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परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

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परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

हमारी पिछली सभा के दौरान हमने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को आपस में साझा किया था। क्या तुम लोगों को स्मरण है कि वह क्या था? मुझे इसे दोहराने दो। हमारी पिछली सहभागिता का विषय था: परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर। क्या यह तुम लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है? इसका कौन सा भाग तुम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है? परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव या स्वयं परमेश्वर? तुम लोगों को किस में सबसे ज्यादा रूचि है? तुम लोग किस भाग के विषय में सबसे अधिक सुनना चाहते हो? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव को उसके कार्य के हर एक पहलु में देखा जा सकता है, और उसके स्वभाव को हमेशा उसके कार्य और सभी स्थानों में प्रकट होता है, और वास्तव में यह स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधकीय योजना में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते हैं।

परमेश्वर के कार्य के विषय में हमारी पिछली सभा की विषय-वस्तु बाइबिल में दर्ज है जो बहुत पहले घटित हुई थी। वे सब के सब परमेश्वर एवं मनुष्य की कहानियां थीं, और वे मनुष्य के साथ घटित हुईं और उसी समय उन्होंने परमेश्वर की भागीदारी एवं अभिव्यक्ति को शामिल किया, अतः ये कहानियाँ परमेश्वर को जानने के लिए विशेष मूल्य एवं महत्व रखती हैं। मनुष्य की सृष्टि करने के तुरन्त बाद, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ संलग्न होना और मनुष्य से बात करना शुरू कर किया था, और उसका स्वभाव मनुष्य पर प्रकट होना आरम्भ हो गया था। दूसरे शब्दों में, जब पहली बार परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न हुआ तब से वह बिना रुके वह अपने सार और स्वरूप को मनुष्य पर सार्वजनिक करने लगा था। इसके बावजूद कि प्रारम्भिक लोग या वर्तमान लोग इसे देखने या समझने के योग्य हैं या नहीं, संक्षेप में परमेश्वर मनुष्य से बात करता है और मनुष्य के बीच कार्य करता है, अपने स्वभाव को प्रकट करता है और अपने सारको अभिव्यक्त करता है—जो एक तथ्य है, और किसी भी व्यक्ति के द्वारा इसे नकारा नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर सार, और स्वरूप सारवह निरन्तर जारी रहता है और प्रकट होता है जब वह मनुष्य के साथ कार्य करता है और संलग्न होता है। उसने किसी भी चीज़ को मनुष्य से कभी नहीं छिपाया है या कभी गुप्त नहीं रखा है, परन्तु इसके बदले उसे सार्वजनिक किया है और बिना कुछ छिपाए अपने स्वयं के स्वभाव को सार्वजानिक किया है। इस प्रकार, परमेश्वर आशा करता है कि मनुष्य उसे जान सकता है और उसके स्वभाव एवं सार को समझ सकता है। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य उसके स्वभाव एवं सार से ऐसा व्यवहार करे जैसे कि वे अनन्त रहस्य हों, न ही वह यह चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर को ऐसा समझे कि वह एक पहेली हो जिसको कभी भी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब मानवजाति परमेश्वर को जान जाती है केवल तभी मनुष्य आगे का मार्ग जान सकता है और परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करने के योग्य हो सकता है, और केवल ऐसी ही मानवजाति सचमुच में परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिता सकती है, और ज्योति में जीवन बिता सकती है, और परमेश्वर की आशीषों के मध्य जीवन बिता सकती है।

वे वचन एवं वह स्वभाव जिन्हें परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रकट किया गया था वे उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उस के सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न होता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह क्या कहता है या करता है, या वह कौन सा स्वभाव प्रकट करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के विषय में क्या देखता है, क्योंकि वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य कितना कुछ एहसास करने, बूझने या समझने के योग्य है, यह सब कुछ परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है—मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा! यह सन्देह से परे है! मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि जिस प्रकार वह लोगों से अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार हों, कि जो वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसे करें, कि जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार जीवन जीएं, और जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार परमेश्वर की इच्छा की सम्पूर्णता को पूरा करने के योग्य बनें। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अविभाज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने स्वभाव और स्वरूप को जारी करता है और उसी समय वह मनुष्य से मांग कर रहा है। इसमें कुछ असत्य नहीं है, कोई बहाना नहीं है, कोई गोपनीयता नहीं है, और कोई सजावट नहीं है। फिर भी मनुष्य जानने में क्यों असमर्थ है, और क्यों वह परमेश्वर के स्वभाव को कभी स्पष्ट रूप से एहसास करने के योग्य नहीं हो पाया है? और क्यों उसने कभी परमेश्वर की इच्छा का एहसास नहीं किया है? जिसे परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रदर्शित किया गया है यह वही है जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है, और उसके सच्चे स्वभाव का हर एक छोटा सा भाग एवं विशेष पहलू है—अतः मनुष्य क्यों नहीं देख सकता है? मनुष्य क्यों ज्ञान को पूरी तरह से समझने में असमर्थ है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और यह कारण क्या है? सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही, मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं किया है। प्राचीन समयों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के सम्बन्ध में क्या किया था, वह मनुष्य जिसे बस अभी अभी सृजा गया था, उस मनुष्य ने उससे एक साथी से बढ़कर व्यवहार नहीं किया था, कोई ऐसा जिस पर भरोसा किया जा सके, और उसके पास परमेश्वर का कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। दूसरे शब्दों में, वह नहीं जानता था कि इस अस्तित्व के द्वारा क्या जारी किया गया था—यह अस्तित्व जिस पर वह भरोसा रखता था और उसे अपने साथी के रूप में देखता है—वह परमेश्वर का सार था, न ही वह जानता था कि यह प्रभावशाली अस्तित्व वह परमेश्वर है जो सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। सरल रूप से कहें, उस समय के लोगों के पास परमेश्वर की ज़रा सी भी जानकारी नहीं थी। वे नहीं जानते थे कि स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों को उसी के द्वारा बनाया गया है, और वे इस बात से अनजान थे कि वह कहाँ से आया था, और इसके अतिरिक्त, कि वह कौन था। वास्तव में, उस बीते समय में परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा नहीं करता था कि वह उसे जाने, या उसे समझे, या वह सब कुछ जो उसने किया था उसे समझे, या उसकी इच्छा के विषय में जानकारी प्राप्त करे, क्योंकि ये मानवजाति की सृष्टि के बाद के अति प्राचीन समय थे। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के कार्य के लिए तैयारियाँ प्रारम्भ की, तब परमेश्वर ने मनुष्य के लिए कुछ किया और साथ ही मनुष्य से कुछ मांग करना शुरू किया, यह बताते हुए कि किस प्रकार परमेश्वर को भेंट चढ़ाएं और आराधना करें। केवल तभी मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में कुछ साधारण विचारों को अर्जित किया था, केवल तभी उसने मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच के अन्तर को जाना था, और यह कि वह परमेश्वर ही है जिसने मानवजाति की सृष्टि की थी। जब मनुष्य जान गया कि परमेश्वर परमेश्वर था और मनुष्य मनुष्य था, तो उसके एवं परमेश्वर के बीच में एक निश्चित दूरी बन गई, तब भी परमेश्वर ने अपेक्षा नहीं की कि मनुष्य के पास उसके विषय में अत्याधिक ज्ञान या गहरी समझ हो। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने कार्य के चरणों एवं परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य से अलग अलग अपेक्षाएं कीं। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के किस पहलू का एहसास करते हो? क्या परमेश्वर वास्तविक है? क्या परमेश्वर की अपेक्षाएं मनुष्य के लिए उचित हैं? परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के बाद अति प्राचीन समयों के दौरान, जब परमेश्वर ने मनुष्य पर विजय एवं सिद्धता का कार्य अभी तक नहीं किया था, और उससे बहुत सारे वचन नहीं कहे थे, तब उसने मनुष्य से थोड़ी सी ही मांग की थी। इसकी परवाह न करते हुए कि मनुष्य ने क्या किया और उसने किस प्रकार व्यवहार किया—भले ही उसने कुछ ऐसे कार्यों को किया जिनसे परमेश्वर को ठेस लगी—फिर भी परमेश्वर ने सब को क्षमा किया और सभी बातों को अनदेखा किया। क्योंकि परमेश्वर जानता था कि उसने मनुष्य को क्या दिया था, और जानता था कि मनुष्य के भीतर क्या था, इस प्रकार वह अपेक्षाओं के स्तर को जानता था जिन्हें उसे मनुष्य से करनी चाहिए। यद्यपि उस समय उसकी अपेक्षाओं का स्तर बहुत ही नीचे था, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका स्वभाव महान नहीं था, या यह कि उसकी बुद्धिमत्ता एवं सर्वसामर्थता सिर्फ खोखले वचन थे। क्योंकि मनुष्य के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को जानने का केवल एक ही मार्ग है: परमेश्वर के प्रबंधन एवं मानवजाति के उद्धार के कार्य के चरण का अनुसरण करने के द्वारा, और उन वचनों को स्वीकार करने के द्वारा जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति से कहा है। परमेश्वर के स्वरूप और परमेश्वर के स्वभाव को जानने से, क्या मनुष्य परमेश्वर से अब भी कहेगा कि उसे अपने वास्तविक व्यक्तित्व को दिखाए? मनुष्य ऐसा नहीं कहेगा, और ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, मनुष्य पहले ही स्वयं सच्चे परमेश्वर को देख चुका होगा, और पहले ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख चुका होगा। यह अवश्य घटित होनेवाला परिणाम है।

जब परमेश्वर का कार्य एवं योजना बिना रुके निरन्तर आगे बढ़ती जाती थी, और जब परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक चिन्ह के रूप में मेघधनुष की वाचा को स्थापित किया कि वह जलप्रलय का इस्तेमाल करके दोबारा कभी संसार का अन्त नहीं करेगा उसके पश्चात्, परमेश्वर के पास ऐसे लोगों को हासिल करने की अत्याधिक तीव्र इच्छा थी जो उसके साथ एक मन के हो सकते थे। इसी प्रकार परमेश्वर के पास भी बहुत ही प्रबल अभिलाषा थी कि ऐसे लोगों को हासिल करे जो पृथ्वी पर उसकी इच्छा को सम्पन्न करने में समर्थ हैं, और इसके अतिरिक्त, लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो अंधकार की शक्तियों को तोड़कर आज़ाद होने में समर्थ हैं, और जो शैतान के द्वारा बांधे न जाएं, और पृथ्वी पर उसकी गवाही देने में समर्थ हैं। लोगों के ऐसे समूह को हासिल करना परमेश्वर की लम्बे समय की इच्छा थी, जिस का वह सृष्टि की रचना के समय से ही इंतज़ार कर रहा था। इस प्रकार, संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा जलप्रलय का उपयोग करने के बावजूद, या मनुष्य के साथ उसकी वाचा के बावजूद, परमेश्वर की इच्छा, मन का प्रारुप, योजना, और आशाएं एक समान बनी रहीं। जो वह करना चाहता था, जिसकी उसने सृष्टि की रचना के समय के बहुत पहले से लालसा की थी, वह यह था कि मानवजाति के मध्य से उन लोगों को हासिल करे जिन्हें उसने हासिल करने की इच्छा की थी—कि लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो उसके स्वभाव को बूझने एवं जानने, और उसकी इच्छा को समझने में समर्थ थे, एक ऐसा समूह जो उसकी आराधना करने में समर्थ थे। लोगों का ऐसा समूह सचमुच में उसके लिए गवाही देने में सक्षम है, और ऐसा कहा जा सकता है कि वे उसके विश्वासपात्र हैं।

आज, आओ हम परमेश्वर के कदमों के निशानों को निरन्तर याद करें और उसके कार्य के चरणों का निरन्तर अनुसरण करें, ताकि हम परमेश्वर के विचारों एवं युक्तियों को, और प्रत्येक चीज़ को उजागर कर सकें जिसका परमेश्वर से सम्बन्ध है, वे सभी चीज़ें इतने लम्बे से "भण्डार में रखी" हुई हैं। इन चीज़ों के माध्यम से हम परमेश्वर के स्वभाव को जान जाएंगे, परमेश्वर के सार को समझ पाएंगे, हम परमेश्वर को अपने हृदयों में आने की अनुमति देंगे, और हम में से प्रत्येक परमेश्वर से अपनी दूरीयों को कम करते हुए धीरे-धीरे परमेश्वर के और करीब आएगा।

हमने पिछले समय जो बातचीत की थी उसका एक भाग इस बात से सम्बन्धित है कि परमेश्वर ने मनुष्य के साथ ऐसी वाचा क्यों बांधी। इस समय, हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंशों के विषय में विचार विमर्श करेंगे। आओ हम पवित्र शास्त्र को पढ़ने के द्वारा प्रारम्भ करें।

क. अब्राहम

1. परमेश्वर अब्राहम से एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

(उत्पत्ति 17:15-17) फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

(उत्पत्ति 17:21-22) परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

2. अब्राहम इसहाक को बलिदान करता है

(उत्पत्ति 22:2-3) उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" अतः अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।

(उत्पत्ति 22:9-10) जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता है जिसे करने का परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय करता है

तो, तुम लोगों ने अभी अभी अब्राहम की कहानी को सुना है। जब बाढ़ ने संसार को नष्ट कर दिया उसके पश्चात् परमेश्वर के द्वारा उसे चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, और जब वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसे मिली। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की जिसका संकेत हमें पवित्र शास्त्र में मिलता हैः "मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर के द्वारा उसे पुत्र दिए जाने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्र शास्त्र निम्नलिखित लेख प्रदान करता हैः "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?" दूसरे शब्दों में, ये दम्पत्ति इतने बूढ़े थे कि सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने अब्राहम से अपनी प्रतिज्ञा की उसके पश्चात् उसने क्या किया? वह हँसता हुआ अपने मुंह के बल गिरा, और अपने आप से कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम ने विश्वास किया कि यह असम्भव था—जिसका अर्थ है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसके लिए एक मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं थी। मनुष्य के दृष्टिकोण से, इसे मनुष्य के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है, और उसी तरह परमेश्वर के द्वारा भी हासिल नहीं किया जा सकता था और यह परमेश्वर के लिए असम्भव था। कदाचित्, अब्राहम के लिए यह हास्यास्पद बात थी: परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी ऐसा लगता है कि वह यह नहीं जानता है कि कोई व्यक्ति जो इतना वृद्ध है वह सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ है; वह सोचता है कि वह मुझे सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति देगा, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—वास्तव में यह असम्भव है! और इस प्रकार, अब्राहम मुँह के बल गिरा और हँसने लगा, और अपने आप में सोचने लगा: असम्भव—परमेश्वर मुझ से मज़ाक कर रहा है, यह सही नहीं हो सकता है! उसने परमेश्वर के वचनों को गम्भीरता से नहीं लिया था। अतः, परमेश्वर की दृष्टि में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धर्मी)। कहाँ यह कहा गया था कि वह एक धर्मी मनुष्य था? तुम लोग सोचते हो कि वे सभी जिन्हें परमेश्वर बुलाता है वे धर्मी, एवं पूर्ण, और ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम लोग सिद्धान्तों में बने रहते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना होगा कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम एक धर्मी मनुष्य है। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए एक मानक होता है। हालाँकि परमेश्वर यह नहीं कहता है कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था, फिर भी अपने आचरण के लिहाज से, अब्राहम के पास परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह एक छोटा सी कल्पना थी? या वह एक बड़े विश्वास वाला व्यक्ति था? नहीं, वह नहीं था! उसकी हँसी एवं विचारों ने यह प्रकट किया कि वह कौन था, अतः तुम लोगों का विश्वास कि वह एक धर्मी व्यक्ति था यह सिर्फ तुम लोगों की कल्पना की उपज है, यह सिद्धान्तों का आँख बन्द कर के पालन करना है, यह एक गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसकी भावभंगिमाओं[क] को देखा था, क्या वह उसके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परन्तु क्या परमेश्वर उस कार्य को बदल देता जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया था? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और दृढ़ निश्चय किया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो उस मामले को पहले से ही पूर्ण किया जा चुका था। न तो मनुष्य के विचार और न ही उसका व्यवहार परमेश्वर को जरा सा भी प्रभावित करेंगे, या परमेश्वर के साथ हस्तक्षेप करेंगे; परमेश्वर अपनी योजना को मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, न ही वह बदलेगा या मनुष्य के बर्ताव के कारण अपनी योजना में उलट-फेर करेगा, जो मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है। तो उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" जो कुछ अब्राहम ने सोचा या कहा था परमेश्वर ने उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। और उसकी उपेक्षा का कारण क्या था? यह इसलिए था क्योंकि उस समय परमेश्वर ने यह मांग नहीं की थी कि मनुष्य को बड़ा विश्वास रखना है, या वह परमेश्वर के अत्याधिक ज्ञान को रखने के योग्य हो, या इसके अतिरिक्त, जो कुछ परमेश्वर के द्वारा किया गया और कहा गया वह उसे पूरी तरह से समझने के योग्य हो। इस प्रकार, उसने यह मांग नहीं की थी कि जो कुछ उसने करने का दृढ़ निश्चय किया था, या वे लोग जिन्हें उसने चुनने का निर्णय किया था, या उसके कार्यों के सिद्धान्तों को मनुष्य पूरी तरह से समझे, क्योंकि मनुष्य का डीलडौल साधारणतः पर्याप्त नहीं था। परमेश्वर ने उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जिस प्रकार उसने अपने आप में व्यवहार किया उसे सामान्य माना। उसने उसकी निंदा नहीं की, या उसे फटकार नहीं लगाई, परन्तु सिर्फ़ यह कहाः "सारा से अगले वर्ष इसी नियुक्त समय में इसहाक उत्पन्न होगा।" जब उसने इन वचनों की घोषणा की उसके पश्चात्, परमेश्वर के लिए यह मामला कदम दर कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, जिसे उसकी योजना के द्वारा पूरा किया जाना था उसे पहले से ही हासिल कर लिया गया था। और इसके लिए प्रबंधों को पूरा करने के बाद, परमेश्वर वहाँ से चला गया। जो कुछ मनुष्य करता या सोचता है, जो कुछ मनुष्य समझता है, मनुष्य की योजनाएं—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई रिश्ता नहीं है। हर एक चीज़ परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार आगे बढ़ती है, उन समयों एवं चरणों के साथ साथ जिन्हें परमेश्वर के द्वारा तय किया गया है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या जानता है परमेश्वर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता है, फिर भी न तो वह अपनी योजनाओं को यों ही जाने देता है, या न ही अपने कार्यों को त्यागता है, क्योंकि मनुष्य विश्वास नहीं करता है या समझता नहीं है। तथ्य इस प्रकार से परमेश्वर की योजना एवं विचारों के अनुसार पूरे होते हैं। यह बिलकुल वही है जिसे हम बाइबल में देखते हैं; परमेश्वर ने इसहाक को ऐसे समय में जन्म लेने दिया जिसे उसने निर्धारित किया था। क्या ये तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य के व्यवहार एवं आचरण ने परमेश्वर के कार्य में बाधा डाला था? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डाला था! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े से विश्वास ने, और परमेश्वर के विषय में उसकी अवधारणाओं एवं कल्पनाओं ने परमेश्वर के कार्य पर असर डाला था? नहीं, उन्होंने कोई असर नहीं डाला था! थोड़ा सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना किसी भी मनुष्य, मामले, या पर्यावरण के द्वारा अप्रभावित है। वह सब कुछ जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया है वह समय पर एवं उसकी योजना के अनुसार खत्म एवं पूर्ण होगा, और उसके कार्य के साथ किसी भी मनुष्य के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर मनुष्य की कुछ मूर्खताओं एवं अज्ञानताओं पर ध्यान नहीं देता है, और यहाँ तक उसके प्रति मनुष्य के कुछ प्रतिरोध एवं अवधारणाओं को भी नज़रअंदाज़ करता है; इसके बदले, वह बिना किसी संकोच के उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए। यह परमेश्वर का स्वभावहै, और उसकी सर्वसामर्थता का प्रतिबिम्ब है।

परमेश्वर के प्रबन्ध का कार्य एवं मानवजाति का उद्धार अब्राहम द्वारा इसहाक के बलिदान के साथ प्रारम्भ होता है।

अब्राहम को एक पुत्र देने के बाद, वे वचन जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था वे पूरे हो गए थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर की योजना यहाँ पर रूक जाती है; इसके विपरीत, मानवजाति के प्रबन्धन एवं उद्धार के लिए परमेश्वर की बहुत ही शोभायमान योजना का बस प्रारम्भ ही हुआ था, और अब्राहम के लिए सन्तान की उसकी आशीष उसकी सम्पूर्ण प्रबन्धकीय योजना की मात्र एक प्रस्तावना थी। उस घड़ी, कौन जानता था कि शैतान के साथ परमेश्वर का युद्ध ख़ामोशी से प्रारम्भ हो चुका था जब अब्राहम ने इसहाक का बलिदान किया था।

परमेश्वर परवाह नहीं करता है यदि मनुष्य मूर्ख है—वह केवल यह मांग करता है कि मनुष्य सच्चा हो

