स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

परमेश्वर का अधिकार (I)

मेरी पिछली अनेक संगतियाँ परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के विषय में थीं। इन संगतियों को सुनने के बाद, क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम सबने परमेश्वर के स्वभाव की समझ और ज्ञान प्राप्त कर लिया है? तुमने किस हद तक समझ और ज्ञान प्राप्त किया है? क्या तुम लोग उसे संख्या में बता सकते हो? क्या इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर की और गहरी समझ दी है? क्या यह कहा जा सकता है कि यह समझ परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? क्या यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का यह ज्ञान और समझ परमेश्वर के संपूर्ण सार-तत्त्व और स्वरूप का ज्ञान है? नहीं, बिलकुल नहीं! क्योंकि ये संगतियाँ केवल परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार तथा स्वरूप के एक भाग की ही समझ प्रदान करती हैं—संपूर्ण रूप में उसके समस्त अस्तित्व की नहीं। इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के एक भाग को समझने में सक्षम बनाया; इन संगतियों के माध्यम से तुमने परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार तथा स्वरूप को देखा और उसके साथ-साथ यह भी देखा कि जो कुछ उसने किया है, उस के पीछे उसका क्या नज़रिया और सोच है। परंतु यह केवल परमेश्वर की शाब्दिक एवं मौखिक समझ है, और तुम सब अपने हृदय में अनिश्चित बने रहते हो कि यह कितनी वास्तविक है। वह कौन सी चीज़ है, जो मुख्य रूप से यह निर्धारित करती है कि ऐसी चीज़ों के प्रति लोगों की समझ में कोई वास्तविकता है या नहीं? यह इससे निर्धारित होता है कि उन सबने अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर के वचनों और स्वभाव का वास्तव में कितना अनुभव किया है, और वे लोग इन वास्तविक अनुभवों के दौरान उसे कितना देख या समझ पाए हैं। क्या किसी ने ऐसे शब्द कहे हैं : "पिछली कई संगतियों से हमने परमेश्वर द्वारा किए गए कामों और उसके विचारों अतिरिक्त मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये, और उसके कार्यों के आधार, और साथ ही उसके कार्यों के सिद्धांतों को भी समझने की अनुमति दी है; और इसलिए हम परमेश्वर के स्वभाव को समझ गए हैं, और हमने परमेश्वर की संपूर्णता को जान लिया है।" क्या यह कहना सही है? स्पष्ट रूप से, यह कहना सही नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह कहना सही नहीं है? परमेश्वर का स्वभाव और उसके सार तथा स्वरूप उसके द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों में व्यक्त होते हैं। परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के दर्शन कर सकता है, परंतु इससे बस यही कहा जा सकता है कि उसके द्वारा किए गए कार्यों और उसके वचनों से मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार तथा स्वरूप के एक अंश को ही समझने में सक्षम हो सकता है। यदि मनुष्य परमेश्वर की और अधिक तथा और गहरी समझ प्राप्त करना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य का और अधिक अनुभव करना होगा। यद्यपि परमेश्वर के वचनों और कार्य के अंश का अनुभव करते हुए मनुष्य परमेश्वर की आंशिक समझ ही प्राप्त करता है, परंतु क्या यह आंशिक समझ परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है? क्या यह परमेश्वर के सार-तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है? बेशक, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार-तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है; इसमें कोई संदेह नहीं है। समय या स्थान या इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर किस तरीके से अपना काम करता है, या वह किस रूप में मनुष्य के सामने प्रगट होता है, या किस प्रकार से वह अपनी इच्छा व्यक्त करता है, वह सब जो वह प्रकट और व्यक्त करता है, वह स्वयं परमेश्वर, परमेश्वर के सार-तत्त्व और उसके सार तथा स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर अपना कार्य अपने सार तथा स्वरूप और अपनी सच्ची पहचान के साथ करता है; यह बिलकुल सच है। फिर भी, आज लोगों को परमेश्वर की आंशिक समझ ही है, जो उन्होंने उसके वचनों के माध्यम से और प्रवचन सुनकर आई है, और उसे केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही कहा जा सकता है। अपनी वास्तविक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए तुम परमेश्वर की समझ या ज्ञान को, जिसे तुमने सुना, देखा या जाना और अपने हृदय में समझा है, केवल तभी सत्यापित कर सकते हो, जब तुममें से हर एक अपने वास्तविक अनुभवों में इससे होकर गुज़रो और इसे थोड़ा-थोड़ा करके जानो। यदि मैं संगति में तुम लोगों को ये वचन न कहता, तो क्या तुम मात्र अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हासिल कर पाते? नहीं, ऐसा करना बहुत कठिन होता। क्योंकि यह जानने के लिए कि अनुभव कैसे करें, लोगों के पास पहले परमेश्वर के वचन होने चाहिए। बहरहाल, परमेश्वर के जितने वचनों को लोग खाते हैं, उतनी ही मात्रा का वे वास्तव में अनुभव कर सकते हैं। परमेश्वर के वचन आगे के पथ पर अगुआई करते हैं और मनुष्य को उसके अनुभव में मार्गदर्शन देते हैं। संक्षेप में, जिन लोगों को थोड़ा-बहुत सच्चा अनुभव है, उन्हें ये पिछली कई संगतियाँ सत्य की और अधिक गहरी समझ और परमेश्वर का और अधिक वास्तविक ज्ञान हासिल करने में सहायता करेंगी। परंतु जिन्हें कुछ भी वास्तविक अनुभव नहीं है, या जिन्होंने अभी अपना अनुभव प्रारंभ ही किया, या जिन्होंने अभी वास्तविकता को स्पर्श करना प्रारंभ ही किया है, उनके लिये यह एक बड़ी परीक्षा है।

पिछली कई संगतियों की मुख्य विषयवस्तु "परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर" से संबंधित थी। जो कुछ भी मैंने कहा था, तुम सबने उसके मुख्य और केंद्रीय भागों में क्या देखा? इन संगतियों माध्यम से क्या तुम लोग यह पहचानने में सक्षम हो कि जिसने यह काम किया, और जिसने इन स्वभावों को प्रकट किया, वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? यदि तुम सबका उत्तर हाँ है, तो किस बात ने तुम लोगों को इस निष्कर्ष पर पहुँचाया? इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तुमने कितने पहलुओं पर विचार किया? क्या कोई मुझे बता सकता है? मैं जानता हूँ कि पिछली कुछ संगतियों ने तुम सबको गहराई से प्रभावित किया, और परमेश्वर के तुम्हारे के लिए तुम लोगों के हृदय में एक नई शुरुआत उपलब्ध कराई थी, जो उत्कृष्ट है। लेकिन, यद्यपि तुम लोगों ने पहले की तुलना में परमेश्वर की अपनी समझ में एक बड़ी छलाँग लगाई है, फिर भी परमेश्वर की पहचान की तुम लोगों की परिभाषा अभी भी व्यवस्था के युग के परमेश्वर यहोवा, अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु, और राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर जैसे नामों से से परे उन्नत होनी है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि "परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर" के बारे में इन संगतियों ने तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा किसी समय बोले गए वचनों और उसके द्वारा किसी समय किए गए कार्य तथा परमेश्वर द्वारा किसी समय प्रकट किए गए उसके अस्तित्व और व्यावहारिक गुणों की कुछ समझ दी है, फिर भी तुम लोग "परमेश्वर" शब्द की सही परिभाषा और सटीक अभिमुखता प्रदान करने में असमर्थ हो। न तुम लोगों के पास स्वयं परमेश्वर की हैसियत और पहचान की, अर्थात् सभी चीज़ों के बीच और संपूर्ण ब्रह्मांड के मध्य परमेश्वर की हैसियत की सच्ची और सटीक अभिमुखता तथा ज्ञान ही है। यह इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर और उसके स्वभाव से संबंधित पिछली संगतियों में समस्त विषयवस्तु परमेश्वर की पूर्व अभिव्यक्तियों और प्रकटीकरण पर आधारित थीं, जो बाइबल में दर्ज़ हैं। अभी मनुष्य के लिए उसके अस्तित्व और उसके व्यावहारिक गुणों की खोज करना कठिन है, जो परमेश्वर द्वारा मानव-जाति के प्रबंध और उद्धार के दौरान, या उसके बाहर, प्रकट और व्यक्त किए गए हैं। अतः, भले ही तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व और उसके व्‍यावहारिक गुणों को समझते हो, जो उसके द्वारा अतीत में किए गए कार्य में प्रकट हुए थे, फिर भी परमेश्वर की पहचान और हैसियत की तुम लोगों की परिभाषा अभी भी "अद्वितीय परमेश्वर, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है," से बहुत दूर और "रचयिता" से अलग है। पिछली कई संगतियों ने सबको एक ही तरह से महसूस करायामनुष्य परमेश्वर के विचारों को कैसे जान सकता है? यदि कोई वास्तव में जानता था, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से परमेश्वर ही होगा, क्योंकि केवल परमेश्वर ही अपने विचारों को जानता है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही अपने हर कार्य के आधार और दृष्टिकोण को जानता है। इस रीति से परमेश्वर की पहचान को जानना तुम लोगों को उचित और तर्कसंगत लगता है, परंतु परमेश्वर के स्वभाव और कार्य से कौन यह बता सकता है कि यह वास्तव में स्वयं परमेश्वर का कार्य है, मनुष्य का नहीं, ऐसा कार्य जो परमेश्वर की ओर से मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता? कौन यह देख सकता है कि यह कार्य उसकी संप्रभुता में आता है, जिसके पास परमेश्वर का सार-तत्त्व और सामर्थ्‍य है? दूसरे शब्दों में, किन विशेषताओं या सार के जरिये तुम लोग यह पहचानते हो कि वह स्वयं परमेश्वर है, जिसके पास परमेश्वर की पहचान है, और जो सब चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? क्या तुम लोगो ने कभी इसके बारे में सोचा है? यदि तुम लोगों ने नहीं सोचा है तो इससे एक बात साबित होती है : पिछली कई संगतियों ने तुम लोगों को बस इतिहास के एक हिस्से की, जिसमें परमेश्वर ने अपना कार्य किया था, और उस कार्य के दौरान परमेश्वर के नज़रिये, उसकी अभिव्यक्ति और उसके प्रकटीकरण की कुछ समझ दी है। हालाँकि ऐसी समझ तुममें से प्रत्येक को निस्संदेह यह पहचान करवाती है कि कार्य के इन दोनों चरणों को पूरा करने वाला स्वयं परमेश्वर है, जिसमें तुम लोग विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो और जिसका तुम सबको हमेशा अनुसरण करना चाहिए, फिर भी तुम लोग अब भी यह पहचानने में असमर्थ हो कि यह वही परमेश्वर है, जो विश्व के सृजन के समय से अस्तित्व में है, और जो अनंत काल तक अस्तित्व में बना रहेगा, और न तुम यह पहचानने में समर्थ हो कि यही समस्त मानव-जाति की अगुआई करता है और उस पर प्रभुत्व रखता है। तुम लोगों ने निश्चित रूप से इस समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा था। वह यहोवा हो या प्रभु यीशु, सार और अभिव्यक्ति के किन पहलुओं के माध्यम से तुम यह पहचानने में सक्षम कते हो कि वह न केवल वह परमेश्वर है, जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए, बल्कि वही मानव-जाति को आज्ञा देता है और मनुष्यों की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है, इसके अतिरिक्त जो स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम यह विश्वास करते हो कि जिसमें तुम विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो, वह स्वयं परमेश्वर है जो सब चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम लोग उस परमेश्वर को, जिस पर तुम विश्वास करते हो, उस परमेश्वर से जोड़ सकते हो, जो मानव-जाति के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है? तुम यह कैसे पहचानते हो कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वही वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी, और सभी चीज़ों में है? यह वह समस्या है, जिसका मैं अगले खंड में समाधान करूँगा।

जिन समस्याओं के बारे में तुम लोगों ने कभी नहीं सोचा है जिनके बारे में तुम सोच भी नहीं सकते हो, वे हो सकती हैं जो परमेश्वर को जानने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, और जिनमें मनुष्य के लिए अथाह सत्य खोजे जा सकते हैं। जब ये समस्याएँ तुम लोगों पर आती हैं और तुम्हें उनका सामना करना चुनाव करना आवश्यक होता है, और यदि तुम लोग अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण उनका पूरी तरह से उनका समाधान करने में असमर्थ रहते हो, या इसलिए कि तुम्हारे अनुभव बहुत सतही हैं और तुम लोगों में परमेश्वर के सच्चे ज्ञान की कमी है, तो वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की राह में सबसे बड़ा अवरोध और सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगे। और इसलिए मुझे लगता है कि इस विषय में तुम लोगों के साथ संगति करना बहुत ज़रूरी है। क्या अब तुम लोग जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है? क्या तुम लोग उन समस्याओं के बारे में स्पष्ट हो, जिनके बारे में मैंने बताया? क्या ये वे समस्याएँ हैं, जिनका तुम लोग सामना करोगे? क्या ये वे समस्याएँ हैं, जिन्हें तुम लोग नहीं समझते हो? क्या ये समस्याएँ तुम्हारे साथ कभी घटित नहीं हुईं? क्या ये समस्याएँ तुम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या ये वास्तव में समस्याएँ हैं? यह मामला तुम लोगों को बहुत भ्रमित करता है, जिससे पता चलता है कि तुम्हारे अंदर उस परमेश्वर की सच्ची समझ नहीं है, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, और यह कि तुम लोग उसे गम्भीरता से नहीं लेते। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि वह परमेश्वर है, और इसलिए मैं उसका अनुसरण करता हूँ, क्योंकि उसके वचन परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। बस, इतना काफी है। और कितने सबूत चाहिए? क्या वाकई हमें परमेश्वर के बारे में संदेह खड़े करने की आवश्यकता नहीं है? क्या वाकई हमें परमेश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए? क्या वाकई हमें परमेश्वर के सार और स्वयं परमेश्वर की पहचान पर प्रश्न नहीं करना चाहिए?" भले ही तुम लोग इस तरह से सोचते हो या नहीं, पर मैं ये प्रश्न परमेश्वर के बारे में तुम लोगों को भ्रमित करने के लिए या तुम लोगों को उसकी परीक्षा लेने हेतु प्रेरित करने के लिए नहीं रख रहा, परमेश्वर की पहचान और उसके सार के बारे में तुम्हारे भीतर संदेह उत्पन्न करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं। बल्कि मैं ऐसा इसलिए करता हूँ, ताकि मैं तुम लोगों में परमेश्वर के सार के बारे में बेहतर समझ और परमेश्वर की हैसियत के बारे में एक बड़ी निश्चितता और विश्वास का उत्साह भर सकूँ, जिससे कि परमेश्वर उन सभी के हृदय में निवास करने वाला एकमात्र परमेश्वर हो सके, और जिससे कि परमेश्वर की मूल हैसियत—सृष्टिकर्ता, सभी चीज़ों के शासक और स्वयं अद्वितीय परमेश्वर की—हर प्राणी के हृदय में बहाल हो जा सके। यह भी एक मुख्य विषय है, जिसके बारे में मैं संगति करने वाला हूँ।

आओ, अब हम बाइबल से निम्नलिखित अंश पढना शुरू करें।

1. परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को प्रयोग करता है

उत्पत्ति 1:3-5 जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

उत्पत्ति 1:6-7 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:9-11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:14-15 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:20-21 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

उत्पत्ति 1:24-25 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

पहले दिन, परमेश्वर के अधिकार के कारण, मानव-जाति के दिन और रात उत्पन्न हुए और स्थिर बने हुए हैं

आओ, हम पहले अंश को देखें : "जब परमेश्‍वर ने कहा, 'उजियाला हो,' तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया" (उत्पत्ति 1:3-5)। यह अंश सृष्टि की शुरुआत में परमेश्वर के पहले कार्य का विवरण देता है, और पहला दिन जिसे परमेश्वर ने गुज़ारा, उसमें एक शाम और एक सुबह थी। पर वह एक असाधारण दिन था : परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए उजाला तैयार करना शुरू किया, और इतना ही नहीं, उजाले को अँधेरे से अलग किया। इस दिन, परमेश्वर ने बोलना शुरू किया, और उसके वचन और अधिकार साथ-साथ मौजूद रहे। उसका अधिकार सभी चीज़ों के बीच दिखाई देने लगा, और उसके वचनों के परिणामस्वरूप उसका सामर्थ्‍य सभी चीज़ों में फैल गया। इस दिन से परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ें बन गई और स्थिर हो गईं, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य की वजह से काम करना शुरू कर दिया। जब परमेश्वर ने ये वचन कहे "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। परमेश्वर कार्यों के किसी क्रम में शामिल नहीं हुआ; उजाला उसके वचनों के परिणामस्वरूप प्रकट हुआ था। इस उजाले को परमेश्वर ने दिन कहा, जिस पर आज भी मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए निर्भर रहता है। परमेश्वर की आज्ञा से उसका सार और मूल्य कभी नहीं बदले, और वह कभी ग़ायब नहीं हुआ। उसका अस्तित्व परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाता है, और सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की घोषणा करता हैकरता है। यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत की बारंबार पुष्टि करता है। यह अमूर्त या आभासी नहीं, बल्कि वास्तविक प्रकाश है, जिसे मनुष्य द्वारा देखा जा सकता है। उस समय के बाद से इस खाली संसार में, जिसमें "पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था," पहली भौतिक चीज़ पैदा हुई। यह चीज़ परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों से आई, और परमेश्वर के अधिकार और कथनों के कारण सभी चीज़ों की सृष्टि के पहले कार्य में दिखाई दी। इसके तुरंत बाद, परमेश्वर ने उजाले और अँधेरे को अलग-अलग-अलग होने की आज्ञा दी...। परमेश्वर के वचनों के कारण हर चीज़ बदल गई और पूर्ण हो गई...। परमेश्वर ने उजाले को "दिन" कहा और अंअँधेरे को उसने "रात" कहा। उस समय, संसार में, जिसे परमेश्वर सृजित करना चाहता था, पहली शाम और पहली सुबह उत्पन्न की गईं, और परमेश्वर ने कहा कि यह पहला दिन है। सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का यह पहला दिन था, और यह सभी चीज़ों की सृष्टि का प्रारंभ था, और यह पहली बार था, जब सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य उसके द्वारा सृजित इस इस संसार में दिखाया गया था।

इन वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर और उसके वचनों के अधिकार, और साथ ही परमेश्वर के सामर्थ्‍य को देखने में सक्षम हुआ। चूँकि केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है; चूँकि परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है। क्या किसी मनुष्य या वस्तु के पास ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य हो सकता है? क्या तुम लोगों के दिल में इसका कोई उत्तर है? परमेश्वर को छोड़, क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास ऐसा अधिकार है? क्या तुम लोगों ने किसी पुस्तक या प्रकाशन में कभी ऐसी चीज़ का उदाहरण देखा है? क्या ऐसा कोई अभिलेख है कि किसी ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? यह किसी अन्य पुस्तक या अभिलेखों में नहीं पाया नहीं जाता; निस्संदेह, ये परमेश्वर द्वारा दुनिया की भव्य सृष्टि के बारे में एकमात्र आधिकारिक और शक्तिशाली वचन हैं, जो बाइबल में दर्ज हैं; ये वचन परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार और पहचान के बारे में बताते हैं। क्या इस तरह के अधिकार और सामर्थ्‍य को वे परमेश्वर की अद्वितीय पहचान का प्रतीक कहा जा सकता है? क्या यह कहा जा सकता है कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर ही धारण करता है? निस्संदेह, सिर्फ परमेश्वर ही ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य धारण करता है! यह अधिकार और सामर्थ्य किसी अन्य सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा धारण या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता! क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? इन वचनों से लोग शीघ्रता और स्पष्टता से इस तथ्य को समझ जाते हैं कि परमेश्वर अद्वितीय अधिकार, अद्वितीय सामर्थ्‍य, सर्वोच्च पहचान और हैसियत धारण करता है। उपर्युक्त बातों की संगति से, क्या तुम लोग कह सकते हो कि वह परमेश्वर, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, अद्वितीय परमेश्वर है?

दूसरे दिन परमेश्वर के अधिकार ने जल का प्रबंध किया और आसमान बनाया तथा मनुष्य के जीवित रहने के लिए जगह बनाई

आओ, हम बाइबल के दूसरे अंश को पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।' तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया" (उत्पत्ति 1:6-7)। कौन-से परिवर्तन हुए, जब परमेश्वर ने कहा "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए"? पवित्र शास्त्रमें कहा गया है : "तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया।" जब परमेश्वर ने ऐसा कहा और किया, तो क्या परिणाम हुआ? इसका उत्तर अंश के आखिरी भाग में हैं : "और वैसा ही हो गया।"

इन दोनों छोटे वाक्यों में एक भव्य घटना दर्ज है, और ये वाक्य एक अद्भुत दृश्य का वर्णन करते हैं—एक जबरदस्त उपक्रम, जिसमें परमेश्वर ने जल को नियंत्रित किया और एक जगह बनाई, जिसमें मनुष्य जीवित रह सके ...

