स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

परमेश्वर का अधिकार (I)

मेरी पिछली अनेक संगतियाँ परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के विषय में थीं। इन संगतियों को सुनने के बाद, क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम सबने परमेश्वर के स्वभाव की समझ और ज्ञान प्राप्त कर लिया है? तुमने किस हद तक समझ और ज्ञान प्राप्त किया है? क्या तुम लोग उसे संख्या में बता सकते हो? क्या इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर की और गहरी समझ दी है? क्या यह कहा जा सकता है कि यह समझ परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? क्या यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के बारे में यह ज्ञान और समझ परमेश्वर के संपूर्ण सार और उसके पास जो है, उसका ज्ञान है? नहीं, बिलकुल नहीं! क्योंकि ये संगतियाँ केवल परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है, उसके एक भाग की ही समझ प्रदान करती हैं—न कि संपूर्ण रूप से उसकी समग्रता की। इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के एक भाग को समझने में सक्षम बनाया; इन संगतियों के माध्यम से तुमने परमेश्वर के स्वभाव और उसके पास जो है, उसे देखा और साथ ही यह भी देखा कि जो कुछ उसने किया है, उसके पीछे उसका क्या नजरिया और सोच है। परंतु यह केवल परमेश्वर के बारे में शाब्दिक एवं मौखिक समझ है, और तुम सब अपने हृदय में अनिश्चित बने रहते हो कि यह कितनी वास्तविक है। वह कौन-सी चीज है, जो मुख्य रूप से यह निर्धारित करती है कि ऐसी चीजों के प्रति लोगों की समझ में कोई वास्तविकता है या नहीं? यह इससे निर्धारित होता है कि उन सबने अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर के वचनों और स्वभाव का वास्तव में कितना अनुभव किया है, और वे लोग इन वास्तविक अनुभवों के दौरान उसे कितना देख या समझ पाए हैं। क्या किसी ने ऐसे शब्द कहे हैं : "पिछली कई संगतियों से हमने परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों और उसके विचारों के अतिरिक्त मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये, और उसके कार्यों के आधार, और साथ ही उसके कार्यों के सिद्धांतों की समझ पाई है; और इसलिए हम परमेश्वर के स्वभाव को समझ गए हैं, और हमने परमेश्वर की संपूर्णता को जान लिया है"? क्या यह कहना सही है? स्पष्ट रूप से, सही नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह कहना सही नहीं है? परमेश्वर का स्वभाव और उसके पास जो है, उसके द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों में व्यक्त होते हैं। परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के पास जो है उसके दर्शन कर सकता है, परंतु इसका अर्थ इतना ही है कि उसके द्वारा किए गए कार्यों और उसके वचनों से मनुष्य, परमेश्वर के स्वभाव और उसके पास जो है उसके एक अंश को ही समझने में सक्षम हो सकता है। यदि मनुष्य परमेश्वर की और अधिक तथा और गहरी समझ प्राप्त करना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य का और अधिक अनुभव करना होगा। यद्यपि परमेश्वर के वचनों और कार्य के अंश का अनुभव करते हुए मनुष्य परमेश्वर की आंशिक समझ ही प्राप्त करता है, परंतु क्या यह आंशिक समझ परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है? क्या यह परमेश्वर के सार का प्रतिनिधित्व करती है? बेशक, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार का प्रतिनिधित्व करती है; इसमें कोई संदेह नहीं है। समय या स्थान चाहे जो हो, परमेश्वर चाहे जिस भी तरीके से अपना काम करे, या वह जिस भी रूप में मनुष्य के सामने प्रकट हो, या जिस भी प्रकार से वह अपनी इच्छा व्यक्त करे, वह सब जो वह प्रकट और व्यक्त करता है, वह स्वयं परमेश्वर, परमेश्वर के सार और उसके पास जो है, उसका प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर अपना कार्य, उसके पास जो है, उससे और अपनी सच्ची पहचान के साथ करता है; यह बिलकुल सच है। फिर भी, आज लोगों को परमेश्वर की आंशिक समझ ही है, जो उन्होंने उसके वचनों के माध्यम से और प्रवचन सुनकर पाई है, और एक हद तक उसे केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही कहा जा सकता है। अपनी वास्तविक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए तुम परमेश्वर के बारे में समझ या ज्ञान को, जिसे आज तुमने सुना, देखा या जाना और अपने हृदय में समझा है, उसे केवल तभी सत्यापित कर सकते हो, जब तुममें से हर एक अपने वास्तविक अनुभवों में इससे होकर गुजरे और थोड़ा-थोड़ा करके इसे जाने। यदि मैं संगति में तुम लोगों से ये वचन न कहता, तो क्या तुम मात्र अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हासिल कर पाते? नहीं, ऐसा करना बहुत कठिन होता। क्योंकि यह जानने के लिए कि अनुभव कैसे करें, लोगों के पास पहले परमेश्वर के वचन होने चाहिए। परमेश्वर के जितने वचनों को लोग खाते हैं, उतनी ही मात्रा का वे वास्तव में अनुभव कर सकते हैं। परमेश्वर के वचन आगे के पथ पर ले जाते हैं और मनुष्य को उसके अनुभव में मार्गदर्शन देते हैं। संक्षेप में, जिन लोगों को थोड़ा-बहुत सच्चा अनुभव है, उन्हें ये पिछली कई संगतियाँ सत्य की और अधिक गहरी समझ और परमेश्वर के बारे में और अधिक वास्तविक ज्ञान हासिल करने में सहायता करेंगी। परंतु जिन्हें कुछ भी वास्तविक अनुभव नहीं है, या जिन्होंने अभी अपना अनुभव प्रारंभ ही किया, या जिन्होंने अभी वास्तविकता को स्पर्श करना प्रारंभ ही किया है, उनके लिए यह एक बड़ी परीक्षा है।

पिछली कई संगतियों की मुख्य विषयवस्तु "परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर" से संबंधित थी। जो कुछ भी मैंने कहा था, उसके मुख्य और केंद्रीय भागों में तुम सबने क्या देखा? इन संगतियों के माध्यम से, क्या तुम लोग यह पहचानने में सक्षम हो कि जिसने यह काम किया, और जिसने इन स्वभावों को प्रकट किया, वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो सभी चीजों के ऊपर संप्रभुता रखता है? यदि तुम सबका उत्तर हाँ है, तो किस बात ने तुम लोगों को इस निष्कर्ष पर पहुँचाया? इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तुमने कितने पहलुओं पर विचार किया? क्या कोई मुझे बता सकता है? मैं जानता हूँ कि पिछली कुछ संगतियों ने तुम सबको गहराई से प्रभावित किया, और तुम लोगों के हृदय में, परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के लिए एक नई शुरुआत प्रदान की, जो उत्कृष्ट है। लेकिन, यद्यपि तुम लोगों ने पहले की तुलना में परमेश्वर के बारे में अपनी समझ में एक बड़ी छलाँग लगाई है, फिर भी परमेश्वर की पहचान की तुम लोगों की परिभाषा अभी भी व्यवस्था के युग के यहोवा परमेश्वर, अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु, और राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर जैसे नामों से आगे नहीं गई है। अर्थात, यद्यपि "परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर" के बारे में इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा कभी बोले गए वचनों और उसके द्वारा कभी किए गए कार्य तथा परमेश्वर द्वारा कभी प्रकट किए गए अस्तित्व और व्यावहारिक गुणों की कुछ समझ दी है, फिर भी तुम लोग "परमेश्वर" शब्द की सही परिभाषा और सटीक अभिमुखता प्रदान करने में असमर्थ हो। तुम लोगों के पास स्वयं परमेश्वर की हैसियत और पहचान की, अर्थात् सभी चीजों के बीच और संपूर्ण ब्रह्मांड के मध्य परमेश्वर की हैसियत की, सच्ची और सटीक अभिमुखता तथा ज्ञान भी नहीं है। यह इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर और उसके स्वभाव से संबंधित पिछली संगतियों में समस्त विषयवस्तु परमेश्वर की पूर्व अभिव्यक्तियों और प्रकटीकरण पर आधारित थीं, जो बाइबल में दर्ज हैं। अभी मनुष्य के लिए उस अस्तित्व और उन व्यावहारिक गुणों का पता लगाना कठिन है, जो परमेश्वर द्वारा मानव-जाति के प्रबंधन और उद्धार के दौरान, या उसके बाहर, प्रकट और व्यक्त किए गए हैं। अतः, भले ही तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व और उसके व्‍यावहारिक गुणों को समझते हो, जो उसके द्वारा अतीत में किए गए कार्य में प्रकट हुए थे, फिर भी परमेश्वर की पहचान और हैसियत की तुम लोगों की परिभाषा अभी भी "अद्वितीय परमेश्वर, जो सभी चीजों के ऊपर संप्रभुता रखता है," से बहुत दूर है और "सृष्टिकर्ता" की परिभाषा से अलग है। पिछली कई संगतियों ने सबको एक जैसा महसूस कराया : मनुष्य परमेश्वर के विचारों को कैसे जान सकता है? यदि कोई वास्तव में जान जाए, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से परमेश्वर ही होगा, क्योंकि केवल स्वयं परमेश्वर ही अपने विचारों को जानता है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही अपने हर कार्य के अंतर्निहित आधार और दृष्टिकोण को जानता है। तुम लोगों को इस रीति से परमेश्वर की पहचान को जानना उचित और तर्कसंगत लगता है, परंतु परमेश्वर के स्वभाव और कार्य से कौन यह बता सकता है कि यह वास्तव में स्वयं परमेश्वर का कार्य है, मनुष्य का नहीं, ऐसा कार्य जो परमेश्वर की ओर से मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता? कौन यह देख सकता है कि यह कार्य उसकी संप्रभुता में आता है जिसके पास परमेश्वर का सार और सामर्थ्‍य है? अर्थात, किन विशेषताओं या सार के जरिये तुम लोग यह पहचानते हो कि वह स्वयं परमेश्वर है, जिसके पास परमेश्वर की पहचान है, और जो सब चीजों के ऊपर संप्रभुता रखता है? क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है? यदि तुम लोगों ने नहीं सोचा है तो इससे एक बात साबित होती है : पिछली कई संगतियों ने तुम लोगों को बस इतिहास के एक हिस्से की कुछ समझ दी है जिसमें परमेश्वर ने अपना कार्य किया था, और उस कार्य के दौरान परमेश्वर के नजरिये, उसकी अभिव्यक्ति और उसके प्रकटीकरण की कुछ समझ दी है। हालाँकि ऐसी समझ तुममें से प्रत्येक को निस्संदेह यह पहचान करवाती है कि कार्य के इन दोनों चरणों को पूरा करने वाला स्वयं परमेश्वर है, जिसमें तुम लोग विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो और जिसका तुम सबको हमेशा अनुसरण करना चाहिए, फिर भी तुम लोग अब भी यह पहचानने में असमर्थ हो कि यह वही परमेश्वर है, जो विश्व के सृजन के समय से अस्तित्व में है, और जो अनंत काल तक अस्तित्व में बना रहेगा, न ही तुम यह पहचानने में समर्थ हो कि वही समस्त मानव-जाति की अगुआई करता है और उस पर प्रभुत्व रखता है। तुम लोगों ने निश्चित रूप से इस समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा है। वह यहोवा हो या प्रभु यीशु, सार और अभिव्यक्ति के किन पहलुओं के माध्यम से तुम यह पहचानने में सक्षम होते हो कि वह न केवल वह परमेश्वर है, जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए, बल्कि वह वही है जो मानव-जाति को आज्ञा देता है और मनुष्यों की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है, इसके अतिरिक्त जो स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम यह पहचानते हो कि जिसमें तुम विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो, वह स्वयं परमेश्वर है जो सब चीजों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम लोग उस परमेश्वर को, जिस पर तुम विश्वास करते हो, उस परमेश्वर से जोड़ सकते हो, जो मानव-जाति के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है? तुम यह कैसे पहचानते हो कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वही वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी, और सभी चीजों में है? यह वह समस्या है, जिसका मैं अगले खंड में समाधान करूँगा।

जिन समस्याओं के बारे में तुम लोगों ने कभी नहीं सोचा है या जिनके बारे में तुम सोच भी नहीं सकते हो, वे हो सकती हैं जो परमेश्वर को जानने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, और जिनमें ऐसे सत्य खोजे जा सकते हैं जो मनुष्य के लिए अथाह हैं। जब ये समस्याएँ तुम लोगों पर आती हैं और तुम्हें उनका सामना करना, चुनाव करना आवश्यक होता है, तब यदि तुम लोग अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण उनका पूरी तरह से समाधान करने में असमर्थ रहते हो, या इसलिए कि तुम्हारे अनुभव बहुत सतही हैं और तुम लोगों में परमेश्वर के सच्चे ज्ञान की कमी है, तो वे परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की राह में सबसे बड़ा अवरोध और सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगी। और इसलिए मुझे लगता है कि इस विषय में तुम लोगों के साथ संगति करना बहुत जरूरी है। क्या अब तुम लोग जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है? क्या तुम लोग उन समस्याओं के बारे में स्पष्ट हो, जिनके बारे में मैंने बताया? क्या ये वे समस्याएँ हैं, जिनका तुम लोग सामना करोगे? क्या ये वे समस्याएँ हैं, जिन्हें तुम लोग नहीं समझते हो? क्या ये वे समस्याएँ हैं जो कभी तुम्हें सूझी नहीं हैं? क्या ये समस्याएँ तुम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या ये वास्तव में समस्याएँ हैं? यह मामला तुम लोगों को बहुत भ्रमित करता है, जिससे पता चलता है कि तुम्हारे अंदर उस परमेश्वर की सच्ची समझ नहीं है, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, और तुम लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि वह परमेश्वर है, और इसलिए मैं उसका अनुसरण करता हूँ, क्योंकि उसके वचन परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। बस, इतना काफी है। और कितने सबूत चाहिए? क्या वाकई हमें परमेश्वर के बारे में संदेह खड़े करने की आवश्यकता है? क्या वाकई हमें परमेश्वर की परीक्षा लेनी चाहिए? क्या वाकई हमें परमेश्वर के सार और स्वयं परमेश्वर की पहचान पर प्रश्न करना चाहिए?" चाहे तुम लोग इस तरह से सोचते हो या नहीं, पर मैं ये प्रश्न परमेश्वर के बारे में तुम लोगों को भ्रमित करने के लिए या तुम लोगों को उसकी परीक्षा लेने हेतु प्रेरित करने के लिए नहीं कर रहा, परमेश्वर की पहचान और उसके सार के बारे में तुम्हारे भीतर संदेह उत्पन्न करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं कर रहा। बल्कि मैं ऐसा इसलिए करता हूँ, ताकि मैं तुम लोगों में परमेश्वर के सार के बारे में बेहतर समझ और परमेश्वर की हैसियत के बारे में अधिक बड़ी निश्चितता और आस्था का संचार कर सकूँ, जिससे कि परमेश्वर अपने अनुयायियों के हृदय में निवास करने वाला एकमात्र परमेश्वर हो सके, और जिससे कि परमेश्वर की—सृष्टिकर्ता, सभी चीजों के शासक और स्वयं अद्वितीय परमेश्वरके रूप में—मूल हैसियत हर प्राणी के हृदय में बहाल हो सके। यह एक मुख्य विषय भी है, जिसके बारे में मैं संगति करने वाला हूँ।

आओ, अब हम बाइबल से निम्नलिखित अंश पढ़ना शुरू करें।

1. परमेश्वर सभी चीजों की सृष्टि करने के लिए वचनों को प्रयोग करता है

उत्पत्ति 1:3-5 जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

उत्पत्ति 1:6-7 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:9-11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:14-15 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:20-21 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

उत्पत्ति 1:24-25 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

पहले दिन, परमेश्वर के अधिकार के कारण, मानव-जाति के दिन और रात उत्पन्न हुए और स्थिर बने हुए हैं

आओ, हम पहले अंश को देखें : "जब परमेश्‍वर ने कहा, 'उजियाला हो,' तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया" (उत्पत्ति 1:3-5)। यह अंश विवरण देता है सृष्टि की शुरुआत में परमेश्वर के पहले कार्य का, और परमेश्वर द्वारा गुजारे गए उस पहले दिन का, जिसमें एक शाम और एक सुबह थी। पर वह एक असाधारण दिन था : परमेश्वर ने सभी चीजों के लिए उजाला तैयार करना शुरू किया, और इतना ही नहीं, उजाले को अँधेरे से अलग किया। इस दिन, परमेश्वर ने बोलना शुरू किया, और उसके वचन और अधिकार साथ-साथ मौजूद रहे। उसका अधिकार सभी चीजों के बीच दिखाई देने लगा, और उसके वचनों के परिणामस्वरूप उसका सामर्थ्‍य सभी चीजों में फैल गया। इस दिन से परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य के कारण सभी चीजें बन गईं और सुदृढ़ रहीं, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य की वजह से काम करना शुरू कर दिया। जब परमेश्वर ने ये वचन कहे "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। परमेश्वर ने कार्यों को किसी क्रम से करना शुरू नहीं किया; उजाला उसके वचनों के परिणामस्वरूप प्रकट हुआ था। इस उजाले को परमेश्वर ने दिन कहा, जिस पर आज भी मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए निर्भर रहता है। परमेश्वर की आज्ञा से उसका सार और मूल्य कभी नहीं बदले हैं, और वह कभी गायब नहीं हुआ है। उसका अस्तित्व परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाता है, और सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की घोषणा करता है। यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत की बारंबार पुष्टि करता है। यह अमूर्त या मायावी नहीं, बल्कि वास्तविक प्रकाश है, जिसे मनुष्य द्वारा देखा जा सकता है। उस समय के बाद से, इस खाली संसार में, जिसमें "पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था," पहली भौतिक चीज पैदा हुई। यह चीज परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों से आई, और परमेश्वर के अधिकार और कथनों के कारण सभी चीजों की सृष्टि के पहले कार्य में दिखाई दी। इसके तुरंत बाद, परमेश्वर ने उजाले और अँधेरे को अलग-अलग होने की आज्ञा दी।... परमेश्वर के वचनों के कारण हर चीज बदल गई और पूरी हो गई।... परमेश्वर ने उजाले को "दिन" कहा और अँधेरे को उसने "रात" कहा। उस समय, जिस संसार को परमेश्वर बनाना चाहता था, उसमें पहली शाम और पहली सुबह हुई, और परमेश्वर ने कहा कि यह पहला दिन है। सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजों की सृष्टि का यह पहला दिन था, और यह सभी चीजों की सृष्टि का प्रारंभ था, और यह पहली बार था, जब सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य उसके द्वारा सृजित इस संसार में दिखा था।

इन वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर और उसके वचनों के अधिकार, और साथ ही परमेश्वर के सामर्थ्‍य को देखने में सक्षम हुआ। चूँकि केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है; चूँकि परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है। क्या किसी मनुष्य या वस्तु के पास ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य हो सकता है? क्या तुम लोगों के दिल में इसका कोई उत्तर है? परमेश्वर को छोड़, क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास ऐसा अधिकार है? क्या तुम लोगों ने किसी पुस्तक या प्रकाशन में कभी ऐसी चीज का उदाहरण देखा है? क्या ऐसा कोई अभिलेख है कि किसी ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों की सृष्टि की हो? यह किसी अन्य पुस्तक या अभिलेखों में नहीं पाया जाता; निस्संदेह, ये परमेश्वर द्वारा दुनिया की भव्य सृष्टि के बारे में एकमात्र आधिकारिक और शक्तिशाली वचन हैं, जो बाइबल में दर्ज हैं; ये वचन परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार और पहचान के बारे में बताते हैं। क्या इस तरह के अधिकार और सामर्थ्‍य को परमेश्वर की अद्वितीय पहचान का प्रतीक कहा जा सकता है? क्या यह कहा जा सकता है कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर ही धारण करता है? निस्संदेह, सिर्फ परमेश्वर ही ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य धारण करता है! यह अधिकार और सामर्थ्य किसी अन्य सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा धारण या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता! क्या यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के विशिष्ट गुणों में से एक है? क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? इन वचनों से लोग शीघ्रता और स्पष्टता से इस तथ्य को समझ जाते हैं कि परमेश्वर अद्वितीय अधिकार, अद्वितीय सामर्थ्‍य, सर्वोच्च पहचान और हैसियत धारण करता है। ऊपर जो संगति की गई है, उससे क्या तुम लोग कह सकते हो कि वह परमेश्वर, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है?

दूसरे दिन परमेश्वर के अधिकार ने जल का प्रबंध किया और आसमान बनाया तथा मनुष्य के जीवित रहने के लिए सबसे बुनियादी जगह प्रकट हुई

आओ, हम बाइबल के दूसरे अंश को पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।' तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया" (उत्पत्ति 1:6-7)। जब परमेश्वर ने कहा "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए" तो कौन-से परिवर्तन हुए? पवित्र शास्त्र में कहा गया है : "तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया।" जब परमेश्वर ने ऐसा कहा और किया, तो क्या परिणाम हुआ? इसका उत्तर अंश के आखिरी भाग में है : "और वैसा ही हो गया।"

इन दोनों छोटे वाक्यों में एक भव्य घटना दर्ज है, और ये वाक्य एक अद्भुत दृश्य का वर्णन करते हैं—एक जबरदस्त उपक्रम, जिसमें परमेश्वर ने जल को नियंत्रित किया और एक जगह बनाई, जिसमें मनुष्य जीवित रह सके ...