आगे, आओ देखें कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ क्या किया था। उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को निम्नलिखित आज्ञा दी: "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" परमेश्वर का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट था: परमेश्वर अब्राहम से अपने एकलौते पुत्र को जिससे वह प्रेम करता था होमबलि के रूप में देने के लिए कह रहा था। आज के परिप्रेक्ष्य में देखें, क्या परमेश्वर की आज्ञा अभी भी मनुष्य की धारणाओं से भिन्न है? हाँ! वह सब जिसे परमेश्वर ने उस समय किया था वह मनुष्य की धारणाओं के बिलकुल विपरीत और मनुष्य की समझ से बाहर था। उनकी धारणाओं में, लोग निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: जब किस मनुष्य ने विश्वास नहीं किया था, और सोचा था कि यह असम्भव है, तब परमेश्वर ने उसे एक पुत्र दिया, और जब उसे पुत्र प्राप्त हो गया उसके बाद, परमेश्वर ने उससे अपने पुत्र को बलिदान करने के लिए कहा—कितना अविश्वसनीय है! परमेश्वर ने वास्तव में क्या करने का इरादा किया था? परमेश्वर का वास्तविक उद्देश्य क्या था? उसने अब्राहम को बिना शर्त एक पुत्र प्रदान किया था, फिर उसने कहा कि अब्राहम बिना किसी शर्त के बलिदान करे। क्या यह बहुत अधिक था? तीसरे समूह के दृष्टिकोण से, यह न केवल बहुत अधिक था बल्कि कुछ कुछ "बिना किसी बात के मुसीबत खड़ा करने" का मामला था। परन्तु अब्राहम ने स्वयं यह नहीं सोचा कि परमेश्वर बहुत ज़्यादा मांग रहा है। हालाँकि उसमें कुछ ग़लतफहमियां थीं, और वह परमेश्वर के विषय में थोड़ा सन्देहास्पद था, फिर भी वह बलिदान करने के लिए अभी भी तैयार था। इस मुकाम पर, तू क्या देखता है जो यह साबित करता है कि अब्राहम अपने पुत्र का बलिदान करने के लिए तैयार था? इन वाक्यों में क्या कहा जा रहा है? मूल पाठ निम्नलिखित लेख प्रदान करता है: "अतः अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।" (उत्पत्ति 22:3)। "जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।" (उत्पत्ति 22:9-10)। जब अब्राहम ने अपने हाथ को आगे बढ़ाया, और अपने बेटे को मारने के लिए छुरा लिया, तो क्या उसके कार्यों को परमेश्वर के द्वारा देखा गया था? परमेश्वर के द्वारा उन्हें देखा गया था। सम्पूर्ण प्रक्रिया से—आरम्भ से लेकर, जब परमेश्वर ने कहा कि अब्राहम इसहाक का बलिदान करे, उस समय तक जब अब्राहम ने अपने पुत्र का वध करने के लिए वास्तव में छुरा उठा लिया था—परमेश्वर ने अब्राहम के हृदय को देखा था, और उसकी पहले की मूर्खता, अज्ञानता एवं परमेश्वर को ग़लत समझने के बावजूद भी, उस समय अब्राहम का हृदय परमेश्वर के प्रति सच्चा, और ईमानदार था, और वह सचमुच में इसहाक को परमेश्वर को वापस करने वाला था, जो पुत्र परमेश्वर के द्वारा उसे दिया गया था, वापस परमेश्वर को। परमेश्वर ने उस में आज्ञाकारिता को देखा—वही आज्ञाकारिता जिसकी उसने इच्छा की थी।

मनुष्य के लिए, परमेश्वर बहुत कुछ करता है जो समझ से बाहर है और यहाँ तक कि अविश्वसनीय भी है। जब परमेश्वर किसी को आयोजित करने की इच्छा करता है, तो ये आयोजन प्रायः मनुष्य की धारणाओं से भिन्न होते हैं, और उसकी समझ से परे होते हैं, फिर भी बिलकुल यही असहमति एवं अबोधगम्यता ही है जो परमेश्वर का परिक्षण एवं मनुष्य की परीक्षाएं हैं। इसी बीच, अब्राहम अपने आप में ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्रदर्शित करने के योग्य हो गया, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को संतुष्ट करने के योग्य होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी। जब अब्राहम परमेश्वर की मांग को मानने के योग्य हुआ, जब उसने इसहाक का बलिदान किया, केवल तभी परमेश्वर को सचमुच में मानवजाति के प्रति—अब्राहम के प्रति—पुनःआश्वासन एवं स्वीकृति का एहसास हुआ, जिसे उसने चुना था। केवल तभी परमेश्वर को निश्चय हुआ कि यह व्यक्ति जिसे उसने चुना था वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अगुवा था जो उसकी प्रतिज्ञा एवं आगामी प्रबंधकीय योजना को आरम्भ कर सकता था। हालाँकि यह सिर्फ एक परीक्षण एवं परीक्षा थी, परमेश्वर को प्रसन्नता का एहसास हुआ, उसने अपने लिए मनुष्य के प्रेम को महसूस किया, और उसे मनुष्य के द्वारा ऐसा सुकून मिला जैसा उसे पहले कभी नहीं मिला था। जिस घड़ी अब्राहम ने इसहाक को मारने के लिए अपना छूरा उठाया था, क्या परमेश्वर ने उसे रोका? परमेश्वर ने अब्राहम को इसहाक का बलिदान करने नहीं दिया, क्योंकि परमेश्वर की इसहाक का जीवन लेने की कोई मनसा नहीं थी। इस प्रकार, परमेश्वर ने अब्राहम को बिलकुल सही समय पर रोक दिया था। परमेश्वर के लिए, अब्राहम की आज्ञाकारिता ने पहले ही उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था, जो कुछ उसने किया वह पर्याप्त था, और परमेश्वर ने उस परिणाम को पहले ही देख लिया था जिसका उसने इरादा किया था। क्या यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था? ऐसा कहा जा सकता है कि यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, कि यह वह परिणाम था जो परमेश्वर चाहता था, और जिसे परमेश्वर ने देखने की लालसा की थी। क्या यह सही है? हालाँकि, अलग-अलग संदर्भों में, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को परखने के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों का उपयोग करता है, अब्राहम में परमेश्वर ने वह देखा जो वह चाहता था, उसने देखा कि अब्राहम का हृदय सच्चा था, और यह कि उसकी आज्ञाकारिता बिना किसी शर्त के थी, और यह बिलकुल वही "बिना किसी शर्त" की आज्ञाकारिता थी जिसकी परमेश्वर ने इच्छा की थी। लोग अकसर कहते हैं, मैंने पहले ही इसका अर्पण कर दिया है, मैंने पहले ही उसका परित्याग किया है—फिर भी परमेश्वर मुझ से अब भी संतुष्ट क्यों नहीं है? वह मुझे लगातार परीक्षाओं के अधीन क्यों कर रहा है? वह मुझे लगातार क्यों परख रहा है? यह एक तथ्य को प्रदर्शित करता हैः परमेश्वर ने तेरे हृदय को नहीं देखा है, और उसने तेरे हृदय को हासिल नहीं किया है। कहने का तात्पर्य है, उसने ऐसी सत्यनिष्ठा नहीं देखी जैसा तब देखा था जब अब्राहम अपने हाथ से अपने पुत्र को मारने के लिए छुरा उठाने, और उसे परमेश्वर को बलिदान करने के योग्य हो गया था। उसने तेरी बिना शर्त की आज्ञाकारिता को नहीं देखा है, और उसे तेरे द्वारा सुकून नहीं मिला है। तो यह स्वाभाविक है कि परमेश्वर निरन्तर तुझे परख रहा है। क्या यह सही नहीं है? हम इस विषय को यहीं पर छोड़ देंगे। इसके आगे, हम "अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं" के विषय में पढ़ेंगे।

3. अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं

(उत्पत्ति 22:16-18) "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी हुई आशीषों का बिना कांट-छांट किया हुआ लेख है। यह हालाँकि संक्षेप में है, फिर भी इसकी विषय-वस्तु समृद्ध हैः यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी हुई भेंट के कारण को और उसकी पृष्ठभूमि को, और वह क्या था जो उसने अब्राहम को दिया था उसे सम्मिलित करता है। यह आनन्द एवं उत्साह से तर-बतर है जिसके तहत परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, साथ ही साथ यह उन लोगों को हासिल करने के लिए उसकी लालसा की शीघ्रता से भी तर-बतर है जो उसके वचनों को ध्यान से सुनने के योग्य हैं। इस में, हम उन लोगों के प्रति परमेश्वर के लालन पालन एवं कोमलता देखते हैं जो उसके वचनों का पालन करते हैं और उसकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं। और साथ ही हम उस कीमत को भी देखते हैं जिसे उसने लोगों को हासिल करने के लिए चुकाया है, और उस देखभाल एवं विचार को देखते हैं जो उसने इन लोगों को हासिल करने में लगाया है।। इसके अतिरिक्त, वह अंश, जिसमें ये वचन "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," है यह हमें परमेश्वर, और सिर्फ परमेश्वर के द्वारा सहे गए उस कड़वाहट एवं दर्द का, और पर्दों के पीछे उसकी प्रबन्धकीय योजना का सामर्थी एहसास कराती है। यह विचारों को उद्वेलित करने वाला एक अंश है, और एक ऐसा अंश है जो उनके लिए विशेष महत्व रखता है, और उन पर दूरगामी प्रभाव डालता है जो बाद में आए थे।

मनुष्य अपनी ईमानदारी और आज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर की आशीषों प्राप्त करता है

क्या परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी गई आशीष महान थी जिसके विषय में हम यहाँ पढ़ते हैं? यह कितनी महान थी? यहाँ पर एक मुख्य वाक्य हैः "और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी," जो यह दिखाता है कि अब्राहम ने ऐसी आशीषों को प्राप्त किया था जिन्हें किसी और को नहीं दिया गया जो पहले आए थे या बाद में। चूँकि परमेश्वर के द्वारा माँगा गया था, इसलिए जब अब्राहम ने अपने पुत्र—अपने एकलौते प्रिय पुत्र—को परमेश्वर को लौटा दिया (टिप्पणी: यहाँ पर हम "बलिदान" शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते हैं; हमें यह कहना चाहिए कि उसने अपने पुत्र को परमेश्वर को वापस किया), तब परमेश्वर ने न केवल अब्राहम को इसहाक का बलिदान करने की अनुमति नहीं दी, बल्कि उसने उसे आशीषित भी किया। उसने अब्राहम को किस प्रतिज्ञा से आशीषित किया था? उसके वंश को बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा से आशीषित किया था। और उन्हें कितनी मात्रा में बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा की गई थी? बाइबल हमें निम्नलिखित लेख प्रदान करती है: "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा: और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी।" वह सन्दर्भ क्या था जिसके अंतर्गत परमेश्वर ने इन वचनों को कहा था? कहने का तात्पर्य है, अब्राहम ने परमेश्वर की आशीषों को कैसे प्राप्त किया था? उसने उन्हें प्राप्त किया ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर पवित्र शास्त्र में कहता है: "क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" अर्थात्, क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण किया था, क्योंकि उसने वह सब कुछ किया जो परमेश्वर ने कहा, मांगा और आदेश दिया था, जरा सी भी शिकायत के बगैर इस लिए परमेश्वर ने उस से ऐसी प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य है जो उस समय परमेश्वर के विचारों को स्पर्श करता है। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? शायद तुम लोगों ने परमेश्वर के इन वचनों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है कि "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" उनका मतलब है कि, जब परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, तब वह अपनी ही शपथ खा रहा था। जब लोग कसम खाते हैं तो वे किसकी शपथ खाते हैं? वे स्वर्ग की शपथ खाते हैं, कहने का अभिप्राय है, वे ख़ुदा के लिए कसम खाते हैं और परमेश्वर की शपथ खाते हैं। हो सकता है कि लोगों के पास उस घटना की ज़्यादा समझ नहीं है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई थी, परन्तु तुम लोग इस बात को समझने के योग्य होगे जब मैं तुम लोगों को सही व्याख्या प्रदान करूंगा। ऐसे मनुष्य से सामना होने पर जो सिर्फ उसके वचनों को सुन सकता है लेकिन उसके हदय को नहीं समझ सकता है उसने एक बार फिर से परमेश्वर को अकेला और खोया हुआ महसूस कराया। निराशा में—और, ऐसा कहा जा सकता है, अवचेतन रूप से—परमेश्वर ने कुछ ऐसा किया जो बहुत ही स्वाभाविक था: परमेश्वर ने अपना हाथ अपने हृदय पर रखा और अब्राहम से स्वयं ही प्रतिज्ञा के फल के विषय में कहा, और इससे मनुष्य ने परमेश्वर को यह कहते हुए सुना "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" परमेश्वर के कार्यां के माध्यम से, तू स्वयं के विषय में सोच सकता है। जब तू अपना हाथ अपने हृदय पर रखता है और स्वयं से कहता है, तो क्या तेरे पास जो कुछ तू कह रहा है उसके विषय में कोई स्पष्ट विचार होता है? क्या तेरी मनोवृत्ति सच्ची है? क्या तू सच्चाई से, और अपने हृदय से बात करता है? इस प्रकार, हम यहाँ देखते हैं कि जब परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, तब वह सच्चा एवं ईमानदार था। उसी समय अब्राहम से बात करते और उसे आशीष देते समय, परमेश्वर स्वयं से भी बोल रहा था। वह अपने आप से कह रहा थाः मैं अब्राहम को आशीष दूंगा, और उसके वंश को आकाश के तारों के समान अनगिनित करूंगा, और समुद्र के किनारे की रेत के समान असंख्य कर दूंगा, क्योंकि उसने मेरे वचनों को माना है और यह वही है जिसे मैंने चुना है। जब परमेश्वर ने कहा "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," तो परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब्राहम में इस्राएल के चुने हुए लोगों को उत्पन्न करेगा, जिसके बाद वह शीघ्रता से अपने कार्य के साथ इन लोगों की अगुवाई करेगा। अर्थात्, परमेश्वर अब्राहम के वंशजों से परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य का बोझ उठवाएगा, और परमेश्वर का कार्य और वह जिसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था वे अब्राहम के साथ प्रारम्भ होंगे, और वे अब्राहम की सन्तानों में निरन्तर आगे बढेंगे, इस प्रकार वे मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर की इच्छा को साकार करेंगे। तुम लोग क्या कहते हो, क्या यह एक आशीषित बात नहीं है? मनुष्य के लिए, इससे बड़ी और कोई आशीष नहीं है; ऐसा कहा जा सकता है कि यह अत्यंत ही आशीषित बात है। अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीष उसके वंश के बहुगुणित होने के लिए नहीं थी, परन्तु अब्राहम के वंशजों में उसके प्रबंधन, उसके आदेश, और उसके कार्य की उपलब्धि के लिए थी। इसका अर्थ है कि अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीषें अस्थायी नहीं थीं, परन्तु लगातार जारी रहीं जैसे परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना बढ़ती गई। जब परमेश्वर ने कहा, और जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब उसने पहले ही एक दृढ़ निश्चय कर लिया था। क्या इस दृढ़ निश्चय की प्रक्रिया सही थी? क्या यह वास्तविक थी? परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया था कि, उस समय के बाद से, उसकी कोशिशें, वह कीमत जो उसने चुकाई थी, उसका स्वरूप, उसकी हर चीज़, और यहाँ तक कि उसका जीवन भी अब्राहम को और अब्राहम के वंशजों को दे दिया जाएगा। परमेश्वर ने यह भी दृढ़ निश्चय किया कि, इस समूह के लोगों से प्रारम्भ करके, वह अपने कार्यों को प्रदर्शित करेगा, और मनुष्य को अनुमति देगा कि वह उसकी बुद्धि, अधिकार और सामर्थ को देखे।

ऐसे लोग जो परमेश्वर को जानते हैं और जो उसकी गवाही देने के योग्य हैं उन्हें हासिल करना परमेश्वर की अपरिवर्तनीय इच्छा है

जब वह स्वयं से कह रहा था ठीक उसी समय, परमेश्वर ने अब्राहम से भी कहा था, परन्तु उन आशीषों को सुनने के अलावा जिन्हें परमेश्वर ने उसे दिया था, क्या उस समय अब्राहम परमेश्वर के सभी वचनों में उसकी वास्तविक इच्छाओं को समझने में सक्षम था? वह नहीं था! और इस प्रकार, उस समय, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब भी उसका हृदय सूना सूना और दुख से भरा हुआ था। वहाँ पर अब भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यह समझने या बूझने के योग्य हो कि उसने क्या इरादा किया था एवं क्या योजना बनाई थी। उस समय, कोई भी व्यक्ति—जिसमें अब्राहम भी शामिल है—परमेश्वर से आत्मविश्वास से बात करने के योग्य नहीं था, और कोई भी उस कार्य को करने में उसके साथ सहयोग करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं था जिसे उसे अवश्य करना था। सतही तौर पर देखें, तो परमेश्वर ने अब्राहम को हासिल किया, और ऐसे व्यक्ति को हासिल किया था जो उसके वचनों का पालन कर सकता था। परन्तु वास्तव में, परमेश्वर के विषय में इस व्यक्ति का ज्ञान बमुश्किल शून्य से अधिक था। भले ही परमेश्वर ने अब्राहम को आशीषित किया था, फिर भी परमेश्वर का हृदय अभी भी संतुष्ट नहीं था। इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर संतुष्ट नहीं था? इसका अर्थ है कि उसका प्रबंधन बस अभी प्रारम्भ ही हुआ था, इसका अर्थ है कि ऐसे लोग जिन्हें वह हासिल करना चाहता था, ऐसे लोग जिन्हें वह देखने की लालसा करता था, ऐसे लोग जिन्हें उसने प्रेम किया था, वे अभी भी उससे दूर थे; उसे समय की आवश्यकता थी, उसे इंतज़ार करने की आवश्यकता थी, और उसे धैर्य रखने की आवश्यकता थी। क्योंकि उस समय पर, स्वयं परमेश्वर को छोड़कर, कोई भी नहीं जानता था कि उसे किस बात की आवश्यकता थी, या उसने क्या हासिल करने की इच्छा की थी, या उसने किस बात की लालसा की थी। और इस प्रकार, ठीक उसी समय अत्याधिक उत्साहित महसूस करते हुए, परमेश्वर ने हृदय में भारी बोझ का भी एहसास किया था। फिर भी उसने अपने कदमों को नहीं रोका, और लगातार अपने उस अगले कदम की योजना बनाता रहा जिसे उसे अवश्य करना था।

अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर ने अब्राहम को महान आशीषें प्रदान की थीं सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने परमेश्वर के वचन को सुना था। हालाँकि, सतही तौर पर, यह सामान्य दिखाई देता है, और एक सहज मामला प्रतीत होता है, इस में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं: परमेश्वर विशेष तौर पर मनुष्य की आज्ञाकारिता को सहेजकर रखता है, और अपने विषय में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की ईमानदारी उसे अच्छी लगती है। परमेश्वर को यह ईमानदारी कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग नहीं समझ सकते हो कि उसे कितना अच्छा लगता है, और शायद ऐसा कोई भी नहीं है जो इसे समझ सके। परमेश्वर ने अब्राहम को एक पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, परमेश्वर ने अब्राहम से अपने पुत्र को बलिदान करने के लिए कहा। अब्राहम ने अक्षरशः परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी ईमानदारी ने परमेश्वर को द्रवित किया और उसकी ईमानदारी को परमेश्वर के द्वारा संजोकर रखा गया था। परमेश्वर ने इसे कितना संजोकर रखा? और उसने क्यों इसे संजोकर रखा था? एक समय पर जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को नहीं बूझा था या उसके हृदय को नहीं समझा था, तब अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिस ने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कंपा दिया, तथा इस से परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का एहसास हुआ, और परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को हासिल करने के आनन्द को लेकर आया जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने के योग्य था। यह संतुष्टि एवं आनन्द उस प्राणी से आया जिसे परमेश्वर के हाथ से रचा गया था, और जब से मनुष्य की सृष्टि की गई थी, यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को अर्पित किया था और जिसको परमेश्वर के द्वारा अत्यंत सहेजकर रखा गया था। इस बलिदान का इंतज़ार करते हुए परमेश्वर ने बहुत ही कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे मनुष्य की ओर से दिए गए प्रथम महत्वपूर्ण भेंट के रूप में लिया, जिसे उसने सृजा था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उस कीमत के प्रथम फल को दिखाया जिसे उसने चुकाया था, और इससे वह मानवजाति में आशा देख सका। इसके बाद, परमेश्वर के पास ऐसे लोगों के समूह के लिए और भी अधिक लालसा थी जो उसका साथ दें, उसके साथ ईमानदारी से व्यवहार करें, ईमानदारी के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यहाँ तक आशा की थी कि अब्राहम निरन्तर जीवित रहता, क्योंकि वह चाहता था कि ऐसा हृदय उसके साथ संगति करे उसके साथ रहे जैसे वह उसके प्रबंधन में निरन्तर बना रहा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या चाहता था, यह सिर्फ एक इच्छा थी, सिर्फ एक विचार था—क्योंकि अब्राहम मात्र एक मनुष्य था जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने के योग्य था, और उसके पास परमेश्वर की थोड़ी सी भी समझ या ज्ञान नहीं था। वह ऐसा व्यक्ति था जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से पूरी तरह रहित थाः परमेश्वर को जानना, परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य होना, और परमेश्वर के साथ एक मन होना। और इस लिए, वह परमेश्वर के साथ नहीं चल सका। अब्राहम के द्वारा इसहाक के बलिदान में, परमेश्वर ने उस में ईमानदारी एवं आज्ञाकारिता को देखा था, और यह देखा था कि उसने परमेश्वर के द्वारा अपनी परीक्षा का स्थिरता से सामना किया था। भले ही परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता एवं ईमानदारी को स्वीकार किया था, किन्तु वह अब भी परमेश्वर का विश्वासपात्र बनने में अयोग्य था, ऐसा व्यक्ति बनने में अयोग्य था जो परमेश्वर को जानता था, और परमेश्वर को समझता था, और उसे परमेश्वर के स्वभाव के विषय में सूचित किया गया था; वह परमेश्वर के साथ एक मन होने और परमेश्वर की इच्छा को सम्पन्न करने से बहुत दूर था। और इस प्रकार, परमेश्वर अपने हृदय में अभी भी अकेला एवं चिंतित था। परमेश्वर जितना अधिक अकेला एवं चिंतित होता गया, उतना ही अधिक उसे आवश्यकता थी कि वह जितना जल्दी हो सके अपने प्रबंधन के साथ निरन्तर आगे बढ़े, और अपनी प्रबंधकीय योजना को पूरा करने के लिए और जितना जल्दी हो सके उसकी इच्छा को प्राप्त करने के लिए लोगों के ऐसे समूह को हासिल करने और चुनने के योग्य हो जाए। यह परमेश्वर की हार्दिक अभिलाषा थी, और यह शुरुआत से लेकर आज तक अपरिवर्तनीय बनी हुई है। जब से उसने आदि में मनुष्य की सृष्टि की थी, तब से परमेश्वर ने विजयी लोगों के समूह की लालसा की है, ऐसा समूह जो उसके साथ चलेगा और जो उसके स्वभाव को समझने, बूझने और जानने के योग्य है। परमेश्वर की इच्छा कभी नहीं बदली है। इसके बावजूद कि उसे अब भी कितना लम्बा इंतज़ार करना है, इसके बावजूद कि आगे का मार्ग कितना कठिन है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे उद्देश्य कितने दूर हैं जिनकी वह लालसा करता है, परमेश्वर ने मनुष्य के लिए अपनी अपेक्षाओं को कभी पलटा नहीं है या हिम्मत नहीं हारा है। अब मैंने यह कह दिया है, तो क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा की कुछ बातों का एहसास कर सकते हो? शायद जो कुछ तुम लोगों ने एहसास किया है वह बहुत गहरा नहीं है—परन्तु वह धीरे-धीरे आएगा!

