12. आस्था अर्थात परमेश्वर पर अटूट विश्वास

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यह केवल तुम्हारे विश्वास के भीतर से ही है कि तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ होगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास है तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनायेगा। विश्वास के बिना, वह ऐसा नहीं कर सकता है। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा जिसको प्राप्त करने की तुम आशा करते हो। यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है और तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वसामर्थ्य को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे पास यह विश्वास होता है कि तुम अपने व्यवहारिक अनुभव में उसके कार्यों को देख सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उस विश्वास के बिना, परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास विश्वास है और तुम परमेश्वर पर संदेह नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, अगर तुम उस पर सच्चा विश्वास करो, केवल तभी वह तुम्हारे अनुभवों में तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन कर देता है, और केवल तभी तुम उसके कार्यों को देख पाओगे। ये सभी चीजें विश्वास के माध्यम से ही प्राप्त की जाती हैं। विश्वास केवल शुद्धिकरण के माध्यम से ही आता है, और शुद्धिकरण की अनुपस्थिति में विश्वास विकसित नहीं हो सकता है। 'विश्वास' यह शब्द किस चीज को संदर्भित करता है? विश्वास सच्चा भरोसा है और ईमानदार हृदय है जो मनुष्यों के पास होना चाहिए जब वे किसी चीज़ को देख या छू नहीं सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के विचारों के अनुरूप नहीं होता हो, जब यह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। इसी विश्वास के बारे में मैं बातें करता हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए')। परमेश्वर के वचनों के अनुसार परमेश्वर में सच्ची आस्था का होना बहुत अहम है। चाहे हमें कैसे ही परीक्षणों का सामना करना पड़े या हमारी कठिनाइयाँ कितनी ही विकट हों, परमेश्वर चाहता है कि हर कोई उसके वचनों पर विश्वास करे और उसमें आस्था रखे, परमेश्वर पर पूरा भरोसा रखे और उसके साथ सहयोग करे। केवल इसी तरीके से अनुभव के ज़रिए परमेश्वर के सर्वशक्तिमान शासन और कर्मों का गवाह बना जा सकता है। परमेश्वर के मार्गदर्शन का धन्यवाद, मुझे भी इसका ज़रा सा अनुभव हुआ।

18 नवम्बर, 2016 की सुबह, मुझे इटली से एक बुजुर्ग भाई का ऑनलाइन संदेश मिला कि वे आध्यात्मिक शुष्कता महसूस कर रहे हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में और जानकारी चाहते हैं। उस संदेश को पढ़कर, मैं प्रभु की वापसी के लिए उनकी ललक और प्रतीक्षा की बेक़रारी महसूस कर सकती थी। मैंने अनुवाद सॉफ़्टवेयर के ज़रिए उनसे बातचीत करनी शुरू कर दी। वे कैथोलिक चर्च में भ्रष्टता और अनैतिकता के कारण निराश थे, इसलिए 1991 से वे दिन-रात एक करके सच्ची कलीसिया की खोज में लगे थे। वे वॉचमैन नी और विटनेस ली की किताबें भी पढ़ चुके थे, लेकिन उन्हें कभी सच्ची आध्यात्मिक संतुष्टि नहीं मिली। उन्होंने कहा कि प्रभु के बिना जीना कष्टदायक, अर्थहीन और आशा विहीन था। उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के कुछ वीडियो और चित्र ऑनलाइन देखे थे और वे तुरंत आकर्षित हो गये। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में एक सच्ची कलीसिया की तरह लग रही है और वे उसके बारे में और जानना चाहते हैं। उनकी बातों से मुझे खोज की तड़प का एहसास हुआ, जिससे मेरे अंदर और भी तीव्र इच्छा पैदा हुई। मैं उन्हें बहुत कुछ बताना चाहती थी, पर मुझे इतालवी भाषा नहीं आती थी। मैं उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाना चाहती थी, पर इतालवी अनुवाद अभी प्रकाशित नहीं हुआ था। मैं चाहती थी कि वे सुसमाचार की कुछ फ़िल्में देखें, पर उनका भी इतालवी रूपांतर अभी रिलीज़ नहीं हुआ था। उन्हें और कोई भाषा नहीं आती थी। मैं बस उन्हें कुछ संगीत वीडियो ही भेज सकी क्योंकि संगीत और नृत्य की भाषा सार्वभौमिक होती है। उन्हें देखने के बाद उनकी उत्सुकता और भी बढ़ गई और उन्होंने याचना भरे अंदाज़ से कहा, "कलीसिया की इतालवी वेबसाइट तैयार होते ही मुझे बताना।" उनके इस संदेश को पढ़कर मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ये वचन याद आए : "तू उन दयनीय, बेचारे और धार्मिकता के भूखे-प्यासे धर्मनिष्ठ विश्वासियों के साथ, जो तेरी देखरेख की आस लगाए बैठे हैं, अपने दर्शनों और अनुभवों को कैसे बांटेगा? किस प्रकार के लोग तेरी देखरेख की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू सोच सकता है? क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें टूटते तारे जैसी रोशनी के लिए कितनी ललक है जो अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर-बितर कर दे, जिन्होंने वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आस लगाए बैठे हैं और कैसे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, भयंकर कष्ट सहते, रिहाई से नाउम्मीद ये लोग, अंधकार में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएँ बेहद बदकिस्मत हैं, जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है। सदियों से ये इसी स्थिति में क्रूर बधंनों और अवरुद्ध इतिहास में जकड़े हुए हैं। उनकी कराहने की आवाज किसने सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?')। इसे पढ़ने के बाद, मैंने देखा कि परमेश्वर ने सुसमाचार के प्रसार और गवाह बनने का काम हमें सौंपा है, पर परमेश्वर की तत्काल अपेक्षा के बावजूद, मुझे लगा जैसे मेरे हाथ बंधे हुए हों। मैं अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की गवाह नहीं बन पा रही थी। मैं उन भाई की मदद नहीं कर पा रही थी जो अंधेरे में खो गये थे और बरसों से तिनकों का सहारा लिए चल रहे थे, परमेश्वर के वचनों का पोषण पाने के लिए। मुझे बेहद बुरा लगा। उनके संदेश पढ़कर मेरी आँखें नम हो गईं और मुझे लगा कि मेरी दशा साँप-छछूंदर जैसी है। अगर मैं पीछे हटती हूँ, तो जिस सत्य मार्ग की उन्हें तलाश और कामना है, उसकी जांच-पड़ताल में देरी हो जाएगी। अगर आगे कदम बढ़ाती हूँ, तो मैं गलत अनुवाद उपकरणों पर भरोसा करूँगी क्योंकि मैं इतालवी नहीं बोल सकती। कई बार ऐसे उपकरण सरल सी चीज़ों का भी सही अनुवाद नहीं कर पाते, आध्यात्मिक बातों की तो बात ही छोड़ो। तो फिर बातचीत कैसे करें? मुझे लगा मैं बेज़ुबान हूँ। मेरी आँखें खुली हुई हैं, पर मैं कुछ कर नहीं पा रही थी। मेरे मन में यह बात भी आई कि इतालवी भाषा जानने वाले किसी भाई या बहन की तलाश की जाए, पर कोई काबिल इंसान नहीं मिला। उस वक्त मुझे सच में कुछ समझ नहीं आ रहा था, और मैंने सोचा, "मुझे इतालवी भाषा में 'नमस्ते' और 'अलविदा' कहने के सिवा और कुछ नहीं आता। इसलिए मैं चाहे कितनी ही कोशिश कर लूँ, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की गवाह नहीं बन सकती।" मैं बहुत निराश हुई।

अगली सुबह, मुझे उनका यह संदेश मिला कि सुबह आँख खुलते ही उसके मन में यह बात आई कि मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में पूछा जाए। वे मुझे लगातार संदेश भेजते रहते थे, इसलिए मैं सच में फ़िक्रमंद हो गई। मैंने तुरंत प्रार्थना की : "प्यारे परमेश्वर, मैंने कभी इतालवी भाषा नहीं पढ़ी है और मैं नहीं जानती कि इन भाई के साथ सुसमाचार कैसे साझा किया जाए। परमेश्वर, मुझे राह दिखाओ।" प्रार्थना के बाद अचानक मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश याद आया : "तुम्हें विश्वास होना ही चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है और मनुष्य तो बस उसके साथ सहयोग भर कर रहे हैं। अगर तेरा दिल सच्चा है, तो परमेश्वर इसे देखेगा, और वह तेरे लिए सभी मार्ग खोल देगा, मुश्किलों को आसान बनाएगा। यह विश्वास तुझमें होना ही चाहिए" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश')। "अपना कर्त्वय निभाते समय तुम लोगों को तब तक किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, जब तक तुम अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करते हो और इसमें अपना पूरा दिल लगाते हो। परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन नहीं बनाएगा या तुम्हें वह करने के लिए मज़बूर नहीं करेगा जिसकी क्षमता तुममें नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश')। इसे पढ़कर मेरा विश्वास और साहस बढ़ गया। यह सच है कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है और उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। कठिनाइयाँ आने पर परमेश्वर हमसे ईमानदारी और सहयोग की अपेक्षा करता है, वह चाहता है कि हम सचमुच उस पर विश्वास करें और उस पर भरोसा रखें और उसके साथ काम करने की पूरी कोशिश करें। तब परमेश्वर समस्याओं को हल करने में हमारी मदद करेगा। पर जब मेरे सामने वैसी समस्या आई, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरे हृदय में परमेश्वर के लिये जगह नहीं थी। मैं अपनी ही धारणा और कल्पनाओं में जी रही थी, सोच रही थी कि मुझे इतालवी भाषा बोलनी नहीं आती, तो मैं उन भाई के साथ सामान्य तौर पर बातचीत नहीं कर सकती, और मैं किसी भी तरह से परमेश्वर के कार्य की गवाह नहीं बन सकती। निराश और मौन-सी होकर, मैं समस्या में उलझकर रह गई थी। उस तरह मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन कैसे मिलता और मैं उसके कर्मों की गवाह कैसे बनती? मुझे वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा करने और अपनी पूरी क्षमता के साथ उसे सहयोग देने की ज़रूरत थी, और विश्वास रखना था कि वह मेरे लिए कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकालेगा। उसी मनोदशा में, मुझे अचानक इतालवी बाइबल के उन पदों का खयाल आया जिन्हें मैंने दो रात पहले संकलित किया था, जिनमें अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की भविष्यवाणी की गई है। मैंने सोचा कि भाई के साथ बातचीत में उनका इस्तेमाल करूंगी। तो, एक सुबह अपनी बातचीत को पुख्ता करने के लिए मैंने वे पद उन्हें भेज दिए। उस दोपहर एक सुखद आश्चर्य की बात हुई, मैंने देखा कि प्रभुत्व का रहस्य फ़िल्म के इतालवी रूपांतर का ट्रेलर रिलीज़ हो चुका है। मैंने वह ट्रेलर उसी वक्त उन भाई को भेज दिया। बाद में उन्होंने बताया, उन्हें समझ आ गया कि उस फ़िल्म में प्रभु की वापसी से जुड़ी बाइबल की भविष्यवाणियों के बारे में बात की गई है। उन्होंने बड़े उत्साह से मुझसे पूछा, "क्या प्रभु वापस आ गया है? क्या वह चीन में है? वर्तमान में उसका क्या नाम है?" उस पल, मुझे लगा जैसे वह कोई खोई हुई भेड़ हो जिसने अपने चरवाहे की आवाज़ सुन ली है और यह जानने के लिए बेचैन हो रही है कि आवाज़ किधर से आ रही है। रुंधे गले से, मैंने उन्हें जवाब भेजा, "उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और यह वही है जिसके बारे में प्रकाशितवाक्य में भविष्यवाणी की गई थी, 'जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है' (प्रकाशितवाक्य 1:8)।" इस मोड़ पर, मैंने देखा कि कैसे परमेश्वर के शासन का हर चरण उसके अगले चरण का पूरक है। अभिवादन के चंद लफ़्ज़ों के अलावा मुझे इतालवी भाषा की कोई जानकारी नहीं थी, पर इस अनुभव से मुझे गहरा एहसास हुआ कि परमेश्वर के मार्गदर्शन से मैं उन भाई के साथ सहजता से बात कर सकी, और उसके कुछ नतीजे भी मेरे सामने थे। मैंने देखा कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है, हमें वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए, उस पर आश्रित रहना चाहिए और पूरे दिल से उसके साथ काम करना चाहिए।