इस तसवीर में, जल और आकाश परमेश्वर की आँखों के सामने तत्क्षण प्रकट होते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा विभाजित हो जाते हैं, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित तरीके से "ऊपर" और "नीचे" के रूप में अलग हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा बनाए गए आकाश ने न केवल नीचे के जल को ढक लिया, बल्कि ऊपर के जल को भी सँभाला...। इसमें मनुष्य कुछ नहीं कर सकता, सिवाय टकटकी लगाकर देखने, भौचक्का होने, और उसके अधिकार की शक्ति और उस दृश्य की भव्यता की तारीफ में ठिठककर रह जाने के, जिसमें सृष्टिकर्ता ने जल को स्थानांतरित किया और उसे आज्ञा दी, और आकाश को बनाया। अपने वचनों और सामर्थ्‍य तथा अधिकार द्वारा परमेश्वर ने एक और महान उपलब्धि हासिल की। क्या यह सृष्टिकर्ता की शक्ति नहीं है? आओ, हम परमेश्वर के कर्मों को स्पष्ट करने के लिए पवित्र शास्त्र का प्रयोग करें : परमेश्वर ने अपने वचन कहे, और परमेश्वर के इन वचनों के कारण जल के मध्य में आकाश बन गया। और उसी समय परमेश्वर के इन वचनों के कारण इस स्थान में एक ज़बरदस्त परिवर्तन हुआ, और यह कोई सामान्य अर्थों में परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक प्रकार का प्रतिस्थापन था, जिसमें कुछ नहीं बदलकर कुछ बन गया। यह सृष्टिकर्ता के विचारों से उत्पन्न हुआ था और सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचनों के कारण कुछ नहीं से कुछ बन गया, और, इतना ही नहीं, इस बिंदु से आगे यह सृष्टिकर्ता की ख़ातिर अस्तित्व में रहेगा और स्थिर बना रहेगा, और सृष्टिकर्ता के विचारों के अनुसार स्थानांतारित, परिवर्तित और नवीकृत होगा। यह अंश संपूर्ण संसार की सृष्टि में सृष्टिकर्ता के दूसरे कार्य का वर्णन करता है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की दूसरी अभिव्यक्ति और सृष्टिकर्ता का एक और अग्रणी उपक्रम था। यह दिन जगत की नींव रखने के सृष्टिकर्ता द्वारा बिताया गया दूसरा दिन था, और यह उसके लिए एक और अद्भुत दिन थाः वह उजाले के बीच में चला, आकाश को लाया, उसने जल का प्रबंध और नियंत्रण किया और उसके कार्य, उसका अधिकार और उसका सामर्थ्‍य एक नए दिन के काम में लग गए ...

क्या परमेश्वर के द्वारा अपने वचन कहे जाने से पहले जल के मध्य में आकाश था? बिलकुल नहीं! और परमेश्वर के यह कहने के बाद क्या हुआ "जल के बीच एक अन्तर हो जाए"? परमेश्वर द्वारा इच्छित चीज़ें प्रकट हो गईं; जल के मध्य में आकाश उत्पन्न हो गया, और जल विभाजित हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने कहा "इस अंतर के कारण जल दो भाग हो जाए।" इस तरह से, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करके, परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के परिणामस्वरूप दो नए पदार्थ, दो नई जन्मी चीज़ें सभी चीज़ों के मध्य प्रकटहो गईं। इन दो नई चीज़ों के प्रकटीकरण से तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता के सामर्थ्‍य की महानता महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता का अद्वितीय और असाधारण बल महसूस करते हो? इस बल और सामर्थ्‍य की महानता परमेश्वर के अधिकार के कारण है, और यह अधिकार स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और स्वयं परमेश्वर की एक अद्वितीय विशेषता है।

क्या यह अंश तुम लोगों को एक बार और परमेश्वर की अद्वितीयता का गहरा बोध कराता है? वास्तव में यह पर्याप्त से बहुत कम है; सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य इससे कहीं परे है। उसकी अद्वितीयता मात्र इसलिए नहीं है, क्योंकि वह किसी अन्य प्राणी से अलग सार धारण करता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसका अधिकार और सामर्थ्‍य असाधारण, असीमित, सर्वोत्कृष्ट है, और इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार और उसके सार स्वरूप जीवन की सृष्टि कर सकता है, चमत्कार कर सकता है, और प्रत्येक भव्य और असाधारण मिनट और सेकंड की सृष्टि कर सकता है। साथ ही वह स्वयं द्वारा सृजित जीवन पर शासन करने में सक्षम है और स्वयं द्वारा सृजित चमत्कारों और हर मिनट और सेकंड पर संप्रभुता रखता है।

तीसरे दिन परमेश्वर के वचनों ने पृथ्वी और समुद्रों की उत्पत्ति की, और परमेश्वर के अधिकार ने संसार को जीवन से लबालब भर दिया

आओ, हम उत्पत्ति 1:9–11 का पहला वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।'" परमेश्वर बस इतना कहने के बाद कि, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।" क्या परिवर्तन हुए? और उजाले और आकाश के अलावा इस जगह पर क्या था? पवित्र शास्त्र में लिखा है : "परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, अब इस जगह में भूमि और समुद्र थे, और भूमि और समुद्र विभाजित हो गए थे। इन नई चीज़ों का प्रकटीकरण परमेश्वर के मुँह से निकली आज्ञा के अनुसरण में हुआ था, "और वैसा ही हो गया।" क्या पवित्र शास्त्र यह वर्णन करता है कि परमेश्वर जब यह सब कर रहा था, तो बहुत व्यस्त था? क्या वह उसके शारीरिक श्रम में संलग्न होने का वर्णन करता है? तो फिर परमेश्वर ने यह कैसे किया गया? परमेश्वर ने इन नई चीज़ों को कैसे उत्पन्न किया? स्वतः स्पष्ट है कि परमेश्वर ने यह सब हासिल करने के लिए, इसकी संपूर्णता सृजित करने के लिए वचनों का प्रयोग किया।

उपर्युक्त तीन अंशों में, हमने तीन बड़ी घटनाओं के घटित होने के बारे में जाना। ये तीन घटनाएँ परमेश्वर के वचनों द्वारा प्रकट हुईं और अस्तित्व में लाई गईं, और उसके वचनों के कारण एक के बाद एक ये घटनाएँ परमेश्वर की आँखों के सामने घटित हो गईं। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि "परमेश्वर कहेगा, और वह पूरा हो जाएगा; वह आज्ञा देगा, और वह बना रहेगा" खोखले वचन नहीं हैं। परमेश्वर के इस सार की पुष्टि तत्क्षण हो जाती है जब वह विचार धारण करता है, और जब परमेश्वर बोलने के लिए अपना मुँह खोलता है, तो उसका सार पूर्णत: प्रतिबिंबित हो जाता है।

आओ, हम इस अंश का अंतिम वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,' और वैसा ही हो गया।" जब परमेश्वर बोल रहा था, तो ये सभी चीज़ें परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके अस्तित्व में आ गईं, और एक क्षण में ही, विभिन्न प्रकार के नाजुक छोटे जीवन-रूप डगमगाते हुए मिट्टी से अपने सिर बाहर निकालने लगे, और अपने शरीर से मिट्टी के कण झाड़ने से पहले ही वे एक-दूसरे का अभिनंदन करने लगे तथा सिर हिला-हिलाकर ससार के प्रति मुस्कराने लगे। उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान किए गए जीवन के लिए उसे धन्यवाद दिया, और संसार के सामने घोषणा की कि वे सभी चीज़ों का अंग हैं और उनमें से प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता के अधिकार को दर्शाने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा। जैसे ही परमेश्वर ने वचन कहे, भूमि हरी-भरी, हो गई, मनुष्य के काम आ सकने वाला समस्त प्रकार के साग-पात अंकुरित हो गए और जमीन फोड़कर निकल आए, और पर्वत और मैदान वृक्षों एवं जंगलों से पूरी तरह से भर गए...। यह बंजर संसार, जिसमें जीवन का कोई निशान नहीं था, तेजी से प्रचुर घास, साग-पात वृक्षों एवं उमड़ती हुई हरियाली से भर गया...। तथा घास की सुगंध और मिट्टी की महक हवा के माध्यम से फैल गई, और पौधों की कतार हवा के चक्र के साथ मिलकर साँस लेने लगी और उनके बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। उसी समय, परमेश्वर के वचनों के कारण और परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके, सभी पौधों ने अपने शाश्वत जीवन-चक्र शुरू कर दिए, जिनमें वे बढ़ते हैं, खिलते हैं, फलते हैं और अपनी वंश-वृद्धि करते हैं। उन्होंने सख्ती से अपने-अपने जीवन-चक्रों का पालन करना शुरू कर दिया और सभी चीज़ों के मध्य अपनी-अपनी भूमिका निभानी प्रारंभ कर दी...। वे सब सृष्टिकर्ता के शब्दों के कारण पैदा हुए थे और जी रहे थे। वे सृष्टिकर्ता की अनंत आपूर्ति और पोषण प्राप्त करेंगे, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाने के लिए हमेशा भूमि के हर कोने में दृढ़ता से जीवित रहेंगे और वे हमेशा सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान की गई जीवन-शक्ति को दर्शाते रहेंगे ...

सृष्टिकर्ता का जीवन असाधारण है, उसके विचार असाधारण हैं, और उसका अधिकार असाधारण है और इसलिए, जब उसके वचन उच्चरित हुए, तो उसका अंतिम परिणाम था "और वैसा ही हो गया।" स्पष्ट रूप से, जब परमेश्वर कार्य करता है, तो उसे अपने हाथों से काम करने की आवश्यकता नहीं होती; वह बस आज्ञा देने के लिए अपने विचारों का और आदेश देने के लिए अपने वचनों का प्रयोग करता है, और इस तरह काम पूरे हो जाते हैं। इस दिन, परमेश्वर ने जल को एक साथ एक जगह पर इकट्ठा किया और सूखी भूमि प्रकट होने दी, जिसके बाद परमेश्वर ने भूमि से घास को उगाया, और बीज उत्पन्न करने वाले पौधे साग-पात और फल देने वाले पेड़ उग गए, और परमेश्वर ने उनकि किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया तथा प्रत्येक को अपने खुद के बीज धारण करने के लिए कहा। यह सब परमेश्वर के विचारों और उसके वचनों की आज्ञा के अनुसार साकार हुआ और इस नए संसार में हर चीज़ एक के बाद एक प्रकट होती गई।

अपना काम शुरू करने से पहले ही परमेश्वर के मस्तिष्क में तस्वीर थी, जिसे वह अपने हासिल करना चाहता था, और जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को हासिल करना शुरू किया, ऐसा तभी हुआ जब परमेश्वर ने इस तसवीर की विषयवस्तु के बारे में बोलने के लिए अपना मुँह खोला था, तो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया। इस पर ध्यान न देते हुए कि परमेश्वर ने इसे कैसे किया या किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, सब-कुछ परमेश्वर की योजना और उसके वचनों की बदौलत क्रमिक रूप से हासिल होता गया परमेश्वर के वचनों और अधिकार की बदौलत स्वर्ग और पृथ्वी में क्रमिक रूप से बदलाव आते गए। इन सभी बदलावों और घटनाओं ने सृष्टिकर्ता के अधिकार और उसकी जीवन-शक्ति की असाधारणता और महानता को दर्शाया। उसके विचार कोई मामूली विचार या खाली तसवीर नहीं हैं, बल्कि जीवन-शक्ति और असाधारण ऊर्जा से भरे हुए अधिकार हैं, वे ऐसे सामर्थ्‍य हैं जो सभी चीज़ों को परिवर्तित कर सकते हैं, पुनर्जीवित कर सकते हैं, फिर से नया बना सकते हैं और नष्ट कर सकते हैं। इसकी वजह से, उसके विचारों के कारण सभी चीज़ें कार्य करती हैं और उसके मुँह से निकले वचनों के कारण, उसी समय हासिल हो जाती हैं ...

सभी चीजों के प्रकट होने से पहले, परमेश्वर के विचारों में एक संपूर्ण योजना बहुत पहले से ही बन चुकी थी, और एक नया संसार बहुत पहले ही आकार ले चुका था। यद्यपि तीसरे दिन भूमि पर हर प्रकार के पौधे प्रकट हुए, किंतु परमेश्वर के पास इस संसार की सृष्टि के चरणों को रोकने का कोई कारण नहीं था; वह लगातार अपने वचनों को बोलने का इरादा रखता था, ताकि वह हर नई चीज़ की सृष्टि करना जारी रख सके सके। वह बोलता गया, अपनी आज्ञाएँ जारी करता गया, और अपने अधिकार का इस्तेमाल करता गया तथा अपना सामर्थ्‍य दिखाता गया, और उसने सभी चीज़ों और मानव-जाति के लिए, जिनके निर्माण का उसका इरादा था, वह सब-कुछ बनाया, जिनका निर्माण करने की उसने योजना बनाई थी ...

चौथे दिन, जब परमेश्वर एक बार फिर से अपने अधिकार का उपयोग करता है तो मानवजाति के लिए मौसम, दिन, और वर्ष अस्तित्व में आते हैं

सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना को पूरा करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया और इस तरह से उसने अपनी योजना के पहले तीन दिन गुज़ारे। इन तीन दिनों के दौरान, परमेश्वर व्यस्त, या खुद को थकाता हुआ दिखाई नहीं दिया; बल्कि इसके विपरीत, उसने अपनी योजना के बेहतरीन तीन पहले दिन गुज़ारे और संसार के विलक्षण रूपान्तरण के महान कार्य को पूरा किया। एक बिलकुल नया संसार उसकी आँखों के सामने प्रकट हुआ और अंश-अंश करके वह ख़ूबसूरत तस्वीर जो उसके विचारों में मुहरबन्द थी, अंततः परमेश्वर के वचनों में प्रगट हो गई। हर नयी चीज़ का प्रकटीकरण एक नवजात बच्चे के जन्म के समान था और सृष्टिकर्ता उस तस्वीर से आनंदित हुआ जो एक समय उसके विचारों में थी लेकिन जिसे अब जीवन्त कर दिया गया था। इस वक्त, उसके दिल को यह देखकर बहुत संतुष्टि मिली, परन्तु उसकी योजना अभी शुरू ही हुई थी। पलक झपकते ही एक नया दिन आ गया था—और सृष्टिकर्ता की योजना में अगला पृष्ठ क्या था? उसने क्या कहा? उसने अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया? उस दौरान इस नए संसार में कौन सी नई चीज़ें आईं? सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए, हमारी निगाहें परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के चौथे दिन पर आ टिकतीं हैं, एक ऐसा दिन जिसमें एक और नई शुरूआत होने वाली थी। सृष्टिकर्ता के लिए यह निःसन्देह एक और बेहतरीन दिन था, और आज की मानवजाति के लिए यह एक और अति महत्वपूर्ण दिन था। यह निश्चय ही एक बहुमूल्य दिन था। वह इतना बेहतरीन कैसे था, वह इतना महत्वपूर्ण कैसे था और वह इतना बहुमूल्य कैसे था? आओ पहले सृष्टिकर्ता के द्वारा बोले गए वचनों को सुनें ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें'" (उत्पत्ति 1:14-15)। सूखी भूमि और उस पर के पौधों की सृष्टि के बाद यह परमेश्वर के अधिकार का एक बार फिर से उपयोग था जो प्राणियों के द्वारा दिखाया गया था। परमेश्वर के लिए ऐसा कार्य उतना ही सरल था जितना कि उसके द्वारा पहले किए गए कार्य थे, क्योंकि परमेश्वर के पास बड़ी सामर्थ्‍य है; परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसके वचन पूरे होंगे। परमेश्वर ने ज्योतियों को आज्ञा दी कि वे आकाश में प्रगट हों, और ये ज्योतियाँ न केवल पृथ्वी के ऊपर आकाश में रोशनी देती थीं, बल्कि दिन और रात और ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए भी चिह्न के रूप में कार्य करती थीं। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, हर एक कार्य जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता था वह परमेश्वर के अभिप्राय और जिस रीति से परमेश्वर ने उन्हें नियुक्त किया था, उसके अनुसार पूरा हो गया।

आकाश में जो ज्योतियाँ हैं, वे आसमान के तत्व हैं जो प्रकाश को बिखेर सकती हैं; वे आकाश, भूमि और समुद्र को प्रकाशमय कर सकती हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार तय की गयी लय एवं तीव्रता में परिक्रमा करती हैं और विभिन्न समयकाल में भूमि पर प्रकाश देती हैं और इस रीति से, ज्योतियों की परिक्रमा के चक्र के कारण भूमि के पूर्व और पश्चिम में दिन और रात होते हैं, वे न केवल दिन और रात के चिह्न हैं, बल्कि ये विभिन्न चक्र मानवजाति के लिए त्योहारों और विशेष दिनों को भी चिन्हित करते हैं। वे चारों ऋतुओं—बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, और शीत ऋतु—की पूर्ण पूरक और सहायक हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा जाता है, जिनके साथ ज्योतियाँ एकरूपता से मानवजाति के लिए चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों के लिए एक निरन्तर और सटीक चिह्न के रूप में कार्य करती हैं। यद्यपि यह केवल कृषि के आगमन के बाद ही हुआ कि मानवजाति ने परमेश्वर द्वारा बनाई गई ज्योतियों द्वारा चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों के विभाजन को देखा और समझा, लेकिन वास्तव में चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों को जिन्हें मनुष्य आज समझता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन से प्रारम्भ हो चुके थे और इसी प्रकार परस्पर बदलने वाले बसंत, ग्रीष्म, शरद, और शीत ऋतु के चक्र भी जिन्हें मनुष्य के द्वारा अनुभव किया जाता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन प्रारम्भ हो चुके थे। परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियों ने मनुष्य को इस योग्य बनाया कि वे लगातार, सटीक ढंग से और साफ-साफ दिन और रात के बीच अन्तर कर सकें, दिनों को गिन सकें, साफ-साफ चन्द्रमा की स्थितियों और वर्षों का हिसाब रख सकें। (पूर्ण चन्द्रमा का दिन एक महीने की समाप्ति को दर्शाता था और इससे मनुष्य जान गया कि ज्योतियों का प्रकाशन एक नए चक्र की शुरूआत करता है; अर्द्ध-चन्द्रमा का दिन आधे महीने की समाप्ति को दर्शाता था, जिसने मनुष्य को यह बताया कि चन्द्रमा की एक नई स्थिति शुरू हो रही है, इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि चन्द्रमा की एक स्थिति में कितने दिन और रात होते हैं और एक ऋतु में चन्द्रमा की कितनी स्थितियाँ होती हैं, एक साल में कितनी ऋतुएँ होती हैं, यह सब कुछ बड़ी नियमितता के साथ प्रदर्शित होता था।) इस प्रकार, मनुष्य ज्योतियों की परिक्रमाओं के चिन्‍हांकन से आसानी से चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों का पता लगा सकता था। यहाँ से, मानवजाति और सभी चीज़ें अनजाने ही दिन-रात के क्रमानुसार परस्पर परिवर्तन और ज्योतियों की परिक्रमाओं से उत्पन्न ऋतुओं के बदलाव के मध्य जीवन बिताने लगे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा चौथे दिन ज्योतियों की सृष्टि का महत्व था। उसी प्रकार, सृष्टिकर्ता के इस कार्य के उद्देश्य और महत्व अभी भी उसके अधिकार और सामर्थ्‍य से अविभाजित थे। इस प्रकार, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियाँ और वह मूल्य जो वे शीघ्र ही मनुष्य तक लाने वाले थे, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल में एक और महानतम कार्य था।