अब्राहम के समय के समान ही इस अवधि के दौरान, परमेश्वर ने एक शहर को भी नष्ट किया था। यह शहर सदोम कहलाता था। निःसन्देह, बहुत से लोग सदोम की कहानी से परिचित हैं, परन्तु कोई भी परमेश्वर के विचारों से परिचित नहीं है जो इस नगर के उसके विनाश की पृष्ठभूमि थी।

और इस प्रकार आज, अब्राहम के साथ परमेश्वर के निम्नलिखित संवाद के माध्यम से, हम उस समय के उसके विचारों को सीखेंगे, साथ ही इसी बीच उसके स्वभाव के विषय में भी जानेंगे। इसके आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश को पढ़ें।

ख. परमेश्वर को सदोम नष्ट करना ही होगा

(उत्पत्ति 18:26) यहोवा ने कहा, "यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।"

(उत्पत्ति 18:29) फिर उसने उससे दोबारा यह कहा, कदाचित् वहाँ चालीस मिलें। और उसने कहा, मैं ऐसा न करूँगा।

(उत्पत्ति 18:30) फिर उसने उससे कहा, कदाचित् वहाँ तीस मिलें। और उसने कहा, मैं ऐसा न करूँगा।

(उत्पत्ति 18:31) और उसने कहा, कदाचित् वहाँ बीस मिलें। और उसने कहा, मैं उसका नाश न करूँगा।

(उत्पत्ति 18:32) और उसने कहा, कदाचित् वहाँ दस मिलें। और उसने कहा, मैं उसका नाश न करूँगा।

ये कुछ उद्धरण हैं जिन्हें मैंने बाइबल से चुना है। वे सम्पूर्ण, एवं मूल अनुवाद नहीं हैं। यदि तुम लोग उन्हें देखना चाहते हो, तो तुम लोग स्वयं ही उन्हें बाइबल में देख सकते हो; समय बचाने के लिए, मैंने मूल विषय-वस्तु के एक भाग को हटा दिया है। मैंने यहाँ पर केवल कुछ मुख्य अंशों और वाक्यों का चयन किया है, और कई वाक्यों को हटा दिया है जिनका आज हमारी सहभागिता से कोई सम्बन्ध नहीं है। सभी अंश एवं विषय-वस्तु जिन के विषय में हम सहभागिता करते हैं, हमारा ध्यान कहानियों के विवरणों के ऊपर से और इन कहानियों में मनुष्य के आचरण के ऊपर से हट जाता है; उसके बजाए, हम केवल परमेश्वर के विचारों एवं युक्तियों के विषय में बात करते हैं जो उस समय थे। परमेश्वर के विचारों एवं युक्तियों में, हम परमेश्वर के स्वभाव को देखेंगे, और सभी चीज़ों से जो परमेश्वर ने किया था, हम सच्चे स्वयं परमेश्वर को देखेंगे—और इस में हम अपने उद्देश्य को हासिल करेंगे।

परमेश्वर केवल ऐसे लोगों के विषय में ही चिंता करता है जो उसके वचनों को मानने और उसकी आज्ञाओं का पालन करने के योग्य हैं।

ऊपर दिए गए अंशों में कई मुख्य शब्द समाविष्ट हैं: संख्या। पहला, यहोवा ने कहा कि यदि उसे नगर में पचास धर्मी मिलें, तो वह उस सारे स्थान को छोड़ देगा, दूसरे शब्दों में, वह नगर का नाश नहीं करेगा। अतः क्या वहाँ सदोम के भीतर वास्तव में पचास धर्मी थे? वहाँ नहीं थे। इसके तुरन्त बाद, अब्राहम ने परमेश्वर से क्या कहा? उसने कहा, कदाचित् वहाँ चालीस मिलें। परमेश्वर ने कहा, मैं नाश नहीं करूंगा। इसके आगे, अब्राहम ने कहा, यदि वहाँ तीस मिलें? परमेश्वर ने कहा, मैं नाश नहीं करूंगा। यदि वहाँ बीस मिलें? मैं नाश नहीं करूंगा। दस? मैं नाश नहीं करूंगा। क्या वहाँ नगर के भीतर वास्तव में दस धर्मी थे? वहाँ पर दस नहीं थे—केवल एक ही था। और वह कौन था? वह लूत था। उस समय, सदोम में मात्र एक ही धर्मी व्यक्ति था, परन्तु क्या परमेश्वर बहुत कठोर था या बलपूर्वक मांग कर रहा था जब बात इस संख्या तक पहुंच गयी? नहीं, वह कठोर नहीं था। और इस प्रकार, जब मनुष्य लगातार पूछता रहा, "चालीस हों तो क्या?" "तीस हों तो क्या?" जब वह "दस हों तो क्या" तक नहीं पहुंच गया? परमेश्वर ने कहा, "यदि वहाँ पर मात्र दस भी होंगे तो मैं उस नगर को नाश नहीं करूंगा; मैं उसे बचा रखूंगा, और इन दस के कारण सभी को माफ कर दूंगा।" दस की संख्या काफी दयनीय होती, परन्तु ऐसा हुआ कि, सदोम में वास्तव में उतनी संख्या में भी धर्मी लोग नहीं थे। तो तू देख, कि परमेश्वर की नज़रों में, नगर के लोगों का पाप एवं दुष्टता ऐसी थी कि परमेश्वर के पास उसे नष्ट करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। परमेश्वर का क्या अभिप्राय था जब उसने कहा कि वह उस नगर को नष्ट नहीं करेगा यदि उस में पचास धर्मी मिलें? परमेश्वर के लिए ये संख्याएं महत्वपूर्ण नहीं थीं। जो महत्वपूर्ण था वह यह कि उस नगर में ऐसे धर्मी हैं या नहीं जिन्हें वह चाहता था। यदि उस नगर में मात्र एक धर्मी मनुष्य होता, तो परमेश्वर उस नगर के विनाश के कारण उनकी हानि की अनुमति नहीं देता। इसका अर्थ यह है कि, इसके बावजूद कि परमेश्वर उस नगर को नष्ट करने वाला था या नहीं, और इसके बावजूद कि उसके भीतर कितने धर्मी थे या नहीं, परमेश्वर के लिए यह पापी नगर श्रापित एवं घिनौना था, और इसे नष्ट किया जाना चाहिए, इसे परमेश्वर की दृष्टि से ओझल हो जाना चाहिए, जबकि धर्मी लोगों को बने रहना चाहिए। युग के बावजूद, मानवजाति के विकास की अवस्था के बावजूद, परमेश्वर की मनोवृत्ति नहीं बदलती है: वह बुराई से घृणा करता है, और अपनी नज़रों में धर्मी की परवाह करता है। परमेश्वर की यह स्पष्ट मनोवृत्ति ही परमेश्वर की हस्ती (मूल-तत्व) का सच्चा प्रकाशन है। क्योंकि वहाँ उस नगर के भीतर केवल एक ही धर्मी व्यक्ति था, इसलिए परमेश्वर और नहीं हिचकिचाया। अंत का परिणाम यह था कि सदोम को आवश्यक रूप से नष्ट किया जाएगा। इस में तुम लोग क्या देखते हो? उस युग में, परमेश्वर ने उस नगर को नष्ट नहीं किया होता यदि उसके भीतर पचास धर्मी होते, और तब भी नष्ट नहीं करता यदि दस धर्मी भी होते, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर ने मानवजाति को क्षमा करने और उसके प्रति सहनशील होने का निर्णय लिया होता, या कुछ लोगों के कारण मार्गदर्शन देने का कार्य किया होता जो उसका आदर करने और उसकी आराधना करने के योग्य होते। परमेश्वर मनुष्य की धार्मिकता में बड़ा विश्वास करता है, ऐसे लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसकी आराधना करने के योग्य हैं, और वह ऐसे लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसके सामने भले कार्यों को करने के योग्य हैं।

अति प्राचीन समयों से लेकर आज के दिन तक, क्या तुम लोगों ने कभी बाइबल में पढ़ा है कि परमेश्वर किसी व्यक्ति से सत्य का संवाद करता है, या किसी व्यक्ति को परमेश्वर के मार्ग के बारे में बताया है? नहीं, कभी नहीं। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचन जिनके विषय में हम पढ़ते हैं वे लोगों को केवल यह बताते थे कि क्या करना था। कुछ लोग गए और उसे किया, परन्तु कुछ लोगों ने नहीं किया; कुछ लोगों ने विश्वास किया, और कुछ लोगों ने नहीं किया। बस यही सब कुछ था। इस प्रकार, उस युग के धर्मी लोग—वे जो परमेश्वर की निगाहों में धर्मी थे—महज ऐसे लोग थे जो केवल परमेश्वर के वचन को सुन सकते थे और परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन कर सकते थे। वे ऐसे सेवक थे जिन्होंने परमेश्वर के वचन को मनुष्य के बीच में सम्पन्न किया था। क्या इस प्रकार के लोगों को ऐसे मनुष्य कहा जा सकता था जो परमेश्वर को जानते थे? क्या उन्हें ऐसे लोग कहा जा सकता था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया गया था? नहीं, उन्हें नहीं कहा जा सकता था। और इस प्रकार, उनकी संख्या के बावजूद, परमेश्वर की दृष्टि में क्या ये धर्मी लोग परमेश्वर के विश्वासपात्र कहलाने के योग्य थे? क्या उन्हें परमेश्वर के गवाह कहा जा सकता था? बिलकुल भी नहीं! वे निश्चित तौर पर परमेश्वर के विश्वासपात्र एवं गवाह कहलाने के योग्य नहीं थे। और इस प्रकार परमेश्वर ने ऐसे लोगों को क्या कहा? बाइबल में, पवित्र शास्त्र के उन अंशों तक जिन्हें अभी पढ़ा गया है, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहाँ परमेश्वर ने उन्हें "मेरे सेवक" कहकर सम्बोधित किया है। कहने का तात्पर्य है, उस समय, परमेश्वर की निगाहों में ये धर्मी लोग परमेश्वर के सेवक थे, ये ऐसे लोग थे जो पृथ्वी पर उसकी सेवाकरते थे। और परमेश्वर ने इस विशिष्ट नाम के विषय में किस प्रकार सोचा था? उसने उन्हें ऐसा क्यों कहा था? क्या परमेश्वर के पास ऐसे मापदंड हैं इस बात के विषय में कि वह इन लोगों को अपने हृदय में क्या कहकर पुकारता है? निश्चित तौर पर उसके पास हैं। परमेश्वर के पास मापदंड हैं, इसके बावजूद कि वह लोगों को धर्मी, सिद्ध, ईमानदार, या सेवक कहकर पुकारता है या नहीं। जब वह किसी व्यक्ति को अपना सेवक कहकर पुकारता है, तो उसे दृढ़ विश्वास है कि यह व्यक्ति उसके संदेशवाहकों को ग्रहण करने के योग्य है, और परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने के योग्य है, और जिस बात की आज्ञा संदेशवाहकों के द्वारा दी जाती है वह उसे सम्पन्न कर सकता है। और यह व्यक्ति क्या सम्पन्न करता है? उसे जिसे पृथ्वी पर क्रियान्वित एवं सम्पन्न करने के लिए परमेश्वर मनुष्य को आज्ञा देता है। उस समय, क्या जिसे पृथ्वी पर क्रियान्वित एवं सम्पन्न करने के लिए परमेश्वर मनुष्य को आज्ञा देता है उसे परमेश्वर का मार्ग कहा जा सकता है? नहीं, इसे नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि उस समय, परमेश्वर ने केवल यह माँगा था कि मनुष्य कुछ साधारण चीज़ों को करे; उसने कुछ साधारण आज्ञाओं को बोला था, मनुष्य को केवल कुछ निश्चित चीज़ें करने को कहते हुए, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं। परमेश्वर अपनी योजना के अनुसार कार्य कर रहा था। क्योंकि उस समय, बहुत सी परिस्थितियां तब तक मौजूद नहीं थीं, समय तब तक पूरा नहीं हुआ था, और मानवजाति के लिए परमेश्वर के मार्ग का भार उठाना बहुत मुश्किल था, इस प्रकार परमेश्वर के मार्ग को अभी उसके हृदय से प्रकट होना था। जिन धर्मियों के विषय में परमेश्वर ने कहा था, वे बीस हों या तीस, उन्हें वह अपने सेवकों के रूप में देखता था| जब परमेश्वर के संदेशवाहक इन सेवकों के पास आते, तब वे इन्हें ग्रहण करने, उनकी आज्ञाओं का पालन करने, और उनके वचन के अनुसार कार्य करने के योग्य होते। यह बिलकुल वही था जिसे परमेश्वर की निगाहों में सेवकों के द्वारा किया जाना चाहिए था, और उसे अर्जित किया जाना चाहिए। स्वयं के द्वारा लोगों को विशिष्ट नाम देने में परमेश्वर न्यायसंगत है। वह उन्हें अपने सेवक कहकर नहीं पुकारता है क्योंकि वे वैसे ही थे जैसे अब तुम लोग हो—क्योंकि उन्होंने काफी प्रचार सुना था, वे जानते थे कि परमेश्वर क्या करनेवाला है, वे परमेश्वर की अधिकांश इच्छा को जानते थे, और उसकी प्रबन्धकीय योजना को समझते थे—परन्तु क्योंकि उनकी मानवता सच्ची थी और वे परमेश्वर के वचनों को मानने के योग्य थे; जब परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी, तो जो कुछ वे कर रहे थे वे उसे दर किनार करने के योग्य थे और उसे सम्पन्न करने के योग्य थे जिसकी परमेश्वर ने आज्ञा दी थी। और इस प्रकार, परमेश्वर के लिए, सेवक की उपाधि[ख] के अर्थ में दूसरी परत यह है कि उन्होंने पृथ्वी पर उसके कार्य के साथ सहयोग किया था, और हालाँकि वे परमेश्वर के संदेशवाहक नहीं थे, फिर भी वे पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का निर्वाहन करनेवाले और उन्हें क्रियान्वित करनेवाले थे। तो तुम लोग देखो, कि ये सेवक या धर्मी लोग परमेश्वर के हृदय में बड़ा प्रभाव रखते थे। वह कार्य जिसकी परमेश्वर पृथ्वी पर साहसिक शुरुआत करने वाला था उसे लोगों की सहायता के बिना पूरा नहीं किया जा सकता था, और परमेश्वर के सेवकों के द्वारा ली गई भूमिका को परमेश्वर के संदेशवाहकों के द्वारा बदला नहीं जा सकता था। प्रत्येक नियत कार्य जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने इन सेवकों को दी थी वह उसके लिए अत्याधिक महत्व रखता था, और इस प्रकार वह उन्हें खो नहीं सकता था। परमेश्वर के साथ इन सेवकों के सहयोग के बिना, मानवजाति के मध्य उसका कार्य ठहराव की ओर आ गया होता, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना और परमेश्वर की आशाएं निरर्थक हो गई होतीं।

परमेश्वर उन लोगों के प्रति अत्यंत दयालु है जिनकी वह परवाह करता है, और उन लोगों के प्रति अत्याधिक क्रोधित है जिनसे वह घृणा करताएवं अस्वीकार करता है

बाइबल के लेखों में, क्या सदोम में परमेश्वर के दस सेवक थे? नहीं, वहाँ नहीं थे! क्या वह नगर परमेश्वर के द्वारा बचाए जाने के योग्य था? उस नगर में केवल एक व्यक्ति—लूत— ने परमेश्वर के संदेशवाहकों को ग्रहण किया था। इसका आशय यह है कि उस नगर में केवल एक ही परमेश्वर का दास था, और इस प्रकार परमेश्वर के पास लूत को बचाने और सदोम के नगर को नष्ट करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था। हो सकता है कि अब्राहम और परमेश्वर के बीच का संवाद साधारण दिखाई दे, परन्तु वे कुछ ऐसी बात को प्रदर्शित करते हैं जो बहुत ही गम्भीर हैं: परमेश्वर के कार्यों के कुछ सिद्धान्त होते हैं, और किसी निर्णय को लेने से पहले वह अवलोकन एवं चिंतन करते हुए लम्बा समय बिताएगा; इससे पहले कि सही समय आए, वह निश्चित तौर पर कोई निर्णय नहीं लेगा या एकदम से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगा। परमेश्वर एवं अब्राहम के बीच का संवाद हमें यह दिखाता है कि सदोम को नाश करने का परमेश्वर का निर्णय जरा सा भी ग़लत नहीं था, क्योंकि परमेश्वर पहले से ही जानता था कि उस नगर में चालीस धर्मी नहीं थे, न ही तीस धर्मी थे, या न ही बीस धर्मी थे। वहाँ पर तो दस धर्मी भी नहीं थे। उस नगर में एकमात्र धर्मी व्यक्ति लूत था। वह सब जो सदोम में हुआ था और उसकी परिस्थितियों का परमेश्वर के द्वारा अवलोकन किया गया था, और वे परमेश्वर के लिए उसके हाथ के समान ही चिरपरिचित थे। इस प्रकार, उसका निर्णय ग़लत नहीं हो सकता था। इसके विपरीत, परमेश्वर की सर्वसामर्थता की तुलना में, मनुष्य कितना सुन्न, कितना मूर्ख एवं अज्ञानी, और कितना निकट-दर्शी है। यह वही बात है जिसे हम परमेश्वर एवं अब्राहम के बीच संवादों में देखते हैं। परमेश्वर आरम्भ से लेकर आज के दिन तक अपने स्वभाव को प्रकट करता रहा है। उसी प्रकार यहाँ पर भी परमेश्वर का स्वभाव है जिसे हमें देखना चाहिए। संख्याएँ सरल हैं, और किसी भी चीज़ को प्रदर्शित नहीं करती हैं, परन्तु यहाँ पर परमेश्वर के स्वभाव का अति महत्वपूर्ण प्रकटीकरण है। परमेश्वर पचास धर्मियों के कारण नगर को नाश नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की दया के कारण है? क्या यह उसके प्रेम एवं सहिष्णुता के कारण है? क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव के इस पहलू को देखाहै? भले ही वहाँ केवल दस धर्मी ही होते, फिर भी परमेश्वर इन दस धर्मियों के कारण उस नगर को नष्ट नहीं करता। यह परमेश्वर की सहनशीलता एवं प्रेम है या नहीं? उन धर्मी लोगों के प्रति परमेश्वर की दया, सहिष्णुता और चिंता के कारण, उसने उस नगर को नष्ट नहीं किया होता। यह परमेश्वर की सहनशीलता है। और अंत में, हम क्या परिणाम देखते हैं? जब अब्राहम ने कहा, "कदाचित् वहाँ दस मिलें," परमेश्वर ने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।" इसके बाद, अब्राहम ने और कुछ नहीं कहा —क्योंकि सदोम के भीतर ऐसे दस धर्मी नहीं थे जिनकी ओर उसने संकेत किया था, और उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था, और उस समय उसने जाना कि परमेश्वर ने क्यों सदोम को नष्ट करने के लिए दृढ़ निश्चय किया था। इस में, तुम लोग परमेश्वर के किस स्वभाव को देखते हो? परमेश्वर ने किस प्रकार का दृढ़ निश्चय किया था? अर्थात्, यदि उस नगर में दस धर्मी नहीं होते, तो परमेश्वर उसके अस्तित्व की अनुमति नहीं देता, और वह अनिवार्य रूप से उसे नष्ट कर देता। क्या यह परमेश्वर का क्रोध नहीं है? क्या यह क्रोध परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है? क्या यह स्वभाव परमेश्वर की पवित्र हस्ती (मूल-तत्व) का प्रकाशन है? क्या यह परमेश्वर के धर्मी सार का प्रकाशन है, जिसका अपमान मनुष्य को नहीं करना चाहिए? इस बात की पुष्टि के बाद कि सदोम में दस धर्मी भी नहीं थे, परमेश्वर निश्चित था कि नगर का नाश कर दे, और परमेश्वर उस नगर के भीतर के लोगों को कठोरता से दण्ड देगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था, और वे बहुत ही गन्दे एवं भ्रष्ट थे।