इस तस्वीर में, जल और आकाश परमेश्वर की आँखों के सामने तत्क्षण प्रकट होते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा विभाजित हो जाते हैं, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित तरीके से "ऊपर" और "नीचे" के रूप में अलग हो जाते हैं। अर्थात, परमेश्वर द्वारा बनाए गए आकाश ने न केवल नीचे के जल को ढक लिया, बल्कि ऊपर के जल को भी सँभाला।... इस दृश्य में मनुष्य टकटकी लगाकर देखने, भौचक्का होने, और उसके अधिकार की शक्ति और उस दृश्य की भव्यता की तारीफ में ठिठककर रह जाने से खुद को रोक नहीं पाता, जिसमें सृष्टिकर्ता ने जल को स्थानांतरित किया और उसे आज्ञा दी, और आकाश को बनाया। अपने वचनों और सामर्थ्‍य तथा अधिकार द्वारा परमेश्वर ने एक और महान उपलब्धि हासिल की। क्या यह सृष्टिकर्ता की शक्ति नहीं है? आओ, हम परमेश्वर के कर्मों को स्पष्ट करने के लिए पवित्र शास्त्र का प्रयोग करें : परमेश्वर ने अपने वचन कहे, और परमेश्वर के इन वचनों के कारण जल के मध्य में आकाश बन गया। और उसी समय परमेश्वर के इन वचनों के कारण इस स्थान में एक जबरदस्त परिवर्तन हुआ, और यह सामान्य अर्थों में परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक प्रकार का प्रतिस्थापन था, जिसमें कुछ नहीं बदलकर कुछ बन गया। यह सृष्टिकर्ता के विचारों से उत्पन्न हुआ था और सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचनों के कारण कुछ नहीं से कुछ बन गया, और, इतना ही नहीं, इस बिंदु से आगे यह सृष्टिकर्ता की खातिर अस्तित्व में रहेगा और स्थिर बना रहेगा, और सृष्टिकर्ता के विचारों के अनुसार स्थानांतरित, परिवर्तित और नवीकृत होगा। यह अंश, संपूर्ण संसार की सृष्टि में सृष्टिकर्ता के दूसरे कार्य का वर्णन करता है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की एक और अभिव्यक्ति और सृष्टिकर्ता का एक और अग्रणी उपक्रम था। यह दिन जगत की नींव रखने के बाद सृष्टिकर्ता द्वारा बिताया गया दूसरा दिन था, और यह उसके लिए एक और अद्भुत दिन था : वह उजाले के बीच में चला, आकाश को लाया, उसने जल का प्रबंध और नियंत्रण किया और उसके कर्म, उसका अधिकार और उसका सामर्थ्‍य एक नए दिन के काम में लगा दिए गए ...

क्या परमेश्वर के द्वारा अपने वचन कहे जाने से पहले जल के मध्य में आकाश था? बिलकुल नहीं! और परमेश्वर के यह कहने के बाद क्या हुआ "जल के बीच एक अन्तर हो जाए"? परमेश्वर द्वारा इच्छित चीजें प्रकट हो गईं; जल के मध्य में आकाश उत्पन्न हो गया, और जल विभाजित हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने कहा "इस अंतर के कारण जल दो भाग हो जाए।" इस तरह से, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करके, परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के परिणामस्वरूप दो नए पदार्थ, दो नई जन्मी चीजें सभी चीजों के मध्य प्रकट हो गईं। इन दो नई चीजों के प्रकटीकरण से तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता के सामर्थ्‍य की महानता को महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता का अद्वितीय और असाधारण बल महसूस करते हो? इस बल और सामर्थ्‍य की महानता परमेश्वर के अधिकार के कारण है, और यह अधिकार स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और स्वयं परमेश्वर की एक अद्वितीय विशेषता है।

क्या यह अंश तुम लोगों को एक बार और परमेश्वर की अद्वितीयता का गहरा बोध कराता है? वास्तव में यह पर्याप्त होने से बहुत दूर है; सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य इससे कहीं परे जाता है। उसकी अद्वितीयता मात्र इसलिए नहीं है, क्योंकि वह किसी अन्य प्राणी से अलग सार धारण करता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसका अधिकार और सामर्थ्‍य असाधारण, असीमित, सर्वोत्कृष्ट हैं, और इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार और उसके पास जो है, वो जीवन की सृष्टि कर सकता है, चमत्कार कर सकता है, और प्रत्येक भव्य और असाधारण मिनट और सेकंड की सृष्टि कर सकता है। साथ ही वह स्वयं द्वारा सृजित जीवन पर शासन करने में सक्षम है और स्वयं द्वारा सृजित चमत्कारों, और हर मिनट और सेकंड पर संप्रभुता रखता है।

तीसरे दिन, परमेश्वर के वचनों ने पृथ्वी और समुद्रों की उत्पत्ति की, और परमेश्वर के अधिकार ने संसार को जीवन से लबालब भर दिया

आओ, हम उत्पत्ति 1:9-11 का पहला वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।'" परमेश्वर के बस इतना कहने के बाद कि, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," क्या परिवर्तन हुए? और उजाले और आकाश के अलावा इस जगह पर क्या था? पवित्र शास्त्र में लिखा है : "परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, अब इस जगह में भूमि और समुद्र थे, और भूमि और समुद्र विभाजित हो गए थे। इन नई चीजों का प्रकटीकरण परमेश्वर के मुँह से निकली आज्ञा के अनुसरण में हुआ था, "और वैसा ही हो गया।" क्या पवित्र शास्त्र यह वर्णन करता है कि परमेश्वर जब यह सब कर रहा था, तो बहुत व्यस्त था? क्या वह उसके शारीरिक श्रम में संलग्न होने का वर्णन करता है? तो फिर परमेश्वर ने यह कैसे किया? परमेश्वर ने इन नई चीजों को कैसे उत्पन्न किया? स्वतः स्पष्ट है कि परमेश्वर ने यह सब हासिल करने के लिए, इसकी संपूर्णता सृजित करने के लिए वचनों का प्रयोग किया।

उपर्युक्त तीन अंशों में, हमने तीन बड़ी घटनाओं के घटित होने के बारे में जाना। ये तीन घटनाएँ परमेश्वर के वचनों द्वारा प्रकट हुईं और अस्तित्व में लाई गईं, और उसके वचनों के कारण ही एक के बाद एक ये घटनाएँ परमेश्वर की आँखों के सामने घटित हो गईं। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि "परमेश्वर कहेगा, और वह पूरा हो जाएगा; वह आज्ञा देगा, और वह बना रहेगा" खोखले वचन नहीं हैं। परमेश्वर के इस सार की पुष्टि तत्क्षण हो जाती है जब उसके विचार उत्पन्न होते हैं, और जब परमेश्वर बोलने के लिए अपना मुँह खोलता है, तो उसका सार पूर्णत: प्रतिबिंबित होता है।

आओ, हम इस अंश का अंतिम वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,' और वैसा ही हो गया।" जब परमेश्वर बोल रहा था, तो ये सभी चीजें परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके अस्तित्व में आ गईं, और एक क्षण में ही, विभिन्न प्रकार के नाजुक छोटे जीवन-रूप डगमगाते हुए मिट्टी से अपने सिर बाहर निकालने लगे, और अपने शरीर से मिट्टी के कण झाड़ने से पहले ही वे उत्सुकता से एक-दूसरे का अभिनंदन करने लगे तथा सिर हिला-हिलाकर संसार को देख मुस्कराने लगे। उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान किए गए जीवन के लिए उसे धन्यवाद दिया, और संसार के सामने घोषणा की कि वे सभी चीजों का अंग हैं और उनमें से प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता के अधिकार को दर्शाने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा। जैसे ही परमेश्वर ने वचन कहे, भूमि हरी-भरी, हो गई, मनुष्य के काम आ सकने वाले समस्त प्रकार के साग-पात अंकुरित हो गए और जमीन फोड़कर निकल आए, और पर्वत और मैदान वृक्षों एवं जंगलों से पूरी तरह से भर गए।... यह बंजर संसार, जिसमें जीवन का कोई निशान नहीं था, तेजी से प्रचुर घास, साग-पात, वृक्षों एवं उमड़ती हुई हरियाली से भर गया।... तथा घास की सुगंध और मिट्टी की महक हवा में फैल गई, और पौधों की कतार हवा के संचलन के साथ मिलकर साँस लेने लगी और उनके बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। उसी समय, परमेश्वर के वचनों के कारण और परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके, सभी पौधों ने अपने शाश्वत जीवन-चक्र शुरू कर दिए, जिनमें वे बढ़ते हैं, खिलते हैं, फलते हैं और वंश-वृद्धि करते हैं। उन्होंने सख्ती से अपने-अपने जीवन-चक्रों का पालन करना शुरू कर दिया और सभी चीजों के मध्य अपनी-अपनी भूमिका निभानी प्रारंभ कर दी।... वे सब सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण पैदा हुए थे और जी रहे थे। वे सृष्टिकर्ता की अनंत आपूर्ति और पोषण प्राप्त करेंगे, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाने के लिए हमेशा भूमि के हर कोने में दृढ़ता से जीवित रहेंगे और वे हमेशा सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान की गई जीवन-शक्ति को दर्शाते रहेंगे ...

सृष्टिकर्ता का जीवन असाधारण है, उसके विचार असाधारण हैं, और उसका अधिकार असाधारण है और इसलिए, जब उसके वचन उच्चरित हुए, तो उसका अंतिम परिणाम था "और वैसा ही हो गया।" स्पष्ट रूप से, जब परमेश्वर कार्य करता है, तो उसे अपने हाथों से काम करने की आवश्यकता नहीं होती; वह आज्ञा देने के लिए बस अपने विचारों का और आदेश देने के लिए अपने वचनों का प्रयोग करता है, और इस तरह काम पूरे हो जाते हैं। इस दिन, परमेश्वर ने जल को एक साथ एक जगह पर इकट्ठा किया और सूखी भूमि प्रकट होने दी, जिसके बाद परमेश्वर ने भूमि से घास को उगाया, और बीज उत्पन्न करने वाले पौधे और फल देने वाले पेड़ उग गए, और परमेश्वर ने उनकी किस्म के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया तथा उसके कारण प्रत्येक ने अपने खुद के बीज धारण किए। यह सब परमेश्वर के विचारों और उसके वचनों की आज्ञा के अनुसार साकार हुआ और इस नए संसार में हर चीज एक के बाद एक प्रकट होती गई।

अपना काम शुरू करने से पहले ही परमेश्वर के मस्तिष्क में उसकी तस्वीर थी, जिसे वह हासिल करना चाहता था, और जब परमेश्वर ने इन चीजों को हासिल करना शुरू किया, यह वही समय था जब परमेश्वर ने इस तस्वीर की विषयवस्तु के बारे में बोलने के लिए अपना मुँह खोला था, तो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के कारण सभी चीजों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया। परमेश्वर ने इसे चाहे जैसे भी किया या जिस भी प्रकार से अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, सब-कुछ परमेश्वर की योजना और उसके वचनों की बदौलत क्रमिक रूप से हासिल होता गया, परमेश्वर के वचनों और अधिकार की बदौलत स्वर्ग और पृथ्वी में क्रमिक रूप से बदलाव आते गए। इन सभी बदलावों और घटनाओं ने सृष्टिकर्ता के अधिकार और उसकी जीवन-शक्ति की असाधारणता और महानता को दर्शाया। उसके विचार कोई मामूली सोच या खाली तस्वीर नहीं हैं, बल्कि जीवन-शक्ति और असाधारण ऊर्जा से भरे हुए अधिकार हैं, वे ऐसे सामर्थ्‍य हैं जो सभी चीजों को परिवर्तित कर सकते हैं, पुनर्जीवित कर सकते हैं, फिर से नया बना सकते हैं और नष्ट कर सकते हैं। इसकी वजह से, उसके विचारों के कारण सभी चीजें कार्य करती हैं और साथ ही उसके मुँह से निकले वचनों के कारण पूरी होती हैं ...

सभी चीजों के प्रकट होने से पहले, परमेश्वर के विचारों में एक संपूर्ण योजना बहुत पहले से ही बन चुकी थी, और एक नया संसार बहुत पहले ही आकार ले चुका था। यद्यपि तीसरे दिन भूमि पर हर प्रकार के पौधे प्रकट हुए, किंतु परमेश्वर के पास इस संसार की सृष्टि के चरणों को रोकने का कोई कारण नहीं था; उसका इरादा लगातार अपने वचनों को बोलते रहने का था, ताकि वह हर नई चीज की सृष्टि करना जारी रख सके। वह बोलता गया, अपनी आज्ञाएँ जारी करता गया, और अपने अधिकार का इस्तेमाल करता तथा अपना सामर्थ्‍य दिखाता गया, और उसने हर वो चीज बनाई जिसके निर्माण की उसकी योजना थी, उसने उन सभी चीजों और मानव-जाति के लिए इन्हें बनाया, जिनके सृजन का उसका इरादा था...

चौथे दिन परमेश्वर ने एक बार फिर अपने अधिकार का उपयोग किया जिससे मानव-जाति की ऋतुएँ, दिन और वर्ष अस्तित्व में आए

सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना पूरी करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया, और इस तरह उसने अपनी योजना के पहले तीन दिन गुजारे। इन तीन दिनों के दौरान परमेश्वर को व्यस्त होते या स्वयं को थकाते हुए नहीं देखा गया; इसके विपरीत, उसने अपनी योजना के पहले तीन दिन शानदार तरीके से बिताए, और दुनिया के आमूलचूल परिवर्तन का महान उपक्रम पूरा किया। उसकी आँखों के सामने एक नई दुनिया प्रकट हुई, और अंश-अंश करके वह सुंदर चित्र, जो उसके विचारों के भीतर बंद था, अंततः परमेश्वर के वचनों में प्रकट हुआ। हर नई चीज का प्रकटन किसी नवजात शिशु के जन्म के समान था, और सृष्टिकर्ता ने उस चित्र का आनंद लिया, जो कभी उसके विचारों में था, लेकिन जिसे अब जीवंत कर दिया गया था। इस समय उसके हृदय को थोड़ा संतोष मिला, लेकिन उसकी योजना अभी शुरू ही हुई थी। पलक झपकते ही एक नया दिन आ गया था—और सृष्टिकर्ता की योजना में अगला पृष्ठ क्या था? उसने क्या कहा? उसने अपने अधिकार का उपयोग कैसे किया? इस बीच इस नई दुनिया में कौन-सी नई चीजें आईं? सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए हमारी निगाह परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के सृजन के चौथे दिन पर पड़ती है, एक ऐसा दिन, जो एक और नई शुरुआत थी। बेशक, सृष्टिकर्ता के लिए यह निस्संदेह एक और शानदार दिन था, और यह आज की मानव-जाति के लिए एक और अत्यंत महत्वपूर्ण दिन था। बेशक, यह बेहद मूल्यवान दिन था। यह शानदार कैसे था, यह इतना महत्वपूर्ण कैसे था, और यह बेहद मूल्यवान कैसे था? पहले सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचन सुनते हैं...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें'" (उत्पत्ति 1:14-15)। यह परमेश्वर के अधिकार का एक और प्रयोग था, जिसे उसके द्वारा सूखी जमीन और उस पर पौधों के सृजन के बाद, प्राणियों द्वारा दिखाया गया था। परमेश्वर के लिए यह कार्य उतना ही आसान था, जितना वे काम थे, जो वह पहले ही कर चुका था, क्योंकि परमेश्वर के पास इतना सामर्थ्य है; परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसका वचन पूरा होगा। परमेश्वर ने आकाश में ज्योतियों को प्रकट होने का आदेश दिया, और ये ज्योतियाँ न केवल आकाश और पृथ्वी पर चमक उठीं, बल्कि दिन और रात, ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए चिह्नों के रूप में भी काम करने लगीं। इस तरह, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचन बोले, हर वह कार्य जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता था, परमेश्वर के आशय के अनुसार और परमेश्वर द्वारा निर्धारित तरीके से पूरा हुआ।

स्वर्ग की ज्योतियाँ आकाश का वह पदार्थ हैं, जो ज्योति विकीर्ण कर सकती हैं; वे आकाश, भूमि और समुद्र को रोशन कर सकती हैं। वे परमेश्वर द्वारा आदेशित लय और आवृत्ति के अनुसार घूमती हैं, और भूमि पर समय की अलग-अलग अवधियों को रोशन करती हैं, और इस तरह ज्योतियों के चक्रों के कारण भूमि के पूर्व और पश्चिम में दिन और रात उत्पन्न होते हैं, और वे केवल रात और दिन के संकेत ही नहीं हैं, बल्कि इन विभिन्न चक्रों के माध्यम से वे मानव-जाति के पर्वों और विभिन्न विशेष दिनों को भी चिह्नित करती हैं। वे चार ऋतुओं—बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत—के लिए पूर्ण पूरक और सहायक वस्तु हैं—जो परमेश्वर द्वारा जारी की गई हैं, जिनके साथ ज्योतियाँ सामंजस्यपूर्ण तरीके से मानव-जाति की चंद्र-अवधियों, दिनों और वर्षों के लिए नियमित और सटीक चिह्नों के रूप में कार्य करती है। हालाँकि खेती के उद्भव के बाद ही मानव-जाति ने परमेश्वर द्वारा सृजित ज्योतियों के कारण उत्पन्न चंद्र-अवधियों, दिनों और वर्षों के विभाजन को समझना और उसे देखना शुरू किया, लेकिन वास्तव में चंद्र-अवधियाँ, दिन और वर्ष, जिन्हें मनुष्य आज समझता है, बहुत पहले परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के सृजन के चौथे दिन उत्पन्न होने शुरू हो गए थे, और इसी तरह मनुष्य द्वारा अनुभव किए जाने वाले बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत के परस्पर परिवर्तनशील चक्र भी बहुत पहले परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के सृजन के चौथे दिन शुरू हो गए थे। परमेश्वर द्वारा बनाई गई ज्योतियों ने मनुष्य को रात और दिन के बीच नियमित रूप से, सटीक और स्पष्ट रूप से अंतर करने, और दिनों की गणना करने और चंद्र-अवधियों और वर्षों की स्पष्ट रूप से जानकारी रखने में सक्षम बनाया। (पूर्णिमा का दिन एक महीना पूरा होने का दिन था, और इससे इंसान ने जाना कि ज्योतियों की रोशनी एक नया चक्र शुरू करती है; अर्धचंद्र का दिन आधा महीना पूरा होने का दिन था, जिसने मनुष्य को बताया कि एक नई चंद्र-अवधि शुरू हो रही है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि चंद्र-अवधि में कितने दिन और रात होते हैं, एक मौसम में कितनी चंद्र-अवधियाँ होती हैं, और एक वर्ष में कितने मौसम होते हैं, और यह सब बड़ी नियमितता के साथ प्रकट हुआ।) इसलिए, मनुष्य आसानी से ज्योतियों के घूर्णनों द्वारा चिह्नित चंद्र-अवधियों, दिनों और वर्षों की जानकारी रख सकता था। इस क्षण से, मानव-जाति और सभी चीजें अनजाने ही ज्योतियों के घूर्णनों द्वारा उत्पन्न रात और दिन के व्यवस्थित अंत:परिवर्तन और ऋतुओं के बदलाव के बीच रहने लगीं। यह सृष्टिकर्ता द्वारा चौथे दिन ज्योतियों के सृजन का महत्व था। इसी तरह, सृष्टिकर्ता के इस कार्य के उद्देश्य और महत्व अभी भी उसके अधिकार और सामर्थ्य से अविभाज्य थे। और इसलिए, परमेश्वर द्वारा सृजित ज्योतियाँ और जल्दी ही मनुष्यों के लिए उनका जो मूल्य होने वाला था, सृष्टिकर्ता के अधिकार के प्रयोग में एक और कमाल था।

इस नई दुनिया में, जिसमें मानव-जाति का अभी प्रकट होना बाकी था, सृष्टिकर्ता ने उस नए जीवन के लिए, जिसे वह शीघ्र ही सृजित करने वाला था, शाम और सुबह, आकाश, भूमि और समुद्र, घास, साग-पात और विभिन्न प्रकार के पेड़, और ज्योतियाँ, मौसम, दिन और वर्ष तैयार किए। सृष्टिकर्ता द्वारा सृजित हर नई चीज में उसका अधिकार और सामर्थ्य व्यक्त हुए, और उसके वचन और उनकी पूर्ति एक-साथ, बिना थोड़ी-सी भी विसंगति के और बिना थोड़े-से भी अंतराल के घटित हुए। इन सभी नई चीजों का प्रकटन और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्य का प्रमाण था : वह अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा, और जो वह पूरा करता है, वह हमेशा रहता है। यह तथ्य कभी नहीं बदला : ऐसा ही यह अतीत में था, ऐसा ही यह आज है, और ऐसा ही यह अनंत काल तक रहेगा। जब तुम एक बार फिर पवित्रशास्त्र के वे वचन देखते हो, तो क्या वे तुम लोगों को नए लगते हैं? क्या तुम लोगों ने नई सामग्री देखी है, और नई खोजें की हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि सृष्टिकर्ता के कर्मों ने तुम लोगों के दिलों को हिला दिया है, और उसके अधिकार और सामर्थ्य के बारे में तुम लोगों के ज्ञान की दिशा निर्देशित की है, और सृष्टिकर्ता के बारे में तुम लोगों की समझ के लिए द्वार खोला है, और उसके कर्मों और अधिकार ने इन वचनों को जीवन प्रदान किया है। इसलिए, इन वचनों में मनुष्य ने सृष्टिकर्ता के अधिकार की एक वास्तविक, विशद अभिव्यक्ति देखी है, वास्तव में सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता देखी है, और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्य की असाधारणता देखी है।

सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्य चमत्कार पर चमत्कार उत्पन्न करते हैं; वह मनुष्य का ध्यान आकर्षित करता है, और मनुष्य उसके अधिकार के प्रयोग से उत्पन्न आश्चर्यजनक कर्म स्तंभित होकर एकटक देखे बिना नहीं रह पाता। उसका असाधारण सामर्थ्य प्रसन्नता पर प्रसन्नता लाता है, और मनुष्य प्रशंसा में दम साधे, अचंभित होकर जय-जयकार करता हुआ चौंधिया जाता है और उल्लसित हो जाता है; इतना ही नहीं, मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से द्रवित हो जाता है और उसमें सम्मान, श्रद्धा और लगाव पैदा होता है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और कर्मों का मनुष्य की आत्मा पर बड़ा असर और शुद्धिकारक प्रभाव पड़ता है, और, इसके अलावा, वे मनुष्य की आत्मा को तृप्त कर देते हैं। उसका हर विचार, उसका हर कथन, और उसके अधिकार का हर प्रकटन सभी चीजों के बीच एक उत्कृष्ट कृत्य और सृजित मानवजाति की गहरी समझ और ज्ञान के सबसे योग्य एक महान उपक्रम है। जब हम सृष्टिकर्ता के वचनों से पैदा हुए प्रत्येक प्राणी के बारे में सोचते हैं, तो हमारी आत्मा परमेश्वर के सामर्थ्य के चमत्कार की ओर आकर्षित होती है, और हम खुद को सृष्टिकर्ता के अगले दिन : परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के सृजन के पाँचवें दिन को जाने वाले पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए पाते हैं।

सृष्टिकर्ता के और अधिक कर्म देखते हुए हम पवित्रशास्त्र को अंश-दर-अंश पढ़ना जारी रखते हैं।

पाँचवें दिन विविध और विभिन्न संरचनाओं का जीवन विभिन्न तरीकों से सृष्टिकर्ता के अधिकार को प्रदर्शित करता है

पवित्र-शास्त्र कहता है, "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।' इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:20-21)। पवित्रशास्त्र हमें स्पष्ट रूप से बताता है कि इस दिन परमेश्वर ने जल में रहने वाले जीव-जंतु और हवा में उड़ने वाले पक्षी बनाए, अर्थात उसने विभिन्न मछलियाँ और चिड़ियाँ सृजित कीं, और उनमें से प्रत्येक को उनकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया। इस तरह, पृथ्वी, आकाश और जल परमेश्वर की सृष्टि से समृद्ध हुए ...

