैं, और उसकी इच्छा को समझ सकते हैं, और जो उसके हृदय की आवाज़ सुन सकते हैं और जो उसकी इच्छा पूरी करने के लिए सक्रियता से सहयोग करेंगे। प्रभु यीशु द्वारा की गई ये चीज़ें परमेश्वर की मूक अभिव्यक्ति थीं।

आगे, आओ हम इस अंश पर नज़र डालें : लाज़र का पुनरूत्थान परमेश्वर को महिमामंडित करता है।

इस अंश को पढ़ने के बाद इसका तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु द्वारा किए गए इस चमत्कार का महत्व पहले वाले चमत्कार से बहुत अधिक था, क्योंकि कोई भी चमत्कार किसी मरे हुए व्यक्ति को क़ब्र से बाहर लाने से ज्यादा आश्चर्यजनक नहीं हो सकता। उस युग में प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना अत्यंत महत्वपूर्ण था। चूँकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, इसलिए लोग केवल उसके शारीरिक रूप-रंग, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख सकते थे। यदि कुछ लोगों ने उसके चरित्र की कोई चीज़ या कुछ विशेष योग्यताएँ देखी और समझी भी थीं, जो उसमें दिखाई देती थीं, तो भी यह कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया है, अपने सार में वह वास्तव में कौन है, और वह वास्तव में और क्या कर सकता है। यह सब मानवजाति को अज्ञात था। इसलिए बहुत-से लोग प्रभु यीशु से संबंधित इन प्रश्नों का उत्तर देने और सत्य जानने के लिए प्रमाण ढूँढ़ना चाहते थे। क्या अपनी पहचान साबित करने के लिए परमेश्वर कुछ कर सकता था? परमेश्वर के लिए यह एक आसान बात थी—बच्चों का खेल था। वह अपनी पहचान और सार साबित करने के लिए कहीं भी, किसी भी समय कुछ कर सकता था, परंतु चीज़ों को करने का परमेश्वर का अपना तरीका था—वह हर चीज़ एक योजना के साथ और चरणों में करता था। उसने चीज़ों को विवेकहीनता से नहीं किया; मनुष्य को दिखाने हेतु कुछ करने के लिए सही समय और सही अवसर का इंतज़ार किया, कुछ ऐसा जो अर्थपूर्ण हो। इस तरह उसने अपना अधिकार और अपनी पहचान प्रमाणित की। तो क्या तब लाज़र का फिर से जी उठना प्रभु यीशु की पहचान प्रमाणित कर पाया? आओ, पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें : "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, तो उसने बस एक बात कही : "हे लाज़र, निकल आ!" तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु द्वारा बोले गए कुछ वचनों के कारण संपन्न हुआ था। इस दौरान प्रभु यीशु ने न तो कोई वेदी स्थापित की, न ही उसने कोई अन्य गतिविधि की। उसने बस यह एक बात कही। इसे कोई चमत्कार कहा जाना चाहिए या आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो, तो निस्संदेह तुम तब भी इसे एक चमत्कार ही कह सकते हो। किंतु इसे किसी मृत आत्मा को वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, और यह किसी तरह की जादूगरी तो बिलकुल भी नहीं थी। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, छोटा-सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति को मारने, उसकी आत्मा उसके शरीर से निकालने और अधोलोक में या जहाँ भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है और मृत्यु के बाद कहाँ जाता है—यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह ये निर्णय किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है, वह मनुष्यों, घटनाओं, वस्तुओं, स्थान या भूगोल द्वारा विवश नहीं होता। यदि वह इसे करना चाहता है, तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन और अधिकार द्वारा उत्पन्न होती हैं, अस्तित्व में रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। वह किसी मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित कर सकता है, और यह भी वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है, जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने मृत लाज़र को पुनर्जीवित करने जैसी चीज़ें कीं, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान के देखने के लिए प्रमाण देना, और मनुष्य और शैतान को यह ज्ञात करवाना था कि मानवजाति से संबंधित सभी चीज़ें, मानवजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी इस भौतिक संसार का, जिसे देखा जा सकता है, और साथ ही आध्यात्मिक संसार का भी, जिसे मनुष्य नहीं देख सकते, वही नियंत्रक था। यह इसलिए था, ताकि मनुष्य और शैतान जान लें कि मानवजाति से संबंधित कुछ भी शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को यह संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मानवजाति का जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु द्वारा लाज़र को पुनर्जीवित किया जाना मानवजाति को शिक्षा और निर्देश देने का सृजनकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था, जिसमें उसने मानवजाति को निर्देश और पोषण प्रदान करने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया था। यह सृजनकर्ता द्वारा बिना वचनों का इस्तेमाल किए मानवजाति को यह सच्चाई दिखाने का एक तरीका था कि वह सभी चीज़ों का नियंत्रक है। यह उसके द्वारा व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मानवजाति को यह बताने का एक तरीका था कि उसके माध्यम से मिलने वाले उद्धार के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मानवजाति को निर्देश देने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त यह मूक उपाय चिरस्थायी, अमिट और मनुष्य के हृदय को एक ऐसा आघात और प्रबुद्धता देने वाला है, जो कभी फीके नहीं पड़ सकते। लाज़र को पुनर्जीवित करने के कार्य ने परमेश्वर को महिमामंडित किया—इसका परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह हर उस व्यक्ति में, जो इस घटना को गहराई से समझता है, यह समझ और दर्शन मज़बूती से जमा देता है कि केवल परमेश्वर ही मानवजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने लाज़र को पुनर्जीवित करने के माध्यम से मानवजाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी संप्रभुता के बारे में एक संदेश भेजा, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर बिना किसी अर्थ के कभी कोई कार्य नहीं करता। हर एक चीज़ जो वह करता है, उसका बड़ा मूल्य होता है और वह खजानों के भंडार में एक नायाब नगीना होती है। वह "किसी व्यक्ति को क़ब्र से बाहर लाने" को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या मद बिलकुल नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसी कोई चीज़ नहीं करता, जिसका कोई अर्थ न हो। एक विलक्षण घटना के रूप में लाज़र को पुनर्जीवित करना परमेश्वर का अधिकार प्रदर्शित करने और प्रभु यीशु की पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार का चमत्कार दोहराया नहीं। परमेश्वर चीज़ों को अपने सिद्धांतों के अनुसार करता है। मनुष्य की भाषा में यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर अपना मस्तिष्क केवल गंभीर कार्यों में व्यस्त रखता है। अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है, तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं। वह जानता है कि इस चरण में वह कौन-सा कार्य करना चाहता है, वह क्या संपन्न करना चाहता है, और वह एकदम अपनी योजना के अनुसार कार्य करेगा। यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की क्षमता होती, तो वह बस अपनी योग्यता प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोचता रहता, ताकि अन्य लोगों को पता चल जाए कि वह कितना दुर्जेय है, जिससे वे उसके सामने झुक जाएँ, ताकि वह उन्हें नियंत्रित कर सके और उन्हें निगल सके। यह बुराई शैतान से आती है—इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसका इस प्रकार का सार नहीं है। चीज़ों को करने के पीछे उसका उद्देश्य अपना दिखावा करना नहीं है, बल्कि मानवजाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, और यही कारण है कि लोगों को बाइबल में इस तरह की घटनाओं के बहुत कम उदाहरण देखने को मिलते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु का सामर्थ्य सीमित था, या वह इस प्रकार की चीज़ें नहीं कर सकता था। इसका कारण केवल था कि परमेश्वर ऐसा करना नहीं चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु द्वारा लाज़र को पुनर्जीवित करने का बहुत व्यावहारिक महत्व था, और परमेश्वर के देहधारी होने का प्राथमिक कार्य चमत्कार करना नहीं था, मुर्दों को जीवित करना नहीं था, बल्कि मानवजाति के छुटकारे का कार्य करना था। इसलिए प्रभु यीशु ने जो कार्य पूरा किया, उसमें अधिकांशत: लोगों को शिक्षा देना, उन्हें पोषण प्रदान करना और उनकी सहायता करना था, और लाज़र को पुनर्जीवित करने जैसी घटनाएँ प्रभु यीशु द्वारा की गई सेवकाई का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा था। इससे भी अधिक, तुम लोग कह सकते हो कि "दिखावा करना" परमेश्वर के सार का अंग नहीं है, इसलिए अधिक चमत्कार न दिखाकर प्रभु यीशु जानबूझकर संयम नहीं बरत रहा था, न ही यह पर्यावरणीय सीमाओं के कारण था, और यह सामर्थ्य की कमी के कारण तो बिलकुल भी नहीं था।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को पुनर्जीवित किया, तो उसने इन वचनों का उपयोग किया : "हे लाज़र, निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ नहीं कहा। तो ये वचन क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी कर सकता है, जिसमें एक मरे हुए व्यक्ति को पुनर्जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन किया, जब उसने संसार बनाया, तो उसने ऐसा अपने वचनों—मौखिक आज्ञाओं, अधिकार-युक्त वचनों का उपयोग करके ही किया था, और सभी चीज़ों का सृजन इसी तरह हुआ था, और यह कार्य इसी तरह संपन्न हुआ था। प्रभु यीशु द्वारा कहे गए ये कुछ वचन परमेश्वर द्वारा उस समय कहे गए वचनों के समान थे, जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन किया था; वे उसी तरह से परमेश्वर का अधिकार और सृजनकर्ता का सामर्थ्य रखते थे। परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों की वजह से सभी चीज़ें बनीं और कायम रहीं, और बिलकुल वैसे ही प्रभु यीशु के मुँह से निकले वचनों के करण लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आ गया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके द्वारा धारित देह में प्रदर्शित और साकार हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और क्षमता सृजनकर्ता की और मनुष्य के उस पुत्र की है, जिसमें सृजनकर्ता साकार हुआ था। लाज़र को पुनर्जीवित करके परमेश्वर द्वारा मानवजाति को यही समझ सिखाई गई है। अब हम इस विषय पर अपनी चर्चा यहीं समाप्त करेंगे। इसके बाद, आओ पवित्रशास्त्र से कुछ और पढ़ें।

10. फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

उपर्युक्त दो अंशों की विषयवस्तु अलग-अलग है। आओ, पहले हम पहले वाले अंश पर नज़र डालें : फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना।

बाइबल में फरीसियों द्वारा स्वयं यीशु और उसके द्वारा की गई चीज़ों का मूल्यांकन इस प्रकार था : "वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना उनके द्वारा दूसरे लोगों के शब्दों को दोहराना भर नहीं था, न ही वह कोई निराधार अनुमान था—वह तो उनके द्वारा प्रभु यीशु के बारे में उसके कार्यों को देख-सुनकर निकाला गया निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष प्रकट रूप में न्याय के नाम पर निकाला गया था और लोगों को ऐसा दिखता था, मानो वह तथ्यों पर आधारित हो, किंतु जिस हेकड़ी के साथ उन्होंने प्रभु यीशु की आलोचना की थी, उस पर काबू रखना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के प्रति उनकी घृणा की उन्मत्त ऊर्जा ने उनकी अपनी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने वाली उनकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को भी उजागर कर दिया था। उनके द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना करते हुए कही गई ये बातें उनकी जंगली महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सत्य के प्रति उनकी शत्रुता की कुरूप और द्वेषपूर्ण प्रकृति से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, न ही उन्होंने उसके द्वारा कही या की गई चीज़ों के सार की खोज की। बल्कि उन्होंने उसके कार्य पर आँख मूँदकर, सनकभरे आवेश में और सोचे-समझे द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। वे यहाँ तक चले गए कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, जो कि परमेश्वर का आत्मा है, को भी जानबूझकर बदनाम कर दिया। "उसका चित ठिकाने नहीं है," "शैतान" और "दुष्टात्माओं का सरदार" कहने से उनका यही आशय था। अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने देह का वस्त्र पहने परमेश्वर के देहधारी आत्मा के कार्य को पागलपन कहा। उन्होंने न केवल शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की और प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा का सार पूरी तरह से शैतान और दुष्टात्माओं द्वारा किए गए परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा के समान था। वे केवल भ्रष्ट मनुष्यों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते थे, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मानवजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सह-अपराधी और अनुचर थे। उनकी ईशनिंदा और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना का सार हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा और उनके द्वारा परमेश्वर की कभी न खत्म होने वाली परीक्षा था। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के सार ने, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था, उसके आधार पर परमेश्वर ने एक उचित न्याय का निर्धारण किया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप ठहराया। यह पाप इस लोक और परलोक, दोनों में अक्षम्य है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश से प्रमाणित होता है : "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन वचनों के सच्चे अर्थ के बारे में बात करें : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" अर्थात्, आओ इस पर से रहस्य हटाएँ कि परमेश्वर किस प्रकार इन वचनों को पूरा करता है : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

