परमेश्वर को जानना 4

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 120

दीर्घ-और सूक्ष्म-परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर के अधिकार को समझना

परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। यह स्वयं परमेश्वर की पहचान की विलक्षण अभिव्यक्ति तथा विशिष्ट सार है। कोई सृजित किया गया या सृजित नहीं किया गया प्राणी ऐसी विलक्षण अभिव्यक्ति और ऐसे सार को धारण नहीं करता है; अर्थात्, केवल सृजनकर्ता ही इस प्रकार के अधिकार को धारण करता है। अर्थात, केवल सृजनकर्ता—अद्वितीय परमेश्वर—ही इस तरह से अभिव्यक्त होता है और उसका यही सार है। परमेश्वर के अधिकार के बारे में बात क्यों करें? स्वयं परमेश्वर का अधिकार मनुष्य के मन में अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? इसके बारे में विशेष क्या है? क्यों इसके बारे में यहाँ बात करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है? तुम लोगों में से प्रत्येक को सावधानीपूर्वक इस मुद्दे पर अवश्य ध्यान देना चाहिए? क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए, "परमेश्वर का अधिकार" एक अस्पष्ट सोच है, एक ऐसी सोच है जिसे किसी के दिमाग में बैठाना बहुत ही कठिन है, और इसके बारे में कोई चर्चा कदाचित अस्पष्ट हो सकती है। इसलिए परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान जिसे धारण करने में मनुष्य समर्थ है और परमेश्वर के अधिकार के सार के बीच सर्वदा एक अन्तर होगा। इस अन्तर को भरने के लिए, किसी को भी वास्तविक-जीवन के लोगों, घटनाओं, चीज़ों, या उन घटनाओं की सहायता से जो मनुष्य की पहुँच के भीतर है, जिन्हें समझने में मनुष्य समर्थ हैं, धीरे-धीरे परमेश्वर के अधिकार को अवश्य जान लेना चाहिए। यद्यपि यह वाक्यांश "परमेश्वर का अधिकार" अथाह प्रतीत हो सकता है, फिर भी परमेश्वर का अधिकार बिल्कुल भी काल्पनिक नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके साथ है, और प्रतिदिन उसकी अगुआई करता है। इसलिए, हर मनुष्य दिन-प्रति-दिन के अपने जीवन में आवश्यक रूप से परमेश्वर के अधिकार के अत्यंत साकार पहलू को देखेगा और अनुभव करेगा। यह साकारता इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर का अधिकार असलियत में मौज़ूद है, और यह किसी भी व्यक्ति को इस तथ्य को पहचानने और समझने की अनुमति देता है कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है।

परमेश्वर ने हर चीज़ का सृजन किया, और इसका सृजन करने के बाद, सभी चीज़ों पर उसका प्रभुत्व है। सभी चीज़ों के ऊपर प्रभुत्व रखने के अतिरिक्त, वह हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है। यह विचार कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इसका अर्थ क्या है? इसकी व्याख्या कैसे की जा सकती है? यह वास्तविक जीवन में किस प्रकार लागू होता है? इस सत्य को समझने के द्वारा कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को कैसे जान सकते हो? "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इस वाक्यांश से हमें देखना चाहिए कि जो कुछ परमेश्वर नियन्त्रित करता है वह ग्रहों का एक भाग, और सृष्टि का एक भाग नहीं है, मनुष्यजाति का एक भाग तो बिलकुल नहीं है, बल्कि हर एक चीज़ है: अति विशाल से लेकर अति सूक्ष्म तक, दृश्य से लेकर अदृश्य तक, ब्रह्माण्ड के सितारों से लेकर पृथ्वी की जीवित चीज़ों तक, और साथ ही अति सूक्ष्मजीवों, जिन्हें नंगी आँखों से देखा नहीं जा सकता है या ऐसे प्राणियों तक जो अन्य रूपों में मौज़ूद हैं। यह "हर एक चीज़" की सही परिभाषा है जिसे परमेश्वर "नियन्त्रण में रखता है," और यह वह दायरा है जिसके ऊपर परमेश्वर अपने अधिकार का उपयोग करता है, और यह उसकी संप्रभुता और उसके शासन का विस्तार है।

मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—सभी ग्रह, आकाश के सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन नियमित रूप से अपनी कक्षा में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे इसमें कितने ही वर्ष लगते हों। कौन सा ग्रह कौन से निश्चित समय में कहाँ जाता है; कौन सा ग्रह कौन सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन सा ग्रह कौन सी कक्षा में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें जरा सी भी ग़लती के बिना आगे बढ़ती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी सख्त तरतीब का अनुसरण करती हैं, उन में से सभी का सटीक आँकड़ों के द्वारा वर्णन किया जा सकता है; वे पथ जिस पर वे यात्रा करते हैं, उनकी कक्षाओं में परिभ्रमण की उनकी गति और तरतीब, वे समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, उन्हें विशेष नियमों के द्वारा परिमाणित किया जा सकता है और उनकी व्याख्या की जा सकती है। युगों से ग्रहों ने इन नियमों का पालन किया है, और ज़रा सा भी विचलन नहीं किया है। कोई भी शक्ति उनकी कक्षाओं या साँचों को नहीं बदल सकती है या उनको बाधित नहीं कर सकती है जिनका वे अनुसरण करते हैं। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को नियन्त्रित करते हैं और वह सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार के द्वारा पूर्वनियत किया जाता है, वे सृजनकर्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन स्वयं ही करते हैं। बृहद स्तर पर, कुछ साँचों, कुछ आँकड़ों, और साथ ही कुछ अजीब और अवर्णनीय नियमों या घटनाओं का पता लगाना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृजनकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और व‍ह हर चीज़ पर प्रभुत्व रखता है, और इसके अतिरिक्त सृजनकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव-विज्ञानी, खगोलशास्त्री, और भौतिक-विज्ञानी उत्तरोत्तर अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और साँचे जो उनकी गतिविधियों को आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रण किया जाता है। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के तरतीबों के बीच एकमात्र शक्तिशाली परमेश्वर ही है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि उसके असली चेहरे को कोई नहीं देख सकता है, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताक़त उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और साथ ही स्वीकार अवश्य करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है। और वे प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली नहीं हैं, बल्कि एक प्रभु और स्वामी के द्वारा आदेशित की जाती हैं। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें बृहद स्तर पर मनुष्यजाति महसूस कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़ियाँ, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सभी मौसम जिनका वह अनुभव करता है, सभी चीज़ें जो पृथ्वी पर पाई जाती हैं, जिनमें पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य शामिल हैं, ये सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं, उन सब के जीवन कुछ नियमों द्वारा शासित होते हैं, और वे उनके साथ बने रहते हुए बढ़ते हैं और बहुगुणित होते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है, परमेश्वर के अधिकार के कारण। या, दूसरे शब्दों में, तो परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण; क्योंकि स्वयं परमेश्वर यह सब करता है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मन है जो इन नियमों को उत्पन्न करता है; ये उसके विचार के अनुसार स्थानांतरित होंगे एवं बदलेंगे, और ये सभी स्थानांतरण और बदलाव उसकी योजना के वास्ते घटित होंगे और गायब होंगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लें। वे बिना चेतावनी दिए अचानक शुरू हो जाती हैं, कोई भी उनके उद्भव को या सही कारणों को नहीं जानता है कि वे क्यों होती हैं, और जब कभी भी कोई महामारी किसी निश्चित स्थान पर आती है, तो ऐसे लोग जो अभागे होते हैं वे विपत्ति से बच नहीं सकते हैं। मानव विज्ञान समझता है कि महामारियाँ ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने के द्वारा उत्पन्न होती हैं, और उनकी गति, दायरे, और प्रसारण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव विज्ञान के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यद्यपि मानवजाति हर सम्भव तरीके से उनका प्रतिरोध करती है, फिर भी वे इस बात को नियंत्रित नहीं कर सकती है कि महामारियाँ अचानक आने पर कौन से लोग और पशु अपरिहार्य रूप से प्रभावित होते हैं। एकमात्र चीज़ जिसे मानवजाति कर सकती है वह है उनकी रोकथाम करने का प्रयास करना, उनका सामना करना, और उन पर शोध करना। परन्तु कोई भी उस मूल कारण को नहीं जानता है जो किसी विशिष्ट महामारी के आरम्भ और अंत का वर्णन करता है, और कोई उन्हें नियन्त्रित नहीं कर सकता है। किसी महामारी के उदय और फैलाव का सामना करते समय, पहला उपाय जो मनुष्य करते हैं वह है कोई टीका विकसित करना, परन्तु कई बार टीके के तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही ख़त्म हो जाती है। क्यों महामारियाँ समाप्त हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि रोगाणुओं को नियन्त्रण में लाया जा चुका है, अन्य लोग कहते हैं कि ऋतुओं में बदलावों के कारण वे समाप्त हो जाती हैं...। जहाँ तक यह बात है कि ये बेबुनियाद अटकलबाज़ियाँ विश्वास-योग्य हैं या नहीं, विज्ञान कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सकता है, और कोई सटीक उत्तर नहीं दे सकता है। जिसका मानवजाति सामना करती है वह न केवल ये अटकलबाज़ियाँ हैं बल्कि महामारियों के बारे में मानवजाति की समझ की कमी और उसका भय है। अंतिम विश्लेषणों में कोई नहीं जानता है, कि क्यों ये महामारियाँ शुरू होती हैं या क्यों वे समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि मानवजाति का विश्वास केवल विज्ञान में है, वह पूरी तरह से इस पर ही आश्रित है, किन्तु वह सृजनकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानती है या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करती है, इसलिए उसके पास कभी कोई उत्तर नहीं होगा।

परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उसके अधिकार, उसके प्रबन्धन के कारण, सभी चीज़ें बढती हैं, अस्तित्व में रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। कुछ चीज़ें चुपके से आती हैं और चली जाती हैं, और मनुष्य नहीं बता सकता है कि वे कहाँ से आई थीं या उन नियमों का आभास नहीं कर सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं, और वह उन कारणों को तो बिलकुल नहीं समझ सकता है कि क्यों वे आती हैं और चली जाती हैं। यद्यपि मनुष्य वह सब कुछ देख, सुन, या अनुभव कर सकता है जो सभी चीज़ों के बीच घटित होती हैं; यद्यपि इन सब का मनुष्य पर असर पड़ता है, और यद्यपि मनुष्य अवचेतन रूप से असाधारणता, नियमितता, या विभिन्न घटनाओं की विचित्रता का आभास करता है, तब भी वह सृजनकर्ता की इच्छा और उसके मन के बारे में कुछ नहीं जानता है जो उनके पीछे होता है। उनके पीछे अनेक कहानियाँ हैं, और अनेक छिपी हुई सच्चाईयाँ हैं। क्योंकि मनुष्य सृजनकर्ता से दूर भटक गया है, क्योंकि वह इस तथ्य को नहीं स्वीकार करता है कि सृजनकर्ता का अधिकार सभी चीज़ों पर शासन करता है, इसलिए वह उस हर एक चीज़ को कभी नहीं जानेगा और समझेगा जो उसकी संप्रभुता के अधीन होती है। क्योंकि अधिकांश भागों में, परमेश्वर का नियन्त्रण और संप्रभुता मानवीय कल्पना, मानवीय ज्ञान, मानवीय समझ, और जो कुछ मानव-विज्ञान प्राप्त कर सकता है उन सीमाओं से बहुत बढ़ कर है, इसलिए सृजन की गई मानवजाति की क्षमताएँ इससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं। कुछ लोग कहते हैं, "चूँकि तुमने स्वयं परमेश्वर की संप्रभुता नहीं देखी है, तो तुम कैसे विश्वास कर सकते हो कि हर एक चीज़ उसके अधिकार के अधीन है?" देखना हमेशा विश्वास करना नहीं होता है; देखना हमेशा पहचानना या समझना नहीं होता है। तो विश्वास कहाँ से आता है? मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि, "विश्वास चीज़ों की वास्तविकता और मूल कारणों के बारे में लोगों की समझ, और अनुभव की मात्रा और गहराई से आता है।" यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, किन्तु तुम पहचान नहीं सकते हो, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के नियन्त्रण और परमेश्वर की संप्रभुता का तो बिलकुल एहसास नहीं करते हो, तो तुम अपने हृदय में यह कभी स्वीकार नहीं करोगे कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है और यह कि परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। तुम कभी भी सृजनकर्ता को अपना प्रभु, अपना परमेश्वर स्वीकार नहीं करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 121

मानवजाति का भाग्य और विश्व का भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता से अविभाज्य हैं

तुम सब लोग वयस्क हो। तुम लोगों में से कुछ अधेड़-उम्र के हैं; कुछ लोग वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुके हैं। एक अविश्वासी से लेकर विश्वासी तक, और परमेश्वर में विश्वास करने की शुरुआत से लेकर परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने और परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने तक, तुम लोगों को परमेश्वर की संप्रभुता का कितना ज्ञान है? तुम लोगों को मनुष्य के भाग्य के भीतर कौन सी अंतर्दृष्टियाँ मिली हैं? क्या एक व्यक्ति हर उस चीज़ को प्राप्त कर सकता है जिसकी वह जीवन में इच्छा करता है? लोगों के अस्तित्व के कुछ दशकों के दौरान कितनी चीज़ें हैं जिन्हें जैसा तुम लोग चाहते थे उसके अनुसार तुम लोग पूरा करने में सक्षम रहे हो? जैसी अपेक्षा की गई थी उसके अनुसार कितनी चीज़ें घटित नहीं होती हैं? कितनी चीज़ें सुखद आश्चर्यों के रूप में आती हैं? कितनी चीज़ें हैं जिनके परिणाम आने की तुम लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हो—अवचेतन रूप से सही पल की प्रतीक्षा कर रहे हो, और स्वर्ग की इच्छा की प्रतीक्षा कर रहे हो? कितनी ही चीज़ें लोगों को असहाय और कुंठित महसूस कराती हैं? सभी अपने भाग्य के बारे में आशाओं से भरपूर हैं, और अनुमान लगाते हैं कि उनकी ज़िन्दगी में हर एक चीज़ वैसी ही होगी जैसा वे चाहते हैं, कि उनके पास भोजन या वस्त्रों का अभाव नहीं होगा, और उनका भाग्य आलीशान ढंग से उदित होगा। कोई भी ऐसा जीवन नहीं चाहता है जो दरिद्र और कुचला हुआ हो, कठिनाईयों से भरा हो, आपदाओं से घिरा हुआ हो। परन्तु लोग इन चीज़ों को पहले से नहीं देख सकते हैं या नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। कदाचित् कुछ लोगों के लिए, अतीत बस अनुभवों का घालमेल है; वे कभी नहीं सीखते हैं कि स्वर्ग की इच्छा क्या है, और न ही वे इसकी परवाह करते हैं कि यह क्या है। वे बिना सोचे समझे, जानवरों के समान, दिन प्रति दिन जीते हुए अपनी ज़िन्दगियों को बिताते हैं, इस बारे में परवाह नहीं करते हैं कि मानवजाति का भाग्य क्या है, मानव क्यों जीवित हैं या उन्हें किस प्रकार जीवन जीना चाहिए। ये लोग मनुष्य के भाग्य के बारे में कोई समझ प्राप्त किए बिना ही वृद्धावस्था में पहुँच जाते हैं, और उनके मरने की घड़ी तक उनके पास कोई विचार नहीं होता है कि जीवन किस बारे में है। ऐसे लोग मरे हुए हैं; वे ऐसे प्राणी है जिनमें आत्मा नहीं है; वे जानवर हैं। यद्यपि सभी चीज़ों के बीच जीवन बिताते हुए, लोग उन अनेक तरीकों से आनन्द पा लेते हैं जिनसे संसार अपनी भौतक आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है, यद्यपि वे इस भौतिक संसार को निरन्तर बढ़ते हुए देखते हैं, फिर भी उनके स्वयं के अनुभव—जो कुछ उनका हृदय और उनकी आत्मा महसूस और अनुभव करती है—का भौतिक चीज़ों के साथ कोई लेना-देना नहीं है, और कोई भी पदार्थ उसका स्थान नहीं ले सकता है। यह एक पहचान है जो किसी व्यक्ति के हृदय की गहराई में होती है, ऐसी चीज़ जिसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है। यह पहचान मनुष्य के जीवन और मनुष्य के भाग्य के बारे में उसकी समझ, और उसकी भावनाओं में निहित होती है। और यह प्रायः किसी व्यक्ति को इस बात की समझ की ओर ले जाती है कि एक अनदेखा स्वामी इन सभी चीज़ों को व्यवस्थित कर रहा है, और मनुष्य के लिए हर एक चीज़ का आयोजन कर रहा है। इन सबके बीच, कोई व्यक्ति भाग्य की व्यवस्थाओं और आयोजनों को स्वीकार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता है; साथ ही, वह उस आगे के पथ को जिसे सृजनकर्ता ने तैयार किया है, और उसके भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता है। यह एक निर्विवाद सत्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भाग्य के बारे में कोई क्या अन्तर्दृष्टि और प्रवृत्ति रखता है, कोई भी इस तथ्य को बदल नहीं सकता है।

तुम प्रतिदिन कहाँ जाओगे, तुम क्या करोगे, तुम किस व्यक्ति का या चीज़ का सामना करोगे, तुम क्या कहोगे, तुम्हारे साथ क्या होगा—क्या इसमें से किसी की भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं को पहले से नहीं देख सकते हैं, और जिस प्रकार वे विकसित होती हैं उसको तो बिलकुल भी नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। जीवन में, पहले से देखी न जा सकने वाली ये घटनाएँ हर समय घटित होती हैं, और ये प्रतिदिन घटित होने वाली घटनाएँ हैं। ये दैनिक उतार-चढ़ाव और तरीके जिन्हें वे प्रकट करते हैं, या ऐसे तरीके जिनके द्वारा वे घटित होते हैं, मानवजाति के लिए निरन्तर अनुस्मारक हैं कि कुछ भी बस यूँ ही नहीं होता है, यह कि विकास का मार्ग जो ये चीज़ें अपनाती हैं उसे, और उनकी अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। हर घटना सृजनकर्ता की ओर से मनुष्यजाति को दी गई झिड़की को सूचित करती है, और यह सन्देश भी देती है कि मानवजाति अपने भाग्य को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, साथ ही हर घटना मानवजाति की अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की निराधार, व्यर्थ महत्वाकांक्षा और इच्छा का खण्डन है। ये मानव जाति के कान के पास एक के बाद एक मारे गए जोरदार थप्पड़ों के समान हैं, जो लोगों को पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती हैं कि अंत में कौन उनके भाग्य पर शासन और नियन्त्रण करता है। और जब मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ लगातार नाकाम और ध्वस्त होती हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से उस चीज़ के लिए एक अचैतन्य स्वीकृति पर आ जाते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखा है, और स्वर्ग की इच्छा और सृजनकर्ता की संप्रभुता की वास्तविकता की स्वीकृति पर आ जाते हैं। सम्पूर्ण मानवजीवन के भाग्य के इन दैनिक उतार-चढ़ावों से, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृजनकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता हो; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता हो कि "सृजनकर्ता के अधिकार से आगे बढ़ा नहीं जा सकता है," जो इस शाश्वत सत्य को सूचित नहीं करता हो कि "सृजनकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है।"

मानवजाति और विश्व के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार से धुनकर अलग नहीं किया जा सकता है। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता मनुष्य की समझ में आते हैं; जीवित बचे रहने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के शासन का एहसास करता है; सभी चीज़ों के भाग्य से वह उन तरीकों के बारे में निष्कर्ष निकालता है जिनसे सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; और मानवजाति और सभी चीज़ों के जीवन चक्रों में मनुष्य सचमुच में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है और सचमुच में इस बात को देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी पार्थिव कानूनों, नियमों, और संस्थानों, तथा अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों का स्थान ले लेती हैं। इसके आलोक में, मानवजाति यह पहचानने के लिए बाध्य हो जाती है कि किसी भी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है, यह कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनियत की गई घटनाओं और चीज़ों के साथ कोई भी शक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है या उन्हें बदल नहीं सकती है। यह इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन है कि मनुष्य और सभी चीज़ें पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन बिताती हैं और बढ़ती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है? यद्यपि मनुष्य, वस्तुगत नियमों में, सभी घटनाओं और सभी चीज़ों के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके विधान को देखता है, फिर भी कितने लोग विश्व के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सिद्धान्तों को समझ पाते हैं? कितने लोग सचमुच में अपने स्वयं के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्था को जान, पहचान, और स्वीकार कर सकते हैं, और उसके प्रति समर्पण कर सकते हैं? कौन, सभी चीज़ों के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के सत्य पर विश्वास करने के बाद, सचमुच में विश्वास करेगा और पहचानेगा कि सृजनकर्ता मानव जीवन के भाग्य को भी निर्धारित करता है? कौन सचमुच में इस तथ्य को समझ सकता है कि मनुष्य का भाग्य सृजनकर्ता की हथेली में रहता है? जब इस सत्य से सामना होता है कि वह मानवजाति के भाग्य पर शासन और नियन्त्रण करता है, तो मानवजाति को सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए, यह एक ऐसा निर्णय है जिसे हर एक मनुष्य को अपने लिए अवश्य लेना चाहिए जिसका अब इस सत्य से सामना होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 122

मानव जीवन में छह मोड़

अपने जीवन के मार्ग में, हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण मोड़ों की एक श्रृंखला पर पहुँचता है। ये अत्यधिक बुनियादी, और अति महत्वपूर्ण कदम हैं जो जीवन में किसी व्यक्ति के भाग्य को निर्धारित करते हैं। जो कुछ आगे दिया गया है वह इन मील के पत्थरों का एक संक्षिप्त विवरण है जिनसे होकर हर एक व्यक्ति को अपने जीवन के मार्ग में गुज़रना होगा।

जन्म: पहला मोड़

किसी व्यक्ति का कहाँ जन्म होता है, वह किस परिवार में जन्म लेता या लेती है, उसका लिंग, रंग-रूप, जन्म का समय: ये किसी व्यक्ति के जीवन के प्रथम मोड़ के विवरण हैं।

इस मोड़ पर इन भागों के बारे में किसी के भी पास कोई विकल्प नहीं होता है; उन सभी को सृजनकर्ता के द्वारा बहुत पहले अग्रमि में ही पूर्वनियत कर दिया जाता है। ये किसी भी तरह से बाहरी वातावरण के द्वारा प्रभावित नहीं होते हैं, और कोई भी मानव-निर्मित कारक इन तथ्यों को बदल नहीं सकते हैं जिन्हें सृजनकर्ता ने पूर्वनियत किया है। क्योंकि किसी व्यक्ति के पैदा होने का अर्थ है कि सृजनकर्ता ने पहले से ही उस भाग्य के पहले कदम को पूरा कर लिया है जिसे उसने उस व्यक्ति के लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि उसने इन सभी विवरणों को बहुत पहले ही अग्रिम में पूर्वनिर्धारित कर दिया है, इसलिए किसी में भी उनमें से किसी को भी बदलने की ताक़त नहीं है। किसी व्यक्ति का बाद का भाग्य चाहे जो भी हो, उसके जन्म की स्थितियाँ पूर्वनियत होती हैं, और जैसी हैं वैसी ही बनी रहती हैं; वे जीवन में उसके भाग्य के द्वारा किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होती हैं, और न ही वे किसी भी तरह से उसके ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता पर असर डालती हैं।

1. सृजनकर्ता की योजनाओं से एक नए जीवन की उत्पत्ति होती है

कोई व्यक्ति प्रथम मोड़ के—अपने जन्म स्थान, अपने परिवार, अपने लिंग, अपने शारीरिक रंग-रूप, अपने जन्म के समय—अंशों में से किसे चुनने में समर्थ है? स्पष्ट रूप से, किसी व्यक्ति का जन्म एक निष्क्रिय घटना है: वह अस्वैच्छिक रूप से, किसी निश्चित स्थान में, किसी निश्चित समय में, किसी निश्चित परिवार में, और किसी निश्चित शारीरिक रंग-रूप के साथ जन्म लेता है; वह अस्वैच्छिक रूप से किसी निश्चित परिवार का सदस्य बन जाता है, और किसी निश्चित वंश-वृक्ष का उत्तराधिकारी होता है। जीवन के इस प्रथम मोड़ में किसी व्यक्ति के पास कोई विकल्प नहीं होता है, किन्तु वह एक ऐसे परिवेश में जो सृजनकर्ता की योजना के अनुसार नियत होता है, एक विशेष परिवार में, एक विशेष लिंग एवं रंग-रूप के साथ, और एक विशेष समय पर जन्म लेता है जो घनिष्ठ रूप से उसके जीवन के पथ से जुड़ा होता है। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर कोई व्यक्ति क्या कर सकता है? सभी ने कहा है, किसी मनुष्य के पास उसके जन्म से सम्बन्धित इन विवरणों में से किसी एक के बारे में भी कोई विकल्प नहीं है। यदि सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत और मार्गदर्शित नहीं होता, तो इस संसार में नवजात नहीं जानता कि कहाँ जाना है या कहाँ रहना है, उसके पास कोई रिश्ते नहीं होते, वह किसी से सम्बन्धित नहीं होता, और उसका कोई वास्तविक घर नहीं होता। किन्तु सृजनकर्ता की अत्यंत सतर्क व्यवस्थाओं की वजह से, वह रहने के लिए एक स्थान, माता-पिता, एक स्थान जिससे वह सम्बन्धित होता है, और रिश्तेदारों के साथ, अपने जीवन की यात्रा का आरम्भ करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से, इस नए जीवन का आगमन सृजनकर्ता की योजनाओं के द्वारा निर्धारित किया जाता है, और हर एक चीज़ जिसे वह धारण करेगा वह उसे सृजनकर्ता के द्वारा प्रदान की जाएगी। स्वतन्त्र रूप से तैरती हुई एक नगण्‍य देह से, धीरे-धीरे मांस-और-लहू की परमेश्वर की एक रचना, एक दृश्यमान, साकार मानव तैयार हो जाता है, जो सोचता, साँस लेता, और गर्माहट और ठण्ड का एहसास करता है, जो भौतिक संसार में सृजित किए गए प्राणियों के सभी सामान्य क्रियाकलापों में भाग ले सकता है, और जो उन सभी हालातों से होकर गुज़रेगी जिनका अनुभव सृजित किए गए मानव को जीवन में करना होगा। सृजनकर्ता के द्वारा किसी व्यक्ति के जन्म के पूर्वनिर्धारण का अर्थ है कि वह उस व्यक्ति को जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक सभी चीज़ें प्रदान करेगा; और यह कि उसी प्रकार किसी व्यक्ति के जन्म लेने का अर्थ है कि वह जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक सभी चीज़ों को सृजनकर्ता के द्वारा प्राप्त करेगा या करेगी, यह कि इस बिन्दु के आगे वह, सृजनकर्ता के द्वारा प्रदान किए गए और सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन, किसी अन्य रूप में जीवन बिताएगा या बिताएगी।

2. क्यों भिन्न-भिन्न मनुष्य भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अधीन जन्म लेते हैं

लोग प्रायः यह कल्पना करना पसंद करते हैं कि यदि वे फिर से जन्म लेते, तो किसी प्रसिद्ध परिवार में जन्म लेते; यदि वे महिला होते, तो वे शुद्ध गोरे रंग के समान दिखते और हर एक के द्वारा प्रेम किए जाते, और यदि वे पुरुष होते, तो वे सुन्दर राजकुमार होते, उन्हें कोई अभाव नहीं होता, और पूरा संसार उनके आदेशों का पालन करने के लिए सदा तत्पर रहता। प्रायः ऐसे लोग हैं जो अपने जन्म के बारे में बहुत से भ्रमों के अधीन हैं और वे अक्सर इससे असंतुष्ट रहते हैं, और अपने परिवार, अपने रंग-रूप, अपने लिंग, और यहाँ तक कि अपने जन्म के समय से भी नाराज़ रहते हैं। फिर भी लोगों की समझ में कभी नहीं आता हैं कि क्यों उनका जन्म किसी विशिष्ट परिवार में हुआ है या क्यों वे किसी विशेष प्रकार के दिखते हैं। वे नहीं जानते हैं कि इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कहाँ जन्म लिया है या वे कैसे दिखाई देते हैं, उन्हें सृजनकर्ता के प्रबंधन में अनेक भूमिकाएँ निभानी हैं और भिन्न-भिन्न ध्येयों को पूरा करना है—यह उद्देश्य कभी नहीं बदलेगा। सृजनकर्ता की नज़रों में, वह स्थान जहाँ किसी व्यक्ति का जन्म होता है, उसका लिंग, उसका शारीरिक रंग-रूप, ये सभी अस्थायी चीज़ें हैं। ये संपूर्ण मनुष्यजाति के उसके प्रबंधन के प्रत्येक पहलू में अति सूक्ष्म बिन्दुओं, और छोटे-छोटे संकेतों की एक श्रृंखला है। और किसी व्यक्ति की वास्तविक मंज़िल और उसका अंत किसी विशेष चरण में उसके जन्म के द्वारा निर्धारित नहीं होते हैं, बल्कि उस ध्येय के द्वारा निर्धारित होते हैं जिसे वह प्रत्येक जीवन में पूरा करता है, उन पर सृजनकर्ता के न्याय के द्वारा निर्धारित होते हैं जब उसकी प्रबंधन योजना पूरी हो जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक प्रभाव का एक कारण होता है, यह कि कोई भी प्रभाव बिना कारण के नहीं होता है। और इसलिए किसी व्यक्ति का जीवन आवश्यक रूप से उसके वर्तमान जीवन और उसके पूर्ववर्ती जीवन दोनों से जुड़ा हुआ होता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु उसके जीवन की वर्तमान अवधि को समाप्त कर देती है, तो व्यक्ति का जन्म एक नए चक्र की शुरुआत है; यदि पुराना चक्र किसी व्यक्ति के पूर्ववर्ती जीवन को दर्शाता है, तो नया चक्र स्वाभाविक रूप से उसका वर्तमान जीवन है। चूँकि व्यक्ति का जन्म उसके पूर्ववर्ती जीवन और साथ ही उसके वर्तमान जीवन, स्थान, परिवार, लिंग, रंग-रूप, और इसी तरह के अन्य कारकों से जुड़ा हुआ है, जो उसके जन्म के साथ जुड़े हुए हैं, तो वे सभी आवश्यक रूप से उससे सम्बन्धित हैं। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के जीवन के कारक न केवल उसके पूर्ववर्ती जीवन के द्वारा प्रभावित होते हैं, बल्कि वर्तमान में उसकी नियति के द्वारा भी निर्धारित होते हैं। इससे अनेक प्रकार की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों का पता चलता है जिनमें लोगों का जन्म होता है; कुछ लोग गरीब परिवारों में जन्म लेते हैं, अन्य अमीर परिवारों में जन्म लेते हैं। इसलिए कुछ लोग सामान्य कुटुम्ब से होते हैं, और अन्य लोगों की प्रसिद्ध वंशावलियाँ होती हैं। कुछ लोग दक्षिण दिशा में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग उत्तर दिशा में जन्म लेते हैं। कुछ लोग रेगिस्तान में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग हरी-भरी भूमि में जन्म लेते हैं। कुछ लोगों के जन्म के साथ-साथ उल्लास, हँसी और उत्सव आता है, और अन्य लोग आँसू, आपदा और दुःख लेकर आते हैं। कुछ लोगों का जन्म सँजोकर रखे जाने के लिए होता है, अन्य लोगों को जंगली खरपतवार की तरह अलग कर दिया जाता है। कुछ लोग सुन्दर मुखाकृति के साथ जन्म लेते हैं, और अन्य लोग कुरूपता के साथ। कुछ लोग दिखने में सुन्दर होते हैं, और अन्य लोग भद्दे होते हैं। कुछ लोग अर्धरात्रि में जन्म लेते हैं, और अन्य लोग दोपहर के सूर्य की चिलचिलाती धूप के नीचे पैदा होते हैं। ... सभी तबकों के लोगों के जन्म को उस भाग्य के द्वारा निर्धारित किया जाता है जो सृजनकर्ता ने उनके लिए संचित किया है; उनके जन्म, वर्तमान जीवन में उनके भाग्य और साथ ही उन भूमिकाओं को जिन्हें वे निभाएँगे और उस ध्येय को जिन्हें वे पूरा करेंगे, को निर्धारित करते हैं। यह सब कुछ सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है, उसके द्वारा पूर्वनियत है; कोई भी अपने पूर्वनियत भाग्य से बच कर नहीं जा सकता है, कोई भी अपने जन्म की परिस्थितियों को[क] बदल नहीं सकता है, और कोई भी अपने स्वयं के भाग्य को चुन नहीं सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में, "की परिस्थितियों को" यह वाक्यांश नहीं है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 123

बड़ा होना: दूसरा मोड़

इस बात पर निर्भर करते हुए कि उन्होंने किस प्रकार के परिवार में जन्म लिया है, लोग भिन्न-भिन्न पारिवारिक परिवेशों में बड़े होते हैं और अपने माता-पिता से भिन्न पाठ सीखते हैं। यह उन स्थितियों को निर्धारित करता है जिसमें कोई व्यक्ति वयस्क होता है, और बड़ा होना[क] व्यक्ति के जीवन के दूसरे मोड़ को दर्शाता है। कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि, इस मोड़ पर लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है। यह भी नियत, और पूर्वनियोजित है।

1. जिन परिस्थितियों के अधीन कोई व्यक्ति बड़ा होता है वे सृजनकर्ता के द्वारा नियत की जाती हैं

कोई व्यक्ति ऐसे लोगों, घटनाओं या चीज़ों का चुनाव नहीं कर सकता है जिनसे वह नसीहत पाता है और जिनसे प्रभावित होता है जैस-जैसे वह वह बड़ा होता है। कोई यह चुनाव नहीं कर सकता है कि वह कौन सा ज्ञान या कौशल हासिल करता है, और वह कौन सी आदतें निर्मित करता है। इस पर किसी का कोई वश नहीं है कि कौन उसके माता-पिता और सगे सम्बन्धी हैं, वह किस प्रकार के परिवेश में बड़ा होता है; लोगों, घटनाओं, और अपने आस-पास की चीज़ों के साथ उसके रिश्‍ते, और वे किस प्रकार उसके विकास को प्रभावित करते हैं, ये सब उसके नियन्त्रण से परे है। तो, इन चीज़ों तो कौन तय करता है? कौन इनकी व्यवस्था करता है? चूँकि इस मामले में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है, चूँकि वे अपने लिए इन चीज़ों का निर्णय नहीं ले सकते हैं, और चूँकि वे स्वाभविक रूप से आकार नहीं लेती हैं, तो स्पष्ट है कि इन सभी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों की रचना सृजनकर्ता के हाथों में है। कहने की कोई आवश्कता नहीं कि ठीक जैसे सृजनकर्ता हर एक व्यक्ति के जन्म की विशेष परिस्थितियों की व्यवस्था करता है, वैसे ही वह उन विशिष्ट परिस्थितियों की भी व्यवस्था करता है जिनमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं, और उस के आस-पास की चीज़ों में परिवर्तन लाता है, तो उस व्यक्ति का बड़ा होना और उसका विकास आवश्यक रूप से उन्हें भी प्रभवित करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का जन्म गरीब परिवारों में होता है, किन्तु वे धन सम्पत्ति के साथ बड़े होते हैं; अन्य लोग समृद्ध परिवारों में जन्म लेते हैं किन्तु अपने परिवारों के सौभाग्य के पतन का इस तरह से कारण बनते हैं, कि वे गरीब परिवेश में बड़े होते हैं। किसी का भी जन्म नियत नियमों के द्वारा शासित नहीं होता है, और कोई भी व्यक्ति परिस्थतियों की अनिवार्य, नियत श्रृंखला के अधीन बड़ा नहीं होता है। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिनका कोई व्यक्ति अनुमान लगा सकता है या नियन्त्रण कर सकता है; ये उसके भाग्य के परिणाम हैं, और उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित होते हैं। निस्संदेह, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें सृजनकर्ता के द्वारा किसी व्यक्ति के भाग्य के लिए पूर्वनियत किया जाता है, उन्हें उस व्यक्ति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के द्वारा, और उसके लिए उसकी योजनाओं के द्वारा, निर्धारित किया जाता है।

2. अनेक परिस्थितियाँ जिनके अधीन लोग बड़े होते हैं भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का कारण बनती हैं

किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ उस परिवेश और उन परिस्थितियों के बुनियादी स्तर पर स्थापित होती हैं जिसमें वे बड़े होते हैं, और उसी तरह से जिन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति बड़ा होता है वे उसके जन्म की परिस्थितियों का परिणाम होती हैं। इस समय के दौरान व्यक्ति भाषा सीखना आरम्भ करता है, और उसका मस्तिष्क कई नई चीज़ों का सामना और उन्हें आत्मसात करना आरम्भ करता है, इस प्रक्रिया में वह लगातार बड़ा होता है। जिन चीज़ों को कोई व्यक्ति अपने कानों से सुनता है, अपनी आँखों से देखता है, और अपने मस्तिष्क से ग्रहण करता है वे धीरे-धीरे उसके भीतरी संसार को समृद्ध और जीवंत करती हैं। जिन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के सम्पर्क में कोई व्यक्ति आता है, जिन सामान्यबोध, विद्याओं, कौशलों को वह सीखता है, और सोचने के जिन तरीकों के द्वारा वह प्रभावित होता है, जो उसके मन में बैठाए जाते हैं, या उसे सिखाए जाते हैं, वे सब जीवन में किसी व्यक्ति के भाग्य का मार्गदर्शन करेंगे और उसे प्रभावित करेंगे। बड़ा होने पर कोई व्यक्ति जिस भाषा को सीखता है और उसका सोचने का तरीका उस परिवेश से अविभाज्य होता है जिसमें वह अपनी किशोरावस्था को बिताता है, और वह परिवेश माता-पिता, सहोदरों, और अन्य लोगों, घटनाओं, और उस के आस-पास की चीज़ों से मिलकर बनता है। इसलिए किसी व्यक्ति के विकास का मार्ग उस परिवेश के द्वारा निर्धारित होता है जिसमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है, और उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों पर भी निर्भर करता है जिनके सम्पर्क में इस समयावधि के दौरान कोई व्यक्ति आता है। चूँकि ऐसी स्थितियाँ जिनके अधीन कोई व्यक्ति बड़ा होता है अग्रिम में बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित होती हैं, इसलिए वह परिवेश जिसमें कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया के दौरान जीवन बिताता है भी, प्राकृतिक रूप से, पूर्वनिर्धारित होता है। इसे किसी व्यक्ति की पसंद और प्राथमिकताओं के द्वारा तय नहीं किया जाता है, बल्कि इसे सृजनकर्ता की योजनाओं के अनुसार तय किया जाता है, सृजनकर्ता द्वारा सावधानी से की गई व्यवस्थाओं के द्वारा, जीवन में व्यक्ति के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता के द्वारा निर्धारित किया जाता है। इसलिए बड़ा होने के मार्ग में कोई व्यक्ति जब लोगों का सामना करता है, और जिन चीजों के सम्पर्क में व‍ह आता है, वे सभी अनिवार्य रूप से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी व्यवस्था से जुड़े होते हैं। लोग इस प्रकार के जटिल पारस्परिक सम्बन्धों को पहले से नहीं देख सकते हैं, और न ही वे उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं या उनकी थाह पा सकते हैं। बहुत सी अलग-अलग चीज़ों और बहुत से अलग-अलग लोगों का उस परिवेश पर प्रभाव पड़ता है जिसमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है, और कोई मनुष्य सम्बन्धों के इतने विशाल जाल की व्यवस्था और आयोजन करने में समर्थ नहीं है। सृजनकर्ता को छोड़ कर कोई व्यक्ति या चीज़ भी अनेक प्रकार के अलग-अलग लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के रंग-रूप, उपस्थिति, तथा उनके लुप्त होने को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, और यह केवल सम्बन्धों का इतना विशाल जाल ही है जो किसी व्यक्ति के विकास को सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत किए गए अनुसार आकार देता है, अनेक प्रकार के परिवेशों का निर्माण करता है जिनमें लोग बड़े होते हैं, तथा सृजनकर्ता के प्रबंधन के कार्य के लिए आवश्यक अनेक भूमिकाओं की रचना करता है, लोगों के लिए ठोस और मज़बूत बुनियाद डालता है ताकि वे सफलतापूर्वक अपने ध्येयों को पूरा करें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "यह" लिखा है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 124

स्वावलंबन: तीसरा मोड़

जब कोई व्यक्ति बचपन और किशोरावस्था से होकर गुज़र जाता है और धीरे-धीरे तथा अनिवार्य रूप से परिपक्वता तक पहुँच जाता है, तो उसके लिए अगला कदम अपनी किशोरावस्था को पूरी तरह से अलविदा कहना, अपने माता-पिता को अलविदा कहना, और आगे के मार्ग का एक स्वावलंबी वयस्क के रूप में सामना करना है। इस मुकाम पर[क] उसे अवश्य सभी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों का सामना अवश्य करना चाहिए जिनका एक वयस्क को सामना करना पड़ता है, अपने भाग्य के सभी हिस्सों का सामना करना चाहिए जो जल्द ही खुद को प्रस्तुत करेंगे। यह तीसरा मोड़ है जिससे होकर व्यक्ति को गुज़रना होगा।