इस नए संसार में, जिसमें मानवजाति अभी तक प्रकट नहीं हुई थी, सृष्टिकर्ता ने साँझ और सवेरे, आकाश, भूमि और समुद्र, घास, सागपात और विभिन्न प्रकार के वृक्षों, और ज्योतियों, ऋतुओं, दिनों, और वर्षों को उस नए जीवन के लिए बनाया जिसका वह शीघ्र सृजन करने वाला था। सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य, हर उस नई चीज़ में प्रगट हुआ जिसे उसने बनाया था और उसके वचन और उपलब्धियाँ लेश-मात्र भी बिना किसी असंगति या अन्तराल के एक साथ घटित हुए। इन सभी नई चीज़ों का प्रकटीकरण और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के प्रमाण थे वह अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो पूर्ण हुआ है वो हमेशा बना रहेगा। यह सच्चाई कभी नहीं बदली है : भूतकाल में भी ऐसा था, वर्तमान में भी ऐसा है और पूरे अनंतकाल के लिए ऐसा ही बना रहेगा। जब तुम लोग पवित्र-शास्त्र के उन वचनों को एक बार फिर देखते हो, तो क्या वे तुम्हें तरोताज़ा दिखाई देते हो? क्या तुम लोगों ने नई विषय-वस्‍तु देखी है और नई नई खोज की है? यह इसलिए है क्योंकि सृष्टिकर्ता के कार्यों ने तुम लोगों के हृदय को द्रवित कर दिया है, और उसके अधिकार और सामर्थ्‍य के बारे में तुम सबके ज्ञान की दिशा का मार्गदर्शन किया है और सृष्टिकर्ता की तुम्हारी समझ के लिए द्वार खोल दिया है और उसके कार्य और अधिकार ने इन वचनों को जीवन दे दिया है। इस प्रकार इन वचनों में मनुष्य ने सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक वास्तविक, सुस्पष्ट प्रकटीकरण देखा और सचमुच में सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता को देखा है, और उसने सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की असाधारणता को देखा है।

सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य चमत्कार पर चमत्कार करते हैं; वह मनुष्य के ध्यान को आकर्षित करता है। मनुष्य उसके अधिकार के उपयोग से पैदा हुए आश्चर्यजनक कर्मों को टकटकी लगाकर देखने के सिवाए कुछ नहीं कर सकता है। उसका असीमित सामर्थ्‍य अत्यंत प्रसन्नता लेकर आता है और मनुष्य भौंचक्का हो जाता है। वह अतिउत्साह से भर जाता है और प्रशंसा में हक्का-बक्का-सा देखता है। वह विस्मयाभिभूत और हर्षित हो जाता है; और इससे अधिक, मनुष्य ज़ाहिर तौर पर द्रवित हो जाता है, और उसमें आदर, सम्मान, और लगाव उत्पन्न होने लग जाते हैं। सृष्टिकर्ता के अधिकार और कर्मों का मनुष्य की आत्मा पर एक बड़ा अपमार्जक प्रभाव होता है और इसके अलावा यह मनुष्य की आत्मा को संतुष्ट कर देता है। परमेश्वर के हर एक विचार, हर एक बोल, उसके अधिकार का हर एक प्रकाशन, सभी चीज़ों में अति उत्तम रचना हैं। यह एक महान कार्य है जो सृजी गई मानवजाति की गहरी समझ और ज्ञान के बहुत ही योग्य है। जब हम सृष्टिकर्ता के वचनों से सृजित किए गए हर एक जीवधारी की गणना करते हैं तो हमारी आत्मा परमेश्वर की सामर्थ्‍य की अद्भुतता की ओर खिंची चली जाती है और हम खुद को सृष्टिकर्ता के कदमों के निशानों के पीछे-पीछे चलते हुए अगले दिन की ओर जाता हुआ पाते हैं : परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का पाँचवा दिन।

आओ, सृष्टिकर्ता के और अधिक कर्मों को देखने के साथ हम एक-एक अंश करके पवित्र शास्त्र को पढ़ना जारी रखें।

पाँचवे दिन, जीवन के विविध और विभिन्न रूप अलग-अलग तरीकों से सृष्टिकर्ता के अधिकार को प्रदर्शित करते हैं

पवित्र-शास्त्र कहता है, "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।' इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:20-21)। पवित्र-शास्त्र साफ-साफ कहता है कि इस दिन, परमेश्वर ने जल के जन्तुओं और आकाश के पक्षियों को बनाया, कहने का तात्पर्य है कि उसने विभिन्न प्रकार की मछलियों और पक्षियों को बनाया और उनकी प्रजाति के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया। इस तरह, परमेश्वर की सृष्टि से पृथ्वी, आकाश और जल समृद्ध हो गए ...

जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे गए, बिलकुल नई ज़िन्दगियाँ, हर एक अलग आकार में, सृष्टिकर्ता के वचनों के मध्य तत्काल जीवित हो गईं। वे इस संसार में अपने स्थान के लिए एक-दूसरे को धकेलते, कूदते और आनंद से खेलते हुए आ गईं...। हर रूप एवं आकार की मछलियाँ जल के एक छोर से दूसरे छोर को तैरने लगीं; और सभी किस्मों की सीपियाँ रेत में उत्पन्न होने लगीं, शल्क वाली, कवचधारी, और बिना रीढ़ वाले जीव-जन्तु, चाहे बड़े हों या छोटे, लम्बे हों या ठिगने, विभिन्न रूपों में जल्दी से विकसित हो गए। विभिन्न प्रकार के समुद्री पौधे शीघ्रता से उगना शुरू हो गए, विविध प्रकार के समुद्री जीवन के बहाव में बहने लगे, लहराते हुए, स्थिर जल को उत्तेजित करते हुए, मानो उनसे कह रहे हों : "नाचो! अपने मित्रों को लेकर आओ! क्योंकि अब तुम लोग कभी अकेले नहीं रहोगे!" उस घड़ी जब परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जीवित प्राणी जल में प्रगट हुए, प्रत्येक नए जीवन ने उस जल में जीवन-शक्ति डाल दी जो इतने लम्बे समय से शांत था और एक नए युग का सूत्रपात किया...। और तब से, वे एक-दूसरे के आस-पास रहते हुए एक-दूसरे का साथ देने लगे और वे आपस में कोई दूरी नहीं रखते थे। जल के भीतर जो भी जीवधारी थे, जल उनका पोषण करने के लिए मौजूद था, और प्रत्येक जीवन, जल और उसके पोषण के कारण अस्तित्व में बना रहा। प्रत्येक जीव, दूसरे को जीवन देता था, और साथ ही, हर एक, उसी रीति से, सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, महानता और सृष्टिकर्ता के अधिकार के सर्वोत्कृष्ट सामर्थ्‍य की गवाही दी ...

अब जबकि समुद्र शांत न रहा, उसी प्रकार जीवन ने आकाश को भरना प्रारम्भ कर दिया। एक के बाद एक, छोटे-बड़े पक्षी, भूमि से आकाश में उड़ने लगे। समुद्र के जीवों से भिन्न, उनके पास पंख और पर थे, जो उनके दुबले और आकर्षक रूप को ढंके हुए थे। वे अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए, गर्व और अभिमान से अपने परों के आकर्षक आवरण को और अपनी विशेष क्रियाओं और कुशलताओं को प्रदर्शित करने लगे जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था। वे स्वतन्त्रता के साथ हवा में लहराने लगे और कुशलता से आकाश और पृथ्वी के बीच, घास के मैदानों और जंगलों के आर-पार यहाँ वहाँ उड़ने लगे...। वे हवा के प्रिय थे, वे हर चीज़ के प्रिय थे। वे जल्द ही स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में एक सेतु बनकर सभी चीज़ों तक संदेश पहुँचाने वाले बनने को थे...। वे गीत गाते, आनंद के साथ यहाँ-वहाँ झपट्टा मारते, उन्होंने कभी ख़ाली पड़े संसार में हर्ष, हँसी व कम्पन पैदा कर दिया...। उन्होंने अपने स्पष्ट एवं मधुर गीतों से और अपने हृदय के भीतर के शब्दों से उस जीवन के लिए सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की जो उसने उन्हें दिया था। उन्होंने सृष्टिकर्ता की पूर्णता और अद्भुतता को प्रदर्शित करने के लिए हर्षोल्लास के साथ नृत्य किया, और वे उस विशेष जीवन के द्वारा जो सृष्टिकर्ता ने उन्हें दिया था, उसके अधिकार की गवाही देने में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर देंगे ...

जीवित प्राणी चाहे जल में थे या आकाश में, सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, जीवित प्राणियों की यह अधिकता जीवन के विभिन्न रूपों में मौजूद थी, और सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, वे अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार इकट्ठे हो गए—और यह व्यवस्था, यह नियम किसी भी जीवधारी के लिए अपरिवर्तनीय था। सृष्टिकर्ता के द्वारा जो भी सीमाएँ बनाई गई थीं, उसके पार जाने की हिम्मत उन्होंने कभी नहीं की और न ही वे ऐसा करने में समर्थ थे। सृष्टिकर्ता के द्वारा आदेश के अनुसार वे जीते और बहुगुणित होते रहे और सृष्टिकर्ता के द्वारा बनाए गए जीवन-क्रम और व्यवस्था का कड़ाई से पालन करते रहे और सजगता से उसकी अनकही आज्ञाओं, स्वर्गीय आदेशों और नियमों में बने रहे जो उसने उन्हें तब से लेकर आज तक दिये थे। वे सृष्टिकर्ता से अपने एक विशेष अन्दाज़ में बात करते थे और सृष्टिकर्ता के अर्थ की प्रशंसा करने लगे और वे उसकी आज्ञा मानते थे। किसी ने कभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया और उनके ऊपर उसकी संप्रभुता और आज्ञाओं का उपयोग उसके विचारों के तहत हुआ था; कोई वचन जारी नहीं किए गए थे, परन्तु सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार ख़ामोशी से सभी चीज़ों का नियन्त्रण करता था जिसमें भाषा की कोई क्रिया नहीं थी और जो मानवजाति से भिन्न था। इस विशेष रीति से उसके अधिकार के इस्तेमाल ने मनुष्य को नया ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया और सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक नई व्याख्या करने को मजबूर किया। यहाँ मैं तुम्हें एक बात बता दूँ कि इस नए दिन में, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल ने एक बार और सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता का प्रदर्शन किया।

आगे, आओ हम पवित्र-शास्त्र के इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोगों को क्या लगता है कि इसका क्या है? इन वचनों में परमेश्वर की भावनाएं निहित हैं। परमेश्वर ने उन सभी चीज़ों को देखा जिन्हें उसने बनाया था जो उसके वचनों के कारण अस्तित्व में आईं और मजबूत बनी रहीं और धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगीं। उस समय, परमेश्वर ने अपने वचनों के द्वारा जो विभिन्न चीज़ें बनाई थीं, और जिन विभिन्न कार्यों को पूरा किया था, क्या वह उनसे सन्तुष्ट था? उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" इससे क्या प्रकट होता है? यह किसका प्रतीक है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने जो योजना बनाई थी और जो निर्देश दिये थे, उन्हें और उन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिएपरमेश्वर के पास सामर्थ्‍य और बुद्धि थी, जिन्हें पूरा करने का उसने मन बनाया था। जब परमेश्वर ने हर एक कार्य को पूरा कर लिया, तो क्या उसे पछतावा हुआ? उत्तर अभी भी यही है "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसने कोई खेद महसूस नहीं किया, बल्कि वह सन्तुष्ट था। इसका मतलब क्या है कि उसे कोई खेद महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसकी सामर्थ्‍य और बुद्धि पूर्ण है, और यह कि सिर्फ उसकी सामर्थ्‍य के द्वारा ही ऐसी पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब मुनष्य कोई कार्य करता है, तो क्या वह परमेश्वर के समान देख सकता है कि सब अच्छा है? क्या हर काम जो मनुष्य करता है वो पूर्णता पा सकता है? क्या मनुष्य किसी काम को एक ही बार में पूरी अनंतता के लिए पूरा कर सकता है? जैसा कि मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं होता, बस बेहतर होता है," ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनुष्य करे और वह पूर्णता को प्राप्त कर ले। परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ उसने बनाया और पूरा किया वह अच्छा है, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई हर वस्तु उसके वचन के द्वारा स्थिर हुई, कहने का तात्पर्य है कि, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तब जो कुछ भी उसने बनाया, उसने एक चिरस्थायी रूप ले लिया, उसकी किस्म के अनुसार उसे वर्गीकृत किया गया, और उसे पूरी अनंतता के लिए एक नियत स्थिति, उद्देश्य, और कार्यप्रणाली दी गई। इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं के बीच उनकी भूमिका, और वह यात्रा जिनसे उन्हें परमेश्वर की सभी वस्तुओं के प्रबन्धन के दौरान गुज़रना था, उन्हें परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियुक्त कर दिया गया था और वे अपरिवर्तनीय थे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी वस्तुओं को दिया गया स्वर्गीय नियम था।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," ये सरल, कम समझे गए वचन, जिनकी कई बार उपेक्षा की जाती है, ये स्वर्गीय नियम और स्वर्गीय आदेश हैं जिन्हें सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप है, जो अधिक व्यावहारिक और अधिक गंभीर है। अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, वह उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ व्यवस्थित और नियमित था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा बढ़ती, अस्तित्व में रहती और नष्ट होती थीं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रहती थींऔर कोई भी वस्तु इससे छूटी नहीं थी! यह व्यवस्था बिलकुल उसी घड़ी शुरू हो गई थी जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और वह बना रहेगा और जारी रहेगा और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के लिए उस दिन तक कार्य करता रहेगा जब तक वह सृष्टिकर्ता के द्वारा रद्द न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सब वस्तुओं को बनाने और सब वस्तुओं को अस्तित्व में आने की आज्ञा देने की काबिलियत में प्रकट हुआ, बल्कि सब वस्तुओं पर शासन करने और सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखने और सब वस्तुओं में चेतना और जीवन देने और इसके अतिरिक्त, उन सब वस्तुओं को जिन्हें वो अपनी योजना में सृजित करेगा, उन्हें पूरी अनंतता के लिए उसके द्वारा बनाए गए संसार में एक उत्तम आकार, उत्तम संरचना, उत्तम भूमिका में प्रकट और मौजूद होने के लिए बनाने की उसकी योग्यता में भी प्रकट हुआ था। यह इस बात से प्रकट हुआ कि सृष्टिकर्ता के विचार किसी विवशता के अधीन नहीं थे और समय, अंतरिक्ष और भूगोल के द्वारा सीमित नहीं थे। उसके अधिकार के समान, सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान सदा-सर्वदा तक अपरिवर्तनीय बनी रहेगी। उसका अधिकार सर्वदा उसकी अद्वितीय पहचान का एक निरूपण और प्रतीक बना रहेगा और उसका अधिकार हमेशा उसकी पहचान के साथ-साथ बना रहेगा!

छठे दिन, सृष्टिकर्ता ने बोला और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक प्रगट होने लगे

अलक्षित रूप से, सब वस्तुओं को बनाने का सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठे दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शुरूआत थी तथा एक और असाधारण दिन था। इस नए दिन की शाम को सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को वह उत्पन्न करेगा, उनकी सृष्टि करेगा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की वाणी है ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,' और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इन में कौन-कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्र-शास्त्र कहता हैः मवेशी और रेंगने वाले जन्तु और पृथ्वी के जाति-जाति के जंगली पशु। कहने का तात्पर्य है कि उस दिन वहाँ पृथ्वी के सब प्रकार के जीवित प्राणी ही नहीं थे, बल्कि उन सभी को प्रजाति के अनुसार वर्गीकृत किया गया था और उसी प्रकार, "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों की तरह, उसी सुर में, सृष्टिकर्ता ने अपने इच्छित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया और हर एक अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हुआ। जब सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो उसके कोई भी वचन व्यर्थ में नहीं बोले जाते और इस प्रकार, छ्ठे दिन हर जीवित प्राणी, जिसको उसने बनाने की इच्छा की थी, नियत समय पर प्रकट हो गया। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा "पृथ्वी से एक-एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरन्त जीवन से भर गई और पृथ्वी के ऊपर अचानक ही हर प्रकार के प्राणियों की श्वास प्रकट हुई...। हरे-भरे घास के जंगली मैदानों में, हृष्ट-पुष्ट गाएँ अपनी पूंछों को इधर-उधर हिलाते हुए, एक के बाद एक प्रगट होने लगीं, मिमियाती हुई भेड़ें झुण्डों में इकट्ठी होने लगीं, और हिनहिनाते हुए घोड़े सरपट दौड़ने लगे...। एक पल में ही, शांत घास के मैदानों की विशालता में जीवन का विस्फोट हुआ...। निश्चल घास के मैदान पर पशुओं के इन विभिन्न झुण्डों का प्रकटीकरण एक सुन्दर दृश्य था जो अपने साथ असीमित जीवन शक्ति लेकर आया था...। वे घास के मैदानों के साथी और स्वामी होंगे और प्रत्येक दूसरे पर निर्भर होगा; वे इन घास के मैदानों के संरक्षक और रखवाले भी होंगे, जो उनका स्थायी निवास होगा, जो उन्हें उनकी सारी ज़रूरतों को प्रदान करेगा और उनके अस्तित्व के लिए अनंत पोषण का स्रोत होगा ...

उसी दिन जब ये विभिन्न मवेशी सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा अस्तित्व में आए थे, ढेर सारे कीड़े-मकौड़े भी एक के बाद एक प्रगट हुए। भले ही वे सभी जीवधारियों में सबसे छोटे थे, परन्तु उनकी जीवन-शक्ति सृष्टिकर्ता की अद्भुत सृष्टि थी और वे बहुत देरी से नहीं आए थे...। कुछ ने अपने पंखों को फड़फड़ाते थे, जबकि कुछ अन्य धीरे-धीरे रेंगते थे; कुछ उछलते और कूदते थे और कुछ अन्य लड़खड़ाते थे, कुछ आगे बढ़ गए, जबकि अन्य जल्दी से पीछे लौट गए; कुछ दूसरी ओर चले गए, कुछ अन्य ऊँची-नीची छलांग लगाने लगे...। वे सभी अपने लिए घर ढूँढ़ने के प्रयास में व्यस्त हो गए : कुछ ने घास में घुसकर अपना रास्ता बनाया, कुछ ने भूमि खोदकर छेद बनाना शुरू कर दिया, कुछ उड़कर पेड़ों पर चढ़ गए और जंगल में छिप गए...। यद्यपि वे आकार में छोटे थे, परन्तु वे खाली पेट की तकलीफ को सहना नहीं चाहते थे और अपने घरों को बनाने के बाद, वे अपना पोषण करने के लिए भोजन की तलाश में दौड़ पड़े। कुछ घास के कोमल तिनकों को खाने के लिए उस पर चढ़ गए, कुछ ने धूल से अपना मुँह भर लिया और अपना पेट भरा और स्वाद और आनंद के साथ खाने लगे (उनके लिए, धूल भी एक स्वादिष्ट भोजन है); कुछ जंगल में छिप गए, परन्तु आराम करने के लिए नहीं रूके, क्योंकि चमकीले गहरे हरे पत्तों के भीतर के रस ने उनके लिये रसीला भोजन प्रदान किया...। सन्तुष्ट होने के बाद भी कीड़े-मकौड़ों ने अपनी गतिविधियों को नहीं रोका, भले ही वे आकार में छोटे थे, फिर भी वे भरपूर ऊर्जा और असीमित उत्साह से भरे हुए थे और उसी प्रकार सभी जीवधारियों में, वे सबसे अधिक सक्रिय और सबसे अधिक परिश्रमी होते हैं। वे कभी आलसी न हुए और न कभी आराम से पड़े रहे। एक बार संतृप्त होने के बाद, उन्होंने फिर से अपने भविष्य के लिए परिश्रम करना प्रारम्भ कर दिया, अपने आने वाले कल के लिए अपने आपको व्यस्त रखा और जीवित बने रहने के लिए भाग-दौड़ करते रहे...। उन्होंने मधुरता से विभिन्न प्रकार की धुनों और सुरों को गुनगुनाकर अपने आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घास, वृक्षों और ज़मीन के हर इन्च में आनंद का समावेश किया और हर दिन और हर वर्ष को अद्वितीय बना दिया...। अपनी भाषा और अपने तरीकों से, उन्होंने भूमि के सभी प्राणियों तक जानकारी पहुँचायी। और अपने विशेष जीवन पथक्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने सब वस्तुओं को जिनके ऊपर उन्होंने निशान छोड़े थे, चिन्हित किया...। उनका मिट्टी, घास और जंगलों के साथ घनिष्ठ संबंध था और वे मिट्टी, घास और वनों में शक्ति और जीवन चेतना लेकर आए, उन्होंने सभी प्राणियों तक सृष्टिकर्ता का प्रोत्साहन और अभिनंदन पहुँचाया ...

