परमेश्वर को जानना 3

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 83

परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को प्रयोग करता है

उत्पत्ति 1:3-5 जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

उत्पत्ति 1:6-7 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:9-11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:14-15 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:20-21 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

उत्पत्ति 1:24-25 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

पहले दिन, परमेश्वर के अधिकार के कारण, मानव-जाति के दिन और रात उत्पन्न हुए और स्थिर बने हुए हैं

आओ, हम पहले अंश को देखें : "जब परमेश्‍वर ने कहा, 'उजियाला हो,' तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया" (उत्पत्ति 1:3-5)। यह अंश सृष्टि की शुरुआत में परमेश्वर के पहले कार्य का विवरण देता है, और पहला दिन जिसे परमेश्वर ने गुज़ारा, उसमें एक शाम और एक सुबह थी। पर वह एक असाधारण दिन था : परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए उजाला तैयार करना शुरू किया, और इतना ही नहीं, उजाले को अँधेरे से अलग किया। इस दिन, परमेश्वर ने बोलना शुरू किया, और उसके वचन और अधिकार साथ-साथ मौजूद रहे। उसका अधिकार सभी चीज़ों के बीच दिखाई देने लगा, और उसके वचनों के परिणामस्वरूप उसका सामर्थ्‍य सभी चीज़ों में फैल गया। इस दिन से परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ें बन गई और स्थिर हो गईं, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के सामर्थ्‍य की वजह से काम करना शुरू कर दिया। जब परमेश्वर ने ये वचन कहे "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। परमेश्वर कार्यों के किसी क्रम में शामिल नहीं हुआ; उजाला उसके वचनों के परिणामस्वरूप प्रकट हुआ था। इस उजाले को परमेश्वर ने दिन कहा, जिस पर आज भी मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए निर्भर रहता है। परमेश्वर की आज्ञा से उसका सार और मूल्य कभी नहीं बदले, और वह कभी ग़ायब नहीं हुआ। उसका अस्तित्व परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाता है, और सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की घोषणा करता हैकरता है। यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत की बारंबार पुष्टि करता है। यह अमूर्त या आभासी नहीं, बल्कि वास्तविक प्रकाश है, जिसे मनुष्य द्वारा देखा जा सकता है। उस समय के बाद से इस खाली संसार में, जिसमें "पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था," पहली भौतिक चीज़ पैदा हुई। यह चीज़ परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों से आई, और परमेश्वर के अधिकार और कथनों के कारण सभी चीज़ों की सृष्टि के पहले कार्य में दिखाई दी। इसके तुरंत बाद, परमेश्वर ने उजाले और अँधेरे को अलग-अलग-अलग होने की आज्ञा दी...। परमेश्वर के वचनों के कारण हर चीज़ बदल गई और पूर्ण हो गई...। परमेश्वर ने उजाले को "दिन" कहा और अंअँधेरे को उसने "रात" कहा। उस समय, संसार में, जिसे परमेश्वर सृजित करना चाहता था, पहली शाम और पहली सुबह उत्पन्न की गईं, और परमेश्वर ने कहा कि यह पहला दिन है। सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का यह पहला दिन था, और यह सभी चीज़ों की सृष्टि का प्रारंभ था, और यह पहली बार था, जब सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य उसके द्वारा सृजित इस इस संसार में दिखाया गया था।

इन वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर और उसके वचनों के अधिकार, और साथ ही परमेश्वर के सामर्थ्‍य को देखने में सक्षम हुआ। चूँकि केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है; चूँकि परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, अत: केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्‍य है। क्या किसी मनुष्य या वस्तु के पास ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य हो सकता है? क्या तुम लोगों के दिल में इसका कोई उत्तर है? परमेश्वर को छोड़, क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास ऐसा अधिकार है? क्या तुम लोगों ने किसी पुस्तक या प्रकाशन में कभी ऐसी चीज़ का उदाहरण देखा है? क्या ऐसा कोई अभिलेख है कि किसी ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? यह किसी अन्य पुस्तक या अभिलेखों में नहीं पाया नहीं जाता; निस्संदेह, ये परमेश्वर द्वारा दुनिया की भव्य सृष्टि के बारे में एकमात्र आधिकारिक और शक्तिशाली वचन हैं, जो बाइबल में दर्ज हैं; ये वचन परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार और पहचान के बारे में बताते हैं। क्या इस तरह के अधिकार और सामर्थ्‍य को वे परमेश्वर की अद्वितीय पहचान का प्रतीक कहा जा सकता है? क्या यह कहा जा सकता है कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर ही धारण करता है? निस्संदेह, सिर्फ परमेश्वर ही ऐसा अधिकार और सामर्थ्‍य धारण करता है! यह अधिकार और सामर्थ्य किसी अन्य सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा धारण या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता! क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? इन वचनों से लोग शीघ्रता और स्पष्टता से इस तथ्य को समझ जाते हैं कि परमेश्वर अद्वितीय अधिकार, अद्वितीय सामर्थ्‍य, सर्वोच्च पहचान और हैसियत धारण करता है। उपर्युक्त बातों की संगति से, क्या तुम लोग कह सकते हो कि वह परमेश्वर, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, अद्वितीय परमेश्वर है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 84

दूसरे दिन परमेश्वर के अधिकार ने जल का प्रबंध किया और आसमान बनाया तथा मनुष्य के जीवित रहने के लिए जगह बनाई

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।' तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया" (उत्पत्ति 1:6-7)। कौन-से परिवर्तन हुए, जब परमेश्वर ने कहा "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए"? पवित्र शास्त्रमें कहा गया है : "तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया।" जब परमेश्वर ने ऐसा कहा और किया, तो क्या परिणाम हुआ? इसका उत्तर अंश के आखिरी भाग में हैं : "और वैसा ही हो गया।"

इन दोनों छोटे वाक्यों में एक भव्य घटना दर्ज है, और ये वाक्य एक अद्भुत दृश्य का वर्णन करते हैं—एक जबरदस्त उपक्रम, जिसमें परमेश्वर ने जल को नियंत्रित किया और एक जगह बनाई, जिसमें मनुष्य जीवित रह सके ...

इस तसवीर में, जल और आकाश परमेश्वर की आँखों के सामने तत्क्षण प्रकट होते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा विभाजित हो जाते हैं, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित तरीके से "ऊपर" और "नीचे" के रूप में अलग हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा बनाए गए आकाश ने न केवल नीचे के जल को ढक लिया, बल्कि ऊपर के जल को भी सँभाला...। इसमें मनुष्य कुछ नहीं कर सकता, सिवाय टकटकी लगाकर देखने, भौचक्का होने, और उसके अधिकार की शक्ति और उस दृश्य की भव्यता की तारीफ में ठिठककर रह जाने के, जिसमें सृष्टिकर्ता ने जल को स्थानांतरित किया और उसे आज्ञा दी, और आकाश को बनाया। अपने वचनों और सामर्थ्‍य तथा अधिकार द्वारा परमेश्वर ने एक और महान उपलब्धि हासिल की। क्या यह सृष्टिकर्ता की शक्ति नहीं है? आओ, हम परमेश्वर के कर्मों को स्पष्ट करने के लिए पवित्र शास्त्र का प्रयोग करें : परमेश्वर ने अपने वचन कहे, और परमेश्वर के इन वचनों के कारण जल के मध्य में आकाश बन गया। और उसी समय परमेश्वर के इन वचनों के कारण इस स्थान में एक ज़बरदस्त परिवर्तन हुआ, और यह कोई सामान्य अर्थों में परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक प्रकार का प्रतिस्थापन था, जिसमें कुछ नहीं बदलकर कुछ बन गया। यह सृष्टिकर्ता के विचारों से उत्पन्न हुआ था और सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचनों के कारण कुछ नहीं से कुछ बन गया, और, इतना ही नहीं, इस बिंदु से आगे यह सृष्टिकर्ता की ख़ातिर अस्तित्व में रहेगा और स्थिर बना रहेगा, और सृष्टिकर्ता के विचारों के अनुसार स्थानांतारित, परिवर्तित और नवीकृत होगा। यह अंश संपूर्ण संसार की सृष्टि में सृष्टिकर्ता के दूसरे कार्य का वर्णन करता है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की दूसरी अभिव्यक्ति और सृष्टिकर्ता का एक और अग्रणी उपक्रम था। यह दिन जगत की नींव रखने के सृष्टिकर्ता द्वारा बिताया गया दूसरा दिन था, और यह उसके लिए एक और अद्भुत दिन थाः वह उजाले के बीच में चला, आकाश को लाया, उसने जल का प्रबंध और नियंत्रण किया और उसके कार्य, उसका अधिकार और उसका सामर्थ्‍य एक नए दिन के काम में लग गए ...

क्या परमेश्वर के द्वारा अपने वचन कहे जाने से पहले जल के मध्य में आकाश था? बिलकुल नहीं! और परमेश्वर के यह कहने के बाद क्या हुआ "जल के बीच एक अन्तर हो जाए"? परमेश्वर द्वारा इच्छित चीज़ें प्रकट हो गईं; जल के मध्य में आकाश उत्पन्न हो गया, और जल विभाजित हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने कहा "इस अंतर के कारण जल दो भाग हो जाए।" इस तरह से, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करके, परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के परिणामस्वरूप दो नए पदार्थ, दो नई जन्मी चीज़ें सभी चीज़ों के मध्य प्रकटहो गईं। इन दो नई चीज़ों के प्रकटीकरण से तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता के सामर्थ्‍य की महानता महसूस करते हो? क्या तुम लोग सृष्टिकर्ता का अद्वितीय और असाधारण बल महसूस करते हो? इस बल और सामर्थ्‍य की महानता परमेश्वर के अधिकार के कारण है, और यह अधिकार स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और स्वयं परमेश्वर की एक अद्वितीय विशेषता है।

क्या यह अंश तुम लोगों को एक बार और परमेश्वर की अद्वितीयता का गहरा बोध कराता है? वास्तव में यह पर्याप्त से बहुत कम है; सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य इससे कहीं परे है। उसकी अद्वितीयता मात्र इसलिए नहीं है, क्योंकि वह किसी अन्य प्राणी से अलग सार धारण करता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसका अधिकार और सामर्थ्‍य असाधारण, असीमित, सर्वोत्कृष्ट है, और इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार और उसके सार स्वरूप जीवन की सृष्टि कर सकता है, चमत्कार कर सकता है, और प्रत्येक भव्य और असाधारण मिनट और सेकंड की सृष्टि कर सकता है। साथ ही वह स्वयं द्वारा सृजित जीवन पर शासन करने में सक्षम है और स्वयं द्वारा सृजित चमत्कारों और हर मिनट और सेकंड पर संप्रभुता रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 85

तीसरे दिन परमेश्वर के वचनों ने पृथ्वी और समुद्रों की उत्पत्ति की, और परमेश्वर के अधिकार ने संसार को जीवन से लबालब भर दिया

उत्पत्ति 1:9–11 का पहला वाक्य : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।'" परमेश्वर बस इतना कहने के बाद कि, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।" क्या परिवर्तन हुए? और उजाले और आकाश के अलावा इस जगह पर क्या था? पवित्र शास्त्र में लिखा है : "परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, अब इस जगह में भूमि और समुद्र थे, और भूमि और समुद्र विभाजित हो गए थे। इन नई चीज़ों का प्रकटीकरण परमेश्वर के मुँह से निकली आज्ञा के अनुसरण में हुआ था, "और वैसा ही हो गया।" क्या पवित्र शास्त्र यह वर्णन करता है कि परमेश्वर जब यह सब कर रहा था, तो बहुत व्यस्त था? क्या वह उसके शारीरिक श्रम में संलग्न होने का वर्णन करता है? तो फिर परमेश्वर ने यह कैसे किया गया? परमेश्वर ने इन नई चीज़ों को कैसे उत्पन्न किया? स्वतः स्पष्ट है कि परमेश्वर ने यह सब हासिल करने के लिए, इसकी संपूर्णता सृजित करने के लिए वचनों का प्रयोग किया।

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आओ, हम इस अंश का अंतिम वाक्य पढ़ें : "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,' और वैसा ही हो गया।" जब परमेश्वर बोल रहा था, तो ये सभी चीज़ें परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके अस्तित्व में आ गईं, और एक क्षण में ही, विभिन्न प्रकार के नाजुक छोटे जीवन-रूप डगमगाते हुए मिट्टी से अपने सिर बाहर निकालने लगे, और अपने शरीर से मिट्टी के कण झाड़ने से पहले ही वे एक-दूसरे का अभिनंदन करने लगे तथा सिर हिला-हिलाकर ससार के प्रति मुस्कराने लगे। उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान किए गए जीवन के लिए उसे धन्यवाद दिया, और संसार के सामने घोषणा की कि वे सभी चीज़ों का अंग हैं और उनमें से प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता के अधिकार को दर्शाने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा। जैसे ही परमेश्वर ने वचन कहे, भूमि हरी-भरी, हो गई, मनुष्य के काम आ सकने वाला समस्त प्रकार के साग-पात अंकुरित हो गए और जमीन फोड़कर निकल आए, और पर्वत और मैदान वृक्षों एवं जंगलों से पूरी तरह से भर गए...। यह बंजर संसार, जिसमें जीवन का कोई निशान नहीं था, तेजी से प्रचुर घास, साग-पात वृक्षों एवं उमड़ती हुई हरियाली से भर गया...। तथा घास की सुगंध और मिट्टी की महक हवा के माध्यम से फैल गई, और पौधों की कतार हवा के चक्र के साथ मिलकर साँस लेने लगी और उनके बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। उसी समय, परमेश्वर के वचनों के कारण और परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके, सभी पौधों ने अपने शाश्वत जीवन-चक्र शुरू कर दिए, जिनमें वे बढ़ते हैं, खिलते हैं, फलते हैं और अपनी वंश-वृद्धि करते हैं। उन्होंने सख्ती से अपने-अपने जीवन-चक्रों का पालन करना शुरू कर दिया और सभी चीज़ों के मध्य अपनी-अपनी भूमिका निभानी प्रारंभ कर दी...। वे सब सृष्टिकर्ता के शब्दों के कारण पैदा हुए थे और जी रहे थे। वे सृष्टिकर्ता की अनंत आपूर्ति और पोषण प्राप्त करेंगे, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य को दर्शाने के लिए हमेशा भूमि के हर कोने में दृढ़ता से जीवित रहेंगे और वे हमेशा सृष्टिकर्ता द्वारा स्वयं को प्रदान की गई जीवन-शक्ति को दर्शाते रहेंगे ...

सृष्टिकर्ता का जीवन असाधारण है, उसके विचार असाधारण हैं, और उसका अधिकार असाधारण है और इसलिए, जब उसके वचन उच्चरित हुए, तो उसका अंतिम परिणाम था "और वैसा ही हो गया।" स्पष्ट रूप से, जब परमेश्वर कार्य करता है, तो उसे अपने हाथों से काम करने की आवश्यकता नहीं होती; वह बस आज्ञा देने के लिए अपने विचारों का और आदेश देने के लिए अपने वचनों का प्रयोग करता है, और इस तरह काम पूरे हो जाते हैं। इस दिन, परमेश्वर ने जल को एक साथ एक जगह पर इकट्ठा किया और सूखी भूमि प्रकट होने दी, जिसके बाद परमेश्वर ने भूमि से घास को उगाया, और बीज उत्पन्न करने वाले पौधे साग-पात और फल देने वाले पेड़ उग गए, और परमेश्वर ने उनकि किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया तथा प्रत्येक को अपने खुद के बीज धारण करने के लिए कहा। यह सब परमेश्वर के विचारों और उसके वचनों की आज्ञा के अनुसार साकार हुआ और इस नए संसार में हर चीज़ एक के बाद एक प्रकट होती गई।

अपना काम शुरू करने से पहले ही परमेश्वर के मस्तिष्क में तस्वीर थी, जिसे वह अपने हासिल करना चाहता था, और जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को हासिल करना शुरू किया, ऐसा तभी हुआ जब परमेश्वर ने इस तसवीर की विषयवस्तु के बारे में बोलने के लिए अपना मुँह खोला था, तो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य के कारण सभी चीज़ों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया। इस पर ध्यान न देते हुए कि परमेश्वर ने इसे कैसे किया या किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, सब-कुछ परमेश्वर की योजना और उसके वचनों की बदौलत क्रमिक रूप से हासिल होता गया परमेश्वर के वचनों और अधिकार की बदौलत स्वर्ग और पृथ्वी में क्रमिक रूप से बदलाव आते गए। इन सभी बदलावों और घटनाओं ने सृष्टिकर्ता के अधिकार और उसकी जीवन-शक्ति की असाधारणता और महानता को दर्शाया। उसके विचार कोई मामूली विचार या खाली तसवीर नहीं हैं, बल्कि जीवन-शक्ति और असाधारण ऊर्जा से भरे हुए अधिकार हैं, वे ऐसे सामर्थ्‍य हैं जो सभी चीज़ों को परिवर्तित कर सकते हैं, पुनर्जीवित कर सकते हैं, फिर से नया बना सकते हैं और नष्ट कर सकते हैं। इसकी वजह से, उसके विचारों के कारण सभी चीज़ें कार्य करती हैं और उसके मुँह से निकले वचनों के कारण, उसी समय हासिल हो जाती हैं ...

सभी चीजों के प्रकट होने से पहले, परमेश्वर के विचारों में एक संपूर्ण योजना बहुत पहले से ही बन चुकी थी, और एक नया संसार बहुत पहले ही आकार ले चुका था। यद्यपि तीसरे दिन भूमि पर हर प्रकार के पौधे प्रकट हुए, किंतु परमेश्वर के पास इस संसार की सृष्टि के चरणों को रोकने का कोई कारण नहीं था; वह लगातार अपने वचनों को बोलने का इरादा रखता था, ताकि वह हर नई चीज़ की सृष्टि करना जारी रख सके सके। वह बोलता गया, अपनी आज्ञाएँ जारी करता गया, और अपने अधिकार का इस्तेमाल करता गया तथा अपना सामर्थ्‍य दिखाता गया, और उसने सभी चीज़ों और मानव-जाति के लिए, जिनके निर्माण का उसका इरादा था, वह सब-कुछ बनाया, जिनका निर्माण करने की उसने योजना बनाई थी ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 86

चौथे दिन, जब परमेश्वर एक बार फिर से अपने अधिकार का उपयोग करता है तो मानवजाति के लिए मौसम, दिन, और वर्ष अस्तित्व में आते हैं

सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना को पूरा करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया और इस तरह से उसने अपनी योजना के पहले तीन दिन गुज़ारे। इन तीन दिनों के दौरान, परमेश्वर व्यस्त, या खुद को थकाता हुआ दिखाई नहीं दिया; बल्कि इसके विपरीत, उसने अपनी योजना के बेहतरीन तीन पहले दिन गुज़ारे और संसार के विलक्षण रूपान्तरण के महान कार्य को पूरा किया। एक बिलकुल नया संसार उसकी आँखों के सामने प्रकट हुआ और अंश-अंश करके वह ख़ूबसूरत तस्वीर जो उसके विचारों में मुहरबन्द थी, अंततः परमेश्वर के वचनों में प्रगट हो गई। हर नयी चीज़ का प्रकटीकरण एक नवजात बच्चे के जन्म के समान था और सृष्टिकर्ता उस तस्वीर से आनंदित हुआ जो एक समय उसके विचारों में थी लेकिन जिसे अब जीवन्त कर दिया गया था। इस वक्त, उसके दिल को यह देखकर बहुत संतुष्टि मिली, परन्तु उसकी योजना अभी शुरू ही हुई थी। पलक झपकते ही एक नया दिन आ गया था—और सृष्टिकर्ता की योजना में अगला पृष्ठ क्या था? उसने क्या कहा? उसने अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया? उस दौरान इस नए संसार में कौन सी नई चीज़ें आईं? सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए, हमारी निगाहें परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के चौथे दिन पर आ टिकतीं हैं, एक ऐसा दिन जिसमें एक और नई शुरूआत होने वाली थी। सृष्टिकर्ता के लिए यह निःसन्देह एक और बेहतरीन दिन था, और आज की मानवजाति के लिए यह एक और अति महत्वपूर्ण दिन था। यह निश्चय ही एक बहुमूल्य दिन था। वह इतना बेहतरीन कैसे था, वह इतना महत्वपूर्ण कैसे था और वह इतना बहुमूल्य कैसे था? आओ पहले सृष्टिकर्ता के द्वारा बोले गए वचनों को सुनें ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें'" (उत्पत्ति 1:14-15)। सूखी भूमि और उस पर के पौधों की सृष्टि के बाद यह परमेश्वर के अधिकार का एक बार फिर से उपयोग था जो प्राणियों के द्वारा दिखाया गया था। परमेश्वर के लिए ऐसा कार्य उतना ही सरल था जितना कि उसके द्वारा पहले किए गए कार्य थे, क्योंकि परमेश्वर के पास बड़ी सामर्थ्‍य है; परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसके वचन पूरे होंगे। परमेश्वर ने ज्योतियों को आज्ञा दी कि वे आकाश में प्रगट हों, और ये ज्योतियाँ न केवल पृथ्वी के ऊपर आकाश में रोशनी देती थीं, बल्कि दिन और रात और ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए भी चिह्न के रूप में कार्य करती थीं। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, हर एक कार्य जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता था वह परमेश्वर के अभिप्राय और जिस रीति से परमेश्वर ने उन्हें नियुक्त किया था, उसके अनुसार पूरा हो गया।

आकाश में जो ज्योतियाँ हैं, वे आसमान के तत्व हैं जो प्रकाश को बिखेर सकती हैं; वे आकाश, भूमि और समुद्र को प्रकाशमय कर सकती हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार तय की गयी लय एवं तीव्रता में परिक्रमा करती हैं और विभिन्न समयकाल में भूमि पर प्रकाश देती हैं और इस रीति से, ज्योतियों की परिक्रमा के चक्र के कारण भूमि के पूर्व और पश्चिम में दिन और रात होते हैं, वे न केवल दिन और रात के चिह्न हैं, बल्कि ये विभिन्न चक्र मानवजाति के लिए त्योहारों और विशेष दिनों को भी चिन्हित करते हैं। वे चारों ऋतुओं—बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, और शीत ऋतु—की पूर्ण पूरक और सहायक हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा जाता है, जिनके साथ ज्योतियाँ एकरूपता से मानवजाति के लिए चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों के लिए एक निरन्तर और सटीक चिह्न के रूप में कार्य करती हैं। यद्यपि यह केवल कृषि के आगमन के बाद ही हुआ कि मानवजाति ने परमेश्वर द्वारा बनाई गई ज्योतियों द्वारा चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों के विभाजन को देखा और समझा, लेकिन वास्तव में चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों और वर्षों को जिन्हें मनुष्य आज समझता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन से प्रारम्भ हो चुके थे और इसी प्रकार परस्पर बदलने वाले बसंत, ग्रीष्म, शरद, और शीत ऋतु के चक्र भी जिन्हें मनुष्य के द्वारा अनुभव किया जाता है, वे बहुत पहले ही, परमेश्वर द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि के चौथे दिन प्रारम्भ हो चुके थे। परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियों ने मनुष्य को इस योग्य बनाया कि वे लगातार, सटीक ढंग से और साफ-साफ दिन और रात के बीच अन्तर कर सकें, दिनों को गिन सकें, साफ-साफ चन्द्रमा की स्थितियों और वर्षों का हिसाब रख सकें। (पूर्ण चन्द्रमा का दिन एक महीने की समाप्ति को दर्शाता था और इससे मनुष्य जान गया कि ज्योतियों का प्रकाशन एक नए चक्र की शुरूआत करता है; अर्द्ध-चन्द्रमा का दिन आधे महीने की समाप्ति को दर्शाता था, जिसने मनुष्य को यह बताया कि चन्द्रमा की एक नई स्थिति शुरू हो रही है, इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि चन्द्रमा की एक स्थिति में कितने दिन और रात होते हैं और एक ऋतु में चन्द्रमा की कितनी स्थितियाँ होती हैं, एक साल में कितनी ऋतुएँ होती हैं, यह सब कुछ बड़ी नियमितता के साथ प्रदर्शित होता था।) इस प्रकार, मनुष्य ज्योतियों की परिक्रमाओं के चिन्‍हांकन से आसानी से चन्द्रमा की स्थितियों, दिनों, और सालों का पता लगा सकता था। यहाँ से, मानवजाति और सभी चीज़ें अनजाने ही दिन-रात के क्रमानुसार परस्पर परिवर्तन और ज्योतियों की परिक्रमाओं से उत्पन्न ऋतुओं के बदलाव के मध्य जीवन बिताने लगे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा चौथे दिन ज्योतियों की सृष्टि का महत्व था। उसी प्रकार, सृष्टिकर्ता के इस कार्य के उद्देश्य और महत्व अभी भी उसके अधिकार और सामर्थ्‍य से अविभाजित थे। इस प्रकार, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई ज्योतियाँ और वह मूल्य जो वे शीघ्र ही मनुष्य तक लाने वाले थे, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल में एक और महानतम कार्य था।

इस नए संसार में, जिसमें मानवजाति अभी तक प्रकट नहीं हुई थी, सृष्टिकर्ता ने साँझ और सवेरे, आकाश, भूमि और समुद्र, घास, सागपात और विभिन्न प्रकार के वृक्षों, और ज्योतियों, ऋतुओं, दिनों, और वर्षों को उस नए जीवन के लिए बनाया जिसका वह शीघ्र सृजन करने वाला था। सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य, हर उस नई चीज़ में प्रगट हुआ जिसे उसने बनाया था और उसके वचन और उपलब्धियाँ लेश-मात्र भी बिना किसी असंगति या अन्तराल के एक साथ घटित हुए। इन सभी नई चीज़ों का प्रकटीकरण और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के प्रमाण थे वह अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो पूर्ण हुआ है वो हमेशा बना रहेगा। यह सच्चाई कभी नहीं बदली है : भूतकाल में भी ऐसा था, वर्तमान में भी ऐसा है और पूरे अनंतकाल के लिए ऐसा ही बना रहेगा। जब तुम लोग पवित्र-शास्त्र के उन वचनों को एक बार फिर देखते हो, तो क्या वे तुम्हें तरोताज़ा दिखाई देते हो? क्या तुम लोगों ने नई विषय-वस्‍तु देखी है और नई नई खोज की है? यह इसलिए है क्योंकि सृष्टिकर्ता के कार्यों ने तुम लोगों के हृदय को द्रवित कर दिया है, और उसके अधिकार और सामर्थ्‍य के बारे में तुम सबके ज्ञान की दिशा का मार्गदर्शन किया है और सृष्टिकर्ता की तुम्हारी समझ के लिए द्वार खोल दिया है और उसके कार्य और अधिकार ने इन वचनों को जीवन दे दिया है। इस प्रकार इन वचनों में मनुष्य ने सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक वास्तविक, सुस्पष्ट प्रकटीकरण देखा और सचमुच में सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता को देखा है, और उसने सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य की असाधारणता को देखा है।

सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य चमत्कार पर चमत्कार करते हैं; वह मनुष्य के ध्यान को आकर्षित करता है। मनुष्य उसके अधिकार के उपयोग से पैदा हुए आश्चर्यजनक कर्मों को टकटकी लगाकर देखने के सिवाए कुछ नहीं कर सकता है। उसका असीमित सामर्थ्‍य अत्यंत प्रसन्नता लेकर आता है और मनुष्य भौंचक्का हो जाता है। वह अतिउत्साह से भर जाता है और प्रशंसा में हक्का-बक्का-सा देखता है। वह विस्मयाभिभूत और हर्षित हो जाता है; और इससे अधिक, मनुष्य ज़ाहिर तौर पर द्रवित हो जाता है, और उसमें आदर, सम्मान, और लगाव उत्पन्न होने लग जाते हैं। सृष्टिकर्ता के अधिकार और कर्मों का मनुष्य की आत्मा पर एक बड़ा अपमार्जक प्रभाव होता है और इसके अलावा यह मनुष्य की आत्मा को संतुष्ट कर देता है। परमेश्वर के हर एक विचार, हर एक बोल, उसके अधिकार का हर एक प्रकाशन, सभी चीज़ों में अति उत्तम रचना हैं। यह एक महान कार्य है जो सृजी गई मानवजाति की गहरी समझ और ज्ञान के बहुत ही योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 87

पाँचवे दिन, जीवन के विविध और विभिन्न रूप अलग-अलग तरीकों से सृष्टिकर्ता के अधिकार को प्रदर्शित करते हैं

पवित्र-शास्त्र कहता है, "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।' इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:20-21)। पवित्र-शास्त्र साफ-साफ कहता है कि इस दिन, परमेश्वर ने जल के जन्तुओं और आकाश के पक्षियों को बनाया, कहने का तात्पर्य है कि उसने विभिन्न प्रकार की मछलियों और पक्षियों को बनाया और उनकी प्रजाति के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया। इस तरह, परमेश्वर की सृष्टि से पृथ्वी, आकाश और जल समृद्ध हो गए ...

जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे गए, बिलकुल नई ज़िन्दगियाँ, हर एक अलग आकार में, सृष्टिकर्ता के वचनों के मध्य तत्काल जीवित हो गईं। वे इस संसार में अपने स्थान के लिए एक-दूसरे को धकेलते, कूदते और आनंद से खेलते हुए आ गईं...। हर रूप एवं आकार की मछलियाँ जल के एक छोर से दूसरे छोर को तैरने लगीं; और सभी किस्मों की सीपियाँ रेत में उत्पन्न होने लगीं, शल्क वाली, कवचधारी, और बिना रीढ़ वाले जीव-जन्तु, चाहे बड़े हों या छोटे, लम्बे हों या ठिगने, विभिन्न रूपों में जल्दी से विकसित हो गए। विभिन्न प्रकार के समुद्री पौधे शीघ्रता से उगना शुरू हो गए, विविध प्रकार के समुद्री जीवन के बहाव में बहने लगे, लहराते हुए, स्थिर जल को उत्तेजित करते हुए, मानो उनसे कह रहे हों : "नाचो! अपने मित्रों को लेकर आओ! क्योंकि अब तुम लोग कभी अकेले नहीं रहोगे!" उस घड़ी जब परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जीवित प्राणी जल में प्रगट हुए, प्रत्येक नए जीवन ने उस जल में जीवन-शक्ति डाल दी जो इतने लम्बे समय से शांत था और एक नए युग का सूत्रपात किया...। और तब से, वे एक-दूसरे के आस-पास रहते हुए एक-दूसरे का साथ देने लगे और वे आपस में कोई दूरी नहीं रखते थे। जल के भीतर जो भी जीवधारी थे, जल उनका पोषण करने के लिए मौजूद था, और प्रत्येक जीवन, जल और उसके पोषण के कारण अस्तित्व में बना रहा। प्रत्येक जीव, दूसरे को जीवन देता था, और साथ ही, हर एक, उसी रीति से, सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, महानता और सृष्टिकर्ता के अधिकार के सर्वोत्कृष्ट सामर्थ्‍य की गवाही दी ...

अब जबकि समुद्र शांत न रहा, उसी प्रकार जीवन ने आकाश को भरना प्रारम्भ कर दिया। एक के बाद एक, छोटे-बड़े पक्षी, भूमि से आकाश में उड़ने लगे। समुद्र के जीवों से भिन्न, उनके पास पंख और पर थे, जो उनके दुबले और आकर्षक रूप को ढंके हुए थे। वे अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए, गर्व और अभिमान से अपने परों के आकर्षक आवरण को और अपनी विशेष क्रियाओं और कुशलताओं को प्रदर्शित करने लगे जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था। वे स्वतन्त्रता के साथ हवा में लहराने लगे और कुशलता से आकाश और पृथ्वी के बीच, घास के मैदानों और जंगलों के आर-पार यहाँ वहाँ उड़ने लगे...। वे हवा के प्रिय थे, वे हर चीज़ के प्रिय थे। वे जल्द ही स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में एक सेतु बनकर सभी चीज़ों तक संदेश पहुँचाने वाले बनने को थे...। वे गीत गाते, आनंद के साथ यहाँ-वहाँ झपट्टा मारते, उन्होंने कभी ख़ाली पड़े संसार में हर्ष, हँसी व कम्पन पैदा कर दिया...। उन्होंने अपने स्पष्ट एवं मधुर गीतों से और अपने हृदय के भीतर के शब्दों से उस जीवन के लिए सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की जो उसने उन्हें दिया था। उन्होंने सृष्टिकर्ता की पूर्णता और अद्भुतता को प्रदर्शित करने के लिए हर्षोल्लास के साथ नृत्य किया, और वे उस विशेष जीवन के द्वारा जो सृष्टिकर्ता ने उन्हें दिया था, उसके अधिकार की गवाही देने में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर देंगे ...