उसके बाद मैंने एक और परीक्षण का सामना किया। ये भाई मुझसे हमेशा पूछते रहते थे कि मैं उन्हें परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही कब दूँगी। मैं भी गवाही देने के लिए बेताब थी, पर भाषा की अड़चन अभी भी रास्ता रोके हुई थी और मुझे मदद के लिए कोई भाई या बहन नहीं मिला था। किसी अविश्वासी से अनुवाद करवाती, तो आध्यात्मिक शब्द उसकी समझ में न आते और वह ठीक से काम न कर पाता। इन समस्याओं के बारे में सोचते हुए मैं निराश हो उठी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। मैं बहुत परेशान हो रही थी। मैंने बार-बार परमेश्वर के आगे गुहार लगाई : "हे परमेश्वर, मेरे हाथ बंधे हुए हैं। मुझे नहीं पता कि अब मुझे क्या करना चाहिए, और मुझे यह भी नहीं पता कि इससे क्या सीखना चाहिए। कृपा करके मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे राह दिखाओ।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने लाल सागर को पार करते मूसा के बारे में सोचा। इस्राएलियों को मिस्र से बाहर निकालते समय मूसा ने सभी प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन परमेश्वर में उसकी आस्था दृढ़ रही। उसने प्रार्थना की और परमेश्वर के साथ सहयोग किया, और परमेश्वर के इतने सारे चमत्कारों का गवाह बना। लाल सागर और उनका पीछा करती हुई सेना के बिना, और रेगिस्तान में बिताए 40 वर्षों के बिना, मूसा के पास ऐसी आस्था और गवाही कैसे हो सकती थी? अपने कर्तव्य पालन में उन कठिनाइयों का सामना किए बगैर, मुझे परमेश्वर में सच्ची आस्था कैसे हासिल हो सकती है? कहने की ज़रूरत नहीं कि मैं लाल सागर पार करने जैसे हालात का सामना नहीं कर रही थी। और जब से मैं उन भाई से ऑनलाइन मिली थी, परमेश्वर ने सदा मुझे राह दिखाई और मैं उसके अनेक चमत्कारिक कर्मों की गवाह बनी हूँ। जानती थी कि मुझे परमेश्वर में अधिक आस्था रखनी चाहिए और उस पर अधिक भरोसा करना चाहिए। इस विचार से मुझे अचानक एहसास हुआ कि इन कठिनाइयों के ज़रिए परमेश्वर उसमें मेरी आस्था और भरोसे को पूर्ण करना चाहता था, ताकि मुझे अपने वास्तविक अनुभवों के ज़रिए परमेश्वर के सर्वशक्तिमान शासन की बेहतर व्यावहारिक समझ हासिल हो सके। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद, मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं रहा कि परमेश्वर मुझे राह दिखाएगा। हमने ऑनलाइन मिलने की तारीख तय कर ली, और भाई-बहनों ने अनुवाद करने के लिए हमारे साथ एक 15 वर्षीया बहन की व्यवस्था कर दी जिसने इतालवी का अध्ययन किया था। जब मैंने सुना कि एक 15 वर्षीया बहन अनुवाद में हमारी मदद करेगी। तो मैंने अपने और उस युवा बहन के बारे में सोचा। मैं बहुत कम उम्र की थी, परमेश्वर में विश्वास भी ज़्यादा पुराना नहीं था और मैंने सुसमाचार का प्रचार तो कभी नहीं किया था। ऐसे में सुसमाचार के प्रचार के लिए इतनी छोटी लड़की की मदद लेना सही होगा? मैं काफ़ी डांवाडोल महसूस कर रही थी। लेकिन जब मैंने इस युवा बहन को धाराप्रवाह इतालवी में परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए सुना और उसने कहा कि उसने नए शब्द उसी वक्त याद किए हैं, तो मैं हैरान भी थी और शर्मिंदा भी। परमेश्‍वर ने सुसमाचार के प्रसार के काम के लिए सभी सही लोगों को इकट्ठा किया था। इससे मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश याद आया : "जब परमेश्वर के मुँह से प्रतिबद्धता या प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, तो सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करती हैं; सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से आयोजित और व्यवस्थित किया जाता है और वे अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं और अपने-अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। उस अनुभव के ज़रिए, मैंने देखा कि जब तक मैं सत्यनिष्ठा से परमेश्वर का आश्रय लेती हूँ, वह मेरा मार्गदर्शन करेगा, और मुझे उसके चमत्कारिक कर्म देखने को मिलेंगे।

