परमेश्वर को जानना 2

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 31

मनुष्यजाति का सृजन करने के तुरंत बाद, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जुड़ना और मनुष्य से बात करना शुरू कर दिया, और उसका स्वभाव मनुष्य के समक्ष व्यक्त होना आरंभ हो गया। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर जब पहली बार मनुष्य के साथ जुड़ा, तभी से वह अपना सार और अपना स्वरूप, बिना किसी व्यवधान के, मनुष्य पर ज़ाहिर करने लगा। इस बात की परवाह किए बिना कि पहले के लोग या आज के लोग इसे देखने या समझने में समर्थ हैं या नहीं, परमेश्वर अपना स्वभाव प्रकट करते हुए और अपना सार व्यक्त करते हुए मनुष्य से बात करता है और मनुष्य के बीच कार्य करता है—यह तथ्य है, और कोई भी व्यक्ति इससे इनकार नहीं कर सकता है। इसका यह भी अर्थ है कि जब परमेश्वर मनुष्य के साथ कार्य करता और जुड़ता है, तब परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर का सार और उसका स्वरूप निरंतर सामने आते और प्रकट होते रहते हैं। उसने मनुष्य से कभी कुछ छिपाया या गुप्त नहीं रखा है, बल्कि इसके बजाय वह कुछ भी रोककर रखे बिना अपना स्वभाव सार्वजनिक और प्रकाशित कर देता है। इस प्रकार, परमेश्वर आशा करता है कि मनुष्य उसे जान सके और उसके स्वभाव और सार को समझ सके। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य उसके स्वभाव और सार के साथ अनंत रहस्यों की तरह व्यवहार करे, न ही वह यह चाहता है कि मनुष्यजाति परमेश्वर को ऐसी पहेली माने जिसे कभी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब मनुष्यजाति परमेश्वर को जान लेती है, केवल तभी मनुष्य आगे का मार्ग जान सकता है और परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार कर सकता है, और केवल ऐसी मनुष्यजाति ही सच्चे अर्थ में परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन जी सकती है, और प्रकाश में, परमेश्वर के आशीषों के बीच, जीवन जी सकती है।

परमेश्वर से निकले और उसके द्वारा प्रकट किए गए वचन और स्वभाव उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उसके सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ता है, तब वह चाहे जो कहे या करे, या वह चाहे जो स्वभाव प्रकट करे, और मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप का चाहे जो देखे, वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। मनुष्य चाहे जितना एहसास कर पाए, बूझ या समझ पाए, यह सब परमेश्वर की इच्छा—मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा—को दर्शाता है! यह संदेह से परे है! मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा वह है जैसा वह लोगों से होने अपेक्षा करता है, जो वह उनसे करने की अपेक्षा करता है, जैसे वह उनसे जीने की अपेक्षा करता है, और जैसा वह उनसे परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने में समर्थ बनने की अपेक्षा करता है। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अवियोज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपना स्वभाव और अपना समूचा स्वरूप उसी समय सामने लाता है जब वह मनुष्य से माँगें कर रहा होता है। इसमें कोई झूठ, कोई बहाना, कोई दुराव-छिपाव, और कोई साज-श्रृंगार नहीं है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर का स्वभाव जानने में असमर्थ क्यों है, और क्यों वह परमेश्वर के स्वभाव को कभी भी स्पष्ट रूप से महसूस करने में समर्थ नहीं रहा है? मनुष्य ने कभी परमेश्वर की इच्छा की अनुभूति क्यों नहीं की? परमेश्वर से जो निकलता और उसके द्वारा प्रकट किया जाता है, यही वह है जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है; यह उसके सच्चे स्वभाव का एक-एक कतरा और फलक है—तो मनुष्य क्यों नहीं देख सकता है? क्यों मनुष्य पूरे ज्ञान के काबिल नहीं है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। तो, यह कारण क्या है? सृजन के समय से ही, मनुष्य ने परमेश्वर के साथ कभी परमेश्वर जैसा बर्ताव नहीं किया। प्राचीनतम समयों में, मनुष्य के संबंध में—उस मनुष्य के संबंध में जिसे अभी बस सृजित किया गया था—परमेश्वर ने चाहे जो किया हो, पर मनुष्य ने परमेश्वर को एक साथी से अधिक कुछ नहीं माना, कोई ऐसा जिस पर भरोसा किया जा सकता था, और मनुष्य को परमेश्वर का कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। कहने का तात्पर्य यह है कि वह नहीं जानता था कि इस अस्तित्व—इस अस्तित्व जिस पर उसने भरोसा किया और जिसे अपने साथी के रूप में देखा—से जो निकला था, वही परमेश्वर का सार था, और न ही वह यह जानता था कि यह अस्तित्व वही एकमात्र परमेश्वर था जो सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। सीधे-सादे ढंग से कहें, तो उस समय के लोग परमेश्वर को बिल्कुल नहीं पहचानते थे। वे नहीं जानते थे कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ें उसी के द्वारा बनाई गई हैं, और वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि वह कहाँ से आया, और इस बात से भी कि वह क्या था। निस्संदेह, उस बीते समय में परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा नहीं करता था कि वह उसे जाने, या उसे बूझे, या वह सब कुछ समझे जो वह करता था, या उसकी इच्छा के बारे में जानकार हो, क्योंकि ये मनुष्यजाति के सृजन के बाद प्राचीनतम समय थे। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के कार्य की तैयारियाँ आरंभ कीं, तब परमेश्वर ने मनुष्य के लिए कुछ किया और मनुष्य से कुछ माँगें करनी भी शुरू कीं, मनुष्य को यह बताते हुए कि वह परमेश्वर को भेंट कैसे चढ़ाए और उसकी कैसे आराधना करे। केवल तभी मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में थोड़ी-सी सीधी-सादी जानकारियाँ प्राप्त कीं, केवल तभी उसने मनुष्य तथा परमेश्वर के बीच का अंतर जाना, और यह जाना कि परमेश्वर ही एकमात्र परमेश्वर है जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था। जब मनुष्य जान गया कि परमेश्वर परमेश्वर था और मनुष्य मनुष्य था, तो उसके और परमेश्वर के बीच में एक निश्चित दूरी बन गई, मगर तब भी परमेश्वर ने यह माँग नहीं की कि मनुष्य को उसके बारे में बहुत अधिक ज्ञान या गहरी समझ हो। इस प्रकार, परमेश्वर अपने कार्य के चरणों और परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य से भिन्न-भिन्न अपेक्षाएँ करता है। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव का कौन-सा पहलू महसूस करते हो? क्या परमेश्वर वास्तविक है? क्या मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उचित हैं? परमेश्वर के द्वारा मनुष्यजाति के सृजन के बाद प्राचीनतम समयों के दौरान, जब परमेश्वर ने मनुष्य पर विजय और पूर्णता का कार्य अभी नहीं किया था, और उससे कई सारे वचन नहीं कहे थे, तब उसने मनुष्य से बहुत थोड़ा चाहा। मनुष्य ने चाहे जो किया और उसने चाहे जैसा व्यवहार किया—यहाँ तक कि यदि उसने कुछ ऐसी चीज़ें भी कीं जिनसे परमेश्वर अप्रसन्न हुआ—किंतु परमेश्वर ने इस सबको क्षमा और अनदेखा कर दिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि परमेश्वर जानता था कि उसने मनुष्य को क्या दिया था और मनुष्य के भीतर क्या था, और इस प्रकार वह जानता था कि उसे मनुष्य से किस स्तर की अपेक्षाएँ करनी चाहिए। उस समय उसकी अपेक्षाओं का स्तर भले ही बहुत कम था, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका स्वभाव महान नहीं था, या उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता खोखले शब्द मात्र थे। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को जानने का केवल एक ही तरीक़ा है : परमेश्वर के प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य के सोपानों का अनुसरण करना, और परमेश्वर मनुष्यजाति से जो वचन कहता है उन्हें स्वीकार करना। एक बार जब मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप जान लेता है, और परमेश्वर का स्वभाव जान लेता भी, तब भी क्या मनुष्य परमेश्वर से अपना वास्तविक व्यक्तित्व उसे दिखाने को कहेगा? नहीं, मनुष्य ऐसा नहीं कहेगा, और ऐसा कहने की हिम्मत तक नहीं करेगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने-बूझने के बाद, मनुष्य सच्चे स्वयं परमेश्वर को, और उसके वास्तविक व्यक्तित्व को पहले ही देख चुका होगा। यह अवश्यंभावी परिणाम है।

परमेश्वर का कार्य और योजना ज्यों-ज्यों निरंतर आगे बढ़ते गए, और जब परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक चिह्न के रूप में बादल में इंद्रधनुष की वाचा स्थापित की कि वह जलप्रलय का उपयोग करके फिर कभी संसार को नष्ट नहीं करेगा, उसके पश्चात् परमेश्वर को उत्तरोत्तर बलवती इच्छा हुई कि वह ऐसे लोगों को प्राप्त करे जो उसके साथ एक मत हो सकते थे। इसलिए भी, उसे पहले से कहीं अधिक तीव्र चाह थी कि वह तत्काल ऐसे लोगों को प्राप्त करे जो पृथ्वी पर उसकी इच्छा पर चल सकें, और, इतना ही नहीं, ऐसे लोगों का एक समूह प्राप्त करे जो अंधकार की शक्तियों का शिकंजा तोड़कर मुक्त हो सकें और शैतान की बेड़ियों में न जकड़े हों, ऐसा समूह जो पृथ्वी पर उसकी गवाही देने में समर्थ होगा। ऐसे लोगों का एक समूह प्राप्त करना परमेश्वर की लंबे समय से इच्छा थी, सृजन के समय से ही वह इसे पाने की प्रतीक्षा कर रहा था। इस प्रकार, संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर द्वारा जलप्रलय के उपयोग, या मनुष्य के साथ उसकी वाचा के बावजूद, परमेश्वर की इच्छा, मनोदशा, योजना, और आशाएँ सभी वैसी की वैसी बनी रहीं। वह जो करना चाहता था, सृजन के समय के बहुत पहले से ही वह जिस चीज़ के लिए लालायित था, वह था मनुष्यजाति के बीच से उन लोगों को प्राप्त करना जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता था—लोगों का ऐसा समूह प्राप्त करना जो उसके स्वभाव को बूझ और जान पाए और उसकी इच्छा को समझ पाए, ऐसा समूह जो उसकी आराधना कर पाने में समर्थ होगा। लोगों का ऐसा समूह सच्चे अर्थ में उसकी गवाही दे पाएगा, और कहा जा सकता है कि वे उसके विश्वासपात्र होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 32

परमेश्वर अब्राहम को एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

उत्पत्ति 17:15-17 फिर परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

उत्पत्ति 17:21-22 परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता जिसे करने का परमेश्वर संकल्प लेता है

तो, तुम सब लोगों ने अभी-अभी अब्राहम की कहानी सुनी। बाढ़ से संसार के नष्ट हो जाने के बाद उसे परमेश्वर द्वारा चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, और जब वह सौ वर्ष का था और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उस तक आई। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की जिसका संकेत हमें पवित्र शास्त्र में मिलता है : "मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर द्वारा उसे पुत्र देने की प्रतिज्ञा के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्र शास्त्र यहाँ यह विवरण प्रदान करते हैं : "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, 'क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?'" दूसरे शब्दों में, यह बुज़ुर्ग दंपति इतने वृद्ध थे कि संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने उससे अपनी प्रतिज्ञा की तो उसके बाद अब्राहम ने क्या किया? वह हँसता हुआ मुँह के बल गिर पड़ा, और उसने मन ही मन कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम मानता था कि यह असंभव था—जिसका अर्थ था कि वह मानता था कि उससे की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा मज़ाक से ज्यादा कुछ नहीं थी। मनुष्य की दृष्टि से, यह मनुष्य के द्वारा अप्राप्य है, और इसी तरह परमेश्वर के द्वारा अप्राप्य और उसके लिए असंभाव्य है। कदाचित्, अब्राहम के लिए, यह हँसी की बात थी : परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी कि वह इस बात से थोड़ा अनभिज्ञ प्रतीत होता है कि इतना वृद्ध व्यक्ति संतान उत्पन्न करने में अक्षम होता है; उसे लगता है कि वह मुझे संतान उत्पन्न करने दे सकता है, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—निश्चित रूप से यह असंभव है! इसलिए, अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, यह सोचते हुए: असंभव—परमेश्वर मेरे साथ मज़ाक कर रहा है, यह सत्य नहीं हो सकता! उसने परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से नहीं लिया। इसलिए, परमेश्वर की नज़रों में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धार्मिक।) यह कहाँ कहा गया था कि वह एक धार्मिक मनुष्य था? तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर जिन्हें बुलाता है वे सब धार्मिक, और पूर्ण होते हैं, कि वे सब ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम सिद्धान्त का पालन करते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना ही चाहिए कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम धार्मिक था। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए मानक हैं। यद्यपि परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था, फिर भी उसके आचरण की दृष्टि से, अब्राहम को परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह थोड़ा अमूर्त था? या उसे अत्यधिक विश्वास था? नहीं, उसे नहीं था! उसकी हँसी और विचार दर्शाते हैं कि वह कौन था, इसलिए तुम लोगों का यह विश्वास कि वह धार्मिक था, तुम्हारी कल्पना की उपज मात्र है, यह सिद्धान्त को आँख मूँदकर लागू करना है, यह गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसके हाव-भाव देखे थे? क्या वह उनके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परंतु परमेश्वर ने जो करने का उसने संकल्प लिया था, क्या वह उसे बदल देता? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और संकल्प लिया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो यह संपन्न हो गया। मनुष्य के विचार और उसका आचरण परमेश्वर को रत्ती भर भी न तो प्रभावित करेगा, न ही कोई विघ्न डाल पायेगा; परमेश्वर अपनी योजना मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, वह मनुष्य के आचरण के कारण, यहाँ तक कि उस आचरण के कारण भी जो अज्ञानी हो सकता है, अपनी योजना को न ही बदलेगा न तो उलट-पलट करेगा। तो, उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" अब्राहम जो सोचता और कहता था, परमेश्वर ने उस पर रत्ती भर ध्यान नहीं दिया। उसके द्वारा अवहेलना करने का क्या कारण था? कारण यह था कि उस समय परमेश्वर ने यह नहीं चाहा था कि मनुष्य को अत्यधिक विश्वास हो, या वह परमेश्वर के बारे में अत्यधिक ज्ञान अर्जित करने में समर्थ हो, या, इतना ही नहीं, वह परमेश्वर द्वारा जो किया और कहा गया था, उसे समझ पाए। इस प्रकार, उसने यह नहीं माँगा कि उसने जो करने का संकल्प लिया था, या उसने जिन लोगों को चुनना निर्धारित किया था, या उसके कार्यों के सिद्धांतों को मनुष्य पूरी तरह समझे, क्योंकि मनुष्य की आध्यात्मिक कद-काठी निरी अपर्याप्त थी। उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जैसा भी उसका चाल-चलन था, उसे परमेश्वर ने सामान्य माना। उसने न निंदा की या न ही फटकार लगाई, बल्कि बस इतना कहा : "इसहाक सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा।" इन वचनों की उसकी घोषणा के बाद, परमेश्वर के लिए, यह विषय कदम-दर-कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, वह जिसे उसकी योजना के अनुसार संपन्न किया जाना था, वह पहले ही प्राप्त कर लिया गया था। इसकी व्यवस्थाएँ पूरी करने के बाद, परमेश्वर चला गया। मनुष्य जो करता या सोचता है, मनुष्य जो समझता है, मनुष्य की योजनाएँ—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है। सब कुछ परमेश्वर की योजना के अनुसार, परमेश्वर द्वारा नियत समयों और चरणों के अनुरूप आगे बढ़ता है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता या जानता है, परमेश्वर उसमें हस्तक्षेप नहीं करता है, तो भी महज़ इसलिए कि मनुष्य मानता या समझता नहीं है, वह न तो अपनी योजना को त्यागता या न ही अपने कार्य को तजता है। इस प्रकार तथ्यों को परमेश्वर की योजना और विचारों के अनुसार संपन्न किया जाता है। यह वही है जो हम बाइबल में देखते हैं : परमेश्वर ने इसहाक को उस समय जन्म लेने दिया जो उसने नियत किया था। क्या तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य के व्यवहार और आचरण ने परमेश्वर के कार्य में रुकावट डाली? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाली! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े-से विश्वास ने, और परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाओं और कल्पनाओं ने परमेश्वर के कार्य को प्रभावित किया? नहीं, उन्होंने नहीं किया! ज़रा-सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबंधन योजना किसी भी मनुष्य, विषय, या परिवेश से अप्रभावित रहती है। वह जो भी करने का संकल्प लेता है, वह सब समय पर तथा उसकी योजना के अनुसार पूर्ण और संपन्न किया जाएगा, और उसके कार्य में कोई भी मनुष्य दख़ल नहीं दे सकता है। परमेश्वर मनुष्य की नासमझी और अज्ञानता के कुछ निश्चित पहलुओं को, और यहाँ तक अपने प्रति मनुष्य के प्रतिरोध और धारणाओं के कुछ निश्चित पहलुओं को भी अनदेखा कर देता है; और चाहे कुछ भी हो वह कार्य करता है जो उसे करना ही है। यह परमेश्वर का स्वभाव है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिबिंब है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 33