जैसे ही परमेश्वर ने वचन बोले, अलग-अलग रूप में नया जीवन सृष्टिकर्ता के वचनों के बीच तुरंत जीवित हो गया। वे अपने स्थान पर पहुँचने के लिए एक-दूसरे को धक्का देते, उछलते-कूदते, खुशी से इठलाते हुए दुनिया में आए।... हर आकार-प्रकार की मछलियाँ पानी में तैरने लगीं; सभी तरह के घोंघे रेत से निकल आए; शल्क वाले, खोल वाले और बिना रीढ़ के जीव जल्दी से छोटे-बड़े, लंबे-ठिंगने अलग-अलग रूपों में विकसित हो गए। इसी तरह विभिन्न प्रकार के समुद्री शैवाल भी विभिन्न जलीय जीवन की गति से डोलते, लहराते हुए, रुके हुए समुद्र से आग्रह करते हुए तेजी से बढ़ने लगे, मानो उससे कह रहे हों : "जल्दी करो! अपने दोस्तों को लाओ! तुम फिर कभी अकेले नहीं होगे!" जिस क्षण से परमेश्वर द्वारा बनाए गए विभिन्न जीवित प्राणी पानी में प्रकट हुए, हर ताजा नया जीवन उस पानी में जीवन-शक्ति लेकर आया जो इतने लंबे समय से निश्चल था, और एक नए युग की शुरुआत की।... उस क्षण से वे एक-दूसरे से चिपटे हुए, एक-दूसरे का साथ देने लगे, और अपने बीच कोई दूरी नहीं रखी। जल अपने भीतर के प्राणियों के लिए अस्तित्व में था, अपनी गोद में पलने वाले प्रत्येक जीवन का पोषण करता था, और प्रत्येक जीवन जल के लिए, उसके पोषण के कारण अस्तित्व में था। प्रत्येक ने एक-दूसरे को जीवन प्रदान किया, और साथ ही, प्रत्येक ने, उसी तरह, सृष्टिकर्ता के सृजन के चमत्कारिकता और महानता, और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अलंघ्य सामर्थ्य की गवाही दी ...

जैसे समुद्र अब शांत नहीं था, वैसे ही आसमान भी जीवन से भरने लगा। एक-एक करके छोटे-बड़े पक्षी जमीन से आसमान में उड़ गए। समुद्री जीवों के विपरीत उनके पंख और डैने थे, जिनसे उनके पतले और सुंदर शरीर ढके हुए थे। उन्होंने अपने पंख फड़फड़ाए, गर्व और अभिमान से अपने पंखों के भव्य आवरण और अपने विशेष कार्यों और कौशलों का प्रदर्शन किया, जो उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किए गए थे। वे आजादी से उड़ गए, और कुशलता से आकाश और पृथ्वी के बीच, घास के मैदानों और जंगलों में आवाजाही करने लगे।... वे हवा के लाड़ले थे, वे सभी चीजों के दुलारे थे। वे जल्दी ही आकाश और पृथ्वी के बीच जोड़ बनने और सभी चीजों को इसका संदेश देने वाले थे।... वे गाते थे, खुशी से गोता लगाते थे, कभी खाली रही इस दुनिया में वे प्रसन्नता, हँसी और जीवंतता लाए।... खुद को मिले जीवन के लिए उन्होंने सृष्टिकर्ता की प्रशंसा करने के लिए अपने स्पष्ट, मधुर गायन और अपने दिल में बसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने सृष्टिकर्ता के सृजन की पूर्णता और चमत्कारिकता प्रदर्शित करने के लिए खुशी से नृत्य किया, और सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किए गए विशेष जीवन के माध्यम से उसके अधिकार की गवाही देने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया ...

ये प्रचुर जीव, चाहे पानी में हों या आसमान में, सृष्टिकर्ता की आज्ञा से जीवन के विभिन्न विन्यासों में अस्तित्व में आ गए, और सृष्टिकर्ता की आज्ञा से ही वे अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार एक-साथ एकत्र हो गए—और यह नियम, यह व्यवस्था किसी भी प्राणी द्वारा अपरिवर्तनीय थी। उन्होंने कभी भी सृष्टिकर्ता द्वारा उनके लिए निर्धारित सीमा से आगे जाने की हिम्मत नहीं की, न ही वे इसमें सक्षम थे। सृष्टिकर्ता के आदेशानुसार वे जीने और वंशवृद्धि करने लगे, और सृष्टिकर्ता द्वारा उनके लिए निर्धारित जीवन-क्रम और व्यवस्थाओं का सख्ती से पालन करने लगे, और सजगतापुर्वक उसकी अनकही आज्ञाओं और उसके द्वारा उन्हें दिए गए स्वर्गिक आदेशों और नियमों का पालन करने लगे और आज तक करते आ रहे हैं। उन्होंने सृष्टिकर्ता के साथ अपने विशेष तरीके से बातचीत की, सृष्टिकर्ता का आशय समझा और उसकी आज्ञाओं का पालन किया। किसी ने भी कभी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया, वह अपने विचारों में ही उन पर संप्रभुता रखता और उन्हें आज्ञा देता था; कोई वचन जारी नहीं किए गए थे, लेकिन सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार ने मौन में उन सभी चीजों को नियंत्रित किया, इसमें भाषा का कोई कार्य नहीं था और यह मानव-जाति से भिन्न था। इस विशेष तरीके से उसके अधिकार के प्रयोग ने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार एक नया ज्ञान प्राप्त करने और उसकी एक नई व्याख्या करने के लिए विवश किया। यहाँ मैं तुम्हें बता दूँ कि इस नए दिन सृष्टिकर्ता के अधिकार के प्रयोग ने एक बार फिर सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता प्रदर्शित की।

इसके बाद, हम पवित्रशास्त्र के इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नजर डालते हैं : "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग क्या सोचते हो, इसका क्या मतलब है? इन वचनों के भीतर परमेश्वर की भावनाएँ निहित हैं। परमेश्वर ने स्वयं द्वारा सृजित सभी चीजों को अपने वचनों के कारण अस्तित्व में आते और डटे रहते देखा, जो धीरे-धीरे बदलने लगीं। इस समय, क्या परमेश्वर उन विभिन्न चीजों से संतुष्ट था जिन्हें उसने अपने वचनों से बनाया था, और उन विभिन्न कार्यों से संतुष्ट था जो उसने पूरे किए थे? इसका उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" क्या दर्शाता है? यह किसका प्रतीक है? इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर ने जिस चीज की योजना बनाई और निर्धारित की थी, जो लक्ष्य उसने पूरे करने तय किए थे, उन्हें पूरा करने का सामर्थ्य और बुद्धि उसके पास थी। जब परमेश्वर ने हर काम पूरा कर लिया, तो क्या उसे खेद हुआ? जवाब अभी भी यही है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसे न केवल कोई पछतावा महसूस नहीं हुआ, बल्कि वह संतुष्ट भी हुआ। इसका क्या मतलब है कि उसे कोई पछतावा महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसका सामर्थ्य और बुद्धि पूर्ण है, और केवल उसके अधिकार से ही ऐसी पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। जब मनुष्य कोई कार्य करता है, तो क्या वह, परमेश्वर की तरह, देख सकता है कि यह अच्छा है? क्या मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह पूर्णता प्राप्त कर सकता है? क्या मनुष्य कोई चीज हमेशा-हमेशा के लिए पूरा कर सकता है? ठीक जैसे मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं है, केवल बेहतर है," मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। जब परमेश्वर ने देखा कि उसने जो कुछ किया और हासिल किया वह सब अच्छा है, परमेश्वर ने जो कुछ भी बनाया वह उसके वचनों द्वारा निर्धारित किया गया था, अर्थात, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तो उसने जो कुछ भी बनाया था उसने एक स्थायी रूप ग्रहण कर लिया, किस्म के अनुसार वर्गीकृत कर दिया गया, और उसे अनंत काल के लिए एक निश्चित स्थान, उद्देश्य और कार्य दे दिया गया। इसके अलावा, सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका, और वह यात्रा जो उसे परमेश्वर के सभी चीजों के प्रबंधन के दौरान करनी चाहिए, पहले से ही परमेश्वर द्वारा निर्धारित कर दी गई थी, और वह अपरिवर्तनीय थीं। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजों को दी गई स्वर्गिक व्यवस्था थी।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," ये सरल, कम समझे गए वचन, जिन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है, परमेश्वर द्वारा सभी प्राणियों को दी गई स्वर्गिक व्यवस्था और स्वर्गिक आदेश के वचन हैं। ये सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप हैं, जो ज्यादा व्यावहारिक और ज्यादा गहरा है। अपने वचनों के माध्यम से सृष्टिकर्ता न केवल वह सब प्राप्त करने में सक्षम रहा जिसे उसने प्राप्त करना निर्धारित किया था, और वह सब हासिल करने में सक्षम रहा जिसे उसने हासिल करना निर्धारित किया था, बल्कि वह अपने हाथों में वह सब-कुछ नियंत्रित कर सका जिसे उसने सृजित किया था, और उन सभी चीजों पर शासन कर सका जिन्हें उसने अपने अधिकार के तहत बनाया था, और, इसके अलावा, सब-कुछ व्यवस्थित और नियमित था। उसके वचन के द्वारा सभी चीजें बढ़ीं भी, अस्तित्व में रहीं, और नष्ट भी हो गईं और, इसके अलावा, उसके अधिकार से वे उस व्यवस्था के बीच मौजूद रहीं जिसे उसने निर्धारित किया था, और कोई भी इससे मुक्त नहीं था! यह व्यवस्था उसी क्षण शुरू हो गई, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और यह परमेश्वर की प्रबंधन-योजना के लिए ठीक उस दिन तक मौजूद, जारी और कार्यरत रहेगी, जब तक इसे सृष्टिकर्ता द्वारा निरस्त न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सभी चीजें सृजित कर उन्हें अस्तित्व में आने की आज्ञा देने की उसकी क्षमता में प्रकट हुआ, बल्कि सभी चीजों पर शासन करने और उन पर संप्रभुता रखने, और सभी चीजों को जीवन और जीवन-शक्ति प्रदान करने की उसकी क्षमता में प्रकट हुआ, इसके अलावा यह उसकी इस क्षमता में प्रकट हुआ कि अपनी योजना में उसने जिन चीजों को रचा, वे अनंत काल तक के लिए उसके द्वारा बनाई गई दुनिया में एक पूर्ण आकार, पूर्ण जीवन-संरचना और एक पूर्ण भूमिका में प्रकट होकर अस्तित्व में रहें। इसी तरह वह इस रूप में भी प्रकट हुआ कि सृष्टिकर्ता के विचार किसी बंधन के अधीन नहीं थे, समय, स्थान या भूगोल द्वारा सीमित नहीं थे। सृष्टिकर्ता के अधिकार की तरह उसकी अद्वितीय पहचान अनंत काल से अनंत काल तक अपरिवर्तित रहेगी। उसका अधिकार हमेशा उसकी विशिष्ट पहचान का प्रतिरूप और प्रतीक होगा, और उसका अधिकार हमेशा उसकी पहचान के साथ-साथ मौजूद रहेगा!

छठे दिन, सृष्टिकर्ता बोलता है और उसके दिमाग में मौजूद हर तरह का प्राणी एक के बाद एक प्रकट होता है

अलक्षित रूप से, सृष्टिकर्ता का सभी चीजों को बनाने का कार्य पाँच दिनों तक जारी रहा, जिसके तुरंत बाद सृष्टिकर्ता ने सभी चीजों के सृजन के छठे दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शुरुआत और एक और असाधारण दिन था। तो फिर, इस नए दिन की पूर्वसंध्या पर सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? वह कौन-से नए जीव पैदा करने वाला था, सृजित करने वाला था? सुनो, यह है सृष्टिकर्ता की वाणी ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,' और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया : और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इनमें कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्रशास्त्र कहता है : पशु, रेंगने वाले जंतु, और पृथ्वी के जाति-जाति के पशु। कहने का तात्पर्य यह है कि, इस दिन पृथ्वी पर न केवल सभी प्रकार के जीवित प्राणी थे, बल्कि वे सभी अपनी किस्म के अनुसार वर्गीकृत भी किए गए थे, और इसी तरह, "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों की ही तरह, सृष्टिकर्ता ने उसी स्वर में बोलकर उन जीवित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया, जिन्हें वह चाहता था, और कहा कि वे अपनी-अपनी किस्म के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हो जाएँ। जब सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का प्रयोग करता है, तो उसका कोई भी वचन व्यर्थ नहीं बोला जाता, और इसलिए, छठे दिन, प्रत्येक जीवित प्राणी जिसे उसने बनाने का इरादा किया था, नियत समय पर प्रकट हो गया। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा, "पृथ्वी से एक-एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरंत जीवन से भर गई, और भूमि पर अचानक सभी प्रकार के जीवित प्राणियों की साँस उभरी।... घास के हरे जंगल में, मोटी-ताजी गायें अपनी पूँछ इधर-उधर सरसराती हुई एक के बाद एक प्रकट हुईं, मिमियाती भेड़ों ने खुद को झुंडों में इकट्ठा कर लिया, और हिनहिनाते घोड़े सरपट दौड़ने लगे।... पल भर में खामोश विशाल चरागाहों में जीवन का विस्फोट हो गया।... इन विभिन्न पशुओं की उपस्थिति घास के शांत मैदान पर एक सुंदर नजारा था, जो असीम जीवन-शक्ति लेकर आए। ये घास के मैदानों के साथी होंगे, घास के मैदानों के स्वामी होंगे, परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर रहेंगे; इसी तरह, वे इन भूमियों के संरक्षक और रखवाले होंगे, जो उनके स्थायी निवास-स्थान होंगे, और जो उन्हें उनकी जरूरत की हर चीज प्रदान करेंगे, जो उनके अस्तित्व के लिए शाश्वत पोषण के स्रोत होंगे ...

जिस दिन ये विभिन्न पशु अस्तित्व में आए, उसी दिन, सृष्टिकर्ता के वचन के द्वारा, एक के बाद एक बहुत सारे कीड़े भी प्रकट हुए। भले ही वे सभी प्राणियों में सबसे छोटे जीवित प्राणी थे, फिर भी उनकी जीवन-शक्ति सृष्टिकर्ता की चमत्कारी रचना थी, और वे बहुत देर से नहीं पहुँचे थे।... कुछ ने अपने छोटे-छोटे पंख फड़फड़ाए, जबकि अन्य धीरे-धीरे रेंगे; कुछ उछले-कूदे, कुछ डगमगाए; कुछ तेजी से आगे बढ़े, जबकि अन्य जल्दी से पीछे हट गए; कुछ बगल में चले गए, अन्य ऊपर-नीचे कूदने लगे।... सब अपने लिए घर ढूँढ़ने की कोशिश में व्यस्त थे : कुछ ने घास में अपना रास्ता बना लिया, कुछ जमीन में बिल बनाने लगे, कोई उड़कर जंगलों में छिपे पेड़ों पर चले गए।... आकार में छोटे होते हुए भी वे खाली पेट की पीड़ा सहने को तैयार नहीं थे, और अपना घर पाकर, वे अपना पेट भरने के लिए भोजन की तलाश में दौड़ पड़े। कुछ घास पर चढ़कर उसकी कोमल पत्तियाँ खाने लगे, कुछ ने झपटकर थोड़ी मिट्टी उठाई और उसे बहुत उत्साह और मजे से खाते हुए अपने पेट में निगल लिया (उनके लिए मिट्टी भी एक स्वादिष्ट भोजन है); कुछ जंगल में छिपे हुए थे, लेकिन वे आराम करने के लिए नहीं रुके, क्योंकि चमकदार गहरे हरे पत्तों के रस ने उन्हें एक रसीला भोजन प्रदान किया।... तृप्त होने के बाद भी, कीड़ों ने अपनी गतिविधि बंद नहीं की; कद में छोटे होते हुए भी उनमें जबरदस्त ऊर्जा और असीम उल्लास भरा था, और इसलिए सभी प्राणियों में वे सबसे सक्रिय और सबसे मेहनती हैं। उन्होंने कभी आलस नहीं किया, न कभी आराम किया। भूख शांत हो जाने पर भी उन्होंने अपने भविष्य के लिए कड़ी मेहनत की, अपने कल, अपने अस्तित्व के लिए खुद को व्यस्त रखा और दौड़-भाग करते रहे।... खुद को प्रेरित-प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने नजाकत से विभिन्न धुनों और लय के लोकगीत गुनगुनाए। उन्होंने घास, पेड़ और मिट्टी के कण-कण में खुशी भी जोड़ दी, हर दिन और हर साल को अनोखा बना दिया।... अपनी-अपनी भाषाओं में और अपने-अपने तरीकों से उन्होंने धरती के सभी जीवित प्राणियों तक जानकारी पहुँचा दी। अपने विशेष जीवन-क्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने उन सभी चीजों को चिह्नित कर दिया, जिन पर उन्होंने निशान छोड़े थे।... मिट्टी, घास और जंगलों के साथ उनका घनिष्ठ संबंध था, और वे मिट्टी, घास और जंगलों में जोश और जीवन-शक्ति लाए। वे सृष्टिकर्ता के उपदेश और अभिवादन सभी जीवित प्राणियों तक लेकर आए ...

सृष्टिकर्ता की निगाह उन सभी चीजों पर पड़ी, जिनका उसने सृजन किया था, और इस समय उसकी नजरें जंगलों और पहाड़ों पर आकर टिक गईं, उसका दिमाग सोच-विचार कर रहा था। जैसे ही उसने वचन बोले, घने जंगलों में, और पहाड़ों पर, एक प्रकार के जीव प्रकट हुए, जो पहले आए किसी भी प्राणी से भिन्न थे : वे परमेश्वर के मुख से बोले गए जंगली जानवर थे। उन चिर-प्रतीक्षित जानवरों ने अपना सिर हिलाया और पूँछ घुमाई, प्रत्येक का अपना अनूठा चेहरा था। कुछ के पास रोएँदार कोट थे, कुछ के पास कवच था, कुछ ने जहरीले दाँत दिखाए, कुछ ने मुस्कराहट ओढ़ी हुई थी, कुछ लंबी गर्दन वाले थे, कुछ छोटी पूँछ वाले थे, कुछ जंगली आँखों वाले थे, कुछ की दृष्टि कातर थी, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के मुँह पर खून लगा था, कुछ दो पैरों पर उछल रहे थे, कुछ चार खुरों से चल रहे थे, कुछ पेड़ों के ऊपर बैठकर दूर तक निहार रहे थे, कुछ जंगलों में घात लगाए बैठे थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाएँ तलाश रहे थे, कुछ मैदानों पर दौड़ और उछल-कूद रहे थे, कुछ जंगलों के बीच शिकार खोजते फिर रहे थे...; कुछ दहाड़ रहे थे, कुछ गरज रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ चीख रहे थे...; कुछ ऊँचे सुर में गाने वाले थे, कुछ मध्यम सुर में गाने वाले थे, कुछ गला फाड़कर गाने वाले थे, कुछ स्पष्ट और मधुर सुर वाले थे...; कुछ कुरूप थे, कुछ सुंदर थे, कुछ घृणित थे, कुछ मनमोहक थे, कुछ भयानक थे, कुछ आकर्षक रूप से भोले थे।... एक-एक करके वे सभी सामने आए। देखो, वे कितने ऊँचे और पराक्रमी हैं, स्वतंत्र, एक-दूसरे के प्रति उदासीन, एक-दूसरे पर एक नजर डालने की परवाह तक नहीं करते।... उनमें से प्रत्येक सृष्टिकर्ता द्वारा दिया गया विशेष जीवन, अपना जंगलीपन और क्रूरता धारण किए हुए जंगलों में और पहाड़ों पर दिखाई दिया। सबसे तिरस्कारपूर्ण, इतने निरंकुश—किसने उन्हें पहाड़ों और जंगलों का सच्चा स्वामी बनाया? जिस क्षण से सृष्टिकर्ता ने उनके प्रकटन का आदेश दिया, उन्होंने जंगलों और पहाड़ों पर "दावा ठोंक दिया", क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले ही उनकी सीमाएँ तय कर दी थीं और उनके अस्तित्व का दायरा तय कर दिया था। केवल वे ही पहाड़ों और जंगलों के सच्चे स्वामी थे, और इसीलिए वे इतने जंगली, इतने तिरस्कारपूर्ण थे। उन्हें "जंगली जानवर" विशुद्ध रूप से इसलिए कहा जाता था, क्योंकि सभी प्राणियों में, वे ही थे जो वास्तव में जंगली, क्रूर और अदम्य थे। उन्हें वश में नहीं किया जा सकता था, इसलिए उन्हें पाला नहीं जा सकता था, और वे मानव-जाति के साथ सामंजस्यपूर्वक नहीं रह सकते थे या मानव-जाति के लिए श्रम नहीं कर सकते थे। चूँकि उन्हें पाला नहीं जा सकता था, और वे मानव-जाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें मानव-जाति से दूर जीना पड़ा, और मनुष्य उनसे संपर्क नहीं कर सकते थे। यह उनके मानव-जाति से दूर रहने और मनुष्य द्वारा उनसे संपर्क न किए जा सकने का ही नतीजा था, कि वे सृष्टिकर्ता द्वारा दी गई जिम्मेदारी पूरी करने में सक्षम थे : पहाड़ों और जंगलों की रक्षा करने की जिम्मेदारी। उनके जंगलीपन ने पहाड़ों की रक्षा की और जंगलों का बचाव किया, और यह उनके अस्तित्व और प्रसार का सबसे अच्छा संरक्षण और आश्वासन था। साथ ही, उनके जंगलीपन ने सभी चीजों के बीच संतुलन बनाए रखा और उसे सुनिश्चित किया। उनके आगमन से पहाड़ों और जंगलों को सहारा और आश्रय मिला; उनके आगमन ने शांत और खाली पड़े पहाड़ों और जंगलों में असीम जोश और जीवन-शक्ति का संचार किया। इस पल से पहाड़ और जंगल उनके स्थायी निवास-स्थान बन गए, और वे अपना घर कभी नहीं खोएँगे, क्योंकि पहाड़ और जंगल उन्हीं के लिए प्रकट हुए और अस्तित्व में थे; जंगली जानवर अपना कर्तव्य पूरा करेंगे और उनकी रक्षा की हर संभव कोशिश करेंगे। इसी तरह, जंगली जानवर भी अपने क्षेत्र पर पकड़ बनाए रखने के सृष्टिकर्ता के उपदेशों का सख्ती से पालन करेंगे, और सृष्टिकर्ता द्वारा स्थापित सभी चीजों का संतुलन कायम रखने के लिए अपनी पाशविक प्रकृति का उपयोग करते रहेंगे, और सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्य प्रदर्शित करेंगे!