अनुवाद के लिए इस युवा बहन के मिलने के बाद, मैं उन भाई से सामान्य रूप से बात करने में सफल हुई। मानो मुझ पर से कई टन बोझ उतर गया हो। इस जानकारी से पहले, मुझमें परमेश्वर पर आश्रित होने की उतनी अधिक इच्छा नहीं थी, फिर किसी ज़रूरी काम के कारण वह बहन आगे और अनुवाद करने में मदद नहीं कर सकती थी। जब मैंने यह खबर सुनी तो मेरे होश ही उड़ गए। उन भाई को बहुत-कुछ बताना बाकी था ताकि सच्चे मार्ग पर उनकी नींव पक्की हो सके। पर दुभाषिए के बगैर, मैं लाचार थी। फिर मैंने सच्चे मार्ग के किसी खोजी के बारे में सुना जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और धार्मिक समुदाय द्वारा फैलाई गई अफ़वाहों से भ्रमित हो गया था, इसलिए उन्होंने इसे जाँचने की हिम्मत नहीं की। मुझे डर था कि यदि समय रहते उनका सिंचन नहीं किया गया, तो ये इतालवी भाई भी रास्ता भटक सकते हैं। मैं बहुत लाचार महसूस कर रही थी और कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। फिर एक दिन मैंने देखा, उन भाई ने अपने पेज पर यह शेयर किया हुआ था : "दोस्तो, भाइयो और बहनो, यीशु मसीह वापस आ गया है! आनन्द मनाओ!" उनकी उस पोस्ट को देखकर मेरे पसीने छूट गए क्योंकि उनके 3,000 से अधिक धार्मिक मित्र थे। अगर उनमें से चंद भी मसीह-विरोधी हुए, जो उन्हें भ्रमित और अशांत कर सकते हों, तो वे कैसे निपटेंगे? मैं आशंकित महसूस कर रही थी, इसलिए मैंने परमेश्वर के आगे प्रार्थना की। "हे परमेश्वर, दुभाषिए के बिना, इन भाई का तुरंत सिंचन नहीं किया जा सकता और मुझे डर है कि वे दूसरों के तर्कों से भ्रमित होकर पीछे हट जाएंगे। इस स्थिति में मुझे तेरे वचनों को कैसे अनुभव करना चाहिए और क्या सबक सीखना चाहिए? कृपा करके मेरा मार्गदर्शन करो।" अपनी प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "लोग अपना अधिकांश समय अचेतावस्था में रहते हुए बिताते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए या स्वयं पर। फिर वे स्वयं पर और अपने आसपास की लाभकारी स्थितियों और वातावरण पर, और साथ ही अपने लिए लाभदायक किन्हीं भी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों पर भरोसा करना चुनने की ओर प्रवृत्त होते हैं। बस इसी में लोग सबसे निपुण होते हैं। जिसमें वे सबसे निकृष्ट हैं, वह है परमेश्वर पर भरोसा करना और उसका आदर करना, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करना बहुत ज़हमत मोल लेना है। उन्हें लगता है कि परमेश्वर का आदर करना अदृश्य और अस्पृश्य है; ऐसा करना अस्पष्ट और अवास्तविक है। इस प्रकार, अपनी शिक्षाओं के इस पहलू में, लोग सबसे निकृष्ट प्रदर्शन करते हैं, और इसमें उनका प्रवेश सबसे उथला होता है। अगर तुम परमेश्वर का आदर करना और उस पर भरोसा करना नहीं सीखते, तो तुम अपने भीतर परमेश्वर के कार्य को तुम्हारा मार्गदर्शन, या तुम्हारा प्रबोधन करते कभी नहीं देख पाओगे। अगर तुम इन चीज़ों को नहीं देख सकते, तो ऐसे प्रश्न कि 'परमेश्वर विद्यमान है या नहीं और वह मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है या नहीं', तुम्हारे हृदय की गहराइयों में, प्रश्नवाचक चिह्न की बजाय विराम चिह्न या विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ समाप्त होंगे। 'क्या परमेश्वर मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है?' 