1. स्वावलंबी होने के पश्चात्, व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना आरम्भ करता है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना उसके जीवन की यात्रा के लिए, व्यक्ति के भाग्य की आधारशिला रखने के लिए "तैयारी की अवधि" है, तो उसका स्वावलंबन जीवन में उसके भाग्य का आरम्भिक आत्मभाषण है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म और बड़ा होना वह धन-समृद्धि है जिसे उसने जीवन में अपने भाग्य के लिए संचित किया है, तो किसी व्यक्ति का स्वावलंबन तब है जब वह अपनी धन-समृद्धि को खर्च करना और उसे बढ़ाना आरम्भ करता है। जब कोई अपने माता-पिता को छोड़ देता है और स्वावलंबी हो जाता है, तो जिन सामाजिक स्थितियाँ का वह सामना करता है, और उसके लिए उपलब्ध कार्य व जीवनवृत्ति का प्रकार दोनों भाग्य द्वारा आदेशित होते हैं और उनका उसके माता-पिता के साथ कोई लेना देना नहीं होता है। कुछ लोग महाविद्यालय में अच्छे मुख्य विषय चुनते हैं और अंत में स्नातक के पश्चात् एक संतोषजनक नौकरी पाते हैं, और अपने जीवन की यात्रा में पहली विजयी छलांग लगाते हैं। कुछ लोग कई विभिन्न कौशलों को सीखते और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और फिर भी ऐसी नौकरी नहीं ढूँढ़ पाते हैं जो उनके अनुकूल हो या अपने पद को नहीं पाते हैं, जीवनवृत्ति तो बिलकुल नहीं पाते हैं; अपनी जीवन यात्रा के आरम्भ में वे अपने आप को हर एक मोड़ पर कुंठित, परेशानियों से घिरा हुए, अपने भविष्य को निराशाजनक और अपने जीवन को अनिश्चित पाते हैं। कुछ लोग स्वयं को कर्मठतापूर्वक अपने अध्ययनों में लगा देते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा पाने के अपने सभी अवसरों से बाल-बाल चूक जाते हैं, और कभी सफलता हासिल नहीं करने के लिए भाग्य के द्वारा निर्दिष्ट होते हैं, अपनी जीवन यात्रा में उनकी सबसे पहली आकांक्षा विशाल शून्य में गायब हो जाती है। न जानते हुए[ख] कि आगे का मार्ग निर्बाध है या पथरीला, वे पहली बार महसूस करते हैं कि प्रभावित करने वाली कितनी चीज़ों से मनुष्य की नियति भरी हुई है, और इसलिए वे आशा और भय के साथ जीवन का सम्मान करते हैं। कुछ लोग, बहुत अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होने के बावजूद, पुस्तकें लिखते हैं और बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं; कुछ, यद्यपि पूरी तरह से अशिक्षित होते हैं, फिर भी व्यवसाय में पैसा कमाते हैं और परिणामस्वरूप स्वयं का खर्च वहन करने में समर्थ होते हैं...। कोई व्यक्ति कौन सा व्यवसाय चुनता है, कोई व्यक्ति कैसे जीविका अर्जित करता है: क्या लोगों का इस पर कोई नियन्त्रण है कि वे अच्छा चुनाव करते हैं या बुरा चुनाव? क्या वे उनकी इच्छाओं एवं निर्णयों के अनुरूप होते हैं? अधिकांश लोग चाहते हैं कि वे कम काम करें और अधिक कमा सकें, धूप और बरसात में परिश्रम न करें, अच्छे कपड़े पहनें, हर जगह जगमगाएँ और चमकें, दूसरों से ऊँचा उठें, और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाएँ। लोगों की इच्छाएँ बहुत उत्तम होती हैं, किन्तु जब लोग अपने जीवन की यात्रा में अपना पहला कदम उठाते हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे समझ में आने लगता है कि मनुष्यों के भाग्य कितने अपूर्ण है, पहली बार सचमुच में यह तथ्य उनकी समझ में आता है कि, यद्यपि कोई व्यक्ति अपने भविष्य के लिए सुस्पष्ट योजना बना सकता है, यद्यपि कोई साहसिक कल्पनाओं को आश्रय दे सकता है, फिर भी किसी के पास भी अपने सपनों को साकार करने की योग्यता या सामर्थ्य नहीं होती है, और कोई भी अपने स्वयं के भविष्य को नियन्त्रित करने की स्थिति में नहीं होता है। किसी व्यक्ति के सपनों और उन सच्चाईयों के बीच हमेशा कुछ दूरी रहेगी जिनका उसे सामना करना होगा; चीज़ें वैसी कभी नहीं होती हैं जैसा कोई व्यक्ति चाहता है कि वे हों, और जब ऐसी सच्चाईयों से सामना होता है तो लोग कभी भी संतुष्टि या तृप्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग अपनी स्वयं की नियति को बदलने के प्रयास में, हर संभव हद तक जाएँगे, वे अपनी जीविका और भविष्य के वास्ते बहुत अधिक प्रयास करेंगे और बड़े-बड़े बालिदन करेंगे। किन्तु अंत में, भले ही वे अपने सपनों और इच्छाओं को अपने स्वयं के कठिन परिश्रम के माध्यम से साकार कर सकते हैं, फिर भी वे अपने भाग्य को कभी बदल नहीं सकते हैं, और भले ही वे कितने ही दृढ़ निश्चय के साथ कोशिश क्यों न करें वे कभी भी उससे आगे नहीं बढ़ सकते हैं जो नियति ने उन्हें आवंटित किया है। योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं की परवाह किए बिना, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता है। कोई किस व्यवसाय की खोज करता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, ये उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं।

2. अपने माता-पिता को छोड़ना और जीवन के रंगमंच में अपनी भूमिका निभाने की ईमानदारी से शुरुआत करना

जब कोई व्यक्ति परिपक्व हो जाता है, तो वह अपने माता-पिता को छोड़ने और अपने बलबूते पर कुछ करने में सक्षम हो जाता है, और यह इसी बिन्दु पर होता है कि वह सही मायने में अपनी भूमिका निभानी शुरू करता है, कि जीवन में उसका ध्येय धुँधला नहीं पड़ता है और धीरे-धीरे स्पष्ट होता जाता है। नाममात्र के लिए वह अभी भी अपने माता-पिता के साथ घनिष्ठता से जुड़ा रहता है, किन्तु क्योंकि उसका ध्येय और वह भूमिका जिसे वह जीवन में अदा करता है उनका उसके माता-पिता के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है, इसलिए, जैसे-जैसे कोई व्यक्ति धीरे-धीरे स्वावलंबी होता जाता है, वास्तविकता में यह घनिष्ठ बन्धन धीरे-धीरे टूटता जाता है। जैविक परिप्रेक्ष्य में, लोग अभी भी अवचेतन रूप में माता-पिता पर निर्भर होने से अपने आप को रोक नहीं सकते हैं, किन्तु वस्तुनिष्ठ रूप से कहें, तो जब एक बार वे बड़े हो जाते हैं तो उनके जीवन अपने माता पिता से बिलकुल भिन्न होते हैं, और वे उन भूमिकाओं को निभाएँगे जिन्हें उन्होंने स्वावलंबन से ग्रहण किया है। जन्म और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा, बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बस एक औपचारिक परिवेश प्रदान करना है, क्योंकि सृजनकर्ता के पूर्वनियोजन के अलावा किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कोई भी इस चीज़ को नियन्त्रित नहीं कर सकता है कि किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा; इसे बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित किया जाता है, और यहाँ तक कि किसी के माता-पिता भी उसके भाग्य को नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है, और हर किसी का अपना स्वयं का भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को नहीं टाल सकते हैं या उस भूमिका पर जरा सा भी प्रभाव नहीं डाल सकते हैं जिसे वह जीवन में निभाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना नियत किया जाता है, और वह परिवेश जिसमें वह बड़ा होता है, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए उन पूर्व शर्तों से बढ़कर और कुछ नहीं हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के जीवन के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके बीच कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका को ग्रहण करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के जीवन जीने के परिवेश में अपनी भूमिका को निभाता है ये पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, कोई भी अन्य वस्तुनिष्ठ स्थितियाँ किसी व्यक्ति के ध्येय को प्रभावित नहीं कर सकती हैं, जो सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया जाता है। सभी लोग बड़े होने के अपने स्वयं के विशेष परिवेश में परिपक्व होते हैं, तब धीरे-धीरे, उत्तरोत्तर, जीवन में अपने स्वयं के मार्गों में चल पड़ते हैं, उन नियतियों को पूरा करते हैं जिन्हें सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए नियोजित किया गया था, स्वाभाविक रूप से, अनायास ही मानवजाति के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में अपने स्वयं के पदों को ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के वास्ते, उसकी संप्रभुता के वास्ते, सृजित किए गए प्राणियों के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना शुरू करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में, "इस मुकाम पर" यह वाक्यांश नहीं है।

ख. मूल पाठ में, "न जानते हुए" यह वाक्यांश नहीं है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 125

विवाह: चौथा मोड़

जब कोई उम्र में बढ़ता है और परिपक्व होता है, तो वह अपने माता-पिता से और उस परिवेश से और भी अधिक दूर हो जाता है जिसमें वह जन्मा और पला-बढ़ा था, और इसके बजाय वह अपने जीवन के लिए एक दिशा को खोजने और उस तरीके से अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को पाने का प्रयास शुरू कर देता है जो उसके माता-पिता से भिन्न होते हैं। इस दौरान उसे अपने माता-पिता की अब और आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु उसके बजाए एक साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह अपने जीवन को बिता सकता हैः एक जीवनसाथी, एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ उसका भाग्य घनिष्ठता से गुँथा हुआ होता है। इस तरह, पहली बड़ी घटना जिसका वह स्वावलंबन के पश्चात् सामना करता है वह विवाह है, चौथा मोड़ जिससे उसे अवश्य गुज़रना चाहिए।

1. विवाह के बारे में किसी के पास कोई विकल्प नहीं है

किसी भी व्यक्ति के जीवन में विवाह एक मुख्य घटना है; यह वह समय है जब कोई सचमुच विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों को ग्रहण करना शुरू करता है, विभिन्न प्रकार के ध्येयों को धीरे-धीरे पूरा करना आरम्भ करता है। लोग विवाह के बारे में स्वयं इसका अनुभव करने से पहले बहुत से भ्रमों को आश्रय देते हैं, और ये सभी भ्रम बहुत ही खूबसूरत होते हैं। महिलाएँ कल्पना करती हैं कि उनके होने वाले पति सुन्दर राजकुमार होंगे, और पुरुष कल्पना करते हैं कि वे शुद्ध, गोरी महिला से विवाह करेंगे। इन कल्पनाओं से पता चलता है कि विवाह के लिए प्रत्येक व्यक्ति की कुछ निश्चित अपेक्षाएँ होती हैं, उनकी स्वयं की माँगें और मानक होते हैं। यद्यपि इस दुष्ट युग में लोगों के ऊपर विवाह के बारे में विकृत संदेशों की लगातार बमबारी की जाती है, जो और भी अधिक अतिरिक्त अपेक्षाओं का निर्माण करते हैं और लोगों को सब प्रकार के सामान एवं अजीब प्रवृत्तियाँ प्रदान करते हैं, कोई व्यक्ति जिसने विवाह का अनुभव किया है वह जानता है कि कोई इसे किसी भी तरह से क्यो न समझे, इसके प्रति उसकी प्रवृत्ति कुछ भी क्यों न हो, विवाह व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है।

व्यक्ति का अपने जीवन में कई लोगों से सामना होता है, किन्तु कोई नहीं जानता है कि उसका जीवनसाथी कौन बनेगा। यद्यपि विवाह के विषय पर प्रत्येक की अपनी स्वयं की सोच और अपने व्यक्तिगत रवैये होते हैं, फिर भी वह पूर्वानुमान नहीं लगा सकता हैं कि अंततः कौन उसका सच्चा जीवनसाथी बनेगा, और उसकी स्वयं की अवधारणाएँ कम महत्व रखती हैं। तुम जिस व्यक्ति को पसंद करते हो उससे मिलने के बाद, उसे पाने का प्रयास कर सकते हो; किन्तु वह तुममें रुचि रखता या रखती है या नहीं, वह तुम्हारा या तुम्हारी जीवन साथी बनने के योग्य है या नहीं, यह तय करना तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हारी अनुरक्तियों का व्यक्ति ज़रूरी नहीं कि वह व्यक्ति हो जिसके साथ तुम अपना जीवन साझा करने में समर्थ होगे; और इसी बीच कोई ऐसा जिसकी तुमने कभी अपेक्षा नहीं की थी वह चुपके से तुम्हारे जीवन में प्रवेश कर जाता है और तुम्हारा साथी बन जाता है, तुम्हारे भाग्य का सबसे महत्वपूर्ण अवयव, तुम्हारा जीवन-साथी बन जाता है, जिसके साथ तुम्हारा भाग्य अभिन्न रूप से बँध जाता है। और इसलिए, यद्यपि संसार में लाखों विवाह होते हैं, फिर भी हर एक भिन्न है: कितने विवाह असंतोषजनक होते हैं, कितने सुखद होते हैं; कितने पूर्व तथा पश्चिम, कितने उत्तर और दक्षिण तक फैल जाते हैं; कितने परिपूर्ण जोड़े होते हैं, कितने समकक्ष श्रेणी के होते हैं; कितने सुखद और सामंजस्यपूर्ण होते हैं, कितने दुःखदाई और कष्टपूर्ण होते हैं; कितने दूसरों से ईर्ष्यापूर्ण होते हैं, कितनों को ग़लत समझा जाता है और उन पर नाक-भौं चढ़ाई जाती है; कितने आनन्द से भरे होते हैं, कितने आँसूओं से भरे हैं और मायूसी पैदा करते हैं...। इन अनगिनत विवाहों में, मनुष्य विवाह के प्रति वफादारी और आजीवन समर्पण प्रकट करते हैं, या प्रेम, आसक्ति, एवं अवियोज्यता को, या परित्याग और न समझ पाने को, या विवाह के प्रति विश्वासघात को, और यहाँ तक कि घृणा को भी प्रकट करते हैं। चाहे विवाह स्वयं में खुशी लाता हो या पीड़ा, विवाह में हर एक व्यक्ति का ध्येय सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनियत होता है और यह बदलेगा नहीं; हर एक को इसे पूरा करना ही होगा। और प्रत्येक विवाह के पीछे निहित व्यक्तिगत भाग्य अपविर्तनीय होता है; इसे बहुत पहले ही सृजनकर्ता के द्वारा अग्रिम में निर्धारित किया गया था।

2. विवाह दो भागीदारों के भाग्य से जन्म लेता है

विवाह किसी व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह किसी व्यक्ति के भाग्य का परिणाम है, उसके भाग्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी है; यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा या प्राथमिकताओं पर स्थापित नहीं होता है, और किसी भी बाहरी कारक के द्वारा प्रभावित नहीं होता है, बल्कि यह पूर्णतः दो पक्षों के भाग्य के द्वारा, दम्पत्ति के भाग्य के बारे में सृजनकर्ता की व्यवस्थाओं और उसके पूर्वनिर्धारणों के द्वारा निर्धारित होता है। सतही तौर पर, विवाह का उद्देश्य मानव जाति को जारी रखना है, परन्तु असलियत में विवाह और कुछ नहीं बल्कि एक रस्म है जिसमें कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करने की प्रक्रिया से गुज़रता है। लोग जिन भूमिकाओं को विवाह में निभाते हैं वे मात्र अगली पीढ़ी का पालन पोषण करना नहीं हैं; वे ऐसी विभिन्न भूमिकाएँ हैं जिन्हें वे ग्रहण करते हैं और ऐसे ध्येय हैं जिन्हें विवाह को बनाए रखने के दौरान उन्हें पूरा करना होगा। चूँकि व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं और आसपास की चीज़ों के परिवर्तन को प्रभावित करता है, इसलिए उसका विवाह भी अनिवार्य रूप से उन्हें प्रभावित करेगा, और इसके अतिरिक्त, अनेक भिन्न-भिन्न तरीकों से उन्हें रूपान्तरित करेगा।

जब कोई स्वावलंबी हो जाता है, तो वह अपनी स्वयं की जीवन यात्रा आरम्भ करता है, जो उसे कदम दर कदम उसके विवाह से सम्बन्धित लोगों, घटनाओं, और चीज़ों की और ले जाती है; और उसके साथ-साथ, वह दूसरा व्यक्ति जो उस विवाह को पूरा करेगा वह, कदम-दर-कदम, उन्हीं लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की ओर आ रहा होता है। सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन, दो असम्बद्ध लोग जो एक सम्बद्ध भाग्य को साझा करते हैं धीरे-धीरे विवाह में प्रवेश करते हैं और, चमत्कारी ढ़ंग से, एक परिवार, "एक ही रस्सी से लटकी हुई दो टिड्डियाँ" बन जाते हैं। इसलिए जब कोई विवाह में प्रवेश करता है, तो उसकी जीवन यात्रा उसके जीवनसाथी को प्रभावित और स्पर्श करेगी, और उसी तरह उसके साथी की जीवन यात्रा भी जीवन में उसके भाग्य को प्रभावित और स्पर्श करेगी। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के भाग्य आपस में एक दूसरे से जुड़े होते हैं, और कोई भी दूसरों से पूरी तरह से स्वतन्त्र होकर जीवन में अपने ध्येय को पूरा नहीं कर सकता है या अपनी भूमिका को नहीं निभा सकता है। व्यक्ति का जन्म सम्बन्धों की एक बड़ी श्रृंखला से सम्बन्धित होता है; बड़े होने में भी सम्बन्धों की एक जटिल श्रृंखला शामिल होती है; और उसी प्रकार, मानवीय सम्बन्धों के एक विशाल और जटिल जाल में विवाह अनिवार्य रूप से अस्तित्व में आता है और कायम रहता है, जिसमें प्रत्येक वह सदस्य शामिल होता है और उस हर एक की नियति प्रभावित होती है जो इसका एक भाग है। विवाह दोनों सदस्यों के परिवारों का, उन परिस्थितियों का जिनमें वे बड़े हुए थे, उनके रंग-रूप, उनकी आयु, उनके गुणों, उनकी प्रतिभाओं, या अन्य कारकों का परिणाम नहीं है; बल्कि, यह साझा ध्येय और सम्बद्ध भाग्य से उत्पन्न होता है। यह विवाह का मूल है, और सृजनकर्ता के द्वारा आयोजित और व्यवस्थित मनुष्य के भाग्य का एक उत्पाद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 126

सन्तान: पाँचवाँ मोड़

विवाह करने के पश्चात्, व्यक्ति अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करना आरम्भ करता है। कोई नहीं कह सकता कि उसकी कितनी और किस प्रकार की संतानें होंगी; यह भी, सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित, व्यक्ति के भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। यह पाँचवाँ मोड़ है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति को गुज़रना ही होगा।

यदि किसी ने किसी और बच्चे की भूमिका को पूरा करने के लिए जन्म लिया है, तो वह किसी और के माता-पिता की भूमिका पूरा करने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं का यह स्थानान्तरण व्यक्ति को भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से जीवन के भिन्न-भिन्न चरणों का अनुभव कराता है। यह व्यक्ति को जीवन के अनुभवों के भिन्न-भिन्न समुच्चय प्रदान करता है, जिसमें वह सृजनकर्ता की उसी संप्रभुता को, और साथ ही इस तथ्य को जान लेता है कि कोई भी व्यक्ति सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण का अतिक्रमण या उसे परिवर्तित नहीं सकता है।

1. किसी की संतान का क्या होता है इस पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं होता है

जन्म, बड़ा होना और विवाह, ये सभी विभिन्न प्रकार की और विभिन्न अंशों में निराशा प्रदान करते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता-पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोग उस परिवेश से नाराज़ हैं या उन्हें उससे कई शिकायतें हैं जिसमें वे बड़े हुए हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं के बीच विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक है। इस बात की परवाह किए बिना कि कोई व्यक्ति अपने जन्म, अपने बड़े होने, या अपने विवाह से कितना असंतुष्ट है, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है जानता है कि वह चुन नहीं सकता है कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसे कैसा दिखना है, उसके माता-पिता कौन हैं, और कौन उसका जीवनसाथी है, बल्कि उसे केवल स्वर्ग की इच्छा को स्वीकार करना होगा। किन्तु जब लोगों का अगली पीढ़ी का पालन पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम भाग की अपनी समस्त अतृप्त इच्छाओं को अपने वंशजों पर डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनकी सभी निराशाओं की क्षतिपूर्ति करेगी जो उन्होंने अपने जीवन के प्रथम भाग में अनुभव की थी। अतः लोग अपने बच्चों के बारे में सभी प्रकार की कल्पनाओं में लिप्त रहते हैं: कि उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत सुन्दरियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक जोशीले सज्जन व्यक्ति बन जाएँगे; यह कि उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और स्टार एथलीट होंगे; यह कि उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और संवेदनशील होंगी, उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे आशा करते हैं कि चाहे बेटे हों या बेटियाँ, वे अपने बुज़ुर्गों का आदर करेंगे, अपने माता पिता का ध्यान रखेंगे, और हर कोई उनसे प्रेम करेगा और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मुकाम पर जीवन की आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के हृदयों में नई उमंगें उत्पन्न होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल और आशाहीन हैं, कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का अन्य अवसर, और अन्य आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए वे अगली पीढ़ी पर अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती हैं; यह कि उनकी बेटियाँ और बेटे परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, और महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध हो जाएँगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को बहुत ऊँचा देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके बच्चों की संख्या, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ, इत्यादि, यह तय करना उनके हाथ में नहीं है, यह कि उनके बच्चों के भाग्य उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने स्वयं के भाग्य से बच निकलने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे और बेटियों के भाग्य को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को बहुत अधिक मूल्यांकित नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? लोग अपनी संतान के लिए किसी भी हद तक जाते हैं, किन्तु अंत में, किसी व्यक्ति के कितने बच्चे हैं, और उसके बच्चे किस प्रकार के हैं, यह उनकी योजनाओं और इच्छाओं का उत्तर नहीं है। कुछ लोग दरिद्र होते हैं परन्तु कई बच्चे होते हैं; कुछ लोग धनी होते हैं फिर भी उनके बच्चे नहीं होते हैं। कुछ लोग एक बेटी चाहते हैं परन्तु उनकी यह इच्छा नकार दी जाती है; कुछ लोग एक बेटा चाहते हैं परन्तु एक लड़के को जन्म देने में असफल रह जाते हैं। कुछ लोगों के लिए, बच्चे एक आशीष हैं; अन्य लोगों के लिए, वे एक श्राप हैं। कुछ दम्पत्ति बुद्धिमान होते हैं, फिर भी मंदबुद्धि बच्चों को जन्म देते हैं; कुछ माता-पिता मेहनती और ईमानदार होते हैं, फिर भी जिन बच्चों का वे पालन-पोषण करते हैं वे आलसी होते हैं। कुछ माता-पिता दयालु और सच्चे होते हैं परन्तु उनके बच्चे कुटिल और शातिर बन जाते हैं। कुछ माता-पिता दिमाग और शरीर से स्वस्थ्य होते हैं किन्तु अपाहिज बच्चों को जन्म देते हैं। कुछ माता-पिता साधारण और असफल होते हैं फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो महान चीज़ों को प्राप्त करते हैं। कुछ माता-पिता की हैसियत निम्न होती है फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो प्रतिष्ठा में बढ़ जाते हैं। ...

2. आगामी पीढ़ी का पालन-पोषण करने के बाद, लोग भाग्य के बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हैं

अधिकांश लोग जो विवाह करते हैं वे लगभग तीस वर्ष की आयु में ऐसा करते है, और जीवन के इस मुकाम पर किसी को मनुष्य की नियति के बारे में कोई समझ नहीं होती है। किन्तु जब लोग बच्चों का पालन-पोषण करना आरम्भ करते हैं, तो जैसे-जैसे उनकी संतानें बड़ी होती हैं, वे नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के जीवन और सभी अनुभवों को दोहराते हुए देखते हैं, और वे अपने स्वयं के अतीत को उनमें प्रतिबिम्बित होते हुए देखते हैं और समझते हैं कि, उनके मार्ग के समान ही, उस मार्ग की योजना नहीं बनाई जा सकती है और उसे चुना नहीं जा सकता है जिस पर युवा पीढ़ी के द्वारा चला गया है। इस तथ्य का सामना करके, उनके पास यह स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं होता है कि हर एक व्यक्ति का भाग्य पूर्वनियत होता है; और पूरी तरह से इसे समझे बिना ही वे धीरे-धीरे अपनी स्वयं की इच्छाओं को एक ओर कर देते हैं, और उनके हृदय का जोश डगमगा जाता है और समाप्त हो जाता है...। इस समयावधि के दौरान, उस व्यक्ति ने अधिकांशतः जीवन में महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर लिया है और जीवन की एक नई समझ प्राप्त कर ली होती है, एक नई प्रवृत्ति अपना ली होती है। इस आयु वाला व्यक्ति भविष्य से कितनी अपेक्षा कर सकता है और उम्मीद करने के लिए उनके पास कौन सी संभावनाएँ हैं? ऐसी कौन सी पचास साल की बूढ़ी स्त्री है जो अभी भी एक सुन्दर राजकुमार का सपना देख रही है? ऐसा कौन सा पचास साल का बूढ़ा पुरुष है जो अभी भी अपनी शुद्ध गोरी स्त्री की खोज कर रहा है? ऐसी कौन सी अधेड़ स्त्री है जो अभी भी एक भद्दी बतख़ से एक हंस में बदलने की आशा कर रही है? क्या अधिकांश बूढ़े पुरुषों में जवान पुरुषों के समान जीवनवृत्ति की प्रबल प्रेरणा होती है? संक्षेप में, इस बात की परवाह किए बिना कि कोई पुरुष है या स्त्री, जो कोई भी इस आयु में जीवन बिताता है उसकी विवाह, परिवार, और बच्चों के प्रति अपेक्षाकृत कहीं अधिक तर्कसंगत, व्यावहारिक प्रवृत्ति होने की संभावना होती है। ऐसे व्यक्ति के पास अनिवार्य रूप से कोई विकल्प नहीं बचता है, भाग्य को चुनौती देने की कोई प्रबल इच्छा नहीं बचती है। जहाँ तक मनुष्य के अनुभव की बात है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस आयु में पहुँचता है तो उसमें स्वाभाविक रूप से यह प्रवृत्ति विकसित हो जाती है: "उसे भाग्य को स्वीकार करना ही होगा; उसके बच्चों का अपना स्वयं का सौभाग्य है; मनुष्य का भाग्य स्वर्ग द्वारा निर्धारित किया जाता है।" अधिकांश लोग जो सत्य को नहीं समझते हैं, इस संसार के सभी उतार-चढ़ावों, कुंठाओं, और कठिनाईयों को झेलने के बाद, मानव जीवन में अपनी अंतर्दृष्टि को तीन शब्दों में सारांशित करते हैं: "यह भाग्य है!" यद्यपि यह वाक्यांश मनुष्य के भाग्य के बारे में सांसारिक लोगों के निष्कर्ष और एहसास को सारगर्भित ढंग से बताता है, यद्यपि यह मानवजाति की असहायता को अभिव्यक्ति करता है और भेदने वाला और अचूक कहा जा सकता है, फिर भी यह सृजनकर्ता की संप्रभुता को समझने से बहुत दूर है, और सृजनकर्ता के अधिकार के ज्ञान का कोई विकल्‍प नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 127

भाग्य पर विश्वास करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान का कोई विकल्‍प नहीं है

इतने वर्षों तक परमेश्वर का अनुयायी रहने के पश्चात्, क्या भाग्य के बारे में तुम लोगों के ज्ञान और संसारिक लोगों के ज्ञान के बीच कोई सारभूत अन्तर है? क्या तुम लोग सचमुच में सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण को समझ गए हो, और सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जान गए हो? कुछ लोगों में इस वाक्यांश "यह भाग्य है" की गहन, एवं गहराई से महसूस की जाने वाली समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, यह विश्वास नहीं करते हैं कि मनुष्य के भाग्य को परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है, और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो ऐसे हैं जो महासागर में इधर-उधर बहते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ तैरते रहते हैं, निष्क्रियता से इंतज़ार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के आलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे अपनी स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं, फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन नहीं जी सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन होने के समान नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना इस तथ्य और इस बाहरी घटना की पहचान मात्र है, जो इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य को शासित करता है, और इस बात को पहचानने से भिन्न है कि सभी चीज़ों के भाग्य के ऊपर प्रभुत्व का सृजनकर्ता ही स्रोत है, और उससे बढ़कर मानवजाति के भाग्य के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से भिन्न है। यदि कोई व्यक्ति केवल भाग्य पर ही विश्वास करता है—यहाँ तक कि इसके बारे में गहराई से महसूस करता है—किन्तु फलस्वरूप मानवजाति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने, पहचानने, उसके प्रति समर्पण करने, और उसे स्वीकार करने में समर्थ नहीं है, तो उसका जीवन तब भी एक त्रासदी, व्यर्थ में बिताया गया जीवन, खालीपन होगा; वह तब भी सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन होने, उस वाक्यांश के सच्चे अर्थ के रूप में एक सृजित किया गया मानव प्राणी बनने, और सृजनकर्ता के अनुमोदन का आनन्द उठाने में असमर्थ होगा या होगी। जो व्यक्ति सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक सक्रिय अवस्था में होना चाहिए, न कि निष्क्रिय या असहाय अवस्था में। जबकि साथ ही यह स्वीकार करके कि सभी चीज़ें भाग्य के द्वारा तय हैं, उसे जीवन और भाग्य के बारे में एक सटीक परिभाषा को धारण करना चाहिए: कि प्रत्येक जीवन सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा के हर एक चरण का स्मरण करता है, तो वह देखता है कि हर एक कदम पर, चाहे उसका मार्ग कठिन रहा था या सरल रहा हो, परमेश्वर उसके पथ का मार्गदर्शन कर रहा था, और उसकी योजना बना रहा था। ये परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएँ थी, और उसकी सतर्क योजना थी, जिन्होंने आज तक, अनजाने में, व्यक्ति की अगुवाई की है। सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसके उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ होना—कितना बड़ा सौभाग्य है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति निष्क्रिय है, तो इससे साबित होता है कि वह हर एक चीज़ का विरोध कर रहा है या कर रही है जो परमेश्वर ने उसके लिए व्यवस्थित की है, और यह कि उसकी विनम्र प्रवृत्ति नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति सक्रिय है, तो जब वह अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता है, जब सचमुच में परमेश्वर की संप्रभुता उसकी समझ में आने लगती है, तो वह और भी अधिक ईमानदारी से हर उस चीज़ के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य का आयोजन करने देने, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह रोकने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास होगा। क्योंकि वह देखता है कि जब वह भाग्य को नहीं बूझता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता है, जब वह जानबूझकर अँधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता और डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन, और बहुत ही मर्मभेदी होती है। इसलिए जब लोग मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो चतुर मनुष्य, स्वयं के तरीके से भाग्य के विरुद्ध लगातार संघर्ष करने और जीवन के अपने तथाकथित लक्ष्यों की खोज करने के बजाय, इसे जानना और स्वीकार करना, उन दर्द भरे दिनों को अलविदा कहना चुनते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छे जीवन का निर्माण करने का प्रयास किया था। जब किसी व्यक्ति का कोई परमेश्वर नहीं होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं देख सकता है, तो हर एक दिन निरर्थक, बेकार, और दयनीय है। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके जीवन जीने का अर्थ और उसके लक्ष्यों की खोज उसके लिए अंतहीन मर्मभेदी दुःख और असहनीय पीड़ा के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आती है, कुछ इस तरह कि वह पीछे मुड़कर देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करेगा, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेगा, और सच्चे मानव जीवन की खोज करेगा, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी मर्मभेदी दुःख और पीड़ा से छूटकर आज़ाद होगा, और जीवन के सम्पूर्ण खालीपन से छुटकारा पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 128

केवल वे लोग ही सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं जो सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति समर्पण करते हैं

क्योंकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं पहचानते हैं, इसलिए वे हमेशा ढिठाई से, विद्रोही प्रवृत्ति के साथ भाग्य का सामना करते हैं, और हमेशा परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता तथा उन चीज़ों को त्याग देना चाहते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखी हैं, तथा अपनी वर्तमान परिस्थितियों के बदलने और अपने भाग्य के पलटने की व्यर्थ की आशा करते हैं। परन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं; वे हर मोड़ पर नाकाम रहते हैं। यह संघर्ष, जो किसी व्यक्ति की आत्मा की गहराई में होता है, पीड़ादायी है; यह पीड़ा अविस्मरणीय है; और पूरे समय वह अपने जीवन को गवाँता रहता है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है, या इसलिए है क्योंकि उस व्यक्ति ने भाग्यहीन जन्म लिया था? स्पष्ट रूप से दोनों में कोई भी सही नहीं है। वास्तव में, यह उन मार्गों के कारण है जिन्हें लोग अपनाते हैं, ऐसे मार्ग जिन्हें लोग अपनी ज़िन्दगियों को जीने के लिए चुनते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीज़ों का एहसास नहीं किया हो। किन्तु जब तुम सचमुच में जान जाते हो, जब तुम्हें सचमुच में एहसास हो जाता है कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सचमुच समझ जाते हो कि वह हर चीज़ जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए योजना बनाई और जो तुम्हारे लिए निश्चित की है वह बहुत लाभकारी है, और वह एक बहुत बड़ी सुरक्षा है, तो तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी पीड़ा धीरे-धीरे कम हो जाती है, और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व शांत, स्वतंत्र, एवं बन्धन मुक्त हो जाता है। अधिकांश लोगों की स्थितियों का आकलन करने पर, यद्यपि व्यक्तिपरक स्तर पर वे उसी तरह से जीवन जीते रहना नहीं चाहते हैं जैसा वे पहले जीते थे, यद्यपि वे अपनी पीड़ा से राहत चाहते हैं, फिर भी वस्तुनिष्ठ रूप से वे मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को नहीं समझ सकते हैं; वे सृजनकर्ता की संप्रभुता को वास्तव में समझ नहीं सकते है और उसके अधीन नहीं हो सकते हैं। और वे यह तो बिलकुल भी नहीं जान सकते हैं कि सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। इसलिए यदि लोग सचमुच में इस तथ्य को पहचान नहीं सकते हैं कि सृजनकर्ता की मनुष्य के भाग्य और मनुष्य की सभी स्थितियों के ऊपर संप्रभुता है, यदि वे सचमुच में सृजनकर्ता के प्रभुत्व के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, तो उनके लिए इस अवधारणा द्वारा विवश न किया जाना, और न रोका जाना कठिन होगा कि "किसी का भाग्य उसके अपने हाथों में होता है," उनके लिए भाग्य और सृजनकर्ता के अधिकार के विरुद्ध अपने प्रचण्ड संघर्ष की पीड़ा से छुटकारा पाना कठिन होगा, और कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके लिए सच में बन्धनमुक्त और स्वतन्त्र होना, और ऐसे लोग बनना भी कठिन होगा जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। अपने आपको इस स्थिति से स्वतन्त्र करने का एक सबसे आसान तरीका हैः जीवन जीने के अपने पुराने तरीके को विदा करना, जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना, अपनी पुरानी जीवनशैली, जीवन-दर्शन, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आदर्शों को सारांशित करना और उनका विश्लेषण करना, और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा और माँग के साथ उनकी तुलना करना, और देखना कि उनमें से कोई परमेश्वर की इच्छा और माँग के अनुकूल है या नहीं, उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है या नहीं, सत्य की महान समझ की ओर उसकी अगुवाई करता है या नहीं, और उसे मानवता और मनुष्य की सदृशता के साथ जीवन जीने देता है या नहीं। जब तुम जीवन के उन विभिन्न लक्ष्यों की, जिनकी लोग खोज करते हैं और जीवन जीने के उनके अनेक अलग-अलग तरीकों की बार-बार जाँच-पड़ताल करोगे और सावधानीपूर्वक उनका विश्लेषण करोगे, तो तुम यह पाओगे कि इनमें से एक भी सृजनकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जब उसने मानवजाति का सृजन किया था। वे सभी, लोगों को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करते हैं; ये सभी ऐसे जाल हैं जो लोगों को पतित बनने पर मजबूर करते हैं, और जो उन्हें नरक की ओर लेकर जाते हैं। तुम्हारे इसे पहचान जाने के पश्चात्, तुम्हारा कार्य है कि जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ दो, अनेक फंदों से दूर रहो, परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का प्रभार लेने दो और तुम्हारे लिए व्यवस्था करने दो, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का प्रयास करो, कोई विकल्प मत रखो, और एक ऐसे इंसान बनो जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसकी पीड़ा को सहन कर सकते हैं, परन्तु दूसरे सहन नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अनुपालन करने के इच्छुक होते हैं, परन्तु कुछ लोग अनिच्छुक होते हैं। जो लोग अनिच्छुक हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा और दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में स्पष्ट रूप से अवगत हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर है जो मनुष्य के भाग्य की योजना बनाता है और उसकी व्यवस्था करता है, और तब भी वे पैर मारते हैं और संघर्ष करते हैं, तब भी अपने भाग्य को परमेश्वर की हथेली में रखने और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होने के लिए सहमत नहीं हैं, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं से नाराज़ होते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो स्वयं देखना चाहते हैं कि वे क्या करने में सक्षम हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं, या अपनी स्वयं की सामर्थ्य के अधीन खुशियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, यह देखना चाहते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं या नहीं। मनुष्य की उदासी यह नहीं है कि मनुष्य सुखी जीवन की खोज करता है, यह नहीं है कि वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज करता है या धुंध के बीच अपने स्वयं के भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करता है, परन्तु यह है कि सृजनकर्ता के अस्तित्व को देखने के पश्चात्, इस तथ्य को जानने के पश्चात् कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता है, वह अभी भी अपने मार्ग को सुधार नहीं सकता है, अपने पैरों को दलदल से बाहर नहीं निकाल सकता है, बल्कि अपने हृदय को कठोर बना देता है और अपनी ग़लतियों को निरन्तर करता रहता है। बल्कि वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारता रहता है, और बिना किसी लेशमात्र पछतावे के, सृजनकर्ता की संप्रभुता के विरोध में ढिठाई से निरन्तर स्पर्धा करता रहता है, और कड़वे अंत तक इसका विरोध करता रहता है, और जब वह टूट कर बिखर जाता है और उसका रक्त बहने लगता है केवल तभी वह आखिरकार छोड़ने और पीछे हटने का निर्णय लेता है। यह असली मानवीय दुःख है। इसलिए मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, और जो बच निकलने का चुनाव करते हैं वे महामूर्ख हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 129

मृत्यु: छठा मोड़

इतनी अफरा-तफरी, इतनी कुंठाओं और निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुखों और दुःखों और उतार-चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार-बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, कोई व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर जाता है, और पलक झपकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के निशान उसके सारे शरीर पर छपे होते है: वह अब और सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, घने काले बालों वाला सिर अब सफेद, और चमकदार हो गया है, चमकीली आँखें धुँधली हो गई हैं और अँधेरा छा गया है, चिकनी तथा कोमल त्वचा झुर्रीदार तथा दागदार हो गई है। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दाँत ढीले हो कर गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएँ धीमी हो गई हैं, उसकी गतिविधियाँ सुस्त हो गई हैं...। इस मुकाम पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है और अपने जीवन की सन्ध्या में प्रवेश कर लिया है: बुढ़ापा। इसके आगे, वह मृत्यु का सामना करेगा, किसी मनुष्य के जीवन का अंतिम मोड़।

1. मनुष्य के जीवन और मृत्यु के ऊपर केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य धारण करता है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पूर्ववर्ती जीवन पर नियत था, तो उसकी मृत्यु उसकी नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके ध्येय का आरम्भ है, तो उसकी मृत्यु उसके उस ध्येय के अन्त को चिह्नित करती है। चूँकि सृजनकर्ता ने किसी व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय निर्धारित किया है, इसलिए स्पष्ट है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति अकस्मात पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अप्रत्याशित नहीं होती है, और जन्म और मृत्यु दोनों ही उसके पिछले और वर्तमान जीवन से आवश्यक रूप से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति की जन्म और मृत्यु की परिस्थितियाँ सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित की जाती हैं; यह किसी व्यक्ति की नियति है, और किसी व्यक्ति का भाग्य है। जैसे किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, वैसे ही हर एक व्यक्ति की मृत्यु भी विशेष परिस्थितियों के एक भिन्न समुच्चय में होगी, इसलिए लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और उनकी मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग मज़बूत और स्वस्थ्य होते हैं और फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमज़ोर और बीमार होते हैं फिर भी अपने बुढ़ापे तक जीवित रहते हैं, और शान्तिपूर्वक मर जाते हैं। कुछ अप्राकृतिक कारणों से नष्ट हो जाते हैं, और अन्य प्राकृतिक कारणों से। कुछ घर से दूर अपने जीवन को समाप्त करते हैं, अन्य अपने प्रियजनों के साथ उनके सानिध्य में अंतिम समय के लिए अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं। कुछ अधर में मरते हैं, अन्य धरती के नीचे। कुछ पानी के नीचे डूब जाते हैं, अन्य आपदाओं में खो जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ... हर कोई एक शानदार जन्म, एक शानदार ज़िन्दगी, और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी स्वयं की नियति का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, कोई भी सृजनकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। मनुष्य अपने भविष्य के लिए सभी प्रकार की योजनाएँ बना सकता है, परन्तु कोई भी अपने जन्म के तरीके और समय की और संसार से अपने प्रस्थान की योजना नहीं बना सकता है। यद्यपि लोग मृत्यु को टालने और उसका प्रतिरोध करने की भरसक कोशिश करते है, फिर भी, उनके जाने बिना, मृत्यु ख़ामोशी से पास चली आती है। कोई नहीं जानता है कि वह कब मरेगा या वह कैसे मरेगा, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानता है कि वह कहाँ मरेगा। स्पष्ट रूप से, न तो मानवजाति, न ही इस प्राकृतिक संसार में कोई प्राणी, जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य रखता है, परन्तु केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य रखता है, जिसका अधिकार अद्वितीय है। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु प्राकृतिक संसार के कुछ नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृजनकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का एक परिणाम है।

2. जो सृजनकर्ता की संप्रभुता को नहीं जानता है उसका मृत्यु के भय के द्वारा पीछा किया जाएगा

जब कोई व्यक्ति वृद्धावस्था में प्रवेश करता है, तो जिस चुनौती का वह सामना करता है वह परिवार के लिए आपूर्ति करना नहीं है या जीवन में अपनी भव्य महत्वाकांक्षाओं को निर्धारित करना नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि किस प्रकार अपने जीवन को अलविदा कहे, किस प्रकार अपने जीवन के अंत तक पहुँचे, और किस प्रकार अपने अस्तित्व के अंत में पूर्णविराम लगाए। हालाँकि सतही तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि लोग मृत्यु पर थोड़ा सा ही ध्यान देते हैं, फिर भी कोई इस विषय पर खोजबीन करने से बच नहीं सकता है, क्योंकि कोई भी नहीं जानता है कि मृत्यु के पार कोई और संसार है या नहीं, एक ऐसा संसार जिसे मनुष्य आभास या एहसास नहीं कर सकता है, एक ऐसा संसार जिसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है। इससे सामने खड़ी मृत्यु का सामना करने से लोग डरते हैं, वे इसका उस तरह से सामना करने से डरते हैं जैसा उनको करना चाहिए, और इसके बजाए वे इस विषय को टालने की भरसक कोशिश करते हैं। और इसलिए यह प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु के भय से भर देता है, और जीवन के इस अपरिहार्य तथ्य पर रहस्य का परदा डाल देता है, और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर लगातार बने रहने वाली छाया डाल देता है।

जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके शरीर का क्षय हो रहा है, जब उसे आभास होता है कि वह मृत्यु के और करीब आ रहा है, तो उसे एक अस्पष्ट ख़ौफ़, एक अवर्णनीय भय महसूस होता है। मृत्यु के भय से वह और भी अधिक अकेला और असहाय महसूस करने लगता है, और इस मुकाम पर वह स्वयं से पूछता हैः मनुष्य कहाँ से आया था? मनुष्य कहाँ जा रहा है? क्या मनुष्य की यही नियति है कि पूरा जीवन तेज़ी से गुज़र जाए और वह काल का गाल बन जाए? क्या यही वह समय है जो मनुष्य के जीवन के अंत को चिह्नित करता है? अंत में, जीवन का क्या अर्थ है? आख़िरकार, जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह प्रसिद्धि और सौभाग्य का होना है? क्या यह परिवार को बढ़ाना है? ... इस बात की परवाह किए बिना कि किसी ने इन विशेष प्रश्नों के बारे में सोचा है या नहीं, इस बात की परवाह किए बिना कि कोई कितनी गहराई से मृत्यु से डरता है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराई में हमेशा से इन रहस्यों की जाँच-पड़ताल करने की इच्छा, जीवन के विषय में नासमझी की भावना होती है, और इनके साथ संसार के बारे में भावुकता, छोड़कर जाने की अनिच्छा, मिली हुई होती है। कदाचित् कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता है कि वह क्या है जिससे मनुष्य भयभीत होता है, वह क्या है जिसकी मनुष्य जाँच-पड़ताल करना चाहता है, वह क्या है जिसके बारे में वह भावुक होता है और वह किसे पीछे छोड़ने का अनिच्छुक होता है ...

