परमेश्वर को जानना 2

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 31

मनुष्य का सृजन करने के तुरन्त बाद, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ संलग्न होना और मनुष्य से बात करना शुरू किया, और उसका स्वभाव मनुष्य पर व्यक्त होना आरम्भ हुआ। दूसरे शब्दों में, जब से पहली बार परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न हुआ तब से वह बिना रुके अपने सार और स्वरूप को मनुष्य पर सार्वजनिक करने लगा। संक्षेप में, इस बात की परवाह किए बिना कि पहले के लोग या आज के लोग इसे देखने या समझने में समर्थ हैं या नहीं, परमेश्वर अपने स्वभाव को प्रकट करते हुए और अपने सार को अभिव्यक्त करते हुए मनुष्य से बात करता है और मनुष्य के बीच कार्य करता है—जो कि एक तथ्य है, और किसी भी व्यक्ति के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि जब परमेश्वर मनुष्य के साथ कार्य करता और संलग्न होता है तो, परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर का सार और उसका स्वरूप निरन्तर जारी और प्रकट होता रहता है। उसने किसी भी चीज़ को मनुष्य से कभी नहीं छिपाया है या कभी भी गुप्त नहीं रखा है, बल्कि इसके बजाय वह बिना कुछ छिपाए अपने स्वयं के स्वभाव को सार्वजनिक और जारी करता है। इस प्रकार, परमेश्वर आशा करता है कि मनुष्य उसे जान सकता है और उसके स्वभाव और सार को समझ सकता है। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य उसके स्वभाव और सार के साथ ऐसे व्यवहार करे जैसे कि वे अनन्त रहस्य हों, न ही वह यह चाहता है कि मनुष्यजाति परमेश्वर को ऐसा समझे कि वह एक पहेली है जिसको कभी नहीं सुलझाया जा सकता है। जब मनुष्यजाति परमेश्वर को जान लेती है केवल तभी मनुष्य आगे का मार्ग जान सकता है और परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करने में समर्थ हो सकता है, और केवल इस तरह की मनुष्यजाति ही सचमुच में परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिता सकती है, प्रकाश में जीवन बिता सकती है और परमेश्वर को आशीषों के बीच जीवन बिता सकती है।

परमेश्वर के द्वारा जारी और प्रकट किए गए वचन और स्वभाव उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उसके सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न होता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह क्या कहता या करता है, या वह कौन सा स्वभाव प्रकट करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के बारे में क्या सोचता है, वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। इसकी परवाह किए बिना कि मनुष्य कितना कुछ एहसास करने, बूझने या समझने में समर्थ है, यह सब परमेश्वर की इच्छा—मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा—को दर्शाता है! यह सन्देह से परे है! मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि जिस प्रकार वह लोगों से अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार के हों, जो वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसे करें, जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार जीवन जीएँ और जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार परमेश्वर की इच्छा की सम्पूर्णता को पूरा करने में समर्थ बनें। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अवियोज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने स्वभाव और स्वरूप को उसी समय जारी करता है जब वह मनुष्य से माँगें कर रहा होता है। इसमें कुछ असत्य नहीं है, कोई बहाना नहीं है, कोई छिपाव नहीं है, और कोई अलंकरण नहीं है। फिर भी मनुष्य जानने में क्यों असमर्थ है, और क्यों वह परमेश्वर के स्वभाव को कभी भी स्पष्ट रूप से महसूस करने में समर्थ नहीं रहा है? और क्यों उसने कभी भी परमेश्वर की इच्छा का एहसास नहीं किया है? जो परमेश्वर के द्वारा जारी और प्रकट किया जाता है यह वही है जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है और उसके सच्चे स्वभाव का हर एक छोटा सा भाग और पहलू है—तो मनुष्य क्यों नहीं देख सकता है? क्यों मनुष्य पूरे ज्ञान के काबिल नहीं है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और यह कारण क्या है? सृजन के समय से ही, मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं किया है। प्राचीनतम समयों में, चाहे परमेश्वर मनुष्य के सम्बन्ध में कुछ भी करे, वह मनुष्य जिसे बस अभी-अभी सृजित किया गया था, उस मनुष्य ने उसके साथ एक साथी जैसा व्यवहार ही किया था, कोई ऐसा जिस पर भरोसा किया जा सकता था, और उसे परमेश्वर का कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। जिसका मतलब है कि, वह नहीं जानता था कि इस अस्तित्व—यह अस्तित्व जिस पर वह भरोसा करता था और जिसे अपने साथी के रूप में देखता है—के द्वारा जो जारी किया गया था, वह परमेश्वर का सार था, न ही वह जानता था कि यह प्रभावशाली अस्तित्व वही एकमात्र परमेश्वर है जो सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। आसान शब्दों में कहें तो, उस समय के लोग परमेश्वर को बिल्कुल नहीं पहचानते थे। वे नहीं जानते थे कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ें उसी के द्वारा बनायी गई हैं, और वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि वह कहाँ से आया, और ये भी नहीं जानते थे कि वह क्या था। निस्संदेह, उस बीते समय में परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा नहीं करता था कि वह उसे जाने, या उसे समझे, या वह सब कुछ समझे जो उसने किया था, या उसकी इच्छा के बारे में जाने, क्योंकि ये मनुष्यजाति के सृजन के बाद के प्राचीनतम समय थे। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के कार्य की तैयारियाँ आरम्भ की, तब परमेश्वर ने मनुष्य के लिए कुछ किया और मनुष्य से कुछ माँगे भी करनी शुरू की, यह बताते हुए कि किस प्रकार परमेश्वर को भेंट चढ़ाएँ और उसकी आराधना करें। केवल तभी मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में कुछ साधारण विचारों को प्राप्त किया, केवल तभी उसने मनुष्य तथा परमेश्वर के बीच के अन्तर को जाना, और यह कि परमेश्वर ही एकमात्र है जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था। जब मनुष्य जान गया कि परमेश्वर परमेश्वर है और मनुष्य मनुष्य है, तो उसके और परमेश्वर के बीच में एक निश्चित दूरी बन गई, मगर तब भी परमेश्वर ने नहीं चाहा कि मनुष्य को परमेश्वर के बारे और अधिक ज्ञान या गहरी समझ हो। इस प्रकार, परमेश्वर अपने कार्य के चरणों और परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य से भिन्न-भिन्न अपेक्षाएँ करता है। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के किस पहलू को महसूस करते हो? क्या परमेश्वर वास्तविक है? क्या मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उचित हैं? परमेश्वर के द्वारा मनुष्यजाति के सृजन के बाद प्राचीनतम समयों के दौरान, जब परमेश्वर ने मनुष्य पर विजय और सिद्धता का कार्य अभी तक नहीं किया था, और उससे बहुत सारे वचन नहीं कहे थे, तब उसने मनुष्य से थोड़ी सी ही माँग की थी। चाहे मनुष्य ने जो भी किया और उसने जिस प्रकार का भी व्यवहार किया—भले ही उसने कुछ ऐसे कार्य किए हों जिनसे परमेश्वर का अपमान हुआ हो—परमेश्वर ने इस सब को क्षमा कर दिया, और इस सब को अनदेखा कर दिया। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर जानता था कि उसने मनुष्य को क्या दिया है, मनुष्य के भीतर क्या है, और इसलिए वह उन अपेक्षाओं के मानक को जानता था जो उसे मनुष्य से करनी चाहिए। यद्यपि उस समय उसकी अपेक्षाओं का मानक बहुत निम्न था, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका स्वभाव महान नहीं था, या उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता सिर्फ खोखले वचन थे। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को जानने का केवल एक ही तरीका है: परमेश्वर के प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य के कदमों का अनुसरण करने, और उन वचनों को स्वीकार करने के द्वारा जो परमेश्वर मनुष्यजाति से कहता है। परमेश्वर के स्वरूप को जान कर और परमेश्वर के स्वभाव को जान कर भी, क्या मनुष्य परमेश्वर से अपना वास्तविक व्यक्तित्व उसे दिखाने को कहेगा? मनुष्य ऐसा नहीं कहेगा, और ऐसा कहने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, मनुष्य पहले ही स्वयं सच्चे परमेश्वर को देख चुका होगा, और पहले ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख चुका होगा। यह अवश्य अपरिहार्य परिणाम है।

जब परमेश्वर के कार्य और योजना ने निरन्तर आगे प्रगति की, और जब परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक चिह्न के रूप में बादल में इंद्रधनुष की वाचा स्थापित की कि वह जलप्रलय का उपयोग करके दोबारा कभी संसार का अन्त नहीं करेगा उसके पश्चात्, परमेश्वर को ऐसे लोगों को प्राप्त करने की उत्तरोत्तर तीव्र इच्छा हुई जो उसके जैसे दृष्टिकोण वाले हो सकते थे। इसलिए भी, परमेश्वर को ऐसे लोगों को प्राप्त करने की कामना थी, जो पृथ्वी पर उसकी इच्छा को पूरा करने में समर्थ थे, और, इसके अतिरिक्त, अंधकार की शक्तियों को तोड़कर आज़ाद होने में समर्थ, शैतान के द्वारा न बँधने वाले और पृथ्वी पर उसकी गवाही देने में समर्थ लोगों के एक समूह को प्राप्त करने की अत्यावश्यक अभिलाषा हुई। परमेश्वर की लम्बे समय से इच्छा थी कि वो लोगों के ऐसे समूह को प्राप्त करे वह सृजन के समय से ही इसकी प्रतीक्षा कर रहा था। इस प्रकार, चाहे संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा जलप्रलय का उपयोग हो या मनुष्य के साथ उसकी वाचा का उपयोग हो, परमेश्वर की इच्छा, मनोदशा, योजना, और आशाएँ सभी वैसी ही बनी रहीं। जो वह करना चाहता था, जिसकी उसने सृजन के समय के बहुत पहले से लालसा की थी, वह मनुष्यजाति में से उन लोगों को प्राप्त करना था जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता था—लोगों के ऐसे समूह को प्राप्त करना जो उसके स्वभाव को बूझने और जानने में, उसकी इच्छा को समझने में समर्थ था, ऐसा समूह जो उसकी आराधना करने में समर्थ था। लोगों का ऐसा समूह सचमुच में उसके लिए गवाही देने में समर्थ होता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि वे उसके विश्वासपात्र हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 32

परमेश्वर अब्राहम को एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

उत्पत्ति 17:15-17 फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

उत्पत्ति 17:21-22 परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता है जिसे करने का परमेश्वर संकल्प लेता है

तो, तुम सभी लोगों ने अभी-अभी अब्राहम की कहानी सुनी। जब बाढ़ ने संसार को नष्ट कर दिया उसके पश्चात् उसे परमेश्वर के द्वारा चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, जब वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उस तक आयी। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की थी? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की थी जिसका संकेत हमें पवित्रशास्त्र में मिलता हैः "मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर के द्वारा उसे पुत्र दिए जाने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्रशास्त्र निम्नलिखित विवरण प्रदान करते हैं: "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, 'क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?'" दूसरे शब्दों में, यह बुज़ुर्ग दम्पत्ति इतने वृद्ध थे कि सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने अब्राहम से अपनी प्रतिज्ञा की तो उसके पश्चात् उसने क्या किया? वह हँसता हुआ अपने मुँह के बल गिर पड़ा, और उसने मन में कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम मानता था कि यह असम्भव है—जिसका अर्थ था कि वह मानता था कि उससे की गयी परमेश्वर की प्रतिज्ञा एक मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं है। मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से, यह मनुष्य के लिए अप्राप्य था, और उसी तरह परमेश्वर के द्वारा भी अप्राप्य थी, असंभव थी। कदाचित्, अब्राहम के लिए, यह हँसी की बात थी: परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी ऐसा लगता है कि वह यह नहीं जानता है कि कोई इतना वृद्ध व्यक्ति सन्तान उत्पन्न करने में अक्षम होता है; उसे लगता है कि वह मुझे सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति दे सकता है, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—निश्चित रूप से यह असम्भव है! और इस प्रकार, अपने मन में यह सोचते हुए अब्राहम हँसते हुए मुँह के बल गिर पड़ा कि: निश्चित रूप से ये असम्भव है—परमेश्वर मुझसे मज़ाक कर रहा है, यह सत्य नहीं हो सकता है! उसने परमेश्वर के वचनों को गम्भीरता से नहीं लिया। इसलिए, परमेश्वर की नज़रों में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धार्मिक।) यह कहाँ कहा गया था कि वह एक धार्मिक मनुष्य है? तुम लोगों को लगता है कि वे सभी जिन्हें परमेश्वर बुलाता है वे धार्मिक, और सिद्ध, और ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम लोग सिद्धान्त से चलते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम धार्मिक है। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए एक मानक हैं। यद्यपि परमेश्वर यह नहीं कहता है कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति है, फिर भी अपने आचरण के लिहाज से, अब्राहम को परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह थोड़ा सा अमूर्त था? या वह बड़े विश्वास वाला व्यक्ति था? नहीं, वह नहीं था! उसकी हँसी और विचारों ने यह प्रकट किया कि वह कौन था, इसलिए तुम लोगों का विश्वास कि वह धार्मिक था सिर्फ तुम लोगों की कल्पना की उपज है, यह सिद्धान्त को आँख बन्द करके लागू करना है, यह एक गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसके हाव-भाव देखे थे, क्या वह उनके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परन्तु क्या परमेश्वर उस कार्य को बदल देता जिसे करने का उसने संकल्प लिया था? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और संकल्प लिया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो वह मामला पहले ही पूरा हो चुका था। न तो मनुष्य के विचार और न ही उसका आचरण परमेश्वर को जरा सा भी प्रभावित कर सकता या परमेश्वर के साथ हस्तक्षेप नहीं कर सकता; परमेश्वर अपनी योजना को मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, न ही वह मनुष्य के आचरण की वजह से अपनी योजना को बदलेगा या उसमें उलट-पलट करेगा, जो कि मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है। तो उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" जो कुछ अब्राहम ने सोचा या कहा परमेश्वर ने उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। उसकी उपेक्षा का कारण क्या था? इसका कारण यह था कि उस समय परमेश्वर ने यह माँग नहीं की कि मनुष्य बड़ा विश्वास वाला हो, या वह परमेश्वर के बारे में अत्यधिक ज्ञान को रखने में समर्थ हो, या जो कुछ परमेश्वर के द्वारा किया और कहा गया वह उसे पूरी तरह से समझने में समर्थ हो। इस प्रकार, उसने यह माँग नहीं की कि जो कुछ उसने करने का संकल्प किया था, या जिन लोगों को चुनने का उसने निर्णय लिया था, या उसके कार्यों के सिद्धान्तों को मनुष्य पूरी तरह से समझे, क्योंकि मनुष्य की कद-काठी पूरी तरह से अपर्याप्त थी। उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जिस प्रकार उसने आचरण किया उसे परमेश्वर ने सामान्य माना। उसने निंदा नहीं की, या फटकार नहीं लगाई, बल्कि सिर्फ़ इतना ही कहाः "इसहाक सारा अगले वर्ष केइसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा।" जब उसने इन वचनों की घोषणा की उसके पश्चात्, परमेश्वर के लिए, ये वचन, यह मामला कदम दर कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, जिसे उसकी योजना के द्वारा पूरा किया जाना था उसे पहले से ही पूरा कर लिया गया था। इन सबकी व्यवस्थाएँ पूरी करने के बाद, परमेश्वर चला गया। जो कुछ मनुष्य करता या सोचता है, जो कुछ मनुष्य समझता है, मनुष्य की योजनाएँ—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है। सब कुछ परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार, उन समयों और चरणों के अनुरूप आगे बढ़ता है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा नियत किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या जानता है परमेश्वर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता है, फिर भी मनुष्य के विश्वास न करने या न समझने के कारण न तो वह अपनी योजनाओं को छोड़ता है, न ही अपने कार्यों को त्यागता है। इस प्रकार से तथ्य परमेश्वर की योजना और विचारों के अनुसार पूरे होते हैं। यह बिलकुल वही है जिसे हम बाइबल में देखते हैं: परमेश्वर ने इसहाक को अपने द्वारा नियत समय में जन्म लेने दिया। क्या तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य के व्यवहार और आचरण ने परमेश्वर के कार्य में बाधा डाली थी? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डाली थी! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े से विश्वास, परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाओं और कल्पना ने परमेश्वर के कार्य को प्रभावित किया? नहीं, उन्होंने प्रभावित नहीं किया! जरा सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबन्धन योजना किसी भी मनुष्य, मामले, या परिवेश से अप्रभावित रहती है। वह सब कुछ जिसे करने का वह संकल्प करता है, समय पर तथा उसकी योजना के अनुसार खत्म और पूर्ण होगा, उसके कार्य में किसी भी मनुष्य के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर मनुष्य की कुछ मूर्खताओं और अज्ञानताओं को, और यहाँ तक उसके प्रति मनुष्य के कुछ प्रतिरोध और धारणाओं को भी अनदेखा कर देता है; उन पर ध्यान दिए बिना वह उस कार्य को करता रहता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। यह परमेश्वर का स्वभाव है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिबिम्ब है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 33

अब्राहम इसहाक की बलि देता है

उत्पत्ति 22:2-3 उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।

उत्पत्ति 22:9-10 जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

परमेश्वर मनुष्य के मूर्ख होने की परवाह नहीं करता है—वह केवल यह माँग करता है कि मनुष्य सच्चा हो

उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को निम्नलिखित आज्ञा दी: "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" परमेश्वर का आशय बिल्कुल स्पष्ट था: परमेश्वर अब्राहम से अपने इकलौते पुत्र को, जिससे वह प्रेम करता था, होमबलि के रूप में देने के लिए कह रहा था। आज इस पर नज़र डालें तो, क्या परमेश्वर की आज्ञा अभी भी मनुष्य की धारणाओं से विपरीत है? हाँ! जो कुछ परमेश्वर ने उस समय किया वह मनुष्य की धारणाओं के बिलकुल विपरीत और मनुष्य की समझ से बाहर था। उनकी धारणाओं में, लोग निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: जब एक मनुष्य ने विश्वास नहीं किया, इसे असम्भव माना, तो परमेश्वर ने उसे एक पुत्र दिया, और उसे एक पुत्र प्राप्त हो जाने के बाद, परमेश्वर ने उससे अपने पुत्र की बलि देने के लिए कहा—कितना अविश्वसनीय है! परमेश्वर ने वास्तव में क्या करने का इरादा किया था? परमेश्वर का वास्तविक उद्देश्य क्या था? उसने अब्राहम को बिना शर्त एक पुत्र दिया, मगर उसने कहा कि अब्राहम एक बेशर्त बलि दे। क्या यह अतिशय था? किसी तीसरे पक्ष के दृष्टिकोण से, यह न केवल अतिशय था बल्कि कुछ-कुछ "बिना बात के मुसीबत खड़ा करने" का मामला था। परन्तु अब्राहम ने स्वयं यह नहीं माना कि परमेश्वर बहुत ज़्यादा माँग रहा है। हालाँकि उसके मन में कुछ मामूली विचार आये थे, और उसे परमेश्वर पर थोड़ा सन्देह हुआ था, तब भी वह बलि देने के लिए तैयार था। इस स्थिति में, तुम क्या देखते हो जो यह साबित करता है कि अब्राहम अपने पुत्र की बलि देने के लिए तैयार था? इन वाक्यों में क्या कहा जा रहा है? मूल पाठ निम्नलिखित विवरण प्रदान करता है: "अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी" (उत्पत्ति 22:3)। "जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे" (उत्पत्ति 22:9-10)। जब अब्राहम ने अपने हाथ को आगे बढ़ाया, और अपने बेटे को मारने के लिए छुरा लिया, तो क्या उसके कार्यकलापों को परमेश्वर के द्वारा देखा गया था? उन्हें देखा गया था। सम्पूर्ण प्रक्रिया ने—आरम्भ से, जब परमेश्वर ने कहा कि अब्राहम इसहाक का बलिदान करे से लेकर, उस समय तक जब अब्राहम ने अपने पुत्र का वध करने के लिए वास्तव में छुरा उठा लिया—परमेश्वर को अब्राहम का हृदय दिखाया, परमेश्वर के बारे में उसकी पहले की मूर्खता, अज्ञानता और ग़लतफ़हमी चाहे जो भी रही हो, उस समय अब्राहम का हृदय परमेश्वर के प्रति सच्चा, और ईमानदार था, और वह परमेश्वर के द्वारा दिये गए पुत्र, इसहाक को सचमुच में परमेश्वर को वापस देने जा रहा था। परमेश्वर ने उसमें आज्ञाकारिता—उसी आज्ञाकारिता को देखा जिसकी उसने इच्छा की थी।

मनुष्य के लिए, परमेश्वर बहुत कुछ करता है जो समझ से बाहर है और यहाँ तक कि अविश्वसनीय भी है। जब परमेश्वर किसी को आयोजित करने की इच्छा करता है, तो यह आयोजन प्रायः मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, और उसकी समझ से परे होता है, फिर भी यह निश्चित रूप से ये असंगति और अबोधगम्यता ही परमेश्वर द्वारा मनुष्य का परीक्षण और परीक्षा हैं। इसी बीच, अब्राहम अपने भीतर ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्रदर्शित करने में समर्थ था, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को संतुष्ट करने में उसके समर्थ होने की सबसे प्रमुख शर्त थी। जब अब्राहम परमेश्वर की माँग को मानने में समर्थ हुआ, जब उसने इसहाक को अर्पित किया, केवल तभी परमेश्वर ने मनुष्यजाति के प्रति—अब्राहम के प्रति, जिसे उसने चुना था—सचमुच में आश्वासन और स्वीकृति महसूस की। केवल तभी परमेश्वर आश्वस्त हुआ कि यह व्यक्ति जिसे उसने चुना था एक अत्यंत महत्वपूर्ण अगुवा है जो उसकी प्रतिज्ञा और उसके बाद की प्रबंधन योजना का उत्तरदायित्व ले सकता था। यद्यपि यह सिर्फ एक परीक्षण और परीक्षा थी, फिर भी परमेश्वर ने संतुष्टि महसूस की, उसने अपने लिए मनुष्य के प्रेम को महसूस किया, और उसे मनुष्य के द्वारा ऐसा आराम महसूस किया जैसा उसे पहले कभी नहीं महसूस हुआ था। जिस पल अब्राहम ने इसहाक को मारने के लिए अपना छुरा उठाया था, क्या परमेश्वर ने उसे रोका? परमेश्वर ने अब्राहम को इसहाक की बलि नहीं देने दी, क्योंकि परमेश्वर का इसहाक का जीवन लेने का कोई इरादा ही नहीं था। इसलिए, परमेश्वर ने अब्राहम को बिलकुल सही समय पर रोक दिया। परमेश्वर के लिए, अब्राहम की आज्ञाकारिता ने पहले ही परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था, जो कुछ उसने किया वह पर्याप्त था, और परमेश्वर ने उस परिणाम को पहले से ही देख लिया था जो उसने इरादा किया था। क्या यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था? ऐसा कहा जा सकता है कि यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, कि यही वह परिणाम था जो परमेश्वर चाहता था, और जिसे देखने की परमेश्वर ने लालसा की थी। क्या यह सही है? यद्यपि, भिन्न-भिन्न संदर्भों में, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों का उपयोग करता है, किन्तु अब्राहम में परमेश्वर ने वह देखा जो वह चाहता था, उसने देखा कि अब्राहम का हृदय सच्चा था, और यह कि उसकी आज्ञाकारिता बेशर्त थी, और यह यही "बेशर्त" आज्ञाकारिता परमेश्वर इच्छा की थी। लोग प्रायः कहते हैं, मैंने पहले ही चढ़ावा चढ़ा दिया है, मैंने पहले ही उसका परित्याग कर दिया है—तब भी परमेश्वर मुझ से संतुष्ट क्यों नहीं है? क्यों वह मुझे परीक्षाओं के अधीन करता रहता है? क्यों वह मेरी परीक्षा लेता रहता है? यह एक तथ्य को प्रदर्शित करता हैः परमेश्वर ने तुम्हारे हृदय को नहीं देखा है, और तुम्हारे हृदय को प्राप्त नहीं किया है। कहने का तात्पर्य है कि, उसने ऐसी ईमानदारी नहीं देखी जैसी तब देखी थी जब अब्राहम अपने ही हाथ से अपने पुत्र को मारने के लिए छुरा उठाने, और उसे परमेश्वर के लिए बलि देने में समर्थ था। उसने तुम्हारी बेशर्त आज्ञाकारिता को नहीं देखा है, और उसे तुम्हारे द्वारा आराम नहीं पहुँचाया गया है। तो यह स्वाभाविक है कि परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता रहे। क्या यह सही नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 34

अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा

उत्पत्ति 22:16-18 "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दिए गए आशीष का भरा-पूरा विवरण है। यद्यपि यह संक्षिप्त है, फिर भी इसकी विषय-वस्तु समृद्ध हैः यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दिए गए उपहार के कारण को, और उसकी पृष्ठभूमि को, और वह क्या था जो उसने अब्राहम को दिया था उसे सम्मिलित करता है। यह उस आनन्द और उत्साह से भरा है जिसके साथ परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, और साथ ही उसके वचनों को सुनने में समर्थ लोगों को प्राप्त करने की उसकी लालसा की अत्यावश्यकता से भी व्याप्त है। इसमें, हम परमेश्वर के वचनों और उसकी आज्ञाओं का पालन करने वाले लोगों के वास्ते परमेश्वर के दुलार, और उसकी सहृदयता को देखते हैं। हम उस कीमत को भी देखते हैं जो वह लोगों को प्राप्त करने के लिए चुकाता है, और उस देखभाल और विचार को देखते हैं जो वह इन लोगों को प्राप्त करने में लगाता है। इसके अतिरिक्त, वह अंश, जिसमें ये वचन "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ" हैं, हमें, उसकी प्रबन्धन योजना के पर्दे के पीछे, सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर के द्वारा सही गई कड़वाहट और दर्द का ज़बरदस्त अनुभव कराते हैं। यह एक विचारने पर मजबूर करने वाला अंश है, एक ऐसा अंश है जो बाद में आने वालों के लिए विशेष महत्व रखता है, और उन पर दूरगामी प्रभाव डालता है।

मनुष्य अपनी ईमानदारी और आज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर के आशीष प्राप्त करता है

क्या परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दिया गया आशीष, जिसके बारे में हम यहाँ पढ़ते हैं, महान था? यह आखिर कितना महान था? यहाँ एक मुख्य वाक्य हैः "और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी," जो यह दिखाता है कि अब्राहम ने ऐसे आशीषों को प्राप्त किया था जो पहले या बाद में आने वालों में से किसी और को नहीं दिये गए थे। परमेश्वर के द्वारा माँगा जाने पर, जब अब्राहम ने अपने इकलौते पुत्र—अपने प्रिय इकलौते पुत्र—को परमेश्वर को लौटा दिया (टिप्पणी: यहाँ पर हम "बलि दे दिया" शब्द का उपयोग नहीं कर सकते हैं; हमें यह कहना चाहिए कि उसने अपने पुत्र को परमेश्वर को लौटा दिया), तब परमेश्वर ने न केवल अब्राहम को इसहाक की बलि देने की अनुमति नहीं दी, बल्कि उसने उसे आशीष भी दिया। उसने अब्राहम को किस प्रतिज्ञा का आशीष दिया? उसके वंश को बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा का आशीष। और उन्हें कितनी मात्रा में बहुगुणित होना था? पवित्रशास्त्र हमें निम्नलिखित अभिलेख प्रदान करता है: "... आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा: और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी।" वह सन्दर्भ क्या था जिसमें परमेश्वर ने इन वचनों को कहा था? कहने का तात्पर्य है कि, अब्राहम ने परमेश्वर के आशीषों को कैसे प्राप्त किया था? उसने उन्हें ठीक वैसे ही प्राप्त किया जैसा परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र में कहा है: "क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" अर्थात्, क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया था, क्योंकि उसने, जरा सी भी शिकायत के बिना, वह सब कुछ किया जो परमेश्वर ने कहा, माँगा और आदेश दिया था, इसलिए परमेश्वर ने उससे ऐसी प्रतिज्ञा की। इस प्रतिज्ञा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य है जो उस समय परमेश्वर के विचारों को थोड़ा स्पर्श करता है। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? हो सकता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर के इन वचनों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया हो कि "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" उनका मतलब है कि, जब परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, तो वह अपनी ही शपथ खा रहा था। जब लोग कसम खाते हैं तो वे किसकी शपथ लेते हैं? वे स्वर्ग की शपथ लेते हैं, कहने का अभिप्राय है कि, वे परमेश्वर की कसम खाते हैं और परमेश्वर की शपथ लेते हैं। हो सकता है कि लोगों के पास उस घटना की ज़्यादा समझ न हो जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी ही शपथ ली थी, परन्तु जब मैं तुम लोगों को सही व्याख्या प्रदान करूँगा तो तुम लोग समझने में समर्थ हो जाओगे। ऐसे मनुष्य के साथ आमना-सामना होने पर, जो उसके वचनों को केवल सुन सकता था किन्तु उसके हदय को नहीं समझ सकता हो, परमेश्वर ने एक बार फिर से एकाकी और खोया हुआ महसूस किया। ऐसा कहा जा सकता है कि, हताशा में—औरअवचेतन रूप से—परमेश्वर ने कुछ बहुत ही स्वाभाविक किया: अब्राहम को यह प्रतिज्ञा प्रदान करते समय परमेश्वर ने अपना हाथ अपने हृदय पर रखा और स्वयं को संबोधित किया, और इससे मनुष्य ने परमेश्वर को कहते सुना "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" परमेश्वर के कार्यों के माध्यम से, तुम शायद स्वयं के बारे में सोचो। जब तुम अपना हाथ अपने हृदय पर रखते हो और स्वयं से कहते हो, तो क्या तुम्हें स्पष्ट विचार होता है कि तुम क्या कह रहे हो? क्या तुम्हारी प्रवृत्ति ईमानदार होती है? क्या तुम खुल कर, अपने हृदय से बात करते हो? इस प्रकार, हम यहाँ देखते हैं कि जब परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, तो वह सच्चा और ईमानदार था। जब अब्राहम से बात कर रहा और उसे आशीष दे रहा था, उसी समय परमेश्वर स्वयं से भी बोल रहा था। वह अपने आप से कह रहा थाः मैं अब्राहम को आशीष दूँगा, और उसकी संतति को आकाश के तारों के समान अनगिनत, और समुद्र के किनारे की रेत के समान असंख्य कर दूँगा, क्योंकि उसने मेरे वचनों का पालन किया है और मैं इसे ही चुनता हूँ। जब परमेश्वर ने कहा "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," तो परमेश्वर ने संकल्प किया कि वह अब्राहम में इस्राएल के चुने हुए लोगों को उत्पन्न करेगा, जिसके बाद वह अपने कार्य के साथ तेजी से इन लोगों की आगे अगुवाई करेगा। अर्थात्, परमेश्वर अब्राहम के वंशजों से परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य धारण करवाएगा, और परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के द्वारा जिन बातों को व्यक्त किया गया था वे अब्राहम के साथ आरम्भ होंगे, और अब्राहम के वंशजों में जारी रहेंगे, इस प्रकार वे मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की इच्छा को साकार करेंगे। जो तुम लोग कहते हो, क्या यह एक आशीषित बात नहीं है? मनुष्य के लिए, इससे बड़ा और कोई आशीष नहीं है; ऐसा कहा जा सकता है कि यह सबसे धन्य बात है। अब्राहम के द्वारा प्राप्त किया गया आशीष उसकी संतान का बहुगुणित होना नहीं था, बल्कि अब्राहम के वंशजों में परमेश्वर के प्रबंधन, उसके आदेश, और उसके कार्य की उपलब्धि थी। इसका अर्थ है कि अब्राहम के द्वारा प्राप्त किए गए आशीष अस्थायी नहीं थे, बल्कि जैसे-जैसे प्रबंधन की परमेश्वर की योजना प्रगति करती गई वे लगातार जारी रहे। जब परमेश्वर बोला, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब वह पहले ही एक संकल्प कर चुका था। क्या इस संकल्प की प्रक्रिया सही थी? क्या यह वास्तविक थी? परमेश्वर ने संकल्प किया कि, उस समय के बाद से, उसके प्रयास, इसके द्वारा चुकाई गई कीमत, उसका स्वरूप, उसका सब कुछ, और यहाँ तक कि उसका जीवन भी अब्राहम और अब्राहम के वंशजों को दे दिया जाएगा। इसलिए भी परमेश्वर ने यह संकल्प किया कि, लोगों के इस समूह से आरम्भ करके, वह अपने कर्मों को प्रदर्शित करेगा, और मनुष्य को अपनी बुद्धि, अधिकार और सामर्थ्य को देखने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 35

अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा

उत्पत्ति 22:16-18 "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

परमेश्वर की अपरिवर्तनीय इच्छा है ऐसे लोगों को प्राप्त करना जो परमेश्वर को जानते हैं और जो उसकी गवाही देने में समर्थ हैं

जब वह स्वयं से बात कर रहा था, उसी समय परमेश्वर ने अब्राहम से भी बात की, परन्तु उन आशीषों को सुनने के अलावा जो परमेश्वर ने उसे दिए थे, क्या उस पल अब्राहम परमेश्वर के सभी वचनों में उसकी सच्ची इच्छाओं को समझने में समर्थ था? नहीं था! और इसलिए, उस समय, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब भी उसका हृदय एकाकी और दुःखभरा था। अभी भी एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यह समझने या बूझने में समर्थ हो कि उसका इरादा और उसकी योजना क्या थी। उस क्षण, कोई भी व्यक्ति—जिसमें अब्राहम भी शामिल है—आत्मविश्वास के साथ परमेश्वर से बात करने में समर्थ नहीं था, और कोई भी उस कार्य को करने में उसके साथ सहयोग करने में तो बिलकुल भी समर्थ नहीं था जो उसे अवश्य करना था। सतही तौर पर, परमेश्वर ने अब्राहम को प्राप्त कर लिया था, और किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त कर लिया था जो उसके वचनों का पालन कर सकता था। परन्तु वास्तव में, परमेश्वर के बारे में इस व्यक्ति का ज्ञान शून्य से थोड़ा ही अधिक था। भले ही परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया था, फिर भी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट नहीं था। इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर संतुष्ट नहीं था? इसका अर्थ है कि उसका प्रबंधन बस अभी आरम्भ ही हुआ था, इसका अर्थ है कि जिन लोगों को वह प्राप्त करना चाहता था, जिन लोगों को वह देखने की लालसा करता था, जिन लोगों से वह प्रेम करता था, वे अभी भी उससे दूर थे; उसे समय की आवश्यकता थी, उसे प्रतीक्षा करने की आवश्यकता थी, और उसे धैर्य रखने की आवश्यकता थी। क्योंकि उस समय, स्वयं परमेश्वर के अलावा, कोई ऐसा नहीं था जो जानता हो कि उसे किस बात की आवश्यकता थी, या वह क्या प्राप्त करने की इच्छा करता था, या वह किस बात की लालसा करता था। इसलिए, अत्यधिक उत्साहित महसूस करने के साथ-साथ, परमेश्वर ने हृदय में भारी बोझ भी महसूस किया। फिर भी उसने अपने कदमों को नहीं रोका, और अपने उस अगले कदम की योजना बनाना जारी रखा जो उसे करना था।

अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर ने अब्राहम को महान आशीष सिर्फ इसलिए प्रदान किए क्योंकि उसने परमेश्वर के वचनों को सुना था। यद्यपि, सतही तौर पर, यह सामान्य, और अपेक्षित प्रतीत होता है, फिर भी इसमें हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं: परमेश्वर अपने प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता को विशेष रूप से सहेजकर रखता है, और अपने बारे में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की ईमानदारी उसे अच्छी लगती है। परमेश्वर को यह ईमानदारी कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग नहीं समझ सकते हो कि उसे यह कितना अच्छा लगता है, और शायद ऐसा कोई भी न हो जो इसे समझ सकता हो। परमेश्वर ने अब्राहम को एक पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, तो परमेश्वर ने अब्राहम से अपने पुत्र की बलि देने के लिए कहा। अब्राहम ने अक्षरशः परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी ईमानदारी ने परमेश्वर को द्रवित किया और उसकी ईमानदारी को परमेश्वर के द्वारा सँजोकर रखा गया। परमेश्वर ने इसे कितना सँजोकर रखा? और क्यों उसने इसे सँजोकर रखा? ऐसे समय पर जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को बूझा या उसके हृदय को समझा नहीं था, अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिसने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कँपा दिया, तथा इसने परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का भाव महसूस कराया, और परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का आनन्द लाया जो उसके वचनों का पालन करने में समर्थ था। यह संतुष्टि और आनन्द परमेश्वर के हाथ से सृजित किए गए प्राणी से आया, और जब से मनुष्य का सृजन किया गया था तबसे यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को चढ़ाया था और जिसे परमेश्वर के द्वारा अत्यंत सहेजकर रखा गया था। इस बलिदान की प्रतीक्षा करते हुए परमेश्वर ने बहुत ही कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे मनुष्य की ओर से दिए गए प्रथम महत्वपूर्ण उपहार के रूप में लिया, जिसे उसने सृजित किया था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उस कीमत का प्रथम फल दिखाया जो उसने चुकायी थी, और उसे मनुष्यजाति में आशा देखने दिया। इसके बाद, परमेश्वर को ऐसे लोगों के समूह की और अधिक लालसा हुई जो उसका साथ दें, उसके साथ ईमानदारी से व्यवहार करें, ईमानदारी के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यहाँ तक आशा की कि अब्राहम निरन्तर जीवित रहे, क्योंकि वह चाहता था कि जब वह अपने प्रबंधन को जारी रख रहा हो तो ऐसा हृदय उसका साथ दे, उसके साथ रहे। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या चाहता था, यह सिर्फ एक इच्छा थी, सिर्फ एक विचार था—क्योंकि अब्राहम मात्र एक मनुष्य था जो उसका आज्ञापालन करने में समर्थ था, और उसे परमेश्वर की थोड़ी सी भी समझ या उसका ज्ञान नहीं था। वह ऐसा व्यक्ति था जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से कम पड़ता थाः परमेश्वर को जानना, परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ होना, और परमेश्वर के साथ एक मन होना। और इसलिए, वह परमेश्वर के साथ नहीं चल सका। अब्राहम के द्वारा इसहाक की बलि में, परमेश्वर ने अब्राहम की ईमानदारी और आज्ञाकारिता को देखा, और देखा कि परमेश्वर के द्वारा उसकी परीक्षा का उसने सामना किया। भले ही परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता और ईमानदारी को स्वीकार किया था, किन्तु वह अभी भी परमेश्वर का विश्वासपात्र बनने के, ऐसा व्यक्ति बनने के अयोग्य था जो परमेश्वर को जानता हो, और परमेश्वर को समझता हो, और जिसे परमेश्वर के स्वभाव के बारे में सूचित किया गया हो; वह परमेश्वर के साथ एक मन होने और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने से बहुत दूर था। और इसलिए, परमेश्वर अपने हृदय में अभी भी एकाकी और चिंतित था। परमेश्वर जितना अधिक एकाकी और चिंतित हुआ, उतनी ही अधिक आवश्यकता उसे अपने प्रबंधन को यथाशीघ्र जारी रखने की, और अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करने और अपनी इच्छा को यथाशीघ्र पूरा करने के लिए लोगों के ऐसे समूह को प्राप्त करने और चुनने में समर्थ होने की हुई। यह परमेश्वर की उत्कट अभिलाषा थी, और यह बिल्कुल शुरुआत से लेकर आज तक अपरिवर्तनीय बनी रही है। जब से उसने आरम्भ में मनुष्य का सृजन किया, तब से परमेश्वर ने विजयी लोगों के समूह की लालसा की है, ऐसा समूह जो उसके साथ चले और जो उसके स्वभाव को समझने, जानने और बूझने में समर्थ हो। परमेश्वर की यह इच्छा कभी नहीं बदली है। इसकी परवाह किए बिना कि उसे अभी भी कितना लम्बा इंतज़ार करना है, इसकी परवाह किए बिना कि आगे का मार्ग कितना कठिन है, वे उद्देश्य कितने ही दूर क्यों न हों जिनकी वह लालसा करता है, परमेश्वर ने मनुष्य के प्रति अपनी अपेक्षाओं को कभी बदला या छोड़ा नहीं है। अब जबकि मैंने यह कह दिया है, तो क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के बारे में कुछ महसूस कर सकते हो? शायद जो कुछ तुम लोगों ने महसूस किया है वह बहुत गहरा नहीं है—परन्तु तुम्हें धीरे-धीरे समझ आएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 36

परमेश्वर को सदोम नष्ट करना ही होगा

उत्पत्ति 18:26 यहोवा ने कहा, "यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।"

उत्पत्ति 18:29 फिर उसने उससे यह भी कहा, "कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:30 फिर उसने कहा, "कदाचित् वहाँ तीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:31 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें बीस मिलें।" उसने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:32 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं उसका नाश न करूँगा।"

परमेश्वर केवल ऐसे लोगों की ही परवाह करता है जो उसके वचनों का पालन करने और उसकी आज्ञाओं का अनुसरण करने में समर्थ हैं

ऊपर दिए गए अंशों में अनेक मुख्य शब्द समाविष्ट हैं: संख्याएँ। पहला, यहोवा ने कहा कि यदि उसे नगर में पचास धार्मिक मिल गए, तो वह उस समस्त स्थान को छोड़ देगा, कहने का मतलब है कि, वह नगर को नष्ट नहीं करेगा। तो क्या वहाँ, सदोम के भीतर, वास्तव में पचास धार्मिक थे? नहीं थे। इसके तुरन्त बाद, अब्राहम ने परमेश्वर से क्या कहा? उसने कहा, कदाचित् वहाँ चालीस मिले तो? और परमेश्वर ने कहा, मैं नष्ट नहीं करूँगा। इसके बाद, अब्राहम ने कहा, कदाचित वहाँ तीस मिले तो? परमेश्वर ने कहा, मैं नष्ट नहीं करूँगा। यदि वहाँ बीस मिले तो? मैं नष्ट नहीं करूँगा। दस मिले तो? मैं नष्ट नहीं करूँगा। क्या नगर के भीतर, वास्तव में, दस धार्मिक थे? वहाँ दस भी नहीं थे—बल्कि एक ही था। और यह एक कौन था? वह लूत था। उस समय, सदोम में मात्र एक ही धार्मिक व्यक्ति था, परन्तु जब बात इस संख्या की आई तो क्या परमेश्वर बहुत कठोर था या बलपूर्वक माँग कर रहा था? नहीं, वह कठोर नहीं था। और इसलिए, जब मनुष्य पूछता रहा, "चालीस हों तो क्या?" "तीस हों तो क्या?" जब तक वह "दस हों तो क्या?" तक पहुँचा तब तक परमेश्वर ने कहा, "यदि वहाँ मात्र दस भी होंगे तो मैं उस नगर को नष्ट नहीं करूँगा; मैं उसे छोड़ दूँगा, और इन दस लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी माफ कर दूँगा।" दस की संख्या काफी शोचनीय रही होती, परन्तु ऐसा हुआ कि, सदोम में, वास्तव में, उतनी संख्या में भी धार्मिक लोग नहीं थे। तो तुम देखो, कि परमेश्वर की नज़रों में, नगर के लोगों का पाप और उनकी दुष्टता ऐसी थी कि परमेश्वर के पास उन्हें नष्ट करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। परमेश्वर का क्या अभिप्राय था जब उसने कहा कि वह उस नगर को नष्ट नहीं करेगा यदि उस में पचास धार्मिक हुए? परमेश्वर के लिए ये संख्याएँ महत्वपूर्ण नहीं थीं। जो महत्वपूर्ण था वह यह कि उस नगर में ऐसे धार्मिक थे या नहीं जिन्हें वह चाहता था। यदि उस नगर में मात्र एक ही धार्मिक मनुष्य होता, तो परमेश्वर उन्हें नगर के विनाश के कारण हानि पहुँचाने की अनुमति नहीं देता। इसका अर्थ यह है कि, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर उस नगर को नष्ट करने जा रहा था या नहीं, और इस बात की परवाह किए बिना कि उसके भीतर कितने धार्मिक थे, परमेश्वर के लिए यह पापी नगर श्रापित और घिनौना था, और इसे नष्ट किया जाना चाहिए, इसे परमेश्वर की दृष्टि से ओझल हो जाना चाहिए, जबकि धार्मिकों को बने रहना चाहिए। युग चाहे जो भी हो, मनुष्यजाति के विकास की अवस्था चाहे जो भी हो, परमेश्वर की प्रवृत्ति नहीं बदलती है: वह दुष्टता से घृणा करता है, और अपनी नज़रों में धार्मिकों की परवाह करता है। परमेश्वर की यह स्पष्ट प्रवृत्ति परमेश्वर के सार का सच्चा प्रकाशन भी है। क्योंकि वहाँ नगर के भीतर केवल एक ही धार्मिक व्यक्ति था, इसलिए परमेश्वर अब और नहीं हिचकिचाया। अंतिम परिणाम यह था कि सदोम को आवश्यक रूप से नष्ट किया जाएगा। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? उस युग में, परमेश्वर उस नगर को नष्ट नहीं करता यदि उसके भीतर पचास धार्मिक होते, न ही तब करता यदि दस धार्मिक होते, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर मनुष्यजाति को क्षमा करने और उसके प्रति सहिष्णु होने का निर्णय लेता, या उन कुछ लोगों की वजह से मार्गदर्शन का कार्य करता जो उसका आदर करने और उसकी आराधना करने में समर्थ होते। परमेश्वर मनुष्य के धार्मिक कर्मों में बड़ा विश्वास करता है, वह ऐसे लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसकी आराधना करने में समर्थ हैं, और वह ऐसे लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसके सामने भले कर्मों को करने में समर्थ हैं।

प्राचीनतम समयों से लेकर आज के दिन तक, क्या तुम लोगों ने कभी परमेश्वर के किसी व्यक्ति से सत्य का संवाद करने, या परमेश्वर के मार्ग के बारे में बात करने के बारे में कभी बाइबल में पढ़ा है? नहीं, कभी नहीं। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचन जिन्हें हम पढ़ते हैं, उन्होंने लोगों को केवल यह बताया कि क्या करना है। कुछ लोगों ने उसे किया, कुछ ने नहीं किया; कुछ लोगों ने विश्वास किया, और कुछ ने नहीं किया। बस यही सब कुछ था। इस प्रकार, उस युग के धार्मिक लोग—वे जो परमेश्वर की नज़रों में धार्मिक थे—मात्र वे लोग थे जो केवल परमेश्वर के वचन को सुन सकते थे और परमेश्वर की आज्ञाओं का अनुसरण कर सकते थे। वे ऐसे सेवक थे जिन्होंने मनुष्यों के बीच परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित किया था। क्या इस प्रकार के लोगों को ऐसे मनुष्य कहा जा सकता था जो परमेश्वर को जानते थे? क्या उन्हें ऐसे लोग कहा जा सकता था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाया गया था? नहीं, उन्हें नहीं कहा जा सकता। और इसलिए, उनकी संख्या भले ही कुछ भी हो, परमेश्वर की नज़रों में क्या ये धार्मिक लोग परमेश्वर के विश्वासपात्र कहलाने के योग्य थे? क्या उन्हें परमेश्वर का गवाह कहा जा सकता था? निश्चित रूप से नहीं! वे निश्चित रूप से परमेश्वर के विश्वासपात्र और गवाह कहलाने के योग्य नहीं थे। और इसलिए परमेश्वर ने ऐसे लोगों को क्या कहा? बाइबल में, पवित्र शास्त्र के उन अंशों तक जिन्हें हमने अभी-अभी पढ़ा है, परमेश्वर का उन्हें "मेरा सेवक" कहकर सम्बोधित करने के कई उदाहरण हैं। कहने का तात्पर्य है कि, उस समय, परमेश्वर की नज़रों में ये धार्मिक लोग परमेश्वर के सेवक थे, ये वे लोग थे जो पृथ्वी पर उसकी सेवा करते थे। और परमेश्वर ने इस विशिष्ट पदवी के बारे में किस प्रकार सोचा? उसने उन्हें ऐसा क्यों कहा? परमेश्वर लोगों को अपने हृदय में जो कहकर पुकारता है क्या उसके पास इसके लिए मानक हैं? निश्चित रूप से उसके पास हैं। चाहे वह लोगों को धार्मिक कहे, सिद्ध, ईमानदार, या सेवक कहे, परमेश्वर के पास मानक हैं। जब वह किसी को अपना सेवक कहकर पुकारता है, तो उसे दृढ़ विश्वास है कि यह व्यक्ति उसके संदेशवाहकों की अगवानी करने में समर्थ है, और उसकी आज्ञाओं का पालन करने में समर्थ है, और उस बात को कार्यान्वित कर सकता है जिसकी आज्ञा संदेशवाहकों द्वारा दी जाती है। और यह व्यक्ति क्या कार्यान्वित करता है? उसे जिसे पृथ्वी पर करने और कार्यान्वित करने की परमेश्वर मनुष्य को आज्ञा देता है। उस समय, क्या जिसे पृथ्वी पर करने और कार्यान्वित करने के लिए परमेश्वर ने मनुष्य को कहा था उसे परमेश्वर का मार्ग कहा जा सकता है? नहीं, इसे नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि उस समय, परमेश्वर ने केवल यह कहा था कि मनुष्य कुछ साधारण चीज़ों को करे; उसने कुछ साधारण आज्ञाएँ बोलीं, जिसमें कहा गया कि मनुष्य यह करे या वह करे, और इससे ज़्यादा और कुछ नहीं। परमेश्वर अपनी योजना के अनुसार कार्य कर रहा था। क्योंकि उस समय, बहुत सी परिस्थितियाँ तब तक मौज़ूद नहीं थीं, तब तक समय परिपक्व नहीं हुआ था, और मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्ग का को वहन करना मुश्किल था, इसलिए परमेश्वर का मार्ग अभी तक उसके हृदय से प्रकट होना शुरू नहीं हुआ था। परमेश्वर ने उन धार्मिक व्यक्तियों को देखा जिनके बारे में उसने बोला था, जिन्हें—चाहे तीस हों या बीस—हम यहाँ उसके सेवकों के रूप में देखते हैं। जब परमेश्वर के संदेशवाहक इन सेवकों को संयोगवश मिलते हैं, तो वे उनकी अगवानी करने, और उनकी आज्ञाओं का अनुसरण करने, और उनके वचन के अनुसार कार्य करने में समर्थ होते हैं। यह हूबहू वही था जिसे परमेश्वर की नज़रों में सेवकों के द्वारा किया, और अर्जित किया जाना चाहिए। लोगों को अपनी पदवी देने में परमेश्वर न्यायसंगत है। उसने उन्हें अपना सेवक कहकर इसलिए नहीं पुकारा क्योंकि वे वैसे थे जैसे अब तुम लोग हो—क्योंकि उन्होंने काफी उपदेश सुना था, वे जानते थे कि परमेश्वर को क्या करना था, परमेश्वर की अधिकांश इच्छा को जानते थे, और उसकी प्रबन्धन योजना को समझते थे—परन्तु इसलिए कहा क्योंकि उनकी मानवता ईमानदार थी और वे परमेश्वर के वचनों का अनुपालन करने में समर्थ थे; जब परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी, तो जो वे कर रहे थे वे उसे दर किनार करने में और उसे कार्यान्वित करने में समर्थ थे जिसकी परमेश्वर ने आज्ञा दी थी। और इसलिए, परमेश्वर के लिए, सेवक की उपाधि में अर्थ की दूसरी परत यह है कि उन्होंने पृथ्वी पर उसके कार्य के साथ सहयोग किया, और यद्यपि वे परमेश्वर के संदेशवाहक नहीं थे, फिर भी वे पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों के निर्वाहक और उन्हें कार्यान्वित करनेवाले थे। तुम लोग समझ सकते हो, कि ये सेवक या धार्मिक लोग परमेश्वर के हृदय में बड़ा प्रभाव रखते थे। जिस कार्य की परमेश्वर को पृथ्वी पर शुरुआत करनी थी वह लोगों के सहयोग के बिना पूरा नहीं हो सकता था, और परमेश्वर के सेवकों के द्वारा ली गई भूमिका को परमेश्वर के संदेशवाहकों के द्वारा बदलना संभव नहीं था। प्रत्येक कार्य जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने इन सेवकों को दी थी वह उसके लिए अत्यधिक महत्व का था, और इसलिए वह उन्हें गँवा नहीं सकता था। परमेश्वर के साथ इन सेवकों के सहयोग के बिना, मनुष्यजाति के बीच उसका कार्य ठहर गया होता, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर की प्रबन्धन योजना और परमेश्वर की आशाएँ ध्वस्त हो गई होतीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 37

परमेश्वर को सदोम नष्ट करना ही होगा

उत्पत्ति 18:26 यहोवा ने कहा, "यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।"

उत्पत्ति 18:29 फिर उसने उससे यह भी कहा, "कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:30 फिर उसने कहा, "कदाचित् वहाँ तीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:31 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें बीस मिलें।" उसने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:32 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं उसका नाश न करूँगा।"

परमेश्वर उन लोगों के प्रति प्रचुरता से करुणाशील है जिनकी वह परवाह करता है, और उन लोगों के प्रति गंभीरता से कुपित है जिनसे वह घृणा और जिन्हें अस्वीकार करता है

