130 एक दूसरा युग, दूसरा दिव्य कार्य

अंतिम दिनों में, प्रमुख रूप से यह सत्य

कि "वचन देहधारी हुआ"

परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाता है।


I

अपने वास्तविक कार्यों के द्वारा ज़मीं पे,

ईश्वर कारण बनता है कि मानव उसे जाने,

कारण बनता है कि मानव उससे जुड़ता है,

और मानव को दिखाता है अपने असली कर्म।

वह मानव को स्पष्ट रूप से दिखाता है

कि वो चिह्न और चमत्कार दिखाता है

कभी और कभी नहीं दिखाता।

ये युग पर निर्भर करता है।

ये दिखाता है कि परमेश्वर है काबिल

दिखाने के चिह्न और चमत्कार,

पर वो बदलता है अपने कार्यचलन को

युग और कार्य के अनुसार।

क्योंकि ये भिन्न युग है और

ईश्वर के कार्य का भिन्न चरण है,

जो कर्म परमेश्वर दिखाता है होते हैं भिन्न।

मानव का परमेश्वर में विश्वास नहीं है चिह्न में,

अजूबों और चमत्कारों में,

पर उसके वास्तविक कार्य में नए युग के दौरान,

नए युग के दौरान।


II

वर्तमान के कार्य के चरण में,

वो चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाता है

जो उसने किए थे यीशु के युग में,

क्योंकि उसका कार्य उस युग में भिन्न था।

परमेश्वर अब वो कार्य नहीं करता है।

और कुछ सोचते हैं कि वो ये नहीं कर सकता है

या वो ईश्वर नहीं है क्योंकि वो नहीं करता है।

क्या ये नहीं है एक भ्रम?

परमेश्वर है काबिल दिखाने को चिन्हों और चमत्कारों को,

पर वो कार्य कर रहा है एक भिन्न युग में

और इसलिए वो ऐसे कार्य नहीं करता है।

क्योंकि ये भिन्न युग है और

ईश्वर के कार्य का भिन्न चरण है,

जो कर्म परमेश्वर दिखाता है होते हैं भिन्न।

मानव का परमेश्वर में विश्वास नहीं है चिह्न में,

अजूबों और चमत्कारों में,

पर उसके वास्तविक कार्य में नए युग के दौरान,

नए युग के दौरान।


III

ओ, मानव ईश्वर को जान पाता है

ईश्वर के कार्य करने के ढंग से।

ये ज्ञान मानव में पैदा करता है

ईश्वर में, उसके कर्म और कार्य में विश्वास।

क्योंकि ये भिन्न युग है और

ईश्वर के कार्य का भिन्न चरण है,

जो कर्म परमेश्वर दिखाता है होते हैं भिन्न।

मानव का परमेश्वर में विश्वास नहीं है चिह्न में,

अजूबों और चमत्कारों में,

पर उसके वास्तविक कार्य में नए युग के दौरान,

नए युग के दौरान, नए युग के दौरान।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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