क्योंकि लोग मृत्यु से डरते हैं, इसलिए वे बहुत ज्यादा चिंता करते है; क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे जाने नहीं दे सकते हैं। जब वे मरने ही वाले होते हैं, तो कुछ लोग इसके या उसके बारे में झल्लाते हैं; वे अपने बच्चों, अपने प्रियजनों, और धन-सम्पत्ति की चिंता करते हैं, मानो चिंता करके वे उस पीड़ा और भय को मिटा सकते हैं जो मृत्यु लेकर आती है, मानो कि जीवितों के साथ एक प्रकार की घनिष्ठता बनाए रख कर वे अपनी उस लाचारी और एकाकीपन से बच सकते हैं जो मृत्यु के साथ आती है। मनुष्य के हृदय की गहराई में एक शुरूआती भय होता है, अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का भय, फिर कभी नीले आसमान पर निगाह न डाल पाने का भय, और फिर कभी इस भौतिक संसार को न देख पाने का भय। अपने प्रियजनों के साथ की आदी, एक एकाकी आत्मा, अपनी पकड़ को ढीला करने और नितान्त अकेले, एक अनजाने और अपरिचित संसार में प्रस्थान करने की अनिच्छुक होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 130

प्रसिद्धि और सौभाग्य की तलाश में बिताया गया जीवन मृत्यु का सामना होने पर व्यक्ति को घबराहट में डाल देगा

सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके द्वारा पूर्वनिर्धारण के कारण, एक एकाकी आत्मा जिसने अपने नाम पर शून्य से आरम्भ किया था वह माता-पिता और परिवार प्राप्त करती है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का अवसर प्राप्त करती है, मानव जीवन का अनुभव करने और दुनिया को देखने का अवसर प्राप्त करती है; और यह सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने, सृजनकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जानने, और सबसे बढ़कर, सृजनकर्ता के अधिकार को जानने और उसके अधीन होने का अवसर भी प्राप्त करती है। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ और क्षणभंगुर अवसर को नहीं पकड़ते हैं। कोई व्यक्ति भाग्य के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को खत्म कर देता है, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए और धन-सम्पत्ति और हैसियत के बीच इधर-उधर भागते हुए अपना सारा समय बिता देता है। जिन चीज़ों को लोग सँजो कर रखते हैं वे परिवार, पैसा और प्रसिद्धि हैं; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपने भाग्य के बारे में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि यह जाँचना और समझना बहुत अनिवार्य है: मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है। अपने सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वे तब तक सिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए दौड़-भाग करते हैं जब तक कि उनकी युवावस्था भाग नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते हैं और उनकी त्वचा में झुर्रियाँ नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे यह देख नहीं लेते हैं कि प्रसिद्धि व सौभाय किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते हैं, यह कि धन हृदय के खालीपन को नहीं भर सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी और मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि कोई भी उससे बच कर नहीं भाग सकता है जो कुछ नियति ने भण्डार में रखा हैं। जब वे जीवन के अंतिम मोड़ का सामना करने के लिए बाध्य होते हैं केवल तभी उनकी सचमुच समझ में आता है कि चाहे कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाए, भले ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त हो जाए और वह ऊँचे पद पर हो, कोई भी मृत्यु से बच कर नहीं भाग सकता है, हर एक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा: एक एकाकी आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है। जब किसी व्यक्ति के पास माता-पिता होते हैं, तो वह विश्वास करता है कि उसके माता-पिता ही सब कुछ हैं; जब किसी व्यक्ति के पास सम्पत्ति होती है, तो वह सोचता है कि पैसा ही उसका मुख्य आधार है, कि यही वह साधन है जिसके द्वारा वह जीवन जीता है; जब लोगों के पास हैसियत होती है, तो वे उससे कस कर चिपक जाते हैं और इसके वास्ते अपने जीवन को जोखिम में डाल देते हैं। जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने ही वाले होते हैं केवल तभी वे यह एहसास करते हैं कि जिन चीज़ों की खोज करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे क्षणभंगुर बादल के अलावा कुछ नहीं हैं, उनमें से किसी को भी वे थामे नहीं रह सकते हैं, उनमें से किसी को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी उन्हें मृत्यु से छूट नहीं दे सकता है, उनमें से कोई भी उस एकाकी आत्मा की वापसी यात्रा में उसका साथ या उसे सांत्वना नहीं दे सकता है; और उनमें से कोई भी किसी व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकता है, मृत्यु से पार जाने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दे सकता है। प्रसिद्धि और सौभाग्य जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में अर्जित करता है, उसे अस्थायी संतुष्टि, थोड़े समय का आनन्द, चैन का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं, और उसे उसके मार्ग से भटका देते हैं। और इसलिए लोग, जब, शान्ति, आराम, और हृदय की निश्चलता की लालसा करते हुए, मानवजाति के इस विशाल समुद्र में हाथ पैर मारते हैं, तो वे बार-बार लहरों के नीचे समा जाते हैं। लोगों ने अब तक सबसे महत्‍वपूर्ण प्रश्नों जैसे—वे कहाँ से आते हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि—का पता भी नहीं लगाया होता है कि वे प्रसिद्धि और सौभाग्य के द्वारा फुसला लिए जाते हैं, गुमराह हो जाते हैं, उनके द्वारा नियन्त्रित हो जाते हैं, हमेशा के लिए खो जाते हैं। समय उड़ जाता हैः पलक झपकते ही वर्षों बीत जाते हैं, इससे पहले कि कोई इसका एहसास करे, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब कोई व्यक्ति जल्दी ही संसार से जाने वाला होता है, तो वह धीरे-धीरे इस एहसास की ओर पहुँचता है कि संसार की हर चीज़ दूर हो रही है, यह कि वह उन चीज़ों को थामे नहीं रह सकता है जो उसके अधिकार में थी; केवल तभी वह महसूस करता है कि अब वाकई उससे पास कुछ भी नहीं है, ठीक अभी-अभी इस संसार में आये एक क्रन्दन करते हुए शिशु के समान महसूस करता है। इस मुकाम पर, व्यक्ति इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है कि उसने जीवन में क्या किया है, जीवित रहने का मूल्य क्या है, इसका अर्थ क्या है, वह इस संसार में क्यों आया; इस मुकाम पर, वह और भी अधिक जानना चाहता है कि वास्तव में दूसरा जीवन है या नहीं, स्वर्ग का वास्तव में अस्तित्व है या नहीं, वास्तव में गुनाहों की सज़ा है या नहीं...। व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस बारे में है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, उतना ही अधिक उसका हृदय खाली महसूस होता है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक असहाय महसूस करता है; और इस प्रकार मृत्यु के बारे में उसका भय दिन प्रति दिन बढ़ता जाता है। जब मनुष्य मृत्यु के नज़दीक पहुँचते हैं तो उनका इस तरह से व्यवहार करने के दो कारण हैं: पहला, वे अपनी प्रसिद्धि और सम्पत्ति को खोने ही वाले होते हैं जिन पर उनका जीवन आधारित था, वे इस संसार में दृश्यमान हर चीज़ को पीछे छोड़ने ही वाले होते हैं; और दूसरा, वे नितान्त अकेले एक अनजाने संसार, एक रहस्मयी, अज्ञात राज्य का सामना करने ही वाले होते हैं जहाँ वे कदम रखने से भयभीत होते हैं, जहाँ उनके पास कोई प्रियजन नहीं है और किसी प्रकार का सहारा नहीं है। इन दो कारणों से, मृत्यु का सामना करने वाला हर एक व्यक्ति बेचैनी महसूस करता है, अत्यंत भय और लाचारी के एहसास का अनुभव करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं जाना था। जब लोग वास्तव में इस मुकाम पर पहुँचते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि, जब कोई इस पृथ्वी पर कदम रखता है, तो पहली बात जो उन्हें अवश्य समझनी चाहिए, वह है कि मानव कहाँ से आता है, लोग जीवित क्यों हैं, कौन मनुष्य के भाग्य का निर्धारण करता है, कौन मानव के अस्तित्व को भरण-पोषण करता है और किसके पास उसके अस्तित्व के ऊपर संप्रभुता है। यह ज्ञान ही वह सच्चा साधन है जिसके द्वारा कोई जीवन जीता रहता है, मानव के जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक आधार हैं, न कि यह सीखना कि किस प्रकार अपने परिवार का भरण-पोषण करें या किस प्रकार प्रसिद्धि और धन-सम्पत्ति प्राप्त करें, किस प्रकार भीड़ से अलग दिखें या किस प्रकार और अधिक समृद्ध जीवन बिताएँ, और यह तो बिलकुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे बढ़ें और उनके विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करें। यद्यपि जीवित बचे रहने के जिन विभिन्न कौशलों पर महारत हासिल करने के लिए लोग अपना जीवन खर्च करते हैं वे भरपूर भौतिक आराम दे सकते हैं, फिर भी वे किसी मनुष्य के हृदय में सच्ची शान्ति और सांत्वना नहीं ला सकते हैं, बल्कि इसके बदले वे लोगों को निरन्तर उनकी दिशा से भटका देते हैं, उन्हें अपने आप पर नियन्त्रण रखने में कठिनाई होती है, वे जीवन का अर्थ सीखने के हर अवसर को खो देते हैं; उत्तरजीविता के ये कौशल इस बारे में उत्कंठा का एक अंतर्प्रवाह पैदा करते हैं कि किस प्रकार ठीक ढंग से मृत्यु का सामना करें। इस तरह से, लोगों की ज़िन्दगियाँ बर्बाद हो जाती हैं। सृजनकर्ता सभी के साथ निष्पक्ष ढंग से व्यवहार करता है, सभी को उसकी संप्रभुता का अनुभव करने और उसे जानने का जीवन भर का अवसर प्रदान करता है, फिर भी, जब मृत्यु नज़दीक आती है, जब मौत का साया उसके ऊपर छा जाता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना आरम्भ करता है—और तब बहुत देर हो जाती है।

लोग धन-दौलत और प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियाँ बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते रहते हैं कि केवल ये ही उनका सहारा हैं, मानों कि उन्हें प्राप्त करके वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, मृत्यु के सामने वे कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से चकनाचूर हो जाते हैं, वे कितने एकाकी और असहाय हैं, और कहीं नहीं भाग सकते हैं। उनकी समझ में आता है कि जीवन को धन-दौलत और प्रसिद्धि से नहीं खरीदा जा सकता है, कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो, उसका पद कितना ही ऊँचा क्यों न हो, मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल और महत्वहीन होते हैं। उनकी समझ में आता है कि धन-दौलत से जीवन को नहीं खरीदा जा सकता है, प्रसिद्धि मृत्यु को नहीं मिटा सकती है, यह कि न तो धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है। लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे जीवित रहने की लालसा करते हैं; लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के पास आने से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर उनकी वास्तव में समझ में आता है कि उनका जीवन उनसे सम्बन्धित नहीं है, उनके नियन्त्रण में नहीं है, और यह कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा इस पर किसी का वश नहीं है, कि यह सब उसके नियन्त्रण से बाहर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 131

सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

जिस क्षण किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब अकेली आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन का अपना अनुभव और सृजनकर्ता के अधिकार का अपना अनुभव आरम्भ करती है जिसे सृजनकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि, यह उस व्यक्ति, उस आत्मा के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान अर्जित करने का, और उसके अधिकार को जानने का और इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का सर्वोत्तम अवसर है। लोग सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए लागू किए गए भाग्य के नियमों के अधीन अपना जीवन जीते हैं जिसे, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर उनके कई दशकों के जीवन के दौरान उसके अधिकार को जानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए, कई दशकों के दौरान अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, यह पहचानना कि सभी मनुष्यों के भाग्य पूर्वनियत होते हैं, और यह समझना या इस बात का सार निकालना कि जीवित रहने का अर्थ क्या है, बहुत आसान होना चाहिए। साथ ही जब कोई व्यक्ति जीवन के इन सीखों को ग्रहण करता है, तो धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगता है कि जीवन कहाँ से आता है, यह समझने लगता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, मनुष्य के जीवन का ध्येय और लक्ष्य क्या होना चाहिए; और धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगेगा कि यदि वह सृजनकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करेगा—जब कोई आत्मा एक बार फिर से सृजनकर्ता का सामना करने ही वाली होगी—तब उसका हृदय असीमित भय और बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों तक अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आता है, अभी तक उसकी समझ में नहीं आया है कि किसकी हथेली में मनुष्य का भाग्य रहता है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने में समर्थ नहीं होगा या होगी। जिस व्यक्ति ने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ और मूल्य की सही समझ है; ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृजनकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव और सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, ऐसा व्यक्ति है जो सृजनकर्ता के अधिकार के प्रति समर्पण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति के सृजन के अर्थ को समझता है, समझता है कि मनुष्य को सृजनकर्ता की आराधना करनी चाहिए, कि जो कुछ भी मनुष्य के पास है वह सृजनकर्ता से आता है और वह निकट भविष्य में ही किसी दिन उसके पास लौट जाएगा; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृजनकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और मनुष्य की मृत्यु पर उसकी संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृजनकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं। इसलिए, जब किसी व्यक्ति की समझ में सचमुच ये बाते आ जाती हैं, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक एक ओर करने, और बाद में जो कुछ भी होता है उसको खुशी से स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पित होने, और सृजनकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम मोड़ का स्वागत करने में समर्थ हो जाएगा, बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे ख़ौफ़ खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजित किए गए प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के और अपने ध्येय को पूरा करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के बारे में सही दृष्टिकोण होगा, और वह सृजनकर्ता के आशीष वाला और मार्गदर्शित जीवन बिताएगा, वह सृजनकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कर्मों और उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि, ऐसे व्यक्ति को सृजनकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा और स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत प्रवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम मोड़ का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम मोड़ को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सहज अंत तक पहुँचाने के बाद, जीवन में अपने ध्येय को पूरा करने के बाद, वह सृजनकर्ता के पास लौट गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 132

अय्यूब के जीवन की खोजों और प्राप्तियों ने उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने दिया

धर्मग्रंथ में अय्यूब के बारे में लिखा गया है कि: "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, तो उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने कोई पीड़ा महसूस नहीं की, बल्कि प्राकृतिक रुप से इस संसार से चला गया। जैसा कि हर कोई जानता है, अय्यूब ऐसा मनुष्य था जो जब वह जीवित था तो परमेश्वर से डरता था और बुराई से दूर रहता था; परमेश्वर ने उसके धार्मिकता के कार्यों की सराहना की थी, लोगों ने उन्हें स्मरण रखा, और उसका जीवन किसी भी अन्य इंसान से बढ़कर मूल्यवान और महत्वपूर्ण था। अय्यूब ने परमेश्वर के आशीषों का आनन्द लिया और परमेश्वर के द्वारा उसे पृथ्वी पर धार्मिक कहा गया था, और परमेश्वर के द्वारा भी उसकी परीक्षा ली गई और शैतान के द्वारा भी उसकी परीक्षा ली गई; वह परमेश्वर का गवाह बना और वह धार्मिक पुरुष कहलाने के योग्य था। परमेश्वर के द्वारा परीक्षा लिए जाने के बाद कई दशकों के दौरान, उसने ऐसा जीवन बिताया जो पहले से कहीं अधिक बहुमूल्य, अर्थपूर्ण, स्थिर, और शान्तिपूर्ण था। उसके धार्मिक कर्मों की वजह से, परमेश्वर ने उसकी परीक्षा ली; उसके धार्मिकता के कर्मों की वजह से, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और सीधे उससे बात की। इसलिए, उसकी परीक्षा लिए जाने के बाद के वर्षों के दौरान अय्यूब ने जीवन के मूल्यों को और अधिक ठोस तरीके से समझा और उसकी सराहना की, सृजनकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहरी समझ प्राप्त की, और इस बारे में और अधिक सटीक और निश्चित ज्ञान प्राप्त किया कि किस प्रकार सृजनकर्ता अपने आशीष देता तथा वापस लेता है। अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान की थीं, सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए और मृत्यु का शान्ति से सामना करने के लिए उसने अय्यूब को और भी बेहतर स्थिति में रखा था। इसलिए अय्यूब, जब वृद्ध हुआ और उसका मृत्यु से सामना हुआ, तो वह निश्चित रूप से अपनी सम्पत्ति के विषय में चिंतित नहीं हुआ होगा। उसे कोई चिन्ता नहीं थी, कुछ पछतावा नहीं था, और वह वास्तव में मृत्यु से भयभीत नहीं था; क्योंकि उसने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर का भय मानते हुए, बुराई से दूर रहते हुए बिताया था, और उसके पास अपने स्वयं के अन्त के बारे में चिन्ता करने का कोई कारण नहीं था। आज कितने लोग हैं जो उन सभी तरह से कार्य कर सकते हैं जैसे अय्यूब ने किया था जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया था? क्यों कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के सरल बाह्य आचरण को बनाए रखने में सक्षम नहीं है? केवल एक ही कारण हैः अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति विश्वास, पहचान, एवं समर्पण की व्यक्तिपरक खोज में बिताया था, और यह इस विश्वास, पहचान और समर्पण के साथ था कि उसने अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ को पार किया था, अपने जीवन के अंतिम वर्षों को जीया था, और अपने जीवन के अंतिम मोड़ का अभिनन्दन किया था। इस बात की परवाह किए बिना कि अय्यूब ने क्या अनुभव किया, जीवन में उसकी खोज और लक्ष्य सुखद थे, कष्टपूर्ण नहीं। वह केवल उन आशीषों या प्रशंसाओं की वजह से खुश नहीं था जो सृजनकर्ता के द्वारा उसे प्रदान की गईं थीं, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण रूप से, अपनी खोजों और जीवन के लक्ष्यों की वजह से, सृजनकर्ता की संप्रभुता के क्रमिक ज्ञान और सही समझ की वजह से जिसे उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के माध्यम से अर्जित किया था, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के अद्भुत कर्मों की वजह से जिन्हें अय्यूब ने सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन एक व्यक्ति के रूप में अपने समय के दौरान व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच सह-अस्तित्व, जान-पहचान, तथा पारस्परिक समझ के उत्साही और अविस्मरणीय अनुभवों और स्मृतियों की वजह से; उस दिलासा और प्रसन्नता की वजह से जो सृजनकर्ता की इच्छा को जानने से आई थी; उस आदर की वजह से जो यह देखने से बाद उभरा था कि परमेश्वर कितना महान, अद्भुत, प्यारा एवं विश्वासयोग्य है, इन कारणों की वजह से वह खुश था। अय्यूब जिस कारण से बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना करने में समर्थ था वह यह था कि वह जानता था कि, मरने पर, वह सृजनकर्ता के पास लौट जाएगा। और जीवन में यही उसकी खोज और प्राप्तियाँ थीं जिसने उसे शान्ति से मृत्यु का सामना करने, सृजनकर्ता के द्वारा उसके जीवन को वापस लेने की सम्भावना का समहृदय से सामना करने, और इसके अतिरिक्त, शुद्ध और चिंतामुक्त होकर, सृजनकर्ता के सामने खड़े होने दिया था। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को प्राप्त कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम लोग स्वयं ऐसा करने के स्थिति में हो? चूँकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में हैं, तो वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय, कुछ पसीने से भीग जाते हैं; कुछ काँपते हैं, मूर्छित हो जाते हैं, स्वर्ग और मनुष्य के विरुद्ध समान रूप से घोर निन्दा करते हैं, यहाँ तक कि रोते और विलाप करते हैं। ये किसी भी तरह से अचानक होने वाली प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं जो तब घटित होती हैं जब मृत्यु नज़दीक आती है। लोग मुख्यत: ऐसे शर्मनाक तरीकों से इसलिए व्यवहार करते हैं क्योंकि, अपने हृदय की गहराई में, वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में स्पष्ट ज्ञान और समझ नहीं है, और सही मायने में वे उनके प्रति समर्पण तो बिलकुल नहीं करते हैं; क्योंकि लोग स्वयं ही हर चीज़ की व्यवस्था और उसे शासित करने, अपने स्वयं के भाग्य, अपने जीवन और मृत्यु को नियन्त्रित करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि लोग कभी मृत्यु के भय से बचने में समर्थ नहीं होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 133

केवल सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके ही कोई व्यक्ति उसकी ओर लौट सकता है

जब किसी को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान और अनुभव नहीं होगा, तो भाग्य और मृत्यु के बारे में उसका ज्ञान आवश्यक रूप से असंगत होगा। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि यह सब परमेश्वर की हथेली में होता है, यह एहसास नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर उनके ऊपर नियन्त्रण और संप्रभुता रखता है, यह नहीं पहचान सकते हैं कि मनुष्य ऐसी संप्रभुता को दूर नहीं फेंक सकता है या उससे बच नहीं सकता है; और इसलिए मृत्यु का सामना करते समय उनके अंतिम शब्दों, चिंताओं एवं पछतावों का कोई अन्त नहीं होता है। वे अत्यधिक बोझ, अत्यधिक अनिच्छा, अत्यधिक भ्रम, से दबे हुए होते हैं, और इन सब के कारण उन्हें मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उनका जन्म ज़रूरी है और उसकी मृत्यु अनिवार्य है, और कोई भी इस प्रवाह से परे नहीं हो सकता है। यदि कोई इस संसार से पीड़ा रहित प्रस्थान करना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम मोड़ का बिना किसी अनिच्छा या चिंता के सामना करने में समर्थ होना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि कोई पछतावा न छोड़ें। और बिना किसी पछतावे के प्रस्थान करने का एकमात्र मार्ग है सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना है, और उनके प्रति समर्पण करना। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों से, दुष्टताओं से, और शैतान के बन्धन से दूर रह सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा निर्देशित और आशीष-प्राप्त जीवन जी सकता है, ऐसा जीवन जो स्वतंत्र और मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य और अर्थ हो, ऐसा जीवन जो सत्यनिष्ठ और खुले हृदय का हो; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति समर्पण कर सकता है; अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा परीक्षा लिए जाने और वंचित किए जाने के लिए, सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अपने जीवन भर सृजनकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी प्रशंसा अर्जित कर सकता है, जैसा कि अय्यूब ने किया था, और उसकी आवाज़ को सुन सकता है, और उसे प्रकट होते हुए देख सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, बिना किसी पीड़ा, चिंता और पछतावे के जी और मर सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, प्रकाश में जीवन बिता सकता है, प्रकाश में अपने जीवन के हर मोड़ से होकर गुज़र सकता है, अपनी यात्रा को प्रकाश में सरलता से पूरा कर सकता है, और अपने ध्येय को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकता है—एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव कर, सीख कर, और जान कर—और प्रकाश में गमन कर सकता है, और उसके पश्चात् एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में हमेशा सृजनकर्ता की तरफ़ खड़ा हो सकता है, और उसकी सराहना पा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 134

सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के अवसर को मत चूको

कुछ मुट्ठी भर दशक जो किसी मानव जीवन को बनाते हैं वे न तो लम्बे होते हैं और न ही छोटे। जन्म और वयस्क होने के बीच के लगभग बीस वर्ष पलक झपकते ही गुज़र जाते हैं, और यद्यपि जीवन के इस मुकाम पर किसी व्यक्ति को वयस्क माना जाता है, फिर भी इस आयु वर्ग के लोग मानव जीवन और मानव के भाग्य के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते हैं। जैसे-जैसे वे और अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, वे धीरे-धीरे अधेड़ अवस्था की ओर बढ़ते जाते हैं। लोग अपने तीस और चालीस के दशक की आयु में जीवन और भाग्य के बारे में आरम्भिक अनुभव अर्जित करते हैं, किन्तु इन चीजों के बारे में उनके विचार अभी भी बिलकुल अस्पष्ट होते हैं। यह चालीस वर्ष की आयु तक तो नहीं होता है कि कुछ लोग मनुष्यजाति और सृजनकर्ता को समझना आरम्भ करते हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, कि वे आभास करें कि मानव जीवन के बारे में सब कुछ क्या है, और मनुष्य के भाग्य के बारे में सब कुछ क्या है। कुछ लोग, यद्यपि वे काफी लम्बे समय से परमेश्वर के अनुयायी रहे हैं और अब वे अधेड़ अवस्था में हैं, फिर भी वे अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता का सटीक ज्ञान और उसकी परिभाषा धारण नहीं करते हैं, सच्चे समर्पण को तो बिलकुल धारण नहीं करते हैं। कुछ लोग आशीषों को पाने की खोज करने के अलावा किसी भी चीज़ की परवाह नहीं करते हैं, और यद्यपि वे कई वर्षों का जीवन बिता चुके हैं, फिर भी वे मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को बिलकुल नहीं जानते और समझते हैं, और इसलिए उन्होंने परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण के व्यावहारिक सबक में जरा सा भी प्रवेश नहीं किया है। ऐसे लोग पूरी तरह से मूर्ख हैं; ऐसे लोग अपना जीवन व्यर्थ में जीते हैं।

यदि किसी मानव जीवन को उसके जीवन के अनुभवों के अंश और मनुष्य के भाग्य के उसके ज्ञान के अनुसार विभाजित किया जाए, तो यह मोटे तौर पर तीन चरणों में विभक्त होगा। पहला चरण है युवावस्था, जन्म से लेकर अधेड़ आयु के बीच के वर्ष, या जन्म से लेकर तीस वर्ष की आयु तक। दूसरा चरण है परिपक्वता, अधेड़ आयु से लेकर वृद्धावस्था तक, या तीस से लेकर साठ वर्ष की आयु तक। और तीसरा चरण है किसी व्यक्ति की परिपक्व अवधि, वृद्धावस्था से, अर्थात् साठ वर्ष से, शुरू होकर, उसके इस संसार से प्रस्थान करने तक। दूसरे शब्दों में, जन्म से लेकर अधेड़ आयु तक, भाग्य और जीवन के बारे में अधिकतर लोगों का ज्ञान दूसरों के विचारों को तोते से समान रटते रहने तक सीमित होता है; इसमें लगभग कोई वास्तविक, व्यावहारिक सार नहीं होता है। इस अवधि के दौरान, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण और किस प्रकार वह इस संसार में अपना मार्ग बनाता है इस बारे में वे सभी बहुत ही सतही और सीधे-सादे होते हैं। यह उसके लड़कपन की अवधि है। जब कोई व्यक्ति जीवन के सभी आनन्द और दुःखों का स्वाद चख लेता है, केवल उसके पश्चात् ही वह भाग्य के बारे में वास्तविक समझ को प्राप्त करता है, वह—अवचेतन रूप से, अपने हृदय की गहराई में—धीरे-धीरे भाग्य की अपरिवर्तनीयता की सराहना करने लगता है, और धीरे-धीरे एहसास करता है कि मनुष्य के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता वास्तव में मौजूद है। यह किसी व्यक्ति की परिपक्वता की अवधि है। जब वह भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करना समाप्त कर देता है, और जब वह झगड़ों में अब और पड़ने की इच्छा नहीं करता है, परन्तु अपने भाग्य को जानता है, स्वर्ग की इच्छा के प्रति समर्पण करता है, अपनी स्वयं की उपलब्धियों और जीवन में हुई ग़लतियों का सार निकलता है, और अपने जीवन में सृजनकर्ता के न्याय का इंतज़ार कर रहा है—यह उसकी परिपक्वता की अवधि है। इन तीन चरणों के दौरान लोगों के द्वारा अर्जित विभिन्न प्रकार के अनुभवों और उपलब्धियों पर विचार करते हुए, सामान्य परिस्थितियों के अधीन सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के उसके अवसर की अवधि बहुत बड़ी नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु तक जीवित रहता है, तो परमेश्वर की संप्रभुता को जानने ले लिए उसके पास केवल लगभग तीस वर्ष का समय ही है; यदि वह और अधिक लम्बी समयावधि चाहता है, तो यह केवल तभी सम्भव है यदि उसका जीवन काफी लम्बा हो, यदि वह सौ वर्ष तक जीवित रहने समर्थ हो। इसलिए मैं कहता हूँ, मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, यद्यपि यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति पहलेपहल सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करता है वहाँ से लेकर उस समय तक जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने में समर्थ हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो जाता है, यदि कोई वास्तव में उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को प्राप्त करने का अवसर होता है। और प्रायः, लोग अपनी इच्छाओं और आशीषों को पाने की अपनी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा बहक जाते हैं; वे नहीं पहचान सकते हैं कि मानव जीवन का सार कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व को नहीं समझते हैं, और इसलिए उन्हें मानव जीवन का अनुभव करने और सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने का यह मूल्यवान अवसर अच्छा नहीं लगता है, और वे य‍ह एहसास नहीं करते हैं कि एक सृजित किए गए प्राणी के लिए सृजनकर्ता का व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। इसलिए मैं कहता हूँ, कि जो लोग जो चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितना जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत की व्यवस्था करे, ताकि वे तुरन्त ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख सकें और शीघ्र ही धन्य हो सकें, वे बदतरीन प्रकार की अवज्ञा और चरण मूर्खता के दोषी हैं। और जो लोग अपने सीमित समय के दौरान सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा करते हैं, वे ही बुद्धिमान लोग हैं, और वे ही प्रतिभाशाली लोग हैं। ये दो अलग-अलग इच्छाएँ दो अत्यंत भिन्न दृष्टिकोणों और खोजों को उजागर करती हैं: जो लोग आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी और नीच हैं; वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई विचार नहीं करते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने की कभी खोज नहीं करते हैं, उसके प्रति समर्पण करने की कभी इच्छा नहीं करते हैं, और जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसा ही जीवन बिताना चाहते हैं। वे लापरवाह चरित्रहीन लोग हैं; वे ऐसी श्रेणी हैं जिन्हें नष्ट किया जाएगा। जो लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं को दरकिनार करने में समर्थ हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हैं; वे इस प्रकार के लोग होने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति विनम्र हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं। ऐेसे लोग प्रकाश में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच जीवन जीते हैं; निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। जो भी हो, मानव पसंद बेकार है, मनुष्य का इस बात पर कोई वश नहीं है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यह अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर की करुणा पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पण कर दें। यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, तो तुम क्या कर सकते हो? क्या परमेश्वर को नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, यदि तुम प्रभारी होने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और एकमात्र तुम ही हो जो अंत में नुकसान उठाओगे। यदि लोग यथाशीघ्र परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने में, उसके अधिकार को जानने में, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उसे समझने में शीघ्रता करेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी, केवल तभी वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएँगे, केवल तभी वे उद्धार प्राप्त करेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 135

कोई इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है

तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के दौरान भले ही किसी भी प्रकार से संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए चिह्नित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह तरीका है जिससे उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण और शासन करता है। यह वही अजेयता है, नियन्त्रण और शासन का वही रूप है, जो उन नियमों के लिए ज़िम्मेदार है जो सभी चीज़ों के जीवन पर हुक्म चलाते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से घुमाते रहते हैं और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर या गहराई से तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य की वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुमने परमेश्वर के वचन का कितना अनुभव किया है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करता है। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करते हैं या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है; सभी परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप हर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है और उनकी व्यवस्था करता है। मनुष्यों के बदलने की वजह से यह नहीं बदलेगा, और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र है, और समय, अंतरिक्ष, और भूगोल में किन्ही भी परिवर्तनों के द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका वास्तविक सार है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या नहीं, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या नहीं, यह मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को ज़रा सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी प्रवृत्ति क्यों न अपनाए, यह बस इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है। भले ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न कर सकते हो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को शासित करता है; भले ही तुम उसकी संप्रभुता को नहीं जान सकते हो, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र हैं, वे मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंदों के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। यदि स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त जाएँ, तब भी उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया था। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक तथ्य है; यह आदि काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 136

उस व्यक्ति के लिए उचित प्रवृत्ति और अभ्यास जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पण करने की इच्छा रखता है

किस प्रवृत्ति के साथ अब मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार, और मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को जानना और मानना चाहिए? यह एक वास्तविक समस्या है जो हर व्यक्ति के सामने खड़ी होती है। वास्तविक-जीवन की समस्याओं का सामना करते समय, तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को जानना और समझना चाहिए? जब तुम नहीं जानते हो कि किस प्रकार इन समस्याओं को समझें, सँभालें और अनुभव करें, तो तुम्हें अपने इरादे, अपनी इच्छा, और परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अपनी वास्तविकता को दर्शाने के लिए किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए? पहले तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; तब तुम्हें समर्पण करना सीखना होगा। "प्रतीक्षा" का अर्थ है परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना, उन लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की प्रतीक्षा करना जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, और उसकी इच्छा की प्रतीक्षा करना कि वह धीरे-धीरे अपनी इच्छा को तुम पर प्रकट करे। "खोजना" का अर्थ है उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों के माध्यम से तुम्हारे लिए परमेश्वर के विचारशील इरादों का अवलोकन करना और उन्हें समझना जो उसने बनाए हैं, उनके माध्यम से सत्य को समझना, वह समझना जो मनुष्यों को अवश्य पूरा करना चाहिए और उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन अवश्य करना चाहिए, इस बात को समझना कि परमेश्वर का मनुष्यों में किन परिणामों को प्राप्त करने का अभिप्राय है और उसका उनमें किन उपलब्धियों को देखने का अभिप्राय है। "समर्पण करना", वास्तव में, उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर ने आयोजित की हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करने और, उसके माध्यम से, यह जान लेने की ओर संकेत करता है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य पर हुक्म चलाता है, कि वह किस प्रकार अपने जीवन से मनुष्य को आपूर्ति करता है, कि वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सत्य का कार्य करता है। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और संप्रभुता के अधीन सभी चीज़ें प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुम परमेश्वर को अपने लिए सभी चीज़ों की व्यवस्था करने और उन पर हुक्म चलाने देते हो, तो तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए, तुम्हें खोज करना सीखना चाहिए, और तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। यही वह प्रवृत्ति है जिसे हर उस व्यक्ति को अवश्य अपनानी चाहिए जो परमेश्वर में अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहता है, और वह मूल गुण है जो हर उस व्यक्ति को अवश्य धारण करना चाहिए जो परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना चाहता है। इस प्रकार की प्रवृत्ति रखने के लिए, इस प्रकार की योग्यता धारण करने के लिए, तुम लोगों को और अधिक कठिन परिश्रम करना होगा; और केवल इस प्रकार से ही तुम लोग सच्ची वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 137

परमेश्वर को अपने अद्वितीय स्वामी के रूप में स्वीकार करना उद्धार हासिल करने का पहला कदम है

परमेश्वर के अधिकार के बारे में सच्चाईयाँ ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गम्भीरता से लेना चाहिए, अवश्य अपने हृदय से अनुभव करना और समझना चाहिए; क्योंकि ये सच्चाईयाँ हर व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित हैं, हर व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं, उन महत्वपूर्ण मोड़ों से सम्बन्धित हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गुज़रना है, और परमेश्वर की संप्रभुता और उस प्रवृत्ति से सम्बन्धित हैं जिनके साथ उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति की आख़िरी मंज़िल से सम्बन्धित हैं। इसलिए उन्हें जानने और समझने के लिए जीवन भर की ऊर्जा लगती है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को गम्भीरता से लोगे, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करोगे, तब धीरे-धीरे एहसास करने लगोगे और समझने लगोगे कि परमेश्वर का अधिकार सचमुच अस्तित्व में है। किन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं समझते हो, उसकी संप्रभुता को कभी स्वीकार नहीं करते हो, तब तुम कितने ही वर्ष क्यों न जीवित रहो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता का थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे। यदि तुम सचमुच में परमेश्वर के अधिकार को जानते और समझते नहीं हो, तो जब तुम मार्ग के अंत में पहुँचोगे, तो भले ही तुमने दशकों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारे पास अपने जीवन में दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में तुम्हारा ज्ञान अनिवार्य रूप से शून्य होगा। क्या यह बहुत ही दुःखदायी बात नहीं है? इसलिए तुम जीवन में चाहे कितनी ही दूर तक क्यों न चले हो, अब तुम चाहे कितने ही वृद्ध क्यों न हो गए हो, तुम्हारी शेष यात्रा चाहे कितनी ही लम्बी क्यों न हो, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को पहचानना होगा और इसे गम्भीरतापूर्वक लेना होगा, और इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय स्वामी है। मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की इन सच्चाईयों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है, मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है, परमेश्वर को जानने हेतु जीवन तथा बुनियादी सबक है जिसका सभी हर दिन सामना करते हैं, और जिससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई एक इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र स्वामी है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपने स्वयं के भाग्य पर हुक्म चलाना असंभव है, और उससे परे होना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, आयोजित, व्यवस्थित, नियन्त्रित, या परिवर्तित तो बिलकुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के लिए सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है, क्योंकि केवल वही अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है; और इसलिए केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय स्वामी है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति के ऊपर, बल्कि सृजित नहीं किए गए प्राणियों, जिन्हें कोई मनुष्य देख नहीं सकता है, के ऊपर भी संप्रभुता रखता है, तारों के ऊपर, और ब्रह्माण्ड के ऊपर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद तथ्य है, ऐसा तथ्य जो वास्तव में अस्तित्व में है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यदि चीज़ें जैसी हैं उससे तुम में से कोई एक अभी भी असंतुष्ट हैं, यह विश्वास करता है कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचता है कि तुम भाग्यशाली हो सकते हो और अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उनसे बच निकल सकते हो; यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का, और इसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देने, और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और सौभाग्य अर्जित करने का प्रयास करते हो; तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि तुम अपने लिए जीवन के हालातों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल समस्याओं को ही माँग रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! एक दिन, देर-सवेर, तुम यह जान जाओगे कि तुमने ग़लत चुनाव किया था, यह कि तुम्हारी कोशिशें व्यर्थ थी। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ, भाग्य से लड़ने की तुम्हारी इच्छाएँ, और तुम्हारा स्वयं का कट्टर स्वभाव, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम एक कड़वी कीमत चुकाओगे। हालाँकि, अभी तुम्हें परिणाम की भयंकरता नहीं दिखाई देती है, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और उसकी सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का स्वामी है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ और इसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे महसूस करने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य से प्रेम करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनाते हो। और स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी भी महसूस नहीं किया है, परमेश्वर के अधिकार को तो बिलकुल नहीं पहचाते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और उस पसंद के कारण जो तुमने की है, तुम सर्वथा मूल्यहीन हो जाओगे, निःसन्देह परमेश्वर की घृणा और तिरस्कार की वस्तु हो जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसकी परीक्षाओं को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक समझ को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृजनकर्ता की प्रजा बन गए होंगे। केवल इस प्रकार के लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जान लिया है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य की उनकी समझ और उसके प्रति उनका समर्पण वास्तविक और परिशुद्ध है। जब वे मृत्यु का सामना करेंगे, तो वे अय्यूब के समान, ऐसा मन रखने में समर्थ होंगे जो मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होता है, किसी व्यक्तिगत पसंद के बिना, किसी व्यक्तिगत इच्छा के बिना, सभी चीज़ों में परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ होंगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक सृजित किए गए सच्चे मनुष्य के रूप सृजनकर्ता की तरफ़ लौटने में समर्थ होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 138

मनुष्य के लिए यहोवा परमेश्वर की आज्ञा

उत्पत्ति 2:15-17 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाया जाना

उत्पत्ति 3:1-5 यहोवा परमेश्‍वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, "क्या सच है कि परमेश्‍वर ने कहा, 'तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना'?" स्त्री ने सर्प से कहा, "इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।" तब सर्प ने स्त्री से कहा, "तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।"

ये दोनों अंश बाइबल की 'उत्पत्ति' नामक पुस्तक के अंश हैं। क्या तुम सभी इन दोनों अंशों से परिचित हो? ये सृष्टि के आरंभ में हुई घटनाओं से संबंधित हैं, जब पहली बार मानव-जाति का सृजन किया गया था; ये घटनाएँ वास्तविक थीं। पहले हम यह देखें कि यहोवा परमेश्वर ने आदम और हव्वा को किस प्रकार की आज्ञा दी थी; इस आज्ञा की विषयवस्तु आज हमारे विषय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, 'तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।'" इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा का क्या तात्पर्य है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, अर्थात् अनेक प्रकार के पेड़ों के फल। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब-कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी संदेह के मनुष्य की इच्छा के अनुसार स्वतंत्रतापूर्वक खाया जा सकता है। यह परमेश्वर की आज्ञा का एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। इस चेतावनी में परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना चाहिए। इस वृक्ष का फल खाने पर क्या होगा? परमेश्वर ने मनुष्य से कहा : यदि तुम इस वृक्ष का फल खाओगे, तो तुम निश्चित ही मर जाओगे। क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? यदि परमेश्वर ने तुमसे यह कहा होता, पर तुम लोग यह न समझ पाते कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम उसके वचनों को एक नियम या आज्ञा के रूप में मानते, जिसका पालन किया जाना चाहिए? ऐसे वचनों का पालन किया जाना चाहिए, है न? परंतु मनुष्य इनका पालन करने योग्य हो या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य से बिलकुल साफ़-साफ़ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता, और अगर वह उसे खा लेता है, जिसे नहीं खाना चाहिए, तो क्या होगा। क्या तुम परमेश्वर द्वारा कहे गए इन संक्षिप्त वचनों में परमेश्वर के स्वभाव की कोई चीज़ देख सकते हो? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? क्या इनमें कोई छलावा है? क्या इनमें कोई झूठ है? क्या इनमें कोई धमकी है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सच्चाई से और निष्कपटता से मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। परमेश्वर ने स्पष्टता से और सीधे-सीधे कहा। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? क्या किसी अटकलबाज़ी की ज़रूरत है? (नहीं।) अटकलबाज़ी की कोई ज़रूरत नहीं है। एक नज़र में उनका अर्थ स्पष्ट है। इन्हें पढ़ने पर आदमी इनके अर्थ के बारे में बिलकुल स्पष्ट महसूस करता है। यानी परमेश्वर जो कुछ कहना चाहता है और जो कुछ वह व्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त चीज़ें स्वच्छ, सीधी और स्पष्ट हैं। उनमें कोई गुप्त उद्देश्य या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं है। उसने सीधे मनुष्य से बात की और बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के इन वचनों से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी और सच्चा है। उसमें ज़रा भी झूठ नहीं है; यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें तुमसे कहा जाए कि तुम उसे नहीं खा सकते जो खाने योग्य है, या न खा सकने योग्य चीज़ों के बारे में तुमसे कहा जाए कि "खाकर देखो, क्या होता है"। परमेश्वर के कहने का यह अभिप्राय नहीं है। परमेश्वर जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, वही कहता है। यदि मैं कहूँ कि परमेश्वर पवित्र है, क्योंकि वह इस प्रकार से इन वचनों में स्वयं को दिखाता और प्रकट करता है, तो हो सकता है कि तुम यह महसूस करो कि मैंने राई का पहाड़ बना दिया है या मैं दूर की कौड़ी ले आया हूँ। यदि ऐसा है, तो चिंता मत करो, हमारी बात अभी पूरी नहीं हुई है।