जीवित प्राणी चाहे जल में थे या आकाश में, सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, जीवित प्राणियों की यह अधिकता जीवन के विभिन्न रूपों में मौजूद थी, और सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, वे अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार इकट्ठे हो गए—और यह व्यवस्था, यह नियम किसी भी जीवधारी के लिए अपरिवर्तनीय था। सृष्टिकर्ता के द्वारा जो भी सीमाएँ बनाई गई थीं, उसके पार जाने की हिम्मत उन्होंने कभी नहीं की और न ही वे ऐसा करने में समर्थ थे। सृष्टिकर्ता के द्वारा आदेश के अनुसार वे जीते और बहुगुणित होते रहे और सृष्टिकर्ता के द्वारा बनाए गए जीवन-क्रम और व्यवस्था का कड़ाई से पालन करते रहे और सजगता से उसकी अनकही आज्ञाओं, स्वर्गीय आदेशों और नियमों में बने रहे जो उसने उन्हें तब से लेकर आज तक दिये थे। वे सृष्टिकर्ता से अपने एक विशेष अन्दाज़ में बात करते थे और सृष्टिकर्ता के अर्थ की प्रशंसा करने लगे और वे उसकी आज्ञा मानते थे। किसी ने कभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया और उनके ऊपर उसकी संप्रभुता और आज्ञाओं का उपयोग उसके विचारों के तहत हुआ था; कोई वचन जारी नहीं किए गए थे, परन्तु सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार ख़ामोशी से सभी चीज़ों का नियन्त्रण करता था जिसमें भाषा की कोई क्रिया नहीं थी और जो मानवजाति से भिन्न था। इस विशेष रीति से उसके अधिकार के इस्तेमाल ने मनुष्य को नया ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया और सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक नई व्याख्या करने को मजबूर किया। यहाँ मैं तुम्हें एक बात बता दूँ कि इस नए दिन में, सृष्टिकर्ता के अधिकार के इस्तेमाल ने एक बार और सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता का प्रदर्शन किया।

आगे, आओ हम पवित्र-शास्त्र के इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोगों को क्या लगता है कि इसका क्या है? इन वचनों में परमेश्वर की भावनाएं निहित हैं। परमेश्वर ने उन सभी चीज़ों को देखा जिन्हें उसने बनाया था जो उसके वचनों के कारण अस्तित्व में आईं और मजबूत बनी रहीं और धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगीं। उस समय, परमेश्वर ने अपने वचनों के द्वारा जो विभिन्न चीज़ें बनाई थीं, और जिन विभिन्न कार्यों को पूरा किया था, क्या वह उनसे सन्तुष्ट था? उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" इससे क्या प्रकट होता है? यह किसका प्रतीक है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने जो योजना बनाई थी और जो निर्देश दिये थे, उन्हें और उन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिएपरमेश्वर के पास सामर्थ्‍य और बुद्धि थी, जिन्हें पूरा करने का उसने मन बनाया था। जब परमेश्वर ने हर एक कार्य को पूरा कर लिया, तो क्या उसे पछतावा हुआ? उत्तर अभी भी यही है "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसने कोई खेद महसूस नहीं किया, बल्कि वह सन्तुष्ट था। इसका मतलब क्या है कि उसे कोई खेद महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसकी सामर्थ्‍य और बुद्धि पूर्ण है, और यह कि सिर्फ उसकी सामर्थ्‍य के द्वारा ही ऐसी पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब मुनष्य कोई कार्य करता है, तो क्या वह परमेश्वर के समान देख सकता है कि सब अच्छा है? क्या हर काम जो मनुष्य करता है वो पूर्णता पा सकता है? क्या मनुष्य किसी काम को एक ही बार में पूरी अनंतता के लिए पूरा कर सकता है? जैसा कि मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं होता, बस बेहतर होता है," ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनुष्य करे और वह पूर्णता को प्राप्त कर ले। परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ उसने बनाया और पूरा किया वह अच्छा है, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई हर वस्तु उसके वचन के द्वारा स्थिर हुई, कहने का तात्पर्य है कि, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तब जो कुछ भी उसने बनाया, उसने एक चिरस्थायी रूप ले लिया, उसकी किस्म के अनुसार उसे वर्गीकृत किया गया, और उसे पूरी अनंतता के लिए एक नियत स्थिति, उद्देश्य, और कार्यप्रणाली दी गई। इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं के बीच उनकी भूमिका, और वह यात्रा जिनसे उन्हें परमेश्वर की सभी वस्तुओं के प्रबन्धन के दौरान गुज़रना था, उन्हें परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियुक्त कर दिया गया था और वे अपरिवर्तनीय थे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी वस्तुओं को दिया गया स्वर्गीय नियम था।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," ये सरल, कम समझे गए वचन, जिनकी कई बार उपेक्षा की जाती है, ये स्वर्गीय नियम और स्वर्गीय आदेश हैं जिन्हें सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप है, जो अधिक व्यावहारिक और अधिक गंभीर है। अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, वह उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ व्यवस्थित और नियमित था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा बढ़ती, अस्तित्व में रहती और नष्ट होती थीं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रहती थींऔर कोई भी वस्तु इससे छूटी नहीं थी! यह व्यवस्था बिलकुल उसी घड़ी शुरू हो गई थी जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और वह बना रहेगा और जारी रहेगा और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के लिए उस दिन तक कार्य करता रहेगा जब तक वह सृष्टिकर्ता के द्वारा रद्द न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सब वस्तुओं को बनाने और सब वस्तुओं को अस्तित्व में आने की आज्ञा देने की काबिलियत में प्रकट हुआ, बल्कि सब वस्तुओं पर शासन करने और सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखने और सब वस्तुओं में चेतना और जीवन देने और इसके अतिरिक्त, उन सब वस्तुओं को जिन्हें वो अपनी योजना में सृजित करेगा, उन्हें पूरी अनंतता के लिए उसके द्वारा बनाए गए संसार में एक उत्तम आकार, उत्तम संरचना, उत्तम भूमिका में प्रकट और मौजूद होने के लिए बनाने की उसकी योग्यता में भी प्रकट हुआ था। यह इस बात से प्रकट हुआ कि सृष्टिकर्ता के विचार किसी विवशता के अधीन नहीं थे और समय, अंतरिक्ष और भूगोल के द्वारा सीमित नहीं थे। उसके अधिकार के समान, सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान सदा-सर्वदा तक अपरिवर्तनीय बनी रहेगी। उसका अधिकार सर्वदा उसकी अद्वितीय पहचान का एक निरूपण और प्रतीक बना रहेगा और उसका अधिकार हमेशा उसकी पहचान के साथ-साथ बना रहेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 88

छठे दिन, सृष्टिकर्ता ने बोला और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक प्रगट होने लगे

अलक्षित रूप से, सब वस्तुओं को बनाने का सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठे दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शुरूआत थी तथा एक और असाधारण दिन था। इस नए दिन की शाम को सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को वह उत्पन्न करेगा, उनकी सृष्टि करेगा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की वाणी है ...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,' और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इन में कौन-कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्र-शास्त्र कहता हैः मवेशी और रेंगने वाले जन्तु और पृथ्वी के जाति-जाति के जंगली पशु। कहने का तात्पर्य है कि उस दिन वहाँ पृथ्वी के सब प्रकार के जीवित प्राणी ही नहीं थे, बल्कि उन सभी को प्रजाति के अनुसार वर्गीकृत किया गया था और उसी प्रकार, "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों की तरह, उसी सुर में, सृष्टिकर्ता ने अपने इच्छित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया और हर एक अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हुआ। जब सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो उसके कोई भी वचन व्यर्थ में नहीं बोले जाते और इस प्रकार, छ्ठे दिन हर जीवित प्राणी, जिसको उसने बनाने की इच्छा की थी, नियत समय पर प्रकट हो गया। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा "पृथ्वी से एक-एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरन्त जीवन से भर गई और पृथ्वी के ऊपर अचानक ही हर प्रकार के प्राणियों की श्वास प्रकट हुई...। हरे-भरे घास के जंगली मैदानों में, हृष्ट-पुष्ट गाएँ अपनी पूंछों को इधर-उधर हिलाते हुए, एक के बाद एक प्रगट होने लगीं, मिमियाती हुई भेड़ें झुण्डों में इकट्ठी होने लगीं, और हिनहिनाते हुए घोड़े सरपट दौड़ने लगे...। एक पल में ही, शांत घास के मैदानों की विशालता में जीवन का विस्फोट हुआ...। निश्चल घास के मैदान पर पशुओं के इन विभिन्न झुण्डों का प्रकटीकरण एक सुन्दर दृश्य था जो अपने साथ असीमित जीवन शक्ति लेकर आया था...। वे घास के मैदानों के साथी और स्वामी होंगे और प्रत्येक दूसरे पर निर्भर होगा; वे इन घास के मैदानों के संरक्षक और रखवाले भी होंगे, जो उनका स्थायी निवास होगा, जो उन्हें उनकी सारी ज़रूरतों को प्रदान करेगा और उनके अस्तित्व के लिए अनंत पोषण का स्रोत होगा ...

उसी दिन जब ये विभिन्न मवेशी सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा अस्तित्व में आए थे, ढेर सारे कीड़े-मकौड़े भी एक के बाद एक प्रगट हुए। भले ही वे सभी जीवधारियों में सबसे छोटे थे, परन्तु उनकी जीवन-शक्ति सृष्टिकर्ता की अद्भुत सृष्टि थी और वे बहुत देरी से नहीं आए थे...। कुछ ने अपने पंखों को फड़फड़ाते थे, जबकि कुछ अन्य धीरे-धीरे रेंगते थे; कुछ उछलते और कूदते थे और कुछ अन्य लड़खड़ाते थे, कुछ आगे बढ़ गए, जबकि अन्य जल्दी से पीछे लौट गए; कुछ दूसरी ओर चले गए, कुछ अन्य ऊँची-नीची छलांग लगाने लगे...। वे सभी अपने लिए घर ढूँढ़ने के प्रयास में व्यस्त हो गए : कुछ ने घास में घुसकर अपना रास्ता बनाया, कुछ ने भूमि खोदकर छेद बनाना शुरू कर दिया, कुछ उड़कर पेड़ों पर चढ़ गए और जंगल में छिप गए...। यद्यपि वे आकार में छोटे थे, परन्तु वे खाली पेट की तकलीफ को सहना नहीं चाहते थे और अपने घरों को बनाने के बाद, वे अपना पोषण करने के लिए भोजन की तलाश में दौड़ पड़े। कुछ घास के कोमल तिनकों को खाने के लिए उस पर चढ़ गए, कुछ ने धूल से अपना मुँह भर लिया और अपना पेट भरा और स्वाद और आनंद के साथ खाने लगे (उनके लिए, धूल भी एक स्वादिष्ट भोजन है); कुछ जंगल में छिप गए, परन्तु आराम करने के लिए नहीं रूके, क्योंकि चमकीले गहरे हरे पत्तों के भीतर के रस ने उनके लिये रसीला भोजन प्रदान किया...। सन्तुष्ट होने के बाद भी कीड़े-मकौड़ों ने अपनी गतिविधियों को नहीं रोका, भले ही वे आकार में छोटे थे, फिर भी वे भरपूर ऊर्जा और असीमित उत्साह से भरे हुए थे और उसी प्रकार सभी जीवधारियों में, वे सबसे अधिक सक्रिय और सबसे अधिक परिश्रमी होते हैं। वे कभी आलसी न हुए और न कभी आराम से पड़े रहे। एक बार संतृप्त होने के बाद, उन्होंने फिर से अपने भविष्य के लिए परिश्रम करना प्रारम्भ कर दिया, अपने आने वाले कल के लिए अपने आपको व्यस्त रखा और जीवित बने रहने के लिए भाग-दौड़ करते रहे...। उन्होंने मधुरता से विभिन्न प्रकार की धुनों और सुरों को गुनगुनाकर अपने आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घास, वृक्षों और ज़मीन के हर इन्च में आनंद का समावेश किया और हर दिन और हर वर्ष को अद्वितीय बना दिया...। अपनी भाषा और अपने तरीकों से, उन्होंने भूमि के सभी प्राणियों तक जानकारी पहुँचायी। और अपने विशेष जीवन पथक्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने सब वस्तुओं को जिनके ऊपर उन्होंने निशान छोड़े थे, चिन्हित किया...। उनका मिट्टी, घास और जंगलों के साथ घनिष्ठ संबंध था और वे मिट्टी, घास और वनों में शक्ति और जीवन चेतना लेकर आए, उन्होंने सभी प्राणियों तक सृष्टिकर्ता का प्रोत्साहन और अभिनंदन पहुँचाया ...

सृष्टिकर्ता की निगाहें उन सब वस्तुओं पर पड़ीं जिन्हें उसने बनाया था और इस पल उसकी निगाहें जंगलों और पर्वतों पर आकर ठहर गईं और उसका मस्तिष्क में कई विचार घूम रहे थे। जैसे ही उसके वचन बोले गए, घने जंगलों में और पहाड़ों के ऊपर, इस प्रकार के पशु प्रकट हुए जो पहले कभी नहीं आए थे : वे "जंगली जानवर" थे जो परमेश्वर के वचन के द्वारा बोले गए थे। लम्बे समय से प्रतीक्षारत, उन्होंने अपने अनोखे चेहरों के साथ अपने-अपने सिरों को हिलाया और हर एक ने अपनी-अपनी पूँछ को लहराया। कुछ के पास रोंएदार लबादे थे, कुछ कवचधारी थे, कुछ के खुले हुए ज़हरीले दाँत थे, कुछ के पास घातक मुस्कान थी, कुछ लम्बी गर्दन वाले थे, कुछ के पास छोटी पूँछ थी, कुछ के पास ख़तरनाक आँखें थीं, कुछ डर के साथ देखते थे, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के मुँह में ख़ून लगा हुआ था, कुछ दो पाँव से उछलते थे, कुछ चार खुरों से धीरे-धीरे चलते थे, कुछ पेड़ों के ऊपर लटके दूर तक देखते थे, कुछ जंगलों में इन्तज़ार में लेटे हुए थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाओं की खोज में थे, कुछ मैदानों में दौड़ते और उछलते थे, कुछ शिकार के लिए जंगलों में गश्त लगा रहे थे...; कुछ गरज रहे थे, कुछ हुँकार भर रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ रो रहे थे...; कुछ ऊँचे सुर, कुछ नीचे सुर वाले, कुछ खुले गले वाले, कुछ साफ-साफ और मधुर स्वर वाले थे...; कुछ भयानक थे, कुछ सुन्दर थे, कुछ बड़े अजीब से थे और कुछ प्यारे-से थे, कुछ डरावने थे, कुछ बहुत ही आकर्षक भोले-भाले थे...। सब एक-एक कर आने लगे। देखो कि वे गर्व से कितने फूले हुए थे, उन्मुक्त-जीव थे, एक-दूसरे से बिलकुल उदासीन थे, एक-दूसरे को एक झलक देखने की भी परवाह नहीं करते थे...। सभी उस विशेष जीवन को जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और अपने जंगलीपन और क्रूरता को धारण किए हुए, जंगलों में और पहाड़ियों के ऊपर प्रकट हो गए। सबसे घृणित, पूरी तरह ढीठ—किसने उन्हें पहाड़ियों और जंगलों का सच्चा स्वामी बना दिया था? उस घड़ी से जब से सृष्टिकर्ता ने उनके प्रकटन को स्वीकृति दी थी, उन्होंने जंगलों और पहाड़ों पर "दावा किया," क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले से ही उनकी सीमाओं को कस दिया था और उनके अस्तित्व के दायरे को निश्चित कर दिया था। केवल वे ही जंगलों और पहाड़ों के सच्चे स्वामी थे, इसलिए वे इतने प्रचण्ड और ढीठ थे। उन्हें "जंगली जानवर" सिर्फ इसीलिए कहा जाता था क्योंकि, सभी प्राणियों में वे ही थे जो वास्तव में इतने जंगली, क्रूर और वश में न आने वाले थे। उन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता था, इस प्रकार उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था और वे मानवजाति के साथ एकता से नहीं रह सकते थे या मानवजाति के लिए परिश्रम नहीं कर सकते थे। चूँकि उनका पालन-पोषण नहीं किया जा सकता था, और वे मानवजाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था। मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे। चूँकि उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे इसलिए बदले में, वे उन ज़िम्मेदारियों को निभा सकते थे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दी गई थी : पर्वतों और जंगलों की सुरक्षा करना। उनके जंगलीपन ने पर्वतों की सुरक्षा की और जंगलों की हिफाज़त की और उनका वही स्वभाव उनके अस्तित्व और बढ़ोत्तरी के लिए सबसे बेहतरीन सुरक्षा और आश्वासन था। साथ ही, उनके जंगलीपन ने सब वस्तुओं के मध्य सन्तुलन को कायम रखा और सुनिश्चित किया। उनका आगमन पर्वतों और जंगलों के लिए सहयोग और मजबूत सहारा लेकर आया; उनके आगमन ने शांत तथा रिक्त पर्वतों और जंगलों में शक्ति और जीवन चेतना का संचार किया। उसके बाद से, पर्वत और जंगल उनके स्थायी निवास बन गए, और वे अपने घरों से कभी वंचित नहीं रहेंगे, क्योंकि पर्वत और पहाड़ उनके लिए प्रकट हुए और अस्तित्व में आए थे; जंगली जानवर अपने कर्तव्य को पूरा करेंगे और उनकी हिफाज़त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। साथ ही, जंगली जानवर सृष्टिकर्ता के प्रोत्साहन के साथ दृढ़ता से रहेंगे ताकि अपने सीमा क्षेत्र को थामे रह सकें और सृष्टिकर्ता के द्वारा स्थापित की गयी सब वस्तुओं के सन्तुलन को कायम रखने के लिए अपने जंगली स्वभाव का निरन्तर उपयोग कर सकें और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को प्रकट कर सकें!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 89

सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन, सभी चीज़ें पूर्ण हैं

परमेश्वर के द्वारा सचल और अचल समेत सब वस्तुओं की सृष्टि की गई, जैसे पक्षी और मछलियाँ, जैसे वृक्ष और फूल, जिसमें मवेशी, कीड़े-मकौड़े, और छठे दिन बनाए गए जंगली जानवर भी शामिल थे—वे सभी परमेश्वर की निगाह में अच्छे थे और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की निगाहों में ये वस्तुएँ उसकी योजना के अनुरूप, पूर्णता के शिखर को प्राप्त कर चुकी थीं और एक ऐसे स्तर तक पहुँच गई थीं जहाँ परमेश्वर उन्हें पहुँचाना चाहता था। कदम-दर-कदम, सृष्टिकर्ता ने उन कार्यों को किया जो वह अपनी योजना के अनुसार करने का इरादा रखता था। जिन चीज़ों की वह रचना करना चाहता था, वे एक-के-बाद-एक प्रकट होती गईं और प्रत्येक का प्रकटीकरण सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रतिबिम्ब था और उसके अधिकार का ठोस रूप था, इन ठोस रूपों के कारण, सभी जीवधारी सृष्टिकर्ता के अनुग्रह और प्रावधान के प्रति नत-मस्तक थे। जैसे ही परमेश्वर के चमत्कारी कर्मों ने अपने आपको प्रकट किया, यह संसार परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सब वस्तुओं से, अंश-अंश करके फैल गया और सब अव्यवस्था और अँधकार से स्पष्टता और उजाले में बदल गया, मृत्युपरक स्थिरता से जीवन्त और असीमित जीवन चेतना में बदल गया। सृष्टि की सब वस्तुओं के मध्य, बड़े से लेकर छोटे तक और छोटे से लेकर सूक्ष्म तक, ऐसा कोई भी नहीं था जो सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के द्वारा सृजित किया नहीं गया था और हर एक जीवधारी के अस्तित्व की एक अद्वितीय और अंतर्निहित आवश्यकता और मूल्य था। उनके आकार और ढांचे के अन्तर के बावजूद, उन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा ही बनाया जाना था ताकि सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन अस्तित्व में बने रहें। कई बार लोग किसी बड़े बदसूरत कीड़े को देखकर कहते हैं, "यह कीड़ा बहुत ही भद्दा है, ऐसा हो ही नहीं सकता कि ऐसे कुरूप जीव को परमेश्वर बना सकता है—ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह इतनी भद्दी चीज़ को बनाए।" कितना मूर्ख़तापूर्ण नज़रिया है यह! इसके बजाय उन्हें यह कहना चाहिए, "भले ही यह कीड़ा इतना भद्दा है, उसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और इस लिए उसके पास उसका अपना अनोखा उद्देश्य ज़रूर होगा।" परमेश्वर के विचारों में, विभिन्न जीवित प्राणी जिन्हें उसने बनाया है, वह उन्हें हर प्रकार का और हर तरह का रूप और हर प्रकार की कार्य प्रणालियाँ और उपयोगिताएँ देना चाहता था और इस प्रकार परमेश्वर के द्वारा बनाई गई किसी भी वस्तु को एक ही साँचे में नहीं ढाला गया है। उनकी बाहरी संरचना से लेकर भीतरी संरचना तक, उनके जीने की आदतों से लेकर उनके निवास तक—हर एक चीज़ अलग है। गायों के पास गायों का रूप है, गधों के पास गधों का रूप है, हिरनों के पास हिरनों का रूप है, हाथियों के पास हाथियों का रूप है। क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अच्छा दिखता है और कौन सबसे भद्दा दिखता है? क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अधिक उपयोगी है और किसकी अस्तित्व की आवश्यकता सबसे कम है? कुछ लोगों को हाथियों का रूप अच्छा लगता है, परन्तु कोई भी खेती के लिए हाथियों का इस्तेमाल नहीं करता है; कुछ लोग शेरों और बाघों के रूप को पसंद करते हैं, क्योंकि उनका रूप सब जीवों में सबसे अधिक प्रभावकारी है, परन्तु क्या तुम उन्हें पालतू जानवर की तरह रख सकते हो? संक्षेप में, जब तमाम जीवों की बात आती है, तो मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार को स्वीकार कर लेना चाहिये, अर्थात्, सब जीवों के लिए सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किए गए क्रम को मान लेना चाहिये; यह सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है। सृष्टिकर्ता के मूल अभिप्रायों को खोजने और उसके प्रति आज्ञाकारी होने का रवैया ही सृष्टिकर्ता के अधिकार की सच्ची स्वीकार्यता और निश्चितता है। यह परमेश्वर की निगाह में अच्छा है तो मनुष्य के पास दोष ढूँढ़ने का कौन-सा कारण है?

अतः, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन सब वस्तुओं को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के लिए सुर में सुर मिलाकर गाना है और उसके नए दिन के कार्य के लिए एक बेहतरीन भूमिका की शुरूआत करनी है और इस समय सृष्टिकर्ता भी अपने प्रबन्ध के कार्य में एक नया पृष्ठ खोलेगा! सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त बसंत ऋतु के अँकुरों, ग्रीष्म ऋतु में परिपक्वता, शरद ऋतु में कटनी, और शीत ऋतु में भण्डारण की व्यवस्था के अनुसार, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता की प्रबंधकीय योजना के साथ प्रतिध्वनित होंगी और वे अपने नए दिन, नई शुरूआत और नए जीवन पथक्रम का स्वागत करेंगी और वे सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन हर दिन का अभिनन्दन करने के लिए कभी न खत्म होने वाले अनुक्रम के अनुसार जीवित रहेंगी और प्रजनन करेंगी ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 90

कोई भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान नहीं ले सकता है

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ्‍य प्रकट और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। चाहे उसने जिस भी रीति से उनका सृजन किया, जिस कारण से भी उनका सृजन किया, परमेश्वर के वचनों के कारण ही सभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और मजबूत बनी रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रकट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के वास्ते सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल किया और मानवजाति के लिए जीने का उपयुक्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय विधियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही उसका श्वास प्राप्त करने वाली थी। अर्थात, मानवजाति की सृष्टि से पहले के समय में, मानवजाति से भिन्न सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ, ऐसी वस्तुओं में प्रकट हुआ जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही विशाल थीं और छोटे से छोटे पशु-पक्षियों में, हर प्रकार के कीड़े-मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में प्रकट हुआ, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे, जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक की वंशवृद्धि सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण हुई और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताता था। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे अपने अलग-अलग रूपों और संरचना के द्वारा उस जीवन व चेतना को दर्शाते थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने उस जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल अचल पदार्थ प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, प्रजनन करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान भी दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने के नियमों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँ जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिये गए हैं। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपका नहीं रहता है और किसी आकार में सीमित नहीं होता; वह विश्व के परिचालन को नियंत्रित करने और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखने में समर्थ है और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली-भाँति सँभाल सकता है जिससे वे उसकी सेवा करें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके भीतर की सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है और इसके अलावा, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है; यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या बिगाड़ानहीं जा सकता है और न ही उसमें किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान की जगह नहीं ले सकता और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; यह किसी गैर-सृजित प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ्‍य नहीं है और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य क्यों नहीं है उसका कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, भले ही हालाँकिपरमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यद्यपि वे कुछ सामर्थ्‍य धारण किए हुए हैं जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने और सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता की जगह कोई गैर-सृजित प्राणी नहीं ले सकता है और उसी प्रकार कोई गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान नहीं ले सकता। क्या तुमने बाइबल में, परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था और इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं और इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है और उनका सम्राट भी। उन में से हर एक के बीच—चाहे वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ्‍य के हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान ले सके। उन्‍हें कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलने वाले सत्‍य और तथ्य हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 91

परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

सभी चीज़ों को बनाने के पश्चात्, सृष्टिकर्ता का अधिकार एक बार फिर इंद्रधनुष की वाचा में दिखाया और पुष्ट किया जाता है

सृष्टिकर्ता का अधिकार हमेशा सभी जीवधारियों पर प्रकट और इस्तेमाल किया जाता है और वह न केवल सब वस्तुओं की नियति पर शासन करता है, बल्कि मनुष्य पर भी शासन करता है, एक विशेष जीवधारी जिसे उसने स्वयं अपने हाथों से बनाया है और जिसकी एक अलग जीवन संरचना है और जो जीवन के एक अलग रूप में अस्तित्व में बना हुआ है। सब वस्तुओं को बनाने के बाद, सृष्टिकर्ता अपने अधिकार और सामर्थ्‍य को प्रकट करने से नहीं रूका; उसके लिए, वह अधिकार जिस के तहत वह सभी चीज़ों पर और सम्पूर्ण मानवजाति की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता था, वह केवल तब औपचारिक रूप से शुरू हुआ जब मानवजाति ने सच में उसके हाथों से जन्म लिया। वह मानवजाति का प्रबन्ध और उन पर शासन करना चाहता था; वह मानवजाति को बचाना चाहता था, मानवजाति को सचमुच में पाना चाहता था, वह ऐसी मानवजाति को पाना चाहता था जो सभी चीज़ों का संचालन कर सके; उसका इरादा ऐसी मानवजाति को अपने अधिकार की अधीनता में रखने का था, उनसे अपने अधिकार को जानने और उसका पालन करवाने का था। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल करके अपने अधिकार को मनुष्य के बीच में अधिकारिक रूप से प्रकट करना प्रारम्भ किया और अपने वचनों को साकार करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ किया। बेशक, इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर का अधिकार सभी स्थानों में दिखाई देने लगा; मैंने बस कुछ विशेष, जाने-माने उदाहरणों को लिया है जिससे तुम सब परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अद्वितीय अधिकार को समझ और जान सको।

उत्पत्ति 9:11-13 के अंश और परमेश्वर द्वारा संसार की सृष्टि के लेखे-जोखे से संबंधित उपर्युक्त अंश में एक समानता है, लेकिन उनमें एक अन्तर भी है। समानता क्या है? समानता परमेश्वर के द्वारा वचनों के इस्तेमाल में निहित है ताकि वह उन कामों को कर सके जिसकी उसने इच्छा की थी और अन्तर यह है कि जिनअंशों को यहाँ उद्धृत किया गया है, वे मनुष्य के साथ परमेश्वर के वार्तालाप को दर्शाते हैं, जिसमें वह मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधता है और मनुष्य को उस बारे में बताता है जो वाचा में समाहित है। मनुष्य के साथ हुए उसके संवाद के दौरान परमेश्वर के अधिकार का उपयोग किया गया, कहने का तात्पर्य है कि मानवजाति की सृष्टि से पहले, परमेश्वर का वचन निर्देश और आदेश थे, जिन्हें उन जीवधारियों के लिए जारी किया गया था जिन्हें वह बनाना चाहता था। परन्तु अब यहाँ कोई परमेश्वर के वचनों को सुनने वाला था और इस प्रकार उसके वचन मनुष्यों के साथ एक संवाद थे और साथ ही मनुष्य के लिए एक प्रोत्साहन एवं चेतावनी भी थे। इसके अतिरिक्त परमेश्वर के वचन सभी चीज़ों को सौंपी गई वो आज्ञाएँ थीं जो उसका अधिकार वहाँ किए हुए थीं।

इस अंश में परमेश्वर की कौन-सी गतिविधि दर्ज है? इसमें वह वाचा दर्ज है जिसे परमेश्वर ने जल प्रलय से संसार के विनाश के बाद मनुष्य के साथ बाँधा था; यह वाचा मनुष्य को बताती है कि परमेश्वर ऐसी तबाही को फिर से संसार पर नहीं लाएगा औरइस कारण, परमेश्वर ने इसके लिए एक चिह्न ठहराया। यह चिह्न क्या था? पवित्र-शास्त्र में कहा गया है कि "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यजाति को बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने इन वचनों को कहा, एक इंद्रधनुष मनुष्य की आँखों के सामने प्रकट हो गया, जहाँ वो आज तक मौजूद है। हर किसी ने ऐसे इंद्रधनुष को देखा है और जब तुम उसे देखते हो तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसे प्रकट होता है? विज्ञान इसे साबित करने में या उसके स्रोत को ढूँढ़ने में या उसके उद्गम स्थान को पहचानने में नाकाम है। क्योंकि इंद्रधनुष उस वाचा का चिह्न है जो सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच में बांधी गयी थी; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, यह मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया गया था, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। अपने वचनों को कहने के बाद यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता है। अपनी प्रतिज्ञा और मनुष्य के साथ अपनी वाचा में बने रहने के लिए सृष्टिकर्ता ने अपनी विशिष्ट विधि का उपयोग किया और इस प्रकार उसने जो वाचा स्थापित की थी उसके चिह्न के रूप में उसके द्वारा इंद्रधनुष का उपयोग, एक स्वर्गीय आदेश और व्यवस्था है जो हमेशा अपरिवर्तनीय बना रहेगा, भले ही वह सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानवजाति के संबंध में। ये कहना ही होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था, सभी चीज़ों की सृष्टि के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और सच्चा प्रकटीकरण है और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य असीमित हैं; उसके द्वारा इंद्रधनुष को एक चिह्न के रूप में इस्तेमाल करना सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता और विस्तार है। अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए यह परमेश्वर द्वारा किया गया एक और कार्य था और अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जो वाचा बाँधी थी, उसका एक चिह्न था। उसने मनुष्य को बताया कि उसने क्या करने का संकल्प लिया है और वह किस रीति से पूर्ण और प्राप्त किया जाएगा। इस तरह से परमेश्वर के मुख के वचनों से वह विषय पूरा हो गया। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ्‍य है और आज उसके द्वारा इन वचनों के बोले जाने के कई हज़ार साल बाद भी मनुष्य परमेश्वर के मुख से बोले गए इंद्रधनुष को देख सकता है। परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के कारण, इंद्रधनुष बिना किसी बदलाव और परिवर्तन के आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बना हुआ है। इस इंद्रधनुष को कोई भी हटा नहीं सकता है, कोई भी इसके नियमों को बदल नहीं सकता है। यह सिर्फ परमेश्वर के वचनों के कारण ही अस्तित्व में बना हुआ है। बिलकुल सही अर्थ में यह परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन का पक्का है और उसका वचन पूरा होगा और जो कुछ वो पूरा करेगा वह सर्वदा बना रहेगा।" ऐसे वचन यहाँ पर साफ-साफ अभिव्यक्त किए गए हैं और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्पष्ट चिह्न और गुण हैं। ऐसा चिह्न या गुण सृजित किए गए प्राणियों में से किसी के भी पास नहीं है और न ही उनमें देखे जाते हैं और न ही इसे गैर-सृजित प्राणियों में से किसी के भी पास देखा जाता है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर का है और मात्र सृष्टिकर्ता के द्वारा धारण की गई पहचान और सार को अन्य जीवधारियों से पृथक करता है। साथ ही, यह ऐसा चिह्न और गुण भी है जिससे श्रेष्ठ स्वयं परमेश्वर को छोड़, कोई भी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी नहीं हो सकताचिह्न।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के साथ वाचा बाँधना एक अति महत्वपूर्ण कार्य था। एक ऐसा कार्य था जिसका उपयोग वह मनुष्य तक एक सच पहुँचाने और मनुष्य को अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था। इस कारण उसने एक अद्वितीय विधि का इस्तेमाल करते हुए, मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए एक विशिष्ट चिह्न का उपयोग किया, जो मनुष्य के साथ बांधी गयी वाचा का एक चिह्न था। अतः क्या इस वाचा का ठहराया जाना एक बड़ी घटना थी? वह घटना आखिर कितनी बड़ी थी? यही वह बात है जो इस वाचा को विशेष बनाती है : यह एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच या एक समूह और दूसरे समूह के बीच या एक देश और दूसरे देश के बीच ठहराई गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण मानवजाति के बीच ठहराई गई वाचा है और यह तब तक प्रमाणित बनी रहेगी जब तक सृष्टिकर्ता सब वस्तुओं का उन्मूलन न कर दे। इस वाचा का प्रतिपादन करने वाला सृष्टिकर्ता है और इसको बनाए रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानवजाति के साथ ठहराई गई इंद्रधनुष की वाचा की सम्पूर्णता, सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य हुए संवाद के अनुसार पूर्ण और प्राप्त हुई थी और आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में वैसी ही बनी हुई है। सृजित जीवधारी समर्पण करने, आज्ञा मानने, विश्वास करने, प्रशंसा करने, गवाही देने और सृष्टिकर्ता के अधिकार की स्तुति करने के सिवा और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और के पास ऐसी वाचा को ठहराने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का प्रकटीकरण बार-बार, मानवजाति के लिए घोषणा करता है और उसके ध्यान को सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य बांधी गयी वाचा की ओर खींचता है। सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य ठहराई गयी वाचा के निरन्तर प्रकटीकरण में, मनुष्य को, इंद्रधनुष या वाचा नहीं दिखलाए जाते, वरन सृष्टिकर्ता के अपरिर्वतनशील अधिकार को दिखाया जाता है। बार-बार इंद्रधनुष का प्रकटीकरण छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के ज़बर्दस्त और अद्भुत कर्मों को दर्शाता है और साथ ही यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का अतिआवश्यक प्रतिबिम्ब है जो कभी धूमिल नहीं होगा, कभी नहीं बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक और पहलू का प्रकटीकरण नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 92

परमेश्वर की आशीषें

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

सृष्टिकर्ता के कथनों का अद्वितीय अंदाज़ और लहज़ा सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार और पहचान का एक प्रतीक हैं

बहुत से लोग परमेश्वर की आशीषों को खोजना और पाना चाहते हैं, परन्तु हर कोई इन आशीषों को प्राप्त नहीं कर सकता है, क्योंकि परमेश्वर के अपने ही सिद्धांत हैं, और वह अपने ही तरीके से मनुष्यों को आशीष देता है। वे प्रतिज्ञाएँ जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और जितना अनुग्रह वह मनुष्य को देता है, वे मनुष्यों के विचारों और कार्यों के आधार पर बाँटे जाते हैं। इस प्रकार, परमेश्वर की आशीषों के द्वारा क्या प्रदर्शित होता है? लोग उनमें क्या देख सकते हैं? इस बिन्दु पर, हम इस वाद-विवाद को दरकिनार करें कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है या मनुष्यों को आशीष देने के लिए परमेश्वर के सिद्धांत क्या हैं। उसके बजाए, आओहम परमेश्वर के अधिकार को जानने के उद्देश्य के साथ और परमेश्वर के अधिकार को जानने के दृष्टिकोण से मनुष्य को परमेश्वर द्वारा दी गयी आशीष पर नज़र डालें।

बाइबल के ऊपर दिए गए सभी चार अंश मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा दी गयी आशीष का अभिलेख हैं। वे परमेश्वर कीआशीष पाने वालों, जैसे अब्राहम और अय्यूब का विस्तृत विवरण देते हैं। साथ ही साथ, उन कारणों का भी विवरण देते हैं कि परमेश्वर ने क्यों अपनी आशीषों को बरसाया और इन आशीषों में क्या निहित था। परमेश्वर के कथनों का अंदाज़ और ढंग और वह दृष्टिकोण और स्थिति जिसके तहत उसने वचन बोले, लोगों को यह समझने देता है कि आशीषों को देने वाला और ऐसी आशीषों को पाने वाले बिलकुल ही अलग पहचान, हैसियत और सार के होते हैं। इन बोले गए वचनों का अंदाज़ और ढंग और जिस हैसियत से वे बोले गए थे, परमेश्वर के लिए अद्वितीय हैं, जो सृष्टिकर्ता की पहचान को धारण करता है। उसके पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, साथ ही साथ, सृष्टिकर्ता का सम्मान और प्रताप भी, जो किसी मनुष्य के संदेह को बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

पहले, आओ हम उत्पत्ति 17:4–6 को देखें : "देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।" ये वचन वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी, साथ ही साथ, परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गयी आशीष भी थी: परमेश्वर अब्राहम को जातियों का पिता बनाएगा और उसे बहुत ही अधिक फलवंत करेगा और उससे अनेक जातियों का मूल बनाएगा और उसके वंश में राजा पैदा होंगे। क्या तुम इन वचनों में परमेश्वर के अधिकार को देखते हो? ऐसे अधिकार को तुम कैसे देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार के सार के किस पहलू को देखते हो? इन वचनों को ध्यान से पढ़ने से, यह पता करना कठिन नहीं है कि परमेश्वर का अधिकार और पहचान परमेश्वर के वचनों में स्पष्टता से प्रकाशित हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने कहा "मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू ... हो जाएगा। ... मैं ने तुझे ठहरा दिया ... मैं तुझे बनाऊँगा...," इसमें "तू बनेगा" और "मैं करूँगा," जैसे वाक्यांश जिनके वचन परमेश्वर की पहचान और अधिकार की पुष्टि करते हैं, वे एक मायने में, सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता का संकेत हैं; दूसरे मायने में, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए विशिष्ट वचन हैं, जो सृष्टिकर्ता की पहचान धारण किए हुए है—साथ ही साथ, पारंपरिक शब्दावली का एक भाग भी है। यदि कोई कहता है कि वे आशा करते हैं कि एक फलाना व्यक्ति बहुतायत से फलवंत होगा और उससे जातियाँ उत्पन्न होंगी और उसके वंश में राजा पैदा होंगे, तब निःसन्देह यह एक प्रकार की अभिलाषा है, यह आशीष या प्रतिज्ञा नहीं है। इसलिए, यह कहने की लोगों की हिम्मत नहीं होगी, "कि मैं तुम्हें ऐसा बनाऊँगा, और तुम ऐसा ऐसा करोगे...," क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास ऐसी सामर्थ्‍य नहीं है; यह उन पर निर्भर नहीं है, अगर वे ऐसी बातें कहें भी तो, उनके शब्द खोखले और बेतुके होंगे, जो उनकी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं से निकले होंगे। यदि किसी को लगे कि वह अपनी अभिलाषा पूरी नहीं कर सकता, तो क्या वह ऐसे बड़बोलेपन वाले अंदाज़ में बात करने की हिम्मत करेगा? हर कोई अपने वंशजों के लिए अभिलाषा करता है और यह आशा करता है कि वे दूसरों से आगे बढ़ेंगे और बड़ी सफलता हासिल करेंगे। "उन में से कोई महाराजा बन जाए तो कितने सौभाग्य की बात होगी! यदि कोई गवर्नर बन जाए तो भी अच्छा होगा, वह बस महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना चाहिये!" ये सब लोगों की अभिलाषाएँ हैं, परन्तु लोग अपने वंशजों के लिये केवल आशीषों की अभिलाषा कर सकते हैं, लेकिन अपनी किसी भी प्रतिज्ञा को पूरा या साकार नहीं कर सकते। अपने हृदय में, हर कोई स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके पास ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने के लिए सामर्थ्‍य नहीं है, क्योंकि उन चीज़ों की हर बात उनके नियंत्रण से बाहर है, तो वे कैसे दूसरों की तक़दीर का फैसला कर सकते हैं? परमेश्वर ऐसे वचनों को इसलिए बोलता है क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है और वह जो भी प्रतिज्ञाएँ मनुष्य से करता है उन्हें पूर्ण और साकार करने के काबिल है और उन आशीषों को फलीभूत करने के योग्य है जिन्हें वह मनुष्य को देता है। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, और किसी को बहुतायत से फलवंत करना परमेश्वर के लिए बच्चों का खेल है; किसी के वंशजों को समृद्ध करने के लिए सिर्फ उसके एक वचन की आवश्यकता होगी। उसे ऐसे कार्य करने के लिए पसीना बहाने, माथापच्ची करने या खुद को उलझन में डालने की कभी आवश्यकता नहीं होगी; यही परमेश्वर का सामर्थ्‍य और परमेश्वर का अधिकार है।