अब्राहम इसहाक की बलि देता है

उत्पत्ति 22:2-3 उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्वर ने उससे की थी।

उत्पत्ति 22:9-10 जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

परमेश्वर को परवाह नहीं यदि मनुष्य नासमझ है—वह बस इतना चाहता है कि मनुष्य सच्चा हो

उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को निम्न आज्ञा दी : "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" परमेश्वर का आशय बिल्कुल स्पष्ट था : वह अब्राहम से अपने इकलौते पुत्र को, जिससे वह प्रेम करता था, होमबलि के रूप में देने के लिए कह रहा था। आज इस पर नज़र डालें, तो क्या परमेश्वर की आज्ञा अभी भी मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है? हाँ! उस समय परमेश्वर ने जो भी किया, वह सब मनुष्य की धारणाओं के बिलकुल विपरीत है; यह मनुष्य के लिए अबूझ है। अपनी धारणाओं में, लोग इन बातों पर विश्वास करते हैं : जब मनुष्य विश्वास नहीं करता था, इसे असंभाव्य मानता था, तब परमेश्वर ने उसे एक पुत्र दिया, और उसके पुत्र प्राप्त कर लेने के बाद, परमेश्वर ने उससे अपने पुत्र की बलि देने के लिए कहा। क्या यह सरासर अविश्वसनीय नहीं है! वास्तव में परमेश्वर का क्या करने का इरादा था? परमेश्वर का वास्तविक मंतव्य क्या था? उसने अब्राहम को बिना शर्त एक पुत्र दिया, मगर उसने यह भी कहा कि अब्राहम बेशर्त बलि चढ़ा दे। क्या यह बहुत अधिक था? तीसरे पक्ष के दृष्टिकोण से, यह न केवल बहुत अधिक था बल्कि कुछ-कुछ "बेवजह आफ़त पैदा करने" का मामला भी था। परंतु अब्राहम स्वयं यह नहीं मानता था कि परमेश्वर बहुत अधिक माँग रहा था। हालाँकि इसके बारे में उसकी अपनी कुछेक छोटी-मोटी राय थीं और वह परमेश्वर के प्रति थोड़ा शंकालु था, तब भी वह बलि देने के लिए तैयार था। इस बिंदु पर, तुम ऐसा क्या देखते हो जो यह सिद्ध करता हो कि अब्राहम अपने पुत्र की बलि देने के लिए तैयार था? इन वाक्यों में क्या कहा जा रहा है? मूल पाठ नीचे लिखे विवरण देता है: "अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्वर ने उससे की थी" (उत्पत्ति 22:3)। "जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे" (उत्पत्ति 22:9-10)। जब अब्राहम ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपने बेटे को मारने के लिए छुरी ली, तो क्या उसके कार्यकलाप परमेश्वर द्वारा देखे गए थे? वे देखे गए थे। समूची प्रक्रिया में—आरंभ से, जब परमेश्वर ने कहा कि अब्राहम इसहाक का बलिदान करे, उस समय तक जब अब्राहम ने अपने पुत्र का वध करने के लिए वास्तव में छुरी उठा ली—परमेश्वर ने अब्राहम का हृदय देखा, और पहले परमेश्वर के बारे में उसकी नासमझी, अज्ञानता और ग़लतफ़हमी चाहे जो रही हो, किंतु उस समय अब्राहम का हृदय परमेश्वर के प्रति सच्चा, और ईमानदार था, और वह परमेश्वर के द्वारा दिए गए पुत्र, इसहाक को सचमुच परमेश्वर को लौटाने जा रहा था। परमेश्वर ने उसमें आज्ञाकारिता देखी—ठीक वही आज्ञाकारिता जो उसने चाही थी।

मनुष्य के लिए, परमेश्वर बहुत-से ऐसे काम करता है जो अबूझ और यहाँ तक कि अविश्वसनीय भी होते हैं। जब परमेश्वर किसी को आयोजित करना चाहता है, तो यह आयोजन प्रायः मनुष्य की धारणाओं के विपरीत और उसके लिए अबूझ होता है, फिर भी ठीक यही असंगति और अबूझता ही है जो परमेश्वर द्वारा मनुष्य का परीक्षण और परीक्षा हैं। इस बीच, अब्राहम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता प्रदर्शित कर पाया, जो परमेश्वर की अपेक्षा को संतुष्ट करने में उसके समर्थ होने की सबसे आधारभूत शर्त थी। जब अब्राहम परमेश्वर की अपेक्षा को पूरा कर पाया, जब उसने इसहाक को भेंट चढ़ाया, केवल तभी परमेश्वर ने मनुष्यजाति के प्रति—अब्राहम के प्रति, जिसे उसने चुना था—सच्चे अर्थ में आश्वस्ति और स्वीकृति महसूस की। केवल तभी परमेश्वर आश्वस्त हुआ कि यह व्यक्ति जिसे उसने चुना था अपरिहार्य अगुआ है जो उसकी प्रतिज्ञा और उसके बाद की उसकी प्रबंधन योजना का उत्तरदायित्व ले सकता था। यद्यपि यह सिर्फ एक परीक्षण और परीक्षा थी, फिर भी परमेश्वर ने कृतार्थ महसूस किया, उसने अपने प्रति मनुष्य का प्रेम महसूस किया, और उसने मनुष्य की ओर से इतना सुखद महसूस किया जैसा पहले कभी नहीं किया था। अब्राहम ने इसहाक को मारने के लिए जिस क्षण अपनी छुरी उठाई, क्या परमेश्वर ने उसे रोका? परमेश्वर ने अब्राहम को इसहाक की बलि नहीं देने दी, क्योंकि इसहाक का जीवन लेने का परमेश्वर का कोई इरादा ही नहीं था। इस प्रकार, परमेश्वर ने अब्राहम को बिलकुल सही समय पर रोक दिया। परमेश्वर के लिए, अब्राहम की आज्ञाकारिता ने पहले ही परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी, उसने जो किया वह पर्याप्त था, और जो करना परमेश्वर का अभीष्ट था उसका परिणाम वह पहले ही देख चुका था। क्या यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था? कहा जा सकता है कि यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, कि यही वह था जो परमेश्वर चाहता था, और वह था जो परमेश्वर देखने को लालायित था। क्या यह सच है? यद्यपि, भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिए भिन्न-भिन्न तरीक़ों का प्रयोग करता है, किंतु अब्राहम में परमेश्वर ने वह देखा जो वह चाहता था, उसने देखा कि अब्राहम का हृदय सच्चा था, और यह कि उसकी आज्ञाकारिता बेशर्त थी। ठीक यही "बेशर्त" ही था जिसकी परमेश्वर ने आकांक्षा की थी। लोग प्रायः कहते हैं, "मैंने पहले ही यह चढ़ा दिया है, मैंने पहले ही उसका त्याग कर दिया है—फिर भी परमेश्वर मुझसे संतुष्ट क्यों नहीं है? वह मुझे परीक्षाओं के लिए विवश क्यों करता रहता है? वह मुझे परखता क्यों रहता है?" यह एक तथ्य दर्शाता है : परमेश्वर ने तुम्हारा हृदय नहीं देखा है, और तुम्हारा हृदय प्राप्त नहीं किया है। कहने का तात्पर्य है कि उसने ऐसी शुद्ध हृदयता नहीं देखी है जैसी तब देखी थी जब अब्राहम अपने ही हाथ से अपने पुत्र को मारने के लिए और परमेश्वर को भेंट चढ़ाने के लिए छुरी उठा पाया था। उसने तुम्हारी बेशर्त आज्ञाकारिता नहीं देखी है, और उसे तुम्हारे द्वारा आराम नहीं पहुँचाया गया है। ऐसे में, यह स्वाभाविक है कि परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता रहे। क्या यह सच नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 34

अब्राहम को परमेश्वर की प्रतिज्ञा

उत्पत्ति 22:16-18 "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दिए गए आशीष का पूर्ण विवरण है। छोटा होते हुए भी इसकी विषयवस्तु समृद्ध है : इसमें अब्राहम को मिले परमेश्वर के उपहार का कारण और उसकी पृष्ठभूमि शामिल है, और साथ ही वह भी जो उसने अब्राहम को दिया था। यह उस आनंद और उत्साह से ओतप्रोत है जिसके साथ परमेश्वर ने ये वचन कहे, और साथ ही साथ उसके वचनों को ध्यानपूर्वक सुन पाने वालों को शीघ्र से शीघ्र प्राप्त करने की उसकी तीव्र लालसा भी इसमें है। परमेश्वर के वचनों का आज्ञापालन और उसकी आज्ञाओं का अनुसरण करने वालों के प्रति परमेश्वर का दुलार, और उसकी दयालुता भी हम इसमें देखते हैं। इसी तरह, हम यह भी देखते हैं कि लोगों को प्राप्त करने के लिए वह क्या क़ीमत चुकाता है, और उन्हें प्राप्त करने के लिए कितनी परवाह और सोच-विचार करता है। यही नहीं, यह अंश, जिसमें "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ" वचन हैं, हमें उसकी प्रबंधन योजना के इस कार्य के परदे के पीछे, केवल और केवल परमेश्वर द्वारा सही गई कटुता और पीड़ा की शक्तिशाली समझ प्रदान करता है। यह विचारोत्तेजक अंश है, और ऐसा अंश जिसका बाद में आने वालों के लिए विशेष महत्व था, और इसने उन पर दूरगामी प्रभाव डाला था।

मनुष्य अपनी ईमानदारी और आज्ञाकारिता के कारण परमेश्वर के आशीष प्राप्त करता है

क्या परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दिया गया आशीष, जिसके बारे में हम यहाँ पढ़ते हैं, महान था? यह आखिर कितना महान था? यहाँ एक मुख्य वाक्य है : "और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी।" यह वाक्य दिखाता है कि अब्राहम को प्राप्त आशीष पहले या बाद में आने वालों में से किसी को भी नहीं दिए गए थे। परमेश्वर के द्वारा माँगे जाने पर, जब अब्राहम ने अपना इकलौता पुत्र—अपना प्रिय इकलौता पुत्र—परमेश्वर को लौटा दिया (टिप्पणी : यहाँ हम "भेंट चढ़ा दिया" शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते; हमें कहना चाहिए कि उसने अपना पुत्र परमेश्वर को लौटा दिया), तब परमेश्वर ने न केवल अब्राहम को इसहाक को भेंट नहीं चढ़ाने दिया, बल्कि उसने उसे आशीष भी दी। उसने अब्राहम को किस प्रतिज्ञा से आशीष दी? उसने उसके वंश को कई गुना बढ़ाने की प्रतिज्ञा से आशीष दी। और उन्हें कितने गुना बढ़ाया जाना था? पवित्र शास्त्र में निम्न वर्णन दिया गया है : "...आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा: और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी।" वह क्या संदर्भ था जिसमें परमेश्वर ने ये वचन कहे? कहने का तात्पर्य है कि अब्राहम ने परमेश्वर के आशीष कैसे प्राप्त किए थे? उसने उन्हें ठीक वैसे ही प्राप्त किया जैसा परमेश्वर पवित्र शास्त्र में कहता है : "क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" अर्थात्, चूँकि अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया था, क्योंकि उसने, ज़रा-सी भी शिकायत के बिना, वह सब कुछ किया जो परमेश्वर ने कहा, माँगा और आदेश दिया था, इसलिए परमेश्वर ने उससे ऐसी प्रतिज्ञा की। इस प्रतिज्ञा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य है जो उस समय परमेश्वर के विचारों का थोड़ा-सा उल्लेख करता है। क्या तुम लोगों ने यह देखा है? हो सकता है तुम लोगों ने परमेश्वर के इन वचनों पर कि "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ" ज़्यादा ध्यान न दिया हो। उनका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर ने ये वचन कहे, तब वह अपनी ही सौगंध खा रहा था। जब लोग शपथ लेते हैं तब वे किसकी सौगंध खाते हैं? वे स्वर्ग की सौगंध खाते हैं, कहने का अभिप्राय यह, वे परमेश्वर की शपथ लेते हैं और परमेश्वर की सौगंध खाते हैं। हो सकता है लोगों को उस परिघटना की ज़्यादा समझ न हो जिसमें परमेश्वर ने स्वयं अपनी शपथ ली थी, परंतु जब मैं तुम लोगों को सही व्याख्या प्रदान करूँगा तब तुम लोग समझ पाओगे। ऐसे मनुष्य से सामना होने पर, जो केवल उसके वचनों को सुन सकता था किंतु उसके हृदय को नहीं समझ सकता था, परमेश्वर ने एक बार फिर एकाकी और खोया हुआ महसूस किया। हताशा में—और, कहा जा सकता है, अवचेतनता में—परमेश्वर ने कुछ बहुत ही स्वाभाविक किया : अब्राहम से यह प्रतिज्ञा करते समय परमेश्वर ने अपना हाथ अपने हृदय पर रखा और स्वयं को संबोधित किया, और इससे मनुष्य ने परमेश्वर को कहते सुना "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" परमेश्वर के क्रियाकलापों के माध्यम से, तुम शायद स्वयं अपने बारे में सोचो। जब तुम अपना हाथ अपने हृदय पर रखते हो और अपने आप से कहते हो, तो क्या तुम्हें स्पष्ट पता होता है कि तुम क्या कह रहे हो? क्या तुम्हारा मनोभाव सच्चा है? क्या तुम अपने हृदय से खुलकर बात करते हो? इस प्रकार, हम यहाँ देखते हैं कि जब परमेश्वर ने अब्राहम से बात की, तो वह सच्चा और शुद्ध हृदय था। अब्राहम से बात करते और उसे आशीष देते समय, परमेश्वर साथ ही साथ स्वयं से भी बोल रहा था। वह स्वयं से कह रहा था : मैं अब्राहम को धन्य करूँगा, और उसकी संतति को आकाश के तारों के समान अनगिनत और समुद्र तट पर रेत के समान प्रचुर कर दूँगा, क्योंकि उसने मेरे वचनों का पालन किया है और वह वही है जिसे मैंने चुना है। जब परमेश्वर ने कहा "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," तब परमेश्वर ने संकल्प किया कि वह अब्राहम में इस्राएल के चुने हुए लोगों को उत्पन्न करेगा, जिसके बाद वह इन लोगों को अपने कार्य के साथ तेज़ गति से आगे ले जाएगा। अर्थात्, परमेश्वर अब्राहम के वंशजों से परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य धारण करवाएगा, और परमेश्वर का कार्य और वह जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया है अब्राहम के साथ आरंभ होगा और अब्राहम के वंशजों में आगे बढ़ेगा, इस प्रकार मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की इच्छा साकार होगी। क्या कहते हो तुम लोग, क्या यह धन्य चीज़ नहीं है? मनुष्य के लिए, इससे बड़ा कोई आशीष नहीं है; कहा जा सकता है कि यह सर्वाधिक धन्य चीज़ है। अब्राहम के द्वारा प्राप्त आशीष उसकी संतान का कई गुना बढ़ना नहीं था, बल्कि अब्राहम के वंशजों में परमेश्वर द्वारा अपने प्रबंधन, अपने आदेश, और अपने कार्य की प्राप्ति थी। इसका अर्थ है कि अब्राहम द्वारा प्राप्त आशीष अस्थायी नहीं थे, बल्कि परमेश्वर की प्रबंधन योजना की प्रगति के साथ आगे बढ़ते गए। जब परमेश्वर बोला, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब वह पहले ही एक संकल्प कर चुका था। क्या इस संकल्प की प्रक्रिया सच्ची थी? क्या यह वास्तविक थी? परमेश्वर ने संकल्प किया कि उससे आगे के समय से, उसके प्रयास, वह क़ीमत जो उसने चुकाई, उसका स्वरूप, उसका सब कुछ, और यहाँ तक कि उसका जीवन भी, अब्राहम को और अब्राहम के वंशजों को दिया जाएगा। इस तरह परमेश्वर ने यह भी संकल्प किया कि लोगों के इस समूह से आरंभ करते हुए, वह अपने कर्मों को प्रत्यक्ष करेगा, और मनुष्य को अपनी बुद्धि, अधिकार और सामर्थ्य देखने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 35

अब्राहम को परमेश्वर की प्रतिज्ञा

उत्पत्ति 22:16-18 "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

जो परमेश्वर को जानते हैं और उसकी गवाही दे पाते हैं उन्हें प्राप्त करना परमेश्वर की अपरिवर्ती इच्छा है