बाइबल के विवरणों में, क्या सदोम में परमेश्वर के दस सेवक थे? नहीं, ऐसा नहीं था! क्या वह नगर परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिए जाने के योग्य था? उस नगर में केवल एक व्यक्ति—लूत—ने परमेश्वर के संदेशवाहकों की अगवानी की थी। इसका आशय यह है कि उस नगर में परमेश्वर का केवल एक ही सेवक था, और इसलिए परमेश्वर के पास लूत को बचाने और सदोम के नगर को नष्ट करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था। हो सकता है कि अब्राहम और परमेश्वर के बीच के संवाद साधारण दिखाई दें, परन्तु वे एक बहुत गम्भीर बात की व्याख्या करते हैं: परमेश्वर के कार्यों के सिद्धान्त हैं, और किसी निर्णय को लेने से पहले वह अवलोकन और चिंतन करते हुए लम्बा समय बिताएगा; इससे पहले कि सही समय आए, वह निश्चित रूप से कोई निर्णय नहीं लेगा या एकदम से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचेगा। अब्राहम और परमेश्वर के बीच के संवाद हमें यह दिखाते हैं कि सदोम को नष्ट करने का परमेश्वर का निर्णय जरा सा भी ग़लत नहीं था, क्योंकि परमेश्वर पहले से ही जानता था कि उस नगर में चालीस धार्मिक नहीं थे, न ही तीस धार्मिक थे, न ही बीस धार्मिक थे। वहाँ दस भी नहीं थे। उस नगर में एकमात्र धार्मिक व्यक्ति लूत था। सदोम में जो कुछ भी हुआ था उसका और उसकी परिस्थितियों का परमेश्वर के द्वारा अवलोकन किया गया था, और परमेश्वर उनसे अपनी हथेली के समान परिचित था। इस प्रकार, उसका निर्णय ग़लत नहीं हो सकता था। इसके विपरीत, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की तुलना में, मनुष्य बहुत संवेदनशून्य, बहुत मूर्ख और अज्ञानी, और बहुत निकटदर्शी है। यह वही बात है जिसे हम अब्राहम और परमेश्वर के बीच के संवादों में देखते हैं। परमेश्वर आरम्भ से लेकर आज के दिन तक अपने स्वभाव को प्रकट करता रहा है। उसी प्रकार, यहाँ पर भी परमेश्वर का स्वभाव है जिसे हमें समझना चाहिए। संख्याएँ सरल हैं, और किसी भी चीज़ को प्रदर्शित नहीं करती हैं, परन्तु यहाँ पर परमेश्वर के स्वभाव की एक अति महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। परमेश्वर पचास धार्मिकों की वजह से नगर को नष्ट नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की करुणा के कारण है? क्या यह उसके प्रेम एवं सहिष्णुता की वजह से है? क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव के इस पहलू को समझा है? यदि वहाँ केवल दस धार्मिक भी होते, तब भी परमेश्वर ने उन दस धार्मिकों की वजह से उस नगर को नष्ट नहीं किया होता। यह परमेश्वर की सहिष्णुता और प्रेम है या नहीं है? उन धार्मिक लोगों के प्रति परमेश्वर की करुणा, सहिष्णुता और चिंता की वजह से, उसने उस नगर को नष्ट नहीं किया होता। यह परमेश्वर की सहिष्णुता है। और अंत में, हम क्या परिणाम देखते हैं? जब अब्राहम ने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें," परमेश्वर ने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।" उसके बाद, अब्राहम ने और कुछ नहीं कहा—क्योंकि सदोम के भीतर ऐसे दस धार्मिक नहीं थे जिनकी ओर उसने संकेत किया था, और उसके पास कहने के लिए और कुछ नहीं था, और उस समय उसने समझा कि क्यों परमेश्वर ने सदोम को नष्ट करने का संकल्प किया था। इसमें, तुम लोग परमेश्वर के किस स्वभाव को देखते हो? परमेश्वर ने किस प्रकार का संकल्प किया था? अर्थात्, यदि उस नगर में दस धार्मिक नहीं होते, तो परमेश्वर उसके अस्तित्व की अनुमति नहीं देता, और अनिवार्य रूप से उसे नष्ट कर देता। क्या यह परमेश्वर का कोप नहीं है? क्या यह कोप परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है? क्या यह स्वभाव परमेश्वर के पवित्र सार का प्रकाशन है? क्या यह परमेश्वर के धार्मिक सार का प्रकाशन है, जिसका अपमान मनुष्य को बिल्कुल नहीं करना चाहिए? इस बात की पुष्टि के बाद कि सदोम में दस धार्मिक नहीं थे, यह निश्चित था कि परमेश्वर नगर को नष्ट करेगा, और उस नगर के भीतर के लोगों को कठोरता से दण्ड देगा, क्योंकि वे परमेश्वर का विरोध करते थे, और वे बहुत ही गन्दे और भ्रष्ट थे।

हमने क्यों इन अंशों का इस तरह से विश्लेषण किया है? क्योंकि ये कुछ साधारण वाक्य परमेश्वर की अतिशय करुणा और अत्यंत कोप वाले स्वभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति देते हैं। धार्मिकों को सँजोने, और उन पर करुणा करने, उन्हें सहने, और उनकी देखभाल करने के साथ-साथ ही, परमेश्वर के हृदय में सदोम के उन सभी लोगों के लिए अत्यंत घृणा थी जिन्हें भ्रष्ट किया जा चुका था। यह अतिशय करुणा और अत्यंत कोप था, या नहीं? परमेश्वर ने किस उपाय से उस नगर को नष्ट किया? आग से। और क्यों उसने आग का उपयोग करके उसे नष्ट किया? जब तुम किसी चीज़ को आग के द्वारा जलाए जाते हुए देखते हो, या जब तुम किसी चीज़ को जलाने ही वाले होते हो, तो उसके प्रति तुम्हारी भावनाएँ क्या होती हैं? तुम इसे क्यों जलाना चाहता हो? क्या तुम महसूस करते हो कि तुम्हें इसकी अब और आवश्यकता नहीं है, कि तुम इसे अब और नहीं देखना चाहते हो? क्या तुम इसका परित्याग करना चाहते हो? परमेश्वर के द्वारा आग के उपयोग का अर्थ है परित्याग, और घृणा, और यह कि वह सदोम को अब और देखना नहीं चाहता था। यही वह भावना थी जिसने परमेश्वर से आग द्वारा सदोम का सम्पूर्ण विनाश करवाया। आग का उपयोग दर्शाता है कि परमेश्वर आखिर कितना क्रोधित था। परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता तो वास्तव में विद्यमान है, किन्तु जब वह अपने कोप को उन्मुक्त करता है तो परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो किसी अपमान को नहीं सहती है। जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह से मानने में सक्षम होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तो परमेश्वर मनुष्य के प्रति अपनी करुणा से भरपूर होता है; जब मनुष्य भ्रष्टता, उसके प्रति घृणा और शत्रुता से भर जाता है, तो परमेश्वर बहुत अधिक क्रोधित होता है। और वह किस हद तक अत्यंत क्रोधित होता है? उसका कोप तब तक बना रहेगा जब तक कि वह मनुष्य के प्रतिरोध और दुष्ट कर्मों को फिर कभी नहीं देखता है, जब तक वे उसकी नज़रों के सामने से दूर नहीं हो जाते हैं। केवल तभी परमेश्वर का क्रोध गायब होगा। दूसरे शब्दों में, भले ही वह व्यक्ति कोई भी क्यों न हो, यदि उसका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है, और कभी वापस नहीं लौटने के लिए, परमेश्वर से फिर गया है, तो फिर इसकी परवाह किए बिना कि किस प्रकार, सभी प्रकटनों के लिए या अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं के संदर्भ में, वो अपने शरीर में या अपनी सोच में परमेश्वर की आराधना करने, उसका अनुसरण करने और उसकी आज्ञा मानने की इच्छा करता है, जैसे ही उसका हृदय परमेश्वर से फिरेगा, परमेश्वर का कोप बिना रूके उन्मुक्त हो जाएगा। यह ऐसे होगा कि जब मनुष्य को पर्याप्त अवसर देने के बाद, परमेश्वर अपने कोप को गंभीरता से उन्मुक्त कर देगा, तो एक बार उसके उन्मुक्त हो जाने के बाद इसे वापस लेने का कोई मार्ग नहीं होगा, और वह ऐसे मनुष्य के प्रति फिर कभी भी करुणाशील और सहिष्णु नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का एक पक्ष है जो किसी अपमान को सहन नहीं करता है। यहाँ, यह लोगों को सामान्य प्रतीत होता है कि परमेश्वर एक नगर को नष्ट करेगा, क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, पाप से भरा हुआ कोई नगर अस्तित्व में और निरन्तर बना नहीं रह सकता था, और यह तर्कसंगत था कि इसे परमेश्वर के द्वारा नष्ट कर दिया जाना चाहिए। फिर भी परमेश्वर के द्वारा सदोम के विनाश के पहले और उसके बाद जो घटित हुआ उसमें, हम परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को देखते हैं। वह उन चीज़ों के प्रति सहिष्णु और करुणाशील है जो उदार, सुन्दर और भली हैं; जो चीज़ें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह गहनता से कुपित होता है, कुछ इस तरह कि उसका कोप रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो प्रमुख और अति महत्वपूर्ण पहलू: अतिशय करुणा और अत्यंत कोप हैं और, इसके अतिरिक्त, इन्हें आरम्भ से लेकर अंत तक परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया गया है। तुम लोगों में से अधिकतर परमेश्वर की करुणा का कुछ अनुभव कर चुके हैं, किन्तु तुम में से बहुत कम लोगों ने परमेश्वर के कोप की सराहना की है। परमेश्वर की दया और करूणा को प्रत्येक व्यक्ति में देखा जा सकता है; अर्थात्, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति बहुत अधिक करुणाशील रहा है। फिर भी ऐसा कहा जा सकता है, परमेश्वर कभी-कभार—या, कभी नहीं—तुम लोगों के बीच में से किसी भी व्यक्ति पर या लोगों के किसी भाग पर अत्यंत क्रोधित हुआ है। शान्त हो जाओ! कभी न कभी, प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा परमेश्वर के कोप को देखा और अनुभव किया जाएगा, किन्तु अभी वह समय नहीं आया है। और ऐसा क्यों है? क्योंकि जब परमेश्वर किसी के प्रति लगातार क्रोधित होता है, अर्थात्, जब वह अपने अत्यंत कोप को उन पर उन्मुक्त करता है, तो इसका अर्थ है कि उसने काफी समय से उस व्यक्ति से घृणा की है और उसे अस्वीकार किया है, यह कि वह उसके अस्तित्व से नफ़रत करता है, और वह उसके अस्तित्व को सहन नहीं कर सकता है; जैसे ही उसका क्रोध उस पर आएगा, वो लुप्त हो जाएएगा। आज, परमेश्वर का कार्य अभी तक उस मुकाम पर नहीं पहुँचा है। परमेश्वर के बहुत अधिक क्रोधित हो जाने पर तुम लोगों में से कोई भी उसे सहन करने में समर्थ नहीं होगा। तो तुम लोग इसे समझो, कि इस समय परमेश्वर तुम सभी लोगों के प्रति अतिशय करुणाशील है, और तुम लोगों ने अभी तक उसका अत्यंत क्रोध नहीं देखा है। यदि ऐसे लोग हैं जो यकीन करने में असमर्थ बने रहते हैं, तो तुम लोग याचना कर सकते हो कि परमेश्वर का कोप तुम लोगों के ऊपर आ जाए, ताकि तुम लोग अनुभव कर सको कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का क्रोध और उसका अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं। क्या तुम लोग ऐसी हिम्मत कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 38

अंत के दिनों के लोग परमेश्वर के कोप को केवल उसके वचनों में देखते हैं, और परमेश्वर के कोप का सचमुच में अनुभव नहीं करते हैं

सृजन के समय से लेकर आज तक, किसी भी समूह ने परमेश्वर के अनुग्रह या दया और करूणा का उतना आनन्द नहीं लिया है जितना इस अंतिम समूह ने लिया है। यद्यपि, अंतिम चरण में, परमेश्वर ने न्याय और ताड़ना का कार्य किया है, और उसने अपना कार्य प्रताप और कोप के साथ किया है, फिर भी अधिकांश बार परमेश्वर अपने कार्य को पूरा करने के लिए केवल वचनों का ही उपयोग करता है; वह सिखाने, सींचने, भरण पोषण करने, और पोषित करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। इसी बीच, परमेश्वर के कोप को हमेशा छिपाकर रखा गया है, और परमेश्वर के वचनों में उसके कुपित स्वभाव का अनुभव करने के अलावा, बहुत ही कम लोगों ने व्यक्तिगत रूप से उसके क्रोध का अनुभव किया है। कहने का तात्पर्य है, न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त कोप लोगों को परमेश्वर की महिमा और अपमान के प्रति उसकी असहिष्णुता अनुभव करने देता है, फिर भी यह कोप उसके वचनों से परे नहीं जाता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर मनुष्य को झिड़कने, मनुष्य को उजागर करने, मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ना देने, और यहाँ तक कि मनुष्य की निंदा करने के लिए वचनों का उपयोग करता है—परन्तु परमेश्वर अभी तक मनुष्य के प्रति अत्यंत क्रोधित नहीं हुआ है, और अपने वचनों से परे मुश्किल से ही मनुष्य पर अपने कोप को उन्मुक्त किया है। इसलिए, मनुष्य के द्वारा इस युग में अनुभव की गई परमेश्वर की दया और करूणा परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन हैं, जबकि मनुष्य के द्वारा अनुभव किया गया परमेश्वर का कोप महज उसके कथनों के स्वर और भाव का प्रभाव है। बहुत से लोग इस प्रभाव को ग़लत ढंग से लेते हैं कि यह परमेश्वर के कोप का सच्चा अनुभव करना और सच्चा ज्ञान है। परिणामस्वरूप, अधिकतर लोग मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों में उसकी दया और करूणा को देखा है, कि उन्होंने मनुष्य द्वारा अपमान में परमेश्वर की असहिष्णुता को भी देखा है, और उनमें से अधिकांश लोग तो मनुष्य के प्रति परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की सराहना भी करने लगे हैं। परन्तु भले ही मनुष्य का व्यवहार कितना ही बुरा क्यों न हो, या उसका स्वभाव कितना ही भ्रष्ट क्यों न हो, परमेश्वर ने हमेशा सहन किया है। सहन करने में, उसका उद्देश्य इस बात की प्रतीक्षा करना है कि जो वचन उसने कहे हैं, जो प्रयास उसने किए हैं और जो क़ीमत उसने चुकाई है वे उन लोगों में एक प्रभाव प्राप्त करें जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार के परिणाम की प्रतीक्षा करने में समय लगता है, और इसमें मनुष्य के लिए विभिन्न परिवेशों का सृजन करने की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे लोग जन्म लेते ही वयस्क नहीं हो जाते हैं; इसमें अट्ठारह या उन्नीस वर्ष लग जाते हैं, और कुछ लोगों को तो बीस या तीस वर्ष लग जाते हैं इससे पहले कि वे परिपक्व होकर असल में वयस्क बनें। परमेश्वर इस प्रक्रिया के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करता है, वह ऐसे समय के आने की प्रतीक्षा करता है, और वह इस परिणाम के आगमन की प्रतीक्षा करता है। और उस पूरे समय जब वह प्रतीक्षा करता है, परमेश्वर अतिशय रूप से करुणाशील होता है। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की अवधि के दौरान अत्यल्प संख्या में लोगों को मार गिराया जाता है, और कुछ ही लोगों को परमेश्वर के प्रति गम्भीर विरोध के कारण दण्ड दिया जाता है। ऐसे उदाहरण परमेश्वर के उस स्वभाव के और भी अधिक बड़े प्रमाण हैं जो मनुष्य के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है, और वे चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर की सहिष्णुता और सहनशीलता के सच्चे अस्तित्व की पूरी तरह से पुष्टि करते हैं। निस्संदेह, इन विशिष्ट उदाहरणों में, इन लोगों में परमेश्वर के स्वभाव के एक अंश का प्रकाशन परमेश्वर की समग्र प्रबन्धन योजना को प्रभावित नहीं करता है। वास्तव में, परमेश्वर के कार्य के इस अंतिम चरण में, परमेश्वर ने उस संपूर्ण अवधि के दौरान सहन किया है जिसमें वह प्रतीक्षा करता रहा है, और उसने अपनी सहिष्णुता और अपने जीवन को उन लोगों के उद्धार के साथ अदल-बदल लिया है जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तुम इसे देखते हो? परमेश्वर अकारण अपनी योजना में उलट-फेर नहीं करता है। वह अपने कोप को उन्मुक्त कर सकता है, और वह करुणाशील भी हो सकता है; यह परमेश्वर के स्वभाव के दो मुख्य भागों का प्रकाशन है। यह बिल्कुल स्पष्ट है, या नहीं है? दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर की बात आती है, तो सही और ग़लत, न्याय संगत और अन्यायपूर्ण, सकारात्मक और नकारात्मक—यह सब कुछ मनुष्य को स्पष्ट रूप से दिखाया जाता है। वह क्या करेगा, वह क्या पसंद करता है, वह किससे घृणा करता है—यह सब सीधे तौर पर उसके स्वभाव में प्रतिबिम्बित हो सकता है। ऐसी बातों को परमेश्वर के कार्य में भी स्पष्ट रूप से और साफ-साफ देखा जा सकता है, और वे अस्पष्ट या आम नहीं हैं; इसके बजाए, वे सभी लोगों को परमेश्वर के स्वभाव, और उसके स्वरूप को एक विशेषरूप से मूर्त, सच्चे व्यावहारिक तरीके से देखने देती हैं। यही स्वयं सच्चा परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 39

परमेश्वर का स्वभाव कभी भी मनुष्य से छिपा नहीं रहा है—मनुष्य का हृदय परमेश्वर से भटक गया है

सृजन के समय से ही, परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य के साथ कदम से कदम मिलाता रहा है। यह मनुष्य से कभी भी छिपा हुआ नहीं रहा है, बल्कि इसे मनुष्य के लिए पूरी तरह से सार्वजनिक और स्पष्ट किया गया है। फिर भी, समय बीतने के साथ, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से और भी अधिक दूर हो गया है, और जैसे-जैसे मनुष्य की भ्रष्टता अधिक गहरी होती गई, वैसे-वैसे मनुष्य और परमेश्वर अधिकाधिक दूर होते गए। धीरे-धीरे परन्तु निश्चित रूप से, मनुष्य परमेश्वर की नज़रों से ओझल हो गया। मनुष्य परमेश्वर को "देखने" में असमर्थ हो गया, जिससे उसके पास परमेश्वर का कोई "समाचार" नहीं रहा; इस प्रकार, वह नहीं जानता कि परमेश्वर अस्तित्व में है या नहीं, और वो इस हद तक चला जाता है कि परमेश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारने लगता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप की मनुष्य की नासमझी इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से छिपा हुआ है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसका हदय परमेश्वर से फिर गया है। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह इससेअनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से परहेज करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं नहीं गया हैः इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे प्रकाशित करने के बजाय ताकि परमेश्वर उसे देखे, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह उस तथ्य के बावज़ूद है जो कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग तो शपथ भी खाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देंगे, कि यदि वे अपनी शपथ को तोड़ें उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मानने में सक्षम है, न ही यह है कि उसने अपने भाग्य और भविष्य की सम्भावनाओं को तथा अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन छोड़ा है। इसलिए, ईश्वर के लिए तुम्हारी कसमों या उसके लिए तुम जो घोषणा करते हो उसके बावजूद, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अभी भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किन्तु तुम उसे इसका नियन्त्रण नहीं करने देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं दिया है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले वचन बोलते हो; इसी बीच, तुम अपने विभिन्न धूर्त इरादों को, अपनी साज़िश, षडयन्त्रों, और योजनाओं को परमेश्वर से छिपाते हो, और तुम अपने भविष्य की सम्भावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़े रहते हो, इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हुए कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ले लिए जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर स्वयं के प्रति मनुष्य की ईमानदारी को कभी नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, और वह देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करने की इच्छा करता है, और देख सकता है कि कौन सी चीजें उसके हृदय के भीतर रखी हुई हैं, फिर भी मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित नहीं होता है, उसने उसे परमेश्वर के नियन्त्रण में नहीं दिया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास अवलोकन करने का अधिकार है, परन्तु उसके पास नियन्त्रण करने का अधिकार नहीं है। अपनी व्यक्तिपरक चेतना में, मनुष्य स्वयं को परमेश्वर के आयोजनों पर छोड़ने की इच्छा या इरादा नहीं करता है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने तथा परमेश्वर की नज़रों से अपने असली चेहरे को छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढंकने के तरीकों के बारे सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देना चाहते हैं, बल्कि उसे स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि जो कुछ मनुष्य करता है और जो कुछ वह चाहता है उन सब की योजना, गणना, और निर्णय स्वयं मनुष्य के द्वारा किए जाते हैं; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं है। इसलिए, चाहे बात परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश के संबंध में हो, या उन अपेक्षाओं के संबंध में हो जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, मनुष्य के निर्णय उसके स्वयं के इरादों और रुचियों पर, उस समय की उसकी स्वयं की अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य हमेशा उस मार्ग का आँकलन करने और उस राह को चुनने के लिए जो उसे लेना चाहिए, अपने चिर-परिचित ज्ञान तथा अंतर्दृष्टि का, और अपनी स्वयं कि मति का उपयोग करता है, और परमेश्वर को हस्तक्षेप और नियन्त्रण की अनुमति नहीं देता है। मनुष्य के इसी हृदय को परमेश्वर देखता है।

आरम्भ से लेकर आज के दिन तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर की सभी जीवित चीज़ों और प्राणियों में से, मनुष्य के अलावा और कोई भी परमेश्वर से बातचीत करने में समर्थ नहीं रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे सुनने में समर्थ बनाते हैं, और उसके पास आँखें हैं जो उसे देखने देती हैं, उसके पास भाषा है, अपने स्वयं के मत हैं और स्वतन्त्र इच्छा है। उसके पास वह सब कुछ है जिसकी आवश्यकता परमेश्वर को बोलता हुआ सुनने, परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए होती है, और इसलिए परमेश्वर मनुष्य को अपनी सभी इच्छाएँ प्रदान करता है, और मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके मन के मुताबिक हो तथा जो उसके साथ चल सके। जबसे परमेश्वर ने प्रबंधन करना प्रारम्भ किया, तब से वह मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है कि वह अपना हृदय उसे दे, कि वह परमेश्वर को उसे शुद्ध और सुसज्जित करने दे, उसे परमेश्वर के लिए संतोषजनक बनाने दे और उसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम करने दे, उसे परमेश्वर का आदर करवाने दे और दुष्टता से दूर करवाने दे। परमेश्वर ने हमेशा से ही इस परिणाम की आशा और प्रतीक्षा की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 40

परमेश्वर के द्वारा और बाइबल में अय्यूब का आँकलन

अय्यूब 1:1 ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अय्यूब 1:5 जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, "कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।" इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।

अय्यूब 1:8 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

वह मुख्य बिन्दु क्या है जिसे तुम लोग इन अंशों में देखते हो? पवित्रशास्त्र के ये तीन संक्षिप्त अंश सभी अय्यूब से सम्बन्धित हैं। यद्यपि संक्षिप्त हैं, फिर भी वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वह किस प्रकार का व्यक्ति था। अय्यूब के प्रतिदिन के व्यवहार और उसके आचरण के बारे में उनके विवरण के माध्यम से, वे हर एक को बताते हैं कि, आधारहीन होने के बजाए, अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन तथ्यों पर आधारित था। वे हमें बताते हैं कि चाहे यह अय्यूब के बारे में मनुष्य का मूल्यांकन हो (अय्यूब 1:1), या उसके बारे में परमेश्वर का मूल्यांकन हो (अय्यूब 1:8), दोनों परमेश्वर और मनुष्य के सामने अय्यूब के कर्मों के परिणाम हैं (अय्यूब 1:5)।

पहले, आओ हम अंश संख्या एक को पढ़ें: "ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" बाइबल में अय्यूब के बारे में पहला आँकलन, यह वाक्य अय्यूब के बारे में लेखक का मूल्यांकन है। स्वाभाविक रूप से, यह अय्यूब के बारे में मनुष्य के आँकलन को भी दर्शाता है, जो है, "वह खरा और सीधा था और परमेश्‍वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" इसके बाद, आओ हम अय्यूब के बारे में परमेश्वर के आँकलन को पढ़ें: "क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है" (अय्यूब 1:8)। दोनों आँकलनों में से, एक मनुष्य से आया, और एक परमेश्वर से उत्पन्न हुआ; ये एक ही विषय-वस्तु वाले दो आँकलन थे। तो यह देखा जा सकता है कि अय्यूब के व्यवहार और आचरण मनुष्य के लिए ज्ञात थे, और परमेश्वर के द्वारा प्रशंसा किए गए थे। दूसरे शब्दों में, अय्यूब का आचरण, मनुष्य के सामने और परमेश्वर के सामने एकसा था; उसने हर समय परमेश्वर के सामने अपने व्यवहार और अभिप्रेरणा को रखा, ताकि परमेश्वर के द्वारा उनका अवलोकन किया जा सके, और वह एक ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था। इसलिए, परमेश्वर की नज़रों में, पृथ्वी पर लोगों में से केवल अय्यूब ही सिद्ध और खरा व्यक्ति था, और ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था।

अपने दैनिक जीवन में अय्यूब की, परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ

इसके बाद, आओ हम परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अय्यूब की विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर नज़र डालें। उन अंशों के अतिरिक्त जो इसके पहले और बाद में दिए गए हैं, आओ हम अय्यूब 1:5 को भी पढ़ें, जो अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की विशिष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है। यह इस बात से सम्बन्धित है कि किस प्रकार वह अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था; बड़ी प्रमुखता से, उसने न केवल वह किया जो उसे परमेश्वर के अपने स्वयं के भय के और दुष्टता से दूर रहने वास्ते करना चाहिए था, बल्कि उसने अपने पुत्रों की ओर से नियमित रूप से परमेश्वर के सामने होमबलि भी चढ़ायी। उसे भय था कि उन्होंने भोज करते हुए प्रायः "पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।" और यह भय अय्यूब में किस प्रकार व्यक्त हुआ था? मूल पाठ निम्नलिखित विवरण प्रदान करता है: "जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था।" अय्यूब का आचरण हमें यह दिखाता है कि, उसके बाहरी व्यवहार में प्रदर्शित होने के बजाए, परमेश्वर के प्रति उसका भय उसके हृदय के भीतर से आया था, और परमेश्वर के प्रति उसके भय को हमेशा उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक पहलू में पाया जा सकता है, क्योंकि उसने न केवल अपने आपको दुष्टता से दूर रखा था, बल्कि वह अपने पुत्रों की ओर से बार-बार होमबलि चढ़ाता था। दूसरे शब्दों में, अय्यूब न केवल परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने और अपने स्वयं के हृदय में परमेश्वर को त्यागने के बारे में अत्यंत भयभीत था, बल्कि वह इस बात से भी चिंतित था कि उसके पुत्रों ने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया और उसे अपने मन से त्याग दिया था। इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय की सच्चाई सूक्ष्म परिक्षण का सामना करती है, और यह किसी मनुष्य के शक के दायरे से बाहर है। क्या वह ऐसा कभी कभार ही करता था, या बार-बार करता था? पाठ का अंतिम वाक्य है "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।" इन वचनों का अर्थ है कि अय्यूब कभी-कभार ही, या जब उसे अच्छा लगता था तभी अपने पुत्रों के पास मिलने के लिए नहीं जाता था, न ही वह परमेश्वर से प्रार्थना के माध्यम से अपने पापों को स्वीकार करता था। इसके बजाए, वह नियमित रूप से अपने पुत्रों को भेजता था और पवित्र करता था, और उनके लिए होमबलि चढ़ाता था। यहाँ पर "सदैव" का अर्थ यह नहीं है कि उसने ऐसा एक या दो दिन तक किया, या एक पल के लिए किया। यह कह रहा है कि परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय की अभिव्यक्ति अस्थायी नहीं थी, और ज्ञान या बोले गए वचनों पर नहीं रुकी थी; इसके बजाए, परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के तरीके ने उसके हृदय का मार्गदर्शन किया था, इसने उसके व्यवहार को निर्धारित किया था, और यह उसके हृदय में, उसके अस्तित्व का मूल कारण था। वह ऐसा सदैव किया करता यह दिखाता है कि, अपने हृदय में, वह हमेशा डरता था कि वह स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध पाप करेगा और इस बात से भी भयभीत था कि उसके पुत्रों और पुत्रियों ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया था। यह दर्शाता है कि वह अपने हृदय के भीतर ही परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के तरीके का कितना भार ढोता था। उसने ऐसा सदैव किया क्योंकि, अपने मन में, वह डरा हुआ और भयभीत था—भयभीत था कि उसने परमेश्वर के विरूद्ध दुष्टता और पाप किए थे, और यह कि वह परमेश्वर के मार्ग से भटक गया था और इसलिए परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ था। और इसके साथ ही, वह अपने पुत्र और पुत्रियों के बारे में भी चिंतित था, डरता था कि उन्होंने परमेश्वर का अपमान किया है। अपने दैनिक जीवन में अय्यूब का सामान्य आचरण ऐसा ही था। यह निश्चित रूप से सामान्य आचरण ही है जो साबित करता है कि अय्यूब का परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना खोखले वचन नहीं थे, यह कि अय्यूब सही में ऐसी वास्तविकता को जीता था। "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था": ये वचन हमें परमेश्वर के सामने अय्यूब के दैनिक कर्मों के बारे में बताते हैं। जब उसने सदैव इसी तरह से किया, तो क्या उसका व्यवहार और उसका हृदय परमेश्वर के सामने पहुँचा? दूसरे शब्दों में, क्या परमेश्वर प्रायः उसके हृदय और उसके व्यवहार से प्रसन्न रहता था? तब, किस अवस्था में, और किस सन्दर्भ में अय्यूब ने सदैव इस तरह से किया? कुछ लोग लोग कहते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि परमेश्वर अय्यूब के सामने प्रायः प्रकट होता था जिसके कारण वह इस तरह से कार्य किया करता था; कुछ कहते हैं कि उसने सदैव इसी तरह से कार्य किया क्योंकि वह दुष्टता से दूर रहता था; और कुछ कहते हैं कि कदाचित् वह सोचता था कि उसका सौभाग्य आसानी से नहीं आया था, और वह जानता था कि यह उसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया था, और इसलिए वह परमेश्वर के विरूद्ध पाप करने और उसका अपमान करने के परिणामस्वरूप अपनी सम्पत्ति को गँवाने के बारे में अत्यंत भयभीत था। क्या इनमें से कोई भी दावा सच है? स्पष्ट रूप से नहीं। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, अय्यूब के बारे में जिस बात को परमेश्वर ने सर्वाधिक स्वीकार किया और हृदय में सँजोकर रखा वह मात्र यह नहीं था कि वह सदैव इसी तरह से करता था; उससे अधिक, यह शैतान के हाथों में सौंप दिये जाने और प्रलोभित किये जाने पर, परमेश्वर, मनुष्य, और शैतान के सामने उसका आचरण था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 41

शैतान पहली बार अय्यूब को प्रलोभित करता है (उसके मवेशी चुरा लिए जाते हैं और उसके बच्चों के ऊपर आपदा पड़ती है)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 1:8 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

अय्यूब 1:12 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना।" तब शैतान यहोवा के सामने से चला गया।

ख. शैतान का जवाब

अय्यूब 1:9-11 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

परमेश्वर शैतान को अय्यूब को प्रलोभित करने देता है जिससे अय्यूब के विश्वास को सिद्ध बनाया जाएगा

यहोवा परमेश्वर और शैतान के बीच हुए संवाद के बारे में अय्यूब 1:8 वह पहला अभिलेख है जिसे हम बाइबल में देखते हैं। और परमेश्वर ने क्या कहा? मूल पाठ निम्नलिखित विवरण प्रदान करता हैः "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।'" शैतान के सामने अय्यूब के बारे में यह परमेश्वर का आँकलन था; परमेश्वर ने कहा था कि वह एक सिद्ध और खरा मनुष्य है, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है। परमेश्वर और शैतान के बीच इन वचनों से पहले, परमेश्वर ने संकल्प किया था कि वह अय्यूब को प्रलोभित करने के लिए शैतान का उपयोग करेगा—कि वह अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप देगा। एक लिहाज से, यह इस बात को साबित करेगा कि अय्यूब के बारे में परमेश्वर का पर्यवेक्षण और मूल्यांकन सटीक और त्रुटिहीन था, और वह अय्यूब की गवाही के माध्यम से शैतान को लज्जित करवाएगा; दूसरे लिहाज से, यह परमेश्वर में अय्यूब के विश्वास को और परमेश्वर के बारे में उसके भय को सिद्ध करेगा। इस प्रकार, जब शैतान परमेश्वर के सामने आया, तो परमेश्वर ने गोल-मोल बात नहीं की। उसने सीधे मुद्दे की बात की और शैतान से कहाः "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" परमेश्वर के प्रश्न का निम्नलिखित अर्थ है: परमेश्वर जानता था कि शैतान ने सभी स्थानों में भ्रमण किया था, और उसने प्रायः अय्यूब की जासूसी की थी, जो कि परमेश्वर का सेवक था। यह साबित करने के लिए कि परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास और परमेश्वर में उसका भय स्थिर नहीं रह सकता है, उसने अय्यूब को बर्बाद करने के किसी मार्ग की खोज करने का प्रयास करते हुए, प्रायः उसे प्रलोभित किया और उस पर आक्रमण किया था। शैतान तत्परता से अय्यूब को तबाह करने के लिए अवसरों को भी खोजता रहता था, जिससे शायद अय्यूब परमेश्वर को त्याग दे और कि यह उसे परमेश्वर के हाथों से हथिया ले। मगर परमेश्वर ने अय्यूब के हृदय में झाँका और देखा कि वह सिद्ध और खरा था, और वह परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था। परमेश्वर ने शैतान को यह बताने के लिए एक प्रश्न का उपयोग किया कि अय्यूब एक सिद्ध और खरा मनुष्य है जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है, कि अय्यूब कभी भी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और शैतान का अनुसरण नहीं करेगा। अय्यूब के बारे में परमेश्वर का मूल्यांकन सुनने के बाद, शैतान के भीतर अपमान से उत्पन्न क्रोध ने प्रवेश किया, इसलिए वह और भी अधिक क्रोधित हो गया, और वह अय्यूब को हथियाने के लिए और भी अधिक अधीर हो गया, क्योंकि शैतान ने कभी भी यह विश्वास नहीं किया था कि कोई सिद्ध और खरा हो सकता है, कि कोई परमेश्वर का भय मान सकता और दुष्टता से दूर रह सकता है। साथ ही, शैतान मनुष्य की सिद्धता और खराई से घृणा करता था, और वह ऐसे लोगों से नफ़रत करता था जो परमेश्वर का भय मान सकते थे और दुष्टता से दूर रह सकते थे। और इसलिए अय्यूब 1:9-11 में लिखा है कि "शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, 'क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।'" परमेश्वर शैतान के द्वेषपूर्ण स्वभाव से घनिष्ठता से परिचित था, और पूरी तरह से जानता था कि शैतान ने अय्यूब पर तबाही लाने के लिए बहुत पहले से ही योजना बनाई थी, और इसलिए इसमें, शैतान को एक बार फिर से बताने के माध्यम से कि अय्यूब सिद्ध और खरा है और वह परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है, परमेश्वर शैतान को रास्ते पर लाना चाहता था, शैतान से उसके असली चेहरे को प्रकट करवाना चाहता था, उससे अय्यूब पर हमला करवाना और उसे प्रलोभित करवाना चाहता था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने जानबूझ कर इस बात पर जोर दिया था कि अय्यूब सिद्ध और खरा है, वह परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता है, और इस उपाय से उसने शैतान से अय्यूब पर हमला करवाया इस बात के प्रति शैतान की घृणा और गुस्से की वजह से कि कैसे अय्यूब एक सिद्ध और खरा मनुष्य है, ऐसा मनुष्य है जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर इस तथ्य के माध्यम से शैतान को शर्मिंदा किया करता था कि अय्यूब एक सिद्ध और खरा मनुष्य है, ऐसा मनुष्य है जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता है, और शैतान को पूरी तरह से शर्मिंदा और पराजित करके छोड़ दिया जाएगा। उसके बाद, शैतान अय्यूब की सिद्धता, खराई, परमेश्वर का भय मानने, या दुष्टता से दूर रहने के बारे में अब और सन्देह या दोषारोपण नहीं करेगा। इस तरह से, परमेश्वर द्वारा परीक्षण और शैतान द्वारा प्रलोभन लगभग अपरिहार्य थे। एकमात्र व्यक्ति जो परमेश्वर द्वारा परीक्षण और शैतान द्वारा परीक्षा का सामना करने में समर्थ था वह अय्यूब था। इस संवाद के बाद, शैतान को अय्यूब को प्रलोभित करने की अनुमति प्रदान की गई। इस प्रकार शैतान के हमलों का पहला दौर आरम्भ हुआ। इन हमलों का लक्ष्य अय्यूब की सम्पत्ति था, क्योंकि शैतान ने अय्यूब के विरुद्ध निम्नलिखित आरोप लगाया था: "क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? ... तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है।" इसके परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने शैतान को अनुमति दी कि अय्यूब के पास जो भी है वह सब ले ले—परमेश्वर का शैतान से बातचीत करने का यही उद्देश्य था। तथापि, परमेश्वर ने शैतान के सामने एक माँग रखी: "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना" (अय्यूब 1:12)। शैतान को अय्यूब को प्रलोभित करने की अनुमति देने के पश्चात् यही वह शर्त थी जो परमेश्वर ने रखी थी और अय्यूब को शैतान के हाथ में कर दिया था, और यही वह सीमा थी जो परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित की थी: उसने शैतान को अय्यूब को हानि नहीं पहुँचाने का आदेश दिया। क्योंकि परमेश्वर पहचानता था कि अय्यूब सिद्ध और खरा है, और उसे विश्वास था कि उसके सामने अय्यूब की सिद्धता और खराई सन्देह से परे थी, और परीक्षा का सामना कर सकती थी; इस प्रकार, परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को प्रलोभित करने की अनुमति दी, परन्तु शैतान पर एक प्रतिबंध लगा दिया: शैतान को अय्यूब की सारी सम्पत्ति लेने की अनुमति थी, किन्तु वह उसे अपनी अँगुली से छू भी नहीं सकता था। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने उस समय अय्यूब को पूरी तरह से शैतान के हाथों में नहीं दिया था। शैतान अपने किसी भी इच्छित उपाय से अय्यूब को प्रलोभित कर सकता था, परन्तु वह स्वयं अय्यूब को हानि नहीं पहुँचा सकता था, यहाँ तक कि उसके सिर के एक बाल को भी नुकसान नहीं पहुँचा सकता था, क्योंकि मनुष्य की हर चीज़ को परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, मनुष्य जीवित रहे या मर जाए इसका निर्णय परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, और शैतान के पास ऐसी कोई अनुज्ञप्ति नहीं है। जब परमेश्वर ने शैतान से इन वचनों को कहा उसके पश्चात्, शैतान शुरुआत करने की प्रतीक्षा नहीं कर सका। उसने अय्यूब को प्रलोभित करने के लिए हर प्रकार के उपाय का उपयोग किया, और शीघ्र ही अय्यूब ने अपनी बहुत सी भेड़-बकरियों और बैलों को और समस्त सम्पत्ति को गँवा दिया जो परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए थे...। इस प्रकार परमेश्वर की परीक्षाएँ उस पर आईं।

यद्यपि बाइबल हमें अय्यूब के प्रलोभन की शुरुआत के बारे में बताती है, फिर भी क्या अय्यूब स्वयं, जिसे इन प्रलोभनों के अधीन किया गया था, जानता था कि क्या हो रहा है? अय्यूब मात्र एक नश्वर मनुष्य था; निस्संदेह वह उस कहानी के बारे में कुछ भी नहीं जानता था जो उसके पीछे चल रही थी। तथापि, परमेश्वर के प्रति उसके भय और उसकी सिद्धता और खराई ने उसे यह महसूस कराया कि परमेश्वर की परीक्षाएँ उस पर आ गई थीं। वह नहीं जानता था कि आध्यात्मिक क्षेत्र में क्या घटित हुआ है, न ही वह यह जानता था कि इन परीक्षाओं के पीछे परमेश्वर के इरादे क्या थे। परन्तु वह यह जानता था कि इस बात की परवाह किए बिना कि उसके साथ क्या घटित होता है, उसे अपनी सिद्धता और खराई के प्रति सच्चा बना रहना चाहिए, और उसे परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का पालन करना चाहिए। इन मुद्दों के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति और प्रतिक्रिया को परमेश्वर के द्वारा स्पष्ट रूप से देखा गया था। और परमेश्वर ने क्या देखा? उसने अय्यूब के हृदय को देखा जो परमेश्वर का भय मानता था, क्योंकि आरम्भ से लेकर ठीक उस समय तक जब तक अय्यूब की परीक्षा नहीं ली गई थी, अय्यूब का हृदय परमेश्वर के सामने खुला हुआ था, यह परमेश्वर के सामने रखा था, और अय्यूब ने अपनी सिद्धता और खराई का त्याग नहीं किया था, न ही वह परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग से दूर हुआ या उससे फिरा था—और इससे बढ़कर और कोई भी चीज़ परमेश्वर के लिए संतुष्टिदायक नहीं थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 42

अय्यूब की प्रतिक्रिया

अय्यूब 1:20-21 तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"

अय्यूब द्वारा अपना सब कुछ वापस करने का जिम्मा अपने ऊपर ले लेना परमेश्वर के प्रति उसके भय से उत्पन्नहोता है

जब परमेश्वर ने शैतान से कहा "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना," उसके पश्चात् शैतान चला गया, जिसके तुरन्त बाद ही अय्यूब अचानक भयंकर हमलों के अधीन हो गया: पहले, उसके बैल और गधे लूट लिए गए और उसके सेवकों को मार दिया गया; उसके बाद, उसकी भेड़-बकरियों और सेवकों को जलाकर नष्ट कर दिया गया; उसके पश्चात्, उसके ऊँटों को ले लिया गया और उसके सेवकों की हत्या कर दी गई; अंत में, उसके पुत्र और पुत्रियों की जान ले ली गई। हमलों की यह श्रृंखला वह यातना थी जिसे अय्यूब ने अपने पहले प्रलोभन के दौरान सही थी। जैसा कि परमेश्वर के द्वारा आदेशित था, इन हमलों के दौरान शैतान ने केवल अय्यूब की सम्पत्ति और उसके बच्चों को लक्ष्य बनाया था, और स्वयं अय्यूब को हानि नहीं पहुँचाई थी। तथापि, अय्यूब एकदम से एक धनवान पुरुष से जिसके पास अपार धन-सम्पत्ति थी ऐसा व्यक्ति बन गया जिसके पास कुछ भी नहीं था। कोई भी व्यक्ति इस विस्मयकारी अप्रत्याशित झटके का सामना नहीं कर सकता था या इसके प्रति उचित प्रतिक्रिया नहीं दे सकता था, फिर भी अय्यूब ने अपने असाधारण पहलू का प्रदर्शन किया। पवित्रशास्त्र निम्नलिखित विवरण प्रदान करते हैं: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" यह सुनने के पश्चात् कि अय्यूब ने अपने बच्चों और अपनी सारी सम्पत्ति को गँवा दिया है यह अय्यूब की पहली प्रतिक्रिया थी। सबसे बढ़कर, वह आश्चर्यचकित, या घबराया हुआ प्रतीत नहीं हुआ, उसने क्रोध या नफ़रत को बिलकुल भी व्यक्त नहीं किया। तो तुमने देखा कि वह अपने हृदय में पहले से ही पहचान गया था कि ये आपदाएँ अप्रत्याशित घटनाएँ नहीं थीं, या मनुष्य के हाथों से उत्पन्न नहीं हुई थीं, वे प्रतिफल या सज़ा का आगमन तो बिलकुल भी नहीं थीं। इसके बजाय, यहोवा की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं; वह यहोवा ही था जो उसकी सम्पत्ति और बच्चों को लेना चाहता था। तब अय्यूब बहुत ही शान्त और चिंतन में स्पष्ट था। उसकी सिद्ध और सच्ची मानवता ने उन आपदाओं के बारे में उसे तर्कसंगत रूप से और स्वाभाविक रूप से परिशुद्ध अनुमान लगाने और निर्णय लेने में समर्थ बनाया, और उसके परिणामस्वरूप, उसने असामान्य शांति के साथ व्यवहार किया: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" "बागा फाड़" का अर्थ है कि वह निर्वस्त्र था, और उसके पास कुछ नहीं था; "सिर मुँडाने" का अर्थ है कि वह एक नवजात शिशु के समान परमेश्वर के सामने लौट गया था; "भूमि पर गिरा, और दण्डवत् किया" का अर्थ है कि वह इस संसार में नग्न आया था, और आज भी उसके पास कुछ नहीं है, वह परमेश्वर के पास एक नवजात शिशु के समान वापस लौटा था। वह सब कुछ जो अय्यूब के ऊपर पड़ा था उसके प्रति उसकी प्रवृत्ति को परमेश्वर के किसी प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता था। यहोवा पर उसका विश्वास विश्वास के क्षेत्र से परे चला गया; यह परमेश्वर के प्रति उसका भय, परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता थी, और वह न केवल उसे देने के लिए, बल्कि उससे ले लेने के लिए भी परमेश्वर को धन्यवाद देने में समर्थ था। इससे अधिक और क्या, वह इसे अपने ऊपर लेने के योग्य था कि वह सब कुछ वापस करे जो उसका था, जिसमें उसका जीवन भी शामिल था।

परमेश्वर के प्रति अय्यूब का भय और आज्ञाकारिता मनुष्यजाति के लिए एक उदाहरण है, और उसकी सिद्धता और खराई मानवता की पराकाष्ठा थी जो मनुष्य के द्वारा अवश्य धारण की जानी चाहिए। यद्यपि उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, फिर भी उसने यह एहसास किया कि परमेश्वर सचमुच में अस्तित्व में है, और इस एहसास की वजह से वह परमेश्वर का भय मानता था—और परमेश्वर के अपने इसी भय के कारण, वह परमेश्वर का आज्ञा पालन करने में समर्थ था। जो कुछ उसके पास है उसे लेने की उसने परमेश्वर को खुली छूट दी, फिर भी उसने कोई शिकायत नहीं की, और वह परमेश्वर के सामने गिर गया और उसने परमेश्वर से कहा कि, इसी समय, भले ही परमेश्वर उसके प्राण ले ले, फिर भी वह, बिना किसी शिकायत के, प्रसन्नता से उसे ऐसा करने देगा। उसका सम्पूर्ण आचरण उसकी सिद्धता और सच्ची मानवता के कारण था। कहने का तात्पर्य है कि, अपनी निर्दोषता, ईमानदारी, और उदारता के परिणामस्वरूप, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में अपने एहसास और अनुभव में अटल था, और इस बुनियाद पर उसने स्वयं के बारे में माँगें की तथा अपनी सोच, व्यवहार, आचरण और परमेश्वर के सामने कार्यों के सिद्धान्तों को उसके लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के कर्मों के अनुसार मानकीकृत किया जिन्हें उसने सभी चीज़ों के बीच देखा था। समय बीतने के साथ, उसके अनुभवों ने उसमें परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक भय उत्पन्न किया और उसे दुष्टता से दूर रखा। यह ईमानदारी का वही स्रोत था जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामा। अय्यूब ने ईमानदार, निर्दोष, और उदार मानवता को धारण किया था, और उसे परमेश्वर का भय मानने का, परमेश्वर का आज्ञापालन का, और दुष्टता से दूर रहने का, और साथ ही उस ज्ञान का वास्तविक अनुभव था कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" केवल इन्हीं चीज़ों की वजह से ही वह शैतान के ऐसे भयंकर हमलों के बीच डटे रहने और गवाही देने में समर्थ था, और केवल उन्हीं की वजह से वह उस वक्त परमेश्वर को निराश नहीं करने और परमेश्वर को एक संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ था जब परमेश्वर की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं। यद्यपि प्रथम प्रलोभन के दौरान अय्यूब का आचरण बिलकुल स्पष्ट था, फिर भी बाद की पीढ़ियाँ, जीवन भर के प्रयासों के बाद भी, ऐसी स्पष्टवादिता को प्राप्त करने के बारे में आश्वस्त नहीं थीं, न ही वे अय्यूब के उस आचरण को आवश्यक रूप से धारण करेंगी जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। आज, अय्यूब के स्पष्टवादी आचरण से सामना होने पर, और इसकी तुलना "मृत्यु तक परम आज्ञाकारिता और वफ़ादारी" की उन पुकारों और दृढ़ निश्चय से करने पर जिसे उन लोगों के द्वारा परमेश्वर को दिखाया जाता है जो परमेश्वर पर विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, क्या तुम लोग अत्यंत लज्जित महसूस करते हो या नहीं करते हो?