उत्पत्ति 18:18 में "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी" को पढ़ने के बाद, क्या तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को महसूस कर सकते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की असाधारणता का एहसास कर सकते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता का एहसास कर सकते हो? परमेश्वर के वचन निश्चित हैं। परमेश्वर सफलता में अपने आत्मविश्वास के कारण या इसके निरूपण के लिए इन वचनों को नहीं कहता है; बल्कि, उसका इन्हें कहना परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं और एक आज्ञा है जो परमेश्वर के वचन को पूरा करती है। यहाँ पर दो अभिव्यक्तियाँ हैं जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है, "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी," तो क्या इन वचनों में अस्पष्टता का कोई तत्व है? क्या चिंता की कोई बात है? क्या इस में भय की कोई बात है? परमेश्वर के द्वारा बोले गए कथनों में "निश्चय होगा" और "होगा" जैसे वचनों के कारण, इन तत्वों का, जो खास तौर से मनुष्यों के गुण हैं और अक्सर उन में प्रदर्शित होते हैं, सृष्टिकर्ता से कभी कोई संबंध नहीं रहा है। किसी को शुभकामना देते समय कोई इन शब्दों का इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं करेगा, किसी में यह हिम्मत नहीं होगी कि ऐसी निश्चितता के साथ किसी दूसरे को एक महान और सामर्थी जाति बनने की आशीष दे या प्रतिज्ञा करे कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसमें आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने अधिक निश्चितहोते हैं, उतना ही अधिक वे किसी चीज़ को साबित करते हैं—और वह चीज़ क्या है? वे साबित करते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है, कि उसका अधिकार इन कामों को पूरा कर सकता है और उनका पूरा होना अनिवार्य है। परमेश्वर, उन सब बातों के विषय में अपने हृदय में निश्चित था जिनके द्वारा उसने अब्राहम को आशीष दी थी, उसे लेकर उसमें ज़रा-भी संदेह नहीं था। इसके अलावा, ये सारी बातें उसके वचन के अनुसार पूरी हो जाएंगी और कोई भी ताकत उनके पूरा होने को बदलने, बाधित करने, कमज़ोर करने या उलट-पुलट करने में सक्षम नहीं होगी। चाहे जो कुछ भी हो जाए, परमेश्वर के वचनों को पूरा होने से और उनकी कार्यसिद्धि को कोई भी निष्फल नहीं कर सकता है। यही सृष्टिकर्ता के मुँह से बोले गए वचनों की सामर्थ्‍य है और सृष्टिकर्ता का अधिकार है जो मनुष्य के इनकार को सह नहीं सकता है! इन वचनों को पढ़ने के बाद भी, क्या तुम लोगों के मन में संदेह है? इन वचनों को परमेश्वर के मुँह से कहा गया था और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्‍य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार को और तथ्यों के पूरा होने की अनिवार्यता को, किसी भी सृजित प्राणी और गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और न ही कोई सृजित प्राणी और गैर-सृजित प्राणी उससे बढ़कर उत्कृष्ट हो सकता है। केवल सृष्टिकर्ता ही मानवजाति के साथ ऐसे अंदाज़ और लहज़े में बात कर सकता है और तथ्यों ने साबित किया है कि उसकी प्रतिज्ञाएँ खोखले वचन या बेकार की डींगें नहीं हैं, बल्कि अद्वितीय अधिकार का प्रदर्शन हैं जिससे कोई व्यक्ति, घटना, या वस्तु बढ़कर नहीं हो सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 93

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और मनुष्य द्वारा बोले गए शब्दों में क्या अंतर है? जब तुम परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को पढ़ते हो तो तुम परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के वचनों के अधिकार को महसूस करते हो। जब तुम लोगों को ऐसे शब्द बोलते हुए सुनते हो तो तुमको कैसा लगता है? क्या तुम्हें महसूस होता है कि वे बहुत अधिक अभिमानी और डींगें हाँकने वाले हैं, और दिखावा करते हैं? क्योंकि उनके पास ऐसी सामर्थ्‍य नहीं होती, उनके पास ऐसा अधिकार भी नहीं होता, और इस प्रकार वे ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। उनका अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति बहुत निश्चित होना केवल उनकी टिप्पणियों की लापरवाही को दर्शाता है। यदि कोई ऐसे शब्दों को कहता है तो वे निःसन्देह अभिमानी और अति-आत्मविश्वासी होंगे और अपने आपको प्रधान स्वर्गदूत के स्वभाव के आदर्श उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे होंगे। ये वचन परमेश्वर के मुँह से बोले गये हैं; क्या तुम इनमें अभिमान की कोई बात पाते हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन महज़ एक मज़ाक हैं? परमेश्वर के वचन अधिकार हैं, परमेश्वर के वचन तथ्य हैं और उसके मुँह से वचन के निकलने से पहले ही, अर्थात, जब परमेश्वर कुछ करने का निर्णय ले रहा होता है तो वह काम पहले ही पूरा किया जा चुका होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि जो कुछ परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था, वह एक वाचा थी जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था और परमेश्वर के द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा थी। यह प्रतिज्ञा एक प्रमाणित तथ्य था, और ये तथ्य परमेश्वर की योजना के अनुसार, परमेश्वर के विचारों में धीरे-धीरे पूरा किये गए। अतः, परमेश्वर द्वारा ऐसी बातों को कहने का यह मतलब नहीं है कि उसका स्वभाव अभिमानी है, क्योंकि परमेश्वर ऐसी चीज़ों को पूरा करने में सक्षम है। उसके पास ऐसी सामर्थ्‍य और अधिकार है, और ऐसे कार्यों को पूरा करने में पूर्णतया सक्षम है और उनका पूर्ण होना पूरी तरह उसकी योग्यता के दायरे में है। जब परमेश्वर के मुख से ऐसे वचन बोले जाते हैं तो वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन एवं प्रकटीकरण होते हैं, वे परमेश्वर के सार एवं अधिकार का पूर्ण प्रकाशन एवं अभिव्यक्ति होते हैं और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान के प्रमाण के रूप में अधिक सही और उचित होता हो। ऐसे कथनों का ढंग, लहज़ा और वचन सृष्टिकर्ता की पहचान के ही चिह्न हैं और वे परमेश्वर की अपनी पहचान के प्रकटीकरण से पूरी तरह से मेल खाते हैं; उनमें कोई झूठा दिखावा या अशुद्धता नहीं है; वे पूरी तरह से और सर्वथा सृष्टिकर्ता के अधिकार और सार का पूर्ण प्रदर्शन हैं। जहाँ तक जीवधारियों की बात है, उनके पास न तो यह अधिकार है और न ही यह सार और परमेश्वर के द्वारा दी गयी शक्ति तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है। यदि मनुष्य ऐसा आचरण नहीं करता है तो यह निश्चित रूप से उसके दूषित स्वभाव का प्रदर्शन होगा और यह मनुष्य के अभिमान और अनियंत्रित महत्‍वाकांक्षाओं का हस्तक्षेप करने वाला प्रभाव होगा तथा उस दुष्ट, शैतान की नीच इच्छाओं का खुलासा होगा, जो लोगों को धोखा देना और बहकाना चाहता है जिससे कि वे परमेश्वर को धोखा दे बैठें। ऐसी भाषा के द्वारा जो प्रकट किया जाता है, उसे परमेश्वर किस ढंग से देखता है? परमेश्वर कहेगा कि तुम उसका स्थान हड़पना चाहते हो और तुम उसका रूप धारण करना और उसका स्थान लेना चाहते हो। जब तुम परमेश्वर के बोले गए वचनों के लहज़े का अनुकरण करते हो, तो तुम्हारा इरादा होता है कि लोगों के हृदयों से परमेश्वर के स्थान को हटा दो और मानवजाति के जीवन के उस स्थान पर अवैध कब्ज़ा कर लो जो न्यायसंगत रूप से परमेश्वर का है। सीधे और सरल रूप में, यह शैतान है; यह प्रधान स्वर्गदूत के वंशजों के कार्य हैं; जो स्वर्ग के लिए असहनीय है! तुम लोगों के बीच में, क्या कोई है जिसने कभी लोगों को गुमराह करने और धोखा देने के इरादे से, किसी निश्चित तरीके से, कुछ बातों को कहने में परमेश्वर का अनुकरण किया हो और उन्हें यह एहसास दिलाया हो मानो इस व्यक्ति के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य है, मानो इस व्‍यक्ति का सार एवं पहचान अद्वितीय हो और यहाँ तक कि मानो इस व्यक्ति के बोलने का लहज़ा भी परमेश्वर के समान हो? क्या तुम लोगों ने कभी ऐसा कुछ किया है? क्या तुम लोगों ने कभी अपनी बातों में, ऐसी भाव-भंगिमाओं के साथ परमेश्वर के लहज़े का अनुकरण किया है जो शायद परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हों, जो तुम्हारे अनुमान से शक्ति और अधिकार हो? क्या तुम में से अधिकतर लोग अक्सर इस तरह से काम करते हैं या काम करने की योजना बनाते हैं? अब, जब तुम लोग सचमुच में सृष्टिकर्ता के अधिकार को देखते, एहसास करते और जानते हो और पीछे मुड़कर देखते हो कि तुम लोग क्या किया करते थे और खुद की किस बात को उजागर करते थे, तो क्या तुम लोग घृणा महसूस करते हो? क्या तुम लोग अपनी नीचता और निर्लज्जता का एहसास करते हो? ऐसे लोगों के स्वभाव और सार का विश्लेषण करने के बाद, क्या ऐसा कहा जा सकता है कि वे नरक की शापित संतानें हैं। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि हर कोई जो ऐसा करता है वह अपने आपको लज्जित करता है? क्या तुम लोग इस प्रकृति की गम्भीरता को पहचानते हो? यह आखिर कितना गम्भीर है? इस प्रकार का कार्य करने वाले लोगों का इरादा परमेश्वर का अनुकरण करना होता है। वे परमेश्वर बनना चाहते हैं और लोगों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाना चाहते हैं। वे लोगों के हृदयों से परमेश्वर के स्थान को हटा देना चाहते हैं और ऐसे परमेश्वर से छुटकारा पाना चाहते हैं जो लोगों के बीच कार्य करता है। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि लोगों को नियंत्रित करने, लोगों को निगलने, और उनकी संपत्ति को हड़पने के मकसद को पूरा कर सकें। हर किसी के पास ऐसी अवचेतन इच्छा और महत्वाकांक्षा होती है और हर कोई ऐसे दूषित शैतानी सार में और ऐसी शैतानी प्रकृति में जीवन बिताता है जिसमें वे परमेश्वर के शत्रु होते हैं, परमेश्वर को धोखा देते हैं और खुद परमेश्वर बनना चाहते हैं। परमेश्वर के अधिकार के विषय पर मेरी सहभागिता के बाद, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर का रूप धारण करने की इच्छा और आकांक्षा करते हो या परमेश्वर की नकल करना चाहते हो? क्या तुम लोग अभी भी परमेश्‍वर होने की इच्छा रखते हो? क्या तुम सब अभी भी परमेश्वर बनना चाहते हो? मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के अधिकार की नकल नहीं की जा सकती है और मनुष्य के द्वारा परमेश्वर की पहचान और हैसियत का जाली रूप धारण नहीं किया जा सकता है। यद्यपि तुम परमेश्वर के बोलने के अंदाज़ की नकल करने में सक्षम हो, किन्तु तुम परमेश्वर के सार की नकल नहीं कर सकते। भले ही तुम परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने और उसका जाली रूप लेने में सक्षम हो, किन्तु तुम कभी वह सब कुछ नहीं कर पाओगे जो परमेश्वर करने की इच्छा रखता है, तुम कभी सभी चीज़ों पर शासन नहीं कर पाओगे और न ही उनको आज्ञा दे पाओगे। परमेश्वर की नज़रों में, तुम हमेशा एक छोटे से जीव बने रहोगे, तुम्हारी क्षमताएं और योग्ताएँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, तुम्हारे पास कितनी भी प्रतिभाएं क्यों न हों, तो भी तुम पूरी तरह से सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन हो। यद्यपि तुम कुछ बड़बोलेपन के शब्द बोलने में सक्षम हो, लेकिन इससे न तो यह पता चलता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का सार है और न ही यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य स्वयं परमेश्वर का सार है। उन्हें सीखा, या बाहर से जोड़ा नहीं गया था, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर का अंतर्निहित सार हैं। इस प्रकार सृष्टिकर्ता और जीवधारियों के मध्य के संबंध को कभी भी पलटा नहीं जा सकता है। जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 94

सृष्टिकर्ता का अधिकार समय, स्थान, या भूगोल के बंधन में नहीं है और उसका अधिकार गणना के परे है

आओ हम उत्पत्ति 22:17-18 को देखें। यह यहोवा परमेश्वर के द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दी कि उसके वंश के लोग बहुगुणित होंगे—परंतु वे किस सीमा तक बहुगुणित होंगे? उस सीमा तक जितना पवित्र-शास्त्र में लिखा है : "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान।" कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर अब्राहम को आकाश के तारों के समान अनगिनत और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान बहुसंख्यक वंशज देना चाहता था। परमेश्वर ने अलंकृत भाषा का इस्तेमाल करते हुए बात कीऔर इस अलंकृत भाषा से यह देखना कठिन नहीं है कि परमेश्वर अब्राहम को मात्र एक, दो, या हज़ारों वंशज नहीं देगा, बल्कि असंख्य तादाद देगा, इतना कि वे जातियों का एक समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि वो बहुत-सी जातियों का पिता होगा। और क्या उस संख्या का निर्धारण मनुष्य द्वारा किया गया था या परमेश्वर के द्वारा? क्या मनुष्य यह तय कर सकता है कि उसके पास कितने वंशज हों? क्या यह उस पर निर्भर है? यह मनुष्य के बस की बात नहीं है कि वह इस बात का निर्धारण कर सके कि उसके पास अनेक वंशज होंगे या नहीं, "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" वंशज होने की तो बात ही छोड़ो। कौन ऐसी इच्छा न करेगा कि उसके संतान तारों के समान अनगिनत हों? दुर्भाग्यवश, चीज़ें वैसी घटित नहीं होती हैं जैसा तुम चाहते हो। चाहे मनुष्य कितना भी कुशल और योग्य हो, यह उस पर निर्भर नहीं करता है; कोई भी उस सीमा से बाहर खड़ा नहीं हो सकता है जिसे परमेश्वर द्वारा ठहरा दिया गया है। जितना वह तुम्हें अनुमति देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगा : यदि परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तब तुम्हारे पास कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं होगा और यदि परमेश्वर तुम्हें बहुत ज़्यादा देता है तो तुम्हारे पास कितना अधिक है, इससे चिढ़ने का कोई फायदा नहीं। क्या ऐसा ही नहीं है? यह सब कुछ परमेश्वर पर है, मनुष्य पर नहीं! मनुष्य पर परमेश्वर द्वारा शासन किया जाता है और इससे कोई छूटा नहीं है।

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा" तो यह वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी और इंद्रधनुष की वाचा के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा भी थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, मनुष्य चाहे इसे किसी भी नज़रिए से देखे और इसे कैसे भी समझे, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार अक्षरशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और शरणा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगेऔर न ही किसी व्यक्ति, घटना, या वस्तु में हुए बदलाव के कारण ये बदलेंगे। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य है, वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है या किसी को भी शून्य बना सकता है और वह जीवित वस्तुओं से लेकर मृत वस्तुओं तक, सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है; परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह सुनने में मनुष्य को परियों की कहानी के समान काल्पनिक लगता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं है और न ही यह परियों की कहानी है। बल्कि यह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसे सराहते हो? क्या तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंशज अनगिनत थे? और कितने अनगिनत थे? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" अनगिनत थे, जैसा कि परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे संसार में सब जातियों और प्रदेशों में फैल गए थे? और इस तथ्य को किसके द्वारा पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों के कहे जाने के सैकड़ों और हज़ारों सालों बाद भी परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए और निरन्तर तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आरंभ में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द हो गया और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया और उसकी प्राप्ति और पूरे होने में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव तात्कालिक थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार के अन्य पहलू को देखने की मंजूरी दी और उसने मनुष्य को यह तथ्य देखने की अनुमति दी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना के परे है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अत्‍युत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

जब एक बार परमेश्वर के वचन बोल दिए जाते हैं तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है और वह तथ्य जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर के मुँह से की गई थी धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है। परिणामस्वरूप सभी चीज़ों में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिलने लग जाते हैं, पेड़ों में कोपलें फूटने लग जाती हैं, पक्षी गाना शुरू कर देते हैं, कलहँस लौट आते हैं, मैदान लोगों से भर जाते हैं...। बसंत के आगमन के साथ ही सभी चीज़ें नई हो जाती हैं और यह सृष्टिकर्ता का आश्चर्यकर्म है। जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है तो स्वर्ग और पृथ्वी में सब वस्तुएँ परमेश्वर के वचन के अनुसार नई हो जाती हैं और बदल जाती हैं—कोई भी इससे अछूता नहीं रहता है। जब परमेश्वर के मुँह से प्रतिबद्धता या प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, तो सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करती हैं; सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से आयोजित और व्यवस्थित किया जाता है और वे अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं और अपने-अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार का एक दायरा है? क्या कोई समय सीमा है? क्या इसे एक निश्चित ऊँचाई या एक निश्चित लम्बाई तक कहा जा सकता है? क्या इसे किसी कहा जा सकता है कि इसका कोई निश्चित आकार या शक्ति है? क्या इसे मनुष्य के आयामों के द्वारा नापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, ना ही वह आता-जाता है और कोई नहीं माप सकता कि उसका अधिकार कितना विशाल है। चाहे कितना भी समय बीत जाए, जब परमेश्वर किसी मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहती है और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगीऔर मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति को बार-बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक, उसके अधिकार के द्वारा हासिल किया गया सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है और उस में कुछ भी दोष नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार और सभी कार्य जो वो पूरा करता है, वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य को बताने में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को पूरा करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार-चढ़ाव आए हों, यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी-अभी बोला गया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति से करता है, उनकी लगातार सुधि ले सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है, इससे निरपेक्ष कि प्रतिज्ञा क्या है, इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना समय लगेगा, उसका वो दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि—इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा और इसे साकार किया जाएगा और उसके पूरा होने या साकार होने में उसे ज़रा-सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल उजियाले का ही प्रबन्धन करता है या यह कि वह जल का प्रबन्धन सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसने जल बनाया और बाकी सब कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह ग़लतफहमी नहीं होगी? यद्यपि सैकड़ों सालों बाद अब्राहम के लिए परमेश्वर की आशीषें धीरे-धीरे मनुष्य की यादों में धूमिल हो चुकी थीं, फिर भी परमेश्वर के लिए वह प्रतिज्ञा जस-की-तस बनी रही। यह तब भी पूरा होने की प्रक्रिया में था और कभी रूका नहीं था। मनुष्य ने न तो कभी जाना और न सुना कि परमेश्वर ने किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था और किस प्रकार सभी चीज़ों को आयोजित और व्यवस्थित किया था और इस दौरान परमेश्वर द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि के बीच कितनी ढेर सारी कहानियाँ घटित हुईं थीं, किन्तु परमेश्वर के अधिकार के प्रकटीकरण और उसके कार्यों के प्रकाशन के प्रत्येक बेहतरीन अंश को सभी चीज़ों तक पहुँचाया गया और उनके बीच गौरवान्वित किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता के अद्भुत कर्मों को दिखाती और उनके बारे में बात करती थी और सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की प्रत्येक लोकप्रिय कहानी को सभी चीज़ों के द्वारा सदा-सर्वदा घोषित किया जाएगा। जिस अधिकार के तहत परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और परमेश्वर की सामर्थ्‍य, सभी चीज़ों को दिखाते हैं कि परमेश्वर हर काल में हर जगह उपस्थित है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की सर्वउपस्थिति के साक्षी बन जाते हो तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर काल में, हर जगह उपस्थित होता है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य समय, भूगोल, स्थान, या किसी व्यक्ति, घटना या वस्तु के बंधन से परे है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता मनुष्य की कल्पनाओं से परे हैः मनुष्य इसकी थाह नहीं पा सकता, यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जानेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 95

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, परन्तु एक मनुष्य की कल्पनाएँ कहाँ तक जा सकती हैं? क्या वह इस संसार के परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य के अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने की अनुमति दे सकते हैं? क्या उनके ज़रिये मनुष्य परमेश्वर के अधिकार को समझकर सचमुच उसके प्रति समर्पण कर सकता है? तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि मनुष्य के अनुमान और कल्पना मात्र मनुष्य की बुद्धिमत्ता की उपज हैं और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार को जानने में ज़रा-सी भी मदद या लाभ नहीं पहुँचाते। विज्ञान की कल्पनाओं को पढ़ने के बाद, कुछ लोग चन्द्रमा और तारे किस प्रकार दिखते हैं उसकी कल्पना कर सकते हैं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य के पास परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना बस ऐसी ही है : कोरी कल्पना। इन वस्तुओं के तथ्यों के विषय में, अर्थात, परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के विषय में, उसके पास बिलकुल भी कोई समझ़ नहीं है। क्या हुआ यदि तुम चन्द्रमा तक गए भी हो तो? क्या इससे यह साबित हो जाता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दिखाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ है तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है तो मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं है : और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानो और प्रमाणित करो। यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है, बल्कि वास्तविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 96

सभी चीज़ों व प्राणियों पर सृष्टिकर्ता के नियन्त्रण और प्रभुत्व का तथ्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के सच्चे अस्तित्व के विषय में बोलता है

अय्यूब के ऊपर यहोवा की आशीष अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया था? "यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के नज़रिए से, अय्यूब को दी गई ये चीज़ें क्या थीं? क्या वे मनुष्य की सम्पत्ति थी? इन सम्पत्तियों के द्वारा क्या अय्यूब उस युग में बहुत अधिक धनी नहीं रहा होगा? उसे ऐसी सम्पत्तियाँ कैसे प्राप्त हुईं थीं? उसे धन कैसे मिला? कहने की आवश्यकता नहीं कि अय्यूब को ये सम्पत्ति परमेश्वर के आशीष से प्राप्त हुई थी। अय्यूब इन सम्पत्तियों को किस नज़रिए से देखता था और वह परमेश्वर की आशीषों को किस प्रकार महत्व देता था, हम इन सब बातों पर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। जब भी परमेश्वर की आशीषों की बात होती है, सभी लोग दिन और रात परमेश्वर से आशीषित होने की लालसा करते हैं, फिर भी मनुष्य का नियन्त्रण इन बातों पर नहीं होता है कि वह अपने जीवनकाल में कितनी सम्पत्ति प्राप्त कर सकता है या वह परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त करेगा भी कि नहीं—यह एक निर्विवादित सत्य है! परमेश्वर के पास अधिकार है और उसके पास मनुष्य को किसी भी प्रकार की सम्पत्ति देने की सामर्थ्‍य है, जिससे वह मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ को प्राप्त करने की स्वीकृति दे सके, फिर भी परमेश्वर की आशीषों का एक सिद्धांत है। परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है? निश्चय ही ऐसे लोगों को जिनको वह पसंद करता है! अब्राहम और अय्यूब दोनों को परमेश्वर के द्वारा आशीषित किया गया था, फिर भी वे आशीषें जिन्हें उन्होंने प्राप्त किया था एक समान नहीं थी। परमेश्वर ने अब्राहम को रेत और तारों के समान अनगिनत वंशजों से आशीषित किया था। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने एक मनुष्य के वंशजों, एक जाति को सामर्थी और समृद्ध किया। इसमें, परमेश्वर के अधिकार ने मानवजाति पर शासन किया, जो सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों में परमेश्वर की श्वास से श्वसन करती थी। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, यह मानवजाति परमेश्वर के द्वारा निर्धारित दायरे के अंतर्गत उस गति से तेजी से बढ़ी और अस्तित्व में आ गई जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया था। विशेष रूप से, इस जाति की जीवन योग्यता, फैलाव की गति और जीवन-प्रत्याशा सब कुछ परमेश्वर के इन्तज़ामों के भाग थे और इन सब का सिद्धांत पूर्णतया उस प्रतिज्ञा पर आधारित था जिसे परमेश्वर ने अब्राहम को दिया था। कहने का तात्पर्य है कि परिस्थितियों से परे, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ बिना किसी बाधा के आगे बढेंगी और परमेश्वर के अधिकार की दूरदर्शिता के अधीन वे साकार होंगी। उस प्रतिज्ञा में जो परमेश्वर ने अब्राहम से की थी, संसार की उथल-पुथल से निरपेक्ष, उस युग से निरपेक्ष, मानवजाति के द्वारा झेली गई महाविपत्तियों से निरपेक्ष, अब्राहम का वंश सम्पूर्ण विनाश के जोखिम का सामना नहीं करेगा और उनकी जाति कभी खत्म नहीं होगी। लेकिन अय्यूब के ऊपर परमेश्वर की आशीषों ने उसे बहुत ज़्यादा धनी बना दिया था। जो परमेश्वर ने उसे जो दिया वह जीवित और साँस लेते हुए जीवधारियों का संग्रह था—उनकी संख्या, विस्तार की उनकी गति, जीवित रहने की दशाएँ, उनके ऊपर चर्बी की मात्रा, इत्यादि—भी परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित था। यद्यपि इन जीवित प्राणियों के पास बोलने की योग्यता नहीं थी, परन्तु वे भी सृष्टिकर्ता के प्रबन्धन के भाग थे और परमेश्वर के प्रबन्धन का सिद्धांत उस आशीष के अनुसार था जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अय्यूब से की थी। उन आशीषों के अंतर्गत जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम और अय्यूब को दिया था, हालाँकि जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी वह अलग थी, फिर भी वह अधिकार जिसके द्वारा सृष्टिकर्ता सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों पर शासन करता है वह एक समान था। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का प्रत्येक विवरण, अब्राहम और अय्यूब को दी गई उसकी अलग-अलग प्रतिज्ञाओं और आशीषों में प्रकट है, और यह एक बार फिर से मानवजाति को दिखाता है कि परमेश्वर का अधिकार मनुष्य की कल्पनाओं से अत्यधिक परे है। ये विवरण एक बार फिर मानवजाति को बताते हैं कि यदि वह परमेश्वर के अधिकार को जानना चाहता है तो यह केवल परमेश्वर के वचनों के द्वारा और परमेश्वर के कार्यों को अनुभव करने के द्वारा ही हो सकता है।

सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता मनुष्य को एक तथ्य देखने की अनुमति देती है : परमेश्वर का अधिकार, "परमेश्वर ने कहा कि उजियाला हो और उजियाला हो गया और आकाश बन जाए और आकाश बन गया और भूमि दिखाई दे और भूमि दिखाई देने लगी," न केवल इन वचनों में समाविष्ट है बल्कि, इसके अतिरिक्त, वह इस बात से भी प्रकट होता है कि उसने किस प्रकार उजियाले को कायम रखा, आकाश को विलुप्त होने से बचाए रखा और भूमि को हमेशा जल से अलग रखा, साथ ही साथ उस विवरण में भी है कि उसने किस प्रकार सृजित की गई चीज़ों : उजियाला, आकाश और भूमि के ऊपर शासन किया और उनका प्रबन्ध किया। परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को दी गई आशीषों में तुम सब और क्या देखते हो? स्पष्ट रीति से, परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष दिए जाने के बाद परमेश्वर के कदम नहीं रुके, क्योंकि उसने तो बस अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ ही किया था और वह अपने हर एक वचन को वास्तविकता बनाना चाहता था और इस प्रकार, आने वाले सालों में अपने हर एक विवरण को जिसे उसने कहा था साकार करने के लिए, वह लगातार सब कुछ करता रहा जिसकी उसने इच्छा की थी। क्योंकि परमेश्वर के पास अधिकार है, कदाचित् मनुष्य को ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर को तो केवल बोलने की आवश्यकता है और बिना एक उंगली तक उठाए सब बातें और चीज़ें पूरी हो जाती हैं। इस प्रकार कल्पना करना काफी बकवास है! यदि तुम वचनों के इस्तेमाल से परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के साथ ठहराई गई वाचा और वचनों के उपयोग से परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की पूर्णता का केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण लेते हो और तुम विभिन्न चिह्नों और तथ्यों को देखने में असमर्थ हो कि परमेश्वर का अधिकार सभी चीज़ों के अस्तित्व के ऊपर प्रभुता रखता है तो परमेश्वर के अधिकार की तुम्हारी समझ कहीं ज़्यादा खोखली और हास्यास्पद है! यदि मनुष्य परमेश्वर की इस प्रकार कल्पना करता है तो ऐसा कहना होगा कि परमेश्वर के विषय में मनुष्य का ज्ञान आखिरी पड़ाव में चला गया है और अंतिम छोर तक पहुँच चुका है, क्योंकि वह परमेश्वर जिसकी मनुष्य कल्पना करता है वह एक मशीन के सिवाए और कुछ नहीं है जो बस आदेश देता है और ऐसा परमेश्वर नहीं है जिस के पास अधिकार है। तुमने अब्राहम और अय्यूब के उदाहरणों के द्वारा क्या देखा है? क्या तुमने परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का सच्चा पहलू देखा है? परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद, परमेश्वर वहाँ खड़ा न रहा जहाँ पर वह था, न ही उसने अपने सन्देशवाहकों को काम पर लगाकर यह देखने के लिए इन्तज़ार किया कि इसका परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, तो परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन के अधीन, सभी चीज़ें उस कार्य के साथ मेल खाने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था और लोगों, चीज़ों और तत्वों को तैयार किया गया जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य है कि जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन बोले गए, परमेश्वर के अधिकार पूरी भूमि पर इस्तेमाल होने लगा और उसने अब्राहम और अय्यूब से की गई प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने और उन्हें पूरा करने के लिए एक क्रम ठहरा दिया, इसी बीच उसने सब के लिए हर प्रकार की उचित योजना बनाई और तैयारियाँ की जिसे पूरा करने की उसने योजना बनाई थी जो हर एक कदम और हर एक मुख्य चरण के लिए जरूरी था। इस दौरान, परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों को कुशलता से इस्तेमाल किया, बल्कि सभी चीज़ों को भी कुशलता से इस्तेमाल किया जिन्हें उसके द्वारा बनाया गया था। कहने का तात्पर्य है कि वह दायरा जिसके भीतर परमेश्वर के अधिकार को इस्तेमाल किया गया था उसमें न केवल दूत शामिल थे, वरन, वे सभी चीज़ें भी शामिल थीं, जिन्हें उस कार्य से अनुपालन करने के लिए कुशलता से उपयोग किया गया था जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशेष रीतियाँ थीं जिनके तहत परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल किया गया था। तुम लोगों की कल्पनाओं में, कुछ लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, सामर्थ्‍य है और इस प्रकार परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में रहने की ज़रूरत है या एक ही स्थिर जगह में रहने की जरूरत है और किसी विशेष कार्य को करने की जरूरत नहीं है, परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य उसके विचारों के भीतर ही पूरा होता है। कुछ लोग यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी थी, फिर भी परमेश्वर को और कुछ करने की जरूरत नहीं थी, और उसके लिए मात्र अपने वचनों को कहना ही काफी था। क्या ऐसा वास्तव में हुआ था? साफ तौर पर ऐसा नहीं हुआ था! यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी बनाई सभी चीज़ों कि उसके द्वारा सृष्टि, सभी चीज़ों पर उसके नियन्त्रण और उस प्रक्रिया में प्रकाशित और साकार हो रहे हैं, जिनके द्वारा वह मानवजाति की अगुवाई और उनका प्रबंधन करता है। हर पद्धति, हर दृष्टिकोण और मानवजाति और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता का हर विवरण और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीज़ों की उसकी समझ—उन सभी ने अक्षरश: यह साबित किया है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्‍य निरन्तर और सभी चीज़ों में प्रदर्शित और प्रकाशित होते हैं। ये प्रकटीकरण और प्रकाशन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बात करते हैं, क्योंकि वह अपने कार्य को जारी रखने और सभी चीज़ों को आज्ञा देने, हर घड़ी सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल कर रहा है; उसके अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान स्वर्गदूत या परमेश्वर के दूत नहीं ले सकते। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि वह किस प्रकार की आशीषों को अब्राहम और अय्यूब को देगा—यह परमेश्वर पर निर्भर निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूतों ने व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब से मुलाकात की, फिर भी उनकी गतिविधियाँ परमेश्वर के आदेश अपर आधारित थीं, परमेश्वर के अधिकार के अधीन थीं और इसके समान ही दूत भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम से मिलते हुए देखता है, यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से बाइबल के लेखों में कुछ करते हुए नहीं देखता है, वास्तव में, यह परमेश्वर स्वयं ही है जो अधिकार और सामर्थ्‍य का सचमुच में उपयोग करता है और यह किसी मनुष्य से कोई सन्देह बर्दाश्त नहीं करता! यद्यपि तुम देख चुके हो कि स्वर्गदूतों और दूतों के पास बड़ी सामर्थ्‍य होती है, उन्होंने चमत्कार किए हैं या परमेश्वर के आदेशानुसार कुछ चीज़ों को किया है, उनके कार्य मात्र परमेश्वर के आदेशों को पूरा करने के लिए होते हैं, किसी भी अर्थ में परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या वस्तु के पास सभी चीज़ों को बनाने और सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है, न ही वे उन्हें धारण करते हैं। इस प्रकार कोई मनुष्य और वस्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार का इस्तेमाल या उसे प्रकट नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 97

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय है और उसका अपमान नहीं किया जा सकता है

1. परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को प्रयोग करता है

उत्पत्ति 1:3-5 जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

उत्पत्ति 1:6-7 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:9-11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:14-15 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

उत्पत्ति 1:20-21 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

उत्पत्ति 1:24-25 फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

2. परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

3. परमेश्वर की आशीषें

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

तुम सबने पवित्र-शास्त्र के इन तीन अंशों में क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा कि परमेश्वर एक सिद्धांत के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए इंद्रधनुष का इस्तेमाल किया—उसने बादलों में एक इंद्रधनुष रखा जिससे मनुष्य को बता सके कि वह संसार को नाश करने के लिए फिर से जलप्रलय का इस्तेमाल कभी नहीं करेगा। जिस इंद्रधनुष को लोग आज देखते हैं क्या वह वही इंद्रधनुष है जो परमेश्वर के मुँह से निकला था? क्या उसका स्वभाव और अर्थ बदल चुका है? बिना किसी सन्देह के, यह नहीं बदला है। परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था, वह वाचा जिसे उसने मनुष्य के साथ ठहराया था वह आज तक जारी है और इस वाचा को बदलने का समय निश्चय ही सिर्फ परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर ने आज तक इस वाचा को निभाया है। तुम इस में क्या देखते हो? यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है और अपने वचनों का पक्का बना रहता है। उसकी कड़ाई और उसके कार्यों के सिद्धांत, सृष्टिकर्ता के अधिकार का अपमान न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बाधा पहुँचाई है, जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के अनुसार होता है, ठीक उसके अनुसार होता है जो कुछ उसके मुँह से निकला था, वह अपनी योजना के चरणों और उद्देश्य का अनुसरण करता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन चीज़ों पर परमेश्वर शासन करता है वे भी सिद्धांतों का पालन करती हैं, उसके अधिकार के प्रबंधों से कोई मनुष्य या चीज़ छूटी नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण दण्ड भुगतते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता का अधिकार बदलता नहीं है और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल लिया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। भले ही स्वर्ग और पृथ्वी किसी बड़े उथल-पुथल से गुज़रें, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने वाले अधिकार का सार है और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 98

शैतान को परमेश्वर की आज्ञा

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

शैतान ने कभी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की है और इसी वजह से, सभी चीज़ें व्यवस्था के अनुसार रहती हैं