सृष्टिकर्ता के अधिकार के तहत सभी चीजें पूर्ण हैं

परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें, जिनमें वे भी शामिल हैं जो चल सकती हैं जैसे कि पक्षी और मछली, और वे भी जो नहीं चल सकतीं, जैसे कि पेड़ और फूल, और छठे दिन बनाए गए पशु, कीड़े और जंगली जानवर—वे सभी परमेश्वर की दृष्टि में अच्छे थे, और, इसके अलावा, परमेश्वर की दृष्टि में इन सभी चीजों ने, उसकी योजना के अनुसार, पूर्णता की पराकाष्ठा प्राप्त कर ली थी और उन स्तरों तक पहुँच गए थे, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता था। कदम-दर-कदम, सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना के अनुसार वह कार्य किया, जो वह करने का इरादा रखता था। एक के बाद एक, वे चीजें जिन्हें उसने सृजित करने का इरादा किया था, प्रकट हो गईं, और प्रत्येक का प्रकटन सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रतिबिंब था, उसके अधिकार का एक ठोस रूप था; इन ठोस रूपों के कारण, सभी प्राणी सृष्टिकर्ता के अनुग्रह और पोषण के लिए आभारी हुए बिना नहीं रह सके। जैसे ही परमेश्वर के चमत्कारी कर्म प्रकट हुए, यह दुनिया, अंश-अंश करके परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों से भर गई, और अराजकता और अंधकार से स्पष्टता और उजाले में बदल गई, मृत्यु की शांति से जीवंतता और असीम जीवन-शक्ति में बदल गई। बड़े से लेकर छोटे तक, छोटे से लेकर सूक्ष्म तक, सृष्टि की सभी चीजों के बीच कोई भी ऐसा नहीं था जो सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्य द्वारा सृजित नहीं किया गया था, और प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व की एक विशिष्ट और अंतर्निहित आवश्यकता और मूल्य था। उनके आकार और संरचना में भिन्नताओं के बावजूद, उन्हें सृष्टिकर्ता के अधिकार के तहत अस्तित्व में रहने के लिए सृष्टिकर्ता द्वारा बनाया जाना आवश्यक था। कभी-कभी लोग कोई बहुत ही बदसूरत कीट देखकर कहते हैं, "यह कीट बहुत भयानक है, यह हो ही नहीं सकता कि इतनी बदसूरत चीज परमेश्वर बनाए—वह ऐसी बदसूरत चीज बना ही नहीं सकता।" क्या मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण है! उन्हें असल में यह कहना चाहिए, "हालाँकि यह कीट बहुत बदसूरत है, लेकिन इसे परमेश्वर ने बनाया, इसलिए इसका विशिष्ट उद्देश्य अवश्य होगा।" अपने विचारों में परमेश्वर ने अपने द्वारा बनाई गई विभिन्न जीवित चीजों को प्रत्येक रूप और सभी प्रकार के कार्य और उपयोग देने का इरादा किया था, इसलिए परमेश्वर द्वारा बनाई गई कोई भी चीज दूसरे के जैसी नहीं है। अपने बाहरी रूप से लेकर अपनी आंतरिक संरचना तक, अपने रहन-सहन से लेकर अपने रहने की जगह तक—सब अलग हैं। गायों में गायों का रूप होता है, गधों में गधों का रूप होता है, हिरणों में हिरणों का रूप होता है, और हाथियों में हाथियों का रूप होता है। क्या तुम बता सकते हो कि कौन सबसे सुंदर है और कौन सबसे बदसूरत? क्या तुम बता सकते हो कि कौन-सा सबसे उपयोगी है, और किसका अस्तित्व सबसे कम आवश्यक है? कुछ लोगों को देखने में हाथी अच्छा लगता है, लेकिन कोई भी खेती करने के लिए हाथियों का इस्तेमाल नहीं करता; कुछ लोगों को शेर और बाघ अच्छे दिखते हैं, क्योंकि उनका रूप सभी चीजों में सबसे प्रभावशाली है, लेकिन क्या तुम उन्हें पालतू जानवरों के रूप में रख सकते हो? संक्षेप में, जब सृष्टि की असंख्य चीजों की बात आती है, तो मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का आदर करना चाहिए, अर्थात्, सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजों के लिए नियत क्रम को स्वीकार करना चाहिए; यह सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है। केवल सृष्टिकर्ता के मूल इरादों की खोज करने और उसके प्रति आज्ञाकारिता का रवैया ही सृष्टिकर्ता के अधिकार की सच्ची स्वीकृति और निश्चितता है। जब परमेश्वर की दृष्टि में यह अच्छा है, तो मनुष्य के पास दोष निकालने का क्या कारण है?

इस प्रकार, सृष्टिकर्ता के अधिकार के तहत सभी चीजों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के लिए एक नया संगीत बजाना है, नए दिन के उसके कार्य के लिए एक शानदार प्रस्तावना शुरू करनी है, और इस समय सृष्टिकर्ता भी अपने प्रबंधन-कार्य में एक नया पृष्ठ खोलेगा! बसंत में नए अंकुर फूटने, गर्मियों में पकने, शरद ऋतु में फसल काटने, और सर्दियों में भंडारण करने की सृष्टिकर्ता द्वारा नियत व्यवस्था के अनुसार, सभी चीजें सृष्टिकर्ता की प्रबंधन-योजना को प्रतिध्वनित करेंगी, और वे अपने नए दिन, नई शुरुआत और नए जीवन-क्रम का स्वागत करेंगी। वे सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के तहत प्रत्येक दिन का स्वागत करने के लिए अनगिनत पीढ़ियों तक जीवित रहेंगी और वंश-वृद्धि करेंगी ...

कोई भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता

जब से परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन शुरू किया, तब से उसका सामर्थ्य व्यक्त और प्रकट होना शुरू हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीजें सृजित करने के लिए वचनों का इस्तेमाल किया। उसने उन्हें जिस भी तरीके से बनाया हो, उसने उन्हें जिस भी वजह से बनाया हो, परमेश्वर के वचनों के कारण सभी चीजें अस्तित्व में आ गईं, डटी और मौजूद रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। मानव-जाति के दुनिया में प्रकट होने से पहले के समय में सृष्टिकर्ता ने मानव-जाति के लिए सभी चीजें बनाने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया, और मानव-जाति के रहने के लिए एक उपयुक्त परिवेश तैयार करने के लिए अपनी अनूठी विधियाँ नियोजित कीं। उसने जो कुछ किया, वह मानव-जाति की तैयारी में था, जो शीघ्र ही परमेश्वर की श्वास पाने वाली थी। अर्थात मानव-जाति के सृजन से पहले के समय में परमेश्वर का अधिकार मानव-जाति से भिन्न सभी प्राणियों में, आकाश, ज्योतियों, समुद्र और भूमि जैसी बड़ी चीजों में, और जानवरों और पक्षियों के साथ-साथ सभी प्रकार के कीड़ों और सूक्ष्मजीवियों में, जिनमें आँखों के लिए अदृश्य विभिन्न बैक्टीरिया शामिल हैं, दिखाया गया था। उनमें से प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा जीवन दिया गया, प्रत्येक ने सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण वंश-वृद्धि की, और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उसकी संप्रभुता के तहत रहा। हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता की साँस नहीं मिली, फिर भी उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान की गई जीवन-शक्ति को अपने विभिन्न रूपों और संरचनाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया; हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति को दी गई बोलने की क्षमता प्राप्त नहीं हुई, फिर भी उनमें से प्रत्येक ने अपने जीवन को व्यक्त करने का एक तरीका प्राप्त किया, जो उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किया गया था और जो मनुष्य की भाषा से भिन्न था। सृष्टिकर्ता का अधिकार न केवल गतिहीन प्रतीत होने वाली भौतिक चीजों को जीवन-शक्ति देता है, ताकि वे कभी गायब न हों, बल्कि वह प्रत्येक जीवित प्राणी को प्रजनन द्वारा वंश-वृद्धि करने की प्रवृत्ति भी देता है, ताकि वे कभी नष्ट न हों, जिससे कि वे सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दी गई अस्तित्व में रहने की व्यवस्थाएँ और सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करें। जिस तरह से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का प्रयोग करता है, वह किसी स्थूल या सूक्ष्म दृष्टिकोण का कठोरता से पालन नहीं करता और किसी भी रूप तक सीमित नहीं रहता; वह ब्रह्मांड के कार्यों को नियंत्रित करने और सभी चीजों के जीवन और मृत्यु पर संप्रभुता रखने में सक्षम है, और इसके अलावा, वह सभी चीजें इस तरह संचालित करने में सक्षम है कि वे उसकी सेवा करें; वह पहाड़ों, नदियों और झीलों के सभी कार्यों का प्रबंधन कर सकता है, और उनके भीतर की सभी चीजों पर शासन कर सकता है, और इससे भी बढ़कर, वह वो चीज प्रदान करने में सक्षम है जो सभी चीजों के लिए आवश्यक है। यह मानव-जाति के अलावा सभी चीजों के बीच सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति है। ऐसी अभिव्यक्ति केवल जीवन भर के लिए नहीं है; यह कभी खत्म नहीं होगी, न ही रुकेगी, और इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बदला या क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता, न ही इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बढ़ाया-घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, और इसलिए, सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी भी सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता; यह किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है। उदाहरण के लिए परमेश्वर के दूतों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर का सामर्थ्य नहीं है, सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है, और उनके पास परमेश्वर का सामर्थ्य और अधिकार न होने का कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे कि परमेश्वर के दूत और स्वर्गदूत, परमेश्वर की ओर से कुछ चीजें कर सकने के बावजूद, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। हालाँकि उनके पास कुछ ऐसा सामर्थ्य है जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं हैं, उनके पास सभी चीजें सृजित करने, सभी चीजें नियंत्रित करने और सभी चीजों पर प्रभुता रखने का अधिकार नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की अद्वितीयता किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती, और इसी तरह, परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किए जा सकते। क्या तुमने बाइबल में परमेश्वर के किसी दूत के बारे में पढ़ा है, जिसने सभी चीजें सृजित की हों? परमेश्वर ने अपने किसी दूत या स्वर्गदूत को सभी चीजें सृजित करने के लिए क्यों नहीं भेजा? चूँकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था, इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग करने की क्षमता नहीं थी। सभी प्राणियों की तरह, वे सभी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन हैं, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं, और इसी तरह, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर और उनका संप्रभु है। उनमें से हर एक के बीच—चाहे वे महान हों या नीच, महान सामर्थ्य के हों या अल्प सामर्थ्य के—कोई भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टिकर्ता का अधिकार लाँघ सकता हो, और इसलिए उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित कर सके। उन्हें कभी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा, और वे कभी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये अटल सत्य और तथ्य हैं!

उपर्युक्त संगति के माध्यम से, क्या हम यह दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं : केवल अद्वितीय अधिकार और अद्वितीय सामर्थ्य से युक्त, सभी चीजों के सृष्टिकर्ता और शासक को ही स्वयं अद्वितीय परमेश्वर कहा जा सकता है? इस समय तुम लोगों को यह प्रश्न बहुत गहरा लग सकता है। तुम लोग फिलहाल इसे समझने में असमर्थ हो, और तुम इसके भीतर के सार को नहीं समझ सकते, और इसलिए अभी तुम लोगों को लगता है कि इसका उत्तर देना मुश्किल है। उस स्थिति में, मैं अपनी संगति जारी रखूँगा। इसके बाद, मैं तुम लोगों को केवल परमेश्वर के स्वामित्व वाले अधिकार और सामर्थ्य के कई पहलुओं के वास्तविक कर्म देखने दूँगा, और इस प्रकार मैं तुम लोगों को वास्तव में परमेश्वर की अद्वितीयता समझने, सराहने और जानने दूँगा, और यह भी कि परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार का क्या अर्थ है।

2. परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे : और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है : मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजें बनाए जाने के बाद उसका अधिकार एक बार फिर इंद्रधनुष की वाचा में पुष्ट किया जाता और दिखाया जाता है

सृष्टिकर्ता का अधिकार सभी प्राणियों के बीच हमेशा दिखाया और प्रयुक्त किया जाता है, और सृष्टिकर्ता न केवल सभी चीजों की नियति पर शासन करता है, बल्कि मनुष्य पर भी शासन करता है, जो वह विशेष प्राणी है जिसे उसने अपने हाथों से सृजित किया और जिसकी एक अलग जीवन-संरचना है और जिसका जीवन के एक अलग रूप में अस्तित्व है। सभी चीजें बनाने के बाद सृष्टिकर्ता ने अपना अधिकार और सामर्थ्य व्यक्त करना बंद नहीं किया; उसके लिए वह अधिकार, जिसके द्वारा उसने सभी चीजों पर और संपूर्ण मानव-जाति की नियति पर संप्रभुता रखी, औपचारिक रूप से तभी शुरू हुआ, जब मानव-जाति ने वास्तव में उसके हाथों से जन्म लिया। उसका इरादा मानव-जाति का प्रबंधन करना और उस पर शासन करना था; उसका इरादा मानव-जाति को बचाना और उसे वास्तव में प्राप्त करना, ऐसी मानव-जाति को प्राप्त करना था जो सभी चीजों पर नियंत्रण कर सके; उसका इरादा ऐसी मानव-जाति को अपने अधिकार में रखने, उससे अपना अधिकार ज्ञात करवाकर उसका पालन करवाने का था। इसलिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल करके अपना अधिकार मनुष्यों के बीच आधिकारिक रूप से व्यक्त करना और अपने वचन साकार करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारंभ किया। बेशक, इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर का अधिकार सभी स्थानों पर दिखाया गया; मैंने केवल कुछ विशिष्ट, जाने-माने उदाहरण चुने हैं, जिनसे तुम लोग परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अद्वितीय अधिकार को समझ और जान सकते हो।

उत्पत्ति 9:11-13 में दिए गए अंश और ऊपर दिए गए अंशों में परमेश्वर द्वारा दुनिया के सृजन के अभिलेख के संबंध में एक समानता है, लेकिन एक अंतर भी है। समानता क्या है? समानता यहाँ है कि परमेश्वर ने जो करने का इरादा किया, उसे करने के लिए उसने अपने वचनों का उपयोग किया, और अंतर यह है कि यहाँ उद्धृत अंश परमेश्वर की मनुष्य के साथ बातचीत दर्शाते हैं, जिसमें उसने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधी और मनुष्य को वह बताया जो वाचा में निहित था। मनुष्य के साथ उसके संवाद के दौरान परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया गया, जिसका अर्थ है कि मानव-जाति के सृजन से पहले, परमेश्वर के वचन निर्देश और आदेश थे, जो उन प्राणियों को जारी किए गए थे जिन्हें वह सृजित करने का इरादा रखता था। लेकिन अब परमेश्वर के वचनों को सुनने वाला कोई था, इसलिए उसके वचन मनुष्य के साथ संवाद और मनुष्य के लिए उपदेश और चेतावनी दोनों थे। इसके अलावा, परमेश्वर के वचन वे आज्ञाएँ थीं, जो उसके अधिकार को धारण करती थीं और जो सभी चीजों को दी गई थीं।

इस अंश में परमेश्वर का कौन-सा कार्य दर्ज है? यह अंश उस वाचा को दर्ज करता है, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के साथ दुनिया को जलप्रलय से नष्ट करने के बाद बाँधा था; यह मनुष्य को बताती है कि परमेश्वर इस तरह का विनाश फिर से दुनिया पर नहीं ढाएगा, और इस उद्देश्य से परमेश्वर ने एक चिह्न बनाया। वह चिह्न क्या था? पवित्रशास्त्र में यह कहा गया है कि "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति से बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने ये वचन कहे, मनुष्य की आँखों के सामने एक इंद्रधनुष प्रकट हो गया, और वह आज तक वहीं बना हुआ है। वह इंद्रधनुष हर किसी ने देखा है, और जब तुम इसे देखते हो, तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसा दिखता है? विज्ञान इसे साबित करने या इसके स्रोत का पता लगाने या इसका अता-पता बताने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इंद्रधनुष सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच बाँधी गई वाचा का चिह्न है; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, इसे मनुष्य ने नहीं बनाया, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। यह सृष्टिकर्ता द्वारा अपने वचन बोलने के बाद उसके अधिकार की निरंतरता है। सृष्टिकर्ता ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा और अपने वादे का पालन करने के लिए अपने विशेष तरीके का उपयोग किया, और इसलिए उसके द्वारा बाँधी गई उस वाचा के चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग एक स्वर्गिक आदेश और व्यवस्था है, जो हमेशा अपरिवर्तित रहेगी, चाहे सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानव-जाति के संबंध में। कहना होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था सभी चीजों के सृजन के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार की एक और सच्ची अभिव्यक्ति है, और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्य असीमित हैं; उसके द्वारा एक चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरंतरता और उसका विस्तार है। यह परमेश्वर द्वारा अपने वचनों का उपयोग करके किया गया एक और कार्य था, और यह उस वाचा का चिह्न था जिसे परमेश्वर ने वचनों का उपयोग करके मनुष्य के साथ बाँधा था। उसने मनुष्य को उस बारे में बताया, जिसे करने का उसने संकल्प किया था, और यह भी कि उसे किस तरीके से पूरा और हासिल किया जाएगा। इस प्रकार परमेश्वर के मुख से निकले वचनों के अनुसार मामला पूरा हुआ। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्य है, और आज, उसके ये वचन कहे जाने के हजारों वर्ष बाद भी, मनुष्य परमेश्वर के मुख से उच्चरित इंद्रधनुष देख सकता है। परमेश्वर द्वारा कहे गए उन वचनों के कारण यह चीज आज तक अचल और अपरिवर्तित बनी हुई है। कोई इस इंद्रधनुष को हटा नहीं सकता, कोई इसकी व्यवस्थाएँ नहीं बदल सकता, और यह केवल परमेश्वर के वचनों के कारण मौजूद है। यही परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसका वचन पूरा होगा, और जो वह पूरा करता है वह हमेशा के लिए रहता है।" ये वचन यहाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का एक स्पष्ट चिह्न और विशेषता है। ऐसा चिह्न या विशेषता किसी भी सृजित प्राणी में मौजूद नहीं है या उसमें नजर नहीं आती और न ही किसी गैर-सृजित प्राणी में देखी जाती है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर में है, और केवल सृष्टिकर्ता में मौजूद पहचान और सार को प्राणियों की पहचान और सार से अलग करता है। साथ ही, यह एक चिह्न और विशेषता भी है जिसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा कभी लाँघा नहीं जा सकता।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के साथ अपनी वाचा बाँधना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य था, ऐसा कार्य जिसका उपयोग वह मनुष्य को एक तथ्य संप्रेषित करने और उसे अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए एक विशेष चिह्न का उपयोग करते हुए एक अनोखी विधि इस्तेमाल की, एक चिह्न जो उस वाचा का वादा था जिसे उसने मनुष्य के साथ बाँधा था। तो क्या यह वाचा बाँधना एक महान घटना थी? यह कितनी महान थी? इस वाचा की खास बात यह है : यह दो आदमियों, दो समूहों या दो देशों के बीच बाँधी गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और पूरी मानव-जाति के बीच बाँधी गई वाचा है, और यह उस दिन तक वैध रहेगी, जब तक कि सृष्टिकर्ता सभी चीजें समाप्त नहीं कर देता। इस वाचा को बाँधने वाला सृष्टिकर्ता है, और इसे कायम रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानव-जाति के साथ बाँधी गई इंद्रधनुष रूपी वाचा संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच हुए संवाद के अनुसार पूरी और हासिल की गई थी, जो आज तक बरकरार है। सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित होने, उसकी आज्ञा मानने, उस पर विश्वास करने, उसे सराहने, उसकी गवाही देने और उसकी स्तुति करने के अलावा प्राणी और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और में ऐसी वाचा बाँधने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना मानव-जाति के लिए एक घोषणा है और वह उसका ध्यान सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा की ओर आकर्षित करता है। सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा के निरंतर प्रकट होने से जो कुछ मानव-जाति को प्रदर्शित किया जाता है, वह स्वयं इंद्रधनुष या वाचा नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता का अपरिवर्तनीय अधिकार है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना, छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के जबरदस्त और चमत्कारपूर्ण कर्म प्रदर्शित करता है, और साथ ही, यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है जो कभी मिटेगा नहीं, और न कभी बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक दूसरे पहलू का प्रदर्शन नहीं है?