हमने जो कुछ भी बात की है, वह परमेश्वर के स्वभाव से, और लोगों, घटनाओं और चीज़ों के प्रति उसके रवैये से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दो अंश भी इसके अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर का क्रोध देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं, जो मानवजाति से अपमान सहन नहीं कर सकता, और यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दो अंशों में परमेश्वर का क्रोध और मानवजाति द्वारा किए जाने वाले अपमान के प्रति उसकी असहनशीलता देखते और महसूस करते हैं, वे वास्तव में उसके रवैये को नहीं समझते। इन दो अंशों में परमेश्वर की निंदा करने वाले और उसे क्रोध दिलाने वाले लोगों के प्रति उसके सच्चे रवैये और दृष्टिकोण के छिपे संदर्भ निहित हैं। उसका रवैया और दृष्टिकोण इस अंश के सच्चे अर्थ को प्रदर्शित करते हैं : "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं और जब वे उसे क्रोधित करते हैं, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसके द्वारा जारी किया गया एक परिणाम होता है। यह बाइबल में इस प्रकार से वर्णित है : "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। किंतु, क्या बाइबल में यह दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम था, जिन्होंने प्रभु यीशु द्वारा ये चीज़ें कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दंड सहा था? नहीं—यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है। यहाँ " नहीं" कने का यह अर्थ नहीं है कि उसमें ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है, बल्कि वास्तव में वह कोई ऐसा परिणाम नहीं था, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता हो। "यह दर्ज नहीं था" कहना कुछ चीज़ों को सँभालने के संबंध में परमेश्वर के रवैये और सिद्धांत को स्पष्ट करता है। जो लोग परमेश्वर की निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं, यहाँ तक कि जो उसकी बदनामी करते हैं—वे लोग, जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसे कोसते हैं—परमेश्वर उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं कर लेता, बल्कि उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है और अपने हृदय में उनकी निंदा करता है। यहाँ तक कि वह यह भी खुलकर घोषित कर देता है कि उनका परिणाम क्या होगा, ताकि लोग जान जाएँ कि जो लोग उसकी निंदा करते हैं, उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जान जाएँ कि वह उनका परिणाम कैसे निर्धारित करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर द्वारा उनके लिए जारी किए जाने वाले परिणाम और निर्णय के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझ सकते। अर्थात्, मानवजाति परमेश्वर द्वारा उन्हें सँभालने के विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख सकती। इसका संबंध चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता, बल्कि उनका दंड और उचित प्रतिफल प्रदान करने के लिए वह सीधे तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; अर्थात् दंड ऐसा होता है, जिसे मनुष्य की आँखें देख सकती हैं। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते हुए परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है और उसका क्रोध भी उनके ऊपर पड़ता है, किंतु उन्हें मिलने वाला दंड ऐसा हो सकता है, जिसे लोग देख नहीं सकते। फिर भी, इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है, जिन्हें लोग देख सकते हैं, जैसे कि दंडित किया जाना या मार दिया जाना। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिन परिस्थितियों में परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को न बचाने या उन पर अब और दया अथवा सहनशीलता न दिखाने और उन्हें अब और अवसर न देने का निश्चय किया है, उनमें उनके प्रति उसका रवैया उन्हें अलग कर देने का होता है। "अलग कर देने" का यहाँ क्या अर्थ है? इन शब्दों का मूल अर्थ है “किसी चीज़ को एक तरफ रखना, उस पर अब और ध्यान न देना।” किंतु यहाँ, जब परमेश्वर "किसी को अलग कर देता है", तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं : पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति का जीवन और उसकी हर चीज़ शैतान को दे दी है, ताकि वह उसके साथ निपटे, और परमेश्वर अब उस व्यक्ति के लिए उत्तरदायी नहीं होगा और अब वह उसका प्रबंधन नहीं करेगा। चाहे वह व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वह अपना दंड भोगने के लिए नरक में उतर जाए, इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि इस तरह के प्राणी का सृष्टिकर्ता के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने ही हाथों से, कुछ करना चाहता है। संभव है, वह इस व्यक्ति की सेवा का उपयोग करे, या वह उसका एक विषमता के रूप में उपयोग करे। संभव है, इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए उसके पास कोई विशेष तरीका हो, उसके साथ व्यवहार करने का कोई विशेष तरीका हो, उदाहरण के लिए, पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है, जिससे उसने इस प्रकार के व्यक्ति से निपटना तय किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, अथवा यदि वे परमेश्वर को उसकी सहनशीलता की सीमा से परे धकेल देते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे गंभीर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िंदगी और उनकी हर चीज़ शैतान को सौंप देता है। उन्हें अनंत काल तक क्षमा नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, उसके हाथ का खिलौना बन गया है, और तब से परमेश्वर का उसके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभन दिया था, तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? उस स्थिति में भी, जबकि शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या उस विनाश की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है, जिसे शैतान उस व्यक्ति पर ढाएगा, जिसे पूरी तरह से शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूरी तरह से शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा पूरी तरह से गँवा दी है, जो अब सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है और जिसका सृष्टि के प्रभु के साथ पूरे तरह से संबंध-विच्छेद कर दिया गया है? शैतान द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना ऐसी ही थी, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परंतु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति का जीवन शैतान को सौंप देता है, तो इसके परिणाम मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का गाय या गधे के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है, जबकि कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं द्वारा कब्जा किया जा सकता है, इत्यादि। ऐसे परिणाम होते हैं उन लोगों में से कुछ के, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शैतान को सौंप दिया जाता है। बाहर से ऐसा दिखाई देता है, जैसे कि प्रभु यीशु का उपहास करने वाले, उसे बदनाम करने वाले, उसकी भर्त्सना करने वाले और उसकी ईशनिंदा करने वाले लोगों ने कोई परिणाम नहीं भुगता। किंतु सच्चाई यह है कि परमेश्वर का हर एक चीज़ से निपटने का एक दृष्टिकोण है। हो सकता है कि वह लोगों को यह बताने के लिए स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे कि जिस प्रकार वह हर तरह के लोगों से निपटता है, उसका क्या परिणाम होता है। कभी-कभी वह सीधे बात नहीं करता, बल्कि सीधे कार्रवाई करता है। वह परिणाम के बारे में बात नहीं करता, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई परिणाम ही नहीं है—वस्तुत:, ऐसे मामले में संभव है कि परिणाम बहुत ज़्यादा गंभीर हो। बाहर से ऐसा लग सकता है, मानो कुछ लोग ऐसे हैं, जिनसे परमेश्वर अपने रवैये के बारे में बात नहीं करता, लेकिन वास्तव में परमेश्वर ने लंबे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उन्हें अब और देखना नहीं चाहता। उनके द्वारा की गई चीज़ों और उनके व्यवहार की वजह से, उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से परमेश्वर केवल उन्हें अपनी नज़रों से गायब देखना चाहता है, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान को दे देना चाहता है, शैतान को उनके साथ जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दोबारा देखना तक नहीं चाहता और उन्हें पूर्णत: छोड़ देना चाहता है, इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उससे निपटना भी नहीं चाहता—यदि वह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि परमेश्वर उसे उसके साथ जो चाहे वह करने और उसे मनचाहे तरीके से नियंत्रित करने, उसका मनचाहे तरीके से उपभोग करने और उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने के लिए शैतान को सौंप देगा—तो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से समाप्त है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और परमेश्वर की सृष्टि का एक प्राणी होने का उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सबसे गंभीर किस्म का दंड नहीं है?

उपर्युक्त सब इन वचनों की पूर्ण व्याख्या है : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्रशास्त्र के इन अंशों पर एक सरल टीका भी है। मेरा मानना है कि अब तुम सबको इसकी समझ है।

अब आओ, पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश पढ़ें।

12. अपने पुनरुत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

यूहन्ना 20:26-29 आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्‍वर!" यीशु ने उससे कहा, "तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्‍वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया।"

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

ये अंश कुछ ऐसी चीज़ों के बारे में बताते हैं, जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद कीं और अपने चेलों से कहीं। पहले, आओ पुनरुत्थान से पहले और बाद में प्रभु यीशु में आए किसी अंतर पर नज़र डालें। क्या वह अभी भी वही पुराने दिनों वाला प्रभु यीशु था? पवित्रशास्त्र में पुनरुत्थान के बाद के प्रभु यीशु का वर्णन करने वाली निम्नलिखित पंक्ति है : "और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, 'तुम्हें शान्ति मिले।'" यह बहुत स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में अवस्थित नहीं था, बल्कि अब वह एक आध्यात्मिक देह में था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि उसने देह की सीमाओं का अतिक्रमण कर लिया था; यद्यपि द्वार बंद था, फिर भी वह लोगों के बीच आ सकता था और उन्हें अपने आपको देखने दे सकता था। पुनरुत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरुत्थान के पहले के देह में रहने वाले प्रभु यीशु के बीच यह सबसे बड़ा अंतर है। यद्यपि उस समय के आध्यात्मिक देह के रूप-रंग और उससे पहले के प्रभु यीशु के रूप-रंग में कोई अंतर नहीं था, फिर भी उस पल प्रभु यीशु ऐसा बन गया था, जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मरकर जी उठने के बाद वह एक आध्यात्मिक देह बन गया था, और उसके पिछले देह की तुलना में यह आध्यात्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा रहस्यमय और भ्रमित करने वाला था। इसने प्रभु यीशु और लोगों के बीच की दूरी और अधिक बढ़ा दी, और लोगों ने अपने हृदय में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमय बन गया था। लोगों की ये अनुभूतियाँ और भावनाएँ अचानक उन्हें वापस उस परमेश्वर पर विश्वास करने के युग में ले गईं, जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। तो, प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद पहली चीज़ यह की, कि उसने इस बात की पुष्टि करने के लिए कि वह मौजूद है, और अपने पुनरुत्थान के तथ्य की पुष्टि करने के लिए अपने को सबको देखने दिया। इसके अतिरिक्त, इस कार्य ने लोगों के साथ उसका संबंध उसी रूप में बहाल कर दिया, जैसा वह तब था जब वह देह में कार्य कर रहा था, वह वो मसीह था जिसे वे देख और छू सकते थे। इसका एक परिणाम यह है कि लोगों को इस बात में कोई संदेह नहीं रहा कि सूली पर चढ़ाए जाने के बाद प्रभु यीशु मरकर पुन: जी उठा है, और उन्हें मानवजाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में भी कोई संदेह नहीं रहा था। दूसरा परिणाम यह है कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के लोगों के सामने प्रकट होने और लोगों को अपने को देखने और छूने देने के तथ्य ने मानवजाति को अनुग्रह के युग में दृढ़ता से सुरक्षित किया, और यह सुनिश्चित किया कि अब से, इस कल्पित तथ्य के आधार पर कि प्रभु यीशु "गायब" हो गया है या "बिना कुछ कहे छोड़कर चला गया है", लोग व्यवस्था के पिछले युग में नहीं लौटेंगे। इस प्रकार उसने सुनिश्चित किया वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उसके द्वारा किए गए कार्य का अनुसरण करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहेंगे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नया चरण खुल गया था, और उस क्षण से व्यवस्था के अधीन रह रहे लोग औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए और उन्होंने एक नए युग में, एक नई शुरुआत में प्रवेश किया। पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के मानवजाति के सामने प्रकट होने के ये बहुआयामी अर्थ हैं।