परमेश्वर जब स्वयं से बात कर रहा था, उसी समय उसने अब्राहम से भी बात की, परंतु परमेश्वर ने उसे जो आशीष दिए उन्हें सुनने के अलावा, क्या अब्राहम उस पल परमेश्वर के सभी वचनों में निहित उसकी सच्ची अभिलाषाओं को समझ पाया था? वह नहीं समझ पाया था! और इसलिए, उस पल, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब भी परमेश्वर का हृदय एकाकी और दुःखी था। अभी भी एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यह समझ या बूझ पाता कि उसका अभीष्ट और उसकी योजना क्या थी। उस क्षण, कोई भी व्यक्ति—अब्राहम सहित—विश्वासपूर्वक परमेश्वर से बात नहीं कर पाता था, उसे जो कार्य करना ही था उसमें उसके साथ सहयोग तो और भी कोई नहीं कर पाता था। सतह पर, परमेश्वर ने अब्राहम को प्राप्त कर लिया था, एक ऐसे व्यक्ति को जो उसके वचनों का पालन कर सकता था। परंतु वास्तव में, परमेश्वर के बारे में इस व्यक्ति का ज्ञान मुश्किल से ही शून्य से अधिक था। परमेश्वर ने अब्राहम को भले ही धन्य कर दिया था, किंतु परमेश्वर का हृदय अब भी संतुष्ट नहीं था। इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर संतुष्ट नहीं था? इसका अर्थ है कि उसका प्रबंधन अभी बस आरंभ ही हुआ था, इसका अर्थ है कि वे लोग जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता था, लोग जिन्हें वह देखने को लालायित था, लोग जिनसे वह प्रेम करता था, वे लोग अभी भी उससे दूर थे; उसे समय की आवश्यकता थी, उसे प्रतीक्षा करने की आवश्यकता थी, और उसे धैर्यवान होने की आवश्यकता थी। क्योंकि उस समय, स्वयं परमेश्वर के अलावा, कोई नहीं था जो जानता हो कि उसे क्या चाहिए था, या वह क्या प्राप्त करना चाहता था, या वह किसके लिए लालायित था। इसलिए, अत्यधिक उत्साहित महसूस करने के साथ-साथ, परमेश्वर ने हृदय में भारी बोझ भी महसूस किया। फिर भी उसने अपने क़दम नहीं रोके, और उसे जो करना ही था उसके अगले चरण की योजना बनाना उसने जारी रखा।

अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर ने अब्राहम को महान आशीष सिर्फ इसलिए प्रदान किए क्योंकि उसने परमेश्वर के वचनों का पालन किया था। यद्यपि, ऊपर से, यह सामान्य और अपेक्षित प्रतीत होता है, फिर भी इसमें हम परमेश्वर का हृदय देखते हैं : परमेश्वर अपने प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता को विशेष रूप से सहेजकर रखता है, और अपने बारे में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता उसे अच्छी लगती है। यह शुद्ध हृदयता परमेश्वर को कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग शायद समझ न सको कि उसे यह कितनी अच्छी लगती है, और शायद ऐसा कोई भी न हो जिसे इसका अहसास हो। परमेश्वर ने अब्राहम को पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, तो परमेश्वर ने अब्राहम से अपना पुत्र परमेश्वर को भेंट चढ़ाने के लिए कहा। अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी शुद्ध हृदयता ने परमेश्वर को द्रवित कर दिया और परमेश्वर ने उसे सहेजकर रखा। परमेश्वर ने इसे कितना सहेजकर रखा? और उसने इसे क्यों सहेजकर रखा? ऐसे समय जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को बूझा या उसके हृदय को समझा नहीं था, अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिसने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कँपा दिया, तथा इसने परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का भाव महसूस कराया, और यह परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का आनंद लाया जो उसके वचनों का पालन करने में समर्थ था। यह संतुष्टि और आनंद परमेश्वर द्वारा अपने हाथ से सृजित किए गए प्राणी से आया, और जब से मनुष्य का सृजन किया गया था, तब से यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को चढ़ाया था और जिसे परमेश्वर ने सर्वाधिक सहेजकर रखा था। इस बलिदान की प्रतीक्षा करते हुए परमेश्वर ने बहुत कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे उस मनुष्य की ओर से दिए गए पहले सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपहार के रूप में लिया जिसे उसने सृजित किया था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उसकी चुकाई क़ीमत का पहला फल दिखाया, और उसे मनुष्यजाति में आशा देखने की गुंजाइश दी। इसके बाद, परमेश्वर को ऐसे लोगों के समूह की और अधिक लालसा हुई जो उसका साथ दें, उसके साथ शुद्ध हृदयता से व्यवहार करें, और शुद्ध हृदयता के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यह तक आशा की कि अब्राहम निरंतर जीवित रहेगा, क्योंकि वह चाहता था कि जब वह अपने प्रबंधन को आगे बढ़ाए तब अब्राहम जैसा एक हृदय उसका साथ दे और उसके साथ रहे। परमेश्वर चाहे जो भी चाहता था, यह मात्र एक इच्छा, मात्र एक विचार था—क्योंकि अब्राहम मात्र एक मनुष्य था जो उसका आज्ञापालन करने में समर्थ था और उसे परमेश्वर की थोड़ी-सी भी समझ या ज्ञान नहीं था। अब्राहम ऐसा व्यक्ति था जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से बहुत कम पड़ता था, जो ये हैं : परमेश्वर को जानना, परमेश्वर की गवाही दे पाना, और परमेश्वर के साथ एक मन होना। इसलिए, अब्राहम परमेश्वर के साथ नहीं चल सकता था। अब्राहम द्वारा इसहाक की भेंट चढ़ाने में, परमेश्वर ने अब्राहम की शुद्ध हृदयता और आज्ञाकारिता देखी, और देखा कि उसने परमेश्वर द्वारा ली गई अपनी परीक्षा का सामना किया था। परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता और शुद्ध हृदयता को भले ही स्वीकार कर लिया था, किंतु वह अब भी परमेश्वर का विश्वासपात्र बनने, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर को जानता और समझता हो, और ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जानकार हो बनने के अयोग्य था; वह परमेश्वर के साथ एक मन होने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से बहुत दूर था। इसलिए, परमेश्वर अपने हृदय में अब भी एकाकी और उद्विग्न था। परमेश्वर जितना अधिक एकाकी और उद्विग्न होता गया, उतना ही अधिक उसे अपने प्रबंधन को यथाशीघ्र आगे बढ़ाने की, और अपनी प्रबंधन योजना संपन्न करने और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए यथाशीघ्र लोगों का एक समूह चुनने और प्राप्त करने की आवश्यकता थी। यह परमेश्वर की उत्कट अभिलाषा थी, और यह बिल्कुल आरंभ से लेकर आज तक अपरिवर्ती बनी रही है। आरंभ में जब से उसने मनुष्य का सृजन किया, तभी से परमेश्वर विजय पाने वालों के एक समूह के लिए तरसा है, ऐसा समूह जो उसके साथ चलेगा और जो उसका स्वभाव समझने, जानने और बूझने में समर्थ होगा। परमेश्वर की यह इच्छा कभी नहीं बदली है। उसे अब भी चाहे जितना लंबा इंतज़ार करना पड़े, आगे का रास्ता चाहे जितना कठिन हो, जिन उद्देश्यों के लिए वह तरसा है वे चाहे जितने दूर हों, परमेश्वर ने मनुष्य के प्रति अपनी अपेक्षाओं को कभी बदला या त्यागा नहीं है। अब जब मैंने यह कहा है, तो क्या तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा का कुछ अहसास हुआ है? तुम्हें जो अहसास हुआ है, शायद वह बहुत गहरा नहीं है—किंतु धीरे-धीरे यह आएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 36

परमेश्वर को सदोम का विनाश करना ही होगा

उत्पत्ति 18:26 यहोवा ने कहा, "यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।"

उत्पत्ति 18:29 फिर उसने उससे यह भी कहा, "कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:30 फिर उसने कहा, "कदाचित् वहाँ तीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:31 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें बीस मिलें।" उसने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:32 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं उसका नाश न करूँगा।"

परमेश्वर केवल उनकी परवाह करता है जो उसके वचनों का पालन और उसकी आज्ञाओं का अनुसरण कर पाते हैं

ऊपर दिए गए अंशों में अनेक मुख्य शब्द समाविष्ट हैं : संख्याएँ। पहला, यहोवा ने कहा कि यदि उसे नगर के भीतर पचास धार्मिक मिल गए, तो वह उस समस्त स्थान को छोड़ देगा, अर्थात्, वह नगर को नष्ट नहीं करेगा। तो क्या वहाँ, सदोम के भीतर, वास्तव में पचास धार्मिक थे? नहीं थे। इसके तुरंत बाद, अब्राहम ने परमेश्वर से क्या कहा? उसने कहा, कदाचित वहाँ चालीस मिले तो? और परमेश्वर ने कहा, मैं नष्ट नहीं करूँगा। इसके बाद, अब्राहम ने कहा, कदाचित वहाँ तीस मिले तो? परमेश्वर ने कहा, मैं नष्ट नहीं करूँगा। यदि वहाँ बीस मिले तो? मैं नष्ट नहीं करूँगा। दस मिले तो? मैं नष्ट नहीं करूँगा। क्या वहाँ नगर के भीतर, वास्तव में, दस धार्मिक थे? वहाँ दस भी नहीं थे—बल्कि एक ही था। और यह एक कौन था? यह लूत था। उस समय, सदोम में मात्र एक ही धार्मिक व्यक्ति था, परंतु जब बात इस संख्या की आई तो क्या परमेश्वर बहुत कठोर था या बलपूर्वक ठीक इतने की ही माँग कर रहा था? नहीं, वह नहीं था। और इसलिए, जब मनुष्य पूछता रहा, "चालीस हों तो क्या?" "तीस हों तो क्या?" जब तक वह "दस हों तो क्या?" पर नहीं पहुँच गया, तब परमेश्वर ने कहा, "यदि वहाँ मात्र दस भी हुए तो मैं नगर को नष्ट नहीं करूँगा; मैं उसे छोड़ दूँगा, और इन दस के अलावा अन्य लोगों को भी माफ़ कर दूँगा"। यदि मात्र दस भी होते, तो यह भी काफी दयनीय रहा होता, परंतु पता यह चला कि, सदोम में, वास्तव में, उतनी संख्या में भी धार्मिक लोग नहीं थे। तो, तुम देखो, कि परमेश्वर की नज़रों में, नगर के लोगों का पाप और दुष्टता ऐसी थी कि परमेश्वर के पास उन्हें नष्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। परमेश्वर ने जब कहा कि यदि पचास धार्मिक हुए तो वह नगर को नष्ट नहीं करेगा तब उसका क्या अभिप्राय था? परमेश्वर के लिए ये संख्याएँ महत्वपूर्ण नहीं थीं। महत्वपूर्ण यह था कि नगर में ऐसे धार्मिक थे या नहीं जैसे वह चाहता था। यदि नगर में मात्र एक धार्मिक व्यक्ति होता, तो परमेश्वर नगर के अपने विनाश के कारण उन्हें हानि नहीं पहुँचने देता। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर चाहे उस नगर को नष्ट करने जा रहा था या नहीं, और उसके भीतर चाहे जितने धार्मिक थे, परमेश्वर के लिए यह पापी नगर श्रापित और घृणित था, और इसे नष्ट कर दिया जाना चाहिए था, इसे परमेश्वर की आँखों से ओझल हो जाना चाहिए था, जबकि धार्मिकों को बने रहना चाहिए था। युग चाहे जो भी हो, मनुष्यजाति के विकास की अवस्था चाहे जो हो, परमेश्वर की प्रवृत्ति नहीं बदलती है : वह बुराई से घृणा करता है, और उसकी नज़रों में जो धार्मिक हैं उनकी परवाह करता है। परमेश्वर की यह सुस्पष्ट प्रवृत्ति परमेश्वर के सार का सच्चा प्रकाशन भी है। चूँकि नगर के भीतर मात्र एक धार्मिक व्यक्ति था, इसलिए परमेश्वर अब और नहीं हिचकिचाया। अंतिम परिणाम यह था कि सदोम को अनिवार्यतः नष्ट कर दिया जाता। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? उस युग में, यदि एक नगर में पचास धार्मिक होते तो परमेश्वर उसे नष्ट नहीं करता, यदि दस होते तब भी नहीं करता, जिसका अर्थ है कि कुछेक लोगों के कारण जो उसके प्रति श्रद्धा रख पाते और उसकी आराधना कर पाते हैं, परमेश्वर मनुष्यजाति को क्षमा करने और उसके प्रति सहिष्णु होने का निर्णय लेता, या मार्गदर्शन का कार्य करता। परमेश्वर मनुष्य के धार्मिक कर्मों में बड़ा विश्वास करता है, वह उन लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसकी आराधना कर पाते हैं, और वह उन लोगों में बड़ा विश्वास करता है जो उसके समक्ष अच्छे कर्म कर पाते हैं।

प्राचीनतम काल से लेकर आज तक, क्या तुम लोगों ने बाइबल में कभी भी किसी भी व्यक्ति से सत्य का संवाद करते, या परमेश्वर के मार्ग के बारे में बात करते परमेश्वर के बारे में पढ़ा है? नहीं, कभी नहीं। मनुष्य के लिए परमेश्वर के जिन वचनों के बारे में हम पढ़ते हैं, उन्होंने लोगों को केवल यह बताया कि क्या करना है। कुछ लोगों ने उसे किया, कुछ ने नहीं किया; कुछ ने विश्वास किया, और कुछ ने नहीं किया। बस कुल इतना ही था। इस प्रकार, उस युग के धार्मिक लोग—वे जो परमेश्वर की नज़रों में धार्मिक थे—मात्र वे लोग थे जो परमेश्वर के वचन सुन सकते थे और परमेश्वर की आज्ञाओं का अनुसरण कर सकते थे। वे सेवक थे जिन्होंने मनुष्यों के बीच परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित किया था। क्या ऐसे लोगों को परमेश्वर को जानने वाला कहा जा सकता था? क्या उन्हें ऐसे लोग कहा जा सकता था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया गया था? नहीं, उन्हें नहीं कहा जा सकता था। इसलिए, उनकी संख्या चाहे जितनी हो, परमेश्वर की नज़रों में ये धार्मिक लोग क्या परमेश्वर के विश्वासपात्र कहलाने योग्य थे? क्या उन्हें परमेश्वर के गवाह कहा जा सकता था? निश्चित रूप से नहीं! वे परमेश्वर के विश्वासपात्र और गवाह कहलाने के योग्य निश्चित रूप से नहीं थे। तो परमेश्वर ने ऐसे लोगों को क्या कहकर पुकारा? बाइबल में, पवित्र शास्त्र के उन अंशों तक जिन्हें हमने अभी-अभी पढ़ा है, परमेश्वर द्वारा उन्हें "मेरा सेवक" कहकर पुकारने के कई दृष्टांत हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय, परमेश्वर की नज़रों में ये धार्मिक लोग परमेश्वर के सेवक थे, ये वे लोग थे जो पृथ्वी पर उसकी सेवा करते थे। और परमेश्वर ने इस विशिष्ट पदवी के बारे में कैसे सोचा? उसने उन्हें ऐसे क्यों पुकारा? परमेश्वर लोगों को जिन विशिष्ट पदवियों से पुकारता है, उनके लिए क्या उसके पास अपने हृदय में कोई मानक हैं? उसके पास निश्चित रूप से हैं। वह लोगों को चाहे धार्मिक, पूर्ण, सच्चा, या सेवक कहे, परमेश्वर के पास मानक हैं। जब वह किसी को अपना सेवक कहकर पुकारता है, तब उसे दृढ़ विश्वास होता है कि यह व्यक्ति उसके संदेशवाहकों की अगवानी करने में समर्थ है, उसके आदेशों का पालन करने में समर्थ है, और उसे कार्यान्वित करने में समर्थ है जिसका आदेश संदेशवाहकों द्वारा दिया जाता है। यह व्यक्ति क्या कार्यान्वित करता है? वे वह कार्यान्वित करते हैं जो परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्य को करने और कार्यान्वित करने का आदेश देता है। उस समय, परमेश्वर ने मनुष्य को पृथ्वी पर जो करने और कार्यान्वित करने के लिए कहा, क्या उसे परमेश्वर का मार्ग कहा जा सकता था? नहीं, इसे नहीं कहा जा सकता था। क्योंकि उस समय, परमेश्वर ने उस मनुष्य से केवल कुछ सीधी-सरल चीज़ें करने के लिए कहा; उसने मनुष्य को यह या वह करने के लिए कहते हुए, कुछेक सीधे-सरल आदेश बोले, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। परमेश्वर अपनी योजना के अनुसार कार्य कर रहा था। चूँकि उस समय, बहुत-सी परिस्थितियाँ अभी विद्यमान नहीं थीं, समय अभी परिपक्व नहीं था, और मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्ग को धारण कर पाना कठिन था, इसलिए परमेश्वर के मार्ग को परमेश्वर के हृदय से बाहर निकलना अभी आरंभ करना था। परमेश्वर ने उन धार्मिक लोगों को देखा जिनके बारे में उसने बात की थी, जिन्हें हम यहाँ—चाहे तीस हों या बीस—उसके सेवकों के रूप में देखते हैं। जब परमेश्वर के संदेशवाहक इन सेवकों को अचानक मिल गए, तब वे उनकी अगवानी कर पाए, और उनके आदेशों का पालन कर पाए, और उनके वचनों के अनुसार कार्य कर पाए। यह ठीक वही था जिसे उनके द्वारा जो परमेश्वर की नज़रों में सेवक थे किया और प्राप्त किया जाना चाहिए था। लोगों को अपनी पदवियाँ देने में परमेश्वर न्यायसंगत है। उसने उन्हें अपना सेवक कहकर पुकारा तो इसलिए नहीं क्योंकि वे वैसे थे जैसे अब तुम लोग हो—क्योंकि उन्होंने काफी उपदेश सुने थे, जानते थे कि परमेश्वर को क्या करना था, परमेश्वर की बहुत-कुछ इच्छा समझते थे, और उसकी प्रबंधन योजना को बूझते थे—बल्कि इसलिए कि वे अपनी मानवता में ईमानदार थे और वे परमेश्वर के वचनों का अनुपालन करने में समर्थ थे; जब परमेश्वर ने उन्हें आदेश दिया, तब वे जो कर रहे थे उसे एक तरफ़ रखने और परमेश्वर ने जो आदेश दिया था उसे कार्यान्वित करने में समर्थ थे। तो, परमेश्वर के लिए, सेवक की उपाधि में अर्थ की दूसरी परत यह है कि उन्होंने पृथ्वी पर उसके कार्य के साथ सहयोग किया, और यद्यपि वे परमेश्वर के संदेशवाहक नहीं थे, फिर भी वे पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों के निर्वाहक और क्रियान्वयक थे। तो, तुम देखो कि ये सेवक या धार्मिक लोग परमेश्वर के हृदय में बहुत महत्व रखते थे। परमेश्वर को पृथ्वी पर जिस कार्य की शुरुआत करनी थी, वह उसके साथ लोगों के सहयोग के बिना पूरा नहीं हो सकता था, और परमेश्वर के सेवकों ने जो भूमिका अपने ऊपर ली थी, उसमें उनका स्थान परमेश्वर के संदेशवाहकों द्वारा ले पाना असंभव था। प्रत्येक कार्य जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने इन सेवकों को दी थी उसके लिए अत्यधिक महत्व का था, और इसलिए वह उन्हें गँवा नहीं सकता था। परमेश्वर के साथ इन सेवकों के सहयोग के बिना, मनुष्यजाति के बीच उसका कार्य ठप पड़ गया होता, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर की प्रबंधन योजना और परमेश्वर की आशाएँ चूर-चूर हो गई होतीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 37