3. परमेश्वर के आशीष

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

सृष्टिकर्ता के कथनों का अद्वितीय तरीका और विशेषताएँ सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान और उसके अधिकार की प्रतीक हैं

बहुत-से लोग परमेश्वर के आशीष खोजना और पाना चाहते हैं, लेकिन हर कोई ये आशीष प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर के अपने सिद्धांत हैं, और वह मनुष्य को अपने तरीके से आशीष देता है। परमेश्वर मनुष्य से जो वादे करता है, और वह जितना अनुग्रह मनुष्य को देता है, वह मनुष्य के विचारों और कार्यों के आधार पर आवंटित किया जाता है। तो, परमेश्वर के आशीषों से क्या दिखता है? लोग उनके भीतर क्या देख सकते हैं? इस समय, हम इस बात की चर्चा अलग रखते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है, और मनुष्य को आशीष देने के परमेश्वर के क्या सिद्धांत हैं। इसके बजाय आओ, हम परमेश्वर के अधिकार को जानने के उद्देश्य से, परमेश्वर के अधिकार को जानने के दृष्टिकोण से, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आशीष दिए जाने को देखते हैं।

पवित्रशास्त्र के उपर्युक्त चारों अंश परमेश्वर के मनुष्य को आशीष देने के अभिलेख हैं। वे अब्राहम और अय्यूब जैसे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने वालों का विस्तृत विवरण प्रदान करते हैं, साथ ही उन कारणों के बारे में भी बताते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें आशीष क्यों दिए, और इस बारे में भी कि इन आशीषों में क्या शामिल था। परमेश्वर के कथनों का लहजा और तरीका, और वह परिप्रेक्ष्य और स्थिति जिससे वह बोला, लोगों को यह समझने देता है कि आशीष देने वाले और आशीष पाने वाले की पहचान, हैसियत और सार स्पष्ट रूप से अलग हैं। इन कथनों का लहजा और ढंग, और जिस स्थिति से वे बोले गए थे, वे अद्वितीय रूप से परमेश्वर के हैं, जिसकी पहचान सृष्टिकर्ता की है। उसके पास अधिकार और शक्ति है, साथ ही सृष्टिकर्ता का सम्मान और प्रताप भी है, जो किसी व्यक्ति द्वारा संदेह किया जाना बरदाश्त नहीं करता।

आओ पहले हम उत्पत्ति 17:4-6 देखें : "देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।" ये वचन वह वाचा थे, जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था, साथ ही यह अब्राहम को परमेश्वर का आशीष भी था : परमेश्वर अब्राहम को जातियों के समूह का मूलपिता बनाएगा, उसे अत्यंत फलवंत करेगा, और उसे जाति-जाति का मूल बनाएगा, और उसके वंश में राजा उत्पन्न होंगे। क्या तुम इन वचनों में परमेश्वर का अधिकार देखते हो? और तुम ऐसे अधिकार को कैसे देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार के सार का कौन-सा पहलू देखते हो? इन वचनों को ध्यान से पढ़ने से, यह पता लगाना कठिन नहीं है कि परमेश्वर का अधिकार और पहचान परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर कहता है "मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू ... हो जाएगा। ... मैं ने तुझे ठहरा दिया ... मैं तुझे बनाऊँगा...," तो "तू हो जाएगा" और "मैं बनाऊँगा" जैसे वाक्यांश, जिनके शब्दों में परमेश्वर की पहचान और अधिकार निहित है, एक दृष्टि से सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता का संकेत हैं; तो दूसरी दृष्टि से, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए विशेष वचन हैं, जिनमें सृष्टिकर्ता की पहचान है—साथ ही वे परंपरागत शब्दावली का हिस्सा हैं। अगर कोई कहता है कि वह आशा करता है कि दूसरा व्यक्ति अत्यंत फलवंत हो, उसे जाति-जाति का मूल बनाया जाए, और उसके वंश में राजा उत्पन्न हों, तो यह निस्संदेह एक तरह की इच्छा है, कोई वादा या आशीष नहीं। इसलिए, लोग यह कहने की हिम्मत नहीं करते कि "मैं तुम्हें फलाँ-फलाँ बनाऊँगा, तुम फलाँ-फलाँ होगे..." क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास ऐसा सामर्थ्य नहीं है; यह उन पर निर्भर नहीं है, और अगर वे ऐसी बातें कहते भी हैं, तो उनके शब्द उनकी इच्छा और महत्वाकांक्षा से प्रेरित कोरी बकवास होंगे। अगर किसी को लगता है कि वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, तो क्या वह इतने भव्य स्वर में बोलने की हिम्मत करता है? हर कोई अपने वंशजों के लिए शुभ कामना करता है, और आशा करता है कि वे उत्कृष्टता प्राप्त करें और बड़ी सफलता का आनंद लें। "उनमें से किसी का सम्राट बनना कितना बड़ा सौभाग्य होगा! अगर कोई राज्यपाल होता, तो वह भी अच्छा होता—बस वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हों!" ये सभी लोगों की इच्छाएँ हैं, लेकिन लोग केवल अपने वंशजों के लिए आशीषों की कामना ही कर सकते हैं, लेकिन अपने किसी भी वादे को पूरा या साकार नहीं कर सकते। अपने दिल में हर कोई स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके पास ऐसी चीजें हासिल करने का सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके बारे में हर चीज उसके नियंत्रण से बाहर है, इसलिए वे दूसरों के भाग्य को नियंत्रित कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर इस तरह के वचन इसलिए कह सकता है, क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है, और वह मनुष्य से किए गए सभी वादे पूरे और साकार करने और मनुष्य को दिए गए सभी आशीष साकार करने में सक्षम है। मनुष्य को परमेश्वर ने सृजित किया था, और परमेश्वर के लिए किसी मनुष्य को अत्यंत फलवंत बनाना बच्चों का खेल होगा; किसी के वंशजों को समृद्ध बनाने के लिए सिर्फ उसके एक वचन की आवश्यकता होगी। उसे खुद कभी ऐसी चीज के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ेगा, या अपने दिमाग को तकलीफ नहीं देनी पड़ेगी, या इसके लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा; यही है परमेश्वर का सामर्थ्य, यही है परमेश्वर का अधिकार।

उत्पत्ति 18:18 में "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी" पढ़ने के बाद क्या तुम लोग परमेश्वर का अधिकार महसूस कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की असाधारणता अनुभव कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता अनुभव कर सकते हो? परमेश्वर के वचन पक्के हैं। परमेश्वर ऐसे वचन सफलता में विश्वास होने के कारण या उसे दर्शाने के लिए नहीं कहता; बल्कि वे परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं, और एक आज्ञा हैं जो परमेश्वर के कथन पूरे करती है। यहाँ दो अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है, "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी," तो क्या इन वचनों में अस्पष्टता का कोई तत्त्व है? क्या चिंता का कोई तत्त्व है? क्या डर का कोई तत्त्व है? परमेश्वर के कथनों में "निश्चय उपजेगी" और "आशीष पाएँगी" शब्दों के कारण ये तत्त्व, जो मनुष्य में विशेष रूप से होते हैं और अक्सर उसमें प्रदर्शित होते हैं, इनका सृष्टिकर्ता से कभी कोई संबंध नहीं रहा है। दूसरों के लिए शुभ कामना करते हुए कोई भी ऐसे शब्दों का उपयोग करने की हिम्मत नहीं करेगा, कोई भी दूसरे को ऐसी निश्चितता के साथ आशीष देने की हिम्मत नहीं करेगा कि उससे एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, या यह वादा नहीं करेगा कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने ज्यादा निश्चित होते हैं, उतना ही ज्यादा वे कुछ साबित करते हैं—और वह कुछ क्या है? वे साबित करते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है कि उसका अधिकार ये चीजें पूरी कर सकता है, और कि उनका पूरा होना अपरिहार्य है। परमेश्वर ने अब्राहम को जो आशीष दिए थे, उन सबके बारे में वह अपने हृदय में, बिना किसी झिझक के निश्चित था। इसके अलावा, यह उसके वचनों के अनुसार समग्र रूप से पूरा किया जाएगा, और कोई भी ताकत इसके पूरा होने को बदलने, बाधित करने, बिगाड़ने या अवरुद्ध करने में सक्षम नहीं होगी। चाहे और कुछ भी हो जाए, कुछ भी परमेश्वर के वचनों के पूरा और साकार होने को निरस्त या प्रभावित नहीं कर सकता। यह सृष्टिकर्ता के मुख से निकले वचनों का ही सामर्थ्य और सृष्टिकर्ता का अधिकार है, जो मनुष्य का इनकार सहन नहीं करता! इन वचनों को पढ़ने के बाद, क्या तुम्हें अभी भी संदेह है? ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले थे, और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार, और तथ्य के पूरा होने की अनिवार्यता, किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है, और कोई सृजित या गैर-सृजित प्राणी इससे आगे नहीं निकल सकता। केवल सृष्टिकर्ता ही मानव-जाति के साथ ऐसे लहजे और स्वर में बात कर सकता है, और तथ्यों ने यह साबित कर दिया है कि उसके वादे खोखले वचन या बेकार की डींग नहीं होते, बल्कि अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति होते हैं, जिसे कोई भी व्यक्ति, घटना या चीज मात नहीं दे सकती।

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और मनुष्य द्वारा बोले गए वचनों में क्या अंतर है? जब तुम परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों को पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार को महसूस करते हो। जब तुम लोगों को ऐसे वचन कहते सुनते हो, तो तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें नहीं लगता कि वे बेहद अहंकारी हैं और शेखी बघारते हैं, ऐसे लोग हैं जो दिखावा कर रहे हैं? क्योंकि उनके पास यह सामर्थ्य नहीं है, उनके पास ऐसा अधिकार नहीं है, इसलिए वे ऐसी चीजें हासिल करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। उनका अपने वादों को लेकर इतना आश्वस्त होना केवल उनकी टिप्पणियों की लापरवाही दर्शाता है। अगर कोई ऐसे वचन कहता है, तो वह निस्संदेह अहंकारी और अति-आत्मविश्वासी होगा, और खुद को प्रधान दूत के स्वभाव के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रकट करेगा। ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले थे; क्या तुम यहाँ अहंकार का कोई तत्त्व महसूस करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन केवल एक मजाक हैं? परमेश्वर के वचन अधिकार हैं, परमेश्वर के वचन तथ्य हैं, और उसके मुँह से वचन निकलने से पहले, यानी जब वह कुछ करने का फैसला कर रहा होता है, तो वह चीज पहले ही पूरी हो चुकी होती है। कहा जा सकता है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, वह परमेश्वर द्वारा अब्राहम के साथ बाँधी गई एक वाचा थी, परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किया गया एक वादा था। यह वादा एक स्थापित तथ्य था, साथ ही एक पूरा किया गया तथ्य भी था, और ये तथ्य परमेश्वर की योजना के अनुसार परमेश्वर के विचारों में धीरे-धीरे पूरे हुए। इसलिए, परमेश्वर द्वारा ऐसे वचन कहे जाने का यह अर्थ नहीं है कि उसका स्वभाव अहंकारी है, क्योंकि परमेश्वर ऐसी चीजें हासिल करने में सक्षम है। उसके पास यह सामर्थ्य और अधिकार है, और वह वे ये कार्य करने में पूरी तरह से सक्षम है, और उनका पूरा होना पूरी तरह से उसकी क्षमता के दायरे के भीतर है। जब इस तरह के वचन परमेश्वर के मुख से बोले जाते हैं, तो वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन और अभिव्यक्ति होते हैं, परमेश्वर के सार और अधिकार का एक पूर्ण प्रकाशन और अभिव्यक्ति, और सृष्टिकर्ता की पहचान के प्रमाण के रूप में इससे ज्यादा सही और उपयुक्त कुछ नहीं होता। इस तरह के कथनों का ढंग, लहजा और शब्द सटीक रूप से सृष्टिकर्ता की पहचान की निशानी हैं, और पूर्ण रूप से परमेश्वर की पहचान की अभिव्यक्ति के अनुरूप हैं; उनमें न तो ढोंग है, न अशुद्धता; वे पूरी तरह से और सरासर सृष्टिकर्ता के सार और अधिकार का पूर्ण प्रदर्शन हैं। जहाँ तक प्राणियों का संबंध है, उनके पास न तो यह अधिकार है, न ही यह सार, उनके पास परमेश्वर द्वारा दिया गया सामर्थ्य तो बिलकुल भी नहीं है। अगर मनुष्य इस तरह का व्यवहार प्रकट करता है, तो यह निश्चित रूप से उसके भ्रष्ट स्वभाव का विस्फोट होगा, और इसके मूल में मनुष्य के अहंकार और जंगली महत्वाकांक्षा का हस्तक्षेपकारी प्रभाव होगा, और वह किसी और के नहीं बल्कि उस शैतान के दुर्भावनापूर्ण इरादों का खुलासा होगा, जो लोगों को धोखा देना और उन्हें परमेश्वर को धोखा देने के लिए फुसलाना चाहता है। ऐसी भाषा से जो प्रकट होता है, उसे परमेश्वर कैसे देखता है? परमेश्वर कहेगा कि तुम उसका स्थान हड़पना चाहते हो और तुम उसका रूप धरना और उसकी जगह लेना चाहते हो। जब तुम परमेश्वर के कथनों के लहजे की नकल करते हो, तो तुम्हारा इरादा लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान लेने का होता है, उस मानव-जाति को हड़पने का होता है जो जायज तौर पर परमेश्वर की है। यह शुद्ध और स्पष्ट रूप से शैतान है; ये प्रधान दूत के वंशजों के कार्य हैं, जो स्वर्ग के लिए असहनीय हैं! क्या तुम लोगों में से कोई है, जिसने लोगों को गुमराह करने और धोखा देने के इरादे से कुछ शब्द बोलकर एक तरीके से परमेश्वर की नकल की है और उन्हें यह महसूस करवाया है कि इस व्यक्ति के वचनों और कार्यों में परमेश्वर का अधिकार और शक्ति है, इस व्यक्ति का सार और पहचान अद्वितीय है, यहाँ तक कि इस व्यक्ति के वचनों का स्वर परमेश्वर के समान है? क्या तुम लोगों ने कभी ऐसा कुछ किया है? क्या तुमने कभी अपनी बोलचाल में ऐसे हाव-भावों के साथ परमेश्वर के स्वर की नकल की है, जो कथित रूप से परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं और जिन्हें तुम पराक्रम और अधिकार मानते हो? क्या तुम लोगों में से ज्यादातर अक्सर इस तरह से कार्य करते या कार्य करने की योजना बनाते हैं? अब, जबकि तुम लोग वास्तव में सृष्टिकर्ता के अधिकार को देखते, समझते और जानते हो, और याद करते हो कि तुम लोग क्या किया करते थे, और अपने बारे में क्या प्रकट किया करते थे, तो क्या तुम्हें खुद से नफरत होती है? क्या तुम लोग अपनी नीचता और निर्लज्जता पहचानते हो? ऐसे लोगों के स्वभाव और सार का विश्लेषण करने के बाद, क्या यह कहा जा सकता है कि वे नरक की शापित संतान हैं? क्या यह कहा जा सकता है कि ऐसा करने वाला हर व्यक्ति अपना अपमान करवा रहा है? क्या तुम लोग इसकी प्रकृति की गंभीरता समझते हो? आखिर यह कितना गंभीर है? इस तरह से कार्य करने वाले लोगों का इरादा परमेश्वर की नकल करना होता है। वे परमेश्वर बनना चाहते हैं, लोगों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाना चाहते हैं। वे लोगों के दिलों से परमेश्वर का स्थान मिटाना चाहते हैं, और उस परमेश्वर से छुटकारा पाना चाहते हैं जो मनुष्यों के बीच कार्य करता है, और वे ऐसा लोगों को नियंत्रित करने, उन्हें निगलने और उन पर अधिकार करने का उद्देश्य हासिल करने के लिए करते हैं। हर किसी के अवचेतन में इस तरह की इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ होती हैं, और हर कोई इस तरह के भ्रष्ट शैतानी सार में जीता है, ऐसी शैतानी प्रकृति में, जिसमें वे परमेश्वर के साथ दुश्मनी रखते हैं, परमेश्वर को धोखा देते हैं, और परमेश्वर बनना चाहते हैं। परमेश्वर के अधिकार के विषय पर मेरी संगति के बाद, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर का रूप धरने या उसकी नकल करने की इच्छा या आकांक्षा रखते हो? क्या तुम अभी भी परमेश्वर बनने की इच्छा रखते हो? क्या तुम अभी भी परमेश्वर बनना चाहते हो? मनुष्य द्वारा परमेश्वर के अधिकार की नकल नहीं की जा सकती, और मनुष्य परमेश्वर की पहचान और हैसियत का रूप नहीं धर सकता। भले ही तुम परमेश्वर के स्वर की नकल करने में सक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर के सार की नकल नहीं कर सकते। भले ही तुम परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने और परमेश्वर का रूप धरने में सक्षम हो, लेकिन तुम कभी वह करने में सक्षम नहीं होगे जो करने का परमेश्वर इरादा रखता है, और कभी भी सभी चीजों पर शासन और नियंत्रण करने में सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर की नजर में तुम हमेशा एक छोटे-से प्राणी रहोगे, और तुम्हारे कौशल और क्षमता कितनी भी महान हों, चाहे तुममें कितने भी गुण हों, तुम संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन हो। भले ही तुम कुछ ढिठाई भरे वचन कहने में सक्षम हो, लेकिन यह न तो यह दिखा सकता है कि तुममें सृष्टिकर्ता का सार है, और न ही यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वयं परमेश्वर के सार हैं। वे बाहर से सीखे या जोड़े नहीं गए, बल्कि स्वयं परमेश्वर के निहित सार हैं। और इसलिए सृष्टिकर्ता और प्राणियों के बीच का संबंध कभी नहीं बदला जा सकता। एक प्राणी के रूप में, मनुष्य को अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए, और कर्तव्यनिष्ठा से व्यवहार करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है, उसकी कर्तव्यपरायणता से रक्षा करो। अनुचित कार्य मत करो, न ही ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान, अतिमानव या दूसरों से ऊँचा बनने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अतिमानव बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना तो और भी ज्यादा शर्मनाक है; यह घृणित और निंदनीय है। जो प्रशंसनीय है, और जो प्राणियों को किसी भी चीज से ज्यादा करना चाहिए, वह है एक सच्चा प्राणी बनना; यही एकमात्र लक्ष्य है जिसका सभी लोगों को अनुसरण करना चाहिए।

सृष्टिकर्ता का अधिकार समय, स्थान या भूगोल द्वारा सीमित नहीं है, और सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना से परे है

आओ, हम उत्पत्ति 22:17-18 देखें। यह यहोवा परमेश्वर द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दिया कि उसकी संतानों की संख्या बढ़ेगी—लेकिन वह किस हद तक बढ़ेगी? जिस हद तक पवित्रशास्त्र में कहा गया है : "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान।" कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर चाहता था कि अब्राहम को आकाश के तारों के समान असंख्य और समुद्र-तट की बालू के कणों के समान प्रचुर मात्रा में संतानें मिले। परमेश्वर ने कल्पना का उपयोग करते हुए बात की, और इस कल्पना से यह देखना कठिन नहीं कि परमेश्वर अब्राहम को केवल एक, दो या केवल हजारों वंशज प्रदान नहीं करेगा, बल्कि एक बेशुमार संख्या में वंशज प्रदान करेगा, जो कि बहुत सारे जाति-समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से वादा किया था कि वह कई जाति-समूहों का पिता होगा। अब, क्या यह संख्या मनुष्य द्वारा निर्धारित की गई थी या परमेश्वर द्वारा? क्या मनुष्य तय कर सकता है कि उसके कितने वंशज होंगे? क्या यह उस पर निर्भर है? मनुष्य पर तो यही निर्भर नहीं कि उसके कई वंशज होंगे भी या नहीं, "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" की तो बात ही छोड़ो। कौन नहीं चाहता कि उसकी संतान तारों के समान असंख्य हो? दुर्भाग्य से, चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी तुम चाहते हो। आदमी कितना भी कुशल या सक्षम क्यों न हो, यह उस पर निर्भर नहीं है; कोई भी उससे बाहर नहीं जा सकता, जो परमेश्वर द्वारा ठहराया गया है। वह तुम्हें जितना देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगा : अगर परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तो तुम्हारे पास ढेर सारा कभी नहीं होगा, और अगर परमेश्वर तुम्हें ढेर सारा देता है, तो इस बात से नाराज होने का कोई फायदा नहीं कि तुम्हारे पास कितना है। क्या बात ऐसी ही नहीं है? यह सब परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर नहीं! मनुष्य परमेश्वर द्वारा शासित है, और कोई भी इससे मुक्त नहीं है!