चूँकि प्रभु यीशु अब एक आध्यात्मिक देह में था, तो लोग उसे कैसे छू और देख सकते थे? इस प्रश्न का प्रभु यीशु के मानवजाति के सामने प्रकट होने के महत्व से संबंध है। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन अंशों में, जो हमने अभी पढ़े, किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आध्यात्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता, और पुनरुत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने हाथ में लिया था, वह पहले ही पूर्ण हो चुका था। इसलिए सिद्धांतत:, उसे लोगों के बीच उनसे मिलने के लिए अपनी मूल छवि में वापस आने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं थी, किंतु थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आध्यात्मिक देह के प्रकटन ने उसके प्रकटन के महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, जिससे वह लोगों के हृदय में अधिक गहराई तक प्रवेश कर गया। जब वह थोमा के पास आया, तो उसने संदेह करने वाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उससे कहा : "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" ये वचन और ये कार्य ऐसी चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरुत्थान के बाद कहना या करना चाहता था; वस्तुत:, ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले करना चाहता था। यह स्पष्ट है कि सूली पर चढ़ाए जाने से पहले ही उसे थोमा जैसे लोगों की समझ थी। तो हम इससे क्या देख सकते हैं? अपने पुनरुत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार नहीं बदला था। थोमा के संदेह केवल तभी शुरू नहीं हुए थे, बल्कि जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था, तब से पूरे समय उसके साथ थे। परंतु यह प्रभु यीशु था, जो मरकर जी उठा था और आध्यात्मिक संसार से अपनी मूल छवि के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के समय से मानवजाति की अपनी समझ के साथ लौटा था, इसलिए वह पहले थोमा के पास गया और उससे अपने पंजर पर हाथ रखवाया, पुनरुत्थान के बाद उसने थोमा को अपनी आध्यात्मिक देह ही नहीं दिखाई, बल्कि अपनी आध्यात्मिक देह के अस्तित्व को स्पर्श और महसूस भी कराया, और उसके संदेह पूरी तरह से मिटा दिए। प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले थोमा ने हमेशा उसके मसीह होने पर संदेह किया था, और वह विश्वास करने में असमर्थ था। परमेश्वर पर उसका विश्वास जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सका था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सका था, केवल उसके आधार पर ही स्थापित हुआ था। प्रभु यीशु को इस प्रकार के व्यक्तियों के विश्वास के बारे में अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा था, उस पर या देहधारी मसीह पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, न ही वे उसे स्वीकार करते थे। थोमा को प्रभु यीशु का अस्तित्व स्वीकार करवाने और उसका विश्वास दिलाने के लिए, और यह भी कि वह सचमुच देहधारी परमेश्वर है, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ाकर अपने पंजर को छूने दिया। क्या प्रभु यीशु के पुनरुत्थान के पहले और बाद में थोमा के संदेह करने में कुछ अंतर था? वह हमेशा संदेह करता था, और सिवाय प्रभु यीशु के आध्यात्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से उसके सामने प्रकट होने और उसे अपने देह में कीलों के निशान छूने देने के, कोई उपाय नहीं था कि कोई उसके संदेहों का समाधान कर सके और उन्हें मिटा सके। इसलिए प्रभु यीशु द्वारा उसे अपने पंजर को छूने देने और कीलों के निशानों की मौज़ूदगी को वास्तव में महसूस करने देने के बाद से थोमा के संदेह गायब हो गए, और उसने सच में जान लिया कि प्रभु यीशु मरकर जी उठा है, और उसने स्वीकार किया और माना कि प्रभु यीशु सच्चा मसीह और देहधारी परमेश्वर है। यद्यपि इस समय थोमा ने अब और संदेह नहीं किया, किंतु उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने उसके साथ रहने, उसका अनुसरण करने और उसे जानने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने स्वयं को प्रभु यीशु द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अवसर गँवा दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटन और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष और एक निर्णय दे दिया, जो संदेहों से भरे हुए थे। उसने संदेह करने वालों को, उन लोगों को जो केवल स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे और मसीह पर विश्वास नहीं करते थे, यह बताने के लिए अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया : परमेश्वर ने उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं की, न ही उसने उनके द्वारा संदेह करते हुए अनुसरण करने की प्रशंसा की। उनके द्वारा परमेश्वर और मसीह पर पूरी तरह से विश्वास करने का दिन ही परमेश्वर द्वारा अपना महान कार्य पूरा करने का दिन हो सकता था। निस्संदेह, यही वह दिन भी था, जब उनके संदेहों पर निर्णय दिया गया। मसीह के प्रति उनके रवैये ने उनका भाग्य निर्धारित कर दिया, और उनके अड़ियल संदेह का मतलब था कि उनके विश्वास ने उन्हें कोई फल प्रदान नहीं किया, और उनकी कठोरता का तात्पर्य था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। चूँकि स्वर्गिक परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रांतियों पर पला था, और मसीह के प्रति उनका संदेह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनका वास्तविक रवैया था, इसलिए भले ही उन्होंने प्रभु यीशु के देह की कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को बाँस की टोकरी से पानी खींचने के रूप में वर्णित किया जा सकता था—वह सब व्यर्थ था। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा, वह उसका हर एक व्यक्ति से स्पष्ट रूप से कहने का भी तरीका था : पुनरुत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है, जिसने साढ़े तैंतीस वर्ष मानवजाति के बीच काम करते हुए बिताए थे। यद्यपि उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु की छाया की घाटी का अनुभव किया था, और यद्यपि उसने पुनरुत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसमें किसी भी पहलू से कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब उसके शरीर पर कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरुत्थित हो गया था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मानवजाति की उसकी समझ, और मानवजाति के प्रति उसके इरादे ज़रा भी नहीं बदले थे। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह सूली से नीचे उतर आया है, उसने पाप पर विजय पाई है, कठिनाइयों पर काबू पाया है, और मुत्यु पर जीत हासिल की है। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के प्रमाण मात्र थे, संपूर्ण मानवजाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एक पापबलि होने के प्रमाण थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले ही मानवजाति के पापों को अपने ऊपर ले लिया है और छुटकारे का अपना कार्य पूरा कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने के लिए लौटा, तो उसने अपने प्रकटन के माध्यम से यह संदेश दिया : "मैं अभी भी जीवित हूँ, मैं अभी भी मौजूद हूँ; आज मैं वास्तव में तुम लोगों के सामने खड़ा हूँ, ताकि तुम लोग मुझे देख और छू सको। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु थोमा के मामले का उपयोग भविष्य के लोगों को यह चेतावनी देने के लिए भी करना चाहता था : यद्यपि तुम प्रभु यीशु पर अपने विश्वास में उसे न तो देख सकते हो और न ही छू सकते हो, फिर भी तुम अपने सच्चे विश्वास के कारण धन्य हो, और तुम अपने सच्चे विश्वास के कारण प्रभु यीशु को देख सकते हो, और इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