यह अय्यूब की पुस्तक में से एक लघु अंश है, इन वचनों में "वह" शब्द अय्यूब की ओर संकेत करता है। हालाँकि यह वाक्य छोटा-सा है, फिर भी यह वाक्य बहुत सारे विषयों पर प्रकाश डालता है। यह आत्मिक संसार में परमेश्वर और शैतान के बीच वार्तालाप का विवरण देता है, हमें यह बताता है कि परमेश्वर के वचनों का लक्ष्य शैतान था। यह परमेश्वर ने जो कहा उसे भी विशेष रूप से बताता है। परमेश्वर के वचन शैतान के लिए एक आज्ञा और आदेश थे। इस आदेश के विशेष विवरण अय्यूब के प्राण को छोड़ देने से संबंधित हैं जहाँ परमेश्वर अय्यूब के प्रति शैतान के बर्ताव में एक रेखा खींच देता है—शैतान को अय्यूब के प्राणों को छोड़ देना पड़ा। पहली बात जो हम इस वाक्य से सीखते हैं वह यह है कि ये परमेश्वर के द्वारा शैतान को कहे गए वचन थे। अय्यूब की पुस्तक के मूल पाठ के अनुसार, यह हमें निम्नलिखित बातों एवं ऐसे वचनों की पृष्ठभूमि के बारे में बताता है : शैतान अय्यूब पर दोष लगाना चाहता था और इसलिए उसकी परीक्षा लेने से पहले उसे परमेश्वर से सहमति लेनी थी। अय्यूब की परीक्षा लेने हेतु शैतान के अनुरोध पर सहमति देते समय परमेश्वर ने शैतान के सामने निम्नलिखित शर्तें रखीं : "अय्यूब तेरे हाथ में है; केवल उसका प्राण छोड़ देना।" इन वचनों की प्रकृति क्या है? वे स्पष्ट रीति से एक आज्ञा हैं, एक आदेश हैं। इन वचनों की प्रकृति को समझने के बाद, तुम्हें निश्चय ही यह भी समझ लेना चाहिए कि आज्ञा देने वाला परमेश्वर है, आज्ञा को पाने वाला और उसका पालन करने वाला शैतान है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस आदेश में परमेश्वर और शैतान के बीच का रिश्ता हर उस व्यक्ति के सामने प्रकट है जो इन वचनों को पढ़ता है। निश्चय ही, यह आत्मिक संसार में परमेश्वर और शैतान के बीच का रिश्ता भी है, परमेश्वर और शैतान की पहचान और स्थिति के बीच का अन्तर भी है, जिन्हें पवित्र-शास्त्र में परमेश्वर और शैतान के बीच हुए वार्तालाप के लेखों में प्रदान किया गया है, और यह अब तक के लिए विशिष्ट उदाहरण और पुस्तकीय लेखा-जोखा है जिसमें मनुष्य परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के मध्य के निश्चित अन्तर को समझ सकता है। इस बिन्दु पर, मुझे कहना होगा कि इन वचनों का लेखा-जोखा मानवजाति के लिए परमेश्वर की पहचान व हैसियत को जानने के वास्ते एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, यह मानवजाति को परमेश्वर के ज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। आत्मिक संसार में सृष्टिकर्ता और शैतान के मध्य हुए वार्तालाप से, मनुष्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के एक और विशिष्ट पहलू को समझने में सक्षम हो जाता है। ये वचन सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक और गवाही हैं।

बाहरी रूप से, यहोवा परमेश्वर शैतान से वार्तालाप कर रहा है। जहाँ तक सार का सवाल है, जिस रवैये से यहोवा परमेश्वर बात करता है, वह जिस पद पर खड़ा है, वे शैतान से श्रेष्ठ हैं। अर्थात् यहोवा परमेश्वर आदेश देने के अन्दाज़ में शैतान को आज्ञा दे रहा है, शैतान को बता रहा है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है, अय्यूब पहले से ही उसके हाथ में है, जैसा वह चाहता है अय्यूब के साथ वैसा बर्ताव कर सकता है—परन्तु उसके प्राण नहीं ले सकता। सहायक पाठ यह है, यद्यपि अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप दिया गया है, परन्तु उसका जीवन शैतान को सौंपा नहीं गया; परमेश्वर के हाथों से अय्यूब के प्राण को कोई नहीं ले सकता है जब तक परमेश्वर इस की अनुमति नहीं देता है। शैतान को दी गई इस आज्ञा में परमेश्वर की मनोवृत्ति को स्पष्ट रीति से व्यक्त किया गया है, यह आज्ञा उस पद को भी प्रकट और प्रकाशित करता है जिससे यहोवा परमेश्वर शैतान से बातचीत करता है। इसमें यहोवा परमेश्वर ने न केवल उस परमेश्वर के दर्जे को थामे हुए है जिसने उजियाला, हवा, सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों को बनाया है, जो सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के ऊपर प्रधान है, बल्कि उस परमेश्वर का भी दर्जा थामे हुए है जो मानवजाति को आज्ञा देता है, अधोलोक को आज्ञा देता है और उस परमेश्वर का जो सभी जीवित प्राणियों के जीवन और मरण को नियन्त्रित करता है। आत्मिक संसार में, परमेश्वर के अलावा किसके पास हिम्मत है कि शैतान को ऐसा आदेश दे? और परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से शैतान को आदेश क्यों दिया? क्योंकि मनुष्य का जीवन, जिसमें अय्यूब भी शामिल है, परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को नुकसान पहुँचाने या उसके प्राण लेने की अनुमति नहीं दी थी, अर्थात् जब परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति दे दी, तब भी, परमेश्वर को विशेष तौर पर यह आज्ञा देना स्मरण रहा और एक बार फिर से उसने शैतान को आज्ञा दी कि वह अय्यूब का प्राण नहीं ले सकता है। शैतान की कभी भी यह हिम्मत नहीं हुई है कि वह परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करे, इसके अतिरिक्त, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेशों और विशेष आज्ञाओं को सावधानीपूर्वक सुना है, उनका पालन किया है, उनको चुनौती देने की कभी हिम्मत नहीं की है, और निश्चय ही, परमेश्वर की किसी आज्ञा को कभी खुल्लमखुल्ला पलटने की हिम्मत नहीं की है। वे सीमाएँ ऐसी ही हैं जिन्हें परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित किया, और शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने की हिम्मत नहीं की है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है? शैतान के पास मानवजाति से कहीं अधिक स्पष्ट समझ है कि परमेश्वर के प्रति कैसा आचरण करना है, उसे किस नज़र से देखना है, इस प्रकार, आत्मिक संसार में, शैतान परमेश्वर के अधिकार व उसके स्थान को बिलकुल साफ-साफ देखता है, उसके पास परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार के इस्तेमाल के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ है। उन्हें नज़रअन्दाज़ करने की हिम्मत वह बिलकुल भी नहीं करता है, न ही वह उन्हें किसी भी तरीके से तोड़ने की हिम्मत करता है, न ही वह ऐसा कुछ करता है जिससे परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन हो, वह किसी भी रीति से परमेश्वर के क्रोध को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता है। यद्यपि वह स्वभाव से बुरा और घमण्डी है, फिर भी उसने परमेश्वर के द्वारा उसके लिए निर्धारित की गयी सीमाओं को लाँघने की कभी हिम्मत नहीं की है। लाखों सालों से, वह कड़ाई से इन सीमाओं पालन करता रहा है, परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए हर आज्ञा और आदेश का पालन करता रहा और कभी उस सीमा के बाहर पैर रखने की हिम्मत नहीं की। यद्यपि वह डाह करने वाला है, तो भी शैतान पतित मानवजाति से कहीं ज़्यादा "चतुर" है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान को जानता है, अपनी सीमाओं को भी जानता है। शैतान के "आज्ञाकारी" कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य, स्वर्गीय आदेश हैं जिनका उल्लंघन शैतान के द्वारा नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर के अधिकार और अद्वितीयता के कारण सभी चीज़ें क्रमागत रीति से बदलती और बढ़ती हैं, और मनुष्य परमेश्वर द्वारा निर्धारित जीवन-क्रम के भीतर रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं, कोई व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था में उथल-पुथल नहीं कर सकती है, कोई व्यक्ति या वस्तु इस नियम को बदलने में सक्षम नहीं है—क्योंकि वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों, सृष्टिकर्ता के आदेश और अधिकार से आते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 99

शैतान की विशिष्ट पहचान ने बहुत से लोगों से उसके विभिन्न पहलुओं के प्रकटीकरण में गहरी रूचि का प्रदर्शन करवाया है। यहाँ तक कि बहुत से मूर्ख लोग हैं जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के साथ-साथ, शैतान भी अधिकार रखता है, क्योंकि शैतान चमत्कार करने में सक्षम है, ऐसे काम करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए असंभव हैं। इस प्रकार, परमेश्वर की आराधना करने के अतिरिक्त, मानवजाति अपने हृदय में शैतान के लिए भी एक स्थान रखती है, यहाँ तक कि परमेश्वर के रूप में शैतान की आराधना भी करती है। ऐसे लोग दयनीय और घृणित हैं। अपनी अज्ञानता के कारण वे दयनीय हैं, अपने पाखंड और अंतर्निहित बुराई के सार के कारण घृणित हैं। इस बिन्दु पर, मैं महसूस करता हूँ कि तुम लोगों को बता दूँ कि अधिकार क्या है और यह किसका प्रतीक है, यह किसे दर्शाता है। व्यापक रूप से कहें तो परमेश्वर स्वयं ही अधिकार है, उसका अधिकार उसकी श्रेष्ठता और सार की ओर संकेत करते हैं, स्वयं परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर के स्थान और पहचान को दर्शाता है। जब बात यह है तो, क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि वह स्वयं परमेश्वर है? क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि उसने सभी चीज़ों को बनाया है; सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है? बिलकुल नहीं करता! क्योंकि वह किसी भी चीज़ को बनाने में असमर्थ है; अब तक उसने परमेश्वर के द्वारा सृजित की गई वस्तुओं में से कुछ भी नहीं बनाया है, कभी ऐसा कुछ नहीं बनाया है जिसमें जीवन हो। क्योंकि उसके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, इसलिए वह संभवत: कभी भी परमेश्वर की हैसियत और पहचान प्राप्त नहीं कर पाएगा, यह उसके सार से तय होता है। क्या उसके पास परमेश्वर के समान सामर्थ्‍य है? बिलकुल नहीं है! हम शैतान के कार्यों को और शैतान द्वारा प्रदर्शित चमत्कारों को क्या कहते हैं? क्या यह सामर्थ्‍य है? क्या इसे अधिकार कहा जा सकता है? बिलकुल नहीं! शैतान बुराई की लहर को दिशा देता है, परमेश्वर के कार्य के हर एक पहलू में अस्थिरता पैदा करता है, बाधा और रूकावट डालता है। पिछले कई हज़ार सालों से, मानवजाति को बिगाड़ने, शोषित करने, भ्रष्ट करने हेतु लुभाने, धोखा देकर पतित करने और परमेश्वर का तिरस्कार करने के अलावा, जिससे कि मनुष्य मृत्यु की छाया की घाटी की ओर चला जाये, क्या शैतान ने ऐसा कुछ किया है जो मनुष्य के द्वारा उत्सव मनाने, तारीफ करने या दुलार पाने के ज़रा-सा भी योग्य हो? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उससे मानवजाति भ्रष्ट हो जाती? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उसने मानवजाति को नुकसान पहुँचाया होता? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या मनुष्य परमेश्वर को छोड़कर मृत्यु की ओर मुड़ जाता? चूँकि शैतान के पास कोई अधिकार और सामर्थ्‍य नहीं है, इसलिये जो कुछ वह करता है उससे उसके सार के विषय में हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? ऐसे लोग भी हैं जो शैतान के हर कार्य को महज एक छल के रूप में परिभाषित करते है, फिर भी मैं विश्वास करता हूँ कि ऐसी परिभाषा उतनी उचित नहीं है। क्या मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए उसके बुरे कार्य महज एक छल हैं? वह बुरी शक्ति जिसके द्वारा शैतान ने अय्यूब का शोषण किया, उसका शोषण करने और उसे नष्ट करने की उसकी प्रचण्ड इच्छा, संभवतः महज छल के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। अगर हम विचार करें तो यह देखते हैं कि पहाड़ों और पर्वतों में दूर-दूर तक फैले हुए अय्यूब के पशुओं का झुण्ड और समूह, एक पल में सब कुछ चला गया; अय्यूब की अत्यधिक धन-संपत्ति, एक क्षण में ग़ायब हो गयी। क्या इसे महज छल के द्वारा प्राप्त किया जा सकता था? शैतान के हर कार्य की प्रकृति नकारात्मक शब्दों जैसे अड़चन डालना, रूकावट डालना, नष्ट करना, नुकसान पहुँचाना, बुराई, ईर्ष्‍या और अँधकार के साथ मेल खाती है और बिलकुल सही बैठती है, इस प्रकार उन सबका घटित होना जो अधर्मी और बुरा है, वह पूरी तरह शैतान के कार्यों के साथ जुड़ा हुआ है, इसे शैतान के बुरे सार से जुदा नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद कि शैतान कितना "सामर्थी" है, इसके बावजूद कि वह कितना ढीठ और महत्वाकांक्षी है, इसके बावजूद कि नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता कितनी बड़ी है, इसके बावजूद कि उसकी तकनीक का दायरा कितना व्यापक है जिससे वह मनुष्य को भ्रष्ट करता और लुभाता है, इसके बावजूद कि उसके छल और प्रपंच कितने चतुर हैं जिससे वह मनुष्य को डराता है, इसके बावजूद कि वह रूप जिसमें वह अस्तित्व में रहता है कितना परिवर्तनशील है, वह एक भी जीवित प्राणी को बनाने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, सभी चीज़ों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाओं और नियमों को निर्धारित करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु पर शासन और नियन्त्रण करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है। ब्रह्मांड और नभमंडल के भीतर, एक भी व्यक्ति या वस्तु नहीं है जो उससे उत्पन्न हुआ हो या उसके द्वारा अस्तित्व में बना हुआ हो; एक भी व्यक्ति या वस्तु नहीं है जिस पर उसके द्वारा शासन किया जाता हो या उसके द्वारा नियन्त्रण किया जाता हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीना है, बल्कि, उसे परमेश्वर के सारे आदेशों और आज्ञाओं को भी मानना होगा। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान के लिए भूमि की सतह पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी छूना कठिन है; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान के पास इतनी भी आज़ादी नहीं है कि वह भूमि की सतह पर से एक चींटी को हटा सके, परमेश्वर द्वारा सृजित इंसान को हटाने की तो बात ही क्या है। परमेश्वर की नज़रों में शैतान पहाड़ों के सोसन फूलों, हवा में उड़ते हुए पक्षियों, समुद्र की मछलियों और पृथ्वी के कीड़े-मकौड़ों से भी कमतर है। सभी चीज़ों के बीच में उसकी भूमिका यह है कि वह सभी चीज़ों की सेवा करे, मानवजाति के लिए कार्य करे, परमेश्वर और उसकी प्रबंधकीय योजना के कार्य करे। इसके बावजूद कि उसका स्वभाव कितना ईर्ष्यालु है, उसका सार कितना बुरा है, एकमात्र कार्य जो वो कर सकता है वह है आज्ञाकारिता से अपने कार्यों को करना : परमेश्वर की सेवाके योग्य होना, परमेश्वर के कार्यों में पूरक होना। शैतान का सार-तत्व और हैसियत ऐसे ही हैं। उसका सार जीवन से जुड़ा हुआ नहीं है, सामर्थ्‍य से जुड़ा हुआ नहीं है, अधिकार से जुड़ा हुआ नहीं है; वह परमेश्वर के हाथों में मात्र एक खिलौना है, परमेश्वर की सेवा में लगा मात्र एक मशीन है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 100

स्वयं अधिकार का वर्णन परमेश्वर की सामर्थ्‍य के रूप में किया जा सकता है। पहले, यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ्‍य दोनों सकारात्मक हैं। उनका किसी नकारात्मक चीज़ से कोई संबंध नहीं है, वे किसी भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी से जुड़े हुए नहीं हैं। परमेश्वर की सामर्थ्‍य किसी भी तरह की चीज़ की सृष्टि करने में सक्षम है जिनके पास जीवन और चेतना हो, यह परमेश्वर के जीवन के द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर जीवन है, इस प्रकार वह सभी जीवित प्राणियों का स्रोत है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों को परमेश्वर के हर एक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात् परमेश्वर के मुँह के वचनों के अनुसार अस्तित्व में आना, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जीना और प्रजनन करना, उसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन करता और आज्ञा देता है और उसमें, सदा-सर्वदा के लिए कभी भी कोई भटकाव नहीं होगा। किसी व्यक्ति या वस्तु में ये चीज़ें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता ही ऐसी सामर्थ्‍य को धारण करता और रखता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है। इस प्रकार, चाहे वह शब्द स्वयं "अधिकार" हो या इस अधिकार का सार, प्रत्येक को सिर्फ सृष्टिकर्ता के साथ ही जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान व सार का एक प्रतीक है, यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत को दर्शाता है; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी भी व्यक्ति या वस्तु को "अधिकार" शब्द के साथ जोड़ा नहीं जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक व्याख्या है।

यद्यपि शैतान अय्यूब को लालच भरी नज़रों से देख रहा था, परन्तु बिना परमेश्वर की इजाज़त के वह अय्यूब के शरीर के एक बाल को भी छूने की हिम्मत नहीं कर सकता था। यद्यपि वह स्वाभाविक रूप से बुरा और निर्दयी है, किन्तु परमेश्वर के द्वारा उसे आज्ञा दिये जाने के बाद, शैतान के पास उसकी आज्ञा में बने रहने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। इस प्रकार, जब शैतान अय्यूब के पास आया तो भले ही वह भेड़ों के बीच में एक भेड़िए के समान उन्माद में था, परन्तु उसने परमेश्वर द्वारा तय की गई सीमाओं को भूलने की हिम्मत नहीं की, जो कुछ भी उसने किया उसमें उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने की हिम्मत नहीं की, शैतान को परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से भटकने की हिम्मत नहीं हुई—क्या यह तथ्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचन का विरोध करने की हिम्मत नहीं करता। शैतान के लिए, परमेश्वर के मुँह से निकला हर एक वचन एक आदेश है, एक स्वर्गीय नियम है, परमेश्वर के अधिकार का प्रकटीकरण है—क्योंकि परमेश्वर के हर एक वचन के पीछे, परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने वालों, स्वर्गीय व्यवस्थाओं की आज्ञा का पालन नहीं करने और विरोध करने वालों के लिए, परमेश्वर का दण्ड निहित है। शैतान स्पष्ट रीति से जानता है कि यदि उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ा तो उसे परमेश्वर के अधिकार के उल्लंघन करने, और स्वर्गीय व्यवस्थाओं का विरोध करने का परिणाम स्वीकार करना होगा। ये परिणाम आखिर क्या हैं? कहने की आवश्यकता नहीं है, ये परमेश्वर के द्वारा उसे दिए जाने वाले दण्ड हैं। अय्यूब के खिलाफ शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का एक छोटा-सा दृश्य था, जब शैतान इन कार्यों को अन्जाम दे रहा था, तब वे सीमाएँ जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया था और वे आदेश जिन्हें उसने शैतान को दिया था, वह शैतान के हर कार्य के पीछे के सिद्धांतों की महज एक छोटी-सी झलक थी। इसके अतिरिक्त, इस मामले में शैतान की भूमिका और पद परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में उसकी भूमिका और पद का मात्र एक छोटा-सा दृश्य था, शैतान के द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की महज एक छोटी-सी तस्वीर थी कि किस प्रकार शैतान ने परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में परमेश्वर के विरूद्ध ज़रा-सा भी विरोध करने का साहस नहीं किया। ये सूक्ष्म दर्शन तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में ऐसा कोई व्यक्ति या चीज़ नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गीय कानूनों और आदेशों का उल्लंघन कर सके, और किसी व्यक्ति या वस्तु की इतनी हिम्मत नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा स्थापित की गयी इन स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को तोड़ सके, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं है जो उस दण्ड को पलट सके या उससे बच सके जिसे सृष्टिकर्ता उसकी आज्ञा न मानने वाले लोगों को देता है। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को बना सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें प्रभाव में लाने की सामर्थ्‍य है, किसी व्यक्ति या वस्तु के द्वारा मात्र सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है, यह अधिकार सभी चीज़ों में सर्वोपरि है, इस प्रकार, यह कहना नामुमकिन है कि "परमेश्वर सबसे महान है और शैतान दूसरे नम्बर पर है।" उस सृष्टिकर्ता को छोड़ जिसके पास अद्वितीय अधिकार है, और कोई परमेश्वर नहीं है!

क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? सबसे पहले, क्या परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ्‍य में कोई अन्तर है? वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों की तुलना करते समय, मनुष्य की सामर्थ्‍य को अकसर गलती से अधिकार समझ लिया जाता है, और दोनों को अगल-बगल रखकर तुलना की जाती है। यहाँ क्या चल रहा है? क्या लोग अनजाने में एक स्थान पर दूसरे को रखने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग ऐसा करने से खुद को रोकने में असमर्थ हैं। इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में कोई समाधान चाहते हो तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ्‍य और परमेश्वर के अधिकार का ज़िक्र नहीं करोगे।

मनुष्य की सामर्थ्‍य किस की ओर संकेत करती है? सरल रीति से कहें तो यह एक योग्यता या कुशलता है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा को अतिविशाल मात्रा में फैलाने या पूरा करने में सक्षम बनाती है। क्या इसे अधिकार माना जा सकता है? मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ कितनी भी बड़ी या हितकारी हों, उस व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके पास अधिकार है; अधिक से अधिक, इस प्रकार का फूलना और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के हँसी-ठट्ठे का महज एक प्रदर्शन है; ज़्यादा से ज़्यादा यह एक हँसी-ठिठोली है जिसमें शैतान अपने स्वयं के पूर्वज के समान कार्य करता है जिससे परमेश्वर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 101

परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ्‍य का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीज़ों के मध्य, तुमने किस में परमेश्वर के अधिकार को देखा है? तुमने उसे कैसे देखा है? मनुष्यों के द्वारा अनुभव किए जाने वाली चार ऋतुओं के सन्दर्भ में, क्या कोई बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, शीत ऋतु के मध्य आपस में परिवर्तन के नियमों को बदल सकता है? बसंत ऋतु में वृक्ष फलते-फूलते हैं; ग्रीष्म ऋतु में वे पत्तों से भर जाते हैं; शरद ऋतु में वे फल उत्पन्न करते हैं और शीत ऋतु में पत्ते झड़ते हैं। क्या कोई इन नियमों को पलट सकता है? क्या यह परमेश्वर के एक पहलू को प्रतिबिम्बित करता है? परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी है? वह किस वजह से अस्तित्व में बना हुआ है? यह वास्तव में परमेश्वर के वचन के कारण, परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में बना हुआ है। जिस वायु को परमेश्वर ने बनाया था क्या व‍ह अब भी अस्तित्व में बनी हुई है? क्या वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेता है परमेश्वर से आयी है? क्या कोई उन चीज़ों को दूर कर सकता है जो परमेश्वर से आती हैं? क्या कोई उनके सार और कार्य को पलट सकता है? क्या कोई परमेश्वर के द्वारा नियुक्त रात और दिन को, परमेश्वर के द्वारा आदेशित रात व दिन के नियम में गड़बड़ी कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कुछ कर सकता है? भले ही तुम रात में न सोओ, रात को दिन के समान लो, तो भी यह रात का समय ही है; तुम अपनी दिनचर्या बदल सकते हो, लेकिन तुम रात और दिन के परिवर्तन के नियम को बदलने में असमर्थ हो—और इस तथ्य को किसी भी व्यक्ति के द्वारा पलटा नहीं जा सकता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या कोई बैल की तरह शेर से भूमि जुतवा सकता है? क्या कोई हाथी को गधे में बदलने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई मुर्गी को बाज के समान आकाश में हवा में लहराने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई भेड़िऐ को भेड़ के समान घास खिलाने में सक्षम हो सकता है? (नहीं।) क्या कोई मछली को सूखी भूमि पर रहने के योग्य बनाने में सक्षम हो सकता है? यह मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्यों नहीं किया जा सकता? क्योंकि परमेश्वर ने मछलियों को पानी में रहने की आज्ञा दी है, इसलिए वे पानी में रहती हैं। वे भूमि पर जीवित रहने में सक्षम नहीं हैं, वे मर जाएँगीं; वे परमेश्वर की आज्ञाओं की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीज़ों के पास उनके अस्तित्व के लिए नियम और सीमा है, हर एक के पास उनका स्वयं का अंतःज्ञान है। इन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया है, किसी मनुष्य के द्वारा उन्हें पलटा और उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर जंगल में ही रहेगा, वह बैल के समान, जो मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के लिए काम करता है, कभी भी पालतू और वफादार नहीं हो सकता। यद्यपि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं और दोनों के पास चार पैर हैं, वे ऐसे जीव हैं जो साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग-अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें दो भिन्न प्रकारों में बाँटा गया है, उनमें से प्रत्येक के पास उनका अपना सहज ज्ञान है, इस प्रकार उन्हें कभी भी आपस में बदला नहीं जाएगा। यद्यपि मुर्गी के पास दो पैर है और बाज के समान पंख भी हैं, फिर भी वह कभी हवा में उड़ नहीं पाएगी। वह ज़्यादा से ज़्यादा एक पेड़ पर उड़ सकती है—और यह उसके सहज ज्ञान के द्वारा निर्धारित किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह सब कुछ परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं के कारण है।

आज मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को प्रगतिशील कहा जा सकता है, मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को प्रभावशील कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत लगातार बढ़ती जा रही है, परन्तु एक अति-महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ है : मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुकी है, चन्द्रमा पर चल चुकी है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, ऊँची तकनीक युक्त जीवन-शैली जीने लगी है, फिर भी, मानवजाति किसी प्राणी को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र—यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति कितनी ऊँचाइयों को छूती है, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती, वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ तय कर दी हैं; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ-वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक-दूसरे की सरहदों का अतिक्रमण नहीं सकते, वे तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहेगा, वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह किसी कार्य को कैसे करे, और जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों का नियम परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर निर्भर नहीं है; न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हिलाया नहीं जा सकता है, बल्कि उसे परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है। यह तथ्य है जिसे मनुष्य नकार नहीं सकता। स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें, ब्रह्मांड, सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य हैं—वे सभी परमेश्वर के अधिकार की अधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार और सृष्टि के आरंभ के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं और परिवर्तित होते हैं। कोई वस्तु या व्यक्ति अपने नियमों को नहीं बदल सकता, न ही अपने स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वह कार्य करता है उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए और परमेश्वर के अधिकार के कारण ही नष्ट होते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है। अब जबकि इतना सब कुछ कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर की हैसियत का प्रतीक है? क्या किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा परमेश्वर के अधिकार को धारण किया जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु या चीज़ द्वारा उसका अनुकरण, रूप धारण या उसका स्थान लिया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 102

सृष्टिकर्ता की पहचान अद्वितीय है और तुम्हें बहु-ईश्वरवाद के विचार का पालन नहीं करना चाहिए

यद्यपि मनुष्य की अपेक्षा शैतान की कुशलताएँ और योग्यताएँ कहीं बढ़कर हैं, यद्यपि वह ऐसे काम कर सकता है जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, तुम चाहे शैतान से ईर्ष्या करो या वह जो करता है उसकी आकांक्षा करो, इन चीजों से नफरत करो या घृणा से भर जाओ, चाहे तुम उसे देख पाओ या नहीं, चाहे शैतान कितना भी हासिल कर पाए या वह कितने भी लोगों को धोखा देखर उनसे अपनी आराधना करवाये में और खुद को पवित्र मनवाए, चाहे तुम इसे कैसे भी परिभाषित करो, तुम यह नहीं कह सकते कि उसके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, सिर्फ एक ही परमेश्वर है, इसके अतिरिक्त, तुम्हें यह जानना चाहिए कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही अधिकार है, सभी चीज़ों पर शासन करने और उन पर नियन्त्रण करने की सामर्थ्‍य उसी के पास है। सिर्फ इसलिए कि शैतान के पास लोगों को धोखा देने की क्षमता है, वह परमेश्वर का रूप धारण कर सकता है, परमेश्वर द्वारा किए गए चिन्हों और चमत्कारों की नकल कर सकता है, उसने परमेश्वर के समान ही कुछ समान काम किये हैं, तो तुम भूलवश विश्वास करने लग जाते हो कि परमेश्वर अद्वितीय नहीं है, बल्कि बहुत सारे ईश्वर हैं, बस उनके पास कुछ कम या कुछ ज़्यादा कुशलताएँ हैं और उस सामर्थ्‍य का विस्तार अलग-अलग है जिसे वे काम में लाते हैं। उनके आगमन के क्रम, उनके युग के अनुसार तुम उनकी महानता को आँकते हो, तुम यह विश्वास करने में गलती करते हो कि परमेश्वर से अलग कुछ अन्य देवता हैं, तुम यह सोचते हो कि परमेश्वर की सामर्थ्‍य और उसका अधिकार अद्वितीय नहीं हैं। यदि तुम्हारे विचार ऐसे हैं, यदि तुम परमेश्वर की अद्वितीयता को पहचान नहीं पाते हो, यह विश्वास नहीं करते हो कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, यदि तुम बहु-ईश्वरवाद को महत्व देते हो तो मैं कहूँगा कि तुम जीवधारियों में सबसे निकृष्ट हो, तुम शैतान का साकार रूप हो और तुम निश्चित तौर पर एक बुरे इंसान हो! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं इन वचनों के द्वारा तुम्हें क्या सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि समय, स्थान या तुम्हारी पृष्ठभूमि क्या है, तुम परमेश्वर और किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, या चीज़ के बीच भ्रमित मत हो। भले ही तुम्‍हें स्वयं-परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का सार कितना ही अज्ञात और अगम्य लगे, शैतान के कार्य और शब्द तुम्हारी धारणा और कल्पना से कितना ही मेल खाते हों, वे तुम्हें कितनी ही संतुष्टि प्रदान करते हों, मूर्ख न बनो, इन धारणाओं में भ्रमित मत हो, परमेश्वर के अस्तित्व को नकारो मत, परमेश्वर की पहचान और हैसियत को नकारो मत, परमेश्वर को दरवाज़े के बाहर मत धकेलो और परमेश्वर को हटाकर शैतान को अपना परमेश्‍वर बनाने के लिए उसे अपने हृदय के भीतर मत लाओ। मुझे कोई सन्देह नहीं है कि तुम ऐसा करने के परिणामों की कल्पना करने में समर्थ हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 103

यद्यपि मानवजाति को भ्रष्ट किया जा चुका है, फिर भी वह सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन रहती है

शैतान हज़ारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट करता आया है। उसने बेहिसाब मात्रा में बुराइयाँ की हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी धोखा दिया है और संसार में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य का ग़लत इस्तेमाल किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य को बहकाया है और ऐसे-ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने बार-बार परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को भ्रमित और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के अधीन सभी चीज़ें और जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित नियमों और व्यवस्थाओं के अनुसार निरन्तर बने हुए हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान का बुरा स्वभाव और अनियन्त्रित विस्तार बहुत ही गन्दा है, बहुत ही घिनौना और नीच है और बहुत ही छोटा और दुर्बल है। यद्यपि शैतान उन सभी चीज़ों के बीच चलता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा बनाया गया है, फिर भी वह परमेश्वर की आज्ञा के द्वारा ठहराए गए लोगों, वस्तुओं या पदार्थों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। कई हज़ार साल बीत गए हैं, अभी भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए उजियाले और वायु का आनन्द उठाता है, स्वयं परमेश्वर के द्वारा फूँके गए श्वास के द्वारा साँस लेता है, अभी भी परमेश्वर के द्वारा सृजित किए गए फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीड़े-मकौड़ों का आनन्द उठाता है और परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई सभी चीज़ों का मज़ा लेता है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे का स्थान ले रहे हैं; चार ऋतुएँ हमेशा की तरह बदल रही हैं; आसमान में उड़ने वाले कलहँस इस शीत ऋतु मे उड़ जाएँगे और अगले बसंत में फिर वापस भी आएँगे; जल की मछलियाँ नदियों और झीलों को—जो उनका घर है कभी भी नहीं छोड़तीं; ज़मीन के कीटपतंगे (शलभ) गर्मी के दिनों में दिल खोलकर गाते हैं; घास के झींगुर शरद ऋतु के दौरान हवा के साथ समय-समय पर धीमे स्वर में गुनगुनाते हैं; कलहँस समूहों में इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बाज एकान्त में अकेले ही रहते हैं, शेरों के कुनबे शिकार करके अपने आपको बनाए रखते हैं; बारहसिंघा घास और फूलों से दूर नहीं जाते...। सभी चीज़ों के मध्य हर प्रकार के जीवधारी चले जाते हैं फिर आ जाते हैं और फिर चले जाते हैं, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन होते हैं—परन्तु जो बदलता नहीं है वह है उनका सहज ज्ञान और ज़िन्‍दा रहने के नियम। वे परमेश्वर के प्रयोजन और परमेश्वर के पालन-पोषण के अधीन जीते हैं, कोई उनके सहज ज्ञान को बदल नहीं सकता है, न ही कोई उनके ज़िन्दा रहने के नियमों को बिगाड़ सकता है। यद्यपि मानवजाति को, जो सभी चीज़ों के बीच में जीवन बिताती है, शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है उसके द्वारा धोखा दिया गया है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जल, परमेश्वर द्वारा बनाई गई वायु, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों को त्याग नहीं सकता है, मनुष्य फिर भी जीवित रहता है और परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस स्थान में फलता-फूलता है। मनुष्य का सहज ज्ञान नहीं बदला है। मनुष्य अभी भी देखने के लिए आँखों पर, सुनने के लिए कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने हृदय पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों पर निर्भर है, आदि; परमेश्वर ने सब प्रकार का सहज ज्ञान मनुष्य को दिया है जिससे वह इस बात को स्वीकार कर सके कि परमेश्वर का प्रयोजन अपरिवर्तनीय बना रहता है, वे योग्यताएँ जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है कभी भी नहीं बदली हैं, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की मानवजाति की योग्यता नहीं बदली है, मानवजाति की आध्यात्मिक ज़रूरतें नहीं बदली है, अपनी उत्पत्ति का पता लगाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है। उस मनुष्य की वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहता है और जिसने शैतान के द्वारा किए गए रक्तरंजित विध्वंस को सहा है। यद्यपि शैतान ने मनुष्य पर अत्याचार किये हैं, और वह अब सृष्टि के प्रारम्भ के आदम और हव्वा नहीं रहे, बल्कि ऐसी चीज़ों से भर गये हैं जो परमेश्वर के विरूद्ध हैं, जैसे ज्ञान, कल्पनाएँ, विचार, इत्यादि और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भर गए हैं, इस कारण परमेश्वर की दृष्टि में मानवजाति अभी भी वही मानवजाति है जिसे उसने सृजित किया था। परमेश्वर अभी भी मानवजाति पर शासन करता और उसका आयोजन करता है, मानवजाति परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित पथक्रम के अनुसार अभी भी जीवन बिताती है, इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में, मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, गुड़गुड़ाते हुए पेट के साथ, महज गंद में लिपटी हुई, ऐसी प्रतिक्रियाओं के साथ जो थोड़ी धीमी हैं, ऐसी याद्दाश्त के साथ जो उतनी अच्छी नहीं है जितना हुआ करती थी और थोड़ी पुरानी हो गयी है—परन्तु मनुष्य के सारे कार्य और सहज ज्ञान पूरी तरह सुरक्षित है। यह वह मनुष्य है जिसे परमेश्वर बचाने की इच्छा करता है। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी है, सृष्टिकर्ता की आवाज़ को सुनना है, वह खड़ा होकर इस आवाज़ के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगा। इस मनुष्य को सृष्टिकर्ता के रूप को देखना है और वह अन्य सभी चीज़ों से बेपरवाह हो जाएगा, सब कुछ छोड़ देगा, जिससे अपने आपको परमेश्वर के प्रति समर्पित कर सके और अपने जीवन को भी उसके लिए दे देगा। जब मनुष्य का हृदय सृष्टिकर्ता के हृदय से निकले वचनों को समझेगा तो वह शैतान को ठुकराकर सृष्टिकर्ता की ओर आ जाएगा; जब मनुष्य अपने शरीर से गन्दगी को पूरी तरह धो देगा, एक बार फिर से सृष्टिकर्ता के प्रयोजन और पालन पोषण को प्राप्त करेगा, तब मनुष्य की स्मरण शक्ति पुनः वापस आ जाएगी और इस बार वह सचमुच में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में वापस आ चुका होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 104

उत्पत्ति 19:1-11 साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा, और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा, "हे मेरे प्रभुओ, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।" उन्होंने कहा, "नहीं, हम चौक ही में रात बिताएँगे।" पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिये वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिये भोजन तैयार किया, और बिना खमीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं। उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया; और लूत को पुकारकर कहने लगे, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा, "हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" उन्होंने कहा, "हट जा!" फिर वे कहने लगे, "तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।" और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए। तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे, अन्धा कर दिया, अत: वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।

उत्पत्ति 19:24-25 तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्‍ट कर दिया।

इन अंशों से, यह देखना कठिन नहीं है कि सदोम का अधर्म और भ्रष्टता पहले से ही उस मात्रा तक पहुँच चुकी थी जो परमेश्वर और मनुष्‍यों दोनों के लिए घृणास्पद था, और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में नगर नाश किए जाने के लायक था। परन्तु नगर के नाश किए जाने से पहले उसके भीतर क्या हुआ था? लोग इन घटनाओं से क्या प्रेरणा ले सकते हैं? इन घटनाओं के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति उसके स्वभाव के विषय में हमें क्या दिखाती है? पूरी कहानी समझने के लिए, आओ हम जो कुछ पवित्र शास्त्र में लिखा गया था उसे सावधानीपूर्वक पढ़ें ...