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा," तो यह एक वाचा थी, जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था, और इंद्रधनुष की वाचा की तरह, यह अनंत काल तक पूरी की जाएगी, और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किया गया एक वादा भी था। केवल परमेश्वर ही इस वादे को पूरा करने के काबिल और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, और मनुष्य इसे जैसे चाहे देखे और समझे, यह सब परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार हूबहू पूरा किया जाएगा। परमेश्वर के वचन मनुष्य की इच्छा या धारणाओं में परिवर्तन के कारण बदले नहीं जाएँगे, और वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज में परिवर्तन के कारण भी नहीं बदले जाएँगे। सभी चीजें गायब हो सकती हैं, लेकिन परमेश्वर के वचन हमेशा रहेंगे। वास्तव में, जिस दिन सभी चीजें गायब होती हैं, ठीक वही दिन परमेश्वर के वचनों के पूरी तरह से साकार होने का दिन होता है, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार, सृष्टिकर्ता का सामर्थ्य है, और वह सभी चीजों और समस्त जीवन-शक्ति को नियंत्रित करता है; वह शून्य में से कोई चीज प्रकट करवा सकता है या किसी चीज को शून्य बना सकता है, और वह सभी चीजों के जीवित से मृत में रूपांतरण को नियंत्रित करता है; परमेश्वर के लिए वंशजों की वृद्धि करने से आसान कुछ भी नहीं हो सकता। यह मनुष्य को किसी परी-कथा की तरह काल्पनिक लगता है, लेकिन परमेश्वर के लिए, जो वह तय करता है और जो करने का वादा करता है, वह काल्पनिक नहीं है, न ही वह कोई परी-कथा है। बल्कि, वह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर पहले ही देख चुका है, और जो निश्चित रूप से पूरा होगा। क्या तुम लोग इसे समझते हो? क्या तथ्य साबित करते हैं कि अब्राहम के वंशज असंख्य थे? वे कितने असंख्य थे? क्या वे "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" असंख्य थे, जैसा परमेश्वर ने कहा था? क्या वे सभी जाति-समूहों और क्षेत्रों में, दुनिया के हर स्थान पर फैल गए थे? यह तथ्य किसके माध्यम से पूरा हुआ? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा पूरा हुआ? परमेश्वर के वचनों के बोले जाने के बाद सैकड़ों-हजारों वर्षों तक परमेश्वर के वचन पूरे होते रहे और लगातार तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति है, और परमेश्वर के अधिकार का प्रमाण है। जब परमेश्वर ने शुरुआत में सभी चीजें बनाईं, तो परमेश्वर ने कहा "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्दी हो गया, बहुत कम समय में पूरा हो गया, और इसकी प्राप्ति और पूर्ति में कोई देरी नहीं हुई; परमेश्वर के वचनों का प्रभाव तत्काल हुआ। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, लेकिन जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार का दूसरा पक्ष दिखाया, और यह तथ्य भी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना से परे है, और इसके अलावा, उसने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक ज्यादा वास्तविक, ज्यादा उत्तम पक्ष दिखाया।

जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं, तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है, और परमेश्वर के मुख से किए गए वादे का तथ्य धीरे-धीरे एक वास्तविकता बनने लगता है। नतीजतन, सभी चीजों के बीच परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिल जाते हैं, पेड़ों से कलियाँ फूट जाती हैं, पक्षी गाने लगते हैं, हंस लौट आते हैं और खेत लोगों से भर जाते हैं।... बसंत के आगमन के साथ सभी चीजों का कायाकल्प हो जाता है, और यह सृष्टिकर्ता का चमत्कारपूर्ण कार्य है। जब परमेश्वर अपने वादे पूरे करता है, तो आकाश और पृथ्वी की सभी चीजें परमेश्वर के विचारों के अनुसार फिर से नई होकर बदल जाती हैं—कुछ भी नहीं छूटता। जब कोई प्रतिज्ञा या वादा परमेश्वर के मुख से उच्चरित होती है, तो सभी चीजें उसे पूरा करती और उसे पूरा करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं; सभी प्राणी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए और अपना-अपना कार्य करते हुए सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के तहत आयोजित और व्यवस्थित किए जाते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अभिव्यक्ति है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार की कोई सीमा है? क्या उसकी कोई समय-सीमा है? क्या उसे किसी निश्चित ऊँचाई या किसी निश्चित लंबाई का कहा जा सकता है? क्या उसे किसी निश्चित आकार या ताकत का कहा जा सकता है? क्या उसे मनुष्य के आयामों से मापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, आता-जाता नहीं, और ऐसा कोई नहीं जो यह नाप सके कि उसका अधिकार कितना महान है। चाहे परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को आशीष दिए कितना भी समय बीत जाए, वह आशीष जारी रहेगा, और उसकी निरंतरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगी, और मानव-जाति को बार-बार सृष्टिकर्ता की अविनाशी जीवन-शक्ति का पुन: प्रकटन देखने देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रदर्शन उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है, जो सभी चीजों और मानव-जाति को दिखाया जाता है। इसके अलावा, उसके अधिकार द्वारा पूरी की गई हर चीज अतुलनीय रूप से उत्तम और पूरी तरह से निर्दोष होती है। कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार, और वह समस्त कार्य जो वह पूरा करता है, सब एक अतुलनीय रूप से सुंदर चित्र हैं, और प्राणियों के लिए, मानव-जाति की भाषा, प्राणियों के लिए उसका महत्व और मूल्य व्यक्त करने में असमर्थ है। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति से कोई वादा करता है, तो उसके बारे में हर चीज से परमेश्वर पूरी तरह से परिचित होता है, चाहे वह यह हो कि वह व्यक्ति कहाँ रहता है, क्या करता है, वादा किए जाने से पहले या बाद की उसकी पृष्ठभूमि, या उसके जीवन-परिवेश में कितनी बड़ी उथल-पुथल रही है। परमेश्वर के वचन बोले जाने के बाद चाहे कितना भी समय बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा होता है मानो वे अभी-अभी बोले गए हों। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के पास सामर्थ्य और ऐसा अधिकार है कि वह मानव-जाति से किए गए प्रत्येक वादे की जानकारी रख सकता है, उसे नियंत्रित कर सकता है और उसे पूरा कर सकता है, और चाहे वादा कुछ भी हो, उसे पूरी तरह से पूरा होने में कितना भी समय लगे, और, इसके अलावा, उसका पूरा होना कितने भी व्यापक दायरे को स्पर्श करता हो—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, नस्ल आदि—यह वादा मुकम्मल और पूरा किया जाएगा, और, इसके अलावा, इसे मुकम्मल और पूरा करने के लिए उसे थोड़ा-सा भी प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का विस्तार पूरे ब्रह्मांड और पूरी मानव-जाति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है। परमेश्वर ने प्रकाश बनाया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परमेश्वर केवल प्रकाश का ही प्रबंधन करता है, या वह केवल पानी का ही प्रबंधन करता है क्योंकि उसने पानी बनाया है, और बाकी सब-कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह गलतफहमी नहीं होगी? हालाँकि परमेश्वर द्वारा अब्राहम को आशीष देने की स्मृति सैकड़ों वर्षों के बाद धीरे-धीरे मनुष्य की स्मृति से फीकी पड़ गई थी, फिर भी परमेश्वर के लिए यह वादा वैसा ही बना रहा। यह अभी भी पूरा होने की प्रक्रिया में था, और कभी रुका नहीं था। मनुष्य ने कभी नहीं जाना या सुना कि कैसे परमेश्वर ने अपने अधिकार का प्रयोग किया, कैसे सभी चीजें आयोजित और व्यवस्थित की गईं, और इस दौरान परमेश्वर की सृष्टि की सभी चीजों के बीच कितनी अद्भुत कहानियाँ घटित हुईं, लेकिन परमेश्वर के अधिकार के प्रदर्शन और उसके कर्मों के प्रकटन का हर अद्भुत अंश सभी चीजों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हुआ और ऊँचा उठाया गया, सभी चीजों ने सृष्टिकर्ता के चमत्कारी कर्म दर्शाए और उनके बारे में बात की, और सभी चीजों पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की बहुत बार सुनाई गई प्रत्येक कहानी सभी चीजों द्वारा हमेशा उद्घोषित की जाएगी। वह अधिकार, जिसके द्वारा परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है, और परमेश्वर का सामर्थ्य सभी चीजों को दिखाता है कि परमेश्वर हर जगह और हर समय मौजूद है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की सर्वव्यापकता देख लोगे, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर जगह और हर समय मौजूद है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य समय, भूगोल, स्थान या किसी व्यक्ति, घटना या चीज से प्रतिबंधित नहीं है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का विस्तार मनुष्य की कल्पना से बढ़कर है; वह मनुष्य के लिए अथाह है, मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जान पाएगा।

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, लेकिन मनुष्य की कल्पना कहाँ तक पहुँच सकती है? क्या वह इस दुनिया से परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और उसकी कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने देने में सक्षम हैं? क्या वे मनुष्य को वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को समझने और उसके प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य का अनुमान और कल्पना केवल मनुष्य की बुद्धि की उपज हैं, और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने में थोड़ी-सी भी सहायता या लाभ प्रदान नहीं करते। विज्ञान-कथाएँ पढ़ने के बाद कुछ लोग चंद्रमा की कल्पना करने में सक्षम होते हैं, या इस बात की कि तारे कैसे होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना तो बस : कल्पना ही है। इन चीजों के तथ्यों के बारे में, अर्थात् परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के बारे में, उसे बिलकुल भी समझ नहीं है। अगर तुम चाँद पर हो भी आए, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? क्या यह दर्शाता है कि तुम्हें परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ हैं, तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प अनुमान या कल्पना न करना होगा अर्थात जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आए, तो मनुष्य को कभी कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं यहाँ तुम लोगों से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के सामर्थ्य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार का ज्ञान अपनी कल्पना पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। चूँकि परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए तुम कल्पना पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम परमेश्वर के अधिकार का सच्चा ज्ञान किस तरह प्राप्त कर सकते हो? इसका तरीका है परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, संगति करना और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना। इस तरह तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और सत्यापन होगा और तुम उसकी एक क्रमिक समझ और वर्धमान ज्ञान प्राप्त करोगे। परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोगों से कल्पना न करने के लिए कहना तुम लोगों को विनाश की प्रतीक्षा करते हुए निष्क्रिय बैठने के लिए प्रेरित करने या तुम लोगों को कुछ भी करने से रोकने के समान नहीं है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का उपयोग न करने का अर्थ है अनुमान लगाने के लिए तर्क का उपयोग न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का उपयोग न करना, आधार के रूप में विज्ञान का उपयोग न करना, बल्कि इस बात को समझना, सत्यापित करना और पुष्टि करना कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, उसके पास अधिकार है, इस बात की पुष्टि करना कि वह तुम्हारे भाग्य पर संप्रभुता रखता है, और यह कि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, सत्य के माध्यम से, हर उस चीज के माध्यम से जिसका तुम जीवन में सामना करते हो, उसका सामर्थ्य हर समय उसे स्वयं सच्चा परमेश्वर साबित करता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे परमेश्वर की समझ प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई आसान तरीका खोजना चाहते हैं, लेकिन क्या तुम लोग ऐसा कोई तरीका सोच सकते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, सोचने की कोई जरूरत नहीं : कोई दूसरा तरीका नहीं है! उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक वचन और वह जो भी करता है, बस उसी के माध्यम से परमेश्वर के पास जो कुछ है और जो वह है, उसे कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ता से जाना और सत्यापित किया जा सकता है। परमेश्वर को जानने का यही एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर की हर चीज, खोखली और खाली नहीं, बल्कि वास्तविक है।

सभी चीजों और जीवित प्राणियों पर सृष्टिकर्ता के नियंत्रण और प्रभुत्व का तथ्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बताता है

इसी तरह, यहोवा द्वारा अय्यूब को आशीष देना अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया? "यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के दृष्टिकोण से, वे कौन-सी चीजें थीं जो अय्यूब को दी गई थीं? क्या वे मानव-जाति की संपत्तियाँ थीं? इन संपत्तियों के साथ, क्या अय्यूब उस युग में बहुत धनी न हो गया होता? फिर, उसने ऐसी संपत्तियाँ कैसे हासिल कीं? उसे धन-दौलत किसने दी? कहने की आवश्यकता नहीं—परमेश्वर के आशीष की बदौलत ही वे संपत्तियाँ अय्यूब को मिलीं। अय्यूब ने इन संपत्तियों को कैसे देखा, और उसने परमेश्वर के आशीष को कैसे देखा, हम इस पर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। जब परमेश्वर के आशीषों की बात आती है, तो सभी लोग दिन-रात परमेश्वर से आशीष पाने के लिए लालायित रहते हैं, फिर भी मनुष्य का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है कि वह अपने जीवनकाल में कितनी संपत्तियाँ प्राप्त कर सकता है, या वह परमेश्वर से आशीष प्राप्त कर सकता है या नहीं—यह एक निर्विवाद तथ्य है! परमेश्वर के पास मनुष्य को कोई भी संपत्ति देने, मनुष्य को कोई भी आशीष प्राप्त करने देने का अधिकार और सामर्थ्य है, फिर भी परमेश्वर के आशीषों का एक सिद्धांत है। परमेश्वर किस तरह के लोगों को आशीष देता है? बेशक, वह उन लोगों को आशीष देता है, जिन्हें वह पसंद करता है! अब्राहम और अय्यूब दोनों को परमेश्वर ने आशीष दिया, फिर भी जो आशीष उन्हें मिले, वे एक-जैसे नहीं थे। परमेश्वर ने अब्राहम को बालू के कणों और तारों जितने असंख्य वंशज होने का आशीष दिया। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, तो उसने एक ही व्यक्ति और एक जाति-समूह के वंशजों को सामर्थ्यवान और समृद्ध बना दिया। इसमें, परमेश्वर के अधिकार ने मानव-जाति पर शासन किया, जिसने सभी चीजों और जीवित प्राणियों के मध्य परमेश्वर की साँस फूँकी। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के तहत, यह मानव-जाति परमेश्वर द्वारा तय की गई गति से, और परमेश्वर द्वारा तय किए गए दायरे के भीतर, बढ़ी और अस्तित्व में रही। विशेष रूप से, इस जाति-समूह की जीवन-क्षमता, वृद्धि-दर और जीवन-प्रत्याशा सभी परमेश्वर की व्यवस्थाओं का हिस्सा थे, और इन सभी का सिद्धांत पूरी तरह से उस वादे पर आधारित था, जो परमेश्वर ने अब्राहम से किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, परमेश्वर के वादे बिना किसी बाधा के आगे बढ़ेंगे और परमेश्वर के अधिकार के विधि-विधान के तहत साकार होंगे। परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किए गए वादे में, चाहे दुनिया में कैसी भी उथल-पुथल हो, कोई भी युग हो, मानव-जाति द्वारा कैसी भी तबाही झेली जाए, अब्राहम के वंशजों को विनाश के जोखिम का सामना नहीं करना पड़ेगा, और उसका जाति-समूह मरेगा नहीं। किंतु परमेश्वर के आशीष ने अय्यूब को अत्यधिक धनवान बनाया। परमेश्वर ने उसे जीवित, साँस लेते जानवरों का एक समूह दिया, जिनकी विशेषताएँ—उनकी संख्या, उनकी वंश-वृद्धि की गति, जीवित रहने की दर, उनके शरीर में वसा की मात्रा, आदि—भी परमेश्वर द्वारा नियंत्रित थीं। हालाँकि इन जीवित प्राणियों में बोलने की क्षमता नहीं थी, फिर भी, वे भी सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं का हिस्सा थे, और उनके लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं के पीछे का सिद्धांत उन आशीषों के आधार पर बनाया गया था, जिनका परमेश्वर ने अय्यूब से वादा किया था। परमेश्वर द्वारा अब्राहम और अय्यूब को दिए गए आशीषों में, हालाँकि जिस चीज का वादा किया गया था वह अलग थी, लेकिन वह अधिकार, जिससे सृष्टिकर्ता सभी चीजों और जीवित प्राणियों पर शासन करता है, एक ही था। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का प्रत्येक विवरण अब्राहम और अय्यूब को दिए गए उसके विभिन्न वादों और आशीषों में व्यक्त होता है, और मानव-जाति को एक बार फिर से दिखाता है कि परमेश्वर का अधिकार मनुष्य की कल्पना से बहुत परे है। ये विवरण मनुष्य को एक बार फिर बताते हैं कि अगर वह परमेश्वर के अधिकार को जानना चाहता है, तो यह केवल परमेश्वर के वचनों के माध्यम से और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही हासिल किया जा सकता है।

सब चीजों पर संप्रभुता का परमेश्वर का अधिकार मनुष्य को एक तथ्य देखने देता है : परमेश्वर का अधिकार इन वचनों में ही सन्निहित नहीं है "और परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो, और उजियाला हो गया, और आकाश हो, और आकाश हो गया, और भूमि हो, और भूमि हो गई," बल्कि, इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार इस बात में भी सन्निहित है कि कैसे उसने उजाले को जारी रखा, आकाश को गायब होने से रोका, और भूमि को हमेशा के लिए पानी से अलग किए रखा, साथ ही इस बात के विवरण में भी कि उसने कैसे स्वयं द्वारा बनाई गई चीजों : उजाले, आकाश और भूमि को शासित और प्रबंधित किया। परमेश्वर द्वारा मानव-जाति को आशीष दिए जाने में तुम लोग और क्या देखते हो? स्पष्ट रूप से, परमेश्वर द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष दिए जाने के बाद, परमेश्वर के कदम रुके नहीं, क्योंकि उसने अभी अपने अधिकार का प्रयोग करना शुरू ही किया था, और उसका इरादा अपने प्रत्येक वचन को वास्तविकता में बदलने, और अपनी कही बात के प्रत्येक विवरण को साकार करने का था, इसलिए, आगामी वर्षों में, उसने वह सब-कुछ करना जारी रखा, जिसका उसने इरादा किया था। चूँकि परमेश्वर के पास अधिकार है, इसलिए शायद मनुष्य को ऐसा लगता है कि परमेश्वर को केवल बोलने की जरूरत है, और बिना उँगली उठाए, सभी मामले और चीजें पूरी हो जाती हैं। ऐसी कल्पनाएँ बहुत ही हास्यास्पद हैं! अगर तुम परमेश्वर द्वारा वचनों का उपयोग करते हुए मनुष्य के साथ वाचा बाँधने और परमेश्वर द्वारा वचनों का उपयोग करते हुए हर चीज पूरी करने के बारे में केवल एकतरफा दृष्टिकोण अपनाते हो, और तुम इस बात के विभिन्न चिह्न और तथ्य देखने में असमर्थ हो कि परमेश्वर का अधिकार सभी चीजों के अस्तित्व पर प्रभुत्व रखता है, तो परमेश्वर के अधिकार के बारे में तुम्हारी समझ बहुत खोखली और हास्यास्पद है! अगर मनुष्य परमेश्वर के ऐसा होने की कल्पना करता है, तो कहना होगा कि परमेश्वर के बारे में मनुष्य का ज्ञान निराशाजनक स्थिति तक पहुँच गया है, वह एक अंधी गली में पहुँच गया है, क्योंकि जिस परमेश्वर की कल्पना मनुष्य करता है, वह केवल एक मशीन है जो आदेश जारी करती है, न कि परमेश्वर जिसके पास अधिकार है। तुमने अब्राहम और अय्यूब के उदाहरणों से क्या देखा है? क्या तुमने परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का वास्तविक पक्ष देखा है? अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद परमेश्वर वहीं नहीं रहा जहाँ वह था, न ही उसने अपने दूतों को काम पर लगाकर यह देखने का इंतजार किया कि परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों का उच्चारण किया, परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन में सभी चीजें उस कार्य का अनुपालन करने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था, और वे लोग, चीजें और पदार्थ तैयार हो गए, जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य यह है कि, जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन निकले, परमेश्वर का अधिकार पूरी पृथ्वी पर लागू होना शुरू हो गया, और उसने अब्राहम और अय्यूब से किए गए वादे पूरे करने के लिए एक क्रम निर्धारित कर दिया, और हर कदम और प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण, जिन्हें पूरा करने की उसने योजना बनाई थी, उनके लिए जो कुछ आवश्यक था, उस सबके लिए सभी उचित योजनाएँ भी बनाईं और तैयारियाँ भी कीं। इस दौरान परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों का, बल्कि उन सभी चीजों का भी इस्तेमाल किया, जो उसके द्वारा बनाई गई थीं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस दायरे में परमेश्वर के अधिकार का उपयोग किया गया था, उसमें न केवल दूत शामिल थे, बल्कि सृष्टि की सभी चीजें शामिल थीं, जिन्हें वह कार्य पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया गया था, जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशिष्ट तरीके थे, जिनसे परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया गया था। अपनी कल्पनाओं में कुछ लोगों की परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, और परमेश्वर के पास सामर्थ्य है, इसलिए परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में या किसी निश्चित स्थान पर रहने की आवश्यकता है, और उसे कोई विशेष कार्य करने की आवश्यकता नहीं है, और परमेश्वर का संपूर्ण कार्य उसके विचारों में पूरा होता है। कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि, हालाँकि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, लेकिन परमेश्वर को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसके लिए केवल अपने वचन बोलना ही पर्याप्त था। क्या सच में ऐसा ही हुआ? स्पष्ट रूप से नहीं! हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसके द्वारा सभी चीजों के सृजन में, सभी चीजों पर उसके नियंत्रण में, और उस प्रक्रिया में जिसके द्वारा वह मानव-जाति का नेतृत्व और प्रबंधन करता है, प्रकट और मूर्त होती हैं। मानव-जाति और सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता का हर तरीका, हर दृष्टिकोण और हर विवरण, और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीजों के बारे में उसकी समझ—ये सभी अक्षरशः साबित करते हैं कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्य लगातार और सभी चीजों में प्रदर्शित और प्रकट होता है। ये अभिव्यक्तियाँ और प्रकटन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बताते हैं, क्योंकि वह अपने अधिकार और सामर्थ्य का उपयोग अपना कार्य जारी रखने, सभी चीजों को नियंत्रित करने और हर क्षण सभी चीजों पर शासन करने के लिए कर रहा है; उसका सामर्थ्य और अधिकार न तो स्वर्गदूतों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, न ही परमेश्वर के दूतों द्वारा। परमेश्वर ने तय किया कि वह अब्राहम और अय्यूब को क्या आशीष देगा—यह परमेश्वर का निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूत व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब के पास गए थे, लेकिन उनके कार्य परमेश्वर की आज्ञाओं पर आधारित थे, और उनके कार्य परमेश्वर के अधिकार के तहत किए गए थे और इस तरह, दूत परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम के पास जाते देखता है, और बाइबल के अभिलेखों में यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से कुछ भी करते नहीं देखता, किंतु असल में, वह केवल स्वयं परमेश्वर ही है, जो वास्तव में सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग करता है, और वह किसी व्यक्ति की ओर से कोई संदेह बरदाश्त नहीं करता! हालाँकि तुमने देखा है कि स्वर्गदूतों और दूतों में बहुत सामर्थ्य है और उन्होंने चमत्कार किए हैं, या उन्होंने परमेश्वर द्वारा आदेशित कुछ काम किए हैं, लेकिन उनके कार्य केवल परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए हैं, और वे किसी भी तरह से परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या चीज के पास सभी चीजों की रचना करने और सभी चीजों पर शासन करने का सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है। इसलिए, कोई भी मनुष्य या चीज सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रयोग या प्रदर्शन नहीं कर सकता।