परमेश्वर को सदोम का विनाश करना ही होगा

उत्पत्ति 18:26 यहोवा ने कहा, "यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।"

उत्पत्ति 18:29 फिर उसने उससे यह भी कहा, "कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:30 फिर उसने कहा, "कदाचित् वहाँ तीस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं ऐसा न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:31 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें बीस मिलें।" उसने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।"

उत्पत्ति 18:32 फिर उसने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें।" उसने कहा, "तो भी मैं उसका नाश न करूँगा।"

परमेश्वर जिनकी परवाह करता है उनके प्रति अत्यधिक दयावान, और जिनसे घृणा करता और ठुकराता है उनके प्रति प्रचंड कोपपूर्ण होता है

बाइबल के वर्णनों में, क्या सदोम में परमेश्वर के दस सेवक थे? नहीं, नहीं थे! क्या वह नगर परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिए जाने योग्य था? नगर में केवल एक व्यक्ति—लूत—ने परमेश्वर के संदेशवाहकों की अगवानी की थी। इसका निहितार्थ यह है कि उस नगर में परमेश्वर का केवल एक ही सेवक था, और इसलिए परमेश्वर के पास लूत को बचाने और सदोम नगर को नष्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अब्राहम और परमेश्वर के बीच ऊपर उद्धृत संवाद सीधे-सादे लग सकते हैं, किंतु वे कुछ बहुत गहरी बात का चित्रण करते हैं : परमेश्वर के कार्यकलापों के अपने सिद्धांत हैं, और निर्णय लेने से पहले वह अवलोकन और सोच-विचार करते हुए लंबा समय बिताएगा; वह निश्चित रूप से सही समय आने से पहले कोई निर्णय नहीं लेगा या हड़बड़ी में किन्हीं निष्कर्षों पर नहीं पहुँचेगा। अब्राहम और परमेश्वर के बीच के संवाद हमें दिखाते हैं कि सदोम को नष्ट करने का परमेश्वर का निर्णय रत्ती भर भी ग़लत नहीं था, क्योंकि परमेश्वर पहले से जानता था कि उस नगर में चालीस धार्मिक नहीं थे, न तीस धार्मिक थे, न ही बीस थे। दस भी नहीं थे। उस नगर में एकमात्र धार्मिक व्यक्ति लूत था। परमेश्वर ने सदोम में जो हुआ उस सबका और उसकी परिस्थितियों का अवलोकन किया था, और वे परमेश्वर की उतनी ही जानी-पहचानी थीं जितनी उसके अपने हाथ की हथेली जानी-पहचानी थी। इस प्रकार, उसका निर्णय ग़लत नहीं हो सकता था। इसके विपरीत, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की तुलना में, मनुष्य इतना अधिक संवेदनशून्य, इतना अधिक नासमझ और अज्ञानी, और इतना अधिक अदूरदर्शी है। यह वही बात है जो हम अब्राहम और परमेश्वर के बीच के संवादों में देखते हैं। परमेश्वर आरंभ से लेकर आज तक अपना स्वभाव प्रकट करता रहा है। उसी प्रकार, यहाँ भी परमेश्वर का स्वभाव है जिसे हमें देखना चाहिए। संख्याएँ तो सीधी-सरल होती हैं—वे कुछ प्रदर्शित नहीं करतीं—किंतु यहाँ परमेश्वर के स्वभाव की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। परमेश्वर पचास धार्मिकों की वजह से नगर को नष्ट नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की अनुकंपा के कारण है? क्या यह उसके प्रेम और सहिष्णुता के कारण है? क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव का यह पहलू देखा है? यदि वहाँ मात्र दस धार्मिक भी होते, इन दस धार्मिक लोगों के कारण, परमेश्वर ने नगर को नष्ट नहीं किया होता। यह परमेश्वर की सहिष्णुता और प्रेम है या नहीं है? उन धार्मिक लोगों के प्रति परमेश्वर की अनुकंपा, सहिष्णुता और सरोकार के कारण, उसने वह नगर नष्ट नहीं किया होता। यही परमेश्वर की सहिष्णुता है। और अंत में, क्या परिणाम हम देखते हैं? जब अब्राहम ने कहा, "कदाचित् उसमें दस मिलें," तब परमेश्वर ने कहा, "मैं उसका नाश न करूँगा।" उसके बाद, अब्राहम ने और कुछ नहीं कहा—क्योंकि सदोम के भीतर ऐसे दस धार्मिक नहीं थे जिनका उसने उल्लेख किया था, और उसके पास कहने के लिए और कुछ नहीं था, और उस समय उसने समझा कि परमेश्वर ने सदोम को नष्ट करने का संकल्प क्यों किया था। इसमें, तुम लोग परमेश्वर का क्या स्वभाव देखते हो? परमेश्वर ने किस प्रकार का संकल्प किया था? परमेश्वर ने संकल्प किया था कि यदि इस नगर में दस धार्मिक नहीं हुए, तो वह इसके अस्तित्व की अनुमति नहीं देगा, और अनिवार्यतः उसे नष्ट कर देगा। क्या यह परमेश्वर का कोप नहीं है? क्या यह कोप परमेश्वर का स्वभाव निरूपित करता है? क्या यह स्वभाव परमेश्वर के पवित्र सार का प्रकाशन है? क्या यह परमेश्वर के धार्मिक सार का प्रकाशन है, जिसका मनुष्य को उल्लंघन नहीं ही करना चाहिए? पुष्टि हो जाने के बाद कि सदोम में दस धार्मिक नहीं थे, यह निश्चित था कि परमेश्वर नगर को नष्ट करेगा, और उस नगर के भीतर रह रहे लोगों को कठोरता से दण्ड देगा, क्योंकि वे परमेश्वर का विरोध करते थे, और क्योंकि वे बहुत ही गंदे और भ्रष्ट थे।

हमने इन अंशों का इस तरह विश्लेषण क्यों किया है? इसलिए कि ये कुछ सीधे-सादे वाक्य परमेश्वर के अतिशय दयावान और प्रचंड कोपपूर्ण स्वभाव को पूर्ण अभिव्यक्ति देते हैं। धार्मिकों को सँजोने, और उन पर अनुकंपा करने, उन्हें सहने, और उनकी देखभाल करने के साथ ही साथ, परमेश्वर के हृदय में सदोम के उन सभी लोगों के लिए प्रगाढ़ घृणा थी जो भ्रष्ट कर दिए गए थे। यह अतिशय दया और गहरा कोप था, या नहीं था? परमेश्वर ने किन साधनों से नगर को नष्ट किया? आग से। और उसने आग से उसे नष्ट क्यों किया? जब तुम किसी चीज़ को आग से जलाए जाते देखते हो, या जब तुम किसी चीज़ को बस जलाने ही वाले होते हो, तब उसके प्रति तुम्हारी भावनाएँ क्या होती हैं? तुम इसे क्यों जलाना चाहते हो? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हें इसकी अब और आवश्यकता नहीं रही, कि तुम इसे अब और देखना नहीं चाहते हो? क्या तुम इसे तज देना चाहते हो? परमेश्वर के द्वारा आग के उपयोग का अर्थ है तज देना, और घृणा, और यह कि वह सदोम को अब और देखना नहीं चाहता था। यही वह भावना थी जिसने परमेश्वर से आग का उपयोग करके सदोम को मटियामेट करवाया। आग का उपयोग दर्शाता है कि परमेश्वर कितना अधिक क्रोधित था। परमेश्वर की अनुकंपा और सहिष्णुता तो सचमुच हैं ही, किंतु जब वह अपने कोप का बाँध खोलता है तब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो अपमान सहन नहीं करता। जब मनुष्य परमेश्वर के आदेशों का पालन करने में पूर्णतः सक्षम होता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तब मनुष्य के प्रति परमेश्वर अपनी अनुकंपा से भरपूर होता है; जब मनुष्य भ्रष्टता, उसके प्रति घृणा और शत्रुता से भर जाता है, तब परमेश्वर अत्यधिक क्रोधित होता है। किस सीमा तक वह अत्यधिक क्रोधित होता है? उसका कोप तब तक बना रहेगा जब तक वह मनुष्य का प्रतिरोध और दुष्ट कर्म अब और नहीं देखता है, जब तक वे उसकी नज़रों के सामने अब और नहीं होते हैं। तब कहीं जाकर परमेश्वर का क्रोध ग़ायब होगा। दूसरे शब्दों में, चाहे जो व्यक्ति हो, यदि उसका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है और परमेश्वर से विमुख हो गया है, कभी न लौटने के लिए, तब फिर वे अपने शरीर में या अपनी सोच में, सभी प्रकटनों के लिए या अपनी व्यक्तिपरक अभिलाषाओं की दृष्टि से, परमेश्वर की चाहे जितनी आराधना, अनुसरण और आज्ञापालन करना चाहते हों, परमेश्वर के कोप का बाँध टूट जाएगा और रुकेगा नहीं। यह ऐसे होगा कि मनुष्य को प्रचुर अवसर देने के बाद, जब परमेश्वर प्रचंड वेग से अपने कोप का बाँध खोलता है, एक बार जब इसे खोल दिया जाएगा, तब इसे वापस लेने का कोई रास्ता न होगा, और ऐसी मनुष्यजाति के प्रति वह फिर कभी दयावान और सहिष्णु नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का एक पक्ष है जो अपमान सहन नहीं करता है। यहाँ, लोगों को यह सामान्य प्रतीत होता है कि परमेश्वर एक नगर को इसलिए नष्ट कर देता क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, पाप से भरा हुआ एक नगर विद्यमान और अनवरत बना नहीं रह सकता था, और यह तर्कसंगत ही था कि इसे परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दिया जाना चाहिए। फिर भी परमेश्वर के द्वारा सदोम के विनाश के पहले और उसके बाद जो घटित हुआ, उसमें हम परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता देखते हैं। वह उन चीज़ों के प्रति सहिष्णु और दयावान है जो कृपालु, सुंदर और भली हैं; जो चीज़ें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह प्रचंड रूप से कोपपूर्ण है, इतना कि उसका कोप रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो सर्वोपरि और सबसे प्रमुख पहलू हैं, और, इतना ही नहीं, इन्हें परमेश्वर ने आरंभ से लेकर अंत तक प्रकट किया है : प्रचुर दया और प्रचंड कोप। तुम लोगों में से अधिकतर परमेश्वर की दया का कुछ न कुछ अनुभव कर चुके हो, किंतु तुममें से बहुत कम लोगों ने परमेश्वर का कोप पूर्णतः पहचाना है। परमेश्वर की अनुकंपा और प्रेममय दयालुता प्रत्येक व्यक्ति में देखी जा सकती है; अर्थात्, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति अतिशय दयावान रहा है। फिर भी परमेश्वर तुम लोगों के बीच किसी व्यक्ति पर या किसी जनसमूह के प्रति अत्यंत दुर्लभ ही—या, कहा जा सकता है, कभी नहीं—प्रचंड रूप से क्रोधित रहा है। इत्मीनान रखो! परमेश्वर का कोप कभी न कभी प्रत्येक व्यक्ति द्वारा देखा और अनुभव किया जाएगा, किंतु अभी वह समय नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जब परमेश्वर किसी से लगातार क्रोधित होता है, अर्थात्, जब वह उसके ऊपर अपने प्रचंड कोप का बाँध खोल देता है, तो इसका अर्थ है कि वह उस व्यक्ति से लंबे समय से घृणा करता और उसे ठुकराता आया है, कि वह उसके अस्तित्व से जुगुप्सा करता है, और वह उनके अस्तित्व को सहन नहीं कर सकता है; ज्यों ही उसका क्रोध उन पर टूटेगा, वे विलुप्त हो जाएँगे। आज, परमेश्वर का कार्य अभी उस बिंदु पर नहीं पहुँचा है। एक बार परमेश्वर प्रचंड रूप से क्रोधित हो जाए तो तुम लोगों में से कोई भी उसे सहन नहीं कर पाएगा। तो, तुम देखो, इस समय परमेश्वर तुम सब लोगों के प्रति अतिशय दयावान है, और तुम लोगों ने अभी उसका प्रचंड क्रोध देखा नहीं है। यदि ऐसे लोग हैं जो मानने को तैयार नहीं हैं, तो तुम उनसे कह सकते हो कि परमेश्वर का कोप तुम्हारे ऊपर टूटे, ताकि तुम अनुभव कर सको कि परमेश्वर का क्रोध और उसका वह स्वभाव जो मनुष्य से कोई अपमान सहन नहीं करता वास्तव में अस्तित्वमान है या नहीं। करते हो तुम लोग हिम्मत?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 38

अंत के दिनों के लोग परमेश्वर का कोप केवल उसके वचनों में देखते हैं, और सच में अनुभव नहीं करते परमेश्वर का कोप