जब तुम उन सब के बारे में पवित्र शास्त्रों में पढ़ते हो जो अय्यूब और उसके परिवार के द्वारा सहा गया था, तो तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होती है? क्या तुम अपने ही विचारों में खो जाते हो? क्या तुम आश्चर्यचकित रह जाते हो? क्या उन परीक्षाओं को जो अय्यूब पर पड़ीं थी "भयावह" कहा जा सकता है? दूसरे शब्दों में, पवित्रशास्त्र में वर्णित अय्यूब की परीक्षाओं के बारे में पढ़ना काफी डरावना है, वे वास्तव में कैसी रही होंगी इसके बारे में कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। तो तुम देखो, कि जो कुछ अय्यूब पर घटित हुआ यह कोई "अभ्यास की कवायद" नहीं थी, बल्कि एक वास्तविक "युद्ध" था, जिसमें वास्तविक "बंदूकें" और "गोलियाँ" शामिल थीं। परन्तु किसके हाथों के द्वारा उसे इन परीक्षाओं के अधीन किया गया था? वास्तव में उन्हें शैतान के द्वारा कार्यान्वित किया गया था, उन्हें व्यक्तिगत रूप से शैतान के द्वारा कार्यान्वित किया गया था—परन्तु वे परमेश्वर के द्वारा अधिकृत थीं। क्या परमेश्वर ने शैतान को बताया कि उसे किस उपाय से अय्यूब को प्रलोभित करना है? उसने नहीं बताया। परमेश्वर ने उसे सिर्फ एक शर्त दी, जिसके बाद प्रलोभन अय्यूब पर आ पड़े। जब प्रलोभन अय्यूब पर आ पड़े, तो इन्होंने लोगों को शैतान की दुष्टता और कुरूपता का, मनुष्य के प्रति उसकी दुर्भावना और घृणा का, परमेश्वर के प्रति इसकी शत्रुता की एक समझ दी। इसमें हम देखते हैं कि केवल शब्दों में इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है कि यह परीक्षा कितनी क्रूर थी। ऐसा कहा जा सकता है कि वह द्वेषपूर्ण प्रकृति जिससे शैतान ने मनुष्य को प्रताड़ित किया था और उसका कुरूप चेहरा इस क्षण पूरी तरह से प्रकट हो गए थे। शैतान ने, इस अवसर का, जो परमेश्वर की अनुमति के द्वारा प्रदान किया गया था, उपयोग अय्यूब को विह्वल करने वाले और बेरहम प्रताड़ना के अधीन करने के लिए किया, जिसकी क्रूरता का तरीका और स्तर दोनों आज लोगों के लिए अकल्पनीय और पूरी तरह से असहनीय हैं। यह कहने के बजाय कि शैतान के द्वारा अय्यूब को प्रलोभित किया गया था, और यह कि इस प्रलोभन के दौरान वह अपनी गवाही में डटा रहा, यह कहना बेहतर है कि परमेश्वर के द्वारा उसके लिए तय की गई परीक्षाओं में अय्यूब ने अपनी सिद्धता और खराई की सुरक्षा करने के लिए, और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के अपने मार्ग का बचाव करने के लिए शैतान के साथ एक मुकाबले की शुरुआत की। इस मुकाबले में, अय्यूब ने बहुत सी भेड़-बकरियों और पशुओं को गँवा दिया, उसने अपनी सारी सम्पत्ति गँवा दी, और उसने अपने पुत्रों और पुत्रियों को गँवा दिया—परन्तु उसने अपनी सिद्धता, खराई, या परमेश्वर से भय मानने को नहीं गँवाया। दूसरे शब्दों में, शैतान के साथ इस मुकाबले में उसने अपनी सिद्धता, खराई, और परमेश्वर से भय मानने को गँवाने की अपेक्षा उसने अपनी सम्पत्ति और बच्चों से वंचित किए जाना पसंद किया। उसने उस जड़ को पकड़े रहना पसंद किया कि मनुष्य होने का अर्थ क्या होता है। पवित्रशास्त्र उस समस्त प्रक्रिया का एक संक्षिप्त विवरण प्रदान करते हैं जिसके द्वारा अय्यूब ने अपनी सम्पत्ति को गँवा दिया था, और अय्यूब के आचरण और प्रवृत्ति को भी प्रलेखित करते हैं। ये संक्षिप्त, सारगर्भित विवरण यह महसूस कराते हैं कि अय्यूब इन प्रलोभनों का सामना करते समय करीब-करीब निश्चिन्त था, परन्तु जो कुछ वास्तव में घटित हुआ था यदि उसे फिर से किया जाता, जिसमें शैतान की द्वेषपूर्ण प्रकृति को भी जोड़ दिया जाता—तो हालात इतने सरल और आसान नहीं होते जैसा इन वाक्यों में वर्णन किया गया है। वास्तविकता उससे अधिक क्रूर थी। तबाही और घृणा का यह स्तर ऐसा ही है जिसके साथ शैतान मनुष्यजाति और उन सभी लोगों से व्यवहार करता है जो परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं। यदि परमेश्वर ने शैतान से अय्यूब को हानि न पहुँचाने के लिए नहीं कहा होता, तो शैतान ने बिना किसी मलाल के उसका वध कर दिया होता। शैतान नहीं चाहता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की आराधना करे, न ही वह उनके लिए जो परमेश्वर की नज़रों में धार्मिक हैं और उनके लिए जो सिद्ध और सच्चे हैं यह इच्छा करता है कि वे निरन्तर परमेश्वर का भय मानने तथा दुष्टता से दूर रहने में समर्थ हों। क्योंकि लोगों के लिए परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का अर्थ है कि वे शैतान से दूर रहें और उसे त्याग दें, और इसलिए शैतान ने बिना किसी दया के अय्यूब के ऊपर अपना समस्त क्रोध और नफ़रत लादने के लिए परमेश्वर की अनुमति का फायदा उठाया। तो तुम देखो, कि वह यंत्रणा कितनी बड़ी थी जिसे अय्यूब के द्वारा मस्तिष्क से लेकर देह तक, बाहर से लेकर भीतर तक सहा गया था। आज, हमें नहीं दिखाई देता है कि उस समय यह कैसा था, और हम केवल बाइबल के विवरणों से ही अय्यूब की उस समय की भावनाओं की एक छोटी सी झलक प्राप्त कर सकते हैं जब उसे यंत्रणा के अधीन किया गया था।

अय्यूब की अटल सत्यनिष्ठा शैतान को शर्मिंदा करती है और उसे दहशत में डाल कर भगा देती है

और जब अय्यूब को इस यंत्रणा के अधीन किया गया था तो परमेश्वर ने क्या किया? परमेश्वर ने परिणाम का अवलोकन किया, उसे देखा, और उसकी प्रतीक्षा की। जब परमेश्वर ने अवलोकन किया और देखा, तो उसे कैसा महसूस हुआ? निस्संदेह उसने शोक में डूबा हुआ महसूस किया। परन्तु, उसकी व्यथा के परिणामस्वरूप, क्या वह शैतान को अय्यूब को प्रलोभित करने की अनुमति देने के लिए पछतावा कर सकता था? इसका उत्तर है, नहीं, वह पछतावा नहीं कर सकता था। क्योंकि वह दृढ़ता से विश्वास करता था कि अय्यूब सिद्ध और खरा है, वह परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता है। परमेश्वर ने शैतान को बस यही अनुमति दी थी कि वह परमेश्वर के सामने अय्यूब की धार्मिकता को सत्यापित करे, और अपनी स्वयं की दुष्टता और घिनौनेपन को प्रकट करे। इसके अतिरिक्त, यह अय्यूब के लिए एक अवसर था कि वह अपनी धार्मिकता और परमेश्वर के प्रति अपने भय और दुष्टता से दूर रहने को संसार के लोगों, शैतान, और यहाँ तक कि उन लोगों के सामने भी प्रमाणित करे जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। क्या अंतिम परिणाम ने यह साबित किया कि अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन सही और त्रुटिहीन था? क्या अय्यूब ने वास्तव में शैतान पर विजय प्राप्त की? हम यहाँ पर अय्यूब के द्वारा बोले गए ठेठ वचनों को पढ़ते हैं, ऐसे वचन जो इस बात का प्रमाण हैं कि उसने शैतान पर विजय पा ली थी। उसने कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा।" यह परमेश्वर के प्रति अय्यूब की आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति है। इसके बाद, फिर उसने कहा: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" अय्यूब के द्वारा कहे गए ये वचन साबित करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, कि वह मनुष्य के मन के भीतर देखने में समर्थ है, और वे साबित करते हैं कि अय्यूब की उसकी स्वीकृति त्रुटिहीन है, कि यह मनुष्य जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था, धार्मिक था। "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" ये वचन परमेश्वर के प्रति अय्यूब की गवाही हैं। ये वे साधारण वचन थे जिन्होंने शैतान को डरा दिया था, जिन्होंने उसे शर्मिंदा कर दिया था और उसे दहशत में डाल कर भगा दिया था, और, इसके अतिरिक्त, जिन्होंने शैतान को जंज़ीरों में जकड़ लिया था और उसे संसाधन-हीन छोड़ दिया था। इसलिए भी इन वचनों ने शैतान को यहोवा परमेश्वर के कर्मों की अद्भुतता और ताक़त महसूस करायी, और उसे ऐसे व्यक्ति के असाधारण आकर्षण को बूझने दिया जिसके हृदय पर परमेश्वर के मार्ग के द्वारा शासन किया जाता था। इसके अलावा, उन्होंने शैतान के सामने वह सामर्थ्यवान जीवन-शक्ति प्रदर्शित की जो एक छोटे से और महत्वहीन मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का पालन करने में दिखायी गई थी। इस प्रकार शैतान को इस पहले मुकाबले में पराजित किया गया था। अपनी "परिश्रम से अर्जित अंतर्दृष्टि" के बावजूद, शैतान का अय्यूब को छोड़ने का कोई इरादा नहीं था, न ही उसकी द्वेषपूर्ण प्रकृति में कोई बदलाव आया था। शैतान ने अय्यूब पर लगातार आक्रमण करने की कोशिश की, और इस प्रकार एक बार फिर से वह परमेश्वर के सामने आया ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 43

शैतान एक बार फिर से अय्यूब को प्रलोभित करता है (अय्यूब के पूरे शरीर में दर्दनाक फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:3 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान के द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:4-5 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

ग. अय्यूब परीक्षा से कैसे निपटता है

अय्यूब 2:9-10 तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।" उसने उससे कहा, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?" इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया।

अय्यूब 3:3 वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, "बेटे का गर्भ रहा।"

परमेश्वर के मार्ग का अय्यूब का प्रेम अन्य सभी से बढ़कर है

पवित्रशास्त्र परमेश्वर और शैतान के बीच कहे गए वचनों को निम्नलिखित रूप में प्रलेखित करता है: "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है'" (अय्यूब 2:3)। इस संवाद में, परमेश्वर उसी प्रश्न को शैतान के सामने दोहराता है। यह ऐसा प्रश्न है जो हमें यहोवा परमेश्वर के उस बारे में सकारात्मक आँकलन को दिखाता है जो पहले परीक्षण के दौरान अय्यूब के द्वारा प्रदर्शित किया गया था और जीया गया था, और यह ऐसा प्रश्न है जो अय्यूब के शैतान के प्रलोभन से होकर गुज़रने से पहले के परमेश्वर के आँकलन से अलग नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि, उसके ऊपर प्रलोभन के आने से पहले, परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब सिद्ध था, और इसलिए परमेश्वर ने उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा की, और उसे आशीष दिया था; वह परमेश्वर की नज़रों में आशीष दिए जाने के योग्य था। प्रलोभन के पश्चात्, अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया क्योंकि उसने अपनी सम्पत्ति और अपने बच्चों को गँवा दिया था, परन्तु निरन्तर यहोवा के नाम की प्रशंसा करता रहा। उसके वास्तविक आचरण ने परमेश्वर से उसकी प्रशंसा करवाई, और उसे पूरे अंक दिलाए। क्योंकि अय्यूब की नज़रों में, उसकी संतान या उसकी सम्पत्ति उससे परमेश्वर को त्याग करवाने के लिए पर्याप्त नहीं थे। दूसरे शब्दों में, उसके हृदय में परमेश्वर के स्थान को उसके बच्चों या सम्पत्ति के किसी भी टुकड़ें से बदला नहीं जा सकता था। अय्यूब के प्रथम प्रलोभन के दौरान, उसने परमेश्वर को दिखाया कि उसके के लिए उसका प्रेम और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग के लिए उसका प्रेम अन्य सभी से बढ़कर है। यह मात्र इतना ही है कि इस परीक्षण ने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करने और उसके द्वारा उसकी सम्पत्ति तथा बच्चों को उससे दूर करने का अनुभव प्रदान किया।

अय्यूब के लिए, यह एक सच्चा अनुभव था जिसने उसकी आत्मा को धोकर स्वच्छ किया था, यह जीवन का एक बपतिस्मा था जिसने उसके अस्तित्व को पूर्ण किया था, तथा, इससे अधिक और क्या, यह एक आलीशान भोज था जिसने परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता और उसके भय की परीक्षा ली थी। इस प्रलोभन ने अय्यूब की स्थिति को एक धनवान पुरुष से ऐसे मनुष्य में रूपान्तरित कर दिया जिसके पास कुछ भी नहीं था, और इसने उसे मनुष्यजाति के बारे में शैतान के दुर्व्यवहार का अनुभव भी करने दिया था। उसकी अभावग्रस्तता ने उसे शैतान से घृणा नहीं करने दी; उसके बजाए, शैतान की नीच करतूतों में उसने शैतान की कुरूपता और घिनौनेपन को, और साथ ही परमेश्वर के प्रति शैतान की शत्रुता और विद्रोह को भी देखा, और इसने उसे हमेशा परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने के लिए बेहतर ढंग से प्रोत्साहित किया। उसने शपथ खाई कि वह सम्पत्ति, बच्चों या कुटुम्बियों जैसे बाहरी कारकों की वजह से कभी भी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और परमेश्वर के मार्ग से कभी पीछे नहीं हटेगा, न ही वह कभी शैतान, सम्पत्ति, या किसी व्यक्ति का दास बनेगा; यहोवा परमेश्वर के अलावा, कोई भी उसका प्रभु, या उसका परमेश्वर नहीं हो सकता है। अय्यूब की आकांक्षाएँ ऐसी ही थीं। प्रलोभन के पार, अय्यूब ने भी कुछ अर्जित किया थाः उसने परमेश्वर के द्वारा दिए गए परीक्षण के बीच प्रचुर सम्पत्ति अर्जित की थी।

पिछले कई दशकों के अपने जीवन के दौरान, अय्यूब ने यहोवा के कर्मों को देखा था और अपने लिए यहोवा परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त किया था। वे ऐसे आशीष थे जिन्होंने उसे अत्यंत बेचैन और कृतज्ञ होने का एहसास कराया था, क्योंकि वह विश्वास करता था कि उसने परमेश्वर के लिए कुछ भी नहीं किया था, फिर भी उसे इतने बड़े आशीष वसीयत में दिए गए थे और उसने बहुत अधिक अनुग्रह का आनन्द उठाया था। इस कारण से, अपने हृदय में वह प्रायः प्रार्थना करता था, यह आशा करता था कि वह परमेश्वर को बदले में कुछ दे पाएगा, यह आशा करता था कि उसे परमेश्वर के कर्मों और महानता की गवाही देने का अवसर मिलेगा, और यह आशा करता था कि परमेश्वर उसकी आज्ञाकारिता की परीक्षा लेगा, और, इससे बढ़कर, कि उसके विश्वास को शुद्ध किया जा सकता था, जब तक कि उसकी आज्ञाकारिता और उसका विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर लेते हैं। और जब परीक्षण अय्यूब के ऊपर आया, तो उसने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को सुन लिया है। अय्यूब ने किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर इस अवसर को सँजोया, और इसलिए उसने इसके साथ हल्के ढंग से व्यवहार करने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि उसकी जीवनभर की सबसे बड़ी इच्छा साकार हो सकती थी। इस अवसर के आगमन का अर्थ था कि उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय की परीक्षा ली जा सकती थी, और उन्हें शुद्ध किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, इसका अर्थ था कि अय्यूब के पास परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त करने का एक अवसर था, जो उसे इस प्रकार परमेश्वर के और करीब ला रहा था। परीक्षण के दौरान, ऐसे विश्वास और खोजों ने उसे और अधिक सिद्ध बनने दिया, और परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्राप्त करने दी। अय्यूब परमेश्वर के आशीषों और अनुग्रहों के लिए और अधिक कृतज्ञ हो गया, उसने अपने हृदय में परमेश्वर के कर्मों के लिए और अधिक प्रशंसा उँडेल दी, और वह परमेश्वर के प्रति और अधिक भयातुर और श्रद्धालु हो गया, और उसने परमेश्वर की सुन्दरता, महानता तथा पवित्रता की और अधिक अभिलाषा की। इस समय, यद्यपि परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब अभी भी ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था, फिर भी उसके अनुभवों के संबंध में, अय्यूब का विश्वास और ज्ञान बहुत तीव्रता से आया था: उसका विश्वास बढ़ चुका था, उसकी आज्ञाकारिता ने पाँव जमा लिया था, और परमेश्वर के प्रति उसका भय और अधिक गम्भीर हो चुका था। यद्यपि इस परीक्षण ने अय्यूब की आत्मा और जीवन को रूपान्तरित किया, फिर भी ऐसे रूपान्तरण ने अय्यूब को संतुष्ट नहीं किया, न ही इसने आगे की ओर उसकी प्रगति को धीमा किया। ठीक उसी समय जब वह गुणा भाग कर रहा था कि उसने इस परीक्षण से क्या अर्जित किया था, और अपनी स्वयं की कमियों पर विचार करते हुए, उसने, अगले परिक्षण की अपने ऊपर आने की प्रतीक्षा करते हुए, खामोशी से प्रार्थना की, क्योंकि उसने अपने विश्वास, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के प्रति भय को परमेश्वर के अगले परीक्षण के दौरान ऊँचा किए जाने लालसा की थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 44

शैतान एक बार फिर से अय्यूब को प्रलोभित करता है (अय्यूब के पूरे शरीर में दर्दनाक फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:3 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान के द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:4-5 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

चरम पीड़ा के बीच, अय्यूब सचमुच में मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की देखरेख महसूस करता है

शैतान से यहोवा परमेश्वर के प्रश्न के बाद, शैतान गुप-चुप रूप से खुश था। ऐसा इसलिए था क्योंकि शैतान जानता था कि उसे एक बार फिर से उस मनुष्य पर हमला करने की अनुमति दी जाएगी जो परमेश्वर की नज़रों में सिद्ध था—जो कि शैतान के लिए एक दुर्लभ अवसर था। शैतान अय्यूब के दृढ़ निश्चय को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए, और उससे परमेश्वर के विश्वास का त्याग करवाने के लिए इस अवसर का उपयोग करना चाहता था, जिससे वह परमेश्वर का अब और भय न माने या यहोवा के नाम को धन्य न कहे। यह शैतान को एक अवसर देगा: स्थान या समय कोई भी हो, वह अय्यूब से अपनी आज्ञा के अधीन आचरण करवाने में समर्थ होगा। शैतान ने किसी नामो निशां के बिना अपने दुष्ट षड्यंत्रों को छिपा रखा था, परन्तु वह अपनी दुष्ट प्रकृति को नियंत्रण में नहीं रख सकता था। इस सच्चाई का संकेत यहोवा परमेश्वर के वचनों के इसके उत्तर में मिल सकता है, जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है: "शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, 'खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा'" (अय्यूब 2:4-5)। परमेश्वर और शैतान के बीच इस वार्तालाप से शैतान के द्वेष का तात्विक ज्ञान और समझ प्राप्त न करना असम्भव है। शैतान की इन भ्रामक बातों को सुनने के बाद, जो सत्य से प्रेम करते हैं और दुष्टता से घृणा करते हैं वे सभी निःसन्देह शैतान की नीचता और निर्लज्जता से अत्यधिक नफ़रत करेंगे, शैतान की भ्रांतियों से त्रस्त और घृणा महसूस करेंगे, और साथ ही, यह प्रार्थना करते हुए कि खराई वाला यह व्यक्ति सिद्धता को प्राप्त कर सके, यह इच्छा करते हुए कि यह व्यक्ति जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता है वह सदा के लिए शैतान के प्रलोभनों पर विजय पाए, और प्रकाश में जीवन बिताए, और परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसकी आशीषों के बीच जीवन बिताए, वे अय्यूब के लिए गम्भीर प्रार्थनाएँ और सच्ची कामनाएँ करेंगे; वे यह भी इच्छा करेंगे कि अय्यूब के धार्मिक कर्म सदैव उन लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित कर सकें जो परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग की खोज करते हैं। हालाँकि शैतान के द्वेषपूर्ण इरादे को इस घोषणा में देखा जा सकता है, फिर भी परमेश्वर शैतान की "विनती" को लेकर आसानी से सहमत हो गया था—परन्तु उसकी एक शर्त भी है: "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना" (अय्यूब 2:6)। क्योंकि, इस बार, शैतान ने अय्यूब के माँस और हड्डियों को नुकसान पहुँचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाने की माँग की थी, इसलिए परमेश्वर ने कहा, "केवल उसका प्राण छोड़ देना।" इन वचनों का अर्थ है कि उसने अय्यूब की देह को शैतान को दे दिया, परन्तु उसके जीवन को बचाए रखा। शैतान अय्यूब का जीवन नहीं ले सकता था, परन्तु इसके अलावा शैतान अय्यूब के विरुद्ध किसी भी उपाय या तरीके को उपयोग में ला सकता था।

परमेश्वर की अनुमति प्राप्त करने के बाद, शैतान अय्यूब पर झपटा और उसकी चमड़ी को पीड़ा पहुँचाने के लिए उसने अपना हाथ बढ़ाया, उसके पूरे शरीर पर पीड़ादायक फोड़े पैदा कर दिए, और अय्यूब ने अपनी चमड़ी में अत्यधिक पीड़ा महसूस की। अय्यूब ने यहोवा परमेश्वर की चमत्कारिकता और पवित्रता की प्रशंसा की, जिसने शैतान को उसके ढीठपन में और भी अधिक जघन्य बना दिया। क्योंकि उसने मनुष्य को पीड़ा पहुँचाने के आनन्द को महसूस किया था, इसलिए शैतान ने अपना हाथ बढ़ाया और अय्यूब के माँस को खरोंच दिया, जिससे उसके घाव पकने लगे। अय्यूब ने तुरन्त ही अपनी देह में ऐसी पीड़ा और यंत्रणा महसूस की जिसकी तुलना नहीं की जा सकती थी, और वह अपने हाथों से अपने आप को सिर से लेकर पाँव तक दबाने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता था, मानो कि यह शरीर की इस पीड़ा से उसकी आत्मा में हुए इस आघात से उसे राहत पहुँचाएगा। उसने महसूस किया कि परमेश्वर उसकी बगल में खड़े होकर उसे देख रहा था, और उसने अपने आपको मज़बूत बनाने का भरसक प्रयत्न किया। वह एक बार फिर से भूमि पर घुटने के बल बैठ गया, और कहा: तू मनुष्य के हृदय के भीतर झाँकता है, तू उसकी दुर्दशा को देखता है; क्यों उसकी कमज़ोरी तुझे चिंतित करती है? परमेश्वर यहोवा के नाम की स्तुति हो। शैतान ने अय्यूब के असहनीय दर्द को देखा, परन्तु उसने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर के नाम को त्यागते हुए नहीं देखा। इसलिए अय्यूब के अंग-अंग को तोड़ने के लिए बेताब उसने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुँचाने के लिए जल्दी से अपना हाथ बढाया। तत्क्षण, अय्यूब ने अभूतपूर्व यंत्रणा महसूस की; यह ऐसा था मानो कि उसके माँस को हड्डियों में से चीरकर बाहर निकाल दिया गया हो, और मानो कि उसकी हड्डियों को थोड़ा-थोड़ा करके कुचला जा रहा हो। इस भयंकर पीड़ा ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि बेहतर होता कि वह मर जाता...। सहने की उसकी क्षमता अपनी चरम सीमा तक पहुँच गई थी...। वह चिल्लाना चाहता था, वह उस दर्द को कम करने के लिए अपने शरीर की चमड़ी को चीर देना चाहता था—फिर भी उसने अपनी चीख को दबा कर रखा, और अपने शरीर की चमड़ी को नहीं चीरा, क्योंकि वह अपनी कमज़ोरी शैतान को नहीं देखने देना चाहता था। और इसलिए वह एक बार फिर से घुटने के बल बैठ गया, परन्तु इस बार उसने यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति को महसूस नहीं किया। वह जानता था कि वह अक्सर उसके सामने, और उसके पीछे, और उसके दोनों तरफ रहता है। मगर उसकी पीड़ा के दौरान, परमेश्वर ने कभी भी अवलोकन नहीं किया; उसने अपना चेहरा ढक लिया था और वह छिप गया था, क्योंकि मनुष्य को सृजित करने का उसका अभिप्राय मनुष्य को पीड़ा पहुँचाना नहीं था। इस बार, अय्यूब रो रहा था, और इस शारीरिक पीड़ा को सहने के लिए अपना हर सम्भव प्रयास कर रहा था, फिर भी वह परमेश्वर को धन्यवाद देने से अपने आपको अब और रोक नहीं सका था: मनुष्य पहले प्रहार में ही गिर जाता है, वह कमज़ोर और निर्बल है, वह युवा और अज्ञानी है—तू उसके प्रति इतना चिंतित और कोमल होने की इच्छा क्यों करेगा? तू मुझे मारता है, फिर भी ऐसा करने से तुझे भी तकलीफ़ होती है। मनुष्य में ऐसी क्या चीज़ है जो तेरी देखभाल और चिंता के लायक है? अय्यूब की प्रार्थनाएँ परमेश्वर के कानों तक पहुँची, और परमेश्वर खामोश रहा, केवल चुपचाप देखता रहा...। हर उपलब्ध चाल का प्रयास करने के कोई फायदा नहीं होने पर, शैतान चुपचाप चला गया, फिर भी इससे अय्यूब के बारे में परमेश्वर की परीक्षाएँ समाप्त नहीं हुईं। क्योंकि अय्यूब में प्रकट हुई परमेश्वर की सामर्थ्य सार्वजनिक नहीं की गई थी, इसलिए अय्यूब की कहानी शैतान के पीछे हटने के साथ समाप्त नहीं हुई। जैसे ही अन्य पात्रों ने प्रवेश किया, और भी अधिक असाधारण दृश्यों का आना अभी बाकी था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 45

सभी चीजों में परमेश्वर के नाम को अत्यधिक महिमा देना, अय्यूब की परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की एक अन्य अभिव्यक्ति है

अय्यूब ने शैतान के विध्वंसों को सहा था, फिर भी उसने यहोवा परमेश्वर के नाम को नहीं छोड़ा। उसकी पत्नी वह पहली इंसान थी जिसने कदम बढ़ाया और शैतान की भूमिका निभाई जिसे अय्यूब पर हमले के द्वारा देखा जा सकता है। मूल पाठ इस प्रकार से इसका वर्णन करता है: "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा'" (अय्यूब 2:9)। ये वे शब्द हैं जो मनुष्य के भेष में शैतान के द्वारा कहे गए थे। वे एक आक्रमण, और एक आरोप, और साथ ही फुसलावा, एक प्रलोभन, और कलंक भी थे। अय्यूब की देह पर आक्रमण करने में असफल होने पर, शैतान ने सीधे तौर पर उसकी सत्यनिष्ठा पर हमला कर दिया, वह अय्यूब से उसकी सत्यनिष्ठा छुड़वाने, परमेश्वर का त्याग करवाने, और जीवन जीना छुड़वाने के लिए इसका उपयोग करना चाहता था। इसलिए शैतान भी अय्यूब को प्रलोभित करने के लिए ऐसे वचनों का उपयोग करना चाहता था: यदि अय्यूब यहोवा के नाम को छोड़ देता, तो उसे ऐसी यंत्रणा को सहने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपने आपको देह की यंत्रणा से मुक्त कर सकता था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने यह कह कर उसे झिड़का, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" (अय्यूब 2:10)। अय्यूब काफी समय से इन वचनों को जानता था, परन्तु इस समय उनके बारे में अय्यूब के ज्ञान की सच्चाई साबित हुई थी।

जब उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को कोसने और मर जाने की सलाह दी, तो उसका आशय था: तेरा परमेश्वर तुझसे ऐसा ही बर्ताव करता है, तो तू उसे कोसता क्यों नहीं है? अभी भी जीवित रहकर तू क्या कर रहा है? तेरा परमेश्वर तेरे प्रति इतना अनुचित है, फिर भी तू कहता है कि यहोवा का नाम धन्य हो। जब तू उसके नाम को धन्य कहता है तो वह कैसे तेरे ऊपर आपदा ला सकता है? जल्दी कर और उसके नाम को त्याग दे, और अब से उसका अनुसरण मत करना। इस तरह से तेरी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी। इस पल, वहाँ ऐसी गवाही उत्पन्न हुई जो परमेश्वर अय्यूब में देखना चाहता था। कोई साधारण मनुष्य ऐसी गवाही नहीं दे सकता था, न ही हम इसके बारे में बाइबल की किसी अन्य कहानी में पढ़ते हैं—परन्तु अय्यूब के द्वारा इन वचनों को कहने के बहुत पहले ही परमेश्वर ने इसे देख लिया था। परमेश्वर ने अय्यूब को सबके सामने यह साबित करने देने के लिए कि परमेश्वर सही है, इस अवसर का उपयोग करने की मात्र इच्छा की थी। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने न केवल अपनी सत्यनिष्ठा को नहीं छोड़ा या परमेश्वर को नहीं त्यागा, बल्कि उसने अपनी पत्नी से यह भी कहा: "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" क्या इन शब्दों का बहुत महत्व है? यहाँ, केवल एक ही तथ्य है जो इन शब्दों के महत्व को साबित करने में सक्षम है। इन शब्दों का महत्व यह है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा अपने हृदय में स्वीकार किया गया है, ये वे वचन हैं जिनकी इच्छा परमेश्वर के द्वारा की गई थी, ये वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर सुनना चाहता था, और ये वे परिणाम हैं जिन्हें परमेश्वर ने देखने की लालसा की थी; ये वचन अय्यूब की गवाही का सार भी हैं। इसमें, अय्यूब की सिद्धता, खराई, परमेश्वर का भय, और दुष्टता से दूर रहना प्रमाणित हुए थे। अय्यूब की बहुमूल्यता इसमें निहित है कि जब उसे प्रलोभित किया गया, और यहाँ तक कि जब उसका पूरा शरीर दुःखदायी फोड़ों से भर गया था, जब उसने अत्यधिक यंत्रणा सही थी, और जब उसकी पत्नी और कुटुंबियों ने उसे सलाह दी थी, तो कैसे उसने तब भी इन वचनों को कहा था। इसे दूसरी तरह से कहें, तो अपने हृदय में वह विश्वास करता था कि, भले भी कोई से भी प्रलोभन, या कैसे भी दुःसह क्लेश या यंत्रणा क्यों न हों, यहाँ तक कि उसके ऊपर मृत्यु ही क्यों न आ जाए, वह कभी भी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को नहीं ठुकराएगा। तो तुम देखो, कि परमेश्वर उसके हृदय में अति महत्वपूर्ण स्थान रखता था, और कि उसके हृदय में केवल परमेश्वर ही था। इसी वजह से ही हम पवित्र शास्त्र में उसके बारे में इस प्रकार के विवरण को पढ़ते हैं: इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया। उसने न केवल अपने मुँह से पाप नहीं किया, बल्कि अपने हृदय में उसने परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत भी नहीं की। उसने परमेश्वर के बारे में ठेस पहुँचाने वाले वचनों को नहीं कहा, न ही उसने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया। न केवल अपने मुँह ने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा, बल्कि अपने हृदय में भी उसने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा; उसका मुँह और हृदय एक जैसे ही थे। यही परमेश्वर के द्वारा देखा गया सच्चा अय्यूब था, और यही वह वास्तविक कारण था कि क्यों परमेश्वर ने अय्यूब को सँजोकर रखा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 46

अय्यूब के बारे में लोगों की अनेक ग़लतफहमियाँ

अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयाँ परमेश्वर के द्वारा भेजे गए स्वर्गदूतों का कार्य नहीं थे, न ही यह परमेश्वर के अपने हाथ से किया गया था। इसके बजाए, इसे व्यक्तिगत रूप से, परमेश्वर के शत्रु, शैतान, के द्वारा किया गया था। परिणामस्वरूप, अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयों का स्तर अत्यधिक गहरा था। फिर भी इस क्षण अय्यूब ने, बिना किसी संशय के, अपने हृदय में परमेश्वर के बारे में अपने प्रतिदिन के ज्ञान को, अपने प्रतिदिन के कार्यों के सिद्धान्तों को, और परमेश्वर के प्रति अपनी प्रवृत्ति को प्रदर्शित किया था—और यही सत्य है। यदि अय्यूब को प्रलोभित नहीं किया गया होता, यदि परमेश्वर अय्यूब के ऊपर इन विपत्तियों को नहीं लाया होता, तो जब अय्यूब ने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," तो तुम कहते कि अय्यूब एक पाखंडी है; परमेश्वर ने उसे बहुत सारी सम्पत्ति दी थी, इसलिए सहज है कि उसने यहोवा के नाम को धन्य कहा। यदि परीक्षाओं के अधीन किए जाने से पहले, अय्यूब ने कहा होता, "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तो तुम कहते कि अय्यूब बढ़ा-चढ़ा कर बातें कर रहा है, और वह परमेश्वर के नाम को नहीं त्यागेगा क्योंकि उसे परमेश्वर के हाथ के द्वारा प्रायः आशीष दिए गए थे। यदि परमेश्वर उसके ऊपर विपत्ति लाया होता, तो उसने निश्चित रूप से परमेश्वर के नाम को त्याग दिया होता। फिर भी जब अय्यूब ने अपने आपको ऐसी परिस्थितियों में पाया जिनकी कोई इच्छा नहीं करेगा, या जिन्हें देखने की कोई इच्छा नहीं करेगा, या इच्छा नहीं चाहेगा कि वे उसके ऊपर आएँ, और जिनके अपने ऊपर आने से लोग डरेंगे, ऐसी परिस्थितियाँ जिन्हें यहाँ तक कि परमेश्वर भी देखना सहन नहीं कर सकता था, अय्यूब उन परिस्थतियों में अपनी ईमानदारी को अभी भी थामे रखने में समर्थ था: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" और "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इस समय अय्यूब के बर्ताव का सामना करने पर, जो लोग आडम्बरी बातें करना पसंद करते हैं, और जो शब्दों और सिद्धान्तों को बोलना पसंद करते हैं, वे निःशब्द रह जाते हैं। जो लोग केवल भाषण में ही परमेश्वर के नाम की प्रशंसा करते हैं, मगर जिन्होंने कभी भी परमेश्वर की परीक्षाओं को कभी स्वीकार नहीं किया है, उनकी उस ईमानदारी के द्वारा निन्दा की जाती है जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामा था, और जिन लोगों ने कभी भी विश्वास नहीं किया कि मनुष्य परमेश्वर के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने में समर्थ है उनका अय्यूब की गवाही के द्वारा न्याय किया जाता है। इन परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के आचरण और उसके द्वारा बोले गए वचनों से सामना होने पर, कुछ लोग भ्रमित महसूस करेंगे, कुछ लोग ईर्ष्या महसूस करेंगे, कुछ लोग संशयात्मक महसूस करेंगे, और कुछ लोग तो उदासीन भी दिखाई देंगे, और अय्यूब की गवाही को स्वीकार करने से इनकार कर देंगे क्योंकि वे न केवल उस यंत्रणा को देखते हैं जो परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के ऊपर आ पड़ी थी, और उन वचनों को पढ़ते हैं जो अय्यूब के द्वारा कहे गए थे, बल्कि वे मनुष्य की "कमज़ोरियों" को भी देखते हैं जो अय्यूब के द्वारा प्रकट की गई थीं जब परीक्षाएँ उसके ऊपर आयी थीं। इस "कमज़ोरी" को वे अय्यूब की सिद्धता में कल्पित अपूर्णता मानते हैं, ऐसे मनुष्य में एक धब्बा मानते हैं जो परमेश्वर की नज़रों में सिद्ध था। करने का तात्पर्य है कि, यह विश्वास किया जाता है कि जो लोग सिद्ध होते हैं वे त्रुटिहीन, किसी भी दाग या धब्बे से रहित होते हैं, यह कि उनमें कोई कमज़ोरी नहीं होती है, उन्हें पीड़ा का ज्ञान नहीं होता है, यह कि वे कभी अप्रसन्न या उदास महसूस नहीं करते हैं, और वे घृणा या किसी भी बाह्य चरम व्यवहार से रहित होते है; परिणामस्वरूप, लोगों का एक बड़ा बहुमत यह विश्वास नहीं करता है कि अय्यूब पूरी तरह से सिद्ध था। लोग अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसके अधिकांश व्यवहार को स्वीकृति नहीं देते हैं। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब ने अपनी सम्पत्ति और बच्चों को गँवा दिया, तो वह फूट-फूट कर नहीं रोया जैसा कि लोग कल्पना करते। उसकी "अशिष्टता" लोगों को यह विचारने पर मजबूर कर देती है कि वह भावशून्य था, क्योंकि वह आँसुओं से, या अपने परिवार के लिए प्रेम से रहित था। यह वह बुरी धारणा है जिसे अय्यूब सबसे पहले लोगों को देता है। उसके बाद वे उसके व्यवहार को और भी अधिक व्याकुल करने वाला पाते हैं: "बागा फाड़" को लोगों के द्वारा परमेश्वर के प्रति उसके अनादर के रूप में भाषांतरित किया गया है, और "सिर मुँडाने" को परमेश्वर के प्रति अय्यूब की निन्दा और विरोध के अभिप्राय में ग़लत ढंग से माना गया है। अय्यूब के इन शब्दों के अलावा कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," लोगों अय्यूब में किसी भी धार्मिकता को नहीं पहचानते हैं जिसकी प्रशंसा परमेश्वर के द्वारा की गई थी, और इस प्रकार अय्यूब के बारे में उनमें से एक बड़े बहुमत का आँकलन नासमझी, ग़लतफहमी, सन्देह, निन्दा, और सिर्फ सिद्धान्तों में ही स्वीकृति से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। उनमें से कोई भी यहोवा परमेश्वर के वचनों को सही मायने में समझने और उनकी सराहना करने में समर्थ नहीं है कि अय्यूब एक सिद्ध और एक सच्चा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था।

अय्यूब के बारे में उनकी धारणा के आधार पर, लोगों में उसकी धार्मिकता को लेकर और अधिक सन्देह हैं, क्योंकि पवित्रशास्त्र में दर्ज अय्यूब के कार्य और उसका व्यवहार उतने मर्मस्पर्शी नहीं हैं जितना लोगों ने कल्पना की थी। न केवल उसने किसी बड़ी उपलब्धि को कार्यान्वित नहीं किया, बल्कि उसने राख में बैठकर अपने आपको खुजाने के लिए मटके का एक टुकड़ा भी लिया। यह कार्य भी लोगों को बहुत अधिक आश्चर्यचकित करता है और उन्हें अय्यूब की धार्मिकता पर सन्देह करने—और यहाँ तक कि उसे नकारने—का कारण बनता है, क्योंकि स्वयं को खुजाते हुए अय्यूब ने परमेश्वर से प्रार्थना नहीं की, या परमेश्वर से प्रतिज्ञा नहीं की; इसके अतिरिक्त, न ही वह दर्द के आँसू बहाते हुए देखा गया। इस समय, लोगों ने सिर्फ उसकी कमज़ोरी को ही देखा और किसी अन्य चीज़ को नहीं, और इसलिए यहाँ तक कि जब उन्होंने अय्यूब को यह कहते हुए सुना, "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तो वे पूरी तरह से भावशून्य रह गए, या अन्यथा दुविधा में पड़ गए, और वे अभी भी अय्यूब के वचनों से उसकी धार्मिकता को पहचानने में असमर्थ हैं। वह बुनियादी धारणा जो अय्यूब अपनी यंत्रणा के दौरान लोगों को देता है वह है कि वह न तो चापलूस था और न ही अहंकारी। लोग उसके व्यवहार के पीछे की उस कहानी को नहीं देखते हैं जो उसके हृदय की गहराईयों में घटी थी, न ही वे उसके हृदय के भीतर परमेश्वर के भय को या दुष्टता से दूर रहने के मार्ग के सिद्धान्तों के अनुपालन को देखते हैं। उसका समभाव लोगों से यह विचार करवाता है कि उसकी सिद्धता और खराई केवल खोखले शब्द थे, यह कि परमेश्वर के प्रति उसका भय केवल एक सुनी हुई बात थी; इसी बीच, जो "कमज़ोरी" उसने बाह्य रूप से प्रकट की थी, वह, उस मनुष्य पर एक "नया परिप्रेक्ष्य," और यहाँ तक कि उसके प्रति "एक नई समझ" देते हुए जिसे परमेश्वर सिद्ध और सच्चे के रूप में परिभाषित करता है, उन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ती है। ऐसा कोई "नया परिप्रेक्ष्य" और "नई समझ" उस समय प्रमाणित होते हैं जब अय्यूब ने अपना मुँह खोला और उस दिन को कोसा जब वह पैदा हुआ था।

यद्यपि उस यंत्रणा का स्तर जो उसने झेली थी किसी भी मनुष्य के लिए अकल्पनीय और समझ से बाहर है, फिर भी उसने सुनी हुई बातों के कोई वचन नहीं बोले, बल्कि केवल अपने स्वयं के उपायों के द्वारा अपने शरीर के दर्द को कम किया। जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है, उसने कहा: "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा'" (अय्यूब 3:3)। कदाचित्, किसी ने भी इन वचनों को कभी भी महत्वपूर्ण नहीं माना है, और कदाचित् ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने इन पर ध्यान दिया है। तुम लोगों की नज़र में, क्या इनका अभिप्राय यह है कि अय्यूब ने परमेश्वर का विरोध किया? क्या वे परमेश्वर के विरुद्ध कोई शिकायत हैं? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों में से बहुतों के पास अय्यूब के द्वारा कहे इन वचनों के बारे में कुछ निश्चित विचार हैं और बहुत से विश्वास करते हैं कि यदि अय्यूब सिद्ध और खरा था, तो उसे किसी भी प्रकार की कमज़ोरी या कष्ट को नहीं दर्शाना चाहिए था, और इसके बजाय उसे शैतान के किसी भी आक्रमण का सकारात्मक रूप से सामना करना चाहिए था, और यहाँ तक कि शैतान के प्रलोभनों का सामना करते हुए मुस्कुराना भी चाहिए था। उसे शैतान के द्वारा उसकी देह पर लायी गई किसी भी यंत्रणा के प्रति जरा सी भी प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए थी, न ही उसे अपने हृदय की किसी भी भावना को प्रकट करना चाहिए था। यहाँ तक कि उसे कहना चाहिए था कि परमेश्वर इन परीक्षाओं को और भी कठोर बना दे। यही है जिसे किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्रदर्शित और धारण किया जाना चाहिए जो अटल है और जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है। इस चरम यंत्रणा के बीच, अय्यूब ने सिर्फ अपने जन्म के समय को कोसा। उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की, और उसका परमेश्वर का विरोध करने का कोई इरादा तो बिलकुल भी नहीं था। इसे करने की तुलना में कहना अधिक आसान है, क्योंकि प्राचीन समयों से लेकर आज के दिन तक, किसी ने भी ऐसे प्रलोभनों का अनुभव नहीं किया या सहा था जो अय्यूब आ पड़े थे। और अय्यूब के समान किसी भी व्यक्ति को उस प्रकार के प्रलोभनों के अधीन क्यों नहीं किया गया है? क्योंकि जैसा कि परमेश्वर इसे देखता है, कोई भी व्यक्ति ऐसी ज़िम्मेदारी या आदेश को सहन करने में समर्थ नहीं है, कोई भी वैसा नहीं कर सकता है जैसा अय्यूब ने किया, और इसके अतिरिक्त, अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा, कोई भी तब भी परमेश्वर के नाम को नहीं त्यागना नहीं कर सकता है और परमेश्वर यहोवा के नाम को लगातार धन्य नहीं कह सकता है, जैसा कि अय्यूब ने किया था जब उस पर यंत्रणा आ पड़ी थीं। क्या कोई ऐसा कर सकता था? जब हम अय्यूब के बारे में ऐसा कहते हैं, तो क्या हम उसके व्यवहार की सराहना कर रहे हैं? वह एक धार्मिक मनुष्य था, और परमेश्वर की ऐसी गवाही देने में समर्थ था, और वह शैतान को उसके हाथों से उसका सिर पकड़ कर भगाने में समर्थ था, ताकि वह दोबारा उस पर दोष लगाने के लिए परमेश्वर के सामने न आए—तो उसकी सराहना करने में क्या ग़लत है? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर की अपेक्षा तुम लोगों के मानक अधिक ऊँचे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि जब परीक्षाएँ तुम लोगों पर आतीं तो तुम लोग अय्यूब से भी बेहतर करते? परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की प्रशंसा की गई थी—तुम लोगों को क्या आपत्तियाँ हो सकती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 47

अय्यूब अपने जन्म के दिन को कोसता है क्योंकि वह नहीं चाहता है कि उसके द्वारा परमेश्वर को पीड़ा हो

मैं अक्सर कहता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, और लोग लोगों के बाह्य स्वरूप को देखते हैं। क्योंकि परमेश्वर लोगों के हृदयों के भीतर देखता है, इसलिए वह उनके सार को समझता है, जबकि लोग अन्य लोगों के सार को उनके बाह्य स्वरूप के आधार पर परिभाषित करते हैं। जब अय्यूब ने अपना मुँह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा, तो इस कार्य ने अय्यूब के तीन मित्रों सहित सभी आध्यात्मिक लोगों को अचम्भित कर दिया। मनुष्य परमेश्वर से आया, और उसे जीवन तथा शरीर के लिए, और साथ ही अपने जन्म के दिन के लिए भी आभारी होना चाहिए, जो परमेश्वर के द्वारा उसे प्रदान किया गया है, और उसे उन्हें कोसना नहीं चाहिए। यह अधिकांश लोगों के लिए समझ में आने योग्य और बोधगम्य है। जो कोई भी परमेश्वर का अनुसरण करता है उसके लिए, यह समझ पवित्र और अनुल्लंघनीय है, यह ऐसा सत्य है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता है। दूसरी ओर, अय्यूब ने नियमों को तोड़ दियाः उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। यह एक ऐसा कार्य है जिसे साधारण लोग निषिद्ध क्षेत्र को पार करने के समान मानते हैं। न केवल वह लोगों की समझ और सहानुभूति का हकदार नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की क्षमा का भी हकदार नहीं है। उसके साथ-साथ ही, और भी अधिक लोग अय्यूब की धार्मिकता के प्रति संशयात्मक हो गए, क्योंकि ऐसा दिखाई देता है कि उसके प्रति परमेश्वर की कृपा ने अय्यूब को आत्म-आसक्त बना दिया था, और इसने उसे इतना निर्भीक और लापरवाह बना दिया था कि उसने न केवल अपने जीवनकाल के दौरान उसे आशीष देने के लिए और उसकी देखभाल करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि उसने अपने जन्म के दिन को भी धिक्कार कर नष्ट कर दिया। यदि यह परमेश्वर का विरोध नहीं है, तो यह क्या है? ऐसी उथली-बातें अय्यूब के इस कार्य की निन्दा करने के लिए लोगों को सबूत प्रदान करते हैं, परन्तु कौन जान सकता है कि उस समय अय्यूब सचमुच में क्या सोच रहा था? और कौन उस कारण को जान सकता है कि क्यों अय्यूब ने उस तरह से कार्य किया? केवल परमेश्वर और स्वयं अय्यूब ही यहाँ भीतर की कहानी और कारणों को जानते हैं।

जब शैतान ने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुँचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, तो अय्यूब बच निकलने के उपायों या प्रतिरोध करने की सामर्थ्य से रहित उसके चंगुल में फँस गया। उसके शरीर और उसकी आत्मा ने अत्यधिक पीड़ा झेली, और इस पीड़ा ने उसे देह में रहने वाले मनुष्य की निरर्थकता, निर्बलता, और शक्तिहीनता का गहराई से परिचय कराया। उसके साथ-साथ, उसने इस बात की भी एक गहरी समझ प्राप्त की कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति की परवाह और देखभाल करने वाले मन वाला है। शैतान के चंगुल में, अय्यूब ने यह एहसास किया कि मनुष्य जो कि माँस और लहू का बना है, वह वास्तव में बहुत ही निर्बल और कमज़ोर है। जब वह अपने घुटनों के बल गिरा और परमेश्वर से प्रार्थना की, तो उसने ऐसा महसूस किया मानो परमेश्वर अपने मुख को ढक रहा हो, और छुप रहा हो, क्योंकि परमेश्वर ने पूरी तरह से उसे शैतान के हाथ में दे दिया था। उसके साथ-साथ, परमेश्वर भी उसके लिए रोया, और इसके अतिरिक्त, वह उसके लिए व्यथित भी था; परमेश्वर उसकी पीड़ा से पीड़ित, और उसे लगी चोट से आहत हुआ था...। अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा को महसूस किया था, और साथ ही इस बात को भी महसूस किया था कि यह परमेश्वर के लिए कितना असहनीय था...। अय्यूब परमेश्वर को और अधिक व्यथा नहीं पहुँचाना चाहता था, न ही वह यह चाहता था कि परमेश्वर उसके लिए विलाप करे, वह यह देखना तो बिलकुल नहीं चाहता था कि परमेश्वर को उसके द्वारा पीड़ा पहुँचे। इस क्षण, अय्यूब केवल स्वयं अपनी देह से वंचित होना चाहता था, अब और उस पीड़ा को सहना नहीं चाहता था जो उसकी देह के द्वारा उस पर लायी गई थी, क्योंकि यह उसकी पीड़ा से परमेश्वर को संतप्त होने से रोकता—मगर वह ऐसा नहीं कर सकता था, और उसे न केवल देह की पीड़ा को, बल्कि परमेश्वर को चिंतित न करने की इच्छा की यंत्रणा को भी सहना पड़ा। इन दो पीड़ाओं ने—एक देह से, और एक आत्मा से—अय्यूब को हृदयविदारक, अत्यंत कष्टदायी पीड़ा पहुँचायी, और उसे महसूस कराया कि कैसे माँस और लहू से बने मनुष्य की सीमाएँ उसे कुंठित और असहाय बना सकती हैं। इन परिस्थितियों के तहत, परमेश्वर के लिए उसकी लालसा और भी अधिक प्रचण्ड हो गई थी, और शैतान के लिए उसकी घृणा और भी अधिक तीव्र हो गई थी। इस समय, परमेश्वर को उसके वास्ते आँसू बहाकर रोते हुए या दर्द सहते हुए देखने की अपेक्षा, अय्यूब ने मनुष्यों के इस संसार में कभी भी जन्म नहीं लेना पसंद किया होता, बल्कि वह अस्तित्व में ही नहीं आया होता। वह अपनी देह से अत्यंत घृणा करने लगा, और अपने आप से, अपने जन्म के दिन से, और यहाँ तक कि उन सब से निराश होने और उकताने लगा था जो उससे जुड़े हुए थे। उसने यह इच्छा नहीं की थी कि उसके जन्म के दिन का और अधिक उल्लेख किया जाए या उससे कोई मतलब रखा जाए, और इसलिए उसने अपना मुँह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा: "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा।' वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो" (अय्यूब 3:3-4)। अय्यूब के वचनों में स्वयं के लिए उसकी घृणा है, "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा,'" और साथ ही उनमें स्वयं की निन्दा और परमेश्वर को पीड़ा पहुँचाने के लिए ऋणी होने का बोध भी है, "वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो।" ये दो अंश इस बात की महानतम अभिव्यक्ति हैं कि अय्यूब ने तब कैसा महसूस किया था, और सभी को उसकी सिद्धता और खराई प्रदर्शित करते हैं। उसके साथ-साथ, बिलकुल वैसी ही जैसी अय्यूब ने इच्छा की थी, परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास और उसकी आज्ञाकारिता, और साथ ही परमेश्वर के प्रति उसका भय सचमुच ऊँचा उठ गए थे। निस्संदेह, यह ऊँचाई निश्चित रूप से वह प्रभाव है जिसकी परमेश्वर ने अपेक्षा की थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 48

अय्यूब शैतान को हराता है और परमेश्वर की नज़रों में एक सच्चा मनुष्य बन जाता है

जब अय्यूब पहली बार अपनी परीक्षाओं से होकर गुज़रा, तब उसकी सारी सम्पत्ति और उसके सभी बच्चों को उससे ले लिए गया था, परन्तु परिणामस्वरूप वह नीचे नहीं गिरा या उसने ऐसा कुछ नहीं कहा जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप था। उसने शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर ली थी, और उसने अपनी भौतिक सम्पत्ति संतान पर, और अपनी समस्त सांसारिक सम्पत्तियों को गँवाने की परीक्षा पर भी विजय प्राप्त कर ली थी, कहने का तात्पर्य है कि वह परमेश्वर के इन्हें उससे ले लेने का आज्ञापालन करने और इसकी वजह से परमेश्वर को धन्यवाद देने और उसकी स्तुति करने में समर्थ था। शैतान के प्रथम प्रलोभन के दौरान अय्यूब का बर्ताव ऐसा ही था, और परमेश्वर के पहले परीक्षण के दौरान भी अय्यूब की गवाही ऐसी ही थी। दूसरी परीक्षा में, शैतान ने अय्यूब को पीड़ा पहुँचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और हालाँकि अय्यूब ने ऐसा दर्द सहा जिसे उसने पहले कभी नहीं सहा था, तब भी उसकी गवाही लोगों को विस्मित करने के लिए काफी थी। उसने एक बार फिर से शैतान को हराने के लिए अपनी सहनशक्ति, दृढ़ता, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का, और साथ ही परमेश्वर के प्रति अपने भय का उपयोग किया, और उसके आचरण और उसकी गवाही को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किया गया और उसका समर्थन किया गया। इस प्रलोभन के दौरान, अय्यूब ने शैतान पर इस बात की घोषणा करने के लिए अपने वास्तविक आचरण का उपयोग किया कि देह की पीड़ा परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास और आज्ञाकारिता को पलट नहीं सकती है या परमेश्वर के प्रति उसकी भक्ति और भय को छीन नहीं सकती है; वह मृत्यु का सामना करने के कारण परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या अपने सिद्धता और खराई को नहीं छोड़ेगा। अय्यूब के दृढ़ संकल्प ने शैतान को कायर बना दिया, उसके विश्वास ने शैतान को कातर और काँपता हुआ बना दिया, शैतान के साथ उसकी ज़िन्दगी और मौत की जंग ने शैतान के भीतर अत्यंत घृणा और रोष उत्पन्न किया, उसकी सिद्धता और खराई ने शैतान की वो हालत कर दी कि वह उसके साथ और कुछ नहीं कर सकता था, कुछ इस तरह कि शैतान ने उस पर अपने आक्रमणों को त्याग दिया और यहोवा परमेश्वर के सामने अय्यूब पर अपने आरोपों को त्याग दिया। इसका अर्थ था कि अय्यूब ने संसार पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसने देह पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसने शैतान पर विजय प्राप्त कर ली थी, और उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली थी; वह पूरी तरह से और सर्वथा ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर का ही था। इन दो परीक्षाओं के दौरान, अय्यूब अपनी गवाही में अडिग रहा, और उसने वास्तव में अपनी सिद्धता और खराई को जीया, और उसने परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के अपना जीवन जीने के सिद्धान्तों के दायरे को व्यापक किया। इन दोनों परीक्षाओं से गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब के भीतर एक समृद्ध अनुभव उत्पन्न हुआ, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व तथा तपा हुआ बना दिया, इसने उसे और मज़बूत, और दृढ़ निश्चय वाला बना दिया था, और इसने उसे सत्यनिष्ठा की सच्चाई और योग्यता के बारे में अधिक आत्मविश्वासी बना दिया जिसके प्रति वह दृढ़ता से स्थिर रहा। यहोवा परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता की एक गहरी समझ और बोध प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की बहुमूल्यता को समझने दिया, जहाँ से परमेश्वर के लिए उसके भय में परमेश्वर के प्रति सोच-विचार और प्रेम को जोड़ दिया गया था। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे दूर नहीं किया, बल्कि वे उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट ले आयीं। जब अय्यूब के द्वारा सही गई दैहिक पीड़ा अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई, तो वह चिंता जो उसने परमेश्वर यहोवा की ओर से महसूस की थी उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिया। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, बल्कि यह उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के लिए उसके सोच-विचार और प्रेम का एक स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के लिए उसके सोच-विचार और प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य है कि, क्योंकि उसने स्वयं से घृणा की थी, और वह परमेश्वर को यंत्रणा देने के लिए तैयार नहीं था, और वह परमेश्वर को कष्ट देना सहन नहीं कर सकता था, इसलिए उसका सोच-विचार और प्रेम निःस्वार्थता के स्तर तक पहुँच गया था। इस समय, अय्यूब ने परमेश्वर के लिए अपनी चिरकालिक आराधना, लालसा और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक उठा दिया। उसके साथ-साथ, उसने परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास और आज्ञाकारिता तथा परमेश्वर के भय को भी सोच-विचार और प्रेम के स्तर तक उठा दिया। उसने स्वयं को कोई ऐसा कार्य नहीं करने दिया जो परमेश्वर को हानि पहुँचा सकता था, उसने अपने आपको ऐसा आचरण करने की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाता, और उसने अपने कारण परमेश्वर पर कोई दुःख, संताप, या अप्रसन्नता भी लाने की अनुमति नहीं दी। परमेश्वर की नज़रों में, हालाँकि अय्यूब वही पहले वाला अय्यूब था, फिर भी अय्यूब के विश्वास, उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के प्रति उसके भय ने परमेश्वर को सम्पूर्ण संतुष्टि और आनन्द पहुँचाया था। इस समय, अय्यूब ने उस सिद्धता को प्राप्त कर लिया था जिसे प्राप्त करने की परमेश्वर ने उससे अपेक्षा की थी, वह एक ऐसा मनुष्य बन गया था जो परमेश्वर की नज़रों में "सिद्ध और खरा" कहलाने के योग्य था। उसके धार्मिक कार्यों ने उसे शैतान पर विजय प्राप्त करने दी, और परमेश्वर की उसकी गवाही में उसे डटे रहने दिया। इसलिए, उसके धार्मिक कार्यों ने भी उसे सिद्ध बनाया, और उसके जीवन के मूल्य को ऊँचा किए जाने दिया, और किसी भी समय की तुलना में बढ़ कर होने दिया, और उसे शैतान के द्वारा उस पर हमला न किए जाने तथा और परीक्षा न लिए जाने वाला सबसे पहला मनुष्य बनने दिया। क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए शैतान के द्वारा उस पर आरोप लगाया गया था और उसे प्रलोभित किया गया था; क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसे शैतान को सौंपा गया था; क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसने शैतान पर विजय प्राप्त की और उसे हराया था, और वह अपनी गवाही में डटा रहा। अब से, अय्यूब एक ऐसा पहला व्यक्ति बन गया था जिसे फिर कभी शैतान को नहीं सौंपा जाएगा, वह सचमुच में परमेश्वर के सिंहासन के सामने आया, और उसने, शैतान की जासूसी या तबाही के बिना, परमेश्वर की आशीषों के अधीन प्रकाश में जीवन बिताया...। वह परमेश्वर की नज़रों में एक सच्चा मनुष्य बन गया था, उसे स्वतन्त्र कर दिया गया था ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 49