बाइबल में दर्ज ये वचन, जिन्हें प्रभु यीशु ने तब कहा था जब वह थोमा के सामने प्रकट हुआ था, अनुग्रह के युग में सभी लोगों के लिए बड़े सहायक हैं। थोमा के सामने उसका प्रकटन और उससे कहे गए उसके वचनों का भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर एक गहरा प्रभाव पड़ा है; उनका सार्वकालिक महत्व है। थोमा उस प्रकार के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, मगर उस पर संदेह भी करते हैं। वे शंकालु प्रकृति के होते हैं, उनका हृदय कुटिल होता है, वे विश्वासघाती होते हैं, और उन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते, जिन्हें परमेश्वर संपन्न कर सकता है। वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसकी संप्रभुता पर विश्वास नहीं करते, न ही वे देहधारी परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। किंतु प्रभु यीशु का पुनरुत्थान उनके इन लक्षणों के लिए एक चुनौती था, और इसने उन्हें अपने संदेह की खोज करने, अपने संदेह को पहचानने और अपने विश्वासघात को स्वीकार करने, और इस प्रकार प्रभु यीशु के अस्तित्व और पुनरुत्थान पर सचमुच विश्वास करने का एक अवसर भी प्रदान किया। थोमा के साथ जो कुछ हुआ, वह बाद की पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और सावधानी थी, ताकि अधिक लोग अपने आपको थोमा के समान शंकालु न होने के लिए सचेत कर सकें, और यदि वे खुद को संदेह से भरेंगे, तो वे अंधकार में डूब जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किंतु बिलकुल थोमा के समान इस बात की पुष्टि, सत्यापन और अनुमान करने के लिए कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं, हमेशा प्रभु के पंजर को छूना और उसके कीलों के निशानों को महसूस करना चाहते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। इसलिए प्रभु यीशु लोगों से अपेक्षा करता है कि वे थोमा के समान न बनें, जो केवल उसी बात पर विश्वास करते हैं जिसे वे अपनी आँखों से देख सकते हैं, बल्कि शुद्ध और ईमानदार व्यक्ति बनें, परमेश्वर के प्रति संदेहों को आश्रय न दें, बल्कि केवल उस पर विश्वास करें और उसका अनुसरण करें। इस प्रकार के लोग धन्य हैं। यह लोगों से प्रभु यीशु की एक बहुत छोटी अपेक्षा है, और यह उसके अनुयायियों के लिए एक चेतावनी है।

संदेहों से भरे लोगों के प्रति प्रभु यीशु का उपर्युक्त रवैया है। तो प्रभु यीशु ने उन लोगों से क्या कहा और उनके लिए क्या किया, जो उस पर ईमानदारी से विश्वास करने और उसका अनुसरण करने में समर्थ हैं? प्रभु यीशु और पतरस के बीच के एक संवाद के माध्यम से आगे हम यही आगे देखने जा रहे हैं।

इस वार्तालाप में प्रभु यीशु ने बार-बार पतरस से एक बात पूछी : "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" यह वह उच्चतर मानक है, जिसकी प्रभु यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद पतरस जैसे लोगों से अपेक्षा करता है, जो वास्तव में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की जाँच और पूछताछ थी, परंतु इससे भी अधिक, यह पतरस जैसे लोगों से एक माँग और एक अपेक्षा थी। प्रभु यीशु ने पूछताछ करने के इस तरीके का उपयोग किया, ताकि लोग अपने बारे में विचार करें और अपने भीतर झाँकें और पूछें : प्रभु यीशु की लोगों से क्या अपेक्षाएँ हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ, जो प्रभु से प्रेम करता है? मुझे प्रभु से कैसे प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा हो, परंतु सच्चाई यह है कि अपने हृदय में वह पतरस से पूछने के इस अवसर का उपयोग इसी प्रकार का प्रश्न परमेश्वर से प्रेम करने के इच्छुक अधिक लोगों से पूछने के लिए करना चाहता था। बस, पतरस धन्य था, जो इस प्रकार के व्यक्तियों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर पाया, जिससे स्वयं प्रभु यीशु द्वारा अपने मुँह से यह पूछताछ की गई।

निम्नलिखित वचनों की तुलना में, जो अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने थोमा से कहे थे : "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो," उसका पतरस से तीन बार यह पूछना : "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" लोगों को प्रभु यीशु के रवैये की कठोरता और पूछताछ करने के दौरान उसके द्वारा महसूस की गई अत्यावश्यकता को बेहतर ढंग से महसूस कराता है। जहाँ तक शंकालु, धोखेबाज प्रकृति के थोमा की बात है, प्रभु यीशु ने उसे अपना हाथ बढ़ाकर अपने शरीर पर कीलों के निशान छूने दिए, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र है जो पुनरुत्थित हुआ है, और उससे मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान स्वीकार कराई। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से डाँटा नहीं, न ही उसने मौखिक रूप से उसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई न्याय व्यक्त किया था, फिर भी उसने उसे जताने के लिए कि वह उसे समझता है, व्यावहारिक कार्यकलापों का उपयोग किया, साथ ही उसने उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपने रवैये और निश्चय को भी प्रदर्शित किया। उस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को, जो कुछ उसने कहा था, उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता, क्योंकि थोमा जैसे लोगों में सच्चे विश्वास का एक टुकड़ा भी नहीं होता। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें केवल इतनी ही होती हैं, लेकिन पतरस जैसे लोगों के प्रति उसके द्वारा प्रकट किया गया रवैया बिलकुल भिन्न था। उसने पतरस से यह अपेक्षा नहीं की कि वह अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, न ही उसने पतरस से यह कहा : "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" इसके बजाय, उसने बार-बार पतरस से एक ही प्रश्न पूछा। वह प्रश्न विचारोत्तेजक और अर्थपूर्ण था, ऐसा प्रश्न, जो मसीह के प्रत्येक अनुयायी को ग्लानि और भय ही महसूस नहीं कराएगा, बल्कि प्रभु यीशु की चिंतित, दुःखित मनोदशा भी महसूस कराए बिना नहीं रहेगा। और जब वे अत्यधिक पीड़ा और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिंता और परवाह को और अधिक समझ पाते है; वे उसकी ईमानदार शिक्षाओं और शुद्ध, ईमानदार लोगों से उसकी कड़ी अपेक्षाओं को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास कराता है कि इन सरल वचनों में प्रकट प्रभु की लोगों से अपेक्षाएँ मात्र उसमें विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, बल्कि अपने प्रभु और अपने परमेश्वर से प्रेम करते हुए प्रेम प्राप्त करने के लिए हैं। इस प्रकार का प्रेम परवाह करना और आज्ञापालन करना होता है। यह मनुष्यों का परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, सर्वस्व परमेश्वर को समर्पित करना है, और सब-कुछ परमेश्वर के लिए व्यय करना और उसे दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को आराम देना, उसे गवाही का आनंद लेने देना, और उसे चैन से रहने देना भी है। यह मानवजाति की परमेश्वर को चुकौती, उसकी जिम्मेदारी, दायित्व और कर्तव्य है, और यह वह मार्ग है, जिसका अनुसरण मानवजाति को जीवन भर करना चाहिए। ये तीन प्रश्न एक अपेक्षा और प्रोत्साहन थे, जो प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किए थे, जो पूर्ण बनाए जाना चाहते थे। ये वे तीन प्रश्न थे, जो पतरस को जीवन में अपने मार्ग पर ले गए और उसका अनुसरण करने की प्रेरणा दी, और प्रभु यीशु के जाने पर ये तीन प्रश्न ही थे, जिन्होंने पूर्ण बनाए जाने के अपने मार्ग पर चलने की शुरुआत करने में पतरस की अगुआई की, जिन्होंने प्रभु के प्रति उसके प्रेम की वजह से प्रभु के हृदय का ख़्याल रखने, प्रभु का आज्ञापालन करने, प्रभु को आराम प्रदान करने और इस प्रेम की वजह से अपना संपूर्ण जीवन और अपना संपूर्ण अस्तित्व अर्पित करने में उसकी अगुआई की।

अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य मुख्यत: दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला प्रकार उन लोगों का था, जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं का पालन कर सकते थे, जो सूली सहन कर सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का आशीष प्राप्त करता है और परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाता है। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस जैसा था, जिसे पूर्ण बनाया जा सकता था। इसलिए अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने सबसे पहले ये दो सर्वाधिक अर्थपूर्ण चीज़ें कीं। एक थोमा के साथ की गई और दूसरी पतरस के साथ। ये दो चीज़ें क्या दर्शाती हैं? क्या ये मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सच्चे इरादे दर्शाती हैं? क्या ये मानवजाति के प्रति परमेश्वर की ईमानदारी दर्शाती हैं? उसके द्वारा थोमा के साथ किया गया कार्य लोगों को चेतावनी देने के लिए था कि वे शंकालु न बनें, बल्कि केवल विश्वास करें। पतरस के साथ किया गया उसका कार्य पतरस जैसे लोगों का विश्वास दृढ़ करने और इस प्रकार के लोगों से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करने और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन लक्ष्यों का अनुसरण करना चाहिए।