सृष्टिकर्ता की निगाहें उन सब वस्तुओं पर पड़ीं जिन्हें उसने बनाया था और इस पल उसकी निगाहें जंगलों और पर्वतों पर आकर ठहर गईं और उसका मस्तिष्क में कई विचार घूम रहे थे। जैसे ही उसके वचन बोले गए, घने जंगलों में और पहाड़ों के ऊपर, इस प्रकार के पशु प्रकट हुए जो पहले कभी नहीं आए थे : वे "जंगली जानवर" थे जो परमेश्वर के वचन के द्वारा बोले गए थे। लम्बे समय से प्रतीक्षारत, उन्होंने अपने अनोखे चेहरों के साथ अपने-अपने सिरों को हिलाया और हर एक ने अपनी-अपनी पूँछ को लहराया। कुछ के पास रोंएदार लबादे थे, कुछ कवचधारी थे, कुछ के खुले हुए ज़हरीले दाँत थे, कुछ के पास घातक मुस्कान थी, कुछ लम्बी गर्दन वाले थे, कुछ के पास छोटी पूँछ थी, कुछ के पास ख़तरनाक आँखें थीं, कुछ डर के साथ देखते थे, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के मुँह में ख़ून लगा हुआ था, कुछ दो पाँव से उछलते थे, कुछ चार खुरों से धीरे-धीरे चलते थे, कुछ पेड़ों के ऊपर लटके दूर तक देखते थे, कुछ जंगलों में इन्तज़ार में लेटे हुए थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाओं की खोज में थे, कुछ मैदानों में दौड़ते और उछलते थे, कुछ शिकार के लिए जंगलों में गश्त लगा रहे थे...; कुछ गरज रहे थे, कुछ हुँकार भर रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ रो रहे थे...; कुछ ऊँचे सुर, कुछ नीचे सुर वाले, कुछ खुले गले वाले, कुछ साफ-साफ और मधुर स्वर वाले थे...; कुछ भयानक थे, कुछ सुन्दर थे, कुछ बड़े अजीब से थे और कुछ प्यारे-से थे, कुछ डरावने थे, कुछ बहुत ही आकर्षक भोले-भाले थे...। सब एक-एक कर आने लगे। देखो कि वे गर्व से कितने फूले हुए थे, उन्मुक्त-जीव थे, एक-दूसरे से बिलकुल उदासीन थे, एक-दूसरे को एक झलक देखने की भी परवाह नहीं करते थे...। सभी उस विशेष जीवन को जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और अपने जंगलीपन और क्रूरता को धारण किए हुए, जंगलों में और पहाड़ियों के ऊपर प्रकट हो गए। सबसे घृणित, पूरी तरह ढीठ—किसने उन्हें पहाड़ियों और जंगलों का सच्चा स्वामी बना दिया था? उस घड़ी से जब से सृष्टिकर्ता ने उनके प्रकटन को स्वीकृति दी थी, उन्होंने जंगलों और पहाड़ों पर "दावा किया," क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले से ही उनकी सीमाओं को कस दिया था और उनके अस्तित्व के दायरे को निश्चित कर दिया था। केवल वे ही जंगलों और पहाड़ों के सच्चे स्वामी थे, इसलिए वे इतने प्रचण्ड और ढीठ थे। उन्हें "जंगली जानवर" सिर्फ इसीलिए कहा जाता था क्योंकि, सभी प्राणियों में वे ही थे जो वास्तव में इतने जंगली, क्रूर और वश में न आने वाले थे। उन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता था, इस प्रकार उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था और वे मानवजाति के साथ एकता से नहीं रह सकते थे या मानवजाति के लिए परिश्रम नहीं कर सकते थे। चूँकि उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था, और वे मानवजाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था। मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे। चूँकि उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे इसलिए बदले में, वे उन ज़िम्मेदारियों को निभा सकते थे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दी गई थी : पर्वतों और जंगलों की सुरक्षा करना। उनके जंगलीपन ने पर्वतों की सुरक्षा की और जंगलों की हिफाज़त की और उनका वही स्वभाव उनके अस्तित्व और बढ़ोत्तरी के लिए सबसे बेहतरीन सुरक्षा और आश्वासन था। साथ ही, उनके जंगलीपन ने सब वस्तुओं के मध्य सन्तुलन को कायम रखा और सुनिश्चित किया। उनका आगमन पर्वतों और जंगलों के लिए सहयोग और मजबूत सहारा लेकर आया; उनके आगमन ने शांत तथा रिक्त पर्वतों और जंगलों में शक्ति और जीवन चेतना का संचार किया। उसके बाद से, पर्वत और जंगल उनके स्थायी निवास बन गए, और वे अपने घरों से कभी वंचित नहीं रहेंगे, क्योंकि पर्वत और पहाड़ उनके लिए प्रकट हुए और अस्तित्व में आए थे; जंगली जानवर अपने कर्तव्य को पूरा करेंगे और उनकी हिफाज़त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। साथ ही, जंगली जानवर सृष्टिकर्ता के प्रोत्साहन के साथ दृढ़ता से रहेंगे ताकि अपने सीमा क्षेत्र को थामे रह सकें और सृष्टिकर्ता के द्वारा स्थापित की गयी सब वस्तुओं के सन्तुलन को कायम रखने के लिए अपने जंगली स्वभाव का निरन्तर उपयोग कर सकें और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को प्रकट कर सकें!

सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन, सभी चीज़ें पूर्ण हैं

परमेश्वर के द्वारा सचल और अचल समेत सब वस्तुओं की सृष्टि की गई, जैसे पक्षी और मछलियाँ, जैसे वृक्ष और फूल, जिसमें मवेशी, कीड़े-मकौड़े, और छठे दिन बनाए गए जंगली जानवर भी शामिल थे—वे सभी परमेश्वर की निगाह में अच्छे थे और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की निगाहों में ये वस्तुएँ उसकी योजना के अनुरूप, पूर्णता के शिखर को प्राप्त कर चुकी थीं और एक ऐसे स्तर तक पहुँच गई थीं जहाँ परमेश्वर उन्हें पहुँचाना चाहता था। कदम-दर-कदम, सृष्टिकर्ता ने उन कार्यों को किया जो वह अपनी योजना के अनुसार करने का इरादा रखता था। जिन चीज़ों की वह रचना करना चाहता था, वे एक-के-बाद-एक प्रकट होती गईं और प्रत्येक का प्रकटीकरण सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रतिबिम्ब था और उसके अधिकार का ठोस रूप था, इन ठोस रूपों के कारण, सभी जीवधारी सृष्टिकर्ता के अनुग्रह और प्रावधान के प्रति नत-मस्तक थे। जैसे ही परमेश्वर के चमत्कारी कर्मों ने अपने आपको प्रकट किया, यह संसार परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सब वस्तुओं से, अंश-अंश करके फैल गया और सब अव्यवस्था और अँधकार से स्पष्टता और उजाले में बदल गया, मृत्युपरक स्थिरता से जीवन्त और असीमित जीवन चेतना में बदल गया। सृष्टि की सब वस्तुओं के मध्य, बड़े से लेकर छोटे तक और छोटे से लेकर सूक्ष्म तक, ऐसा कोई भी नहीं था जो सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के द्वारा सृजित किया नहीं गया था और हर एक जीवधारी के अस्तित्व की एक अद्वितीय और अंतर्निहित आवश्यकता और मूल्य था। उनके आकार और ढांचे के अन्तर के बावजूद, उन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा ही बनाया जाना था ताकि सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन अस्तित्व में बने रहें। कई बार लोग किसी बड़े बदसूरत कीड़े को देखकर कहते हैं, "यह कीड़ा बहुत ही भद्दा है, ऐसा हो ही नहीं सकता कि ऐसे कुरूप जीव को परमेश्वर बना सकता है—ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह इतनी भद्दी चीज़ को बनाए।" कितना मूर्ख़तापूर्ण नज़रिया है यह! इसके बजाय उन्हें यह कहना चाहिए, "भले ही यह कीड़ा इतना भद्दा है, उसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और इस लिए उसके पास उसका अपना अनोखा उद्देश्य ज़रूर होगा।" परमेश्वर के विचारों में, विभिन्न जीवित प्राणी जिन्हें उसने बनाया है, वह उन्हें हर प्रकार का और हर तरह का रूप और हर प्रकार की कार्य प्रणालियाँ और उपयोगिताएँ देना चाहता था और इस प्रकार परमेश्वर के द्वारा बनाई गई किसी भी वस्तु को एक ही साँचे में नहीं ढाला गया है। उनकी बाहरी संरचना से लेकर भीतरी संरचना तक, उनके जीने की आदतों से लेकर उनके निवास तक—हर एक चीज़ अलग है। गायों के पास गायों का रूप है, गधों के पास गधों का रूप है, हिरनों के पास हिरनों का रूप है, हाथियों के पास हाथियों का रूप है। क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अच्छा दिखता है और कौन सबसे भद्दा दिखता है? क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अधिक उपयोगी है और किसकी अस्तित्व की आवश्यकता सबसे कम है? कुछ लोगों को हाथियों का रूप अच्छा लगता है, परन्तु कोई भी खेती के लिए हाथियों का इस्तेमाल नहीं करता है; कुछ लोग शेरों और बाघों के रूप को पसंद करते हैं, क्योंकि उनका रूप सब जीवों में सबसे अधिक प्रभावकारी है, परन्तु क्या तुम उन्हें पालतू जानवर की तरह रख सकते हो? संक्षेप में, जब तमाम जीवों की बात आती है, तो मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार को स्वीकार कर लेना चाहिये, अर्थात्, सब जीवों के लिए सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किए गए क्रम को मान लेना चाहिये; यह सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है। सृष्टिकर्ता के मूल अभिप्रायों को खोजने और उसके प्रति आज्ञाकारी होने का रवैया ही सृष्टिकर्ता के अधिकार की सच्ची स्वीकार्यता और निश्चितता है। यह परमेश्वर की निगाह में अच्छा है तो मनुष्य के पास दोष ढूँढ़ने का कौन-सा कारण है?

अतः, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन सब वस्तुओं को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के लिए सुर में सुर मिलाकर गाना है और उसके नए दिन के कार्य के लिए एक बेहतरीन भूमिका की शुरूआत करनी है और इस समय सृष्टिकर्ता भी अपने प्रबन्ध के कार्य में एक नया पृष्ठ खोलेगा! सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त बसंत ऋतु के अँकुरों, ग्रीष्म ऋतु में परिपक्वता, शरद ऋतु में कटनी, और शीत ऋतु में भण्डारण की व्यवस्था के अनुसार, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता की प्रबंधकीय योजना के साथ प्रतिध्वनित होंगी और वे अपने नए दिन, नई शुरूआत और नए जीवन पथक्रम का स्वागत करेंगी और वे सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन हर दिन का अभिनन्दन करने के लिए कभी न खत्म होने वाले अनुक्रम के अनुसार जीवित रहेंगी और प्रजनन करेंगी ...

कोई भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान नहीं ले सकता है

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ्‍य प्रकट और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। चाहे उसने जिस भी रीति से उनका सृजन किया, जिस कारण से भी उनका सृजन किया, परमेश्वर के वचनों के कारण ही सभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और मजबूत बनी रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रकट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के वास्ते सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल किया और मानवजाति के लिए जीने का उपयुक्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय विधियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही उसका श्वास प्राप्त करने वाली थी। अर्थात, मानवजाति की सृष्टि से पहले के समय में, मानवजाति से भिन्न सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ, ऐसी वस्तुओं में प्रकट हुआ जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही विशाल थीं और छोटे से छोटे पशु-पक्षियों में, हर प्रकार के कीड़े-मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में प्रकट हुआ, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे, जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक की वंशवृद्धि सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण हुई और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताता था। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे अपने अलग-अलग रूपों और संरचना के द्वारा उस जीवन व चेतना को दर्शाते थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने उस जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल अचल पदार्थ प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, प्रजनन करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान भी दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने के नियमों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँ जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिये गए हैं। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपका नहीं रहता है और किसी आकार में सीमित नहीं होता; वह विश्व के परिचालन को नियंत्रित करने और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखने में समर्थ है और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली-भाँति सँभाल सकता है जिससे वे उसकी सेवा करें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके भीतर की सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है और इसके अलावा, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है; यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या बिगाड़ानहीं जा सकता है और न ही उसमें किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान की जगह नहीं ले सकता और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; यह किसी गैर-सृजित प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ्‍य नहीं है और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य क्यों नहीं है उसका कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, भले ही हालाँकिपरमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यद्यपि वे कुछ सामर्थ्‍य धारण किए हुए हैं जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने और सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता की जगह कोई गैर-सृजित प्राणी नहीं ले सकता है और उसी प्रकार कोई गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान नहीं ले सकता। क्या तुमने बाइबल में, परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था और इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं और इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है और उनका सम्राट भी। उन में से हर एक के बीच—चाहे वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ्‍य के हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान ले सके। उन्‍हें कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलने वाले सत्‍य और तथ्य हैं!

उपरोक्त सहभागिता के जरिए, क्या हम दृढ़तापूर्वक निम्नलिखित बातों को कह सकते हैं : केवल सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता और शासक, वह जिसके पास अद्वितीय अधिकार और अद्वितीय सामर्थ्‍य है, क्या उसे स्वयं अद्वितीय परमेश्वर कहा जा सकता है? इस समय, शायद तुम लोग महसूस करो कि ऐसा प्रश्न बहुत ही गंभीर है। तुम लोग, कुछ पल के लिए, उसे समझने में असमर्थ हो और उसके भीतर के सार-तत्व को नहीं समझ सकते और इसलिए इस पल तुम लोगों को लगेगा कि उसका उत्तर देना कठिन है। ऐसी स्थिति में, मैं अपनी सहभागिता को जारी रखूँगा। आगे, मैं चाहूँगा कि तुम लोग उस सामर्थ्‍य और अधिकार के बहुत-से पहलुओं के वास्तविक कर्मों को देखो जो केवल परमेश्वर के पास है और इस प्रकार मैं तुम लोगों को सचमुच परमेश्वर की अद्वितीयता को समझने, प्रशंसा करने और परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार के अर्थ को जानने दूँगा।

2. परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

सभी चीज़ों को बनाने के पश्चात्, सृष्टिकर्ता का अधिकार एक बार फिर इंद्रधनुष की वाचा में दिखाया और पुष्ट किया जाता है

सृष्टिकर्ता का अधिकार हमेशा सभी जीवधारियों पर प्रकट और इस्तेमाल किया जाता है और वह न केवल सब वस्तुओं की नियति पर शासन करता है, बल्कि मनुष्य पर भी शासन करता है, एक विशेष जीवधारी जिसे उसने स्वयं अपने हाथों से बनाया है और जिसकी एक अलग जीवन संरचना है और जो जीवन के एक अलग रूप में अस्तित्व में बना हुआ है। सब वस्तुओं को बनाने के बाद, सृष्टिकर्ता अपने अधिकार और सामर्थ्‍य को प्रकट करने से नहीं रूका; उसके लिए, वह अधिकार जिस के तहत वह सभी चीज़ों पर और सम्पूर्ण मानवजाति की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता था, वह केवल तब औपचारिक रूप से शुरू हुआ जब मानवजाति ने सच में उसके हाथों से जन्म लिया। वह मानवजाति का प्रबन्ध और उन पर शासन करना चाहता था; वह मानवजाति को बचाना चाहता था, मानवजाति को सचमुच में पाना चाहता था, वह ऐसी मानवजाति को पाना चाहता था जो सभी चीज़ों का संचालन कर सके; उसका इरादा ऐसी मानवजाति को अपने अधिकार की अधीनता में रखने का था, उनसे अपने अधिकार को जानने और उसका पालन करवाने का था। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल करके अपने अधिकार को मनुष्य के बीच में अधिकारिक रूप से प्रकट करना प्रारम्भ किया और अपने वचनों को साकार करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ किया। बेशक, इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर का अधिकार सभी स्थानों में दिखाई देने लगा; मैंने बस कुछ विशेष, जाने-माने उदाहरणों को लिया है जिससे तुम सब परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अद्वितीय अधिकार को समझ और जान सको।

उत्पत्ति 9:11-13 के अंश और परमेश्वर द्वारा संसार की सृष्टि के लेखे-जोखे से संबंधित उपर्युक्त अंश में एक समानता है, लेकिन उनमें एक अन्तर भी है। समानता क्या है? समानता परमेश्वर के द्वारा वचनों के इस्तेमाल में निहित है ताकि वह उन कामों को कर सके जिसकी उसने इच्छा की थी और अन्तर यह है कि जिनअंशों को यहाँ उद्धृत किया गया है, वे मनुष्य के साथ परमेश्वर के वार्तालाप को दर्शाते हैं, जिसमें वह मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधता है और मनुष्य को उस बारे में बताता है जो वाचा में समाहित है। मनुष्य के साथ हुए उसके संवाद के दौरान परमेश्वर के अधिकार का उपयोग किया गया, कहने का तात्पर्य है कि मानवजाति की सृष्टि से पहले, परमेश्वर का वचन निर्देश और आदेश थे, जिन्हें उन जीवधारियों के लिए जारी किया गया था जिन्हें वह बनाना चाहता था। परन्तु अब यहाँ कोई परमेश्वर के वचनों को सुनने वाला था और इस प्रकार उसके वचन मनुष्यों के साथ एक संवाद थे और साथ ही मनुष्य के लिए एक प्रोत्साहन एवं चेतावनी भी थे। इसके अतिरिक्त परमेश्वर के वचन सभी चीज़ों को सौंपी गई वो आज्ञाएँ थीं जो उसका अधिकार वहाँ किए हुए थीं।

इस अंश में परमेश्वर की कौन-सी गतिविधि दर्ज है? इसमें वह वाचा दर्ज है जिसे परमेश्वर ने जल प्रलय से संसार के विनाश के बाद मनुष्य के साथ बाँधा था; यह वाचा मनुष्य को बताती है कि परमेश्वर ऐसी तबाही को फिर से संसार पर नहीं लाएगा औरइस कारण, परमेश्वर ने इसके लिए एक चिह्न ठहराया। यह चिह्न क्या था? पवित्र-शास्त्र में कहा गया है कि "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यजाति को बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने इन वचनों को कहा, एक इंद्रधनुष मनुष्य की आँखों के सामने प्रकट हो गया, जहाँ वो आज तक मौजूद है। हर किसी ने ऐसे इंद्रधनुष को देखा है और जब तुम उसे देखते हो तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसे प्रकट होता है? विज्ञान इसे साबित करने में या उसके स्रोत को ढूँढ़ने में या उसके उद्गम स्थान को पहचानने में नाकाम है। क्योंकि इंद्रधनुष उस वाचा का चिह्न है जो सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच में बांधी गयी थी; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, यह मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया गया था, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। अपने वचनों को कहने के बाद यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता है। अपनी प्रतिज्ञा और मनुष्य के साथ अपनी वाचा में बने रहने के लिए सृष्टिकर्ता ने अपनी विशिष्ट विधि का उपयोग किया और इस प्रकार उसने जो वाचा स्थापित की थी उसके चिह्न के रूप में उसके द्वारा इंद्रधनुष का उपयोग, एक स्वर्गीय आदेश और व्यवस्था है जो हमेशा अपरिवर्तनीय बना रहेगा, भले ही वह सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानवजाति के संबंध में। ये कहना ही होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था, सभी चीज़ों की सृष्टि के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और सच्चा प्रकटीकरण है और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य असीमित हैं; उसके द्वारा इंद्रधनुष को एक चिह्न के रूप में इस्तेमाल करना सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता और विस्तार है। अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए यह परमेश्वर द्वारा किया गया एक और कार्य था और अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जो वाचा बाँधी थी, उसका एक चिह्न था। उसने मनुष्य को बताया कि उसने क्या करने का संकल्प लिया है और वह किस रीति से पूर्ण और प्राप्त किया जाएगा। इस तरह से परमेश्वर के मुख के वचनों से वह विषय पूरा हो गया। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ्‍य है और आज उसके द्वारा इन वचनों के बोले जाने के कई हज़ार साल बाद भी मनुष्य परमेश्वर के मुख से बोले गए इंद्रधनुष को देख सकता है। परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के कारण, इंद्रधनुष बिना किसी बदलाव और परिवर्तन के आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बना हुआ है। इस इंद्रधनुष को कोई भी हटा नहीं सकता है, कोई भी इसके नियमों को बदल नहीं सकता है। यह सिर्फ परमेश्वर के वचनों के कारण ही अस्तित्व में बना हुआ है। बिलकुल सही अर्थ में यह परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो कुछ वो पूरा करेगा वह सर्वदा बना रहेगा।" ऐसे वचन यहाँ पर साफ-साफ अभिव्यक्त किए गए हैं और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्पष्ट चिह्न और गुण हैं। ऐसा चिह्न या गुण सृजित किए गए प्राणियों में से किसी के भी पास नहीं है और न ही उनमें देखे जाते हैं और न ही इसे गैर-सृजित प्राणियों में से किसी के भी पास देखा जाता है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर का है और मात्र सृष्टिकर्ता के द्वारा धारण की गई पहचान और सार को अन्य जीवधारियों से पृथक करता है। साथ ही, यह ऐसा चिह्न और गुण भी है जिससे श्रेष्ठ स्वयं परमेश्वर को छोड़, कोई भी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी नहीं हो सकताचिह्न।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के साथ वाचा बाँधना एक अति महत्वपूर्ण कार्य था। एक ऐसा कार्य था जिसका उपयोग वह मनुष्य तक एक सच पहुँचाने और मनुष्य को अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था। इस कारण उसने एक अद्वितीय विधि का इस्तेमाल करते हुए, मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए एक विशिष्ट चिह्न का उपयोग किया, जो मनुष्य के साथ बांधी गयी वाचा का एक चिह्न था। अतः क्या इस वाचा का ठहराया जाना एक बड़ी घटना थी? वह घटना आखिर कितनी बड़ी थी? यही वह बात है जो इस वाचा को विशेष बनाती है : यह एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच या एक समूह और दूसरे समूह के बीच या एक देश और दूसरे देश के बीच ठहराई गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण मानवजाति के बीच ठहराई गई वाचा है और यह तब तक प्रमाणित बनी रहेगी जब तक सृष्टिकर्ता सब वस्तुओं का उन्मूलन न कर दे। इस वाचा का प्रतिपादन करने वाला सृष्टिकर्ता है और इसको बनाए रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानवजाति के साथ ठहराई गई इंद्रधनुष की वाचा की सम्पूर्णता, सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य हुए संवाद के अनुसार पूर्ण और प्राप्त हुई थी और आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में वैसी ही बनी हुई है। सृजित जीवधारी समर्पण करने, आज्ञा मानने, विश्वास करने, प्रशंसा करने, गवाही देने और सृष्टिकर्ता के अधिकार की स्तुति करने के सिवा और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और के पास ऐसी वाचा को ठहराने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का प्रकटीकरण बार-बार, मानवजाति के लिए घोषणा करता है और उसके ध्यान को सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य बांधी गयी वाचा की ओर खींचता है। सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य ठहराई गयी वाचा के निरन्तर प्रकटीकरण में, मनुष्य को, इंद्रधनुष या वाचा नहीं दिखलाए जाते, वरन सृष्टिकर्ता के अपरिर्वतनशील अधिकार को दिखाया जाता है। बार-बार इंद्रधनुष का प्रकटीकरण छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के ज़बर्दस्त और अद्भुत कर्मों को दर्शाता है और साथ ही यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का अतिआवश्यक प्रतिबिम्ब है जो कभी धूमिल नहीं होगा, कभी नहीं बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक और पहलू का प्रकटीकरण नहीं है?