हमने क्यों इन अंशों का इस रीति से विश्लेषण किया है? क्योंकि ये कुछ साधारण वाक्य अत्यंत दया एवं अत्याधिक क्रोध के विषय में परमेश्वर के स्वभाव की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। ठीक उसी समय धर्मियों को सहेजकर रखते हुए, उन पर दया करते हुए, उनको सहते हुए, और उनकी देखभाल करते हुए, परमेश्वर के हृदय में सदोम के सभी लोगों के लिए अत्यंत घृणा थी जो भ्रष्ट हो चुके थे। क्या यह अत्यंत दया एवं अत्याधिक क्रोध था, या नहीं? परमेश्वर ने किस तरह से उस नगर को नष्ट किया था? आग से। और उसने आग का इस्तेमाल करके उसे क्यों नष्ट किया था? जब तू किसी चीज़ को आग के द्वारा जलते हुए देखता है, या जब तू किसी चीज़ को जलाने वाला होता है, तो उसके प्रति तेरी भावनाएं क्या होती हैं? तू इसे क्यों जलाना चाहता है? क्या तू महसूस करता है कि अब तुझे इसकी आवश्यकता नहीं है, यह कि तू इसे अब और नहीं देखना चाहता है? क्या तू इसका परित्याग करना चाहता है? परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल करने का अर्थ है परित्याग, एवं घृणा, और यह कि वह सदोम को अब और देखना नहीं चाहता था। यह वह भावना थी जिसने परमेश्वर से आग द्वारा सदोम का सम्पूर्ण विनाश करवाया। आग का इस्तेमाल दर्शाता है कि परमेश्वर कितना क्रोधित था। परमेश्वर की दया एवं सहनशीलता वास्तव में मौजूद है, किन्तु जब वह अपने क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित करता है तो परमेश्वर की पवित्रता एवं धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलु भी दिखाती है जो किसी गुनाह की अनुमति नहीं देता है। जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह से मानने में समर्थ होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तो परमेश्वर मनुष्य के प्रति अपनी दया से भरपूर होता है; जब मनुष्य भ्रष्टता, घृणा एवं उसके प्रति शत्रुता से भर जाता है, तो परमेश्वर बहुत अधिक क्रोधित होता है। और वह किस हद तक अत्यंत क्रोधित होता है? उसका क्रोध तब तक बना रहता है जब तक वह मनुष्य के प्रतिरोध एवं बुरे कार्यों को फिर कभी नहीं देखता है, जब तक वे उसकी नज़रों के सामने से दूर नहीं हो जाते हैं। केवल तभी परमेश्वर का क्रोध दूर होगा। दूसरे शब्दों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह व्यक्ति कौन है, यदि उनका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है, और परमेश्वर से फिर गया है, कभी वापस नहीं लौटने के लिए, तो इसके बावजूद कि, सभी संभावनाओं या अपनी आत्मनिष्ठ इच्छाओं के अर्थ में वे किस प्रकार अपने शरीर में या अपनी सोच में परमेश्वर की आराधना करने, उसका अनुसरण करने और उसकी आज्ञा मानने की इच्छा करते हैं, जैसे ही उनका हृदय परमेश्वर से दूर हो जाता है, परमेश्वर के क्रोध को बिना रूके तीव्रता से प्रवाहित किया जाएगा। यह कुछ ऐसा होगा कि मनुष्य को पर्याप्त अवसर देने के बाद, जब परमेश्वर अपने क्रोध को प्रचंडता से प्रवाहित करता है, जब एक बार उसके क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित किया जाता है तो उसके बाद इसे वापस लेने का कोई मार्ग नहीं होगा, और वह ऐसे मनुष्य के प्रति फिर कभी दयावान एवं सहनशील नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का ऐसा पहलु है जो किसी गुनाह को बर्दाश्त नहीं करता है। यहाँ, यह लोगों को सामान्य प्रतीत होता है कि परमेश्वर एक नगर को नष्ट करेगा, क्योंकि, परमेश्वर की दृष्टि में, वह नगर जो पाप से भरा हुआ था अस्तित्व में नहीं रह सकता था और निरन्तर बना नहीं रह सकता था, और यह न्यायसंगत था कि इसे परमेश्वर के द्वारा नष्ट किया जाना चाहिए। फिर भी उन बातों में जो परमेश्वर के द्वारा सदोम के विनाश के पहले और उसके बाद घटित हुए थे, हम परमेश्वर के स्वभाव की सम्पूर्णता को देखते हैं। वह उन चीज़ों के प्रति सहनशील एवं दयालु है जो उदार, और खूबसूरत, और भली हैं; ऐसी चीज़ें जो बुरी, और पापमय, और दुष्ट हैं, वह उनके प्रति अत्याधिक क्रोधित होता है, कुछ इस तरह कि वह लगातार क्रोध करता है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो सिद्धान्त एवं अति महत्वपूर्ण पहलु हैं, और, इसके अतिरिक्त, उन्हें प्रारम्भ से लेकर अंत तक परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया गया है: भरपूर दया एवं अत्यंत क्रोध। तुम लोगों में से अधिकतर लोगों ने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, किन्तु तुम में से बहुत कम लोगों ने परमेश्वर के क्रोध की सराहना की होगी। परमेश्वर की दया एवं करूणा को प्रत्येक व्यक्ति में देखा जा सकता है; अर्थात्, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति बहुत अधिक दयालु रहा है। फिर भी कभी कभार—या, ऐसा कहा जा सकता है, कभी नहीं—परमेश्वर ने किसी भी व्यक्ति के प्रति या आज तुम लोगों के बीच के किसी भी समूह के प्रति अत्याधिक क्रोध किया है। शान्त हो जाओ! जल्द ही या बाद में, प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा परमेश्वर के क्रोध को देखा और अनुभव किया जाएगा, किन्तु अभी वह समय नहीं आया है। और ऐसा क्यों है? क्योंकि जब परमेश्वर किसी के प्रति लगातार क्रोधित होता है, अर्थात्, जब वह अपने अत्यंत क्रोध को उन पर तीव्रता से प्रवाहित करता है, तो इसका अर्थ है कि उसने काफी समय से उससे घृणा की है और उसे अस्वीकार किया है, यह कि उसने उनके अस्तित्व को तुच्छ जाना है, और यह कि वह उनकी मौजूदगी को सहन नहीं कर सकता है; जैसे ही उसका क्रोध उनके ऊपर आएगा, वे लुप्त हो जाएंगे। आज, परमेश्वर का कार्य अभी तक उस मुकाम पर नहीं पहुंचा है। परमेश्वर के बहुत अधिक क्रोधित हो जाने पर तुम लोगों में से कोई भी उसके सामने खड़े होने के योग्य नहीं होगा। तो तुम लोग देखते हो कि इस समय परमेश्वर तुम सभी के प्रति अत्याधिक दयालु है, और तुम लोगों ने अभी तक उसका अत्यंत क्रोध नहीं देखा है। यदि ऐसे लोग हैं जो अविश्वास की दशा में बने रहते हैं, तो तुम लोग याचना कर सकते हो कि परमेश्वर का क्रोध तुम लोगों के ऊपर आ जाए, ताकि तुम लोग अनुभव कर सको कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का क्रोध और उसका अनुल्लंघनीय स्वभाव वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं। क्या तुम लोग ऐसी हिम्मत कर सकते हो?

अंतिम दिनों के लोग परमेश्वर के क्रोध को केवल उसके वचनों में देखते हैं, और परमेश्वर के क्रोध को सचमुच में महसूस नहीं करते हैं

क्या परमेश्वर के स्वभाव के वे दो पहलु सहभागिता के योग्य हैं जिन्हें पवित्र शास्त्र के इन अंशों में देखा जाता है? इस कहानी को सुनने के बाद, क्या तुम लोगों के पास परमेश्वर की एक नई समझ है? किस प्रकार की समझ? ऐसा कहा जा सकता है कि उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक, किसी भी समूह ने परमेश्वर के अनुग्रह या दया एवं करूणा का उतना आनन्द नहीं लिया है जितना इस अंतिम समूह ने लिया है। हालाँकि, परमेश्वर ने अंतिम चरण में न्याय एवं ताड़ना का कार्य किया है, और उसने अपना कार्य प्रताप एवं क्रोध के साथ किया है, अधिकतर बार परमेश्वर अपने कार्य को पूरा करने के लिए केवल वचनों का ही उपयोग करता है; वह सिखाने, सींचने, प्रदान करने, और पोषण करने के लिए वचनों का ही उपयोग करता है। इसी बीच, परमेश्वर के क्रोध को हमेशा छिपाकर रखा गया है, और उसके वचनों में परमेश्वर के क्रोधपूर्ण स्वभाव का अनुभव करने के अलावा, बहुत ही कम लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर उसके क्रोध का अनुभव किया है। कहने का तात्पर्य है, न्याय एवं ताड़ना के विषय में परमेश्वर के कार्य के दौरान, हालाँकि परमेश्वर के वचनों में प्रकट क्रोध लोगों को परमेश्वर की महिमा और अपराध के प्रति उसकी असहिष्णुता का अनुभव करने देता है, फिर भी यह क्रोध उसके वचनों से परे नहीं जाता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर मनुष्य को झिड़कने, मनुष्य का खुलासा करने, मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ना देने, और यहाँ तक कि मनुष्य की निंदा करने के लिए वचनों का उपयोग करता है—परन्तु परमेश्वर अभी तक मनुष्य के प्रति अत्यंत क्रोधित नहीं हुआ है, और अपने वचनों के बाहर बमुश्किल ही मनुष्य पर अपने क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित किया है। इस प्रकार, परमेश्वर की दया एवं करूणा जिनका अनुभव मनुष्य के द्वारा इस युग में किया जाता है वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन हैं, जबकि परमेश्वर का क्रोध जिसका अनुभव मनुष्य के द्वारा किया जाता है वह महज उसके कथनों के अन्दाज़ एवं एहसास का प्रभाव है। बहुत से लोग इस प्रभाव को ग़लत रीति से लेते हैं कि ये परमेश्वर के क्रोध का सच्चा अनुभव एवं सच्चा ज्ञान है। परिणामस्वरूप, अधिकतर लोग मानते हैं कि उन्होंने उसके वचनों में परमेश्वर की दया एवं करूणा को देखा है, यह कि उन्होंने मनुष्य के अपराध के विषय में परमेश्वर की असहिष्णुता को भी देखा है, और उन में से अधिकांश लोग मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया एवं सहिष्णुता की सराहना भी करने लगे हैं। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य का व्यवहार कितना बुरा है, या उसका स्वभाव कितना भ्रष्ट है, परमेश्वर ने हमेशा सहन किया है। सहते रहने में, उसका उद्देश्य है कि वे वचन जो उसने कहे हैं, वे कोशिशें जो उसने की है और वह कीमत जो उसने चुकाई है इनके प्रभाव हासिल करने का इंतज़ार उन लोगों में करना जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार के परिणाम का इंतज़ार करने में समय लगता है, और इस में मनुष्य के लिए विभिन्न वातावरण की सृष्टि करने की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे लोग जन्म लेते ही व्यस्क नहीं हो जाते हैं; इस में अट्ठारह या उन्नीस साल लग जाते हैं, और कुछ लोगों को तो बीस या तीस साल लग जाते हैं इससे पहले कि वे परिपक्व होकर व्यस्क हों। परमेश्वर इस प्रक्रिया के पूर्ण होने का इंतज़ार करता है, वह ऐसे समय के आने का इंतज़ार करता है, और वह इस परिणाम के आगमन का इंतज़ार करता है। और उस पूरे समय जब वह इंतज़ार करता है, परमेश्वर अत्यंत दयालु होता है। फिर भी परमेश्वर के कार्य की समयावधि के दौरान बहुत कम संख्या में लोगों को मार गिराया जाता है, और कुछ ही लोगों को परमेश्वर का गम्भीर विरोध करने के कारण दण्ड दिया जाता है। ऐसे उदाहरण परमेश्वर के उस स्वभाव के और भी अधिक बड़े प्रमाण हैं जो मनुष्य के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है, और वे चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर की सहिष्णुता एवं सहनशक्ति के सच्चे अस्तित्व को पूरी तरह से पुष्ट करते हैं। हाँ वास्तव में, इन प्रतीकात्मक उदाहरणों में, इन लोगों में परमेश्वर के स्वभाव के एक हिस्से का प्रकटीकरण परमेश्वर की समूची प्रबन्धकीय योजना को प्रभावित नहीं करता है। वास्तव में, परमेश्वर के कार्य के इस अंतिम चरण में, परमेश्वर ने उस समयावधि के दौरान चुपचाप सहन किया है जिस में वह इंतज़ार करता रहा है, और उसने अपनी सहनशक्ति एवं अपने जीवन को उन लोगों के उद्धार से बदल लिया है जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तू इसे देखता है? परमेश्वर बिना कारण अपनी योजना में उलट-फेर नहीं करता है। वह अपने क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित कर सकता है, और वह दयालु भी हो सकता है; यह परमेश्वर के स्वभाव के दो मुख्य भागों का प्रकटीकरण है। क्या यह बिल्कुल स्पष्ट है, या नहीं है? दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर की बात आती है, तो सही एवं ग़लत, धर्मी एवं अधर्मी, सकारात्मक एवं नकारात्मक—यह सब कुछ मनुष्य को साफ साफ दिखाया जाता है। जो वह करेगा, जो वह पसंद करता है, जिससे वह घृणा करता है—यह सब सीधे तौर पर उसके स्वभाव में प्रतिबिम्बित हो सकता है। ऐसी बातों को परमेश्वर के कार्य में भी स्पष्ट तौर पर और साफ साफ देखा जा सकता है, और वे अस्पष्ट या सामान्य नहीं हैं; इसके बजाए, वे सभी लोगों को परमेश्वर के स्वभाव, और स्वरूप को ख़ास तौर पर ठोस, सही एवं व्यावहारिक रीति से देखने देता है। यही स्वयं सच्चा परमेश्वर है।

परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य से कभी छिपाया नहीं गया है—मनुष्य का हृदय परमेश्वर से भटक गया है

यदि मैं इन चीज़ों के बारे में सहभागिता में विचार विमर्श न करूं, तो तुम लोगों में से कोई भी बाइबल की कहानियों में परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को देखने के योग्य नहीं होगा। यह तथ्य है। यह इसलिए है क्योंकि, हालाँकि बाइबल की इन कहानियों ने उन कुछ चीज़ों को दर्ज किया है जिन्हें परमेश्वर ने किया था, फिर भी परमेश्वर ने सिर्फ कुछ वचनों को ही कहा था, और उसने अपने स्वभाव का सीधे तौर पर परिचय नहीं कराया था या मनुष्य पर खुले तौर पर अपनी इच्छा को प्रकट नहीं किया था। बाद की पीढ़ियों ने इन लिखित दस्तावेज़ो को कहानियों से बढ़कर और कुछ नहीं माना है, और इससे लोगों को लगा कि परमेश्वर अपने आपको मनुष्य से छिपाता है, कि यह परमेश्वर का व्यक्तित्व नहीं है जो मनुष्य से छिपा हुआ है, परन्तु उसका स्वभाव एवं इच्छा है जो मनुष्य से छिपा हुआ है। मेरी आज की सहभागिता के बाद, क्या तुम लोग अभी भी महसूस करते हो कि परमेश्वर मनुष्य से पूरी तरह से छिपा हुआ है? क्या तुम लोग अभी भी यह विश्वास करते हो कि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य से छिपा हुआ है?

उत्पत्ति के समय से ही, परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य के साथ कदम से कदम मिलाता रहा है। इसे मनुष्य से कभी छिपाया नहीं गया है, बल्कि इसे मनुष्य के लिए पूरी तरह से सार्वजनिक किया गया है और सरल बनाया गया है। फिर भी, समय के बीतने के साथ ही, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से और भी अधिक दूर होता गया, और जब मनुष्य की भ्रष्टता और अधिक गहरी होती गई, तो मनुष्य एवं परमेश्वर दूर तथा और अधिक दूर होते गए। आहिस्ता आहिस्ता परन्तु निश्चित रूप से, मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि से ओझल हो गया। मनुष्य परमेश्वर को "देखने" में असमर्थ हो गया, जिससे उसके पास परमेश्वर का कोई "समाचार" नहीं रहा; इस प्रकार, वह नहीं जानता कि परमेश्वर अस्तित्व में है या नहीं, और यहाँ तक चला गया है कि परमेश्वर के अस्तित्व का पूरी तरह से इंकार करता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूपके विषय में मनुष्य की नासमझी इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से छिप गया है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसका हदय परमेश्वर से फिर गया है। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह इस बारे में अनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह उसे प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आया है और उसने हमेशा से परमेश्वर से परहेज किया है। इसके परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। अतः उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं और नहीं गया हैः इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे परमेश्वर पर प्रकट करने के बजाय कि वह उसे देखे, उसने इसे अपने आपके लिए रख लिया है। यह उस तथ्य के विरोध में है कि कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग यह शपथ भी खाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देते हैं, यह कि उन्हें दण्ड दिया जा सकता है यदि वे अपनी शपथ को तोड़ते हैं। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वह परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों को मानने के योग्य है, न ही इसका अर्थ यह है कि उसने अपनी नियति एवं सम्भावनाओं एवं अपना सब कुछ परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन कर दिया है। इस प्रकार, ऐसे शपथ के बावजूद जिन्हें तू परमेश्वर के लिए लेता है या उसके प्रति अपनी मनोवृत्ति के बावजूद, परमेश्वर की दृष्टि में तेरा हृदय उसके प्रति अभी भी अवरुद्ध है, क्योंकि तू केवल परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है किन्तु तू उसे इसका नियन्त्रण करने नहीं देता है। दूसरे शब्दों में, तूने अपना हृदय परमेश्वर को बिलकुल भी नहीं दिया है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए मनभावने शब्द बोलता है; इसी बीच, तूने अपने विभिन्न धूर्त इरादों को, और साथ ही अपने षडयन्त्रों, साजिशों, एवं योजनाओं को परमेश्वर से छिपाया है, और तू अपने भविष्य की सम्भावनाओं एवं नियति को अपने हाथों में कसकर पकड़े रहता है, और अत्यंत भयभीत होता है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ले लिए जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर ने स्वयं के प्रति मनुष्य की ईमानदारी को कभी नहीं देखा है। हालाँकि वह मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, और वह देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करने की इच्छा करता है, और जो चीजें उसके हृदय के भीतर रखी हुई हैं वह उन्हें देख सकता है, फिर भी मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित नहीं है, उसने उसे परमेश्वर के नियन्त्रण में नहीं दिया है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के पास उसका अवलोकन करने का अधिकार है, परन्तु उसके पास उसका नियन्त्रण करने का अधिकार नहीं है। मनुष्य की आत्मनिष्ठ चेतनावस्था में, मनुष्य अपने आपको परमेश्वर की दया पर छोड़ने की इच्छा या इरादा नहीं करता है। मनुष्य ने न केवल अपने आपको परमेश्वर के लिए अवरुद्ध किया है, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जो अपने हृदयों को ढांपने के लिए उपायों के बारे में सोचते हैं, परमेश्वर के विषय में मिथ्या प्रभाव उत्पन्न करने और उसका भरोसा हासिल करने के लिए चिकनी चुपड़ी बातों एवं चापलूसी का उपयोग करते हैं, और परमेश्वर कि दृष्टि से अपने असली चेहरे को छिपाने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर को देखने की अनुमति न देने में उनका उद्देश्य है कि परमेश्वर को अनुमति न दिया जाए कि वह एहसास करे कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देना चाहते हैं, परन्तु उन्हें स्वयं के लिए ही रखना चाहते हैं। इसका गुप्त कारण यह है कि जो कुछ मनुष्य करता है और जो कुछ वह चाहता है उसकी योजना, उसकी गणना, और उसका निर्णय स्वयं मनुष्य के द्वारा ही किया जाता है; उसे परमेश्वर की भागीदारी एवं हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं है, और उसे परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं है। इस प्रकार, चाहे परमेश्वर की आज्ञाओं, एवं उसके महान आदेश के लिहाज से, या उन अपेक्षाओं के लिहाज से जिन्हें परमेश्वर मनुष्य से करता है, मनुष्य का निर्णय अपने स्वयं के इरादों एवं रुचियों पर, और उस समय की अपनी स्वयं की दशा एवं परिस्थितियों पर आधारित होता है। मनुष्य हमेशा न्याय करने और उस मार्ग को चुनने के लिए जिसे उसे लेना चाहिए अपने उस ज्ञान एवं अंतर्दृष्टि का उपयोग करता है जिन से वह परिचित है, और अपनी स्वयं कि बुद्धिमत्ता का उपयोग करता है, और परमेश्वर के हस्तक्षेप एवं नियन्त्रण की अनुमति नहीं देता है। यह मनुष्य का हृदय है जिसे परमेश्वर देखता है।

प्रारम्भ से लेकर आज के दिन तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर के समस्त जीवित प्राणियों एवं जीवधारियों के मध्य, और कोई नहीं केवल मनुष्य ही परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे इस योग्य बनाते हैं कि वह सुने, और उसके पास आंखें हैं जिससे वह देख सकता है, उसके पास भाषा है, और अपने स्वयं के विचार हैं, और स्वतन्त्र इच्छा है। उसके पास वह सब कुछ है जिनकी आवश्यकता होती है जिससे वह परमेश्वर को बोलते हुए सुने, और परमेश्वर की इच्छा को समझे, और परमेश्वर के महान आदेश को स्वीकार करे, और इस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को अपनी सारी इच्छाएं प्रदान करता है, और मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके मन के मुताबिक हो तथा जो उसके साथ चल सके। जब से उसने प्रबंध करना प्रारम्भ किया है, परमेश्वर मनुष्य के लिए इंतजार करता रहा है कि वह अपना हृदय उसे दे, कि वह परमेश्वर को उसे शुद्ध एवं सुसज्जित करने की अनुमति दे, कि उसे परमेश्वर के लिए संतोषप्रद बनाए और परमेश्वर के द्वारा उससे प्रेम किया जाए, कि वह परमेश्वर का आदर करे और बुराई से दूर रहे। परमेश्वर ने हमेशा से ही इस परिणाम की ओर देखा है और इसका इंतजार किया है। क्या बाइबल के लेखों में ऐसे लोग हैं? अर्थात्, क्या बाइबल में ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर को अपना हदय देने के काबिल हैं? क्या इस युग से पहले किसी घटना का उदाहरण है? आज, आओ हम बाइबल के लेखों को निरन्तर पढ़ें और एक नज़र डालें कि इस चरित्र—अय्यूब—के द्वारा जो कुछ किया गया था उसका इस शीर्षक "अपना हृदय परमेश्वर को देना" से कोई सम्बन्ध है या नहीं जिसके विषय में आज हम बातचीत कर रहे हैं। आओ हम देखें कि अय्यूब परमेश्वर के प्रति संतोषप्रद था या नहीं और परमेश्वर द्वारा उससे प्रेम किया गया था या नहीं।