सृजन के समय से लेकर आज तक, किसी भी समूह ने परमेश्वर के अनुग्रह या दया और प्रेममय दयालुता का उतना आनंद नहीं लिया है जितना इस अंतिम समूह ने लिया है। यद्यपि, अंतिम चरण में, परमेश्वर ने न्याय और ताड़ना का कार्य किया है, और अपना कार्य प्रताप और कोप के साथ किया है, तो भी अधिकांश बार परमेश्वर अपना कार्य संपन्न करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है; वह सिखाने और सींचने, भरण-पोषण और भोजन के लिए वचनों का उपयोग करता है। इस बीच, परमेश्वर के कोप को हमेशा छिपाकर रखा गया है, और परमेश्वर के वचनों में उसके कोपपूर्ण स्वभाव का अनुभव करने के अलावा, बहुत ही कम लोगों ने व्यक्तिगत रूप से उसके क्रोध का अनुभव किया है। कहने का तात्पर्य है, न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि परमेश्वर के वचनों में प्रकट किया गया कोप लोगों को परमेश्वर की महिमा और अपमान के प्रति उसकी असहिष्णुता अनुभव करने देता है, फिर भी यह कोप उसके वचनों से आगे नहीं जाता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर मनुष्य को झिड़कने, मनुष्य को उजागर करने, मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ना देने, और यहाँ तक कि मनुष्य की निंदा करने के लिए भी वचनों का उपयोग करता है—परंतु परमेश्वर अभी तक मनुष्य के प्रति प्रचंड रूप से क्रोधित नहीं हुआ है, और अपने वचनों के साथ के अलावा उसने अपने कोप का बाँध मनुष्य पर मुश्किल से ही खोला है। इस प्रकार, मनुष्य के द्वारा इस युग में अनुभव की गई परमेश्वर की अनुकंपा और प्रेममय दयालुता परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन है, जबकि मनुष्य के द्वारा अनुभव किया गया परमेश्वर का कोप महज़ उसके कथनों के स्वर और भाव का प्रभाव है। बहुत-से लोग इस प्रभाव को ग़लत ढंग से परमेश्वर के कोप का सच्चा अनुभव करना और सच्चा ज्ञान मान लेते हैं। परिणामस्वरूप, अधिकतर लोग मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों में उसकी अनुकंपा और प्रेममय दयालुता को देखा है, कि उन्होंने मनुष्य द्वारा अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता को भी देखा है, और उनमें से अधिकांश लोग तो मनुष्य के प्रति परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की सराहना भी करने लगे हैं। परंतु मनुष्य का व्यवहार चाहे जितना बुरा हो, या उसका स्वभाव चाहे जितना भ्रष्ट हो, परमेश्वर ने हमेशा सहन किया है। सहन करने में, उसका उद्देश्य इस बात की प्रतीक्षा करना है कि जो वचन उसने कहे हैं, जो प्रयास उसने किए हैं और जो क़ीमत उसने चुकाई है, वे उन लोगों में जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है, सफलतापूर्वक निष्कर्ष पर पहुँच सकें। ऐसे एक परिणाम की प्रतीक्षा करने में समय लगता है, और मनुष्य के लिए भिन्न-भिन्न परिवेशों का सृजन करने की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे लोग जन्म लेते ही वयस्क नहीं हो जाते हैं; इसमें अट्ठारह या उन्नीस वर्ष लग जाते हैं, और कुछ लोगों को तो बीस या तीस वर्ष लग जाते हैं तब कहीं जाकर वे वास्तविक वयस्क के रूप में परिपक्व होते हैं। परमेश्वर इस प्रक्रिया के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करता है, वह ऐसा समय आने की प्रतीक्षा करता है, और वह इस परिणाम के आगमन की प्रतीक्षा करता है। और उस पूरे समय जब वह प्रतीक्षा करता है, परमेश्वर अतिशय रूप से दयावान होता है। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की अवधि के दौरान, परमेश्वर के प्रति घोर विरोध के कारण बहुत ही छोटी संख्या में लोगों को मार गिराया जाता है, और कुछ को दण्डित किया जाता है। ऐसे उदाहरण परमेश्वर के उस स्वभाव के और भी अधिक बड़े प्रमाण हैं जो मनुष्य के द्वारा अपमान बर्दाश्त नहीं करता है, और चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर की सहिष्णुता और सहनशीलता के वास्तविक अस्तित्व की पूर्णतः पुष्टि करते हैं। निस्संदेह, इन विशिष्ट उदाहरणों में, इन लोगों में परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का प्रकाशन परमेश्वर की समग्र प्रबंधन योजना को प्रभावित नहीं करता है। वास्तव में, परमेश्वर के कार्य के इस अंतिम चरण में, परमेश्वर ने प्रतीक्षा करते रहने की अपनी इस संपूर्ण अवधि के दौरान सहन किया है, और उसने अपनी सहनशीलता और अपने जीवन को अपना अनुसरण करने वाले लोगों के उद्धार के साथ अदल-बदल लिया है। क्या तुम लोग यह देखते हो? परमेश्वर अकारण अपनी योजना में उलट-फेर नहीं करता है। वह अपने कोप का बाँध खोल सकता है, और वह दयावान भी हो सकता है; यह परमेश्वर के स्वभाव के दो मुख्य भागों का प्रकाशन है। यह बिल्कुल स्पष्ट है, या नहीं है? दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर की बात आती है, तो सही और ग़लत, न्यायसंगत और अन्यायपूर्ण, सकारात्मक और नकारात्मक—यह सब कुछ मनुष्य को स्पष्ट रूप से दिखाया जाता है। वह क्या करेगा, वह क्या पसंद करता है, वह किससे घृणा करता है—यह सब उसके स्वभाव में सीधे प्रतिबिंबित हो सकता है। ऐसी चीज़ें परमेश्वर के कार्य में भी प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं, और वे धुँधली या सामान्य नहीं हैं; इसके बजाय, वे सभी लोगों को विशेष रूप से मूर्त, सच्चे और व्यावहारिक ढँग से परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप देखने देती हैं। यही स्वयं सच्चा परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 39

परमेश्वर का स्वभाव कभी मनुष्य से छिपा नहीं रहा है—मनुष्य का हृदय परमेश्वर से भटक गया है

सृजन के समय से ही, परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य के साथ क़दम से क़दम मिलाता रहा है। यह मनुष्य से कभी भी छिपा हुआ नहीं रहा है, बल्कि मनुष्य के लिए पूरी तरह प्रचारित और स्पष्ट किया गया है। फिर भी, समय बीतने के साथ, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से और भी अधिक दूर हो गया है, और जैसे-जैसे मनुष्य की भ्रष्टता अधिक गहरी होती गई है, वैसे-वैसे मनुष्य और परमेश्वर अधिकाधिक दूर होते गए हैं। धीरे-धीरे परंतु निश्चित रूप से, मनुष्य परमेश्वर की नज़रों से ओझल हो गया है। मनुष्य परमेश्वर को "देखने" में असमर्थ हो गया है, जिससे उसके पास परमेश्वर का कोई "समाचार" नहीं रह गया है; इस प्रकार, वह नहीं जानता कि परमेश्वर विद्यमान है या नहीं, और इस हद तक चला जाता है कि परमेश्वर के अस्तित्व को ही पूरी तरह नकार देता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के स्वभाव, और स्वरूप, के बारे में मनुष्य की अबूझता इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से छिपा हुआ है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसका हदय परमेश्वर से विमुख हो गया है। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह अनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से बचता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं गया नहीं है : इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे परमेश्वर के देखने के लिए प्रकट करने के बजाय, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह इस तथ्य के बावज़ूद है कि कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग तो परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देने की सौगंध खाते हैं, कि यदि वे अपनी सौगंध तोड़ें तो उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मानने में सक्षम है, न ही यह कि उसने अपना भाग्य और संभावनाएँ और अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन छोड़ दिया है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के समक्ष चाहे जो सौगंधें खाओ या चाहे जो घोषणा करो, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अब भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किंतु इसे नियंत्रित करने की अनुमति उसे नहीं देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को थोड़ा भी दिया ही नहीं है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले शब्द बोलते हो; इस बीच, तुम अपने षडयंत्रों, कुचक्रों और मनसूबों के साथ-साथ अपने छल-कपट से भरे नानाविध मंतव्य भी परमेश्वर से छिपा लेते हो, और तुम अपनी संभावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़ लेते हो, इस गहरे डर से कि परमेश्वर उन्हें ले लेगा। इस प्रकार, परमेश्वर कभी अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों को ध्यान से देखता है, और देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करना चाहता है, और देख सकता है कि उसके हृदय के भीतर कौन-सी चीज़ें रखी हैं, किंतु मनुष्य का हृदय परमेश्वर का नहीं है, उसने उसे परमेश्वर के नियंत्रण में नहीं सौंपा है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर को अवलोकन का अधिकार है, किंतु उसे नियंत्रण का अधिकार नहीं है। मनुष्य की व्यक्तिपरक चेतना में, मनुष्य अपने आप को परमेश्वर की व्यवस्थाओं को सौंपना नहीं चाहता या न ही उसका ऐसा कोई इरादा है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे भी लोग हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने, और परमेश्वर की नज़रों से अपना असली चेहरा छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढँक लेने के तरीक़ों के बारे सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह जानने-समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपने हृदय देना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य जो करता है और वह जो चाहता है, उन सब का नियोजन, आकलन, और निर्णय स्वयं मनुष्य द्वारा किया जाता है; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो और भी नहीं है। इस प्रकार, बात चाहे परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश, या परमेश्वर द्वारा मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं से संबंधित हो, मनुष्य के निर्णय उसके अपने मंतव्यों और हितों पर, उस समय की उसकी अपनी अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य को जो मार्ग अपनाना चाहिए उसे परखने और चुनने के लिए वह अपने चिर-परिचित ज्ञान और अंतर्दृष्टियों का, और अपनी विचार शक्ति का उपयोग करता है, और परमेश्वर को हस्तक्षेप या नियंत्रण नहीं करने देता है। यही वह मनुष्य का हृदय है जिसे परमेश्वर देखता है।

आरंभ से लेकर आज तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर के सभी जीवित जीव-जंतुओं और प्राणियों में, मनुष्य के अलावा कोई भी परमेश्वर से बातचीत करने में समर्थ नहीं रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे सुनने में समर्थ बनाते हैं, और उसके पास आँखें हैं जो उसे देखने देती हैं; उसके पास भाषा, अपने स्वयं के विचार, और स्वतंत्र इच्छा है। वह उस सबसे युक्त है जो परमेश्वर को बोलते हुए सुनने, और परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए आवश्यक है, और इसलिए परमेश्वर अपनी सारी इच्छाएँ मनुष्य को प्रदान करता है, मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके साथ एक मन हो और जो उसके साथ चल सके। जब से परमेश्वर ने प्रबंधन करना प्रारंभ किया है, तभी से वह प्रतीक्षा करता रहा है कि मनुष्य अपना हृदय उसे दे, परमेश्वर को उसे शुद्ध और सुसज्जित करने दे, उसे परमेश्वर के लिए संतोषप्रद और परमेश्वर द्वारा प्रेममय बनाने दे, उसे परमेश्वर का आदर करने और बुराई से दूर रहने वाला बनाने दे। परमेश्वर ने सदा ही इस परिणाम की प्रत्याशा और प्रतीक्षा की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 40

परमेश्वर के द्वारा और बाइबल में अय्यूब का आँकलन

अय्यूब 1:1 ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अय्यूब 1:5 जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, "कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो।" इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।

अय्यूब 1:8 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

वह मुख्य बिंदु क्या है जो तुम लोग इन अंशों में देखते हो? पवित्र शास्त्र के ये तीनों संक्षिप्त अंश अय्यूब से संबंधित हैं। संक्षिप्त होते हुए भी वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वह किस प्रकार का व्यक्ति था। अय्यूब के प्रतिदिन के व्यवहार और उसके आचरण के बारे में अपने वर्णन के माध्यम से, वे हर एक को बताते हैं कि अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन, निराधार होने के बजाय, तथ्यों पर आधारित था। वे हमें बताते हैं कि चाहे यह अय्यूब के बारे में मनुष्य का मूल्याँकन हो (अय्यूब 1:1), या उसके बारे में परमेश्वर का मूल्याँकन हो (अय्यूब 1:8), दोनों परमेश्वर और मनुष्य के सामने अय्यूब के कर्मों के परिणाम हैं (अय्यूब 1:5)।

सबसे पहले, आओ हम प्रथम अंश को पढ़ें : "ऊज़ देश में अय्यूब नामक एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" यह बाइबल में अय्यूब के बारे में पहला आँकलन है, और यह वाक्य अय्यूब के बारे में लेखक का मूल्याँकन है। स्वाभाविक रूप से, यह अय्यूब के बारे में मनुष्य का आँकलन भी प्रस्तुत करता है, जो यह है, "वह खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।" इसके बाद, आओ हम अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन पढ़ें : "क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है" (अय्यूब 1:8)। इन दोनों आँकलनों में से, एक मनुष्य से आया, और एक परमेश्वर से उत्पन्न हुआ; ये दो आँकलन हैं जिनकी विषय-वस्तु समान है। तो, देखा जा सकता है कि अय्यूब के व्यवहार और आचरण मनुष्य को पता थे, और परमेश्वर ने भी उनकी प्रशंसा की थी। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के सामने अय्यूब का आचरण और परमेश्वर के सामने उसका आचरण एक समान थे; उसने अपना व्यवहार और हेतु हर समय परमेश्वर के समक्ष रखा, ताकि परमेश्वर उनका अवलोकन कर सके, और वह एक ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था। इस प्रकार, परमेश्वर की नज़रों में, पृथ्वी पर लोगों में केवल अय्यूब ही पूर्ण और खरा था, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अपने दैनिक जीवन में अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की सुनिश्चित अभिव्यंजनाएँ

इसके बाद, आओ हम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की अय्यूब की सुनिश्चित अभिव्यंजनाओं पर नज़र डालें। इससे पहले और बाद के अंशों के अतिरिक्त, आओ हम अय्यूब 1:5 भी पढ़ें, जो अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की सुनिश्चित अभिव्यंजनाओं में से एक है। इसका संबंध इस बात से है कि अपने दैनिक जीवन में वह किस प्रकार परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था; सबसे प्रमुख बात यह है, उसने न केवल वह किया जो उसे परमेश्वर के प्रति अपने भय और बुराई से दूर रहने के वास्ते करना ही होता, बल्कि उसने अपने पुत्रों की ओर से परमेश्वर के सामने नियमित रूप से होमबलि भी चढ़ाई। उसे भय था कि उन्होंने भोज करते हुए प्रायः "पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया" था। यह भय अय्यूब में कैसे अभिव्यंजित हुआ था? मूल पाठ नीचे लिखा वर्णन प्रस्तुत करता है : "जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था।" अय्यूब का आचरण हमें दिखाता है कि उसके बाहरी व्यवहार में प्रदर्शित होने के बजाए, परमेश्वर के प्रति उसका भय उसके हृदय के भीतर से आया था, और परमेश्वर के प्रति उसका भय उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक पहलू में हर समय पाया जा सकता था, क्योंकि उसने न केवल अपने आपको बुराई से दूर रखा था बल्कि वह अपने पुत्रों की ओर से प्रायः होमबलि चढ़ाता था। दूसरे शब्दों में, अय्यूब न केवल परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने और अपने स्वयं के हृदय में परमेश्वर को खो देने के बारे में अत्यंत भयभीत था, बल्कि वह इस बात से भी चिंतित था कि उसके पुत्र परमेश्वर के विरुद्ध पाप कर सकते थे और उसे अपने हृदयों में खो सकते थे। इससे यह देखा जा सकता है कि अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानने की सच्चाई जाँच-पड़ताल में खरी उतरती है, और किसी भी मनुष्य के संदेह से परे है। क्या वह ऐसा कभी-कभार ही करता था, या बार-बार करता था? पाठ का अंतिम वाक्य है "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।" इन वचनों का अर्थ है कि अय्यूब कभी-कभार ही, या जब उसे अच्छा लगता था तभी, अपने पुत्रों को देखने और मिलने नहीं जाता था, न ही वह प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के समक्ष अपने पापों को स्वीकार करता था। इसके बजाय, वह अपने पुत्रों को पापमुक्त होने के लिए नियमित रूप से भेजता था, और पवित्र करता था, और उनके लिए होमबलि चढ़ाता था। यहाँ "सदैव" का अर्थ यह नहीं है कि उसने ऐसा एक या दो दिन, या पल भर के लिए, किया। यह कह रहा है कि परमेश्वर के प्रति अय्यूब के भय का आविर्भाव अस्थायी नहीं था, और ज्ञान या बोले गए वचनों पर नहीं रुकता था; इसके बजाय, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग उसके हृदय को दिशा दिखलाता था, यह उसका व्यवहार तय करता था, और यह उसके हृदय में उसके अस्तित्व का मूल आधार था। वह सदैव ऐसा करता था, यह दिखाता है कि अपने हृदय में उसे अक्सर भय होता था कि वह स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध पाप कर बैठेगा और यह डर भी था कि उसके पुत्र और पुत्रियाँ परमेश्वर के विरुद्ध पाप कर बैठेंगे। यह दर्शाता है कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग उसके हृदय के भीतर कितना वज़न रखता था। उसने ऐसा सदैव इसलिए किया क्योंकि, अपने मन में, वह डरा हुआ और भयभीत था—भयभीत कि उसने परमेश्वर के विरुद्ध बुरा और पाप किए थे, और यह कि वह परमेश्वर के मार्ग से भटक गया था और इसलिए परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाया था। साथ ही, वह अपने पुत्र और पुत्रियों के बारे में भी चिंतित था, इस डर से कि उन्होंने परमेश्वर को नाराज़ कर दिया था। ऐसा था अय्यूब का सामान्य आचरण अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में। ठीक यही वह सामान्य आचरण है जो सिद्ध करता है कि अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना खोखले वचन नहीं थे, कि अय्यूब ऐसी वास्तविकता को सचमुच जीता था। "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था" : ये वचन हमें परमेश्वर के समक्ष अय्यूब के दिन-प्रतिदिन के कर्मों के बारे में बताते हैं। जब वह सदैव इस रीति करता था, तो क्या उसका व्यवहार और उसका हृदय परमेश्वर के समक्ष पहुँचते थे? दूसरे शब्दों में, क्या परमेश्वर प्रायः उसके हृदय और उसके व्यवहार से प्रसन्न होता था? फिर, किस अवस्था में, और किस संदर्भ में, अय्यूब सदैव इस रीति किया करता था? कुछ लोग कहते हैं कि उसने इस तरह कार्य इसलिए किया क्योंकि परमेश्वर अय्यूब के समक्ष प्रायः प्रकट होता था; कुछ कहते हैं कि उसने सदैव इस रीति किया क्योंकि उसमें बुराई से दूर रहने की इच्छाशक्ति थी; और कुछ कहते हैं कि कदाचित वह सोचता था कि उसका सौभाग्य आसानी से नहीं मिला था, और वह जानता था कि यह उसे परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया था, और इसलिए वह परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने और उसे नाराज़ करने के परिणामस्वरूप अपनी संपत्ति गँवा बैठने को लेकर अत्यंत भयभीत था। क्या इनमें से कोई भी दावा सच है? स्पष्ट रूप से नहीं। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, अय्यूब के बारे में जो बात परमेश्वर ने सर्वाधिक स्वीकार की और हृदय में सँजोई, वह मात्र यह नहीं थी कि वह सदैव इस रीति किया करता था; उससे अधिक, यह शैतान को सौंप दिए जाने और लुभाए जाने पर परमेश्वर, मनुष्य, और शैतान के सामने उसका आचरण था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 41