3. परमेश्वर की आशीषें

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

सृष्टिकर्ता के कथनों का अद्वितीय अंदाज़ और लहज़ा सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार और पहचान का एक प्रतीक हैं

बहुत से लोग परमेश्वर की आशीषों को खोजना और पाना चाहते हैं, परन्तु हर कोई इन आशीषों को प्राप्त नहीं कर सकता है, क्योंकि परमेश्वर के अपने ही सिद्धांत हैं, और वह अपने ही तरीके से मनुष्यों को आशीष देता है। वे प्रतिज्ञाएँ जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और जितना अनुग्रह वह मनुष्य को देता है, वे मनुष्यों के विचारों और कार्यों के आधार पर बाँटे जाते हैं। इस प्रकार, परमेश्वर की आशीषों के द्वारा क्या प्रदर्शित होता है? लोग उनमें क्या देख सकते हैं? इस बिन्दु पर, हम इस वाद-विवाद को दरकिनार करें कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है या मनुष्यों को आशीष देने के लिए परमेश्वर के सिद्धांत क्या हैं। उसके बजाए, आओहम परमेश्वर के अधिकार को जानने के उद्देश्य के साथ और परमेश्वर के अधिकार को जानने के दृष्टिकोण से मनुष्य को परमेश्वर द्वारा दी गयी आशीष पर नज़र डालें।

बाइबल के ऊपर दिए गए सभी चार अंश मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा दी गयी आशीष का अभिलेख हैं। वे परमेश्वर कीआशीष पाने वालों, जैसे अब्राहम और अय्यूब का विस्तृत विवरण देते हैं। साथ ही साथ, उन कारणों का भी विवरण देते हैं कि परमेश्वर ने क्यों अपनी आशीषों को बरसाया और इन आशीषों में क्या निहित था। परमेश्वर के कथनों का अंदाज़ और ढंग और वह दृष्टिकोण और स्थिति जिसके तहत उसने वचन बोले, लोगों को यह समझने देता है कि आशीषों को देने वाला और ऐसी आशीषों को पाने वाले बिलकुल ही अलग पहचान, हैसियत और सार के होते हैं। इन बोले गए वचनों का अंदाज़ और ढंग और जिस हैसियत से वे बोले गए थे, परमेश्वर के लिए अद्वितीय हैं, जो सृष्टिकर्ता की पहचान को धारण करता है। उसके पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, साथ ही साथ, सृष्टिकर्ता का सम्मान और प्रताप भी, जो किसी मनुष्य के संदेह को बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

पहले, आओ हम उत्पत्ति 17:4–6 को देखें : "देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।" ये वचन वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी, साथ ही साथ, परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गयी आशीष भी थी: परमेश्वर अब्राहम को जातियों का पिता बनाएगा और उसे बहुत ही अधिक फलवंत करेगा और उससे अनेक जातियों का मूल बनाएगा और उसके वंश में राजा पैदा होंगे। क्या तुम इन वचनों में परमेश्वर के अधिकार को देखते हो? ऐसे अधिकार को तुम कैसे देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार के सार के किस पहलू को देखते हो? इन वचनों को ध्यान से पढ़ने से, यह पता करना कठिन नहीं है कि परमेश्वर का अधिकार और पहचान परमेश्वर के वचनों में स्पष्टता से प्रकाशित हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने कहा "मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू ... हो जाएगा। ... मैं ने तुझे ठहरा दिया ... मैं तुझे बनाऊँगा...," इसमें "तू बनेगा" और "मैं करूँगा," जैसे वाक्यांश जिनके वचन परमेश्वर की पहचान और अधिकार की पुष्टि करते हैं, वे एक मायने में, सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता का संकेत हैं; दूसरे मायने में, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए विशिष्ट वचन हैं, जो सृष्टिकर्ता की पहचान धारण किए हुए है—साथ ही साथ, पारंपरिक शब्दावली का एक भाग भी है। यदि कोई कहता है कि वे आशा करते हैं कि एक फलाना व्यक्ति बहुतायत से फलवंत होगा और उससे जातियाँ उत्पन्न होंगी और उसके वंश में राजा पैदा होंगे, तब निःसन्देह यह एक प्रकार की अभिलाषा है, यह आशीष या प्रतिज्ञा नहीं है। इसलिए, यह कहने की लोगों की हिम्मत नहीं होगी, "कि मैं तुम्हें ऐसा बनाऊँगा, और तुम ऐसा ऐसा करोगे...," क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास ऐसी सामर्थ्‍य नहीं है; यह उन पर निर्भर नहीं है, अगर वे ऐसी बातें कहें भी तो, उनके शब्द खोखले और बेतुके होंगे, जो उनकी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं से निकले होंगे। यदि किसी को लगे कि वह अपनी अभिलाषा पूरी नहीं कर सकता, तो क्या वह ऐसे बड़बोलेपन वाले अंदाज़ में बात करने की हिम्मत करेगा? हर कोई अपने वंशजों के लिए अभिलाषा करता है और यह आशा करता है कि वे दूसरों से आगे बढ़ेंगे और बड़ी सफलता हासिल करेंगे। "उन में से कोई महाराजा बन जाए तो कितने सौभाग्य की बात होगी! यदि कोई गवर्नर बन जाए तो भी अच्छा होगा, वह बस महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना चाहिये!" ये सब लोगों की अभिलाषाएँ हैं, परन्तु लोग अपने वंशजों के लिये केवल आशीषों की अभिलाषा कर सकते हैं, लेकिन अपनी किसी भी प्रतिज्ञा को पूरा या साकार नहीं कर सकते। अपने हृदय में, हर कोई स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके पास ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने के लिए सामर्थ्‍य नहीं है, क्योंकि उन चीज़ों की हर बात उनके नियंत्रण से बाहर है, तो वे कैसे दूसरों की तक़दीर का फैसला कर सकते हैं? परमेश्वर ऐसे वचनों को इसलिए बोलता है क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है और वह जो भी प्रतिज्ञाएँ मनुष्य से करता है उन्हें पूर्ण और साकार करने के काबिल है और उन आशीषों को फलीभूत करने के योग्य है जिन्हें वह मनुष्य को देता है। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, और किसी को बहुतायत से फलवंत करना परमेश्वर के लिए बच्चों का खेल है; किसी के वंशजों को समृद्ध करने के लिए सिर्फ उसके एक वचन की आवश्यकता होगी। उसे ऐसे कार्य करने के लिए पसीना बहाने, माथापच्ची करने या खुद को उलझन में डालने की कभी आवश्यकता नहीं होगी; यही परमेश्वर का सामर्थ्‍य और परमेश्वर का अधिकार है।

उत्पत्ति 18:18 में "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी" को पढ़ने के बाद, क्या तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को महसूस कर सकते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की असाधारणता का एहसास कर सकते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता का एहसास कर सकते हो? परमेश्वर के वचन निश्चित हैं। परमेश्वर सफलता में अपने आत्मविश्वास के कारण या इसके निरूपण के लिए इन वचनों को नहीं कहता है; बल्कि, उसका इन्हें कहना परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं और एक आज्ञा है जो परमेश्वर के वचन को पूरा करती है। यहाँ पर दो अभिव्यक्तियाँ हैं जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है, "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी," तो क्या इन वचनों में अस्पष्टता का कोई तत्व है? क्या चिंता की कोई बात है? क्या इस में भय की कोई बात है? परमेश्वर के द्वारा बोले गए कथनों में "निश्चय होगा" और "होगा" जैसे वचनों के कारण, इन तत्वों का, जो खास तौर से मनुष्यों के गुण हैं और अक्सर उन में प्रदर्शित होते हैं, सृष्टिकर्ता से कभी कोई संबंध नहीं रहा है। किसी को शुभकामना देते समय कोई इन शब्दों का इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं करेगा, किसी में यह हिम्मत नहीं होगी कि ऐसी निश्चितता के साथ किसी दूसरे को एक महान और सामर्थी जाति बनने की आशीष दे या प्रतिज्ञा करे कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसमें आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने अधिक निश्चितहोते हैं, उतना ही अधिक वे किसी चीज़ को साबित करते हैं—और वह चीज़ क्या है? वे साबित करते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है, कि उसका अधिकार इन कामों को पूरा कर सकता है और उनका पूरा होना अनिवार्य है। परमेश्वर, उन सब बातों के विषय में अपने हृदय में निश्चित था जिनके द्वारा उसने अब्राहम को आशीष दी थी, उसे लेकर उसमें ज़रा-भी संदेह नहीं था। इसके अलावा, ये सारी बातें उसके वचन के अनुसार पूरी हो जाएंगी और कोई भी ताकत उनके पूरा होने को बदलने, बाधित करने, कमज़ोर करने या उलट-पुलट करने में सक्षम नहीं होगी। चाहे जो कुछ भी हो जाए, परमेश्वर के वचनों को पूरा होने से और उनकी कार्यसिद्धि को कोई भी निष्फल नहीं कर सकता है। यही सृष्टिकर्ता के मुँह से बोले गए वचनों की सामर्थ्‍य है और सृष्टिकर्ता का अधिकार है जो मनुष्य के इनकार को सह नहीं सकता है! इन वचनों को पढ़ने के बाद भी, क्या तुम लोगों के मन में संदेह है? इन वचनों को परमेश्वर के मुँह से कहा गया था और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्‍य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार को और तथ्यों के पूरा होने की अनिवार्यता को, किसी भी सृजित प्राणी और गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और न ही कोई सृजित प्राणी और गैर-सृजित प्राणी उससे बढ़कर उत्कृष्ट हो सकता है। केवल सृष्टिकर्ता ही मानवजाति के साथ ऐसे अंदाज़ और लहज़े में बात कर सकता है और तथ्यों ने साबित किया है कि उसकी प्रतिज्ञाएँ खोखले वचन या बेकार की डींगें नहीं हैं, बल्कि अद्वितीय अधिकार का प्रदर्शन हैं जिससे कोई व्यक्ति, घटना, या वस्तु बढ़कर नहीं हो सकती है।

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और मनुष्य द्वारा बोले गए शब्दों में क्या अंतर है? जब तुम परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को पढ़ते हो तो तुम परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के वचनों के अधिकार को महसूस करते हो। जब तुम लोगों को ऐसे शब्द बोलते हुए सुनते हो तो तुमको कैसा लगता है? क्या तुम्हें महसूस होता है कि वे बहुत अधिक अभिमानी और डींगें हाँकने वाले हैं, और दिखावा करते हैं? क्योंकि उनके पास ऐसी सामर्थ्‍य नहीं होती, उनके पास ऐसा अधिकार भी नहीं होता, और इस प्रकार वे ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। उनका अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति बहुत निश्चित होना केवल उनकी टिप्पणियों की लापरवाही को दर्शाता है। यदि कोई ऐसे शब्दों को कहता है तो वे निःसन्देह अभिमानी और अति-आत्मविश्वासी होंगे और अपने आपको प्रधान स्वर्गदूत के स्वभाव के आदर्श उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे होंगे। ये वचन परमेश्वर के मुँह से बोले गये हैं; क्या तुम इनमें अभिमान की कोई बात पाते हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन महज़ एक मज़ाक हैं? परमेश्वर के वचन अधिकार हैं, परमेश्वर के वचन तथ्य हैं और उसके मुँह से वचन के निकलने से पहले ही, अर्थात, जब परमेश्वर कुछ करने का निर्णय ले रहा होता है तो वह काम पहले ही पूरा किया जा चुका होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि जो कुछ परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था, वह एक वाचा थी जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था और परमेश्वर के द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा थी। यह प्रतिज्ञा एक प्रमाणित तथ्य था, और ये तथ्य परमेश्वर की योजना के अनुसार, परमेश्वर के विचारों में धीरे-धीरे पूरा किये गए। अतः, परमेश्वर द्वारा ऐसी बातों को कहने का यह मतलब नहीं है कि उसका स्वभाव अभिमानी है, क्योंकि परमेश्वर ऐसी चीज़ों को पूरा करने में सक्षम है। उसके पास ऐसी सामर्थ्‍य और अधिकार है, और ऐसे कार्यों को पूरा करने में पूर्णतया सक्षम है और उनका पूर्ण होना पूरी तरह उसकी योग्यता के दायरे में है। जब परमेश्वर के मुख से ऐसे वचन बोले जाते हैं तो वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन एवं प्रकटीकरण होते हैं, वे परमेश्वर के सार एवं अधिकार का पूर्ण प्रकाशन एवं अभिव्यक्ति होते हैं और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान के प्रमाण के रूप में अधिक सही और उचित होता हो। ऐसे कथनों का ढंग, लहज़ा और वचन सृष्टिकर्ता की पहचान के ही चिह्न हैं और वे परमेश्वर की अपनी पहचान के प्रकटीकरण से पूरी तरह से मेल खाते हैं; उनमें कोई झूठा दिखावा या अशुद्धता नहीं है; वे पूरी तरह से और सर्वथा सृष्टिकर्ता के अधिकार और सार का पूर्ण प्रदर्शन हैं। जहाँ तक जीवधारियों की बात है, उनके पास न तो यह अधिकार है और न ही यह सार और परमेश्वर के द्वारा दी गयी शक्ति तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है। यदि मनुष्य ऐसा आचरण नहीं करता है तो यह निश्चित रूप से उसके दूषित स्वभाव का प्रदर्शन होगा और यह मनुष्य के अभिमान और अनियंत्रित महत्‍वाकांक्षाओं का हस्तक्षेप करने वाला प्रभाव होगा तथा उस दुष्ट, शैतान की नीच इच्छाओं का खुलासा होगा, जो लोगों को धोखा देना और बहकाना चाहता है जिससे कि वे परमेश्वर को धोखा दे बैठें। ऐसी भाषा के द्वारा जो प्रकट किया जाता है, उसे परमेश्वर किस ढंग से देखता है? परमेश्वर कहेगा कि तुम उसका स्थान हड़पना चाहते हो और तुम उसका रूप धारण करना और उसका स्थान लेना चाहते हो। जब तुम परमेश्वर के बोले गए वचनों के लहज़े का अनुकरण करते हो, तो तुम्हारा इरादा होता है कि लोगों के हृदयों से परमेश्वर के स्थान को हटा दो और मानवजाति के जीवन के उस स्थान पर अवैध कब्ज़ा कर लो जो न्यायसंगत रूप से परमेश्वर का है। सीधे और सरल रूप में, यह शैतान है; यह प्रधान स्वर्गदूत के वंशजों के कार्य हैं; जो स्वर्ग के लिए असहनीय है! तुम लोगों के बीच में, क्या कोई है जिसने कभी लोगों को गुमराह करने और धोखा देने के इरादे से, किसी निश्चित तरीके से, कुछ बातों को कहने में परमेश्वर का अनुकरण किया हो और उन्हें यह एहसास दिलाया हो मानो इस व्यक्ति के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य है, मानो इस व्‍यक्ति का सार एवं पहचान अद्वितीय हो और यहाँ तक कि मानो इस व्यक्ति के बोलने का लहज़ा भी परमेश्वर के समान हो? क्या तुम लोगों ने कभी ऐसा कुछ किया है? क्या तुम लोगों ने कभी अपनी बातों में, ऐसी भाव-भंगिमाओं के साथ परमेश्वर के लहज़े का अनुकरण किया है जो शायद परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हों, जो तुम्हारे अनुमान से शक्ति और अधिकार हो? क्या तुम में से अधिकतर लोग अक्सर इस तरह से काम करते हैं या काम करने की योजना बनाते हैं? अब, जब तुम लोग सचमुच में सृष्टिकर्ता के अधिकार को देखते, एहसास करते और जानते हो और पीछे मुड़कर देखते हो कि तुम लोग क्या किया करते थे और खुद की किस बात को उजागर करते थे, तो क्या तुम लोग घृणा महसूस करते हो? क्या तुम लोग अपनी नीचता और निर्लज्जता का एहसास करते हो? ऐसे लोगों के स्वभाव और सार का विश्लेषण करने के बाद, क्या ऐसा कहा जा सकता है कि वे नरक की शापित संतानें हैं। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि हर कोई जो ऐसा करता है वह अपने आपको लज्जित करता है? क्या तुम लोग इस प्रकृति की गम्भीरता को पहचानते हो? यह आखिर कितना गम्भीर है? इस प्रकार का कार्य करने वाले लोगों का इरादा परमेश्वर का अनुकरण करना होता है। वे परमेश्वर बनना चाहते हैं और लोगों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाना चाहते हैं। वे लोगों के हृदयों से परमेश्वर के स्थान को हटा देना चाहते हैं और ऐसे परमेश्वर से छुटकारा पाना चाहते हैं जो लोगों के बीच कार्य करता है। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि लोगों को नियंत्रित करने, लोगों को निगलने, और उनकी संपत्ति को हड़पने के मकसद को पूरा कर सकें। हर किसी के पास ऐसी अवचेतन इच्छा और महत्वाकांक्षा होती है और हर कोई ऐसे दूषित शैतानी सार में और ऐसी शैतानी प्रकृति में जीवन बिताता है जिसमें वे परमेश्वर के शत्रु होते हैं, परमेश्वर को धोखा देते हैं और खुद परमेश्वर बनना चाहते हैं। परमेश्वर के अधिकार के विषय पर मेरी सहभागिता के बाद, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर का रूप धारण करने की इच्छा और आकांक्षा करते हो या परमेश्वर की नकल करना चाहते हो? क्या तुम लोग अभी भी परमेश्‍वर होने की इच्छा रखते हो? क्या तुम सब अभी भी परमेश्वर बनना चाहते हो? मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के अधिकार की नकल नहीं की जा सकती है और मनुष्य के द्वारा परमेश्वर की पहचान और हैसियत का जाली रूप धारण नहीं किया जा सकता है। यद्यपि तुम परमेश्वर के बोलने के अंदाज़ की नकल करने में सक्षम हो, किन्तु तुम परमेश्वर के सार की नकल नहीं कर सकते। भले ही तुम परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने और उसका जाली रूप लेने में सक्षम हो, किन्तु तुम कभी वह सब कुछ नहीं कर पाओगे जो परमेश्वर करने की इच्छा रखता है, तुम कभी सभी चीज़ों पर शासन नहीं कर पाओगे और न ही उनको आज्ञा दे पाओगे। परमेश्वर की नज़रों में, तुम हमेशा एक छोटे से जीव बने रहोगे, तुम्हारी क्षमताएं और योग्ताएँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, तुम्हारे पास कितनी भी प्रतिभाएं क्यों न हों, तो भी तुम पूरी तरह से सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन हो। यद्यपि तुम कुछ बड़बोलेपन के शब्द बोलने में सक्षम हो, लेकिन इससे न तो यह पता चलता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का सार है और न ही यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य स्वयं परमेश्वर का सार है। उन्हें सीखा, या बाहर से जोड़ा नहीं गया था, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर का अंतर्निहित सार हैं। इस प्रकार सृष्टिकर्ता और जीवधारियों के मध्य के संबंध को कभी भी पलटा नहीं जा सकता है। जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए।