अय्यूब से तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा है? मूल पाठ का उद्धरण देते हुए, कुछ लोग कहते हैं कि अय्यूब "परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था।" "परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था": अय्यूब का मूल आंकलन ऐसा ही था जिसे बाइबल में दर्ज किया गया है। यदि तुम लोगों ने स्वयं के शब्दों का इस्तेमाल किया होता, तो तुम लोग अय्यूब का ठीक ठीक वर्णन कैसे करते? कुछ लोग कहते हैं कि अय्यूब एक अच्छा एवं न्यायसंगत मनुष्य था; कुछ लोग कहते हैं कि उसके पास परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास था; कुछ लोग कहते हैं कि अय्यूब धर्मी एवं दयालु मनुष्य था। तुम लोगों ने अय्यूब के विश्वास को देखा है, कहने का तात्पर्य है, तुम लोग अपने हृदय में अय्यूब के विश्वास के विषय में बड़ा लगाव रखते हो और ईर्ष्यालु हो। तो आज, आओ हम देखें कि अय्यूब के द्वारा क्या धारण किया गया था कि परमेश्वर उससे इतना अधिक प्रसन्न था। इसके आगे, आओ हम नीचे दिए गए पवित्र शास्त्र को पढ़ें।

ग. अय्यूब

1. परमेश्वर के द्वारा और बाइबल में अय्यूब का आंकलन

(अय्यूब 1:1) ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

(अय्यूब 1:5) जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, "कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।" इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।

(अय्यूब 1:8) यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

वह मुख्य बिन्दु क्या है जिसे तुम लोग इन अंशों में देखते हो? पवित्र शास्त्र के ये तीन संक्षिप्त अंश अय्यूब से सम्बन्धित हैं। हालाँकि संक्षिप्त हैं, फिर भी वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वह किस प्रकार का व्यक्ति था। अय्यूब के प्रतिदिन के व्यवहार एवं उसके आचरण के विषय में उनके विवरण के माध्यम से, वे हर एक को बताते हैं कि, आधारहीन होने के बजाए, अय्यूब के विषय में परमेश्वर का आंकलन तथ्यों पर आधारित था। वे हमें बताते हैं कि चाहे यह अय्यूब के विषय में मनुष्य की प्रशंसा है (अय्यूब 1:1), या उसके विषय में परमेश्वर की प्रशंसा है (अय्यूब 1:8), दोनों परमेश्वर एवं मनुष्य के सामने अय्यूब के कार्यों के परिणाम हैं (अय्यूब 1:5)।

पहले, आओ हम अंश संख्या एक को पढ़ें: "ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" बाइबल में अय्यूब का पहला आंकलन, यह वाक्य अय्यूब के विषय में लेखक की प्रशंसा थी। स्वाभाविक रीति से, यह अय्यूब के विषय में मनुष्य के आंकलन को भी दर्शाता है, जो है, "वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" इसके आगे, आओ हम अय्यूब के विषय में परमेश्वर के आंकलन को पढ़ें: "क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है" (अय्यूब 1:8)। दो आंकलनों में से, एक मनुष्य से आया था, और दूसरा परमेश्वर की ओर से निकला था; ये एक समान सन्दर्भ के साथ दो आंकलन थे। तो ऐसा देखा जा सकता है कि मनुष्य अय्यूब के व्यवहार एवं आचरण को जानते थे, और साथ ही परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा भी की गई थी। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के सामने उसका आचरण और परमेश्वर के सामने उसका आचरण एक समान ही था, उसने सभी समयों पर परमेश्वर के सामने अपने व्यवहार एवं अभिप्रेरणा को रखा था, ताकि उन्हें परमेश्वर के द्वारा देखा जा सके, और वह ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। इस प्रकार, परमेश्वर की दृष्टि में, पृथ्वी पर लोगों में से केवल अय्यूब ही खरा एवं सीधा था, और ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अय्यूब के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और अपने प्रतिदिन के जीवन में बुराई से दूर रहने के विषय में विशेष प्रकटीकरण

इसके आगे, आओ हम अय्यूब के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के विषय में विशेष प्रकटीकरण को देखें। उन अंशों के अतिरिक्त जो इसके ऊपर एवं नीचे दिए गए हैं, आओ हम अय्यूब 1:5 को भी पढ़ें, जो अय्यूब के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के विषय में एक विशेष प्रकटीकरण है। यह इस बात से सम्बन्धित है कि उसने किस प्रकार अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर का भय माना और बुराई से दूर रहा; बड़े शानदार ढंग से, उसने न केवल वह किया जो उसे परमेश्वर के प्रति अपने स्वयं के भय के लिए और बुराई से दूर रहने लिए अवश्य करना चाहिए था, बल्कि उसने अपने पुत्रों की तरफ से नियमित रूप से परमेश्वर के सामने होमबलि भी चढ़ाया था। वह इस बात से भयभीत था कि उन्होंने जेवनार करते समय "पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो।" और यह भय अय्यूब में किस प्रकार प्रदर्शित हुआ था? मूल पाठ निम्नलिखित लेख प्रदान करता है: "जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था।" अय्यूब का आचरण हमें यह दिखाता है कि, उसके बाहरी व्यवहार में प्रदर्शित होने के बजाए, परमेश्वर के प्रति उसका भय उसके हृदय के भीतर से आया था, और यह कि परमेश्वर के प्रति उसके भय को सभी समयों पर उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक पहलु में पाया जा सकता है, क्योंकि उसने न केवल अपने आपको बुराई से दूर रखा था, बल्कि अपने पुत्रों की तरफ से बार बार होमबलि चढ़ाता था। दूसरे शब्दों में, अय्यूब न केवल परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने और अपने हृदय में परमेश्वर को त्यागने के विषय में अत्यंत भयभीत था, बल्कि वह इस बात से भी चिंतित था कि उसके पुत्रों ने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया होगा और अपने मनों में उसे त्याग दिया होगा। इस से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय की सच्चाई सूक्ष्म परिक्षण का डटकर मुकाबला करती है, और यह किसी मनुष्य के शक के दायरे से बाहर है। क्या वह ऐसा कभी कभार ही करता था, या हमेशा करता था? पाठ का अंतिम वाक्य है "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।" इन शब्दों का अर्थ है कि अय्यूब कभी कभार ही अपने पुत्रों के पास नहीं जाता था और उन्हें कभी कभार ही नहीं देखता था, या जब उसे अच्छा लगता था, न ही वह परमेश्वर से प्रार्थना के माध्यम से अंगीकार करता था। इसके बजाए, वह लगातार जाता था और अपने पुत्रों को शुद्ध करता था, और उनके लिए होमबलि चढ़ाया करता था। यहाँ पर "निरन्तर" का अर्थ यह नहीं है कि उसने ऐसा एक या दो दिन के लिए किया था, या एक समय के लिए किया था। यह कह रहा है कि परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय का प्रकटीकरण अस्थायी नहीं था, और ज्ञान या बोले गए वचनों पर आ कर नहीं रुका था; इसके बजाए, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की रीति ने उसके हृदय का मार्गदर्शन किया था, उसने उसके व्यवहार को नियन्त्रित किया था, और यह उसके हृदय में उसके अस्तित्व का मूल कारण था। वह इसी रीति से सदैव किया करता था यह दिखाता है कि वह अपने हृदय में हमेशा डरता था कि उसने स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया होगा और साथ ही वह इस बात से भी भयभीत था कि उसके पुत्रों एवं पुत्रियों ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया होगा। यह दर्शाता है कि वह अपने हृदय के भीतर परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की रीति का कितना भार ढोए हुए था। उसने ऐसा लगातार किया क्योंकि वह अपने मन में डरा हुआ एवं भयभीत था—भयभीत इसलिए क्योंकि कदाचित् उसने परमेश्वर के विरूद्ध बुराई एवं पाप किया था, और यह कि कदाचित् वह परमेश्वर के मार्ग से भटक गया था और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ था। ठीक उसी समय, वह अपने पुत्र एवं पुत्रियों के विषय में भी चिंतित था, इस बात से डरते हुए कि उन्होंने परमेश्वर को ठेस पहुंचाया होगा। अपने दैनिक जीवन में अय्यूब का सामान्य आचरण ऐसा ही था। यह बिलकुल यही सामान्य आचरण है जो साबित करता है कि अय्यूब का परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना खोखले शब्द नहीं थे, यह कि अय्यूब सही में ऐसा जीवन जीता था। "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था": ये शब्द हमें परमेश्वर के सामने अय्यूब के प्रतिदिन के कार्यों के विषय में बताते हैं। जब उसने सदैव इसी रीति से किया, तो क्या उसका व्यवहार एवं उसका हृदय परमेश्वर के सामने पहुंचा? दूसरे शब्दों में, क्या परमेश्वर अकसर उसके हृदय एवं उसके आचरण से प्रसन्न होता था? तब, किन परिस्थितियों के अधीन और किस सन्दर्भ में अय्यूब निरन्तर इसी रीति से करता रहा? कुछ लोग लोग कहते हैं कि यह इसलिए था क्योंकि परमेश्वर अय्यूब के सामने अकसर प्रकट होता था जिससे उसने इस रीति से दिखावा किया था; कुछ लोग कहते हैं कि उसने सदैव इसी रीति से कार्य किया था क्योंकि वह बुराई से दूर रहना चाहता था; और कुछ लोग कहते हैं कि कदाचित् उसने सोचा था कि उसका सौभाग्य आसानी से नहीं आया था, और वह जानता था कि यह उसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया था, और इस प्रकार वह परमेश्वर के विरूद्ध पाप करने और उसे ठेस पहुंचाने के परिणामस्वरूप अपनी सम्पत्ति को खोने के विषय में अत्यंत भयभीत था। क्या इनमें से कोई भी दावा सच है? स्पष्ट तौर पर नहीं। क्योंकि, परमेश्वर की दृष्टि में, अय्यूब के विषय में जिस बात को परमेश्वर ने हृदय में संजोकर रखा था वह यह नहीं था कि वह सदैव इसी रीति से किया करता था; उससे बढ़कर, यह परमेश्वर, मनुष्य, और शैतान के सामने उसका आचरण था जब उसे शैतान के हाथों में सौंप दिया गया था और उसकी परीक्षा की गई थी। नीचे दिया गया खण्ड अत्याधिक आश्वस्त करनेवाला प्रमाण देता है, ऐसा प्रमाण जो हमें अय्यूब के विषय में परमेश्वर के आंकलन को दिखाता है। इसके आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।

2. शैतान ने पहली बार अय्यूब को परखा (उसकी भेड़-बकरियां चुरा ली गईं और उसके बच्चों के ऊपर आपदा आई)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

(अय्यूब 1:8) यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

(अय्यूब 1:12) यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना।" तब शैतान यहोवा के सामने से चला गया।

ख. शैतान का जवाब

(अय्यूब 1:9-11) शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

परमेश्वर शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति देता है जिससे अय्यूब के विश्वास को सिद्ध बनाया जाएगा

यहोवा परमेश्वर एवं शैतान के बीच हुए संवाद के विषय में अय्यूब 1:8 वह पहला लेख है जिसे हम बाइबल में देखते हैं। और परमेश्वर ने क्या कहा था? मूल पाठ हमें निम्नलिखित लेख प्रदान करता हैः "यहोवा ने शैतान से पूछा, क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" शैतान के सामने अय्यूब के विषय में यह परमेश्वर का आंकलन था; परमेश्वर ने कहा कि वह एक खरा एवं सीधा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर एवं शैतान के मध्य इन वचनों से पहले, परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया था कि वह अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए शैतान का इस्तेमाल करेगा—यह कि वह अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप देगा। एक लिहाज से, यह इस बात को साबित करेगा कि अय्यूब के विषय में परमेश्वर का अवलोकन एवं आंकलन सटीक और त्रुटिहीन था, और वह अय्यूब की गवाही के जरिए शैतान को लज्जित करेगा; दूसरे लिहाज से, यह परमेश्वर में अय्यूब के विश्वास को और परमेश्वर के प्रति उसके भय को सिद्ध करेगा। इस प्रकार, जब शैतान परमेश्वर के सामने आया, तो परमेश्वर ने अस्पष्ट रुप से बात नहीं की। उसने सीधे मुद्दे की बात की और शैतान से कहाः "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" परमेश्वर के प्रश्न में निम्लिखित अर्थ थाः परमेश्वर जानता था कि शैतान ने सभी स्थानों में भ्रमण किया था, और उसने बार बार अय्यूब की जासूसी की थी, जो परमेश्वर का सेवक था। उसने अकसर उसकी परीक्षा की थी और उस पर आक्रमण किया था, इस बात की कोशिश करते हुए कि वह अय्यूब को बर्बाद करने के लिए कोई मार्ग खोज सके जिससे यह साबित हो कि परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास और परमेश्वर के प्रति उसका भय दृढ़ता से स्थिर नहीं रह सकता था। शैतान भी तत्परता से अय्यूब को तबाह करने के लिए अवसरों को खोजता रहता था, कि शायद अय्यूब परमेश्वर को त्याग सकता था और शैतान को अनुमति दे सकता था जिससे वह उसे परमेश्वर के हाथों से हथिया ले। फिर भी परमेश्वर ने अय्यूब के हृदय में झांका और देखा कि वह खरा एवं सीधा था, और यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने शैतान को यह बताने के लिए एक प्रश्न का उपयोग किया कि अय्यूब एक खरा एवं सीधा मनुष्य है जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, यह कि अय्यूब कभी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और शैतान के पीछे नहीं चलेगा। अय्यूब के विषय में परमेश्वर की सराहना को सुनने के बाद, शैतान के भीतर लज्जा से उत्पन्न एक प्रचण्ड क्रोध ने प्रवेश किया, तथा वह और भी अधिक क्रोधित हो गया, और वह अय्यूब को छीनने के लिए और भी अधिक अधीर हो गया, क्योंकि शैतान ने कभी भी यह विश्वास नहीं किया था कि कोई खरा और सिद्ध भी हो सकता है, या यह कि वे परमेश्वर का भय मान सकते हैं और बुराई से दूर रह सकते हैं। ठीक उसी समय, शैतान ने भी मनुष्य की खराई एवं सीधाई से घृणा की थी, और वह ऐसे लोगों से नफरत करता था जो परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रह सकते थे। और इस प्रकार अय्यूब 1:9-11 में लिखा हुआ है कि "शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" परमेश्वर शैतान के द्वेषपूर्ण स्वभाव से भली भांति वाकिफ था, और पूरी तरह से जानता था कि शैतान ने अय्यूब पर तबाही लाने के लिए बहुत पहले से ही योजना बनाई थी, और शैतान को एक बार फिर से बताने के माध्यम से कि अय्यूब खरा एवं सीधा था और वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, परमेश्वर इस सिलसिले में शैतान को सीधे रास्ते पर लाना चाहता था, और शैतान से उसके असली चेहरे को प्रकट करवाना चाहता था और उससे अय्यूब पर हमला करवाना और उसकी परीक्षा करवाना चाहता था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने जानबूझ कर इस बात पर जोर डाला कि अय्यूब खरा एवं सीधा था, और यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और इसकी सहायता से उसने शैतान से अय्यूब पर हमला करवाया था अय्यूब के प्रति शैतान की घृणा एवं कोप के कारण कि अय्यूब कैसे एक खरा और सीधा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने उस तथ्य के जरिए शैतान को लज्जित किया कि अय्यूब खरा एवं सीधा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और शैतान को पूरी तरह से लज्जित एवं पराजित करके छोड़ दिया जाएगा। उसके बाद, शैतान अय्यूब की खराई, सीधाई, परमेश्वर के भय, या बुराई से दूर रहने के विषय में आगे से फिर कभी सन्देह या दोषारोपण नहीं करेगा। इस रीति से, परमेश्वर का परीक्षण और शैतान की परीक्षा लगभग अपरिहार्य थे। एकमात्र व्यक्ति जो परमेश्वर के परीक्षण और शैतान की परीक्षा का डटकर मुकाबला करने के योग्य था वह केवल अय्यूब था। इस संवाद के आगे, शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति प्रदान की गई थी। इस प्रकार शैतान के हमलों का पहला चक्र आरम्भ हुआ। इन हमलों का निशाना था अय्यूब की सम्पत्ति, क्योंकि शैतान ने अय्यूब के विरुद्ध निम्नलिखित आरोप लगाया था: "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है।" इसके परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने शैतान को अनुमति दी कि अय्यूब के पास जो भी था उसे ले ले—यह वही उद्देश्य था जिसके लिए परमेश्वर ने शैतान से बातचीत की थी। तोभी, परमेश्वर ने शैतान के सामने एक मांग रखी: "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना" (अय्यूब 1:12)। शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति देने के पश्चात् यही वह शर्त थी जिसे परमेश्वर ने रखा था और अय्यूब को शैतान के हाथ में कर दिया था, और यही वह सीमा थी जिसे परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित की थी: उसने शैतान को अय्यूब को हानि न पहुंचाने का आदेश दिया। क्योंकि परमेश्वर पहचान गया था कि अय्यूब खरा एवं सीधा पुरुष था, और उसे विश्वास था कि उसके सामने अय्यूब की खराई एवं सीधाई सन्देह से परे थी, और परीक्षा में पड़ने पर वह दृढ़ता से सामना कर सकता था; इस प्रकार, परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए शैतान को अनुमति दी, परन्तु शैतान पर एक प्रतिबंध लगा दिया: शैतान के पास अय्यूब की सारी सम्पत्ति लेने की अनुमति थी, किन्तु वह उसे अपनी ऊंगली से छू नहीं सकता था। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने उस समय अय्यूब को पूरी तरह से शैतान के हाथों में नहीं दिया था। शैतान अय्यूब की परीक्षा ले सकता था किसी भी माध्यम के द्वारा जिसे वह चाहता था, परन्तु वह स्वयं अय्यूब को हानि नहीं पहुंचा सकता था, उसके सिर के एक बाल को भी नुकसान नहीं पहुंचा सकता था, क्योंकि मनुष्य की हर चीज़ को परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, चाहे मनुष्य जीवित रहे या मर जाए इसका निर्णय परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, और शैतान के पास ऐसा लाइसेंस नहीं है। जब परमेश्वर ने शैतान से इन वचनों को कहा उसके पश्चात्, शैतान शुरुआत करने के लिए और इंतजार नहीं कर सकता था। उसने अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए हर प्रकार के साधन का उपयोग किया था, और बहुत पहले ही अय्यूब ने अपनी बहुत सारी भेड़-बकरियों एवं बैलों को और सारी सम्पत्ति को खो दिया था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उसे दिया गया था। इस प्रकार परमेश्वर की परीक्षाएं उस पर आ गईं।

हालाँकि बाइबल हमें अय्यूब की परीक्षा की शुरुआत के विषय में बताती है, फिर भी क्या अय्यूब स्वयं, वह पुरुष जिसे इन परीक्षाओं के अधीन किया गया था, जानता था कि क्या हो रहा था? अय्यूब मात्र एक नश्वर मनुष्य था; वास्तव में वह उस कहानी के बारे में कुछ भी नहीं जानता था जो उसके पीछे प्रकट हो रही थी। फिर भी, परमेश्वर के प्रति उसके भय, और उसकी खराई एवं सीधाई ने उसे यह महसूस कराया कि परमेश्वर की परीक्षाएं उस पर आ गई थीं। वह नहीं जानता था कि आत्मिक आयाम में क्या घटित हुआ था, न ही वह यह जानता था कि इन परीक्षाओं के पीछे परमेश्वर के इरादे क्या थे। परन्तु वह नहीं जानता था कि इसके बावजूद कि उसके साथ क्या घटित होगा, उसे अपनी खराई एवं सीधाई के प्रति सच्चाई को थामे रहना चाहिए, और उसे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग में बने रहना चाहिए। इन मुद्दों के प्रति अय्यूब की मनोवृत्ति एवं प्रतिक्रिया को परमेश्वर के द्वारा साफ साफ देखा गया था। और उसने क्या देखा था? उसने अय्यूब के हृदय को देखा जो परमेश्वर का भय मानता था, क्योंकि प्रारम्भ से लेकर ठीक उस समय तक जब अय्यूब को परखा नहीं गया था, अय्यूब का हृदय परमेश्वर के सामने खुला हुआ था, इसे परमेश्वर के सामने रखा गया था, और अय्यूब ने अपनी खराई एवं सीधाई का त्याग नहीं किया था, न ही उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की रीति को दूर किया था या उससे पीछे हटा था—और इससे बढ़कर और कोई भी चीज़ परमेश्वर के लिए संतोषजनक नहीं थी। इसके आगे, हम देखेंगे कि अय्यूब किन परीक्षाओं से होकर गुज़रा और वह इन परीक्षाओं से कैसे निपटा। आओ हम पवित्र शास्त्र को पढ़ें।

ग. अय्यूब की प्रतिक्रिया

(अय्यूब 1:20-21) तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"

यह कि अय्यूब इसे अपने ऊपर ले लेता है कि वह सब कुछ वापस करे जो उसके पास है जो परमेश्वर के प्रति उसके भय से उत्पन्न हुआ है