'क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों में देखता है?' क्या कारण है कि तुम इन बातों को प्रश्नों में बदल देते हो? अगर तुम सच में परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो या उसका आदर नहीं करते हो, तो तुम उसमें सच्ची आस्था उत्पन्न नहीं कर पाओगे। अगर तुम उसमें सच्ची आस्था को उत्पन्न नहीं कर पाते हो, तो तुम परमेश्वर जो भी करता है उस पर हमेशा प्रश्नवाचक चिह्न ही लगाओगे, कभी कोई विराम चिह्न नहीं लगाओगे" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए')। परमेश्वर के वचनों ने मेरी आँखें खोल दीं और मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से परमेश्वर को भूल गई थी। जब परमेश्वर ने मुझे ऐसी स्थिति में डाला जिसमें मैं असहाय महसूस कर रही थी, जिसमें मैं बातचीत करने में असमर्थ थी और मुझे नहीं पता था कि क्या करना चाहिए, तब मैंने परमेश्वर को अपने जीवन रक्षक के रूप में देखा। लेकिन जब हालात सही थे और सही लोग मौजूद थे, मैं फ़ौरन दूसरे लोगों पर आश्रित हो गई थी, क्योंकि मुझे वह अधिक व्यावहारिक लगा था। जब मेरी ज़रूरत के समय वह युवा बहन मदद करने आई, तब मुझे पता था कि वह परमेश्वर का काम था। पर उसके बाद, मैं यह मानती रही कि उन भाई का अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना उस दुभाषिए पर निर्भर है। मुझमें अभी भी परमेश्वर में सच्ची आस्था की कमी थी। मुझे प्रभु यीशु के कुछ वचन याद आए : "मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझ को दिया है, सबसे बड़ा है और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता" (यूहन्ना 10:29)। परमेश्वर की भेड़ें उसकी वाणी सुनती हैं। कोई अफ़वाह, झूठ या कठिनाई परमेश्वर के लोगों को उसके हाथों से नहीं छीन सकती। यह परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्ति है। मुझे परमेश्वर के वचनों पर विश्वास करना चाहिए, अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए, और उन भाई के साथ संगति के लिए हर सहारे को आज़माना चाहिए। वे अफ़वाहों और झूठ से भ्रमित हुए या नहीं, इसका फ़ैसला मुझे नहीं करना था।

उसके बाद मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "शैतान हज़ारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट करता आया है। उसने बेहिसाब मात्रा में बुराइयाँ की हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी धोखा दिया है और संसार में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य का ग़लत इस्तेमाल किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य को बहकाया है और ऐसे-ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने बार-बार परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को भ्रमित और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के अधीन सभी चीज़ें और जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित नियमों और व्यवस्थाओं के अनुसार निरन्तर बने हुए हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान का बुरा स्वभाव और अनियन्त्रित विस्तार बहुत ही गन्दा है, बहुत ही घिनौना और नीच है और बहुत ही छोटा और दुर्बल है। यद्यपि शैतान उन सभी चीज़ों के बीच चलता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा बनाया गया है, फिर भी वह परमेश्वर की आज्ञा के द्वारा ठहराए गए लोगों, वस्तुओं या पदार्थों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। परमेश्वर के वचनों से मुझे आगे बढ़ने में मदद मिली। यह सच है कि सभी चीज़ें परमेश्वर के शासन के अधीन हैं, और परमेश्वर की इच्छा के मार्ग में कोई बाधा नहीं बन सकता। परमेश्वर की भेड़ों को कोई नहीं ले जा सकता। यदि कोई जो परमेश्वर की भेड़ नहीं है, परमेश्वर के घर में घुस जाए, तो एक दिन उसका भांडा फूटेगा और उसे घर से निकाल दिया जाएगा। यह परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है। मैंने देखा कि मैंने वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझा था। मैं इसका