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जाने योग्य है

पवित्रशास्त्र के इन तीन भागों में तुमने क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा है कि एक सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर अपने अधिकार का प्रयोग करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए इंद्रधनुष का उपयोग किया—उसने मनुष्य को यह बताने के लिए बादलों में इंद्रधनुष रखा कि वह दुनिया को नष्ट करने के लिए फिर कभी जलप्रलय का उपयोग नहीं करेगा। क्या लोग जो इंद्रधनुष आज देखते हैं, वह अभी भी वही है जो परमेश्वर के मुख से बोला गया था? क्या उसका स्वरूप और अर्थ बदल गया है? बेशक, नहीं। परमेश्वर ने यह कार्य करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग किया, और जो वाचा उसने मनुष्य के साथ बाँधी थी, वह आज तक चलती आई है, और जिस समय इस वाचा को बदला जाएगा, वह निश्चित रूप से परमेश्वर का निर्णय होगा। परमेश्वर के यह कहने के बाद कि "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर ने आज तक हमेशा इस वाचा का पालन किया। तुम इसमें क्या देखते हो? हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन वह अपने कार्यों में बहुत कठोर और सिद्धांतवादी है, और अपने वचन पर अडिग रहता है। उसकी कठोरता और उसके कार्यों के सिद्धांत दर्शाते हैं कि सृष्टिकर्ता का अपमान नहीं किया जा सकता और और सृष्टिकर्ता का अधिकार अलंघ्य है। हालाँकि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, और सभी चीजें उसके प्रभुत्व के अधीन हैं, और हालाँकि उसके पास सभी चीजों पर शासन करने का सामर्थ्य है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना क्षतिग्रस्त या बाधित नहीं की है, और हर बार जब वह अपने अधिकार का उपयोग करता है, तो यह कड़ाई से उसके सिद्धांतों के अनुसार ही होता है, और ठीक उसी का अनुसरण करता है जो उसके मुँह से बोला गया था, और उसकी योजना के चरणों और उद्देश्यों का पालन करता है। कहने की जरूरत नहीं कि परमेश्वर द्वारा शासित सभी चीजें उन सिद्धांतों का भी पालन करती हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया जाता है, और कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार की व्यवस्थाओं से मुक्त नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। परमेश्वर की दृष्टि में, जिन लोगों को आशीष दिया जाता है, वे उसके अधिकार द्वारा लाया गया सौभाग्य प्राप्त करते हैं, और जिन्हें शाप दिया जाता है, उन्हें परमेश्वर के अधिकार के कारण दंड मिलता है। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के तहत, कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार के प्रयोग से मुक्त नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। सृष्टिकर्ता का अधिकार किसी भी कारक में होने वाले परिवर्तन से नहीं बदलता, और इसी तरह, वे सिद्धांत, जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है, किसी भी कारण से नहीं बदलते। आसमान और धरती भारी उथल-पुथल से गुजर सकते हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीजें गायब हो सकती हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने योग्य अधिकार का सार है, और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

नीचे दिए गए वचन परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए अनिवार्य हैं, और उनका अर्थ नीचे की संगति में दिया गया है। आओ, हम पवित्रशास्त्र पढ़ना जारी रखते हैं।

4. शैतान को परमेश्वर की आज्ञा

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

शैतान ने कभी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की है, और इस वजह से, सभी चीजें व्यवस्थित रहती हैं

यह अय्यूब की पुस्तक का एक उद्धरण है, और इन वचनों में "वह" का मतलब है अय्यूब। संक्षिप्त होने के बावजूद यह वाक्य कई मुद्दे स्पष्ट करता है। यह आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर और शैतान के बीच हुई एक विशेष बातचीत का वर्णन करता है, और हमें बताता है कि परमेश्वर के वचनों का लक्ष्य शैतान था। यह इसे भी दर्ज करता है कि परमेश्वर ने विशेष रूप से क्या कहा था। परमेश्वर के वचन शैतान के लिए एक आज्ञा और एक आदेश थे। इस आदेश का विशिष्ट विवरण अय्यूब के जीवन को बख्शने से और इससे संबंधित है कि परमेश्वर ने शैतान द्वारा अय्यूब के साथ किए जाने वाले व्यवहार में मर्यादा-रेखा कहाँ खींची—शैतान को अय्यूब का जीवन छोड़ना था। इस वाक्य से पहली चीज जो हम सीखते हैं, वह यह है कि ये परमेश्वर द्वारा शैतान से कहे गए वचन थे। अय्यूब की पुस्तक के मूल पाठ के अनुसार, यह हमें ऐसे वचनों की पृष्ठभूमि बताता है : शैतान अय्यूब पर आरोप लगाना चाहता था, इसलिए उसकी परीक्षा लेने से पहले उसे परमेश्वर की सहमति प्राप्त करनी थी। अय्यूब की परीक्षा लेने का शैतान का अनुरोध स्वीकार करते हुए परमेश्वर ने शैतान के सामने निम्नलिखित शर्त रखी : "अय्यूब तुम्हारे हाथ में है; लेकिन उसके प्राण छोड़ देना।" इन वचनों की प्रकृति क्या है? ये स्पष्ट रूप से एक आज्ञा, एक आदेश हैं। इन वचनों की प्रकृति समझने के बाद, तुम्हें निश्चित रूप से यह भी समझ लेना चाहिए कि जिसने यह आदेश जारी किया, वह परमेश्वर था, और जिसने यह आदेश प्राप्त कर उसका पालन किया, वह शैतान था। कहने की जरूरत नहीं कि इस आदेश में परमेश्वर और शैतान के बीच का संबंध इन वचनों को पढ़ने वाले हर व्यक्ति पर स्पष्ट है। बेशक, यह आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर और शैतान के बीच का संबंध भी है, और परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के बीच का अंतर भी, जो पवित्रशास्त्र में परमेश्वर और शैतान के बीच हुई बातचीत के अभिलेख में दिया गया है, और यह परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के बीच स्पष्ट अंतर है, जिसे आज तक मनुष्य विशिष्ट उदाहरण और पाठ्य अभिलेख में देख सकता है। इस जगह, मुझे कहना होगा कि इन वचनों का अभिलेख परमेश्वर की पहचान और हैसियत के बारे में मानव-जाति के ज्ञान का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, और यह परमेश्वर के बारे में मानव-जाति के ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। आध्यात्मिक दुनिया में सृष्टिकर्ता और शैतान के बीच हुई इस बात के माध्यम से मनुष्य सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और विशिष्ट पहलू समझने में सक्षम है। ये वचन सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक और गवाही हैं।

बाहरी तौर पर, यहोवा परमेश्वर शैतान के साथ बातचीत कर रहा है। सार के संदर्भ में, जिस रवैये के साथ यहोवा परमेश्वर बोलता है, और जिस स्थान पर वह खड़ा है, वह शैतान से ऊँचा है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहोवा परमेश्वर शैतान को आदेशात्मक स्वर में आज्ञा दे रहा है, और शैतान को बता रहा है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, कि अय्यूब पहले से ही उसके हाथों में है, और वह अय्यूब के साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र है—लेकिन वह अय्यूब की जान न ले। इसका निहित पाठ यह है कि, हालाँकि अय्यूब शैतान के हाथों में सौंप दिया गया है, लेकिन उसका जीवन शैतान को नहीं दिया गया है; कोई भी अय्यूब का जीवन परमेश्वर के हाथों से नहीं ले सकता, जब तक कि परमेश्वर की अनुमति न हो। शैतान को दिए गए इस आदेश में परमेश्वर का रवैया स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है, और यह आदेश उस स्थिति को भी अभिव्यक्त और प्रकट करता है, जिससे यहोवा परमेश्वर शैतान के साथ बातचीत करता है। इसमें यहोवा परमेश्वर न केवल उस परमेश्वर का दर्जा रखता है, जिसने प्रकाश, वायु और सभी चीजों और जीवों का सृजन किया, उस परमेश्वर का, जो सभी चीजों और जीवों पर प्रभुत्व रखता है, बल्कि उस परमेश्वर का भी, जो मानव-जाति को आज्ञा देता है, और रसातल को आज्ञा देता है, परमेश्वर जो सभी जीवित चीजों के जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करता है। आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर के अलावा और कौन शैतान को ऐसा आदेश देने का साहस करेगा? और परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से शैतान को अपना आदेश क्यों दिया? क्योंकि अय्यूब सहित सभी मनुष्यों का जीवन परमेश्वर के नियंत्रण में है। परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की जान को नुकसान पहुँचाने या उसकी जान लेने की अनुमति नहीं दी, यहाँ तक कि जब परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति दी, तब भी परमेश्वर को विशेष रूप से ऐसा आदेश देना याद था, इसलिए उसने एक बार फिर शैतान को अय्यूब की जान न लेने की आज्ञा दी। शैतान ने कभी परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करने का साहस नहीं किया है, और, इसके अलावा, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेश और विशिष्ट आज्ञाएँ ध्यान से सुनी हैं और उनका पालन किया है, कभी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं किया है, और निश्चित रूप से, परमेश्वर के किसी भी आदेश को मुक्त रूप से बदलने की हिम्मत नहीं की है। ऐसी हैं वे सीमाएँ, जो परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित की हैं, और इसलिए शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने का साहस नहीं किया है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार का सामर्थ्य नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है? मानव-जाति की तुलना में शैतान को इस बात की ज्यादा स्पष्ट समझ है कि परमेश्वर के प्रति कैसे व्यवहार करना है, और परमेश्वर को कैसे देखना है, और इसलिए, आध्यात्मिक दुनिया में, शैतान परमेश्वर की हैसियत और अधिकार को बहुत स्पष्ट रूप से देखता है, और वह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार प्रयोग के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ रखता है। वह उन्हें नजरअंदाज करने की बिलकुल भी हिम्मत नहीं करता, न ही वह किसी भी तरह से उनका उल्लंघन करने की या ऐसा कुछ करने की हिम्मत करता है, जो परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करता हो, और वह किसी भी तरह से परमेश्वर के कोप को चुनौती देने का साहस नहीं करता। हालाँकि शैतान दुष्ट और अहंकारी प्रकृति का है, लेकिन उसने कभी परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित हद और सीमाएँ लाँघने का साहस नहीं किया है। लाखों वर्षों से उसने इन सीमाओं का कड़ाई से पालन किया है, परमेश्वर द्वारा दी गई हर आज्ञा और आदेश का पालन किया है, और कभी भी हद पार करने की हिम्मत नहीं की है। हालाँकि शैतान दुर्भावना से भरा है, लेकिन वह भ्रष्ट मानव-जाति से कहीं ज्यादा बुद्धिमान है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान जानता है, और अपनी सीमाएँ भी जानता है। शैतान के "विनम्र" कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वर्गिक आदेश हैं, जिनका शैतान द्वारा उल्लंघन नहीं किया जा सकता, और यह ठीक परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अधिकार के कारण है कि सभी चीजें एक व्यवस्थित तरीके से बदलती और बढ़ती हैं, ताकि मानव-जाति परमेश्वर द्वारा स्थापित क्रम के भीतर रह सके और वंश-वृद्धि कर सके, कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस आदेश को भंग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था को बदलने में सक्षम नहीं है—क्योंकि ये सभी सृष्टिकर्ता के हाथों से और सृष्टिकर्ता के आदेश और अधिकार से आते हैं।

केवल परमेश्वर, जिसके पास सृष्टिकर्ता की पहचान है, ही अद्वितीय अधिकार रखता है

शैतान की विशेष पहचान के कारण कई लोग उसके विभिन्न पहलुओं की अभिव्यक्तियों में गहन रुचि प्रदर्शित करते हैं। यहाँ तक कि बहुत-से ऐसे मूर्ख लोग भी हैं, जो यह मानते हैं कि परमेश्वर के साथ-साथ शैतान के पास भी अधिकार है, क्योंकि शैतान चमत्कार दिखाने में सक्षम है, और वे चीजें करने में सक्षम है जो मानव-जाति के लिए असंभव हैं। इस तरह, परमेश्वर की आराधना करने के अतिरिक्त मानव-जाति अपने हृदय में शैतान के लिए भी स्थान सुरक्षित रखती है, यहाँ तक कि शैतान की परमेश्वर की तरह आराधना भी करती है। ये लोग दयनीय और घृणित दोनों हैं। वे दयनीय अपनी अज्ञानता के कारण हैं, और घृणित अपने पाखंड और अंतर्निहित रूप से दुष्ट सार के कारण। इस मुकाम पर, मुझे तुम लोगों को यह सूचित करना आवश्यक लगता है कि अधिकार क्या है, किसका प्रतीक है, और क्या दर्शाता है। मोटे तौर पर, स्वयं परमेश्वर अधिकार है, उसका अधिकार परमेश्वर की सर्वोच्चता और सार का प्रतीक है, और स्वयं परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की हैसियत और पहचान दर्शाता है। ऐसी स्थिति में, क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि वह खुद परमेश्वर है? क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि उसने सभी चीजों का सृजन किया, और वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है? बेशक, नहीं! क्योंकि वह सभी चीजों का सृजन करने में असमर्थ है; आज तक उसने कभी परमेश्वर द्वारा निर्मित कोई चीज नहीं बनाई, और कभी ऐसी किसी चीज का सृजन नहीं किया जिसमें जीवन हो। चूँकि उसके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, इसलिए उसके पास कभी परमेश्वर की हैसियत और पहचान नहीं हो सकती, और यह उसके सार से निर्धारित होता है। क्या उसमें परमेश्वर के समान सामर्थ्य है? बेशक, नहीं है! हम शैतान के कार्यों और शैतान द्वारा प्रदर्शित चमत्कारों को क्या कहते हैं? क्या वह सामर्थ्य है? क्या उसे अधिकार कहा जा सकता है? बिलकूल नही! शैतान बुराई के ज्वार को निर्देशित करता है, और परमेश्वर के कार्य के हर पहलू को खराब करता, बिगाड़ता और बाधित करता है। पिछले हजारों साल से, मनुष्य को मौत की छाया की घाटी की ओर चलवाने के लिए मानव-जाति को भ्रष्ट करने और उसके साथ दुर्व्यवहार करने, और मनुष्य को लालच और धोखा देकर दुष्टता की ओर धकेलने और परमेश्वर को नकारने के अलावा, क्या शैतान ने कुछ भी ऐसा किया है, जो मनुष्य के थोड़े-से भी स्मरण, प्रशंसा या उसके द्वारा सँजोए जाने के योग्य है? अगर शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्य होते, तो क्या उसके द्वारा मानव-जाति भ्रष्ट की जाती? अगर शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्य होते, तो क्या उसके द्वारा मानव-जाति को नुकसान पहुँचाया जाता? अगर शैतान के पास सामर्थ्य और अधिकार होते, तो क्या मानव-जाति परमेश्वर को छोड़कर मृत्यु की ओर मुड़ती? चूँकि शैतान के पास कोई अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इसलिए जो कुछ वह करता है, उसके सार के बारे में हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? कुछ लोग हैं, जो शैतान के सभी कार्यों को मात्र चालबाजी के रूप में परिभाषित करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि ऐसी परिभाषा ज्यादा उपयुक्त नहीं है। क्या उसके द्वारा मानव-जाति को भ्रष्ट करने के लिए किए जाने वाले दुष्कर्म केवल चालबाजी हैं? शैतान ने जिस बुरी ताकत से अय्यूब के साथ दुर्व्यवहार किया था, और उसके साथ दुर्व्यवहार कर उसे निगल जाने की उसकी तीव्र इच्छा शायद केवल चालबाजी से पूरी नहीं हो सकती थी। बीती बातों पर सोचें तो, अय्यूब के भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के झुंड, जो दूर-दूर तक पहाड़ियों और पहाड़ों पर बिखरे हुए थे, एक ही क्षण में चले गए; अय्यूब की विशाल संपत्ति एक ही पल में गायब हो गई। क्या यह केवल चालबाजी से हासिल किया जा सकता था? शैतान जो कुछ भी करता है, उसकी प्रकृति बिगाड़ना, बाधित करना, नष्ट करना, नुकसान पहुँचाना, बुराई, दुर्भावना और अंधकार जैसे नकारात्मक शब्दों के साथ मेल खाती और सही बैठती है, इसलिए जो कुछ भी अधार्मिक और बुरा है, उसका होना शैतान के कार्यों के साथ अटूट रूप से जुड़ा है और शैतान के दुष्ट सार से अविभाज्य है। शैतान चाहे जितना भी "सामर्थ्यवान" हो, चाहे वह जितना भी दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी हो, चाहे नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता जितनी भी बड़ी हो, चाहे मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी तकनीकें जितनी भी व्यापक हों, चाहे मनुष्य को डराने की उसकी तरकीबें और योजनाएँ जितनी भी चतुराई से भरी हों, चाहे उसके अस्तित्व के रूप जितने भी परिवर्तनशील हों, वह कभी एक भी जीवित चीज सृजित करने में सक्षम नहीं हुआ, कभी सभी के चीजों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाएँ या नियम निर्धारित करने में सक्षम नहीं हुआ, और कभी किसी सजीव या निर्जीव चीज पर शासन और नियंत्रण करने में सक्षम नहीं हुआ। ब्रह्मांड और आकाश के भीतर, एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उससे पैदा हुई हो, या उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उसके द्वारा शासित हो, या उसके द्वारा नियंत्रित हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना है, बल्कि, परमेश्वर के सभी आदेशों और आज्ञाओं का पालन करना है। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान के लिए जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत का एक कण छूना भी मुश्किल है; परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान धरती पर चींटियों का स्थान बदलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है, परमेश्वर द्वारा सृजित मानव-जाति की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर की दृष्टि में, शैतान पहाड़ पर उगने वाली कुमुदनियों से, हवा में उड़ने वाले पक्षियों से, समुद्र में रहने वाली मछलियों से, और पृथ्वी पर रहने वाले कीड़ों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानव-जाति के लिए कार्य करना, और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन-योजना के काम आना है। उसकी प्रकृति कितनी भी दुर्भावनापूर्ण क्यों न हो, और उसका सार कितना भी बुरा क्यों न हो, केवल एक चीज जो वह कर सकता है, वह है अपने कार्य का कर्तव्यनिष्ठा से पालन करना : परमेश्वर के लिए सेवा देना, और परमेश्वर को एक विषमता प्रदान करना। ऐसा है शैतान का सार और उसकी स्थिति। उसका सार जीवन से असंबद्ध है, सामर्थ्य से असंबद्ध है, अधिकार से असंबद्ध है; वह परमेश्वर के हाथ में केवल एक खिलौना है, परमेश्वर की सेवा में रत सिर्फ एक मशीन है!