जब परमेश्वर ने शैतान से कहा "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना," उसके पश्चात् शैतान चला गया, उसके तुरन्त बाद ही अय्यूब अचानक और भयंकर हमलों के अधीन हो गया: पहले, उसके बैल एवं गधे लूट लिए गए और उसके सेवकों को मार दिया गया; इसके बाद, उसकी भेड़-बकरियों एवं सेवकों को जलाकर नष्ट कर दिया गया; उसके पश्चात्, उसके ऊंटों को ले लिया गया और उसके सेवकों को मार दिया गया; अंत में, उसके पुत्र एवं पुत्रियों की जान ले ली गई। हमलों की यह श्रृंखला वह यातना थी जिसे अय्यूब ने अपनी पहली परीक्षा के दौरान सहा था। जैसा परमेश्वर के द्वारा आदेशित था, इन हमलों के दौरान शैतान ने केवल अय्यूब की सम्पत्ति और उसके बच्चों को निशाना बनाया था, और स्वयं अय्यूब को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई थी। तोभी, अय्यूब एकदम से एक धनवान पुरुष से जिसके पास अपार धन-सम्पत्ति थी ऐसा व्यक्ति बन गया जिसके पास कुछ भी नहीं था। कोई भी व्यक्ति इस विस्मयकारी आश्चर्यजनक आघात का सामना नहीं कर सकता था या इसके प्रति उचित रीति से प्रतिक्रिया नहीं कर सकता था, फिर भी अय्यूब ने अपने असाधारण पहलु का प्रदर्शन किया। पवित्र शास्त्र निम्नलिखित लेख प्रदान करता है: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् की।" यह सुनने के पश्चात् कि उसने अपने बच्चों और अपनी सारी सम्पत्ति को खो दिया था यह अय्यूब की पहली प्रतिक्रिया थी। सबसे बढ़कर, वह आश्चर्यचकित, या दर्द का मारा हुआ नहीं दिखा, और उसने क्रोध या नफरत को बिलकुल भी प्रकट नहीं किया था। तो तूने देखा कि वह अपने हृदय में पहले से पहचान गया था कि ये आपदाएं महज एक संयोग नहीं थीं, या मनुष्य के हाथों के काम नहीं थे, और वे प्रतिशोध या सज़ा का आगमन तो बिलकुल भी नहीं थे। इसके बजाय, यहोवा की परीक्षाएं उसके ऊपर आ गई थीं; वह यहोवा ही था जो उसकी सम्पत्ति एवं बच्चों को लेना चाहता था। उस दशा में भी अय्यूब बहुत ही शान्त और खुले-दिमाग का था। उसकी खरी एवं सच्ची धार्मिकता ने उसे आपदाओं के विषय में तर्कसंगत रूप से एवं स्वाभाविक रूप से बिलकुल सही फैसला करने और निर्णय लेने के योग्य बनाया था, और उसी के परिणाम में, उसने असाधारण शांति के साथ व्यवहार किया था: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् की।" "अपना बागा फाड़ा" का अर्थ है कि वह निर्वस्त्र था, और उसके पास कुछ नहीं था; "सिर मुढ़ाने" का अर्थ है कि वह एक नवजात शिशु के समान परमेश्वर के सामने लौट गया था; "भूमि पर गिरा, और आराधना की" का अर्थ है कि वह इस संसार में नग्न आया था, और आज उसके पास कुछ भी नहीं है, वह परमेश्वर के पास एक नवजात शिशु के समान वापस लौट गया था। वह सब कुछ जो अय्यूब के ऊपर आया था उसके प्रति उसकी मनोवृत्ति को परमेश्वर के किसी जीवधारी के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता था। यहोवा पर उसका भरोसा विश्वास के आयाम के परे चला गया था; यह परमेश्वर के प्रति उसका भय था, और परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता थी, और उसे इतना कुछ देने के लिए वह न केवल परमेश्वर को धन्यवाद देने के योग्य था, बल्कि उससे ले लेने के लिए भी वह परमेश्वर को धन्यवाद देने के योग्य था। इससे अधिक और क्या, वह इसे अपने ऊपर लेने के योग्य था कि वह सब कुछ वापस करे जो उसका था, जिसमें उसका जीवन भी शामिल था।

परमेश्वर के प्रति अय्यूब का भय एवं आज्ञाकारिता मानवजाति के लिए एक उदाहरण है, और उसकी खराई एवं सीधाई मानवता की पराकाष्ठा थी जिसे किसी मनुष्य को अवश्य धारण करना चाहिए। हालाँकि उसने परमेश्वर को नहीं देखा, फिर भी उसने यह एहसास किया कि परमेश्वर सचमुच में अस्तित्व में है, और इसी एहसास के कारण वह परमेश्वर का भय मानता था—और परमेश्वर के इसी भय के कारण, वह परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने के योग्य था। उसने परमेश्वर को स्वतन्त्रता से शासन करने का अधिकार दिया कि जो कुछ उसके पास है उसे ले ले, फिर भी उसने कोई शिकायत नहीं की, और परमेश्वर के सामने गिर गया और परमेश्वर से कहा कि, इस समय में, भले ही परमेश्वर उसके प्राण ले ले, फिर भी वह ऐसा करने के लिए प्रसन्नता से उसे अनुमति देगा, वह भी बिना किसी शिकायत के। उसका सम्पूर्ण आचरण उसकी खरी एवं सच्ची मानवता के कारण था। कहने का तात्पर्य है, उसकी बेगुनाही, ईमानदारी, एवं उदारता के परिणामस्वरूप, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में अपने एहसास एवं अनुभव में अडिग था, और इस बुनियाद पर उसने स्वयं के विषय में दावा किया था तथा अपनी सोच, व्यवहार, आचरण एवं कार्यों के सिद्धान्तों को परमेश्वर के सामने उसके लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के कार्यों के अनुसार मानकीकृत (उन्नत) किया था जिन्हें उसने सभी चीजों में मध्य देखा था। समय के बीतने के साथ, उसके अनुभवों ने उसमें परमेश्वर का सच्चा एवं वास्तविक भय उत्पन्न किया और उसे बुराई से दूर रखा। यह ईमानदारी का वही स्रोत था जिसके प्रति अय्यूब दृढ़ता से स्थिर रहा। अय्यूब ने ईमानदार, निर्दोष, एवं उदार मानवता को धारण किया था, और उसके पास परमेश्वर का भय मानने का, परमेश्वर की आज्ञा मानने का, और बुराई से दूर रहने का, साथ ही साथ उस ज्ञान का वास्तविक अनुभव था कि "परमेश्वर ने दिया, और परमेश्वर ने ही ले लिया।" केवल इन्हीं हालातों के कारण ही वह शैतान के ऐसे भयंकर हमलों के बीच दृढ़ता से खड़े रहने और गवाही देने के योग्य पाया था, और केवल उन्हीं के कारण ही वह तब परमेश्वर को निराश नहीं करने और परमेश्वर को एक संतोषजनक उत्तर देने के योग्य हो पाया था जब परमेश्वर की परीक्षाएं उसके ऊपर आ गई थीं। हालाँकि प्रथम परीक्षा के दौरान अय्यूब का आचरण बिलकुल स्पष्ट था, फिर भी आने वाली पीढ़ियां ऐसी स्पष्टवादिता को हासिल करने के विषय में आश्वस्त नहीं थीं, यहां तक कि जीवन भर के प्रयासों के बाद भी न ही वे अय्यूब के आचरण को आवश्यक रूप से धारण करेंगे जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। आज, अय्यूब की स्पष्टवादी आचरण से सामना होने पर, और इसकी तुलना "मृत्यु तक सम्पूर्ण आज्ञाकारिता एवं वफ़ादारी" की उस पुकार एवं दृढ़ निश्चय से करने पर जिसे उन लोगों के द्वारा परमेश्वर को दिखाया जाता है जो परमेश्वर पर विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, तो क्या तुम लोग अत्यंत लज्जित महसूस करते हो या नहीं करते हो?

जब तू उन सब के विषय में पवित्र शास्त्र में पढ़ता है जिसे अय्यूब और उसके परिवार के द्वारा सहा गया था, तो तेरी प्रतिक्रिया क्या होती है? क्या तू अपने ही विचारों में खो जाता है? क्या तू बहुत अधिक आश्चर्यचकित हो जाता है? क्या वे परीक्षाएं जो अय्यूब पर आ पड़ीं उन्हें "खौफनाक" कहा जा सकता है? अन्य शब्दों में, जैसा पवित्र शास्त्र में वर्णन किया गया है अय्यूब की परीक्षाओं के विषय में पढ़ना काफी भय उत्पन्न करता है, वे वास्तव में कैसी रही होंगी इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। तो तूने देखा, कि जो कुछ अय्यूब पर घटा यह कोई "व्यावहारिक अभ्यास" नहीं था, परन्तु एक असली "युद्ध" था, जिसमें वास्तविक "बंदूकें" और "गोलियां" शामिल थीं। परन्तु किसके द्वारा उसे परीक्षाओं के अधीन किया गया था? वास्तव में उन्हें शैतान के द्वारा क्रियान्वित किया गया था, उन्हें व्यक्तिगत तौर पर शैतान के द्वारा क्रियान्वित किया गया था—परन्तु उन्हें परमेश्वर के द्वारा अधिकृत किया गया था। क्या परमेश्वर ने शैतान को बताया था कि उसे किन माध्यमों से अय्यूब को परखना है? उसने नहीं बताया था। परमेश्वर ने उसे सिर्फ एक शर्त दी थी, उसके बाद परीक्षाएं अय्यूब पर आ पड़ीं। जब ये परीक्षाएं अय्यूब पर आ पड़ीं, तो इसने लोगों को शैतान की बुराई एवं कुरूपता का, और मनुष्य के प्रति उसकी दुर्भावना एवं घृणा और परमेश्वर के प्रति शत्रुता का एहसास कराया। इसमें हम देखते हैं कि शब्दों में इसका वर्णन नहीं किया जा सकता कि यह परीक्षा कितनी भयावह थी। ऐसा कहा जा सकता है कि उस द्वेषपूर्ण स्वभाव को जिसके तहत शैतान ने मनुष्य का शोषण किया था और उसके कुरूप चेहरे को इस समय पूरी तरह से प्रकट किया गया था। शैतान ने इस अवसर का इस्तेमाल किया था, उस अवसर का जो परमेश्वर की अनुमति के द्वारा प्रदान किया गया था, ताकि अय्यूब को उत्तेजनापूर्ण एवं बेरहम शोषण अधीन किया जाए, उस तरीके एवं क्रूरता के उस स्तर के अधीन किया जाए जिसके तहत दोनों ही आज के लोगों के लिए अकल्पनीय और पूरी तरह से असहनीय हैं। यह कहने के बजाय कि शैतान के द्वारा अय्यूब की परीक्षा ली गई थी, और यह कि वह अपनी गवाही के दौरान दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहा, यह कहना बेहतर है कि उन परीक्षाओं में जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उसके लिए तय किया गया था अय्यूब ने अपनी खराई एवं सीधाई की सुरक्षा करने के लिए, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की अपनी रीति का बचाव करने के लिए शैतान के साथ एक मुकाबले की शुरुआत की थी। इस मुकाबले में, अय्यूब ने बहुत सारी भेड़-बकरियों एवं पशुओं को खो दिया था, उसने अपनी सारी सम्पत्ति को खो दिया था, और उसने अपने बेटे-बेटियां को खो दिया था—परन्तु उसने अपनी खराई, सीधाई, या परमेश्वर के भय को नहीं खोया था। दूसरे शब्दों में, शैतान के साथ इस मुकाबले में उसने अपनी खराई, सीधाई, एवं परमेश्वर के भय को खोने की अपेक्षा यह चुनाव किया कि उसे उसकी सम्पत्ति और बच्चों से वंचित कर दिया जाए। उसने उस जड़ को पकड़े रहने का चुनाव किया कि मनुष्य होने का अर्थ क्या होता है। पवित्र शास्त्र उस समूची प्रक्रिया का एक संक्षिप्त लेख प्रदान करता है जिसके परिणामस्वरूप अय्यूब ने अपनी सम्पत्ति को खो दिया था, और साथ ही अय्यूब के आचरण एवं मनोवृत्ति को दस्तावेज़ में दर्ज करता है। ये संक्षिप्त, एवं छोटे छोटे लेख यह बोध कराते हैं कि अय्यूब इन परीक्षाओं का सामना करते समय करीब-करीब निश्चिन्त था, परन्तु जो कुछ वास्तव में घटित हुआ था यदि उसे फिर से किया जाता, जिसमें शैतान के द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी जोड़ दिया जाता—तो हालात इतने सरल एवं आसान नहीं होते जैसा इन वाक्यों में वर्णन किया गया है। वास्तविकता उससे कहीं अधिक निर्दयी थी। तबाही एवं घृणा का वह स्तर ऐसा ही है जिसके तहत शैतान मानवजाति एवं उन सभी लोगों से निपटता है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किया गया है। यदि परमेश्वर ने शैतान से अय्यूब को हानि न पहुंचाने के लिए नहीं कहा होता, तो शैतान ने बिना किसी मलाल के उसका वध कर दिया होता। शैतान नहीं चाहता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की आराधना करे, न ही वह उनके लिए जो परमेश्वर की आंखों में धर्मी हैं और उनके लिए जो खरे एवं सीधे हैं यह इच्छा करता है कि वे निरन्तर परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के योग्य हों। क्योंकि लोगों के लिए परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अर्थ है कि वे शैतान से दूर रहें और उसे त्याग दें, और इस प्रकार शैतान ने परमेश्वर की अनुमति का फायदा उठाया ताकि वह बिना किसी दया के अय्यूब के ऊपर अपने सारे क्रोध एवं नफरत ढेर लगा दे। तो तूने देखा कि वह पीड़ा कितनी बड़ी थी जिसे अय्यूब के द्वारा मस्तिष्क से लेकर देह तक, बाहर से लेकर भीतर तक सहा गया था। आज, हम नहीं देख पाते हैं कि उस समय यह कैसा था, और हम केवल बाइबल के लेखों से ही अय्यूब की भावनाओं की एक छोटी सी झलक प्राप्त कर सकते हैं जब उस समय उसे पीड़ा के अधीन किया गया था।

अय्यूब की अटल सत्यनिष्ठा ने शैतान को लज्जित किया और उसे भयातुर करके खदेड़ दिया

और परमेश्वर ने क्या किया जब अय्यूब को इस पीड़ा के अधीन किया गया था? परमेश्वर ने परिणाम का अवलोकन किया, और उसे देखा, और उसका इंतजार किया। जब परमेश्वर ने अवलोकन किया एवं देखा, तो उसने कैसा महसूस किया था? हाँ वास्तव में उसने गहरा शोक महसूस किया। परन्तु उसकी पीड़ा के परिणामस्वरूप, क्या वह शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति देने के लिए खेदित था? उसका उत्तर है, नहीं, वह खेदित नहीं था। क्योंकि वह दृढ़ता से विश्वास करता था कि अय्यूब खरा एवं सीधा था, यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने बस शैतान को अनुमति दी थी कि वह उसके सामने अय्यूब की धार्मिकता को परखे, और अपनी स्वयं की दुष्टता एवं घिनौनेपन को प्रकट करे। इसके अतिरिक्त, यह अय्यूब के लिए एक अवसर था कि वह अपनी धार्मिकता एवं परमेश्वर के प्रति अपने भय और बुराई से दूर रहने की गवाही को संसार के लोगों, शैतान, और यहाँ तक कि उन लोगों के सामने दे जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। क्या अंतिम परिणाम ने यह साबित किया कि अय्यूब के विषय में परमेश्वर का आंकलन सही एवं त्रुटिहीन था। क्या अय्यूब ने वास्तव में शैतान पर विजय प्राप्त किया था? हम यहाँ पर आदर्श वचनों को पढ़ते हैं जिन्हें अय्यूब के द्वारा बोला गया था, ऐसे वचन जो इस बात का प्रमाण हैं कि उसने शैतान पर विजय पा लिया था। उसने कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा।" यह परमेश्वर के प्रति अय्यूब की आज्ञाकारिता की मनोवृत्ति है। इसके आगे, फिर उसने कहा: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" अय्यूब के द्वारा कहे गए इन वचनों से प्रमाणित होता है कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, यह कि वह मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर देख सकता है, और वे साबित करते हैं कि अय्यूब के विषय में उसकी स्वीकृति त्रुटिहीन है, और यह कि यह मनुष्य धर्मी था जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था। "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" ये वचन परमेश्वर के प्रति अय्यूब की गवाही हैं। ये वे साधारण वचन थे जिन्होंने शैतान को डरा दिया था, उसे लज्जित किया था और उसे भयातुर करके खदेड़ दिया था, और इसके अतिरिक्त, शैतान को जंज़ीरों में जकड़ लिया था और उसे असहाय करके छोड़ दिया था। अतः इन वचनों ने शैतान को भी यहोवा परमेश्वर के कार्यों की अद्भुतता एवं सामर्थ का एहसास कराया था, और उसे अनुमति दी थी कि वह ऐसे व्यक्ति के असाधारण आकर्षक व्यक्तित्व का आभास करे जिसके हृदय पर परमेश्वर के मार्ग के द्वारा शासन किया जाता था। इसके अलावा, उन्होंने शैतान पर उस सामर्थी जीवन-शक्ति को भी प्रकट किया था जिसे एक छोटे एवं महत्वहीन मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की रीति का पालन करने में दिखाया गया था। इस प्रकार शैतान को इस पहले मुकाबले में पराजित किया गया था। अपनी "कठिनाई से अर्जित की गई अंतर्दृष्टि" के बावजूद भी, शैतान के पास अय्यूब को छोड़ देने का कोई इरादा नहीं था, न ही उसके द्वेषपूर्ण स्वभाव में कोई बदलाव आया था। शैतान ने अय्यूब पर लगातार आक्रमण करने की कोशिश की थी, और इस प्रकार एक बार फिर से वह परमेश्वर के सामने आया था।

इसके आगे, आओ हम दूसरी बार पवित्र शास्त्र को पढ़ें जब अय्यूब की परीक्षा ली गई थी।

3. शैतान एक बार फिर से अय्यूब की परीक्षा लेता है (अय्यूब के सम्पूर्ण शरीर में फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

(अय्यूब 2:3) यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

(अय्यूब 2:6) यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान के द्वारा कहे गए वचन

(अय्यूब 2:4-5) शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

ग. अय्यूब इस परीक्षा से कैसे निपटता है।

(अय्यूब 2:9-10) तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।" उसने उससे कहा, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया।

(अय्यूब 3:3) वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा।'

परमेश्वर के मार्ग के लिए अय्यूब का प्रेम अन्य सभी चीज़ों से बढ़कर है

पवित्र शास्त्र परमेश्वर एवं शैतान के बीच कहे गए वचनों को निम्नलिखित रूप में दर्ज करता है: यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है" (अय्यूब 2:3)। इस संवाद में, परमेश्वर उसी प्रश्न को शैतान के सामने फिर से दोहराता है। यह ऐसा प्रश्न है जो हमें यहोवा परमेश्वर के सकारात्मक आंकलन को दिखाता है कि पहले परीक्षण के दौरान अय्यूब के द्वारा क्या प्रदर्शित किया गया था और कैसा जीवन जीया गया था, और यह ऐसा प्रश्न है जो अय्यूब के विषय में परमेश्वर के आंकलन से अलग नहीं है इससे पहले कि वह शैतान की परीक्षा से होकर गुज़रता। कहने का तात्पर्य है, उसके ऊपर परीक्षा के आने से पहले, परमेश्वर की दृष्टि में अय्यूब सिद्ध था, और इस प्रकार परमेश्वर ने उसकी एवं उसके परिवार की सुरक्षा की थी, और उसे आशीषित किया था; वह परमेश्वर की दृष्टि में आशीषित होने के योग्य था। परीक्षा के पश्चात्, अपनी सम्पत्ति एवं अपने बच्चों को खो देने के कारण अय्यूब ने अपने होंठों से पाप नहीं किया, परन्तु निरन्तर यहोवा के नाम की प्रशंसा करता रहा। उसके वास्तविक आचरण से ही परमेश्वर ने उसकी प्रशंसा की, और उसे पूरा अंक दिया। क्योंकि अय्यूब की दृष्टि में, उसका वंश या उसकी सम्पत्ति परमेश्वर को त्यागने के लिए पर्याप्त नहीं थी। दूसरे शब्दों में, उसके हृदय में परमेश्वर के स्थान को उसकी संतानों या सम्पत्ति के किसी भी भाग के द्वारा नहीं लिया जा सकता था। अय्यूब की प्रथम परीक्षा के दौरान, उसने दिखाया कि परमेश्वर के लिए उसका प्रेम और परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने की रीति के लिए उसका प्यार अन्य सभी चीज़ों से बढ़कर था। यह मात्र ऐसा है कि इस परीक्षण ने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर से प्रतिफल पाने का और उसके द्वारा उसकी सम्पत्ति एवं संतानों को उससे दूर करने का अनुभव प्रदान किया।

अय्यूब के लिए, यह एक सच्चा अनुभव था जिसने उसके प्राण (मन) को धोकर स्वच्छ किया था, यह जीवन का एक बपतिस्मा था जिसने उसके अस्तित्व को पूर्ण किया था, और, इससे अधिक क्या, यह एक शानदार दावत थी जिसने परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता एवं उसके भय को परखा था। इस परीक्षा ने अय्यूब की स्थिति को एक धनवान पुरुष से ऐसे मनुष्य में रूपान्तरित कर दिया जिसके पास कुछ भी नहीं था, और साथ ही इसने उसे मानवजाति के विषय में शैतान के शोषण का अनुभव करने की अनुमति भी प्रदान की थी। उसकी दीन-हीन दशा ने उसे शैतान से घृणा करने नहीं दिया; उसके बजाए, उसने शैतान के बहुत ही बुरे कार्यों में शैतान की कुरूपता एवं नीचता को, साथ ही साथ परमेश्वर के प्रति शैतान की शत्रुता एवं विद्रोह को भी देखा था, और इसने उसे हमेशा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने के लिए अच्छी तरह प्रेरित किया. उसने शपथ खाई थी कि वह बाहरी कारकों जैसे सम्पत्ति, बच्चे या सगे-सम्बन्धियों के कारण कभी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और परमेश्वर के मार्ग से कभी पीछे नहीं हटेगा, न ही वह कभी शैतान, सम्पत्ति, या किसी व्यक्ति का दास बनेगा; यहोवा परमेश्वर को छोड़, कोई उसका प्रभु या उसका परमेश्वर नहीं हो सकता था। अय्यूब की आकांक्षाएं ऐसी ही थीं। परीक्षा की दूसरी ओर, अय्यूब ने भी कुछ अर्जित किया थाः उसने परमेश्वर के द्वारा दिए गए परीक्षण के मध्य अपार धन-सम्पत्ति अर्जित की थी।