आओ, अब "सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाए जाने" के बारे में बात करें। सर्प कौन है? (शैतान।) शैतान परमेश्वर के छह हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना में विरोधी की भूमिका निभाता है, और यह वह भूमिका है, जिसका जिक्र हमें परमेश्वर की पवित्रता के बारे में संगति करते समय करना होगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? अगर तुम शैतान की बुराई और भ्रष्टता को नहीं जानते, अगर तुम शैतान के स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारे पास पवित्रता को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, न ही तुम यह जान सकते हो कि पवित्रता वास्तव में क्या है। भ्रम की स्थिति में लोग यह विश्वास करते हैं कि शैतान जो कुछ करता है, वह सही है, क्योंकि वे इस प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव के अंतर्गत जीते हैं। बिना विरोधी के, बिना तुलना के किसी बिंदु के, तुम नहीं जान सकते कि पवित्रता क्या है। अतः यहाँ पर शैतान का उल्लेख करना होगा। यह उल्लेख कोई निरर्थक बातचीत नहीं है। शैतान के शब्दों और कार्यों से हम देखेंगे कि शैतान कैसे काम करता है, वह किस तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और उसका स्वभाव और चेहरा कैसा है। तो स्त्री ने सर्प से क्या कहा था? स्त्री ने सर्प को वह बात बताई, जो यहोवा परमेश्वर ने उससे कही थी। जब उसने शैतान को यह बात बताई, तो क्या वह निश्चित थी कि जो कुछ परमेश्वर ने उससे कहा है, वह सच है? वह आश्वस्त नहीं हो सकती थी, या हो सकती थी? एक ऐसे प्राणी के रूप में, जिसका नया-नया सृजन किया गया था, उसके पास भले और बुरे को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, न ही उसे अपने आसपास की किसी चीज़ का कोई संज्ञान था। सर्प से कहे गए उसके शब्दों को देखते हुए, वह अपने हृदय में आश्वस्त नहीं थी कि परमेश्वर के वचन सही हैं; ऐसा उसका रवैया था। अतः जब सर्प ने परमेश्वर के वचनों के प्रति स्त्री का अनिश्चित रवैया देखा, तो उसने कहा : "तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या इन शब्दों में कोई समस्या है? जब तुम लोग इस वाक्य को पढ़ते हो, तो तुम्हें सर्प के इरादों का कोई आभास होता है? क्या हैं वे इरादे? (मनुष्य को ललचाना, उसे पाप करने के लिए प्रेरित करना।) वह उस स्त्री को परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देने से रोकने के लिए उसे ललचाना चाहता था। लेकिन उसने इसे सीधे तौर पर नहीं कहा। अतः हम कह सकते हैं कि वह बहुत चालाक है। वह अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुँचने के लिए अपने अर्थ को शातिर और कपटपूर्ण तरीके से व्यक्त करता है, जिसे वह मनुष्य से छिपाकर अपने मन के भीतर गुप्त रखता है—यह सर्प की चालाकी है। शैतान का बोलने और कार्य करने का हमेशा यही तरीका रहा है। वह किसी तरह से पुष्टि न करते हुए "निश्चित रूप से नहीं" कहता। लेकिन यह सुनकर इस अबोध स्त्री का हृदय द्रवित हो गया। सर्प प्रसन्न हो गया, क्योंकि उसके शब्दों ने इच्छित प्रभाव पैदा कर दिया था—ऐसा धूर्त इरादा था सर्प का। इतना ही नहीं, मनुष्यों को वांछित लगने वाले परिणाम का वादा करके उसने यह कहकर उसे बहका दिया था, कि "जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी।" इसलिए वह सोचती है, "मेरी आँखों का खुलना तो एक अच्छी बात है!" और फिर उसने कुछ और भी मोहक बात कही, ऐसे शब्द जिनसे मनुष्य अब तक अनजान था, ऐसे शब्द जो सुनने वाले को लुभाने की बड़ी ताकत रखते हैं : "तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या ये शब्द मनुष्य को सशक्त रूप से लुभाने वाले नहीं हैं? जैसे कोई तुमसे कहे : "तुम्हारे चेहरे का आकार तो बहुत सुंदर है, बस नाक का ऊपरी हिस्सा थोड़ा छोटा है। अगर तुम इसे ठीक करवा लो, तो तुम विश्वस्तरीय सुंदरी बन जाओगी!" क्या ये शब्द ऐसे व्यक्ति के हृदय को द्रवित नहीं कर देंगे, जिसने पहले कभी कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने की इच्छा नहीं पाली होगी? क्या ये शब्द प्रलोभन देने वाले नहीं हैं? क्या यह प्रलोभन तुम्हें लुभा नहीं रहा है? और क्या यह एक प्रलोभन नहीं है? (हाँ।) क्या परमेश्वर ऐसी बातें कहता है? क्या परमेश्वर के वचनों में, जिन्हें हमने अभी पढ़ा, इसका कोई संकेत था? (नहीं।) क्या परमेश्वर वही कहता है, जो उसके दिल में होता है? क्या मनुष्य परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके हृदय को देख सकता है? (हाँ।) परंतु जब सर्प ने स्त्री से वे शब्द कहे, तब क्या तुम उसके हृदय को देख सके? (नहीं।) और अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य सर्प के शब्दों से आसानी से बहक गया और ठगा गया। तो क्या तुम शैतान के इरादों को देख सके? क्या तुम जो कुछ शैतान ने कहा, उसके पीछे के उद्देश्य को देख सके? क्या तुम उसकी साज़िश और चालों को देख सके? (नहीं।) शैतान के बोलने का तरीका किस तरह के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है? इन शब्दों के माध्यम से तुमने शैतान में किस प्रकार का सार देखा है? क्या वह कपटी नहीं है? शायद ऊपर से वह तुम पर मुसकराता है या शायद वह किसी भी प्रकार की भाव-भंगिमा प्रकट न करता हो। परंतु अपने हृदय में वह गणना कर रहा है कि किस प्रकार अपना उद्देश्य हासिल किया जाए, और इस उद्देश्य को ही देखने में तुम असमर्थ हो। सभी वादे जो वह तुमसे करता है, सभी फायदे जो वह तुम्हें बताता है, उसके प्रलोभन की आड़ हैं। ये चीज़ें तुम्हें अच्छी दिखाई देती हैं, इसलिए तुम्हें लगता है कि जो कुछ वह कहता है, वह परमेश्वर की बातों से अधिक उपयोगी और ठोस है। जब यह होता है, तब क्या मनुष्य एक विनीत कैदी नहीं बन जाता? क्या शैतान द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली यह रणनीति दुष्टतापूर्ण नहीं है? तुम स्वयं को पतन में गर्त होने देते हो। शैतान के बिना एक उँगली भी हिलाए, केवल ये दो वाक्य कहने भर से तुम खुश होकर उसका अनुसरण और अनुपालन करने लगते हो। इस प्रकार उसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। क्या यह इरादा भयंकर नहीं है? क्या यह शैतान का असली चेहरा नहीं है? शैतान के शब्दों से मनुष्य उसके भयंकर इरादों, उसके घिनौने चेहरे और उसके सार को देख सकता है। क्या ऐसा नहीं है? इन वाक्यों की तुलना करने पर, बिना विश्लेषण किए तुम शायद सोच सकते हो कि यहोवा परमेश्वर के वचन नीरस, साधारण और घिसे-पिटे हैं, और वे परमेश्वर की ईमानदारी की प्रशंसा में बढ़-चढ़कर बताए जाने लायक नहीं हैं। लेकिन जब हम तुलना के रूप में शैतान के शब्दों और उसके घिनौने चेहरे को लेते हैं, तो क्या परमेश्वर के ये वचन आज के लोगों के लिए ज्यादा वजन नहीं रखते? (रखते हैं।) इस तुलना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की पवित्र निर्दोषता का आभास कर सकता है। शैतान का हर एक शब्द, और साथ ही उसके प्रयोजन, उसके इरादे और उसके बोलने का तरीका—सभी अशुद्ध हैं। शैतान के बोलने के तरीके की मुख्य विशेषता क्या है? तुम्हें अपने दोरंगेपन को देखने का मौका न देते हुए वह तुम्हें बहकाने के लिए वाक्छल का प्रयोग करता है, न ही वह तुम्हें अपने उद्देश्य को पहचानने देता है; वह तुम्हें चारा लेने देता है और तुमसे अपनी स्तुति और गुणगान करवाता है। क्या यह चाल शैतान की पसंद का अभ्यस्त तरीका नहीं है? (है।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 139

शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप

अय्यूब 1:6-11 एक दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

अय्यूब 2:1-5 फिर एक और दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके सामने उपस्थित हुआ। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

इन दो अंशों में पूरी तरह से परमेश्वर और शैतान के मध्य एक वार्तालाप है; ये अंश इस बात को दर्ज करते हैं कि परमेश्वर ने क्या कहा और शैतान ने क्या कहा। परमेश्वर ने बहुत अधिक नहीं बोला, और बड़ी सरलता से बोला। क्या हम परमेश्वर के सरल वचनों में उसकी पवित्रता देख सकते हैं? कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा करना आसान नहीं है। तो क्या हम शैतान के प्रत्युत्तरों में उसका घिनौनापन देख सकते हैं? (हाँ।) आओ, पहले देखें कि यहोवा परमेश्वर ने शैतान से किस प्रकार के प्रश्न पूछे। "तू कहाँ से आता है?" क्या यह एक सीधा प्रश्न नहीं है? क्या इसमें कोई छिपा हुआ अर्थ है? (नहीं।) यह केवल एक शुद्ध प्रश्न है, जिसमें किसी गुप्त उद्देश्य की मिलावट नहीं है। यदि मुझे तुम लोगों से पूछना होता : "तुम कहाँ से आए हो?" तब तुम लोग किस प्रकार उत्तर देते? क्या इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है? क्या तुम लोग यह कहते : "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ"? (नहीं।) तुम लोग इस प्रकार उत्तर न देते। तो फिर शैतान को इस तरीके से उत्तर देते देख तुम लोगों को कैसा लगता है? (हमें लगता है कि शैतान बेतुका है, लेकिन धूर्त भी है।) क्या तुम लोग बता सकते हो कि मुझे कैसा लग रहा है? हर बार जब मैं शैतान के इन शब्दों को देखता हूँ, तो मुझे घृणा महसूस होती है, क्योंकि वह बोलता तो है, पर उसके शब्दों में कोई सार नहीं होता। क्या शैतान ने परमेश्वर के प्रश्न का उत्तर दिया? नहीं, शैतान ने जो शब्द कहे, वे कोई उत्तर नहीं थे, उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ। वे परमेश्वर के प्रश्न के उत्तर नहीं थे। "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" तुम इन शब्दों से क्या समझते हो? आखिर शैतान कहाँ से आया था? क्या तुम लोगों को इस प्रश्न का कोई उत्तर मिला? (नहीं।) यह शैतान की धूर्त योजनाओं की "प्रतिभा" है—किसी को पता लगने न देना कि वह वास्तव में क्या कह रहा है। ये शब्द सुनकर भी तुम लोग यह नहीं जान सकते कि उसने क्या कहा है, हालाँकि उसने उत्तर देना समाप्त कर लिया है। फिर भी वह मानता है कि उसने उत्तम तरीके से उत्तर दिया है। तो तुम कैसा महसूस करते हो? घृणा महसूस करते हो ना? (हाँ।) अब तुमने इन शब्दों की प्रतिक्रिया में घृणा महसूस करना शुरू कर दिया है। शैतान सीधे तौर पर बात नहीं करता, और तुम्हें अपना सिर खुजलाता छोड़ देता है, और तुम उसके शब्दों के स्रोत को समझने में असमर्थ रहते हो। कभी-कभी वह जान-बूझकर ऐसा बोलता है, और कभी-कभी जब वह बोलता है तो उसके शब्द उसके सार और स्वभाव द्वारा नियंत्रित होते हैं। ये शब्द सीधे शैतान के मुँह से बाहर आए। शैतान ने इन शब्दों को लंबे समय तक नहीं तोला; या उन्हें इस तरह नहीं बोला कि उसे चतुर समझा जाए, बल्कि उसने इन्हें स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया। जैसे ही तुम शैतान से पूछते हो कि वह कहाँ से आया है, वह तुम्हें इस प्रकार, इन शब्दों में जवाब देता है। तुम बिलकुल उलझन में पड़ जाते हो, और नहीं जान पाते कि आखिर वह कहाँ से आया है। क्या तुम लोगों के बीच में कोई ऐसा है, जो इस प्रकार से बोलता है? (हाँ।) यह बोलने का कैसा तरीका है? (यह अस्पष्ट है और निश्चित उत्तर नहीं देता।) बोलने के इस तरीके का वर्णन करने के लिए हमें किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए? यह ध्यान भटकाने वाला और गुमराह करने वाला है, है कि नहीं? मान लो, कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि दूसरे यह जानें कि वह कल कहाँ गया था। तुम उससे पूछते हो : "मैंने तुम्हें कल देखा था। तुम कहाँ जा रहे थे?" वह तुम्हें सीधे यह नहीं बताता कि वह कल कहाँ गया था। इसके बजाय वह कहता है "कल क्या दिन था। बहुत थकाने वाला दिन था!" क्या उसने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया? दिया, लेकिन वह उत्तर नहीं दिया, जो तुम चाहते थे। यह मनुष्य के बोलने की चालाकी की "प्रतिभा" है। तुम कभी पता नहीं लगा सकते कि उसका क्या मतलब है, न तुम उसके शब्दों के पीछे के स्रोत या इरादे को ही समझ सकते हो। तुम नहीं जानते कि वह क्या टालने की कोशिश रहा है, क्योंकि उसके हृदय में उसकी अपनी कहानी है—वह कपटी है। क्या तुम लोग भी अकसर इस तरह से बोलते हो? (हाँ।) तो तुम लोगों का क्या उद्देश्य होता है? क्या यह कभी-कभी तुम्हारे अपने हितों की रक्षा के लिए होता है, और कभी-कभी अपनी स्थिति, अपनी छवि बनाए रखने के लिए, अपने निजी जीवन के रहस्य गुप्त रखने के लिए, अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए? उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, यह तुम्हारे हितों से अलग नहीं है, यह तुम्हारे हितों से जुड़ा हुआ है। क्या यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है? क्या इस प्रकार के स्वभाव वाला हर व्यक्ति शैतान के समान नहीं है? हम ऐसा कह सकते हैं, है न? सामान्य रूप से कहें, तो यह अभिव्यक्ति घृणित और वीभत्स है। तुम लोग भी अब घृणा़ महसूस करते हो, हैं न? (हाँ।)

पहले अंश को फिर से देखें तो, शैतान फिर से यहोवा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है : "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?" शैतान अय्यूब के संबंध में यहोवा के आकलन पर हमला कर रहा है, और यह हमला दुश्मनी के रंग में रँगा है। "क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा?" यह अय्यूब पर किए गए यहोवा के कार्य के संबंध में शैतान की समझ और उसका आकलन है। शैतान उसका इस तरह आकलन करता है, और कहता है : "तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" शैतान सदा अस्पष्टता से बात करता है, पर यहाँ वह निश्चय के साथ बोल रहा है। लेकिन निश्चय के साथ बोले जाने के बावजूद ये शब्द एक हमला हैं, ईश-निंदा हैं और यहोवा परमेश्वर की, स्वयं परमेश्वर की अवज्ञा हैं। जब तुम लोग ये शब्द सुनते हो, तो तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें घृणा महसूस होती है? क्या तुम लोग शैतान के इरादों को देख पा रहे हो? सर्वप्रथम, शैतान अय्यूब के संबंध में—जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य है, यहोवा के आकलन को नकारता है। फिर वह हर उस चीज़ को नकारता है, जिसे अय्यूब कहता और करता है, अर्थात् वह उसके मन में मौजूद यहोवा के भय को नकारता है। क्या यह आरोप लगाना नहीं है? शैतान यहोवा की हर कथनी और करनी पर दोषारोपण करता है, उसे नकारता है और उस पर संदेह करता है। वह यह कहते हुए विश्वास नहीं करता कि "अगर तुम कहते हो कि चीज़ें ऐसी हैं, तो फिर मैंने उन्हें क्यों नहीं देखा? तुमने उसे बहुत सारे आशीष दिए हैं, तो वह तुम्हारा भय क्यों नहीं मानेगा?" क्या यह परमेश्वर के हर कार्य को खंडन नहीं है? दोषारोपण, खंडन, ईश-निंदा—क्या शैतान के शब्द हमला नहीं हैं? क्या ये शब्द, शैतान जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, उसकी सच्ची अभिव्यक्ति नहीं हैं? ये वचन निश्चित रूप से वैसे नहीं हैं, जैसे हमने अभी पढ़े थे : "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" वे पूरी तरह से भिन्न हैं। इन शब्दों के माध्यम से शैतान अपने दिल की बात पूरी तरह से अनावृत कर देता है—परमेश्वर के प्रति अपना रवैया और अय्यूब के परमेश्वर का भय मानने से घृणा। जब ऐसा होता है, तो उसकी दुर्भावना और बुरी प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाती हैं। वह उनसे घृणा करता है, जो परमेश्वर का भय मानते हैं; वह उनसे घृणा करता है, जो बुराई से दूर रहते हैं; और इनसे भी बढ़कर, वह मनुष्य को आशीष प्रदान करने के लिए यहोवा से घृणा करता है। वह इस अवसर का उपयोग अय्यूब को नष्ट करने के लिए करना चाहता है; जिस अय्यूब को परमेश्वर ने अपने हाथों से बड़ा किया है, उसे बरबाद करने के लिए वह कहता है : "तुम कहते हो, अय्यूब तुम्हारा भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। मैं इसे अलग तरह से देखता हूँ।" वह यहोवा को उकसाने और प्रलोभन देने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करता है और कई हथकंडे अपनाता है, ताकि यहोवा परमेश्वर अय्यूब को शैतान को सौंप दे, जिससे कि वह उसके बेहूदगी से पेश आ सके, उसे नुकसान पहुँचा सके और उसके साथ दुर्व्यवहार कर सके। वह इस अवसर का लाभ इस मनुष्य को नष्ट करने के लिए करना चाहता है, जो परमेश्वर की नज़रों में धार्मिक और पूर्ण है। क्या शैतान के पास इस प्रकार का हृदय होना केवल एक क्षणिक आवेग का परिणाम है? नहीं, ऐसा नहीं है। इसे बनने में लंबा समय लगा है। परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह एक व्यक्ति की देखभाल करता है, उस पर नज़र रखता है, और शैतान इस पूरे समय के दौरान उसके हर कदम का पीछा करता है। परमेश्वर जिस किसी पर भी अनुग्रह करता है, शैतान भी पीछे-पीछे चलते हुए उस पर नज़र रखता है। यदि परमेश्वर इस व्यक्ति को चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को भ्रमित, बाधित और नष्ट करने के लिए विभिन्न बुरे हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; उसे वे सभी लोग अपने लिए चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्ज़ा कर सके, उन पर नियंत्रण कर सके, उनको अपने अधिकार में ले सके, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है? तुम लोग अकसर कहते हो कि शैतान कितना बुरा, कितना खराब है, परंतु क्या तुमने उसे देखा है? तुम सिर्फ यह देख सकते हो कि मनुष्य कितना बुरा है। तुमने असल में नहीं देखा है कि शैतान वास्तव में कितना बुरा है। पर क्या तुम लोगों ने अय्यूब से संबंधित इस मामले में शैतान की बुराई देखी है? (हाँ।) इस मामले ने शैतान के भयंकर चेहरे और उसके सार को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है। परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का उद्देश्य उस समस्त कार्य को नष्ट करना है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है; उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है; उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। यदि वे मिटाए नहीं जाते, तो वे शैतान द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है। और परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर इस अंश में केवल एक सरल वाक्य कहता है; परमेश्वर के इससे कुछ भी अधिक करने का कोई अभिलेख नहीं है, परंतु शैतान के कहने और करने के और भी कई अभिलेख हम देखते हैं। पवित्र शास्त्र के नीचे दिए गए अंश में यहोवा ने शैतान से पूछता है, "तू कहाँ से आता है?" शैतान क्या उत्तर देता है? (उसका उत्तर अभी भी यही है "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।") यह अभी भी वही वाक्य है। यह शैतान का आदर्श वाक्य, उसका कॉलिंग कार्ड बन गया है। ऐसा कैसे है? क्या शैतान घृणास्पद नहीं है? निश्चित रूप से इस घिनौने वाक्य को एक बार कहना ही काफी है। शैतान बार-बार इसे दोहराए क्यों जाता है। इससे एक बात साबित होती है : शैतान का स्वभाव अपरिवर्तनीय है। शैतान अपना बदसूरत चेहरा छिपाने के लिए दिखावे का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। परमेश्वर उससे एक प्रश्न पूछता है और वह इस तरह प्रत्युतर देता है। ऐसा है, तो सोचो, मनुष्यों के साथ वह कैसा व्यवहार करता होगा! वह परमेश्वर से नहीं डरता, परमेश्वर का भय नहीं मानता, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करता। अतः वह बेहूदगी से परमेश्वर के सम्मुख ढीठ होने की, परमेश्वर के प्रश्न पर लीपापोती करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने की, परमेश्वर के प्रश्न का वही उत्तर दोहराने और इस उतर से परमेश्वर को उलझाने की कोशिश करता है—यह शैतान का कुरूप चेहरा है। वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर के अधिकार पर विश्वास नहीं करता, और वह निश्चित रूप से परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होता। वह लगातार परमेश्वर के विरोध में रहता है, लगातार परमेश्वर के हर कार्य पर हमला कर उसे बरबाद करने की कोशिश करता है—यह उसका दुष्ट उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 140

शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप

अय्यूब 1:6-11 एक दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

अय्यूब 2:1-5 फिर एक और दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके सामने उपस्थित हुआ। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

जैसा कि अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है, शैतान द्वारा बोले गए ये दो अंश और शैतान द्वारा किए गए कार्य परमेश्वर की छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना में उसके प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करते हैं—यहाँ शैतान का असली रंग प्रकट हो जाता है। क्या तुमने असली जीवन में शैतान के शब्दों और कार्यों को देखा है? जब तुम उन्हें देखते हो, तो हो सकता है, तुम उन्हें शैतान द्वारा बोली गई बातें न समझो, बल्कि मनुष्य द्वारा बोली गई बातें समझो। जब मनुष्य द्वारा ऐसी बातें बोली जाती हैं, तो किसका प्रतिनिधित्व होता है? शैतान का प्रतिनिधित्व होता है। भले ही तुम इसे पहचान लो, फिर भी तुम यह नहीं समझ सकते कि वास्तव में इसे शैतान द्वारा बोला जा रहा है। पर यहाँ और अभी तुमने सुस्पष्ट ढंग से देखा है कि शैतान ने स्वयं क्या कहा है। अब तुम्हारे पास शैतान के भयानक चेहरे और उसकी दुष्टता की स्पष्ट और बिलकुल साफ समझ है। तो क्या शैतान द्वारा बोले गए ये दो अंश आज लोगों को शैतान के स्वभाव के बारे में जानकारी पाने में मदद करने की दृष्टि से मूल्यवान हैं? क्या ये दो अंश आज मानव-जाति के लिए शैतान के भयंकर चेहरे को, उसके मूल, असली चेहरे को पहचानने में सक्षम होने के लिए सावधानी से संगृहीत किए जाने योग्य हैं? यद्यपि ऐसा कहना शायद उचित प्रतीत न हो, फिर भी इस तरह कहे गए ये शब्द ठीक लग सकते हैं। निस्संदेह, मैं इस विचार को केवल इसी रूप में व्यक्त कर सकता हूँ, और यदि तुम लोग इसे समझ सको, तो यह काफी है। शैतान यहोवा द्वारा किए गए कार्यों पर बार-बार हमला करता है और यहोवा परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय के संबंध में अनेक इलज़ाम लगाता है। वह यहोवा को उकसाने का प्रयास करता है और यहोवा को अय्यूब का लालच छोड़ने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करता है। इसलिए उसके शब्द बहुत भड़काने वाले हैं। तो मुझे बताओ, जब एक बार शैतान ये शब्द बोल देता है, तो क्या परमेश्वर साफ-साफ देख सकता है कि शैतान क्या करना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर के हृदय में यह मनुष्य अय्यूब, जिस पर परमेश्वर दृष्टि रखता है—परमेश्वर का यह सेवक, जिसे परमेश्वर धर्मी मनुष्य, एक पूर्ण मनुष्य मानता है—क्या वह इस तरह के प्रलोभन का सामना कर सकता है? (हाँ।) परमेश्वर उसके बारे में इतना निश्चित क्यों है? क्या परमेश्वर हमेशा मनुष्य के हृदय की जाँच करता रहता है? (हाँ।) तो क्या शैतान मनुष्य के हृदय की जाँच करने में सक्षम है? शैतान जाँच नहीं कर सकता। यहाँ तक कि यदि शैतान तुम्हारा हृदय देख भी सकता हो, तो भी उसका दुष्ट स्वभाव उसे कभी विश्वास नहीं करने देगा कि पवित्रता, पवित्रता है, या गंदगी, गंदगी है। दुष्ट शैतान कभी किसी ऐसी चीज़ को सँजोकर नहीं रख सकता, जो पवित्र, धर्मी और उज्ज्वल है। शैतान अपने स्वभाव, अपनी दुष्टता के अनुसार और उन तरीकों के माध्यम से, जिनका वह आदी है, कार्य किए बिना नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा स्वयं को दंडित या नष्ट किए जाने की कीमत पर भी वह ढिठाई से परमेश्वर का विरोध करने से नहीं हिचकिचाता—यह दुष्टता है, यह शैतान का स्वभाव है। तो इस अंश में शैतान कहता है : "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" शैतान सोचता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य का भय इस कारण है, क्योंकि मनुष्य ने परमेश्वर से बहुत सारे लाभ प्राप्त किए हैं। मनुष्य परमेश्वर से अनेक लाभ उठाता है, इसलिए वह कहता है कि परमेश्वर अच्छा है। वह इस तरह से परमेश्वर का भय इसलिए नहीं मानता, क्योंकि परमेश्वर अच्छा है, बल्कि सिर्फ इसलिए मानता है, क्योंकि वह उससे इतने सारे लाभ प्राप्त करता है। एक बार यदि परमेश्वर उसे इन लाभों से वंचित कर दे, तो वह परमेश्वर को त्याग देगा। अपने दुष्ट स्वभाव के कारण शैतान यह नहीं मानता है कि मनुष्य का हृदय सच में परमेश्वर का भय मान सकता है। अपने दुष्ट स्वभाव के कारण वह नहीं जानता कि पवित्रता क्या है, और वह भयपूर्ण श्रद्धा को तो बिलकुल भी नहीं जानता। वह नहीं जानता कि परमेश्वर की आज्ञा मानना क्या है, या परमेश्वर का भय मानना क्या है। चूँकि वह इन चीज़ों को नहीं जानता, इसलिए वह सोचता है, मनुष्य भी परमेश्वर का भय नहीं मान सकता। मुझे बताओ, क्या शैतान दुष्ट नहीं है? हमारी कलीसिया को छोड़कर, विभिन्न धर्मों और संप्रदायों या धार्मिक और सामाजिक समूहों में से कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता, इस बात में तो वे बहुत कम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर देह बन गया है और न्याय का कार्य कर रहा है। दुराचारी व्यक्ति चारों ओर देखता है, तो उसे हर कोई दुराचारी नज़र आता है, जैसा वह खुद है। झूठे आदमी को चारों ओर बेईमानी और झूठ ही दिखाई देता है। दुष्ट व्यक्ति हर एक को दुष्ट समझता है और उससे लड़ना चाहता है। तुलनात्मक रूप से ईमानदार लोग हर किसी को ईमानदार समझते हैं, अतः वे हमेशा झाँसे में आ जाते हैं, हमेशा धोखा खाते हैं, और इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम लोगों को अपने विश्वास में दृढ़ करने के लिए मैं ये कुछ उदाहरण देता हूँ : शैतान का बुरा स्वभाव क्षणिक मजबूरी या परिस्थितियों से निर्धारित नहीं है, न ही वह किसी कारण या संदर्भगत कारकों से उत्पन्न कोई अस्थायी अभिव्यक्ति है। बिलकुल नहीं! शैतान इसके अलावा कुछ हो ही नहीं सकता! वह कुछ भी अच्छा नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब वह कुछ कर्णप्रिय बात भी कहता है, तो वह केवल तुम्हें बहकाने के लिए होती है। जितनी ज्यादा कर्णप्रिय, उतनी ज्यादा चतुराई से भरी; जितने ज्यादा कोमल शब्द, उनके पीछे उतने ही ज्यादा दुष्ट और भयानक इरादे। इन दो अंशों में शैतान किस तरह का चेहरा, किस तरह का स्वभाव दिखाता है? (कपटी, दुर्भावनापूर्ण और दुष्ट।) शैतान का प्रमुख लक्षण दुष्टता है; अन्य सबसे बढ़कर, शैतान दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 141

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा मानव-जाति के जीवन का मार्गदर्शन किया है। चाहे मानव-जाति को आशीष देना हो, मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ जारी करना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियम निर्धारित करना हो, क्या तुम लोग जानते हो कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का अभिप्रेत उद्देश्य क्या है? पहला, क्या तुम निश्चित रूप से कह सकते हो कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब मानव-जाति की भलाई के लिए है? तुम लोगों को ये भव्य, खोखले शब्दों की तरह लग सकते हैं, किंतु भीतर के विवरण की जाँच करने पर क्या वह सब जो परमेश्वर करता है, एक सामान्य जीवन जीने की दिशा में मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए नहीं है? चाहे वह मनुष्य से अपने नियमों का पालन करवाना हो या अपनी व्यवस्थाओं का पालन करवाना, परमेश्वर का उद्देश्य है कि मनुष्य शैतान की आराधना न करने लगे और उसके कारण हानि न उठाए; यह सबसे मूलभूत बात है, और यही वह काम है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाएँ और नियम बनाए और ऐसे विनियम बनाए, जिनमें हर ऐसे पहलू का समावेश था, जिसकी कल्पना की जा सकती थी। ये विनियम सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानव-जाति को सँजोता है, उसका पोषण करता है और उससे बहुत प्रेम करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह उद्देश्य सही और सकारात्मक है? (हाँ।) अपने कार्य के दौरान परमेश्वर ने जो भी विनियम बनाए हैं, उन सबका प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। तो क्या परमेश्वर के मन में कोई स्वार्थपूर्ण विचार हैं? जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त उद्देश्य हैं? क्या परमेश्वर किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? (नहीं।) जरा भी नहीं। परमेश्वर वही करता है, जो वह कहता है और उसके वचन और कार्य उसके हृदय के विचारों से मेल खाते हैं। इसमें कोई दूषित उद्देश्य नहीं है, कोई स्वार्थपूर्ण विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता, जो कुछ भी वह करता है, मनुष्य के लिए करता है, बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के। हालाँकि उसकी अपनी योजनाएँ और इरादे हैं, जिन्हें वह मनुष्य पर लागू करता है, पर उनमें से कुछ भी उसके अपने लिए नहीं है। वह जो कुछ भी करता है, विशुद्ध रूप से मानव-जाति के लिए करता है, मानव-जाति को बचाने के लिए, उसे गुमराह न होने देने के लिए करता है। तो क्या उसका यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? क्या तुम इस बहुमूल्य हृदय का लेशमात्र संकेत भी शैतान में देख सकते हो? तुम इसका लेशमात्र संकेत भी शैतान में नहीं देख सकते। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सहज रूप से प्रकट होता है। आओ, अब परमेश्वर के कार्य करने के तरीके को देखें; वह अपना काम कैसे करता है? क्या परमेश्वर इन व्यवस्थाओं और अपने वचनों को लेकर वशीकरण मंत्र[क] की तरह हर आदमी के सिर पर कसकर बाँध देता है और इस प्रकार उन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है। वह हमें सलाह और प्रोत्साहन देता है।) क्या वह धमकाता है? क्या वह तुमसे गोल-मोल बात करता है? (नहीं।) जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करता है? (वह ज्योति चमकाता है।) वह तुम पर एक ज्योति चमकाकर तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि यह चीज़ सत्य के अनुरूप नहीं है, और फिर वह तुम्हें बताता है कि तुम्हें क्या करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों से तुम्हें क्या लगता है, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर तुम्हारी समझ से परे है? (नहीं।) तो परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों को देखकर तुम्हें कैसा महसूस होता है? परमेश्वर विशेष रूप से तुम्हारे बहुत करीब है; तुम्हारे और परमेश्वर के बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, जब वह तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तो तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर कितना सौम्य है, तुम्हारे मन में उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तुम महसूस करते हो कि वह कितना प्यारा है, तुम उसकी गर्मजोशी महसूस करते हो। लेकिन जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का इस्तेमाल करता है? क्या वह वचनों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह तुम्हारे वातावरण और लोगों, मामलों और चीज़ों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) परमेश्वर किस सीमा तक तुम्हें अनुशासन करता है? क्या परमेश्वर मनुष्य को उतनी ही मात्रा में अनुशासित करता है, जितनी मात्रा में शैतान मनुष्य को नुकसान पहुँचाता है? (नहीं, परमेश्वर मनुष्य को केवल उसी सीमा तक अनुशासित करता है, जिस सीमा तक वह सह सकता है।) परमेश्वर सौम्य, कोमल, प्यारे और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है। उसका तरीका तुम्हारे भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : "परमेश्वर को मुझे यह करने देना चाहिए" या "परमेश्वर को मुझे वह करने देना चाहिए चाहिए।" परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म की मानसिक या भावनात्मक तीव्रता नहीं देता, जो चीज़ों को असहनीय बना देती है। क्या ऐसा नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य को समझते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अलंघनीय है? (हाँ।) क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से डर लगता है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भयपूर्ण श्रद्धा महसूस करते हो। क्या लोग ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता, तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएँ होतीं? (नहीं।) परमेश्वर अपने वचनों, अपने सत्य और अपने जीवन का प्रयोग मनुष्य की निरंतर आपूर्ति के लिए और उसे सहारा देने के लिए करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य मायूसी महसूस करता है, तब निश्चित रूप से परमेश्वर यह कहते हुए कठोरता से बात नहीं करता कि, "मायूस मत हो! इसमें मायूस होने की क्या बात है? तुम कमज़ोर क्यों हो? इसमें कमज़ोर होने का क्या कारण है? तुम हमेशा कितने कमज़ोर हो, और तुम हमेशा कितने नकारात्मक रहते हो! तुम्हारे जिंदा रहने का क्या फायदा है? मर जाओ और किस्सा खत्म करो!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) फिर भी परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। परमेश्वर के इस तरह से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार, परमेश्वर की पवित्रता का सार। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, उसके द्वारा मनुष्य को सँजोकर रखने और उसका पोषण करने को, स्पष्ट रूप से एक-दो वाक्यों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो मनुष्य की डींगों में घटित होती हो, बल्कि परमेश्वर इसे वास्तविक रूप से अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार का प्रकटीकरण है। क्या ये सभी तरीके, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता दिखा सकते हैं? इन सभी तरीकों से, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर लागू करना चाहता है, जिनमें वे विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, वह मनुष्य को क्या समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई बुराई या धोखा देखा है? (नहीं।) तो जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, उसमें और साथ ही परमेश्वर के समस्त सार में, जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अपनी अब तक की चर्चा के आधार पर, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते है? (हाँ।) परमेश्वर के वचनों सहित वह सब-कुछ, जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, वे विभिन्न तरीके जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, जो परमेश्वर मनुष्य से कहता है, जिसकी परमेश्वर मनुष्य को याद दिलाता है, वह जो सलाह और प्रोत्साहन देता है—यह सब एक सार से उत्पन्न होता है : परमेश्वर की पवित्रता से। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर न होता, तो कोई मनुष्य उसके कार्य को करने के लिए उसका स्थान न ले पाता। यदि परमेश्वर ने इन लोगों को पूरी तरह से शैतान को सौंप दिया होता, तो क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम किस हालत में होते? क्या तुम सब यहाँ सही-सलामत बैठे होते? क्या तुम भी यह कहोगे : "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ"? क्या तुम इतने बेशरम, ढीठ और अकड़ू होगे कि ऐसे शब्द बोलो और परमेश्वर के सामने निर्लज्जता से डींग हाँको? (हाँ।) बेशक, तुम बिलकुल ऐसा ही करोगे! मनुष्य के प्रति शैतान का रवैया उसे यह देखने का मौका देता है कि शैतान का स्वभाव और सार परमेश्वर से पूर्णतः अलग है। शैतान के सार की वह कौन-सी बात है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है? (शैतान की दुष्टता।) शैतान का दुष्ट स्वभाव परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। अधिकतर लोगों द्वारा परमेश्वर के इस प्रकटीकरण और परमेश्वर की पवित्रता के इस सार को न पहचान पाने का कारण यह है कि वे शैतान के प्रभुत्व के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के अंतर्गत और शैतान के जीवन जीने के दायरे के भीतर रहते हैं। वे नहीं जानते कि पवित्रता क्या है या पवित्रता को कैसे परिभाषित किया जाए। यहाँ तक कि परमेश्वर की पवित्रता को समझ लेने के बाद भी तुम किसी निश्चय के साथ उसे परमेश्वर की पवित्रता के रूप में इसे परिभाषित नहीं कर सकते। यह परमेश्वर की पवित्रता के संबंध में मनुष्य के ज्ञान की विषमता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

फुटनोट:

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 142

कौन-सा प्रतिनिधि लक्षण मनुष्य पर शैतान के कार्य को चिह्नित करता है? तुम लोगों को अपने खुद के अनुभवों के माध्यम से इसे जानने में समर्थ होना चाहिए—यह शैतान का सबसे प्रतिनिधि लक्षण है, वह चीज़ जिसे वह सबसे ज्यादा करता है, वह चीज़ जिसे वह हर एक व्यक्ति के साथ करने की कोशिश करता है। शायद तुम लोग इस लक्षण को नहीं देख पाते, इसलिए तुम यह महसूस नहीं करते कि शैतान कितना भयावह और घृणित है। क्या कोई जानता है कि वह लक्षण क्या है? (वह जो कुछ भी करता है, मनुष्य को नुकसान पहुँचाने के लिए करता है।) वह मनुष्य को कैसे नुकसान पहुँचाता है? क्या तुम लोग मुझे और अधिक विशेष रूप से और विस्तार से बता सकते हो? (वह मनुष्य को बहकाता, फुसलाता और ललचाता है।) यह सही है; ये विभिन्न तरीके हैं, जिनमें वह लक्षण प्रकट होता है। शैतान मनुष्य को भ्रमित भी करता है, उस पर हमला भी करता है और आरोप भी लगाता है—ये सब अभिव्यक्तियाँ हैं। और कुछ? (वह झूठ बोलता है।) धोखा देना और झूठ बोलना शैतान को सबसे ज्यादा स्वाभाविक रूप से आते हैं। वह ऐसा इतनी बार करता है कि झूठ उसके मुँह से इस तरह निकलता है कि इसके लिए उसे सोचने की भी जरूरत नहीं पड़ती। और कुछ? (वह कलह के बीज बोता है।) यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। अब मैं तुम लोगों को एक ऐसी बात बताऊँगा, जो तुम्हारे रोंगटे खड़े कर देगी, लेकिन मैं ऐसा तुम लोगों को डराने के लिए नहीं कर रहा। परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है और उसे अपने दृष्टिकोण और हृदय दोनों में पोषित करता है। इसके विपरीत, क्या शैतान मनुष्य को पोषित करता है? नहीं, वह मनुष्य को पोषित नहीं करता। उलटे वह मनुष्य को हानि पहुँचाने के बारे में सोचने में बहुत समय बिताता है। क्या ऐसा नहीं है? जब वह मनुष्य को हानि पहुँचाने के बारे में सोच रहा होता है, तो क्या उसकी मनस्थिति अत्यावश्यकता की होती है? (हाँ।) तो जहाँ तक मनुष्य पर शैतान के कार्य का संबंध है, तो मेरे पास दो वाक्यांश हैं, जो शैतान की दुर्भावना और दुष्ट प्रकृति की व्याख्या अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिससे सच में तुम लोग शैतान की घृणा को जान सकते हो : मनुष्य के प्रति अपने नज़रिये में शैतान हमेशा हर मनुष्य पर इस सीमा तक बलपूर्वक कब्ज़ा करना और उस पर काबू करना चाहता है, जहाँ वह मनुष्य पर पूरा नियंत्रण हासिल कर ले और उसे कष्टप्रद तरीके से नुकसान पहुँचाए, ताकि वह अपना उद्देश्य और वहशी महत्वाकांक्षा पूरी कर सके। "बलपूर्वक कब्जा" करने का क्या अर्थ है? क्या यह तुम्हारी सहमति से होता है, या बिना तुम्हारी सहमति के? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या बिना तुम्हारी जानकारी के? उत्तर है कि यह पूरी तरह से बिना तुम्हारी जानकारी के होता है! यह ऐसी स्थितियों में होता है, जब तुम अनजान रहते हो, संभवतः उसके तुमसे बिना कुछ कहे या तुम्हारे साथ बिना कुछ किए, बिना किसी प्रस्तावना के, बिना प्रसंग के—शैतान वहाँ होता है, तुम्हारे इर्द-गिर्द, तुम्हें घेरे हुए। वह तुम्हारा शोषण करने के लिए एक अवसर तलाशता है और फिर बलपूर्वक तुम पर कब्ज़ा कर लेता है, तुम पर काबू कर लेता है और तुम पर पूरा नियंत्रण प्राप्त करने और तुम्हें नुकसान पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल कर लेता है। मानव-जाति को परमेश्वर से छीनने की लड़ाई में शैतान का यह एक सबसे विशिष्ट इरादा और व्यवहार है। इसे सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? (हम दिल में आतंकित और भयभीत महसूस करते हैं।) क्या तुम लोग घृणा महसूस करते हो? (हाँ।) जब तुम लोग घृणा महसूस करते हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि शैतान निर्लज्ज है? जब तुम्हें लगता है कि शैतान निर्लज्ज है, तो क्या तुम अपने आसपास के उन लोगों के प्रति घृणा महसूस करते हो. जो हमेशा तुम्हें नियंत्रित करना चाहते हैं, जो हैसियत और रुचियों के लिए प्रचंड महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने और उसे काबू में करने के लिए कौन-से तरीके इस्तेमाल करता है? क्या तुम लोग इस बारे में स्पष्ट हो? जब तुम लोग ये दो शब्द "बलपूर्वक कब्ज़ा" और "काबू" सुनते हो, तो तुम घृणा महसूस करते हो और तुम्हें इन शब्दों के बारे में बुरा एहसास हो सकता है बिना तुम्हारी सहमति या जानकारी के शैतान तुम पर कब्ज़ा करता है, तुम्हें काबू में करता है और भ्रष्ट करता है। तुम्हें अपने हृदय में क्या महसूस होता है? क्या तुम्हें घृणा और नाराजगी का अनुभव होता है? (हाँ।) जब तुम्हें शैतान के इन तरीकों से घृणा और नाराजगी का अनुभव होता है, तो परमेश्वर के लिए किस तरह का एहसास होता है? (कृतज्ञता का।) तुम्हें बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता का। तो अब, इस क्षण, क्या तुम्हारे अंदर यह अभिलाषा या इच्छा है कि परमेश्वर तुम्हें और जो कुछ तुम्हारे पास है, वह सब अपने अधिकार में ले ले और उस पर नियंत्रण करे? (हाँ।) किस संदर्भ में तुम ऐसा उत्तर दे रहे हो? क्या तुम इसलिए "हाँ" कहते हो, क्योंकि तुम्हें शैतान द्वारा खुद पर बलपूर्वक कब्ज़ा किए जाने और काबू में किए जाने का डर है? (हाँ।) तुम्हारी मानसिकता इस तरह की नहीं होनी चाहिए; यह सही नहीं है। डरो मत, क्योंकि परमेश्वर यहाँ है। डरने की कोई बात नहीं है। एक बार जब तुमने शैतान के बुरे सार को समझ लिया है, तो, तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रेम, परमेश्वर के अच्छे इरादों, मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और उसकी सहिष्णुता तथा उसके धार्मिक स्वभाव की अधिक सटीक समझ या उन्हें गहराई से सँजोने का भाव होना चाहिए। शैतान इतना घृणित है, फिर भी यदि यह अभी भी परमेश्वर के संबंध में तुम्हारे प्रेम और परमेश्वर पर तुम्हारी निर्भरता और परमेश्वर में तुम्हारे भरोसे को प्रेरित नहीं करता, तो तुम किस प्रकार के व्यक्ति हो? क्या तुम इस प्रकार शैतान द्वारा खुद को नुकसान पहुँचाए जाने के इच्छुक हो? शैतान की दुष्टता और भयंकरता को देखने के बाद हम पलटते हैं और तब परमेश्वर को देखते हैं। क्या परमेश्वर के संबंध में तुम्हारी जानकारी में कुछ बदलाव आया है? क्या हम कह सकते हैं परमेश्वर पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर दोष-रहित है? "परमेश्वर अद्वितीय पवित्रता है"—क्या परमेश्वर इस उपाधि पर खरा उतरता है? (हाँ।) तो इस संसार में और सब चीजों के मध्य, क्या केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य की परमेश्वर की इस समझ पर खरा नहीं उतरता? क्या कोई और है? (नहीं।) तो परमेश्वर मनुष्य को वास्तव में क्या देता है? क्या वह केवल तुम्हारे जाने बिना ही तुम्हें थोड़ी देखभाल, परवाह और ध्यान देता है? परमेश्वर ने मनुष्य को क्या दिया है? परमेश्वर ने मनुष्य को जीवन दिया है, और उसने मनुष्य को सब-कुछ दिया है, और वह मनुष्य को यह सब बिना किसी शर्त के, बिना कोई चीज़ माँगे, बिना किसी गूढ़ प्रयोजन के प्रदान करता है। वह मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए सत्य, अपने वचनों और अपने जीवन का प्रयोग करते हुए मनुष्य को शैतान के नुकसान से दूर ले जाता है, शैतान के प्रलोभन और बहकावे से दूर ले जाता है और वह मनुष्य को शैतान का दुष्ट स्वभाव और उसका भयंकर चेहरा दिखाता है। क्या मानव-जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और चिंता सच्ची है? क्या तुम सभी लोग इसे अनुभव कर सकते हो? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 143