शैतान पहली बार अय्यूब को लुभाता है (उसके मवेशी चुरा लिए जाते हैं और उसके बच्चों के ऊपर विपत्ति टूटती है)

क. परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 1:8 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

अय्यूब 1:12 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना।" तब शैतान यहोवा के सामने से चला गया।

ख. शैतान का जवाब

अय्यूब 1:9-11 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

परमेश्वर शैतान को अय्यूब को लुभाने देता है जिससे अय्यूब के विश्वास को पूर्ण बनाया जाएगा

अय्यूब 1:8 यहोवा परमेश्वर और शैतान के बीच हुए संवाद का पहला अभिलेख है जो हम बाइबल में देखते हैं। तो, परमेश्वर ने क्या कहा? मूल पाठ नीचे लिखा वर्णन प्रस्तुत करता हैः "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।'" यह शैतान के सामने अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन था; परमेश्वर ने कहा था कि वह पूर्ण और खरा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर और शैतान के बीच इन वचनों से पहले, परमेश्वर ने संकल्प किया था कि वह अय्यूब को लुभाने के लिए शैतान का उपयोग करेगा—कि वह अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप देगा। एक दृष्टि से, यह सिद्ध करेगा कि अय्यूब के बारे में परमेश्वर का पर्यवेक्षण और मूल्याँकन सटीक और त्रुटिहीन था, और वह अय्यूब की गवाही के माध्यम से शैतान को लज्जित होने के लिए विवश करेगा; दूसरी दृष्टि से, यह अय्यूब के परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर के भय को पूर्ण बनाएगा। इस प्रकार, जब शैतान परमेश्वर के सामने आया, तो परमेश्वर ने गोल-मोल बात नहीं की। वह सीधे मुद्दे पर आया और शैतान से पूछा : "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" परमेश्वर के प्रश्न का नीचे लिखा अर्थ है : परमेश्वर जानता था कि शैतान सभी स्थानों पर घूमा-फिरा था, और उसने प्रायः अय्यूब की, जो परमेश्वर का सेवक था, जासूसी की थी। उसने प्रायः अय्यूब को लुभाया और उस पर आक्रमण किए थे, इस कोशिश में कि उस पर तबाही बरपाने का कोई तरीक़ा खोजे, जिससे यह सिद्ध कर सके कि अय्यूब का परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का भय मज़बूती से टिका नहीं रह सकता है। शैतान ने तत्परता से अय्यूब को तबाह करने के अवसर भी खोजे, कि हो सकता है इससे अय्यूब परमेश्वर को त्याग दे, और कि हो सकता है इससे वह उसे परमेश्वर के हाथों से छीन ले। फिर भी परमेश्वर ने अय्यूब के हृदय में झाँका और देखा कि वह पूर्ण और खरा था, और वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने एक प्रश्न का उपयोग करके शैतान को बताया कि अय्यूब पूर्ण और खरा मनुष्य था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, कि अय्यूब परमेश्वर को तजकर शैतान का अनुसरण कभी नहीं करेगा। अय्यूब के बारे में परमेश्वर का मूल्याँकन सुनने के बाद, शैतान को क्रोध आ गया जो अपमान से उत्पन्न हुआ था, और इसलिए वह अय्यूब को छीनने के लिए और अधिक क्रोधित तथा और अधिक अधीर हो उठा, क्योंकि शैतान ने कभी भी विश्वास ही नहीं किया था कि कोई पूर्ण और खरा हो सकता है, कि कोई परमेश्वर का भय मान सकता और बुराई से दूर रह सकता है। साथ ही, शैतान मनुष्य में पूर्णता और खरापन अत्यंत नापसंद करता था, और वह उन लोगों से घृणा करता था जो परमेश्वर का भय मान सकते और दुष्टता से दूर रह सकते थे। और इसलिए अय्यूब 1:9-11 में लिखा है कि "शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, 'क्या अय्यूब परमेश्‍वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।'" परमेश्वर शैतान की विद्वेषपूर्ण प्रकृति से घनिष्ठ रूप से परिचित था, और बहुत अच्छी तरह जानता था कि शैतान ने अय्यूब पर तबाही बरपाने की योजना बहुत पहले ही बना ली थी, और इसलिए इसमें, शैतान को एक बार फिर यह बताने के माध्यम से, कि अय्यूब पूर्ण और खरा था और वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, परमेश्वर शैतान को रास्ते पर लाना, शैतान से उसका असली चेहरा प्रकट करवाना और उससे अय्यूब पर आक्रमण करवाना और उसे प्रलोभित करवाना चाहता था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने जान-बूझकर ज़ोर दिया था कि अय्यूब पूर्ण और खरा था, और कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और इस उपाय से उसने शैतान से अय्यूब पर हमला करवाया, इस बात के प्रति शैतान की घृणा और गुस्से के कारण कि अय्यूब पूर्ण और खरा मनुष्य भला कैसे था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परिणामस्वरूप, परमेश्वर शैतान को इस तथ्य के माध्यम से बेइज्ज़त करता कि अय्यूब पूर्ण और खरा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और शैतान सरासर अपमानित और पराजित रह जाता। उसके बाद, शैतान अय्यूब की पूर्णता, खरेपन, परमेश्वर का भय मानने, या बुराई से दूर रहने के बारे में अब और न तो संदेह करता या न ही दोषारोपण करता। इस तरह, परमेश्वर का परीक्षण और शैतान का प्रलोभन लगभग अवश्यंभावी थे। परमेश्वर के परीक्षण और शैतान के प्रलोभन का सामना कर पाने वाला एकमात्र व्यक्ति अय्यूब था। इस संवाद के बाद, शैतान को अय्यूब को लुभाने की अनुमति दे दी गई। इस प्रकार शैतान के हमलों का पहला दौर आरंभ हुआ। इन हमलों का लक्ष्य अय्यूब की संपत्ति थी, क्योंकि शैतान ने अय्यूब के विरुद्ध नीचे लिखा आरोप लगाया था : "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? ... तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है।" परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने शैतान को अनुमति दी कि वह अय्यूब के पास जो भी था सब ले ले—यही वह उद्देश्य था जिससे परमेश्वर ने शैतान के साथ बात की थी। तथापि, परमेश्वर ने शैतान से एक माँग अवश्य की : "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना" (अय्यूब 1:12)। यही वह शर्त थी जो परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को लुभाने की अनुमति देने और अय्यूब को शैतान के हाथों में सौंप देने के पश्चात रखी थी, और यह वह सीमा थी जो उसने शैतान के लिए निर्धारित की थी : उसने शैतान को आदेश दिया कि वह अय्यूब को हानि न पहुँचाए। चूँकि परमेश्वर पहचानता था कि अय्यूब पूर्ण और खरा था, और चूँकि उसे विश्वास था कि उसके समक्ष अय्यूब की पूर्णता और खरापन संदेह से परे थे और परीक्षा में डाले जाने का सामना कर सकते थे, इसलिए परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को लुभाने दिया, परंतु शैतान पर एक प्रतिबंध लगा दिया : शैतान को अय्यूब की सारी संपत्ति ले लेने की अनुमति थी, किंतु वह उसे एक अँगुली भी नहीं लगा सकता था। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने उस क्षण अय्यूब को पूरी तरह शैतान को नहीं दिया था। शैतान जिस किसी भी उपाय से चाहता अय्यूब को लुभा सकता था, परंतु वह स्वयं अय्यूब को—यहाँ तक कि उसके सिर के एक बाल को भी—हानि नहीं पहुँचा सकता था, क्योंकि मनुष्य का सब कुछ परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होता है, और क्योंकि मनुष्य जिये या मरे इसका निर्णय भी परमेश्वर करता है। शैतान के पास यह अधिकार नहीं है। परमेश्वर द्वारा शैतान से ये वचन कहे जाने के उपरांत, शैतान आरंभ करने के लिए अधीर हो उठा। उसने अय्यूब को लुभाने के लिए हर उपाय इस्तेमाल किया, और अय्यूब देखते ही देखते पर्वत जितने ऊंचे मूल्य की भेड़-बकरियाँ और बैल और परमेश्वर द्वारा उसे दी गई सारी संपत्ति गँवा चुका था...। इस प्रकार परमेश्वर के परीक्षणों से वह गुज़रा।

यद्यपि बाइबल अय्यूब के प्रलोभन की उत्पत्तियों के बारे में हमें बताती है, फिर भी क्या स्वयं अय्यूब, जिसे इन प्रलोभनों से गुज़रना पड़ा था, जानता था कि क्या चल रहा था? अय्यूब मात्र एक नश्वर मनुष्य था; अपने चारों ओर घट रही इस कहानी के बारे में वह निस्संदेह कुछ भी नहीं जानता था। तथापि, परमेश्वर के उसके भय और उसकी पूर्णता और खरेपन ने उसे अहसास कराया कि परमेश्वर की परीक्षाएँ उस पर आ गई थीं। वह नहीं जानता था कि आध्यात्मिक क्षेत्र में क्या घटित हुआ था, न ही यह कि इन परीक्षाओं के पीछे परमेश्वर के अभिप्राय क्या थे। परंतु वह यह अवश्य जानता था कि उसके साथ चाहे जो हो, उसे अपनी पूर्णता और खरेपन के प्रति सच्चा बने रहना चाहिए, और उसे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। इन विषयों के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति और प्रतिक्रिया परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से देखी थीं। परमेश्वर ने क्या देखा था? उसने अय्यूब का परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय देखा, इसलिए कि आरंभ से ठीक उस पूरे समय तक जब अय्यूब की परीक्षा ली गई, अय्यूब का हृदय परमेश्वर के समक्ष खुला हुआ था, यह परमेश्वर के समक्ष बिछा था, और अय्यूब ने अपनी पूर्णता और खरापन तजा नहीं था, न ही वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग से भटका या विमुख हुआ था—परमेश्वर के लिए इससे अधिक सुखदायक कुछ नहीं था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 42

अय्यूब की प्रतिक्रिया

अय्यूब 1:20-21 तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"

अय्यूब द्वारा अपना सब कुछ वापस करने का जिम्मा अपने ऊपर ले लेना परमेश्वर के प्रति उसके भय से उत्पन्न होता है

परमेश्वर द्वारा शैतान से यह कहने के बाद कि "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना," शैतान चला गया, जिसके तुरंत बाद अय्यूब के ऊपर अचानक और भयंकर हमले होने लगे : पहले, उसके बैल और गधे लूट लिए गए और उसके कुछ सेवकों को मार दिया गया; फिर, उसकी भेड़-बकरियों और कुछ और सेवकों को आग में भस्म कर दिया गया; उसके पश्चात्, उसके ऊँट ले लिए गए और उसके कुछ और सेवकों की हत्या कर दी गई; अंत में, उसके पुत्र और पुत्रियों की जानें ले ली गईं। हमलों की यह श्रृंखला अय्यूब द्वारा अपने पहले प्रलोभन के दौरान झेली गई यातना थी। जैसा कि परमेश्वर द्वारा आदेशित था, इन हमलों के दौरान शैतान ने केवल अय्यूब की संपत्ति और उसके बच्चों को लक्ष्य बनाया था, और स्वयं अय्यूब को हानि नहीं पहुँचाई थी। तथापि, अय्यूब विशाल संपदा से संपन्न धनवान मनुष्य से तत्क्षण ऐसे व्यक्ति में बदल गया जिसके पास कुछ भी नहीं था। कोई भी व्यक्ति यह विस्मयकारी अप्रत्याशित झटका सह नहीं कर सकता था या इसके प्रति समुचित प्रतिक्रिया नहीं कर सकता था, फिर भी अय्यूब ने अपने असाधारण पहलू का प्रदर्शन किया। पवित्र शास्त्र नीचे लिखा विवरण प्रदान करते हैं : "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" यह सुनने के पश्चात् कि अय्यूब ने अपने बच्चे और अपनी सारी संपत्ति गँवा दी थी, यह अय्यूब की पहली प्रतिक्रिया थी। सबसे बढ़कर, वह आश्चर्यचकित, या घबराया हुआ नहीं दिखा, उसने क्रोध या नफ़रत तो और भी व्यक्त नहीं की। तो, तुम देखते हो कि वह अपने हृदय में पहले से ही पहचान गया था कि ये आपदाएँ आकस्मिक घटनाएँ नहीं थीं, या मनुष्य के हाथों से उत्पन्न नहीं हुई थीं, वे प्रतिफल या दण्ड का आगमन तो और भी नहीं थीं। इसके बजाय, यहोवा की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं; वह यहोवा ही था जो उसकी संपत्ति और बच्चों को ले लेना चाहता था। उस समय अय्यूब बहुत शांत और सोच-विचार में स्पष्ट था। उसकी अचूक और खरी मानवता ने उसे अपने ऊपर आ पड़ी आपदाओं के बारे में तर्कसंगत और स्वाभाविक रूप से सटीक परख करने और निर्णय लेने में समर्थ बनाया, और इसके परिणामस्वरूप, उसने असामान्य शांत मन से व्यवहार किया : "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" "बागा फाड़" का अर्थ है वह निर्वस्त्र था, और कुछ भी धारण नहीं किए था; "सिर मुँडाने" का अर्थ है वह नवजात शिशु के समान परमेश्वर के समक्ष लौट आया था; "भूमि पर गिरा, और दण्डवत् किया" का अर्थ है वह इस संसार में नग्न आया था, और आज भी उसके पास कुछ नहीं था, वह परमेश्वर के पास लौट आया था मानो नवजात शिशु हो। उस पर जो बीता था उस सबके प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति परमेश्वर के किसी प्राणी द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती थी। यहोवा में उसका विश्वास, विश्वास के क्षेत्र से आगे चला गया था; यह परमेश्वर के प्रति उसका भय, परमेश्वर के प्रति उसका आज्ञापालन था; वह न केवल उसे देने के लिए, बल्कि उससे लेने के लिए भी परमेश्वर को धन्यवाद दे पाने में समर्थ था। इतना ही नहीं, वह स्वयं आगे बढ़कर वह सब करने में समर्थ था, जो अपना सब कुछ, अपने जीवन सहित, परमेश्वर को लौटाने के लिए आवश्यक था।

परमेश्वर के प्रति अय्यूब का भय और आज्ञाकारिता मनुष्यजाति के लिए एक उदाहरण है, और उसकी पूर्णता और खरापन मानवता की पराकाष्ठा थी जो मनुष्य को धारण करना ही चाहिए। यद्यपि उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, फिर भी उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर सचमुच विद्यमान था, और इस एहसास के कारण वह परमेश्वर का भय मानता था, और परमेश्वर के अपने इसी भय के कारण, वह परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाया था। उसने परमेश्वर को वह सब जो उसका था लेने की खुली छूट दे दी, फिर भी उसे कोई शिकायत नहीं थी, और वह परमेश्वर के समक्ष गिर गया और उसने उससे कहा कि, बिल्कुल इसी क्षण, यदि परमेश्वर उसकी देह भी ले ले, तो वह, शिकायत किए बिना, ख़ुशी-ख़ुशी उसे ऐसा करने देगा। उसका समूचा आचरण उसकी अचूक और खरी मानवता के कारण था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी निश्छलता, ईमानदारी, और दयालुता के फलस्वरूप, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के अपने अहसास और अनुभव में अटल था, और इस स्थापना के आधार पर उसने स्वयं अपने से भारी-भरकम अपेक्षाएँ की थीं और परमेश्वर के समक्ष अपनी सोच, व्यवहार, आचरण और क्रियाकलापों के सिद्धांतों को उसने अन्य बातों के अलावा परमेश्वर द्वारा अपने मार्गदर्शन और परमेश्वर के जो कर्म वह देख चुका था उनके अनुसार आदर्श ढँग से ढाला था। समय के साथ, उसके अनुभवों ने उसमें परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक भय उत्पन्न किया और उसे बुराई से दूर रखा। यही उस अखंडता का स्रोत था जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामे रखा था। अय्यूब सत्यनिष्ठ, निश्छल, और दयालु मानवता से युक्त था, और उसने परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर का आज्ञापालन करने, और बुराई से दूर रहने का, साथ ही इस ज्ञान का कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया" का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया था। केवल इन्हीं चीज़ों के कारण वह शैतान के ऐसे शातिर हमलों के बीच अपनी गवाही पर डटा रह पाया, और जब परमेश्वर की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ीं, तब केवल उन्हीं के कारण वह परमेश्वर को निराश नहीं करने और परमेश्वर को संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ हो पाया। यद्यपि प्रथम प्रलोभन के दौरान अय्यूब का आचरण बिलकुल दोटूक था, किंतु यह दोटूकपन बाद की पीढ़ियों को जीवन भर के प्रयासों के बाद भी प्राप्त होना निश्चित नहीं था, न ही वे अय्यूब के ऊपर वर्णित आचरण से आवश्यक रूप से युक्त होंगी। आज, अय्यूब के दोटूक आचरण से दोचार होने पर, और इसकी तुलना परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करने वाले लोगों द्वारा परमेश्वर के समक्ष प्रदर्शित "परम आज्ञाकारिता और मृत्युपर्यंत निष्ठा" के क्रंदनों और दृढ़संकल्पों से करने पर, तुम लोग अत्यंत लज्जित महसूस करते हो, या नहीं करते हो?