पिछले कई दशकों से अपने जीवन काल के दौरान, अय्यूब ने परमेश्वर के कार्यों को देखा था और अपने लिए यहोवा परमेश्वर की आशीषों को हासिल किया था। वे ऐसी आशीषें थीं जिन्होंने उसे अत्यंत व्याकुलता एवं ऋणी होने का एहसास कराया था, क्योंकि वह विश्वास करता था कि उसने परमेश्वर के लिए कुछ भी नहीं किया, फिर भी उसे इतनी बड़ी आशीषें मीरास में प्राप्त हुईं और उसने भरपूर अनुग्रह का आनन्द उठाया था। इस कारण से, वह अपने हृदय में प्रायः प्रार्थना किया करता था, यह आशा करते हुए कि वह परमेश्वर को बदले में कुछ देने के योग्य होगा, यह आशा करते हुए कि उसके पास परमेश्वर के कार्यों एवं महानता की गवाही देने के लिए अवसर होगा, और यह आशा करते हुए कि परमेश्वर उसकी आज्ञाकारिता को परखेगा, और, इससे बढ़कर, उसके विश्वास को शुद्ध किया जा सकता था, जब तक उसकी आज्ञाकारिता एवं उसका विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति को हासिल न कर ले। और जब वह परीक्षण अय्यूब के ऊपर आया, तो उसने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को सुन लिया था। अय्यूब ने किसी अन्य चीज़ से बढ़कर इस अवसर को अपने हृदय में संजोया, और इस प्रकार उसने इससे आसानी से निपटने की हिमाकत नहीं की, क्योंकि उसके जीवनकाल की सबसे बड़ी इच्छा साकार हो सकती थी। इस अवसर के आगमन का अर्थ था कि उसकी आज्ञाकारिता एवं परमेश्वर के भय को परखा जा सकता था, और शुद्ध किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, इसका अर्थ था कि अय्यूब के पास परमेश्वर की स्वीकृति को हासिल करने का एक मौका था, इस प्रकार, इसने इसे परमेश्वर के और करीब पहुंचाया। परीक्षण के दौरान, ऐसे विश्वास एवं अनुसरण ने उसे और अधिक सिद्ध बनाने, और परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ हासिल करने की अनुमति प्रदान की। अय्यूब परमेश्वर की आशीषों एवं अनुग्रह के लिए और अधिक आभारी हो गया, उसने अपने हृदय में परमेश्वर के कार्यों के लिए और अधिक प्रशंसा को उंडेला, और वह परमेश्वर के विषय में और अधिक भयातुर एवं श्रद्धालु हो गया, और उसने परमेश्वर की सुन्दरता, महानता एवं पवित्रता की और अधिक अभिलाषा की। इस समय, हालाँकि परमेश्वर की दृष्टि में अय्यूब अभी भी ऐसा पुरुष था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, फिर भी उसके अनुभवों के लिहाज से, अय्यूब का विश्वास एवं ज्ञान बहुत जल्दी बढ़ गया: उसका विश्वास बढ़ चुका था, उसकी आज्ञाकारिता को पाँव रखने की जगह मिल गई थी, और परमेश्वर के विषय में उसका भय और अधिक गम्भीर हो चुका था। हालाँकि इस परीक्षण ने अय्यूब की आत्मा एवं जीवन को रूपान्तरित किया, फिर भी ऐसे रूपान्तरण ने अय्यूब को संतुष्ट नहीं किया, न ही इसने आगे की ओर उसकी प्रगति को धीमा किया। ठीक उसी समय यह गुणा भाग करते हुए कि उसने इस परीक्षण से क्या अर्जित किया था, और अपनी स्वयं की कमियों पर विचार करते हुए उसने खामोशी से प्रार्थना की, और अगले परिक्षण का इंतजार किया कि वह उसके ऊपर आए, क्योंकि उसने अपने विश्वास, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय को परमेश्वर के अगले परीक्षण के दौरान उन्नत किए जाने लालसा की थी।

परमेश्वर मनुष्य के भीतर के विचारों का और वह सब जो मनुष्य कहता एवं करता है उनका अवलोकन करता है। अय्यूब के विचार यहोवा परमेश्वर के कानों तक पहुंच गए और परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को सुना, और इस रीति से जैसी अपेक्षा की गई थी अय्यूब के लिए परमेश्वर के अगले परीक्षण का आगमन हो चुका था।

अत्याधिक पीड़ा के मध्य, अय्यूब ने सचमुच में मानवजाति के लिए परमेश्वर की देखरेख का एहसास किया

शैतान से यहोवा परमेश्वर के प्रश्न के बाद, शैतान रहस्यमयी रूप से खुश था। यह इसलिए था क्योंकि शैतान जानता था कि उसे एक बार फिर से उस पुरुष पर आक्रमण करने की अनुमति दी जाएगी जो परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध था—यह शैतान के लिए एक दुर्लभ अवसर था। शैतान अय्यूब के अंगीकार को पूरी तरह से खत्म करने के लिए, और उससे परमेश्वर के विश्वास का त्याग करवाने के लिए इस अवसर का उपयोग करना चाहता था, जिससे वह आगे से परमेश्वर का भय न माने या यहोवा के नाम को धन्य न कहे। यह शैतान को एक अवसर देगा: किसी भी स्थान या समय पर, वह अय्यूब को अपनी आज्ञा के अधीन एक खिलौना बनाने योग्य हो जाएगा। शैतान ने किसी नामो निशान के बिना अपनी बुरी युक्तियों को छिपा रखा था, परन्तु वह अपने दुष्ट स्वभाव को रोक कर नहीं रख सकता था। इस सच्चाई का संकेत यहोवा परमेश्वर के वचनों के प्रति उसके उत्तर में मिल सकता है, जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है: शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा" (अय्यूब 2:4-5)। परमेश्वर एवं शैतान के मध्य इस वार्तालाप से शैतान की दुर्भावना का ठोस ज्ञान एवं एहसास हासिल न कर पाना असम्भव है। शैतान की इन भ्रामक बातों को सुनने के बाद, वे सभी जो सत्य से प्रेम करते हैं और बुराई से घृणा करते हैं उनमें निःसन्देह शैतान की नीचता एवं निर्लज्जता के विषय में अत्याधिक नफरत होगी, वे शैतान की भ्रांतियों के द्वारा त्रस्त एवं घृणा महसूस करेंगे, और ठीक उसी समय, वे अय्यूब के लिए गम्भीर प्रार्थनाएं एवं सच्ची कामना करेंगे, यह प्रार्थना करते हुए कि यह खरा व्यक्ति सिद्धता को प्राप्त कर सके, यह इच्छा करते हुए कि यह पुरुष जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता है वह सदा सर्वदा शैतान की परीक्षाओं पर विजय पाएगा, और ज्योति में जीवन बिताएगा, और परमेश्वर की आशीषों एवं मार्गदर्शन के मध्य जीवन बिताएगा; वे यह भी इच्छा करते हैं कि अय्यूब की धार्मिकता के कार्य सदा सर्वदा उन लोगों को प्रेरणा दे सकें और उनको प्रोत्साहित कर सकें जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करते हैं। हालाँकि शैतान के दुर्भावनापूर्ण इरादे को इस घोषणा में देखा जा सकता है, फिर भी परमेश्वर शैतान की "विनती" से प्रसन्नतापूर्वक सहमत हो गया था—परन्तु उसकी भी एक शर्त है: "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना" (अय्यूब 2:6)। क्योंकि, इस समय, शैतान ने अय्यूब की हड्डियों एवं शरीर पर अपना हाथ बढ़ाने की मांग की थी, परमेश्वर ने कहा, "केवल उसका प्राण छोड़ देना।" इन शब्दों का अर्थ है कि उसने अय्यूब के शरीर को शैतान को दे दिया, परन्तु उसके जीवन को बचाए रखा। शैतान अय्यूब का जीवन नहीं ले सकता था, परन्तु इसके अलावा शैतान अय्यूब के विरुद्ध किसी भी तरीके या हथकण्डे को उपयोग में ला सकता था।

परमेश्वर की अनुमति को प्राप्त करने के बाद, शैतान तेज़ी से अय्यूब के पास पहुंचा और उसकी चमड़ी को पीड़ा पहुंचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, उसके पूरे शरीर पर पीड़ा दायक फोड़े निकल आए, और अय्यूब ने अपनी चमड़ी में अत्याधिक पीड़ा महसूस की। अय्यूब ने परमेश्वर की अद्भुतता एवं पवित्रता की प्रशंसा की, जिसने शैतान को उसकी ढीठाई में और भी अधिक स्तब्ध कर दिया। क्योंकि उसने मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने का आनन्द लिया था, शैतान ने अपना हाथ बढ़ाया और अय्यूब के मांस को उधेड़ दिया, जिससे उसके घाव पकने लगे। अय्यूब ने तुरन्त ही अपने शरीर में पीड़ा एवं कष्ट का ऐसा एहसास किया जिसकी तुलना नहीं की जा सकती थी, और वह अपने हाथों से सिर से लेकर पांव को दबाने के सिवाय और कोई मदद नहीं कर सकता था, मानो यह शारीर की इस पीड़ा से उसकी आत्मा में हुए इस आघात से उसे राहत पहुंचाएगा। उसने महसूस किया कि परमेश्वर उसकी बगल में खड़े होकर सब कुछ देख रहा था, और उसने अपने आपको मज़बूत बनाने के लिए भरसक कोशिश की। उसने एक बार फिर से भूमि पर घुटने टेका, और कहा: तू मनुष्य के हृदय के भीतर झांकता है, तू उसकी दुर्दशा को देखता है; क्यों उसकी कमज़ोरी तुझे चिंतित करती है? परमेश्वर यहोवा के नाम की स्तुति हो। शैतान ने अय्यूब के असहनीय दर्द को देखा, परन्तु उसने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर के नाम को त्यागते हुए नहीं देखा था। इस प्रकार उसने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुंचाने के लिए तुरन्त ही अपना हाथ बढाया, और वह उसके अंग अंग को तोड़ने के लिए बेताब था। एक मिसाल के तौर पर, अय्यूब ने अभूतपूर्व पीड़ा का एहसास किया था; यह मानो ऐसा था कि उसके मांस को चीरकर हड्डियों से बाहर निकाल दिया गया था, और मानो उसकी हड्डियों को थोड़ा थोड़ा करके कुचला जा रहा था। इस भयंकर पीड़ा ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मर जाना इससे बेहतर होता। उसकी सहनशक्ति अपनी चरम सीमा तक पहुंच गई थी। वह चिल्लाना चाहता था, वह उस दर्द को कम करने के लिए अपने शरीर की चमड़ी को चीर देना चाहता था—फिर भी उसने अपनी चीख को दबा कर रखा, और अपने शारीर की चमड़ी को नहीं चीरा, क्योंकि वह शैतान को अपनी कमज़ोरी नहीं दिखाना चाहता था। और इस प्रकार उसने एक बार फिर से घुटने टेके, परन्तु इस बार उसने यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति को महसूस नहीं किया। वह जानता था कि वह अकसर उसके सामने, और उसके पीछे, और उसके दोनों तरफ रहता था। फिर भी उसकी पीड़ा के दौरान, परमेश्वर ने कभी अवलोकन नहीं किया; उसने अपना चेहरा ढँक लिया और छिप गया था, क्योंकि मनुष्य के विषय में उसकी सृष्टि का अर्थ मनुष्य को पीड़ा पहुंचाना नहीं था। इस समय, अय्यूब विलाप कर रहा था, और अपनी दैहिक पीड़ा को सहने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहा था, फिर भी वह परमेश्वर को धन्यवाद देने से अपने आपको और रोक नहीं सकता था: मनुष्य पहले प्रहार में ही गिर जाता है, वह कमज़ोर एवं निर्बल है, वह युवा एवं अज्ञानी है—तू उसके प्रति इतने चिंतित एवं कोमल होने की इच्छा क्यों करता है? तू मुझे मारता है, फिर भी ऐसा करने से तुझे भी तकलीफ होती है। मनुष्य में ऐसा क्या है जो वह तेरी देखभाल एवं चिंता के लायक है। अय्यूब की प्रार्थनाएं परमेश्वर के कानों तक पहुंची, और परमेश्वर खामोश था, केवल चुपचाप देख रहा था। पुस्तक में हर एक चाल को चलने के बाद कोई फायदा नहीं हुआ, शैतान चुपचाप चला गया, फिर भी अय्यूब के विषय में परमेश्वर की परीक्षाएं समाप्त नहीं हुईं। क्योंकि परमेश्वर की वह सामर्थ जो अय्यूब में प्रकट हुई थी उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था, अय्यूब की कहानी शैतान के पीछे हटने के साथ समाप्त नहीं हुई थी। जैसे ही अन्य पात्रों ने प्रवेश किया, और भी अधिक शानदार दृश्यों का आना अभी बाकी था।

अय्यूब के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का एक और प्रगटिकरण परमेश्वर के नाम को सभी चीजों में अत्यधिक महिमा देता है

अय्यूब ने शैतान के प्रकोपों का दुःख उठाया था, फिर भी उसने यहोवा परमेश्वर के नाम को नहीं छोड़ा। उसकी पत्नी वह इंसान थी जिसने पहले कदम बढ़ाया और शैतान का किरदार अदा किया जिसे अय्यूब पर हमले के द्वारा देखा जा सकता है। मूल पाठ इस प्रकार से इसका वर्णन करता है: तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा" (अय्यूब 2:9)। ये वे शब्द हैं जिन्हें मनुष्य के भेष में शैतान के द्वारा कहा गया था। वे एक आक्रमण, एवं एक आरोप, साथ ही साथ प्रलोभन, परीक्षा, एवं कलंक भी थे। अय्यूब की देह पर आक्रमण करने में असफल होने पर, तब शैतान ने सीधे तौर पर उसकी खराई पर हमला किया था, वह इसका उपयोग करना चाहता था ताकि अय्यूब को मजबूर करे कि वह अपनी ईमानदारी को छोड़ दे, परमेश्वर को त्याग दे, और जीना छोड़ दे। इस प्रकार शैतान भी अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग करना चाहता था: यदि अय्यूब यहोवा के नाम को छोड़ देता, तो उसे इस पीड़ा को सहने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपने आपको शारीरिक पीड़ा से मुक्त करा सकता था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने यह कहने के द्वारा उसे झिड़का, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" (अय्यूब 2:10)। अय्यूब काफी समय से इन वचनों को जानता था, परन्तु इस समय उनके विषय में अय्यूब के ज्ञान की सच्चाई साबित हो गई थी।

जब उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को श्राप देने और मर जाने की सलाह दी, तो उसका अभिप्राय था: तेरा परमेश्वर तुझ से ऐसा ही बर्ताव करता है, इसलिए उसे कोसता क्यों नहीं है? अभी भी जीवित रहकर तू क्या कर रहा है? तेरा परमेश्वर तेरे प्रति इतना पक्षपाती है, फिर भी तू कहता है कि यहोवा का नाम धन्य है। जब तू उसके नाम को धन्य कहता है तो वह कैसे तेरे ऊपर विपत्ति ला सकता है? जल्दी कर और उसके नाम को त्याग दे, और अब से उसका अनुसरण मत करना। इस तरह से तेरी परेशानियाँ समाप्त हो जाएंगी। इस घड़ी, वहाँ ऐसी गवाही उत्पन्न हुई जिसे परमेश्वर अय्यूब में देखना चाहता था। कोई साधारण मनुष्य ऐसी गवाही नहीं रख सकता था, न ही हम इसके विषय में बाइबल की किसी अन्य कहानियों में पढ़ते हैं—परन्तु अय्यूब के द्वारा इन शब्दों को कहने के बहुत पहले ही परमेश्वर ने इसे देख लिया था। परमेश्वर ने महज अय्यूब को अनुमति देने के लिए इस अवसर का उपयोग करने की इच्छा की थी ताकि वह सब को यह साबित करे कि परमेश्वर सही था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने न केवल अपनी ईमानदारी को नहीं छोड़ा या परमेश्वर को नहीं त्यागा, बल्कि उसने अपनी पत्नी से यह भी कहा: "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" क्या इन शब्दों में बहुत वज़न है? यहाँ, केवल एक ही तथ्य है जो इन शब्दों के वज़न को साबित करने में समर्थ है। इन शब्दों का वज़न यह है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा उसके हृदय में मंजूर किया गया है, ये वे शब्द हैं जिनकी इच्छा परमेश्वर के द्वारा की गई थी, ये वे शब्द हैं जिन्हें परमेश्वर सुनना चाहता था, और ये वे परिणाम हैं जिन्हें परमेश्वर ने देखने की लालसा की थी; साथ ही ये शब्द अय्यूब की गवाही का सार-तत्व भी हैं। इसमें, अय्यूब की खराई, सीधाई, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूर रहने को प्रमाणित किया गया है। अय्यूब की बहुमूल्यता इसमें निहित है कि जब उसकी परीक्षा ली गई, और तब भी जब उसका पूरा शरीर दुखदायी घावों से भरा हुआ था, जब उसने अत्याधिक पीड़ा को सहा, और जब उसकी पत्नी एवं सगे-सम्बन्धियों ने उसे सलाह दी, फिर भी उसने इन शब्दों को कहा था। इसे दूसरी तरह से कहें, तो उसने अपने हृदय में विश्वास किया था कि, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परीक्षाएं कैसी भी हों, क्लेश या पीड़ा कितनी भी दर्दनाक क्यों न हों, भले ही मृत्यु उसके ऊपर आ जाए, वह कभी भी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं ठुकराएगा। तो तूने देखा कि परमेश्वर उसके हृदय में अति महत्वपूर्ण स्थान रखता था, और उसके हृदय में केवल परमेश्वर ही था। यह इसके कारण ही था कि हम पवित्र शास्त्र में उसके विषय में इस प्रकार पढ़ते हैं: इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया। उसने न केवल अपने होंठों से पाप नहीं किया, बल्कि उसने अपने हृदय में परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत नहीं की। उसने परमेश्वर के बारे में कष्टदायक शब्दों को नहीं कहा, न ही उसने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया। न केवल उसके मुँह ने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा, बल्कि उसने अपने हृदय में भी परमेश्वर के नाम को धन्य कहा; उसका मुँह एवं हृदय एक ही था। यही वह सच्चा अय्यूब था जिसे परमेश्वर के द्वारा देखा गया था, और यही वह प्रमुख कारण था कि क्यों परमेश्वर ने अय्यूब को हृदय में संजोकर रखा था।