सृष्टिकर्ता का अधिकार समय, स्थान, या भूगोल के बंधन में नहीं है और उसका अधिकार गणना के परे है

आओ हम उत्पत्ति 22:17-18 को देखें। यह यहोवा परमेश्वर के द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दी कि उसके वंश के लोग बहुगुणित होंगे—परंतु वे किस सीमा तक बहुगुणित होंगे? उस सीमा तक जितना पवित्र-शास्त्र में लिखा है : "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान।" कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर अब्राहम को आकाश के तारों के समान अनगिनत और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान बहुसंख्यक वंशज देना चाहता था। परमेश्वर ने अलंकृत भाषा का इस्तेमाल करते हुए बात कीऔर इस अलंकृत भाषा से यह देखना कठिन नहीं है कि परमेश्वर अब्राहम को मात्र एक, दो, या हज़ारों वंशज नहीं देगा, बल्कि असंख्य तादाद देगा, इतना कि वे जातियों का एक समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि वो बहुत-सी जातियों का पिता होगा। और क्या उस संख्या का निर्धारण मनुष्य द्वारा किया गया था या परमेश्वर के द्वारा? क्या मनुष्य यह तय कर सकता है कि उसके पास कितने वंशज हों? क्या यह उस पर निर्भर है? यह मनुष्य के बस की बात नहीं है कि वह इस बात का निर्धारण कर सके कि उसके पास अनेक वंशज होंगे या नहीं, "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" वंशज होने की तो बात ही छोड़ो। कौन ऐसी इच्छा न करेगा कि उसके संतान तारों के समान अनगिनत हों? दुर्भाग्यवश, चीज़ें वैसी घटित नहीं होती हैं जैसा तुम चाहते हो। चाहे मनुष्य कितना भी कुशल और योग्य हो, यह उस पर निर्भर नहीं करता है; कोई भी उस सीमा से बाहर खड़ा नहीं हो सकता है जिसे परमेश्वर द्वारा ठहरा दिया गया है। जितना वह तुम्हें अनुमति देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगा : यदि परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तब तुम्हारे पास कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं होगा और यदि परमेश्वर तुम्हें बहुत ज़्यादा देता है तो तुम्हारे पास कितना अधिक है, इससे चिढ़ने का कोई फायदा नहीं। क्या ऐसा ही नहीं है? यह सब कुछ परमेश्वर पर है, मनुष्य पर नहीं! मनुष्य पर परमेश्वर द्वारा शासन किया जाता है और इससे कोई छूटा नहीं है।

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा" तो यह वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी और इंद्रधनुष की वाचा के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा भी थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, मनुष्य चाहे इसे किसी भी नज़रिए से देखे और इसे कैसे भी समझे, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार अक्षरशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और शरणा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगेऔर न ही किसी व्यक्ति, घटना, या वस्तु में हुए बदलाव के कारण ये बदलेंगे। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य है, वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है या किसी को भी शून्य बना सकता है और वह जीवित वस्तुओं से लेकर मृत वस्तुओं तक, सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है; परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह सुनने में मनुष्य को परियों की कहानी के समान काल्पनिक लगता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं है और न ही यह परियों की कहानी है। बल्कि यह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसे सराहते हो? क्या तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंशज अनगिनत थे? और कितने अनगिनत थे? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" अनगिनत थे, जैसा कि परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे संसार में सब जातियों और प्रदेशों में फैल गए थे? और इस तथ्य को किसके द्वारा पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों के कहे जाने के सैकड़ों और हज़ारों सालों बाद भी परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए और निरन्तर तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आरंभ में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द हो गया और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया और उसकी प्राप्ति और पूरे होने में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव तात्कालिक थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार के अन्य पहलू को देखने की मंजूरी दी और उसने मनुष्य को यह तथ्य देखने की अनुमति दी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना के परे है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अत्‍युत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

जब एक बार परमेश्वर के वचन बोल दिए जाते हैं तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है और वह तथ्य जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर के मुँह से की गई थी धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है। परिणामस्वरूप सभी चीज़ों में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिलने लग जाते हैं, पेड़ों में कोपलें फूटने लग जाती हैं, पक्षी गाना शुरू कर देते हैं, कलहँस लौट आते हैं, मैदान लोगों से भर जाते हैं...। बसंत के आगमन के साथ ही सभी चीज़ें नई हो जाती हैं और यह सृष्टिकर्ता का आश्चर्यकर्म है। जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है तो स्वर्ग और पृथ्वी में सब वस्तुएँ परमेश्वर के वचन के अनुसार नई हो जाती हैं और बदल जाती हैं—कोई भी इससे अछूता नहीं रहता है। जब परमेश्वर के मुँह से प्रतिबद्धता या प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, तो सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करती हैं; सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से आयोजित और व्यवस्थित किया जाता है और वे अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं और अपने-अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार का एक दायरा है? क्या कोई समय सीमा है? क्या इसे एक निश्चित ऊँचाई या एक निश्चित लम्बाई तक कहा जा सकता है? क्या इसे किसी कहा जा सकता है कि इसका कोई निश्चित आकार या शक्ति है? क्या इसे मनुष्य के आयामों के द्वारा नापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, ना ही वह आता-जाता है और कोई नहीं माप सकता कि उसका अधिकार कितना विशाल है। चाहे कितना भी समय बीत जाए, जब परमेश्वर किसी मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहती है और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगीऔर मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति को बार-बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक, उसके अधिकार के द्वारा हासिल किया गया सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है और उस में कुछ भी दोष नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार और सभी कार्य जो वो पूरा करता है, वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य को बताने में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को पूरा करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार-चढ़ाव आए हों, यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी-अभी बोला गया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति से करता है, उनकी लगातार सुधि ले सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है, इससे निरपेक्ष कि प्रतिज्ञा क्या है, इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना समय लगेगा, उसका वो दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि—इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा और इसे साकार किया जाएगा और उसके पूरा होने या साकार होने में उसे ज़रा-सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल उजियाले का ही प्रबन्धन करता है या यह कि वह जल का प्रबन्धन सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसने जल बनाया और बाकी सब कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह ग़लतफहमी नहीं होगी? यद्यपि सैकड़ों सालों बाद अब्राहम के लिए परमेश्वर की आशीषें धीरे-धीरे मनुष्य की यादों में धूमिल हो चुकी थीं, फिर भी परमेश्वर के लिए वह प्रतिज्ञा जस-की-तस बनी रही। यह तब भी पूरा होने की प्रक्रिया में था और कभी रूका नहीं था। मनुष्य ने न तो कभी जाना और न सुना कि परमेश्वर ने किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था और किस प्रकार सभी चीज़ों को आयोजित और व्यवस्थित किया था और इस दौरान परमेश्वर द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि के बीच कितनी ढेर सारी कहानियाँ घटित हुईं थीं, किन्तु परमेश्वर के अधिकार के प्रकटीकरण और उसके कार्यों के प्रकाशन के प्रत्येक बेहतरीन अंश को सभी चीज़ों तक पहुँचाया गया और उनके बीच गौरवान्वित किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता के अद्भुत कर्मों को दिखाती और उनके बारे में बात करती थी और सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की प्रत्येक लोकप्रिय कहानी को सभी चीज़ों के द्वारा सदा-सर्वदा घोषित किया जाएगा। जिस अधिकार के तहत परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और परमेश्वर की सामर्थ्‍य, सभी चीज़ों को दिखाते हैं कि परमेश्वर हर काल में हर जगह उपस्थित है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की सर्वउपस्थिति के साक्षी बन जाते हो तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर काल में, हर जगह उपस्थित होता है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य समय, भूगोल, स्थान, या किसी व्यक्ति, घटना या वस्तु के बंधन से परे है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता मनुष्य की कल्पनाओं से परे हैः मनुष्य इसकी थाह नहीं पा सकता, यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जानेगा।

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, परन्तु एक मनुष्य की कल्पनाएँ कहाँ तक जा सकती हैं? क्या वह इस संसार के परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य के अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने की अनुमति दे सकते हैं? क्या उनके ज़रिये मनुष्य परमेश्वर के अधिकार को समझकर सचमुच उसके प्रति समर्पण कर सकता है? तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि मनुष्य के अनुमान और कल्पना मात्र मनुष्य की बुद्धिमत्ता की उपज हैं और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार को जानने में ज़रा-सी भी मदद या लाभ नहीं पहुँचाते। विज्ञान की कल्पनाओं को पढ़ने के बाद, कुछ लोग चन्द्रमा और तारे किस प्रकार दिखते हैं उसकी कल्पना कर सकते हैं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य के पास परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना बस ऐसी ही है : कोरी कल्पना। इन वस्तुओं के तथ्यों के विषय में, अर्थात, परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के विषय में, उसके पास बिलकुल भी कोई समझ़ नहीं है। क्या हुआ यदि तुम चन्द्रमा तक गए भी हो तो? क्या इससे यह साबित हो जाता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दिखाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ है तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है तो मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं है : और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानो और प्रमाणित करो। यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है, बल्कि वास्तविक है।

सभी चीज़ों व प्राणियों पर सृष्टिकर्ता के नियन्त्रण और प्रभुत्व का तथ्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के सच्चे अस्तित्व के विषय में बोलता है

उसी प्रकार से, अय्यूब के ऊपर यहोवा की आशीष अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया था? "यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के नज़रिए से, अय्यूब को दी गई ये चीज़ें क्या थीं? क्या वे मनुष्य की सम्पत्ति थी? इन सम्पत्तियों के द्वारा क्या अय्यूब उस युग में बहुत अधिक धनी नहीं रहा होगा? उसे ऐसी सम्पत्तियाँ कैसे प्राप्त हुईं थीं? उसे धन कैसे मिला? कहने की आवश्यकता नहीं कि अय्यूब को ये सम्पत्ति परमेश्वर के आशीष से प्राप्त हुई थी। अय्यूब इन सम्पत्तियों को किस नज़रिए से देखता था और वह परमेश्वर की आशीषों को किस प्रकार महत्व देता था, हम इन सब बातों पर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। जब भी परमेश्वर की आशीषों की बात होती है, सभी लोग दिन और रात परमेश्वर से आशीषित होने की लालसा करते हैं, फिर भी मनुष्य का नियन्त्रण इन बातों पर नहीं होता है कि वह अपने जीवनकाल में कितनी सम्पत्ति प्राप्त कर सकता है या वह परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त करेगा भी कि नहीं—यह एक निर्विवादित सत्य है! परमेश्वर के पास अधिकार है और उसके पास मनुष्य को किसी भी प्रकार की सम्पत्ति देने की सामर्थ्‍य है, जिससे वह मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ को प्राप्त करने की स्वीकृति दे सके, फिर भी परमेश्वर की आशीषों का एक सिद्धांत है। परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है? निश्चय ही ऐसे लोगों को जिनको वह पसंद करता है! अब्राहम और अय्यूब दोनों को परमेश्वर के द्वारा आशीषित किया गया था, फिर भी वे आशीषें जिन्हें उन्होंने प्राप्त किया था एक समान नहीं थी। परमेश्वर ने अब्राहम को रेत और तारों के समान अनगिनत वंशजों से आशीषित किया था। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने एक मनुष्य के वंशजों, एक जाति को सामर्थी और समृद्ध किया। इसमें, परमेश्वर के अधिकार ने मानवजाति पर शासन किया, जो सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों में परमेश्वर की श्वास से श्वसन करती थी। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, यह मानवजाति परमेश्वर के द्वारा निर्धारित दायरे के अंतर्गत उस गति से तेजी से बढ़ी और अस्तित्व में आ गई जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया था। विशेष रूप से, इस जाति की जीवन योग्यता, फैलाव की गति और जीवन-प्रत्याशा सब कुछ परमेश्वर के इन्तज़ामों के भाग थे और इन सब का सिद्धांत पूर्णतया उस प्रतिज्ञा पर आधारित था जिसे परमेश्वर ने अब्राहम को दिया था। कहने का तात्पर्य है कि परिस्थितियों से परे, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ बिना किसी बाधा के आगे बढेंगी और परमेश्वर के अधिकार की दूरदर्शिता के अधीन वे साकार होंगी। उस प्रतिज्ञा में जो परमेश्वर ने अब्राहम से की थी, संसार की उथल-पुथल से निरपेक्ष, उस युग से निरपेक्ष, मानवजाति के द्वारा झेली गई महाविपत्तियों से निरपेक्ष, अब्राहम का वंश सम्पूर्ण विनाश के जोखिम का सामना नहीं करेगा और उनकी जाति कभी खत्म नहीं होगी। लेकिन अय्यूब के ऊपर परमेश्वर की आशीषों ने उसे बहुत ज़्यादा धनी बना दिया था। जो परमेश्वर ने उसे जो दिया वह जीवित और साँस लेते हुए जीवधारियों का संग्रह था—उनकी संख्या, विस्तार की उनकी गति, जीवित रहने की दशाएँ, उनके ऊपर चर्बी की मात्रा, इत्यादि—भी परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित था। यद्यपि इन जीवित प्राणियों के पास बोलने की योग्यता नहीं थी, परन्तु वे भी सृष्टिकर्ता के प्रबन्धन के भाग थे और परमेश्वर के प्रबन्धन का सिद्धांत उस आशीष के अनुसार था जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अय्यूब से की थी। उन आशीषों के अंतर्गत जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम और अय्यूब को दिया था, हालाँकि जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी वह अलग थी, फिर भी वह अधिकार जिसके द्वारा सृष्टिकर्ता सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों पर शासन करता है वह एक समान था। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का प्रत्येक विवरण, अब्राहम और अय्यूब को दी गई उसकी अलग-अलग प्रतिज्ञाओं और आशीषों में प्रकट है, और यह एक बार फिर से मानवजाति को दिखाता है कि परमेश्वर का अधिकार मनुष्य की कल्पनाओं से अत्यधिक परे है। ये विवरण एक बार फिर मानवजाति को बताते हैं कि यदि वह परमेश्वर के अधिकार को जानना चाहता है तो यह केवल परमेश्वर के वचनों के द्वारा और परमेश्वर के कार्यों को अनुभव करने के द्वारा ही हो सकता है।

सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता मनुष्य को एक तथ्य देखने की अनुमति देती है : परमेश्वर का अधिकार, "परमेश्वर ने कहा कि उजियाला हो और उजियाला हो गया और आकाश बन जाए और आकाश बन गया और भूमि दिखाई दे और भूमि दिखाई देने लगी," न केवल इन वचनों में समाविष्ट है बल्कि, इसके अतिरिक्त, वह इस बात से भी प्रकट होता है कि उसने किस प्रकार उजियाले को कायम रखा, आकाश को विलुप्त होने से बचाए रखा और भूमि को हमेशा जल से अलग रखा, साथ ही साथ उस विवरण में भी है कि उसने किस प्रकार सृजित की गई चीज़ों : उजियाला, आकाश और भूमि के ऊपर शासन किया और उनका प्रबन्ध किया। परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को दी गई आशीषों में तुम सब और क्या देखते हो? स्पष्ट रीति से, परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष दिए जाने के बाद परमेश्वर के कदम नहीं रुके, क्योंकि उसने तो बस अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ ही किया था और वह अपने हर एक वचन को वास्तविकता बनाना चाहता था और इस प्रकार, आने वाले सालों में अपने हर एक विवरण को जिसे उसने कहा था साकार करने के लिए, वह लगातार सब कुछ करता रहा जिसकी उसने इच्छा की थी। क्योंकि परमेश्वर के पास अधिकार है, कदाचित् मनुष्य को ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर को तो केवल बोलने की आवश्यकता है और बिना एक उंगली तक उठाए सब बातें और चीज़ें पूरी हो जाती हैं। इस प्रकार कल्पना करना काफी बकवास है! यदि तुम वचनों के इस्तेमाल से परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के साथ ठहराई गई वाचा और वचनों के उपयोग से परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की पूर्णता का केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण लेते हो और तुम विभिन्न चिह्नों और तथ्यों को देखने में असमर्थ हो कि परमेश्वर का अधिकार सभी चीज़ों के अस्तित्व के ऊपर प्रभुता रखता है तो परमेश्वर के अधिकार की तुम्हारी समझ कहीं ज़्यादा खोखली और हास्यास्पद है! यदि मनुष्य परमेश्वर की इस प्रकार कल्पना करता है तो ऐसा कहना होगा कि परमेश्वर के विषय में मनुष्य का ज्ञान आखिरी पड़ाव में चला गया है और अंतिम छोर तक पहुँच चुका है, क्योंकि वह परमेश्वर जिसकी मनुष्य कल्पना करता है वह एक मशीन के सिवाए और कुछ नहीं है जो बस आदेश देता है और ऐसा परमेश्वर नहीं है जिस के पास अधिकार है। तुमने अब्राहम और अय्यूब के उदाहरणों के द्वारा क्या देखा है? क्या तुमने परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का सच्चा पहलू देखा है? परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद, परमेश्वर वहाँ खड़ा न रहा जहाँ पर वह था, न ही उसने अपने सन्देशवाहकों को काम पर लगाकर यह देखने के लिए इन्तज़ार किया कि इसका परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, तो परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन के अधीन, सभी चीज़ें उस कार्य के साथ मेल खाने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था और लोगों, चीज़ों और तत्वों को तैयार किया गया जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य है कि जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन बोले गए, परमेश्वर के अधिकार पूरी भूमि पर इस्तेमाल होने लगा और उसने अब्राहम और अय्यूब से की गई प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने और उन्हें पूरा करने के लिए एक क्रम ठहरा दिया, इसी बीच उसने सब के लिए हर प्रकार की उचित योजना बनाई और तैयारियाँ की जिसे पूरा करने की उसने योजना बनाई थी जो हर एक कदम और हर एक मुख्य चरण के लिए जरूरी था। इस दौरान, परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों को कुशलता से इस्तेमाल किया, बल्कि सभी चीज़ों को भी कुशलता से इस्तेमाल किया जिन्हें उसके द्वारा बनाया गया था। कहने का तात्पर्य है कि वह दायरा जिसके भीतर परमेश्वर के अधिकार को इस्तेमाल किया गया था उसमें न केवल दूत शामिल थे, वरन, वे सभी चीज़ें भी शामिल थीं, जिन्हें उस कार्य से अनुपालन करने के लिए कुशलता से उपयोग किया गया था जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशेष रीतियाँ थीं जिनके तहत परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल किया गया था। तुम लोगों की कल्पनाओं में, कुछ लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, सामर्थ्‍य है और इस प्रकार परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में रहने की ज़रूरत है या एक ही स्थिर जगह में रहने की जरूरत है और किसी विशेष कार्य को करने की जरूरत नहीं है, परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य उसके विचारों के भीतर ही पूरा होता है। कुछ लोग यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी थी, फिर भी परमेश्वर को और कुछ करने की जरूरत नहीं थी, और उसके लिए मात्र अपने वचनों को कहना ही काफी था। क्या ऐसा वास्तव में हुआ था? साफ तौर पर ऐसा नहीं हुआ था! यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी बनाई सभी चीज़ों कि उसके द्वारा सृष्टि, सभी चीज़ों पर उसके नियन्त्रण और उस प्रक्रिया में प्रकाशित और साकार हो रहे हैं, जिनके द्वारा वह मानवजाति की अगुवाई और उनका प्रबंधन करता है। हर पद्धति, हर दृष्टिकोण और मानवजाति और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता का हर विवरण और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीज़ों की उसकी समझ—उन सभी ने अक्षरश: यह साबित किया है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्‍य निरन्तर और सभी चीज़ों में प्रदर्शित और प्रकाशित होते हैं। ये प्रकटीकरण और प्रकाशन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बात करते हैं, क्योंकि वह अपने कार्य को जारी रखने और सभी चीज़ों को आज्ञा देने, हर घड़ी सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल कर रहा है; उसके अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान स्वर्गदूत या परमेश्वर के दूत नहीं ले सकते। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि वह किस प्रकार की आशीषों को अब्राहम और अय्यूब को देगा—यह परमेश्वर पर निर्भर निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूतों ने व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब से मुलाकात की, फिर भी उनकी गतिविधियाँ परमेश्वर के आदेश अपर आधारित थीं, परमेश्वर के अधिकार के अधीन थीं और इसके समान ही दूत भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम से मिलते हुए देखता है, यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से बाइबल के लेखों में कुछ करते हुए नहीं देखता है, वास्तव में, यह परमेश्वर स्वयं ही है जो अधिकार और सामर्थ्‍य का सचमुच में उपयोग करता है और यह किसी मनुष्य से कोई सन्देह बर्दाश्त नहीं करता! यद्यपि तुम देख चुके हो कि स्वर्गदूतों और दूतों के पास बड़ी सामर्थ्‍य होती है, उन्होंने चमत्कार किए हैं या परमेश्वर के आदेशानुसार कुछ चीज़ों को किया है, उनके कार्य मात्र परमेश्वर के आदेशों को पूरा करने के लिए होते हैं, किसी भी अर्थ में परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या वस्तु के पास सभी चीज़ों को बनाने और सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है, न ही वे उन्हें धारण करते हैं। इस प्रकार कोई मनुष्य और वस्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार का इस्तेमाल या उसे प्रकट नहीं कर सकता है।