शैतान का असली चेहरा समझने के बाद, बहुत-से लोग अभी भी नहीं समझते कि अधिकार क्या है, इसलिए मैं तुम्हें बताता हूँ! अधिकार को अपने आप में परमेश्वर के सामर्थ्य के रूप में समझाया जा सकता है। पहले, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ्य दोनों सकारात्मक हैं। उनका किसी भी नकारात्मक चीज से कोई संबंध नहीं, और वे किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणियों से संबंधित नहीं हैं। परमेश्वर का सामर्थ्य जीवन और जीवन-शक्ति रखने वाले किसी भी रूप की चीजें बनाने में सक्षम है, और यह परमेश्वर के जीवन द्वारा निर्धारित किया जाता है। परमेश्वर जीवन है, इसलिए वह सभी जीवों का स्रोत है। इसके अलावा, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों से परमेश्वर के प्रत्येक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात्, उन्हें परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों के अनुसार अस्तित्व में ला सकता है, और परमेश्वर की आज्ञा से जीने और प्रजनन करने दे सकता है, जिसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन और नियंत्रण करता है, और इसमें कभी विचलन नहीं होगा, न अभी, न भविष्य में कभी। किसी व्यक्ति या वस्तु के पास ये चीजें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता के पास ही ऐसा सामर्थ्य है और वही इसे धारण करता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है। इसलिए, चाहे वह "अधिकार" शब्द हो या उस अधिकार का सार, दोनों केवल सृष्टिकर्ता के साथ जोड़े जा सकते हैं, क्योंकि ये सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान और सार के प्रतीक हैं, और सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत दर्शाते हैं; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी व्यक्ति या चीज को "अधिकार" शब्द के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की व्याख्या है।

हालाँकि शैतान ने अय्यूब को ललचाई आँखों से देखा, लेकिन परमेश्वर की अनुमति के बिना उसने अय्यूब के शरीर का एक बाल भी छूने की हिम्मत नहीं की। हालाँकि शैतान अंतर्निहित रूप से दुष्ट और क्रूर है, लेकिन परमेश्वर द्वारा उसे आदेश दिए जाने के बाद, उसके पास परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इस प्रकार, भले ही शैतान जब वह अय्यूब के पास आया, तो वह भेड़ों के बीच भेड़िये की तरह उन्मत्त था, लेकिन उसने परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित सीमाएँ भूलने की हिम्मत नहीं की, परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की, और जो कुछ भी उसने किया, उसमें शैतान ने परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से भटकने की हिम्मत नहीं की—क्या यह एक तथ्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचन का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करता। शैतान के लिए परमेश्वर के मुख से निकला प्रत्येक वचन एक आदेश और एक स्वर्गिक व्यवस्था है, परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्ति है—क्योंकि परमेश्वर के प्रत्येक वचन के पीछे परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करने वालों और स्वर्गिक व्यवस्थाओं की अवज्ञा और विरोध करने वालों के लिए परमेश्वर की सजा निहित है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि अगर वह परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करेगा, तो उसे परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करने और स्वर्गिक व्यवस्थाओं का विरोध करने के परिणाम स्वीकारने होंगे। आखिर वे परिणाम क्या हैं? कहने की जरूरत नहीं कि वे परमेश्वर द्वारा उसे दी जाने वाली सजा हैं। अय्यूब के प्रति शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने का केवल एक सूक्ष्म रूप थे, और जब शैतान ये कार्य कर रहा था, तो परमेश्वर ने जो सीमाएँ निर्धारित कीं और जो आदेश उसने शैतान को दिए, वे सब उसके द्वारा की जाने वाली हर चीज के पीछे के सिद्धांतों का एक सूक्ष्म रूप मात्र थे। इसके अलावा, इस मामले में शैतान की भूमिका और स्थिति, परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य में उसकी भूमिका और स्थिति का एक सूक्ष्म रूप मात्र थी, और शैतान द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता केवल इस बात का एक सूक्ष्म रूप थी कि कैसे शैतान ने परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य में परमेश्वर का थोड़ा-सा भी विरोध करने की हिम्मत नहीं की। ये सूक्ष्म रूप तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में, कोई भी व्यक्ति या चीज ऐसी नहीं है, जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गिक व्यवस्थाओं और आदेशों का उल्लंघन कर सकती हो, और कोई भी व्यक्ति या चीज ऐसी नहीं है जो इन स्वर्गिक नियमों और आदेशों का उल्लंघन करने की हिम्मत करती हो, क्योंकि कोई भी व्यक्ति या चीज उस सजा को बदल या उससे बच नहीं सकती, जो सृष्टिकर्ता उनकी अवज्ञा करने वालों को देता है। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गिक व्यवस्थाएँ और आदेश स्थापित कर सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें लागू करने का सामर्थ्य है, और केवल सृष्टिकर्ता के सामर्थ्य का ही किसी भी व्यक्ति या चीज द्वारा उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है, और यह अधिकार सभी चीजों में सर्वोच्च है, और इसलिए, यह कहना असंभव है कि "परमेश्वर महानतम है और शैतान दूसरे नंबर पर है।" अद्वितीय अधिकार से संपन्न सृष्टिकर्ता के अलावा कोई दूसरा परमेश्वर नहीं है!

क्या तुम लोगों को अब परमेश्वर के अधिकार का नया ज्ञान है? पहले, क्या अभी-अभी उल्लिखित परमेश्वर के अधिकार और मनुष्य के सामर्थ्य के बीच कोई अंतर है? क्या अंतर है? कुछ लोगों का कहना है कि दोनों में कोई तुलना नहीं है। यह सही है! हालाँकि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं है, लेकिन मनुष्य के विचारों और धारणाओं में, मनुष्य का सामर्थ्य अक्सर अधिकार के साथ भ्रमित किया जाता है, और दोनों की अक्सर साथ-साथ तुलना की जाती है। यहाँ क्या हो रहा है? क्या लोग अनजाने में एक को दूसरे के साथ प्रतिस्थापित करने की गलती नहीं कर रहे? ये दोनों असंबद्ध हैं, और इनके बीच कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग बाज नहीं आते। इसका समाधान कैसे किया जाना चाहिए? अगर तुम वास्तव में समाधान खोजना चाहते हो, तो एकमात्र तरीका परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार को समझने और जानने के बाद तुम मनुष्य के सामर्थ्य और परमेश्वर के अधिकार का एक-साथ उल्लेख नहीं करोगे।

मनुष्य के सामर्थ्य से क्या तात्पर्य है? सीधे तौर पर कहें तो, यह एक क्षमता या कौशल है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को अधिकतम सीमा तक फैलने या पूरा होने में सक्षम बनाता है। क्या इसे अधिकार माना जा सकता है? मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ चाहे जितनी भी बड़ी या आकर्षक हों, यह नहीं कहा जा सकता कि उस व्यक्ति के पास अधिकार है; ज्यादा से ज्यादा, यह घमंड और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के मसखरेपन का एक प्रदर्शन मात्र है; ज्यादा से ज्यादा यह एक प्रहसन है, जिसमें शैतान परमेश्वर होने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए खुद को अपना ही पूर्वज बना लेता है।

अब तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे देखते हो? अब जबकि इन वचनों पर संगति हो गई है, तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान होना चाहिए। इसलिए मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : परमेश्वर का अधिकार किसका प्रतीक है? क्या यह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या यह स्वयं परमेश्वर के सामर्थ्य का प्रतीक है? क्या यह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीजों के बीच, तुमने परमेश्वर का अधिकार किसमें देखा है? तुमने इसे कैसे देखा? मनुष्य द्वारा अनुभव की जाने वाली चार ऋतुओं के संदर्भ में, क्या कोई बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु के बीच अंत:परिवर्तन की व्यवस्था बदल सकता है? बसंत ऋतु में पेड़ों पर कलियाँ उगती और खिलती हैं; गर्मियों में वे पत्तियों से ढक जाते हैं; शरद ऋतु में उन पर फल लगते हैं, और सर्दियों में पत्ते गिर जाते हैं। क्या कोई इस व्यवस्था को बदल सकता है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार का एक पहलू दर्शाता है? परमेश्वर ने कहा "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी मौजूद है? यह किसके कारण मौजूद है? बेशक, यह परमेश्वर के वचनों के कारण, और परमेश्वर के अधिकार के कारण मौजूद है। क्या परमेश्वर द्वारा सृजित हवा अभी भी मौजूद है? क्या मनुष्य जिस हवा में साँस लेता है, वह परमेश्वर से आती है? क्या कोई परमेश्वर से आने वाली चीजें छीन सकता है? क्या कोई उनका सार और कार्य बदल सकता है? क्या कोई परमेश्वर द्वारा नियत रात और दिन, और परमेश्वर द्वारा आदेशित रात और दिन की व्यवस्था नष्ट कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कर सकता है? अगर तुम रात को नहीं सोते, और रात को दिन मान लेते हो, तब भी रात ही होती है; तुम अपनी दिनचर्या बदल सकते हो, लेकिन तुम रात और दिन के बीच अंत:परिवर्तन की व्यवस्था बदलने में असमर्थ हो—यह तथ्य किसी भी व्यक्ति द्वारा अपरिवर्तनीय है, है न? क्या कोई शेर से बैल की तरह भूमि जुतवाने में सक्षम है? क्या कोई हाथी को गधे में बदलने में सक्षम है? क्या कोई मुर्गी को बाज की तरह हवा में उड़वाने में सक्षम है? क्या कोई भेड़िये को भेड़ की तरह घास खाने के लिए मजबूर कर सकता है? (नहीं।) क्या कोई पानी में रहने वाली मछली को सूखी जमीन पर जीवित रखने में सक्षम है? यह मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता। क्यों नहीं किया जा सकता? इसलिए कि परमेश्वर ने मछलियों को पानी में रहने की आज्ञा दी है, इसलिए वे पानी में रहती हैं। जमीन पर वे जीवित नहीं रह पाएँगी और मर जाएँगी; वे परमेश्वर की आज्ञा की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीजों के अस्तित्व की एक व्यवस्था और सीमा होती है, और उनमें से प्रत्येक की अपनी सहज प्रवृत्ति होती है। वे सृष्टिकर्ता द्वारा नियत की गई हैं, और किसी भी मनुष्य द्वारा अपरिवर्तनीय और अलंघ्य हैं। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर, जंगल में रहेगा, और वह कभी उतना विनम्र और वफादार नहीं हो सकता, जितना कि मनुष्य के साथ रहने और उसके लिए काम करने वाला बैल होता है। हालाँकि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं और दोनों के चार पैर होते हैं, और वे जीव हैं जो हवा में साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा विभिन्न किस्मों में विभाजित किया गया था, उनमें से प्रत्येक की अपनी सहज प्रवृत्ति होती है, इसलिए वे कभी आपस में बदले नहीं जा सकेंगे। हालाँकि बाज की ही तरह मुर्गे के भी दो पैर और पंख होते हैं, लेकिन वह कभी हवा में नहीं उड़ पाएगा; ज्यादा से ज्यादा वह केवल पेड़ तक उड़ सकता है—यह उसकी सहज प्रवृत्ति से निर्धारित होता है। कहने की जरूरत नहीं कि यह सब परमेश्वर के अधिकार की आज्ञाओं के कारण है।

मानव-जाति के विकास में आज उसके विज्ञान को फलता-फूलता कहा जा सकता है, और मनुष्य की वैज्ञानिक खोज की उपलब्धियाँ प्रभावशाली कही जा सकती हैं। कहना होगा कि मनुष्य की क्षमता लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन एक वैज्ञानिक खोज ऐसी है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ रहा है : मनुष्य ने हवाई जहाज, विमान-वाहक और परमाणु बम बना लिए हैं, वह अंतरिक्ष में पहुँच गया है, चंद्रमा पर चला है, उसने इंटरनेट का आविष्कार किया, और एक हाई-टेक जीवन-शैली जीने लगा है, फिर भी वह एक जीवित, साँस लेने वाली चीज बनाने में असमर्थ है। हर जीवित प्राणी की सहज प्रवृत्ति और वे व्यवस्थाएँ जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर किस्म के जीवित प्राणियों के जीवन और मृत्यु का चक्र—ये सब मनुष्य के विज्ञान के सामर्थ्य से परे हैं और उसके द्वारा नियंत्रित नहीं किए जा सकते। इस जगह, कहना होगा कि मनुष्य के विज्ञान ने चाहे जितनी भी महान ऊँचाइयाँ प्राप्त कर ली हों, उनकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार के साथ नहीं की जा सकती और वह सृष्टिकर्ता के सृजन की चमत्कारिकता और उसके अधिकार की शक्ति को समझने में असमर्थ है। पृथ्वी पर इतने सारे महासागर हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया और अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ निर्धारित की हैं; वे वहीं ठहर गए, जहाँ ठहरने की उसने उन्हें आज्ञा दी, और परमेश्वर की अनुमति के बिना वे आजादी से यहाँ-वहाँ नहीं जा सकते। परमेश्वर की अनुमति के बिना वे एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं कर सकते, और केवल तभी हिल सकते हैं जब परमेश्वर हिलने को कहता है, और वे कहाँ जाएँगे और ठहरेंगे, यह परमेश्वर के अधिकार द्वारा निर्धारित किया जाता है।

साफ कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर को यह तय करने का अधिकार है कि कोई चीज कैसे करनी है, और उसे उस तरह किया जाता है, जिस तरह से वह चाहता है। सब चीजों की व्यवस्था परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर नहीं; न ही उसे मनुष्य द्वारा बदला जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा से नहीं हिलाया जा सकता, बल्कि परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि और परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जाता है; यह एक ऐसा तथ्य है जिससे कोई भी व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता। स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें, ब्रह्मांड, तारों भरा आकाश, वर्ष के चार मौसम, जो भी मनुष्य के लिए दृश्यमान और अदृश्य हैं—वे सभी थोड़ी-सी भी त्रुटि के बिना, परमेश्वर के अधिकार के तहत, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के मुताबिक, और सृष्टि की शुरुआत की व्यवस्थाओं के अनुसार अस्तित्व में हैं, कार्यरत हैं, और बदलते हैं। कोई भी व्यक्ति या चीज उनकी व्यवस्थाएँ नहीं बदल सकती, या वह अंतर्निहित क्रम नहीं बदल सकती जिसके द्वारा वे कार्य करते हैं; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए, और परमेश्वर के अधिकार के कारण नष्ट होते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है। अब जबकि इतना कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और हैसियत का प्रतीक है? क्या परमेश्वर का अधिकार किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास हो सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु या पदार्थ द्वारा इसका अनुकरण, प्रतिरूपण, या प्रतिस्थापन किया जा सकता है?

सृष्टिकर्ता की पहचान अद्वितीय है और तुम्हें बहुईश्वरवाद के विचार का पालन नहीं करना चाहिए

हालाँकि शैतान के कौशल और क्षमताएँ मनुष्य की तुलना में ज्यादा हैं, हालाँकि वह वे चीजें कर सकता है जो मनुष्य नहीं कर सकता, चाहे तुम शैतान के कार्यों से ईर्ष्या करो या उनकी आकांक्षा करो, चाहे तुम इन चीजों से घृणा करो या इनका तिरस्कार करो, चाहे तुम उन्हें देखने में सक्षम हो या न हो, और चाहे शैतान जितना भी हासिल कर सकता हो या जितने भी लोगों को धोखा देकर उनसे अपनी आराधना और अपना प्रतिष्ठापन करवा सकता हो, और चाहे तुम जैसे भी इसे परिभाषित करो, लेकिन तुम संभवतः यह नहीं कह सकते कि उसमें परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है। तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर परमेश्वर है, केवल एक परमेश्वर है, और इसके अलावा, तुम्हें पता होना चाहिए कि केवल परमेश्वर के पास ही अधिकार है, कि केवल परमेश्वर के पास ही सभी चीजों पर नियंत्रण और शासन करने का सामर्थ्य है। सिर्फ इसलिए कि शैतान में लोगों को धोखा देने की क्षमता है और वह परमेश्वर का रूप धारण कर सकता है, परमेश्वर द्वारा बनाए गए चिह्नों और चमत्कारों की नकल कर सकता है, और उसने परमेश्वर के समान कार्य किए हैं, तुम गलती से मानते हो कि परमेश्वर अद्वितीय नहीं है, कि कई परमेश्वर हैं, कि इन अलग-अलग परमेश्वरों के पास केवल ज्यादा या कम कौशल हैं, और उनके सामर्थ्य के विस्तार में अंतर हैं। तुम उनके आगमन के क्रम में और उनकी उम्र के अनुसार उनकी महानता को श्रेणीबद्ध करते हो, और तुम गलत ढंग से यह मानते हो कि परमेश्वर के अलावा अन्य देवता भी हैं, और सोचते हो कि परमेश्वर का सामर्थ्य और अधिकार अद्वितीय नहीं हैं। अगर तुम्हारे ऐसे विचार हैं, अगर तुम परमेश्वर की अद्वितीयता को नहीं पहचानते, यह विश्वास नहीं करते कि केवल परमेश्वर के पास ही अधिकार है, और अगर तुम केवल बहुईश्वरवाद का पालन करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम प्राणियों में सबसे नीच हो, तुम शैतान के सच्चे मूर्त रूप हो, और तुम पूरी तरह से बुरे व्यक्ति हो! क्या तुम लोग समझ रहे हो कि मैं ये वचन कहकर तुम लोगों को क्या सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ? चाहे जो भी समय या स्थान हो, या जो भी तुम्हारी पृष्ठभूमि हो, तुम्हें किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु या पदार्थ को परमेश्वर नहीं समझ लेना चाहिए। चाहे तुम परमेश्वर के अधिकार और स्वयं परमेश्वर के सार को कितना भी अज्ञेय या अगम्य महसूस करो, चाहे शैतान के कर्म और वचन तुम्हारी धारणा और कल्पना से कितने भी मेल खाएँ, चाहे वे तुम्हारे लिए कितने भी संतोषजनक हों, तुम मूर्ख मत बनो, इन अवधारणाओं में मत उलझो, परमेश्वर का अस्तित्व मत नकारो, परमेश्वर की पहचान और हैसियत मत नकारो, परमेश्वर को दरवाजे से बाहर मत करो और शैतान को अपने दिल के भीतर लाकर परमेश्वर का स्थान मत दो, उसे अपना परमेश्वर मत बनाओ। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम लोग ऐसा करने के परिणामों की कल्पना करने में सक्षम हो!

हालाँकि मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है, लेकिन वह अभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन रहता है

शैतान हजारों वर्षों से मनुष्य को भ्रष्ट कर रहा है। उसने मनुष्य में बेहिसाब बुराई गढ़ी है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे धोखा दिया है, और दुनिया में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, मनुष्य को परमेश्वर का विरोध करने के लिए बहकाया है, और ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने परमेश्वर की प्रबंधन-योजना को बार-बार उलझाया और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के तहत, सभी चीजें और जीवित प्राणी परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करते रहते हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान की दुष्ट प्रकृति और निरंकुशता बहुत कुरूप, बहुत घृणित और नीच, और बहुत क्षुद्र और कमजोर है। भले ही शैतान परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के बीच चलता है, लेकिन वह परमेश्वर द्वारा नियंत्रित लोगों, चीजों और पदार्थों में थोड़ा-सा भी बदलाव करने में सक्षम नहीं है। हजारों वर्ष बीत चुके हैं, और मानव-जाति अभी भी परमेश्वर द्वारा प्रदत्त प्रकाश और हवा का आनंद लेती है, अभी भी स्वयं परमेश्वर द्वारा छोड़ी गई साँस से साँस लेती है, अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीटों का आनंद लेती है, और परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई सभी चीजों का आनंद लेती है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे की जगह लेते हैं; चार मौसम हमेशा की तरह बारी-बारी से आते हैं; आकाश में उड़ने वाले हंस सर्दियों में चले जाते हैं और अगले बसंत में फिर लौट आते हैं; पानी में रहने वाली मछलियाँ कभी नदी-झीलें—अपना घर नहीं छोड़तीं; गर्मी के दिनों में शलभ पृथ्वी पर दिल खोलकर गाते हैं; पतझड़ के दौरान हवा के साथ घास में झींगुर मृदुता से गुनगुनाते हैं; हंस झुंड में एकत्र होते हैं, जबकि बाज अकेले रहते हैं; सिंहों के समूह शिकार करके अपना भरण-पोषण करते हैं; बारहसिंगा घास और फूलों से भटककर दूर नहीं जाता...। सभी चीजों के बीच हर तरह का जीवित प्राणी जाता और लौटता है और फिर चला जाता है, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन हो जाते हैं—लेकिन जो नहीं बदलता, वह है उनकी सहज प्रवृत्ति और अस्तित्व की व्यवस्थाएँ। वे परमेश्वर के प्रावधान और पोषण के तहत रहते हैं, और कोई उनकी सहज प्रवृत्ति नहीं बदल सकता, और न ही कोई उनके अस्तित्व की व्यवस्थाओं के नियम भंग कर सकता है। हालाँकि मानव-जाति, जो सभी चीजों के बीच रहती है, शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई और ठगी गई है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा बनाए गए पानी, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई हवा, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें नहीं छोड़ सकता, और मनुष्य अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित स्थान में रहता और वंश-वृद्धि करता है। मानव-जाति की सहज प्रवृत्तियाँ नहीं बदली हैं। मनुष्य अभी भी देखने के लिए अपनी आँखों पर, सुनने के लिए अपने कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने दिल पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों पर, इत्यादि, निर्भर करता है; वे सभी सहज प्रवृत्तियाँ जो परमेश्वर ने मनुष्य को दीं, ताकि वह परमेश्वर का प्रावधान स्वीकार कर सके, अपरिवर्तित रहती हैं, जिन क्षमताओं के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, उनमें कोई बदलाव नहीं आया है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए मानव-जाति की क्षमता नहीं बदली है, मानव-जाति की आध्यात्मिक आवश्यकताएँ नहीं बदली हैं, मानव-जाति की अपने मूल को खोजने की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानव-जाति की लालसा नहीं बदली है। ऐसी हैं मानव-जाति की वर्तमान परिस्थितियाँ, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहती है, और जिसने शैतान द्वारा किया गया खूनी विनाश सहन किया है। हालाँकि मनुष्य शैतान द्वारा रौंदे गए हैं, और अब वे सृष्टि की शुरुआत वाले आदम और हव्वा नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, कल्पना, धारणाओं आदि जैसी परमेश्वर-विरोधी चीजों से भरे हुए हैं और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूर्ण हैं, फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में मानव-जाति अभी भी वही मानव-जाति है, जिसे उसने बनाया था। मानव-जाति अभी भी परमेश्वर द्वारा शासित और आयोजित है, और अभी भी परमेश्वर द्वारा निर्धारित क्रम के भीतर रहती है, और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में मानव-जाति, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, सिर्फ गर्द से ढकी हुई है, उसका पेट गड़गड़ाता है, वह थोड़ी धीमी प्रतिक्रिया देती है, उसकी स्मृति उतनी अच्छी नहीं रही जितनी हुआ करती थी, और थोड़ी पुरानी पड़ गई है—लेकिन मनुष्य के सभी कार्य और सहज प्रवृत्तियाँ पूरी तरह से अक्षत हैं। यही वह मनुष्य है, जिसे परमेश्वर बचाने का इरादा रखता है। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी होगी, बस सृष्टिकर्ता की वाणी सुननी होगी, फिर वह उठ खड़ा होगा और उस वाणी के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगा। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की आकृति देखनी होगी, फिर वह किसी और चीज पर ध्यान नहीं देगा, और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के लिए सब-कुछ त्याग देगा, यहाँ तक कि उसके लिए अपना जीवन भी दे देगा। जब मानव-जाति का हृदय सृष्टिकर्ता के हार्दिक वचनों को समझेगा, तब मानव-जाति शैतान को नकार देगी और सृष्टिकर्ता के साथ आ जाएगी; जब मानव-जाति अपने शरीर से गंदगी पूरी तरह से धो देगी, और एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का प्रावधान और पोषण प्राप्त कर लेगी, तब मानव-जाति की स्मृति बहाल हो जाएगी, और उस समय मानव-जाति वास्तव में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में लौट आएगी।

14 दिसंबर, 2013

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