81 ओह, परमेश्वर! मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता

1

यह तुम्हारी वाणी ही है जो तुम्हारी उपस्थिति तक  आने में मेरा मार्गदर्शन करती है।

ये तुम्हारे वचन हैं जो मेरे दिल को जीत लेते हैं।

ये तुम्हारा कोमल प्रेम, जीवन से भरे तुम्हारे वचन हैं,

जो मेरे दिल को कसकर थामे रहते हैं, और आगे तुम्हें प्रेम करने में मुझे सक्षम बनाते हैं।

तुम हमेशा मेरे ख़यालों में हो, ओह, तुम हमेशा मेरे  ख़यालों में हो.


2

तुम्हारे वचनों ने मुझे तुम्हारे प्रेम में डुबो दिया है।

तुम्हारा सुन्दर चेहरा मेरे प्रेम को प्रेरित करता है।

तुम्हारे वचन हमारा न्याय करते और हमें उजागर करते हैं, वे हमें सांत्वना और हिम्मत देते हैं; तुम्हारे दयालु वचन इंसान के दिल को छू लेते हैं. 

तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारा मुझसे निपटना, साथ ही तुम्हारा प्रबोधन, मुझे तुम्हारे प्रेम को चखने देते हैं।

तुम्हारे प्रेम से मेरा दिल छलक जाता है। ओह, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।


3

तुम्हारा स्वभाव धर्मी, पवित्र, और बहुत मनभावन है.

तुम्हारा ज्ञान और तुम्हारा अनोखापन मनोहर हैं।

हालाँकि, आज मेरा परीक्षण होता है, और पीड़ा मेरे दिल को शुद्ध करती है, 

तुम्हारे वचन हमेशा मेरे साथ होते हैं। मैं बस तुम्हें जितनी भी अच्छी तरह हो सके, प्रेम करना चाहता हूँ। 

तुम्हारे आयोजन के बीच रहकर, मुझे कोई शिकायतें नहीं हैं। ओह, तुम्हारे आयोजन के बीच रहकर, मुझे कोई शिकायतें नहीं हैं।


4

मानव जाति के लिए तुम्हारा प्रेम बहुत सच्चा, बहुत वास्तविक है।

मैं ख़ुशी से तुम्हें संतुष्ट करने के लिए यथाशक्ति सब कुछ कर सकता हूँ।

यद्यपि ये परीक्षण और शोधन गंभीर हैं, मेरे पास तुम्हारे वचनों का मार्गदर्शन है।

मुझे तुम्हारे में पूरी आस्था है। जब तक मैं तुम्हें प्रेम कर सकूँ और गवाही दे सकूँ,

तब तक मैं किसी भी कठिनाई से, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, गुज़रने को तैयार हूँ। ओह, तुम्हारे लिए मेरा प्रेम कभी नहीं बदलेगा।

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