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय है और उसका अपमान नहीं किया जा सकता है

तुम सबने पवित्र-शास्त्र के इन तीन अंशों में क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा कि परमेश्वर एक सिद्धांत के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए इंद्रधनुष का इस्तेमाल किया—उसने बादलों में एक इंद्रधनुष रखा जिससे मनुष्य को बता सके कि वह संसार को नाश करने के लिए फिर से जलप्रलय का इस्तेमाल कभी नहीं करेगा। जिस इंद्रधनुष को लोग आज देखते हैं क्या वह वही इंद्रधनुष है जो परमेश्वर के मुँह से निकला था? क्या उसका स्वभाव और अर्थ बदल चुका है? बिना किसी सन्देह के, यह नहीं बदला है। परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था, वह वाचा जिसे उसने मनुष्य के साथ ठहराया था वह आज तक जारी है और इस वाचा को बदलने का समय निश्चय ही सिर्फ परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर ने आज तक इस वाचा को निभाया है। तुम इस में क्या देखते हो? यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है और अपने वचनों का पक्का बना रहता है। उसकी कड़ाई और उसके कार्यों के सिद्धांत, सृष्टिकर्ता के अधिकार का अपमान न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बाधा पहुँचाई है, जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के अनुसार होता है, ठीक उसके अनुसार होता है जो कुछ उसके मुँह से निकला था, वह अपनी योजना के चरणों और उद्देश्य का अनुसरण करता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन चीज़ों पर परमेश्वर शासन करता है वे भी सिद्धांतों का पालन करती हैं, उसके अधिकार के प्रबंधों से कोई मनुष्य या चीज़ छूटी नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण दण्ड भुगतते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता का अधिकार बदलता नहीं है और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल लिया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। भले ही स्वर्ग और पृथ्वी किसी बड़े उथल-पुथल से गुज़रें, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने वाले अधिकार का सार है और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

नीचे दिए गए वचन परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए अति आवश्यक हैं और उनका अर्थ नीचे सहभागिता में दिया गया है। आओ हम पवित्र-शास्त्र को पढ़ना जारी रखें।

4. शैतान को परमेश्वर की आज्ञा

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

शैतान ने कभी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की है और इसी वजह से, सभी चीज़ें व्यवस्था के अनुसार रहती हैं

यह अय्यूब की पुस्तक में से एक लघु अंश है, इन वचनों में "वह" शब्द अय्यूब की ओर संकेत करता है। हालाँकि यह वाक्य छोटा-सा है, फिर भी यह वाक्य बहुत सारे विषयों पर प्रकाश डालता है। यह आत्मिक संसार में परमेश्वर और शैतान के बीच वार्तालाप का विवरण देता है, हमें यह बताता है कि परमेश्वर के वचनों का लक्ष्य शैतान था। यह परमेश्वर ने जो कहा उसे भी विशेष रूप से बताता है। परमेश्वर के वचन शैतान के लिए एक आज्ञा और आदेश थे। इस आदेश के विशेष विवरण अय्यूब के प्राण को छोड़ देने से संबंधित हैं जहाँ परमेश्वर अय्यूब के प्रति शैतान के बर्ताव में एक रेखा खींच देता है—शैतान को अय्यूब के प्राणों को छोड़ देना पड़ा। पहली बात जो हम इस वाक्य से सीखते हैं वह यह है कि ये परमेश्वर के द्वारा शैतान को कहे गए वचन थे। अय्यूब की पुस्तक के मूल पाठ के अनुसार, यह हमें निम्नलिखित बातों एवं ऐसे वचनों की पृष्ठभूमि के बारे में बताता है : शैतान अय्यूब पर दोष लगाना चाहता था और इसलिए उसकी परीक्षा लेने से पहले उसे परमेश्वर से सहमति लेनी थी। अय्यूब की परीक्षा लेने हेतु शैतान के अनुरोध पर सहमति देते समय परमेश्वर ने शैतान के सामने निम्नलिखित शर्तें रखीं : "अय्यूब तेरे हाथ में है; केवल उसका प्राण छोड़ देना।" इन वचनों की प्रकृति क्या है? वे स्पष्ट रीति से एक आज्ञा हैं, एक आदेश हैं। इन वचनों की प्रकृति को समझने के बाद, तुम्हें निश्चय ही यह भी समझ लेना चाहिए कि आज्ञा देने वाला परमेश्वर है, आज्ञा को पाने वाला और उसका पालन करने वाला शैतान है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस आदेश में परमेश्वर और शैतान के बीच का रिश्ता हर उस व्यक्ति के सामने प्रकट है जो इन वचनों को पढ़ता है। निश्चय ही, यह आत्मिक संसार में परमेश्वर और शैतान के बीच का रिश्ता भी है, परमेश्वर और शैतान की पहचान और स्थिति के बीच का अन्तर भी है, जिन्हें पवित्र-शास्त्र में परमेश्वर और शैतान के बीच हुए वार्तालाप के लेखों में प्रदान किया गया है, और यह अब तक के लिए विशिष्ट उदाहरण और पुस्तकीय लेखा-जोखा है जिसमें मनुष्य परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के मध्य के निश्चित अन्तर को समझ सकता है। इस बिन्दु पर, मुझे कहना होगा कि इन वचनों का लेखा-जोखा मानवजाति के लिए परमेश्वर की पहचान व हैसियत को जानने के वास्ते एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, यह मानवजाति को परमेश्वर के ज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। आत्मिक संसार में सृष्टिकर्ता और शैतान के मध्य हुए वार्तालाप से, मनुष्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के एक और विशिष्ट पहलू को समझने में सक्षम हो जाता है। ये वचन सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक और गवाही हैं।

बाहरी रूप से, यहोवा परमेश्वर शैतान से वार्तालाप कर रहा है। जहाँ तक सार का सवाल है, जिस रवैये से यहोवा परमेश्वर बात करता है, वह जिस पद पर खड़ा है, वे शैतान से श्रेष्ठ हैं। अर्थात् यहोवा परमेश्वर आदेश देने के अन्दाज़ में शैतान को आज्ञा दे रहा है, शैतान को बता रहा है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है, अय्यूब पहले से ही उसके हाथ में है, जैसा वह चाहता है अय्यूब के साथ वैसा बर्ताव कर सकता है—परन्तु उसके प्राण नहीं ले सकता। सहायक पाठ यह है, यद्यपि अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप दिया गया है, परन्तु उसका जीवन शैतान को सौंपा नहीं गया; परमेश्वर के हाथों से अय्यूब के प्राण को कोई नहीं ले सकता है जब तक परमेश्वर इस की अनुमति नहीं देता है। शैतान को दी गई इस आज्ञा में परमेश्वर की मनोवृत्ति को स्पष्ट रीति से व्यक्त किया गया है, यह आज्ञा उस पद को भी प्रकट और प्रकाशित करता है जिससे यहोवा परमेश्वर शैतान से बातचीत करता है। इसमें यहोवा परमेश्वर ने न केवल उस परमेश्वर के दर्जे को थामे हुए है जिसने उजियाला, हवा, सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों को बनाया है, जो सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के ऊपर प्रधान है, बल्कि उस परमेश्वर का भी दर्जा थामे हुए है जो मानवजाति को आज्ञा देता है, अधोलोक को आज्ञा देता है और उस परमेश्वर का जो सभी जीवित प्राणियों के जीवन और मरण को नियन्त्रित करता है। आत्मिक संसार में, परमेश्वर के अलावा किसके पास हिम्मत है कि शैतान को ऐसा आदेश दे? और परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से शैतान को आदेश क्यों दिया? क्योंकि मनुष्य का जीवन, जिसमें अय्यूब भी शामिल है, परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को नुकसान पहुँचाने या उसके प्राण लेने की अनुमति नहीं दी थी, अर्थात् जब परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति दे दी, तब भी, परमेश्वर को विशेष तौर पर यह आज्ञा देना स्मरण रहा और एक बार फिर से उसने शैतान को आज्ञा दी कि वह अय्यूब का प्राण नहीं ले सकता है। शैतान की कभी भी यह हिम्मत नहीं हुई है कि वह परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करे, इसके अतिरिक्त, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेशों और विशेष आज्ञाओं को सावधानीपूर्वक सुना है, उनका पालन किया है, उनको चुनौती देने की कभी हिम्मत नहीं की है, और निश्चय ही, परमेश्वर की किसी आज्ञा को कभी खुल्लमखुल्ला पलटने की हिम्मत नहीं की है। वे सीमाएँ ऐसी ही हैं जिन्हें परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित किया, और शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने की हिम्मत नहीं की है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है? शैतान के पास मानवजाति से कहीं अधिक स्पष्ट समझ है कि परमेश्वर के प्रति कैसा आचरण करना है, उसे किस नज़र से देखना है, इस प्रकार, आत्मिक संसार में, शैतान परमेश्वर के अधिकार व उसके स्थान को बिलकुल साफ-साफ देखता है, उसके पास परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार के इस्तेमाल के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ है। उन्हें नज़रअन्दाज़ करने की हिम्मत वह बिलकुल भी नहीं करता है, न ही वह उन्हें किसी भी तरीके से तोड़ने की हिम्मत करता है, न ही वह ऐसा कुछ करता है जिससे परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन हो, वह किसी भी रीति से परमेश्वर के क्रोध को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता है। यद्यपि वह स्वभाव से बुरा और घमण्डी है, फिर भी उसने परमेश्वर के द्वारा उसके लिए निर्धारित की गयी सीमाओं को लाँघने की कभी हिम्मत नहीं की है। लाखों सालों से, वह कड़ाई से इन सीमाओं पालन करता रहा है, परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए हर आज्ञा और आदेश का पालन करता रहा और कभी उस सीमा के बाहर पैर रखने की हिम्मत नहीं की। यद्यपि वह डाह करने वाला है, तो भी शैतान पतित मानवजाति से कहीं ज़्यादा "चतुर" है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान को जानता है, अपनी सीमाओं को भी जानता है। शैतान के "आज्ञाकारी" कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य, स्वर्गीय आदेश हैं जिनका उल्लंघन शैतान के द्वारा नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर के अधिकार और अद्वितीयता के कारण सभी चीज़ें क्रमागत रीति से बदलती और बढ़ती हैं, और मनुष्य परमेश्वर द्वारा निर्धारित जीवन-क्रम के भीतर रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं, कोई व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था में उथल-पुथल नहीं कर सकती है, कोई व्यक्ति या वस्तु इस नियम को बदलने में सक्षम नहीं है—क्योंकि वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों, सृष्टिकर्ता के आदेश और अधिकार से आते हैं।

केवल परमेश्वर के पास ही सृष्टिकर्ता की पहचान है, वही अद्वितीय अधिकार रखता है

शैतान की विशिष्ट पहचान ने बहुत से लोगों से उसके विभिन्न पहलुओं के प्रकटीकरण में गहरी रूचि का प्रदर्शन करवाया है। यहाँ तक कि बहुत से मूर्ख लोग हैं जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के साथ-साथ, शैतान भी अधिकार रखता है, क्योंकि शैतान चमत्कार करने में सक्षम है, ऐसे काम करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए असंभव हैं। इस प्रकार, परमेश्वर की आराधना करने के अतिरिक्त, मानवजाति अपने हृदय में शैतान के लिए भी एक स्थान रखती है, यहाँ तक कि परमेश्वर के रूप में शैतान की आराधना भी करती है। ऐसे लोग दयनीय और घृणित हैं। अपनी अज्ञानता के कारण वे दयनीय हैं, अपने पाखंड और अंतर्निहित बुराई के सार के कारण घृणित हैं। इस बिन्दु पर, मैं महसूस करता हूँ कि तुम लोगों को बता दूँ कि अधिकार क्या है और यह किसका प्रतीक है, यह किसे दर्शाता है। व्यापक रूप से कहें तो परमेश्वर स्वयं ही अधिकार है, उसका अधिकार उसकी श्रेष्ठता और सार की ओर संकेत करते हैं, स्वयं परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर के स्थान और पहचान को दर्शाता है। जब बात यह है तो, क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि वह स्वयं परमेश्वर है? क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि उसने सभी चीज़ों को बनाया है; सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है? बिलकुल नहीं करता! क्योंकि वह किसी भी चीज़ को बनाने में असमर्थ है; अब तक उसने परमेश्वर के द्वारा सृजित की गई वस्तुओं में से कुछ भी नहीं बनाया है, कभी ऐसा कुछ नहीं बनाया है जिसमें जीवन हो। क्योंकि उसके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, इसलिए वह संभवत: कभी भी परमेश्वर की हैसियत और पहचान प्राप्त नहीं कर पाएगा, यह उसके सार से तय होता है। क्या उसके पास परमेश्वर के समान सामर्थ्‍य है? बिलकुल नहीं है! हम शैतान के कार्यों को और शैतान द्वारा प्रदर्शित चमत्कारों को क्या कहते हैं? क्या यह सामर्थ्‍य है? क्या इसे अधिकार कहा जा सकता है? बिलकुल नहीं! शैतान बुराई की लहर को दिशा देता है, परमेश्वर के कार्य के हर एक पहलू में अस्थिरता पैदा करता है, बाधा और रूकावट डालता है। पिछले कई हज़ार सालों से, मानवजाति को बिगाड़ने, शोषित करने, भ्रष्ट करने हेतु लुभाने, धोखा देकर पतित करने और परमेश्वर का तिरस्कार करने के अलावा, जिससे कि मनुष्य मृत्यु की छाया की घाटी की ओर चला जाये, क्या शैतान ने ऐसा कुछ किया है जो मनुष्य के द्वारा उत्सव मनाने, तारीफ करने या दुलार पाने के ज़रा-सा भी योग्य हो? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उससे मानवजाति भ्रष्ट हो जाती? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उसने मानवजाति को नुकसान पहुँचाया होता? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या मनुष्य परमेश्वर को छोड़कर मृत्यु की ओर मुड़ जाता? चूँकि शैतान के पास कोई अधिकार और सामर्थ्‍य नहीं है, इसलिये जो कुछ वह करता है उससे उसके सार के विषय में हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? ऐसे लोग भी हैं जो शैतान के हर कार्य को महज एक छल के रूप में परिभाषित करते है, फिर भी मैं विश्वास करता हूँ कि ऐसी परिभाषा उतनी उचित नहीं है। क्या मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए उसके बुरे कार्य महज एक छल हैं? वह बुरी शक्ति जिसके द्वारा शैतान ने अय्यूब का शोषण किया, उसका शोषण करने और उसे नष्ट करने की उसकी प्रचण्ड इच्छा, संभवतः महज छल के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। अगर हम विचार करें तो यह देखते हैं कि पहाड़ों और पर्वतों में दूर-दूर तक फैले हुए अय्यूब के पशुओं का झुण्ड और समूह, एक पल में सब कुछ चला गया; अय्यूब की अत्यधिक धन-संपत्ति, एक क्षण में ग़ायब हो गयी। क्या इसे महज छल के द्वारा प्राप्त किया जा सकता था? शैतान के हर कार्य की प्रकृति नकारात्मक शब्दों जैसे अड़चन डालना, रूकावट डालना, नष्ट करना, नुकसान पहुँचाना, बुराई, ईर्ष्‍या और अँधकार के साथ मेल खाती है और बिलकुल सही बैठती है, इस प्रकार उन सबका घटित होना जो अधर्मी और बुरा है, वह पूरी तरह शैतान के कार्यों के साथ जुड़ा हुआ है, इसे शैतान के बुरे सार से जुदा नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद कि शैतान कितना "सामर्थी" है, इसके बावजूद कि वह कितना ढीठ और महत्वाकांक्षी है, इसके बावजूद कि नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता कितनी बड़ी है, इसके बावजूद कि उसकी तकनीक का दायरा कितना व्यापक है जिससे वह मनुष्य को भ्रष्ट करता और लुभाता है, इसके बावजूद कि उसके छल और प्रपंच कितने चतुर हैं जिससे वह मनुष्य को डराता है, इसके बावजूद कि वह रूप जिसमें वह अस्तित्व में रहता है कितना परिवर्तनशील है, वह एक भी जीवित प्राणी को बनाने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, सभी चीज़ों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाओं और नियमों को निर्धारित करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु पर शासन और नियन्त्रण करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है। ब्रह्मांड और नभमंडल के भीतर, एक भी व्यक्ति या वस्तु नहीं है जो उससे उत्पन्न हुआ हो या उसके द्वारा अस्तित्व में बना हुआ हो; एक भी व्यक्ति या वस्तु नहीं है जिस पर उसके द्वारा शासन किया जाता हो या उसके द्वारा नियन्त्रण किया जाता हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीना है, बल्कि, उसे परमेश्वर के सारे आदेशों और आज्ञाओं को भी मानना होगा। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान के लिए भूमि की सतह पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी छूना कठिन है; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान के पास इतनी भी आज़ादी नहीं है कि वह भूमि की सतह पर से एक चींटी को हटा सके, परमेश्वर द्वारा सृजित इंसान को हटाने की तो बात ही क्या है। परमेश्वर की नज़रों में शैतान पहाड़ों के सोसन फूलों, हवा में उड़ते हुए पक्षियों, समुद्र की मछलियों और पृथ्वी के कीड़े-मकौड़ों से भी कमतर है। सभी चीज़ों के बीच में उसकी भूमिका यह है कि वह सभी चीज़ों की सेवा करे, मानवजाति के लिए कार्य करे, परमेश्वर और उसकी प्रबंधकीय योजना के कार्य करे। इसके बावजूद कि उसका स्वभाव कितना ईर्ष्यालु है, उसका सार कितना बुरा है, एकमात्र कार्य जो वो कर सकता है वह है आज्ञाकारिता से अपने कार्यों को करना : परमेश्वर की सेवाके योग्य होना, परमेश्वर के कार्यों में पूरक होना। शैतान का सार-तत्व और हैसियत ऐसे ही हैं। उसका सार जीवन से जुड़ा हुआ नहीं है, सामर्थ्‍य से जुड़ा हुआ नहीं है, अधिकार से जुड़ा हुआ नहीं है; वह परमेश्वर के हाथों में मात्र एक खिलौना है, परमेश्वर की सेवा में लगा मात्र एक मशीन है!