पीछे मुड़कर अपने अब तक के जीवन में उन सब कार्यों को देखो, जिन्हें परमेश्वर ने तुम्हारे विश्वास के इन सभी वर्षों में किया है। यह तुम्हारे भीतर गहरी या उथली कैसी भी भावनाएँ उभारे, पर क्या यह चीज़ तुम्हारे लिए सर्वाधिक आवश्यक नहीं थी? क्या यह वह चीज़ नहीं थी, जिसे प्राप्त करना तुम्हारे लिए सबसे जरूरी था? (हाँ।) क्या यह सत्य नहीं है? क्या यह जीवन नहीं है? (हाँ।) क्या कभी परमेश्वर ने तुम्हें प्रबोधन दिया और फिर तुमसे, जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके बदले में कोई चीज़ देने के लिए कहा? (नहीं।) तो परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? क्या परमेश्वर का उद्देश्य तुम पर कब्ज़ा करना है? (नहीं।) क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदय में अपने सिंहासन पर चढ़ना चाहता है? (हाँ।) तो परमेश्वर द्वारा अपने सिंहासन पर चढ़ने और शैतान द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा करने में क्या अंतर है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय को पाना चाहता है, वह मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करना चाहता है—इसका क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह है कि परमेश्वर मनुष्य को अपनी कठपुतली, अपनी मशीन बनाना चाहता है? (नहीं।) तो परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? क्या परमेश्वर द्वारा मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करने की इच्छा करने और शैतान द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा और काबू करने में कोई अंतर है? (हाँ।) क्या अंतर है? क्या तुम लोग मुझे स्पष्ट रूप से बता सकते हो? (शैतान इसे बल के माध्यम से करता है जबकि परमेश्वर मनुष्य को स्वेच्छा से करने देता है)। क्या यही अंतर है? तुम्हारे हृदय का परमेश्वर के लिए क्या उपयोग है? और तुम पर कब्ज़ा करने का परमेश्वर के लिए क्या उपयोग है? तुम लोग अपने दिल में "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है" से क्या समझते हो? हमें यहाँ परमेश्वर के बारे में बात करने में ईमानदार होना चाहिए, वरना लोग हमेशा ग़लत समझेंगे और सोचेंगे कि : "परमेश्वर हमेशा मुझ पर कब्ज़ा करना चाहता है। वह मुझ पर कब्ज़ा क्यों करना चाहता है? मैं नहीं चाहता कि कोई मुझ पर कब्ज़ा करे, मैं बस अपना मालिक आप रहना चाहता हूँ। तुम कहते हो, शैतान लोगों पर कब्ज़ा करता है, किंतु परमेश्वर भी तो लोगों पर कब्ज़ा करता है। क्या ये दोनों चीज़ें एक जैसी नहीं हैं? मैं किसी को भी खुद पर कब्ज़ा नहीं करने देना चाहता। मैं, मैं हूँ।" यहाँ अंतर क्या है? इस पर ज़रा सोचो। मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, कि क्या "परमेश्वर मनुष्य पर कब्ज़ा करता है" एक खोखला वाक्यांश है? क्या परमेश्वर के मनुष्य पर कब्ज़े का अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में रहता है और तुम्हारे प्रत्येक शब्द और प्रत्येक गतिविधि को नियंत्रित करता है? यदि वह तुमसे बैठने के लिए कहता है, तो क्या तुम खड़े होने की हिम्मत नहीं कर सकते? यदि वह तुमसे पूर्व दिशा में जाने के लिए कहता है, तो क्या तुम पश्चिम दिशा में जाने की हिम्मत नहीं कर सकते? क्या यह कब्ज़ा कुछ ऐसा ही अर्थ रखता है? (नहीं, ऐसा नहीं है। परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर की सत्ता और अस्तित्व में जिए।) वर्षों से परमेश्वर द्वारा किए गए गए मनुष्य के प्रबंध में, और इस अंतिम चरण में अब तक मनुष्य पर किए गए उसके कार्य में, उसके द्वारा बोले गए समस्त वचनों का मनुष्य पर क्या वांछित प्रभाव रहा है? क्या मनुष्य परमेश्वर की सत्ता और अस्तित्व में जीता है? "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है" के शाब्दिक अर्थ को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को लेता है और उस पर कब्ज़ा कर लेता है, उसमें रहता है और फिर बाहर नहीं आता; वह मनुष्य के हृदय का स्वामी बन जाता है और उस पर हावी होकर मनमरजी से उसमें फेरबदल कर देता है, ताकि मनुष्य वही करे, जो परमेश्वर उसे करने के लिए कहे। इस अर्थ में ऐसा प्रतीत होता है, मानो हर व्यक्ति परमेश्वर बन सकता है और उसके सार और स्वभाव को धारण कर सकता है। तो क्या इस स्थिति में मनुष्य भी परमेश्वर के कार्यों को अंजाम दे सकता है? क्या "कब्ज़े" को इस तरीके से समझाया जा सकता है? (नहीं।) तो फिर यह क्या है? मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : क्या वे सारे वचन और सत्य, जिनकी परमेश्वर मनुष्य को आपूर्ति करता है, परमेश्वर के सार और उसकी सत्ता तथा अस्तित्व के प्रकटीकरण हैं? (हाँ।) यह निश्चित रूप से सच है। किंतु क्या यह अनिवार्य है कि परमेश्वर खुद भी उन सभी वचनों का अभ्यास करे और उन्हें धारण करे, जिनकी वह मनुष्य को आपूर्ति करता है? इस पर थोड़ा विचार करो। जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है, तो वह किस कारण से ऐसा करता है? ये वचन कैसे अस्तित्व में आए? इन वचनों की विषय-वस्तु क्या होती है, जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करते समय इन्हें बोलता है? वे किस पर आधारित होते हैं? क्या वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित होते हैं? (हाँ।) तो क्या परमेश्वर द्वारा मनुष्य के न्याय से हासिल होने वाला प्रभाव परमेश्वर के सार पर आधारित होता है? (हाँ।) तो क्या परमेश्वर द्वारा "मनुष्य पर कब्ज़ा करना" एक खोखला वाक्यांश है? निश्चित रूप से ऐसा नहीं है। तो परमेश्वर मनुष्य से ये वचन क्यों कहता है? इन वचनों को कहने का उसका क्या उद्देश्य है? क्या वह मनुष्य के जीवन के लिए इन वचनों का उपयोग करना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर इन वचनों में कहे अपने समस्त सत्य का उपयोग मनुष्य के जीवन के लिए करना चाहता है। जब मनुष्य इस समस्त सत्य और परमेश्वर के वचन को लेकर उन्हें अपने जीवन में रूपांतरित करता है, तब क्या मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मान सकता है? तब क्या मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है? तब क्या मनुष्य बुराई से दूर रह सकता है? जब मनुष्य इस बिंदु पर पहुँच जाता है, तब क्या वह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था को मान सकता है? तब क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की स्थिति में होता है? जब अय्यूब या पतरस जैसे लोग अपने मार्ग के अंतिम छोर पर पहुँच जाते हैं, जब यह माना जाता है कि उनका जीवन परिपक्व हो चुका है, जब उनके पास परमेश्वर की वास्तविक समझ होती है—तो क्या शैतान उन्हें तब भी भटका सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी कब्ज़ा कर सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी बलपूर्वक काबू कर सकता है? (नहीं।) तो यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या यह कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। (हाँ।) अर्थ के इस स्तर पर तुम लोग ऐसे व्यक्ति को किस प्रकार देखते हो, जिसे परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है? परमेश्वर के दृष्टिकोण से, इन परिस्थितियों के अंतर्गत वह इस व्यक्ति के हृदय पर पहले ही कब्ज़ा कर चुका है। किंतु यह व्यक्ति कैसा महसूस करता है? क्या परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मार्ग मनुष्य के भीतर उसका जीवन बन जाता है, फिर यह जीवन मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व पर काबिज़ हो जाता है और फिर यह उसके जीवन और उसके सार को ऐसा बना देता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है? क्या परमेश्वर के दृष्टिकोण से इस क्षण मनुष्य के हृदय पर उसके द्वारा कब्ज़ा कर लिया जाता है? (हाँ।) अब तुम लोग इस स्तर के अर्थ को कैसा समझते हो? क्या यह परमेश्वर का आत्मा है, जो तुम पर कब्ज़ा करता है? (नहीं, वह परमेश्वर का वचन है, जो हम पर कब्ज़ा करता है।) यह परमेश्वर का मार्ग और परमेश्वर का वचन है, जो तुम्हारा जीवन बन गए हैं, और यह सत्य है, जो तुम्हारा जीवन बन गया है। इस समय मनुष्य के पास वह जीवन होता है, जो परमेश्वर से आता है, किंतु हम यह नहीं कह सकते कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है। दूसरे शब्दों में, हम यह नहीं कह सकते कि मनुष्य द्वारा परमेश्वर के वचन से प्राप्त किया जाने वाला जीवन परमेश्वर का जीवन है। अतः चाहे मनुष्य कितने ही लंबे समय तक परमेश्वर का अनुसरण कर ले, चाहे मनुष्य परमेश्वर से कितने ही वचन प्राप्त कर ले, मनुष्य कभी परमेश्वर नहीं बन सकता। यहाँ तक कि यदि परमेश्वर किसी दिन यह कहे, "मैंने तेरे हृदय पर कब्ज़ा कर लिया है, अब तू मेरे जीवन को धारण करता है," तो क्या तुम्हें यह लगेगा कि तुम परमेश्वर हो? (नहीं।) तब तुम क्या बन जाओगे? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं होगी? क्या तुम्हारा हृदय उस जीवन से नहीं भर जाएगा, जिसे परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है? यह इस बात की एक सामान्य अभिव्यक्ति होगी कि जब परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर कब्ज़ा करता है, तो क्या होता है। यह तथ्य है। तो इसे इस पहलू से देखने पर, क्या मनुष्य परमेश्वर बन सकता है? जब मनुष्य परमेश्वर के सारे वचनों को प्राप्त कर लेता है, जब मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर हो जाता है, तो क्या मनुष्य परमेश्वर की पहचान और सार धारण कर सकता है? (नहीं।) चाहे कुछ भी हो जाए, सब-कुछ कहे और किए जाने के बाद, मनुष्य अभी भी मनुष्य ही रहता है। तुम सृष्टि के एक प्राणी हो; जब तुम परमेश्वर से उसका मार्ग प्राप्त कर लेते हो, तो तुम केवल उस जीवन को धारण करते हो, जो परमेश्वर के वचन से आता है, और तुम कभी परमेश्वर नहीं बन सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 144

शैतान का प्रलोभन

मत्ती 4:1-4 तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उस से कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" यीशु ने उत्तर दिया: "लिखा है, 'मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।'"

ये वे वचन हैं, जिनसे शैतान ने पहली बार प्रभु यीशु को प्रलोभित करने का प्रयास किया था। इब्लीस ने जो कहा था, उसकी विषयवस्तु क्या है? ("अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।") इब्लीस द्वारा कहे गए ये शब्द काफी साधारण हैं, किंतु क्या इनके सार के साथ कोई समस्या है? इब्लीस ने कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है," लेकिन अपने दिल में क्या वह जानता था या नहीं कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है? क्या वह जानता था या नहीं कि वह मसीह है? (वह जानता था।) तो उसने ऐसा क्यों कहा "अगर तू है"? (वह परमेश्वर को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था।) किंतु ऐसा करने में उसका उद्देश्य क्या था? उसने कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है।" अपने दिल में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, यह उसके दिल में बहुत स्पष्ट था, किंतु यह जानने के बावजूद, क्या उसने उसके सामने समर्पण किया या उसकी आराधना की? (नहीं।) वह क्या करना चाहता था? वह मसीह को क्रोध दिलाने और फिर अपने इरादों के अनुसार कार्य करवाने में प्रभु यीशु को मूर्ख बनाने के लिए इस पद्धति और इन वचनों का उपयोग करना चाहता था। क्या इब्लीस के शब्दों के पीछे यही अर्थ नहीं था? अपने दिल में शैतान स्पष्ट रूप से जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, किंतु उसने फिर भी ये शब्द कहे। क्या यह शैतान की प्रकृति नहीं है? शैतान की प्रकृति क्या है? (धूर्त, दुष्ट होना और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना।) परमेश्वर के प्रति उसकी कोई श्रद्धा नहीं होने का क्या परिणाम होगा। क्या वह परमेश्वर पर हमला नहीं करना चाहता था? वह इस पद्धति का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और इसलिए उसने कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ"; क्या यह शैतान की बुरी नीयत नहीं है? वह वास्तव में क्या करने का प्रयास कर रहा था? उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है : वह इस पद्धति का उपयोग प्रभु यीशु मसीह के पद और पहचान को नकारने के लिए करने की कोशिश कर रहा था। उन शब्दों से शैतान का आशय यह था कि, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे। अगर तू ऐसा नहीं कर सकता, तो तू परमेश्वर का पुत्र नहीं है, इसलिए तुझे अपना काम अब और नहीं करना चाहिए।" क्या ऐसा नहीं है? वह इस पद्धति का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और वह परमेश्वर के काम को खंडित और नष्ट करना चाहता था; यह शैतान का द्वेष है। उसका द्वेष उसकी प्रकृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यद्यपि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र, स्वयं परमेश्वर का ही देहधारण है, फिर भी वह परमेश्वर का पीछा करते हुए, उस पर लगातार आक्रमण करते हुए और उसके कार्य को अस्तव्यस्त और नष्ट करने का भरसक प्रयास करते हुए इस प्रकार का काम करने से बाज नहीं आता।

अब, आओ शैतान द्वारा बोले गए इस वाक्यांश का विश्लेषण करें : "तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" पत्थरों को रोटी में बदलना—क्या इसका कुछ अर्थ है? अगर वहाँ भोजन है, तो क्यों न उसे खाया जाए? पत्थरों को भोजन में बदलना क्यों आवश्यक है? क्या यह कहा जा सकता है कि यहाँ कोई अर्थ नहीं है? यद्यपि वह उस समय उपवास कर रहा था, फिर भी निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? (उसके पास भोजन था।) तो हम यहाँ शैतान के शब्दों की असंगति देख सकते हैं। शैतान की सारी दुष्टता और कपट के बावजूद हम उसकी असंगति और बेतुकापन देख सकते हैं। शैतान बहुत सारी चीज़ें करता है, जिसके माध्यम से तुम उसकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को देख सकते हो; तुम उसे वैसी चीज़ें करते देख सकते हो, जो परमेश्वर के कार्य को खंडित करती हैं, और यह देखकर तुम अनुभव करते हो कि वह घृणित और कुपित करने वाला है। किंतु दूसरी ओर, क्या तुम उसके शब्दों और कार्यों के पीछे एक बचकानी और बेहूदी प्रकृति नहीं देखते? यह शैतान की प्रकृति के बारे में एक प्रकाशन है; चूँकि उसकी ऐसी प्रकृति है, इसलिए वह ऐसे ही काम करेगा। आज लोगों के लिए शैतान के ये शब्द असंगत और हास्यास्पद हैं। किंतु शैतान बेशक ऐसे शब्द कहने में सक्षम है। क्या हम कह सकते हैं कि वह अज्ञानी और बेतुका है? शैतान की दुष्टता हर जगह है और लगातार प्रकट हो रही है। और प्रभु यीशु ने उसे कैसे उत्तर दिया? ("मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।") क्या इन वचनों में कोई सामर्थ्य है? (उनमें सामर्थ्य है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? वह इसलिए, क्योंकि ये वचन सत्य हैं। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और रात उपवास किया। क्या वह भूख से मर गया? (नहीं।) वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास गया और उसे इस तरह की बातें कहते हुए पत्थरों को भोजन में बदलने के लिए उकसाया : "अगर तू पत्थरों को खाने में बदल देगा, तो क्या तब तेरे पास खाने की चीज़ें नहीं होंगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा!" किंतु प्रभु यीशु ने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहेगा," जिसका अर्थ है कि, यद्यपि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, किंतु उसका भौतिक शरीर भोजन से नहीं, बल्कि परमेश्वर के मुख से निकले प्रत्येक वचन से जीवित रहता और साँस लेता है। एक ओर, ये वचन सत्य हैं; ये विश्वास देते हैं, उन्हें यह महसूस कराते हैं कि वे परमेश्वर पर निर्भर रह सकते हैं और कि वह सत्य है। दूसरी ओर, क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक पहलू है? क्या प्रभु यीशु चालीस दिन और रात उपवास करने के बाद भी खड़ा नहीं था, जीवित नहीं था? क्या यह एक वास्तविक उदाहरण नहीं है? उसने चालीस दिन और रात कोई भोजन नहीं किया था, और वह फिर भी ज़िंदा था। यह सशक्त गवाही है, जो उसके वचनों की सच्चाई की पुष्टि करती है। ये वचन सरल है, किंतु प्रभु यीशु के लिए, क्या उसने इन्हें केवल तभी बोला जब शैतान ने उसे प्रलोभित किया, अथवा क्या ये पहले से ही प्राकृतिक रूप से उसका एक हिस्सा थे? इसे दूसरी तरह से कहें तो, परमेश्वर सत्य है, और परमेश्वर जीवन है, लेकिन क्या परमेश्वर का सत्य और जीवन बाद के जोड़ थे? क्या वे बाद के अनुभव से उत्पन्न हुए थे? नहीं—वे परमेश्वर में जन्मजात थे। कहने का तात्पर्य यह है कि सत्य और जीवन परमेश्वर के सार हैं। उस पर चाहे जो भी बीते, वह सब सत्य ही प्रकट करता है। यह सत्य, ये वचन—चाहे उसकी वाणी की अंतर्वस्तु लंबी हो या छोटी—वे मनुष्य को जीने में सक्षम बना सकते हैं और उसे जीवन दे सकते हैं; वे लोगों को मानव-जीवन के मार्ग के बारे में सत्य और स्पष्टता हासिल करने में सक्षम बना सकते हैं, और उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने में सक्षम बना सकते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा इन वचनों के प्रयोग का स्रोत सकारात्मक है। तो क्या हम कह सकते हैं कि यह सकारात्मक चीज़ पवित्र है? (हाँ।) शैतान के वे शब्द शैतान की प्रकृति से आते हैं। शैतान हर जगह लगातार अपनी दुष्ट और द्वेषपूर्ण प्रकृति प्रकट करता रहता है। अब, क्या शैतान ये प्रकाशन स्वाभाविक रूप से करता है? क्या कोई उसे ऐसा करने का निर्देश देता है? क्या कोई उसकी सहायता करता है? क्या कोई उसे विवश करता है? (नहीं।) ये सब प्रकाशन वह स्वत: करता है। यह शैतान की दुष्ट प्रकृति है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है और जैसे भी करता है, शैतान उसके पीछे-पीछे चलता है। शैतान द्वारा कही और की जाने वाली इन चीज़ों का सार और उनकी वास्तविक प्रकृति शैतान का सार है—ऐसा सार, जो दुष्ट और द्वेषपूर्ण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 145

मत्ती 4:5-7 तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है: 'वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।'" यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'"

आओ, पहले शैतान द्वारा यहाँ कहे गए शब्दों को देखें। शैतान ने कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे," और तब उसने धर्मग्रंथों से उद्धृत किया, "वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।" शैतान के शब्द सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने, असंगत और और घृणास्पद हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? शैतान अकसर मूर्खतापूर्ण बातें करता रहता है, और वह स्वयं को बहुत चतुर मानता है। वह प्रायः धर्मग्रंथों के उद्धरण—यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन भी—उद्धृत करता है—वह परमेश्वर पर आक्रमण करने और उसे प्रलोभित करने के लिए इन वचनों का उपयोग परमेश्वर के विरुद्ध करने का प्रयास करता है, ताकि उसकी कार्य-योजना को खंडित करने का अपना उद्देश्य पूरा कर सके। क्या तुम शैतान द्वारा कहे गए इन शब्दों में कुछ देख पाते हो? (शैतान बुरे इरादे रखता है।) शैतान ने अपने समस्त कार्यों में हमेशा मानवजाति को प्रलोभित करने की कोशिश की है। वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, बल्कि प्रलोभन, छल और फरेब का उपयोग करते हुए गोल-मोल तरीके से बोलता है। शैतान परमेश्वर को भी प्रलोभन देने की कोशिश करता है, मानो वह कोई साधारण मनुष्य हो, और वह यह मानता है कि परमेश्वर भी मनुष्य की ही तरह अज्ञानी, मूर्ख और चीज़ों के सही रूप को स्पष्ट रूप से पहचानने में असमर्थ है। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य समान रूप से उसके सार, उसकी चालाकी और उसके कुटिल इरादे को आर-पार देख पाने में असमर्थ हैं। क्या यह शैतान की मूर्खता नहीं है? इतना ही नहीं, शैतान खुल्लम-खुल्ला धर्मग्रंथों को उद्धृत करता है, और यह विश्वास करता है कि ऐसा करने से उसे विश्वसनीयता मिलती है, और तुम उसके शब्दों में कोई गलती नहीं पकड़ पाओगे या मूर्ख बनाए जाने से नहीं बच पाओगे। क्या यह शैतान की मूर्खता और बचकानापन नहीं है? यह ठीक वैसा ही है, जैसा जब लोग सुसमाचार को फैलाते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं : तो क्या अविश्वासी कुछ ऐसा ही नहीं कहते, जैसा शैतान ने कहा था? क्या तुम लोगों ने लोगों को वैसा ही कुछ कहते हुए सुना है? ऐसी बातें सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम घृणा महसूस करते हो? (हाँ।) जब तुम घृणा महसूस करते हो, तो क्या तुम अरुचि और विरक्ति भी महसूस करते हो? जब तुम्हारे भीतर ऐसी भावनाएँ होती हैं, तो क्या तुम यह पहचान पाते हो कि शैतान और मनुष्य के भीतर काम करने वाला उसका स्वभाव दुष्ट हैं? क्या अपने दिलों में तुमने कभी ऐसा महसूस किया है : "जब शैतान बोलता है, तो वह ऐसा हमले और प्रलोभन के रूप में करता है; शैतान के शब्द बेतुके, हास्यास्पद, बचकाने और घृणास्पद होते हैं; लेकिन परमेश्वर कभी इस तरह से नहीं बोलता या कार्य करता और वास्तव में उसने कभी ऐसा नहीं किया है"? निस्संदेह, इस स्थिति में लोग इसे बहुत कम समझ पाते हैं और परमेश्वर की पवित्रता को समझने में असमर्थ रहते हैं। क्या ऐसा नहीं है? अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के साथ तुम लोग मात्र यही महसूस करते हो : "परमेश्वर जो कुछ भी कहता कहता है, सच कहता है, वह हमारे लिए लाभदायक है, और हमें उसे स्वीकार करना चाहिए।" चाहे तुम इसे स्वीकार करने में सक्षम हो या नहीं, बिना अपवाद के तुम कहते हो कि परमेश्वर का वचन सत्य है और यह कि परमेश्वर सत्य है, किंतु तुम यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है।

तो शैतान के इन शब्दों पर यीशु की क्या प्रतिक्रिया थी? यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'" क्या यीशु द्वारा कहे गए इन वचनों में सत्य है? (हाँ।) इनमें सत्य है। ऊपरी तौर पर ये वचन लोगों द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए एक आज्ञा हैं, एक सरल वाक्यांश, परंतु फिर भी, मनुष्य और शैतान दोनों ने अकसर इन शब्दों का उल्लंघन किया है। तो, प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर," क्योंकि शैतान ने प्रायः ऐसा किया था और इसके लिए पूरा प्रयास किया था। यह कहा जा सकता है कि शैतान ने बेशर्मी और ढिठाई से ऐसा किया था। परमेश्वर से न डरना और अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना यह शैतान की अनिवार्य प्रकृति है। यहाँ तक कि जब शैतान परमेश्वर के पास खड़ा था और उसे देख सकता था, तब भी वह परमेश्वर को प्रलोभन देने से बाज़ नहीं आया। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।" ये वे वचन हैं, जो परमेश्वर ने शैतान से प्रायः कहे हैं। तो क्या इस वाक्यांश को वर्तमान समय में लागू किया जाना उपयुक्त है? (हाँ, क्योंकि हम भी अकसर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं।) लोग अकसर परमेश्वर को प्रलोभन क्यों देते हैं? क्या इसका कारण यह है कि लोग भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से भरे हुए हैं? (हाँ।) तो क्या शैतान के उपर्युक्त शब्द ऐसे हैं, जिन्हें लोग प्रायः कहते हैं? और किन परिस्थितियों में? कोई यह कह सकता है कि लोग समय और स्थान की परवाह किए बिना ऐसा कहते आ रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से अलग नहीं है। प्रभु यीशु ने कुछ सरल वचन कहे; वचन, जो सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं; वचन, जिनकी लोगों को आवश्यकता है। लेकिन इस स्थिति में क्या प्रभु यीशु इस तरह बोल रहा था, जैसे शैतान से बहस कर रहा हो? क्या जो कुछ उसने शैतान से कहा, उसमें टकराव की कोई बात थी? (नहीं।) प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन के संबंध में अपने दिल में कैसा महसूस किया? क्या उसने तिरस्कार और घृणा महसूस की? (हाँ।) प्रभु यीशु ने तिरस्कार और घृणा महसूस की, फिर भी उसने शैतान से बहस नहीं की, किन्हीं महान सिद्धांतों के बारे में तो उसने बिलकुल भी बात नहीं की। ऐसा क्यों है? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है; वह कभी बदल नहीं सकता।) क्या यह कहा जा सकता है कि शैतान विवेकहीन है? (हाँ।) क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और कभी स्वीकार नहीं करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसकी प्रकृति है। शैतान के स्वभाव का एक और पहलू है, जो घृणास्पद है। वह क्या है? प्रभु यीशु को प्रलोभित करने के अपने प्रयासों में, शैतान ने सोचा कि भले ही वह असफल हो गया हो, फिर भी वह ऐसा करने का प्रयास करेगा। भले ही उसे दंडित किया जाएगा, फिर भी उसने किसी न किसी प्रकार से कोशिश करने का चयन किया। भले ही ऐसा करने से कुछ लाभ नहीं होगा, फिर भी वह कोशिश करेगा, और अपने प्रयासों में दृढ़ रहते हुए बिलकुल अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा रहेगा। यह किस तरह की प्रकृति है? क्या यह दुष्टता नहीं है? अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर के नाम का उल्लेख किए जाने पर कुपित हो जाता है और क्रोध से फनफना उठता है, क्या उसने परमेश्वर को देखा है? क्या वह जानता है, परमेश्वर कौन है? वह नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करता और परमेश्वर ने उससे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उसे कभी परेशान नहीं किया है, तो फिर वह गुस्सा क्यों होता है? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति दुष्ट है? दुनिया के रुझान, भोजन करना, पीना और सुख की खोज, और मशहूर हस्तियाँ का पीछा करना—इनमें से कोई भी चीज़ उन्हें परेशान नहीं करेगी। हालाँकि "परमेश्वर" शब्द के उल्लेख मात्र, अथवा परमेश्वर के वचनों के सत्य पर ही वह आक्रोश से भर जाता है। क्या यह दुष्ट प्रकृति होने का गठन नहीं करती है? यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि इस मनुष्य की प्रकृति दुष्ट है। अब, तुम लोगों की बात करें, क्या ऐसे अवसर आए हैं, जब सत्य का उल्लेख होता है या परमेश्वर द्वारा मानवजाति के परीक्षणों अथवा मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय का उल्लेख किया जाता है, और तुम अरुचि महसूस करते हो; तिरस्कार महसूस करते हो, और ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते? तुम मन में सोचते हो : "क्या सभी लोग नहीं कहते कि परमेश्वर सत्य है? इनमें से कुछ शब्द सत्य नहीं हैं! ये स्पष्ट रूप से सिर्फ परमेश्वर द्वारा मनुष्य की भर्त्सना के वचन हैं!" कुछ लोग अपने दिलों में अरुचि भी महसूस कर सकते हैं और सोच सकते हैं : "यह हर दिन बोला जाता है—उसके परीक्षण, उसका न्याय, यह कब ख़त्म होगा? हमें अच्छी मंज़िल कब मिलेगी?" पता नहीं, यह अनुचित क्रोध कहाँ से आता है। यह किस प्रकार की प्रकृति है? (दुष्ट प्रकृति।) यह शैतान की दुष्ट प्रकृति से निर्देशित और मार्गदर्शित होती है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, शैतान की दुष्ट प्रकृति और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के संबंध में वह कभी बहस नहीं करता या लोगों के प्रति द्वेष नहीं रखता, और जब मनुष्य मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं, तो वह कभी बात का बतंगड़ नहीं बनाता। तुम परमेश्वर को चीज़ों के संबंध में मनुष्यों जैसे विचार रखते नहीं देखोगे, और इतना ही नहीं, उसे तुम चीज़ों को सँभालने के लिए मनुष्य के दृष्टिकोणों, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन या कल्पना का उपयोग करते हुए नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है, वह सत्य से जुड़ा है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य किसी आधारहीन कल्पना की उपज नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने सार और अपने जीवन के आधार पर व्यक्त किए जाते हैं। चूँकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज़ का सार सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है, वह लोगों के लिए जीवन-शक्ति और प्रकाश लाती है; वह लोगों को सकारात्मक चीजें और उन सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता देखने में सक्षम बनाती है, और मनुष्यों को राह दिखाती है, ताकि वे सही मार्ग पर चलें। ये सब चीज़ें परमेश्वर के सार और उसकी पवित्रता के सार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 146

मत्ती 4:8-11 फिर इब्लीस उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" तब यीशु ने उससे कहा, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है: तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान इब्लीस ने अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद एक और कोशिश की : उसने प्रभु यीशु को दुनिया के समस्त राज्य और उनका वैभव दिखाया और उससे अपनी आराधना करने के लिए कहा। इस स्थिति से तुम शैतान के वास्तविक लक्षणों के बारे में क्या देख सकते हो? क्या इब्लीस शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हाँ, है।) वह कैसे बेशर्म है? सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा रची गई थीं, फिर भी शैतान ने पलटकर परमेश्वर को सारी चीज़ें दिखाईं और कहा, "इन सभी राज्यों की संपत्ति और वैभव देख। अगर तू मेरी उपासना करे, तो मैं यह सब तुझे दे दूँगा।" क्या यह पूरी तरह से भूमिका उलटना नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं, पर क्या उसने सारी चीज़ें अपने उपभोग के लिए बनाईं? परमेश्वर ने हर चीज़ मनुष्य को दे दी, लेकिन शैतान उन सबको अपने कब्ज़े में करना चाहता था और उन्हें अपने कब्ज़े में करने के बाद उसने पमेश्वर से कहा, "मेरी आराधना कर! मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूँगा।" यह शैतान का बदसूरत चेहरा है; यह पूर्णतः बेशर्म है? यहाँ तक कि शैतान "शर्म" शब्द का मतलब भी नहीं जानता। यह उसकी दुष्टता का सिर्फ एक और उदाहरण है। वह यह भी नहीं जानता कि "शर्म" क्या होती है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं और कि वह सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है और उन पर उसकी प्रभुता है। सारी चीज़ें मनुष्य की नहीं हैं, शैतान की तो बिलकुल भी नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की हैं, और फिर भी इब्लीस शैतान ने ढिठाई से कहा कि वह सारी चीज़ें परमेश्वर को दे देगा। क्या यह शैतान के एक बार फिर बेतुकेपन और बेशर्मी से कार्य करने का एक और उदाहरण नहीं है? यह परमेश्वर के शैतान से और अधिक घृणा करने का कारण बनता है, है न? फिर भी, शैतान ने चाहे जो भी कोशिश की, पर क्या प्रभु यीशु उसके झाँसे में आया? प्रभु यीशु ने क्या कहा? ("तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।") क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक अर्थ है? (हाँ, है।) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की वाणी में उसकी दुष्टता और बेशर्मी देखते हैं। तो अगर मनुष्य शैतान की उपासना करेंगे, तो क्या परिणाम होगा? क्या उन्हें सभी राज्यों का धन और वैभव मिल जाएगा? (नहीं।) उन्हें क्या मिलेगा? क्या मनुष्य शैतान जितने ही बेशर्म और हास्यास्पद बन जाएँगे? (हाँ।) तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए, प्रभु यीशु ने ये वचन कहे, जो हर एक इंसान के लिए महत्वपूर्ण हैं : "तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" इसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर के अलावा, अगर तुम किसी दूसरे की उपासना करते हो, अगर तुम इब्लीस शैतान की उपासना करते हो, तो तुम उसी गंदगी में लोट लगाओगे, जिसमें शैतान लगाता है। तब तुम शैतान की बेशर्मी और उसकी दुष्टता साझा करोगे, और ठीक शैतान की ही तरह तुम परमेश्वर को प्रलोभित करोगे और उस पर हमला करोगे। तब तुम्हारा क्या अंत होगा? परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा, परमेश्वर तुम्हें मार गिराएगा, परमेश्वर तुम्हें नष्ट कर देगा। प्रभु यीशु को कई बार प्रलोभन देने में असफल होने के बाद क्या शैतान ने फिर कोशिश की? शैतान ने फिर कोशिश नहीं की और फिर वह चला गया। इससे क्या साबित होता है? इससे यह साबित होता है कि शैतान की दुष्ट प्रकृति, उसकी दुर्भावना, उसकी बेहूदगी और उसकी असंगतता परमेश्वर के सामने उल्लेख करने योग्य भी नहीं है। प्रभु यीशु ने शैतान को केवल तीन वाक्यों से परास्त कर दिया, जिसके बाद वह दुम दबाकर खिसक गया, और इतना शर्मिंदा हुआ कि चेहरा दिखाने लायक भी नहीं रहा, और उसने फिर कभी प्रभु को प्रलोभन नहीं दिया। चूँकि प्रभु यीशु ने शैतान के इस प्रलोभन को परास्त दिया, इसलिए अब वह आसानी से अपने उस कार्य को जारी रख सकता था, जो उसे करना था और जो कार्य उसके सामने पड़े थे। क्या इस परिस्थिति में जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, अगर उसे वर्तमान समय में प्रयोग में लाया जाए, तो क्या प्रत्येक मनुष्य के लिए उसका कोई व्यावहारिक अर्थ है? (हाँ, है।) किस प्रकार का व्यावहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान बात है? क्या लोगों को शैतान की दुष्ट प्रकृति की स्पष्ट समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हाँ।) जब तुम अपने जीवन में शैतान के प्रलोभनों का अनुभव करते हो, अगर तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति को आर-पार देखने में समर्थ हो, तो क्या तुम उसे हराने में सक्षम नहीं होगे? अगर तुम शैतान की बेहूदगी और असंगतता के बारे में जानते हो, तो क्या फिर भी तुम शैतान के साथ खड़े होगे और परमेश्वर पर हमला करोगे? अगर तुम समझ जाओ कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी तुम्हारे माध्यम से प्रकट होती हैं—अगर तुम इन चीज़ों को स्पष्ट रूप से पहचान और समझ जाओ—तो क्या तुम फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करोगे और उसे प्रलोभित करोगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे।) तुम क्या करोगे? (हम शैतान के विरुद्ध विद्रोह करेंगे और उसका परित्याग कर देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? यह आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए लोगों को लगातार प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें अपने को बार-बार परमेश्वर के सामने रखना चाहिए और स्वयं को जाँचना चाहिए। और उन्हें परमेश्वर के अनुशासन और उसके न्याय तथा ताड़ना को अपने ऊपर आने देना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग धीरे-धीरे अपने आपको शैतान के धोखे और नियंत्रण से मुक्त करेंगे।

अब, शैतान द्वारा बोले गए इन सभी शब्दों को देखकर हम उन चीज़ों को संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे, जो शैतान के सार का निर्माण करती हैं। पहली बात, शैतान के सार को सामान्यतया दुष्टता कहा जा सकता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान का सार दुष्टता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए व्यक्ति को, जो कुछ शैतान लोगों के साथ करता है, उसके परिणामों की जाँच करनी चाहिए। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के तहत काम करता है, और वह शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोगों की दुनिया में रहता है। मानवजाति अनजाने ही शैतान द्वारा अधिकृत और आत्मसात कर ली जाती है; इसलिए मनुष्य में शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है, जो कि शैतान की प्रकृति है। शैतान द्वारा कही और की गई हर चीज़ से, क्या तुमने उसका अंहकार देखा है? क्या तुमने उसका छल और द्वेष देखा है। शैतान का अंहकार मुख्य रूप से कैसे प्रदर्शित होता है? क्या शैतान सदैव परमेश्वर का स्थान लेने की इच्छा रखता है? शैतान हमेशा परमेश्वर के कार्य और पद को खंडित करने और उसे खुद हथियाने की चाह रखता है, ताकि लोग शैतान का अनुसरण, समर्थन और उसकी आराधना करें; यह शैतान की अंहकारी प्रकृति है। जब शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, तो क्या वह उनसे सीधे कहता है कि उन्हें क्या करना चाहिए? जब शैतान परमेश्वर को प्रलोभित करता है, तो क्या वह सामने आकर कहता है कि, "मैं तुझे प्रलोभित कर रहा हूँ, मैं तुझ पर हमला करने जा रहा हूँ"? वह ऐसा बिलकुल नहीं करता। शैतान कौन-सा तरीका इस्तेमाल करता है? वह बहकाता है, प्रलोभित करता है, हमला करता है, और अपना जाल बिछाता है, और यहाँ तक कि धर्मग्रंथों को भी उद्धृत करता है। अपने कुटिल उद्देश्य हासिल करने और अपने इरादे पूरे करने के लिए शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है। शैतान के ऐसा कर लेने के बाद मनुष्य में जो अभिव्यक्त होता है, उससे क्या देखा जा सकता है? क्या लोग भी अंहकारी़ नहीं हो जाते? हजारों सालों से मनुष्य शैतान की भ्रष्टता से पीड़ित रहा है, इसलिए मनुष्य अहंकारी, धोखेबाज, दुर्भावनाग्रस्त और विवेकहीन हो गया है। ये सभी चीज़ें शैतान की प्रकृति के कारण उत्पन्न हुई हैं। चूँकि शैतान की प्रकृति दुष्ट है, इसलिए इसने मनुष्य को यह दुष्ट प्रकृति दी है और उसे यह दुष्ट, भ्रष्ट स्वभाव प्रदान किया है। इसलिए मनुष्य भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के तहत जीता है और शैतान की ही तरह, परमेश्वर का विरोध करता है, परमेश्वर पर हमला करता है, यहाँ तक कि वह परमेश्वर की आराधना नहीं कर सकता, उसके प्रति श्रद्धा रखने वाला हृदय नहीं रखता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 147

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है

क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज़ मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि "ज्ञान" शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीज़ों में सूचीबद्ध है, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समस्त ज्ञान का आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या मनुष्य द्वारा खोज और संकलन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना करने या सत्य के साथ नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : "हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों द्वारा सृजित होनी चाहिए? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह बकवास है।) बिलकुल सही! यह बकवास है! ज्ञान चर्चा का एक जटिल विषय है। तुम बस यह कह सकते हो कि ज्ञान का क्षेत्र ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है। ज्ञान का यह क्षेत्र ऐसा है, जिसे परमेश्वर की उपासना न करने और परमेश्वर द्वारा सब चीज़ों का निर्माण किए जाने की बात न समझने के आधार पर सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देखते कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व है; वे नहीं देखते कि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभारी है या सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे जो कुछ भी करते हैं, वह है ज्ञान के क्षेत्र का अंतहीन अनुसंधान और खोज, और वे ज्ञान के आधार पर उत्तर खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? वह सब ज्ञान तुम्हें केवल जीविकोपार्जन, एक नौकरी, आमदनी दे सकता है, ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुम्हें कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं करने देगा, और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना अधिक तुम ज्ञान का अध्ययन करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर को अपने अध्ययन के अधीन करने, परमेश्वर को प्रलोभित करने और परमेश्वर का विरोध करने की इच्छा करोगे। तो अब हम क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखा रहा है? यह सब शैतान का फ़लसफ़ा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मनुष्यों के बीच फैलाए गए फ़लसफ़ों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई संबंध है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के विपरीत हैं। लोग प्रायः कहते हैं, "जीवन गति है" और "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, अगर मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूख से बेज़ार महसूस करता है"; ये क्या कहावतें हैं? ये भुलावे हैं और इन्हें सुनने से घृणा की भावना पैदा होती है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन का फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने अपने दृष्टिकोण, अवधारणाएँ और विचार मनुष्य के मन में भर दिए हैं, तो क्या इस प्रक्रिया में मनुष्य भ्रष्ट नहीं होता? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित कर लेता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर जी रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोणों और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है, जो इस ज्ञान के भीतर छिपे हैं। यहीं पर शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का अनिवार्य अंश घटित होता है; यह शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि दोनों है।