सदोम की भ्रष्टताः मनुष्यों को क्रोधित करने वाली, परमेश्वर के कोप को भड़काने वाली

उस रात, लूत ने परमेश्वर के दो दूतों का स्वागत किया और उनके लिए एक भोज तैयार किया। रात्रि भोजन के पश्चात्, उनके लेटने से पहले, नगर के चारों ओर से लोगों की भीड़ ने लूत के घर को घेर लिया और लूत को बाहर बुलाने लगे। पवित्र शास्त्र में उनका ये कथन दर्ज है, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" इन शब्दों को किसने कहा था? इन्हें किन से कहा गया था? ये सदोम के लोगों के शब्द थे, जो लूत के घर के बाहर चिल्लाते थे और ये लूत के लिए थे। इन शब्दों को सुनकर कैसा महसूस होता है? क्या तुम क्रोधित हो? क्या इन शब्दों से तुम्हें घिन आती है? क्या तुम क्रोध के मारे आगबबूला हो रहे हो? क्या ये शब्द शैतान की तीखी दुर्गन्ध नहीं है? उनके जरिए, क्या तुम इस नगर की बुराई और अन्धकार का एहसास कर सकते हो? क्या तुम उनके शब्दों के जरिए इन लोगों के व्यवहार की क्रूरता और बर्बरता का एहसास कर सकते हो? क्या तुम उनके आचरण के जरिए उनकी भ्रष्टता की गहराई का एहसास कर सकते हो? उन्होंने जो कहा उसके जरिए यह समझना कठिन नहीं है कि उनकी अधर्मी प्रकृति और हिंसक स्वभाव एक ऐसे स्तर तक पहुँच गया था जो उनके खुद के नियन्त्रण से परे था। लूत को छोड़कर, नगर का हर एक व्यक्ति शैतान जैसा ही था; अन्य व्यक्तियों की झलक पाते ही ये लोग उन्हें नुकसान पहुंचाना और निगल जाना चाहते थे...। ये चीज़ें एक व्यक्ति को नगर के भयंकर और डरावनी प्रकृति के साथ ही इसके चारों ओर उपस्थित मौत के वातावरण का भी एहसास कराती हैं; वे एक व्यक्ति को नगर की अधर्मता एवं ख़ूनी प्रकृति का भी एहसास कराती हैं।

जब उसने स्वयं को अमानवीय ठगों के गिरोह के आमने-सामने पाया, जो प्राणों को निगल जाने की लालसा से भरे हुए थे, तो लूत ने कैसा प्रत्युत्तर दिया था? पवित्र शास्त्र के अनुसार: "हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" लूत के शब्दों का अभिप्राय निम्नलिखित था: वह दूतों को बचाने के लिए अपनी दो बेटियों को त्यागने के लिए तैयार हो गया था। उचित तो यह था कि, इन लोगों को लूत की शर्तों से सहमत हो जाना चाहिए था और दोनों दूतों को अकेला छोड़ देना चाहिए था; आख़िरकार, वे दूत उनके लिए पूरी तरह से अजनबी थे, ऐसे लोग जिनका उनके साथ कोई लेना देना नहीं था; इन दोनों दूतों ने उनके हितों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाया था। फिर भी, अपनी बुरी प्रकृति से प्रेरित होकर, उन्होंने उस मुद्दे को यहीं खत्‍म नहीं किया। उसके बजाए, उन्होंने अपने प्रयासों को और अधिक तेज ही किया। यहां उनकी बातचीत का एक भाग नि:सन्देह इन लोगों के असली पापपूर्ण प्रकृति की और अधिक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकता है; साथ ही यह परमेश्वर के इस नगर को नष्ट करने के कारण को जानने और बूझने भी देता है।

अत: उन्होंने आगे क्या कहा? जैसा बाइबल में पढ़ते है: "'हट जा!' फिर वे कहने लगे, 'तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।' और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए।" वे किवाड़ को क्यों तोड़ना चाहते थे? वजह यह है कि वे उन दोनों दूतों को नुकसान पहुँचाने के लिए उत्सुक थे। वे दोनों दूत सदोम में क्या कर रहे थे? वहां आने का उनका उद्देश्य था लूत एवं उसके परिवार को बचाना; फिर भी, नगर के लोगों ने ग़लत रीति से सोचा कि वे आधिकारिक पदों पर हक़ जमाने के लिए आए थे। उनके उद्देश्य को पूछे बिना, यह मात्र अनुमान ही था जिससे नगरवासियों ने असभ्यता से उन दोनों दूतों को नुकसान पहुंचाना चाहा; वे ऐसे दो जनों को चोट पहुंचाना चाहते थे जिनका उनके साथ किसी भी प्रकार का कोई लेना-देना नहीं था। यह स्पष्ट है कि नगर के लोगों ने पूरी तरह से अपनी मानवता और तर्कशक्ति को गंवा दिया था। उनके पागलपन और असभ्यता का स्तर पहले से ही मनुष्यों को नुकसान पहुँचाने वाले और निगल जानेवाले शैतान के दुष्ट स्वभाव से अलग नहीं था।

जब उन्होंने लूत से इन लोगों को मांगा, तब लूत ने क्या किया? पाठ से हमें ज्ञात होता है कि लूत ने उन्हें नहीं सौंपा। क्या लूत परमेश्वर के इन दोनों दूतों को जानता था? बिल्कुल भी नहीं! परन्तु वह इन दोनों लोगों को बचाने में समर्थ क्यों था? क्या उसे मालूम था कि वे क्या करने आए थे? यद्यपि वह उनके आने के कारण से अनजान था, फिर भी वह जानता था कि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और इस प्रकार उसने उनका स्वागत किया। उसने परमेश्वर के इन दासों को स्वामी कहकर बुलाया जो यह दिखाता है कि सदोम के अन्‍य लोगों से अलग, लूत आम तौर पर परमेश्वर का एक अनुयायी था। इसलिए, जब परमेश्वर के दूत उसके पास आए, तो इन दोनों सेवकों का स्वागत करने के लिए उसने अपने स्वयं के जीवन को जोखिम में डाल दिया था; उससे बढ़कर, इन दोनों सेवकों की सुरक्षा के लिए उसने बदले में अपनी दो बेटियाँ भी चढ़ा दी। यह लूत का धर्मी कार्य है; साथ ही यह लूत के स्वभाव और उसके सार का एक ठोस प्रकटीकरण है, और साथ ही परमेश्वर के लूत को बचाने के लिए अपने सेवकों को भेजने का कारण भी था। जोखिम का सामना करते समय, लूत ने किसी भी चीज़ की परवाह किए बगैर इन दोनों सेवकों की सुरक्षा की; यहाँ तक कि उसने सेवकों की सुरक्षा के बदले में अपनी दोनों बेटियों का सौदा करने का भी प्रयास किया। लूत के अतिरिक्त, क्या नगर के भीतर कोई ऐसा था जो कुछ इस तरह का काम कर सकता था? जैसे कि तथ्य साबित करते हैं—नहीं! इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं है कि, लूत को छोड़कर सदोम के भीतर हर कोई विनाश का लक्ष्य था साथ-ही-साथ एक ऐसे लक्ष्य के समान था जो विनाश के योग्य था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 105

उत्पत्ति 19:1-11 साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा, और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा, "हे मेरे प्रभुओ, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।" उन्होंने कहा, "नहीं, हम चौक ही में रात बिताएँगे।" पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिये वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिये भोजन तैयार किया, और बिना खमीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं। उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया; और लूत को पुकारकर कहने लगे, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा, "हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" उन्होंने कहा, "हट जा!" फिर वे कहने लगे, "तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।" और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए। तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे, अन्धा कर दिया, अत: वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।

उत्पत्ति 19:24-25 तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्‍ट कर दिया।

परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के कारण सदोम को तबाह कर दिया गया

जब सदोम के लोगों ने इन दो सेवकों को देखा, तो उन्होंने उनके आने का कारण नहीं पूछा, न ही किसी ने यह पूछा कि क्या वे परमेश्वर की इच्छा का प्रचार करने के लिए आए थे। इसके विपरीत, उन्होंने एक भीड़ इकट्ठा की और स्पष्टीकरण का इंतज़ार किए बगैर, जंगली कुत्तों या दुष्ट भेड़ियों के समान उन दोनों सेवकों को पकड़ने के लिए आ गए। क्या परमेश्वर ने इन चीज़ों को होते हुए देखा था? इस प्रकार के मानवीय व्यवहार, और इस प्रकार की बात को लेकर परमेश्वर अपने हृदय में क्या सोच रहा था? परमेश्वर ने इस नगर का नाश करने का निर्णय लिया था; वह संकोच और इंतज़ार नहीं करेगा, न ही वह निरन्तर धीरज दिखाएगा। उसका दिन आ चुका था, अतः उसने उस कार्य को आरम्भ किया जिसे उसने करने की इच्छा की थी। इस प्रकार, उत्पत्ति 19:24-25 कहता है, "तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्‍ट कर दिया।" ये दोनों पद लोगों को उस पद्धति के बारे में बताते हैं जिसके तहत परमेश्वर ने नगर को नष्ट किया था; और यह लोगों को यह भी बताता है कि परमेश्वर ने क्या नाश किया था। प्रथम, बाइबल वर्णन करती है कि परमेश्वर ने उस नगर को आग से जला दिया, और आग की मात्रा समस्त लोगों और जो कुछ भूमि पर उगता था उसे नष्ट करने के लिए पर्याप्त थी। कहने का तात्पर्य है, वह आग जो स्वर्ग से गिरी उसने न केवल उस नगर को नष्ट किया; बल्कि उसने उसके भीतर समस्त लोगों और जीवित प्राणियों को भी नष्ट कर दिया, और बिना किसी नामोनिशान के सब कुछ नष्ट कर दिया। नगर के नष्ट होने के पश्चात्, वह भूमि जीवित प्राणियों से विहीन हो गई थी। वहां अब कोई जीवन नहीं था, और न ही जीवन के निशान थे। नगर एक उजड़ी भूमि और एक खाली स्थान बन गया था जो मौत की ख़ामोशी से भरा हुआ था। इस स्थान पर परमेश्वर के विरुद्ध अब और कोई बुरा कार्य नहीं होगा; अब और कोई हत्या या ख़ून ख़राबा नहीं होगा।

परमेश्वर क्यों इस नगर को पूरी तरह से जलाना चाहता था? तुम लोग यहां क्या देख सकते हो? क्या परमेश्वर मनुष्य और प्रकृति, अपनी स्वयं की सृष्टि का इस तरह नाश होते हुए देख सकता था? यदि तुम उस आग से, जिसे स्‍वर्ग से बरसाया गया था, यहोवा परमेश्वर के कोप को परख सकते, तो उसकी विनाशलीला के लक्ष्य, और साथ-ही जिस हद तक इस नगर को नष्ट किया गया था, उससे, उसके कोप के स्तर को देखना कठिन नहीं है। जब परमेश्वर किसी नगर को तुच्छ जानता है, तो वह अपने दण्ड को उसके ऊपर डालेगा। जब परमेश्वर किसी नगर से अप्रसन्न को जाता है, तो वह लोगों को अपने क्रोध के बारे में सूचित करते हुए बार-बार चेतावनियां जारी करेगा। फिर भी, जब परमेश्वर एक नगर का खात्मा और विनाश करने का निर्णय लेता है—अर्थात्, जब उसके क्रोध और वैभव को ठेस पहुँचती है—तो वह और अधिक दण्ड और चेतावनी नहीं देगा। इसके बजाय, वह सीधे उसे नष्ट कर देगा। वह उसे पूरी तरह से मिटा देगा। यह परमेश्वर का धर्मी स्वभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 106

उत्पत्ति 19:1-11 साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा, और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा, "हे मेरे प्रभुओ, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।" उन्होंने कहा, "नहीं, हम चौक ही में रात बिताएँगे।" पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिये वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिये भोजन तैयार किया, और बिना खमीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं। उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया; और लूत को पुकारकर कहने लगे, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा, "हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" उन्होंने कहा, "हट जा!" फिर वे कहने लगे, "तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।" और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए। तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे, अन्धा कर दिया, अत: वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।

उत्पत्ति 19:24-25 तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्‍ट कर दिया।

अपने प्रति सदोम के लगातार प्रतिरोध और शत्रुता के पश्चात्, परमेश्वर ने उसे पूरी तरह से मिटा दिया

मानवीय दृष्टिकोण से, सदोम ऐसा नगर था जो मनुष्य की कामना और मनुष्य की दुष्टता दोनों को पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता था। वह प्रलोभन देने वाला और मोहित करने वाला था, जहाँ हर रात संगीत और नृत्य के साथ, उसकी सम्पन्नता ने मनुष्यों को आकर्षण और उन्माद की ओर धकेल दिया। बुराई ने लोगों के हृदयों को कलुषित कर दिया और उन्हें मोहित करके पतित कर दिया। यह एक ऐसा नगर था जहां अशुद्ध आत्माएं और दुष्ट आत्माएं बेधड़क मण्डराया करती थीं; यह पाप और हत्या से पूरी तरह भरा हुआ था और ख़ूनी एवं सड़ी हुई दुर्गन्ध से भरपूर था। यह एक ऐसा नगर था जिसने लोगों की हड्डियों तक को सुन्न कर दिया था, एवं एक ऐसा नगर था जिससे कोई भी अपने आपको दूर रखना चाहेगा। इस नगर में एक भी व्यक्ति—न पुरुष और न स्त्री, न जवान और न बुज़ुर्ग—सच्चे मार्ग को खोजने वाला नहीं था; कोई भी प्रकाश की लालसा नहीं करता था या पाप से दूर जाने की इच्छा नहीं करता था। वे शैतान के नियन्त्रण, भ्रष्टता और धूर्तता में जीवन बिताते थे। उन्होंने अपनी मानवता को खो दिया था; उन्होंने अपनी संवेदनाओं को गंवा दिया था, और उन्होंने मनुष्य के अस्तित्व के मूल उद्देश्य को खो दिया था। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध प्रतिरोध के अनगिनत दुष्ट कर्मों को अंजाम दिया था; उन्होंने उसके मार्गदर्शन को अस्वीकार किया था और उसकी इच्छा का विरोध किया था। ये उनके बुरे कार्य थे जिसने इन लोगों को, नगर को, और उसके भीतर के हर एक जीवित प्राणी को कदम-दर-कदम विनाश के पथ पर नीचे पहुंचा दिया था।

यद्यपि ये दोनों अंश उन विवरणों को दर्ज नहीं करते हैं जिनमें सदोम के लोगों की भ्रष्टता का विस्तार से वर्णन किया गया है, इसके बजाए वे नगर में परमेश्वर के दोनों सेवकों के आगमन के बाद वहाँ के लोगों के उनके प्रति व्यवहार को दर्ज करते हैं, तथापि एक साधारण सा सत्य प्रकट कर सकता है कि किस हद तक सदोम के लोग भ्रष्ट एवं दुष्ट थे और परमेश्वर का प्रतिरोध करते थे। इसके साथ ही, नगर के लोगों के असली चेहरे और सार का भी खुलासा हो जाता है। उन्होंने न केवल परमेश्वर की चेतावनियों को स्वीकार नहीं किया था, बल्कि वे उसके दण्ड से भी नहीं डरते थे। इसके विपरीत, उन्होंने परमेश्वर के कोप का उपहास किया। उन्होंने आंख बंद करके परमेश्वर का प्रतिरोध किया। चाहे परमेश्वर कुछ भी करे या जैसे भी करे, उनका दुष्ट स्वभाव केवल तेजी से बढ़ता ही जाता था, और वे लगातार परमेश्वर का विरोध करते रहे। सदोम के लोग परमेश्वर के अस्तित्व, उसके आगमन, उसके दण्ड, और उससे बढ़कर, उसकी चेतावनियों के विरुद्ध थे। उन्होंने उन सभी लोगों को निगल लिया और नुकसान पहुँचाया, जिन्हें निगला और नुकसान पहुँचाया जा सकता था, और उन्होंने परमेश्वर के सेवकों से कोई अलग बर्ताव नहीं किया था। सदोम के लोगों के द्वारा की गई दुष्टता के तमाम कार्यों के लिहाज से, परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुंचाना तो बस उनकी दुष्टता का छोटा सा हिस्सा था, और इससे जो उनकी दुष्ट प्रकृति प्रकट हुई थी वह वास्तव में विशाल समुद्र में पानी की एक बूंद के बराबर ही थी। इसलिए, परमेश्वर ने उन्हें आग से नष्ट करने का फैसला किया। परमेश्वर ने नगर को नष्ट करने के लिए बाढ़ का इस्तेमाल नहीं किया, न ही उसने चक्रवात, भूकम्प, सुनामी या किसी और तरीके का इस्तेमाल किया। इस नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल क्या सूचित करता है? इसका अर्थ नगर का सम्पूर्ण विनाश था, इसका अर्थ था कि नगर पूरी तरह से पृथ्वी से और अस्तित्व से लोप हो गया था। यहां, "विनाश" न केवल नगर के आकार और ढांचे या बाहरी रूप के लोप हो जाने की ओर संकेत करता है; बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि पूरी रीति से मिटा दिए जाने के कारण नगर के भीतर के लोगों की आत्माएं भी अस्तित्व में नहीं बचीं। साधारण रूप से कहें, तो नगर के साथ जुड़े सभी लोगों, घटनाओं और चीज़ों को नष्ट किया गया था। उनके लिए दूसरा जीवन या पुनर्जन्म नहीं होगा; परमेश्वर ने उन्हें मानवजाति से, एवं अपनी सृष्टि से हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया था। "आग का इस्तेमाल" पाप के विराम को सूचित करता है, और इसका अर्थ है पाप का अंत; यह पाप अस्तित्व में नहीं रहेगा और ना ही फैलेगा। इसका अर्थ था कि शैतान की दुष्टता ने अपनी उपजाऊ मिट्टी के साथ-ही-साथ उस कब्रिस्तान को भी खो दिया था जिसने इसे रहने और जीने के लिए एक स्थान प्रदान किया था। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में, परमेश्वर द्वारा आग का इस्तेमाल उसकी विजय की छाप है जिससे शैतान पर मुहर लगाई गई है। मनुष्यों को भ्रष्ट और बर्बाद करने के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की शैतान की महत्वाकांक्षा में सदोम का विनाश एक बहुत भारी चूक है, और उसी प्रकार यह मनुष्यों के विकास में उस समय का एक अपमानजनक चिह्न है जब मनुष्य ने परमेश्वर के मार्गदर्शन को ठुकरा दिया था और अपने आपको बुराई के हवाले कर दिया था। इसके अतिरिक्त, यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के सच्चे प्रकाशन का एक लेखा-जोखा है।

जब उस आग ने जिसे परमेश्वर ने स्वर्ग से भेजा था सदोम को राख में तब्दील कर दिया, तो इसका अर्थ यह हुआ कि "सदोम" नामक नगर, और उस नगर के भीतर की हर चीज़ भी अस्तित्व में नहीं रही। इसे परमेश्वर के क्रोध के द्वारा नष्ट किया गया था, यह परमेश्वर के क्रोध और महाप्रताप के अधीन विलुप्त हो गया। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण सदोम को उसका न्यायोचित दण्ड मिला; और परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण, उसे उसका न्यायोचित अंत मिला। सदोम के अस्तित्व का अन्त उसकी बुराई के कारण हुआ, और यह इस कारण से भी हुआ क्योंकि परमेश्वर दोबारा इस नगर को, साथ-ही-साथ किसी भी जन को जो इस नगर में रहता था या किसी भी जीवन को जो इस नगर में पनपा था देखना नहीं चाहता था। परमेश्वर की "दोबारा इस नगर को कभी नहीं देखने की इच्छा" उसके क्रोध के साथ-साथ उसका प्रताप है। परमेश्वर ने नगर को जला दिया क्योंकि उसकी बुराई और पाप ने परमेश्वर को उसके प्रति क्रोध, घृणा और द्वेष का एहसास कराया था और वह उसको या वहाँ के किसी निवासी या जीवों को दोबारा कभी नहीं देखना चाहता था। जब एक बार नगर का जलना समाप्त हो गया, और केवल राख ही बाकी रह गई, तो वह सचमुच में परमेश्वर की नज़रों में अस्तित्व में नहीं रहा; यहाँ तक कि उसकी यादें भी परमेश्‍वर की स्‍मृति से चली गईं, मिट गईं। इसका अर्थ है कि वह आग जिसे स्वर्ग से भेजा गया था उसने न केवल सदोम नगर और अधर्म से भरे हुए लोगों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था, और न केवल उसने नगर के भीतर पाप से कलंकित सभी चीज़ों को नष्ट कर दिया था; बल्कि उससे भी बढ़कर, इस आग ने मनुष्यों की दुष्टता की यादों को और परमेश्वर की प्रति उनके प्रतिरोध को नष्ट कर दिया था। उस नगर को जलाकर राख करने में परमेश्वर का उद्देश्य यही था।

मनुष्य चरम सीमा तक पतित हो चुके थे। वे नहीं जानते थे कि परमेश्वर कौन था या वे स्वयं कहाँ से आए थे। यदि तुम परमेश्वर का ज़िक्र भी करते, तो ये लोग हमला कर देते, कलंक लगाते और ईश-निन्दा करते। यहाँ तक कि जब परमेश्वर के सेवक उसकी चेतावनी का प्रचार करने आए थे, तब इन दुष्ट लोगों ने न केवल पश्चाताप का कोई चिन्ह नहीं दिखाया और उन्होंने अपने दुष्ट आचरण को भी नहीं त्यागा, बल्कि इसके विपरीत, उन्होंने ढिठाई से परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुँचाया। जो कुछ उन्होंने उजागर और प्रकट किया था वह परमेश्वर के प्रति उनकी प्रकृति और चरम शत्रुता का तत्व था। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के विरुद्ध इन भ्रष्ट लोगों का प्रतिरोध उनके भ्रष्ट स्वभाव के प्रकाशन से कहीं अधिक था, बिल्कुल वैसे ही जैसे यह सत्य की कमी के कारण की जाने वाली निंदा और उपहास करने की एक घटना से कहीं अधिक था। उनके दुष्ट स्वभाव का कारण न तो मूर्खता थी न ही अज्ञानता; न ही इन लोगों का धोखा खाना इसका कारण था, इसका कारण यह तो बिल्कुल नहीं था कि इन्हें भटकाया गया था। उनका चाल-चलन परमेश्वर के विरुद्ध खुले तौर पर निर्लज्ज शत्रुता, विरोध और उपद्रव के स्तर तक पहुंच चुका था। बिना किसी सन्देह के, इस प्रकार का मानवीय आचरण परमेश्वर को क्रोधित करेगा, और यह उसके स्वभाव को क्रोधित करेगा—एक ऐसा स्वभाव जिसे ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। इसलिए, परमेश्वर ने सीधे और खुले तौर पर अपने क्रोध और अपने प्रताप को दिखाया; यह उसके धर्मी स्वभाव का सच्चा प्रकाशन है। एक ऐसे नगर को सामने देख जो पाप से उमड़ रहा था, परमेश्वर ने तीव्रतम संभव ढंग से उसे नष्ट करने की इच्छा की थी; वह उसके भीतर लोगों को और उनके सम्पूर्ण पापों को पूर्णतम रीति से मिटाना, और इस नगर के लोगों के अस्तित्व को समाप्त करना और इस स्थान के भीतर पाप को बहुगुणित होने से रोकना चाहता था। ऐसा करने का सबसे तेज और सबसे मुकम्मल तरीका था उसे आग से जलाकर नष्‍ट कर देना। सदोम के लोगों के प्रति परमेश्वर का रवैया परित्याग या उपेक्षा का नहीं था, उसके बजाए, उसने इन लोगों को दण्ड देने, मारकर नीचे गिराने और पूरी तरह से नष्ट करने लिए अपने क्रोध, प्रताप और अधिकार का प्रयोग किया था। उनके प्रति उसका रवैया न केवल शारीरिक विनाश का था किन्तु साथ ही प्राण के विनाश का भी था, एक अनंतकालिक विध्वंस। यह उनके "अस्तित्व की समाप्ति के लिए" परमेश्वर की इच्छा का असली आशय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 107

हालाँकि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य से छिपा हुआ और अज्ञात है, फ़िर भी यह किसी अपराध को नहीं सहता है

सभी मूर्ख और अबोध मनुष्यों के प्रति परमेश्वर का व्यवहार मुख्य रूप से दया और सहनशीलता पर आधारित है। दूसरी ओर, उसका क्रोध समय और चीज़ों के अति विशाल पैमाने में छिपा हुआ है; मनुष्य इससे अनजान है। परिणामस्वरूप, यह मनुष्य के लिए कठिन है कि वह परमेश्वर को उसका स्वयं का क्रोध प्रदर्शित करते हुए देखे, और साथ ही उसके क्रोध को समझना भी कठिन है। इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को हल्के में लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के अंतिम कार्य और मनुष्य की क्षमा और उसके प्रति सहिष्णु होने के चरण को सामने पाते हैं—अर्थात्, जब परमेश्वर की दया और चेतावनी की अंतिम घटना उनके पास पहुँचती है—यदि वे तब भी परमेश्वर का विरोध करने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और पश्चाताप करने, अपने मार्गों को सुधारने या उसकी दया को स्वीकार करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं, तो परमेश्वर आगे से उन्‍हें अपनी सहनशीलता और धैर्य प्रदान नहीं करेगा। इसके विपरीत, यह वह समय है जब परमेश्वर अपनी दया को वापस ले लेगा। इसके पश्चात्, वह बस अपने क्रोध को व्‍यक्‍त करेगा। वह अलग-अलग तरीकों से अपने क्रोध को प्रकट कर सकता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह लोगों को दण्ड देने और नष्ट करने के लिए अलग अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।

सदोम नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल करना मानवता और किसी जीव को सम्पूर्ण रीति से विनाश करने के लिए उसकी तीव्रतम पद्धति है। सदोम के लोगों को जलाना उनकी शारीरिक देहों को नष्ट करने से कहीं अधिक था; इसने पूरी तरह से उनकी आत्माओं, उनके प्राणों और उनके शरीरों को नष्ट कर दिया, यह भी सुनिश्चित किया कि इस नगर के भीतर के लोग, न तो भौतिक संसार में अस्तित्व में रहेंगे न ही उस संसार में रहेंगे जो मनुष्य के लिए अदृश्य है। यह एक तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध को दर्शाता और प्रकट करता है। इस तरह का प्रकाशन और प्रदर्शन परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक सार का एक पहलू है, बिल्कुल वैसे ही जैसे यह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आवश्यक सार भी है। जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तो वह दया या करुणा प्रकट करना बन्द कर देता है, वह कोई सहनशीलता या धैर्य प्रदर्शित नहीं करता है; तब कोई ऐसा व्यक्ति, वस्तु या कारण नहीं है जो उसे निरन्तर धीरज धरने, फ़िर से दया करने, और एक बार फ़िर से अपनी सहनशीलता को प्रकट करने के लिए रज़ामंद कर सके। इन चीज़ों के बदले में, निसंकोच, परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को व्‍यक्‍त करेगा, जो कुछ वह चाहता है उसे करेगा, और वह इन चीज़ों को अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुरूप शीघ्रता से और साफ़-सुथरे तरीके से करेगा। यह वह तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को प्रकट करता है, जिसे मनुष्य को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए, और साथ ही यह उसके धर्मी स्वभाव के एक पहलू की अभिव्यक्ति भी है। जब लोग परमेश्वर को मनुष्य के प्रति चिंता करते और प्रेम दिखाते हुए देखते हैं, तो वे उसके क्रोध को भाँपने में, उसके प्रताप को देखने में या गुनाह के प्रति उसकी असहनशीलता को अनुभव करने में असमर्थ होते हैं। इन चीज़ों ने हमेशा से यह विश्वास करने में लोगों की अगुवाई की है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव केवल दया, सहनशीलता और प्रेम है। फिर भी, जब कोई परमेश्वर को किसी नगर का विनाश करते हुए या मनुष्य से घृणा करते हुए देखता है, तो मनुष्य के विनाश में उसका क्रोध और प्रताप लोगों को उसके धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष की झलक देखने देता है। यह गुनाह के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता है। परमेश्वर का स्वभाव जो किसी गुनाह को सहन नहीं करता वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी की कल्पना से परे है, कोई भी उसके साथ दखलंदाज़ी करने या उसको प्रभावित करने में सक्षम नहीं है; उससे भी बढ़कर, इसका भेष धारण या अनुकरण नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर के स्वभाव का यह पहलू ऐसा है जिसे मनुष्य को बहुत अच्छे से जानना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का स्वभाव है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के स्वभाव को धारण करता है। परमेश्वर इस प्रकार के धर्मी स्वभाव को धारण करता है क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहीपन और शैतान के बुरे कार्यों जैसे कि—मानवजाति को भ्रष्ट करना और निगल जाना—से घृणा करता है क्योंकि वह अपने पवित्र और बेदाग सार के कारण अपने विरुद्ध पाप के सारे कार्यों से घृणा करता है। यह इसलिए है क्योंकि वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी द्वारा खुला विरोध या स्वयं से मुकाबला सहन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई थी या जिसका चुनाव किया था, वह व्‍यक्ति भी उसके स्वभाव को ललकार या उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धान्त का उल्‍लंघन भर कर दे तो वह थोड़ी सी भी दया या संकोच के बिना अपने धर्मी स्वभाव को जारी और प्रकट करेगा—ऐसा धर्मी स्वभाव जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 108

परमेश्वर का क्रोध समस्त सच्ची शक्तियों और समस्त सकारात्मक चीज़ों के लिए बचाव है

अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसका विशिष्ट सार है; परमेश्वर का क्रोध उसका विशिष्ट स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसका विशिष्ट सार है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धान्त उस पहचान और स्थिति को दर्शाता है जिसे सिर्फ उसने धारण किया है। यह जिक्र करने की आवश्यकता नहीं है कि यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के सार का एक प्रतीक भी है। परमेश्वर का स्वभाव उसका स्वयं का अंतर्निहित सार है। यह समय के गुज़रने के साथ बिल्कुल भी नहीं बदलता है, और जब कभी स्थान परिवर्तित होता है तब भी यह नहीं बदलता है। उसका अंतर्निहित स्वभाव उसका स्वाभाविक सार है। वह चाहे जिस किसी पर भी अपना कार्य क्‍यों न करे, न तो उसका सार बदलता है और न ही उसका धर्मी स्वभाव। जब कोई परमेश्‍वर को क्रोधित करता है, तो जिसे वह आगे भेजता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है; इस समय उसके क्रोध के पीछे का सिद्धान्त नहीं बदलता है, और न ही उसकी अद्वितीय पहचान और हैसियत बदलती है। अपने सार में परिवर्तन के कारण या स्वभाव के अलग-अलग सारों को उत्पन्न करने के कारण वह क्रोधित नहीं होता है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसके विरुद्ध मनुष्य का विरोध उसके स्वभाव को ठेस पहुंचाता है। मनुष्य का परमेश्वर को स्पष्ट रूप से ललकारना परमेश्वर की अपनी पहचान और हैसियत के लिए एक गम्भीर चुनौती है। परमेश्वर की नज़र में, जब मनुष्य उसे चुनौती देता है, तब मनुष्य उससे मुकाबला कर रहा है और उसके क्रोध की परीक्षा ले रहा है। जब मुनष्य परमेश्वर का विरोध करता है, जब मनुष्य परमेश्वर से मुकाबला करता है, जब मनुष्य लगातार उसके क्रोध की परीक्षा लेता है—यह वही समय है जब उसका पाप अनियंत्रित हो जाता है—तब परमेश्वर का क्रोध स्वाभाविक रूप से अपने आपको प्रकट एवं प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का प्रकटीकरण संकेत करता है कि समस्त बुरी ताकतें अस्तित्व में नहीं रहेंगी; यह संकेत करता है कि सभी उपद्रवी शक्तियों को नष्ट किया जाएगा। यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की अद्वितीयता है, और यह परमेश्वर के क्रोध की अद्वितीयता है। जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को चुनौती दी जाती है, जब मनुष्य के द्वारा धर्मी ताकतों को रोका जाता है और मनुष्य द्वारा इसकी अनदेखी की जाती है, तब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजेगा। परमेश्वर के सार के कारण, पृथ्वी की वे सारी ताकतें जो परमेश्वर का मुकाबला करती हैं, उसका विरोध करती हैं और उसके साथ संघर्ष करती हैं वे बुरी, भ्रष्ट और अधर्मी हैं; वे शैतान की ओर से आती हैं और उसी की हैं। क्योंकि परमेश्वर धर्मी है, प्रकाश और दोषरहित पवित्रता से संबंधित है, इसलिए समस्त चीज़ें जो बुरी, भ्रष्ट और शैतान की हैं वे परमेश्वर के क्रोध के प्रकट होने के साथ ही विलुप्त हो जाएंगी।

यद्यपि परमेश्वर के क्रोध का उंडेला जाना उसके धर्मी स्वभाव के प्रदर्शन का एक पहलू है, फ़िर भी अपने लक्ष्य के प्रति परमेश्वर का क्रोध बिल्कुल भी विवेकशून्य या सिद्धान्तविहीन नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर क्रोध करने में बिल्कुल भी उतावलापन नहीं दिखाता है, न ही वह अपने क्रोध और प्रताप को अविवेकपूर्ण रूप से प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का क्रोध विशेष रूप से नियन्त्रित और नपा-तुला होता है; इसकी तुलना मनुष्य के क्रोध से आग बबूला होने या अपने गुस्से को प्रकट करने से बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है। परमेश्वर और मनुष्य के बीच हुई अनेक बातचीत बाइबल में दर्ज हैं। इनमें से कुछ लोगों के कथन सतही, अज्ञानी और बचकाने थे, किन्तु परमेश्वर ने उन्हें मारकर नीचे नहीं गिराया, और न ही उनकी भर्त्सना की। विशेष रूप से, अय्यूब की परीक्षा के दौरान, यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब के तीन मित्रों और दूसरों की अय्यूब से कही बातों को सुनने के पश्चात, उनसे कैसा बर्ताव किया था? क्या उसने उन्हें दोषी ठहराया था? क्या वह उन पर आग बबूला हो गया था? उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था! उसके बजाए उसने अय्यूब को उनके लिए विनती करने, और उनके लिए प्रार्थना करने के लिए कहा; दूसरी ओर परमेश्वर ने उनकी ग़लतियों को मन में नहीं रखा। ये सभी उदाहरण उस मुख्य रवैये को दर्शाते हैं जिसके तहत परमेश्वर भ्रष्ट एवं अबोध मनुष्य से बर्ताव करता है। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का प्रदर्शन या उसे प्रकट करना बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर का क्रोध गुस्से का बहुत बड़ा विस्फोट नहीं है जैसा मनुष्य इसे समझता है। परमेश्वर अपने क्रोध को इसलिए नहीं प्रकट करता है क्योंकि वह अपने मिज़ाज पर काबू करने में समर्थ नहीं है या इसलिए कि उसका क्रोध उबलने पर आ पहुंचा है और उसे बाहर निकालना ही होगा। इसके विपरीत, उसका क्रोध उसके धर्मी स्वभाव का एक प्रदर्शन है और उसके धर्मी स्वभाव की एक विशुद्ध अभिव्यक्ति है; यह उसके पवित्र सार का एक सांकेतिक प्रकाशन है। परमेश्वर क्रोध है, और किसी भी गुनाह के प्रति सहनशील नहीं है—कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि परमेश्वर का क्रोध विभिन्न कारणों के बीच अन्तर नहीं करता है या यह सिद्धान्तविहीन है; यह भ्रष्ट मनुष्य ही है जिसके पास सिद्धान्तविहीनता, और बिना सोचे समझे, विभिन्न कारणों के बीच अन्तर न करने वाले क्रोध को ज़ाहिर करने पर एक व्यापक एकाधिकार है। जब एक बार किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक कद मिल जाता है, तो उसे अक्सर अपने मिजाज़ पर नियन्त्रण पाने में कठिनाई महसूस होगी, और इस प्रकार वह अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए घटनाओं का इस्तेमाल करने में आनन्द लेगा; वह अक्सर बिना किसी स्पष्ट कारण के क्रोध से आगबबूला होगा, जिससे अपनी योग्यता को प्रकट कर सके और दूसरे जान सकें कि उसकी हैसियत और पहचान अन्य सामान्य लोगों से अलग है। नि:संदेह, भ्रष्ट लोग बिना किसी हैसियत के भी बार-बार नियन्त्रण खो देते हैं। उनके व्यक्तिगत हितों के नुकसान होने पर उनका क्रोध बार-बार प्रकट होता है। अपनी स्वयं की हैसियत और गरिमा की सुरक्षा करने के लिए, भ्रष्ट मानवजाति बार-बार अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगी और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करेगी। पाप के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए मनुष्य क्रोध में आगबबूला होगा और अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगा, ये कार्य वे तरीके हैं जिसके तहत मनुष्य अपने असंतोष को प्रकट करता है; ये अशुद्धताओं से, छल कपट और साजिशों से लबालब भरे हुए हैं; वे मनुष्य की भ्रष्टता और बुराई से लबालब भरे हुए हैं; उससे कहीं बढ़कर, वे मनुष्य की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब भरे हुए हैं। जब न्याय दुष्टता से मुकाबला करता है, तो मनुष्य न्याय के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए क्रोध से आगबबूला नहीं होता है; उसके विपरीत, जब न्याय की शक्तियों को धमकाया, सताया और उन पर आक्रमण किया जाता है, तब मनुष्य का स्वभाव नज़रअंदाज़ करने, टालने या मुंह फेरने वाला होता है। फ़िर भी, दुष्ट शक्तियों से मुकाबला करते समय, मनुष्य का रवैया सेवा करने और मक्खन लगाने वाला होता है। इसलिए, मनुष्य का क्रोध निकालना दुष्ट शक्तियों के लिए बच निकलने का मार्ग है, और देहयुक्त मनुष्य के बुरे आचरण का प्रदर्शन है जो अनियंत्रित एवं रोका न जा सकनेवाला है। फ़िर भी, जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तब सारी बुरी शक्तियों को रोका जाएगा; मनुष्य को हानि पहुंचाने वाले सारे पापों को रोका जाएगा; वे सभी बैरी शक्तियां जो परमेश्वर के कार्य में बाधा डालती हैं उन्हें प्रकट, अलग और शापित किया जाएगा; शैतान के सभी सह अपराधियों को जो परमेश्वर का विरोध करते हैं उन्हें दण्डित किया जाएगा, और जड़ से उखाड़ दिया जाएगा। उनके स्थान पर, परमेश्वर का कार्य रुकावटों से मुक्त होकर आगे बढ़ेगा; परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना निर्धारित समय के अनुसार लगातार कदम दर कदम विकसित होगी; परमेश्वर के चुने हुए लोग शैतान की बाधा और धूर्तता से मुक्त होंगे; ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे खामोश और शांतिप्रिय माहौल के बीच परमेश्वर की अगुवाई और आपूर्ति का आनन्द लेंगे। परमेश्वर का क्रोध एक सुरक्षा कवच है जो दुष्ट की सारी शक्तियों को बहुगुणित होने और अनियंत्रित होकर बढ़ने से रोकता है, और यह एक ऐसा सुरक्षा कवच भी है जो समस्त धर्मी और सकारात्मक चीज़ों के अस्तित्व और फैलाव को सुरक्षा प्रदान करता है और दमन और विनाश से सदा उनकी रक्षा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 109