शैतान के वास्तविक चेहरे को समझने के बाद भी, बहुत से लोग नहीं जानते हैं कि अधिकार क्या है, तो मैं तुम्हें बताता हूँ! स्वयं अधिकार का वर्णन परमेश्वर की सामर्थ्‍य के रूप में किया जा सकता है। पहले, यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ्‍य दोनों सकारात्मक हैं। उनका किसी नकारात्मक चीज़ से कोई संबंध नहीं है, वे किसी भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी से जुड़े हुए नहीं हैं। परमेश्वर की सामर्थ्‍य किसी भी तरह की चीज़ की सृष्टि करने में सक्षम है जिनके पास जीवन और चेतना हो, यह परमेश्वर के जीवन के द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर जीवन है, इस प्रकार वह सभी जीवित प्राणियों का स्रोत है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों को परमेश्वर के हर एक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात् परमेश्वर के मुँह के वचनों के अनुसार अस्तित्व में आना, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जीना और प्रजनन करना, उसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन करता और आज्ञा देता है और उसमें, सदा-सर्वदा के लिए कभी भी कोई भटकाव नहीं होगा। किसी व्यक्ति या वस्तु में ये चीज़ें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता ही ऐसी सामर्थ्‍य को धारण करता और रखता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है। इस प्रकार, चाहे वह शब्द स्वयं "अधिकार" हो या इस अधिकार का सार, प्रत्येक को सिर्फ सृष्टिकर्ता के साथ ही जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान व सार का एक प्रतीक है, यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत को दर्शाता है; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी भी व्यक्ति या वस्तु को "अधिकार" शब्द के साथ जोड़ा नहीं जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक व्याख्या है।

यद्यपि शैतान अय्यूब को लालच भरी नज़रों से देख रहा था, परन्तु बिना परमेश्वर की इजाज़त के वह अय्यूब के शरीर के एक बाल को भी छूने की हिम्मत नहीं कर सकता था। यद्यपि वह स्वाभाविक रूप से बुरा और निर्दयी है, किन्तु परमेश्वर के द्वारा उसे आज्ञा दिये जाने के बाद, शैतान के पास उसकी आज्ञा में बने रहने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। इस प्रकार, जब शैतान अय्यूब के पास आया तो भले ही वह भेड़ों के बीच में एक भेड़िए के समान उन्माद में था, परन्तु उसने परमेश्वर द्वारा तय की गई सीमाओं को भूलने की हिम्मत नहीं की, जो कुछ भी उसने किया उसमें उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने की हिम्मत नहीं की, शैतान को परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से भटकने की हिम्मत नहीं हुई—क्या यह तथ्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचन का विरोध करने की हिम्मत नहीं करता। शैतान के लिए, परमेश्वर के मुँह से निकला हर एक वचन एक आदेश है, एक स्वर्गीय नियम है, परमेश्वर के अधिकार का प्रकटीकरण है—क्योंकि परमेश्वर के हर एक वचन के पीछे, परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने वालों, स्वर्गीय व्यवस्थाओं की आज्ञा का पालन नहीं करने और विरोध करने वालों के लिए, परमेश्वर का दण्ड निहित है। शैतान स्पष्ट रीति से जानता है कि यदि उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ा तो उसे परमेश्वर के अधिकार के उल्लंघन करने, और स्वर्गीय व्यवस्थाओं का विरोध करने का परिणाम स्वीकार करना होगा। ये परिणाम आखिर क्या हैं? कहने की आवश्यकता नहीं है, ये परमेश्वर के द्वारा उसे दिए जाने वाले दण्ड हैं। अय्यूब के खिलाफ शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का एक छोटा-सा दृश्य था, जब शैतान इन कार्यों को अन्जाम दे रहा था, तब वे सीमाएँ जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया था और वे आदेश जिन्हें उसने शैतान को दिया था, वह शैतान के हर कार्य के पीछे के सिद्धांतों की महज एक छोटी-सी झलक थी। इसके अतिरिक्त, इस मामले में शैतान की भूमिका और पद परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में उसकी भूमिका और पद का मात्र एक छोटा-सा दृश्य था, शैतान के द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की महज एक छोटी-सी तस्वीर थी कि किस प्रकार शैतान ने परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में परमेश्वर के विरूद्ध ज़रा-सा भी विरोध करने का साहस नहीं किया। ये सूक्ष्म दर्शन तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में ऐसा कोई व्यक्ति या चीज़ नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गीय कानूनों और आदेशों का उल्लंघन कर सके, और किसी व्यक्ति या वस्तु की इतनी हिम्मत नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा स्थापित की गयी इन स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को तोड़ सके, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं है जो उस दण्ड को पलट सके या उससे बच सके जिसे सृष्टिकर्ता उसकी आज्ञा न मानने वाले लोगों को देता है। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को बना सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें प्रभाव में लाने की सामर्थ्‍य है, किसी व्यक्ति या वस्तु के द्वारा मात्र सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है, यह अधिकार सभी चीज़ों में सर्वोपरि है, इस प्रकार, यह कहना नामुमकिन है कि "परमेश्वर सबसे महान है और शैतान दूसरे नम्बर पर है।" उस सृष्टिकर्ता को छोड़ जिसके पास अद्वितीय अधिकार है, और कोई परमेश्वर नहीं है!

क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? सबसे पहले, क्या परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ्‍य में कोई अन्तर है? वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों की तुलना करते समय, मनुष्य की सामर्थ्‍य को अकसर गलती से अधिकार समझ लिया जाता है, और दोनों को अगल-बगल रखकर तुलना की जाती है। यहाँ क्या चल रहा है? क्या लोग अनजाने में एक स्थान पर दूसरे को रखने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग ऐसा करने से खुद को रोकने में असमर्थ हैं। इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में कोई समाधान चाहते हो तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ्‍य और परमेश्वर के अधिकार का ज़िक्र नहीं करोगे।

मनुष्य की सामर्थ्‍य किस की ओर संकेत करती है? सरल रीति से कहें तो यह एक योग्यता या कुशलता है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा को अतिविशाल मात्रा में फैलाने या पूरा करने में सक्षम बनाती है। क्या इसे अधिकार माना जा सकता है? मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ कितनी भी बड़ी या हितकारी हों, उस व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके पास अधिकार है; अधिक से अधिक, इस प्रकार का फूलना और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के हँसी-ठट्ठे का महज एक प्रदर्शन है; ज़्यादा से ज़्यादा यह एक हँसी-ठिठोली है जिसमें शैतान अपने स्वयं के पूर्वज के समान कार्य करता है जिससे परमेश्वर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके।

अब तुम परमेश्वर के अधिकार को किस तरह से देखते हो? अब चूँकि इन वचनों पर सहभागिता की जा चुकी है, तुम्हारे पास में परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान होना चाहिए। अतः मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ्‍य का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीज़ों के मध्य, तुमने किस में परमेश्वर के अधिकार को देखा है? तुमने उसे कैसे देखा है? मनुष्यों के द्वारा अनुभव किए जाने वाली चार ऋतुओं के सन्दर्भ में, क्या कोई बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, शीत ऋतु के मध्य आपस में परिवर्तन के नियमों को बदल सकता है? बसंत ऋतु में वृक्ष फलते-फूलते हैं; ग्रीष्म ऋतु में वे पत्तों से भर जाते हैं; शरद ऋतु में वे फल उत्पन्न करते हैं और शीत ऋतु में पत्ते झड़ते हैं। क्या कोई इन नियमों को पलट सकता है? क्या यह परमेश्वर के एक पहलू को प्रतिबिम्बित करता है? परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी है? वह किस वजह से अस्तित्व में बना हुआ है? यह वास्तव में परमेश्वर के वचन के कारण, परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में बना हुआ है। जिस वायु को परमेश्वर ने बनाया था क्या व‍ह अब भी अस्तित्व में बनी हुई है? क्या वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेता है परमेश्वर से आयी है? क्या कोई उन चीज़ों को दूर कर सकता है जो परमेश्वर से आती हैं? क्या कोई उनके सार और कार्य को पलट सकता है? क्या कोई परमेश्वर के द्वारा नियुक्त रात और दिन को, परमेश्वर के द्वारा आदेशित रात व दिन के नियम में गड़बड़ी कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कुछ कर सकता है? भले ही तुम रात में न सोओ, रात को दिन के समान लो, तो भी यह रात का समय ही है; तुम अपनी दिनचर्या बदल सकते हो, लेकिन तुम रात और दिन के परिवर्तन के नियम को बदलने में असमर्थ हो—और इस तथ्य को किसी भी व्यक्ति के द्वारा पलटा नहीं जा सकता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या कोई बैल की तरह शेर से भूमि जुतवा सकता है? क्या कोई हाथी को गधे में बदलने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई मुर्गी को बाज के समान आकाश में हवा में लहराने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई भेड़िऐ को भेड़ के समान घास खिलाने में सक्षम हो सकता है? (नहीं।) क्या कोई मछली को सूखी भूमि पर रहने के योग्य बनाने में सक्षम हो सकता है? यह मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्यों नहीं किया जा सकता? क्योंकि परमेश्वर ने मछलियों को पानी में रहने की आज्ञा दी है, इसलिए वे पानी में रहती हैं। वे भूमि पर जीवित रहने में सक्षम नहीं हैं, वे मर जाएँगीं; वे परमेश्वर की आज्ञाओं की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीज़ों के पास उनके अस्तित्व के लिए नियम और सीमा है, हर एक के पास उनका स्वयं का अंतःज्ञान है। इन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया है, किसी मनुष्य के द्वारा उन्हें पलटा और उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर जंगल में ही रहेगा, वह बैल के समान, जो मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के लिए काम करता है, कभी भी पालतू और वफादार नहीं हो सकता। यद्यपि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं और दोनों के पास चार पैर हैं, वे ऐसे जीव हैं जो साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग-अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें दो भिन्न प्रकारों में बाँटा गया है, उनमें से प्रत्येक के पास उनका अपना सहज ज्ञान है, इस प्रकार उन्हें कभी भी आपस में बदला नहीं जाएगा। यद्यपि मुर्गी के पास दो पैर है और बाज के समान पंख भी हैं, फिर भी वह कभी हवा में उड़ नहीं पाएगी। वह ज़्यादा से ज़्यादा एक पेड़ पर उड़ सकती है—और यह उसके सहज ज्ञान के द्वारा निर्धारित किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह सब कुछ परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं के कारण है।

आज मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को प्रगतिशील कहा जा सकता है, मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को प्रभावशील कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत लगातार बढ़ती जा रही है, परन्तु एक अति-महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ है : मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुकी है, चन्द्रमा पर चल चुकी है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, ऊँची तकनीक युक्त जीवन-शैली जीने लगी है, फिर भी, मानवजाति किसी प्राणी को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र—यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति कितनी ऊँचाइयों को छूती है, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती, वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ तय कर दी हैं; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ-वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक-दूसरे की सरहदों का अतिक्रमण नहीं सकते, वे तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहेगा, वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह किसी कार्य को कैसे करे, और जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों का नियम परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर निर्भर नहीं है; न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हिलाया नहीं जा सकता है, बल्कि उसे परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है। यह तथ्य है जिसे मनुष्य नकार नहीं सकता। स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें, ब्रह्मांड, सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य हैं—वे सभी परमेश्वर के अधिकार की अधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार और सृष्टि के आरंभ के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं और परिवर्तित होते हैं। कोई वस्तु या व्यक्ति अपने नियमों को नहीं बदल सकता, न ही अपने स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वह कार्य करता है उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए और परमेश्वर के अधिकार के कारण ही नष्ट होते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है। अब जबकि इतना सब कुछ कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर की हैसियत का प्रतीक है? क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा परमेश्वर के अधिकार को धारण किया जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु या चीज़ द्वारा उसका अनुकरण, रूप धारण या उसका स्थान लिया जा सकता है?

सृष्टिकर्ता की पहचान अद्वितीय है और तुम्हें बहु-ईश्वरवाद के विचार का पालन नहीं करना चाहिए

यद्यपि मनुष्य की अपेक्षा शैतान की कुशलताएँ और योग्यताएँ कहीं बढ़कर हैं, यद्यपि वह ऐसे काम कर सकता है जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, तुम चाहे शैतान से ईर्ष्या करो या वह जो करता है उसकी आकांक्षा करो, इन चीजों से नफरत करो या घृणा से भर जाओ, चाहे तुम उसे देख पाओ या नहीं, चाहे शैतान कितना भी हासिल कर पाए या वह कितने भी लोगों को धोखा देखर उनसे अपनी आराधना करवाये में और खुद को पवित्र मनवाए, चाहे तुम इसे कैसे भी परिभाषित करो, तुम यह नहीं कह सकते कि उसके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, सिर्फ एक ही परमेश्वर है, इसके अतिरिक्त, तुम्हें यह जानना चाहिए कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही अधिकार है, सभी चीज़ों पर शासन करने और उन पर नियन्त्रण करने की सामर्थ्‍य उसी के पास है। सिर्फ इसलिए कि शैतान के पास लोगों को धोखा देने की क्षमता है, वह परमेश्वर का रूप धारण कर सकता है, परमेश्वर द्वारा किए गए चिन्हों और चमत्कारों की नकल कर सकता है, उसने परमेश्वर के समान ही कुछ समान काम किये हैं, तो तुम भूलवश विश्वास करने लग जाते हो कि परमेश्वर अद्वितीय नहीं है, बल्कि बहुत सारे ईश्वर हैं, बस उनके पास कुछ कम या कुछ ज़्यादा कुशलताएँ हैं और उस सामर्थ्‍य का विस्तार अलग-अलग है जिसे वे काम में लाते हैं। उनके आगमन के क्रम, उनके युग के अनुसार तुम उनकी महानता को आँकते हो, तुम यह विश्वास करने में गलती करते हो कि परमेश्वर से अलग कुछ अन्य देवता हैं, तुम यह सोचते हो कि परमेश्वर की सामर्थ्‍य और उसका अधिकार अद्वितीय नहीं हैं। यदि तुम्हारे विचार ऐसे हैं, यदि तुम परमेश्वर की अद्वितीयता को पहचान नहीं पाते हो, यह विश्वास नहीं करते हो कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, यदि तुम बहु-ईश्वरवाद को महत्व देते हो तो मैं कहूँगा कि तुम जीवधारियों में सबसे निकृष्ट हो, तुम शैतान का साकार रूप हो और तुम निश्चित तौर पर एक बुरे इंसान हो! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं इन वचनों के द्वारा तुम्हें क्या सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि समय, स्थान या तुम्हारी पृष्ठभूमि क्या है, तुम परमेश्वर और किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, या चीज़ के बीच भ्रमित मत हो। भले ही तुम्‍हें स्वयं-परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का सार कितना ही अज्ञात और अगम्य लगे, शैतान के कार्य और शब्द तुम्हारी धारणा और कल्पना से कितना ही मेल खाते हों, वे तुम्हें कितनी ही संतुष्टि प्रदान करते हों, मूर्ख न बनो, इन धारणाओं में भ्रमित मत हो, परमेश्वर के अस्तित्व को नकारो मत, परमेश्वर की पहचान और हैसियत को नकारो मत, परमेश्वर को दरवाज़े के बाहर मत धकेलो और परमेश्वर को हटाकर शैतान को अपना परमेश्‍वर बनाने के लिए उसे अपने हृदय के भीतर मत लाओ। मुझे कोई सन्देह नहीं है कि तुम ऐसा करने के परिणामों की कल्पना करने में समर्थ हो!

यद्यपि मानवजाति को भ्रष्ट किया जा चुका है, फिर भी वह सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन रहती है

शैतान हज़ारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट करता आया है। उसने बेहिसाब मात्रा में बुराइयाँ की हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी धोखा दिया है और संसार में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य का ग़लत इस्तेमाल किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य को बहकाया है और ऐसे-ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने बार-बार परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को भ्रमित और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के अधीन सभी चीज़ें और जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित नियमों और व्यवस्थाओं के अनुसार निरन्तर बने हुए हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान का बुरा स्वभाव और अनियन्त्रित विस्तार बहुत ही गन्दा है, बहुत ही घिनौना और नीच है और बहुत ही छोटा और दुर्बल है। यद्यपि शैतान उन सभी चीज़ों के बीच चलता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा बनाया गया है, फिर भी वह परमेश्वर की आज्ञा के द्वारा ठहराए गए लोगों, वस्तुओं या पदार्थों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। कई हज़ार साल बीत गए हैं, अभी भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए उजियाले और वायु का आनन्द उठाता है, स्वयं परमेश्वर के द्वारा फूँके गए श्वास के द्वारा साँस लेता है, अभी भी परमेश्वर के द्वारा सृजित किए गए फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीड़े-मकौड़ों का आनन्द उठाता है और परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई सभी चीज़ों का मज़ा लेता है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे का स्थान ले रहे हैं; चार ऋतुएँ हमेशा की तरह बदल रही हैं; आसमान में उड़ने वाले कलहँस इस शीत ऋतु मे उड़ जाएँगे और अगले बसंत में फिर वापस भी आएँगे; जल की मछलियाँ नदियों और झीलों को—जो उनका घर है कभी भी नहीं छोड़तीं; ज़मीन के कीटपतंगे (शलभ) गर्मी के दिनों में दिल खोलकर गाते हैं; घास के झींगुर शरद ऋतु के दौरान हवा के साथ समय-समय पर धीमे स्वर में गुनगुनाते हैं; कलहँस समूहों में इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बाज एकान्त में अकेले ही रहते हैं, शेरों के कुनबे शिकार करके अपने आपको बनाए रखते हैं; बारहसिंघा घास और फूलों से दूर नहीं जाते...। सभी चीज़ों के मध्य हर प्रकार के जीवधारी चले जाते हैं फिर आ जाते हैं और फिर चले जाते हैं, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन होते हैं—परन्तु जो बदलता नहीं है वह है उनका सहज ज्ञान और ज़िन्‍दा रहने के नियम। वे परमेश्वर के प्रयोजन और परमेश्वर के पालन-पोषण के अधीन जीते हैं, कोई उनके सहज ज्ञान को बदल नहीं सकता है, न ही कोई उनके ज़िन्दा रहने के नियमों को बिगाड़ सकता है। यद्यपि मानवजाति को, जो सभी चीज़ों के बीच में जीवन बिताती है, शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है उसके द्वारा धोखा दिया गया है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जल, परमेश्वर द्वारा बनाई गई वायु, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों को त्याग नहीं सकता है, मनुष्य फिर भी जीवित रहता है और परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस स्थान में फलता-फूलता है। मनुष्य का सहज ज्ञान नहीं बदला है। मनुष्य अभी भी देखने के लिए आँखों पर, सुनने के लिए कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने हृदय पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों पर निर्भर है, आदि; परमेश्वर ने सब प्रकार का सहज ज्ञान मनुष्य को दिया है जिससे वह इस बात को स्वीकार कर सके कि परमेश्वर का प्रयोजन अपरिवर्तनीय बना रहता है, वे योग्यताएँ जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है कभी भी नहीं बदली हैं, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की मानवजाति की योग्यता नहीं बदली है, मानवजाति की आध्यात्मिक ज़रूरतें नहीं बदली है, अपनी उत्पत्ति का पता लगाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है। उस मनुष्य की वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहता है और जिसने शैतान के द्वारा किए गए रक्तरंजित विध्वंस को सहा है। यद्यपि शैतान ने मनुष्य पर अत्याचार किये हैं, और वह अब सृष्टि के प्रारम्भ के आदम और हव्वा नहीं रहे, बल्कि ऐसी चीज़ों से भर गये हैं जो परमेश्वर के विरूद्ध हैं, जैसे ज्ञान, कल्पनाएँ, विचार, इत्यादि और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भर गए हैं, इस कारण परमेश्वर की दृष्टि में मानवजाति अभी भी वही मानवजाति है जिसे उसने सृजित किया था। परमेश्वर अभी भी मानवजाति पर शासन करता और उसका आयोजन करता है, मानवजाति परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित पथक्रम के अनुसार अभी भी जीवन बिताती है, इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में, मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, गुड़गुड़ाते हुए पेट के साथ, महज गंद में लिपटी हुई, ऐसी प्रतिक्रियाओं के साथ जो थोड़ी धीमी हैं, ऐसी याद्दाश्त के साथ जो उतनी अच्छी नहीं है जितना हुआ करती थी और थोड़ी पुरानी हो गयी है—परन्तु मनुष्य के सारे कार्य और सहज ज्ञान पूरी तरह सुरक्षित है। यह वह मनुष्य है जिसे परमेश्वर बचाने की इच्छा करता है। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी है, सृष्टिकर्ता की आवाज़ को सुनना है, वह खड़ा होकर इस आवाज़ के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगा। इस मनुष्य को सृष्टिकर्ता के रूप को देखना है और वह अन्य सभी चीज़ों से बेपरवाह हो जाएगा, सब कुछ छोड़ देगा, जिससे अपने आपको परमेश्वर के प्रति समर्पित कर सके और अपने जीवन को भी उसके लिए दे देगा। जब मनुष्य का हृदय सृष्टिकर्ता के हृदय से निकले वचनों को समझेगा तो वह शैतान को ठुकराकर सृष्टिकर्ता की ओर आ जाएगा; जब मनुष्य अपने शरीर से गन्दगी को पूरी तरह धो देगा, एक बार फिर से सृष्टिकर्ता के प्रयोजन और पालन पोषण को प्राप्त करेगा, तब मनुष्य की स्मरण शक्ति पुनः वापस आ जाएगी और इस बार वह सचमुच में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में वापस आ चुका होगा।

14 दिसंबर, 2013

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