114 परमेश्वर मानव के सृजन के अर्थ को पुर्स्थापित करेगा

I

परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया,

उन्हें पृथ्वी पर स्थान दिया,

और वर्तमान तक पहुंचने की राह दिखाई।

उसने खुद की आहुति दे कर मनुष्य को बचाया

और अंत में अपनी जीत कायम करके

उसे मनुष्य को पुनःस्थापित करना पड़ेगा।

उसे मनुष्य को पुनःस्थापित करना पड़ेगा।

प्रारम्भ से ही उसने इसी कार्य में खुद कोसंलग्नकिया।

प्रारम्भ से ही उसने इसी कार्य में खुद को संलग्न किया।

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

पृथ्वी और मानव की स्थिति पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।

सारी सृष्टि पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।


II

शैतान से होके दूषित, मानव ने अपना दिल खोया,

अपना धर्मभीरू दिल खोया।

और उसने अपना वह प्रकार्य खोया

जो परमेश्वर के हर सृजन से आरम्भ से अपेक्षित है।

वह शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर,

प्रभु का शत्रु बन चुका है।

परमेश्वर ने मानव की आज्ञाकारिता और भय को खोया,

और अब उसका काम मनुष्यों के बीच नहीं हो सकता।नहीं हो सकता।

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

पृथ्वी और मानव की स्थिति पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।

सारी सृष्टि पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।


III

परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया,

मानव का कर्तव्य है उसकी आराधना करना।

पर मानव ने प्रभु से मुँह मोड़ के, की शैतान की उपासना।

पर मानव ने प्रभु से मुँह मोड़ के, की शैतान की उपासना।

शैतान बन गया आराध्य प्रतिमा,

इंसान के दिल में परमेश्वर ने अपना आसन खोया।

अर्थात मनुष्य ने अपनी सृष्टि का मतलब खोया।

इस मतलब को पुनःप्राप्त करने,

मानव को अपनी पूर्व-स्थिति में वापस जाना होगा।

परमेश्वर को मानव कोअपनेदुराचरण से मुक्ति दिलानी होगी।

परमेश्वर को मानव को अपने दुराचरण से मुक्ति दिलानी होगी।

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

वह अपने राज्य का स्थापन करेगा,

पृथ्वी और मानव की स्थिति पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।

सारी सृष्टि पर अपना अधिकार पुनःस्थापित करेगा।


IV

शैतान से मानव को वापस लाने के लिए

परमेश्वर को उसे पाप से बचाना ही होगा।

तब जाके वह धीरे धीरे

मनुष्य की प्राथमिक भूमिका पुनःस्थापित कर पायेगा।

और अंत में अपना राज्य पुनःस्थापित करेगा।

सारे आज्ञालंघनकारियों का विनाश होगा।

ताकि मनुष्य परमेश्वर की बेहतर तरह से भक्ति कर सके,

इस पृथ्वी पर बेहतर जीवन जी सके।

ताकि मनुष्य परमेश्वर की बेहतरतरह से भक्ति कर सके,

इस पृथ्वी पर बेहतर जीवन जी सके,

और इस पृथ्वी पर एक बेहतर जीवन जी सके,

और इस पृथ्वी पर एक बेहतर जीवन जी सके।


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