अय्यूब के दैनिक जीवन में हम उसकी सिद्धता, खराई, परमेश्वर का भय, और दुष्टता से दूर रहना देखते हैं

यदि हमें अय्यूब के बारे में चर्चा करनी है, तो हमें उसके बारे में उस आँकलन से शुरु अवश्य करनी चाहिए जो परमेश्वर के मुख से कहा गया था: "उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

आओ हम सबसे पहले अय्यूब की खराई और सिद्धताके बारे में जाने।

तुम लोग "सिद्ध" और "खरा" शब्दों के बारे में क्या समझ रखते हो? क्या तुम लोग यह मानते हो कि अय्यूब दोष रहित था, और आदरणीय था? वास्तव में, यह "सिद्ध" और "खरा" का एक शाब्दिक अनुवाद और समझ होगी। वास्तविक जीवन अय्यूब की सच्ची समझ का अभिन्न भाग है—केवल वचन, किताबें, और सिद्धान्त कोई उत्तर प्रदान नहीं करेंगे। हम अय्यूब के पारिवारिक जीवन पर, जीवन के दौरान उसका सामान्य आचरण किसके जैसा था इस पर नज़र डालते हुए शुरुआत करेंगे। यह हमें जीवन में उसके सिद्धान्तों और उद्देश्यों, और साथ ही उसके व्यक्तित्व और उसकी खोज के बारे में भी बताएगा। अब, आओ हम अय्यूब 1:3 के अंतिम वचनों को पढ़ें: "पूर्वी देशों के लोगों में वह सबसे बड़ा था।" ये वचन यह कह रहे हैं कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ऊँची थी, और यद्यपि हमें यह नहीं बताया गया है कि वह अपनी प्रचुर धन-सम्पत्ति के कारण पूर्वी देशों के लोगों में सबसे बड़ा था या इसलिए क्योंकि वह सिद्ध और खरा था, और परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था, इसलिए कुल मिलाकर, हम यह जानते हैं कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ही मूल्यवान थी। जैसा कि बाइबल में दर्ज है, अय्यूब के बारे में लोगों की पहली धारणा यह थी कि अय्यूब सिद्ध था, यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था, और यह कि उसके पास बहुत धन-सम्पत्ति और सम्माननीय हैसियत थी। एक साधारण मनुष्य के लिए जो ऐसे परिवेश में और ऐसी परिस्थितियों के तहत रहता हो, अय्यूब का आहार, जीवन की गुणवत्ता, और उसके व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पहलू अधिकांश लोगों के ध्यान का केन्द्र बिन्दु होंगे; इसलिए हमें पवित्र शास्त्र को पढ़ना अवश्य जारी रखना चाहिए: "उसके बेटे बारी-बारी से एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे। जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, 'कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।' इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था" (अय्यूब 1:4-5)। यह अंश हमें दो चीज़ें बताता है: पहला है कि अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ नियमित रूप से भोज, खाना और पीना करते थे; दूसरा है कि अय्यूब प्रायः होमबलियाँ चढ़ाता था क्योंकि वह प्रायः उन लोगों के लिए चिंतित रहता था, इस बात से भयभीत रहता था कि वे पाप कर रहे हैं, यह कि उन्होंने अपने हृदय में परमेश्वर को कोसा था। इसमें दो अलग-अलग प्रकार के लोगों के जीवन का वर्णन किया गया है। पहला, अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ, जो, भौतिक सम्पत्ति के द्वारा आयी उच्च जीवनशैली का आनन्द उठाते हुए, अपनी सम्पन्नता के कारण अक्सर भोज करते थे, वे फिज़ूलखर्ची का जीवन जीते थे, वे अपने मन की संतुष्टि तक दाखरस पीते और भोजन करते थे। ऐसा जीवन जीते हुए, यह अपरिहार्य था कि वे अक्सर पाप करेंगे और परमेश्वर का अपमान करेंगे—मगर इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपने आपको शुद्ध नहीं किया या होमबलि नहीं चढ़ाई। तो तुम देखो कि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था, कि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति कोई विचार नहीं किया, न ही वे परमेश्वर का अपमान करने से डरे, वे अपने हृदय से परमेश्वर को त्यागने से बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए। निस्संदेह, हमारा ध्यान अय्यूब के बच्चों पर नहीं है, बल्कि हमारा ध्यान उस पर है जो अय्यूब ने तब किया जब उसने ऐसी चीज़ों का सामना किया; यह दूसरा मामला है जिसका इस अंश में वर्णन किया गया है, और जिसमें अय्यूब का दैनिक जीवन और उसकी मानवता का सार शामिल है। जब बाइबल अय्यूब के पुत्र और पुत्रियों के भोज का जिक्र करती है, तो वहाँ अय्यूब का कोई जिक्र नहीं है; केवल ऐसा कहा गया है कि उसके पुत्र और पुत्रियाँ ही अक्सर एक साथ मिलकर खाया और पीया करते थे। दूसरे शब्दों में, उसने भोजों का आयोजन नहीं किया, न ही वह फिज़ूलखर्ची करने के लिए अपने पुत्र और पुत्रियों के साथ खाने-पीने में शामिल हुआ। यद्यपि वह समृद्ध था, और उसके पास कई सम्पत्तियाँ और सेवक थे, फिर भी अय्यूब का जीवन विलासिता का नहीं था। वह जीवन जीने के अपने सर्वोत्कृष्ट परिवेश से मोहित नहीं हुआ था, और उसने देह के सुख विलासों से अपने आपको ठूँस-ठूँस कर नहीं भरा या वह अपनी सम्पत्ति की वजह से होमबलि चढ़ाना नहीं भूला, और इससे वह अपने हृदय में धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर तो बिलकुल भी नहीं हुआ। तो स्पष्ट रूप से, अय्यूब अपनी जीवनशैली में अनुशासित था, और वह लोभी या सुखवादी नहीं था, न ही उसके लिए परमेश्वर के आशीषों के परिणामस्वरूप जीवन की गुणवत्ता से, वह ग्रस्त हुआ। इसके बजाए, वह नम्र और शालीन था, उसे आडंबर के लिए नहीं दिया गया था, और वह परमेश्वर के सामने सतर्क और सावधान था, वह अक्सर परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों पर विचार करता, और वह परमेश्वर से लगातार भयभीत रहता था। अपने दैनिक जीवन में, अय्यूब प्रायः अपने पुत्र और पुत्रियों के लिए होमबलि चढ़ाने के लिए जल्दी उठा जाता था। दूसरे शब्दों में, न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरूद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक सम्पत्ति का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही वह परमेश्वर के स्थान को बदल सकती थी; चाहे वह स्वयं के वास्ते हो या उसके बच्चों के वास्ते, अय्यूब के दैनिक सभी कार्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने से जुड़े थे। यहोवा परमेश्वर का उसका भय उसके मुँह तक नहीं रुका, बल्कि अमल में लाया गया, और वह उसके दैनिक जीवन के हर एक भाग में प्रतिबिम्बित होता था। अय्यूब का यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और एक सार को धारण करता था जो न्याय और उन चीज़ो से प्रेम करता था जो सकारात्मकता थीं। यह कि अय्यूब अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रायः भेजा और पवित्र किया करता था इसका अर्थ है कि वह अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकृतया अनुमोदित नहीं करता था; इसके बजाए, अपने हृदय में वह उनके व्यवहार से उकता गया था, और उनकी निन्दा करता था। उसने यह निष्कर्ष निकाला कि उसके पुत्र और पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला नहीं था, और इसलिए वह प्रायः उनसे यहोवा परमेश्वर के सामने जाने और अपने पापों का अंगीकार करने के लिए कहता था। अय्यूब के कार्यकलाप हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं: एक जिसमें वह कभी भी उनके साथ नहीं चलता था जो अक्सर पाप करते थे और परमेश्वर का अपमान करते थे, बल्कि इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे परहेज करता था। भले ही ये लोग उसके पुत्र और पुत्रियाँ थे, फिर भी उसने अपने सिद्धान्तों को इसलिए नहीं छोड़ा कि वे उसके स्वयं के सगे सम्बन्धी थे, न ही वह अपनी स्वयं की भावनाओं के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ। इसके बजाए, उसने उनसे पापों को अंगीकार करने और यहोवा परमेश्वर के धैर्य को प्राप्त करने का आग्रह किया था, और उसने उन्हें चेताया था कि वे अपने स्वयं के लोभी सुख-विलासों के वास्ते परमेश्वर को न छोड़ें। अय्यूब दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता था इस बात के सिद्धान्त परमेश्वर के प्रति उसके भय और दुष्टता से दूर रहने के सिद्धान्तों से अवियोज्य हैं। वह उसे प्रेम करता था जो परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया जाता था, और उससे घृणा करता था जिससे परमेश्वर को नफ़रत थी, और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के विरुद्ध दुष्टता और पाप करते थे। ऐसा प्रेम और ऐसी घृणा उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित होती थी, और यह अय्यूब का वही खराई थी जिसे परमेश्वर की नज़रों से देखा गया था। स्वाभाविक रुप से, अपने दैनिक जीवन में दूसरों के साथ अपने रिश्तों के सम्बन्ध में यह अय्यूब की सच्ची मानवता की अभिव्यक्ति और उसे जीना भी है जिसके बारे में हमें अवश्य सीखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 50

अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी मानवता की अभिव्यक्तियाँ (अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी खराई, सीधापन, परमेश्वर का भय, और दुष्टता से दूर रहने को समझना)

जब अय्यूब ने यह सुना कि उसकी सम्पत्ति को चुरा लिया गया है, कि उसके पुत्र और पुत्रियों ने अपने जीवन गँवा दिए हैं, और उसके सेवकों को मार दिया गया है, तो उसने निम्नलिखित रूप से प्रतिक्रिया की: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा" (अय्यूब 1:20)। ये वचन हमें एक तथ्य बताते हैं: इस समाचार को सुनने के बाद, अय्यूब घबराया नहीं, वह रोया नहीं, या उन सेवकों पर दोष नहीं लगाया जिन्होंने उसे समाचार दिया था, और उसने वारदात के दृश्य का मुआयना तो बिलकुल नहीं किया ताकि वह वारदात के पीछे के कारण की जाँच कर सके, उसे सत्यापित कर सके और यह पता लगा सके कि वास्तव में क्या हुआ था। उसने अपनी सम्पत्ति के खो जाने पर किसी पीड़ा या खेद का प्रदर्शन नहीं किया, न ही वह अपने बच्चों के, अपने प्रियजनों के खो जाने के कारण फूट-फूटकर रोया। इसके विपरीत, उसने अपना बागा फाड़ा, और अपना सिर मुँडाया, और भूमि पर गिर गया, और आराधना की। अय्यूब के कार्यकलाप किसी भी समान्य मनुष्य के कार्यकलापों से भिन्न थे। वे बहुत से लोगों को भ्रमित करते हैं, और अय्यूब की "निष्ठुरता" के कारण उनके मन में उसे झिड़की का पात्र बनाते हैं। अपनी सम्पत्ति को अचानक खो देने पर, साधारण लोग टूटे दिल वाले, या निराश दिखाई देते हैं—या, कुछ लोगों तो गहरे विषाद में भी आ जाते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोगों के हृदय में उनकी सम्पत्ति जीवनभर के प्रयास को दर्शाती है, यह ऐसा है जिस पर उनका जीवित रहना निर्भर होता है, यह वह आशा है जो उन्हें जीवित रखती है; उनकी सम्पत्ति के खोने का अर्थ है कि उनके प्रयास निरर्थक रहे हैं, यह कि उन्हें कोई आशा नहीं है, और यहाँ तक कि उनका कोई भविष्य भी नहीं है। अपनी सम्पत्ति और नज़दीकी रिश्ते के प्रति जो इसके साथ उनका होता है यह किसी भी समान्य व्यक्ति की प्रवृत्ति होती है, और यही लोगों की नज़रों में सम्पत्ति का महत्व भी है। वैसे तो, अधिकांश लोग अय्यूब की सम्पत्ति के नुकसान के प्रति उसकी उदासीन प्रवृत्ति से भ्रमित महसूस करते हैं। आज, अय्यूब के हृदय के भीतर क्या कुछ चल रहा था उसका वर्णन करके हम इन सभी लोगों के भ्रम को दूर करने जा रहे हैं।

व्यावहारिक ज्ञान कहता है कि, परमेश्वर के द्वारा इतनी सारी सम्पत्ति दिए जाने के बाद, इन सम्पत्तियों को गँवाने की वजह से अय्यूब को परमेश्वर के सामने शर्मिन्दगी महसूस करनी चाहिए, क्योंकि उसने उनकी देखरेख नहीं की थी या उनका ख्याल नहीं रखा था, वह परमेश्वर के द्वारा दी हुई सम्पत्तियों को सँभालकर नहीं रखा था। इसलिए, जब उसने यह सुना कि उसकी सम्पत्ति चुरा ली गई है, उसकी सबसे पहली प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए थी कि वह वारदात के स्थल पर जाता और जो खो गया था उन सामानों की सूची बनाता, और उसके बाद परमेश्वर के सामने अंगीकार करता ताकि वह एक बार फिर से परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त कर सके। हालाँकि, अय्यूब ने ऐसा नहीं किया—और ऐसा न करने के उसके पास स्वाभाविक रूप से उसके स्वयं के कारण थे। अपने हृदय में, अय्यूब गहराई से विश्वास करता था कि जो कुछ भी उसके पास था वह उसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया था, और उसके स्वयं के परिश्रम से नहीं आया था। इसलिए, उसने इन आशीषों को एक ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखा था कि उससे लाभ उठाया जाए, बल्कि अपने जीवन के सिद्धान्तों के रूप में वह उस मार्ग पर जी जान से मज़बूती से बना रहा जिस पर उसे बने रहना चाहिए था। उसने परमेश्वर की आशीषों को सँजोकर रखा, और उनके लिए धन्यवाद दिया, परन्तु वह और अधिक आशीषों के लिए अनुरक्त नहीं हुआ, न ही उसने और आशीषों की खोज की। सम्पत्ति के प्रति उसकी ऐसी प्रवृत्ति थी। न तो उसने आशीषें प्राप्त करने के लिए कुछ किया, न ही वह परमेश्वर के आशीषों की कमी या नुकसान से दुःखित हुआ; वह न तो परमेश्वर के आशीषों की वजह से बेतहाशा और उन्मत रूप से प्रसन्न हुआ, न ही उसने उन आशीषों के कारण जिनका वह बार-बार आनन्द उठता था परमेश्वर के मार्गों की उपेक्षा की या परमेश्वर के अनुग्रह को भुलाया। अपनी सम्पत्ति के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति लोगों के लिए उसकी सच्ची मानवता को प्रकट करती है: पहली बात, अय्यूब एक लोभी मनुष्य नहीं था, और वह अपने भौतिक जीवन में उदार था। दूसरी बात, अय्यूब ने इस बात की कभी चिंता नहीं की या इससे कभी नहीं डरा कि परमेश्वर वह सब ले लेगा जो उसके पास है, जो परमेश्वर के प्रति उसके हृदय में आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति थी; अर्थात्, इस बारे में उसकी कोई माँग या शिकायतें नहीं थीं कि कब या क्या परमेश्वर उससे सब कुछ ले लेगा, और उसने कारण नहीं पूछा कि क्यों, बल्कि उसने केवल परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करने की कोशिश की। तीसरी बात, उसने कभी भी यह नहीं माना कि उसकी सम्पत्तियाँ उसके अपने प्रयासों से आई थीं, बल्कि यह कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा उसे प्रदान किया गया था। यह परमेश्वर पर अय्यूब का विश्वास था, और उसके दृढ़ विश्वास का एक संकेत है। क्या अय्यूब की मानवता और उसकी दैनिक सच्ची खोज को उसके बारे में इस तीन-सूत्रीय सारांश में स्पष्ट कर दिया गया है? अय्यूब की मानवता और खोज उसके उदासीन आचरण से अभिन्न थे जब उसने अपनी सम्पत्ति के खो जाने का सामना किया था। यह निश्चित रूप से उसकी प्रतिदिन की खोज की वजह से था कि परमेश्वर की परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के पास ऐसी कद-काठी और दृढ़ विश्वास था कि उसने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," इन वचनों को रातों-रात प्राप्त नहीं किया गया था, न ही वे बस यूँ ही अय्यूब के दिमाग में उछले थे। ये ऐसी बातें थीं जिन्हें उसने कई सालों तक जीवन का अनुभव करने के दौरान देखा और अर्जित किया था। उन सभी लोगों की तुलना में जो केवल परमेश्वर के आशीषों को ही खोजते हैं, और जो इस बात से डरते हैं कि परमेश्वर उन्हें उनसे ले लेगा, वे इस बात से नफरत करते हैं और इसके बारे में शिकायत करते हैं, क्या अय्यूब की आज्ञाकारिता एकदम वास्तविक नहीं है? उन सभी लोगों की तुलना में जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, परन्तु जिन्होंने कभी यह विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, क्या अय्यूब बड़ी ईमानदारी और खराई धारण नहीं करता है?

अय्यूब की विवेकशीलता

अय्यूब के वास्तविक अनुभव और उसकी सीधी और सच्ची मानवता का अर्थ था कि उसने बहुत ही विवेकशील निर्णय और चुनाव किए थे जब उसने अपनी सम्पत्तियों और अपने बच्चों को गँवाया था। ऐसे विवेकशील चुनाव उसकी दैनिक खोजों और परमेश्वर के कर्मों से अवियोज्य थे जिन्हें उसने अपने दिन प्रति दिन के जीवन के दौरान जाना था। अय्यूब की ईमानदारी ने उसे यह विश्वास करवाया कि यहोवा का हाथ सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है; उसके विश्वास ने उसे सभी चीज़ों के ऊपर यहोवा की संप्रभुता के तथ्य को जानने दिया; उसके ज्ञान ने उसे यहोवा परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानने के लिए तैयार किया और उसे इसके योग्य बनाया; उसकी आज्ञाकारिता ने यहोवा परमेश्वर के प्रति उसके भय में उसे अधिकाधिक सच्चा होने में सक्षम बनाया; उसके भय ने दुष्टता से दूर रहने में उसे अधिकाधिक वास्तविक बनाया; अंततः, अय्यूब सिद्ध बन गया क्योंकि वह परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था; और उसकी सिद्धता ने उसे बुद्धिमान बनाया, और उसे अत्यधिक विवेकशीलता प्रदान की।

हमें "विवेकशील" शब्द को किस प्रकार समझना चाहिए? एक शाब्दिक अनुवाद में इसका अर्थ है अच्छी समझ वाला होना, अपनी सोच में तार्किक और समझदार होना, अच्छे वचनों, कार्यकलापों, और मूल्यांकन वाला होना, और अच्छे और नियमित नैतिक मानकों को धारण करना। फिर भी अय्यूब की विवेकशीलता इतनी आसानी से नहीं समझायी जाती है। जब यहाँ ऐसा कहा जाता है कि अय्यूब अत्यधिक विवेकशीलता धारण करता था, तो यह उसकी मानवता और परमेश्वर के सामने उसके आचरण के सम्बन्ध में होता है। क्योंकि अय्यूब ईमानदार था, इसलिए वह परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करने और उसको मानने में समर्थ था, जिसने उसे ऐसा ज्ञान दिया जो दूसरों के द्वारा अप्राप्य था, और इस ज्ञान ने उसे उस चीज़ का अधिक परिशुद्धता से बोध करने, उसका अनुमान लगाने, और उसे परिभाषित करने में समर्थ बनाया जो उस पर आ पड़ी थीं, जिसने उसे सक्षम बनाया कि वह अधिक परिशुद्धता से और चतुराई से चुनाव करे कि उसे क्या करना है और किस बात को दृढ़ता से थामे रहना है। कहने का तात्पर्य है कि उसके वचन, व्यवहार, उसके कार्यकलापों के पीछे के सिद्धान्त, और वह नियम जिसके द्वारा उसने कार्य किया, वे नियमित, स्पष्ट और विशिष्ट थे, और वे बिना सोचे समझे, आवेगशील या भावात्मक नहीं थे। वह जानता था कि जो भी उस पर आ पड़ा था उससे कैसे बर्ताव किया जाए, वह जानता था कि जटिल घटनाओं के बीच सम्बन्धों को कैसे संतुलित किया और सँभाला जाए, वह जानता था कि उस मार्ग को कैसे दृढ़ता से थामा जाए जिसे थामा जाना चाहिए, और, इसके अतिरिक्त, वह जानता था कि यहोवा परमेश्वर के देने और ले लेने के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। यही अय्यूब की वास्तविक विवेकशीलता थी। यह निश्चित रूप से इसलिए थी क्योंकि जब उसने अपनी सम्पत्तियों और अपने पुत्रों और पुत्रियों को गँवा दिया तब अय्यूब ऐसी विवेकशीलता से सुसज्जित था कि उसने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है"।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 51

अय्यूब का असली चेहरा: सच्चा, शुद्ध, और असत्यता से रहित

आओ हम अय्यूब 2:7-8 को पढ़ें: "तब शैतान यहोवा के सामने से निकला, और अय्यूब को पाँव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया। तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा लेकर राख पर बैठ गया।" यह अय्यूब के आचरण का वर्णन है जब उसके शरीर पर दर्दनाक फोड़े निकल आए थे। इस समय, अय्यूब दर्द सहते हुए राख पर बैठ गया। किसी ने भी उसका उपचार नहीं किया, और किसी ने भी उसके शरीर के दर्द को कम करने के लिए सहायता नहीं की; इसके बजाए, उसने अपने फोड़ों की सतह को खुजाने के लिए एक ठीकरे का उपयोग किया। सतही तौर पर, यह अय्यूब की यंत्रणा का मात्र एक ही चरण था, और इसका उसकी मानवता और परमेश्वर के भय से कोई नाता नहीं है, क्योंकि अय्यूब ने इस समय अपनी मनोदशा और दृष्टिकोणों को प्रदर्शित करने के लिए कोई वचन नहीं बोले। फिर भी, अय्यूब के कार्य और उसका आचरण अभी भी उसकी मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति हैं। पिछले अध्याय के अभिलेख में हमने पढ़ा था कि अय्यूब पूर्व के सभी मनुष्य में सबसे बड़ा था। इसी बीच, दूसरे अध्याय का यह अंश हमें यह दिखाता है कि पूर्व के इस महान मनुष्य ने वास्तव में राख में बैठकर अपने आपको खुजाने के लिए एक ठीकरा लिया। क्या इन दोनों विवरणों के बीच स्पष्ट विषमता नहीं है? यह ऐसी विषमता है जो हमें अय्यूब के असली व्यक्तित्व को दिखाती है: उसकी प्रतिष्ठा और हैसियत के बावजूद, उसने कभी उससे प्रेम नहीं किया या उस पर कोई ध्यान नहीं दिया; उसने परवाह नहीं की कि अन्य लोग उसकी प्रतिष्ठा को कैसे देखते हैं, न ही वह इस बारे में चिंतित था कि उसके कार्य और आचरण का उसकी प्रतिष्ठा पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा या नहीं; वह हैसियत की संपत्ति में लिप्त नहीं हुआ, न ही उसने उस महिमा का आनन्द उठाया जो हैसियत और प्रतिष्ठा से आयी थी। उसने सिर्फ अपने मूल्यों की और यहोवा परमेश्वर की नज़रों में अपने जीवन को जीने के महत्व की चिंता की। अय्यूब का असली व्यक्तित्व उसका मूल सार था: उसने प्रसिद्धि एवं सौभाग्य से प्रेम नहीं किया, तथा वह प्रसिद्धि और सौभाग्य के लिए नहीं जीता था; वह सच्चा, और शुद्ध और असत्यता से रहित था।

अय्यूब का प्रेम और नफ़रत का विभाजन

अय्यूब की मानवता का एक और पहलू उसके और उसकी पत्नी के बीच हुए संवाद में प्रदर्शित होता है: "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।' उसने उससे कहा, 'तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?'" (अय्यूब 2:9-10)। जिस यंत्रणा को वह सह रहा था उसे देखते हुए, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस यंत्रणा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की—फिर भी उन "भले इरादों" को अय्यूब की मंजूरी प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाए, उन्होंने उसके क्रोध को भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसके विश्वास और उसके प्रति उसकी आज्ञाकारिता को नकारा था, और यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था, क्योंकि उसने स्वयं को ऐसा कुछ करने की अनुमति कभी नहीं दी थी जिससे परमेश्वर का विरोध हुआ हो या उसे ठेस पहुँची हो, दूसरों की तो बात ही जाने दो। वह कैसे चुपचाप रह सकता था जब उसने अन्य लोगों ने ऐसे वचनों को कहते देखा जो परमेश्वर की निन्दा और उसका अपमान करते थे? इसलिए उसने अपनी पत्नी को "मूर्ख स्त्री" कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्रोध और घृणा, और साथ ही धिक्कार और फटकार की थी। यह प्रेम और घृणा के बीच अन्तर करने की अय्यूब की मानवता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, और उसकी खरी मानवता का सच्चा प्रदर्शन था। अय्यूब ने न्याय की समझ को धारण किया था—ऐसी समझ जिसने उसे दुष्टता की हवाओँ और ज्वारों से नफ़रत करवाई, और बेतुके मतान्तरों, हास्यास्पद विवादों, और हास्यास्पद दावों से घृणा करवाई, उनकी निंदा करवाई और उन्हें अस्वीकार करवाया, और उसे अपने स्वयं के सही सिद्धान्तों और रवैये को सच्चाई से थामे रहने दिया जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उसे उन लोगों के द्वारा छोड़ किया गया था जो उसके करीबी थे।

अय्यूब की उदारहृदयता और ईमानदारी

चूँकि अय्यूब के व्यवहार से, हम उसकी मानवता के विभिन्न पहलुओं की अभिव्यक्ति को देख पाते हैं, तो जब उसने अपने जन्म के दिन को कोसने के लिए अपना मुँह खोला तब हम अय्यूब की मानवता के किस पहलू को देखते हैं? यही वह विषय है जिसे हम नीचे साझा करेंगे।

ऊपर, मैंने अय्यूब के द्वारा अपने जन्म के दिन को कोसने के उद्गमों के बारे में बात की है। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यदि अय्यूब कठोर हृदय, और प्रेम से रहित होता, यदि वह उदासीन और भावनारहित होता, और मानवता से वंचित होता, तो क्या वह परमेश्वर के हृदय की इच्छा की परवाह कर सकता था? और क्या वह परमेश्वर के हृदय की परवाह करने के फलस्वरूव अपने जन्म के दिन को कोस सकता था? दूसरे शब्दों में, यदि अय्यूब कठोर हृदय वाला और मानवता से वंचित होता, तो क्या वह परमेश्वर की पीड़ा से परेशान हो सकता था? क्या वह अपने जन्म के दिन को इसलिए कोस सकता था क्योंकि परमेश्वर उसके द्वारा व्यथित हुआ था? इसका उत्तर है, बिल्कुल नहीं! क्योंकि वह दयालु हृदय वाला था, इसलिए अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय की परवाह की थी; क्योंकि वह परमेश्वर के हृदय की परवाह करता था, इसलिए अय्यूब को परमेश्वर की पीड़ा की समझ थी; क्योंकि वह दयालु हृदय वाला था, इसलिए उसने परमेश्वर की पीड़ा को समझने के परिणामस्वरूप अत्यधिक यंत्रणा सही; क्योंकि उसने परमेश्वर की पीड़ा को समझा, इसलिए वह अपने जन्म के दिन से घृणा करने लगा, और इसलिए उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। बाहरी लोगों के लिए, अय्यूब की परीक्षा के दौरान उसका सम्पूर्ण आचरण अनुकरणीय है। केवल उसके द्वारा अपने जन्म के दिन को कोसना ही उसकी सिद्धता और खराई के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह लगाता है, अथवा एक अलग ही आँकलन प्रदान करता है। वास्तव में, यह अय्यूब की मानवता के सार की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति थी। उसकी मानवता का सार छिपा हुआ या बंद किया हुआ नहीं था, या किसी अन्य के द्वारा संशोधित किया हुआ नहीं था। जब उसने अपने जन्म के दिन को कोसा, तो उसने अपने हृदय की गहराई में उदार हृदयता और ईमानदारी को प्रदर्शित किया; वह एक ऐसे सोते के समान था जिसका पानी इतना साफ और पारदर्शी था कि इसके तल को दिखाता था।

अय्यूब के बारे में यह सब कुछ जानने के बाद, अधिकांश लोगों के पास निःसन्देह अय्यूब की मानवता के सार का एक निष्पक्ष रूप से सटीक और वस्तुनिष्ठ आँकलन होगा। उन्हें अय्यूब की सिद्धता और खराई की एक गहरी, व्यावहारिक, और अधिक उन्नत समझ और सराहना भी होनी चाहिए जिसके बारे में परमेश्वर के द्वारा बोला गया था। आशाजनक रूप से, यह समझ और सराहना परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के तरीके की शुरुआत करने में लोगों को सहायता करेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 52

परमेश्वर के द्वारा अय्यूब को शैतान को सौंपने और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों के बीच सम्बन्ध

यद्यपि अधिकांश लोग यह पहचानते हैं कि अय्यूब सिद्ध और खरा था, और यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था, यह पहचान उन्हें परमेश्वर के इरादे की एक बड़ी समझ प्रदान नहीं करती है। उसके साथ-साथ अय्यूब की मानवता और खोज से ईर्ष्या करते हुए, वे परमेश्वर के बारे में निम्नलिखित प्रश्न पूछते हैं: अय्यूब इतना सिद्ध और खरा था, कि लोग उसे इतना प्यार करते थे, तो क्यों परमेश्वर ने उसे शैतान को सौंप दिया और उसे इतनी अधिक यंत्रणा के अधीन किया? ऐसे प्रश्नों का लोगों के हृदयों में आना लाजिमी है—या बल्कि, यह सन्देह वही प्रश्न है जो अनेक लोगों के हृदयों में है। चूँकि इसने इतने सारे लोगों को हैरान कर दिया है, इसलिए हमें इस प्रश्न को मेज पर रखना और इसे सही तरह से समझाना अवश्य चाहिए।

हर एक कार्य जो परमेश्वर करता है वह आवश्यक होता है, और वह असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि जो कुछ भी वह मनुष्य में करता है वह उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से सम्बन्धित होता है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने जो कार्य अय्यूब में किया वह कुछ अलग नहीं है, भले ही अय्यूब परमेश्वर की नज़रों में सिद्ध और खरा था। दूसरे शब्दों में, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है या किन उपायों के द्वारा वह इसे करता है, भले ही उसकी कीमत, या उसका कुछ भी क्यों न हो, उसके कार्यों का उद्देश्य बदलता नहीं है। उसका उद्देश्य है कि वह मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं, और मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा का काम करे; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर वह सब कुछ करने के लिए है जिसे परमेश्वर मानता है कि ये उसके कदमों के अनुसार सकारात्मक हैं, जो मनुष्य को सक्षम बनाता है ताकि वह परमेश्वर के हृदय को समझे और परमेश्वर के सार को बूझे, और उसे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानने देता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता का परित्याग करना प्राप्त करने देता है—जो भी वह करता है उसमें यह सब परमेश्वर के उद्देश्य का एक पहलू है। अन्य पहलू है कि, क्योंकि शैतान एक विषमता और परमेश्वर के कार्य में काम आने वाली एक वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दे दिया जाता है; यही वह साधन है जिसे परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों के बीच लोगों को शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घिनौनेपन को देखने देने के लिए उपयोग करता है, इस प्रकार लोग को शैतान से घृणा करवाता है और उन्हें वह जानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें धीरे-धीरे स्वयं को शैतान के नियन्त्रण से, और शैतान के आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से स्वतन्त्र होने देती है—जब तक कि, परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं, और शैतान के आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे अब और शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं—कि उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के प्रति विश्वास, आज्ञाकारिता और भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे पूरी तरह से शैतान को हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनका दृढ़ विश्वास, और परमेश्वर का भय और उसकी आज्ञाकारिता शैतान को हरा देता है, और उन्हें शैतान से पूरी तरह से छुड़वा देता है। केवल ऐसे लोग ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किए गए हैं, और मनुष्य को बचाने में यही परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे बचाए जाने की इच्छा करते हैं, और पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की कामना करते हैं, तो उन सभी को जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं शैतान के बड़े और छोटे प्रलोभनों और हमलों का सामना अवश्य करना चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान को पूरी तरह से हराने में समर्थ हैं ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया जा चुका है। कहने का तात्पर्य है कि, वे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से होकर गुज़र चुके हैं, और जिन पर शैतान के द्वारा अनगिनत बार परीक्षण और हमला किया जा चुका है। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है वे परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करने में समर्थ हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया गया है वे ईमानदारी को धारण करते हैं, वे उदारहृदय के हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अन्तर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे न्यायसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह करने और सब सँजोकर रखने में समर्थ हैं जो परमेश्वर का है। शैतान के द्वारा ऐसे लोगों को बाध्य नहीं किया जाता है, उनकी जासूसी नहीं की जाती है, उन पर दोष नहीं लगाया जाता है, या दुर्व्यवहार नहीं किया जाता है, वे पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं, उन्हें पूरी तरह से मुक्त किया और छुड़ाया जा चुका है। अय्यूब सिर्फ ऐसी स्वतन्त्रता वाला मनुष्य था, और यह निश्चित रूप से उस बात का महत्व है कि क्यों परमेश्वर ने उसे शैतान को सौंपा था।

शैतान के द्वारा अय्यूब के साथ दुर्व्यवहार किया गया था, परन्तु उसने शाश्वत स्वतन्त्रता भी प्राप्त की थी, और यह अधिकार हासिल किया था कि उसे फिर कभी शैतान की भ्रष्टता, दुर्व्यवहार, और आरोपों के अधीन नहीं किया जाएगा, इसके बजाय वह परमेश्वर के मुख के प्रकाश में आज़ादी से और भारमुक्त होकर जीवन बिताएगा, और उसके लिए परमेश्वर के आशीषों के बीच जीवन बिताएगा। कोई भी इस अधिकार को छीन, या नष्ट, या इसे प्राप्त नहीं कर सकता है। यह अय्यूब को परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास, दृढ़ निश्चय, और आज्ञाकारिता के बदले में दिया गया था; अय्यूब ने पृथ्वी पर आनन्द और प्रसन्नता को अर्जित करने, स्वर्ग के द्वारा नियत और पृथ्वी के द्वारा स्वीकृत, अधिकार और पात्रता को अर्जित करने, परमेश्वर के एक सच्चे प्राणी के रूप में बिना किसी व्यवधान के पृथ्वी पर सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए अपने जीवन की क़ीमत चुकाई थी। अय्यूब द्वारा सहन किए गए प्रलोभनों का यही सबसे बड़ा परिणाम भी था।

जब लोगों को अभी भी बचाया जाना बाकी है, तो शैतान के द्वारा उनके जीवन में प्रायः हस्तक्षेप किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें नियन्त्रित भी किया जाता है। दूसरे शब्दों में, ऐसे लोग जिन्हें अभी तक बचाया नहीं गया है वे शैतान के क़ैदी हैं, उनके पास कोई स्वतन्त्रता नहीं है, उन्हें शैतान के द्वारा छोड़ा नहीं गया है, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य या पात्र नहीं हैं, शैतान के द्वारा करीब से उनका पीछा किया जाता है और उन पर दुष्टतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने के लिए कोई खुशी नहीं होती, उनके पास कहने के लिए एक सामान्य अस्तित्व का कोई अधिकार नहीं होता है, और इसके अतिरिक्त, उनके पास कहने के लिए कोई गरिमा नहीं होती है। यदि तुम खड़े हो जाओ और परमेश्वर में अपने विश्वास और अपनी आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय को शैतान के साथ ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ने के एक साधन की तरह उपयोग करते हुए शैतान के साथ इस तरह से युद्ध करो, कि तुम शैतान को पूरी तरह से हरा दो और जब भी वह तुम्हें देखे तो वह दुम दबाए और कायर बन जाए, ताकि वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह से त्याग दे—केवल तभी तुम बचाए जाओगे और स्वतन्त्र होगे। यदि तुमने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ने का दृढ़ संकल्प किया है, परन्तु यदि तुम उन हथियारों से सुसज्जित नहीं हो जो शैतान को हराने में तुम्हारी सहायता करेंगे, तो तुम अभी भी खतरे में होगे; जैसे-जैसे समय गुज़रता है, और जब तुम शैतान के द्वारा इतना प्रताड़ित कर दिए जाते हो कि तुममें रत्ती भर भी ताक़त नहीं बचती है, फिर भी तुम अभी भी गवाही देने में असमर्थ रहते हो, तुमने अभी भी अपने विरुद्ध शैतान के आरोपों और हमलों से स्वयं को पूरी तरह से मुक्त नहीं किया है, तो तुम्हारे उद्धार की थोड़ी सी ही आशा होगी। अंत में, जब परमेश्वर के कार्य के समापन की घोषणा की जाती है, तो तुम तब भी शैतान के शिकंजे में होगे, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ होगे, और इस प्रकार तुम्हारे पास कभी भी कोई अवसर या आशा नहीं होगी। तो इसका निहितार्थ है कि ऐसे लोग पूरी तरह से शैतान की क़ैद में होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 53

परमेश्वर की परीक्षाओं को स्वीकार करो, शैतान के प्रलोभनों को पराजित करो, और परमेश्वर को तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को प्राप्त करने दो

मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्थायी प्रावधान और भरण-पोषण के कार्य के दौरान, परमेश्वर मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इच्छा और अपेक्षाओं को बताता है, और मनुष्य को अपने कर्मों, स्वभाव, और स्वरूप को दिखता है। उद्देश्य मनुष्य को कद-काठ से सुसज्जित करना, और मनुष्य को अनुमति देना है ताकि वह परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उससे विभिन्न सच्चाईयों को प्राप्त करे—ऐसी सच्चाईयाँ जो शैतान से लड़ने के लिए परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिए गए हथियार हैं। इस प्रकार से सुसज्जित होकर, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के कई माध्यम और मार्ग हैं, परन्तु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु अर्थात् शैतान के "सहयोग" की आवश्यकता पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को हथियार देने के बाद, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य की कद-काठी की "परीक्षा" लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया होगा। परन्तु यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को छोड़कर जाने में असफल होता है, और शैतान के प्रति समर्पण कर देता है, तो उसने परीक्षा को उत्तीर्ण नहीं किया होगा। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू की जाँच करता है, तो उसकी जाँच के मापदंड हैं कि शैतान के द्वारा आक्रमण किए जाने पर मनुष्य अपनी गवाही में डटा रहता है या नहीं, और शैतान के द्वारा फुसलाए जाते समय उसने परमेश्वर को छोड़ा है या नहीं और शैतान के सामने आत्मसमर्पण किया और उसके अधीन हुआ है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान पर विजय प्राप्त करके उसे हरा सकता है या नहीं, और वह स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान के बन्धनों पर विजय पाने के लिए, शैतान से आशा का पूरी तरह से त्याग करवाते हुए और उसे अकेला छोड़ते हुए, परमेश्वर के द्वारा उसे दिये गए हथियारों को, अपने दम पर, उठा सकता है या नहीं। यदि शैतान आशा को त्याग देता है और एक व्यक्ति को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर से लेने के लिए फिर कभी कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी ऐसे व्यक्तियों पर दोष नहीं लगाएगा और इनके साथ हस्तक्षेप नहीं करेगा, उन्हें फिर कभी प्रचंड तरीके से प्रताड़ित नहीं करेगा या उन पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस प्रकार के किसी व्यक्ति को ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिया गया होगा। यही वह सम्पूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है।

अय्यूब की गवाही के द्वारा बाद की पीढ़ियों को प्रदान की गई चेतावनी और प्रबुद्धता

जिस प्रक्रिया के द्वारा परमेश्वर किसी व्यक्ति को पूरी तरह से प्राप्त करता है उसे समझने के साथ-साथ, लोग परमेश्वर के द्वारा अय्यूब को शैतान को सौंपे जाने के लक्ष्यों और महत्व को भी समझेंगे। लोग अय्यूब की यंत्रणा के द्वारा अब और परेशान नहीं होते हैं, और उनके पास उसके महत्व की एक नई समझ है। वे इस बारे में अब और चिंता नहीं करते हैं कि उन्हें अय्यूब जैसे ही प्रलोभन के अधीन किया जाएगा या नहीं, और वे परमेश्वर के परीक्षणों के आने का अब और विरोध या उन्हें अस्वीकार नहीं करते हैं। अय्यूब का विश्वास, आज्ञाकारिता, और शैतान पर विजय पाने की उसकी गवाही लोगों के लिए बड़ी सहायता और प्रोत्साहन का एक स्रोत रहे हैं। वे अय्यूब में अपने स्वयं के उद्धार की आशा को देखते हैं, और देखते हैं कि विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और भय के माध्यम से, शैतान को हराना, और शैतान के ऊपर प्रबल होना पूरी तरह से सम्भव है। वे देखते हैं कि अगर वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करते हैं, और सब कुछ खोने के बाद भी परमेश्वर को न छोड़ने का दृढ़ संकल्प और विश्वास रखते हैं, तो वे शैतान को लज्जित और पराजित कर सकते हैं, और यह कि शैतान को डराने और उसे जल्दी से पीछे हटाने के लिए, उन्हें अपनी गवाही में अटल रहने के लिए केवल दृढ़ संकल्प और धीरज धारण करने की आवश्यकता है—भले ही इसका अर्थ अपने प्राणों को गँवाना हो। अय्यूब की गवाही बाद वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी है, और यह चेतावनी उन्हें बताती है कि यदि वे शैतान को नहीं हराते हैं, तो वे कभी भी अपने आपको शैतान के आरोपों और हस्तक्षेप से छुड़ाने में समर्थ नहीं होंगे, न ही वे कभी शैतान के दुर्व्यवहार और हमलों से बचकर निकलने में समर्थ होंगे। अय्यूब की गवाही ने बाद की पीढ़ियों को प्रबुद्ध किया है। यह प्रबुद्धता लोगों को सिखाती है कि यदि वे सिद्ध और खरे हैं केवल तभी वे परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में समर्थ हैं; यह उन्हें सिखाती है कि यदि वे परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं केवल तभी वे परमेश्वर के लिए एक मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही दे सकते हैं; यदि वे परमेश्वर के लिए मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देते हैं केवल तभी उन्हें शैतान के द्वारा कभी भी नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, और वे परमेश्वर के मार्गदर्शन तथा सुरक्षा के अधीन जीवन बिता सकते हैं—और केवल तभी उन्हें सचमुच में बचाया गया होगा। उद्धार की खोज करने वाले हर किसी के द्वारा अय्यूब के व्यक्तित्व और उसके जीवन की खोज का अनुकरण किया जाना चाहिए। जिसे उसने अपने सम्पूर्ण जीवन के दौरान जीया और उसकी परीक्षाओं के दौरान उसका आचरण उन सब के लिए एक अनमोल ख़ज़ाना है जो परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग की खोज करते हैं।

अय्यूब की गवाही परमेश्वर को आराम पहुँचाती है

यदि अब मैं तुम लोगों से कहूँ कि अय्यूब प्यारा इंसान है, तो हो सकता है कि तुम लोग इन वचनों के भीतर के अर्थ को नहीं समझ सको, और हो सकता है कि मैंने इन सभी चीज़ों को क्यों कहा है उसके पीछे की उस भावना को ग्रहण न कर सको; परन्तु उस दिन तक प्रतीक्षा करो जब तुम लोगों को अय्यूब के सदृश या वैसी ही परीक्षाओं का अनुभव हो चुका होगा, जब तुम लोग विपत्तियों से होकर गुज़र चुके होगे, जब तुम लोग उन परीक्षाओं का अनुभव कर चुके होगे जिन्हें परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों के लिए व्यवस्थित किया गया था, जब तुम अपना सर्वस्व दे दोगे, और प्रलोभनों के बीच शैतान को जीतने और परमेश्वर के लिए गवाही देने के लिए अपमान और क्लेश को सहोगे—तब तुम इन वचनों के अर्थ को समझ पाओगे जो मैंने कहे हैं। उस समय, तुम महसूस करोगे कि तुम अय्यूब से बहुत अधिक हीन हो, तुम महसूस करोगे कि अय्यूब कितना प्यारा है, वह अनुकरण करने के योग्य है; जब वह समय आएगा, तब तुम यह समझोगे कि अय्यूब के द्वारा कहे गए वे उत्कृष्ट वचन एक ऐसे व्यक्ति के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं जो भ्रष्ट है और जो इन समयों में रहता है, और तुम समझोगे कि आज के दिन के लोगों के लिए उसे प्राप्त करना कितना कठिन है जिसे अय्यूब के द्वारा प्राप्त किया गया था। जब तुम महसूस करोगे कि यह कठिन है, तब तुम समझोगे कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है, तुम समझोगे कि ऐसे लोगों को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के द्वारा चुकाई गई कीमत कितनी बड़ी है, और वह कार्य कितना बहुमूल्य है जिसे परमेश्वर के द्वारा मनुष्यजाति के लिए किया और व्यय किया जाता था। अब जबकि तुम लोगों ने इन वचनों को सुन लिया है, तो क्या तुम लोगों के पास अय्यूब के बारे में परिशुद्ध समझ और सही आँकलन है? तुम लोगों की नज़रों में, क्या अय्यूब सचमुच में एक सिद्ध और खरा मनुष्य था जो परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था? मैं विश्वास करता हूँ कि अधिकांश लोग निश्चित रूप से हाँ कहेंगे। क्योंकि जो कुछ भी अय्यूब ने किया और प्रकट किया उनके तथ्यों को किसी भी मनुष्य या शैतान के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। वे शैतान पर अय्यूब की विजय के अत्यंत सामर्थ्यवान प्रमाण हैं। यह प्रमाण अय्यूब में उत्पन्न हुआ था, और यह परमेश्वर के द्वारा ग्रहण की गई प्रथम गवाही थी। इस प्रकार, जब अय्यूब शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त की और परमेश्वर के लिए गवाही दी, तो परमेश्वर ने अय्यूब में आशा देखी, और उसके हृदय को अय्यूब से आराम मिला था। उत्पत्ति के समय से लेकर अय्यूब तक, यह पहली बार था कि परमेश्वर ने अनुभव किया कि आराम क्या होता है, और मनुष्य के द्वारा आराम दिए जाने का क्या अर्थ होता है, और यह पहली बार था कि उसने सच्ची गवाही को देखा, और प्राप्त किया था जो उसके लिए दी गई थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 54

अय्यूब ने कानों से परमेश्वर के बारे में सुना था

अय्यूब 9:11 देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझको नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है।

अय्यूब 23:8-9 देखो, मैं आगे जाता हूँ परन्तु वह नहीं मिलता; मैं पीछे हटता हूँ, परन्तु वह दिखाई नहीं पड़ता; जब वह बाईं ओर काम करता है, तब वह मुझे दिखाई नहीं देता; वह दाहिनी ओर ऐसा छिप जाता है, कि मुझे वह दिखाई ही नहीं पड़ता।

अय्यूब 42:2-6 मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है, और तेरी युक्‍तियों में से कोई रुक नहीं सकती। तू ने पूछा, "तू कौन है जो ज्ञानरहित होकर युक्‍ति पर परदा डालता है?" परन्तु मैं ने तो जो नहीं समझता था वही कहा, अर्थात् जो बातें मेरे लिये अधिक कठिन और मेरी समझ से बाहर थीं जिनको मैं जानता भी नहीं था। तू ने कहा, "मैं निवेदन करता हूँ सुन, मैं कुछ कहूँगा, मैं तुझ से प्रश्न करता हूँ, तू मुझे बता।" मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं; इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूल और राख में पश्‍चाताप करता हूँ।

हालाँकि परमेश्वर ने अय्यूब पर अपने आपको प्रकट नहीं किया था, फिर भी अय्यूब परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करता है

इन वचनों का जोर किस बात पर है? क्या तुम लोगों में से किसी ने यह एहसास किया कि यहाँ पर एक तथ्य है? पहला, अय्यूब को कैसे पता चला कि एक परमेश्वर है? और उसे कैसे पता चला कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ें परमेश्वर के द्वारा शासित होती हैं? एक अंश है जो इन दोनों प्रश्नों का उत्तर देता है: "मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं; इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूल और राख में पश्‍चाताप करता हूँ" (अय्यूब 42:5-6)। इन वचनों से हम यह सीखते हैं कि, परमेश्वर को अपनी आँखों से देखने के बजाए, अय्यूब ने परमेश्वर के बारे में आख्यानों से जाना था। यह इन परिस्थितियों के अंतर्गत था कि उसने परमेश्वर के मार्ग पर चलना आरम्भ किया, जिसके बाद उसने अपने जीवन में, और सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के अस्तित्व की पुष्टि की। यहाँ पर एक निर्विवाद तथ्य है—और वह क्या है? परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करने में समर्थ होने के बावजूद, अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था। क्या वह इसमें आज के समय के लोगों के समान ही नहीं था? अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, जिसका निहितार्थ है कि यद्यपि उसने परमेश्वर के बारे में सुना था, फिर भी वह नहीं जानता था कि परमेश्वर कहाँ है, या परमेश्वर किस के समान है, या परमेश्वर क्या कर रहा है, जो कि व्यक्तिपरक कारक हैं; तटस्थ भाव से कहें, तो यद्यपि वह परमेश्वर का अनुसरण करता था, फिर भी परमेश्वर उसके सामने कभी भी प्रकट नहीं हुआ या परमेश्वर ने उससे कभी भी बात नहीं की। क्या यह एक तथ्य नहीं है? यद्यपि परमेश्वर ने अय्यूब से बात नहीं की थी, या उसे कोई आदेश नहीं दिया था, फिर भी अय्यूब ने परमेश्वर के अस्तित्व को देखा था, और सभी चीज़ों के बीच और उन आख्यानों में उसकी संप्रभुता को देखा था जिनमें उसने परमेश्वर के बारे में कानो से सुना था, जिसके बाद उसने परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का जीवन आरम्भ किया। आरम्भ और प्रक्रिया ऐसी ही थीं जिनके द्वारा अय्यूब ने परमेश्वर का अनुसरण किया था। परन्तु इस बात की परवाह किए बिना कि वह किस प्रकार से परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था, इस बात की परवाह किए बिना कि कैसे वह अपनी खराई के प्रति दृढ़ता से स्थिर रहता था, तब भी परमेश्वर उस पर कभी भी प्रकट नहीं हुआ। आओ हम इस अंश को पढ़ें। उसने कहा, "देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझको नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है" (अय्यूब 9:11)। ये वचन कह रहे हैं कि हो सकता है कि अय्यूब ने परमेश्वर को अपने आस-पास महसूस किया हो या हो सकता है कि नहीं किया हो—परन्तु वह परमेश्वर को कभी भी नहीं देख पाया था। ऐसे भी समय थे जब उसने कल्पना की कि परमेश्वर उसके सामने से जा रहा है, या कार्य कर रहा है, या मनुष्य का मार्गदर्शन कर रहा है, परन्तु उसने कभी नहीं जाना था। परमेश्वर मनुष्य पर तब आता है जब वह इसकी अपेक्षा नहीं कर रहा होता है; मनुष्य नहीं जानता है कि कब परमेश्वर उस पर आता है, और वह कहाँ से उस पर आता है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं देख सकता है, और इसलिए, मनुष्य के लिए परमेश्वर छिपा हुआ है।

परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास नहीं डगमगाता है क्योंकि परमेश्वर उससे छिपा हुआ है

पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश में, तब अय्यूब कहता है, "देखो, मैं आगे जाता हूँ परन्तु वह नहीं मिलता; मैं पीछे हटता हूँ, परन्तु वह दिखाई नहीं पड़ता; जब वह बाईं ओर काम करता है, तब वह मुझे दिखाई नहीं देता; वह दाहिनी ओर ऐसा छिप जाता है, कि मुझे वह दिखाई ही नहीं पड़ता" (अय्यूब 23:8-9)। इस विवरण में, हमें पता चलता है कि अय्यूब के अनुभवों में, परमेश्वर पूरे समय उससे छिपा हुआ रहा था; परमेश्वर उसके सामने खुलकर प्रकट नहीं हुआ था, न ही उसने खुलकर उससे कोई वचन कहे थे, फिर भी अपने हृदय में, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में आश्वस्त था। उसने हमेशा विश्वास किया था कि शायद परमेश्वर उसके सामने चल रहा है, या शायद उसके बगल में कार्य कर रहा है, और यह कि यद्यपि वह परमेश्वर को देख नहीं सकता था, फिर भी परमेश्वर उसकी सभी चीज़ों को शासित करते हुए उसके बगल में था। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, परन्तु वह अपने विश्वास के प्रति सच्चाई में बना रहने में समर्थ था, जिसे कोई अन्य व्यक्ति करने में समर्थ नहीं था। और वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते थे? क्योंकि परमेश्वर ने अय्यूब से बात नहीं की, या उस के सामने प्रकट नहीं हुआ, और यदि उसने सचमुच में विश्वास नहीं किया होता, तो वह आगे नहीं बढ़ सकता था, न ही वह परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रह सकता था। क्या यह सही नहीं है? तुम कैसा महसूस करते हो जब तुम पढ़ते हो कि अय्यूब इन वचनों को बोल रहा है? क्या तुम महसूस करते हो कि अय्यूब की सिद्धता और खराई, और परमेश्वर के सामने उसकी धार्मिकता सही है, और परमेश्वर की ओर से की गई कोई अतिशयोक्ति नहीं है? भले ही परमेश्वर ने अय्यूब से अन्य लोगों के समान ही व्यवहार किया था, और उसके सामने प्रकट नहीं हुआ या उससे बात नहीं की थी, तब भी अय्यूब अपनी खराई को दृढ़ता से थामे हुए था, वह तब भी परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करता था, और इससे बढ़कर, वह परमेश्वर को अपमानित करने के अपने भय के फलस्वरूप प्रायः होमबलि चढ़ाता था और परमेश्वर से प्रार्थना करता था। परमेश्वर को देखे बिना परमेश्वर का भय मानने की अय्यूब की योग्यता में, हम देखते हैं कि वह सकारात्मक चीज़ों से कितना प्रेम करता था, और उसका विश्वास कितना दृढ़ और वास्तविक था। उसने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारा क्योंकि परमेश्वर उससे छिपा हुआ था, न ही उसने अपने विश्वास को खोया और परमेश्वर को छोड़ा क्योंकि उसने उसे कभी नहीं देखा था। इसके बजाए, सभी चीज़ों पर शासन करने के परमेश्वर के छिपे हुए कार्यों के बीच, उसने परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस किया था, और परमेश्वर की संप्रभुता और उसके सामर्थ्य को महसूस किया था। उसने खरा होना नहीं त्यागा क्योंकि परमेश्वर छिपा हुआ था, न ही उसने परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को छोड़ा क्योंकि परमेश्वर उसके सामने कभी प्रकट नहीं हुआ था। अय्यूब ने कभी नहीं कहा कि अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए परमेश्वर उसके सामने खुलकर प्रकट हो, क्योंकि उसने पहले ही सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर की संप्रभुता को देख लिया था, और वह विश्वास करता था कि उसने उन आशीषों और उस अनुग्रह को प्राप्त कर लिया था जिन्हें अन्य लोगों ने प्राप्त नहीं किया था। यद्यपि परमेश्वर उससे छिपा रहा, फिर भी परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास कभी नहीं डगमगाया था। इस प्रकार, उसने इन वस्तुओं की उपज प्राप्त की जिन्हें अन्य लोगों ने प्राप्त नहीं किया था: परमेश्वर की स्वीकृति और परमेश्वर के आशीष।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 55

अय्यूब परमेश्वर के नाम को धन्य कहता है और आशीषों या आपदाओं के बारे में नहीं सोचता है

एक तथ्य है जिसकी ओर पवित्र शास्त्र की अय्यूब की कहानियों में कभी भी ज़िक्र नहीं किया जाता है, जिस पर आज हम ध्यान केन्द्रित करेंगे। यद्यपि अय्यूब ने परमेश्वर को कभी भी नहीं देखा था या अपने कानों से परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं सुना था, फिर भी अय्यूब के हृदय में परमेश्वर का एक स्थान था। और परमेश्वर के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्या थी? यह थी, जैसा पहले ज़िक्र किया गया है, "यहोवा का नाम धन्य है।" उसके द्वारा परमेश्वर के नाम को धन्य कहना बेशर्त, अप्रतिबंधित, और बिना किसी तर्क के था। हम देखते हैं कि अय्यूब ने अपना हृदय परमेश्वर के द्वारा नियंत्रित होने देते हुए परमेश्वर को दे दिया था; वह सब जो वह सोचता था, वह सब जिसका निर्णय वह लेता था, और वह सब जिनकी योजना वह अपने हृदय में बनाता था उसे परमेश्वर पर डाल देता था और उसे परमेश्वर से पृथक नहीं करता था। उसका हृदय परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा नहीं हुआ, और उसने परमेश्वर से कभी नहीं कहा कि वह उसके लिए कुछ करे या उसे कोई चीज़ दे, और उसने फिज़ूल की इच्छाओं को पनाह नहीं दी कि वह परमेश्वर की आराधना से कोई भी चीज़ प्राप्त करेगा। उसने व्यापार के बारे में परमेश्वर से कोई बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई माँग या याचना नहीं की। वह सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए परमेश्वर की बड़ी सामर्थ्य और अधिकार की वजह से परमेश्वर के नाम की प्रशंसा करता था, और वह इस बात पर आश्रित नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुई या उसे आपदाओं के द्वारा मारा गया। वह विश्वास करता था कि चाहे परमेश्वर लोगों को आशीष दे या उनके ऊपर आपदा लाये, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, चाहे किसी व्यक्ति की परिस्थितियाँ भले ही कुछ भी हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता की वजह से परमेश्वर के द्वारा आशीष दिया जाता है, और जब मनुष्य पर विपत्ति पड़ती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता की वजह से ही पड़ती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य के ऊपर शासन करते हैं और मनुष्य की हर एक चीज़ को व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के सौभाग्य की अनिश्चितताएँ परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यक्ति हैं, और किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण भले ही कुछ भी हो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यह वही है जिसका अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जाना था। अय्यूब के सभी विचार और कार्यकलाप परमेश्वर के कानों तक पहुँचे थे, और परमेश्वर के सामने आए थे, और परमेश्वर के द्वारा उन्हें उतने ही महत्वपूर्ण रूप से देखा गया था। परमेश्वर ने अय्यूब के इस ज्ञान को सँजोकर रखा, और ऐसा हृदय होने के लिए अय्यूब को सँजोए रखा। इस हृदय ने हमेशा, और सभी स्थानों में परमेश्वर की आज्ञाओं की प्रतीक्षा की, और समय या स्थान चाहे कुछ भी क्यों न रहा हो, जो कुछ भी इस पर पड़ा इसने उसका स्वागत किया। अय्यूब ने परमेश्वर से कोई माँग नहीं की। जो भी उसने स्वयं माँगा वह था उन सभी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करना, उन्हें स्वीकार करना, उनका सामना करना, और उनको मानना जो परमेश्वर से आई थीं; अय्यूब इसे अपना कर्तव्य मानता था, और यह निश्चित रूप से वही था जो परमेश्वर द्वारा चाहा गया था। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, न ही उसे कोई वचन बोलते हुए, कोई आज्ञा देते हुए, कोई शिक्षा देते हुए, या किसी चीज़ के बारे में कोई निर्देश देते हुए सुना था। आज के वचनों में, उसके लिए परमेश्वर के प्रति ऐसे ज्ञान और प्रवृत्ति को धारण करने में समर्थ होना जबकि परमेश्वर ने उसे कोई प्रबुद्धता, मार्गदर्शन, और सत्य के संबंध में कोई प्रावधान नहीं दिया था—यह बहुत बहुमूल्य था, और उसके लिए ऐसी चीज़ों को प्रदर्शित करना परमेश्वर के लिए पर्याप्त था, और उसकी गवाही की परमेश्वर के द्वारा प्रशंसा की गई थी, और परमेश्वर के द्वारा सँजोकर रखी गई थी। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा या व्यक्तिगत रूप से उसे कोई शिक्षा देते हुए नहीं सुना था, परन्तु परमेश्वर के लिए उसका हृदय और वह स्वयं उन लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक अनमोल था जो परमेश्वर के सामने केवल गहरे सिद्धान्तों की बात कर सकते थे, जो केवल शेखी बघार सकते थे, और बलिदानों को चढ़ाने की बात कर सकते थे, परन्तु जिनके पास परमेश्वर का असली ज्ञान कभी नहीं था, और उन्होंने सचमुच में परमेश्वर का भय कभी नहीं माना था। क्योंकि अय्यूब का हृदय शुद्ध था, और परमेश्वर से छिपा हुआ नहीं था, और उसकी मानवता ईमानदार और दयालु थी, और वह न्याय से और जो सकारात्मक था उससे प्रेम करता था। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही, जिसने ऐसे हृदय और ऐसी मानवता को धारण किया था, परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ था, और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में सक्षम था। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की संप्रभुता को देख सकता था, उसके अधिकार और सामर्थ्य को देख सकता था, और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ था। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच में परमेश्वर के नाम को धन्य कह सकता था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने यह नहीं देखा था कि परमेश्वर उसे आशीष देगा या उसके ऊपर आपदा लाएगा, क्योंकि वह जानता था कि हर एक चीज़ को परमेश्वर के हाथ के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, और यह कि मनुष्य का चिंता करना मूर्खता, अज्ञानता, या तर्कहीनता का, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य के प्रति सन्देह का, और परमेश्वर का भय न मानने एक संकेत है। अय्यूब का ज्ञान हूबहू वैसा ही था जैसा परमेश्वर चाहता था। तो, क्या तुम लोगों की अपेक्षा अय्यूब के पास परमेश्वर के बारे में अधिक सैद्धांतिक ज्ञान था? क्योंकि उस समय परमेश्वर का कार्य और उसके कथन बहुत ही कम थे, इसलिए परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करना कोई आसान बात नहीं थी। अय्यूब के द्वारा ऐसी उपलब्धि किसी भी तरह से साहसिक कार्य नहीं था। उसने परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं किया था, न ही कभी परमेश्वर को बोलते हुए सुना था, या न ही परमेश्वर के चेहरे को देखा था। कि वह परमेश्वर के प्रति ऐसी प्रवृत्ति रखने में समर्थ था यह पूरी तरह से उसकी मानवता और उसकी व्यक्तिगत खोज का परिणाम था, ऐसी मानवता और खोज जिन्हें आज के लोगों के द्वारा धारण नहीं किया जाता है। इस प्रकार, उस युग में, परमेश्वर ने कहा, "क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा मनुष्य और कोई नहीं है।" उस युग में, परमेश्वर ने पहले से ही उसके बारे में ऐसा आँकलन कर लिया था, और वह ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच चुका था। आज यह कितना अधिक सत्य होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 56

यद्यपि परमेश्वर मनुष्य से छिपा हुआ है, फिर भी सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के कर्म उसको जानने हेतु मनुष्य के लिए पर्याप्त हैं

अय्यूब ने परमेश्वर के चेहरे को नहीं देखा था, या परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को नहीं सुना था, उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो बिलकुल भी नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रति उसके भय और उसकी परीक्षाओं के दौरान उसकी गवाही को सभी लोगों के द्वारा देखा जाता है, और परमेश्वर के द्वारा उनसे प्रेम किया जाता है, उनमें आनन्द मनाया जाता है, और उनकी प्रशंसा की जाती है, और लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं, और इसके अतिरिक्त, उनका स्तुति-गान करते हैं। उसके जीवन के बारे में कुछ भी महान या असाधारण नहीं था: किसी साधारण मनुष्य के समान ही, उसने एक साधारण जीवन जीया था, सूर्य उगने पर काम पर जाना और सूर्य अस्त होने पर अपने घर पर विश्राम के लिए वापस आना। अन्तर यह है कि इन अनेक साधारण दशकों के दौरान, उसने परमेश्वर के मार्ग में एक अंतर्दृष्टि प्राप्त की थी, और परमेश्वर की महान सामर्थ्य और संप्रभुता का ऐसा एहसास किया और उसे समझा था, जैसा किसी और व्यक्ति ने कभी नहीं किया था। वह किसी भी साधारण मनुष्य की अपेक्षा अधिक चतुर नहीं था, उसका जीवन खासतौर पर कठिन नहीं था, इसके अतिरिक्त, न ही उसके पास अदृश्य विशेष कौशल थे। यद्यपि जो उसने धारण किया था वह ऐसा व्यक्तित्व था जो ईमानदार, उदार, और सीधा था, एक ऐसा व्यक्तित्व जो निष्पक्षता और धार्मिकता से प्रेम करता था, और जो सकारात्मक चीज़ों से प्रेम करता था—जिनमें से कुछ भी अधिकांश सामान्य लोगों के द्वारा धारण नहीं किया जाता है। उसने प्रेम और घृणा के बीच अन्तर किया, उसके पास न्याय की समझ थी, वह अटल और दृढ़ था, और वह अपनी सोच में विस्तार के प्रति अतिसावधान ध्यान देता था, और इस प्रकार पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान उसने उन सभी असाधारण चीज़ों को देखा जिन्हें परमेश्वर ने किया था, और उसने परमेश्वर की महानता, पवित्रता और धार्मिकता को देखा, उसने मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता, कृपा, और सुरक्षा को देखा, और सर्वोच्च परमेश्वर की माननीयता और अधिकार को देखा। अय्यूब क्यों इन चीज़ों को हासिल कर पाया था जो किसी भी साधारण मनुष्य से परे थीं, इसका पहला कारण था कि उसके पास एक शुद्ध हृदय था, और उसका हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित था, और उसकी अगुवाई सृजनकर्ता के द्वारा की गई थी। दूसरा कारण था उसकी खोज: ऐसा व्यक्ति बनने की खोज जो निर्दोष, और सिद्ध हो, और ऐसा व्यक्ति हो जो स्वर्ग की इच्छा का पालन करे, जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया जाए, और जो दुष्टता से दूर हो गया हो। अय्यूब ने परमेश्वर को देखने या परमेश्वर के वचनों को सुनने में असमर्थ होने पर इन चीज़ों को धारण किया और इनकी खोज की; यद्यपि उसने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, फिर भी वह उन उपायों को जान गया था जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है; और उस बुद्धि को समझ गया था जिससे परमेश्वर ऐसा करता है। यद्यपि उसने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को कभी नहीं सुना था, फिर भी अय्यूब जानता था कि मनुष्य को प्रतिफल देने और मनुष्य से ले लेने के सभी कर्म परमेश्वर की ओर से आते हैं। हालाँकि उसके जीवन के वर्ष किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न नहीं थे, फिर भी उसने अपने जीवन की असाधारणता को सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के अपने ज्ञान को प्रभावित करने, या परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग के अपने अनुसरण को प्रभावित करने नहीं दिया। उसकी नज़रों में, सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के कार्यों से भरे हुए थे, और परमेश्वर की संप्रभुता को व्यक्ति के जीवन के किसी भी भाग में देखा जा सकता था। उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, परन्तु वह यह एहसास कर पाता था कि परमेश्वर के कर्म हर जगह हैं, और पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान, अपने जीवन के हर कोने में वह परमेश्वर के असाधारण और चमत्कारिक कर्मों को देख पाता था, और परमेश्वर की चमत्कारिक व्यवस्थाओं को देख सकता था। परमेश्वर की गोपनीयता और खामोशी ने अय्यूब के द्वारा परमेश्वर के कर्मों के एहसास को बाधित नहीं किया, न ही इसने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के उसके ज्ञान को प्रभावित किया। उसका जीवन परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का एहसास था, जो उसके दैनिक जीवन के दौरान, सभी चीज़ों के बीच छिपा हुआ था। अपने दैनिक जीवन में उसने उस परमेश्वर के हृदय की आवाज़ को और परमेश्वर के वचनों को सुना और समझा था, जो सभी चीज़ों के बीच खामोश है, फिर भी अपने हृदय की आवाज़ और अपने वचनों को सभी चीज़ों के नियमों के शासन के द्वारा अभिव्यक्त करता है। तो तुम देखो, कि यदि लोगों के पास अय्यूब के समान ही मानवता और खोज हो, तो वे अय्यूब के समान एहसास और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और अय्यूब के समान ही सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की समझ और ज्ञान को अर्जित कर सकते हैं। परमेश्वर अय्यूब पर प्रकट नहीं हुआ था या परमेश्वर ने उससे बात नहीं की थी, परन्तु अय्यूब सिद्ध, और खरा होने, तथा परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में समर्थ था। दूसरे शब्दों में, बिना परमेश्वर के प्रकट हुए या मनुष्य से बात किए, सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के कर्म और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी संप्रभुता किसी मनुष्य के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर के अस्तित्व, सामर्थ्य और अधिकार को जान ले, और परमेश्वर के सामर्थ्य और अधिकार ऐसे मनुष्य को परमेश्वर का भय दिलाने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करवाने के लिए पर्याप्त हैं। चूँकि अय्यूब जैसा साधारण मनुष्य परमेश्वर का भय प्राप्त करने और दुष्टता का परित्याग करने में समर्थ था, इसलिए हर साधारण मनुष्य जो परमेश्वर का अनुसरण करता है उसे भी इसमें समर्थ होना चाहिए। हालाँकि ये वचन एक तर्कसंगत अनुमान के समान सुनाई दे सकते हैं, फिर भी ये चीज़ों के नियमों का उल्लंघन नहीं करते हैं। मगर तथ्यों ने अपेक्षाओं से मेल नहीं खाया है: परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना, ऐसा प्रतीत होता है कि, यह अय्यूब का और केवल अय्यूब की गतिविधि का ही दायरा है। "परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने" का उल्लेख होने पर लोग सोचते हैं कि इसे केवल अय्यूब के द्वारा ही किया जाना चाहिए, मानो कि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की नामपट्टी को अय्यूब के नाम के साथ लगा दिया गया था और दूसरों से इसका कोई संबंध नहीं था। इसका कारण स्पष्ट हैः क्योंकि केवल अय्यूब ही इस प्रकार का व्यक्तित्व रखता था जो ईमानदार, उदार, और खरा था, और जो निष्पक्षता और धार्मिकता तथा उन चीज़ों से प्रेम करता था जो सकारात्मक थीं, इस प्रकार केवल अय्यूब ही परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण कर सकता था। तुम लोगों ने यहाँ पर निहितार्थ को अवश्य समझ लिया होगा—जो यह है कि क्योंकि कोई भी ऐसी मानवता को धारण नहीं करता है जो सच्ची, उदार, खरी है, और उससे प्रेम करती है जो निष्पक्ष और धार्मिक तथा सकारात्मक है, इसलिए कोई भी परमेश्वर का भय नहीं मान सकता है और दुष्टता से दूर नहीं रह सकता है, और इस प्रकार वे कभी परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकते हैं या परीक्षाओं के बीच में डटे नहीं रह सकते हैं। जिसका यह भी मतलब है कि, अय्यूब के अपवाद के साथ, सभी लोगों को अब भी शैतान के द्वारा बाँधा और जाल में फँसाया जाता है, इसके द्वारा उन सभी पर दोषा लगाया जाता है, आक्रमण किया जाता है, और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, और वे ऐसे लोग हैं जिन्हें शैतान निगलने की कोशिश करता है, और वे सभी बिना किसी स्वतन्त्रता वाले, क़ैदी हैं जिन्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 57

यदि मनुष्य का हृदय परमेश्वर के प्रति शत्रुता में होता है, तो वह कैसे परमेश्वर का भय मान सकता है और दुष्टता से दूर रह सकता है?

चूँकि आज के समय के लोग अय्यूब के समान मानवता को धारण नहीं करते हैं, इसलिए उनके स्वभाव का सार, और परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति क्या है? क्या वे परमेश्वर का भय मानते हैं? क्या वे दुष्टता से दूर रहते हैं? जो लोग परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं और दुष्टता से दूर नहीं रहते हैं उन्हें केवल तीन शब्दों में सारांशित जा सकता हैः परमेश्वर के शत्रु। तुम लोग अक्सर इन तीन शब्दों को कहते हो, परन्तु तुम लोगों ने कभी उनके वास्तविक अर्थ को नहीं जाना है। "परमेश्वर के शत्रु" शब्दों में उनके लिए सार है: वे यह नहीं कह रहे हैं कि परमेश्वर मनुष्य को शत्रु के रूप में देखता है, परन्तु मनुष्य परमेश्वर को शत्रु के रुप में देखता है। पहला, जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना आरम्भ करते हैं, तो किसके पास अपने स्वयं के लक्ष्य, कारण या महत्वकांक्षाएँ नहीं होती हैं? भले ही उनका एक भाग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता है, और उसने उसके अस्तित्व को देखा है, फिर भी परमेश्वर में उनके विश्वास में अभी भी वे कारण होते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने का उनका अंतिम लक्ष्य उसके आशीषों और उन चीज़ों को प्राप्त करना है जिन्हें वे चाहते हैं। लोगों के जीवन के अनुभवों में, वे प्रायः अपने लिए सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका को छोड़ दिया, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे तो इसमें अवश्य जोड़ना, और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कोई वचन दिए हैं? क्या उसने मेरे भले कर्मों को याद किया है? मेरा अन्त क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त कर सकता हूँ? ... प्रत्येक व्यक्ति लगातार, और प्रायः अपने हृदय में इस प्रकार का गुणा भाग करता है, और वे परमेश्वर से माँगें करते हैं जिनमें उनके कारण, और महत्वाकांक्षाएँ, तथा सौदे होते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है, परमेश्वर के बारे में लगातार योजनाओं को ईजाद करता रहता है, और लगातार परमेश्वर के साथ अपने अंत के बारे में बहस करता रहता है, और परमेश्वर से एक वक्तव्य निकलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह देता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर की खोज करने के साथ-साथ, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान व्यवहार नहीं करता है। वह हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करता है, लगातार उससे माँग करता रहता है, और यहाँ तक कि हर कदम पर उस पर दबाव डालता है, और एक इंच दिए जाने के बाद एक मील हथियाने की कोशिश करता है। परमेश्वर के साथ सौदबाजी करने के साथ-साथ, मनुष्य उसके साथ बहस भी करता है, और ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किसी निश्चित परिस्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त पड़ जाते हैं, और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भर जाते हैं। जब उसने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरम्भ किया था तब से, मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, स्विटज़रलैंड की सेना का एक चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा लेनदार माना है, मानो कि परमेश्वर से आशीषों और प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और कर्तव्य था, जबकि परमेश्वर की ज़िम्मेदारी मनुष्य की रक्षा और देखभाल करना और उसे भरण पोषण देना थी। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन सबकी "परमेश्वर में विश्वास करने" की मूल समझ, और परमेश्वर में विश्वास करने की अवधारणा की उनकी गहरी समझ ऐसी ही है। मनुष्य की प्रकृति के सार से लेकर उसकी व्यक्तिपरक खोज तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से सम्बन्धित हो। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ सम्भवतः कोई लेना देना नहीं हो सकता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य ने कभी यह विचार नहीं किया और न ही यह समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने में परमेश्वर का भय मानने, और परमेश्वर की आराधना करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थितियों के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। और यह सार क्या है? ऐसा है कि मनुष्य का हृदय द्वेषी है, यह छल और कपट को आश्रय देता है, और यह न त निष्पक्षता और धार्मिकता, या न ही उससे प्रेम करता है जो सकारात्मक है, और यह घिनौना और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के अधिक करीब नहीं आ सका है; उसने इसे बिलकुल भी परमेश्वर को नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य के सच्चे हृदय को कभी नहीं देखा है, न ही मनुष्य के द्वारा कभी उसकी आराधना की गई है। भले ही परमेश्वर कितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकाए, या कितना अधिक काम क्यों न करे, या मनुष्य को कितना ही अधिक प्रदान क्यों न करे, मनुष्य इसके प्रति अंधा, और सर्वथा उदासीन बना रहता है। मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपने हृदय का केवल अपने आप ही ध्यान रखना, अपने स्वयं के निर्णयों को ही लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करना, या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। आज मनुष्य की दशा ऐसी ही हैं। अब आओ हम फिर से अय्यूब को देखें। सबसे पहले, क्या उसने परमेश्वर के साथ कोई सौदा किया? क्या परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने में उसकी कोई छिपी हुई मंशा थी? उस समय, क्या परमेश्वर ने किसी से आने वाले अंत के बारे में बात की थी? उस समय, परमेश्वर ने किसी से भी अंत के बारे में प्रतिज्ञाएँ नहीं की थी, और यह इस पृष्ठभूमि से था कि अय्यूब परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में समर्थ था। क्या आज के लोग अय्यूब के साथ तुलना करने पर टिक सकते हैं? यहाँ बहुत ही अधिक असमानता हैं, वे भिन्न-भिन्न संघटनों में हैं। यद्यपि अय्यूब को परमेश्वर का अधिक ज्ञान नहीं था, फिर भी उसने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया था और वह परमेश्वर से संबंधित था। उसने परमेश्वर के साथ कभी सौदा नहीं किया, और उसकी परमेश्वर के प्रति कोई अनावश्यक इच्छाएँ या माँगें नहीं थीं; इसके बजाए, वह विश्वास करता था कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" यह वह था जो उसने अपने जीवन के अनेक वर्षों के दौरान परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को सच्चाई से थामें रहने से देखा और प्राप्त किया था। उसी प्रकार से, उसने "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" के परिणाम को भी प्राप्त किया था। ये दो वाक्य ऐसे थे जो उसने अपने जीवन के अनुभवों के दौरान परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप देखे और जाने थे, और वे उसके अत्यंत सामर्थ्यवान हथियार भी थे जिनसे उसने शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त की थी, और परमेश्वर के लिए गवाही में उसके डटे रहने का आधार थे। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग अय्यूब को एक प्यारे इंसान के रूप में देखते हो? क्या तुम लोग ऐसा व्यक्ति बनने की आशा करते हो? क्या तुम लोग शैतान के प्रलोभनों से होकर गुज़रने से डरते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर से यह प्रार्थना करने का संकल्प करते हो कि वह तुम लोगों को अय्यूब के समान ही परीक्षाओं के अधीन करे? बिना सन्देह के, अधिकांश लोग ऐसी प्रार्थना करने का साहस नहीं करेंगे। तो यह स्पष्ट है कि तुम लोगों का विश्वास दयनीय रूप से छोटा है; अय्यूब की तुलना में, तुम लोगों का विश्वास मात्र उल्लेख करने के लायक भी नहीं है। तुम लोग परमेश्वर के शत्रु हो, तुम लोग परमेश्वर से नहीं डरते हो, तुम लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में डटे रहने में अक्षम हो, और शैतान के हमलों, आरोपों और प्रलोभनों पर विजय पाने में असमर्थ हो। वह क्या है जो तुम लोगों को परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने के योग्य बनाता है? अय्यूब की कहानी सुनने और मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के इरादे और मनुष्य के उद्धार के अर्थ को समझने के बाद, क्या अब तुम लोगों में अय्यूब के समान परीक्षणों को स्वीकार करने का विश्वास है? क्या तुम लोगों में स्वयं को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करने देने का थोड़ा सा संकल्प नहीं होना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 58

परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं के बारे में कोई संदेह नहीं रखो

अय्यूब की परीक्षाओं के अंत के बाद उसकी गवाही को प्राप्त करने के पश्चात्, परमेश्वर ने संकल्प लिया कि वह अय्यूब के समान लोगों के एक समूह—या एक से अधिक समूह—को प्राप्त करेगा, मगर उसने यह संकल्प लिया कि वह फिर कभी शैतान को अनुमति नहीं देगा कि वह उन साधनों का उपयोग करके किसी और व्यक्ति पर हमला या उसके साथ दुर्व्यवहार करे जिनके द्वारा इसने परमेश्वर के साथ शर्त लगाकर अय्यूब को प्रलोभित किया था, उस पर हमला किया था और उसके साथ दुर्व्यवहार किया था; परमेश्वर ने शैतान को अनुमति नहीं दी कि वह फिर कभी मनुष्य के साथ ऐसी चीज़ें करे, जो कि कमज़ोर, मूर्ख और अज्ञानी है—इतना काफी था कि शैतान ने अय्यूब को प्रलोभित किया था! शैतान जैसा चाहे वैसा लोगों के साथ दुर्व्यवहार करे इसकी उसे अनुमति नहीं देना परमेश्वर की करुणा है। क्योंकि परमेश्वर के लिए, इतना काफी था कि अय्यूब ने शैतान के प्रलोभन और दुर्व्यवहार को सहा था। परमेश्वर ने शैतान को फिर कभी ऐसी चीज़ें करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उनके जीवन और उनकी हर चीज़ पर परमेश्वर के द्वारा शासन और उनका आयोजन किया जाता है, और शैतान को हक़ नहीं है कि वह अपनी इच्छानुसार परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हेरफेर करे—तुम लोगों को इस बिन्दु के बारे में स्पष्ट हो जाना चाहिए! परमेश्वर मनुष्य की कमज़ोरी का ध्यान रखता है, और उसकी मूर्खता तथा अज्ञानता को समझता है। यद्यपि, मनुष्य को पूरी तरह से बचाया जा सके इसके लिए, परमेश्वर को उसे शैतान के हाथों में सौंपना पड़ा, फिर भी परमेश्वर यह देखना नहीं चाहता है कि शैतान के द्वारा हमेशा मनुष्य को एक मूर्ख की तरह खेला जाए और उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाए, और वह मनुष्य को हमेशा दुःख दर्द सहते हुए नहीं देखना चाहता है। मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, और यह पूरी तरह से न्यायोचित है कि परमेश्वर मनुष्य की हर चीज़ पर शासन करे और उसकी व्यवस्था करे; यह परमेश्वर की ज़िम्मेदारी है, और वह अधिकार है जिसके द्वारा परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है! परमेश्वर शैतान को इच्छानुसार मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार और दुराचार नहीं करने देता है, मनुष्य को पथभ्रष्ट करने के लिए शैतान को विभिन्न उपायों को काम में नहीं लाने देता है, और इसके अतिरिक्त, वह मनुष्य के बारे में परमेश्वर की संप्रभुता में शैतान को हस्तक्षेप नहीं करने देता है, न ही वह शैतान को उन व्यवस्थाओं को कुचलने और नष्ट करने देता है जिनके द्वारा परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, मनुष्यजाति के प्रबंधन और उसके उद्धार के परमेश्वर के महान कार्य के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं! जिन लोग को परमेश्वर बचाना चाहता है, और जो लोग जो परमेश्वर के लिए गवाही देने में समर्थ हैं, वे परमेश्वर की छः हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना का मर्म और साकार रूप हैं, और साथ ही उसके छः हज़ार वर्षों के कार्य में उसके प्रयासों की क़ीमत भी हैं। परमेश्वर इन लोगों को यूँही शैतान को कैसे दे सकता है?

लोग प्रायः परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं के बारे में चिंता करते हैं और भयभीत होते हैं, फिर भी हर समय वे शैतान के फंदे में जीवन बिताते रहते हैं, और उस ख़तरनाक इलाके में जीवन जीते रहते हैं जिसमें उन पर शैतान के द्वारा आक्रमण और उनका शोषण किया जाता है—मगर वे भय को नहीं जानते हैं, और अविचलित रहते हैं। क्या चल रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित रहता है जिन्हें वह देख सकता है। उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और चिंता की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की जरा सी भी समझ नहीं है। बल्कि उसमें परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के बारे में थोड़ी सी घबराहट के अलावा, मनुष्य के पास परमेश्वर के भले इरादों की जरा सी भी समझ नहीं है। परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो कि परमेश्वर के पास छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा, यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर दुष्ट मंसूबों को आश्रय देता है; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सतर्क नहीं हुए तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, यह कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ भी उनके पास है वह परमेश्वर के द्वारा लिया जा सकता है, और उनके जीवन को भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य शैतान के खेमे में है, परन्तु वह शैतान के द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने के बारे में कभी चिंता नहीं करता है, और शैतान के द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है परन्तु वह शैतान के द्वारा बन्दी बनाए जाने की कभी चिंता नहीं करता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या यह विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच में मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ है, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर के शासन को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ है, तो वहाँ खोने के लिए क्या है? और इसलिए, मैं सुझाव देता हूँ कि तुम लोग अपने कार्यों में सतर्क रहो, और हर उस चीज़ के प्रति सावधान रहो जो तुम लोगों पर आने ही वाली है। तुम लोग उतावले या आवेगी न बनो, और परमेश्वर के साथ तथा लोगों, मामलों, और वस्तुओं के साथ, जिनकी उसने तुम लोगों के लिए व्यवस्था की है, अपने गर्म खून या अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हुए, अपनी कल्पनाओं और अवधारणाओं के अनुसार व्यवहार मत करो; परमेश्वर के कोप को भड़काने से बचने के लिए, तुम लोगों को अपने कार्यों में सचेत अवश्य होना चाहिए, तथा अवश्य अधिक प्रार्थना और खोज करनी चाहिए। यह याद रखो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 59

अपनी परीक्षाओं के पश्चात् अय्यूब

अय्यूब 42:7-9 ऐसा हुआ कि जब यहोवा ये बातें अय्यूब से कह चुका, तब उसने तेमानी एलीपज से कहा, "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही। इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा, क्योंकि तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" यह सुन तेमानी एलीपज, शूही बिलदद और नामाती सोपर ने जाकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया, और यहोवा ने अय्यूब की प्रार्थना ग्रहण की।

अय्यूब 42:10 जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने उसका सारा दु:ख दूर किया, और जितना अय्यूब के पास पहले था, उसका दुगना यहोवा ने उसे दे दिया।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

अय्यूब 42:17 अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया।

जो लोग परमेश्वर का भय मानते और दुष्टता से दूर रहते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा दुलार से देखा जाता है, जबकि मूर्ख लोगों को परमेश्वर के द्वारा अधम के रूप में देखा जाता है

अय्यूब 42:7-9 में, परमेश्वर कहता है कि अय्यूब उसका दास है। अय्यूब का ज़िक्र करने के लिए उसके द्वारा "दास" शब्द का उपयोग उसके हृदय में अय्यूब के महत्व को दर्शाता है; यद्यपि परमेश्वर ने अय्यूब को ऐसा कुछ कह कर नहीं पुकारा था जो और अधिक सम्माननीय होता, फिर भी परमेश्वर के हृदय के भीतर अय्यूब के महत्व से इस उपाधि का कोई सम्बन्ध नहीं था। यहाँ पर "दास" शब्द अय्यूब के लिए परमेश्वर का दिया हुआ उपनाम है। "मेरे दास अय्यूब" का परमेश्वर का अनगिनित बार ज़िक्र यह दिखाता है कि वह अय्यूब से कितना प्रसन्न था, और यद्यपि परमेश्वर ने "दास" शब्द के पीछे के अर्थ को नहीं बताया, फिर भी दास शब्द की परमेश्वर की परिभाषा को पवित्र शास्त्र के इस अंश में उसके वचनों से देखा जा सकता है। परमेश्वर ने सबसे पहले तेमानी एलीपज से कहा: "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही।" ये वचन पहली बार हैं जिन्हें परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से लोगों से कहा कि उसने वह सब कुछ स्वीकार किया जो परमेश्वर द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं के बाद अय्यूब के द्वारा कहा और किया गया था, और ये वचन पहली बार हैं कि उसने उन सब चीज़ों की स्पष्ट रूप से परिशुद्धता और यथार्थता की पुष्टि की थी जिन्हें अय्यूब ने किया और कहा था। परमेश्वर एलीपज और अन्य लोगों से उनके ग़लत, और बेतुके वार्तालाप की वजह से क्रोधित था, क्योंकि, अय्यूब के समान, वे परमेश्वर के प्रकटन को नहीं देख या उन वचनों को नहीं सुन सकते थे जो उसने उनके जीवन में कहे थे, मगर अय्यूब के पास परमेश्वर का ऐसा परिशुद्ध ज्ञान था, जबकि वे परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन करते हुए और जो कुछ वे करते थे उनमें उसके धैर्य की परीक्षा लेते हुए, आँख मूँद कर परमेश्वर के बारे में केवल अनुमान ही लगा सकते थे। परिणामस्वरूप, अय्यूब के द्वारा जो किया और कहा गया था उसे स्वीकार करने के साथ-साथ, परमेश्वर अन्य लोगों के प्रति कुपित हो गया, क्योंकि वह न केवल उनमें परमेश्वर के भय की किसी वास्तविकता को देखने में असमर्थ था, बल्कि जो कुछ वे कहते थे उसने उसमें भी परमेश्वर के भय के बारे में कुछ नहीं सुना था। और इसलिए इसके बाद परमेश्वर ने उनसे निम्नलिखित माँगें की: "इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा।" इस अंश में परमेश्वर ऐलीपज और अन्य लोगों से कुछ ऐसा करने के लिए कह रहा है जो उन्हें पापों से छुटकारा देगा, क्योंकि उनकी मूर्खता यहोवा परमेश्वर के विरुद्ध एक पाप था, और इसलिए उन्हें अपनी ग़लती का सुधार करने के लिए होमबलि चढ़ानी पड़ी थी। होमबलियाँ प्रायः परमेश्वर को चढ़ायी जाती हैं, परन्तु इन होमबलियों के बारे में असामान्य बात यह है कि उन्हें अय्यूब को चढ़ाया गया था। अय्यूब को परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था क्योंकि उसने अपनी परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर के लिए गवाही दी थी। इसी बीच, अय्यूब के इन मित्रों को उसकी परीक्षाओं के दौरान प्रकट किया गया था; उनकी मूर्खता के कारण परमेश्वर के द्वारा उनकी भर्त्सना की गई थी, और उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था, और उन्हें परमेश्वर के द्वारा दण्ड दिया जाना चाहिए—अय्यूब के सामने होमबलि चढ़ाने के द्वारा दण्ड दिया गया—जिसके बाद अय्यूब ने उनके लिए प्रार्थना की कि उनके प्रति परमेश्वर का दण्ड और कोप दूर हो जाए। परमेश्वर का इरादा था कि उन्हें लज्जित किया जाए, क्योंकि वे ऐसे लोग नहीं थे जो परमेश्वर का भय मानते और दुष्टता से दूर रहते थे, और उन्होंने अय्यूब की खराई पर दोष लगाया था। एक लिहाज से, परमेश्वर उन्हें बता रहा था कि उसने उनके कार्यों को स्वीकार नहीं किया परन्तु अय्यूब को बहुत स्वीकार किया और उससे प्रसन्न हुआ था; दूसरे लिहाज से, परमेश्वर उनसे कह रहा था कि परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किए जाने से परमेश्वर के सामने मनुष्य ऊँचा उठता है, यह कि मनुष्य की मूर्खता की वजह से परमेश्वर के द्वारा मनुष्य से घृणा की जाती है, और इसकी वजह से परमेश्वर का अपमान करता है, और वह परमेश्वर की नज़रों में अधम और नीच है। दो प्रकार के लोगों की ये परमेश्वर के द्वारा दी गई परिभाषाएँ हैं, इन दो प्रकार के लोगों के प्रति ये परमेश्वर की प्रवृत्तियाँ हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के मूल्य और स्थिति की ये परमेश्वर अभिव्यक्तियाँ हैं। भले ही परमेश्वर ने अय्यूब को अपना दास कहा था, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में यह "दास" प्यारा था, और उसे दूसरों के लिए प्रार्थना करने और उनकी ग़लतियों को क्षमा करने का अधिकार प्रदान किया गया था। यह दास परमेश्वर से सीधे बातचीत करने में और सीधे परमेश्वर के सामने आने में समर्थ था, उसकी हैसियत दूसरों की तुलना में अधिक ऊँची और सम्माननीय थी। यह परमेश्वर के द्वारा बोले गए "दास" शब्द का असली अर्थ है। अय्यूब को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की वजह से यह विशेष सम्मान दिया गया था, और दूसरों को परमेश्वर के द्वारा दास नहीं कहा गया था उसका कारण है क्योंकि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते थे और दुष्टता से दूर नहीं रहते थे। परमेश्वर की ये दो स्पष्ट रूप से भिन्न प्रवृत्तियाँ ही दो प्रकार के लोगों के प्रति उसकी प्रवृत्तियाँ हैं: जो लोग परमेश्वर का भय मानते और दुष्टता से दूर रहते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया जाता है, और वे उसकी नज़रों में बहुमूल्य के रूप में देखे जाते हैं, जबकि जो लोग मूर्ख हैं वे परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं, और दुष्टता से दूर रहने में अक्षम हैं, और वे परमेश्वर की कृपा को पाने में समर्थ नहीं हैं; परमेश्वर के द्वारा प्रायः उनसे घृणा और उनकी निन्दा की जाती है, और वे परमेश्वर की नज़रों में अधम हैं।

परमेश्वर अय्यूब को अधिकार प्रदान करता है

अय्यूब ने अपने मित्रों के लिए प्रार्थना की, और उसके बाद, अय्यूब की प्रार्थनाओं की वजह से, परमेश्वर उनसे उनकी मूर्खता के अनुसार नहीं निपटा—उसने उन्हें दण्ड नहीं दिया या उनसे कोई बदला नहीं लिया। और ऐसा क्यों था? क्योंकि उनके लिए परमेश्वर के दास अय्यूब की प्रार्थनाएँ परमेश्वर के कानों तक पहुँच गई थीं; परमेश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया था क्योंकि उसने अय्यूब की प्रार्थनाओं को स्वीकार कर लिया था। और हम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर किसी को आशीष देता है, तो वह उन्हें बहुत से प्रतिफल देता है, सिर्फ भौतिक वस्तुएँ ही नहीं, दोनों देता है: परमेश्वर उन्हें अधिकार भी देता है, और दूसरों के लिए प्रार्थना करने का हक़दार बनाता है, और परमेश्वर उन लोगों के अपराधों को भूल जाता है, और अनदेखा करता है क्योंकि वह इन प्रार्थनाओं को सुन लेता है। यह वही अधिकार है जो परमेश्वर ने अय्यूब को दिया। उनके तिरस्कार को रोकने के लिए अय्यूब की प्रार्थनाओं के माध्यम से, यहोवा परमेश्वर ने उन मूर्खों लोगों को लज्जित किया—जो, वास्तव में, एलीपज और दूसरों के लिए उसका विशेष दण्ड था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 60

अय्यूब को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा आशीष दिया जाता है, और उस पर फिर कभी भी शैतान के द्वारा आरोप नहीं लगाया जाता है

यहोवा परमेश्वर के कथनों के बीच ऐसे वचन हैं कि "तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" वह क्या था जो अय्यूब ने कहा था? यह वह था जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, और साथ ही यह वह था जो अय्यूब की पुस्तक के पन्नों के अनेक वचनों में है जिनमें अय्यूब को बोलते हुए दर्ज किया गया है। वचनों के इन कई सभी पन्नों में, अय्यूब को एक बार भी परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत या संदेह नहीं है। वह सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा करता है। यह वह प्रतीक्षा है जो आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति है, जिसके परिणामस्वरूप, और उन वचनों के परिणामस्वरूप जो उसने परमेश्वर से कहे थे, अय्यूब को परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था। जब उसने परीक्षाओं को सहा और कठिनाईयों को झेला, तब परमेश्वर उसके बगल में था, और यद्यपि परमेश्वर की उपस्थिति से उसकी कठिनाई कम नहीं हुई थी, फिर भी परमेश्वर ने वह देखा जिसे देखने की उसने इच्छा की थी, और वह सुना जिसे सुनने की उसने इच्छा की थी। अय्यूब का प्रत्येक कार्य और वचन परमेश्वर की नज़रों और कानों तक पहुँचा; परमेश्वर ने सुना, और उसने देखा—और यह तथ्य है। परमेश्वर के बारे में अय्यूब का ज्ञान, और उस समय, उस अवधि के दौरान उसके हृदय में परमेश्वर के बारे में उसके विचार, वास्तव में उन लोगों के लिए उतने विशिष्ट नहीं थे जितना आज के समय के लोगों के लिए हैं, परन्तु उस समय के सन्दर्भ में, परमेश्वर ने तब भी वह सब कुछ पहचान लिया जो उसने कहा था, क्योंकि उसका व्यवहार और उसके हृदय में विचार, और जो कुछ उसने अभिव्यक्त और प्रकट किया था, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के लिए पर्याप्त थे। जब अय्यूब को परीक्षाओं के अधीन किया गया था उस दौरान, जो उसने अपने हृदय में सोचा था और करने का संकल्प किया था उसने परमेश्वर को एक परिणाम दिखाया, एक ऐसा परिणाम जो परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, और उसके बाद परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षाओं को दूर किया, अय्यूब अपनी मुसीबतों से उभरा, और उसकी परीक्षाएँ पूरी हो गई थीं और फिर कभी दुबारा उस पर नहीं आईं। क्योंकि अय्यूब को पहले ही परीक्षाओं के अधीन कर दिया गया था, और वह इन परीक्षाओं के दौरान डटा रहा था, और उसने शैतान पर पूरी तरह से विजय प्राप्त की थी, इसलिए परमेश्वर ने उसे आशीषें प्रदान की जिनका वह सही मायने में हक़दार था। जैसा कि अय्यूब 42:10,12 में दर्ज है, अय्यूब को एक बार फिर से आशीष दिया गया था, और उसे पहली बार की तुलना में कहीं अधिक आशीष दिए गए थे। इस बार शैतान पीछे हट गया था, तथा उसने अब और कुछ नहीं कहा या किया, और उसके बाद से शैतान के द्वारा अय्यूब को कभी बाधित नहीं किया गया या उस पर आक्रमण नहीं किया गया, और शैतान ने अय्यूब के बारे में परमेश्वर के आशीषों के विरुद्ध अब और कोई दोषारोपण नहीं किया।

अय्यूब ने अपना बाकी का आधा जीवन परमेश्वर के आशीषों के बीच बिताया

यद्यपि उस समय के उसके आशीषें केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊँटों, भौतिक सम्पत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थीं, फिर भी वे आशीष जो परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थे। उस समय क्या इस बात को दर्ज किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की शाश्वत प्रतिज्ञाएँ अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब के उसके के आशीषों में, परमेश्वर ने उसके अंत का उल्लेख नहीं किया या उसकी थोड़ी सी भी चर्चा नहीं की, और इस बात की परवाह किए बिना कि अय्यूब परमेश्वर के हृदय में क्या महत्व और स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपने आशीषों में बहुत सोचा-समझा हुआ था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा की स्थिति तक नहीं पहुँची थी, और योजना ने उसके कार्य के अंतिम चरण में प्रवेश नहीं किया था, तब तक परमेश्वर ने मनुष्य को मात्र भौतिक आशीषें ही प्रदान करते हुए, अंत का कोई उल्लेख नहीं किया था। इसका अर्थ है कि अय्यूब का बाकी का आधा जीवन परमेश्वर के आशीषों के बीच गुज़रा था, जो कि वही था जिसने उसे दूसरों से अलग बनाया था—परन्तु उनके समान ही उसकी उम्र बढ़ी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन आया जब उसने संसार को अलविदा कह दिया। इस प्रकार ऐसा दर्ज है की "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। यहाँ "वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" इसका क्या अर्थ है? जब परमेश्वर ने लोगों के अंत की घोषणा की थी उससे पहले के युग में, परमेश्वर ने अय्यूब के लिए एक जीवन काल निर्धारित किया था, और जब वह उस आयु तक पहुँच गया था तब उसने अय्यूब को प्राकृतिक रूप से इस संसार से जाने दिया। अय्यूब को दूसरे आशीष से लेकर उसकी मृत्यु तक, परमेश्वर ने और कोई कठिनाई नहीं बढ़ाई। परमेश्वर के लिए अय्यूब की मृत्यु सामान्य, और आवश्यक भी थी, यह कुछ ऐसा था जो बहुत ही सामान्य था, और न तो यह कोई न्याय था और न ही कोई दण्ड। जब वह जीवित था, तब अय्यूब परमेश्वर की आराधना और उसका भय मानता था; इस संबंध में कि उसकी मृत्यु के बाद उसका अंत किस प्रकार हुआ, परमेश्वर ने कुछ नहीं कहा, और न ही इस बारे में कोई टिप्पणी की। परमेश्वर जो कहता और करता है उसमें उसकी औचित्य की एक प्रबल भावना होती है, और उसके वचनों और कार्यों की विषयवस्तु और सिद्धान्त उसके कार्य के चरण और उस समय अवधि के अनुसार होते हैं जिसमें वह कार्य कर रहा होता है। परमेश्वर के हृदय में किसी ऐसे व्यक्ति का अंत किस का प्रकार होगा जो अय्यूब के समान है? क्या परमेश्वर अपने हृदय में किसी निर्णय पर पहुँच चुका था? निस्संदेह में वह पहुँच चुका था! बस इतना ही है कि मनुष्य के द्वारा इसे जाना नहीं गया था; परमेश्वर मनुष्य को नहीं बताना चाहता था, न ही मनुष्य को बताने का उसका कोई इरादा था। और इसलिए, सतही तौर पर कहें, तो अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया, और अय्यूब का जीवन ऐसा ही था।

अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब के द्वारा जीये गए जीवन का मूल्य

क्या अय्यूब ने एक मूल्यवान जीवन बिताया था? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि उसने एक मूल्यवान जीवन बिताया? मनुष्य के लिए उसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया जिसे परमेश्वर शैतान और संसार के लोगों के सामने एक ज़बरदस्त गवाही देने के लिए बचाना चाहता है। उसने उस कर्तव्य को निभाया जिसे परमेश्वर के प्राणी के द्वारा निभाया जाना चाहिए, और एक मिसाल कायम की, और उसने उन सभी लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में कार्य किया जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, और लोगों को अनुमति दी कि वे देखें कि परमेश्वर पर भरोसा रखने के द्वारा शैतान पर विजय प्राप्त करना पूरी तरह से सम्भव है। और परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य उसका परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने, और परमेश्वर के कर्मों की प्रशंसा करने, परमेश्वर को आराम पहुँचाने और उसके आनन्द के लिए किसी चीज़ को लाने की उसकी योग्यता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने किस प्रकार की परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजय प्राप्त की, और, मनुष्यजाति के बीच परमेश्वर की महिमा करते हुए, परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाते हुए, और परमेश्वर के उत्सुक हृदय को एक परिणाम, और आशा को देखने देते हुए, शैतान और संसार के लोगों के सामने परमेश्वर के लिए ज़बरदस्त गवाही दी। उसकी गवाही ने किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में डटे रहने की क्षमता, और, मनुष्य के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य में, परमेश्वर की ओर से शैतान को लज्जित करने में सक्षम होने की मिसाल कायम की। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाया था, उसने परमेश्वर को महिमान्वित होने की खुशी का पूर्वस्वाद चखाया था, और परमेश्वर की प्रबन्धन योजना के लिए एक अद्भुत शुरुआत प्रदान की थी। और इसी के बाद से अय्यूब का नाम परमेश्वर की महिमा के लिए एक प्रतीक, और शैतान पर मनुष्यजाति की विजय का एक चिन्ह बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जैसा जीवन जीया और शैतान के ऊपर उसकी असाधारण विजय को परमेश्वर के द्वारा हमेशा हृदय में सँजोकर रखा जाएगा, और आनेवाली पीढ़ियों के द्वारा उसकी सिद्धता, खराई, और परमेश्वर के भय का सम्मान और अनुकरण किया जाएगा। उसे एक दोषरहित, चमकदार मोती के समान परमेश्वर के द्वारा हमेशा सँजोया जाएगा, और इसलिए भी वह मनुष्य के द्वारा सहेजकर रखे जाने के योग्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 61

व्यवस्था के युग के नियम

दस आज्ञाएँ

वेदी बनाने के सिद्धान्त

सेवकों के साथ व्यवहार के लिए नियम

चोरी और मुआवजे़ के लिए नियम

सब्त के वर्ष और तीन पर्वों का पालन करना

सब्त के दिन के लिए नियम

बलि चढ़ाने के लिए नियम

होमबलि

अन्न बलि

मेल बलि

पाप बलि

दोषबलि

याजकों के द्वारा बलियाँ चढ़ाने के नियम (हारुन और उसके पुत्रों को पालन करने का आदेश दिया जाता है)

याजकों के द्वारा होमबलि

याजकों के द्वारा अन्नबलि

याजकों के द्वारा पापबलि

याजकों के द्वारा दोषबलि

याजकों के द्वारा मेलबलि

याजकों के द्वारा बलि को खाने के नियम

शुद्ध और अशुद्ध पशु (जिन्हें खाया और नहीं खाया जा सकता है)

बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के शुद्धिकारण के नियम

कुष्ठ रोग की जाँच करने के लिए मानक

जो कुष्ठ रोग से चंगे हो चुके हैं उनके लिए नियम

संक्रमित घरों की सफाई करने के लिए नियम

असामान्य स्राव से पीड़ित लोगों के लिए नियम

प्रायश्चित का दिन वर्ष में एक बार अवश्य मनाया जाना चाहिए

मवेशी और भेड़-बकरियों की बलि चढ़ाने के लिए नियम

अन्यजातियों के घिनौने अभ्यासों का अनुसरण करने का निषेध (कौटुम्बिक व्यभिचार, इत्यादि नहीं करना)

नियम जिनका लोगों के द्वारा पालन अवश्य किया जाना चाहिए ("तुम पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा पवित्र हूँ।")

उनका वध जो मोलेक को अपने बच्चों की बलि चढ़ाते हैं

व्यभिचार के अपराध की सजा के लिए नियम

नियम जिनका याजकों के द्वारा पालन अवश्य किया जाना चाहिए (उनके प्रतिदिन के व्यवहार के नियम, पवित्र चीज़ों का उपभोग करने के नियम, बलिदान चढ़ाने के लिए नियम, इत्यादि)

पर्व जिन्हें मनाया जाना चाहिए (सब्त का दिन, फसह, पिन्तेकुस्त, प्रायश्चित का दिन, इत्यादि)

अन्य नियम (दीपक जलाना, जुबली वर्ष, भूसम्पत्ति को छुड़ाना, मन्नत मानना, दसवें अंश की भेंटें, इत्यादि)

व्यवस्था के युग के नियम संपूर्ण मनुष्यजाति के परमेश्वर के निर्देशन के वास्तविक प्रमाण हैं

