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परमेश्वर अपनी उम्मीद रखता है पूरी तरह इंसान पर

I

प्रारंभ से लेकर आजतक,

बस इंसान ही कर पाया बात परमेश्वर से।

उसके बनाए गए सभी जीवित प्राणियों के बीच,

बस इंसान ही कर पाता है बात परमेश्वर से।

इंसान सुनता है कानों से और देखता है आँखों से,

सोच और भाषा के साथ है उसके पास इच्छा की आज़ादी।

इंसान के पास हैं सभी क्षमताएं ज़रूरी

परमेश्वर को सुनने के लिए, उसकी इच्छा समझने के लिए,

परमेश्वर का आदेश स्वीकारने के लिए,

परमेश्वर के दिए आदेश को अपनाने के लिए।

इसलिए परमेश्वर रखता है अपनी पूरी उम्मीद इंसान पर,

पूरी उम्मीद इंसान पर।

वो चाहता है इंसान को बनाना अपना साथी,

जो उसके साथ एक ही दिल और दिमाग़ का रहे,

जो उसके साथ मिलकर चलता रहे।

II

जबसे परमेश्वर ने किया शुरू अपना प्रबंधन,

वो करता रहा इंतज़ार कि कब इंसान दे अपना दिल,

दे उसे अपना दिल हर वक़्त,

ताकि वो कर सके शुद्ध और तैयार उसे,

ताकि इंसान करे उसे संतुष्ट, करे परमेश्वर उसे प्रेम,

ताकि इंसान भयभीत हो परमेश्वर से और बुराई से हो दूर।

परमेश्वर करता रहा उम्मीद और इंतज़ार

इस परिणाम का इंतज़ार हर वक़्त,

ताकि इंसान करे उसे संतुष्ट, करे परमेश्वर उसे प्रेम,

ताकि इंसान भयभीत हो परमेश्वर से और बुराई से हो दूर।

परमेश्वर करता रहा उम्मीद और इंतज़ार

इस परिणाम का इंतज़ार हर वक़्त।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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