हम ज्ञान के सबसे सतही पहलू पर चर्चा से शुरुआत करेंगे। क्या भाषाओं का व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? (नहीं।) शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते; वे एक उपकरण हैं, जिसका लोग बोलने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और वे वह उपकरण भी हैं, जिसका लोग परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और इतना ही नहीं, वर्तमान समय में भाषा और शब्द ही हैं, जिनसे परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है। वे उपकरण हैं, और वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, और दो गुणा दो चार होते हैं; क्या यह ज्ञान नहीं है? पर क्या यह तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्य ज्ञान है—यह एक निश्चित प्रतिमान है—और इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता। तो किस तरह का ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? भ्रष्ट करने वाला ज्ञान वह ज्ञान होता है, जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों की मिलावट होती है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी लेख में, लिखित शब्दों में अपने आपमें कुछ ग़लत नहीं होता। समस्या लेखक के दृष्टिकोण और अभिप्राय में होती है, जब वह लेख लिखता है, और साथ ही उसके विचारों की अंतर्वस्तु में। ये आत्मा की चीज़ें हैं, और वे लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम टेलीविज़न पर कोई कार्यक्रम देख रहे हो, तो उसमें किस प्रकार की चीज़ें लोगों का दृष्टिकोण बदल सकती हैं? क्या कलाकारों द्वारा कहे गए शब्द खुद लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम होगे? (नहीं।) किस प्रकार की चीज़ें लोगों को भ्रष्ट करेंगी? ये कार्यक्रम के मुख्य विचार और विषय-वस्तु होंगे, जो निर्देशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इन विचारों द्वारा वहन की गई सूचना लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकती है। क्या ऐसा नहीं है? अब तुम लोग जानते हो कि मैं अपनी चर्चा में शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करने के संदर्भ में क्या कह रहा हूँ। तुम ग़लत नहीं समझोगे, है न? तो अगली बार जब तुम कोई उपन्यास या लेख पढ़ोगे, तो क्या तुम आकलन कर सकोगे कि लिखित शब्दों में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को भ्रष्ट करते हैं या मानवजाति के लिए योगदान करते हैं? (हाँ, कुछ हद तक।) यह ऐसी चीज़ है, जिसे धीमी गति से पढ़ा और अनुभव किया जाना चाहिए, और यह ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे तुरंत आसानी से समझ लिया जाए। उदाहरण के लिए, ज्ञान के किसी क्षेत्र में शोध या अध्ययन करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उस क्षेत्र के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान समझने में सहायता कर सकते हैं, साथ ही यह जानने में भी सक्षम बना सकते हैं कि किन चीज़ों से लोगों को बचना चाहिए। उदाहरण के लिए "बिजली" को लो—यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? अगर तुम्हें यह पता न होता कि बिजली लोगों को झटका मार सकती है और चोट पहुँचा सकती है, तो क्या तुम अनभिज्ञ न होते? किंतु एक बार ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ लेने पर तुम बिजली के करेंट वाली चीज़ों को छूने में लापरवाही नहीं बरतोगे, और तुम जान जाओगे कि बिजली का उपयोग कैसे करना है। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब तुम लोगों को स्पष्ट हो गया है कि ज्ञान लोगों को किस तरह भ्रष्ट करता है, इस बारे में हम क्या चर्चा कर रहे हैं? दुनिया में कई प्रकार के ज्ञान का अध्ययन किया जाता है और तुम लोगों को स्वयं उनमें अंतर करने के लिए अपना समय देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 148

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के मन में बड़ी प्रतिष्ठा नहीं रखता और अगाध नहीं माना जाता? जब विज्ञान का उल्लेख किया जाता है, तो क्या लोग ऐसा महसूस नहीं करते : "यह एक ऐसी चीज़ है, जो सामान्य लोगों की पहुँच से परे है; यह ऐसा विषय है, जिसे केवल वैज्ञानिक शोधकर्ता या विशेषज्ञ ही स्पर्श कर सकते हैं; इसका हम जैसे आम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं है"? क्या इसका आम लोगों के साथ कोई संबंध है? (हाँ।) शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है? हम यहाँ अपनी चर्चा में केवल उन चीज़ों के बारे में बात करेंगे, जिनसे लोगों का अपने जीवन में बार-बार सामना होता है, और अन्य मामलों को नज़रअंदाज़ कर देंगे। एक शब्द है "जींस।" क्या तुमने यह शब्द सुना है? तुम सब इस शब्द से परिचित हो, है न? क्या जींस विज्ञान के माध्यम से नहीं खोजे गए थे? लोगों के लिए जींस ठीक-ठीक क्या मायने रखते हैं? क्या ये लोगों को यह महसूस नहीं कराते कि शरीर एक रहस्यमयी चीज़ है? जब लोगों को इस विषय से परिचित कराया जाएगा, तो क्या कुछ लोग ऐसे नहीं होंगे—विशेषकर जिज्ञासु—जो और अधिक जानना चाहेंगे या और अधिक विवरण पाना चाहेंगे? ये जिज्ञासु लोग अपनी ऊर्जा इस विषय पर केंद्रित करेंगे और जब उनके पास कोई और चीज़ करने को नहीं होगी, तो वे इसके बारे में और अधिक विवरण पाने के लिए पुस्तकों में और इंटरनेट पर जानकारी खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट रूप से कहूँ तो, विज्ञान उन चीज़ों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिनके बारे में मनुष्य जिज्ञासु है, जो अज्ञात चीज़ें हैं, और जो उन्हें परमेश्वर द्वारा नहीं बताई गई हैं; विज्ञान उन रहस्यों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है। विज्ञान का दायरा क्या है? तुम कह सकते हो कि बल्कि यह बृहद है; उस हल चीज़ में शोध और अध्ययन करता है जिसमें उसकी रुचि होती है। विज्ञान में इन चीज़ों के विवरण और नियमों का शोध करना और फिर वे संभावित सिद्धांत सामने लाना शामिल है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं : "ये वैज्ञानिक सचमुच ज़बर्दस्त हैं। वे इतना अधिक जानते हैं, इन चीज़ों को समझने के लिए इनमें बहुत ज्ञान है!" उनके मन में वैज्ञानिकों के लिए बहुत सराहना होती है, है न? जो लोग विज्ञान संबंधी शोध करते हैं, वे किस तरह के विचार रखते हैं? क्या वे ब्रहमांड का शोध नहीं करना चाहते, अपनी रुचि के क्षेत्र में रहस्यमयी चीज़ों पर शोध नहीं करना चाहते? इसका अंतिम परिणाम क्या है? कुछ विज्ञानों में लोग अनुमानों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालते हैं, और अन्य विज्ञानों में वे निष्कर्ष निकालने के लिए मानव-अनुभव पर भरोसा करते हैं। विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोग ऐतिहासिक और पृष्ठभूमिगत अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। क्या ऐसा नहीं है? तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान सिर्फ इतना करता है कि लोगों को भौतिक जगत में चीज़ों को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा शांत करता है, पर यह मनुष्य को उन नियमों को देखने में सक्षम नहीं बनाता, जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान में उत्तर पाता प्रतीत होता है, किंतु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि, जो मनुष्य के मन को केवल भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से उत्तर मिले हैं, इसलिए जो कोई भी मामला उठता है, वे उस मामले को साबित या स्वीकृत करने के लिए आधार के रूप में अपने वैज्ञानिक विचारों का ही इस्तेमाल करते हैं। मनुष्य का मन विज्ञान से आविष्ट हो जाता है और उससे इस हद तक बहक जाता है कि वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने और यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, और उत्तर पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? लोग जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतने ही अधिक बेतुके हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और वे यह विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण करने वाले कुछ लोग भी सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाते हैं या किसी मुद्दे के जवाब के लिए जानकारी खोजने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में वे समस्याओं का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक विचारों या ज्ञान या वैज्ञानिक समाधानों पर भरोसा करना चाहते हैं; वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं, जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जो उस स्थान पर गए हैं, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद जहाज़ रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के प्रकटन में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे अधिक संशयात्मक नहीं बनाता? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता, और उनके हृदयों पर पकड़ बनाने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग नहीं करता, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें? (हाँ।) इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 149

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का उपयोग कैसे करता है

क्या ऐसी कई चीज़ें हैं, या क्या ऐसी कई चीज़ें नहीं हैं, जो पारंपरिक संस्कृति का अंग मानी जाती हैं? (हाँ, हैं।) इस "पारंपरिक संस्कृति" का अर्थ क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि यह पूर्वजों से चली आती है—यह एक पहलू है। आरंभ से ही परिवारों, जातीय समूहों, यहाँ तक कि पूरी मानवजाति में जीवन के तरीके, रीति-रिवाज, कहावतें और नियम आगे बढ़ाए गए हैं, और वे लोगों के विचारों में बैठ गए हैं। लोग उन्हें अपने जीवन का अविभाज्य अंग समझते हैं और उन्हें नियमों की तरह मानते हैं, और उनका इस तरह पालन करते हैं, जैसे वे स्वयं जीवन हों। दरअसल, वे कभी भी इन चीज़ों को बदलना या इनका परित्याग करना नहीं चाहते, क्योंकि ये उनके पूर्वजों से आई हैं। पारंपरिक संस्कृति के अन्य पहलू भी हैं, जो लोगों की हड्डियों तक में जम गए हैं, जैसे कि वे चीज़ें, जो कन्फ्यूशियस या मेंसियस से आई हैं, और वे चीज़ें, जो चीनी ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई हैं। क्या यह सही नहीं है? पारंपरिक संस्कृति में क्या चीज़ें शामिल हैं? क्या इसमें वे त्योहार शामिल हैं, जिन्हें लोग मनाते हैं? उदाहरण के लिए : वसंत महोत्सव, दीप-महोत्सव, चिंगमिंग दिवस, ड्रैगन नौका महोत्सव, और साथ ही, भूत महोत्सव और मध्य-हेमंत महोत्सव। कुछ परिवार तब भी उत्सव मनाते हैं, जब वरिष्ठ लोग एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाते हैं, या जब बच्चे एक माह या सौ दिन की उम्र के हो जाते हैं। और इसी तरह चलता रहता है। ये सब पारंपरिक त्योहार हैं। क्या इन त्योहारों में पारंपरिक संस्कृति अंतर्निहित नहीं है? पारंपरिक संस्कृति का मूल क्या है? क्या इनका परमेश्वर की उपासना से कुछ लेना-देना है? क्या इनका लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए कहने से कुछ लेना-देना है? क्या परमेश्वर को भेंट चढ़ाने, परमेश्वर की वेदी पर जाने और उसकी शिक्षाएँ प्राप्त करने के लिए भी लोगों के कोई त्योहार हैं? क्या इस तरह के कोई त्योहार हैं? (नहीं।) इन सभी त्योहारों में लोग क्या करते हैं? आधुनिक युग में इन्हें खाने, पीने और मज़े करने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। पारंपरिक संस्कृति का अंतर्निहित स्रोत क्या है? पारंपरिक संस्कृति किससे आती है? (शैतान से।) यह शैतान से आती है। इन पारंपरिक त्योहारों के दृश्यों के पीछे शैतान मनुष्यों में कुछ खास चीजें भर देता है। वे चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें—क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंगमिंग महोत्सव के दौरान लोग कब्रों की सफ़ाई करते हैं और अपने पूर्वर्जों को भेंट चढ़ाते हैं, ताकि वे अपने पूर्वजों को भूलें नहीं। साथ ही, शैतान सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना याद रखें, जिसका एक उदाहरण ड्रैगन नौका महोत्सव है। मध्य-हेमंत उत्सव किसलिए मनाया जाता है? (पारिवारिक पुनर्मिलन के लिए।) पारिवारिक पुनर्मिलनों की पृष्ठभूमि क्या है? इसका क्या कारण है? यह भावनात्मक रूप से संवाद करने और जुड़ने के लिए है। निस्संदेह, चाहे वह चांद्र नववर्ष की पूर्व संध्या मनाना हो या दीप-महोत्सव, उन्हें मनाने के पीछे के कारणों का वर्णन करने के कई तरीके हैं। लेकिन कोई उन कारणों का वर्णन कैसे भी करे, उनमें से प्रत्येक कारण शैतान द्वारा लोगों में अपना फ़लसफ़ा और सोच भरने का तरीका है, ताकि वे परमेश्वर से भटक जाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर है, और वे भेंटें या तो अपने पूर्वजों को चढ़ाएँ या फिर शैतान को, या देह-सुख की इच्छाओं के वास्ते खाएँ, पीएँ और मज़ा करें। जब भी ये त्योहार मनाए जाते हैं, तो इनमें से हर त्योहार में लोगों के जाने बिना ही उनके मन में शैतान के विचार और दृष्टिकोण गहरे जम जाते हैं। जब लोग अपनी उम्र के पचासवें या साठवें दशक में या उससे भी बड़ी उम्र में पहुँचते हैं, तो शैतान के ये विचार और दृष्टिकोण पहले से ही उनके मन में गहरे जम चुके होते हैं। इतना ही नहीं, लोग इन विचारों को, चाहे वे सही हों या गलत, अविवेकपूर्ण ढंग से और बिना दुराव-छिपाव के, अगली पीढ़ी में संचारित करने का भरसक प्रयास करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? (है।) पारंपरिक संस्कृति और ये त्योहार लोगों को कैसे भ्रष्ट करते हैं? क्या तुम जानते हो? (लोग इन परंपराओं के नियमों से इतना विवश और बाध्य हो जाते हैं कि उनमें परमेश्वर को खोजने का समय और ऊर्जा नहीं बचती।) यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, चांद्र नव वर्ष के दौरान हर कोई उत्सव मनाता है—अगर तुमने नहीं मनाया, तो क्या तुम दुःखी महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने दिल में कोई अंधविश्वास रखते हो? शायद तुम ऐसा महसूस करो : "मैंने नववर्ष का उत्सव नहीं मनाया, और चूँकि चांद्र नव वर्ष का दिन एक खराब दिन था; तो कहीं बाकी पूरा वर्ष भी खराब ही न बीते"? क्या तुम बुरा और थोड़ा डरा हुआ महसूस नहीं करोगे? ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्होंने वर्षों से अपने पुरखों को भेंट नहीं चढ़ाई है और वे अचानक स्वप्न देखते हैं, जिसमें कोई मृत व्यक्ति उनसे पैसा माँगता है। वे कैसा महसूस करेंगे? "कितने दुःख की बात है कि इस मृत व्यक्ति को खर्च करने के लिए पैसा चाहिए! मैं उसके लिए कुछ कागज़ी मुद्रा जला दूँगा। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ, तो यह बिलकुल भी सही नहीं होगा। इससे हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं—कौन कह सकता है, दुर्भाग्य कब आ पड़ेगा?" उनके मन में डर और चिंता का यह छोटा-सा बादल हमेशा मँडराता रहेगा। उन्हें यह चिंता कौन देता है? (शैतान।) शैतान इस चिंता का स्रोत है। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का एक तरीका नहीं है? वह तुम्हें भ्रष्ट करने, तुम्हें धमकाने और तुम्हें बाँधने के लिए विभिन्न तरीके और बहाने इस्तेमाल करता है, ताकि तुम स्तब्ध रह जाओ और झुक जाओ और उसके सामने समर्पण कर दो; शैतान इसी तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। प्रायः जब लोग कमज़ोर होते हैं या परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत नहीं होते, तब वे असावधानीवश, भ्रमित तरीके से कुछ कर सकते हैं; अर्थात्, वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और वे बेइरादा कुछ कर सकते हैं, कुछ ऐसी चीज़ें कर सकते हैं, जिनके बारे में वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। शैतान इसी तरह से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। यहाँ तक कि अब कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो गहरे जड़ जमाई हुई पारंपरिक संस्कृति से अलग होने के अनिच्छुक हैं, और उसे नहीं छोड़ सकते हैं। विशेष रूप से जब वे कमज़ोर और निष्क्रिय होते हैं, तब वे इस प्रकार के उत्सव मनाना चाहते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, ताकि उनके दिलों को सुकून मिल जाए। पारंपरिक संस्कृति की पृष्ठभूमि क्या है? क्या पर्दे के पीछे से शैतान का काला हाथ डोर खींच रहा है? क्या शैतान की दुष्ट प्रकृति जोड़-तोड़ और नियंत्रण कर रही है? क्या शैतान इन सभी चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है? (हाँ।) जब लोग इस पारंपरिक संस्कृति में जीते हैं और इस प्रकार के पारंपरिक त्योहार मनाते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा परिवेश है, जिसमें वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए और भ्रष्ट किए जा रहे हैं, और इतना ही नहीं, वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने और भ्रष्ट किए जाने से खुश हैं? (हाँ।) यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम सब स्वीकार करते हो, जिसके बारे में तुम जानते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 150

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है

शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है? सभी लोग अपना भाग्य जानना चाहते हैं, इसलिए शैतान उनकी उत्सुकता का उन्हें लालच देने के लिए फायदा उठाता है। लोग अटकल, भविष्य-कथन, और चेहरा पढ़वाने में संलग्न हो जाते हैं ताकि जान सकें कि भविष्य में उनके साथ क्या होगा और आगे किस प्रकार का मार्ग है। अंत में, यद्यपि, वह भाग्य या संभावनाएँ किसके हाथ में हैं जिनसे लोग इतने चिंतित हैं? (परमेश्वर के हाथ।) ये सभी चीज़ें परमेश्वर के हाथों में हैं। इन विधियों का उपयोग करके शैतान लोगों को क्या ज्ञात करवाना चाहता है? शैतान चेहरा पढ़ने और भविष्य-कथन का उपयोग लोगों को यह बताने के लिए करना चाहता है कि वह उनका भविष्य और भाग्य जानता है, और न केवल वह इन चीज़ों को जानता है, बल्कि ये उसके नियंत्रण में भी हैं। शैतान इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और इन विधियों का उपयोग लोगों को नियंत्रित करने के लिए करना चाहता है, ताकि लोग उस पर अंधे होकर विश्वास करें और उसके हर शब्द का पालन करें। उदाहरण के लिए, अगर तुम अपना चेहरा पढ़वाओ, और अगर भाग्य बताने वाला व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके पूर्ण स्पष्टता के साथ तुम्हें बता दे कि पिछले कुछ दशकों में तुम्हारे साथ क्या-क्या घटित हुआ है, तो तुम भीतर कैसा महसूस करोगे? तुम तुरंत महसूस करोगे, "यह कितना सटीक है! मैंने अपना अतीत पहले कभी किसी को नहीं बताया है, इसने उसके बारे में कैसे जाना? मैं सच में इस भविष्यवक्ता की सराहना करता हूँ!" क्या शैतान के लिए तुम्हारे अतीत के बारे में जानना बहुत आसान नहीं है? परमेश्वर तुम्हें वहाँ तक लेकर आया है, जहाँ आज तुम हो, और इस पूरे समय के दौरान शैतान लोगों को भ्रष्ट करता रहा है और तुम्हारा पीछा करता रहा है। तुम्हारे जीवन के दशकों का समय शैतान के लिए कुछ भी नहीं है और इन चीज़ों को जानना उसके लिए कठिन नहीं है। जब तुम जानते हो कि शैतान जो कहता है, वह सटीक है, तो क्या तुम अपना हृदय उसे नहीं दे देते? क्या तुम अपना भविष्य और भाग्य उसके नियंत्रण पर नहीं छोड़ देते? एक पल में तुम्हारा हृदय उसके लिए कुछ आदर या श्रद्धा महसूस करेगा, और कुछ लोगों के लिए, इस बिंदु पर उनकी आत्माएँ उसके द्वारा पहले ही छीन ली गई होंगी। और तुम तुरंत भाग्यवक्ता से पूछोगे, "मैं आगे क्या करूँ? आने वाले साल में मुझे किससे बचना चाहिए? मुझे क्या नहीं करना चाहिए?" और फिर, वह कहेगा, "तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए, तुम्हें यह नहीं करना चाहिए, फ़लाँ रंग के कपड़े मत पहनो, तुम्हें अमुक-अमुक स्थानों पर नहीं जाना चाहिए, और तुम्हें फ़लाँ चीज़ें अधिक करनी चाहिए...।" क्या तुम उसकी हर बात तुरंत दिल से स्वीकार नहीं कर लोगे? तुम उसके वचन परमेश्वर के वचनों से भी अधिक तेजी से याद कर लोगे। तुम उन्हें इतनी शीघ्रता से क्यों याद कर लोगे? क्योंकि तुम अच्छे भाग्य के लिए शैतान पर भरोसा करना चाहोगे। क्या तभी वह तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा नहीं कर लेता? जब उसकी भविष्यवाणियाँ एक के बाद एक सच हो जाती हैं, तब क्या तुम यह जानने के लिए वापस उसके पास नहीं जाना चाहोगे, कि अगला साल कैसा भाग्य लेकर आएगा? (हाँ।) तुम वही करोगे, जो शैतान तुमसे करने के लिए कहेगा, और उन चीज़ों से बचोगे, जिनसे वह बचने के लिए कहेगा। इस तरह से, क्या तुम उसकी कही हर बात का पालन नहीं कर रहे होते? बहुत जल्दी तुम उसकी गोद में जा गिरोगे, धोखा खाओगे और उसके नियंत्रण में चले जाओगे। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि तुम विश्वास करते हो कि वह जो कहता है, वह सत्य है, और क्योंकि तुम मानते हो कि वह तुम्हारी पिछली ज़िंदगियों, तुम्हारी वर्तमान ज़िंदगी और तुम्हारे भविष्य में घटित होने वाली चीज़ों के बारे में जानता है। यही वह विधि है, जिससे शैतान लोगों को नियंत्रित करता है। किंतु वास्तव में कौन नियंत्रण करता है? स्वयं परमेश्वर नियंत्रण करता है, शैतान नहीं। शैतान इस मामले में अपनी चालाकियों का उपयोग केवल अज्ञानी लोगों को चकमा देने के लिए करता है, उन लोगों को बरगलाने के लिए करता है, जो उस पर विश्वास और भरोसा करने में केवल भौतिक जगत को देखते हैं। फिर वे शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और उसकी हर बात मानते हैं। किंतु क्या जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहते हैं, तब शैतान अपनी पकड़ ढीली करता है? शैतान अपनी पकड़ ढीली नहीं करता। इस स्थिति में, क्या लोग वास्तव में शैतान के चंगुल में फँस रहे हैं? (हाँ।) क्या हम कह सकते हैं कि इस संदर्भ में शैतान का व्यवहार सचमुच निर्लज्जतापूर्ण है? (हाँ।) हम ऐसा क्यों कहेंगे? क्योंकि ये धोखा देने वाली और छल से भरी हुई चालबाजियाँ हैं। शैतान बेशर्म है और लोगों को गुमराह करता है कि वह उनसे संबंधित सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और वह उनके भाग्य को भी नियंत्रित करता है। इससे अज्ञानी लोग उसे पूरी तरह से मानने लगते हैं। वे केवल कुछ शब्दों से मूर्ख बना दिए जाते हैं। हतप्रभ होकर लोग उसके आगे झुक जाते हैं। तो शैतान किस तरह के तरीके इस्तेमाल करता है, खुद पर विश्वास करवाने के लिए वह क्या कहता है? उदाहरण के लिए, तुमने शैतान को नहीं बताया होगा कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, किंतु शायद वह बता दे कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, और साथ ही तुम्हारे माता-पिता और बच्चों की उम्र बता भी दे। इससे पहले अगर तुम्हें शैतान पर कुछ शक या संदेह रहा भी हो, तो क्या ऐसी बातें सुनने के बाद तुम यह महसूस नहीं करोगे कि यह थोड़ा अधिक विश्वसनीय है? तब शैतान कह सकता है कि हाल ही में तुम्हारा कार्य कितना कठिन रहा है, कि तुम्हारे वरिष्ठ तुम्हें उतना महत्व नहीं देते, जितना तुम्हें मिलना चाहिए और वे हमेशा तुम्हारे विरुद्ध कार्य करते हैं, इत्यादि। यह सुनने के बाद तुम सोचोगे, "यह बिलकुल सही है! कार्यालय में सब चीज़ें सुचारु रूप से नहीं चल रही हैं।" तो तुम शैतान पर थोड़ा और विश्वास करोगे। फिर वह तुम्हें धोखा देने के लिए कुछ और कहेगा, जिससे तुम उस पर और भी अधिक विश्वास करोगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अब खुद को उसका और प्रतिरोध करने या उस पर संदेह करने में असमर्थ पाओगे। शैतान सिर्फ कुछ मामूली चालाकियाँ, यहाँ तक कि छोटी-छोटी तुच्छ चालाकियाँ इस्तेमाल करता है और इस तरह तुम्हें भ्रमित कर देता है। जब तुम भ्रमित हो जाते हो, तो तुम अपना व्यवहार स्थिर नहीं रख पाते, तुम्हारी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ, और तुम वही करना आरंभ कर देते हो, जो शैतान कहता है। यह वह शानदार तरीका है, जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है, जिससे तुम अनजाने ही उसके जाल में फँस जाते हो और इसके द्वारा बहकाए जाते हो। शैतान तुमसे कुछ बातें कहता है, जिन्हें लोग अच्छी बातें मानते हैं, और तब वह तुम्हें कहता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना। इस तरह तुम अनजाने ही छले जाते हो। एक बार जब तुम इसमें पड़ जाते हो, तो तुम्हारे लिए चीज़ें परेशानी देने वाली हो जाती हैं; तुम लगातार इसी बारे में सोचते रहते हो कि शैतान ने क्या कहा और उसने तुमसे क्या करने को कहा, और तुम अनजाने ही उसके कब्ज़े में आ जाते हो। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मनुष्यों में सत्य का अभाव है और इसलिए वे शैतान के प्रलोभन और बहकावे के विरुद्ध मजबूती से खड़े होने और उसका विरोध करने में असमर्थ हैं। शैतान की दुष्टता और उसके धोखे, विश्वासघात और दुर्भावना का सामना करने में मानवजाति बहुत अज्ञानी, अपरिपक्व और कमज़ोर है, है न? क्या यह उन तरीकों में से एक नहीं है, जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है? (हाँ, है।) मनुष्य अनजाने में, थोड़ा-थोड़ा करके, शैतान के विभिन्न तरीकों द्वारा धोखा खाते और छले जाते हैं, क्योंकि उनमें सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर करने की योग्यता का अभाव है। शैतान पर विजय पाने के लिए उनमें इस आध्यात्मिक कद और योग्यता का अभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 151

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक रुझानों का उपयोग कैसे करता है

सामाजिक रुझान कब अस्तित्व में आए? क्या वे केवल वर्तमान समय में अस्तित्व में आए? कोई यह कह सकता है कि सामाजिक रुझान तब अस्तित्व में आए, जब शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करना आरंभ किया। सामाजिक रुझानों में क्या शामिल है? (कपड़ों और शृंगार की शैलियाँ।) ये ऐसी चीजें हैं, जिनके संपर्क में लोग अकसर आते हैं। कपड़ों की शैलियाँ, फैशन, रुझान—ये चीज़ें एक छोटा पहलू निर्मित करती हैं। क्या और भी कुछ है? क्या वे लोकप्रिय वाक्यांश भी इसमें शामिल हैं, जिन्हें लोग अकसर बोलते हैं? क्या वे जीवन-शैलियाँ इसमें शामिल हैं, जिनकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत के सितारे, मशहूर हस्तियाँ, पत्रिकाएँ और उपन्यास, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, इसमें शामिल होते हैं? (हाँ।) तुम लोगों के विचार में, सामाजिक रुझानों का कौन-सा पहलू मनुष्य को भ्रष्ट करने में सक्षम है? इनमें से कौन-सा रुझान तुम लोगों को सबसे लुभावना लगता है? कुछ लोग कहते हैं : "हम सब एक खास उम्र में पहुँच गए हैं, हम अपनी उम्र के साठवें, सत्तरवें, अस्सीवें या नब्बेवें दशक में हैं, और हम अब और इन रुझानों के अनुकूल नहीं हो सकते और वे वास्तव में हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करते।" क्या यह सही है? दूसरे कहते हैं : "हम मशहूर हस्तियों का अनुसरण नहीं करते, वह तो बीसेक साल के युवा लोग किया करते हैं; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते, वह तो अपनी छवि के बारे में सतर्क लोग किया करते हैं।" तो इनमें से क्या तुम लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम है? (लोकप्रिय कहावतें।) क्या ये कहावतें लोगों को भ्रष्ट कर सकती हैं? मैं एक उदाहरण दूँगा, और तुम लोग देख सकते हो कि वे लोगों को भ्रष्ट करती हैं या नहीं : "पैसा दुनिया को नचाता है"; क्या यह एक रुझान है? क्या यह तुम लोगों द्वारा उल्लिखित फैशन और स्वादिष्ट भोजन के रुझानों की तुलना में अधिक खराब नहीं है? "पैसा दुनिया को नचाता है" यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है। तुम कह सकते हो कि यह एक रुझान है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है। बिल्कुल शुरू से ही, लोगों ने इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किन्तु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो उन्होंने इसे मूक सहमति दी, और महसूस करना शुरू किया कि वे वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोग इस कहावत को समान मात्रा में नहीं समझते, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग मात्रा में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना अनुभव है, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक के सहित दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इस तरह प्रकट होने वाली इस चीज़ की व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! तो शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस रुझान का उपयोग किए जाने के बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे की खोज में लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? इतना ही नहीं, क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है।) क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम सामर्थ्यहीन हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किन्तु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिलकुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे तुम्हें इस बात का एहसास क्यों न हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर का प्रेम कितना गहरा और कितना महान है, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सबको त्यागने के, तुम अपने भाग्य को इस कहावत से नियंत्रित करवाओगे। क्या यह तथ्य कि लोग ऐसा करते हैं, कि वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित और प्रभावित होते हैं, यह नहीं दर्शाता कि शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करना कारगर है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का तुम्हारे हृदय में जड़ जमाना नहीं है? अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ।) क्या तुम देखते हो कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? क्या तुम इसे महसूस कर सकते हो? (नहीं।) तुमने इसे न तो देखा है, न महसूस किया है। क्या तुम यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हो? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असंभव बना देता है और वह इसके सामने मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है, जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें इस बात का पता नहीं चलता कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हैं और उन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को अपने साथ जोड़-तोड़ करने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 152

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इन अनेक विधियों का उपयोग करता है। मनुष्य को कुछ वैज्ञानिक सिद्धांतों का ज्ञान और समझ है, मनुष्य पारंपरिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक मनुष्य पारंपरिक संस्कृति का उत्तराधिकारी और हस्तांतरणकर्ता है। मनुष्य शैतान द्वारा स्वयं को दी गई पारंपरिक संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य है, और वह शैतान द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले सामाजिक रुझानों का पालन भी करता है। मनुष्य शैतान से अविभाज्य है, वह हर समय शैतान का अनुसरण करता है, उसकी दुष्टता, धोख़े, दुर्भावना और अहंकार को स्वीकार करता है। शैतान के इन स्वभावों को धारण कर लेने पर, क्या मनुष्य इस भ्रष्ट मनुष्यजाति के बीच रहते हुए खुश रहा है या दुःखी? (दुःखी।) तुम ऐसा क्यों कहते हो? (चूँकि मनुष्य इन चीज़ों से बँधा है और इन भ्रष्ट चीज़ों से नियंत्रित है, वह पाप में रहता है और एक कठिन संघर्ष में डूबा हुआ है।) कुछ लोग बहुत बौद्धिक दिखाई देने के लिए चश्मा पहनते हैं; वे वाक्पटुता और तर्क के साथ बहुत आदर पूर्वक बोल सकते हैं, और क्योंकि वे कई चीज़ों से होकर गुज़रे होंगे, वे बहुत अनुभवी और परिष्कृत हो सकते हैं। वे छोटे-बड़े मामलों के बारे में विस्तार से बोलने में समर्थ हो सकते हैं; वे चीज़ों की प्रामाणिकता और तर्क का आँकलन करने में भी समर्थ हो सकते हैं। कुछ लोग इन लोगों के व्यवहार और रूप-रंग, और साथ ही इनके चरित्र, इनकी ईमानदारी, और आचरण इत्यादि को देख सकते हैं, और उन्हें उनमें कोई दोष नहीं मिलता होगा। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रुझानों के अनुकूल होने में ख़ास तौर से सक्षम होते हैं। भले ही ये लोग अधिक उम्र के हों, पर वे कभी समकालीन रुझानों से पीछे नहीं रहते और कभी इतने बूढ़े नहीं होते कि सीखना बंद कर दें। सतह पर, कोई भी ऐसे व्यक्ति में दोष नहीं निकाल सकता, लेकिन अंदर से वे शैतान द्वारा सरासर और पूरी तरह से भ्रष्ट किए जा चुके होते हैं। हालाँकि इन लोगों में कोई बाहरी दोष नहीं ढूँढ़ा जा सकता, और हालाँकि सतह पर वे सौम्य, परिष्कृत होते हैं और ज्ञान और एक खास नैतिकता रखते हैं, और उनमें ईमानदारी होती है, और हालाँकि ज्ञान के मामले में वे किसी भी तरह से युवा लोगों से कम नहीं होते, फिर भी जहाँ तक उनकी प्रकृति और सार का संबंध होता है, ऐसे लोग शैतान के पूर्ण और जीवित प्रतिमान होते हैं। वे शैतान के पूर्ण प्रतिबिंब होते हैं। यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का "फल" है। मैंने जो कहा है, उससे तुम्हें ठेस पहुँच सकती है, पर यह सब सत्य है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जिस विज्ञान को वह समझता है और सामाजिक रुझानों में तालमेल बिठाने के लिए जिन साधनों का वह चयन करता है, वे निरपवाद रूप से शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के उपकरण हैं। यह बिलकुल सत्य है। इसलिए, मनुष्य एक ऐसे स्वभाव के भीतर जीता है, जिसे शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया होता है, और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का सार क्या है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के तरीकों में सतही तौर पर कोई दोष नहीं ढूँढ़ सकता; किसी के व्यवहार से कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ अनुचित है। प्रत्येक व्यक्ति अपना कार्य सामान्य रूप से करता है और सामान्य जीवन जीता है; वह सामान्य रूप से पुस्तकें और समाचारपत्र पढ़ता है, सामान्य रूप से अध्ययन करता और बोलता है। कुछ लोगों ने कुछ नीति शास्त्र सीख लिये हैं, और बोलने में अच्छे, दूसरों को समझने वाले और मित्रतापूर्ण होते हैं, मददगार और उदार होते हैं, और छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा नहीं करते या लोगों का फायदा नहीं उठाते। लेकिन उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ें जमाए होता है और यह सार बाहरी प्रयासों पर भरोसा करके नहीं बदला जा सकता। इस सार के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझने में समर्थ नहीं है, और परमेश्वर की पवित्रता के सार को मनुष्य पर प्रकट किए जाने के बावज़ूद मनुष्य इसे गंभीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि विभिन्न साधनों के जरिये शैतान पहले ही मनुष्य की भावनाओं, मतों, दृष्टिकोणों और विचारों को अपने कब्जे में करने के लिए आ चुका होता है। यह कब्ज़ा और भ्रष्टता अस्थायी या आकस्मिक नहीं होते; बल्कि हर जगह और हर समय विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार, तीन या चार साल से—अथवा यहाँ तक कि पाँच या छह साल से भी—परमेश्वर पर विश्वास करते आ रहे बहुत से लोग अभी भी इन दुष्ट विचारों, दृष्टिकोणों, तर्क और फ़लसफ़ों को खज़ाने के रूप में लेते हैं जो शैतान ने उनमें भर दिए हैं, और उन्हें छोड देने में असमर्थ हैं। चूँकि मनुष्य ने शैतान की प्रकृति से आने वाली दुष्ट, अहंकारी और दुर्भावनापूर्ण चीज़ों को स्वीकार किया है, इसलिए उनके अंतर्वैयक्तिक संबंधों में अपरिहार्य रूप से प्रायः संघर्ष, बहसबाजी और और असामंजस्य रहता है, जो शैतान की अहंकारी प्रकृति के परिणामस्वरूप आता है। अगर शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक चीज़ें दी होतीं—उदाहरण के लिए, अगर मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारंपरिक संस्कृति के कन्फ्यूशीवाद और ताओवाद अच्छी चीज़ें होतीं—तो उन चीज़ों को स्वीकार करने के बाद समान मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहने में समर्थ होना चाहिए था। तो समान चीजें स्वीकार करने वालों के बीच इतनी बड़ी फूट क्यों है? क्यों है इतनी बड़ी फूट? ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये चीज़ें शैतान से आती हैं और शैतान लोगों में दरार पैदा करता है। शैतान से आने वाली चीज़ें, चाहे वे सतही तौर पर कितनी ही गरिमापूर्ण और महान क्यों न दिखाई पड़ें, मनुष्यों के लिए और उनके जीवन में केवल अहंकार और शैतान की दुष्ट प्रकृति के धोखे के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कोई ऐसा व्यक्ति, जो अपने को छिपाने में सक्षम हो, जिसके पास ज्ञान की संपदा हो या जिसकी अच्छी परवरिश हुई हो, उसे भी अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को छिपाने में कठिनाई होगी। अर्थात्, इस व्यक्ति ने भले ही अपने आपको कितने ही तरीकों से छिपाया हो, चाहे तुम उसे संत समझते थे या सोचते थे कि वह पूर्ण है, या तुम सोचते थे कि वह एक फ़रिश्ता है, चाहे तुमने उसे कितना भी शुद्ध क्यों न समझा हो, पर्दे के पीछे उसका जीवन किस तरह का है? उसके स्वभाव के प्रकाशन में तुम क्या सार देखोगे? निस्संदेह तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति देखोगे। क्या ऐसा कहना स्वीकार्य है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम लोग अपने करीबी किसी व्यक्ति को जानते हो, जिसके बारे में तुम सोचते थे कि वह अच्छा व्यक्ति है, शायद कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे तुम एक आदर्श मानते हो। अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के अनुसार तुम उसके बारे में क्या सोचते हो? पहले, तुम यह आकलन करते हो कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वह ईमानदार है, क्या उसमें लोगों के लिए सच्चा प्रेम है, क्या उसके वचन और कार्य दूसरों को लाभ और सहायता पहुँचाते हैं। (नहीं पहुँचाते।) इन लोगों द्वारा दिखाई जाने वाली तथाकथित दयालुता, प्रेम या अच्छाई क्या है? यह सब झूठ है, मुखौटा है। इस मुखौटे के पीछे एक गुप्त बुरा उद्देश्य है : उस व्यक्ति को इष्ट और पूजनीय बनाना। क्या तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से देखते हो? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 153

शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए जिन विधियों का उपयोग करता है, वे मानवजाति के लिए क्या लेकर आती हैं? क्या वे कुछ सकारात्मक लाती हैं? पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे के बीच अंतर कर सकता है? क्या तुम कहोगे कि इस संसार का कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कोई प्रसिद्ध या महान व्यक्ति हो, या कोई पत्रिका, या अन्य प्रकाशन हो, ऐसे मानक हैं जिनका वे यह निर्णय करने के लिए उपयोग करते हैं कि कोई चीज़ अच्छी या बुरी, और सही या ग़लत, परिशुद्ध है? क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनके आकलन निष्पक्ष हैं? क्या उनमें सच्चाई है? क्या यह संसार, यह मानवजाति, सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करती है? (नहीं।) लोगों में वह क्षमता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया है और विज्ञान के विषय में इतना अधिक जानते हैं, इसलिए वे महान क्षमताओं से युक्त हैं, है न? तो फिर वे सकारात्मक और नकारात्मक चीज़ों के बीच अंतर करने में क्यों असमर्थ हैं? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों के पास सत्य नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) शैतान मानवजाति के लिए जो भी चीज़ लेकर आता है, वह दुष्ट और भ्रष्ट होती है, और उसमें सत्य, जीवन और मार्ग का अभाव होता है। शैतान द्वारा मनुष्य के लिए लाई जाने वाली दुष्टता और भ्रष्टता को देखते हुए क्या तुम कह सकते हो कि शैतान के पास प्रेम है? क्या तुम कह सकते हो कि मनुष्य के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं : "तुम ग़लत हो, दुनिया में बहुत लोग हैं, जो गरीबों और बेघर लोगों की सहायता करते हैं। क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? यहाँ धर्मार्थ संगठन भी हैं, जो अच्छे कार्य करते हैं; क्या उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य अच्छे नहीं हैं?" तुम उसे क्या कहोगे? शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कई अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या मनुष्य की यह भ्रष्टता एक अस्पष्ट धारणा है? नहीं, यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यावहारिक चीज़ें भी करता है, और वह इस दुनिया और समाज में एक दृष्टिकोण या एक सिद्धांत को भी बढ़ावा देता है। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक काल-खंड में वह एक सिद्धांत को बढ़ावा देता है और मनुष्यों के मन में विचार भरता है। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के हृदयों में जड़ जमा लेते हैं, और तब वे उन विचारों और सिद्धांतों के अनुसार जीना आरंभ कर देते हैं। एक बार जब वे इन चीज़ों के अनुसार जीने लगते हैं, तो क्या वे अनजाने ही शैतान नहीं बन जाते? क्या तब लोग शैतान के साथ एक नहीं हो जाते? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तो अंत में परमेश्वर के प्रति उनका क्या रवैया होता है? क्या यह वही रवैया नहीं होता, जो शैतान परमेश्वर के प्रति रखता है? कोई भी यह स्वीकार करने का साहस नहीं करता, है न? यह कितना भयावह है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान की प्रकृति दुष्ट है? मैं ऐसा अकारण नहीं कहता; बल्कि, शैतान की प्रकृति का निर्धारण और विश्लेषण इस आधार पर किया जाता है कि उसने क्या किया है और किन चीज़ों को प्रकट किया है। अगर मैंने केवल यह कहा होता कि शैतान दुष्ट है, तो तुम लोग क्या सोचते? तुम लोग सोचते : "स्पष्टतः शैतान दुष्ट है।" इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ : "शैतान के कौन-से पहलू दुष्टता हैं?" अगर तुम कहते हो : "शैतान द्वारा परमेश्वर का विरोध करना दुष्टता है," तो तुम अभी भी स्पष्टता के साथ नहीं बोल रहे होगे। अब जबकि मैंने इस प्रकार विशिष्ट रूप से कहा है; तो क्या तुम्हें शैतान की दुष्टता के सार की विशिष्ट अंतर्वस्तु के बारे समझ है? (हाँ।) अगर तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो, तो तुम अपनी खुद की स्थितियाँ देखोगे। क्या इन दोनों चीज़ों के बीच में कोई संबंध है? यह तुम लोगों के लिए मददगार है या नहीं? (हाँ, है।) जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में संगति करता हूँ, तो क्या यह आवश्यक है कि मैं शैतान के दुष्ट सार के बारे में भी संगति करूँ? इस बारे में तुम्हारी क्या राय है? (हाँ, यह आवश्यक है।) क्यों? (शैतान की दुष्टता परमेश्वर की पवित्रता को स्पष्टता से उभार देती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक रूप से सही है, इस अर्थ में कि शैतान की दुष्टता के बिना लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जानेंगे; यह कहना सही है। लेकिन अगर तुम कहते हो कि परमेश्वर की पवित्रता केवल शैतान की दुष्टता के विपरीत होने के कारण विद्यमान है, तो क्या यह सही है? सोचने का यह द्वंद्वात्मक तरीका ग़लत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यहाँ तक कि जब परमेश्वर इसे अपने कर्मों के माध्यम से प्रकट करता है, तब भी वह परमेश्वर के सार की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है और यह तब भी परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यह हमेशा विद्यमान रही है और स्वयं परमेश्वर के लिए अंतर्भूत और सहज है, यद्यपि मनुष्य इसे नहीं देख सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के बीच और शैतान के प्रभाव के अधीन रहता है, और वह पवित्रता के बारे में ही नहीं जानता, परमेश्वर की पवित्रता की विशिष्ट अंतर्वस्तु के बारे में तो कैसे जानेगा। तो क्या यह आवश्यक है कि हम पहले शैतान के दुष्ट सार के बारे में संगति करें? (हाँ, यह आवश्यक है।) कुछ लोग कुछ संदेह व्यक्त कर सकते हैं : "तुम स्वयं परमेश्वर के बारे में संगति कर रहे हो, तो फिर तुम हर समय इस बारे में बात क्यों करते रहते हो कि शैतान लोगों को भ्रष्ट कैसे करता है और शैतान की प्रकृति दुष्ट कैसे है?" अब तुमने इन संदेहों का समाधान कर लिया है, है ना? जब लोगों को शैतान की दुष्टता का बोध हो जाता है और जब उनके पास उसकी एक सही परिभाषा होती है, जब लोग दुष्टता की विशिष्ट अंतर्वस्तु और अभिव्यक्ति को, दुष्टता के स्रोत और सार को स्पष्ट रूप से देख लेते हैं, केवल तभी, परमेश्वर की पवित्रता की चर्चा के माध्यम से, लोग स्पष्ट रूप से समझ और पहचान पाते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है, पवित्रता मात्र क्या है। अगर मैं शैतान की दुष्टता की चर्चा न करूँ, तो कुछ लोग ग़लती से यह विश्वास कर लेंगे कि कुछ चीज़ें, जिन्हें लोग समाज में या लोगों के बीच करते हैं—या कुछ खास चीजें, जो इस संसार में विद्यमान हैं—पवित्रता से संबंधित हो सकती हैं। क्या यह दृष्टिकोण ग़लत नहीं है? (हाँ, है।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 154