अय्यूब के विषय में लोगों की अनेक ग़लतफहमियां

अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयां परमेश्वर के द्वारा भेजे गए स्वर्गदूतों का कार्य नहीं था, न ही इसे परमेश्वर के हाथ के द्वारा किया गया था। इसके बजाए, इसे शैतान के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था, जो परमेश्वर का शत्रु है। परिणामस्वरूप, अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयों का स्तर अत्याधिक गहरा था। फिर भी इस समय अय्यूब ने बिना किसी संशय के अपने हृदय में परमेश्वर के विषय में अपने प्रतिदिन के ज्ञान को, प्रतिदिन के कार्यों के सिद्धान्तों को, और परमेश्वर के प्रति अपनी मनोवृत्ति को प्रदर्शित किया था—और यही वह सच्चाई है। यदि अय्यूब की परीक्षा नहीं की गई होती, यदि परमेश्वर अय्यूब के ऊपर इन विपत्तियों को नहीं लाता, तो जब अय्यूब ने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," तो तू कहता है कि अय्यूब एक पाखंडी है; परमेश्वर ने उसे बहुत सारी सम्पत्ति दी थी, इसलिए वास्तव में उसने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा था। परीक्षाओं के अधीन किए जाने से पहले, यदि अय्यूब ने कहा होता, "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तो तू कहेगा कि अय्यूब बढ़ा-चढ़ा कर बातें कर रहा था, और यह कि वह परमेश्वर के नाम को नहीं त्यागेगा क्योंकि उसे परमेश्वर के हाथ के द्वारा अकसर आशीषित किया गया था। यदि परमेश्वर उसके ऊपर विपत्ती लाया होता, तो उसने निश्चय ही परमेश्वर के नाम को त्याग दिया होता। फिर भी जब अय्यूब ने अपने आपको ऐसी परिस्थितियों में पाया जिन्हें कोई नहीं चाहेगा, या जिन्हें देखने की इच्छा नहीं करेगा, या नहीं चाहेगा कि वे उनके ऊपर आएं, और जिनके अपने ऊपर आने से लोग डरेंगे, ऐसी परिस्थितियां जिन्हें परमेश्वर भी नहीं देख सकता था, अय्यूब उन परिस्थतियों में अपनी ईमानदारी को अभी भी थामे रखने के योग्य था: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" और "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इस समय अय्यूब के बर्ताव का सामना करने पर, ऐसे लोग जो बड़ी बड़ी बातें करना पसंद करते हैं, और जो पत्रियों एवं सिद्धान्तों को बोलना पसंद करते हैं, वे निःशब्द हो जाते हैं। ऐसे लोग जो केवल भाषण में ही परमेश्वर के नाम का अत्यंत गुणगान करते हैं, फिर भी उन्होंने परमेश्वर की परीक्षाओं को कभी स्वीकार नहीं किया है, उनकी निन्दा उस ईमानदारी के द्वारा की जाती है जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामा था, और ऐसे लोग जिन्होंने कभी विश्वास नहीं किया है कि मनुष्य परमेश्वर के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने के योग्य है उन्हें अय्यूब की गवाही के द्वारा दोषी ठहराया जाता है। इन परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के आचरण और उन वचनों का सामना करने पर जिन्हें उसने कहा था, कुछ लोग भ्रम का एहसास करेंगे, कुछ लोग ईर्ष्या का एहसास करेंगे, कुछ लोग सन्देह महसूस करेंगे, और कुछ लोग उदासीन भी दिखाई देंगे, और अय्यूब की गवाही पर घमण्ड से अपनी अपनी नाक को ऊंचा कर लेंगे क्योंकि वे न केवल उस पीड़ा को देखते हैं जो परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के ऊपर आया था, और उन वचनों को पढ़ते हैं जिन्हें अय्यूब के द्वारा कहा गया था, बल्कि वे मानवता की "कमज़ोरियों" को भी देखते हैं जिन्हें अय्यूब के द्वारा उजागर किया गया था जब परीक्षाएं उसके ऊपर आ गई थीं। इस "कमज़ोरी" को वे अय्यूब की सिद्धता में कल्पित अपूर्णता मानते हैं, वे इसे एक ऐसे मनुष्य में एक कलंक मानते हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध था। दूसरे शब्दों में, यह विश्वास किया जाता है कि ऐसे लोग जो सिद्ध हैं वे त्रुटिहीन हैं, वे बिना किसी दाग या धब्बे के हैं, उनमें कोई कमज़ोरी नहीं है, यह कि उनके पास पीड़ा का ज्ञान नहीं है, यह कि वे कभी अप्रसन्नता या उदासी का अनुभव नहीं करते हैं, और उनके पास कोई नफरत या बाह्य चरम व्यवहार नहीं है; इसके परिणामस्वरूप, अधिकांश लोग यह विश्वास नहीं करते हैं कि अय्यूब पूरी तरह से सिद्ध था। लोग अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसके अधिकांश व्यवहार को पसंद नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब ने अपनी सम्पत्ति एवं बच्चों को खो दिया, वह फूट फूट कर नहीं रोया जैसा लोग कल्पना करेंगे। उसकी "अशिष्टता" ने लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर किया कि वह रुखा था, क्योंकि उसके पास आंसू, या अपने परिवार के लिए प्रेम नहीं था। यह वह बुरा प्रभाव है जिसे अय्यूब सबसे पहले लोगों को देता है। उसके बाद वे पाते हैं कि उसका व्यवहार और भी अधिक परेशान करने वाला है: "अपना बागा फाड़ा" को लोगों के द्वारा परमेश्वर के प्रति उसके अनादर के रूप में अनुवाद किया गया है, और "अपना सिर मुड़ाया" को परमेश्वर के प्रति अय्यूब की निन्दा एवं विरोध के अभिप्राय में ग़लत माना गया है। अय्यूब के इन शब्दों के आलावा कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," लोगों ने अय्यूब में किसी भी प्रकार की धार्मिकता को नहीं परखा जिसकी प्रशंसा परमेश्वर के द्वारा की गई थी, और इस प्रकार अय्यूब के विषय में उनमें से अधिकतर लोगों का आंकलन नासमझी, ग़लतफहमी, सन्देह, निन्दा, एवं सिर्फ सिद्धान्तों में ही स्वीकार किए जाने से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। उनमें से कोई भी यहोवा परमेश्वर के वचनों को सही मायने में समझने एवं उनकी सराहना करने के योग्य नहीं है कि अय्यूब एक खरा एवं सीधा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अय्यूब के विषय में उनकी छवि के आधार पर, लोगों में उसकी धार्मिकता को लेकर और अधिक सन्देह हैं, क्योंकि अय्यूब के कार्य एवं उसका व्यवहार जिन्हें पवित्र शास्त्र में दर्ज किया गया है वे अत्यंत प्रभावशाली रूप से उतने मर्मस्पर्शी नहीं हैं जितना लोगों ने कल्पना किया होगा। न केवल उसने किसी बड़ी दावत को अंजाम नहीं दिया, बल्कि उसने राख में बैठकर अपने आपको खुजाने के लिए मटके का एक ठीकरा लिया। इस कार्य ने भी लोगों को बहुत अधिक आश्चर्यचकित किया और उन्हें अय्यूब की धार्मिकता पर सन्देह करने—और यहाँ तक कि उसका इंकार करने के लिए मजबूर भी किया, क्योंकि स्वयं को खुजाते समय अय्यूब ने परमेश्वर से प्रार्थना नहीं की, या परमेश्वर से प्रतिज्ञा नहीं की; इसके अतिरिक्त न ही उसे दर्द के कारण विलाप से आँसू बहाते हुए देखा गया। इस समय, लोगों ने सिर्फ उसकी कमज़ोरी को ही देखा और किसी अन्य चीज़ को नहीं, और इस प्रकार जब उन्होंने अय्यूब को यह कहते हुए सुना, "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तो वे पूरी तरह से भौंचक्के हो गए, या फिर दुविधा में पड़ गए, और वे अभी भी अय्यूब के शब्दों से उसकी धार्मिकता को परखने में असमर्थ हैं। वह मूल छवि जिसे अय्यूब अपनी पीड़ा के दौरान लोगों को देता है वह यह है कि वह न तो शर्मिन्दा था और न ही अहंकारी। लोग उसके इस व्यवहार के पीछे की उस कहानी को नहीं देखते हैं जो उसके हृदय की गहराईयों में घटी थी, न ही वे उसके हृदय के भीतर परमेश्वर के भय को या बुराई से दूर रहने की रीति के सिद्धान्तों में बने रहने को देखते हैं। उसका शांत चित्त लोगों का यह सोचने पर मजबूर करता है कि उसकी खराई एवं सीधाई केवल खोखले शब्द हैं, यह कि परमेश्वर के प्रति उसका भय केवल एक झूठी शिक्षा थी; इसी बीच वह "कमज़ोरी" जिसे उसने बाह्य रूप से प्रकट किया था वह उन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ता है, उन्हें उस मनुष्य का एक "नया दृष्टिकोण," और यहाँ तक कि उसके प्रति "एक नई समझ" देता है जिसे परमेश्वर खरे एवं सीधे पुरुष के रूप में परिभाषित करता है। ऐसे "नए दृष्टिकोण" और "नई समझ" को उस समय प्रमाणित किया गया जब अय्यूब ने अपना मुंह खोला और उस दिन को धिक्कारने लगा जब वह पैदा हुआ था।

हालाँकि पीड़ा का वह स्तर जिसे उसने सहा वह किसी भी मनुष्य के लिए अकल्पनीय एवं समझ से परे है, फिर भी उसने झूठी शिक्षा का कोई बोल नहीं बोला, बल्कि अपने स्वयं के उपायों के द्वारा अपने शरीर के दर्द को कम किया। जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है, उसने कहा: वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा' (अय्यूब 3:3)। कदाचित्, किसी ने भी इन शब्दों को महत्वपूर्ण नहीं समझा है, और कदाचित् ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने इन पर ध्यान दिया है। तुम लोगों की नज़र में, क्या इनका अभिप्राय यह है कि अय्यूब ने परमेश्वर का विरोध किया था? क्या वे परमेश्वर के विरुद्ध कोई शिकायत हैं? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों के पास अय्यूब के द्वारा कहे इन शब्दों के विषय में कुछ विचार हैं और मैं विश्वास करता हूँ कि यदि अय्यूब खरा एवं सीधा होता, तो उसने किसी भी प्रकार की कमज़ोरी या कष्ट को जाहिर नहीं किया होता, और इसके बजाय उसे सकारात्मक रूप से शैतान के किसी भी आक्रमण का सामना करना चाहिए था, और शैतान की परीक्षाओं का सामना करते हुए मुस्कुराना भी चाहिए था। उसे किसी भी प्रकार की पीड़ा के प्रति जरा सी भी प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए थी जिसे शैतान के द्वारा उसके शरीर पर लाया गया था, न ही उसे अपने हृदय में किसी भी प्रकार की भावनाओं को उजागर करना चाहिए था। यहाँ तक कि उसे परमेश्वर से कहना चाहिए था कि वह इन परीक्षणों को और भी कठिन बना दे। यह वही है जिसे किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्रदर्शित एवं धारण किया जाना चाहिए जो अडिग है और जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहता है। इस चरम पीड़ा के बीच, अय्यूब ने सिर्फ अपने जन्म के समय को कोसा था। उसने परमेश्वर के विषय में शिकायत नहीं की, और उसके पास परमेश्वर का विरोध करने का कोई इरादा तो बिलकुल भी नहीं था। करने की अपेक्षा यह बोलने में अधिक आसान है, क्योंकि प्राचीन समयों से लेकर आज के दिन तक, किसी ने भी ऐसी परीक्षाओं का अनुभव नहीं किया है या सहा है जो अय्यूब पर आई थीं। और अय्यूब के समान किसी भी व्यक्ति को उस प्रकार की परीक्षा के अधीन क्यों नहीं किया गया है? क्योंकि जिस रीति से परमेश्वर इसे देखता है, कोई भी व्यक्ति ऐसी ज़िम्मेदारी या महान आदेश को सहन नहीं कर सकता है, जैसा अय्यूब ने किया वैसा कोई नहीं कर सकता है, और इसके अतिरिक्त, अपने जन्म के दिन को कोसने के आलावा, कोई भी व्यक्ति अभी भी परमेश्वर के नाम को त्याग सकता है और परमेश्वर यहोवा के नाम को लगातार धन्य नहीं कह सकता है, जैसे अय्यूब ने किया था जब पीड़ाएं उस पर आ गई थीं। क्या कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता है? जब हम अय्यूब के बारे में ऐसा कहते हैं, तो क्या हम उसके व्यवहार की सराहना कर रहे हैं? वह एक धर्मी मनुष्य था, और वह परमेश्वर की ऐसी गवाही देने के योग्य था, और वह शैतान को खदेड़कर भगाने में समर्थ था कि वह अपने सिर पर अपने हाथों को रखकर भागे, ताकि वह दोबारा उस पर दोष लगाने के लिए परमेश्वर के सामने न आए—तो उसकी सराहना करने में क्या ग़लत है? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों के स्तर परमेश्वर की अपेक्षा अधिक ऊंचे हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोग अय्यूब से भी बेहतर करते जब परीक्षाएं तुम लोगों पर आतीं? परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की प्रशंसा की गई थी—तुम लोगों को क्या आपत्तियां हो सकती है?

अय्यूब अपने जन्म के दिन को कोसता है क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके द्वारा परमेश्वर को तकलीफ हो

मैं अकसर कहता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, और लोग मनुष्यों के बाहरी रुप-रंग को देखते हैं। क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, वह उनकी हस्ती (मूल-तत्व) को समझता है, जबकि लोग उनके बाहरी रूप-रंग के आधार पर अन्य मनुष्यों की हस्ती को परिभाषित करते हैं। जब अय्यूब ने अपना मुंह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा, तो इस कार्य ने सभी आत्मिक लोगों को बहुत अधिक चकित कर दिया, जिनमें उसके तीन मित्र भी शामिल थे। मनुष्य परमेश्वर से आया था, और उसे जीवन एवं शरीर के लिए धन्यवादित होना चाहिए, साथ ही साथ अपने जन्म के दिन के लिए भी धन्यवादित होना चाहिए, जिसे परमेश्वर के द्वारा उसे प्रदान किया गया है, और उसे उन्हें कोसना नहीं चाहिए। यह अधिकांश लोगों के लिए समझने योग्य एवं बोधगम्य है। किसी के लिए भी जो परमेश्वर का अनुसरण करता है, यह समझ पवित्र और अनुल्लंघनीय है, यह ऐसा सत्य है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता है। दूसरी ओर, अय्यूब ने नियमों को तोड़ दियाः उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। यह एक ऐसा कार्य है जिसके विषय में अधिकांश लोग यह समझते हैं कि यह प्रतिबन्धित क्षेत्र में प्रवेश करने के समान है। न केवल वह लोगों की समझ एवं सहानुभूति का हकदार नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की क्षमा का भी हकदार नहीं है। ठीक उसी समय, और भी अधिक लोग अय्यूब की धार्मिकता के प्रति सन्देहास्पद हो गए थे, क्योंकि ऐसा दिखाई देता है कि उसके प्रति परमेश्वर की कृपा ने अय्यूब को अपने आपमें में ही आनन्दित बना दिया था, और इसने उसे इतना निर्भीक एवं लापरवाह बना दिया था कि उसने न केवल अपने जीवनकाल के दौरान उसे आशीष देने के लिए और उसकी देखभाल करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि उसने अपने जन्म के दिन को भी धिक्कारा कि उसका नाश कर दिया जाए। यदि यह परमेश्वर का विरोध नहीं है, तो यह क्या है? ऐसे उथलेपन ने अय्यूब के इस कार्य की निन्दा करने के लिए लोगों को सबूत प्रदान किया है, परन्तु कौन जान सकता है कि उस समय अय्यूब सचमुच में क्या सोच रहा था? और कौन उस कारण को जान सकता है कि अय्यूब ने क्यों उस तरह से व्यवहार किया था? केवल परमेश्वर एवं स्वयं अय्यूब ही यहाँ भीतर की उस कहानी को और उन कारणों को जानते हैं।

जब शैतान ने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुंचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, तो अय्यूब बच निकलने के उपायों या प्रतिरोध करने की सामर्थ के बिना उसके चंगुल में फंस गया। उसकी देह एवं उसके प्राण (मन) ने अत्याधिक पीड़ा को सहन किया, और इस पीड़ा ने उसे शरीर में जीवित रहने की निरर्थकता, निर्बलता, एवं शक्तिहीनता का गहराई से परिचय कराया था। ठीक उसी समय, उसने एक गहरी समझ को भी हासिल किया कि परमेश्वर एक ऐसे मस्तिष्क का क्यों है कि वह मानवजाति की परवाह एवं देखभाल करता है। अय्यूब ने शैतान के चंगुल में यह एहसास किया कि मनुष्य जो मांस और लहू का बना हुआ है वह वास्तव में बहुत ही निर्बल एवं कमज़ोर है। जब वह अपने घुटनों पर आया और परमेश्वर से प्रार्थना की, तो उसने ऐसा महसूस किया मानो परमेश्वर अपने मुख को ढांप रहा था, और छिप रहा था, क्योंकि परमेश्वर ने पूरी तरह से उसे शैतान के हाथ में दे दिया था। ठीक उसी समय, परमेश्वर भी उसके लिए रोया, और इसके अतिरिक्त, वह उसके लिए व्यथित भी था; परमेश्वर उसके दर्द से तड़प उठा था, और उसकी पीड़ा से पीड़ित हुआ था। अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा को महसूस किया था, साथ ही साथ इस बात को भी कि यह परमेश्वर के लिए कितना असहनीय था। अय्यूब परमेश्वर को और अधिक पीड़ा नहीं पहुंचाना चाहता था, न ही वह यह चाहता था कि परमेश्वर उसके लिए विलाप करे, वह यह देखना तो बिलकुल भी नहीं चाहता था कि परमेश्वर को उसके द्वारा पीड़ा पहुंचे। इस घड़ी, अय्यूब केवल अपनी देह को स्वयं से उतारना चाहता था, वह आगे से उस पीड़ा को सहना नहीं चाहता था जिसे उसकी देह के द्वारा उस पर लाया गया था, क्योंकि यह परमेश्वर को अपनी पीड़ा के द्वारा पीड़ित होने से रोकेगा—फिर भी वह नहीं कर सका, और उसे न केवल देह के उस दर्द को सहना पड़ा, बल्कि साथ ही उस पीड़ा को भी सहना पड़ा कि वह नहीं चाहता था कि परमेश्वर को चिंतित करे। इन दो पीड़ाओं ने—एक देह से, और एक आत्मा से—अय्यूब को दिल को चीरने वाला, अंतड़ियों को मरोड़ने वाला दर्द पहुंचाया था, और उसे यह एहसास कराया कि मनुष्य की सीमाएं किस प्रकार किसी को परेशान एवं असहाय कर सकती हैं जो मांस और लहू से बना है। इन परिस्थितियों के अंतर्गत, परमेश्वर के लिए उसकी लालसा और भी अधिक प्रचण्ड हो गई थी, और शैतान के लिए उसकी घृणा और भी अधिक तीव्र हो गई थी। इस समय, परमेश्वर को उसके लिए आंसू बहाकर रोते हुए या दर्द सहते हुए देखने की अपेक्षा अय्यूब ने यह अधिक पसंद किया होता कि मनुष्यों के इस संसार में उसका जन्म कभी न हुआ होता, भला होता कि वह अस्तित्व में नहीं आता। उसने अपनी देह से अत्यंत घृणा करना शुरू कर दिया था, और वह बीमार होने एवं अपने आप से, और जन्म के दिन से, और यहाँ तक कि उनसब से उकताने लगा था जो उससे जुड़े हुए थे। उसने यह इच्छा नहीं की थी कि उसके जन्म के दिन का और अधिक जिक्र किया जाए या उससे कोई मतलब रखा जाए, और इस प्रकार उसने अपना मुंह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा: "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा।'

वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो" (अय्यूब 3:3-4)। अय्यूब के शब्दों में स्वयं के लिए उसकी घृणा है, "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, बेटे का गर्भ रहा," साथ ही साथ उनमें स्वयं के लिए उसकी निन्दा और परमेश्वर को दर्द पहुंचाने के लिए ऋणी होने का एहसास भी है, "वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो।" ये दो अंश महानतम प्रकटीकरण हैं कि अय्यूब ने तब कैसा महसूस किया था, और सब पर उसकी खराई एवं सीधाई को प्रदर्शित करते हैं। ठीक उसी समय, बिलकुल वैसे ही जैसे अय्यूब ने इच्छा की थी, उसके विश्वास को एवं परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता को, साथ ही साथ परमेश्वर के प्रति उसके भय को सचमुच में ऊंचा उठाया गया था। हाँ वास्तव में, यह ऊंचाई बिलकुल वह प्रभाव है जिसकी परमेश्वर ने अपेक्षा की थी।

अय्यूब ने शैतान को हराया और परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चा मनुष्य बन गया

जब अय्यूब पहली बार अपनी परीक्षाओं से होकर गुज़रा था, तब उसकी सारी सम्पत्ति और उसके सभी बच्चों को उससे ले लिए गया था, परन्तु उसके परिणामस्वरूप वह नीचे नहीं गिरा या ऐसा कुछ भी नहीं कहा जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप था। उसने शैतान की सभी परीक्षाओं पर विजय प्राप्त की थी, और उसने अपनी भौतिक सम्पत्ति एवं वंश पर, और अपनी सांसारिक सम्पत्तियों को खोने की परीक्षा पर भी विजय प्राप्त की थी, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर ने इन्हें ले लिया तब भी वह उसकी आज्ञाओं को मानने और इसके कारण परमेश्वर को धन्यवाद एवं स्तुति देने के योग्य था। शैतान की पहली परीक्षा के दौरान अय्यूब का बर्ताव ऐसा ही था, और परमेश्वर के पहले परीक्षण के दौरान अय्यूब की गवाही ऐसी ही थी। दूसरी परीक्षा में, शैतान ने अय्यूब को तकलीफ देने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और हालाँकि अय्यूब ने ऐसा दर्द सहा जिसे उसने पहले कभी नहीं सहा था, तौभी उसकी गवाही लोगों को अचरज में डालने के लिए काफी थी। उसने एक बार फिर से शैतान को हराने के लिए अपनी सहनशक्ति, अंगीकार, और परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता का उपयोग किया, और उसके आचरण एवं उसकी गवाही को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किया गया एवं उसका समर्थन किया गया। इस परीक्षा के दौरान, अय्यूब ने शैतान पर इस बात की घोषणा करने के लिए अपने वास्तविक व्यवहार का उपयोग किया कि शरीर का दर्द परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास एवं आज्ञाकारिता को पलट नहीं सकता था या परमेश्वर के प्रति उसकी भक्ति एवं भय को छीन नहीं सकता था; वह मृत्यु का सामना करने के कारण परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या अपनी खराई एवं सीधाई नहीं छोड़ेगा। अय्यूब के दृढ़ संकल्प ने शैतान को कायर बना दिया, उसके विश्वास ने शैतान को भयभीत और थरथरा दिया, शैतान के साथ उसकी ज़िन्दगी और मौत की जंग ने शैतान के भीतर अत्यंत घृणा एवं रोष उत्पन्न किया, उसकी खराई एवं सीधाई ने शैतान की वो हालत कर दी कि वह उसके साथ और कुछ नहीं कर सकता था, कुछ इस तरह कि शैतान ने उस पर अपने आक्रमणों को त्याग दिया और यहोवा परमेश्वर के सामने अय्यूब पर अपने आरोपों को छोड़ दिया। इसका अर्थ यह है कि अय्यूब ने संसार पर विजय प्राप्त की थी, उसने देह पर विजय प्राप्त की थी, उसने शैतान पर विजय प्राप्त की थी, और उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी; वह पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखता था। इन दोनों परीक्षाओं के दौरान, अय्यूब अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहा, और उसने वास्तव में अपनी खराई एवं सीधाई को जीया था, और उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के अपने जीवन जीने के सिद्धान्तों के दायरे को व्यापक किया था। इन दोनों परीक्षाओं से होकर गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब के भीतर एक समृद्ध अनुभव उत्पन्न हुआ, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व एवं अत्यंत अनुभवी बना दिया था, इसने उसे मज़बूत, और प्रबल आस्था रखने वाला मनुष्य बना दिया था, और इसने उसे ईमानदारी की सच्चाई एवं योग्यता के विषय में अति आत्मविश्वासी बना दिया जिनके तहत वह दृढ़ता से स्थिर रहा। यहोवा परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता के विषय में एक गहरी समझ एवं एहसास प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की बहुमूल्यता का एहसास करने की अनुमति दी, और उस बिन्दु से परमेश्वर के लिए उसके भय में परमेश्वर के प्रति विचार और प्रेम को जोड़ दिया गया था। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे दूर नहीं किया, बल्कि उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट लाया। जब अय्यूब के द्वारा सहा गया दैहिक दर्द अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया, तो वह चिंता जिसे उसने परमेश्वर यहोवा की ओर से महसूस की थी उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिया था। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, परन्तु ऐसा आचरण उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के लिए उसके विचार एवं उसके प्रेम का एक स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के लिए उसके विचार एवं उसके प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य है, क्योंकि उसने स्वयं से घृणा की थी, और वह पर