जीता-जागता उदाहरण थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने से पहले, पाँच साल तक मैंने धार्मिक जगत और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के झूठ को सुना था। भले ही मेरे मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ आईं, परमेश्वर के वचनों ने मुझे अंत के दिनों में उसके कार्य को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया था। और अब, उनके द्वारा फैलाया गया कोई भी पाखंड और झूठ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अनुसरण की मेरी राह में अड़चन नहीं डाल सकता। उनके कारण मुझे शैतान का घिनौना चेहरा और भी स्पष्ट दिखाई देता है और परमेश्वर का अनुसरण करने की मेरी आस्था दृढ़ होती है। मेरे अंदर यह परिवर्तन परमेश्वर के वचनों से आया। मैंने उन भाई के साथ महीने भर से ज़्यादा की गई अपनी बातचीत के बारे में सोचा। हम एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते थे और सामान्य रूप से बातचीत नहीं कर सकते थे, पर हम तब तक पीछे नहीं हटे, जब तक उन्होंने अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं कर लिया। यहाँ तक कि उन्होंने सुसमाचार को फैलाने और इटली में एक कलीसिया स्थापित करने का भी ज़िक्र किया। क्या परमेश्वर के मार्गदर्शन के बगैर, परमेश्वर के वचनों द्वारा लोगों को जीतने के बगैर ऐसा मुमकिन होता? मैंने देखा कि मुझमें वास्तव में परेश्वर के बारे में समझ की कमी थी। जब मैंने सुसमाचार का प्रसार किया, मैं कहती रही कि परमेश्वर के अधिकार का कोई सानी नहीं है और कोई शक्ति उसके काम में रोड़ा नहीं अटका सकती, लेकिन मैं चीज़ों को हमेशा तर्क के तराजू पर तौलती थी। जब भाषा के अवरोध की कठिनाई सामने आई, तो मुझे इस बात का डर था कि कहीं वह भाई अफ़वाहों और मसीह-विरोधियों के झूठ से भ्रमित न हो जाए। मैं डर में जी रही थी। जबकि हकीकत में, उन भाई का सच्चे मार्ग को अपनाना या न अपनाना परमेश्वर के हाथ में था, यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित था। फिजूल की चिंता को छोड़कर मुझे बस अपना कर्तव्य पूरा करना था और ज़िम्मेदारी से काम करना था। यह विचार आने पर मैंने परमेश्वर के आगे प्रार्थना की कि मैं उसके शासन और व्यवस्था के अधीन रहूँगी। हैरानी की बात, कुछ समय बाद, उस युवा बहन ने मुझे संदेश भेजकर बताया कि अब उसके पास समय है और वह फिर से अनुवाद में मेरी मदद कर सकती है। हाँ, आखिरकार, मैं उन इतालवी भाई से सहजता से बातचीत करने में कामयाब रही।

हालांकि उन भाई के साथ सुसमाचार साझा करने के दौरान, कभी-कभी मैं बहुत हताश हो जाया करती थी और कभी-कभी मैं बहुत ज़्यादा फ़िक्रमंद हो उठती थी, जब मैंने वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा किया, मुझे उसका मार्गदर्शन और कर्म बार-बार देखने को मिले। मैंने देखा कि परमेश्वर अपना सारा कार्य स्वयं ही करता है, और उसमें मेरी आस्था दृढ़ होती गई। यह सब परमेश्वर का अनुग्रह और दया थी। मैं सोचती थी कि सुसमाचार साझा करने का अर्थ है अन्य लोगों को बचाना, मगर फिर मुझे एहसास हुआ कि ऐसा करते हुए मुझे भी परमेश्वर के कार्य और वचनों का अनुभव हो रहा था। इस अनुभव के ज़रिए, मुझ "शंकालु इंसान" को, परमेश्वर के अधिकार और सच्चाई का वास्तविक अनुभव हुआ। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है : "जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए')। परमेश्वर को जानने के लिए हमें लोगों, घटनाओं और रोज़मर्रा की बातों के ज़रिए, और अपना कर्तव्य निभाते समय, परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अभ्यास और अनुभव करने की ज़रूरत है। परमेश्वर को वास्तव में जानने और उसका भय मानने का यही एकमात्र तरीका है। मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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