शैतान ज्ञान को एक चारे के रूप में उपयोग करता है। ध्यान से सुनें: ज्ञान बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि "कठिन अध्ययन करें और दिन प्रति दिन खुद को बेहतर बनाएं," ज्ञान को हथियार के रूप में उपयोग करें और स्वयं को उससे हथियारबंद करें, और फिर विज्ञान के द्वार को खोलने के लिए ज्ञान का उपयोग करें; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करोगे, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है; यह लोगों को ज्ञान सीखने के समय ही ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए भी कहता है, वह उन्हें बताता है कि उन्‍हें महत्वाकांक्षाएँ एवं आकांक्षाएं पैदा करनी चाहिए। मनुष्‍य की जानकारी के बिना, शैतान इस प्रकार के अनेक सन्देश देता है, लोगों को अवचेतन रूप से यह महसूस करवाता है कि ये चीज़ें सही हैं, या लाभप्रद हैं। अनजाने में, लोग इस मार्ग पर कदम रखते हैं, अनजाने में ही अपने स्वयं के आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा आगे बढ़ने को बाध्‍य किए जाते हैं। कदम दर कदम, वे बिना इरादे के ही शैतान के द्वारा दिए गए ज्ञान से सीखते हैं कि महान या प्रसिद्ध लोगों के सोचने के तरीके क्‍या हैं। वे कुछ ऐसे लोगों के कर्मों से भी कुछ चीज़ें सीखते हैं जिन्हें नायक माना जाता है। शैतान इन नायकों के कर्मों के सन्दर्भ में मनुष्य के लिए किस बात का समर्थन कर रहा है? वह मनुष्य के मन के भीतर क्या बिठाना चाहता है? यह कि मनुष्य को देशभक्त अवश्य होना चाहिए, उसके पास राष्ट्रीय अखण्डता अवश्य होनी चाहिए, और उसमें वीरोचित भावना अवश्य होनी चाहिए। मनुष्य ऐतिहासिक कहानियों से या प्रसिद्ध वीरोचित व्यक्तियों की जीवनियों से क्या सीखता है? व्यक्तिगत वफादारी के एहसास का होना, अपने दोस्‍तों और भाइयों के लिए, कुछ भी कर गुज़रने को तैयार होना। शैतान के इस ज्ञान के अंतर्गत, मनुष्य अनजाने में कई ऐसी चीज़ों को सीखता है जो बिल्‍कुल सकारात्‍मक नहीं हैं। अनभिज्ञता के बीच, शैतान के द्वारा उनके लिए तैयार किए गए बीजों को लोगों के अपरिपक्व मनों में बो दिया जाता है। ये बीज उन्हें यह महसूस करवाते हैं कि उन्हें महान मनुष्य होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए, नायक होना चहिए, देशभक्त होना चाहिए, ऐसे लोग होना चाहिए जो अपने परिवार से प्रेम करते हैं, और ऐसे लोग होना चाहिए जो एक मित्र के लिए कुछ भी करेंगे और व्यक्तिगत वफादारी का एहसास रखेंगे। शैतान के द्वारा बहकाए जाने के द्वारा, वे अनजाने में ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे उसने उनके लिए तैयार किया था। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियमों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। पूरी तरह अनजाने में, वे जीवन जीने के अपने स्वयं के नियम विकसित कर लेते हैं, जबकि ये शैतान के उन नियमों के अलावा और कुछ भी नहीं होते हैं जिन्हें जबरदस्ती उनके भीतर बैठा दिया गया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान उन्हें अपने स्वयं के लक्ष्यों को बढ़ावा देने, अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को, जीवन जीने के सिद्धान्तों को, और जीवन की दिशा को निर्धारित करने के लिए उकसाने का कारण बनता है, इसी बीच कहानियों का उपयोग करके, जीवनियों का उपयोग करके, और सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करके उनमें शैतान की चीज़ों को भरता है, ताकि वे थोड़ा-थोड़ा करके उसके चारे को निगल लें। इस तरह से, अपने सीखने के दौरान कुछ लोग साहित्य, कुछ लोग अर्थशास्त्र, कुछ लोग खगोल विज्ञान या भूगोल पसन्द करने लगते हैं। फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो राजनीति को पसन्द करने लगते हैं, कुछ लोग हैं जो भौतिक विज्ञान, कुछ रसायन विज्ञान, और यहाँ तक कि कुछ अन्‍य लोग धर्मशास्‍त्र को पसन्द करते हैं। ये सब एक बड़ी चीज का एक भाग है जिसे ज्ञान कहते हैं। अपने हृदयों में, तुम लोगों में से प्रत्येक जानता है कि ये चीजें वास्‍तव में क्‍या हैं, तुममें से हर कोई पहले से ही उनके सम्पर्क में है। तुममें से हर कोई ज्ञान की किसी न किसी शाखा के सम्बन्ध में निरन्तर बिना रुके बात कर सकता है। और इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह ज्ञान मनुष्य के मनों में कितनी गहराई से प्रवेश कर चुका है, यह आसानी से देखा जा सकता है कि इस ज्ञान ने लोगों के मनों में क्‍या स्‍थान बना लिया है और इसका उन पर कितना गहरा प्रभाव है। जब एक बार कोई व्यक्ति ज्ञान के किसी पहलू को पसन्द करने लगता है, जब कोई व्यक्ति अपने हृदय में इसके साथ गहराई से प्रेम करने लगता है, तब वह अनजाने में ही महत्‍वाकांक्षाओं को विकसित कर लेता है: कुछ लोग ग्रंथकार बनना चाहते हैं, कुछ लोग साहित्यिक लेखक बनना चाहते हैं, कुछ लोग राजनीति में अपनी जीवनवृत्ति बनाना चाहते हैं, और कुछ अर्थशास्त्र में संलग्न होना और व्यवसायी बनना चाहते हैं। फिर लोगों का ऐसा समूह है जो नायक बनना चाहते हैं, महान या प्रसिद्ध बनना चाहते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि कोई किस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहता है, उनका लक्ष्य ज्ञान को सीखने के इस तरीके को अपनाना और अपने उद्देश्यों के लिए और अपनी स्वयं की इच्छाओं और महत्‍वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए इसका उपयोग करना है। चाहे यह कितना ही अच्छा क्यों न सुनाई देता हो—चाहे वे अपने स्वप्नों को हासिल करना चाहते हैं, इस जीवन को व्यर्थ में नहीं जीना चाहते हैं, या वे किसी जीवनवृत्ति में लगे रहना चाहते हैं—वे अपने ऊँचे आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देते हैं परन्तु, दरअसल, यह सब किसलिए है? क्या तुम लोगों ने इसके बारे में पहले कभी सोचा है? शैतान यह सब क्यों करना चाहता है? इन चीज़ों को मनुष्य के भीतर बिठाने का शैतान का क्या उद्देश्य है? तुम लोगों के हृदय इस प्रश्न के प्रति स्पष्ट अवश्य होने चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 155

मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है, चाहे यह कहानियों की व्याख्या करना हो, ज्ञान का मात्र एक अंश देना हो, या उन्हें अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने देना हो या अपनी महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने देना हो। शैतान तुम्हें किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी ग़लत नहीं है, कि यह तो पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करना, ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देना और महत्वाकांक्षाओं का होना कर्मों की प्रेरणा को रखना है, और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें, या सफलतापूर्वक करियर बना सकें—तो क्या इस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं है? उस प्रकार से न केवल कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है बल्कि संभवतः इतिहास पर अपनी छाप छोड़ सकता है—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी बात है, और उनके लिए यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। हालाँकि, क्या शैतान अपनी भयावह मंशाओं के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और बस इतना ही होता है? कदापि नहीं। वास्तव में, मनुष्य के आदर्श चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, चाहे मनुष्य की इच्छाएँ कितनी ही वास्तविक क्यों न हों या वे कितनी ही उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह जटिल रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बिठाने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? वे हैं "प्रसिद्धि" और "लाभ"। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का तरीका चुनता है, ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का अतिवादी मार्ग नहीं है, जिसके जरिए वह लोगों से अनजाने में जीवन जीने के उसके रास्‍ते को, जीने के उसके नियमों को स्वीकार करवाता है, और जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करवाता है, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में महत्‍वाकांक्षाएं पालने लगते हैं। चाहे जीवन में ये महत्‍वाकांक्षाएं कितनी ही ऊँची प्रतीत क्यों न होती हों, वे "प्रसिद्धि" और "लाभ" से अविभाज्‍य रूप से जुडी होती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, वास्तव में सभी लोग, वे जीवन में जिस किसी चीज़ का अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए इन चीजों का लाभ उठा सकते हैं। वे सोचते हैं कि प्रसिद्धि एवं लाभ एक प्रकार की पूंजी है, जिसका उपयोग करके वे मौजमस्‍ती और देहसुख का आनंद लेने का जीवन हासिल कर सकते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ, जो मनुष्‍य को इतना प्‍यारा है, के लिए लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियतियों को ले जा कर शैतान के हाथों में सौंप देते हैं ताकि उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्हें लालसा है। लोग वास्तव में इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और इस सब कुछ को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं। क्या लोगों के पास तब भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे इस प्रकार से शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं? कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सर्वथा शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सर्वथा दलदल में धंस गए हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ हैं। एक बार जब कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में पड़ जाता है, तो वह आगे से उसकी खोज नहीं करता है जो उजला है, जो धार्मिक है या उन चीज़ों को नहीं खोजता है जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रसिद्धि एवं लाभ की जो मोहक शक्ति लोगों के ऊपर है वह बहुत बड़ी है, वे लोगों के लिए उनके पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि पूरे अनंतकाल तक अनवरत अनुसरण करने की चीज़ें बन जाती हैं। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से अधिक और कुछ नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं हेतु बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त धन कमा सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो कोई व्‍यक्ति इतने वर्षों तक इन कठिनाइयों एवं कष्टों को क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि एवं लाभ आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे पुकार रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाइयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर यह ज्ञान क्या है? क्या यह जीवन जीने के नियम नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिन्हें उनके ज्ञान सीखने के दौरान शैतान के द्वारा उन्हें सिखाया गया है? क्या यह जीवन के "ऊँचे आदर्श" नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के विचारों, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीरोचित लोगों की बहादुरी के जोश को लें, या नायकों और सामरिक उपन्यासों में तलवारबाज़ों के शौर्य एवं उदारता को लें—क्‍या इन रास्‍तों से शैतान इन आदर्शों को नहीं बैठाता है? (हाँ, ऐसा है।) ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को इन विचारों को स्वीकार करने, इन विचारों के लिए जीने और इनका अनवरत अनुसरण के लिए तैयार किया जाता है। यही वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके जरिए शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान ने इस मार्ग पर लोगों की अगुवाई की उसके पश्चात्, क्या तब भी उनके लिए परमेश्वर की आराधना करना सम्भव है? क्या ज्ञान एवं नियम जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया है उनमें परमेश्वर की आराधना का कोई अंया भी है? क्या वे ऐसी कोई चीज़ रखते हैं जो सत्य से सम्बन्धित है? क्या वे परमेश्वर से डरने और बुराई से दूर रहने की किसी चीज़ से युक्त हैं? (नहीं, वे नहीं हैं।) तुम लोग थोड़ी अनिश्चितता की बातें करते हुए प्रतीत होते हो, परन्तु कोई बात नहीं। यदि तुम लोग यह स्वीकार करते हो कि "प्रसिद्धि" और "लाभ" ऐसे दो प्रमुख शब्द हैं जिन्हें शैतान लोगों को बुराई के मार्ग पर लुभाने के लिए उपयोग करता है, तो यह पर्याप्त है।

आओ हमने अब तक जितना विचार-विमर्श किया है, उसका संक्षेप में पुनरावलोकन करें : शैतान मनुष्य को मजबूती से अपने नियन्त्रण में रखने के लिए किस का उपयोग करता है? (प्रसिद्धि एवं लाभ का।) तो, शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है। अब शैतान की करतूतों को देखने पर, क्या उसकी भयानक मंशाएँ बिलकुल ही घिनौनी नहीं हैं? हो सकता है कि आज तुम लोग अब तक शैतान की भयानक मंशाओं की वास्तविक प्रकृति को नहीं देख पा रहे हो क्योंकि तुम लोग सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बिना कोई जी नहीं सकता है। तुम सोचते हो कि यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे के मार्ग को देखने में समर्थ नहीं रहेंगे, अपने लक्ष्यों को देखने में समर्थ नहीं रह जायेँगे, उनका भविष्य अंधकारमय, मद्धिम एवं विषादपूर्ण हो जाएगा। परन्तु, धीरे-धीरे तुम सभी लोग यह समझ जाओगे कि प्रसिद्धि एवं लाभ ऐसी भयानक बेड़ियाँ हैं जिनका उपयोग शैतान मनुष्य को बाँधने के लिए करता है। जब वो दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियन्त्रण का विरोध करोगे और उन बेड़ियों का पूरी तरह से विरोध करोगे जिनका उपयोग शैतान तुम्हें बाँधने के लिए करता है। जब वह समय आएगा कि तुम उन सभी चीज़ों को फेंकने की इच्छा करोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर डाला है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और तुम सच में उन सब से घृणा करोगे जिन्हें शैतान तुम तक लाया है। केवल तभी मानवजाति के पास परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम और लालसा होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 156

विज्ञान का अनुसंधान करने और रहस्यों की छानबीन करने की इंसानी जिज्ञासा और इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है। विज्ञान के नाम पर, शैतान, मनुष्य की उन भौतिक आवश्यकताओं और माँगों को संतुष्ट करता है जिनका उपयोग मनुष्य अपने जीवन की गुणवत्ता को निरन्तर बेहतर बनाने के लिए करता रहता है। इस तरह शैतान, इस बहाने से, मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है। क्या यह सिर्फ मनुष्य की सोच है या मनुष्य का दिमाग है जिसे शैतान विज्ञान का इस तरीके से उपयोग करके भ्रष्ट करता है? हमारे पास-पड़ोस के लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों में, जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके सम्पर्क में हम आते हैं, और ऐसा क्या है जिसे शैतान विज्ञान से भ्रष्ट करता है? (प्राकृतिक पर्यावरण।) सही कहा। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों ने इसके कारण भारी नुकसान झेला है, और तुम लोग बहुत अधिक प्रभावित हुए हो। मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान की सब प्रकार की विभिन्न खोजों एवं निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, शैतान विज्ञान का उपयोग एक ऐसे साधन के रूप में भी करता है जिससे जीवित रहने के उस पर्यावरण का मनमाने ढंग से विनाश एवं दोहन करे जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया था। वह इसे इस बहाने से करता है कि यदि मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रियान्वित करता है, तो मनुष्य का रहने का वातावरण तथा जीवन की गुणवत्ता में निरन्तर सुधार होगा, और इसके अतिरिक्त वह यह बहाना करता है कि वैज्ञानिक विकास, लोगों की बढ़ती हुई दैनिक भौतिक आवश्यकताओं और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करने की उनकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए है। यह शैतान का विज्ञान के विकास का सैद्धान्तिक आधार है। हालाँकि, विज्ञान ने मानवजाति को क्या दिया है? हम जिस पर्यावरण से जुड़े हैं वह किन चीज़ों से मिलकर बना हुआ है? क्या जिस वायु में मनुष्यजाति साँस लेती है, वह प्रदूषित नहीं हो गयी है? क्या वह जल जिसे हम पीते हैं, अभी भी सचमुच शुद्ध है? (नहीं।) जो भोजन हम खाते हैं, क्या वो प्राकृतिक है? उसका अधिकांश भाग रासायनिक उर्वरक का उपयोग करके उगाया जाता है और आनुवांशिक संशोधन का उपयोग करके इसकी खेती की जाती है, और साथ ही विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करने के कारण हुए उत्परिवर्तन भी हैं। यहाँ तक कि सब्जियाँ और फल जिन्हें हम खाते हैं, वे भी अब प्राकृतिक नहीं रह गए हैं। प्राकृतिक अण्डे पाना भी अब आसान नहीं है और शैतान के तथाकथित विज्ञान के द्वारा पहले से ही संसाधित कर दिए जाने के कारण अण्डों का वैसा स्वाद भी नहीं रहा जैसा पहले हुआ करता था। पूरे मामले को समझें तो, समूचे वातावरण को नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़ों, झीलों, जंगलों, नदियों, महासागरों, और भूमि के ऊपर और नीचे की हर चीज़ को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों के द्वारा नष्ट कर दिया गया है। संक्षेप में, सम्पूर्ण प्राकृतिक पर्यावरण एवं जीवन जीने के लिए परमेश्वर के द्वारा मनुष्यजाति को प्रदान किया गया सम्पूर्ण पर्यावरण, तथाकथित विज्ञान के द्वारा नष्ट एवं बर्बाद कर दिया गया है। यद्यपि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने, अपनी इच्छाओं और अपने शरीर दोनों को संतुष्ट करते हुए, जीवन की गुणवत्ता के सन्दर्भ में वह प्राप्त कर लिया है जिसकी उन्होंने सदैव आशा की थी, लेकिन जिस पर्यावरण में मनुष्य रहता है, उसे विज्ञान द्वारा लाई गई विभिन्न "उपलब्धियों" के द्वारा मूल रूप से नष्ट एवं बर्बाद कर दिया गया है। अब हमें स्वच्छ हवा की एक साँस लेने का भी अधिकार नहीं रह गया है। क्या यह मनुष्यजाति का दुःख नहीं है? क्या मनुष्य के लिए अभी भी खुशी की कोई बात रह गयी है जबकि उसे ऐसी जगह में रहना पड़ रहा है? शुरुआत से ही, मनुष्य जिस जगह और जिस पर्यावरण में रहता है वह परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए सृजित किया गया था। वह जल जिसे लोग पीते हैं, वह वायु जिसमें लोग साँस लेते हैं, वह भोजन जिसे लोग खाते हैं, पौधे, पेड़, और महासागर—रहने के इस पर्यावरण का हर हिस्सा, परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, और परमेश्वर के द्वारा स्थापित प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार संचालित हो रहा है। यदि विज्ञान नहीं होता, तो लोग खुश होते और परमेश्वर के तरीके से हर चीज़ का उसके असल रूप में आनन्द उठा सकते थे और परमेश्वर ने उनके सुख के लिए उन्हें जो कुछ प्रदान किया है उसका आनन्द उठा सकते थे। लेकिन, अब यह सब-कुछ शैतान के द्वारा नष्ट और बर्बाद कर दिया गया है; मनुष्य के रहने की मूलभूत जगह अब अपने मूल स्वरूप में नहीं रह गयी है। परन्तु कोई भी यह समझ नहीं पाता कि यह किस कारण हुआ या यह कैसे हुआ है, अधिक से अधिक लोग शैतान के द्वारा उनमें डाले गए उन विचारों का उपयोग करके विज्ञान को समझते हैं और विज्ञान के नज़दीक आते हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद एवं दयनीय नहीं है? अब जबकि शैतान ने उस जगह को ले लिया है जिसमें लोग जीते हैं, साथ ही उनके रहने के पर्यावरण को भी ले लिया है और उन्हें इस स्थिति तक भ्रष्ट कर दिया, और मानवजाति के निरन्तर इस तरह से विकसित होते रहने से, क्या परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से इन लोगों को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? यदि लोग निरन्तर इसी रीति से विकसित होते रहे, तो वे कौन-सी दिशा में जायेंगे? (वे पूर्णतया विनष्ट कर दिए जाएँगे।) वे कैसे पूर्णतया विनष्ट कर दिए जाएँगे? प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए लोग अपनी लालच-भरी खोज के अलावा, निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण करते हैं एवं अनुसंधान की गहराई में उतरते रहते हैं, फिर वे लगातार अपनी भौतिक आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए कार्य करते रहते हैं; तो फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे होते हैं? सबसे पहले, पर्यावरणीय संतुलन टूट जाता है, जब ये होता है, तो लोगों के शरीर, उनके आंतरिक अंग इस असंतुलित पर्यावरण से दूषित एवं क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, और दुनिया भर में विभिन्न संक्रामक रोग और महामारियाँ फैल जाती हैं। क्या यह सच नहीं है कि अब ऐसी स्थिति है जिस पर मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है? अब जबकि तुम लोग इसे समझते हो, यदि मनुष्यजाति परमेश्वर का अनुसरण न करे, बल्कि इस तरह से हमेशा शैतान का अनुसरण करे—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करे, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करे, जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करे—तो क्या तुम समझ सकते हो कि मानवजाति के लिए इसका अन्त क्या होगा? (इसका अर्थ होगा विलोपन।) हाँ, इसका अंत विलोपन के रूप में होगा : एक-एक कदम बढ़ाते हुए, मानवजाति विलुप्त होने के कगार पर आ रही है! अब ऐसा लग रहा है मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई पेय है जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम लोग चीज़ों को समझने की कोशिश करो तो तुम लोग अस्पष्ट धुंध में ऐसा करो; चाहे तुम कितने ही ध्यान से क्यों न देखो, तुम चीज़ों को साफ-साफ नहीं देख सकते, और चाहे तुम लोग कितना ही प्रयास क्यों न करो, तुम उन्हें समझ नहीं सकते। क्योंकि, तुम्हारी भूख को बढ़ाने और कदम-कदम बढ़ाते हुए तुम्हें रसातल तथा मृत्यु की ओर ज़बरदस्ती ले जाने के लिए, शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 157

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारम्परिक संस्कृति का उपयोग करता है। पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास के बीच अनेक समानताएँ हैं, लेकिन अंतर यह है कि पारम्परिक संस्कृति में कुछ निश्चित कहानियाँ, संकेत, एवं स्रोत होते हैं। शैतान ने, लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या मिथ्याधर्मी प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में गहरा प्रभाव डालते हुए, कई लोक कथाओं या कहानियों को गढ़ा और बनाया है जो इतिहास की पुस्तकों में मिलती हैं। उदाहरण के लिए, चीन में, "आठ अमर हस्तियों का समुद्र पार करना," "पश्चिम की ओर यात्रा," जेड सम्राट, "नेज़्हा की अजगर राजा पर विजय," और "ईश्वरों का अधिष्ठापन।" क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग पूरी कहानी विस्तार से न जानें, फिर भी तुम मोटे तौर पर कहानियों को तो जानते ही हो, और मोटे तौर की यही जानकारी है जो तुम्हारे हृदय और मन में बैठ जाती है, ताकि तुम इसे भुला न सको। ये ही वे विभिन्न विचार या किंवदंतियाँ हैं जिन्हें शैतान ने बहुत समय पहले मनुष्य के लिए तैयार किया था जिन्हें विभिन्न समयों पर को फैलाया गया है। ये चीज़ें प्रत्यक्ष रूप से लोगों की आत्माओं को हानि पहुँचाती हैं और नष्ट करती हैं और लोगों को एक के बाद एक मायाजाल में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुम ऐसी पारम्परिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वासी चीज़ों को स्वीकार कर लेते हो, जब एक बार ये तुम्हारे मन में बैठ जाती हैं, और जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह तुम्हारे सम्मोहित हो जाने जैसा है—तुम इन सांस्कृतिक जालों में, इन विचारों एवं पारम्परिक कथाओं में उलझ जाते हो और प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, जीवन को देखने के तुम्हारे नज़रिये, चीज़ों के बारे में तुम्हारे फैसले को प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर, वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं : यह वास्तव में एक दुष्टतापूर्ण मायाजाल है। तुम जितनी भी कोशिश कर लो, परन्तु उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते; तुम उन पर चोट तो करते हो किन्तु उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु उन पर प्रहार करके उन्हें दूर नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, जब लोगों की जानकारी के बिना उन पर इस प्रकार का मायाजाल डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में, अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हुए, शैतान की आराधना करना आरम्भ कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, अपने लिए एक आराधना करने और आदर करने की वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि वे उसे परमेश्वर मानने की हद तक भी चले जाते हैं। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं, उनके वचनों एवं कर्मों को नियन्त्रित कर रही हैं। इसके अलावा, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, और फिर तुम अनजाने में इनके अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक व्यक्ति, वास्तविक, विद्यमान वस्तु बना देते हो। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। तुम अवचेतन रूप से दुष्टात्माओं, शैतान एवं मूर्तियों को भी अपने घर में और अपने हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक मायाजाल है। क्या तुम लोग इन बातों से खुद को जोड़ पा रहे हो? (हाँ।) क्या तुम लोगों के बीच में ऐसे लोग हैं जिन्होंने बुद्ध के सामने धूप जलायी है और उसकी आराधना की है? (हाँ।) तो धूप जलाने और बुद्ध की आराधना करने का उद्देश्य क्या था? (शान्ति के लिए प्रार्थना करना।) इसके बारे में अब सोचो तो, क्या शांति के लिए शैतान से प्रार्थना करना बेतुका नहीं है? क्या शैतान शान्ति लाता है? (नहीं।) क्या तुम लोग नहीं देख पा रहे कि पहले तुम कितने अज्ञानी थे? इस प्रकार का आचरण बहुत ही बेतुका, अज्ञानता एवं बेवकूफी भरा है, है कि नहीं? शैतान सिर्फ इससे मतलब रखता है कि किस प्रकार तुम्हें भ्रष्ट किया जाए। शैतान तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता, वह तुम्हें केवल अस्थायी राहत ही दे सकता है। परन्तु यह राहत पाने के लिए तुम्हें अवश्य एक प्रतिज्ञा लेनी होगी और यदि तुम अपने वादे या उस प्रतिज्ञा को तोड़ते हो जो तुमने शैतान से किया है, तो तुम देखोगे कि वह तुम्हें किस प्रकार कष्ट देता है। तुमसे एक प्रतिज्ञा दिलवा कर, वह वास्तव में तुम्हें नियंत्रित करना चाहता है। जब तुम लोगों ने शान्ति के लिए प्रार्थना की थी, तो क्या तुम लोगों ने शान्ति पाई? (नहीं।) तुम लोगों ने शान्ति नहीं पाई, इसके विपरीत तुम्हारे प्रयास केवल दुर्भाग्य, अंतहीन आपदाएँ लाये, सच में कड़वाहट का असीम महासागर लाये। शान्ति शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, और यह सत्य है। यह वह परिणाम है जो सामंती अन्धविश्वास और पारम्परिक संस्कृति मानवजाति के लिए लाये हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 158

सामाजिक प्रवृत्तियों से शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। "सामाजिक प्रवृत्तियों" में अनेक बातें शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं : "क्या इसका अर्थ नवीतनम फैशन, सौन्दर्य प्रसाधन, बालों की शैली और स्वादिष्ट भोजन है?" क्या ये चीज़ें सामाजिक प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं? ये सामाजिक प्रवृतियों का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ उनके बारे में बात नहीं करेंगे। हम बस ऐसे विचारों के बारे में बात करना चाहते हैं जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों में उत्पन्न करती हैं, जिस तरह से वे संसार में लोगों से आचरण करवाती हैं, और लोगों में जीवन के लक्ष्यों एवं जीवन को देखने का जो नज़रिया उत्पन्न करती हैं उन पर बात करना चाहते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की अवस्था को नियन्त्रित और प्रभावित कर सकती हैं। ये सभी प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उठती हैं, और उन सभी का दुष्ट प्रभाव होता है जो निरन्तर मनुष्य को पतित करता रहता है, जिसके कारण लोग लगातार विवेक, मानवता और तर्कशीलता को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और अधिक कमजोर कर देता है, इस हद तक कि हम यह भी कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों में कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनमें कोई विवेक है, और तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। तो ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? ये वो प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें तुम खुली आँखों से नहीं देख सकते। जब कोई नयी प्रवृत्ति दुनिया पर छा जाती है, तो कदाचित् सिर्फ कुछ ही लोग अग्रणी स्थान पर होते हैं, जो प्रवृत्ति स्थापित करने वालों के तौर पर काम करते हैं। वे कुछ नया काम करते हुए शुरुआत करते हैं, फिर कुछ नए विचार या कुछ नए दृष्टिकोण स्वीकार करते हैं। लेकिन, अनभिज्ञता की दशा में, अधिकांश लोग इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। एक के बाद एक, ऐसी प्रवृत्तियाँ लोगों से, जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के नहीं हैं; जो नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, और जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं कर सकते हैं, इन्हें और साथ ही जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को जो शैतान से आते हैं खुशी से स्वीकार करवाती हैं। शैतान उन्हें जीवन के प्रति नज़रिया रखने के बारे में जो बताता है वे उसे और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार कर लेता है जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है, और उसने पास न तो सामर्थ्य है, न ही योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। तो, ये प्रवृत्तियाँ आखिर क्या हैं? मैंने एक साधारण-सा उदाहरण चुना है जो तुम लोगों को धीरे-धीरे समझ में आ सकता है। उदाहरण के लिए, अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार चलाते थे जिससे कोई भी धोखा न खाये; वे वस्तुओं को एक ही दाम में बेचते थे, इस बात की परवाह किए बिना कि कौन खरीद रहा है। क्या यहाँ अच्छे विवेक एवं मानवता के कुछ तत्व व्यक्त नहीं हो रहे हैं? जब लोग अपने व्यवसाय को ऐसे, अच्छे विश्वास के साथ संचालित करते थे, तो यह देखा जा सकता है कि उस समय भी उनमें कुछ विवेक, कुछ मानवता बाकी थी। परन्तु मनुष्य की धन की लगातार बढ़ती हुई माँग के कारण, लोग अनजाने में धन, लाभ, मनोरंजन और अन्य कई चीजों से प्रेम करने लगे थे। संक्षेप में, लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रुप में देखने लगे थे। जब लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी प्रसिद्धि, अपनी प्रतिष्ठा, अपने नाम, और अपनी ईमानदारी को कम महत्व देने लगते हैं; क्या वे ऐसा नहीं करते? जब तुम व्यवसाय करते हो, तो तुम लोगों को ठगने के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग करते और धनी बनते हुए देखते हो। यद्यपि जो धन कमाया गया है वह बेईमानी से प्राप्त हुआ है, फिर भी वे और भी अधिक धनी बनते जाते हैं। भले ही तुम्हारा और उनका व्यवसाय एक हो, परन्तु तुम्हारी अपेक्षा उनका परिवार कहीं अधिक जीवन का आनन्द उठाता है, और तुम बुरा महसूस करते हुए खुद से यह कहते हो कि : "मैं वैसा क्यों नहीं कर सकता? मैं उतना क्यों नहीं कमा पाता हूँ जितना वे कमाते हैं? मुझे और अधिक धन प्राप्त करने के लिए, और अपने व्यवसाय की उन्नति के लिए कोई तरीका सोचना होगा।" तब तुम इस बारे में अपना भरसक विचार करते हो कि कैसे बहुत सा पैसा बनाया जाए। धन कमाने के सामान्य तरीके के अनुसार—सभी ग्राहकों को एक ही कीमत पर वस्तुओं को बेच कर—जो धन तुम कमाते हो वह अच्छे विवेक से कमाया गया है। परन्तु यह जल्दी अमीर बनने का तरीका नहीं है। लाभ कमाने की तीव्र इच्छा से प्रेरित होकर, तुम्हारी सोच धीरे-धीरे बदलती है। इस रुपान्तरण के दौरान, तुम्हारे आचरण के सिद्धान्त भी बदलने शुरू हो जाते हैं। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे मन में संदेह होता है, तुम कहते हो, "यह आख़िरी बार है कि मैंने किसी को धोखा दिया है| मैं ऐसा दोबारा नहीं करूँगा। मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता। लोगों को धोखा देने के गंभीर परिणाम होते हैं। इससे मैं बड़ी मुश्किलों में पड़ जाऊँगा!" जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे हृदय में कुछ नैतिक संकोच होते हैं; यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—तुम्हें नैतिक संकोच का एहसास कराना और तुम्हें धिक्कारना, ताकि जब तुम किसी को धोखा दो तो असहज महसूस करो। परन्तु जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो, तो तुम देखते हो कि अब तुम्हारे पास पहले की अपेक्षा अधिक धन है, और तुम सोचते हो कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे हृदय में हल्के से दर्द के बावजूद, तुम्हारा मन करता है कि तुम अपनी सफलता पर स्वयं को बधाई दो, और तुम स्वयं से थोड़ा खुश महसूस करते हो। पहली बार, तुम अपने व्यवहार को, अपने धोखे को मंजूरी देते हो। इसके बाद, जब एक बार मनुष्य ऐसे धोखे से दूषित हो जाता है, तो यह उस व्यक्ति के समान हो जाता है जो जुआ खेलता है और फिर एक जुआरी बन जाता है। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अपने स्वयं के धोखाधड़ी के व्यवहार को मंजूरी दे देते हो और उसे स्वीकार कर लेते हो। अनभिज्ञता में, तुम धोखाधड़ी को जायज़ वाणिज्यिक व्यवहार मान लेते हो और अपने जीने के लिए और अपनी रोज़ी-रोटी के लिए तुम धोखाधड़ी को अत्यंत उपयोगी साधन मान लेते हो; तुम सोचते हैं कि ऐसा करके तुम जल्दी से पैसे बना सकते हो। यह एक प्रक्रिया है : शुरुआत में, लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पाते, वे इस व्यवहार और अभ्यास को नीची दृष्टि से देखते हैं, फिर वे स्वयं ऐसे व्यवहार से प्रयोग करने लगते हैं, अपने तरीके से इसे आजमाते हैं, और उनका हृदय धीरे-धीरे रूपान्तरित होना शुरू हो जाता है। यह किस तरह का रूपान्तरण है? यह इस प्रवृत्ति की, इस प्रकार के विचार की स्वीकृति और मंजूरी है जिसे सामाजिक प्रवृत्ति के द्वारा तुम्हारे भीतर डाला गया है। इसका एहसास किए बिना, यदि तुम लोगों के साथ व्यवसाय करते समय उन्हें धोखा नहीं देते हो, तो तुम महसूस करते हो कि तुम दुष्टतर हो; यदि तुम लोगों को धोखा नहीं देते हो तो तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी चीज़ को खो दिया है। अनजाने में, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी बन जाती है, और एक प्रकार का अत्यावश्यक व्यवहार बन जाती है जो तुम्हारे जीवन में एक सिद्धान्त है। जब मनुष्य इस प्रकार के व्यवहार और ऐसी सोच को स्वीकार कर लेता है, तो क्या यह उसके हृदय में परिवर्तन नहीं लाता है? तुम्हारा हृदय परिवर्तित हो गया है, तो क्या तुम्हारी ईमानदारी भी बदल गयी है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गयी है? क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? (हाँ।) हाँ, ऐसे मनुष्यों का हर हिस्सा, उसके हृदय से लेकर उसके विचारों तक, इस हद तक एक गुणात्मक परिवर्तन से गुज़रता है कि वह भीतर से लेकर बाहर तक रूपांतरित हो जाता है। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से दूर करता चला जाता है तथा तुम अधिक से अधिक शैतान के अनुरूप बनते चले जाते हो; तुम अधिक से अधिक शैतान के समान बन जाते हो।

जब इन सामाजिक प्रवृत्तियों को देखते हो, तो क्या तुम कहोगे कि उनका लोगों पर बहुत बड़ा प्रभाव है? क्या इनका लोगों पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव होता है? (हाँ।) उनका लोगों पर बहुत ही गहरा हानिकारक प्रभाव होता है। शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का एक के बाद एक उपयोग करते हुए मनुष्य में किन चीजों को भ्रष्ट करता? (मनुष्य का विवेक, तर्क, मानवता, नैतिकता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण।) वे मनुष्य में क्रमिक पतन का कारण बनते हैं, है न? शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है ताकि एक-एक कदम करके लोगों को दुष्टात्माओं के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि सामाजिक प्रवृत्तियों में फँसे लोग अनजाने में ही धन, भौतिक इच्छाओं, दुष्टता एवं हिंसा का समर्थन करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्टात्मा, शैतान बन जाता है! क्यों? मनुष्य के हृदय में कौन से मनोवैज्ञानिक झुकाव हैं? मनुष्य किस बात का सम्मान करता है? मनुष्य दुष्टता और हिंसा में आनंद लेना शुरू कर देता है, वो खूबसूरती या अच्छाई के प्रति प्रेमभाव नहीं दिखाता, शांति के प्रति तो बिलकुल भी नहीं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए ऊँची हैसियत एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों और बन्धनों के बिना, अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं; दूसरे शब्दों में जो कुछ भी वे चाहते हैं, करते हैं। तो जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है वह खुद को छुड़ाने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास की तुम्हारी समझ क्या इस भयानक दुर्दशा से बचने में तुम्हारी सहायता कर सकती है? क्या पारम्परिक नैतिकता एवं अनुष्ठान जिन्हें मनुष्य जानता है, संयम बरतने में लोगों की सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, तीन उत्कृष्ट चरित्र (थ्री करेक्टर क्लासिक) को लो। क्या यह इन प्रवृत्तियों के दलदल में से अपने पाँवों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, नहीं कर सकता है।) इस तरह, मनुष्य और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, दूसरों को नीचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण बन जाता है। लोगों के बीच अब और कोई स्नेह नहीं रह जाता है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह जाता है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई तालमेल नहीं रह जाता है; हिंसा मानवीय रिश्तों की विशेषता बन जाती है। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्यों के बीच रहने के लिए हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे हिंसा का उपयोग करके अपनी दैनिक रोटी झपट लेते हैं; वे हिंसा का उपयोग करके अपने पद को प्राप्त कर लेते हैं और अपने लाभों को प्राप्त करते हैं और वे अपनी मनमर्ज़ी करने के लिए हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।) अभी-अभी मैंने जिन चीज़ों के बारे में बात की है उसे सुनने के बाद, क्या तुम लोगों को इस परिवेश में, इस संसार में, इस प्रकार के लोगों के बीच में रहना भयावह नहीं लगता है, जिनके बीच शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है? (हाँ।) तो, क्या तुम लोगों ने कभी अपने आपको दयनीय महसूस किया है? इस पल में तुम्हें ऐसा थोड़ा महसूस हो रहा होगा, है न? (हाँ।) तुम लोगों के स्वर को सुनकर, ऐसा प्रतीत होता है मानो कि तुम लोग सोच रहे हो, "शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए बहुत सारे भिन्न-भिन्न तरीके हैं। वह प्रत्येक अवसर को झपट लेता है और जहाँ कहीं हम जाते हैं वह वहाँ होता है। क्या तब भी मनुष्य को बचाया जा सकता है?" क्या तब भी मनुष्य को बचाया जा सकता है? क्या मनुष्य अपने आपको बचा सकता है? (नहीं।) क्या जेड सम्राट मनुष्य को बचा सकता है? क्या कन्फयूशियस मनुष्य को बचा सकता है? क्या गुआनयिन बोधिसत्व मनुष्य को बचा सकता है? (नहीं।) तो कौन मनुष्य को बचा सकता है? (परमेश्वर।) हालाँकि, कुछ लोग अपने हृदय में ऐसे प्रश्नों को उठाएँगे : "शैतान हमें इतनी बुरी तरह से, इतने पागलपन भरे उन्माद में हानि पहुँचाता है कि हमारे पास जीयव्न जीने की कोई उम्मीद नहीं रहती है, न ही जीवन जीने का कोई आत्मविश्वास रहता है। हम सभी भ्रष्टता के बीच जीते हैं और हर एक व्यक्ति किसी न किसी तरीके से परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और अब हमारे हृदय इतना नीचे डूब गए हैं जितना संभव था। तो जब शैतान हमें भ्रष्ट कर रहा है, तो परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर क्या कर रहा है? जो कुछ भी परमेश्वर हमारे लिए कर रहा है, हम उसे कभी महसूस नहीं करते हैं!" कुछ लोग अपरिहार्य रूप से निरुत्साहित और कुछ निराशा का अनुभव करते हैं, है ना? तुम लोगों के लिए, यह अनुभूति बहुत गहरी है क्योंकि वह सब जो मैं कहता रहा हूँ वह इसलिए है कि लोगों को धीरे-धीरे समझ में आ जाए, वे और भी अधिक यह महसूस करें कि वे आशारहित हैं, कि वे और भी अधिक यह महसूस करें कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया है। परन्तु चिंता न करो। आज हमारी संगति का विषय, "शैतान की दुष्टता," हमारी वास्तविक विषयवस्तु नहीं है। हालाँकि, परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में बातचीत करने के लिए, हमें सबसे पहले किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और शैतान की दुष्टता पर विचार-विमर्श करना चाहिए ताकि इसे लोगों के लिए और अधिक स्पष्ट किया जा सके कि मनुष्य इस समय किस प्रकार की स्थिति में है। इस बारे में बात करने का एक लक्ष्य, लोगों को शैतान की दुष्टता के बारे में जानने देना है, जबकि दूसरा लक्ष्य लोगों को और गहराई से यह समझने देना है कि सच्ची पवित्रता क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 159

