756 सत्य से शैतान को हराओ ताकि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जा सको

1 मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्थायी प्रावधान और भरण-पोषण के कार्य के दौरान, परमेश्वर मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इच्छा और अपेक्षाओं को बताता है, और मनुष्य को अपने कर्मों, स्वभाव, और स्वरूप को दिखता है। उद्देश्य मनुष्य को कद-काठ से सुसज्जित करना, और मनुष्य को अनुमति देना है ताकि वह परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उससे विभिन्न सच्चाईयों को प्राप्त करे—ऐसी सच्चाईयाँ जो शैतान से लड़ने के लिए परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिए गए हथियार हैं। इस प्रकार से सुसज्जित होकर, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के कई माध्यम और मार्ग हैं, परन्तु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु अर्थात् शैतान के "सहयोग" की आवश्यकता पड़ती है।

2 शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को हथियार देने के बाद, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य की कद-काठी की "परीक्षा" लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया होगा। परन्तु यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को छोड़कर जाने में असफल होता है, और शैतान के प्रति समर्पण कर देता है, तो उसने परीक्षा को उत्तीर्ण नहीं किया होगा। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू की जाँच करता है, तो उसकी जाँच के मापदंड हैं कि शैतान के द्वारा आक्रमण किए जाने पर मनुष्य अपनी गवाही में डटा रहता है या नहीं, और शैतान के द्वारा फुसलाए जाते समय उसने परमेश्वर को छोड़ा है या नहीं और शैतान के सामने आत्मसमर्पण किया और उसके अधीन हुआ है या नहीं।

3 है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान पर विजय प्राप्त करके उसे हरा सकता है या नहीं, और वह स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान के बन्धनों पर विजय पाने के लिए, शैतान से आशा का पूरी तरह से त्याग करवाते हुए और उसे अकेला छोड़ते हुए, परमेश्वर के द्वारा उसे दिये गए हथियारों को, अपने दम पर, उठा सकता है या नहीं। यदि शैतान आशा को त्याग देता है और एक व्यक्ति को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर से लेने के लिए फिर कभी कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी ऐसे व्यक्तियों पर दोष नहीं लगाएगा और इनके साथ हस्तक्षेप नहीं करेगा, उन्हें फिर कभी प्रचंड तरीके से प्रताड़ित नहीं करेगा या उन पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस प्रकार के किसी व्यक्ति को ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिया गया होगा। यही वह सम्पूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से रूपांतरित

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