अपने पुनरुत्थित होने के बाद प्रभु यीशु उन लोगों के सामने प्रकट हुआ जिन्हें वह आवश्यक समझता था, उनसे बातें कीं, और उनसे अपेक्षाएँ कीं, और लोगों के बारे में अपने इरादे और उनसे अपनी अपेक्षाएँ पीछे छोड़ गया। कहने का अर्थ है कि देहधारी परमेश्वर के रूप में मानवजाति के लिए उसकी चिंता और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ कभी नहीं बदलीँ; जब वह देह में था तब, और सलीब पर चढ़ाए जाने और पुनरुत्थित होने के बाद जब वह आध्यात्मिक देह में था तब भी, वे एक-जैसी रहीं। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों के बारे में चिंतित था, और अपने हृदय में वह हर एक व्यक्ति की स्थिति को लेकर स्पष्ट था और वह प्रत्येक व्यक्ति की कमियाँ समझता था, और निस्संदेह, अपनी मृत्यु, पुनरुत्थान और आध्यात्मिक शरीर बन जाने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति के बारे में उसकी समझ वैसी थी, जैसी तब थी जब वह देह में था। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, किंतु देह में रहने के दौरान उसने लोगों से कठोर माँगें नहीं कीं। परंतु पुनरुत्थित हो जाने के बाद वह उनके सामने प्रकट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित किया कि प्रभु यीशु परमेश्वर से आया है और वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने अपने प्रकटन और पुनरुत्थान के तथ्य का उपयोग मानवजाति द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सबसे बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में किया। मृत्यु से उसके पुनरुत्थान ने न केवल उन सभी को मज़बूत किया जो उसका अनुसरण करते थे, बल्कि उसने अनुग्रह के युग के उसके कार्य को मानवजाति के बीच अच्छी तरह से कार्यान्वित कर दिया, और इस प्रकार अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए जाने वाले उद्धार का सुसमाचार धीरे-धीरे मानवजाति के हर छोर तक पहुँच गया। क्या तुम कहोगे कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटन का कोई महत्व था? उस समय यदि तुम थोमा या पतरस होते, और तुमने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतनी अर्थपूर्ण थी, तो इसका तुम्हारे ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या तुमने इसे परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सबसे बड़े दर्शन के रूप में देखा होता? क्या तुमने परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयत्न करते हुए और अपने जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हुए इसे परमेश्वर का अनुसरण करने की एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखा होता? क्या तुमने इस सबसे बड़े दर्शन को फैलाने के लिए जीवन भर का प्रयास व्यय किया होता? क्या तुमने प्रभु यीशु द्वारा उद्धार का सुसमाचार फैलाने को परमेश्वर की आज्ञा के रूप में लिया होता? भले ही तुम लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों द्वारा परमेश्वर और उसकी इच्छा की एक स्पष्ट समझ प्राप्त करने के लिए थोमा और पतरस के दो उदाहरण काफी हैं। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, जब उसने मानवजाति के बीच रहकर जीवन का अनुभव प्राप्त कर लिया और मानव-जीवन का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर लिया, और जब उसने उस समय मानवजाति की भ्रष्टता और मानव-जीवन की दशा देख ली, तो देहधारी परमेश्वर ने ज्यादा गहराई से यह महसूस किया कि मानवजाति कितनी असहाय, शोचनीय और दयनीय है। देह में रहते हुए परमेश्वर में जो मानवता थी, उसकी वजह से, अपनी दैहिक अंत:प्रेरणाओं की वजह से, परमेश्वर ने मनुष्य की स्थिति के प्रति और अधिक समवेदना हासिल की। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिंतित हो गया। ये शायद ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें तुम लोग नहीं समझ सकते, परंतु मैं देहधारी परमेश्वर द्वारा अपने हर एक अनुयायी के लिए अनुभव की गई इस चिंता और परवाह का केवल इन दो शब्दों में वर्णन कर सकता हूँ : "गहन चिंता"। यद्यपि ये शब्द मानवीय भाषा से आते हैं, और यद्यपि ये बहुत मानवीय हैं, फिर भी ये अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर की भावनाओं को वास्तव में व्यक्त और वर्णित करते हैं। जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की गहन चिंता की बात है, अपने अनुभवों के दौरान तुम लोग धीरे-धीरे इसे महसूस करोगे और इसका स्वाद लोगे। किंतु इसे केवल अपने स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करने के आधार पर परमेश्वर के स्वभाव को धीरे-धीरे समझकर ही प्राप्त किया जा सकता है। जब प्रभु यीशु प्रकट हुआ, तो इसने मानवजाति में उसके अनुयायियों के लिए उसकी गहन चिंता को मूर्त रूप दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक देह को, या तुम यह कह सकते हो कि उसकी दिव्यता को, सौंप दिया। उसके प्रकटन ने लोगों को परमेश्वर की चिंता और परवाह का एक बार और अनुभव और एहसास कराया, साथ ही सशक्त रूप से यह भी प्रमाणित किया कि वह परमेश्वर ही है, जो युग का सूत्रपात करता है, युग का विकास करता है, और युग का समापन भी करता है। अपने प्रकटन के माध्यम से उसने सभी लोगों का विश्वास मज़बूत किया, और संसार के सामने इस तथ्य को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। इससे उसके अनुयायियों को अनंत पुष्टि मिली, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने नए युग में अपने कार्य के एक चरण का सूत्रपात किया।

13. अपने पुनरुत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्रशास्त्र समझाता है

लूका 24:30-32 जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशा स्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?"

14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भुनी हुई मछली दी

लूका 24:36-43 वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" परन्तु वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्‍चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया। उसने लेकर उनके सामने खाया।