क्या तुम सब सदोम के विनाश में परमेश्वर के क्रोध के सार को देख सकते हो? क्या उसके क्रोध में कोई चीज़ मिली हुई है? क्या परमेश्वर का क्रोध पवित्र है? मनुष्य के शब्दों में, क्या परमेश्वर का क्रोध बिना किसी मिलावट के है? क्या उसके क्रोध के पीछे कोई छल है? क्या कोई षडयंत्र है? क्या अकथनीय रहस्य हैं? मैं कठोरता और गम्भीरता से तुम्हें बता सकता हूँ; परमेश्वर के क्रोध का कोई अंश ऐसा नहीं है जिसके कारण किसी के मन में सन्देह आ सकता है। उसका क्रोध पवित्र एवं अमिश्रित है और वह उसमें किसी अन्य इरादों या लक्ष्यों को आश्रय नहीं देता है। उसके क्रोध का कारण पवित्र, निर्दोष और आलोचना से परे है। यह उसके पवित्र सार का एक स्वाभाविक प्रकाशन और प्रदर्शन है; यह कुछ ऐसा है जिसे सृष्टि में कोई भी धारण नहीं करता है। यह परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव का एक हिस्सा है, साथ ही यह सृष्टिकर्ता और उसकी सृष्टि के विशिष्ट सारों के बीच का एक असाधारण अन्तर भी है।

चाहे कोई दूसरों के सामने क्रोध करे या उनके पीठ पीछे, प्रत्येक के पास अलग-अलग इरादे और उद्देश्य होते हैं। कदाचित् वे अपनी प्रतिष्ठा का निर्माण कर रहे हैं, या शायद वे अपने हितों का समर्थन कर रहे हैं, अपनी छवि बना रहे हैं या अपना मान रख रहे हैं। कुछ लोग अपने क्रोध पर नियन्त्रण रखने का अभ्यास करते हैं, जबकि अन्य लोग बहुत उतावले होते हैं और थोड़े भी नियन्त्रण के बिना, अपनी इच्छानुसार क्रोध से आगबबूला हो जाते हैं। संक्षेप में, मनुष्य का क्रोध उसके भ्रष्ट स्वभाव में से ही उपजता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इसका उद्देश्य क्या है, यह शरीर और स्वभाव से संबंधित है; इसका न्याय और अन्याय से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव और सार में ऐसा कुछ नहीं है जो सत्य के अनुरूप हो। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्य के गुस्से और परमेश्वर के क्रोध का जिक्र एक साथ नहीं किया जाना चाहिए। बिना किसी अपवाद के, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य का स्वभाव, भ्रष्टता के बचाव से शुरू होता है, और यह भ्रष्टता पर आधारित होता है; इसलिए, चाहे यह सैद्धान्तिक रूप से कितना भी उचित दिखाई देता हो, मनुष्य के गुस्से का जिक्र परमेश्वर के क्रोध के साथ एक ही समय पर नहीं किया जा सकता है। जब परमेश्वर अपना क्रोध प्रकट करता है, दुष्ट शक्तियों को रोका जाता है, बुरी चीज़ों को नष्ट किया जाता है, जबकि धर्मी और सकारात्मक चीज़ें परमेश्वर की देखरेख एवं सुरक्षा का आनन्द लेती हैं, और उन्हें निरन्तर बढ़ने की अनुमति दी जाती है। परमेश्वर अपने क्रोध को प्रकट करता है क्योंकि अधर्मी, नकारात्मक और बुरी चीज़ें सामान्य गतिविधि और धर्मी एवं सकारात्मक चीज़ों के विकास को बाधित, परेशान या नष्ट करती हैं। परमेश्वर के क्रोध का लक्ष्य उसके स्वयं के सार और पहचान के बचाव के लिए नहीं है, किन्तु धर्मी, सकारात्मक, सुन्दर और अच्छी चीज़ों के अस्तित्व के बचाव के लिए, और मनुष्य के सामान्य रूप से जीवित रहने के नियमों और विधियों के बचाव के लिए है। यह परमेश्वर के क्रोध का मूल कारण है। परमेश्वर का कोप बिल्कुल उचित, स्वाभाविक और उसके स्वभाव का असली प्रकाशन है। उसके क्रोध के पीछे कोई इरादे नहीं हैं, न ही धूर्तता या षडयंत्र हैं; उससे भी बढ़कर, उसके कोप में कोई कामना, चतुराई, द्वेष, हिंसा, बुराई या कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सारी भ्रष्ट मानवजाति में पायी जाती हैं। परमेश्वर द्वारा अपने क्रोध को प्रकट करने से पहले, उसने बिल्कुल स्पष्ट रीति से और पूरी तरह से हर एक मामले के सार को पहले से ही जान लिया है, और उसने पहले से ही सटीक एवं स्पष्ट परिभाषाओं और परिणामों का वर्णन कर दिया है। इस प्रकार, हर कार्य में जिसे वह करता है, परमेश्वर का उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट है, जैसे उसका रवैया स्पष्ट है। उसका दिमाग उलझन में नहीं है; वह अन्धा नहीं है; वह आवेगशील नहीं है; वह लापरवाह नहीं है; उससे बढ़कर, वह सिद्धान्तविहीन नहीं है। यह परमेश्वर के क्रोध का व्यावहारिक पहलू है, और यह परमेश्वर के क्रोध के इस व्यावहारिक पहलू के कारण ही है कि मनुष्य ने अपना सामान्य अस्तित्व हासिल किया है। परमेश्वर के क्रोध के बिना, मनुष्य जीवन जीने की असामान्य दशाओं में पतित हो जाता; सभी चीज़ें जो धर्मी, सुन्दर और अच्छी हैं उन्हें नष्ट कर दिया जाता और वे अस्तित्व में नहीं रहतीं। परमेश्वर के क्रोध के बिना, वे नियम और विधि जो सृष्टि को संचालित करती हैं, उन्हें तोड़ दिया जाता या उन्हें पूरी तरह से पलट दिया जाता। मनुष्य की उत्पत्ति के समय से, परमेश्वर ने मनुष्य के सामान्य अस्तित्व को बचाने और कायम रखने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का निरन्तर इस्तेमाल किया है। चूँकि उसके धर्मी स्वभाव में क्रोध और प्रताप का समावेश है, सभी बुरे लोग, चीज़ें, पदार्थ और समस्त चीज़ें जो मनुष्य के सामान्य अस्तित्व को परेशान करती हैं और क्षति पहुंचाती हैं, उन्हें उसके क्रोध के कारण दण्डित, नियन्त्रित और नष्ट कर दिया जाता है। पिछली अनेक शताब्दियों से, परमेश्वर ने सब प्रकार की अशुद्ध आत्माओं और बुरी आत्माओं को, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं और मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य में शैतान के सहअपराधियों और अनुचरों के समान कार्य करती हैं, मार गिराने और नष्ट करने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का लगातार इस्तेमाल किया है। इस प्रकार, मुनष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर का कार्य उसकी योजना के अनुसार सदैव प्रगति करता गया है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के क्रोध के अस्तित्व के कारण, मनुष्यों के बीच के सर्वाधिक नेक कारण को कभी भी नष्ट नहीं किया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 110

यद्यपि शैतान दयालु, धर्मी और गुणवान प्रतीत होता है, फ़िर भी वह निर्दयी और सार में बुरा है

शैतान जन सामान्य को धोखा देने के जरिए प्रसिद्धि प्राप्त करता है। वह अक्सर स्वयं को धार्मिकता के प्रमुख और आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित करता है। धार्मिकता के बचाव के झण्डे तले, वह मनुष्य को हानि पहुंचाता है, उनके प्राणों को निगल जाता है, और मनुष्य को स्तब्ध करने, धोखा देने और भड़काने के लिए हर प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। उसका लक्ष्य है कि मनुष्य उसके बुरे आचरण को स्वीकार करे और उसका अनुसरण करे, और मनुष्य परमेश्वर के अधिकार और सर्वोच्च सत्ता का विरोध करने में उसके साथ जुड़ जाए। फ़िर भी, जब कोई उसकी चालों, षड्यंत्रों और बुरी युक्तियों को समझ जाता है और नहीं चाहता कि शैतान द्वारा उसे लगातार कुचला जाए और मूर्ख बनाया जाए या वो निरन्तर उसकी गुलामी करे, या उसके साथ दण्डित एवं नष्ट हो जाए, तो शैतान अपने असली दुष्ट, दुराचारी, भद्दे और वहशी चेहरे को प्रकट करने के लिए अपने पहले के संत रुपी चेहरे को बदल देता है और अपने झूठे नकाब को फाड़कर फेंक देता है। उसे उन सभी का विनाश करने में कहीं ज़्यादा खुशी मिलेगी जो उसका अनुसरण करने से इंकार करते हैं और उसकी बुरी शक्तियों का विरोध करते हैं। इस बिन्दु पर शैतान अब से विश्वास योग्य और सभ्य व्यक्ति का रूप धारण नहीं कर सकता है; उसके बजाए, उसके बुरे और असली शैतानी लक्षण प्रकट हो जाते हैं भेड़ की खाल उतर जाती है। जब एक बार शैतान की युक्तियों को प्रकाश में लाया जाता है, जब एक बार उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाता है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाएगा और अपने वहशीपन का खुलासा करेगा; लोगों को नुकसान पहुंचाने और निगल जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र हो जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मनुष्य के जागृत हो जाने से क्रोधित हो गया है; स्वतन्त्रता और प्रकाश की लालसा और अपनी कैद को तोड़कर आज़ाद होने की उनकी आकांक्षा के कारण उसने मनुष्य के प्रति बदले की एक प्रबल भावना को विकसित कर लिया है। उसके क्रोध का अभिप्राय उसकी बुराई का समर्थन करना है, और साथ ही यह उसके जंगली स्वभाव का असली प्रकाशन भी है।

हर एक मामले में, शैतान का आचरण उसके बुरे स्वभाव का खुलासा करता है। उन सभी बुरे कार्यों से जिन्हें शैतान ने मनुष्यों पर क्रियान्वित किया है—उसके आरम्भ के प्रयासों से लेकर उसका अनुसरण करने के लिए मनुष्यों को बहकाने तक, और उसके द्वारा मनुष्य के शोषण तक, जिसके अंतर्गत वह मनुष्य को अपने बुरे कार्यों में खींचता है, और उसके असली लक्षणों का खुलासा कर दिए जाने और मनुष्य द्वारा उसे पहचानने और उसे छोड़ देने के पश्चात् मनुष्य के प्रति शैतान की बदले की भावना तक—कोई भी शैतान के बुरी सार का खुलासा करने से नहीं चूकता है; कोई भी बात उस तथ्य को प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान का सकारात्मक चीज़ों से कोई नाता नहीं है; कोई भी बात यह प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान ही समस्त बुरी चीज़ों का स्रोत है। उसका हर एक कार्य उसकी बुराई का बचाव करता है, उसके बुरे कार्यों की निरन्तरता को बनाए रखता है, धर्मी और सकारात्मक चीज़ों के विरुद्ध जाता है, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के नियमों और विधियों को बर्बाद कर देता है। वे परमेश्वर के विरोधी हैं, और वे ऐसे हैं जिन्हें परमेश्वर का क्रोध नष्ट कर देगा। यद्यपि शैतान के पास उसका अपना क्रोध है, फ़िर भी उसका क्रोध उसके बुरे स्वभाव को प्रकट करने का एक माध्यम है। शैतान के भड़का हुआ और क्रोधित होने का कारण यह है: उसकी अकथनीय युक्तियों का खुलासा कर दिया गया है; उसके षडयन्त्र आसानी से दूर नहीं होते हैं; परमेश्वर का स्थान लेने और परमेश्वर के समान कार्य करने की उसकी वहशी महत्वाकांक्षा और लालसा पर प्रहार किया गया है और उसे रोका गया है; समूची मानवजाति को नियन्त्रित करने का उसका उद्देश्य निष्फल हो गया है और उसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता है। यह परमेश्वर का बार-बार उत्तेजित होनेवाला उसका क्रोध है जिसने शैतान के षडयन्त्रों को सफल होने से रोक दिया है और शैतान की दुष्टता के फैलाव और हिंसात्मक आचरण का पहले से अंत कर दिया है; इसलिए, शैतान परमेश्वर के क्रोध से नफरत करता है और डरता है। परमेश्वर के क्रोध का प्रत्येक इस्तेमाल न केवल शैतान के असली बुरे रूप को बेनकाब करता है; बल्कि वह शैतान की बुरी इच्छाओं को ज्योति में प्रकट भी करता है। उसी समय, मनुष्य के प्रति शैतान के क्रोध की वज़हों का पूरी तरह से खुलासा किया गया है। शैतान के क्रोध का भड़काना उसके बुरे स्वभाव का असली प्रकाशन है, और उसकी युक्तियों का खुलासा है। हाँ वास्तव में, हर बार जब शैतान क्रोधित होता है, तो यह बुरी चीज़ों के विनाश की घोषणा करता है, यह सकारात्मक चीज़ों की सुरक्षा और उनकी निरन्तरता की घोषणा करता है, और यह परमेश्वर के क्रोध की प्रकृति की घोषणा करता है—एक ऐसी प्रकृति जिसे ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 111

परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के लिए किसी को अनुभव और कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए

जब तुम स्वयं को परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का सामना करते हुए पाते हो, तो क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर के वचन में मिलावट है? क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर के क्रोध के पीछे एक कहानी है, और उसके क्रोध में मिलावट है? क्या तुम परमेश्वर पर कलंक लगाओगे, यह कहते हुए कि उसका स्वभाव आवश्यक रूप से पूर्णत: धर्मी नहीं है? परमेश्वर के प्रत्येक कार्य के साथ व्यवहार करते समय, तुम्हें पहले निश्चित होना होगा कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अन्य तत्वों से मुक्त है; कि यह पवित्र और त्रुटिहीन है; इन कार्यों में परमेश्वर द्वारा मनुष्य को मारकर नीचे गिराना, दण्ड देना और नष्ट करना शामिल है। बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर के हर एक कार्य को उसके अंतर्निहित स्वभाव और उसकी योजना के अनुसार सख्ती से बनाया गया है—इसमें मनुष्य का ज्ञान, परम्परा और दर्शनशास्त्र शामिल नहीं है—परमेश्वर का हर एक कार्य उसके स्वभाव और सार का एक प्रकटीकरण है, और किसी भी ऐसी चीज़ से असम्बद्ध है जो भ्रष्ट मनुष्य से सम्बन्धित है। मनुष्य की अवधारणाओं में, मानवजाति के प्रति केवल परमेश्वर का प्रेम, करुणा और सहनशीलता ही दोषरहित, अमिश्रित और पवित्र है। लेकिन, कोई नहीं जानता है कि परमेश्वर का कोप और उसका क्रोध इसी तरह अमिश्रित हैं; इसके अतिरिक्त, परमेश्वर किसी गुनाह को क्यों नहीं सहता है या उसका कोप इतना भयंकर क्यों है, ऐसे प्रश्नों पर किसी ने भी विचार नहीं किया है? इसके विपरीत, कुछ लोग परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मनुष्य का गुस्सा जान कर ग़लती करते हैं; वे परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मनुष्य का कोप समझते हैं; यहाँ तक कि वे भूलवश अनुमान लगाते हैं कि परमेश्वर का कोप मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के स्वाभाविक प्रकाशन के समान ही है। वे भूलवश विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का प्रकट होना भ्रष्ट मनुष्य के क्रोध के समान ही है; जो नाराज़गी से उत्पन्न होता है; वे यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का एक प्रदर्शन है। इस सहभागिता के पश्चात्, मैं आशा करता हूँ कि अब से तुम लोगों में से कोई भी परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर किसी भी प्रकार की ग़लत अवधारणा, कल्पना या अनुमान नहीं रखेगा, और मैं आशा करता हूँ कि मेरे वचनों को सुनने के पश्चात् तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के क्रोध की सच्ची पहचान हो सकती है, तुम लोग परमेश्वर के क्रोध के विषय में पिछले समय की किसी भी ग़लत समझ को किनारे कर सकते हो, तुम लोग अपने ग़लत विश्वास और परमेश्वर के क्रोध के सार के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकते हो। इससे बढ़कर, मैं आशा करता हूँ कि तुम सब अपने हृदयों में परमेश्वर के स्वभाव की एक सटीक परिभाषा पा सकते हो, तुम लोगों के मन में अब से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर कोई सन्देह नहीं होगा, तुम लोग परमेश्वर के सच्चे स्वभाव के ऊपर कोई मानवीय तर्क या अनुमान नहीं थोपोगे। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव परमेश्वर का स्वयं का सच्चा सार है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा कुशलता से आकार दिया गया है या लिखा गया है। उसका धर्मी स्वभाव उसका अपना धर्मी स्वभाव है और इसका सृष्टि की किसी भी चीज़ के साथ कोई सम्बन्ध या नाता नहीं है। परमेश्वर स्वयं ही स्वयं परमेश्वर है। वह कभी भी सृष्टि का एक भाग नहीं बन सकता है, और भले ही वह सृजे गए प्राणियों के बीच एक सदस्य बन जाए, फ़िर भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और सार नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानना नहीं है; यह किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझना है। यदि परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य किसी वस्तु को जानने या किसी व्यक्ति को समझने की अपनी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करता है, तो वह परमेश्वर के ज्ञान को हासिल करने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर को जानना, अनुभव या कल्पना पर भरोसा करना नहीं है, और इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए। भले ही तुम्हारे अनुभव और कल्पना कितने ही समृद्ध क्यों न हों, फिर भी वे सीमित ही रहेंगे; और तो और, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती है, और सच्चाई से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो तो तुम कभी भी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता इस प्रकार है: वह सब ग्रहण करो जो परमेश्वर से आता है, फ़िर धीरे-धीरे उसका अनुभव करो और समझो। एक ऐसा दिन आएगा जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण, सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम सचमुच में उसे समझो और जानो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 112

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी नीनवे के लोगों तक पहुंचती है

आओ, हम दूसरे अंश की ओर आगे बढ़ें, योना की पुस्तक का तीसरा अध्यायः "योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, 'अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।'" ये वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर ने नीनवे के लोगों को बताने के लिए सीधे योना को दिया था। वे स्वाभाविक रूप से वे वचन हैं जिन्हें यहोवा नीनवे के लोगों से कहना चाहता था। ये वचन हमें बताते हैं कि परमेश्वर ने नगर के लोगों से घृणा और नफरत करना शुरू कर दिया था क्योंकि उनकी दुष्टता परमेश्वर की नज़रों में आ गई थी, और इस प्रकार वह इस नगर का नाश करना चाहता था। लेकिन, परमेश्वर नगर को नष्ट करने से पहले नीनवे के नागरिकों के लिए एक घोषणा करेगा, और इसके साथ-साथ वह उन्हें उनकी दुष्टता के लिए पश्चताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने का एक अवसर देगा। यह अवसर चालीस दिन तक रहेगा। दूसरे शब्दों में, यदि नगर के भीतर के लोगों ने चालीस दिनों के भीतर यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप न किया, अपने पापों को न माना या दंडवत न किया, तो परमेश्वर इस नगर को वैसे ही नष्ट करेगा जैसा उसने सदोम को नष्ट किया था। यह वह बात थी जिसे यहोवा परमेश्वर नीनवे के लोगों को बताना चाहता था। स्पष्ट रूप से, यह कोई सामान्य घोषणा नहीं थी। इसने न केवल यहोवा परमेश्वर के क्रोध को व्यक्त किया, बल्कि इसने नीनवे के लोगों के प्रति उसके रवैये को भी सूचित किया था; साथ ही इस सामान्य घोषणा ने नगर के भीतर रहनेवाले लोगों के लिए एक गम्भीर चेतावनी के रूप में भी काम किया था। इस चेतावनी ने उन्हें बताया था कि अपने बुरे कार्यों से उन्होंने यहोवा परमेश्वर की नफरत को अर्जित किया था, और इसने उन्हें बताया था कि उनके बुरे कार्य शीघ्र ही उन्हें उनके सम्पूर्ण विनाश के कगार पर पहुंचा देंगे; इसलिए, नीनवे में हर एक का जीवन विनाश के अत्यंत निकट था।

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी के प्रति नीनवे और सदोम की प्रतिक्रिया में स्पष्ट अन्तर

उलट दिए जाने का क्या अर्थ है? बोलचाल की भाषा में, इसका अर्थ है लोप हो जाना। परन्तु किस प्रकार से? कौन एक नगर को पूर्ण रूप से उलट सकता है? किसी मनुष्य के लिए ऐसा काम करना असम्भव है, हाँ वास्तव में। ये लोग कोई मूर्ख नहीं थे; ज्यों ही उन्होंने इस घोषणा को सुना, त्यों ही वे इसके अभिप्राय को समझ गये। वे जानते थे कि यह परमेश्वर की ओर से आया था; वे जानते थे कि परमेश्वर अपना कार्य करने जा रहा था; वे जानते थे कि उनकी दुष्टता ने यहोवा परमेश्वर को क्रोधित किया और उसके क्रोध को उनके ऊपर उतारा था; जिससे वे शीघ्र ही अपने नगर के साथ नष्ट हो जाने वाले थे। यहोवा परमेश्वर की चेतावनी को सुनने के पश्चात् नगर के लोगों ने किस प्रकार बर्ताव किया था? बाइबल राजा से लेकर एक आम आदमी तक, इन सभी लोगों की प्रतिक्रिया का बहुत ही विस्तार से वर्णन करती है। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: "तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: 'क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। ...'"

यहोवा परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने एक ऐसे रवैये का प्रदर्शन किया जो सदोम के लोगों से पूरी तरह विपरीत था—सदोम के लोगों ने खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध किया, और बुरे से बुरा कार्य करते चले गए, परन्तु इन वचनों को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने इस विषय को नज़रअंदाज़ नहीं किया, न ही उन्होंने प्रतिरोध किया; उसके बजाए उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया और उपवास की घोषणा की। "विश्वास किया" क्या संकेत करता है? यह शब्द स्वतः ही विश्वास और समर्पण की ओर संकेत करता है। यदि हम इस शब्द का वर्णन करने के लिए नीनवे के नागरिकों के वास्तविक व्यवहार का उपयोग करते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि उन्होंने विश्वास किया कि परमेश्वर ने जैसा कहा था वैसा वह कर सकता है और करेगा, और वे पश्चाताप करने के लिए तैयार थे। क्या नीनवे के लोग सन्निकट विनाश के सामने भय महसूस करते थे? यह उनका विश्वास था जिसने उनके हृदयों में भय डाला था। ठीक है, तो नीनवे के लोगों के विश्वास और भय को प्रमाणित करने के लिए हम क्या उपयोग कर सकते है? यह वैसा ही है जैसा बाइबल कहती हैः "और उन्होंने उपवास का प्रचार किया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा।" कहने का तात्पर्य है कि नीनवे के लोगों ने सचमुच में विश्वास किया था, और इस विश्वास से भय उत्पन्न हुआ, जिसने उसके बाद उपवास करने और टाट ओढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इस प्रकार से उन्होंने अपने आरम्भिक पश्चाताप को दिखाया था। सदोम के लोगों के बिल्कुल विपरीत, नीनवे के लोगों ने न केवल परमेश्वर का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने व्यवहार और कार्यों के जरिए स्पष्ट रुप से अपने पश्चाताप को भी दिखाया था। नि:संदेह, यह केवल नीनवे के आम लोगों के लिए नहीं था; उनका राजा भी इससे अछूता नहीं था।

नीनवे के राजा का पश्चाताप यहोवा परमेश्वर की प्रशंसा पाता है

जब नीनवे के राजा ने यह सन्देश सुना, वह अपने सिंहासन से उठा खड़ा हुआ, अपने वस्त्र उतार डाले, टाट पहन लिया और राख में बैठ गया। तब उसने घोषणा की कि नगर में किसी को भी कुछ भी चखने की अनुमति नहीं दी जाएगी, कोई मवेशी, भेड़-बकरी, और बैल घास नहीं चरेगा और पानी नहीं पिएगा। मनुष्य और पशु दोनों को एक समान टाट ओढ़ना था; लोग बड़ी लगन से परमेश्वर से विनती करेंगे। साथ ही राजा ने भी घोषणा की कि उनमें से हर एक अपने बुरे मार्गों से फिरे और अपने उपद्रव के कार्यों को छोड़ दे। पश्चाताप के कार्यों की इस श्रृंखला को देखते हुए, नीनवे के राजा ने अपने हृदय से पश्चाताप का प्रदर्शन किया। उसने एक के बाद एक जो कार्य किये—अपने सिंहासन से उठना, अपने राजकीय वस्त्र को उतारना, टाट ओढ़ना और राख में बैठ जाना—यह लोगों को बताती है कि नीनवे के राजा ने अपने शाही रुतबे को दरकिनार कर आम लोगों के साथ टाट ओढ़ लिया था। कहने का तात्पर्य है कि नीनवे का राजा यहोवा परमेश्वर से आई घोषणा को सुनने के पश्चात् अपने बुरे मार्ग या अपने उपद्रव के कार्यों को जारी रखने के लिए अपने शाही पद जमा नहीं रहा; उसके बजाए, उसने उस अधिकार को किनारे रख दिया जो उसके पास था और यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप किया। इस समय नीनवे का राजा, एक राजा के समान पश्चाताप नहीं कर रहा था; वह परमेश्वर की एक सामान्य प्रजा के रूप में अपने पापों का अंगीकार करने और पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आया था। उसके अलावा, उसने पूरे शहर से भी कहा कि वे उसके समान यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें; इसके अतिरिक्त, उसके पास एक विशिष्ट योजना थी कि ऐसा कैसे करना है, जैसा पवित्र शास्त्र में देखा जाता है: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। ... और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें।" नगर का शासक होने के नाते, नीनवे का राजा उच्चतम पद और सामर्थ्य धारण करता था और जो वह चाहता था कर सकता था। जब उसने यहोवा परमेश्वर की घोषणा को सामने पाया, तो वह उस मामले को नज़रअंदाज़ कर सकता था या बस यों ही अकेले अपने पापों का पश्चाताप और अंगीकार कर सकता था; जहाँ तक यह बात है कि उस शहर के लोगों ने पश्चाताप करने का चयन किया था या नहीं, वह उस मामले की पूर्ण रूप से उपेक्षा कर सकता था। फ़िर भी, नीनवे के राजा ने ऐसा कतई नहीं किया। वह न केवल अपने सिंहासन पर से उठा, बल्कि टाट एवं राख को ओढ़ा और यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप किया, उसने अपने नगर के भीतर के सभी लोगों और पशुओं को भी ऐसा करने का आदेश दिया। यहाँ तक कि उसने लोगों को आदेश दिया कि "परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दो।" कार्यों की इस श्रृंखला के जरिए, नीनवे के राजा ने सचमुच में वो हासिल किया जिसे एक शासक को करना चाहिए; उसके द्वारा किये गये कार्यों को करना मानव इतिहास में किसी भी राजा के लिए कठिन था, साथ ही यह एक ऐसी चीज़ भी है जो कोई भी नहीं कर पाया था। इन कार्यों को मानव इतिहास में अभूतपूर्व उद्यम कहा जा सकता है; वे इस योग्य हैं कि मानवजाति के द्वारा उनका उत्सव मनाया और अनुकरण किया जाए। मनुष्य के अरुणोदय के समय से ही, प्रत्येक राजा ने परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करने में अपनी प्रजा की अगुवाई की थी। किसी ने भी अपनी दुष्टता के निमित्त छुटकारे की खोज करने के लिए, यहोवा परमेश्वर की क्षमा पाने के लिए और सन्निकट दण्ड से बचने के लिए परमेश्वर से विनती करने हेतु अपनी प्रजा की अगुवाई नहीं की थी। फ़िर भी, नीनवे का राजा अपनी प्रजा को परमेश्वर की ओर ले जाने में, अपने अपने बुरे मार्गों को छोड़ने में और उपद्रव के कार्यों को रोकने में समर्थ था। इससे बढ़कर, वह अपने सिंहासन को छोड़ने के लिए भी समर्थ था, और इसके बदले, यहोवा परमेश्वर अपने फैसले से फ़िर गया, उसने अपना मन बदल लिया और उसने अपना क्रोध त्याग दिया, और उस नगर के लोगों को जीवित रहने की अनुमति दी और उन्हें सर्वनाश से बचा लिया। इस राजा के कार्यों को मानव इतिहास में केवल एक दुर्लभ आश्चर्य कर्म ही कहा जा सकता है; यहाँ तक कि उन्हें भ्रष्ट मनुष्यों का आदर्श भी कहा जा सकता है जो परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 113

योना 3 तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा: "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्‍ट होने से बच जाएँ।" जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

परमेश्वर नीनवे के नागरिकों के हृदय की गहराइयों में सच्चा पश्चाताप देखता है

परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के राजा और उसकी प्रजा ने कार्यों की एक श्रंखला को अंजाम दिया। उनके व्यवहार और कार्यों की प्रकृति क्या है? दूसरे शब्दों में, उनके समग्र चाल चलन का सार-तत्व क्या है? जो कुछ उन्होंने किया वो क्यों किया? परमेश्वर की नज़रों में उन्होंने सच्चाई से पश्चाताप किया था, न केवल इसलिए क्योंकि उन्होंने पूरी लगन से परमेश्वर से प्रार्थना की थी और उसके सम्मुख अपने पापों का अंगीकार किया था, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने बुरे व्यवहार का परित्याग कर दिया था। उन्होंने इस तरह से कार्य किया था क्योंकि परमेश्वर के वचनों को सुनने के पश्चात्, वे अविश्वसनीय रूप से भयभीत थे और यह विश्वास करते थे कि वह वही करेगा जैसा उसने कहा है। उपवास करने, टाट पहनने और राख में बैठने के द्वारा, वे अपने मार्गों का पुन: सुधार करना, दुष्टता से अलग रहने की अपनी तत्परता को प्रकट करना, यहोवा परमेश्वर के क्रोध को रोकने के लिए उससे प्रार्थना करना, और अपने निर्णय साथ ही साथ उस विपत्ति को वापस लेने के लिए यहोवा परमेश्वर से विनती करना चाहते थे जो उन पर आने ही वाली थी। उनके सम्पूर्ण चालचलन को जाँचने से हम देख सकते हैं कि वे पहले से ही समझ गए थे कि उनके पहले के बुरे काम यहोवा परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे और वे उस कारण को समझ गए थे कि वह क्यों उन्हें शीघ्र नष्ट कर देगा। इन कारणों से, वे सभी पूर्ण रूप से पश्चाताप करना, अपने बुरे मार्गों से फिरना और उपद्रव के कार्यों का परित्याग करना चाहते थे। दूसरे शब्दों में, जब एक बार उन्हें यहोवा परमेश्वर की घोषणा के बारे में पता चल गया, तब उनमें से हर एक ने अपने हृदय में भय महसूस किया; उन्होंने आगे से अपने बुरे आचरण को निरन्तर जारी नहीं रखा और न ही उन कार्यों को करते रहे जिनसे यहोवा परमेश्वर घृणा करता था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यहोवा परमेश्वर से अपने पिछले पापों को क्षमा करने के लिए और उनके पापों के अनुसार उनसे बर्ताव नहीं करने के लिए विनती की थी। वे दोबारा दुष्टता में कभी संलग्न न होने के लिए और यहोवा परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार थे, वे फ़िर कभी यहोवा परमेश्वर को क्रोध नहीं दिलाएँगे। उनका पश्चाताप सच्चा और सम्पूर्ण था। यह उनके हृदय की गहराइयों से आया था और यह बनावटी नहीं था, और न ही थोड़े समय का था।

जब एक बार नीनवे के लोग, सर्वोच्च राजा से लेकर उसकी प्रजा तक, यह जान गए कि यहोवा परमेश्वर उनसे क्रोधित था, तो उनका हर एक कार्य, उनका सम्पूर्ण व्यवहार, साथ ही साथ उनका हर एक निर्णय और चुनाव परमेश्वर की दृष्टि में स्पष्ट और साफ थे। परमेश्वर का हृदय उनके व्यवहार के अनुसार बदल गया। ठीक उस क्षण परमेश्वर की मनःस्थिति क्या थी? बाइबल तुम्हारे उस प्रश्न का उत्तर दे सकती है। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: "जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।" यद्यपि परमेश्वर ने अपना मन बदल लिया था, फ़िर भी उसकी मनःस्थिति बिल्कुल भी जटिल नहीं थी। उसने बस अपने क्रोध को प्रकट किया, फिर अपने क्रोध को शांत किया, और फ़िर नीनवे शहर के ऊपर उस विपत्ति को न लाने का निर्णय लिया। परमेश्वर के निर्णय—उस विपत्ति से नीनवे के नागरिकों को बख्श देना—के इतना शीघ्र होने का कारण यह है कि परमेश्वर ने नीनवे के हर एक व्यक्ति के हृदय का अवलोकन किया था। उसने देखा कि उनके हृदय की गहराइयों में क्या था: अपने पापों के लिए उनका सच्चा अंगीकार और पश्चाताप, परमेश्वर में उनका सच्चा विश्वास, उनकी गहरी समझ कि कैसे उनके बुरे कार्यों ने उसके स्वभाव को क्रोधित किया, और यहोवा परमेश्वर के सन्निकट दण्ड के परिणाम स्वरूप उत्पन्न भय। साथ ही, यहोवा परमेश्वर ने उनके हृदय की गहराइयों से निकली उनकी प्रार्थनाओं को सुना जो उससे विनती कर रहे थे कि वह उनके विरुद्ध अपने क्रोध को रोक दे जिससे वे इस विपत्ति से बच सकें। जब परमेश्वर ने इन सभी तथ्यों का अवलोकन कर किया, तो थोड़ा-थोड़ा करके उसका क्रोध जाता रहा। इसके बावजूद कि उसका क्रोध पहले कितना विशाल था, जब उसने इन लोगों के हृदय की गहराइयों में सच्चा पश्चाताप देखा तो इसने उसके हृदय को छू लिया, और इसलिए वह उनके ऊपर विपत्ति नहीं डालना चाहता था, और उसने उन पर क्रोध करना बंद कर दिया। इसके बजाए उसने लगातार उनके प्रति करुणा और सहनशीलता का विस्तार किया और लगातार उनका मार्गदर्शन और उनकी आपूर्ति की।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 114

योना 3 तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा: "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्‍ट होने से बच जाएँ।" जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