जब तुम पवित्र शास्त्रों में वह सब पढ़ते हो जो अय्यूब और उसके परिवार ने सहा था, तब तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होती है? क्या तुम अपने ही विचारों में खो जाते हो? क्या तुम अचंभित रह जाते हो? क्या अय्यूब पर आ पड़ी परीक्षाओं को "भयावह" कहा जा सकता है? दूसरे शब्दों में, पवित्र शास्त्रों में वर्णित अय्यूब की परीक्षाओं के बारे में पढ़ना इतना डरावना है कि वास्तविक जीवन में वे कैसी रही होंगी इसकी तो बात ही छोड़ दें। तो, तुम देखते हो कि अय्यूब पर जो घटित हुआ वह कोई "प्रशिक्षण अभ्यास" नहीं, बल्कि वास्तविक "संग्राम" था, जिसमें वास्तविक "बंदूकें" और "गोलियाँ" शामिल थीं। परंतु किसके हाथों उसे इन परीक्षाओं से गुज़रना पड़ा था? निश्चित ही, वे शैतान के काम थे, और शैतान ने ये चीज़ें स्वयं अपने हाथों से की थीं। बावज़ूद इसके, ये चीज़ें परमेश्वर द्वारा अधिकृत थीं। क्या परमेश्वर ने शैतान को बताया कि उसे किन उपायों से अय्यूब को लुभाना है? उसने नहीं बताया। परमेश्वर ने बस एक शर्त रखी जिसका शैतान को पालन करना ही चाहिए था, और फिर प्रलोभन अय्यूब पर आ पड़े। जब प्रलोभन अय्यूब पर आ पड़े, तब इसने लोगों को शैतान की दुष्टता और कुरूपता का, मनुष्य के प्रति उसके द्वेष और घृणा का, परमेश्वर के प्रति उसकी शत्रुता का अहसास करवाया। इसमें हम देखते हैं कि शब्दों में वर्णन ही नहीं किया जा सकता कि यह प्रलोभन कितना क्रूर था। कहा जा सकता है कि वह द्वेषपूर्ण प्रकृति जिससे शैतान ने मनुष्य को हानि पहुँचाई थी, और उसका कुरूप चेहरा, इस क्षण पूरी तरह प्रकट हो गए थे। शैतान ने इस अवसर का उपयोग, अवसर जो परमेश्वर की अनुमति से दिया गया था, अय्यूब को अधीर और बेरहम हानि पहुँचाने के लिए किया, जिसकी क्रूरता का तरीक़ा और स्तर आज लोगों के लिए अकल्पनीय और पूर्णतः असहनीय दोनों हैं। बजाय यह कहने के कि अय्यूब शैतान द्वारा प्रलोभित किया गया था, और कि इस प्रलोभन के दौरान वह अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटा रहा, यह कहना बेहतर है कि अय्यूब ने परमेश्वर द्वारा अपने लिए तय परीक्षाओं में अपनी पूर्णता और खरेपन की रक्षा करने के लिए, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के अपने मार्ग का बचाव करने के लिए शैतान के साथ एक प्रतियोगिता आरंभ की। इस प्रतियोगिता में, अय्यूब ने बहुत अधिक मूल्य की भेड़-बकरियाँ और पशु गँवा दिए, उसने अपनी सारी संपत्ति गँवा दी, और उसने अपने पुत्र और पुत्रियाँ गँवा दीं। परंतु उसने अपनी पूर्णता, खरापन, या परमेश्वर का भय नहीं तजा। दूसरे शब्दों में, शैतान के साथ इस प्रतियोगिता में, अय्यूब ने अपनी पूर्णता, खरापन, और परमेश्वर का भय गँवाने की अपेक्षा अपनी संपत्ति और बच्चों से वंचित किया जाना पसंद किया। मनुष्य होने का जो अर्थ है उसकी जड़ को उसने थामे रखना पसंद किया। पवित्र शास्त्र अय्यूब द्वारा अपनी संपत्ति गँवाने की समूची प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण प्रदान करते हैं, और अय्यूब के आचरण और प्रवृत्ति का भी लिखित प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। ये संक्षिप्त, सारगर्भित विवरण महसूस कराते हैं कि इस प्रलोभन का सामना करते समय अय्यूब लगभग निश्चिंत था, किंतु वास्तव में जो घटित हुआ था यदि उसे पुनर्रचित किया जाए—शैतान की द्वेषपूर्ण प्रकृति पर भी विचार करते हुए—तो चीज़ें इतनी सीधी-सादी और सहज नहीं होतीं जितनी इन वाक्यों में वर्णित की गई हैं। वास्तविकता कहीं अधिक क्रूर थी। ऐसा होता है उस तबाही और घृणा का स्तर जिससे शैतान मनुष्यजाति और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत सभी लोगों के साथ बर्ताव करता है। यदि परमेश्वर ने यह न कहा होता कि शैतान अय्यूब को हानि न पहुँचाए, तो शैतान ने बिना किसी पछतावे के निस्संदेह उसका वध कर दिया होता। शैतान नहीं चाहता है कि कोई भी परमेश्वर की आराधना करे, न ही वह यह चाहता है कि परमेश्वर की नज़रों में जो धार्मिक हैं और जो पूर्ण तथा खरे हैं वे निरंतर परमेश्वर का भय मान पाएँ तथा बुराई से दूर रह पाएँ। क्योंकि लोगों के लिए परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अर्थ यह है कि वे शैतान से दूर रहें और उसे त्याग दें, और इसलिए शैतान ने दया किए बिना अय्यूब के ऊपर अपना सारा क्रोध और नफ़रत लादने के लिए परमेश्वर की अनुमति का फ़ायदा उठाया। तो, तुम देखो, वह यंत्रणा कितनी बड़ी थी जो अय्यूब ने मन से देह तक, बाहर से भीतर तक सही थी। आज, हमें दिखाई नहीं देता कि उस समय यह कैसा था, और हम केवल बाइबल के वृतांतों से ही उस समय जब उसे यंत्रणा गुज़ारा गया था अय्यूब की भावनाओं की एक छोटी-सी झलक प्राप्त कर सकते हैं।

अय्यूब की अटल सत्यनिष्ठा शैतान को शर्मिंदा करती है और उसे दहशत में डालकर भगा देती है

तो, जब अय्यूब को इस यंत्रणा के गुज़ारा गया था तब परमेश्वर ने क्या किया? परमेश्वर ने अवलोकन किया, और देखा, और परिणाम की प्रतीक्षा की। जब परमेश्वर ने अवलोकन किया और देखा, तो उसने कैसा महसूस किया? निस्संदेह उसने शोक में डूबा महसूस किया। परंतु क्या यह संभव है कि उसने जो व्यथा महसूस की मात्र उसके कारण, अय्यूब को लुभाने के लिए शैतान को दी गई अपनी अनुमति पर परमेश्वर को पछतावा हुआ हो सकता था? इसका उत्तर है, नहीं, उसे ऐसा पछतावा महसूस नहीं हो सकता था। क्योंकि वह दृढ़ता से मानता था कि अय्यूब पूर्ण और खरा था, कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने शैतान को बस इतना ही अवसर दिया था कि वह परमेश्वर के सामने अय्यूब की धार्मिकता को सत्यापित करे, और अपनी स्वयं की जुगुप्सा और घिनौनेपन को प्रकट करे। इतना ही नहीं, यह अय्यूब के लिए एक अवसर था कि वह संसार के लोगों, शैतान, और यहाँ तक कि परमेश्वर का अनुसरण करने वालों के भी सामने अपनी धार्मिकता और अपना परमेश्वर के प्रति भय मानना और बुराई से दूर रहना प्रमाणित करे। क्या अंतिम परिणाम से यह साबित हुआ कि अय्यूब के बारे में परमेश्वर का आँकलन सही और त्रुटिहीन था? क्या अय्यूब ने वास्तव में शैतान पर विजय प्राप्त की? हम यहाँ अय्यूब द्वारा बोले गए ठेठ वचन पढ़ते हैं, वचन जो सिद्ध करते हैं कि उसने शैतान पर विजय पा ली थी। उसने कहा : "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा।" यह परमेश्वर के प्रति अय्यूब की आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति है। फिर, उसने कहा : "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" अय्यूब द्वारा कहे गए ये वचन साबित करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, कि वह मनुष्य के मन के भीतर झाँकने में समर्थ है, और वे साबित करते हैं कि अय्यूब की उसकी स्वीकृति त्रुटिहीन है, कि यह मनुष्य जिसे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया गया था, धार्मिक था। "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" ये वचन परमेश्वर के प्रति अय्यूब की गवाही हैं। ये साधारण वचन ही थे जिन्होंने शैतान को संत्रस्त कर दिया था, जिन्होंने उसे शर्मिंदा कर दिया था और उसे दहशत में डालकर भगा दिया था, और, इतना ही नहीं, जिन्होंने शैतान को जंज़ीरों में जकड़ लिया था और उसे संसाधन-हीन छोड़ दिया था। इसलिए भी इन वचनों ने शैतान को यहोवा परमेश्वर के कर्मों की चमत्कारिकता और ताक़त महसूस कराई, और जिसका हृदय परमेश्वर के मार्ग द्वारा शासित होता था उसका असाधारण आकर्षण महसूस करने दिया। इसके अलावा, उन्होंने एक छोटे-से और महत्वहीन मनुष्य द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का पालन करने में दिखाई गई सामर्थ्यवान जीवनशक्ति का शैतान को दर्शन कराया। इस प्रकार पहली प्रतियोगिता में शैतान पराजित हुआ था। "इससे सीख लेने" के बावजूद, शैतान का अय्यूब को छोड़ने का कोई इरादा नहीं था, न ही उसकी द्वेषपूर्ण प्रकृति में कोई बदलाव आया था। शैतान ने अय्यूब पर लगातार आक्रमण करते रहने की कोशिश की, और एक बार फिर परमेश्वर के सामने आया ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 43

शैतान एक बार फिर अय्यूब को प्रलोभित करता है (अय्यूब के पूरे शरीर में दर्दनाक फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:3 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:4-5 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

ग. अय्यूब परीक्षा से कैसे निपटता है

अय्यूब 2:9-10 तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।" उसने उससे कहा, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?" इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया।

अय्यूब 3:3 वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, "बेटे का गर्भ रहा।"

परमेश्वर के मार्ग के प्रति अय्यूब का प्रेम अन्य सभी से बढ़कर है

पवित्र शास्त्र परमेश्वर और शैतान के बीच कहे गए वचन नीचे लिखे अनुसार अंकित करते हैं : "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है'" (अय्यूब 2:3)। इस संवाद में, परमेश्वर वही प्रश्न शैतान के सामने दोहराता है। यह ऐसा प्रश्न है जो हमें प्रथम परीक्षण के दौरान अय्यूब द्वारा जो प्रदर्शित किया और जिया गया था उसके बारे में यहोवा परमेश्वर का सकारात्मक आँकलन दिखाता है, और यह वह आँकलन है जो शैतान के प्रलोभन से होकर गुज़रने से पहले के अय्यूब के बारे में परमेश्वर के आँकलन से भिन्न नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि उसके ऊपर प्रलोभन के आने से पहले, परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब पूर्ण था, और इसलिए परमेश्वर ने उसकी और उसके परिवार की रक्षा की थी, और उसे धन्य किया था; वह परमेश्वर की नज़रों में धन्य किए जाने योग्य था। प्रलोभन के पश्चात्, अय्यूब ने अपने होठों से पाप नहीं किया क्योंकि उसने अपनी संपत्ति और अपने बच्चों को गँवा दिया था, बल्कि यहोवा के नाम की निरंतर स्तुति ही करता रहा। उसके वास्तविक आचरण ने परमेश्वर से उसकी वाहवाही करवाई, और इसके कारण, परमेश्वर ने उसे पूरे अंक दिए। क्योंकि अय्यूब की नज़रों में, उसकी संतान या उसकी संपत्ति उससे परमेश्वर का त्याग करवाने के लिए पर्याप्त नहीं थे। दूसरे शब्दों में, उसके हृदय में परमेश्वर के स्थान को उसके बच्चों या संपत्ति के किसी टुकड़े से बदला नहीं जा सकता था। अय्यूब के प्रथम प्रलोभन के दौरान, उसने परमेश्वर को दिखाया कि उसके प्रति उसका प्रेम और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग के प्रति उसका प्रेम अन्य सभी से बढ़कर था। यह मात्र इतना ही है कि इस परीक्षण ने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करने और उसके द्वारा उसकी संपत्ति तथा बच्चों को छीन लिए जाने का अनुभव प्रदान किया था।

अय्यूब के लिए, यह एक सच्चा अनुभव था जिसने उसकी आत्मा को धोकर स्वच्छ कर दिया था, यह जीवन का एक बपतिस्मा था जिसने उसके अस्तित्व को परिपूर्ण किया था, और, इससे भी अधिक, यह एक आलीशान भोज था जिसने परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता, और उसके भय को कसौटी पर कसा था। इस प्रलोभन ने अय्यूब की स्थिति एक धनवान पुरुष से ऐसे व्यक्ति में रूपांतरित कर दी जिसके पास कुछ भी नहीं था, और इसने उसे मनुष्यजाति के प्रति शैतान के दुर्व्यवहार का अनुभव भी प्राप्त करने दिया था। उसकी अभावग्रस्तता ने उसे शैतान से घृणा करने को नहीं उकसाया; बल्कि, शैतान की नीच करतूतों में उसने शैतान की कुरूपता और घिनौनापन, और साथ ही परमेश्वर के प्रति शैतान की शत्रुता और विद्रोह भी देखा, और इसने उसे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सदैव डटे रहने के लिए बेहतर ढंग से प्रोत्साहित किया। उसने शपथ ली कि वह संपत्ति, बच्चों या कुटुंबियों जैसे बाहरी कारकों की वजह से कभी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और परमेश्वर के मार्ग की तरफ़ पीठ नहीं फेरेगा, न ही वह कभी शैतान, संपत्ति, या किसी व्यक्ति का दास होगा; यहोवा परमेश्वर के अलावा, कोई भी उसका प्रभु, या उसका परमेश्वर नहीं हो सकता है। ऐसी थीं अय्यूब की आकांक्षाएँ। दूसरी ओर, अय्यूब ने कुछ अर्जित भी किया था : परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए परीक्षणों के बीच उसने प्रचुर धन-संपत्ति प्राप्त की थी।