आगे हम पवित्रशास्त्र के उपर्युक्त अंशों पर नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्रशास्त्र को समझाने का वर्णन करता है, और दूसरे अंश में प्रभु यीशु के भुनी हुई मछली खाने का वर्णन है। ये दो अंश परमेश्वर के स्वभाव को जानने में तुम्हारी किस प्रकार सहायता करते हैं? क्या तुम लोग प्रभु यीशु के रोटी और फिर भुनी हुई मछली खाने के इन विवरणों से प्राप्त तसवीर के प्रकार की कल्पना कर सकते हो? क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि यदि प्रभु यीशु तुम लोगों के सामने रोटी खाता हुआ खड़ा होता, तो तुम लोगों को कैसा महसूस होता? अथवा यदि वह तुम लोगों के साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा होता, लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा होता, तो उस क्षण तुम्हारे मन में किस प्रकार की भावना आती? यदि तुम महसूस करते कि तुम प्रभु के बेहद करीब हो, कि वह तुम्हारे साथ बहुत अंतरंग है, तो यह भावना सही है। यह बिलकुल वही परिणाम है, जो अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु इकट्ठे हुए लोगों के सामने रोटी और मछली खाकर लाना चाहता था। यदि प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद लोगों से सिर्फ बात की होती, यदि वे उसकी देह और हड्डियों को महसूस न कर पाते, बल्कि यह महसूस करते कि वह एक अगम्य पवित्रात्मा है, तो वे कैसा महसूस करते? क्या वे निराश नहीं हो जाते? निराशा अनुभव करके क्या लोग परित्यक्त महसूस न करते? क्या वे अपने और प्रभु यीशु मसीह के बीच एक दूरी महसूस न करते? परमेश्वर के साथ लोगों के संबंध पर यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती? लोग निश्चित रूप से भयभीत हो जाते, वे उसके करीब आने की हिम्मत न करते, और उनका उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने का रवैया होता। तब से वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने अंतरंग संबंध को तोड़ देते, और वापस मानवजाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच के संबंध की ओर लौट जाते, जैसा कि अनुग्रह के युग के पहले था। वह आध्यात्मिक देह, जिसे लोग छू या महसूस न कर पाते, परमेश्वर के साथ उनकी अंतरंगता का उन्मूलन कर देती, और वह उस अंतरंगता के अस्तित्व को भी, जो प्रभु यीशु मसीह के देह में रहने के समय स्थापित हुई थी, जिसमें मानवजाति और उसके बीच कोई दूरी नहीं थी, खत्म कर देती। आध्यात्मिक देह से लोगों में केवल डरने, बचने और निःशब्द टकटकी लगाकर देखने की भावनाएँ उभरी थीं। वे उसके करीब आने या उससे बात करने की हिम्मत न करते, उसका अनुसरण करने, उसका विश्वास करने या उसका आदर करने की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर मनुष्यों के मन में अपने लिए इस प्रकार की भावना देखने का इच्छुक नहीं था। वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उससे बचकर निकलें या अपने आप को उससे दूर हटा लें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ और उसका परिवार बन जाएँ। यदि तुम्हारा अपना परिवार, तुम्हारे बच्चे तुम्हें देखें लेकिन तुम्हें पहचानें नहीं, और तुम्हारे करीब आने की हिम्मत न करें बल्कि हमेशा तुमसे बचते रहें, और जो कुछ तुमने उनके लिए किया, वे उसे समझ न पाएँ, तो इससे तुम्हें कैसा महसूस होगा? क्या यह दर्दनाक नहीं होगा? क्या इससे तुम्हारा हृदय टूट नहीं जाएगा? बिलकुल ऐसा ही परमेश्वर महसूस करता है, जब लोग उससे बचते हैं। इसलिए, अपने पुनरुत्थान के बाद भी प्रभु यीशु लोगों के सामने मांस और लहू के अपने रूप में ही प्रकट हुआ, और तब भी उसने उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह मनुष्यों से भी यही चाहता है कि वे उसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के रूप में देखें; केवल इसी तरह से परमेश्वर वास्तव में लोगों को प्राप्त कर सकता है, और केवल इसी तरह से लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या तुम लोग पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों का उद्धरण देने के मेरे इरादे को समझ सकते हो, जिनमें प्रभु यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद रोटी खाता है और पवित्रशास्त्र को समझाता है, और चेले उसे खाने के लिए भुनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि कार्यों की जो शृंखलाएँ प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद कहीं और कीं, उनमें एक गंभीर विचार रखा गया था। वे उस दयालुता और स्नेह से भरी हुई थीं, जो परमेश्वर मानवजाति के प्रति रखता है, और वे दुलार और सूक्ष्म परवाह से भी भरी हुई थीं, जो वह उस अंतरंग संबंध के प्रति रखता था, जिसे उसने देह में रहने के दौरान मानवजाति के साथ स्थापित किया था। इससे भी अधिक, वे अतीत की उस ललक और लालसा से भी भरी हुई थीं, जो उसने देह में रहने के दौरान अपने अनुयायियों के साथ खाने-पीने के अपने जीवन के लिए महसूस की थी। इसलिए, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी महसूस करें, न ही वह यह चाहता था कि मानवजाति स्वयं को परमेश्वर से दूर रखे। इससे भी बढ़कर, वह नहीं चाहता था कि मानवजाति यह महसूस करे कि प्रभु यीशु पुनरुत्थान के बाद वह प्रभु नहीं रहा जो लोगों से बहुत अंतरंग था, कि वह अब मानवजाति के साथ नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में लौट गया है, उस पिता के पास लौट गया है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते या जिस तक वे कभी पहुँच नहीं सकते। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मानवजाति के बीच हैसियत का कोई अंतर पैदा हो गया है। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है, जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परंतु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसके हृदय में पीड़ा होती है, क्योंकि इसका मतलब यह है कि उनका हृदय उससे बहुत दूर है और उसके लिए उनके हृदय को पाना बहुत कठिन होगा। इसलिए यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हुआ होता जिसे वे देख या छू न सकते, तो इसने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इससे मानवजाति गलती से यह समझ बैठती कि पुनरुत्थान के बाद मसीह अभिमानी, मनुष्यों से भिन्न प्रकार का और ऐसा बन गया है, जो अब मनुष्यों के साथ मेज पर नहीं बैठ सकता और उनके साथ खा नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य पापी और गंदे हैं, और कभी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते। मानवजाति की इन ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए प्रभु यीशु ने कई चीज़ें कीं, जिन्हें वह देह में रहते हुए किया करता था, जैसा कि बाइबल में दर्ज है : "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" उसने उन्हें पवित्रशास्त्र भी समझाया, जैसा कि वह अतीत में किया करता था। प्रभु यीशु द्वारा की गई इन सब चीज़ों ने हर उस व्यक्ति को, जिसने उसे देखा था, यह महसूस कराया कि प्रभु बदला नहीं है, वह अभी भी वही प्रभु यीशु है। भले ही उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, किंतु वह पुनर्जीवित हो गया है और उसने मानवजाति को छोड़ा नहीं है। वह मनुष्यों के बीच रहने के लिए लौट आया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। लोगों के सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र अभी भी वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और बातचीत का उसका तरीका बहुत परिचित लगता था। वह अभी भी प्रेममय करुणा, अनुग्रह और सहनशीलता से उतना ही भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था, जो लोगों से वैसे ही प्रेम करता था जैसे वह अपने आप से करता था, जो मानवजाति को सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा कर सकता था। उसने हमेशा की तरह लोगों के साथ खाया, उनके साथ पवित्रशास्त्र पर चर्चा की, और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह पहले के समान ही माँस और लहू से बना था और उसे छुआ और देखा जा सकता था। पहले की तरह के मनुष्य के पुत्र के रूप में उसने लोगों को अंतरंगता महसूस कराई, सहजता महसूस कराई, और किसी खोई हुई चीज़ को पुनः प्राप्त करने का आनंद दिलाया। बड़ी आसानी से उन्होंने बहादुरी और आत्मविश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा और उसका आदर करना आरंभ कर दिया, जो मानवजाति को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। वे बिना किसी हिचकिचाहट के प्रभु यीशु के नाम से प्रार्थना भी करने लगे, वे उसका अनुग्रह, उसका आशीष प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए, उससे देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने लगे, और प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करने लगे और दुष्टात्माओं को निकालने लगे।