यदि परमेश्वर में तेरा विश्वास सच्चा है, तो तू अक्सर उसकी देखरेख को प्राप्त करेगा

नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के द्वारा अपने इरादों को बदलने में कोई संकोच या अस्पष्टता शामिल नहीं है। इसके बजाए, यह शुद्ध-क्रोध से शुद्ध-सहनशीलता में हुआ एक रूपान्तरण था। यह परमेश्वर के सार का एक सच्चा प्रकाशन है। परमेश्वर अपने कार्यों में कभी अस्थिर या संकोची नहीं होता है; उसके कार्यों के पीछे के सिद्धान्त और उद्देश्य स्पष्ट, पारदर्शी, शुद्ध और दोषरहित होते हैं, जिसमें कोई धोखा या षड्यंत्र बिल्कुल भी नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के सार में कोई अंधकार या बुराई शामिल नहीं होती है। परमेश्वर नीनवे के नागरिकों से इसलिए क्रोधित हो गया था क्योंकि उनकी दुष्टता के कार्य उसकी नज़रों में आ गए थे; उस वक्त उसका क्रोध उसके सार से निकला था। फ़िर भी, जब परमेश्वर का क्रोध जाता रहा और उसने नीनवे के लोगों पर एक बार फ़िर से सहनशीलता दिखाई, तो वह सब कुछ जो उसने प्रकट किया था वह भी उसका स्वयं का सार था। यह सम्पूर्ण परिवर्तन परमेश्वर के प्रति मनुष्य के रवैये में हुए बदलाव के कारण है। इस सम्पूर्ण अवधि के दौरान, उल्लंघन न किया जा सकने वाला परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदला; परमेश्वर का सहनशील सार नहीं बदला; परमेश्वर का प्रेमी और करुणामय सार नहीं बदला। जब लोग दुष्टता के काम करते हैं और परमेश्वर को ठेस पहुंचाते हैं, तो वह अपना क्रोध उन पर लाता है। जब लोग सचमुच में पश्चाताप करते हैं, तो परमेश्वर का हृदय बदलेगा, और उसका क्रोध थम जाएगा। जब लोग हठी होकर निरन्तर परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो उसका क्रोध निरन्तर जारी रहेगा; उसका क्रोध थोड़ा-थोड़ा करके उन पर तब तक दबाव बनाता जाएगा जब तक वे नष्ट नहीं हो जाते हैं। यह परमेश्वर के स्वभाव का सार है। परमेश्वर चाहे क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया एवं करुणा, यह मनुष्य के हृदय की गहराइयों में परमेश्वर के प्रति उसका आचरण, व्यवहार और रवैया ही है जो यह तय करता है कि परमेश्वर के स्वभाव के प्रकाशन के माध्यम से क्या व्यक्त होगा। यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को निरन्तर अपने क्रोध के अधीन रखता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति का हृदय परमेश्वर का विरोध करेगा। क्योंकि उसने कभी भी परमेश्वर के सम्मुख सचमुच में पश्चाताप नहीं किया है, अपना सिर नहीं झुकाया या परमेश्वर में सच्चा विश्वास धारण नहीं किया है, और उसने कभी भी परमेश्वर की दया और सहनशीलता को हासिल नहीं किया है। यदि कोई व्यक्ति अक्सर परमेश्वर की देखरेख को प्राप्त करता है, और अक्सर उसकी करुणा और सहनशीलता को हासिल करता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति के पास अपने हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा विश्वास है, और उसका हृदय परमेश्वर के विरुद्ध नहीं है। वह प्रायः परमेश्वर के सम्मुख पश्चाताप करता है; इसलिए, भले ही परमेश्वर का अनुशासन अक्सर इस व्यक्ति के ऊपर आए, फ़िर भी उसका क्रोध नहीं आएगा।

यह संक्षिप्त उल्लेख, लोगों को परमेश्वर के हृदय को देखने, उसके सार की यथार्थता को देखने, और यह देखने देता है कि परमेश्वर का क्रोध और उसके हृदय के बदलाव बेवज़ह नहीं हैं। इस अति स्पष्ट अन्तर के बावजूद जिसे परमेश्वर ने तब प्रदर्शित किया था जब वह क्रोधित था और जब उसने अपना हृदय बदल लिया था, जिससे लोगों को यह लगता है कि परमेश्वर के सार के इन दोनों पहलुओं—उसका क्रोध और उसकी सहनशीलता—के बीच बहुत दूरी है और एक बड़ा अन्तर है। नीनवे के लोगों के पश्चाताप के प्रति परमेश्वर का रवैया एक बार फ़िर से लोगों को परमेश्वर के सच्चे स्वभाव के अन्य पहलू को देखने देता है। परमेश्वर के हृदय के बदलाव ने सचमुच में एक बार फ़िर से मनुष्य को परमेश्वर की दया और करुणा की सच्चाई को देखने और परमेश्वर के सार के सच्चे प्रकाशन को देखने दिया है। मनुष्य को बस यह जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर की दया और करुणा पौराणिक कथाएं नहीं हैं, और न ही उन्हें मन से गढ़ा गया है। यह इसलिए है क्योंकि उस घड़ी परमेश्वर की भावनाएं सच्ची थीं; परमेश्वर के हृदय का बदलाव सच्चा था; परमेश्वर ने वास्तव में एक बार फ़िर से मनुष्य के ऊपर अपनी दया और करुणा को अर्पित किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 115

योना 3 तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा: "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्‍ट होने से बच जाएँ।" जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

नीनवे के लोगों के हृदयों में सच्चे पश्चाताप से उन्होंने परमेश्वर की दया को प्राप्त किया और उसने उनके अंत को बदल दिया

क्या परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके क्रोध के बीच कोई परस्पर विरोध था? नहीं, बिल्कुल भी नहीं! यह इसलिए है क्योंकि उस विशेष समय पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। इसका कारण क्या हो सकता है? इसका कारण वह है जिसे बाइबल में दिया गया है: "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फ़िर गया," और "अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।"

यह "कुमार्ग" कुछ मुटठीभर बुरे कार्यों की ओर संकेत नहीं करता है, परन्तु लोगों के व्यवहार के पीछे पाए जाने वाले बुरे स्रोत की ओर संकेत करता है। "अपने कुमार्ग से फ़िर जाना" इसका अर्थ है कि संबंधित लोग कभी भी इन कार्यों को दोबारा नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे पुन: इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; वह तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और उनके कार्यों का सिद्धान्त सब बदल चुका है; वे अपने हृदय में आनन्द और प्रसन्नता को लाने के लिए पुनः उन तरीकों और सिद्धान्तों का उपयोग कभी नहीं करेंगे। "हाथों के उपद्रव को त्याग देना" में "त्याग देना" का अर्थ है त्याग देना या छोड़ देना, बीते कल से पूर्ण रूप से नाता तोड़ देना और उस ओर कभी न फिरना। जब नीनवे के लोगों ने अपने हाथों का उपद्रव त्याग दिया, तो इसने उनके सच्चे पश्चाताप को प्रमाणित और साथ ही साथ प्रदर्शित भी किया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप और साथ ही साथ उनके हृदय का भी अवलोकन करता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के हृदयों में निश्चित सच्चे पश्चाताप को देखा, साथ ही यह भी देखा कि वे अपने कुमार्ग से फ़िर गए हैं और उन्होंने अपने हाथों के उपद्रव को त्याग दिया है, तो उसने अपना मन बदल लिया। कहने का तात्पर्य है कि इन लोगों के चालचलन, व्यवहार और कार्य करने के विभिन्न तरीकों ने, साथ ही साथ उनके हृदय के सच्चे अंगीकार और पापों के पश्चाताप ने, परमेश्वर को प्रेरित किया कि वह अपने मन को बदल दे, अपने इरादों को बदल दे, अपने निर्णय को वापस ले ले, और उन्हें दण्ड न दे या नष्ट न करे। इस प्रकार, नीनवे के लोगों ने एक अलग अंत को प्राप्त किया। उन्होंने अपने जीवन को छुड़ाया साथ ही परमेश्वर की दया और करुणा को जीत लिया, इस बिन्दु पर परमेश्वर ने भी अपने क्रोध को वापस ले लिया।

परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता दुर्लभ नहीं है—मनुष्य का सच्चा पश्चाताप दुर्लभ है

परमेश्वर नीनवे के लोगों से बहुत क्रोधित था, उसके बावजूद भी, ज्यों ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, त्यों ही उसका हृदय धीरे-धीरे कोमल होता गया, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने उनके लिए घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—अपने पापों के निमित्त उनके अंगीकार और पश्चाताप के कुछ समय पहले—परमेश्वर तब भी उन से क्रोधित था। जब एक बार उन्होंने पश्चाताप के कई कार्य किये, तो नीनवे के लोगों के निमित्त परमेश्वर का क्रोध धीरे-धीरे उनके लिए दया और सहनशीलता में रूपान्तरित हो गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दोनों पहलुओं के प्रकाशन का एक साथ मिलने के विषय में कोई विरोधाभास नहीं है। किसी व्यक्ति को विरोधाभास की इस कमी को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों के पश्चाताप के साथ परमेश्वर ने एक के बाद एक इन दोनों एकदम विपरीत सारों को प्रकट और प्रकाशित किया, जिसने लोगों को परमेश्वर के सार की यथार्थता और उसके उल्लंघन न किए जा सकने वाले गुण को देखने दिया। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया: ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बर्दाश्त नहीं करता है, या वह उन पर दया करना नहीं चाहता है; यह ऐसा है कि वे कभी कभार ही परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप करते हैं, और ऐसा कभी कभार ही होता है कि लोग सचमुच में अपने कुमार्ग से फिरते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्यागते हैं। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित हो जाता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सचमुच में पश्चाताप करने में समर्थ होगा, और वह मनुष्य के सच्चे पश्चाताप को देखना चाहता है, इस दशा में वह उदारता से मनुष्य पर अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा चालचलन परमेश्वर के क्रोध को उनके ऊपर लाता है, जबकि परमेश्वर की दया और करुणा को उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो परमेश्वर को ध्यान से सुनते हैं और सचमुच में उसके सम्मुख सच्चा पश्चाताप करते हैं, और इसे उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो अपने कुमार्ग से फिर जाते हैं और अपने हाथों के उपद्रव का त्याग कर देते हैं। नीनवे के लोगों प्रति अपने व्यवहार में परमेश्वर के रवैये को बिल्कुल साफ़-साफ़ प्रकाशित किया गया है: परमेश्वर की दया और सहनशीलता को प्राप्त करना बिल्कुल भी कठिन नहीं है; वह एक व्यक्ति से सच्चे पश्चाताप की अपेक्षा करता है। जब तक लोग अपने कुमार्गों से दूर रहते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्याग देते हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति अपने हृदय और अपने रवैये को बदलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 116

सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव सच्चा और स्पष्ट है

जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के वास्ते अपने मन को बदल लिया, तो क्या उसकी करुणा और सहनशीलता एक दिखावा थी? नहीं, बिल्कुल भी नहीं! फ़िर एक ही मुद्दे के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के दोनों पहलुओं के बीच का रूपान्तरण तुम्हें क्या देखने देता है? परमेश्वर का स्वभाव पूरी तरह से सम्पूर्ण है; यह बिल्कुल भी खण्डित नहीं है। चाहे वह लोगों के प्रति क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया एवं सहनशीलता, यह सब उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर का स्वभाव सच्चा एवं सुस्पष्ट है। वह अपने विचारों और रवैयों को चीज़ों के विकास अनुसार बदलता है। नीनवे के निवासियों के प्रति उसके रवैये का रूपान्तरण मनुष्यों को बताता है कि उसके पास अपने स्वयं के विचार और युक्तियां हैं; वह रोबोट या मिट्टी का कोई पुतला नहीं है, परन्तु स्वयं जीवित परमेश्वर है। वह नीनवे के लोगों से क्रोधित हो सकता था, ठीक उसी तरह जैसे वह उनके रवैये के अनुसार उनके अतीत को क्षमा कर सकता था; वह नीनवे के लोगों के ऊपर दुर्भाग्य लाने का निर्णय ले सकता था, और वह उनके पश्चाताप के कारण अपना निर्णय बदल सकता था। लोग यांत्रिक रूप से नियमों को लागू करना, और ऐसे नियमों का सीमांकन करने तथा परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए ठीक उसी तरह नियमों का उपयोग करना पसंद करते हैं, जैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने के लिए सूत्रों का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए, मानवीय विचारों के आयाम के अनुसार, परमेश्वर विचार नहीं करता, और न ही उसके पास कोई स्वतन्त्र योजनाएँ हैं। असलियत में, परमेश्वर के विचार चीज़ों और वातावरण में परिवर्तन के अनुसार निरन्तर रूपान्तरित हो रहे हैं; जब तक ये विचार रूपान्तरित हो रहे हैं, परमेश्वर के अस्तित्व के विभिन्न पहलू प्रकट होंगे। रूपान्तरण की इस प्रक्रिया के दौरान, उस घड़ी जब परमेश्वर अपना मन बदलता है, तब वह मानवजाति पर अपने जीवन के अस्तित्व की सच्चाई को प्रकट करता है, और वह यह प्रकट करता है कि उसका धर्मी स्वभाव सच्चा और सुस्पष्ट है। इससे बढ़कर, परमेश्वर मानवजाति के प्रति अपने क्रोध, अपनी दया, करुणा और सहनशीलता के अस्तित्व के सत्य को प्रमाणित करने के लिए अपने सच्चे प्रकटीकरणों का उपयोग करता है। उसके सार को चीज़ों के विकास के अनुसार किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जाएगा। वह एक सिंह का क्रोध भी धारण करता है और माता की ममता एवं सहनशीलता भी। किसी मनुष्य को उसके धर्मी स्वभाव पर प्रश्न करने, उसका उल्लंघन करने, उसे बदलने या तोड़ने मरोड़ने की अनुमति नहीं है। समस्त मुद्दों और सभी चीज़ों के मध्य, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को, अर्थात्, परमेश्वर का क्रोध एवं उसकी करुणा को, किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जा सकता है। परमेश्वर प्रकृति के हर एक कोने एवं छिद्र में इन पहलुओं को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है और हर पल स्पष्ट रूप से उन्हें अंजाम देता है। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समय या अन्तराल के द्वारा सीमित नहीं है, या दूसरे शब्दों में, समय या अन्तराल की सीमाओं के द्वारा तय तरीके से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को यांत्रिक रूप से प्रकट या प्रकाशित नहीं किया जाता है। उसके बजाए, परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी समय और स्थान में स्वतन्त्र रूप से प्रकट और प्रकाशित होता है। जब तुम परमेश्वर को अपना मन बदलते और अपने क्रोध को थामते और नीनवे के लोगों का नाश करने से पीछे हटते हुए देखते हो, तो क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर केवल दयालु और प्रेमी है? क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर का क्रोध खोखले वचनों से बना है? जब परमेश्वर प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है और अपनी दया को वापस ले लेता है, तो क्या तुम कह सकते हो कि वह मनुष्यों के प्रति किसी सच्चे प्रेम का एहसास नहीं करता है? परमेश्वर लोगों के बुरे कार्यों के प्रत्युतर में प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है; उसका क्रोध दोषपूर्ण नहीं है। परमेश्वर का हृदय लोगों के पश्चाताप के द्वारा द्रवित हो जाता है, और यह वही पश्चाताप है जो इस तरह उसके हृदय को बदल देता है। उसका द्रवित होना, मनुष्य के प्रति उसके हृदय का बदलाव साथ ही साथ उसकी दया और सहनशीलता पूर्ण रूप से दोषमुक्त है; वह साफ, स्वच्छ, निष्कलंक और अमिश्रित है। परमेश्वर की सहनशीलता विशुद्ध रूप से सहनशीलता है; उसकी दया विशुद्ध रूप से दया है। उसका स्वभाव मनुष्य के पश्चाताप और उसके विभिन्न चाल-चलन के अनुसार क्रोध प्रकट करेगा, साथ ही साथ दया एवं सहनशीलता को प्रकट करेगा। चाहे वह जो भी प्रकट या प्रकाशित करता हो, सब कुछ पूरी तरह पवित्र है; यह पूरी तरह प्रत्यक्ष है; उसका सार सृष्टि की किसी भी चीज़ से विशिष्ट है। कार्यों के वे सिद्धान्त जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता है, उसके विचार एवं योजनाएँ या कोई विशेष निर्णय, साथ ही साथ हर एक कार्य, किसी भी प्रकार की त्रुटियों या दागों से स्वतन्त्र है। जैसा परमेश्वर निर्णय लेता है, वह वैसा ही करता है, और इस रीति से वह अपने उद्यमों को पूरा करता है। इस प्रकार के परिणाम ठीक और दोषरहित हैं क्योंकि उनका स्रोत दोषरहित और निष्कलंक है। परमेश्वर का क्रोध दोषमुक्त है। इसी प्रकार, परमेश्वर की दया और सहनशीलता, जिसे किसी सृजन के द्वारा धारण नहीं किया जाता है, वे पवित्र एवं निर्दोष हैं, और वे सोच विचार और अनुभव किए जाने पर खरे उतरने में समर्थ हैं।

नीनवे की कहानी को समझने के पश्चात्, क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के सार के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या तुम सब परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या मनुष्यों के मध्य कोई इस प्रकार का स्वभाव धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान इस प्रकार का क्रोध धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान दया और सहनशीलता धारण करता है? सृष्टि के मध्य ऐसा कौन है जो इतना अधिक क्रोध कर सकता है और मानवजाति को नष्ट करने या उसके ऊपर विपत्ति लाने का निर्णय ले सकता है? और करुणा प्रदान करने, मनुष्यों को सहने और क्षमा करने, और मनुष्य को नष्ट करने के निर्णय को बदलने के योग्य कौन है? सृष्टिकर्ता अपनी स्वयं की अनोखी पद्धतियों और सिद्धान्तों के माध्यम से अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करता है; वह लोगों, घटनाओं या चीज़ों के नियन्त्रण या प्रतिबन्ध के अधीन नहीं है। उसके अद्वितीय स्वभाव के साथ, कोई भी उसके विचारों और उपायों को बदलने में समर्थ नहीं है, न ही कोई उसे मनाने में और उसके निर्णयों को बदलने में समर्थ है। सृष्टि के व्यवहार और विचारों की सम्पूर्णता उसके धर्मी स्वभाव के न्याय के अधीन अस्तित्व में रहती है। वह क्रोध करेगा या दया, इसे कोई भी नियन्त्रित नहीं कर सकता है; केवल सृष्टिकर्ता का सार—या दूसरे शब्दों में, सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव—ही इसका निर्णय ले सकता है। सृष्टिकर्ता के धर्मी स्वभाव की अद्वितीय प्रकृति यही है!

जब हम ने एक बार नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये में रूपान्तरण का विश्लेषण कर लिया है और समझ लिया है, तो क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव में पाई जानेवाली दया का वर्णन करने के लिए "अद्वितीय" शब्द का उपयोग करने में समर्थ हो? हम ने पहले कहा था कि परमेश्वर का क्रोध उसके अद्वितीय धर्मी स्वभाव के सार का एक पहलू है। अब मैं दो पहलुओं, परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर की दया, को उसके धर्मी स्वभाव के रूप में परिभाषित करूंगा। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव पवित्र है; यह अनुल्लंघनीय साथ ही साथ निर्विवादित भी है; यह कुछ ऐसा है जिसे सृजित या असृजित वस्तुओं के मध्य कोई भी धारण नहीं कर सकता है। यह परमेश्वर के लिए अद्वितीय और अतिविशेष दोनों है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का क्रोध पवित्र और अनुल्लंघनीय है। उसी भाँति, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अन्य पहलू—परमेश्वर की दया—पवित्र है और उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। सृजित या असृजित वस्तुओं में से कोई भी परमेश्वर के कार्यों में उसका स्थान नहीं ले सकता है या उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और न ही कोई सदोम के विनाश या नीनवे के उद्धार में परमेश्वर का स्थान ले सकता है या उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 117

मानवजाति के प्रति सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाएं

लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फ़िर भी, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुल भी कठिन विषय नहीं है, क्योंकि वह बार-बार मनुष्य को अपने कार्यों का गवाह बनने देता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है; उसने कभी भी मनुष्य से अपने आपको गुप्त नहीं रखा है, न ही उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचारों, उसके उपायों, उसके वचनों और उसके कार्यों को मानवजाति के लिए पूरी तरह से प्रकाशित किया गया है। इसलिए, जब तक मनुष्य परमेश्वर को जानने की कामना करता है, वह सभी प्रकार के माध्यमों और पद्धतियों के जरिए उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य का आँखें मूंदकर यह सोचने का कि परमेश्वर ने जानबूझकर उससे परहेज किया है, कि परमेश्वर ने जानबूझकर स्वयं को मनुष्य से छिपाया है, कि परमेश्वर का मनुष्य को परमेश्वर को समझने या जानने देने का कोई इरादा नहीं है, कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझने की इच्छा करता है; उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कार्यों की परवाह नहीं करता है...। सच कहूँ तो, यदि कोई सृष्टिकर्ता के वचनों या कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने और समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और सृष्टिकर्ता के विचारों एवं उनके हृदय की वाणी पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो उन्हें यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कार्य दृश्यमान और पारदर्शी हैं। उसी प्रकार, यह महसूस करने में उन्हें बस थोड़ा सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य में है, कि वह मनुष्य और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ हमेशा से वार्तालाप में है, और वह प्रतिदिन नए कार्य कर रहा है। उसके सार और स्वभाव को मनुष्य के साथ उसके संवाद में प्रकट किया गया है; उसके विचारों और उपायों को उसके कार्यों में पूरी तरह से प्रकट किया गया है; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसे ध्यान से देखता है। वह ख़ामोशी से अपने शांत वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है: मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...। उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे बलवान हैं, उसके कदम हल्के हैं, उसकी आवाज़ कोमल और अनुग्रहकारी है; उसका स्वरूप हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है, और समूची मानवजाति का आलिंगन करता है; उसका मुख सुन्दर और सौम्य है। वह छोड़कर कभी नहीं गया, और न ही वह गायब हुआ है। रात-दिन, वह मानवजाति का निरन्तर साथी है, उसका पक्ष कभी नहीं छोड़ता है। मनुष्यों के लिए उसकी समर्पित देखभाल और विशेष स्नेह, साथ ही साथ मनुष्य के लिए उसकी सच्ची चिंता और प्रेम, को उस समय थोड़ा-थोड़ा करके प्रदर्शित किया गया जब उसने नीनवे के नगर को बचाया था। विशेष रूप से, यहोवा परमेश्वर और योना के बीच के संवाद ने उस मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता की दया को खुलकर प्रकट किया जिसे उसने स्वयं सृजा था। इन वचनों के माध्यम से, तुम मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की सच्ची भावनाओं की एक गहरी समझ हासिल कर सकते हो ...

निम्नलिखित वचन को योना की पुस्तक 4:10-11 में दर्ज किया गया है: "तब यहोवा ने कहा, 'जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?'" ये यहोवा परमेश्वर के वास्तविक वचन हैं, उसके और योना के बीच का वार्तालाप हैं। यद्यपि यह संवाद एक संक्षिप्त वार्तालाप है, यह मनुष्य के निमित्त सृष्टिकर्ता की चिंता और उसे त्यागने की उसकी अनिच्छा से लबालब भरा हुआ है। ये वचन उस सच्चे रवैये और एहसासों को प्रकट करते हैं जिसे परमेश्वर ने अपनी सृष्टि के लिए अपने हृदय के भीतर संजोकर रखा है, और इन स्पष्ट वचनों से, जिस प्रकार के वचन मनुष्य कभी कभार ही सुनते हैं, परमेश्वर मनुष्यों के लिए अपने सच्चे इरादों को बताता है। यह संवाद नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये को दर्शाता है—किन्तु यह किस प्रकार का रवैया है? यह वह रवैया है जिसे परमेश्वर नीनवे के लोगों के प्रति उनके पश्चाताप से पहले और बाद में अपनाता है। परमेश्वर मनुष्यों से इसी रीति से बर्ताव करता है। इन वचनों के भीतर कोई भी व्यक्ति उसके विचारों के साथ उसके स्वभाव को पा सकता है।

इन वचनों में परमेश्वर के किस प्रकार के विचारों को प्रकट किया गया है? सावधानीपूर्वक पढ़ने से तुरन्त ही प्रकट हो जाता है कि उसने "दया" शब्द का प्रयोग किया है; इस शब्द का उपयोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के सच्चे रवैये को दिखाता है।

शाब्दिक अर्थ के स्तर पर, लोग "दया" शब्द की विभिन्न प्रकार से व्याख्या कर सकते हैं: पहला, प्रेम करना और रक्षा करना, किसी चीज़ के प्रति कोमलता महसूस करना; दूसरा, अत्यंत प्रेम करना; और अंततः, नुकसान पहुँचाना न चाहना और इस प्रकार के कार्य को बर्दाश्त करने में असमर्थ होना। संक्षेप में, इसका तात्पर्य कोमल स्नेह और प्रेम है, साथ ही साथ किसी व्यक्ति या किसी चीज़ को छोड़ने की अनिच्छा है; इसका अर्थ मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया और सहनशीलता है। यद्यपि परमेश्वर ने एक ऐसे शब्द का उपयोग किया जिसे मनुष्यों के बीच सामान्य तौर पर बोला जाता है, फ़िर भी इस शब्द के इस्तेमाल ने मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय की आवाज़ और उनके रवैये को खुलकर प्रकट किया है।

यद्यपि नीनवे का नगर ऐसे लोगों से भरा हुआ था जो सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, बुरे और उपद्रवी थे, उनके पश्चाताप ने परमेश्वर को बाध्य किया कि वो अपना मन बदल दे और उन्हें नाश न करने का निर्णय ले। क्योंकि परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया ने एक ऐसे रवैये का प्रदर्शन किया जो सदोम के नागरिकों के रवैये के ठीक विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके सच्चे समर्पण और अपने पापों के लिए उनके सच्चे पश्चाताप, साथ ही साथ हर लिहाज से उनके सच्चे और हार्दिक आचरण के कारण, परमेश्वर ने एक बार फ़िर से उनके ऊपर अपनी हार्दिक दया दिखाई और उन्हें इसे प्रदान किया। मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रतिफल और उसकी दया की नकल कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है; कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दया या सहनशीलता को धारण नहीं कर सकता है, न ही मनुष्य के प्रति उसके सच्चे एहसासों को धारण कर सकता है। क्या कोई है जिसे तुम महान पुरुष या स्त्री मानते हो, या कोई अलौकिक मानव भी, जो श्रेष्ठ नज़रिए से, एक महान पुरुष या स्त्री के रूप में, या उच्चतम बिन्दु पर बोलते हुए, मानवजाति या सृष्टि के लिए इस प्रकार का कथन कहेगा? मानवजाति के मध्य ऐसा कौन है जो मनुष्य के जीवन की स्थितियों को अपनी हथेली के समान जान सकता है? मनुष्य के अस्तित्व के लिए बोझ और ज़िम्मेदारी कौन उठा सकता है? किसी नगर के विनाश की घोषणा करने के लिए कौन योग्य है? और किसी नगर को क्षमा करने के लिए कौन योग्य है? कौन कह सकता है कि वह अपनी स्वयं की सृष्टि को संजोता है? केवल सृष्टिकर्ता! केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के ऊपर दया करता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति को कोमलता और स्नेह दिखाता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के लिए सच्चा और अटूट प्रेम रखता है। उसी प्रकार, केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति पर दया कर सकता है और अपनी सम्पूर्ण सृष्टि को संजो सकता है। उसका हृदय मनुष्य के हर एक कार्यों से खुशी से उछलता और दुखित होता है: वह मनुष्य की दुष्टता और भ्रष्टता के ऊपर क्रोधित, परेशान और दुखित होता है; वह मनुष्य के पश्चाताप और विश्वास के लिए प्रसन्न, आनंदित, क्षमाशील और प्रफुल्लित होता है; उसका हर एक विचार और अभिप्राय मानवजाति के लिए अस्तित्व के लिए है और उसके चारों ओर परिक्रमा करता है; उसका स्वरूप पूरी तरह से मानवजाति के वास्ते प्रकट किया जाता है; उसकी भावनाओं की सम्पूर्णता मानवजाति के अस्तित्व के साथ आपस में गुथी हुई है। मनुष्य के वास्ते, वह भ्रमण करता है और यहां वहां भागता है, वह खामोशी से अपने जीवन का हर अंश दे देता है; वह अपने जीवन का हर मिनट और क्षण समर्पित कर देता है...। उसने कभी नहीं जाना कि स्वयं अपने जीवन पर किस प्रकार दया करनी है, फ़िर भी उसने हमेशा से उस मानवजाति पर दया की है और उसे संजोया है जिसे उसने स्वयं सृजा था...। वह सब कुछ देता है जिसे उसे इस मानवजाति को देना है...। वह बिना किसी शर्त के और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति उसकी नज़रों के सामने निरन्तर जीवित रहे, और जीवन के उसके प्रावधान प्राप्त करती रहे; वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति एक दिन उसके सम्मुख समर्पित हो जाए और यह पहचान जाए कि यह वही परमेश्वर है जो मुनष्य के अस्तित्व का पालन पोषण करता है और समूची सृष्टि के जीवन की आपूर्ति करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 118

योना 4 यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का। उसने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, "हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिये फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करनेवाला करुणानिधान है, और दु:ख देने से प्रसन्न नहीं होता। इसलिये अब हे यहोवा, मेरा प्राण ले ले; क्योंकि मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही भला है।" यहोवा ने कहा, "तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?" इस पर योना उस नगर से निकलकर, उसकी पूरब ओर बैठ गया; और वहाँ एक छप्पर बनाकर उसकी छाया में बैठा हुआ यह देखने लगा कि नगर का क्या होगा? तब यहोवा परमेश्‍वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दु:ख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्‍वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया। जब सूर्य उगा, तब परमेश्‍वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई, और धूप योना के सिर पर ऐसी लगी कि वह मूर्च्छित होने लगा; और उसने यह कहकर मृत्यु माँगी, "मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही अच्छा है।" परमेश्‍वर ने योना से कहा, "तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?" उसने कहा, "हाँ, मेरा जो क्रोध भड़का है वह अच्छा ही है, वरन् क्रोध के मारे मरना भी अच्छा होता।" तब यहोवा ने कहा, "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?"

सृष्टिकर्ता मनुष्य के लिए अपनी सच्ची भावनाओं को प्रकट करता है

यहोवा परमेश्वर और योना के बीच यह वार्तालाप निःसन्देह मनुष्य के लिए सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाओं का एक प्रकटीकरण है। एक ओर यह उसके अधीन सम्पूर्ण प्रकृति के विषय में सृष्टिकर्ता की समझ के बारे में लोगों को सूचित करता है; जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?" दूसरे शब्दों में, नीनवे के विषय में परमेश्वर की समझ सतही से कहीं अधिक था। वह न केवल नगर में रहने वाले जीवित प्राणियों (मनुष्य व पशु समेत) की संख्या को जानता था, बल्कि वह यह भी जानता था कि कितने लोग अपने दाहिने बाएं हाथों का भेद नहीं पहचानते हैं—अर्थात्, कितने बच्चे या तरुण वहां मौज़ूद हैं। यह मानवजाति के विषय में परमेश्वर की श्रेष्ठतम समझ का एक ठोस प्रमाण है। दूसरी ओर यह वार्तालाप मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये के विषय में लोगों को सूचित करता है, दूसरे शब्दों में, यह सृष्टिकर्ता के हृदय पर मनुष्य के बोझ को सूचित करता है। यह ठीक वैसा है जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे ... तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?" ये यहोवा परमेश्वर के वचन हैं जो योना पर दोष लगाते हैं, किन्तु वे सब सत्य हैं।

यद्यपि योना को नीनवे के लोगों के लिए यहोवा परमेश्वर के वचनों की घोषणा का काम सौंपा गया था, फ़िर भी उसने यहोवा परमेश्वर के इरादों को नहीं समझा था, न ही उसने नगर के लोगों के लिए उसकी चिंताओं और अपेक्षाओं को समझा था। एक फटकार के साथ परमेश्वर का अभिप्राय उसे यह बताना था कि मनुष्य उसके हाथों की रचना है, और परमेश्वर ने हर एक व्यक्ति के लिए कष्टप्रद प्रयास किया था; प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ परमेश्वर की आशाओं को लिए फिरता था, प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति का आनन्द लेता था; प्रत्येक व्यक्ति के लिए, परमेश्वर ने एक कष्टप्रद कीमत चुकाई थी। साथ ही इस फटकार ने योना को यह भी बताया कि परमेश्वर मनुष्य को संजोता है, वह उसके हाथों की रचना है, वैसे ही जैसे योना स्वयं रेंड़ के पेड़ को प्रिय जानता था। परमेश्वर अंतिम सम्भावित घड़ी से पहले किसी भी कीमत पर उन्हें आसानी से नहीं त्यागेगा; इसके अतिरिक्त, उस नगर में इतने सारे बच्चे और निरीह पशु थे। परमेश्वर की सृष्टि के इन युवा और अज्ञानी प्राणियों से व्यवहार करते समय, जो अपने दाहिने बाएं हाथों का भेद भी नहीं पहचानते थे, परमेश्वर इस प्रकार जल्दबाज़ी करते हुए उनके जीवन को समाप्त करने और उनके परिणाम को निर्धारित करने में और भी अधिक असमर्थ था। परमेश्वर ने उन्हें बढ़ते हुए देखने की आशा की थी; उसने आशा की थी कि वे अपने पूर्वजों के समान उन्हीं मार्गों पर नहीं चलेंगे, कि उन्हें फ़िर से यहोवा परमेश्वर की चेतावनी को नहीं सुनना होगा, और यह कि वे नीनवे के अतीत की गवाही देंगे। और तो और परमेश्वर ने, नीनवे के द्वारा पश्चाताप किए जाने के बाद उसे देखने, नीनवे के पश्चाताप के पश्चात् उसके भविष्य को देखने, और एक बार फ़िर से नीनवे को अपनी दया के अधीन जीवन जीते हुए देखने की आशा की थी। इसलिए, परमेश्वर की निगाहों में, सृष्टि के प्राणी जो अपने दाहिने और बाएं हाथों का भेद नहीं जान सकते थे, वे नीनवे के भविष्य थे। वे नीनवे के घृणित अतीत की ज़िम्मेदारी लेंगे, ठीक उसी तरह जैसे वे यहोवा परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन नीनवे के अतीत और भविष्य के प्रति गवाही देने के महत्वपूर्ण कर्तव्य की ज़िम्मेदारी लेंगे। अपनी सच्ची भावनाओं की इस घोषणा में, मनुष्य के लिए यहोवा परमेश्वर ने सृष्टिकर्ता की दया को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत किया है। इसने मनुष्य को दिखाया है कि "सृष्टिकर्ता की दया" कोई खोखला वाक्यांश नहीं है, न ही यह खोखला वादा है; इसमें ठोस सिद्धान्त, पद्धतियाँ और उद्देश्य हैं। वह सच्चा और वास्तविक है, और किसी झूठ या कपटवेश का उपयोग नहीं करता है, और इसी रीति से उसकी दया को बिना रुके हर समय और हर युग में मनुष्य को प्रदान किया जाता है। फ़िर भी, आज के दिन तक, योना के साथ सृष्टिकर्ता का संवाद, परमेश्वर का इस बारे में एकमात्र और अति विशेष मौखिक कथन है कि वह मनुष्य पर दया क्यों करता है, वह मनुष्य पर दया कैसे करता है, वह मनुष्य के प्रति कितना सहनशील है और मनुष्य के लिए उसकी सच्ची भावनाएँ क्या हैं। यहोवा परमेश्वर का संक्षिप्त वार्तालाप मनुष्य के लिए उसके सम्पूर्ण विचारों को अभिव्यक्त करता है; यह मनुष्य के निमित्त परमेश्वर के हृदय के रवैये की सच्ची अभिव्यक्ति है, और साथ ही यह मनुष्य पर व्यापक रूप से दया करने का ठोस सबूत भी है। उसकी दया न केवल मनुष्य की प्राचीन पीढ़ियों को दी गई है; बल्कि यह मनुष्य के युवा सदस्यों को भी दी गई है, एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी तक, ठीक उसी तरह जैसा हमेशा से होता आया है। यद्यपि परमेश्वर का क्रोध बार-बार मनुष्यजाति पर कुछ निश्चित जगहों और कुछ निश्चित समयों पर उतरता है, फ़िर भी उसकी दया कभी खत्म नहीं हुई है। अपनी करुणा के साथ, वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन एवं अगुवाई करता है, वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी की आपूर्ति एवं उनका पालन पोषण करता है, क्योंकि मनुष्य के प्रति उसकी सच्ची भावनाएं कभी नहीं बदलेंगी। जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?" उसने सदैव अपनी सृष्टि को संजोया है। यह सृष्टिकर्ता के धर्मी स्वभाव की दया है, और साथ ही यह सृष्टिकर्ता की विशुद्ध अद्वितीयता भी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 119