तो, तुम लोगों ने व्यवस्था के युग के इन नियमों और सिद्धान्तों को पढ़ा है, है न? क्या ये नियम एक व्यापक दायरे को शामल करते हैं? पहला, वे दस आज्ञाओं को शामिल करते हैं, जिसके बाद वे नियम हैं कि वेदियाँ कैसे बनाएँ, इत्यादि। इनके बाद सब्त का पालन करने और तीन पर्वां को मनाने के नियम हैं, जिसके बाद बलियाँ चढ़ाने के नियम हैं। क्या तुम लोगों ने देखा कि यहाँ कितने प्रकार कि बलियाँ हैं? यहाँ होमबलि, अन्नबलि, मेलबलि, पापबलि, इत्यादि हैं। इनके बाद याजकों के लिए बलि के नियम आते हैं, जिसमें याजकों के द्वारा होमबलि और अन्नबलि, और अन्य प्रकार की बलियाँ शामिल हैं। आठवें नियम याजकों के द्वारा बलियों को खाने के लिए है। और उसके बाद इसके लिए नियम हैं कि लोगों के जीवन के दौरान किन चीज़ों का पालन किया जाना चाहिए। लोगों के जीवन के कई पहलुओं के लिए आवश्यक शर्तें हैं, जैसे कि इसके लिए नियम कि वे क्या खा सकते हैं या क्या नहीं खा सकते हैं, बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के शुद्धिकारण के लिए नियम, और उनके लिए नियम जिनका कोढ़ चंगा किया जा चुका है। इन नियमों में, परमेश्वर बीमारी के बारे में तक बात करता है, और इनमें भेड़-बकरियों और मवेशियों, इत्यादि का वध करने के लिए भी नियम हैं। भेड़-बकरियों और मवेशियों का सृजन परमेश्वर के द्वारा किया गया था, और तुम्हें उनका वध उसी तरह से करना चाहिए जिस तरह से करने के लिए परमेश्वर तुमसे कहता है; बिना किसी सन्देह के परमेश्वर के वचनों में तर्क है, परमेश्वर के द्वारा दी गयी आज्ञाओं के अनुसार कार्य करना निःसन्देह सही है, और निश्चित रूप से लोगों के लिए लाभदायक है! पर्व और उन्हें मनाने के नियम भी हैं, जैसे सब्त का दिन, फसह, और अन्य—परमेश्वर ने इन सब के बारे में बोला था। आओ हम अंतिम नियमों पर नज़र डालें: अन्य नियम—दीपक जलाना, जुबली वर्ष, भूसम्पत्ति को छुड़ाना, मन्नत मानना, दशवाँ अंश चढ़ाना, इत्यादि। क्या ये एक व्यापक दायरे को शामिल करते हैं? सबसे पहली बात जिसके बारे में बातचीत की जाए वह है लोगों द्वारा बलियों का मामला, उसके बाद चोरी और मुआवजे के लिए, और सब्त के दिन का पालन करने के लिए नियम हैं...; जीवन के विवरणों का हर एक ब्यौरा शामिल है। कहने का तात्पर्य है कि, जब परमेश्वर ने प्रबन्धन योजना के अपने आधिकारिक कार्य की शुरुआत की, तो उसने अनेक नियम निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य के द्वारा किया जाना था। ये नियम पृथ्वी पर मनुष्य को साधारण जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का ऐसा साधारण जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य हो। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियों को किस प्रकार बनाएँ, वेदियों को किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि कैसे बलि चढ़ाएँ, और स्थापित किया कि मनुष्य को किस प्रकार से जीवन जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो कुछ निर्दिष्ट किया था वह सर्वव्यापी था, और इन रिवाजों, नियमों, और सिद्धान्तों के साथ उसने लोगों के व्यवहार को मानकीकृत किया, उनकी ज़िन्दगियों का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर के नियमों के प्रति उनकी दीक्षा का मार्ग दर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के सामने आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और सभी चीज़ों के बीच ऐसा जीवन पाने के लिए मार्गदर्शन किया जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया था जो व्यवस्थित क्रम, नियमितता, और संयम को धारण किए हुए था। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाओं को तय करने के लिए सबसे पहले इन साधारण नियमों और सिद्धान्तों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने का एक साधारण जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का साधारण जीवन हो; उसकी छः हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना की शुरुआत की विशिष्ट विषयवस्तु ऐसी ही है। ये नियम और व्यवस्थाएँ बहुत ही व्यापक विषयवस्तु को आवृत करती हैं, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, उन लोगों के द्वारा इन्हें स्वीकार और इनका आदर किया जाना था जो व्यवस्था के युग से पहले आए, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर के द्वारा अगुवाई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

मनुष्यजाति परमेश्वर की शिक्षाओं और प्रावधानों से हमेशा अवियोज्य है

इन नियमों में हम देखते हैं कि अपने कार्य के प्रति, अपने प्रबंधन के प्रति, और मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति गम्भीर, कर्तव्यनिष्ठ, कठोर और ज़िम्मेदार है। वह जरा सी भी विसंगति के बिना उस कार्य को करता है जो उसे अपने कदमों के अनुसार मनुष्यजाति के बीच अवश्य करना चाहिए, जरा सी भी त्रुटि या चूक के बिना उन वचनों को कह रहा है जो उसे मनुष्यजाति को अवश्य कहने चाहिए, मनुष्यजाति को यह देखने दे रहा है कि वह परमेश्वर की अगुवाई से अवियोज्य है, और उसे यह दिखा रहा है कि वह सब कुछ जो परमेश्वर करता और कहता है वह मनुष्यजाति के लिए आखिर कितना महत्वपूर्ण है। संक्षेप में, इस बात की परवाह किए बिना कि अगले युग में मनुष्य किस प्रकार का है, बिलकुल शुरुआत में—व्यवस्था के युग के दौरान—परमेश्वर ने इन साधारण चीज़ों को किया था। परमेश्वर के लिए, उस युग में परमेश्वर, संसार और मनुष्यजाति की लोगों की धारणाएँ अमूर्त और अस्पष्ट थीं, और यद्यपि उनके पास कुछ सचेत मत और इरादे थे, फिर भी उनमें से सभी अस्पष्ट और ग़लत थे, और इसलिए मनुष्यजाति परमेश्वर की शिक्षाओं और उसके लिए परमेश्वर के भरण पोषण से अवियोज्य थी। प्राचीनतम मनुष्यजाति कुछ नहीं जानती थी, और इसलिए परमेश्वर को मनुष्य को जीवित बचे रहने के अत्यंत सतही और मूलभूत सिद्धान्तों और जीवन जीने के लिए आवश्यक नियमों को सिखाना था, इन चीज़ों को थोड़ा थोड़ा करके मनुष्य के हृदय में डालना था, और इन नियमों के माध्यम से, और इन व्यवस्थाओं के माध्यम से, जो कि वचनों के थे, मनुष्य को परमेश्वर की एक उत्तरोत्तर समझ, परमेश्वर की अगुवाई की एक उत्तरोत्तर समझ और सराहना, और मनुष्य तथा परमेश्वर के बीच सम्बन्ध की एक मूल अवधारणा देना आरम्भ करना था। इस प्रभाव को प्राप्त करने के बाद ही, केवल, थोड़ा-थोड़ा करके, परमेश्वर उस कार्य को करने में समर्थ हुआ जिसे वह बाद में करता, और इस प्रकार व्यवस्था के युग के दौरान ये नियम और परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य के मूल सिद्धान्त, और परमेश्वर की प्रबन्धन योजना में कार्य का पहला चरण हैं। यद्यपि, व्यवस्था के युग के कार्य से पहले, परमेश्वर ने आदम, हव्वा और उनके वंशजों से बात की थी, फिर भी वे आज्ञाएँ और शिक्षाएँ इतनी व्यवस्थित या विशिष्ट नहीं थीं कि उन्हें एक-एक करके मनुष्य को दिया जाता, और उन्हें लिखा नहीं गया था, न ही वे नियम बनी थीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि, उस समय, परमेश्वर की योजना उतनी दूर तक नहीं गई थी; जब परमेश्वर इस कदम तक मनुष्य की अगुवाई कर चुका था केवल तभी वह व्यवस्था के युग के इन नियमों को बोलना आरम्भ कर सका था, और मनुष्य से इसे सम्पन्न करवाना शुरू कर सका था। यह एक आवश्यक प्रक्रिया थी, और परिणाम अपरिहार्य था। ये साधारण रीति रिवाज़ और नियम मनुष्य के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य के चरणों और परमेश्वर की बुद्धि को दिखाते हैं जो उसकी प्रबंधन योजना में प्रकट हुई थी। परमेश्वर जानता है कि शुरुआत करने के लिए किस विषयवस्तु और किन साधनों का उपयोग करना है, जारी रखने के लिए किन साधनों का उपयोग करना है, समाप्त करने के लिए किन साधनों का उपयोग करना है ताकि वह ऐसे लोगों के समूह को प्राप्त कर सके जो उसकी गवाही दे सकें, ऐसे लोगों के समूह को प्राप्त कर सके जो उसी के समान एक मन वाले हों। वह जानता है कि मनुष्य के भीतर क्या है, और जानता है कि उसमें क्या कमी है, वह जानता है कि उसे क्या प्रदान करना है, और उसे मनुष्य की अगुवाई कैसे करनी है, और वह यह भी जानता है कि मनुष्य को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। मनुष्य एक कठपुतली के समान हैः भले ही उसे परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं थी, फिर भी वह आज तक, कदम-कदम पर, परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के द्वारा अगुवाई करवाए जाने के सिवाए और कुछ नहीं कर सकता था। जो कुछ परमेश्वर करनेवाला था उसके बारे में परमेश्वर के हृदय में कोई अस्पष्टता नहीं थी; उसके हृदय में बहुत ही स्पष्ट और जीवंत योजना थी, और उसने, सतही से गहराई की ओर प्रगति करते हुए, उस कार्य को कार्यान्वित किया जिसे करने की इच्छा उसने अपने कदमों और अपनी योजना के अनुसार की थी। यद्यपि उसने उस कार्य की ओर संकेत नहीं किया था जिसे वह बाद में करने वाला था, फिर भी उसका बाद का कार्य उसकी योजना के अनुसार कड़ाई से निरन्तर कार्यान्वित होता और प्रगति करता रहा, और जो कि परमेश्वर के स्वरूप की अभिव्यक्ति, और परमेश्वर का अधिकार भी है। इस बात की परवाह किए बिना कि वह अपनी प्रबंधन योजना के किस चरण का कार्य कर रहा है, उसका स्वभाव और उसका सार स्वयं उसका ही प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बिल्कुल सत्य है। युग, या कार्य के चरण, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के लोगों से वह घृणा करता है इन सबके बावजूद, उसका स्वभाव और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। यद्यपि ये नियम और सिद्धान्त जिन्हें परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान स्थापित किया था आज के लोगों को बहुत ही साधारण और सतही प्रतीत होते हैं, और भले ही उन्हें समझना और प्राप्त करना आसान है, उनमें अभी भी परमेश्वर की बुद्धि है, और परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है। क्योंकि इन प्रकट रूप से साधारण नियमों के भीतर मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की ज़िम्मेदारी और देखरेख, तथा उसके विचारों का उत्कृष्ट सार व्यक्त होते हैं, जो मनुष्य को सचमुच में इस तथ्य एहसास करने देते हैं कि परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को उसके हाथ के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। मनुष्यजाति भले ही कितने अधिक ज्ञान पर महारत हासिल क्यों न कर ले, या वह कितने ही सिद्धान्तों और रहस्यों को क्यों न समझ ले, परमेश्वर के लिए इनमें से कुछ भी मनुष्यजाति के लिए उसके भरण पोषण का, और मनुष्यजाति के प्रति उसकी अगुवाई का स्थान लेने में सक्षम नहीं है; मनुष्यजाति परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य से हमेशा अवियोज्य रहेगी। मनुष्य और परमेश्वर के बीच अवियोज्य सम्बन्ध ऐसा ही है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर तुम्हें कोई आज्ञा, या नियम देता है, या उसकी इच्छा को समझने के लिए तुम्हें कोई सच्चाई प्रदान करता है या नहीं, वह भले ही कुछ भी क्यों न करता हो, परमेश्वर का लक्ष्य मनुष्य का एक खूबसूरत कल की ओर मार्गदर्शन करना है। परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन और वह कार्य जिसे वह करता है दोनों उसके सार के एक पहलू का प्रकाशन हैं, तथा उसके स्वभाव और उसकी बुद्धि के एक पहलू का प्रकाशन हैं, और वे उसकी प्रबंधन योजना का एक अवियोज्य कदम हैं। इसकी अनदेखी बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए! परमेश्वर जो कुछ करता है उसमें उसकी इच्छा होती है; परमेश्वर ग़लत टीका-टिप्पणियों से भयभीत नहीं होता है, न ही वह अपने बारे में किसी मनुष्य की धारणाओं या विचारों से डरता है। वह किसी भी मनुष्य, मामले या पदार्थ से बाधित हुए बिना, सिर्फ अपनी प्रबंधन योजना के अनुसार अपना कार्य करता है, और अपने प्रबंधन को निरन्तर जारी रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 62

आज हम सबसे पहले मनुष्यों के सृजन के बाद से परमेश्वर के विचारों, मतों, और प्रत्येक कार्य का सार निकालने जा रहे हैं, और इस पर एक नज़र डालने जा रहे हैं कि उसने संसार की रचना करने से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक आरम्भ तक कौन सा कार्य कार्यान्वित किया था। तब हम खोज कर सकते हैं कि परमेश्वर के कौन से विचार और मत मनुष्यों के लिए अज्ञात हैं, और वहाँ से हम प्रबन्धन के लिए परमेश्वर की योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस सन्दर्भ को विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबन्धन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और विस्तारपूर्वक यह भी समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबन्धन के कार्य से कौन से परिणामों को चाहता है—अर्थात्, उसके प्रबन्धन के कार्य का मर्म और उद्देश्य क्‍या है। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें एक सुदूर, स्थिर और मौन समय में जाने की आवश्यकता है जब कोई मनुष्य नहीं था ...

जब परमेश्वर अपने सेज से उठा, पहला विचार जो उसके मन में आया वह यह थाः एक जीवित व्यक्ति, एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—कोई ऐसा जिसके साथ वह रहे और जो उसका निरन्तर साथी बने। वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने एक मुट्ठीभर धूल उठायी और सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया जिसकी उसने कल्पना की थी, और तब उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। एक बार जब परमेश्वर ने इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को प्राप्त कर लिया था, तो उसने कैसा महसूस किया? पहली बार, उसने एक प्रियजन, एक साथी को पाने का आनन्द महसूस किया। उसने पहली बार एक पिता होने के उत्तरदायित्व को और उस चिन्ता को भी महसूस किया जो उसके साथ आयी। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनन्द लाया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था जो परमेश्वर ने कभी किया था जिसे परमेश्वर ने अपने विचारों या यहाँ तक कि वचनों से भी सम्पन्न नहीं किया था, बल्कि जो उसके स्वयं के दोनों हाथों से किया गया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हो गया, जो माँस और लहू से बना हुआ, शरीर और आकार के साथ, और परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने एक प्रकार का ऐसा आनन्द महसूस किया जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने सचमुच में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी सी हलचल ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया था। इसलिए जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार उसे आया। यह घटनाओं की श्रृंखला थी जो उस पहले विचार के साथ आरम्भ हुई जो परमेश्वर को आया था। परमेश्वर के लिए, ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किन्तु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा ही महसूस क्यों न किया हो—आनन्द, उत्तरदायित्व, चिन्ता—उसके पास साझा करने के लिए वहाँ कोई नहीं था। उस पल से आरम्भ करके, परमेश्वर ने सचमुच में एकाकीपन और उदासी महसूस की जो उसने पहले कभी भी महसूस नहीं की थी। उसे महसूस हुआ कि मानव जाति उसके प्रेम और चिन्ता, और मनुष्य-जाति के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकती है या समझ नहीं सकती है, इसलिए उसे तब भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने इन चीज़ों को मनुष्य के लिए किया था, फिर भी मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे नहीं समझा था। प्रसन्नता के अलावा, वह आनन्द और संतुष्टि जो मनुष्य उसके लिए लाया था वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आयी। ये उस समय परमेश्वर के विचार और भावना थीं। जब परमेश्वर इन सब चीज़ों को कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनन्द से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, सब कुछ चिंता में घुल मिल गया। जो कुछ भी वह करना चाहता था वह था कि जल्दी ही यह व्यक्ति, यह मानव जाति जान ले कि परमेश्वर के हृदय में क्या है और उसकी इच्छाओं को शीघ्रता से समझ ले। तब, वे उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके अनुरूप हो सकते हैं। वे परमेश्वर को बोलते हुए अब और नहीं सुनेंगे लेकिन मूक बने रहेंगे; वे अब और अनजान नहीं होंगे कि कैसे परमेश्वर के साथ उसके कार्य में जुड़ें; और ख़ास कर के, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के प्रति अब और उदासीन लोग नहीं रहेंगे। ये पहली चीज़ें जिन्हें परमेश्वर ने पूर्ण किया बहुत ही अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों का सृजन करने के बाद, परमेश्वर ने आराम नहीं किया। वह अपने प्रबन्धन को कार्यान्वित करने की प्रतीक्षा नहीं कर सका, और न ही वह ऐसे लोगों को प्राप्त करने की प्रतीक्षा कर सका जिन्हें उसने मनुष्य-जाति के बीच में बहुत प्रेम किया था।

आगे, परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल प्रलय आया था। जल प्रलय के अभिलेख में नूह का उल्लेख है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था जिसने परमेश्वर के एक कार्य को पूर्ण करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए परमेश्वर का बुलावा प्राप्त किया था। वास्तव में, यह पहली बार भी था जब परमेश्वर ने अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए पृथ्वी पर किसी इंसान को बुलाया था। जब नूह ने जहाज़ बनाना पूरा कर लिया, तो परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल प्रलय की। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल प्रलय से नष्ट कर दिया, तो यह उन्हें सृजन करने के समय से लेकर अब तक पहली बार हुआ था कि उसने अपने आप को मानव जाति के प्रति घृणा से वशीभूत महसूस किया था; इसी ने परमेश्वर को इस मानव जाति को जल प्रलय के द्वारा नष्ट करने का दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल प्रलय के द्वारा पृथ्वी को नष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी कि वह ऐसा फिर कभी नहीं करेगा। उस वाचा का चिन्ह एक इंद्रधनुष था। यह मनुष्य-जाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इसलिए वह इंद्रधनुष परमेश्वर के द्वारा दी गई वाचा का पहला चिह्न था; यह इंद्रधनुष एक वास्तविक, और भौतिक चीज़ है जो अस्तित्व में रहती है। यह इस धनुष का ही अस्तित्व है जो परमेश्वर को पूर्ववर्ती मानव जाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अक्सर उदास महसूस करवाता है, और उसके लिए एक निरंतर अनुस्मारक के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था...। परमेश्वर अपनी गति को धीमा नहीं करेगा—वह अपने प्रबन्धन में अगला कदम उठाने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता है। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने सम्पूर्ण इस्राएल में अपने कार्य को करने के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में अब्राहम को चुना। यह भी पहली बार था कि परमेश्वर ने ऐसे किसी उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने इस व्यक्ति के माध्यम से मनुष्य-जाति को बचाने के अपने कार्य को शुरू करने, और इस व्यक्ति के वंशजों के बीच अपने कार्य को जारी रखने का संकल्प लिया। हम बाइबल में देख सकते हैं कि यही परमेश्वर ने अब्राहम के साथ किया था। तब परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी प्रथम चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों, के माध्यम से व्यवस्था के युग के अपने कार्य को आरम्भ किया। एक बार फिर पहली बार, परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान की जिनका अनुसरण मानव जाति को करना चाहिए, और उन्हें विस्तार से समझाया। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, मानक नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीवन जीना चाहिए, उन्हें क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें कौन से त्‍यौहारों और दिनों को मानना चाहिए, और वह हर चीज़ जो वे करते हैं उसमें किन सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहिए। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्य-जाति को उनके जीवन के लिए इतने विस्तृत, मानक विधि-विधान और सिद्धांत दिए थे।

जब मैं "पहली बार" कहता हूँ, तो इसका मतलब है कि परमेश्वर ने इस तरह का कार्य पहले कभी पूर्ण नहीं किया था। यह कुछ ऐसा है जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्यजाति का सृजन किया था और उसने सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों का सृजन किया था, फिर भी उसने उस प्रकार का कार्य कभी पूर्ण नहीं किया था। इस समस्त कार्य में परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों का प्रबन्धन शामिल था; यह सब मनुष्यों, मनुष्यों के परमेश्वर के द्वारा उद्धार प्रबन्धन से सम्बन्धित था। अब्राहम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिर एक चुनाव किया—उसने व्यवस्था के अधीन होने के लिए अय्यूब को चुना जो निरन्तर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और उसकी गवाही देते हुए शैतान के प्रलोभनों का सामना कर सकता था। यह भी पहली बार ही था कि परमेश्वर ने शैतान को किसी इंसान को प्रलोभित करने दिया था, और पहली बार उसने शैतान के साथ शर्त लगाई थी। अंत में, पहली बार, परमेश्वर ने किसी ऐसे को प्राप्त किया जो शैतान का सामना करते हुए परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम था—ऐसा व्यक्ति जो उसके लिए गवाही दे सकता था और शैतान को पूर्णत: शर्मिन्दा कर सकता था। जब से परमेश्वर ने मनुष्य-जाति को बनाया, तब से यही वह पहला व्यक्ति था जिसे उसने प्राप्त किया था जो उसके लिए गवाही देने में समर्थ था। एक बार जब उसने इस व्यक्ति को प्राप्त कर लिया, तो परमेश्वर अपने प्रबन्धन को आगे बढ़ाने और, अपनी अगली पसंद और अपने कार्य स्थल की तैयारी करते हुए, अपने कार्य के अगले चरण को करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया था।

इस सब के बारे में संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा की सही समझ है? परमेश्वर अपने मनुष्य-जाति के प्रबन्धन, और अपने मनुष्य-जाति के उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण के रूप में विचार करता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और न ही उसे अपने वचनों से करता है, और वह विशेष रूप से इन चीज़ों को यूँ ही नहीं करता है—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, एक मानक के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मनुष्यजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। वह कार्य चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, बाधाएँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने ही कमज़ोर क्यों न हों, या मनुष्य-जाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी ही गहरी क्यों न हो, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपने परिश्रमी प्रयास व्यय करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबन्धन करते हुए, परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और सभी लोगों पर और उस कार्य पर जिसे वह पूर्ण करना चाहता है शासन कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है कि परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मनुष्यजाति को बचाने और उसका प्रबन्धन करने की मुख्य परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई। जब परमेश्वर इस कार्य को कार्यान्वित कर रहा होता है, तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बिना छिपाव के मनुष्यों के सामने अपने मेहनती प्रयास को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को मनुष्य-जाति के लिए व्यक्त और जारी कर रहा होता है। वह इन चीज़ों को उस तरह से जारी और व्यक्त करता है जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है। इसलिए, पूरे विश्व में, परमेश्वर जिन लोगों को बचाने और जिनका प्रबन्धन करने का उद्देश्य रखता है उनके अलावा, कोई भी प्राणी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग रिश्ता हो। अपने हृदय में, जिस मनुष्यजाति का वह प्रबन्धन और उद्धार करना चाहता है, वह सबसे महत्वपूर्ण है, और वह इस मनुष्यजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं त्यागता है और लगातार अथक रूप से बिना कोई शिकायत या पछतावे के अपने कार्य में लगा रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि आज नहीं तो कल मनुष्य एक न एक दिन उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, और पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उस की ओर लौट जाएँगे ...

आज यह सब कुछ सुनने के बाद, तुम लोग ऐसा महसूस कर सकते हो कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह बिल्कुल सामान्य होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के वचनों से, और उसके कार्य से मनुष्यों ने हमेशा उसकी इच्छा को कुछ-कुछ महसूस किया है, लेकिन उनकी भावनाओं या उनके ज्ञान और जो परमेश्वर सोच रहा है उनके बीच हमेशा से एक निश्चित दूरी रही है। इसलिए, मैं सोचता हूँ कि सभी लोगों के साथ इस बारे में संवाद करना आवश्यक है कि क्यों परमेश्वर ने मनुष्यजाति को बनाया, और उन लोगों को प्राप्त करने हेतु उसकी इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी जिनकी उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ साझा करना आवश्यक है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। क्योंकि परमेश्वर का हर एक विचार और मत, और उसके कार्य का हर एक चरण और हर अवधि उसके सम्पूर्ण प्रबन्धन के कार्य से बँधी, और करीब से जुड़ी हुई है, जब तुम परमेश्वर के कार्य के हर कदम में उसके विचारों, मतों और उसकी इच्छा को समझते हो, तो यह उसकी प्रबन्धन योजना के कार्य के स्रोत को समझने के समान है। यह इसी बुनियाद पर है कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ गहरी होती है। यद्यपि वह सब कुछ जो परमेश्वर ने किया जब उसने पहली बार संसार को बनाया जिसका जिक्र मैंने पहले किया था, वह लोगों के लिए अब मात्र कुछ जानकारी है और सच्चाई की खोज करने में असम्बद्ध प्रतीत होती है, फिर भी तुम्हारे अनुभव के दौरान एक ऐसा दिन आएगा जब तुम नहीं सोचोगे कि यह जानकारी के कुछ भागों के समान इतना साधारण है और न ही यह कुछ रहस्यों के समान इतना सरल है। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा और जब परमेश्वर के लिए तुम्हारे हृदय में थोड़ी सी जगह हो जाएगी, या जब तुम पूरी तरह से और गहराई से उस की इच्छा को समझ जाओगे, तब तुम उसके महत्व और उसकी आवश्यकता को सचमुच में समझ पाओगे जिसके बारे में मैं आज कह रहा हूँ। चाहे तुम लोगों ने जिस भी हद तक इसे स्वीकार किया हो; यह आवश्यक है कि तुम लोग इन चीज़ों को समझो और जानो। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपने कार्य को कार्यान्वित करता है, चाहे यह उसके अपने मतों से है या उसके स्वयं के हाथ से, चाहे उसने इसे पहली बार किया है या अन्तिम बार—अंततः, परमेश्वर की एक योजना है, और हर चीज़ जो वह करता है उसमें उसके उद्देश्य और उसके विचार होते हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं, और ये उसके स्वरूप को प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़े—परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप—हर एक व्यक्ति के द्वारा अवश्य समझा जाना चाहिए। एक बार जब कोई व्यक्ति उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को समझ जाता है, तो वह धीरे-धीरे समझ सकता है कि परमेश्वर जो करता है वह क्यों करता है और जो वह कहता है वह क्यों कहता है। उससे, तब उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य की खोज करने, और स्वभाव में किसी परिवर्तन को खोजने का और अधिक विश्वास हो सकता है। अर्थात्, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसका विश्वास अवियोज्य हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 63

यदि लोग जिसके बारे में सुनते हैं या जिसकी समझ प्राप्त करते हैं वह परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है, तो वे जो प्राप्त करते हैं, वह जीवन होगा जो परमेश्वर से आता है। एक बार जब यह जीवन तुम्हारे भीतर गढ़ दिया जाएगा, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय उत्तरोत्तर बड़ा होता जाएगा, और इस फसल को काटना बहुत ही स्वाभाविक रूप से घटित होता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते हो, और यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केन्द्रित करना भी नहीं चाहते हो, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास की खोज कर रहे हो वह तुम्हें कभी भी उसकी इच्छा को संतुष्ट करने और उसकी प्रशंसा को प्राप्त करने नहीं दे सकता है। उससे अधिक, तुम कभी भी सचमुच में उद्धार तक नहीं पहुँच सकते हो—ये अन्तिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं और उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं, तो उनका हृदय कभी भी परमेश्वर के लिए सचमुच में नहीं खुल सकता है। एक बार जब वे परमेश्वर को समझ जाएँगे, तो वे रूचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरम्भ कर देंगे। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीर-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें, और तुम्हारी स्वयं की अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थी। जब तुम्हारा हृदय सचमुच में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय इतना असीमित संसार के जैसा है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई धूर्तता नहीं है, कोई अंधकार नहीं है, और कोई दुष्टता नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। यह प्रेम और देख-रेख से भरा हुआ है, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जिन्दा रहने की प्रसन्नता और आनन्द महसूस करोगे। ये वे चीज़े हैं जिन्हें वह तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से भरा हुआ है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; वह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के और इस बात के हर पहलू को देख सकते हो कि किस बात से वह आनन्दित होता है, क्यों वह चिन्ता करता है और क्यों वह उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। यही वह है जिसे हर एक ऐसा इंसान देख सकता है जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है। परमेश्वर तभी तुम्हारे हृदय के भीतर आ सकता है जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते है, केवल तभी तुम अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हो जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर प्रवेश कर चुके। उस समय, तुम्हें यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ बहुत बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप सँजोये रखने के बहुत लायक है। उसकी तुलना में, वे लोग जो तुम्हें घेरे रहते हैं, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और ऐसी चीज़े जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे मुश्किल से उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। वे बहुत छोटे हैं, और बहुत निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से तुम्हें उसमें खींचने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, और कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी उसके लिए कोई कीमत चुकाने हेतु बहका नहीं सकेगा। परमेश्वर की दीनता में तुम उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखोगे; इसके अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिसके बारे में तुम यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो उसमें तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखोगे, और उसके धैर्य, उसकी सहनशीलता, और तुम्हारे प्रति उसकी समझ को देखोगे। यह तुममें उसके लिए प्रेम उत्पन्न करेगा। उस दिन, तुम्हें लगेगा कि मनुष्यजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, यह कि जो लोग तुम्हारे आस-पास रहते हैं और जो चीज़े तुम्हारे जीवन में घटित होती हैं, और यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिन्ता भी इस योग्य नहीं हैं कि उनका उल्लेख भी किया जाए—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियजन है, और यह केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सब से ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगेः परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई दुष्टता नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मनुष्यजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? यह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना, प्रत्येक इंसान के लिए आजीवन शिक्षा है, और यह प्रत्येक उस व्यक्ति के द्वारा खोज किया जाने वाला एक आजीवन लक्ष्य है जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करते हैं, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 64

यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को और अधिक समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग पर नहीं रुक सकते हैं, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इसलिए, जैसे-जैसे परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का आरम्भ किया, वैसे-वैसे हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में आ गए हैं—एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में, परमेश्वर ने एक बार फिर से पहली बार कुछ बहुत महत्वपूर्ण किया। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मनुष्यजाति दोनों के लिए एक नया शुरूआती बिन्दु था। यह नया शुरूआती बिन्दु एक बार फिर से एक नया कार्य था जिसे परमेश्वर ने पहली बार किया था। यह नया कार्य कुछ अभूतपूर्व था जिसे परमेश्वर ने कार्यान्वित किया था जिसकी कल्पना मनुष्यों, और समस्त प्राणियों के द्वारा नहीं की जा सकती थी। यह कुछ ऐसा है जिसे अब सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं—यह पहली बार था कि परमेश्वर एक मानव बन गया, पहली बार उसने एक मानव के रूप, एक मानव की पहचान के साथ, अपना कार्य आरम्भ किया। यह नया कार्य इस बात को प्रकट करताथा कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया था, और यह कि वह व्यवस्था के अधीन अब और कुछ नहीं करेगा या बोलेगा। न ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के नियमों और सिद्धांतों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसका समस्त कार्य हमेशा के लिए रूक गया था और जारी नहीं रह गया था, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करना और नई चीज़ों को करना चाहता था, और उसकी योजनाओं का एक बार फिर से एक नया शुरूआती बिन्दु था। इसलिए, परमेश्वर को मनुष्यजाति की एक नए युग में अगुवाई करनी थी।

चाहे यह मनुष्य के लिए एक आनन्ददायक समाचार हो या अशुभ समाचार यह इस बार पर निर्भर करता था कि उनका सार क्या है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह एक आनन्ददायक समाचार नहीं था, बल्कि यह कुछ लोगों के लिए एक अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो वे लोग जिन्होंने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, और जिन्होंने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था किन्तु परमेश्वर का भय नहीं माना था वे परमेश्वर के नए कार्य पर दोष लगाने के लिए उसके पुराने कार्य के उपयोग की ओर प्रवृत्त होने लगे। इन लोगों के लिए, यह एक अशुभ समाचार था; परन्तु हर उस व्यक्ति के लिए जो निर्दोष और साफ़दिल का था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके छुटकारे को पाने की इच्छा करता था, परमेश्वर का पहला देहधारण बहुत आनन्ददायक समाचार था। क्योंकि जब से मनुष्य रहे हैं, यह पहली बार था कि परमेश्वर एक ऐसे रूप में जो पवित्रात्मा नहीं था मनुष्यजाति के बीच प्रकट हुआ और जीया था; बल्कि, वह मनुष्य से जन्मा था और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच रहता था, और उनके बीच काम करता था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला और यह सभी कल्पनाओं से परे भी था। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों ने एक वास्‍तविक लाभ प्राप्त किया। परमेश्वर ने न केवल पुराने युग को खत्म किया, बल्कि उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों, और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया था। उसने अपने सन्देशवाहकों को उसकी इच्छा को अब और संप्रेषित नहीं करने दिया, और वह बादलों में अब और छिपा हुआ नहीं था, और न ही वह अब और गर्जना के माध्यम से आज्ञा देते हुए मनुष्यों के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला। पहले की किसी भी चीज़ के असदृश, एक ऐसी पद्धति के माध्यम से जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय थी और जिसे समझना और स्वीकार करना उनके लिए कठिन था—देह बनना—वह उस युग के कार्य को विकसित करने के लिए मनुष्य का पुत्र बना। परमेश्वर के इस कार्य से मनुष्य-जाति हक्की-बक्की रह गयी; इसने उन्हें शर्मिंदा कर दिया, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 65

मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

हमने इस अंश को क्यो चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह है कि यह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इससे ज्यादा "विश्वासघाती" क्या हो सकती है कि वे मकई की "बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते थे और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे—बहुत सी ऐसी बातें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की ओर से किया गया यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन बिता रहे थे, और इसने आलोचना को भी भड़काया था। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले यह चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों में से, सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है जिसके बारे में मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से संवाद करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया था और नए कार्य का प्रारम्भ किया था, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की आवश्यकता नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विधि-विधानों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उसमें, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था तथा उसका अब और अनुसरण नहीं करता था, और उसने मनुष्यजाति से उसका अब और अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, प्रभु ने आराम नहीं किया, बल्कि बाहर काम करता रहा। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह व्यवस्था के अधीन अब और जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और एक नई कार्यशैली के साथ वह मनुष्यजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ है। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है जो व्यवस्था से बाहर जाने और सब्त से बाहर जाने से आरम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य कार्यान्वित किया, तो वह अतीत से अब और नहीं चिपका रहा, और वह व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में अब और चिन्तित नहीं था। न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया और जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास अधिकांश कार्य करने के लिए जिसे वह करना चाहता है और अधिकांश बातें कहने के लिए जिन्‍हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, तो वह न तो फिर से अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है और न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मनुष्यजाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावतों या विधि-विधानों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो इसे याद नहीं रखेगा या इसकी प्रशंसा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को ला चुका है, और अपने कार्य में एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह एक नए कार्य को आरम्भ करता है, तो वह मनुष्यजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से, और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न-भिन्न पहलुओं को और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या घिसे-पिटे मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी स्वतंत्र और मुक्त हैं, और कोई निषेधात्मकता नहीं है, कोई लाचारी नहीं है—जो वह मनुष्यजाति के लिए लाता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और मुक्ति है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो असलियत में, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और मुक्ति, क्योंकि वह सत्य, जीवन, और मार्ग को धारण करता है—और वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता है। लोग चाहे कुछ भी क्यों न कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से क्यों न देखें या कैसे भी उसका आकलन क्‍यों न करें, वह बिना किसी आशंका के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की भी धारणाओं या उसके कार्य और वचनों पर उठी अँगुलियों के बारे में, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। जो परमेश्वर करता है उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, या तितर-बितर करने या उसमें तोड़फोड़ करने के लिए, संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता है। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें कोई निषेधात्मकता नहीं है, और उसे किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, और उसे किसी शत्रुतापूर्ण ताक़तों के द्वारा तितर-बितर नहीं किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और किन्हीं भी शत्रुतापूर्ण ताक़तों और मनुष्यजाति में से सभी विधर्मों और भ्रांतियों को उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिया जाता है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इस निश्चित रूप से मनुष्यजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, इसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाधित रूप से कार्यान्वित किया जाएगा जब तक कि उसका महान कार्य पूर्ण नहीं हो जाता है। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, और उसका अधिकार और उसकी सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मनुष्यजाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। उसके पास जो था वह परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था, और उसका कार्य मनुष्यजाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें प्रकाश में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं वे, सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं—आज एक चीज़ का निषेध होता है, कल किसी दूसरी चीज़ का निषेध होता है—उनके जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिनके पास कोई खुशी नहीं है जिसके बारे में वे बात करें। "निषेध" क्या दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और दुष्टता को दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है तो वह एक झूठे ईश्वर की आराधना कर रहा होता है, वह एक दुष्ट आत्मा की आराधना कर रहा होता है। प्रतिबन्ध इसके साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते हो, तुम आज बाहर नहीं जा सकते हो, तुम कल अपना चूल्हा नहीं जला सकते हो, तुम अगले दिन नए घर में नहीं जा सकते हो, विवाह तथा अन्तिम क्रिया के लिए, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। यह क्या कहलाता है? यही प्रतिबन्ध कहलाता है; यह मनुष्यजाति का बंधन है, और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित कर रही हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो तुम्हें सबसे पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कोई भी निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में उसके सिद्धांत हैं, किन्तु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 66

"पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ों को करेंगे जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को, प्रजातंत्र और स्वतन्त्रता के लिए, मानवाधिकारों के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को जीवनवृत्तियों के लिए अपने कौशलों का उपयोग करने की ओर मोड़ देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक अंश के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या मनुष्यों की ये अभिव्यक्तियाँ आवश्यक रूप से वैसी ही नहीं हैं जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है"? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, बल्कि आज, लोग अमूर्त मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय करते हैं। जो लोग नियमों को बहुमूल्य समझते हैं वे नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं वे हैसियत को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, जो लोग अपनी जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने की ओर ले जाती हैं: "लोग अपने वचनों से परमेश्वर की सबसे बड़े के रूप में स्तुति करते हैं, किन्तु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।" ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उन जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। जहाँ तक जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है उसका, और उसकी इच्छा का संबंध है, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस परिदृश्य में, इन लोगों के बारे में और जो लोग दो हज़ार वर्ष पहले मन्दिर में अपना स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे उनके बारे में क्या अन्तर है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 67

यह वाक्य "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" लोगों को बताता है कि परमेश्वर का सब कुछ अभौतिक है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं को प्रदान कर सकता है, फिर भी जब एक बार तुम्हारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों से सन्तुष्टि तुम्हारी सत्य की खोज का स्थान ले सकती है? यह निःसन्देह संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप जिसके बारे में हमने संगति की है दोनों सत्य हैं। इसे भौतिक वस्तुओं की भारी कीमत के साथ भी नहीं तौला जा सकता है और न ही इसके मूल्य की पैसों में मात्रा निर्धारित की जा सकती है, क्योंकि यह कोई भौतिक वस्तु नहीं है, और यह हर एक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए, इन अमूर्त सच्चाईयों का मूल्य ऐसी किसी भी भौतिक चीज़ से बढ़कर होना चाहिए जिसे तुम अच्छा समझते हो, ठीक है न? यह कथन कुछ ऐसा है जिस पर तुम लोगों को टिके रहने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा है उसका मुख्य बिन्दु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उसका सब कुछ हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और इन्हें किसी भौतिक पदार्थ के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगाः जब तुम्हें भूख लगती है, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन सापेक्ष रूप से अच्छा हो सकता है, या सापेक्ष रूप से कमी वाला हो सकता है, किन्तु जब तुम अपना पेट भर लेते हो, तो भूखे होने का वह अप्रिय एहसास अब और नहीं होगा—वह चला जाएगा। तुम वहाँ आराम से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम में होगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किन्तु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हें उसके बारे में कोई समझ नहीं है? तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे? क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो और उसकी इच्छा तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का उपयोग कर सकते हो? परमेश्वर के माध्यम से उद्धार के तुम्हारे अनुभव की प्रक्रिया में, अपने स्वभाव में किसी परिवर्तन की खोज करने के दौरान, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझते हो या यह नहीं जानते हो कि सत्य क्या है, और यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते हो, तो क्या तुम बहुत व्याकुलता महसूस नहीं करते हो? क्या तुम अपने हृदय में एक बड़ी भूख और प्यास महसूस नहीं करते हो? क्या ये एहसास तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति महसूस करने से रोकते नहीं हैं? तो कैसे तुम अपने हृदय की उस भूख की क्षतिपूर्ति कर सकते हो—क्या इसका समाधान करने का कोई तरीका है? कुछ लोग खरीददारी करने के लिए बाज़ार चले जाते हैं, कुछ लोग भरोसा करने के लिए मित्रों को ढूँढ़ लेते हैं, कुछ लोग जी भरकर सोते हैं, अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ते हैं, या अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए कठिन मेहनत और अधिक प्रयास व्यय करते हैं। क्या ये चीज़े तुम्हारी वास्तविक कठिनाईयों का समाधान कर सकती हैं? तुम लोगों में से सभी इस प्रकार के अभ्यासों को पूर्णत: समझ लो। जब तुम निर्बलता महसूस करते हो, जब तुम परमेश्वर से प्रबुद्धता पाने की दृढ़ इच्छा महसूस करते हो ताकि वह तुम्हें उसकी सच्चाई और उसकी इच्छा की वास्तविकता को जानने की अनुमति दे सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किसकी आवश्यकता होती है? तुम्हें जिसकी आवश्यकता होती है वह भरपेट आहार नहीं है, और यह कुछ भले वचन नहीं हैं। उससे बढ़कर, यह देह का क्षणिक आराम और देह की सन्तुष्टि नहीं है—तुम्हें जिसकी आवश्यक है वह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें इसे कैसे करना करना चाहिए, और तुम्हें स्पष्ट रूप से बताए कि सत्य क्या है। तुम्हारे द्वारा इसे समझ लेने के बाद, भले ही यह थोड़ा सा ही क्यों ना हो, क्या तुम एक अच्छा भोजन कर लेने की तुलना में अपने हृदय में अधिक सन्तुष्टि महसूस नहीं करते हो? जब तुम्हारा हृदय सन्तुष्ट होता है, तो क्या तुम्हारा हृदय, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व सच्ची शांति प्राप्त नहीं करता है? इस दृष्टान्त और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोगों को अब समझ में आया कि क्यों मैं तुम लोगों के साथ इस वाक्य को साझा करना चाहता था कि, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है"? इसका वह अर्थ है जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर है, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है जिस पर तुमने किसी समय विश्वास किया था और जिसे तुमने सबसे अधिक सँजोया था। अर्थात्, यदि मनुष्य परमेश्वर के मुँह के वचन प्राप्त नहीं कर सकते हैं या वे उसकी इच्छा को नहीं समझते हैं, तो वे शांति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अपने भविष्य के अनुभवों में, तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह सत्य और जीवन है। मनुष्य-जाति के लिए सत्य कोई ऐसी चीज़ है जिसकी उनके जीवन में कमी नहीं हो सकती है, जिसके बिना वे कभी कुछ नहीं कर सकते हैं; तुम ऐसा भी कह सकते हो कि यह सबसे बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे देख या उसे छू नहीं सकते हो, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है; यही वह एकमात्र चीज़ है जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 68

क्या सत्य के बारे में तुम लोगों की समझ तुम्हारी स्वयं की अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में, तुम्हें पहले यह सोचना है कि कौन से सत्‍य उन लोगों, चीज़ों, और वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं जिनके समक्ष तुम आए हो; इन्हीं सत्‍यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और जिसके समक्ष तुम आए हो उसे उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते हो कि सत्‍य का कौन सा पहलू उन चीज़ों से सम्बन्ध रखता है जिनका तुमने सामना किया है किन्तु सीधे जाकर परमेश्वर की इच्छा को खोजते हो, तो ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से भुलावा है और परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि किस प्रकार की चीज़े तुम्हारे ऊपर आयी हैं, वे सत्य के किस पहलू से सम्बन्ध रखती हैं, और परमेश्वर के वचनों में उस सत्य को देखना है जो तुम्‍हारे अनुभव से सम्बन्ध रखता है। तब तुम उस सत्‍य में अभ्यास के उस मार्ग को खोजते हो जो तुम्हारे लिए सही है; और इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रित नहीं होता है, न ही कोई व्यवस्था है। यह मृत नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज़ है, और यह वह नियम है जिसका अनुसरण प्राणी को अवश्य करना चाहिए और वह नियम है जिसे मनुष्य को अपने जीवन में अवश्य रखना चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अनुभव से और अधिक समझना होगा। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों या सत्य से अवियोज्य हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जो कुछ समझते हो वे सभी परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होते है; और वे सत्य से विकट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के स्वरूप को साकार करता है और इसे स्पष्ट रूप से बताता है; यह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, और वह क्या पसंद नहीं करता है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। जिन सत्‍यों को परमेश्वर प्रकट करता है उनके पीछे लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, फिर भी यह सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहता है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है यह उसके साथ असमानता है।

हम अभी जिस बारे में संवाद कर रहे हैं वह सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में है। इन कहानियों के माध्यम से, और घटित हुई इन चीज़ों के विश्लेषण के माध्यम से, लोग उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को जो उसने प्रकट किया है समझ सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के हर पहलू को और अधिक खुल कर, अधिक गहराई से, अधिक व्यापकता से, और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है। तो, क्या परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका इन कहानियों के माध्यम से ही है? नहीं, ऐसा नहीं है! क्योंकि जो परमेश्वर कहता है और राज्य के युग में जो कार्य वह करता है वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और इसे अधिक पूरी तरह से जानने में लोगों की और अधिक सहायता कर सकते हैं। हालाँकि, मैं सोचता हूँ कि कुछ ऐसे उदाहरणों और बाइबल में दर्ज कहानियों के माध्यम से जिनसे लोग परिचित हैं परमेश्वर के स्वभाव को जानना और उसके स्वरूप को समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं तुम्हें परमेश्वर ज्ञात करवाने के लिए न्याय और ताड़ना के वचनों और उन सत्यों को जिन्हें आज परमेश्वर प्रकट करता है शब्दशः लेता हूँ, तो तुम इसे बहुत सुस्त और बहुत थका देने वाला महसूस करोगे, और कुछ लोग तो यहाँ तक महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन सूत्रित प्रतीत होते हैं। परन्तु यदि मैं बाइबल की इन कहानियों को परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को सहायता करने वाले उदाहरणों के रूप में लेता हूँ, तो वे इसे अरुचिकर नहीं पाएँगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करने के दौरान, उस समय जो परमेश्वर के हृदय में था उसके विवरण—उसकी मनोदशा या मनोभाव, या उसके विचार और मत—लोगों को मानवीय भाषा में बताए गए हैं, और इस सब का उद्देश्य उन्हें सराहना करने देना, और यह महसूस करने देना है कि परमेश्वर का स्वरूप कोई सूत्र नहीं है। यह कोई पौराणिक, या कुछ ऐसा नहीं है जिसे लोग देख और छू नहीं सकते हैं। यह कुछ ऐसा है जो सचमुच में अस्तित्व में है जिसे लोग महसूस कर सकते हैं, और जिसकी सराहना कर सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि जो लोग इस युग में रह रहे हैं वे धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्य की विस्तृत समझ प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उस कार्य के द्वारा उसके स्वभाव को देख सकते हैं जो उसने किया है। और वे इन स्वभावों के द्वारा जिन्हें उसने प्रकट किया है मनुष्य-जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव के एक अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँचने के लिए, उसकी पवित्रता की मूर्त अभिव्यक्ति और मनुष्यों के लिए उसकी देखरेख को समझ सकते हो। मुझे विश्वास है कि तुम सभी लोग इसे महसूस कर सकते हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 69

उस कार्य के क्षेत्र के भीतर जिसे प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में पूर्ण किया था, तुम परमेश्वर के स्वरूप के अन्य पहलू को देख सकते हो। यह उसकी देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के माध्यम से लोगों के लिए देखना और सराहना करना संभव बनाया गया था। मनुष्य के पुत्र में, लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता में जीवन बिताया था, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता को देखा था। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिल्कुल सच्चे परमेश्वर को देखने दिया, और उन्हें परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बनाने दी। हालाँकि, संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अन्त के बीच की समयावधि में, अर्थात्, अनुग्रह के युग से पहले, लोगों के द्वारा जो देखा, सुना, और अनुभव किया जाता था वह केवल परमेश्वर का दिव्य पहलू था। यह वह था जो परमेश्वर ने अमूर्त क्षेत्र में किया और कहा था, और वे चीज़े थीं जिन्हें उसने अपने सच्चे व्यक्तित्व से व्यक्त किया था जिन्हें देखा और छुआ नहीं जा सकता है। प्रायः, ये चीज़े लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर बहुत महान है, और यह कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते हैं। वह प्रभाव जो परमेश्वर सामान्यतः लोगों के ऊपर डालता था वह था कि वह भीतर और बाहर जगमगाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमयी और इतने मायावी थे कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं था, और वे उनको समझने और उनकी सराहना करने का प्रयास तो बिल्कुल भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर के बारे में सब कुछ बहुत दूर था—इतना दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, और उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिल्कुल भी अस्तित्व में नहीं है। इसलिए लोगों के लिए, परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना भी पहुँच के बाहर था, और यहाँ तक कि अगम्य था। यद्यपि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए थे, और उसने कुछ विशेष वचन जारी किए थे और कुछ विशेष स्वभावों को व्यक्त किया था ताकि लोग उसके सच्चे ज्ञान की सराहना करें और उसे देखें, फिर भी अंत में, यह एक अमूर्त क्षेत्र में परमेश्वर के स्वरूप की उसकी अभिव्यक्ति थी, और जो लोगों ने समझा था, जो वे जानते थे वह तब भी उसके स्वरूप का दिव्य पहलू था। परमेश्वर के स्वरूप की इस अभिव्यक्ति से मनुष्य-जाति ठोस धारणा प्राप्त नहीं कर सकी, और परमेश्वर के बारे में उनकी पहली छाप अभी भी इसी दायरे के भीतर अटकी हई थी कि "एक आत्मिक देह जिसके करीब जाना कठिन है, जो भीतर और बाहर जगमगाता है।" क्योंकि लोगों को दिखाई देने के लिए परमेश्वर ने भौतिक क्षेत्र की किसी विशिष्ट वस्तु या किसी छवि का उपयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा का उपयोग करके उसे परिभाषित नहीं कर सकते थे। लोग अपने हृदय और मस्तिष्क में, परमेश्वर के लिए एक मानक स्थापित करने, उसे मूर्त बनाने और उसे मानवीय बनाने के लिए हमेशा अपनी स्वयं की भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना ऊँचा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह विशेष रूप से क्या पसंद करता है और उसका विशिष्ट व्यक्तित्व क्या है। वास्तव में, अपने हृदय में परमेश्वर जानता था कि लोग इस तरह से सोचते है। वह लोगों की आवश्यकताओं के बारे में बहुत स्पष्ट था, और निस्संदेह वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए उसने अनुग्रह के युग में एक अलग तरीके से अपने कार्य को कार्यान्वित किया था। यह दिव्य और मानवीय दोनों था। जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उस समय लोग यह देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ थीं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था, और चीज़ों की उनके साथ चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत से कार्यों को भी पूर्ण किया था जो उसकी दिव्यता को दर्शाते थे, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति और प्रकाशन थे। इस समय के दौरान, जब परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण सी देह में साकार हुई थी जिसे लोग देख और छू सकते थे, वे अब और यह महसूस नहीं करते थे कि वह भीतर और बाहर जगमगा रहा है, जिसके करीब वे नहीं जा सकते थे। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हरकत, उसके वचनों, और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। देहधारी मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता को व्यक्त किया था और परमेश्वर की इच्छा को मनुष्यजाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकट किया जिसे आध्यात्मिक क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता है। जो लोगों ने देखा वह, मूर्त और हड्डियों तथा माँस वाला, स्वयं परमेश्वर था। तो देहधारी मनुष्य के पुत्र ने परमेश्वर की स्वयं की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव, और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। यद्यपि परमेश्वर की छवि के बारे में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार और स्वरूप पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और हैसियत को दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—अभिव्यक्ति के रूप में मात्र कुछ भिन्नताएँ थीं। चाहे यह मनुष्य के पुत्र की मानवता हो या उसकी दिव्यता, हम नकार नहीं सकते कि वह स्वयं परमेश्वर की पहचान और उसकी हैसियत को दर्शाता था। हालाँकि इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की, और मनुष्य-जाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और उसने लोगों को मनुष्यजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य का सामना और अनुभव करने का अवसर दिया। उसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और उसकी महानता में अंतर्दृष्टि, और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारम्भिक समझ और एक प्रारम्भिक परिभाषा भी प्राप्त करने दी। भले ही प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किया गया कार्य, कार्य करने के उसके तरीके, और जिस परिप्रेक्ष्य से उसने बोला था वे आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के सच्चे व्यक्तित्व से भिन्न थे, फिर भी उसके बारे में हर चीज़ सचमुच में स्वयं परमेश्वर को दर्शाती थी जिसे मनुष्यों ने पहले कभी नहीं देखा था—इसे नकारा नहीं जा सकता है! अर्थात्, चाहे परमेश्वर किसी भी रूप में प्रकट हो, चाहे वह किसी भी परिप्रेक्ष्य में बात करे, या वह किस छवि में मनुष्य-जाति के सामने आता है, परमेश्वर और किसी को नहीं बल्कि स्वयं को दर्शाता है। वह किसी मनुष्य को नहीं दर्शा सकता है—वह किसी भ्रष्ट मनुष्य को नहीं दर्शा सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और इसे नकारा नहीं जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 70

खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त

मत्ती 18:12-14 तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।

यह अंश एक रूपक है—यह लोगों को किस प्रकार की भावना देता है? यहाँ उपयोग किया गया अभिव्यक्ति का यह तरीका—रूपक—मानवीय भाषा में एक अलंकार है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा ही कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता कि यह वास्तव में परमेश्वर जो है उसके अनुरूप नहीं है, लेकिन जब अनुग्रह के युग में मनुष्य के पुत्र ने इस अंश को प्रदान किया, तब यह लोगों को सुकून देने वाला, जोशपूर्ण, और अंतरंग महसूस हुआ। जब परमेश्वर देह बन गया, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपने हृदय की आवाज़ को व्यक्त करने के लिए एक बहुत ही उचित रूपक का उपयोग किया। इस आवाज़ ने परमेश्वर की स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व किया जो वह उस युग में करना चाहता था। अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर की जो रवैया था यह उसे भी दर्शाता था। लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के परिप्रेक्ष्य से देखें तो, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ कर सकता है वह करेगा। यह इस बार मनुष्यों के बीच देह में परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को दर्शाता है। परमेश्वर ने इस कार्य में अपना संकल्प और अपने रवैये की व्याख्या करने के लिए इस दृष्टान्त को उपयोग किया। यह परमेश्वर के देह बनने का लाभ थाः वह मनुष्यजाति के ज्ञान का लाभ उठा सका था और लोगों से बात करने, और अपनी इच्छा को प्रकट करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सका था। उसने मनुष्यों के लिए अपनी गहरी, दिव्य भाषा की व्याख्या की अथवा "अनुवाद" किया जिसे मानवीय भाषा, मानवीय तरीके से समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। इससे लोगों को उसकी इच्छा को समझने में और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता था। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके, मानवीय परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और लोगों के साथ उस तरीके से बातचीत कर सकता था जिसे वे समझ सकते थे। वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग करके भी बातचीत और कार्य कर सकता था जिसकी वजह से लोग परमेश्वर की दयालुता और घनिष्ठता महसूस कर सकते थे, जिससे वे उसके हृदय को देख सकते थे। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यह कि परमेश्वर के वचनों और क्रियाओं में कोई निषेधात्मकता नहीं है। जिस तरह से लोग इसे देखते हैं, हो ही नहीं सकता था कि जो बात परमेश्वर स्वयं कहना चाहता था, और जो कार्य वह करना चाहता था उसके बारे में बात करने के लिए, या अपनी स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए परमेश्वर मनुष्यों के ज्ञान, भाषा, या बोलने के तरीकों का उपयोग कर सकता था; यह ग़लत सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के रूपक का उपयोग किया जिससे लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी को महसूस कर सकें, और उस समयावधि के दौरान लोगों के प्रति उसके रवैये को देख सकें। इस दृष्टान्त ने उन लोगों को स्वप्न से जगा दिया था जो लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन व्यतीत कर रहे थे, और इसने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेरित किया। इस दृष्टान्त के अंश को पढ़ कर, लोग मनुष्यजाति को बचाने हेतु परमेश्वर की ईमानदारी को जान जाते हैं और उसके हृदय में मनुष्यजाति का जो महत्व है उसे समझ जाते हैं।

आओ हम इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के स्वयं के वचन थे, या उसके स्वर्गिक पिता के वचन थे? सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि यह प्रभु यीशु है जो बात कर रहा है, किन्तु उसकी इच्छा स्वयं परमेश्वर की इच्छा को प्रकट करती है, यही वजह है कि उसने कहा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गिक पिता को ही परमेश्वर के रूप में मानते थे, और इस व्यक्ति को जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते थे उसे बस उसके द्वारा भेजा हुआ मानते थे, और यह कि वह स्वर्गिक पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसी लिए प्रभु यीशु को ऐसा भी कहना पड़ा था, ताकि वे सचमुच में मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को अनुभव कर सकें, और जो कुछ उसने कहा था उसकी प्रामाणिकता और सटीकता को महसूस कर सकें। भले ही कहने के लिए यह एक साधारण बात थी, किन्तु यह बहुत परवाह करने वाली बात थी और यह प्रभु यीशु की दीनता और आंतरिकता को प्रकट करती थी। इससे फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर देह बना या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य किया, वह मनुष्य के हृदय को सर्वोत्तम ढंग से जानता था, और सर्वोत्तम ढंग से समझता था कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, और जानता था कि लोग किस बारे में चिंता करते हैं, और क्या चीज़ उन्हें भ्रम में डालती है, इसलिए उसने इस एक पंक्ति को जोड़ दिया था। इस पंक्ति ने मनुष्यजाति में छिपी एक समस्या को विशिष्ट रूप से दर्शा दिया: मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ भी कहा था उसको लेकर लोग सन्देह में थे, कहने का मतलब है कि, जब प्रभु यीशु बोल रहा था उसे यह जोड़ना पड़ा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" केवल इस आधार पर ही उसके वचन, लोगों को उनकी परिशुद्धता का विश्वास दिलाने तथा उनकी विश्वसनीयता को सुधारने का, परिणाम दे सकते थे। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर मनुष्य का एक सामान्य पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मनुष्यजाति के बीच एक बड़ा बेढंगा रिश्ता था, और यह कि मनुष्य के पुत्र की स्थिति बहुत शर्मनाक थी। यह इस बात को भी दर्शाता है कि उस समय मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की हैसियत कितनी महत्वहीन थी। जब उसने ऐसा कहा, तो यह वास्तव में लोगों को बताने के लिए था कि: तुम लोग निश्चिंत हो सकते हो—यह उसे नहीं दर्शाता है जो मेरे स्वयं के हृदय में है, बल्कि यह उस परमेश्वर की इच्छा है जो तुम लोगों के हृदय में है। मनुष्यजाति के लिए, क्या यह एक व्यंग्यात्मक बात नहीं थी? भले ही देह में रह कर काम कर रहे परमेश्वर को अनेक फायदे थे जो उसके पास उसके व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके सन्देहों और अस्वीकृति का और साथ ही उनकी संवेदनशून्यता और मूढ़़ता का भी सामना करना पड़ा था। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मनुष्यजाति के द्वारा अस्वीकृत किए जाने के अनुभव करने की प्रक्रिया, और उनके द्वारा उसके विरूद्ध प्रतिस्पर्धा किए जाने का अनुभव था। उससे भी बढ़कर, यह मनुष्यजाति के भरोसे को निरन्तर जीतने और अपने स्वरूप के माध्यम से, अपने स्वयं के सार के माध्यम से मनुष्यजाति पर विजय पाने के लिए कार्य करने की प्रक्रिया थी। यह इतना ही नहीं था कि देहधारी परमेश्वर आम लोगों के बीच शैतान के विरूद्ध युद्ध कर रहा था; यह उससे अधिक था कि परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य बन गया और उसने उनके साथ संघर्ष करना आरम्भ कर दिया जो उसका अनुसरण करते थे, और इस संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी दीनता के साथ, अपने स्वरूप के साथ, और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूर्ण किया। उसने उन लोगों को प्राप्त किया जिन्हें वह चाहता था, उस पहचान और हैसियत को प्राप्त किया जिसके वह योग्य था, और अपने सिंहासन की ओर लौट गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 71

सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों विषय वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों की विशिष्टता से दर्शाते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में कार्यान्वित करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह उसके साथ अपने कार्य का एक चरण ले कर आया—वह उसके साथ विशिष्ट कार्य और उस स्वभाव को लेकर आया जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया वह उस कार्य के चारों ओर घूमता था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न इससे कुछ ज़्यादा करेगा न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया वह सब इस युग से सम्बंधित था। इस बात की परवाह किए बिना कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से—भले ही कोई सा भी तरीका, या किसी भी परिप्रेक्ष्य से क्यों न रहा हो—उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों से जो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में लोगों की सहायता करे। वह परमेश्वर की इच्छा को समझने और जानने में, मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से विभिन्न उपायों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु जो कुछ मनुष्यजाति को बताना चाहता था उसे व्यक्त करने के लिए अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करता है। उससे भी बढ़कर, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा होता है, उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति कर रहा होता है, और जिसके लिए उन्होंने विनती की है उसमें उनकी सहायता कर रहा होता है। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मनुष्यजाति के साथ और ज़्यादा अंतरंग तथा उनके प्रति और अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक समर्थ हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने के बारे में उपमा वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करती है। इस उपमा में संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझने देना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा तब उसके क्‍या इरादे थे। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" यह किस प्रकार का मत है? यह लोगों से क्षमा को उनका स्वयं का उत्तरदायित्व बनवाने के लिए है, ऐसा कुछ है जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, और एक ऐसा मार्ग है जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। भले ही यह मात्र एक उपमा थी, किन्तु इसने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभायी थी। इसने उस बात की गहराई से सराहना करने में जो परमेश्वर कहना चाहता था और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और मानकों की खोज करने में लोगों की सहायता की। इस उपमा ने स्पष्ट रूप से समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें परिशुद्ध धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए—और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, लेकिन दूसरों के प्रति सहिष्‍णुता का रवैया और समझ के साथ। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की कोई संख्या है कि कितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो उल्लेख किए गए "समयों की संख्या" में रूचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवता में परमेश्वर की अभिव्यक्ति थी। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मनुष्यजाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओं के साथ-साथ अवश्य लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। जो वह कहता था उसका परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मनुष्यजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। जो लोग देह में जीवन बिताते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देह बनने के बाद, उसने मानवीय परिप्रेक्ष्य से मनुष्‍य जाति से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया। मनुष्यजाति को उस अंश तक जिस तक वे समर्थ हैं परमेश्वर को समझने और जानने देने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित मानकों को बूझने देने के लिए, उन चीज़ों के द्वारा जिनकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिसे वे समझ सकते थे, वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और रवैये को व्यक्त कर सकता था। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या माध्यम से प्राप्त किया गया था, फिर भी इसने सचमुच में ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें सीधे दिव्यता में होकर कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक, और लक्षित था, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर था।

नीचे, आओ हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर दिव्यता में प्रकट होता है? स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़े थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन को दुलारने के समान है," और केवल लोग ही इस तरह से बात करेंगे। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की है। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं होती है क्योंकि उसे मनुष्यजाति के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती है कि "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का प्राकृतिक प्रकाशन है। क्या तुम लोगों ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने ऐसा कुछ कहा कि "मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार में, और उसके स्वरूप में है। मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस तरह से लोगों के साथ व्यवहार करता है और उसका रवैया उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति और प्रकाशन है। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना प्राप्त करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक संहिता का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सी पद्धतियाँ, उसके बहुत से वचन, और उसके बहुत से सत्य सब कुछ मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परन्तु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप, और उसकी इच्छा, लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत को दर्शाते थे। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव परिशुद्ध तरीके से व्यक्त किया था। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतः-क्रिया में कोई व्यवधान या कोई बाधा नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते हो कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण के बीच बहुत सी समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का भी उपयोग करता है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को व्यक्त करने के लिए मनुष्यजाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान में से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का प्रयोग करता है। एक बार जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य या दिव्य परिप्रेक्ष्य से ही क्यों न बात करे, प्रकटीकरण की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ सभी मानवीय भाषा और पद्धतियों के माध्यम से होती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बन गया, तो यह तुम्हारे लिए उसकी सर्वशक्तिमत्ता और उसकी बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर था। जब परमेश्वर देह बन गया, उसके बड़े होने के दौरान, उसने मनुष्यजाति के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवता में अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा, और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर इन चीज़ों को धारण करता था जो उन मनुष्यों से आयी थीं जिन्हें उसने सृजित किया था। वे उसके स्वभाव और उसकी दिव्यता को व्यक्त करने के लिए देहधारी परमेश्वर के साधन बन गए, और जब वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्यजाति के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे उसके कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रामाणिक, और अधिक सटीक बनाने दिया। इसने लोगों के लिए इसे और अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में समर्थ हुआ जिसे वह करना चाहता था, ऐसा तब है कि वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त करता, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब और कोई "पीढ़ी का अंतराल" नहीं था, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के माध्यम से संवाद करने के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है वे उसके अधिक करीब थे, और यह कि उसके प्रबन्धन के कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और यह कि संपूर्ण मनुष्यजाति का सामना एक नए युग से होने ही वाला था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 72

जिसने बाइबल पढ़ा है वह हर कोई जानता है कि जब यीशु का जन्म हुआ था तो बहुत सी चीज़े घटित हुई थीं। उनमें से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा के द्वारा शिकार किया जाना, यहाँ तक कि उस स्थिति तक कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उस से नीचे के सभी बच्चों का भी वध किया जा रहा था। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह होकर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम अपनाया था; और मनुष्यजाति को बचाने के अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई वह भी स्पष्ट है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मनुष्यजाति के बीच किया था वे भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य को सँभालने में समर्थ था, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, ठीक है न? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मनुष्यजाति के बीच अपने नए कार्य का विकास करना आरम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ था और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई को पूरा करने के अपने कार्य को आरम्भ किया था, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से अभिभूत हो गया था क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद, वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सका था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को आरम्भ कर सका था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मनुष्यजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह निस्संदेह वह था जिसके बारे में परमेश्वर सबसे अधिक प्रसन्न था। तब से शुरू हो कर यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही प्रामाणिक था। मनुष्यजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्टि महसूस करता है, ऐसा तब होता है जब मनुष्यजाति परमेश्वर के करीब आ सकती है, और जब लोग उद्धार के निकट आ सकते हैं। परमेश्वर के लिए, यह उसके नए कार्य की शुरूआत भी है, जब उसकी प्रबन्धन योजना एक कदम आगे प्रगति करती है, और इसके अतिरिक्त, जब उसकी इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचती है। मनुष्यजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह एक महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए चरण को कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मनुष्यजाति के बीच इस नए कार्य और नई शुरूआत को आरम्भ और प्रस्तुत किया जाता है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण के परिणाम को पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और परिणाम को देख लेता है। ऐसा भी तब होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि महसूस कराते हैं, और उसका हृदय, वास्तव में, प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, उसने पहले से ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने में और उसे सन्तुष्टि प्रदान करने में समर्थ है, परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, वह अपनी चिन्ताओं को एक ओर रख देता है, और वह प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरम्भ करने में समर्थ है, और वह उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के अवश्य करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने अन्त को पहले से ही देख लिया होता है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न हृदय वाला है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रोए? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर अपने हाथों से ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मनुष्यजाति के लिए गा सकता है, उसे अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख है, और उसकी विभिन्न भावनाओं को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है, और कुछ भी अधिक सामान्य और उचित नहीं हो सकता है। लोगों को इस बारे में कुछ अन्य नहीं सोचना चाहिए। परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, उसकी खुशी या उसकी किसी भी अन्य भावना वो सीमित करने के लिए कहते हुए, तुम लोगों को परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी मनोभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के माध्यम से हमने इन दोनों बार संवाद किया है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतन्त्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस कर पाओ जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस कर पाओ जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनो—तो कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो कि क्या चीज़ परमेश्वर को प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उसे उदास करती है—जब तुम उदास महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, और तुम प्रसन्न महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और उसके साथ अब और कोई बाधा नहीं होगी। तुम मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं, और ज्ञान से परमेश्वर को अब और विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारी इस प्रकार की आकांक्षा है। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

फुटनोट:

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 73

प्रभु यीशु के दृष्टान्त

बीज बोने वाले का दृष्टान्त (मत्ती 13:1-9)

जंगली बीज का दृष्टान्त (मत्ती 13:24-30)

राई के बीज का दृष्टान्त (मत्ती 13:31-32)

खमीर का दृष्टान्त (मत्ती 13:33)

जंगली बीज के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)

छिपे हुए खजाने का दृष्टान्त (मत्ती 13:44)

अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती 13:45-46)

जाल का दृष्टान्त (मत्ती 13:47-50)

पहला बीज बोने वाले का दृष्टान्त है। यह वास्तव में एक रूचिकर दृष्टान्त हैः बीज बोना लोगों के जीवन में एक सामान्य घटना है। दूसरा जंगली बीज का दृष्टान्त है। जहाँ तक जंगली बीज की बात है कि वे क्या होते हैं, जिन्होंने भी फसलें लगाई हैं और वयस्क हैं वे जान जाएँगे। तीसरा राई के बीज का दृष्टान्त है। तुम सभी लोग जानते हो कि राई क्या होती है, ठीक है न? यदि तुम लोग नहीं जानते हो, तो तुम लोग बाइबल में एक दृष्टि डाल सकते हो। चौथा, ख़मीर के दृष्टान्त के लिए, अधिकतर लोग जानते हैं कि खमीर को किण्वन के लिए उपयोग किया जाता है; यह कुछ ऐसा है जिसे लोग अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। नीचे दिए गए सभी दृष्टान्त, जिसमें छठा छिपे हुए खजाने का दृष्टान्त, सातवाँ अनमोल मोती का दृष्टान्त, और आठवाँ जाल का दृष्टान्त भी शामिल है, उन सभी को लोगों के जीवन से लिया गया है; वे सभी लोगों के वास्तविक जीवन से आते हैं। ये दृष्टान्त किस प्रकार की तस्वीर चित्रित करते हैं? यह परमेश्वर के एक सामान्य व्यक्ति बनने और मनुष्यों के साथ-साथ रहने, सामान्य जीवन की भाषा का उपयोग करने, मनुष्यों से बात करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग करने और उन्हें वह प्रदान करने की एक तस्वीर है जिसकी उन्हें आवश्यकता है। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लम्बे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन-शैलियों का अनुभव करने और उन्हें देखने के बाद, ये अनुभव उसकी दिव्य भाषा को मानवीय भाषा में रूपान्तरित करने के लिए उसकी पाठ्यपुस्तकें बन गए। निस्संदेह, ये चीज़ें जो उसने जीवन में देखी और सुनी उन्होंने भी मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव को समृद्ध किया। जब वह लोगों को कुछ सत्‍यों को समझाना, परमेश्वर की कुछ इच्छाओं को समझाना चाहता था, तो वह परमेश्वर की इच्छा और मनुष्यजाति के प्रति उस की अपेक्षाओं को बताने के लिए वह उपरोक्त के समान दृष्टान्तों का उपयोग कर सकता था। ये दृष्टान्त लोगों के जीवन से सम्बन्धित थे; और ऐसा एक भी दृष्टान्त नहीं था जो मनुष्य के जीवन से अछूता था। जब प्रभु यीशु मनुष्यजाति के साथ रहता था, वह किसानों को अपने खेतों में देखभाल करते हुए देखता था, वह जानता था कि जंगली बीज क्या है और खमीर उठना क्या है; वह समझता था कि मनुष्य छिपे हुए खजाने को पसंद करते हैं, इसलिए उसने छिपे हुए खजाने और अनमोल मोती दोनों उपमाओं का उपयोग किया। जीवन में, उसने मछुआरों को बार-बार जाल फैलाते हुए देखा था; प्रभु यीशु ने मनुष्यजाति के जीवन से संबंधित इस और अन्य गतिविधियों को देखा था; और उसने भी उस प्रकार के जीवन का अनुभव किया। वह किसी अन्य मनुष्य के समान एक साधारण व्यक्ति था, जो मनुष्यों के तीन वक्त के भोजन और दिनचर्या का अनुभव कर रहा था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत इंसान के जीवन का अनुभव किया, और उसने दूसरों की ज़िन्दगियों को भी देखा। जब उसने यह सब कुछ देखा और व्यक्तिगत रूप से इनका अनुभव किया, तो उसने जो सोचा वह इस बारे में नहीं था कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार और अधिक स्वतन्त्रता से, अधिक आराम से जीवन बिता सकता है। जब वह प्रामाणिक मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तो प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन की कठिनाई को देखा, उसने शैतान की भ्रष्टता के अधीन लोगों की कठिनाई, संताप, और उदासी को देखा, उसने देखा कि वे शैतान के अधिकार क्षेत्र में जी रहे हैं, और पाप में जी रहे हैं। जब वह व्यक्तिगत रूप से मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तब उसने यह भी अनुभव किया कि जो लोग भ्रष्टता के बीच जीवन बिता रहे थे वे कितने असहाय हैं, उसने उन मनुष्यों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया जो पाप में जीवन बिताते थे, जो शैतान के द्वारा, दुष्टता के द्वारा लाए गए अत्याचार में खो गए थे। जब प्रभु यीशु ने इन चीज़ों को देखा, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता में देखा या अपनी मानवता में? उसकी मानवता सचमुच में अस्तित्व में थी—वह बिल्कुल जीवन्त थी—वह इस सब का अनुभव कर सकता था और देख सकता था, और निस्संदेह वह इसे अपने सार में, उसने अपनी दिव्यता में इसे देखा। अर्थात्, स्वयं मसीह, उस मनुष्य प्रभु यीशु ने इसे देखा, और जो कुछ उसने देखा उससे उसने उस कार्य के महत्व और आवश्यकता को महसूस किया जिसे उसने इस बार अपनी देह में सँभाला था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि वह उत्तरदायित्व जिसे उसे देह में लेने की आवश्यकता थी बहुत बड़ा है, और वह पीड़ा जिसका वह सामना करेगा कितनी बेरहम होगी, फिर भी जब उसने पाप में जी रही मनुष्यजाति को असहाय देखा, जब उसने उनकी ज़िन्दगियों में संताप को और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने और अधिक पीड़ा का अनुभव किया, और मनुष्यजाति को पाप से बचाने के लिए अधिकाधिक चिन्तित हो गया। चाहे उसने किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया हो या किसी भी प्रकार की पीड़ा को सहा हो, वह पाप में जी रही मनुष्यजाति को बचाने के लिए और अधिक कृतसंकल्प हो गया। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना आरम्भ कर दिया था जो उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। और वह उस कार्य को पूर्ण करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया जो उसे लेना था—मनुष्यजाति के सभी पापों को लेने के लिए, मनुष्यजाति के लिए प्रायश्चित करने के लिए ताकि वे पाप में और अधिक न जीएँ और परमेश्वर पापबलि की वजह से मनुष्य के पापों को भुलाने में समर्थ हो, और इससे उसे मनुष्यजाति को बचाने के अपने कार्य को आगे बढ़ाने कि अनुमति मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि प्रभु यीशु अपने हृदय में, अपने आप को मनुष्यजाति के प्रति अर्पित करने, अपना स्‍वयं का बलिदान करने का इच्छुक था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने, सूली पर चढ़ाए जाने का भी इच्छुक था, और वह इस कार्य को पूर्ण करने का उत्सुक था। जब उसने मनुष्यों के जीवन की दयनीय दशा को देखा, तो वह, बिना एक मिनट या क्षण की देरी के, जितना जल्दी हो सके अपने लक्ष्य को और भी अधिक पूरा करना चाहता था। जब उसे ऐसी अत्यावश्यकता महसूस हुई, तो वह यह नहीं सोच रहा था कि उसका दर्द कितना भयानक होगा, और न ही उसने अब और यह सोचा कि उसे कितना अपमान सहना होगा—उसने बस अपने हृदय में एक दृढ़-विश्वास रखाः जब तक वह अपने को अर्पित किए रहेगा, जब तक उसे पापबलि के रूप में सूली पर चढ़ा कर रखा जाएगा, परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित किया जाएगा और वह अपने नए कार्य को शुरू कर पाएगा। पाप में मनुष्यजाति की ज़िन्दगियाँ, और पाप में अस्तित्व में रहने की उसकी अवस्था पूर्णत: बदल जाएगी। उसका दृढ़-विश्वास और जो उसने करने का निर्णय लिया था वे मनुष्यजाति को बचाने से सम्बन्धित थे, और जो करने के लिए वह दृढ़-संकल्पी था वह मनुष्य को बचाने से संबंधित था, और उसके पास केवल एक उद्देश्य थाः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरूआत कर सके। यह वह था जो उस समय प्रभु यीशु के मन में था।

देह में जीवन बिताते हुए, देहधारी परमेश्वर ने सामान्य मानवता को धारण किया; उसके अंदर एक सामान्य व्यक्ति की भावनाएँ और तर्कशक्ति थी। वह जानता था कि खुशी क्या होती है, पीड़ा क्या होती है, और जब वह मनुष्यजाति को इस प्रकार के जीवन में देखता, तो वह गहराई से महसूस करता था कि लोगों को मात्र कुछ शिक्षाएँ देने से, और उन्हें कुछ प्रदान करने या उन्हें कुछ सिखाने से उन्हें पाप से बाहर नही निकाला जा सकता है। ना ही उनसे कुछ आज्ञाओं का पालन करवाने से उन्हें पापों से छुटकारा दिया जा सकता था—जब उसने मानवजाति के पापों को ग्रहण कर लिया और पापमय देह की सदृशता में आ गया केवल तभी वह इसे मानवता की स्वतन्त्रता से अदला-बदली कर सकता था, और इसे मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की क्षमा से अदला-बदली कर सकता था। इसलिए जब प्रभु यीशु ने मनुष्यों की पापमय ज़िन्दगियों अनुभव कर लिया और उसे देख लिया, तो उसके हृदय में एक प्रबल इच्छा अभिव्यक्‍त हुई—मनुष्यों को उनकी ज़िन्दगियों में पाप में संघर्ष से छुटकारा देने की। इस इच्छा ने उसे अधिकाधिक यह महसूस करवाया कि उसे अवश्य सूली पर जाना और यथाशीघ्र मनुष्यजाति के पापों को अपने ऊपर लेना चाहिए। लोगों के साथ रहने और उनके पापमय जीवन की दुर्गति को देखने, सुनने और महसूस करने के बाद, उस समय ये प्रभु यीशु के विचार थे। यह कि देहधारी परमेश्वर की मनुष्यजाति के प्रति इस प्रकार की इच्छा हो सकती थी, कि वह इस प्रकार के स्वभाव को प्रकट और प्रदर्शित कर सकता था—क्या यह कुछ ऐसा है जो एक औसत इंसान के पास हो सकता है? इस प्रकार के परिवेश में रहते हुए एक औसत इंसान क्या देखेगा? वे क्या सोचेंगे? यदि किसी औसत इंसान ने इन सबका सामना किया होता, तो क्या वह समस्याओं को उच्च परिप्रेक्ष्य से देख पाता? निश्चित रूप से नहीं! यद्यपि देहधारी परमेश्वर का रूप-रंग ठीक मनुष्य के समान है, फिर भी वह मानवीय ज्ञान को सीखता है और मानवीय भाषा बोलता है और कभी-कभी अपने मतों को मनुष्यजाति के उपायों या अभिव्यक्तियों के माध्यम से भी व्यक्त करता है, जिस तरह से वह मनुष्यों, और चीज़ों के सार को देखता है, और जिस तरह से भ्रष्ट लोग मनुष्यजाति और चीज़ों के सार को देखते हैं वे बिल्कुल एक-से नहीं हैं। उसका परिप्रेक्ष्य और वह ऊँचाई जिस पर वह खड़ा होता है वह कुछ ऐसा है जो किसी भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा अप्राप्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सत्य है, और जिस देह को वह पहनता है वह भी परमेश्वर के सार को धारण करता है, और उसके विचार तथा जो उसकी मानवता के द्वारा प्रकट किया जाता है वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वे देह में व्यक्त करते हैं वे सत्य के, और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं हैं, बल्कि पूरी मनुष्यजाति के लिए हैं। किसी भी भ्रष्ट व्यक्ति के लिए, उसके हृदय में केवल थोड़े से ही वे लोग ही होते हैं जो उससे सम्बद्ध होते हैं। केवल कुछ ही ऐसे लोग होते हैं जिनके बारे में वह चिन्ता करता है, या जिनकी वह परवाह करता है। जब आपदा आने ही वाली होती है, तो वह सबसे पहले अपने बच्चों, जीवन साथी, या माता-पिता के बारे में सोचता है, और एक अधिक लोकहितैषी व्यक्ति अधिक से अधिक कुछ रिश्तेदारों या किसी अच्छे मित्र के बारे में सोचता है; क्या वह अधिक सोचता है? कभी भी नहीं! क्योंकि मनुष्य अंततः मनुष्य ही हैं, और वे सब कुछ एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से और ऊँचाई से ही देख सकते हैं। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णत: अलग है। देहधारी परमेश्वर का देह कितना ही सामान्य, कितना ही साधारण, कितना ही अधम क्यों न हो, या यहाँ तक कि लोग उसे कितनी ही नीची दृष्टि से क्यों न देखते हों, मनुष्यजाति के प्रति उसके विचार और उसका रवैया ऐसी चीज़ें है जिन्हें कोई भी मनुष्य धारण नहीं कर सकता है, और कोई मनुष्य उसका अनुकरण नहीं कर सकता है। वह हमेशा दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, और सृजनकर्ता के रूप में अपने पद की ऊँचाई से मनुष्यजाति का अवलोकन करेगा। वह हमेशा परमेश्वर के सार और परमेश्वर की मानसिकता से मनुष्यजाति को देखेगा। वह एक औसत व्यक्ति की ऊँचाई से, और एक भ्रष्ट व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से मनुष्यजाति को बिल्कुल नहीं देख सकता है। जब लोग मनुष्यजाति को देखते हैं, तो वे मानवीय दृष्टि से देखते हैं, और वे मानवीय ज्ञान और मानवीय नियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों को एक पैमाने के रूप में उपयोग करते हैं। यह उस दायरे के भीतर है जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं; यह उस दायरे के भीतर है जिसे भ्रष्ट लोग प्राप्त कर सकते हैं। जब परमेश्वर मनुष्यजाति को देखता है, तो वह दिव्य दर्शन के साथ देखता है, और अपने सार और अपने स्वरूप को एक माप के रूप में लेता है। इस दायरे में वे चीज़ें शामिल हैं जिन्हें लोग नहीं देख सकते हैं, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्य पूरी तरह से भिन्न हैं। यह अन्तर मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न-भिन्न सार के द्वारा निर्धारित होता है, और ये भिन्न-भिन्न सार ही हैं जो उनकी पहचानों और स्थितियों को और साथ ही उस परिप्रेक्ष्य और ऊँचाई को निर्धारित करते हैं जिससे वे चीज़ों को देखते हैं। क्या तुम लोग प्रभु यीशु में स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकाशन को देखते हो? तुम लोग कह सकते हो कि जो प्रभु यीशु ने किया और कहा वह उसकी सेवकाई से और परमेश्वर के स्वयं के प्रबन्धन कार्य से संबंधित था, कि यह सब परमेश्वर के सार की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। यद्यपि उसकी मानवीय अभिव्यक्ति थी, किन्तु उसके दिव्य सार और उसकी दिव्यता के प्रकाशन को नकारा नहीं जा सकता है। क्या यह मानवीय अभिव्यक्ति वास्तव में मानवता की अभिव्यक्ति थी? उसकी मानवीय अभिव्यक्ति अपने मूल सार में, भ्रष्ट लोगों की मानवीय अभिव्यक्ति से बिल्कुल भिन्न थी। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, यदि वह सचमुच में एक सामान्य, भ्रष्ट मनुष्य रहा होता, तो क्या वह दिव्य परिप्रेक्ष्य से पापमय मनुष्यजाति के जीवन को देख सकता था? बिल्कुल नहीं! मनुष्य के पुत्र और एक सामान्य मनुष्य के बीच यही अन्तर है। सभी भ्रष्ट लोग पाप में जीते हैं, और जब कोई पाप को देखता है, तो उन्हें उसके बारे में कोई विशेष भावना नहीं होती है; वे सभी एक समान होते हैं, कीचड़ में रहने वाले एक सूअर के समान जिसे बिल्कुल भी किसी असुविधा या गन्दगी का एहसास नहीं होता है—वह अच्छी तरह से खाता है, और गहरी नींद में सोता है। यदि कोई सूअरों के बाड़े को साफ करता है, तो सूअर को वास्तव में सहज महसूस नहीं होगा, और वह साफ सुथरा नहीं रहेगा। जल्दी ही, वह एक बार फिर से, पूरी तरह आराम से, कीचड़ में लोट-पोट कर रहा होगा, क्योंकि वह एक गन्दा जीव है। जब मनुष्य सूअर को देखते हैं, तो वे महसूस करते हैं कि वह गन्दा है, और यदि तुम उसे साफ करते हो, तो सूअर को अच्छा महसूस नहीं होता है—इसीलिए कोई भी सूअर को अपने घर में नहीं रखता है। जिस तरह से मनुष्य सूअरों को देखते हैं वह हमेशा उससे भिन्न होगा जैसा सूअर अपने आप के लिए महसूस करते हैं, क्योंकि मनुष्य और सूअर एक ही किस्म के नहीं हैं। और क्योंकि देहधारी मनुष्य का पुत्र उसी किस्म का नहीं है जैसे मनुष्य हैं, इसलिए केवल देहधारी परमेश्वर ही दिव्य परिप्रेक्ष्य से खड़ा हो सकता है, और मनुष्यजाति को देखने के लिए, सब कुछ देखने के लिए परमेश्वर की ऊँचाई से खड़ा हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 74

जब परमेश्वर देह बनता है और मनुष्यजाति के बीच रहता है, तो वह देह में किस प्रकार की पीड़ा का अनुभव करता है? क्या कोई सचमुच में समझता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर बड़ी पीड़ा सहता है, और यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर है, फिर भी लोग उसके सार को नहीं समझते हैं और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार करते हैं, जो उन्हें वह दुःखित और ग़लत महसूस कराता है—वे कहते हैं कि परमेश्वर की पीड़ा सचमुच बहुत बड़ी है। अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परन्तु वह मनुष्य के समान पीड़ा भुगतता है और मनुष्यजाति के साथ-साथ उत्पीड़न, बदनामी, और अपमान भुगतता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियों और अवज्ञा को भी सहता है—परमेश्वर की पीड़ा को सचमुच में मापा नहीं जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को नहीं समझते हो। वास्तव में, वह दुःख जिसके बारे में तुम लोग बात करते हो उसे परमेश्वर के लिए सच्चे दुःख के रूप में नहीं गिना जाता है, क्योंकि इससे कहीं बढ़कर पीड़ा है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? देहधारी परमेश्वर की देह के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? परमेश्वर के लिए, मनुष्यजाति का उसे नहीं समझना पीड़ा के रूप में नहीं लिया जाता है, और लोगों की परमेश्वर के बारे में कुछ ग़लतफहमियाँ होना और उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखना पीड़ा के रूप में नहीं लिया जाता है। हालाँकि, लोग प्रायः महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने अवश्य कोई बहुत बड़ा अन्याय सहा होगा, यह कि जितने समय तक परमेश्वर देह में रहता है वह अपने व्यक्तित्व को मनुष्यजाति को नहीं दिखा सकता है और उन्हें अपनी महानता को नहीं देखने दे सकता है, और परमेश्वर विनम्रता से एक मामूली देह में छिपा रहता है, इसलिए यह उसके लिए अवश्य यंत्रणादायी रहा होगा। लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझ सकते हैं और जो कुछ देख सकते हैं उसे हृदय से लगा लेते हैं, और परमेश्वर पर हर प्रकार की सहानुभूति थोप देते हैं और प्रायः यहाँ तक कि उसके लिए एक छोटी सी स्तुति भी प्रस्तुत कर देते हैं। वास्तविकता में, लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझते हैं और वह सचमुच में जो महसूस करता है उसके बीच एक अन्तर है, एक अंतराल है। मैं तुम लोगों को सच बता रहा हूँ—परमेश्वर के लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर का आत्मा है या देहधारी परमेश्वर की देह, वह पीड़ा सच्ची पीड़ा नहीं है। तो यह क्या है जो परमेश्वर सचमुच में भुगतता है? आओ हम केवल देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पीड़ा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बन कर, मनुष्यजाति के बीच, लोगों के आसपास रह कर, क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं, और फ़लसफ़ों को देख नहीं सकता है और महसूस नहीं कर सकता है? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? क्यों वह घृणा का एहसास करता है? मनुष्यजाति के जीने के लिए क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में जड़ पकड़े हुए थे? वे किस पर आधारित थे? जीने के लिए मनुष्यजाति की पद्धतियों, नियमों इत्यादि के लिए—यह सब कुछ शैतान की तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े पर सृजित है। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सच्चाई नहीं होती है—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य, और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। परमेश्वर, जो इस सार को धारण किए हुए है और ऐसी मनुष्यजाति के बीच रहता है—वह अपने हृदय में क्या सोचता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, और यह दर्द कुछ ऐसा है जिसे कोई इंसान समझ नहीं सकता है या अनुभव नहीं कर सकता है। क्योंकि सब कुछ जिसका वह सामना करता है, मुक़ाबला करता है, जिसे सुनता, देखता, और अनुभव करता है वह सब मनुष्यजाति की भ्रष्टता, दुष्टता, और सत्य के विरुद्ध उनका विद्रोह और सत्य के प्रति प्रतिरोध है। जो कुछ मनुष्यों से आता है वह उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, क्योंकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या वह ऐसे किसी को ढूँढ़ पाता है जो उसके साथ एक सामान्य भाषा साझा करता है? ऐसा मनुष्यजाति में नहीं पाया जा सकता है। ऐसे किसी को भी नहीं पाया जा सकता है जो परमेश्वर के साथ संवाद कर सकता हो, इस प्रकार आदान प्रदान कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे वे भागते हैं और जिनकी वे लालसा करते हैं वे सभी पाप से, और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में एक कटार के समान नहीं है? इन चीज़ों का सामना करके, क्या उसे अपने हृदय में आनन्द मिल सकता है? क्या वह सान्त्वना पा सकता है? जो उसके साथ रह रहें हैं वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—तो उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता है? यह पीड़ा वास्तव में कितनी बड़ी है, और कौन इसकी परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इस की सराहना कर सकता है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा कुछ ऐसी है जिसकी सराहना करने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवता की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा करती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह की दुर्दशा पर अक्सर सहानुभूति दिखाते हैं क्योंकि बाइबल में एक छंद है जो कहता हैः "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे हृदय में ले लेते हैं और विश्वास करते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहता है। अब, तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से इसे देखते हुए, क्या मामला ऐसा ही है? परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये कठिनाईयाँ पीड़ा हैं। उसने कभी देह की पीड़ाओं के लिए अन्याय के विरूद्ध चीख पुकार नहीं की है, और उसने कभी भी अपने लिए मनुष्यों से किसी चीज़ का प्रतिफल या पुरस्कार नहीं लिया है। हालाँकि, जब वह मनुष्यजाति की हर चीज़, मनुष्यों के भ्रष्ट जीवन और दुष्टता को देखता है, और जब वह देखता है कि मनुष्यजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान की क़ैद में है और बचकर नहीं निकल सकती है, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है—तो वह इन सब पापों को सहन नहीं कर सकता है। मनुष्यजाति के बारे में उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किन्तु उसे इस सब को सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाओं को भी व्यक्त नहीं कर सकता है, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता है। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश भी नहीं करता है—उसका हृदय दिन प्रतिदिन, लगातार कई वर्षों से, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इन सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने जो कुछ दिया है उसके बदले में वह मनुष्यों से किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं करता है, किन्तु परमेश्वर के सार की वजह से, वह मनुष्यजाति की दुष्टता, भ्रष्टता, और पाप को बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकता है, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसकी देह को अनन्त पीड़ा की ओर ले जाती है। क्या तुम लोग यह सब देख सकते हो? ज़्यादा संभावना है, कि तुम लोगों में से कोई भी इसे देख नहीं सकता है, क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझता है। समय के साथ तुम लोग धीर-धीरे इसे अपने आप समझ सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 75

यीशु पाँच हज़ार पुरुषों को खिलाता है

यूहन्ना 6:8-13 उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" किस प्रकार की धारणा है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ आमतौर पर कितने लोगों के लिए पर्याप्त होंगी। यदि तुम लोग एक औसत इंसान की भूख के आधार पर माप करो, तो यह केवल दो व्यक्तियों के लिए ही पर्याप्त होंगी। यही पाँच रोटियों और दो मछलियों की मुख्य धारणा है। हालाँकि, यह इस अंश में लिखा है कि पाँच रोटियों और दो मछलियों ने कितने लोगों को खिलाया? यह पवित्रशास्त्र में इस प्रकार दर्ज हैः "उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में, क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इसका क्या मतलब है कि यह संख्या इतनी बड़ी थी? मानवीय परिप्रेक्ष्य से, पाँच हज़ार लोगों के बीच पाँच रोटियों और दो मछलियों को बाँटना असंभव होगा, क्योंकि उनके बीच का अंतर बहुत बड़ा है। यहाँ तक कि यदि प्रत्येक व्यक्ति को बस एक छोटा सा टुकड़ा ही मिलता, तब भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी नहीं होता। परन्तु यहाँ, प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने न केवल पाँच हज़ार लोगों को भरपेट खाने दिया, बल्कि कुछ अतिरिक्त भी था। पवित्रशास्त्र कहता हैः "जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, 'बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।' अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।" इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति को देखने दिया, और इसने उन्हें यह देखने दिया कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—उन्होंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार को खिलाने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु वहाँ यदि कोई भोजन ही नहीं होता तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को खिला सकता था? निस्संदेह वह खिला सकता था! यह एक चमत्कार था, इसलिए लोगों ने आवश्यक रूप से महसूस किया कि यह समझ से बाहर है और महसूस किया कि यह अविश्वसनीय और रहस्यमय है, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसी चीज़ करना कोई बड़ी बात नहीं थी। चूँकि परमेश्वर के लिए एक सामान्य चीज़ थी, तो व्याख्या करने के लिए इसे क्यों चुना गया होगा? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे जो निहित है वह प्रभु यीशु की इच्छा से युक्त है, जिसे मनुष्यजाति के द्वारा कभी नहीं खोजा गया है।

पहले, आओ यह समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के लोग थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्रशास्त्र से, हम जानते हैं कि वे उसके अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? निश्चित रूप से नहीं! कम से कम, वे यह तो नहीं जानते थे कि जो व्यक्ति उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु है, या हो सकता है कि कुछ लोग केवल इतना ही जानते हों कि उसका नाम क्या है, और उन चीज़ों के बारे जो उसने की थीं कुछ जानते हों या उन्होंने कुछ सुना हो। वे मात्र कहानियों से प्रभु यीशु के बारे में उत्सुक थे, परन्तु तुम लोग निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते हो कि वे उसका अनुसरण करते थे, और उसे समझते तो बिल्कुल भी नहीं थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, तो वे भूखे थे और केवल भरपेट भोजन करने के बारे में ही सोच सकते थे, इसलिए यह इस सन्दर्भ में था कि प्रभु यीशु ने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया। जब उसने उनकी इच्छाओं को तृप्त कर दिया, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसका रवैया क्या था जो केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे? इस समय, प्रभु यीशु के विचार और उसके रवैये का परमेश्वर के स्वभाव और सार के साथ संबंध था। इन खाली पेट वाले पाँच हज़ार लोगों का सामना करते हुए जो केवल एक बार भर-पेट भोजन खाना चाहते थे, उसके बारे में उत्सुकता और आशाओं से भरे इन लोगों का सामना करते हुए, प्रभु यीशु ने केवल उन पर अनुग्रह प्रदान करने के लिए इस चमत्कार का उपयोग करने के बारे में सोचा था। हालाँकि, उसने अपनी आशाएँ नहीं बढ़ाई कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे मौज-मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए वहाँ जो कुछ उसके पास था उसने उसे बेहतरीन बनाया, और पाँच हज़ार को खिलाने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखें खोल दीं जो मनोरंजन का आनंद लेते थे, जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूर्ण कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करने के लिए कुछ मूर्त चीज़ों का उपयोग किया था, क्योंकि वह पहले से ही अपने हृदय में जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस एक बढ़िया भोजन करना चाहते थे, इसलिए उसने उन्हें कुछ भी नहीं कहा या उन्हें बिल्कुल भी उपदेश नहीं दिया—उसने बस उन्हें उस चमत्कार को घटित होते हुए देखने दिया। वह इन लोगों से वैसा बर्ताव बिल्कुल नहीं कर सका जैसा वह अपने चेलों के साथ करता था जो सचमुच में उसका अनुसरण करते थे, परन्तु परमेश्वर के हृदय में, सभी प्राणी उसके शासन के अधीन थे, और वह अपनी दृष्टि में सभी जीवधारियों को जब आवश्यक हो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति देगा। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन है या वे उसे समझते नहीं थे, या रोटियों और मछलियों को खाने के बाद भी उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था या उसके प्रति उनकी कोई कृतज्ञता नहीं थी, फिर भी यह कुछ ऐसा नहीं था जो परमेश्वर के लिए मुद्दा हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने के लिए एक अद्भुत अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसमें उसके सिद्धान्त होते हैं, और वह अविश्वासियों की निगरानी या उनकी सुरक्षा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद उठाने नहीं देता है। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे ऐसे जीवित प्राणी हैं जिन्हें उसने स्वयं बनाया है, वह उनका प्रबन्धन और उनकी परवाह करेगा; वह भिन्न तरीके से उनके साथ व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा, और उन पर शासन करेगा। इन सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के विचार और उसका रवैया हैं।

यद्यपि पाँच हज़ार लोग जिन्होंने रोटियों और मछलियों को खाया उनकी प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं थी, फिर भी वह उनके प्रति कठोर नहीं था; एक बार जब उन्होंने भर पेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया? क्या उसने उन्हें किसी चीज़ का उपदेश दिया? इसे करने के बाद वह कहाँ चला गया? पवित्रशास्त्र मे दर्ज नहीं है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; जब उसने अपना चमत्कार पूर्ण कर लिया तो वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कुछ अपेक्षाएँ कीं? क्या कोई नफ़रत थी? इनमें से कुछ भी नहीं था—वह बस इन लोगों पर अब और कोई ध्यान देना नहीं चाहता था जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे, और इस समय उसका हृदय दर्द में था। क्योंकि उसने मनुष्यजाति की चरित्रहीनता को देखा था और उसने मनुष्यजाति के द्वारा ठुकराया जाना महसूस किया था, और जब उसने इन लोगों को देखा या जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता ने उसे बहुत ही दुःखी कर दिया और उसके हृदय को पीड़ित कर दिया, इसलिए वह इन लोगों को जितना जल्दी हो सके छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु को अपने हृदय में इनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं थीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, विशेषकर वह अपनी ऊर्जा को उन पर व्यय नहीं करना चाहता था, और वह जानता था कि वे उसका अनुसरण नहीं करेंगे—इस सब के बावजूद, उनके प्रति उसका रवैया अभी भी बिल्कुल स्पष्ट था। वह बस उनके साथ दयालु बर्ताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह प्रदान करना चाहता था—अपने शासन के अधीन प्रत्येक प्राणी के प्रति यह परमेश्वर का रवैया था: प्रत्येक प्राणी के लिए, उनके साथ अच्छा बर्ताव करना, उनका भरण पोषण करना, उनका पालन-पोषण करना। जिस मुख्य कारण के लिए प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था उसके लिए, उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकट किया और इन लोगों के साथ दयालु बर्ताव किया। उसने उनके साथ करुणा और सहिष्णुता वाले हृदय से दयालु व्यवहार किया था। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि इन लोगों ने प्रभु यीशु को किस प्रकार देखा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार का परिणाम होता, उसने बस हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु के रूप में अपने पद के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो प्रकट किया वह था, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप। इसलिए प्रभु यीशु ने खामोशी से कुछ किया था, फिर वह खामोशी से चला गया—यह परमेश्वर के स्वभाव का कौन सा पहलू है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह परमेश्वर के प्रेम के कारण दयालु चीज़ों को करना है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि परमेश्वर निःस्वार्थ है? क्या कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलायी थीं? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे प्रभु यीशु के बिल्कुल अनुरूप नहीं थे, और उनका सार बिल्कुल परमेश्वर के विरूद्ध था। परन्तु परमेश्वर ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध को शांत करने के लिए एक तरीके का उपयोग किया था—इस तरीके को "दयालुता" कहते हैं। अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वे तब भी उसकी रचना थे, इसलिए उसने इन पापियों के साथ तब भी दयालु व्यवहार किया। यह परमेश्वर की सहिष्णुता है, और यह सहिष्णुता स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार से निर्धारित होती है। इसलिए, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजित कोई भी मनुष्य नहीं कर सकता है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 76

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मनुष्यजाति के प्रति उसके रवैये को सचमुच में समझने में समर्थ होते हो, और जब तुम सचमुच में प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हो, तो तुम सृजनकर्ता के द्वारा सृजित हर एक मनुष्य के ऊपर व्यय की गई लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तो तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे—वे दो शब्द क्या हैं? कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "लोकहितैषी।" इन दोनों में "लोकहितैषी" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह ऐसा शब्द है जिसे लोग किसी व्यक्ति के उदार विचारों और भावनाओं का वर्णन करने के लिए उपयोग करते हैं। मैं वास्तव में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, और सिद्धांतों की परवाह किए बिना उदारता बाँटने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों की अति भावनात्मक अभिव्यक्ति है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से एक ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं—वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "विशाल" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा है "असीम।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैं परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" किसी चीज़ के आयतन और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो—यह कुछ ऐसी है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, यह कोई अमूर्त पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को वह आभास देती है जो अपेक्षाकृत परिशुद्ध और व्यावहारिक होता है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किसी समतल से देखो या त्रिआयामी कोण से; तुम्हें इसके अस्तित्व की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम का परिमाण करना है, हालाँकि, यह इस बात का एहसास भी देता है कि परिमाणनीय नहीं है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण किया जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अनस्तित्व नहीं है, और न ही वह किसी पौराणिक कथा से निकलता है। बल्कि, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की अधीनता में सभी प्राणियों के द्वारा साझा किया जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद सभी प्राणियों के द्वारा विभिन्न अंशों में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवनाधार और जीवन लाता है क्यों कि यह थोड़ा-थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकट होता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम को गिनते हैं और उसकी गवाही देते हैं जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर का प्रेम अपरिमाणनीय है क्योंकि परमेश्वर का सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य कुछ ऐसा है जिसकी थाह पाना मनुष्यजाति के लिए उतना ही कठिन है, जितना कि सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के विचारों की, और विशेष रूप से उन विचारों की जो मनुष्यजाति के लिए हैं। अर्थात्, उस लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता है जो परमेश्वर ने मनुष्यजाति के लिए बहाये हैं। उस मनुष्यजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और महत्व को कोई नहीं बूझ सकता है, कोई नहीं समझ सकता है, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया। परमेश्वर के प्रेम को अपार के रूप में वर्णन करना इसके अस्तित्व के विस्तार और इसकी सच्चाई की सराहना करने और समझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग संज्ञा "सृष्टि" के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "असीम" शब्द सामान्यतः किस चीज़ का वर्णन करता है? यह साधारणतः महासागरों या ब्रह्माण्ड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे असीम ब्रह्माण्ड, या असीम महासागर। ब्रह्माण्ड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और उसकी गहराई दृष्टि के तो भीतर हैं किन्तु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—तो वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और उसकी समग्रता को महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "असीम" शब्द का उपयोग किया है। यह लोगों को इस बात को महसूस करने में कि वह कितना बहुमूल्य है, और उसके प्रेम की अगाध सुंदरता को महसूस करने में सहायता करने के लिए है, और यह कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनन्त और विस्तृत है। यह उसके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिष्ठा और उसका अपमान नहीं किए जाने की योग्यता को महसूस करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होता है। अब क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "असीम" एक उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर का प्रेम इन दो शब्दों "विशाल" और "असीम" के अनुसार खरा उतरता है? बिल्कुल! मानवीय भाषा में, केवल ये दो शब्द ही अपेक्षाकृत उचित हैं, परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोग ऐसा नहीं सोचते हो? यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का उपयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि परमेश्वर के प्रेम की तुम लोगों की समझ और सराहना एक समतल परिप्रेक्ष्य तक सीमित है, और त्रि-आयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँची है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो तुम लोग महसूस करते कि तुम लोगों के पास शब्दों का अभाव है; और यहाँ तक कि तुम लोग अवाक् भी हो जाते। हो सकता है कि आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने बात की है वे तुम लोगों के लिए समझने में कठिन हों, या हो सकता है कि तुम लोग ऐसे ही उससे सहमत न हों। यह बस उस सच्चाई को बता सकता है कि परमेश्वर के प्रेम के बारे में तुम लोगों की सराहना और समझ सतही और एक संकीर्ण दायरे के भीतर है। मैं पहले कह चुका हूँ कि परमेश्वर निःस्वार्थ है—तुम लोगों को निःस्वार्थ शब्द याद है। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रेम का केवल निःस्वार्थ के रूप में वर्णन किया जा सकता है? क्या यह एक बहुत संकीर्ण दायरा नहीं है? इससे कुछ प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को इस मामले पर अधिक मनन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 77

लाज़र का पुनरूत्थान परमेश्वर की महिमा करता है

यूहन्ना 11:43-44 यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ!" जो मर गया था वह कफन से हाथ पाँव बँधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, "उसे खोल दो और जाने दो।"