जिस दौरान प्रभु यीशु ने देह में रहकर काम किया, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उसके द्वारा कही गई चीज़ों को पूरी तरह से सत्यापित नहीं कर सके। जब वह सूली की ओर बढ़ रहा था, तो उसके चेलों का रवैया पर्यवेक्षण का था। फिर, उसे सूली पर चढ़ाए जाने से लेकर क़ब्र में डाले जाने के समय तक उसके प्रति लोगों का रवैया निराशा का था। इस दौरान लोगों ने पहले ही अपने हृदय में उन चीज़ों के बारे में संदेह करने से एकदम नकारने की ओर जाना आरंभ कर दिया था, जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के समय कहा था। फिर जब वह क़ब्र से बाहर आया और एक-एक करके लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो उन लोगों में से अधिकांश, जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरुत्थान का समाचार सुना था, धीरे-धीरे नकारने से संशय करने की ओर आने लगे। केवल जब अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने थोमा से उसका हाथ अपने पंजर में डलवाया, और जब प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खाई, और फिर उनके सामने भुनी हुई मछली खाने के लिए बढ़ा, तभी उन्होंने वास्तव में इस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ही देहधारी मसीह है। तुम कह सकते हो कि यह ऐसा था, मानो माँस और रक्त वाला यह आध्यात्मिक शरीर उन लोगों के सामने खड़ा उन्हें स्वप्न से जगा रहा था : उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र वह था, जो अनादि काल से अस्तित्व में था। उसका एक रूप, माँस और हड्डियाँ थीं, और वह पहले ही लंबे समय मानवजाति के साथ तक रह और खा चुका था...। इस समय लोगों ने महसूस किया कि उसका अस्तित्व बहुत यथार्थ और बहुत अद्भुत था। साथ ही, वे भी बहुत आनंदित और प्रसन्न थे और भावनाओं से भरे थे। उसके पुनः प्रकटन ने लोगों को वास्तव में उसकी विनम्रता दिखाई, मानवजाति के प्रति उसकी नज़दीकी और अनुरक्ति अनुभव कराई, और यह महसूस कराया कि वह उनके बारे में कितना सोचता है। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को, जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था, यह महसूस कराया मानो एक पूरा जीवन-काल गुज़र चुका हो। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिंतित, लालायित और संवेदनशून्य हृदय को आराम मिला। वे अब शंकालु या निराश नहीं रहे, क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब आशा और भरोसा करने के लिए कुछ है। उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र अब हर समय उनका पृष्ठरक्षक रहेगा; वह उनका दृढ़ दुर्ग, अनंत काल के लिए उनका आश्रय होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरुत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मानवजाति को नहीं छोड़ा था। लोगों के सामने प्रकट होकर उसने उन्हें बताया कि वह किसी भी रूप में मौजूद क्यों न हो, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। उसने उन्हें बताया कि वह हर समय और हर जगह मनुष्यों का भरण-पोषण और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें अपने को देखने और छूने देगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि वे फिर कभी असहाय महसूस न करें। प्रभु यीशु यह भी चाहता था कि लोग यह जानें कि इस संसार में वे अकेले नहीं रहते। मानवजाति के पास परमेश्वर की देखरेख है; परमेश्वर उनके साथ है। वे हमेशा परमेश्वर पर आश्रित हो सकते हैं, और वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आश्रित होकर मानवजाति अब और एकाकी या असहाय नहीं रहेगी, और जो उसे अपनी पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं, वे अब और पाप में बँधे नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, प्रभु यीशु द्वारा अपने पुनरुत्थान के बाद किए गए उसके कार्य के ये भाग बहुत छोटी चीज़ें थीं, परंतु जिस तरह से मैं उन्हें देखता हूँ, उसके द्वारा की गई छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत अर्थपूर्ण, बहुत मूल्यवान, बहुत प्रभावशाली और भारी महत्व रखने वाली थी।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाइयों और पीड़ा से भरा हुआ था, फिर भी मांस और रक्त की अपनी आध्यात्मिक देह के प्रकटन के माध्यम से, उसने उस समय के मानवजाति को छुड़ाने के देह के अपने कार्य को पूर्णता और कुशलता से संपन्न किया था। उसने देह बनकर अपनी सेवकाई की शुरुआत की और मनुष्यों के सामने अपने दैहिक रूप में प्रकट होकर उसने अपनी सेवकाई का समापन किया। मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से नए युग की शुरुआत करते हुए उसने अनुग्रह के युग की उद्घोषणा की। मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से उसने अनुग्रह के युग में अपना कार्य किया और अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को मज़बूत किया और उनकी अगुआई की। परमेश्वर के कार्य के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह जो आरंभ करता है, उसे वास्तव में पूरा करता है। इस कार्य में कदम और योजना होती है, और वह परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वशक्तिमत्ता, उसके अद्भुत कर्मों, उसके प्रेम और दया से भी भरपूर होता है। निस्संदेह, परमेश्वर के समस्त कार्य का मुख्य सूत्र मानवजाति के लिए उसकी देखभाल है; यह उसकी परवाह की भावनाओं से ओतप्रोत है, जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता। बाइबल के इन पदों में, अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु द्वारा की गई एक-एक चीज़ में मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपरिवर्तनीय आशाएँ और चिंता प्रकट हुई, और साथ ही प्रकट हुई मनुष्यों के लिए परमेश्वर की कुशल देखरेख और दुलार। शुरू से लेकर आज तक इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय अनजाने ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता? यदि तुम लोग उस युग में रह रहे होते और प्रभु यीशु पुनरुत्थान के बाद तुम लोगों के सामने मूर्त रूप में प्रकट होता जिसे तुम लोग देख सकते, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और तुम लोगों को पवित्रशास्त्र समझाता, तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? या तुम दोषी महसूस करते? परमेश्वर के बारे में पिछली ग़लतफहमियाँ और उससे बचना, परमेश्वर के साथ टकराव और उसके बारे में संदेह—क्या ये सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच का रिश्ता और अधिक सामान्य और उचित न हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की व्याख्या से, क्या तुम लोगों को परमेश्वर के स्वभाव में किसी खामी का पता चलता है? क्या तुम लोगों को परमेश्वर के प्रेम में कोई मिलावट मिलती है? क्या तुम लोगों को परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में कोई धोखा या बुराई दिखती है? निश्चित रूप से नहीं! अब क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर की प्रत्येक भावना उसके सार और उसके स्वभाव का प्रकाशन है? मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम लोगों को इनसे प्राप्त होने वाली समझ से सहायता मिलेगी और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन और परमेश्वर से भय मानने के तुम्हारे प्रयास में तुम लोगों को लाभ पहुँचाएँगे, और वे तुम लोगों के लिए ऐसे फल लाएँगे जो दिन प्रति दिन बढ़ते ही जाएँगे, जिससे खोज की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, उस मानक के अधिकाधिक करीब ले आएगी जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है। तुम लोग सत्य की खोज करने में अब और ऊबा हुआ महसूस नहीं करोगे और तुम लोग अब और ऐसा महसूस नहीं करोगे कि सत्य की और स्वभाव में परिवर्तन की खोज एक कष्टप्रद या निरर्थक चीज़ है। इसके बजाय, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके पवित्र सार की अभिव्यक्ति से प्रेरित होकर तुम लोग ज्योति की लालसा करोगे, न्याय की लालसा करोगे, और सत्य की खोज करने, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का प्रयास करने की आकांक्षा करोगे, और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए व्यक्ति बन जाओगे, एक वास्तविक व्यक्ति बन जाओगे।

आज हमने उन कुछ चीज़ों के बारे में बात की है, जो परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में की थीं, जब उसे पहली बार देहधारी बनाया गया था। इन चीज़ों से हमने उसके द्वारा देह में व्यक्त और प्रकट किए गए स्वभाव को और साथ ही उसके स्वरूप के प्रत्येक पहलू को देखा है। उसके स्वरूप के ये सभी पहलू बहुत ही मानवीय प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि उसके द्वारा प्रकट और व्यक्त की गई हर चीज़ का सार उसके अपने स्वभाव से अलग नहीं किया जा सकता। देहधारी परमेश्वर की हर पद्धति और उसका हर पहलू, जो मानवता में उसके स्वभाव को व्यक्त करता है, उसके अपने सार से मजबूती से जुड़ा है। इसलिए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर मनुष्य के पास देहधारण के तरीके का उपयोग करके आया। जो कार्य उसने देह में किया, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है, किंतु देह में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए, भ्रष्टता में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए इससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं उसके द्वारा प्रकट किया गया स्वभाव और उसके द्वारा व्यक्त की गई इच्छा। क्या तुम लोग इसे समझने में सक्षम हो? परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को समझने के बाद क्या तुम लोगों ने कोई निष्कर्ष निकाला है कि तुम लोगों को परमेश्वर के साथ कैसा बरताव करना चाहिए? अंत में, इस प्रश्न के उत्तर में, मैं तुम लोगों को तीन सलाहें देना चाहूँगा : पहली, परमेश्वर की परीक्षा मत लो। चाहे तुम परमेश्वर के बारे में कितना भी क्यों न समझते हो, चाहे तुम उसके स्वभाव के बारे में कितना भी क्यों न जानते हो, उसकी परीक्षा बिलकुल मत लो। दूसरी, हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ संघर्ष मत करो। चाहे परमेश्वर तुम्हें किसी भी प्रकार की हैसियत दे या वह तुम्हें किसी भी प्रकार का कार्य सौंपे, चाहे वह तुम्हें किसी भी प्रकार का कर्तव्य करने के लिए बड़ा करे, और चाहे तुमने परमेश्वर के लिए कितना भी व्यय और बलिदान किया हो, उसके साथ हैसियत के लिए प्रतिस्पर्धा बिलकुल मत करो। तीसरी, परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा मत करो। परमेश्वर तुम्हारे साथ जो कुछ भी करता है, जो भी वह तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है, और जो चीज़ें वह तुम पर लाता है, तुम उन्हें समझते या उनके प्रति समर्पित होते हो या नहीं, किंतु परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा बिलकुल मत करो। यदि तुम इन सलाहों पर चल सकते हो, तो तुम काफी सुरक्षित रहोगे, और तुम परमेश्वर को क्रोधित करने की ओर प्रवृत्त नहीं होगे। हम अपनी आज की संगति यहीं समाप्त करेंगे।

23 नवंबर, 2013

फुटनोट :

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

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