पांच प्रकार के लोग

मैं परमेश्वर के अनुयायियों की समझ और उसके धर्मी स्वभाव के साथ उनके अनुभव और समझ के अनुसार, उनको अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत करूंगा, ताकि तुम सब उस अवस्था को जिससे तुम सब वर्तमान में सम्बन्धित हो साथ ही साथ अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद को जान सको। परमेश्वर के विषय में लोगों के ज्ञान और उसके धर्मी स्वभाव के विषय में उनकी समझ के सम्बन्ध में, अलग-अलग अवस्थाएं एवं कद जिन्हें लोग धारण करते हैं, उसके अनुसार उन्हें साधारण तौर पर पांच प्रकारों में बांटा जा सकता है। यह विषय अद्वितीय परमेश्वर और उसके धर्मी स्वभाव को जानने के आधार पर निर्दिष्ट है; इसलिए, जैसे-जैसे तुम सब निम्लिखित विषयवस्तु को पढ़ते हो, तुम्हें सावधानीपूर्वक यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तुम सब के पास परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके धर्मी स्वभाव के सम्बन्ध में वास्तव में कितनी समझ और कितना ज्ञान है, और तब तुम सब यह अनुमान लगाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हो कि तुम सब सचमुच में किस अवस्था से सम्बन्धित हो, तुम लोगों का कद सचमुच में कितना बड़ा है, और तुम सब सचमुच में किस प्रकार के व्यक्ति हो।

प्रथम प्रकार: कपड़े में लिपटे हुए नवजात शिशु की अवस्था

कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु क्या है? कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु एक ऐसा शिशु है जो संसार में आया ही है, एक नया जन्मा बच्चा। यह तब होता है जब लोग बहुत ही छोटे और बिल्कुल अपरिपक्व होते हैं।

इस अवस्था में लोग आवश्यक रूप से परमेश्वर में विश्वास के विषयों को लेकर कोई जागरुकता और सचेतता धारण नहीं करते हैं। वे हर चीज़ के प्रति अज्ञानी और उलझन में होते हैं। हो सकता है कि इन लोगों ने एक लम्बे समय से परमेश्वर पर विश्वास किया है या ऐसा बिल्कुल न किया हो, परन्तु उनकी उलझन भरी और अज्ञानता की दशा और उनका असली आध्यात्मिक कद उन्हें कपड़े में लिपटे हुए एक नवजात शिशु की अवस्था के अंतर्गत रखता है। कपड़े में लिपटे हुए एक नवजात शिशु की स्थिति की सटीक परिभाषा इस प्रकार हैः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस प्रकार के व्यक्ति ने कितने लम्बे समय से परमेश्वर में विश्वास रखा है, वह हमेशा नासमझ, व्याकुल और सरल मन का होगा; वह नहीं जानता है कि वह परमेश्वर में क्यों विश्वास करता है, न ही वह यह जानता है कि कौन परमेश्वर है या परमेश्वर कौन है? यद्यपि वह परमेश्वर का अनुसरण करता है, फ़िर भी उसके हृदय में परमेश्वर की कोई सटीक परिभाषा नहीं है, और वह यह निर्धारित नहीं कर सकता है कि वह जिसका अनुसरण करता है वह परमेश्वर है कि नहीं, इसकी तो बात ही छोड़ दीजिए कि उसे सचमुच में परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहिए कि नहीं। इस प्रकार के व्यक्ति की यही असली परिस्थितियां हैं। इन लोगों के विचार धुंधले हैं, और सरल ढंग से कहें, तो उनका विश्वास एक तरह से भ्रमित है। वे हमेशा व्याकुलता और खालीपन की अवस्था में बने रहते हैं; नासमझी, भ्रम और सरल मन होना उनकी अवस्थाओं को संक्षेप में बताते हैं। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को न कभी देखा है, न ही उसे महसूस किया है, और इसलिए, परमेश्वर को जानने के बारे में उनसे बात करना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है; वे न तो उसे समझेंगे और न ही उसे ग्रहण करेंगे। उनके लिए, परमेश्वर को जानना एक काल्पनिक कहानी को सुनने के समान है। जबकि उनके विचार धुंधले हो सकते हैं, किन्तु वे वास्तव में दृढ़ता से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को जानना पूरी तरह से समय और प्रयास की बर्बादी है। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है—कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु।

द्वितीय प्रकार: दूध पीते हुए शिशु की अवस्था

कपड़े में लिपटे हुए एक शिशु की तुलना में, इस प्रकार के व्यक्ति ने कुछ प्रगति कर ली है। खेदजनक ढंग से, उनमें अभी भी परमेश्वर की कुछ भी समझ नहीं है। उनमें अभी भी परमेश्वर के विषय में स्पष्ट समझ और अन्तःदृष्टि की कमी है, और वे बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं हैं कि उन्हें परमेश्वर पर विश्वास क्यों करना चाहिए, किन्तु अपने हृदयों में उनके स्वयं के अपने उद्देश्य और स्पष्ट युक्तियां हैं। वे स्वयं इस बात से चिंतित नहीं होते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना सही है या नहीं। वह लक्ष्य एवं उद्देश्य जिन्हें वे परमेश्वर में विश्वास के जरिए खोजते हैं, वह उसके अनुग्रह का आनन्द उठाने के लिए, आनन्द और शांति पाने के लिए, आरामदेह ज़िन्दगी बिताने के लिए, परमेश्वर की देखभाल एवं सुरक्षा को पाने के लिए और परमेश्वर की आशीषों के अधीन जीवन बिताने के लिए है। वे इस बात से चिंतित नहीं हैं कि वे किस हद तक परमेश्वर को जानते हैं; उनमें परमेश्वर की समझ को खोजने के लिए कोई उत्सुकता नहीं है, न ही वे इस बात से चिंतित हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है या वह क्या करना चाहता है। वे सिर्फ आंख बंद करके उसके अनुग्रह का आनन्द उठाने तथा उसकी और भी अधिक आशीषों को हासिल करने की खोज करते हैं; वे वर्तमान युग में सौ गुना और आनेवाले युग में अनन्त जीवन प्राप्त करना चाहते करते हैं। उनके विचार, उनका स्वयं को खपाना और भक्ति, साथ ही साथ उनका दुख उठाना, सभी के पीछे एक ही प्रायोजन है: परमेश्वर के अनुग्रह को और आशीषों को हासिल करना। उन्हें किसी भी अन्य चीज़ की कोई चिंता नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति केवल इस बात में निश्चित है कि परमेश्वर उन्हें सुरक्षित रख सकता है और उन्हें अपनी दया प्रदान कर सकता है। कहा सकता है कि वे इसमें रूचि नहीं रखते हैं और वे बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं हैं कि परमेश्वर क्यों मनुष्य को बचाना चाहता है या वो परिणाम क्या है जिसे परमेश्वर अपने वचनों और कार्य से हासिल करना चाहता है। उन्होंने परमेश्वर के सार और धर्मी स्वभाव को जानने के लिए कभी प्रयास नहीं किया है, और न ही वे ऐसा करने के लिए रूचि जुटा सकते हैं। उन्हें इन चीज़ों पर ध्यान देने की इच्छा नहीं होती है, न ही वे इन्हें जानना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की अपेक्षाओं, परमेश्वर की इच्छा या कोई चीज़ जो परमेश्वर से सम्बन्धित है उसके विषय में पूछना नहीं चाहते हैं; न ही उन्हें इन चीज़ों के विषय में पूछने का कष्ट लेने को कहा जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वे विश्वास करते हैं कि ये मुद्दे उनके द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लिए जाने से सम्बन्धित नहीं हैं; वे केवल एक ऐसे परमेश्वर से मतलब रखते हैं जो अनुग्रह करता है और जो उनकी व्यक्तिगत रुचियों से सम्बन्धित है। कितने भी वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बावजूद उनमें किसी और चीज़ की कोई रूचि नहीं है, और इस प्रकार वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। किसी ऐसे व्यक्ति के बिना जो बार-बार उन्हें सींचे और उनका पोषण करे, उनके लिए परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग पर निरन्तर बढ़ते जाना कठिन है। यदि वे अपनी प्रारम्भिक खुशी और शांति का आनन्द या परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द नहीं उठा पाते हैं, तो संभव है कि वे पीछे हट सकते हैं। यह दूसरे प्रकार का व्यक्ति है: वह व्यक्ति जो दूध पीते हुए शिशु की अवस्था में रहता है।

तृतीय प्रकार: दूध छुड़ाए हुए बच्चे की या छोटे बच्चे की अवस्था

इस समूह के लोग कुछ स्पष्ट जागरूकता रखते हैं। ये लोग जानते हैं कि परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने का अर्थ यह नहीं है कि वे अपने आप में सच्चा अनुभव रखते हैं; वे जानते हैं कि यदि वे निरंतर आनन्द और शांति की खोज करते रहें, और अनुग्रह की खोज करते रहें, या यदि वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने के अनुभव को बाँटने के द्वारा या उन आशीषों के लिए परमेश्वर की प्रशंसा करने के द्वारा गवाही देने में समर्थ हैं जो उसने उन्हें दिए हैं, तो इन चीज़ों का अर्थ यह नहीं है कि वे जीवन को धारण करते हैं, न ही इसका अर्थ यह है कि वे सत्य की वास्तविकता को धारण करते हैं। अपनी सचेतता की शुरुआत से ही, वे ऐसी निरर्थक आशाएं रखना छोड़ देते हैं कि सिर्फ परमेश्वर का अनुग्रह ही उनके साथ रहेगा; इसके बजाए, जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाते हैं, तो वे साथ ही परमेश्वर के लिए कुछ करना भी चाहते हैं; वे अपने कर्तव्यों को निभाने, थोड़ी बहुत कठिनाई और थकान सहने, और परमेश्वर के साथ कुछ हद तक सहयोग करने के लिए तैयार हैं। फ़िर भी, चूँकि परमेश्वर के प्रति विश्वास में उनका अनुसरण बहुत अधिक मिलावटी है, चूँकि उनके मन के व्यक्तिगत इरादे और इच्छाएं बहुत ही ताकतवर हैं, चूँकि उनका स्वभाव बहुत ही उद्दंड रूप से अभिमानी है, तो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना या परमेश्वर के प्रति वफादार होना उनके लिए बहुत कठिन है; इसलिए, वे अक्सर अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का एहसास या परमेश्वर से की गई प्रतिज्ञाओं का सम्मान नहीं कर पाते हैं। वे अक्सर अपने आपको परस्पर विरोधी स्थितियों में पाते हैं: जहां तक सम्भव हो वे सर्वाधिक मात्रा में परमेश्वर को सन्तुष्ट करने की बहुत इच्छा करते हैं, फ़िर भी वे उसका विरोध करने के लिए अपनी सारी सामर्थ्य का उपयोग करते हैं; वे अक्सर परमेश्वर से वादे तो करते हैं परन्तु तुरन्त ही अपने वादों से पीछे हट जाते हैं। उससे भी ज़्यादा वे अपने आपको अन्य परस्पर विरोधी स्थितियों में पाते हैं: वे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, फ़िर भी उसका और जो कुछ उससे आता है उसका इंकार करते हैं; वे व्याकुलता से आशा करते हैं कि परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करेगा, उनकी अगुवाई करेगा, और उनकी आपूर्ति करेगा और उनकी सहायता करेगा, फ़िर भी वे बाहर निकलने का अपना मार्ग खोज ही लेते हैं। वे परमेश्वर को समझना और जानना चाहते हैं, फ़िर भी वे उसके करीब आने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बदले, वे हमेशा परमेश्वर से परहेज करते हैं; उनका हृदय उसके लिए बंद है। जबकि उनके पास परमेश्वर के वचनों और सत्य के शाब्दिक अर्थ की सतही समझ और अनुभव है, और परमेश्वर और सत्य की सतही अवधारणा है, किन्तु अवचेतन रूप में वे अभी भी इसकी पुष्टि या इसे निर्धारित नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर सत्य है या नहीं; वे इसकी पुष्टि नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर सचमुच में धर्मी है या नहीं; न ही वे परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार की यथार्थता को निर्धारित कर सकते हैं, उसके सच्चे अस्तित्व की तो बात ही छोड़ दीजिए। परमेश्वर के प्रति उनके विश्वास में सदैव सन्देह और ग़लतफ़हमी होती है, और साथ ही उसमें कल्पनाएं और अवधारणाएं होती हैं। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, तो वे न चाहते हुए भी उन में से कुछ का अनुभव या अभ्यास करते हैं जिन्हें वे सम्भावित सत्य मानते हैं, ताकि वे अपने विश्वास को समृद्ध कर सकें, परमेश्वर के प्रति विश्वास में अपने अनुभव को बढ़ा सकें, परमेश्वर के प्रति विश्वास के विषय में अपनी समझ को सत्यापित कर सकें, जीवन के पथ पर चलने के घमंड को सन्तुष्ट कर सकें जिसे उन्होंने स्वयं स्थापित किया है और मानवजाति की नेक वज़ह को पूरा कर सकें। साथ ही वे इन चीज़ों को इसलिए भी करते हैं ताकि आशीषों को हासिल करने की अपनी स्वयं की इच्छा को सन्तुष्ट कर सकें, इसलिए करते हैं ताकि वे सौदा कर सकें जिससे वे मनुष्य की सबसे बड़ी आशीषों को प्राप्त कर सकते हैं, और उस महत्वाकांक्षी आकांक्षा और जीवनभर की इच्छा को पूरा करने के लिए करते हैं कि वे तब तक विश्राम नहीं करेंगे जब तक वे परमेश्वर को प्राप्त न कर लें। ये लोग कभी कभार ही परमेश्वर के अद्भुत प्रकाशन को हासिल करने में सक्षम होते हैं, क्योंकि आशीषों को पाने की उनकी इच्छा और उनके इरादे उनके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उनके पास इसे छोड़ने की कोई इच्छा नहीं है और इसे छोड़ने की बात को वे सह नहीं सकते हैं। वे डरते हैं कि आशीषों को पाने की इच्छा के बिना, लम्बे समय से संजोयी उस महत्वाकांक्षा के बिना कि वे तब तक विश्राम नहीं करेंगे जब तक वे परमेश्वर को प्राप्त न कर लें, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के पीछे की प्रेरणा को खो देंगे। इसलिए, वे वास्तविकता का सामना नहीं करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के वचन या परमेश्वर के कार्य का सामना नहीं करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव या सार का सामना तक नहीं करना चाहते हैं, परमेश्वर को जानने के विषय की चर्चा की तो बात ही छोड़ दीजिए। यह इसलिए है क्योंकि अगर परमेश्वर, उसका सार और उसका धर्मी स्वभाव उनकी कल्पनाओं का स्थान ले लेगा, तो उनके सपने धुएं में उड़ जाएंगे; उनका तथाकथित विश्वास और "योग्यताएं" जिन्हें वर्षों के कठिन परिश्रम के कार्य के जरिए इकट्ठा किया गया था, लुप्त और निष्फल हो जाएंगे; उनका "इलाका" जिसे उन्होंने कई वर्षों से खून पसीने से जीता था वे धराशायी होने के कगार पर होंगे। यह सूचित करेगा कि उनके अनेक वर्षों के कठिन परिश्रम और प्रयास व्यर्थ हैं, और उन्हें शून्य से दोबारा शुरुआत करना होगा। अपने हृदय में सहने के वास्ते यह उनके लिए सबसे कठिन दर्द है, और यह ऐसा परिणाम है जिसको देखने की इच्छा वे बहुत ही कम करते हैं; इसलिए वे हमेशा इस प्रकार के अनिर्णय एवं असहमति की विकट स्थिति में बंद रहते हैं, और वापस लौटने से मना करते हैं। यह तीसरे प्रकार का व्यक्ति है: ऐसा व्यक्ति जो दूध छुड़ाए हुए बच्चे की अवस्था में रहता है।

तीन प्रकार के लोग जिनका वर्णन ऊपर किया है—दूसरे शब्दों में, ऐसे लोग जो इन तीन अवस्थाओं में बने रहते हैं—वे परमेश्वर की पहचान और सार में या उसके धर्मी स्वभाव में कोई सच्चा विश्वास नहीं रखते हैं, न ही उनके पास इन चीज़ों के विषय की कोई स्पष्ट, और निश्चित पहचान या पुष्टिकरण है। इसलिए, इन तीनों अवस्थाओं के लोगों के लिए सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत कठिन है, और साथ ही उनके लिए परमेश्वर की दया, अद्भुत प्रकाशन और अद्भुत ज्योति को प्राप्त करना भी कठिन है क्योंकि वह प्रणाली जिसके अंतर्गत वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर के प्रति उनका ग़लत रवैया, परमेश्वर के लिए यह असम्भव बना देता है कि वह उनके हृदयों के भीतर कार्य करे। परमेश्वर के सम्बन्ध में उनके सन्देह, ग़लत अवधारणाएं और कल्पनाएं परमेश्वर के विषय में उनके विश्वास और ज्ञान से आगे बढ़ चुके हैं। ये तीन प्रकार के लोग हैं जो बहुत अधिक जोखिम पर हैं, और ये तीन बहुत ही ख़तरनाक चरण हैं। जब कोई परमेश्वर, परमेश्वर के सार, परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर सत्य है या नहीं और उसके अस्तित्व की वास्तविकता के विषय के प्रति सन्देह के रवैये को बनाए रखता है और इन चीज़ों के विषय में निश्चित नहीं हो सकता है, तो कोई कैसे हर उस चीज़ को स्वीकार कर सकता है जो परमेश्वर से आता है? कैसे कोई उस तथ्य को स्वीकार कर सकता है कि परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है? कोई कैसे परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार कर सकता है? कोई कैसे परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकता है? इस किस्म का व्यक्ति परमेश्वर के सच्चे मार्गदर्शन और आपूर्ति को कैसे प्राप्त कर सकता है? वे जो इन तीन अवस्थाओं में हैं वे परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, परमेश्वर पर दोष लगा सकते हैं, परमेश्वर की निंदा कर सकते हैं या किसी भी समय परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं। वे किसी भी समय सत्य के मार्ग को त्याग सकते हैं और परमेश्वर को छोड़ सकते हैं। कोई कह सकता है कि इन तीनों अवस्थाओं के लोग कठिन समयावधि में रहते हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर में विश्वास के विषय में सही पथ में प्रवेश नहीं किया है।

चौथा प्रकार: परिपक्व होते हुए बालक की अवस्था; अर्थात्, बचपना

जब एक बच्चे का दूध पीना छुड़ाया जाता है—अर्थात्, उनके द्वारा प्रचुर मात्रा में अनुग्रह का आनन्द लिए जाने के पश्चात, एक व्यक्ति यह खोज करना प्रारम्भ कर देता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने करने का क्या अर्थ है, और विभिन्न प्रश्नों को जैसे कि, मनुष्य क्यों जी रहा है, मनुष्य को कैसे जीवन जीना चाहिए और परमेश्वर क्यों मनुष्य पर अपने कार्य को करता है, इन्हें समझने की इच्छा करता है। जब ये अस्पष्ट विचार और भ्रमित विचार के साँचे उनके भीतर से उठते हैं और उनके भीतर बने रहते हैं, तो वे लगातार सिंचाई को प्राप्त करते हैं और साथ ही वे अपने कर्तव्य को निभाने में समर्थ भी होते हैं। इस समयावधि के दौरान, उनके पास परमेश्वर के सत्य को लेकर कोई सन्देह नहीं रह जाता है, और उनके पास एक सटीक समझ होती है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ क्या है। इस नींव पर उन्हें धीरे-धीरे परमेश्वर का ज्ञान होता है, और वे आहिस्ता-आहिस्ता परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार के सम्बन्ध में अपने अस्पष्ट विचारों और भ्रमित विचार के साँचों के कुछ उत्तर हासिल करते हैं। उनके स्वभाव एवं परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान में हुए परिवर्तनों के सम्बन्ध में, इस अवस्था में लोग सही पथ पर कदम बढ़ाना आरम्भ कर देते हैं और एक रूपान्तरण की समयावधि में प्रवेश करते हैं। इस अवस्था के अंतर्गत ही लोग जीवन पाना शुरू करते हैं। जीवन को धारण करने के स्पष्ट संकेत परमेश्वर को जानने से सम्बन्धित उन विभिन्न प्रश्नों का क्रमिक समाधान है जो लोगों के हृदयों में होते हैं—ग़लतफ़हमियां, कल्पनाएं, अवधारणाएं और परमेश्वर की अस्पष्ट परिभाषाएं—कि वे न केवल सचमुच में परमेश्वर के अस्तित्व की वास्तविकता पर विश्वास करते हैं और उसे जानते हैं, बल्कि परमेश्वर की एक परिशुद्ध परिभाषा धारण करते हैं और अपने हृदय में परमेश्वर के लिए सही स्थान रखते हैं, कि सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करना उनके अस्पष्ट विश्वास का स्थान ले लेता है। इस अवधि के दौरान, लोग परमेश्वर के प्रति अपनी मिथ्या अवधारणाओं और अपने ग़लत अनुसरण और विश्वास के तरीकों को धीरे-धीरे जान जाते हैं। वे सत्य के लिए, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और अनुशासन के अनुभव हेतु, और अपने स्वभाव में परिवर्तन के लिए लालायित होना प्रारम्भ कर देते हैं। इस अवस्था के दौरान परमेश्वर के विषय में सभी प्रकार की अवधारणाओं और कल्पनाओं को वे धीरे-धीरे त्याग देते हैं; ठीक उसी समय वे परमेश्वर के विषय में अपने ग़लत ज्ञान को बदलते और सुधारते हैं और परमेश्वर के विषय में कुछ सही आधारभूत ज्ञान हासिल करते हैं। यद्यपि इस अवस्था में लोगों के द्वारा धारण किए गए ज्ञान का एक अंश बहुत विशिष्ट या सटीक नहीं होता है, फ़िर भी कम से कम वे परमेश्वर के विषय में अपनी अवधारणाओं, ग़लत ज्ञान और ग़लतफ़हमियों को त्यागना आरम्भ कर देते हैं; वे परमेश्वर के प्रति अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को अब और बनाए नहीं रखते हैं। वे यह सीखना आरम्भ करते हैं कि किस प्रकार त्याग करना है—अपनी स्वयं की अवधारणाओं के मध्य पाई जानेवाली चीज़ों को त्यागना, जो ज्ञान से और शैतान से हैं; वे सही और सकारात्मक चीज़ों के अधीन होने के लिए तैयार होना शुरू कर देते हैं, और यहां तक कि उन चीज़ों के अधीन भी होने लगते हैं जो परमेश्वर के वचनों से आते हैं और सत्य के अनुरूप होते हैं। साथ ही वे परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का प्रयास करना, उसके वचनों को व्यक्तिगत रूप से जानना और उसे क्रियान्वित करना, उसके वचनों को अपने कार्यों के सिद्धान्तों के रूप में और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के एक आधार के रूप में स्वीकार करना आरम्भ कर देते हैं। इस समयावधि के दौरान, लोग अनजाने में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हैं, और अनजाने में परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं। परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, और उसके वचनों को स्वीकार करते हुए, वे और भी अधिक सचेत हो जाते हैं और यह एहसास करने में सक्षम होते हैं कि वह परमेश्वर जिस पर वे अपने हृदय से विश्वास करते हैं वह सचमुच में अस्तित्व में है। परमेश्वर के वचनों में, उनके अनुभवों और उनकी ज़िन्दगियों में, वे बहुतायत से महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने सदैव मनुष्य की नियति पर अध्यक्षता की है, उसकी अगुवाई की है, और उसकी आपूर्ति की है। परमेश्वर के साथ अपनी संगति के जरिए, वे धीरे-धीरे परमेश्वर के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। इसलिए, इसका एहसास करने से पहले ही, उन्होंने अर्ध चेतनावस्था में ही परमेश्वर के कार्य को मंज़ूर कर लिया है और उस पर दृढ़ता से विश्वास किया है, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों को मंज़ूर कर लिया है। जब एक बार लोग परमेश्वर के वचनों को मंज़ूर कर लेते हैं और परमेश्वर के कार्यों को मंज़ूर कर लेते हैं, वे बिना रुके स्वयं को नकारते हैं, अपनी स्वयं की अवधारणाओं का इंकार करते हैं, अपने स्वयं के ज्ञान का इंकार करते हैं, अपनी स्वयं की कल्पनाओं का इंकार करते हैं, और साथ ही उसी समय वे अनवरत खोजते हैं कि सत्य क्या है और परमेश्वर की इच्छा क्या है। विकास की इस अवधि के दौरान परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान बहुत ही सतही होता है—वे तो शब्दों का उपयोग करते हुए इस ज्ञान को विस्तार से समझाने में भी असमर्थ हैं, न ही वे इसे विशेष रूप से इसकी व्याख्या कर सकते हैं—उनके पास सिर्फ महसूस की जानेवाली समझ है; फ़िर भी, पिछली तीन अवस्थाओं के साथ तुलना करने पर, इस समयावधि के लोगों की अपरिपक्व ज़िन्दगियों ने पहले से ही परमेश्वर के वचनों की सिंचाई और आपूर्ति को प्राप्त कर लिया है, और पहले से ही अंकुरित होना प्रारम्भ कर दिया है। यह एक बीज के समान है जिसे भूमि में गाड़ा गया है; नमी और पोषक तत्वों को पाने के बाद; वह मिट्टी से फूटता है, उसका अंकुरित होना एक नए जीवन की उत्पत्ति को दर्शाता है। नए जीवन की यह उत्पत्ति एक व्यक्ति को जीवन के संकेतों की झलक देखने देती है। जीवन के साथ, लोग इस प्रकार बढ़ते जाएंगे। इसलिए, इन नीवों पर—परमेश्वर में विश्वास करने के सही पथ पर धीरे-धीरे अपना मार्ग बनाना, अपनी स्वयं की अवधारणाओं को त्यागना, परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त करना—लोगों की ज़िन्दगियां अनिवार्य रूप से आहिस्ता-आहिस्ता प्रगति करेंगी। किस आधार पर इस प्रगति को नापा जाता है? इसे परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सही समझ और उसके अनुभव के अनुसार नापा जाता है। यद्यपि प्रगति की इस समयावधि के दौरान परमेश्वर और उसके सार के विषय में अपने ज्ञान का सटीकता से वर्णन करने के लिए अपने स्वयं के शब्दों का उपयोग करना उन्हें बहुत ही कठिन जान पड़ता है, फ़िर भी इस समूह के लोग अब से परमेश्वर के अनुग्रह के आनन्द के जरिए प्रसन्नता का अनुसरण करने के लिए, या परमेश्वर के अनुग्रह को हासिल करने के लिए उसमें विश्वास करने के पीछे के अपने उद्देश्य का अनुसरण करने से लिए चैतन्य रूप से तैयार नहीं हैं। उसके बजाए, वे परमेश्वर के वचन के द्वारा जीविका की खोज करने, और परमेश्वर के उद्धार का एक विषय बनने के इच्छुक हैं। इसके अतिरिक्त, वे आत्मविश्वास रखते हैं और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने हेतु तैयार हैं। यह प्रगति की अवस्था में एक व्यक्ति की पहचान है।

यद्यपि इस अवस्था में लोगों के पास परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का कुछ ज्ञान होता है, फ़िर भी यह ज्ञान बहुत धुंधला और अस्पष्ट है। जबकि वे इसका स्पष्ट रीति से विस्तार नहीं कर सकते हैं, उनको एहसास होता है कि उन्होंने पहले से ही अपने भीतर कुछ हासिल कर लिया है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की ताड़ना एवं न्याय के जरिए परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के विषय में कुछ मात्रा में ज्ञान और समझ हासिल कर ली है; फ़िर भी, यह सब सतही ही है, और यह अभी भी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। इस समूह के लोगों के पास ठोस दृष्टिकोण है जिसके तहत वे परमेश्वर के अनुग्रह से व्यवहार करते हैं। इस दृष्टिकोण को उद्देश्यों में हुए उन परिवर्तनों में प्रकट किया गया है जिनका वे अनुसरण करते हैं और जिस तरह से वे उनका अनुसरण करते हैं। उन्होंने पहले से ही देख लिया है—परमेश्वर के वचनों और कार्यों में, मनुष्य से की गई उसकी सभी प्रकार की अपेक्षाओं में और मनुष्य को दिए गए उसके प्रकाशनों में—कि यदि वे अब भी सत्य का अनुसरण नहीं करेंगे, यदि वे अब भी वास्तविकता में प्रवेश करने का अनुसरण नहीं करेंगे, यदि वे अब भी परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और जानने के लिए प्रयास नहीं करेंगे जबकि वे उसके वचनों का अनुभव करते हैं, तो वे परमेश्वर में विश्वास करने के महत्व को खो देंगे। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह का कितना आनन्द उठाते हैं, वे अपने स्वभाव को नहीं बदल सकते हैं, परमेश्वर को सन्तुष्ट नहीं कर सकते हैं और परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और यदि वे लगातार परमेश्वर के अनुग्रह के मध्य जीवन बिताएं, तो वे कभी उन्नति को प्राप्त नहीं करेंगे, जीवन को हासिल नहीं करेंगे या उद्धार पाने में समर्थ नहीं होंगे। संक्षेप में, यदि कोई परमेश्वर के वचनों का सचमुच में अनुभव नहीं कर सकता है और उसके वचनों के माध्यम से परमेश्वर को जानने में असमर्थ है, तो वह व्यक्ति अनंतकाल तक एक नवजात शिशु की अवस्था में बना रहेगा और कभी भी अपने जीवन की प्रगति में एक कदम भी नहीं ले पाएगा। यदि तुम सदैव एक नवजात शिशु की अवस्था में बने रहते हो, यदि तुम परमेश्वर के वचन की सच्चाई में कभी प्रवेश नहीं करते हो, यदि तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा जीवन व्यतीत करने में कभी समर्थ नहीं होते हो, यदि तुम परमेश्वर के सच्चे विश्वास और ज्ञान को धारण करने में कभी समर्थ नहीं होते हो, तो परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने हेतु क्या कोई सम्भावना है? इसलिए, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करता है, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के समान ग्रहण करता है, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करता है, कोई भी व्यक्ति जिसका भ्रष्ट स्वभाव बदलना शुरू हो गया है, और कोई भी व्यक्ति जिसके पास एक ऐसा हृदय है जो सत्य के लिए लालायित होता है, जिसके पास परमेश्वर को जानने की इच्छा है, जिसके पास परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण करने की इच्छा है—ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने सचमुच में जीवन को धारण किया है। यह सचमुच में चौथे प्रकार का व्यक्ति है, जो परिपक्व हो रहा बच्चा है, वह व्यक्ति जो बालकपन की अवस्था में है।

पांचवां प्रकार: परिपक्व जीवन की अवस्था, या बालिग अवस्था

बालकपन की लड़खड़ाती हुई अवस्था का अनुभव करने के पश्चात्, प्रगति की यह अवस्था बार-बार की जानेवाली पुनरावृत्तियों से भरी हुई है, लोगों का जीवन पहले से ही स्थिर हो गया है, उनके बढ़ते पग अब नहीं रुकते हैं, न ही कोई ऐसा है जो उन्हें रोकने में समर्थ है। यद्यपि आगे का पथ ऊबड़-खाबड़ और खुरदुरा है, फ़िर भी वे अब कमज़ोर और भयभीत नहीं होते हैं; वे फूहड़ता से काम नहीं करते हैं या अपने आचरण को नहीं खोते हैं। उनकी नींव परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभव में गहराई से जड़ पकड़े हुए हैं। उनके हृदय परमेश्वर की प्रतिष्ठा और महानता के द्वारा आकर्षित किये गये हैं। वे परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने के लिए, परमेश्वर के सार को जानने के लिए, और परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में जानने के लिए लालायित हैं।

इस अवस्था में लोग पहले से ही साफ़-साफ़ जानते हैं कि वे किस में विश्वास करते हैं, और वे स्पष्ट रीति से जानते हैं कि उन्हें परमेश्वर में क्यों विश्वास करना चाहिए है और वे स्वयं अपनी अपनी ज़िन्दगियों के अर्थों को जानते हैं; साथ ही वे यह भी स्पष्ट रीति से जानते हैं कि हर चीज़ जिसे परमेश्वर प्रकट करता है वह सत्य है। उनके अनेक वर्षों के अनुभव में, वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना के बिना, कोई व्यक्ति परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और परमेश्वर को जानने में कभी सक्षम नहीं होगा, न ही इसके बिना कोई व्यक्ति परमेश्वर के सम्मुख आने में सचमुच में कभी समर्थ होगा। इन लोगों के अपने अपने हृदयों में एक बड़ी तीव्र इच्छा होती है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा जांचा जाए, जिससे जांचे जाते समय वे परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देख सकें, एक अधिक शुद्ध प्रेम को हासिल कर सकें, और ठीक उसी समय परमेश्वर को और अधिक सच्चाई से समझने और जानने में समर्थ हो सकें। वे जो इस अवस्था से सम्बन्धित हैं उन्होंने पहले से ही नवजात शिशु की अवस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है, अर्थात् परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने और रोटी खाने और तृप्त होने की अवस्था को त्याग दिया है। वे परमेश्वर को स्वयं के प्रति सहिष्णु बनाने और उन पर दया दिखाने के लिए अब और असाधारण आशाएं नहीं रखते हैं; इसके बजाए, वे परमेश्वर की न रुकने वाली ताड़ना और उसके न्याय को पाने के लिए आश्वस्त हैं और उसकी आशा करते हैं, ताकि अपने भ्रष्ट स्वभाव से अपने आपको अलग कर सकें और परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकें। परमेश्वर के विषय में उनका ज्ञान, उनका अनुसरण या उनके अनुसरण के अंतिम लक्ष्य: ये सभी चीज़ें उनके मनों में बहुत ही स्पष्ट हैं। इसलिए, बालिग अवस्था में लोगों ने पहले से ही अस्पष्ट विश्वास की अवस्था को, उस अवस्था को जिसके अंतर्गत वे उद्धार के लिए अनुग्रह पर आश्रित होते हैं, अपरिपक्व जीवन की अवस्था को जो परीक्षाओं का सामना नहीं कर सकती है, धुंधलेपन की अवस्था को, फूहड़पन से काम करने की अवस्था को, उस अवस्था को जिसमें अक्सर चलने के लिए कोई पथ नहीं होता है, अचानक उत्साही और फिर ठण्डे पड़ जाने के बीच डोलने की अस्थिर समयावधि को, और उस अवस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है जहां कोई व्यक्ति अपनी आँख मूंदकर परमेश्वर के पीछे-पीछे चलता है। इस प्रकार का व्यक्ति अक्सर परमेश्वर की प्रबुद्धता और उसकी रोशनी को प्राप्त करता है, और अक्सर परमेश्वर के साथ सच्ची संगति और संवाद में संलग्न रहता है। कहा जा सकता है कि इस अवस्था में रह रहे लोगों ने पहले से ही परमेश्वर की इच्छा के एक भाग को समझ लिया है; वे जो कुछ भी करते हैं उसमें वे सत्य के सिद्धान्तों को पाने में समर्थ हैं; वे जानते हैं परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करना है। इससे बढ़कर, उन्होंने परमेश्वर को जानने के पथ को भी पा लिया है और परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान की गवाही देना भी प्रारम्भ कर दिया है। क्रमिक प्रगति की प्रक्रिया के दौरान, उनके पास परमेश्वर की इच्छा, मनुष्य की सृष्टि करने में परमेश्वर की इच्छा, और मनुष्य का प्रबंधन करने में परमेश्वर की इच्छा की क्रमिक समझ और ज्ञान होता है; इसके अतिरिक्त, उन्हें धीरे-धीरे सार के सम्बन्ध में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की समझ और ज्ञान भी हो जाता है। कोई मानवीय अवधारणा या कल्पना इस ज्ञान का स्थान नहीं ले सकती है। जबकि कोई नहीं कह सकता है कि पांचवी अवस्था में किसी व्यक्ति का जीवन पूरी तरह से परिपक्व हो गया है या इस व्यक्ति को धर्मी या पूर्ण कहा जा सकता है, लेकिन इस प्रकार के व्यक्ति ने जीवन में परिपक्वता की अवस्था की ओर पहले से ही एक कदम बढ़ा लिया है; यह व्यक्ति परमेश्वर के सामने आने के लिए, परमेश्वर के वचन के आमने सामने खड़े होने के लिए और परमेश्वर के आमने सामने खड़े होने के लिए पहले से ही समर्थ है। क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति ने परमेश्वर के वचनों का बहुत अनुभव कर लिया है, अनगिनत परीक्षाओं का अनुभव कर लिया है और परमेश्वर से अनुशासन, न्याय और ताड़ना की असंख्य घटनाओं का अनुभव कर लिया है, इसलिए परमेश्वर के प्रति उसका समर्पण सापेक्षिक नहीं बल्कि सम्पूर्ण है। परमेश्वर के विषय में उनका ज्ञान अर्द्धचेतनावस्था से स्पष्ट एवं सटीक ज्ञान में, छिछलेपन से गहराई में, धुंधलेपन एवं अस्पष्टता से अति सतर्कता एवं स्पृश्यता में रूपान्तरित हो गया है, और वे ढीठ फूहड़पन एवं निष्क्रिय प्रयासों से सरल ज्ञान और प्रतिक्रियाशील गवाही में बदल गए हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि लोगों ने इस अवस्था में परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को धारण कर लिया है, और उन्होंने पतरस के समान पूर्णता के पथ पर कदम रख दिया है। यह पांचवें प्रकार का व्यक्ति है, ऐसा व्यक्ति जो परिपक्व होने की दशा—बालिग अवस्था—में जीवन व्यतीत करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

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