जब कभी भी शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है या उसे निरंकुश क्षति पहुँचाता है, तो परमेश्वर बेपरवाही से चुपचाप देखता नहीं रहता है, ना ही वह अपने चुने हुओं की उपेक्षा करता है या उन्हें अनदेखा करता है। परमेश्वर वह सब कुछ जो शैतान जो करता है उसे बिलकुल स्पष्ट रूप से समझता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि शैतान क्या करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रवृत्ति को उत्पन्न करता है, परमेश्वर वह सब जानता है जिसे शैतान करने का प्रयास कर रहा है, और परमेश्वर उन लोगों को नहीं छोड़ता है जिन्हें उसने चुना है। इसके बजाए, कोई ध्यान आकर्षित किए बिना—गुप्त रूप से, चुपचाप—परमेश्वर वह सब करता है जो आवश्यक है। जब परमेश्वर किसी पर कार्य करना आरम्भ करता है, जब वह किसी को चुन लेता है, तो वह इस समाचार की घोषणा किसी को नहीं करता है, न ही वह इसकी घोषणा शैतान को करता है, कोई भव्य भाव प्रदर्शन तो बिलकुल नहीं करता है। वह बस बहुत शान्ति से, बहुत स्‍वाभाविक रूप से, जो ज़रूरी है उसे करता है। सबसे पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; तुम्हारे परिवार की पृष्ठभूमि, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे पूर्वज—यह सब परमेश्वर पहले से ही तय कर देता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ये निर्णय किसी सनक के चलते नहीं लेता; बल्कि इसके बजाए उसने यह कार्यलम्बे समय पहले शुरू कर दिया था। जब एक बार परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवार का चुन लेता है, फिर वह उस तिथि को चुनता है जब तुम्हारा जन्म होगा। फिर, जब तुम जन्म लेते हो और रोते हुए इस संसार में आते हो तो परमेश्वर देखता है। वो तुम्हारे जन्म को देखता है, तुम्हें देखता है जब तुम अपने पहले शब्दों को बोलते हो, तुम्हें देखता है जब तुम चलना सीखते हुए लड़खड़ाते हो और डगमगाते हुए अपने पहले कदमों को उठाते हो। पहले तुम एक कदम लेते हो फिर दूसरा कदम लेते हो ... अब तुम दौड़ सकते हो, कूद सकते हो, बात कर सकते हो, अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो। जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, शैतान की निगाह उनमें से प्रत्येक पर जम जाती है, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। परन्तु अपने कार्य को करने में, परमेश्वर कभी भी लोगों, घटनाओं या चीज़ों, अन्तराल या समय की सीमाओं के अधीन नहीं रहा है; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और वही करता है जो उसे करना चाहिए। बड़े होने की प्रक्रिया में, हो सकता है कि तुम कई चीज़ों का सामना कर सकते हो जो तुम्हारी पसन्द की न हों, जैसे कि बीमारी एवं कुंठा। परन्तु जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम्हारा जीवन और तुम्हारा भविष्य पूरी तह से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। परमेश्वर तुम्हें एक विशुद्ध गारंटी देता है जो सम्पूर्ण जीवन भर बनी रहती है, क्योंकि वह, तुम्हारी रक्षा करते हुए और तुम्हारी देखभाल करते हुए, बिलकुल तुम्हारे बगल में ही है। तुम इस बात से अनजान रहते हुए बड़े होते हो। तुम नई-नई चीज़ों के सम्पर्क में आने लगते हो और इस संसार को और इस मानवजाति को जानना आरम्भ करते हो। तुम्हारे लिए हर एक चीज़ ताज़ी और नयी होती है। कुछ बातें हैं जो तुम्हें करनी अच्छी लगती हैं। तुम अपनी मानवता के भीतर रहते हो, अपने दायरे के भीतर जीते हो, और तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जरा-सी भी अनुभूति नहीं होती है। परन्तु जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और तुम्हें देखता है जब तुम आगे की ओर हर कदम उठाते हो। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञान की बातें सीखते हो, या विज्ञान का अध्ययन करते हो, तब एक कदम के लिए भी परमेश्वर ने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा है। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान हो, इस संसार को जानने और उसके जुडने के दौरान, तुमने अपने स्वयं के आदर्शों को स्थापित कर लिया है, तुम्हारे अपने शौक, तुम्हारी स्वयं की रूचियाँ हैं, और तुम ऊँची महत्वाकांक्षाओं को भी मन में रखते हो। तुम प्रायः अपने स्वयं के भविष्य पर विचार करते हो, प्राय: रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारा भविष्य कैसा दिखना चाहिए। परन्तु मार्ग पर जो भी होता है, परमेश्वर स्पष्टता से सब कुछ होते हुए देखता है। हो सकता है कि तुम स्वयं अपने अतीत को भूल गए हो, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कोई नहीं है जो उससे बेहतर तुम्हें समझ सकता है। तुम बड़े होते हुए, परिपक्व होते हुए, परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीते हो। इस अवधि के दौरान, परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुछ ऐसा है जिसका कोई कभी एहसास नहीं करता है, कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। परमेश्वर निश्चित रूप से किसी को इसके बारे में नहीं बताता है। तो, सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कहा जा सकता है कि यह एक गारंटी है कि परमेश्वर एक व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि अगर परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, तो उसे यह करना ही होगा। यह कार्य मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्या तुम जानते हो ये क्या है? क्या तुम लोग यह जानते हो? ऐसा लगता है कि तुम लोगों के पास इसके बारे में कोई अनुभूति नहीं है, या इसके बारे में कोई धारणा नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों को बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर ने तुम पर बहुत सा कार्य सम्पन्न किया है, परन्तु हर चीज़ जो उसने की है वह उसका तुम्हें विस्तृत विवरण नहीं देता है। परमेश्वर ने यह जानने की तुम्हें अनुमति नहीं दी, न ही उसने तुम्हें बताया। हालाँकि, मानवजाति के लिए, हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह महत्वपूर्ण है। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, यह कुछ ऐसी चीज़ है जो उसे अवश्य करनी चाहिए। उसके हृदय में ऐसी कोई महत्वपूर्ण चीज़ है जो उसे करनी है, जो इन चीज़ों में से किसी से भी कहीं बढ़कर है। अर्थात, जब एक व्यक्ति पैदा होता है, उस समय से लेकर वर्तमान दिन तक, परमेश्वर को उसकी सुरक्षा की गारंटी अवश्य देनी चाहिए। इन वचनों को सुनने के बाद, हो सकता है कि तुम लोग ऐसा महसूस करो मानो कि तुम लोगों को पूरी तरह समझ नहीं आ रहा है। तुम पूछ सकते हो, "क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?" "सुरक्षा" का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ शांति समझते हो या हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ कभी भी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छी तरह से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना समझते हो। परन्तु अपने हृदय में, तुम लोगों को जानना चाहिए कि यह इतना सरल नहीं है। तो आखिर यह क्या चीज़ है जिसके बारे में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए सुरक्षा का क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में "सुरक्षा" के सामान्य अर्थ की गारंटी है? नहीं। तो वह क्या है जो परमेश्वर करता है? इस "सुरक्षा" का अर्थ यह है कि तुम शैतान के द्वारा निगले नहीं जाओगे। क्या यह महत्वपूर्ण है? शैतान के द्वारा निगला नहीं जाना, यह तुम्हारी सुरक्षा से सम्बन्धित है या नहीं? हाँ, यह तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से सम्बन्धित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता है। जब एक बार तुम शैतान के द्वारा निगल लिए जाते हो, तो तुम्हारी आत्मा और तुम्हारा शरीर परमेश्वर से संबंधित नहीं रह जाता है। परमेश्वर तुम्हें अब और नहीं बचाएगा। परमेश्वर इस तरह की आत्माओं और लोगों को त्याग देता है जो शैतान द्वारा निगले जा चुके हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो परमेश्वर को करनी है वह है तुम्हारी इस सुरक्षा की गारंटी देना, यह गारंटी देना कि तुम शैतान के द्वारा निगले नहीं जाओगे। यह बहुत महत्वपूर्ण है, है न? तो तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे पा रहे हो? लगता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया को महसूस नहीं कर पा रहे हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 160

परमेश्वर लोगों की सुरक्षा की गारंटी देने, और यह गारंटी देने कि वे शैतान के द्वारा निगले नहीं जाएँगे, के अतिरिक्त बहुत कुछ करता है। वह किसी को चुनने और उसे बचाने से पहले, बहुत-से तैयारी के कार्य करता है। सबसे पहले, परमेश्वर इसके संबंध में अतिसावधानी से तैयारी करता है कि तुम्हारा चरित्र किस प्रकार का होगा, किस प्रकार के परिवार में तुम पैदा होगे, कौन तुम्हारे माता-पिता होंगे, तुम्हारे कितने भाई-बहन होंगे, जिस परिवार में तुम्‍हारा जन्‍म हुआ है उसकी स्थिति, आर्थिक दशा और परिस्थितियाँ क्या होगी। क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर के चुने हुए अधिकतर लोग किस प्रकार के परिवार में पैदा होते हैं? क्या वे प्रमुख परिवार होते हैं? हम निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते हैं कि ऐसा कोई नहीं है जो नामी-गिरामी परिवार में पैदा हुआ हो। कुछ हो सकते हैं, परन्तु वे बहुत कम होते हैं। क्या वे असाधारण धन-सम्पत्ति वाले परिवार में पैदा होते हैं, जैसे कि अरबपति या खरबपति? नहीं, वे लगभग कभी भी इस प्रकार के परिवार में पैदा नहीं होते हैं। तो परमेश्वर इन लोगों में से अधिकांश के लिए किस प्रकार के परिवार की व्यवस्था करता है? (साधारण परिवार।) तो कौन से परिवार साधारण परिवार माने जा सकते हैं? उनमें कामकाजी परिवार शामिल होते हैं, अर्थात्, एक बार जब वे जीवित बचे रहने के लिए मजदूरी पर निर्भर हो जाते हैं, तो आधारभूत आवश्यकताओं को जुटा सकता है। और अत्यधिक धनी नहीं होते हैं; इनमें किसानी परिवार भी शामिल हैं। किसान अपने भोजन के लिए फसल उगाने पर आश्रित होते हैं, उनके पास खाने के लिए अनाज होता है और पहनने के लिए कपड़े होते हैं, औरवे भूखे नहीं रहते हैं। फिर कुछ ऐसे परिवार हैं जो छोटे व्यवसाय चलाते हैं, और कुछ जहाँ माता-पिता बुद्धिजीवी हैं, इन्हें भी साधारण परिवार के रूप में ही गिना जा सकता है। कुछ ऐसे माता-पिता भी होते हैं जो कार्यालय कर्मचारी या मामूली सरकारी अधिकारी होते हैं, उन्हें भी प्रमुख परिवारों के रुप में नहीं गिना जा सकता है। अधिकतर लोग साधारण परिवारों में पैदा होते हैं, और यह सब परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित किया जाता है। अर्थात्, सबसे पहले तो यह परिवेश जिसमें तुम रहते हो वह सम्पन्न साधनों वाला परिवार नहीं होता जिसकी शायद लोग कल्पना करें, और यह ऐसा परिवार है जिसे परमेश्वर के द्वारा तुम्हारे लिए तय किया गया है, और अधिकांश लोग इस प्रकार के परिवार की सीमाओं के भीतर जीवन बिताएँगे। तो सामाजिक हैसियत के विषय में क्या कहें? अधिकांश माता-पिता की आर्थिक स्थितियाँ औसत दर्जे की होती हैं और उनके पास ऊँची सामाजिक हैसियत नहीं होती है—उनके लिए बस किसी नौकरी का होना ही अच्छा है। क्या इसमें राज्यपाल शामिल हैं? या राष्ट्रपति हैं? (नहीं।) अधिक से अधिक छोटे कारोबार के प्रबंधक या छोटे-मोटे कारोबार के मालिक होते हैं। उनकी सामाजिक हैसियत साधारण होती है, और उनकी आर्थिक स्थितियाँ औसत दर्जे की होती हैं। अन्य कारक है परिवार का जीवन निर्वाह का परिवेश। सबसे पहले, इन परिवारों में ऐसे कोई माता-पिता नहीं होते हैं जो स्पष्ट रूप से अपने बच्चों को भविष्यवाणी और भविष्य कथन के पथ पर चलने के लिए प्रभावित करें; इन चीज़ों से जुड़ने वाले भी बहुत ही कम होते हैं। अधिकांश माता-पिता काफ़ी सामान्य होते हैं। जिस समय परमेश्वर लोगों को चुनता है, वह उनके लिए इस प्रकार का परिवेश निर्धारित करता है, जो कि लोगों को बचाने के उसके कार्य के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। ऊपर से, ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के लिए ऐसा कुछ विशेष नहीं किया है जो पृथ्वी को ही हिला दे; वह बस सब-कुछ गुप्त रीति से, चुपचाप अपना काम करने के लिए आगे बढ़ता है, विनम्रता से और खामोशी में। परन्तु वास्तव में, वह सब जो परमेश्वर करता है, वह तुम्हारे उद्धार हेतु एक नींव डालने के लिए, आगे का मार्ग तैयार करने के लिए और तुम्हारे उद्धार के लिए सभी आवश्यक स्थितियाँ तैयार करने के लिए करता है। फिर, परमेश्वर हर व्यक्ति को निर्धारित समय पर वापस अपने सामने लाता है : तभी तुम परमेश्वर की वाणी सुनते हो; तभी तुम उसके सामने आते हो। जब यह घटित होता है उस समय तक, कुछ लोग पहले ही माता-पिता बन चुके होते हैं, जबकि अन्य लोग अब तक किसी के बच्चे होते हैं। दूसरे शब्दों में, कुछ लोगों ने विवाह कर लिया होता है और उनके बच्चे हो जाते हैं जबकि कुछ अभी भी अकेले ही होते हैं, उन्होंने अभी तक अपने परिवार शुरू नहीं किये होते हैं। परन्तु किसी की स्थितियों की परवाह किए बिना, परमेश्वर ने पहले से ही तुम्हें चुनने और जब उसका सुसमाचार और वचन तुम तक पहुँचेगा, उसका समय निर्धारित कर दिया है। परमेश्वर ने परिस्थितियों को निर्धारित कर दिया है, किसी निश्चित व्यक्ति या किसी निश्चित सन्दर्भ को निर्धारित कर दिया है जिसके माध्यम से तुम तक सुसमाचार पहुँचाया जाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को सुन सको। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए पहले से ही सभी आवश्यक परिस्थितियों को तैयार कर दिया है। इस तरह से, भले ही मनुष्य अनजान है कि यह सब हो रहा है, मनुष्य उसके सामने आ जाता है और परमेश्वर के परिवार में वापस लौट जाता है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके के प्रत्येक कदम में प्रवेश करते हुए जिसे उसने मनुष्य के लिए तैयार किया है, मनुष्यअनजाने में परमेश्वर का अनुसरण करता है और उसके कार्य करने के तरीके के प्रत्येक कदम में प्रवेश करता है। जब इस समय परमेश्वर मनुष्य के लिए चीज़ों को करता है तो वह किन तरीकों का उपयोग करता है? सबसे पहले, सबसे न्यूनतम कार्य है वह देखभाल एवं सुरक्षा जिसका मनुष्य आनंद लेता है। इसके अलावा, परमेश्वर विभिन्न लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों को व्यवस्थित करता है ताकि उनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व एवं उसके कर्मों को देख सके। उदाहरण के लिए, कुछ लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं क्योंकि उनके परिवार में कोई बीमार है। जब दूसरे उन्हें सुसमाचार सुनाते हैं तो वे परमेश्वर पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं, और परमेश्वर में यह विश्वास परिस्थिति के कारण होता है। तो किसने इस परिस्थिति की व्यवस्था की? (परमेश्वर ने।) इस बीमारी के माध्यम से, कुछ ऐसे परिवार हैं जहाँ सभी विश्वासी हैं, जबकि कुछ ऐसे परिवार हैं जहाँ परिवार के कुछ ही लोग विश्वास करते हैं। बाहर से, ऐसा लग सकता है कि तुम्हारे परिवार में किसी को बीमारी है, परन्तु वास्तव में यह तुम्हें प्रदान की गई एक परिस्थिति है ताकि तुम परमेश्वर के सामने आ सको—यह परमेश्वर की दयालुता है। क्योंकि कुछ लोगों के लिए पारिवारिक जीवन कठिन होता है और उन्हें कोई शान्ति नहीं मिलती है, इसलिए एक आकस्मिक अवसर सामने आ सकता है—कोई सुसमाचार देगा और कहेगा, "प्रभु यीशु में विश्वास करो और तुम्हें शान्ति मिलेगी।" इस तरह, न जानते हुए, वे अत्यंत स्वाभाविक परिस्थितियों के अंतर्गत परमेश्वर में विश्वास करने लगते हैं, तो क्या यह एक प्रकार की स्थिति नहीं है? और क्या यह तथ्य कि उनके परिवार में शांति नहीं है, क्या परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया एक अनुग्रह नहीं है? क्या यह एक अनुग्रह है जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया है? कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कुछ अन्य कारणों से परमेश्वर पर विश्वास करने लगते हैं। विश्वास करने के भिन्न-भिन्न कारण और भिन्न-भिन्न तरीके हैं, परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस कारण से तुम उसमें विश्वास करने लगते हो, यह सब वास्तव में परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित और मार्गदर्शित होता है। सबसे पहले परमेश्‍वर अपने परिवार में तुम्‍हें लाने के लिए और तुम्‍हारा चयन करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्‍तेमाल करता है। यह वह अनुग्रह है जो परमेश्‍वर हर एक व्‍यक्ति को प्रदान करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 161

अंत के दिनों में, इन दिनों में परमेश्वर के कार्य के वर्तमान चरण में, वह मनुष्य को पहले की तरह अनुग्रह एवं आशीषें प्रदान नहीं करता है, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है। कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिसका उसने अनुभव किया है? मनुष्य ने परमेश्वर के प्रेम को, परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को देखा है। इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर मनुष्य का भरण पोषण करता है, उसे सहारा देता है, प्रबुद्ध करता है और उसका मार्गदर्शन करता है, ताकि मनुष्य उसके बोले वचनों को और उसके द्वारा मनुष्य को प्रदत्त सत्य को जानने के लिए धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगे। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब वो हतोत्साहित होता है, जब उसके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होता, तब परमेश्वर मनुष्य को सान्त्वना, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि मनुष्य की छोटी कद-काठी धीरे-धीरे मजबूत हो सके, सकारात्मकता में उठ सके और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सके। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की अवज्ञा करता है या उसका विरोध करता है, या अपनी भ्रष्टता को प्रकट करता है, तो परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देने में और उसे अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। हालाँकि, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति, परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस तरीके से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बड़ा होता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ निश्चित सत्‍यों को जानने लगता है, कौन सी चीज़ें सकारात्मक हैं और कौन सी नकारात्मक हैं, यह जानने लगता है, यह जानने लगता है कि बुराई और अंधकार क्या हैं। परमेश्वर सदैव मनुष्य को ताड़ित एवं अनुशासित करने का ही एकमात्र दृष्टिकोण नहीं रखता है, लेकिन वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य भी नहीं दिखाता है। बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति का, भिन्न-भिन्न तरीकों से, उनके विभिन्न चरणों में और उनके भिन्न-भिन्न स्‍तरों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीज़ें करता है और बड़ी क़ीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत या इन चीज़ों के बारे में कुछ भी महसूस नहीं करता है, फिर भी व्यवहार में, वह जो कुछ करता है उसे सच में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम व्यवहारिक है : परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा से बचता है, और इस पूरे समय मनुष्य की दुर्बलता के प्रति, परमेश्वर बार-बार अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, परमेश्वर का मनुष्य को प्रबुद्ध करना एवं उसका मार्गदर्शन, ये सब मानवजाति को सत्य के सार को और भी अधिक जानने देते हैं, और उत्तरोत्तर यह जानने देते हैं कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्‍या है, और कैसे आगे के मार्ग पर चलना है। ये सभी कार्य जो परमेश्वर करता है, वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो, यह उद्देश्य क्या है? क्यों परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन विधियों का उपयोग करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है? वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर जो देखना चाहता है वह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। ये विधियाँ जिन्हें वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है, निरंतर प्रयास हैं, मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए, मनुष्य की आत्मा को जागृत करने के लिए, मनुष्य को यह जानने में समर्थ बनाने के लिए कि वह कहाँ से आया है, कौन उसका मार्गदर्शन, उसकी सहायता, उसका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को वर्तमान दिन तक जीवित रहने दिया है; वे मनुष्य को यह जानने देने का साधन है कि सृष्टिकर्ता कौन है, उसे किसकी आराधना करनी चाहिए, उसे किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; वे मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने का साधन है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान ले, परमेश्वर के हृदय को समझ ले, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ ले। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब मनुष्य एक पतित एवं भ्रष्ट स्वभाव के साथऔर जीने की इच्छा नहीं करता, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण करने की इच्छा करता है। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो मनुष्य खुद को शैतान से पूरी तरह अलग करने में सक्षम हो जाता है। अब उसे शैतान के द्वारा हानि नहीं पहुँचेगी, उसके द्वारा वो अब और नियंत्रित या मूर्ख नहीं बनेगा। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए, परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों में सक्रियात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय और बुराई को त्यागने को प्राप्त करता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 162

शैतान की दुष्टता के बारे में हमने अभी-अभी जो चर्चा की, वह हर एक को ऐसा महसूस करवाती है मानो कि मनुष्य बड़ी अप्रसन्नता के बीच जीवन जीता है और मनुष्य का जीवन दुर्भाग्य से घिरा हुआ है। परन्तु अब जबकि मैं परमेश्वर की पवित्रता और उस कार्य के बारे में बात कर रहा हूँ जिसे वह मनुष्य पर करता है, वह तुम्हें कैसा अनुभव करा रहा है? (अत्यधिक प्रसन्न।) हम अब देख सकते हैं कि जो कुछ भी परमेश्वर करता है, जिसे वह अत्यंत परिश्रम से मनुष्य के लिए व्यवस्थित करता है, वह सब बेदाग होता है। हर चीज़ जो परमेश्वर करता है, वह बिना किसी ग़लती के होती है, जिसका अर्थ है कि यह दोषरहित होती है, सुधारने, सलाह देने या इसमें कोई बदलाव करने के लिए किसी की ज़रूरत नहीं होती है। परमेश्वर प्रत्येक प्राणी के लिए जो कुछ करता है, वह सन्देह से परे होता है; वह हाथ पकड़कर हर किसी की अगुवाई करता है, हर बीतते क्षण तुम्हारी देखरेख करता है और उसने तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ा है। जब लोग इस प्रकार के वातावरण में और इस प्रकार की पृष्ठभूमि में बढ़ते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि लोग वास्तव में परमेश्वर की हथेली में बढ़ते हैं? (हाँ।) तो क्या तब भी तुम लोगों को कुछ खोने का एहसास होता है? क्या कोई अभी भी हतोत्साहित महसूस करता है? क्या कोई ऐसा महसूस करता है कि परमेश्वर ने मानवजाति को त्याग दिया है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर ने वास्तव में किया क्या है? (उसने मानवजाति पर नज़र राखी है।) जो कुछ परमेश्वर करता है उसके पीछे जो महान विचार एवं देखभाल परमेश्वर करता है, वो सवालों से परे है। इसके अलावा, परमेश्वर ने हमेशा अपना कार्य बेशर्त किया है। उसने तुममें से किसी से कभी भी ये अपेक्षा नहीं रखी है कि तुम उस कीमत को जानो जो वह तुम्हारे लिए चुकाता है जिससे कि तुम उसके प्रति गहराई से आभारी महसूस करो। क्या परमेश्वर ने कभी तुमसे ये अपेक्षा की है? (नहीं।) अपने लम्बे मानवीय जीवन में, लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक ख़तरनाक परिस्थितियों और वह अनेक प्रलोभनों का सामना किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान तुम्हारे बगल में खड़ा है, उसकी आँखें लगातार तुम्हारे ऊपर जमी हैं। जब तुम पर आपदा आती है, शैतान इसमें आनंद मनाता है; जब तुम पर विपदाएँ पड़ती हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है, जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते हो, इन बातों से शैतान को बड़ा मज़ा आता है। जहाँ तक परमेश्वर क्या कर रहा है इसकी बात है, वह हर बीतते क्षण के साथ तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ मनुष्य के पास है—शान्ति और आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा—सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन है; वह हर प्राणी के भाग्य का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है। परन्तु क्या परमेश्वर के पास अपने पद की कोई बढ़ी हुई अवधारणा है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं? क्या परमेश्वर तुम्हारे सामने घोषणा करता है, "मैं सबसे महान हूँ। वह मैं हूँ जो तुम लोगों की ज़िम्मेदारी लेता है। तुम लोगों को मुझ से अवश्य दया की भीख माँगनी चाहिए और अवज्ञा के लिए मृत्युदंड दिया जाएगा"? क्या परमेश्वर ने कभी मानवजाति को इस प्रकार से धमकी दी है? (नहीं।) क्या उसने कभी कहा है, "मानवजाति भ्रष्ट है इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं उससे कैसा व्यवहार करता हूँ, उनके साथ कसे भी व्यवहार किया जा सकता है; मुझे उनके लिए बहुत अच्छे ढंग से व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है"? क्या परमेश्वर इस तरह से सोचता है? क्या परमेश्वर ने इस तरीके से कार्य किया है? (नहीं।) इसके विपरीत, प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का बर्ताव सच्चा एवं ज़िम्मेदारीपूर्ण है। यहाँ तक कि वह तुमसे उससे भी अधिक ज़िम्मेदारी से व्यवहार करता है जितना तुम स्वयं के प्रति करते हो। क्या ऐसा नहीं है? परमेश्वर व्यर्थ में नहीं बोलता है, न ही वह ऊँचे पद का दिखावा करता है और न ही ढिठाई से लोगों को धोखा देता है। इसके बजाय वह ईमानदारी एवं खामोशी से उन चीज़ों को करता है जो उसे स्वयं करने की आवश्यकता है। ये चीज़ें मनुष्य के लिए आशीषें, शान्ति एवं आनन्द लाती हैं। ये मनुष्य को शांति एवं प्रसन्नता से परमेश्वर की दृष्टि के सामने और उसके परिवार में लाती हैं; और सामान्य विवेक और विचार के साथ वे परमेश्वर के सामने रहते हैं और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारते हैं। तो क्या परमेश्वर अपने कार्य में कभी भी मनुष्य के साथ धोखेबाज़ रहा है? क्या उसने कभी उदारता का झूठा प्रदर्शन किया है, पहले कुछ हँसी-मजाक के साथ मनुष्य को मूर्ख बनाया, फिर मनुष्य की ओर पीठ कर ली है? (नहीं।) क्या परमेश्वर ने कभी कहा कुछ है और फिर किया कुछ और है? क्या परमेश्वर ने लोगों से यह कहते हुए कभी खोखले वादे किए हैं और शेखी बघारी है कि वह उनके लिए ऐसा कर सकता है या वैसा करने के लिए उनकी सहायता कर सकता है, लेकिन फिर गायब हो गया है? (नहीं।) परमेश्वर में कोई छल नहीं है, और कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है और जो कुछ वह करता है उसमें सच्चा है। वही एकमात्र है जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं; एकमात्र परमेश्वर है जिसे लोग अपना जीवन एवं उनके पास जो है वो सबकुछ सौंप सकते हैं। चूँकि परमेश्वर में कोई छल नहीं है, तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर ही सबसे अधिक ईमानदार है? (हाँ।) निश्चित रूप से हम कह सकते हैं! यद्यपि, "ईमानदार" शब्द जब परमेश्वर पर लागू किया जाता है तो यह अत्यंत कमज़ोर, बहुत मानवीय है, हमारे लिए और क्या शब्द हैं जिन्हें हम इस्तेमाल कर सकते हैं? मानवीय भाषा की सीमाएँ ऐसी ही हैं। भले ही परमेश्वर को "ईमानदार" कहना थोड़ा अनुचित है, परन्तु फिर भी फिलहाल हम इसी शब्द का उपयोग करेंगे। परमेश्वर विश्वासयोग्य एवं ईमानदार है। तो जब हम इन पहलुओं के बारे में बात करते हैं तो हमारा आशय क्या है, हम किसे संदर्भित कर रहे हैं? क्या हमारा संदर्भ परमेश्वर और मनुष्य के बीच भिन्नताओं और परमेश्वर और शैतान के बीच भिन्नताओं से है? हाँ, हम ऐसा कह सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का एक भी नामोनिशान नहीं देख सकता है। क्या ऐसा कहने में मैं सही हूँ? आमीन? (आमीन!) हम शैतान की किसी भी बुराई को परमेश्वर में प्रकट होते हुए नहीं देखते हैं। वह सब जो परमेश्वर करता है और प्रकट करता है वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद एवं मनुष्य की सहायता करता है, वह पूरी तरह से मनुष्य का भरण-पोषण करने के लिए किया जाता है, वह जीवन से भरपूर है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग और चलने के लिए एक दिशा देता है। परमेश्वर भ्रष्ट नहीं है और इसके अलावा, इस वक्त हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे देखते हुए, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर में मानवजाति की कोई भ्रष्टता नहीं है और न ही मानवजाति के जैसा कोई भ्रष्ट स्वभाव या शैतान का सार है, और परमेश्वर के वारे में कुछ भी ऐसा नहीं है जो इन चीज़ों से समानता रखता हो, तो इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर किसी भ्रष्टता का प्रदर्शन नहीं करता है, और उसके कार्य में उसके स्वयं के सार का प्रकाशन ही इस बात की पूरी पुष्टि है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। क्या तुम लोग इसे देखते हो? परमेश्वर के पवित्र सार को जानने के लिए, फिलहाल आओ हम इन दो पहलुओं पर नज़र डालें: 1) परमेश्वर में भ्रष्ट स्वभाव की झलक भी नहीं है; 2) मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को स्‍वयं परमेश्वर के सार को देखने देता है और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक है। क्योंकि वे चीज़ें जिन्हें परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा मनुष्य के लिए लाता है सभी सकारात्मक हैं। सबसे पहले, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य ईमानदार हो—क्या यह सकारात्मक चीज़ नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को बुद्धि देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को भले एवं बुरे के बीच पहचान करने में सक्षम बनाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को मानवीय जीवन का अर्थ एवं मूल्य समझने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को सत्य के अनुसार लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के सार के भीतर देखने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? (हाँ, यह है।) और इन सब का परिणाम यह है कि मनुष्य शैतान के द्वारा अब और धोखा नहीं खाता है, शैतान के द्वारा अब और उसे नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा या शैतान के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जायेगा। दूसरे शब्दों में, ये चीज़ें लोगों को शैतान की भ्रष्टता से अपने आप को पूरी तरह से स्वतन्त्र होने देती हैं, और इस तरह वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 163

छः प्राथमिक चालें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

पहला है नियन्त्रण और जोर जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियन्त्रित करने के लिए शैतान हर सभंव कार्य करेगा। "जोर जबरदस्ती" का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है अपनी बात मानने पर विवश करने के लिए धमकी और ज़ोर-ज़बरदस्ती के पैतरों का इस्तेमाल करना, यदि तुम बात नहीं मानते हो तो उसके परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम भयभीत होते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते हो, इसलिए तब तुम उसके प्रति समर्पण कर देते हो।

दूसरा है धोखाधड़ी और छल कपट। "धोखाधड़ी और छल कपट" में क्‍या अपरिहार्य होता है? शैतान कुछ कहानियों एवं झूठी बातों को बनाता है, तुम्हें छल कपट से उन पर विश्वास करवाता है। वह तुम्हें कभी नहीं बताता है कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, न ही वह प्रत्यक्ष रूप से यह कहता है कि तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सृजित नहीं गया था। वह "परमेश्वर" शब्द का उपयोग बिलकुल नहीं करता है, बल्कि इसके बजाए एक विकल्प के रूप में किसी और चीज़ का उपयोग करता है, तुम्हें धोखा देने के लिए इस चीज़ का उपयोग करता है ताकि तुममें परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में मूल रूप से कोई विचार न हो। निश्चित रूप से इस "छल कपट" में बस ये एक नहीं बल्कि कई पहलू शामिल हैं।

तीसरा है ज़बरदस्ती दिमाग में भरना। किस चीज़ को लोगों में ज़बरदस्ती भरा जाता है? क्या ज़बरदस्ती दिमाग में भरना मनुष्य की स्वयं की पसंद से होता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? (नहीं।) तुम इससे सहमत न भी हो तो तुम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम्हारी अनभिज्ञता में, शैतान तुम्हारे दिमाग में ज़बरदस्ती चीज़ें भरता है, शैतान अपनी सोच, जीवन के अपने नियमों और अपने सार को तुम्हारे भीतर डालता है।

चौथा है धमकाना और भुलावा देना। अर्थात्, शैतान विभिन्न चालों को काम में लाता है ताकि तुम्हें उसे स्वीकार करने उसका अनुसरण करने, उसकी सेवा में कार्य करने को मजबूर कर सके। अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वो कुछ भी करेगा। वह कभी-कभी तुम पर छोटे-छोटे अनुग्रह करता है, और इस पूरे समय तुम्हें पाप करने के लिए लुभाता है। यदि तुम उसका अनुसरण नहीं करते हो, तो वह तुम्हें कष्ट भुगतवाएगा और तुम्हें दण्ड देगा और तुम पर आक्रमण करने और तुम्हें जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करेगा।

पाँचवा है धोखा और असमर्थता। "धोखा और असमर्थता" वह है जब शैतान कुछ मधुर सुनाई देने वाले शब्दों एवं विचारों को बनाता है जो लोगों की अवधारणाओं से मेल खाते हैं ताकि ऐसा लगे मानो कि वह लोगों के दैहिक स्थिति या उनके जीवन एवं भविष्य के प्रति विचारशील हो रहा है, जबकि वास्तव में उसका एकमात्र लक्ष्य तुम्हें बेवकूफ़ बनाना है। तब वह तुम्हें असमर्थ कर देता है ताकि तुम यह न जान पाओ कि क्या सही है और क्या ग़लत है, ताकि तुम अनजाने में ही छले जाओ और फलस्वरूप उसके नियन्त्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है शरीर और मन का विनाश। शैतान मनुष्यों के किस हिस्से को नष्ट करता है? (मनुष्य के मन को, और पूरे अस्तित्व को।) शैतान तुम्हारे मन को नष्ट करता है, तुम्हें विरोध करने में शक्तिहीन बना देता है, इसका अर्थ है कि धीरे-धीरे, तुम्हारे न चाहने के बावजूद तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। वह हर दिन इन चीज़ों को तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रभावित करने और तैयार करने के लिए प्रतिदिन इन विचारों एवं संस्कृतियों का उपयोग करता है, धीरे-धीरे तुम्हारी इच्छा शक्ति को खोखला कर देता है, जिसके कारण अंतत: तुम एक अच्छा इंसान नहीं बने रहना चाहते हो, तुम उस चीज़ के पक्ष में अब और डटे नहीं रहना चाहते हो जिसे तुम "धार्मिकता" कहते हो। अनजाने में, तुम्हारे पास प्रवाह के विरुद्ध तैरने की इच्छा शक्ति नहीं जाती है, बल्कि इसके बजाए तुम प्रवाह के साथ बहने लगते हो। "विनाश" का अर्थ है शैतान का लोगों को इतना अधिक कष्ट देना कि वे अपनी छायामात्र बन जाते हैं, वे अब मनुष्य नहीं रह जाते हैं। इसी वक्त शैतान प्रहार करता है, उन्हें पकड़कर निगल लेता है।

इन में से प्रत्येक चाल जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है, मनुष्य को विरोध करने में निर्बल कर देता है; उनमें से कोई भी मनुष्य के लिए घातक हो सकता है। दूसरे शब्दों में, शैतान जो कुछ भी करता है और वह जिस भी चाल को काम में लाता है, वह तुम्हें पतित करने का कारण बन सकता है, तुम्हें शैतान के नियन्त्रण के अधीन ला सकता है और तुम्हें दुष्टता और पाप के दलदल में धँसा सकता है। ये वे चालें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 164

अभी के लिए, परमेश्वर के सार की तुम लोगों की बोध आधारित समझ को अभी भी सीखने, इसकी पुष्टि करने, इसे महसूस करने और इसका अनुभव करने के लिए एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता है, जब एक दिन तुम लोग अपने हृदय के अंतर्तम भाग से जान लोगे कि "परमेश्वर की पवित्रता" का अर्थ है कि परमेश्वर का सार दोषरहित है और परमेश्वर का प्रेम निःस्वार्थ है, जो कुछ परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है वह निःस्वार्थ है, और तुम लोग यह जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता निष्कलंक और अनिन्द्य है। परमेश्वर के ये सार के ये पहलू मात्र ऐसे शब्द नहीं हैं जिसे वह अपनी हैसियत का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ खामोश ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या मत-संबंधी है और यह निश्चित रूप से एक प्रकार का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है; बल्कि इसके बजाए यह परमेश्वर के स्वयं के कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन है और परमेश्वर के स्वरूप का प्रकटित सार है। मनुष्य को इस सार को जानना और इसे समझना चाहिए, क्योंकि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है और हर वचन जो वह कहता है उसका हर एक व्यक्ति के लिए बड़ा मूल्य एवं बड़ा महत्व होता है। जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में इन शब्दों "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के सच्चे अर्थ को समझ सकते हो। तुम अब यह सोचते हुए कोरी कल्पना नहीं करोगे कि चलने के लिए इसके अलावा भी मार्ग हैं जिन्हें तुम चुन सकते हो, और तुम उस हर एक चीज़ के साथ विश्वासघात करने की इच्छा नहीं करोगे जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के माध्यम से प्रकाश के धर्मी मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक मानवता को जी सकते हो और सत्य को धारण भी कर सकते हो और उसे जान भी सकते हो। केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सत्य से जीवन को प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की क्षति और नियन्त्रण से मुक्त कर सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम और कष्ट न सहो। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है; केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वही तुम्हारे लिए सभी चीज़ों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजित या अनसृजित प्राणी प्राप्त नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई भी सृजित या अनसृजित प्राणी परमेश्वर के सार के समान सार को धारण नहीं कर सकता है, किसी भी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है। कदाचित् तुम लोगों को यह महसूस होता हो कि मेरे द्वारा कहे गए ये वचन सिद्धान्ततः थोड़ी सहायता कर सकते हैं, परन्तु यदि तुम सत्य की खोज करते हो, यदि तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो तुम ये अनुभव करोगे कि कैसे ये वचन न केवल तुम्हारी नियति को बदल देंगे, बल्कि इसके अलावा वे तुम्हें मानव जीवन के सही मार्ग पर ले आएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 165

मैं तुम लोगों से किसी ऐसी चीज़ के बारे में बात करना चाहता हूँ जो तुम लोगों ने आज हमारी सभा के आरम्भ में की थी, जिसने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ लोग कृतज्ञता का बोध पले बैठे थे, शायद तुम आभारी महसूस कर रहे थे, और इसलिए तुम्हारी भावनाओं के कारण तद्नुरूप क्रियाएँ हो गयीं। जो कुछ तुम लोगों ने किया उसे झिड़की की आवश्यकता नहीं है, यह न तो सही और न ही ग़लत है। किन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम लोग कुछ समझो। यह क्या है जो मैं चाहता हूँ कि तुम समझो? सबसे पहले, मैं तुम लोगों से उसके बारे में पूछना चाहूँगा जो तुम लोगों ने अभी-अभी किया। क्या यह आराधना करने के लिए दण्डवत् करना था या घुटने टेकना था? क्या कोई मुझे बता सकता है? (हम मानते हैं कि यह दण्डवत् करना था।) तुम लोग मानते हो कि यह दण्डवत् करना था, तो फिर दण्डवत् करने का क्या अर्थ है? (आराधना।) तो फिर, आराधना करने के लिए घुटने टेकना क्या है? मैंने तुम लोगों के साथ पहले इसके बारे में संगति नहीं की, किन्तु आज मुझे लगता है कि ऐसा करना आवश्यक है। क्या तुम लोग अपनी सामान्य सभाओं में दण्डवत् करते हो? (नहीं।) क्या जब तुम लोग अपनी प्रार्थनाएँ करते हो तब तुम लोग दण्डवत् करते हो? (हाँ।) हर बार जब तुम प्रार्थना करते हो, अगर परिस्थितियाँ अनुमति दें, तब क्या तुम दण्डवत् करते हो, जब ती हैं? (हाँ।) अच्छा है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि आज तुम लोग ये समझो कि परमेश्वर दो प्रकार के लोगों के आदर में घुटने टेकने को स्वीकार करता है। हमें बाइबल से या किसी आध्यात्मिक हस्तियों के कर्मों या आचरण से सीख लेने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, मैं अभी और यहीं पर तुम लोगों को कुछ सत्य बताऊँगा। पहला, आराधना करने के लिए दण्डवत् करना और घुटने टेकना एक ही चीज़ नहीं है। क्यों परमेश्वर उन लोगों के घुटने टेकने को स्वीकार करता है जो दण्डवत् करते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने पास बुलाता है और इस व्यक्ति को परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए आह्वान करता है, इसलिए परमेश्वर उस व्यक्ति को अपने सामने दण्डवत् करने देगा। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है। दूसरे प्रकार का व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति की आराधना करने के लिए घुटने टेकता है जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता है। लोगों के सिर्फ यही दो प्रकार हैं। तो तुम लोग किस प्रकार के लोगों से सम्बन्धित हो? क्या तुम लोग कहने में सक्षम हो? यह एक सत्य है, यद्यपि यह तुम्हारी भावनाओं को थोड़ी चोट पहुँचा सकता है। प्रार्थना के दौरान लोगों के घुटने टेकने के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है—यह उचित है और वैसा ही है जैसा इसे होना चाहिए, क्योंकि जब लोग प्रार्थना करते हैं तो अधिकांशतः किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर के लिए अपने हृदय को खोलते हैं और उसके आमने-सामने आते हैं। यह परमेश्वर के साथ दिल से बातचीत और विनिमय है। घुटनों के बल आराधना करना मात्र एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया है उसके लिए तुम लोगों की निन्दा करने का मेरा आशय यह नहीं है। मैं बस इसे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना चाहता हूँ ताकि तुम लोग इस सिद्धान्त को समझो—तुम लोग इसे समझते हो, है ना? (हाँ, हम जानते हैं।) मैं तुम लोगों को यह इसलिए बता रहा हूँ कि ताकि यह दुबारा न हो। तो, क्या लोगों के पास परमेश्वर के चेहरे के सामने दण्डवत् करने और घुटने टेकने का कोई अवसर होता है? ऐसा नहीं है कि ऐसा अवसर कभी नहीं आएगा। आज नहीं तो कल ऐसा दिन आएगा, परन्तु अभी वह समय नहीं है। क्या तुम लोग देखते हो? क्या यह तुम लोगों को परेशान करता है? (नहीं।) यह अच्छा है। हो सकता है कि ये वचन तुम लोगों को प्रेरित करेंगे या प्रेरणा देंगे जिससे तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वर्तमान दशा को और अब मनुष्य और परमेश्वर के बीच में किस प्रकार का सम्बन्ध विद्यमान है उसे जान सको। यद्यपि हमने हाल ही में थोड़ी-और बातचीत और संवाद किया है, फिर भी परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ अभी भी पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर को समझने का प्रयास करने के मार्ग पर मनुष्य को अभी भी बहुत दूर तक जाना है। मेरा इरादा यह नहीं है कि तुम लोगों से इस कार्य को अत्यावश्यक कार्य के रूप में करवाऊँ, या इस प्रकार की आकांक्षाओं या भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तुम लोगों से जल्दबाज़ी करवाऊँ। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया था वह तुम लोगों की सच्ची भावनाओं को प्रकट और व्यक्त कर सकता है, और मैंने उन्हें महसूस किया है। तो जब तुम लोग इसे कर रहे थे, तब मैं बस खड़ा होना और तुम लोगों को अपनी शुभकामनाएँ देना चाहता था, क्योंकि मैं तुम लोगों के भले की कामना करता हूँ। अतः मेरे हर वचन और हर कार्यकलाप में, मैं तुम लोगों की सहायता करने, तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए अपना भरसक प्रयास करता हूँ, ताकि तुम लोगों के पास सभी चीज़ों की सही समझ एवं सही दृष्टिकोण हो सके। तुम इसे समझ सकते हो, है न? (हाँ।) यह बहुत अच्छा है। यद्यपि लोगों को परमेश्वर के विभिन्न स्वभावों, परमेश्वर के स्वरूप के पहलुओं की और जो कार्य परमेश्वर करता है, उसकी कुछ समझ है, फिर भी इस समझ का अधिकांश भाग किसी पृष्ठ पर वचनों को पढ़ने, या उन्हें सिद्धान्त रूप से समझने, या सिर्फ उनके बारे में सोचने से अधिक नहीं है। लोगों में जिस चीज़ का अत्यंत अभाव है वो है वास्तविक समझ एवं दृष्टिकोण जो वास्तविक अनुभव से आते हैं। भले ही परमेश्वर लोगों के हृदय को जागृत करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करता है, फिर भी इससे पहले कि इसे संपन्न किया जा सके, एक लम्बा मार्ग तय करना होगा। मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो कि परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, या परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी ग़लतफ़हमी या बोझके, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने की खोज करने के मार्ग पर अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ। चाहे तुमने कोई भी ग़लतियाँ क्यों न की हो, चाहे तुम कितनी दूर तक भटक क्यों न गए हो या तुमने कितने गंभीर अपराध क्यों न किए हों, इन्हें अपना बोझ या अतिरिक्त सामान मत बनने दो जिन्हें तुम्हें परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में ढोना पड़ता है। निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। हर वक्त, परमेश्वर मनुष्य के उद्धार को अपने हृदय में रखता है; यह कभी नहीं बदलता है। यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

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