इस अंश को पढ़ने के बाद इसका तुम लोगों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु के द्वारा किए गए इस चमत्कार का महत्व पहले वाले से बहुत अधिक था क्योंकि कोई भी चमत्कार किसी मरे हुए इंसान को क़ब्र से बाहर लाने से बढ़कर विस्मयकारक नहीं हो सकता है। प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना उस युग में बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण था। क्योंकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, इसलिए लोग केवल उसके शारीरिक रूप-रंग, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख सकते थे। भले ही कुछ लोगों ने उसके कुछ गुणों या कुछ ताक़तों को देखा और समझा जो उसमें दिखाई देते थे, फिर भी कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया, उसका सार वास्तव में कौन है, और वह वास्तव में और अधिक क्या कर सकता है। यह सब कुछ मनुष्यजाति के लिए अज्ञात था। बहुत से लोग इस चीज़ का प्रमाण चाहते थे, और सत्य को जानना चाहते थे। क्या अपनी पहचान को साबित करने के लिए परमेश्वर कुछ कर सकता था? परमेश्वर के लिए, यह आसान बात थी—बच्चों का खेल था। वह अपनी पहचान और सार को साबित करने के लिए कहीं भी, किसी भी समय कुछ कर सकता था, परन्तु चीज़ों को करने का परमेश्वर का आना तरीका था—एक योजना के साथ, और चरणों में। उसने चीज़ों को विवेकहीनता से नहीं किया; उसने ऐसा कुछ करने के लिए जो मनुष्यजाति के देखने के लिए अर्थपूर्ण हो सही समय, और सही अवसर का इंतज़ार किया। इसने उसके अधिकार और उसकी पहचान को साबित किया। इसलिए तब, क्या लाज़र का पुनरूत्थान प्रभु यीशु की पहचान को प्रमाणित कर सका था? आओ हम पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें: "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, उसने बस एक बात कहीः "हे लाज़र, निकल आ!" तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु के द्वारा बोली गयी एक पंक्ति के कारण पूरा हुआ था। इस अवधि के दौरान, प्रभु यीशु ने कोई वेदी स्थापित नहीं की, और उसने कोई अन्य गतिविधि नहीं की। उसने बस एक बात कही। क्या इसे एक चमत्कार कहा जाएगा या एक आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम लोग इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो तो, निस्संदेह तुम लोग इसे तब भी एक चमत्कार ही कह सकते हो। हालाँकि, इसे किसी आत्मा को मृत से वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है, और कोई जादू-टोना तो बिल्कुल भी नहीं। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, एक छोटा सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार, और उसकी क्षमता है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति के मरने का अधिकार है, और उसकी आत्मा का उसके शरीर को छोड़ने और अधोलोक में, या जहाँ कहीं भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है, और मृत्यु के बाद वह कहाँ जाता है—यह सब परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह इसे किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है। वह मनुष्यों, घटनाओं, पदार्थों, अंतरिक्ष, या स्थान के द्वारा विवश नहीं होता है। यदि वह इसे करना चाहता है तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन, और उसके अधिकार के द्वारा बढ़ती हैं, अस्तित्व में रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। वह एक मृत व्यक्ति का पुनरुत्थान कर सकता है—यह भी कुछ ऐसा है जिसे वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृतक में से वापस लाने जैसा कुछ किया, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान को दिखाने के लिए, तथा मनुष्य और शैतान को जानने देने के लिए प्रमाण देना था कि मनुष्यजाति की सभी चीज़ें, और मनुष्यजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर के द्वारा निर्धारित होते हैं, और यह कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी हमेशा की तरह, उसने इस भौतिक संसार को जिसे देखा जा सकता है और साथ ही आध्यात्मिक संसार को जिसे मनुष्य देख नहीं सकते हैं, अपने नियंत्रण में बनाए रखा था। यह इसलिए था कि मनुष्य और शैतान जान लें कि मनुष्यजाति का सब कुछ शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मनुष्यजाति का जीवन और उनकी मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु के द्वारा लाज़र का पुनरूत्थान—इस प्रकार का दृष्टिकोण मनुष्यजाति को शिक्षा और निर्देश देने के लिए सृजनकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था जिसमें उसने मनुष्यजाति को निर्देश देने, और मनुष्यों के भरण पोषण के लिए अपनी क्षमता और अधिकार का उपयोग किया था। सभी चीज़ों के उसके नियंत्रण में होने के सत्य को मनुष्यजाति को देखने देने का यह सृजनकर्ता का एक वचनों से रहित तरीका था। यह व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मनुष्यजाति को यह बताने का उसका एक तरीका था कि उसके माध्यम के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मनुष्यजाति को इस प्रकार का मूक निर्देश देने का उसका उपाय सर्वदा बने रहता है—यह अमिट है, और इसने मनुष्य के हृदय को एक आघात और प्रबुद्धता दी है जो कभी धूमिल नहीं हो सकती है। लाज़र के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की—इसका परमेश्वर के हर एक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह ऐसे प्रत्येक व्यक्ति में जो गहराई से इस घटना को समझता है, इस समझ को, दर्शन को मज़बूती से जड़ देता है कि केवल परमेश्वर ही मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी सर्वोच्चता के बारे में लाज़र के पुनरूत्थान के जरिए एक सन्देश भेजा था, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर कोई कार्य बिना किसी आशय के कभी नहीं करता है। हर एक चीज़ जो वह करता है उसका बड़ा महत्व है और ख़जाने के भंडार में एक अति उत्कृष्ट गहना है। वह "किसी व्यक्ति के क़ब्र से बाहर आने" को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या चीज़ बिल्कुल नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करता है जिसका कोई आशय ना हो। लाज़र का एक पुनरूत्थान परमेश्वर के अधिकार को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त था। यह प्रभु यीशु की पहचान को साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार के चमत्कार को फिर से नहीं दोहराया था। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धांतों के अनुसार चीज़ों को करता है। मानवीय भाषा में, ऐसा होगा कि परमेश्वर गंभीर कार्य के बारे में सचेत है। अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं है। वह जानता है कि इस चरण में वह कौन सा कार्य करना चाहता है, वह क्या पूरा करना चाहता है, और वह कड़ाई से अपनी योजना के अनुसार कार्य करेगा। यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की क्षमता होती, तो वह बस अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोच रहा होता ताकि अन्य लोगों को पता चल जाए कि वह कितना भयंकर है, जिससे वे उसके सामने झुक जाएँ, ताकि वह उन्हें नियन्त्रित कर सके और उन्हें निगल सके। यही वह बुराई है जो शैतान से आती है—इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसका इस प्रकार का सार नहीं है। चीज़ों को करने में उसका उद्देश्य अपना दिखावा करना नहीं है, बल्कि मनुष्यजाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, इसलिए लोग बाइबल में इस तरह की चीज़ों के बहुत कम ही उदाहरणों को देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु की क्षमताएँ सीमित थीं, या वह इस प्रकार की चीज़ को नहीं कर सकता था। केवल इतना ही है कि परमेश्वर ऐसा नहीं करना चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु का लाज़र का पुनरूत्थान करने का बहुत ही व्यावहारिक महत्व था, और साथ ही क्योंकि परमेश्वर के देहधारी होने का प्राथमिक कार्य चमत्कार करना नहीं था, यह मुर्दों को जीवित करना नहीं था, बल्कि यह मनुष्यजाति के छुटकारे के कार्य को करना था। इसलिए, प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य में से अधिकांश लोगों को शिक्षा देना, उनका भरण पोषण करना, और उनकी सहायता करना, और ऐसी चीज़ें जैसे लाज़र का पुनरूत्थान करना उस सेवकाई का मात्र एक छोटा सा अंश था जिसे प्रभु यीशु ने कार्यान्वित किया था। उससे भी अधिक, तुम लोग कह सकते हो कि "दिखावा करना" परमेश्वर के सार का एक भाग नहीं है, इसलिए अधिक चमत्कारों को नहीं दिखाना जानबूझकर किया गया संयम नहीं था, न ही यह पर्यावरणीय सीमाओं के कारण था, और यह क्षमता की कमी तो बिल्कुल भी नहीं था।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृत से वापस जीवित किया, तो उसने एक पंक्ति का उपयोग किया: "हे लाज़र, निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ नहीं कहा—ये शब्द क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी पूरा कर सकता है, जिसमें एक मरे हुए इंसान को जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन कर लिया, जब उसने जगत को बना लिया, तो उसने ऐसा अपने वचनों—मौखिक आज्ञाओं, अधिकार युक्त वचनों का उपयोग करके किया था, और ठीक उसी तरह सभी चीज़ों का सृजन हुआ था। यह उसी तरह से पूरा हुआ था। प्रभु यीशु के द्वारा कही गयी यह एक मात्र पंक्ति परमेश्वर के द्वारा उस समय कहे गए वचनों के समान थी जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन किया था; उसमें परमेश्वर के समान अधिकार, और सृजनकर्ता के समान क्षमता थी। परमेश्वर के मुँह के वचनों की वजह से सभी चीज़ें बनी और डटी थी, और बिल्कुल वैसे ही, जैसे प्रभु यीशु के मुँह के वचनों की वजह से लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके देहधारी देह में प्रदर्शित और साकार हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और क्षमता सृजनकर्ता, और मनुष्य के पुत्र से संबंधित थी जिसमें सृजनकर्ता साकार हुआ था। यही वह समझ है जो परमेश्वर के द्वारा लाज़र को मृत से वापस लाकर मनुष्यजाति को सिखायी गयी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 78

फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले हम पहले वाले पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का और उसके द्वारा कही गई चीज़ों का मूल्यांकन यह था: "क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या शून्य में कल्पना करना नहीं था—उसके कार्यों के बारे में जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के बारे में उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो कि उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, किन्तु वह अहंकार जिसके साथ उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी उन्मत्त ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी उजागर कर दिया था। ये बातें जो उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं वे उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के कुरूप और द्वेषपूर्ण स्वभाव से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु जो कुछ उसने किया था उस पर उन्होंने बिना देखे, अधीरता से, सनक और जानबूझकर किए गए द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। यह यहाँ तक कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को विवेकहीन तरीके से बदनाम करने की हद तक था। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बालज़बूल" और "दुष्टात्माओं का सरदार।" अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देह के कार्य को जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना हुआ था पागलपन कहा। उन्होंने ना केवल बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके प्रतिरोध का सार और परमेश्वर की ईशनिंदा पूरी तरह से शैतान के सार और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्मा के प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा के समान था। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते थे, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मनुष्यजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और हरकारे थे। उनकी ईशनिंदा का सार और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, परमेश्वर की परीक्षा लेने की उनकी कभी न खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के उनके प्रतिरोध का सार और उसके प्रति उनकी शत्रुता का रवैया, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था उसके लिए परमेश्वर ने एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में, दोनों में अक्षम्य है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन वचनों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" अर्थात्, आओ इस बात का रहस्य खोलें कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है: "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

प्रत्येक चीज़ जिसके बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, मामलों, और चीज़ों के प्रति उसके रवैया से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दोनों अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मनुष्यजाति से अपमान को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और उसकी असहिष्णुता को देखते और महसूस करते हैं, तब भी उसका रवैया सचमुच में उनकी समझ में नहीं आता है। ये दोनों अंश उन लोगों के प्रति परमेश्वर के सच्‍चे रवैये और दृष्टिकोण के निहितार्थ से युक्त हैं जो उसकी ईशनिंदा और उसे क्रोधित करते हैं। पवित्रशास्त्र का यह अंश उसके रवैये और दृष्टिकोण के सच्चे अर्थ को धारण करता हैः "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं, जब वे उसे क्रोधित करते हैं, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसके द्वारा जारी किया गया एक परिणाम होता है। यह बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। हालाँकि, यह बाइबल में दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्होंने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा था या नहीं? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" क्या यह कहना नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसले को स्पष्ट करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की रवैया और सिद्धांत। परमेश्वर का उन लोगों के साथ व्यवहार जो उसकी निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं उन लोगों के साथ भी उसका व्यवहार जो उसे बदनाम करते हैं—जो लोग जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं, और उसे कोसते हैं—वह उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं करता है। उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी निन्दा करता है। यहाँ तक कि उनके परिणाम की खुल कर घोषणा भी करता है, ताकि लोग जानें कि जो उसकी निंदा करते हैं उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जानें कि वह उनका कैसा परिणाम निर्धारित करता है। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर के परिणामों के पीछे के सिद्धांतों, उनके लिए उसके निर्णय को नहीं समझ सकते हैं। अर्थात्, मनुष्यजाति उस विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख नहीं सकती है जो उन्हें सँभालने के लिए परमेश्वर के पास है। इसका चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से संबंध है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता है और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता है, बल्कि उन्हें दण्डित किए जाने, और उनका उचित प्रतिफल प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए वह प्रत्यक्ष रूप से तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है, परन्तु साथ ही, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर पड़ता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह कुछ ऐसा हो सकता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है जिसे लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिसमें परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्तियों को बचाना नहीं है, और उन पर अब और कोई दया और सहिष्णुता नहीं दिखानी है, उन्हें कोई अवसर अब और नहीं देने हैं, उनके लिए उसका रवैया उन्हें अलग कर देने की होता है। "अलग रख देना" का अर्थ क्या है? अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ है किसी चीज़ को एक ओर रखना, इस पर अब और कोई ध्यान नहीं देना। यहाँ, जब परमेश्वर " किसी को अलग रख देता है" तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया है ताकि वह उसके साथ निपटे। परमेश्वर अब ओर उत्तरदायी नहीं होगा तथा अब और उसका प्रबन्धन नहीं करेगा। चाहे वे व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाएँ, और चाहे जीवित रहें या मर जाएँ, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में उतर जाएँ, इससे परमेश्वर का कोई लेन-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि उस प्राणी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से, कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति की सेवा का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक विषम तुलना के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा, उसके साथ व्यवहार करने का एक विशेष तरीका होगा—बिल्कुल पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है कि उसने इस प्रकार के व्यक्ति से किस तरह निपटना निर्धारित किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, तो यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, या यदि वे परमेश्वर की सहनशीलता की सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे कठोर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उनकी हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनंतता तक क्षमा नहीं किए जाएँगे। इसका अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुके हैं, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभित किया था तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? इस शर्त के अधीन जिसमें शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने तब भी बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या शैतान के उन विध्वंसों की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है जिसके अधीन किसी व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा को पूर्णत: गँवा दिया है, जो सृजनकर्ता के शासन के अधीन अब और नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है, जिसका रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: विच्छेद कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना कुछ ऐसी ही थी जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इसका परिणाम कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में कोई कल्पना नहीं कर सकता है। यह बस कुछ लोगों का एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लेने, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिए जाने, इत्यादि के समान है। यह कुछ लोगों का परिणाम, अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जाता है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है जैसे कि जिन लोगों ने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उसे बदनाम किया था, उसकी निंदा की थी, और उसकी ईशनिन्दा की थी, उन्होंने कोई परिणाम नहीं भुगता। हालाँकि, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने की परमेश्वर का एक रवैया है। परमेश्वर जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणाम को लोगों को बताने के लिए हो सकता है कि वह स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे। कभी-कभी वह प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं करता है, परन्तु वह चीज़ों को प्रत्यक्ष रूप से करता है। यह कि वह इसके बारे में बात नहीं करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसका कोई परिणाम नहीं है—यह संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देखने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपने रवैये को प्रकट करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उनके द्वारा की गई चीज़ों, उनके व्यवहार की वजह से, और उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उसकी नज़रों से ओझल हो जाएँ, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर को शैतान को देना चाहता है, शैतान को जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दुबारा देखना भी नहीं चाहता, कि वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उनसे निपटना भी नहीं चाहता है—यदि यह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि वह इसके लिए उसे शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वह शैतान को उस पर नियंत्रण करने, उसे भस्म करने, और जैसा चाहे वैसा व्यवहार करने देगा—तो ऐसा व्यक्ति पूर्णत: समाप्त हो जाता है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और एक प्राणी के रूप में उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सर्वाधिक गंभीर परिणाम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 79

अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

यूहन्ना 20:26-29 आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्‍वर!" यीशु ने उससे कहा, "तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्‍वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया।"

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

ये अंश जो बताते हैं वे कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद की थीं और अपने चेलों से कही थीं। पहले, आओ हम पुनरूत्थान से पहले के और बाद के प्रभु यीशु के बीच किसी भी भिन्नता पर एक नज़र डालें। क्या वह अभी भी अतीत के दिनों के प्रभु यीशु के समान ही था? पवित्रशास्त्र में पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु का वर्णन करने वाली निम्नलिखित पंक्ति हैः "और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, 'तुम्हें शान्ति मिले।'" इससे बिल्कुल स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में अब और नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक देह था। ऐसा इसलिए था क्योंकि वह देह की सीमाओं से पार चला गया था, और जब द्वार बन्द था तब भी वह लोगों के बीच में भीतर आ सकता था और उन्हें अपने आपको देखने दे सकता था। यह पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरूत्थान के पहले के देह में रहने वाले प्रभु यीशु के बीच सबसे बड़ा अन्तर है। यद्यपि उस समय की आध्यात्मिक देह के रूप-रंग और उससे पहले के प्रभु यीशु के रूप-रंग के बीच में कोई अंतर नहीं था, फिर भी उस पल यीशु एक ऐसा यीशु बन गया था जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मृतक से जी उठने के बाद वह एक आध्यात्मिक देह बन गया था, और उसकी पिछली देह की तुलना में, यह आध्यात्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा रहस्यमय और भ्रमित करने वाला था। इसने प्रभु यीशु और लोगों के बीच की दूरियों को और अधिक बढ़ा दिया, और लोगों ने अपने हृदयों में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमयी बन गया था। लोगों की ऐसी समझ और भावनाओं ने उन्हें अचानक परमेश्वर पर विश्वास करने के एक ऐसे युग में पहुँचा दिया जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। इसलिए, वह पहली चीज़ जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद की वह थी कि उसने इस बात की पुष्टि करने के लिए कि वह अस्तित्व में है, और अपने पुनरूत्थान को साबित करने के लिए हर एक को उसे देखने दिया था। इसके अतिरिक्त, उसने लोगों के साथ अपने रिश्ते को फिर से उस रिश्ते के साथ पुनर्स्थापित किया जैसा उसका उनके साथ तब था जब वह देह में कार्य कर रहा था, और वह उनका मसीह था जिसे वे देख और छू सकते थे। इस तरह, एक परिणाम यह हुआ कि लोगों को सन्देह नहीं रहा कि प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोंके जाने के बाद उसका मृत्यु से पुनरूत्‍थान हुआ था, और मनुष्य-जाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में कोई सन्देह नहीं रहा था। और दूसरा परिणाम यह हुआ कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु का लोगों के सामने प्रकट होने और लोगों को उसे देखने और छूने देने के तथ्य ने मनुष्यजाति को अनुग्रह के युग में दृढ़ता से सुरक्षित किया। इस समय के बाद से, प्रभु यीशु के "अन्तर्धान" या "छोड़कर चले जाने" की वजह से, लोग पिछले युग, व्यवस्था के युग, में नहीं लौट सकते थे, लेकिन वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उसके द्वारा किए गए कार्य का अनुसरण करके लगातार आगे बढ़ना जारी रख सकते थे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नये चरण का मार्ग प्रशस्त हो चुका था, और जो लोग व्यवस्था के अधीन रहे थे वे उसके बाद औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए, और उन्होंने एक नए युग में, एक नई शुरूआत के साथ प्रवेश किया। पुनरूत्थान के बाद मनुष्यजाति के सामने प्रभु यीशु के प्रकट होने के ये बहुआयामी अर्थ हैं।

चूँकि वह एक आध्यात्मिक देह था, तो लोग उसे कैसे छू, और देख सकते थे? इसका मनुष्यजाति के सामने प्रभु यीशु के प्रकटन के महत्व से संबंध है। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आध्यात्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता है, और पुनरूत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने सँभाला था वह पहले ही पूर्ण हो चुका था। तो सैद्धांतिक रूप से, उसे लोगों के बीच उनसे मिलने के लिए अपनी मूल छवि में वापस आने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं थी, बल्कि थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आध्यात्मिक देह के प्रकटन ने उसके महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, और यह लोगों के हृदयों में अधिक गहराई तक घुस गई। जब वह थोमा के पास आया, तो उसने सन्देह करने वाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उससे कहाः "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" ये वचन, और ये कार्यकलाप ऐसी चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरूत्थान के बाद कहना या करना चाहता था, बल्कि ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह क्रूस पर कीलों से ठोके जाने से पहले करना चाहता था। यह स्पष्ट है कि जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोका भी नहीं गया था तब से उसे थोमा जैसे लोगों की पहले से ही समझ थी। तो हम इससे क्या देख सकते हैं? अपने पुनरूत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार नहीं बदला था। थोमा के सन्देह अभी-अभी शुरू नहीं हुए थे बल्कि जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था तब से हर समय उसके साथ थे, परन्तु यह प्रभु यीशु था जो मृत से जी उठा था और आध्यात्मिक संसार से अपनी मूल छवि के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के अपने समय से मनुष्यजाति की अपनी समझ के साथ लौट चुका था, इसलिए प्रभु यीशु थोमा से अपने पंजर पर हाथ रखवाने, पुनरूत्थान के बाद न केवल उसे अपनी आध्यात्मिक देह दिखाने, बल्कि अपनी आध्यात्मिक देह के अस्तित्व को स्पर्श और महसूस कराने, और उसके सन्देहों को पूर्णत: हटाने के लिए पहले उसे ढूँढ़ने गया। प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले, थोमा ने हमेशा सन्देह किया था कि वह मसीह है कि नहीं, और उस पर विश्वास नहीं कर सका था। जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सका था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सका था केवल उसके आधार पर ही परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास स्थापित हुआ था। इस प्रकार के व्यक्ति के विश्वास के बारे में प्रभु यीशु के पास एक अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा है, या मसीह जो देह में है उस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, और उसे स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उसे प्रभु यीशु के अस्तित्व को और यह कि वही सचमुच में देहधारी परमेश्वर है इस बात को स्वीकार कराने और विश्वास दिलाने के लिए, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ा कर अपने पंजर को छूने दिया। क्या प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के पहले और बाद में थोमा के सन्देह करने में कुछ अंतर था? वह हमेशा सन्देह करता था, और उसके सामने प्रभु यीशु के आध्यात्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से प्रकट होने और अपनी देह में कीलों के निशानों को थोमा को छूने देने के अलावा, कोई भी उसके सन्देहों का समाधान नहीं कर सकता था, और कोई उन्हें उससे नहीं छुड़वा सकता था। इसलिए उस समय से जब प्रभु यीशु ने उसे अपने पंजर को छूने दिया और उसे कीलों के निशानों की मौज़ूदगी को वास्तव में महसूस कराया, थोमा के सन्देह गायब हो गए, और उसने सचमुच में जाना कि प्रभु यीशु मृत से जी उठा है और उसने स्वीकार किया और विश्वास किया कि प्रभु यीशु ही सच्चा मसीह है, और यह कि वह देहधारी परमेश्वर है। यद्यपि इस समय थोमा ने अब और सन्देह नहीं किया, फिर भी उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने उसके साथ इकट्ठे होने का, उसका अनुसरण करने का, और उसे जानने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने प्रभु यीशु के द्वारा उसे सिद्ध बनाए जाने का अवसर गँवा दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटन और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष, और एक निर्णय प्रदान किया जो सन्देहों से भरे हुए थे। उसने सन्देह करने वालों को बताने के लिए, उन लोगों को बताने के लिए जो केवल स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे किन्तु मसीह पर विश्वास नहीं करते थे, अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया: परमेश्वर ने उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं की, न ही उसने उनके अनुसरण की प्रशंसा की जो सन्देहों से भरा हुए थे। जिस दिन उन्होंने परमेश्वर और मसीह पर पूर्णत: विश्वास किया था केवल यही वह दिन हो सकता था कि परमेश्वर ने अपने महान कार्य को पूर्ण किया था। निस्संदेह, यही वह दिन भी था कि उनके सन्देहों ने एक निर्णय प्राप्त किया था। मसीह के प्रति उनके रवैये ने उनके भाग्य का निर्धारण किया था, उनके ढीठ सन्देह का अभिप्राय था कि उनके विश्वास से उन्हें कोई परिणाम प्राप्त नहीं हुआ था, और उनकी कठोरता का अभिप्राय था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। क्योंकि स्वर्गिक परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रान्तियों पर पला था, और मसीह के प्रति उनका सन्देह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनका वास्तविक रवैया था, इसलिए भले ही उन्होंने प्रभु यीशु की देह के कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को बाँस की टोकरी से पानी खींचने—सब कुछ व्यर्थ—के रूप में वर्णित किया जा सकता था। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा वह हर एक व्यक्ति को भी स्पष्ट रूप से कह गया थाः पुनरूत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है जिसने आरम्भ में साढ़े तैंतीस वर्ष मनुष्यजाति के बीच काम करते हुए बिताए थे। यद्यपि उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था और उसने मृत्यु की छाया की घाटी का अनुभव किया था, और उसने पुनरूत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसके हर एक पहलू में कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब उसके शरीर में कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरूत्थित हो चुका था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मनुष्यजाति की उसकी समझ, और मनुष्यजाति के प्रति उसका इरादा थोड़ा सा भी नहीं बदला था। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह क्रूस से नीचे आ गया है, उसने पाप पर विजय पाई है, कठिनाईयों पर विजय पाई है, और मुत्यु पर विजय पाई है। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के प्रमाण मात्र थे, संपूर्ण मनुष्यजाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एक पाप बलि होने का प्रमाण थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले से ही मनुष्यजाति के पापों को ग्रहण कर लिया है और उसने छुटकारे के अपने कार्य को पूर्ण कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने के लिए लौटा, तो उसने अपने प्रकटन के साथ उनसे कहाः "मैं अभी भी जीवित हूँ, मैं अभी भी अस्तित्व में हूँ; आज मैं सचमुच में तुम लोगों के सामने खड़ा हूँ ताकि तुम लोग मुझे देख और छू सको। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु भविष्य के लोगों को चेतावनी देने के लिए भी थोमा के उदाहरण का उपयोग करना चाहता था: यद्यपि तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो, फिर भी तुम उसे न तो देख सकते हो और न ही छू सकते हो, तब भी तुम अपने सच्चे विश्वास के द्वारा धन्य किए जा सकते हो, और तुम अपने सच्चे विश्वास के माध्यम से प्रभु यीशु को देख सकते हो: इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

बाइबल में दर्ज ये वचन जिन्हें प्रभु यीशु ने तब कहा था जब वह थोमा के सामने प्रकट हुआ था अनुग्रह के युग में सभी लोगों के लिए एक बड़ी सहायता हैं। थोमा के सामने उसका प्रकटन और उसके वचनों का भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर एक गहरा प्रभाव पड़ा है, और उनका सर्वकालिक महत्व है। थोमा उस प्रकार के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं मगर उस पर सन्देह भी करते हैं। वे शंकालु प्रकृति के होते हैं, उनका कुटिल हृदय होता है, वे विश्वासघाती होते हैं, और उन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण कर सकता है। वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसके शासन पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। हालाँकि, प्रभु यीशु का पुनरूत्थान उनके चेहरों पर एक तमाचा था, और इसने उन्हें अपने स्वयं के सन्देह की खोज करने, अपने सन्देह को पहचानने, और अपने स्वयं के विश्वासघात को स्वीकार करने, फलस्वरूप प्रभु यीशु के अस्तित्व और पुनरूत्थान पर सचमुच विश्वास करने का, एक अवसर भी प्रदान किया था। थोमा के साथ जो कुछ हुआ था वह बाद की पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और सावधानी थी ताकि अधिक-से-अधिक लोग अपने आपको सावधान कर सकें कि वे थोमा के समान सन्देह ना करें, और यदि वे सन्देह करेंगे, तो वे अंधकार में डूब जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु बिल्कुल थोमा के समान, यह पुष्टि करने, सत्यापित करने, और यह अंदाज़ा लगाने के लिए कि परमेश्वर का अस्तित्व है कि नहीं, तुम हमेशा प्रभु के पंजर को छूना और उसके कीलों के निशानों को महसूस करना चाहते हो, तो परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा। इसलिए, प्रभु यीशु लोगों से अपेक्षा करता है कि वे थोमा के समान न बनें, जो केवल उसी बात पर विश्वास करते हैं जिसे वे अपनी आँखों से देख सकते हैं, बल्कि एक शुद्ध, और ईमानदार इंसान बनें, परमेश्वर के प्रति सन्देहों को आश्रय न दें, बल्कि केवल उस पर विश्वास करें और उसका अनुसरण करें। इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है। यह लोगों से प्रभु यीशु की एक छोटी सी अपेक्षा है, और यह उसके अनुयायियों के लिए एक चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 80

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

इस वार्तालाप में, प्रभु यीशु ने लगातार पतरस से एक बात पूछीः "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" यह वह उच्चतर मानक है जिसकी प्रभु यीशु अपने पुनरूत्थान के बाद पतरस के समान लोगों से अपेक्षा करता है, जो सचमुच में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की खोजबीन थी, एक प्रकार की पूछताछ थी, परन्तु इससे भी अधिक, यह पतरस के समान लोगों से एक माँग और एक अपेक्षा थी। उसने प्रश्न पूछने के इस तरीके का उपयोग किया ताकि लोग स्वयं पर विचार करें और स्वयं के भीतर झाँकें: लोगों से प्रभु यीशु की अपेक्षाएँ क्या हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो प्रभु से प्रेम करता है? कैसे मुझे प्रभु से प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा था, परन्तु सत्‍य यह है कि अपने हृदय में, वह पतरस से पूछने के इस अवसर का लाभ उठाना चाहता था ताकि पतरस अधिक से अधिक लोगों से इस प्रकार का प्रश्न पूछे जो परमेश्वर से प्रेम करने की खोज करते हैं। यह सिर्फ इतना ही है कि पतरस इस प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने, प्रभु यीशु के स्वयं के मुँह से प्रश्न को प्राप्त करने के लिए आशीषित था।

"अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो," की तुलना में, प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद थोमा से जो कहा था, उसका पतरस से तीन बार प्रश्न पूछना: "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" लोगों को प्रभु यीशु के रवैये की कठोरता, और उस अत्यावश्यकता को बेहतर ढंग से महसूस करने देता है जो उसने प्रश्न पूछने के समय महसूस की थी। जहाँ तक धोखेबाज प्रकृति वाले सन्देह करने वाले थोमा की बात है, प्रभु यीशु ने उसे उसका हाथ बढ़ाने और अपनी कीलों के निशान को छूने दिया, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु ही मनुष्य का पुत्र है जो पुनरूत्थित हुआ है और उसने मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान को स्वीकार किया। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से नहीं डाँटा था, न ही उसने मौखिक रूप से उसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई न्याय व्यक्त किया था, फिर भी उसने उसे जानने दिया कि वह उसे व्यावहारिक कार्यकलापों के माध्यम से समझ चुका था, जब वह उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपने रवैये और निर्धारण को प्रदर्शित कर रहा था। इस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को जो कुछ उसने कहा था उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता है। क्योंकि थोमा जैसे लोगों के पास महज़ सच्चे विश्वास की डोर नहीं होती है। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें केवल इसी में थीं, लेकिन वह रवैया जो उसने पतरस जैसे लोगों के लिए प्रकट किया वह बिल्कुल भिन्न था। उसने यह माँग नहीं की थी कि पतरस अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, न ही उसने पतरस से कहा: "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" उसके बजाए, उसने लगातार पतरस से वही प्रश्न पूछा। यह विचारोत्तेजक, अर्थपूर्ण प्रश्न था जो मसीह के प्रत्येक अनुयायी को ग्लानि, और भय महसूस कराने, बल्कि प्रभु यीशु की चिन्ता, दुःखित मनोदशा को भी महसूस कराने के अलावा कोई सहायता नहीं कर सकता है। और जब वे अत्यधिक पीड़ा और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिन्ता और उसकी देखरेख को और अधिक समझ पाते है; वे शुद्ध, और ईमानदार लोगों से उसकी ईमानदार शिक्षाओं और सख्त माँगों को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास करने देता है कि इन सामान्य वचनों में प्रकट प्रभु की लोगों से अपेक्षाएँ मात्र उनमें विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, बल्कि प्रेम को पाने, अपने प्रभु से प्रेम करने, और अपने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए है। इस प्रकार का प्रेम देखरेख करने वाला और आज्ञाकारी होता है। यह मनुष्यों का परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, परमेश्वर के प्रति सर्वस्व समर्पित करना है, और परमेश्वर के लिए सब कुछ व्यय करना और सब कुछ दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को आराम देना, उसे गवाही का आनंद लेने देना, और उसे विश्राम में होने देना भी है। यह मनुष्यजाति की परमेश्वर को चुकौती, उनका उत्तरदायित्व, दायित्व और कर्त्तव्य है, और यह एक मार्ग है जिसका अनुसरण मनुष्यजाति को जीवन भर अवश्य करना चाहिए। ये तीनों प्रश्न एक माँग और प्रोत्साहन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किए थे जिन्हें सिद्ध बनाया जाएगा। ये वे तीन प्रश्न थे जिन्होंने पतरस को जीवन में अपने मार्ग को पूर्ण करने के लिए अगुवाई और प्रेरणा दी, और ये प्रभु यीशु के जाने पर वे प्रश्न थे जिन्होंने सिद्ध बनाए जाने की उसकी यात्रा को शुरू करने में पतरस की अगुवाई की, जिन्होंने, प्रभु के प्रति उसके प्रेम की वजह से, प्रभु के हृदय का ख़्याल रखने, प्रभु का आज्ञापालन करने, प्रभु को आराम प्रदान करने, और इस प्रेम की वजह से अपने सम्पूर्ण जीवन और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को अर्पित करने में उसकी अगुवाई की।

अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला उस प्रकार के लोगों के लिए था जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं को मान सकते थे, जो क्रूस को उठा सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेगा और परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाएगा। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस के समान था, कोई ऐसा जिसे सिद्ध बनाया जा सकता था। इसलिए प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के बाद, उसने सबसे पहले इन दो सर्वाधिक अर्थपूर्ण चीज़ों को किया। एक थोमा के साथ, और दूसरा पतरस के साथ। ये दोनों चीज़ें क्या दर्शाती हैं? क्या ये मनुष्यजाति को बचाने के परमेश्वर के सच्चे इरादों को दर्शाती हैं? क्या ये मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की ईमानदारी को दर्शाती हैं? जो कार्य उसने थोमा के साथ किया वह लोगों की चेतावनी के लिए था कि वे सन्देह न करें, बल्कि बस विश्वास करें। जो कार्य उसने पतरस के साथ किया वह पतरस जैसे लोगों के विश्वास को दृढ़ करने, और इस प्रकार के लोगों के बारे में अपेक्षाओं को स्पष्ट करने, और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन लक्ष्यों का अनुसरण करना चाहिए।

प्रभु यीशु के पुनरूत्थित होने के बाद, वह उन लोगों के सामने प्रकट हुआ जिन्हें वह आवश्यक समझता था, उनसे बातें की, और उनसे माँगें की, लोगों के बारे में अपने इरादों, और उनसे अपनी अपेक्षाओं को छोड़ कर चला गया। कहने का अर्थ है, कि देहधारी परमेश्वर के रूप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि यह उसके देह में रहने के समय के दौरान था, या क्रूस पर ठोके जाने और मृत से जी उठने के बाद आध्यात्मिक देह में रहने के समय था—मनुष्यजाति के लिए उसकी चिन्ता और लोगों से उसकी माँगें नहीं बदली थीं। क्रूस के ऊपर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों के बारे में चिंतित था; अपने हृदय में, वह हर एक व्यक्ति की अवस्था को लेकर स्पष्ट था, वह प्रत्येक व्यक्ति की कमी को समझता था, और वास्तव में उसकी मृत्यु, पुनरूत्थान, और आध्यात्मिक शरीर बनने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति के बारे में उसकी समझ वही थी जैसी तब थी जब वह देह में था। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, परन्तु देह में रहने के उसके समय के दौरान उसने लोगों से कठोर अपेक्षाएँ नहीं कीं। परन्तु पुनरूत्थित हो जाने के बाद वह उनके सामने प्रकट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित किया कि प्रभु यीशु परमेश्वर से आया है, यह कि वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने मनुष्यजाति के द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सबसे बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में अपने प्रकटन और अपने पुनरूत्थान के तथ्य का उपयोग किया। मृत्यु से उसके पुनरूत्थान ने न केवल उन सभी को मज़बूत किया जो उसका अनुसरण करते थे, बल्कि अनुग्रह के युग के उसके कार्य को पूर्णत: मनुष्यजाति के बीच प्रभावी कर दिया था, और इस प्रकार अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के उद्धार का सुसमाचार धीरे-धीरे मानवजाति के हर छोर तक पहुँच गया। क्या तुम कहोगे कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटन का कोई महत्व था? उस समय यदि तुम थोमा या पतरस होते, और तुमने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतना अर्थपूर्ण होता, तो इसका तुम्हारे ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या तुम इसे परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सबसे बड़े दर्शन के रूप में देखते? क्या तुम, उसे सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करते हुए, और अपने जीवन में उसे प्रेम करने की खोज करते हुए, इसे परमेश्वर का अनुसरण करने की एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखते? क्या इस सबसे बड़े दर्शन को फैलाने के लिए तुम जीवन भर का प्रयास व्यय करते? क्या तुम प्रभु यीशु के उद्धार के सुसमाचार को फैलाने को परमेश्वर से प्राप्त एक महान आदेश के रूप में लेते? भले ही तुम लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा को और परमेश्वर को स्पष्ट रूप से समझने के लिए थोमा और पतरस के दो मामले काफी हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, उसके द्वारा मनुष्यजाति के बीच जीवन का और एक मानवीय जीवन का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर लेने के बाद, और उसके द्वारा मनुष्यजाति की चरित्रहीनता और मानवीय जीवन की दशा को देखने के बाद, देहधारी परमेश्वर ने मनुष्यजाति की असहायता, उदासी, और दयनीयता को और गहराई से महसूस किया था। देह में रहते हुए अपनी मानवता की वजह से, और देह में अपने सहजज्ञान की वजह से, परमेश्वर को मानवता की हालत पर और अधिक करूणा उमड़ी। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिंतित हो गया। शायद ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझ सकते हो, परन्तु मैं इस वाक्यांश से उसके हर एक अनुयायी के लिए देहधारी परमेश्वर की चिंता और देखरेख का वर्णन कर सकता हूँ: गहन चिंता। यद्यपि यह शब्द मानवीय भाषा से आता है, और यद्यपि यह बिल्कुल मानवीय वाक्यांश है, फिर भी यह अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर की भावनाओं को सचमुच में व्यक्त और वर्णित करता है। जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की गहन चिन्ता की बात है, अपने अनुभवों के दौरान तुम लोग धीरे-धीरे इसे महसूस करोगे और इसका स्वाद चखोगे। हालाँकि, इसे केवल अपने स्वभाव में परिवर्तन की खोज करने के आधार पर परमेश्वर के स्वभाव को धीरे-धीरे समझने के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। प्रभु यीशु के प्रकटन ने मानवजाति में उसके अनुयायियों के लिए उसकी अत्यधिक चिन्ता को मूर्तरूप दिया और इसे उसकी आध्यात्मिक देह को, या तुम लोग यह कह सकते हो कि उसकी दिव्यता को सौंप दिया था। उसके प्रकटन ने लोगों को परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख को एक अन्य अनुभव और एहसास करने दिया जबकि सामर्थ्यपूर्ण ढंग से यह भी प्रमाणित किया कि परमेश्वर ही वह एक है जो एक युग का मार्ग प्रशस्त करता है, जो एक युग को विकसित करता है, और वही एकमात्र है जो एक युग को समाप्त करता है। अपने प्रकटन के माध्यम से उसने लोगों के विश्वास को मज़बूत किया, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने संसार के सामने उस तथ्य को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। इससे उसके अनुयायियों को अनंत पुष्टि मिली, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने नए युग में अपने कार्य के एक चरण का मार्ग प्रशस्त किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 81

अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्रशास्त्रों को समझाता है

लूका 24:30-32 जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशा स्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?"

चेलों ने यीशु को खाने के लिए भुनी हुई मछली दी

लूका 24:36-43 वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" परन्तु वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्‍चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया। उसने लेकर उनके सामने खाया।

इसके बाद, अब हम ऊपर दिए गए पवित्रशास्त्र के अंशों पर एक नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्रशास्त्र को समझाने का वर्णन है, और दूसरा अंश प्रभु यीशु के भुनी हुई मछली खाने का वर्णन है। ये दोनों अंश परमेश्वर के स्वभाव को जानने के लिए किस प्रकार की सहायता प्रदान करते हैं? क्या तुम लोग इसकी कल्पना कर सकते हो कि प्रभु यीशु के रोटी और फिर भुनी हुई मछली खाने के इन विवरणों में तुम लोग किस प्रकार की तस्वीरों को प्राप्त करते हो? क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि, यदि प्रभु यीशु तुम लोगों के सामने रोटी खाता हुआ खड़ा होता, तो तुम लोगों को कैसा महसूस होता? अथवा यदि वह तुम लोगों के साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा होता, लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा होता, तो उस समय तुम्हें किस प्रकार की भावना आती? यदि तुम महसूस करते कि तुम प्रभु के बेहद करीब होते, कि वह तुम्हारे साथ बेहद अंतरंग होता, तब यह भावना सही है। यह बिल्कुल वही परिणाम है जो पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु इकट्ठा हुए लोगों के सामने रोटी और मछली खाने के द्वारा दिखाना चाहता था। यदि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद सिर्फ लोगों से बात करता, यदि उन्होंने उसकी देह और हड्डियों को महसूस नहीं किया होता, बल्कि यह महसूस किया होता कि वह एक अगम्य पवित्रात्मा है, तो वे कैसा महसूस करते? क्या वे निराश नहीं हो जाते? जब लोग निराश हो जाते, तो क्या वे परित्यक्त महसूस नहीं करते? क्या वे प्रभु यीशु मसीह से एक दूरी का एहसास नहीं करते? परमेश्वर के साथ लोगों के रिश्ते पर यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती? लोग निश्चित रूप से भयभीत हो जाते, कि वे उसके करीब आने की हिम्मत नहीं करते, और उनका उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने का रवैया होता। उसके बाद से, वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने अंतरंग रिश्ते को तोड़ देते, और मनुष्यजाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच रिश्ते की ओर वापस लौट जाते, जैसा कि अनुग्रह के युग के पहले था। जिस आध्यात्मिक देह को लोग स्पर्श और महसूस नहीं कर सकते थे वह परमेश्वर के साथ उनकी अंतरंगता का उन्मूलन कर देती, और यह उस अंतरंगता के अस्तित्व को भी—जो प्रभु यीशु मसीह के देह में रहने के समय स्थापित हुई थी, जिसमें मनुष्यजाति और उसके बीच कोई दूरी नहीं थी—खत्म कर देती। आध्यात्मिक देह के प्रति लोगों की भावनाएँ केवल भय, बचते रहना, और निःशब्द टकटकी है। वे उसके करीब आने या उससे बात करने की हिम्मत नहीं करते हैं, उसका अनुसरण करने, उस पर भरोसा करने, या उससे आशा करने की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर इस प्रकार की भावना को देखने का अनिच्छुक था जो मनुष्यों के मन में उसके लिए थी। वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उसे बच कर निकलें या अपने आप को उससे दूर हटा दें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ, और उसका परिवार बन जाएँ। यदि तुम्हारे स्वयं के परिवार ने, तुम्हारे बच्चों ने तुम्हें देखा परन्तु तुम्हें पहचाना नहीं, और तुम्हारे करीब आने की हिम्मत नहीं की बल्कि हमेशा तुमसे बचते रहे, और जो कुछ भी तुमने उनके लिए किया उसके लिए तुम उनकी समझ को प्राप्त नहीं कर सके, तो इससे तुम्हें कैसा महसूस होगा? क्या यह दुःखदायी नहीं होगा? क्या तुम्हारा हृदय नहीं टूट जाएगा? बिल्कुल ऐसा ही परमेश्वर महसूस करता है जब लोग उससे बचते हैं। इसलिए, अपने पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु तब भी लोगों के सामने माँस और लहू के अपने रूप में प्रकट हुआ, और उसने उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह चाहता है कि मनुष्यजाति भी उसे इसी तरह से देखे; केवल इसी तरह से परमेश्वर सचमुच में लोगों को प्राप्त कर सकता है, और लोग सचमुच में उससे प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या तुम लोग पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों का उद्धरण देने के मेरे इरादे को समझ सकते हो जहाँ प्रभु यीशु रोटी खाता है, अपने पुनरूत्थान के बाद पवित्रशास्त्र को समझाता है, और चेले उसे खाने के लिए भुनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि कार्यों की श्रृंखलाएँ जो प्रभु यीशु ने पुनरूत्थान के बाद कही और की वे विचारपूर्ण थीं, और वे दयालु इरादों से की गई थीं। वे दयालुता और स्नेह से भरी हुई थीं जो परमेश्वर मानवजाति के प्रति रखता है, और दुलार और कुशल देखरेख से भी भरी हुई थीं जो उस अंतरंग सम्बन्ध के लिए थीं जिसे उसने देह में रहने के दौरान मनुष्यजाति के साथ स्थापित किया था। उससे भी अधिक, वे अतीत की ललक और अपने अनुयायियों के साथ खाने-पीने के उस जीवन की लालसा से भरी हुई थीं जो उसके देह में रहने के समय के दौरान थी। इसलिए, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी महसूस करें, और न ही वह यह चाहता था कि मनुष्यजाति स्वयं को परमेश्वर से दूर रखे। इससे भी बढ़कर, वह नहीं चाहता था कि मनुष्यजाति यह महसूस करे कि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद अब और वह प्रभु नहीं है जो लोगों से बहुत अंतरंग था, कि वह मनुष्यजाति के साथ अब और नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में लौट गया है, और उस पिता के पास लौट गया है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते थे और जिस तक कभी नहीं पहुँच सकते हैं। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मनुष्यजाति के बीच पद का कोई अंतर है। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परन्तु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसके हृदय में पीड़ा होती है क्योंकि इसका मतलब है कि उनके हृदय उससे बहुत दूर है, इसका मतलब है कि उसके लिए उनके हृदयों को पाना बहुत कठिन होगा। इसलिए यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हो जाता जिसे वे छू और देख नहीं सकते, तो इसने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इसने मनुष्यजाति की ग़लत ढंग से यह देखने की ओर अगुआई की होती कि पुनरूत्थान के बाद मसीह अभिमानी, मनुष्यों से भिन्न प्रकार का, और ऐसा बन गया है, जो मनुष्य के साथ मेज पर अब और नहीं बैठ सकता था और उनके साथ नहीं खा सकता है क्योंकि मनुष्य पापी और गन्दे हैं, और कभी भी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते हैं। मनुष्यजाति की इन ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए, प्रभु यीशु ने कई चीज़ें की जिन्हें वह देह में प्रायः करता था, जैसा कि बाइबल में दर्ज है, "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" उसने उन्हें पवित्रशास्त्र भी समझाया, जैसा कि वह किया करता था। यह सब कुछ जो प्रभु यीशु ने किया उसने प्रत्येक व्यक्ति को जिसने उसे देखा था यह महसूस कराया कि प्रभु नहीं बदला है, यह कि वह अभी भी वही प्रभु यीशु है। भले ही उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, फिर भी वह पुनर्जीवित हो चुका है, और उसने मनुष्यजाति को नही छोड़ा था। वह मनुष्यों के बीच रहने के लिए लौट आया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। लोगों के सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और उसकी बातचीत बहुत परिचित लगती थी। वह तब भी सहृदयता और सोच-विचार, अनुग्रह और सहिष्णुता से उतना ही भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था जो लोगों से वैसा ही प्रेम करता था जैसा वह अपने आप से करता था, जो मनुष्यजाति को सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा कर सकता था। हमेशा की तरह, उसने लोगों के साथ खाया, उनके साथ पवित्रशास्त्र पर चर्चा की, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वह पहले के समान ही, माँस और लहू से बना था और उसे छुआ और देखा जा सकता था। इस तरह मनुष्य के पुत्र ने लोगों को उस अंतरंगता को महसूस करने, और सहज महसूस करने, और किसी खोयी हुई चीज़ को पुनः प्राप्त करने का आनंद लेने दिया, और उन्होंने भी हिम्मत और दृढ़ विश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा और उसका आदर करना आरम्भ करने में पर्याप्त रूप से सहज महसूस किया जो मनुष्यजाति को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। वे निःसंकोच रूप से प्रभु यीशु के नाम से उसका अनुग्रह, उसका आशीष प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति और आनन्द प्राप्त करने के लिए, और उससे देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना भी करने लगे, तथा प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करने लगे और दुष्टात्माओं को निकालने लगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 82

जिस दौरान प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उसके द्वारा कही गई चीज़ों को पूरी तरह से सत्यापित नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, तो उनके चेलों का रवैया अपेक्षा का था; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर उसे क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों का निराश रवैया था। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों के बारे में सन्देह करने से नकारने की ओर जाना आरम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक-एक करके लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे-धीरे नकारने से संशय की ओर आने लगे थे। अपने पुनरूत्थान के बाद जिस समय प्रभु यीशु ने अपने पंजर में थोमा से उसका हाथ डलवाया, जिस समय प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खायी, और उसके बाद उनके सामने भुनी हुई मछली खायी, केवल तभी उन्होंने सचमुच में उस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ही देह में मसीह है। तुम लोग ऐसा कह सकते हो कि यह ऐसा था मानो कि तब माँस और रक्त वाला यह आध्यात्मिक शरीर उन लोगों के सामने खड़ा हुआ उन्हें किसी स्वप्न से जगा रहा थाः मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था वही एक था जो अतिप्रचीन समय से अस्तित्व में था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डियाँ थीं, और वह पहले से ही मनुष्यजाति के साथ लम्बे समय तक रह और खा चुका था...। इस समय, लोगों ने महसूस किया कि उसका अस्तित्व बहुत यथार्थ, और बहुत अद्भुत था; वे भी बहुत आनन्दित और प्रसन्न थे, और साथ ही मनोभाव से भी भरे थे। और उसके पुनः-प्रकटन ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, और उसकी चाहत, और मनुष्यजाति के प्रति उसकी अनुरक्ति को महसूस करने दिया। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह महसूस कराया मानो कि एक पूरा जीवन काल गुज़र चुका हो। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और संवेदनशून्य हृदय को आराम मिला। वे अब और सन्देहपूर्ण या निराश नहीं थे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र पूरी अनन्तता तक उनके पीछे रहेगा, वह उनका दृढ़ दुर्ग, और हमेशा के लिए उनका आश्रय होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मनुष्यजाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटन से लोगों को बताया कि वह भले ही किसी भी रूप में अस्तित्व में क्यों न हो, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह, वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें उसे देखने और छूने देगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि वे कभी पुनः असहाय महसूस न करें। प्रभु यीशु यह भी चाहता था कि लोग यह जानें: इस संसार में उनके जीवन अकेले नहीं हैं। मनुष्यजाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आश्रित हो सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आश्रित होने के साथ, मनुष्यजाति अब और एकाकी या असहाय नहीं होगी, और जो उसे अपनी पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे अब और पाप में बँधे नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया बहुत छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस तरह से मैं उन्हें देखता हूँ, हर एक छोटी सी चीज़ भी बहुत अर्थपूर्ण थी, और बहुत मूल्यवान थी, और वे सभी बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली थीं।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाईयों और पीड़ा से भरा हुआ था, फिर भी माँस और रक्त की अपनी आध्यात्मिक देह के प्रकटन के माध्यम से, उसने उस समय के मनुष्यजाति को छुड़ाने के देह के अपने कार्य को पूर्णता और सिद्धता से पूरा किया था। उसने देह बन कर अपनी सेवकाई की शुरूआत की, और मनुष्यों के सामने अपने दैहिक रूप में प्रकट होकर उसने अपनी सेवकाई का समापन किया। वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था, उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से अनुग्रह के युग की शुरूआत की। उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया और उसने अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को मज़बूत किया और उनकी अगुवाई की। परमेश्वर के कार्य के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि वह जिसे आरम्भ करता है उसे वास्तव में पूरा करता है। इसमें कदम और योजना होते हैं, और यह परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वशक्तिमत्ता, और उसके अद्भुत कर्मों से भरपूर होता है। यह परमेश्वर के प्रेम और करुणा से भी भरपूर होता है। निस्संदेह, परमेश्वर के समस्त कार्य की मुख्य डोर मनुष्यजाति के लिए उसकी देखभाल है; यह उसकी परवाह की भावनाओं से व्याप्त है जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता है। बाइबल के इन छन्दों में, अपने पुनरूत्थान के बाद हर एक चीज़ में जो प्रभु यीशु ने की, जो प्रकट हुआ वह मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का न बदलने वाला प्रेम और चिन्ता थे, और साथ ही मनुष्यों के लिए परमेश्वर की कुशल देखरेख और दुलारना था। अब तक, इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय स्वतः ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता है? यदि तुम लोग उस युग में रहते और प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद तुम लोगों के सामने प्रकट होता, मूर्त रूप में ताकि तुम लोग देख सकते, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और तुम लोगों को पवित्रशास्त्र समझाता, तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? दोषी के बारे में क्या कहेंगे? परमेश्वर के बारे में पिछली ग़लतफहमियाँ और उससे बचना, परमेश्वर के साथ टकराव और उसके बारे में सन्देह—क्या ये सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच का रिश्ता और अधिक उचित नहीं हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की व्याख्या के माध्यम से, क्या तुम लोगों को परमेश्वर के स्वभाव में किसी खोट का पता लगा? क्या तुम लोगों को परमेश्वर के प्रेम में मिलावट का पता लगा! क्या तुम लोगों ने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में कोई धूर्तता या दुष्टता देखी? निश्चित रूप से नहीं? अब क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर के मनोभाव उसके सार और उसके स्वभाव के प्रकाशन हैं। मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ लेने के बाद, जो कुछ तुम लोगों ने इससे समझा है उससे तुम लोगों को सहायता मिलेगी और यह स्वभाव में परिवर्तन की तुम लोगों की खोज और परमेश्वर से भय मानने में तुम लोगों को लाभ पहुँचाएगा। मैं यह भी आशा करता हूँ कि ये वचन तुम लोगों के लिए परिणाम उत्पन्न करेंगे जो दिन प्रति दिन बढ़ते ही जाएँगे, इस प्रकार खोज की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, और उस उच्च मानक के और करीब ले आएगी जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है, ताकि तुम लोग सत्य की खोज करने में अब और ऊबा हुआ महसूस न करो और तुम लोग अब और ऐसा महसूस न करो कि सत्य की और स्वभाव में परिवर्तन की खोज एक कष्टप्रद या निरर्थक चीज़ है। इसके बजाए, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेश्वर के पवित्र सार की अभिव्यक्ति है जो तुम लोगों को ज्योति की लालसा करने, और न्याय की लालसा करने, और सत्य की खोज करने, परमेश्वर की इच्छा की सन्तुष्टि की खोज करने, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किया गया मनुष्य बनने, और एक वास्तविक मनुष्य बनने की अभिलाषा करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

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