पिछले कई दशकों के अपने जीवन के दौरान, अय्यूब ने यहोवा के कर्म देखे थे और अपने लिए यहोवा परमेश्वर के आशीष प्राप्त किए थे। वे ऐसे आशीष थे जिन्होंने उसे अत्यंत असहज और ऋणी महसूस करते छोड़ दिया था, क्योंकि वह मानता था कि उसने परमेश्वर के लिए कुछ भी नहीं किया था, फिर भी उसे इतने बड़े आशीष वसीयत में दिए गए थे और उसने इतने अधिक अनुग्रह का आनंद लिया था। इस कारण से, वह प्रायः अपने हृदय में प्रार्थना करता था, यह आशा करते हुए कि वह परमेश्वर का ऋण चुका पाएगा, यह आशा करते हुए कि उसे परमेश्वर के कर्मों और महानता की गवाही देने का अवसर मिलेगा, और यह आशा करते हुए कि परमेश्वर उसकी आज्ञाकारिता की परीक्षा लेगा, और, इससे बढ़कर, यह भी कि उसके विश्वास को शुद्ध किया जा सकता था, जब तक कि उसकी आज्ञाकारिता और उसका विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर लेते हैं। फिर, जब परीक्षण अय्यूब के ऊपर आ पड़ा, तो उसने मान लिया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाएँ सुन ली हैं। अय्यूब ने यह अवसर किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर सँजोया, और इस प्रकार उसने इसे हल्के ढंग से बरतने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि उसकी जीवन भर की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो सकती थी। इस अवसर के आगमन का अर्थ था कि उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय की परीक्षा ली जा सकती थी, और उन्हें शुद्ध किया जा सकता था। इतना ही नहीं, इसका अर्थ था कि अय्यूब के पास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का एक अवसर था, जो उसे इस प्रकार परमेश्वर के और क़रीब ला रहा था। परीक्षण के दौरान, ऐसे विश्वास और अनुसरण ने उसे और अधिक पूर्ण होने दिया, और परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्राप्त करने दी। अय्यूब परमेश्वर के आशीषों और अनुग्रहों के लिए और अधिक कृतज्ञ हो गया, अपने हृदय में उसने परमेश्वर के कर्मों पर और अधिक स्तुति की झ़ड़ी लगा दी, और वह परमेश्वर के प्रति और अधिक भयभीत और श्रद्धालु था, और परमेश्वर की सुंदरता, महानता तथा पवित्रता के लिए और अधिक लालायित था। इस समय, यद्यपि परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब अब भी वह व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, फिर भी उसके अनुभवों को मानते हुए, अय्यूब का विश्वास और ज्ञान बहुत तेज़ी से कई गुना बढ़ गया था : उसके विश्वास में बढ़ोतरी हुई थी, उसकी आज्ञाकारिता को पाँव रखने की जगह मिल गई थी, और परमेश्वर के प्रति उसका भय और अधिक गहरा हो चुका था। यद्यपि इस परीक्षण ने अय्यूब की आत्मा और जीवन को रूपांतरित कर दिया, फिर भी ऐसे रूपांतरण ने अय्यूब को संतुष्ट नहीं किया, न ही इसने उसकी आगे की प्रगति को धीमा किया। साथ ही साथ, इस परीक्षण से उसने जो प्राप्त किया था उसका हिसाब लगाते हुए, और स्वयं अपनी कमियों पर विचार करते हुए, उसने ख़ामोशी से प्रार्थना की, अगले परीक्षण के अपने ऊपर आने की प्रतीक्षा करने लगा, क्योंकि वह अपने विश्वास, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के प्रति भय को परमेश्वर के अगले परीक्षण के दौरान ऊँचा उठाने के लिए लालायित था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 44

शैतान एक बार फिर अय्यूब को प्रलोभित करता है (अय्यूब के पूरे शरीर में दर्दनाक फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:3 यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान द्वारा कहे गए वचन

अय्यूब 2:4-5 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

अत्यधिक पीड़ा के बीच, अय्यूब मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की परवाह का सच में अहसास करता है

शैतान से यहोवा परमेश्वर के प्रश्नों के उपरांत, शैतान गुपचुप खुश था। ऐसा इसलिए था क्योंकि शैतान जानता था कि उसे एक बार फिर उस मनुष्य पर हमला करने की अनुमति दी जाएगी जो परमेश्वर की नज़रों में पूर्ण था—शैतान के लिए, यह एक दुर्लभ अवसर था। शैतान अय्यूब के दृढ़ विश्वास को पूरी तरह कमज़ोर करने के लिए इस अवसर का उपयोग करना चाहता था, ताकि वह परमेश्वर में अपना विश्वास गँवा दे और इस प्रकार अब और परमेश्वर का भय न माने या यहोवा के नाम को धन्य न करे। यह शैतान को एक अवसर देता : स्थान या समय कोई भी हो, वह अय्यूब को अपनी आज्ञा के प्रति उपकृत खिलौना बना पाएगा। शैतान ने अपने दुष्ट इरादे तो कोई निशान छोड़े बिना छिपा लिए, परंतु वह अपनी बुरी प्रकृति को काबू में नहीं रख सका। इस सच्चाई का संकेत यहोवा परमेश्वर के वचनों के इसके उत्तर में दिया गया है, जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है : "शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, 'खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा'" (अय्यूब 2:4-5)। यह असंभव है कि परमेश्वर और शैतान के बीच इस वार्तालाप से शैतान के विद्वेष का तात्विक ज्ञान और समझ प्राप्त न हो। शैतान की इन भ्रामक बातों को सुनने के बाद, वे सब जो सत्य से प्रेम और बुराई से घृणा करते हैं शैतान की नीचता और निर्लज्जता से निस्संदेह और अधिक नफ़रत करेंगे, शैतान की भ्रांतियों से संत्रस्त और जुगुप्सा महसूस करेंगे, और साथ ही, वे अय्यूब के लिए अथाह प्रार्थनाएँ और सच्ची कामनाएँ करेंगे, विनती करते हुए कि यह खरा मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सके, मन्नत मानते हुए कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला यह मनुष्य सदा के लिए शैतान के प्रलोभनों पर विजय पाए, और परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसकी आशीषों के बीच, प्रकाश में जीवन बिताए; इस तरह, ऐसे लोग यह भी कामना करेंगे कि अय्यूब के धार्मिक कर्म सदैव उन लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित कर सकें जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करते हैं। हालाँकि शैतान का द्वेषपूर्ण इरादा इस उद्घोषणा में देखा जा सकता है, किंतु फिर भी परमेश्वर ने शैतान की "विनती" प्रसन्नचित्त होकर मान ली—परंतु उसने एक शर्त भी रख दी : "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना" (अय्यूब 2:6)। चूँकि, इस बार, शैतान ने अय्यूब के माँस और हड्डियों को नुक़सान पहुँचाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाने की माँग की थी, इसलिए परमेश्वर ने कहा, "केवल उसका प्राण छोड़ देना।" इन वचनों का अर्थ यह है कि उसने अय्यूब की देह शैतान को दे दी, परंतु अय्यूब का जीवन परमेश्वर ने रख लिया। शैतान अय्यूब का जीवन नहीं ले सकता था, परंतु इसके अलावा शैतान अय्यूब के विरुद्ध कोई भी उपाय या रीति उपयोग में ला सकता था।

परमेश्वर की अनुमति प्राप्त करने के बाद, शैतान अय्यूब पर झपटा और उसकी चमड़ी को पीड़ा पहुँचाने के लिए उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, उसके पूरे शरीर पर पीड़ादायक फोड़े पैदा कर दिए, और अय्यूब ने अपनी चमड़ी पर पीड़ा महसूस की। अय्यूब ने यहोवा परमेश्वर की चमत्कारिकता और पवित्रता की स्तुति की, जिसने शैतान को उसके ढीठपन में और भी अधिक जघन्य बना दिया। क्योंकि वह मनुष्य को पीड़ा पहुँचाने का आनंद महसूस कर चुका था, इसलिए शैतान ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अय्यूब का माँस खरोंच दिया, जिससे उसके पीड़ादायक फोड़े और तीखे हो गए। अय्यूब ने तत्काल अपनी देह पर ऐसी पीड़ा और यंत्रणा महसूस की जिसका कोई सानी नहीं था, और वह अपने हाथों से स्वयं को सिर से पाँव तक मसलने के सिवा और कुछ नहीं कर सका, मानो यह उसके शरीर की इस पीड़ा के द्वारा उसकी आत्मा को पहुँचाए गए इस आघात से उसे राहत दिलाएगा। उसे अहसास हुआ कि परमेश्वर उसकी बगल में खड़े होकर उसे देख रहा था, और उसने अपने को मज़बूत बनाने का भरसक प्रयत्न किया। वह एक बार फिर भूमि पर घुटनों के बल बैठ गया, और कहा : "तू मनुष्य के हृदय के भीतर झाँकता है, तू उसकी दुर्दशा देखता है; उसकी कमज़ोरी तुझे चिंतित क्यों करती है? यहोवा परमेश्वर के नाम की स्तुति हो।" शैतान ने अय्यूब का असहनीय दर्द देखा, परंतु उसने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर का नाम त्यागते नहीं देखा। इसलिए उसके टुकड़े-टुकड़े करने को अधीर होकर उसने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुँचाने के लिए जल्दी से अपना आगे हाथ बढाया। तत्क्षण, अय्यूब ने अभूतपूर्व यंत्रणा महसूस की; यह ऐसा था मानो उसका माँस हड्डियों से चीरकर अलग कर दिया गया था, और मानो उसकी हड्डियों को टुकड़े-टुकड़े करके अलग किया जा रहा था। इस अत्यंत दुखदायी पीड़ा ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया कि इससे तो मर जाना बेहतर होता...। इस यंत्रणा को सहने की उसकी क्षमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी...। वह चीखना चाहता था, वह दर्द को कम करने की कोशिश में अपने शरीर की चमड़ी को चीरकर निकाल देना चाहता था—फिर भी उसने अपनी चीखें रोक लीं, और अपने शरीर की चमड़ी को नहीं चीरा, क्योंकि वह शैतान को अपनी कमज़ोरी देखने देना नहीं चाहता था। और इसलिए अय्यूब एक बार फिर घुटनों के बल बैठा, परंतु इस बार उसने यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति महसूस नहीं की। वह जानता था कि यहोवा परमेश्वर अक़्सर उसके सामने, और उसके पीछे, और उसके दोनों तरफ होता था। परंतु उसकी पीड़ा के दौरान, परमेश्वर ने एक बार भी नहीं देखा; उसने अपना चेहरा ढँक लिया था और वह छिपा हुआ था, क्योंकि मनुष्य के उसके सृजन का उसका अभिप्राय मनुष्य के ऊपर पीड़ा बरपाना नहीं था। इस समय, अय्यूब रो रहा था, और इस शारीरिक यंत्रणा को सहने का भरसक प्रयास कर रहा था, फिर भी वह परमेश्वर को धन्यवाद देने से अपने आपको अब और रोक नहीं सका : "मनुष्य पहले धक्के में ही गिर जाता है, वह कमज़ोर और शक्तिहीन है, वह कच्चा और अज्ञानी है—तू उसके प्रति इतना चिंतित और नरमदिल होना क्यों चाहेगा? तू मुझे मारता है, पर ऐसा करने से तुझे तकलीफ़ होती है। मनुष्य में क्या है जो तेरी देखभाल और चिंता के लायक है?" अय्यूब की प्रार्थनाएँ परमेश्वर के कानों तक पहुँच गईं, और परमेश्वर ख़ामोश था, कोई भी आवाज़ किए बिना बस देख रहा था...। हर उपलब्ध चाल आज़माने और उसका कोई फायदा नहीं होने पर, शैतान चुपचाप चला गया, किंतु इससे परमेश्वर द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं का अंत नहीं हुआ। चूँकि अय्यूब में प्रकट की गई परमेश्वर की सामर्थ्य सार्वजनिक नहीं की गई थी, इसलिए अय्यूब की कहानी शैतान के पीछे हटने के साथ समाप्त नहीं हुई। अन्य पात्रों के प्रवेश करने के साथ, अभी और भी दर्शनीय दृश्य आने बाकी थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 45

अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का एक और आविर्भाव सभी चीजों में उसके द्वारा परमेश्ववर के नाम का गुणगान करना है

अय्यूब ने शैतान के विध्वंस झेले थे, किंतु फिर भी उसने यहोवा परमेश्वर का नाम नहीं तजा। उसकी पत्नी पहली थी जो बाहर आई और, मनुष्य की आँखों को दिखाई दे सकने वाले रूप में शैतान की भूमिका निभाते हुए, उसने अय्यूब पर आक्रमण किया। मूल पाठ इसका वर्णन इस प्रकार करता है : "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा'" (अय्यूब 2:9)। ये वे शब्द थे जो मनुष्य के छद्मभेष में शैतान के द्वारा कहे गए थे। वे एक आक्रमण, और एक आरोप, और साथ ही फुसलावा, एक प्रलोभन, और कलंक भी थे। अय्यूब की देह पर आक्रमण करने में विफल होने पर, फिर शैतान ने उसकी सत्यनिष्ठा पर सीधा हमला किया, वह इसका उपयोग अय्यूब से उसकी सत्यनिष्ठा छुड़वाने, परमेश्वर का त्याग करवाने, और जीते नहीं रहने देने के लिए करना चाहता था। इसलिए शैतान भी अय्यूब को प्रलोभित करने के लिए ऐसे वचनों का उपयोग करना चाहता था : यदि अय्यूब यहोवा का नाम त्याग देता, तो उसे ऐसी यंत्रणा सहने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपने को देह की यंत्रणा से मुक्त कर सकता था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने यह कहकर उसे झिड़का, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" (अय्यूब 2:10)। अय्यूब लंबे समय से इन वचनों को जानता था, परंतु इस समय उनके बारे में अय्यूब के ज्ञान का सत्य सिद्ध हो गया था।

जब उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को कोसने और मर जाने की सलाह दी, तो उसका आशय था : "तेरा परमेश्वर तुझसे ऐसा ही बर्ताव करता है, तो तू उसे कोसता क्यों नहीं? अभी भी जीवित रहकर तू क्या कर रहा है? तेरा परमेश्वर तेरे प्रति इतना अनुचित है, फिर भी तू कहता है कि 'यहोवा का नाम धन्य हो'। जब तू उसके नाम को धन्य कहता है तो वह तेरे ऊपर आपदा कैसे ला सकता है? जल्दी कर और उसका नाम त्याग दे, और अब से उसका अनुसरण मत करना। इसके बाद, तेरी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी।" इसी पल, वह गवाही उत्पन्न हुई जो परमेश्वर अय्यूब में देखना चाहता था। कोई साधारण मनुष्य ऐसी गवाही नहीं दे सकता था, न ही हम इसके बारे में बाइबल की किसी अन्य कहानी में पढ़ते हैं—परंतु परमेश्वर ने अय्यूब द्वारा ये वचन कहे जाने के बहुत पहले ही यह देख लिया था। परमेश्वर ने तो इस अवसर का उपयोग बस अय्यूब को सबके सामने यह साबित करने देने के लिए करना चाहा था कि परमेश्वर सही था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने न केवल अपनी सत्यनिष्ठा को नहीं छोड़ा या परमेश्वर को नहीं त्यागा, बल्कि उसने अपनी पत्नी से यह भी कहा : "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" क्या ये वचन बहुत महत्व रखते हैं? यहाँ, केवल एक ही तथ्य इन वचनों का महत्व सिद्ध करने में सक्षम है। इन वचनों का महत्व यह है कि उन्हें परमेश्वर द्वारा अपने हृदय में स्वीकार किया गया है, ये वे वचन हैं जो परमेश्वर द्वारा वांछित थे, ये वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर सुनना चाहता था, और ये वे परिणाम हैं जिन्हें परमेश्वर देखने को लालायित था; ये वचन अय्यूब की गवाही का सार भी हैं। इसमें, अय्यूब की पूर्णता, खरापन, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूर रहना प्रमाणित हुए थे। अय्यूब की अनमोलता इसमें निहित है कि जब उसे प्रलोभित किया गया था, और यहाँ तक कि जब उसका पूरा शरीर दुःखदायी फोड़ों से ढँक गया था, जब उसने अत्यधिक यंत्रणा सही थी, और जब उसकी पत्नी और कुटुंबियों ने उसे सलाह दी थी, तब भी उसने ऐसे वचन कहे थे। इसे दूसरे ढँग से कहें, तो अपने हृदय में वह मानता था कि, चाहे जो भी प्रलोभन हों, या दारुण दुःख या यंत्रणा चाहे जितनी भी कष्टदायी हो, यहाँ तक कि उसके ऊपर यदि चाहे मृत्यु ही आनी हो, तब भी वह परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग नहीं ठुकराएगा। तो, तुम देखो, कि परमेश्वर उसके हृदय में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता था, और उसके हृदय में केवल परमेश्वर ही था। यही कारण है कि हम पवित्र शास्त्र में उसके बारे में ऐसे विवरण पढ़ते हैं : इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया। उसने न केवल अपने होंठों से पाप नहीं किया, बल्कि अपने हृदय में उसने परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत भी नहीं की। उसने परमेश्वर के बारे में ठेस पहुँचाने वाले वचन नहीं कहे, न ही उसने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया। न केवल उसके मुँह ने परमेश्वर के नाम को धन्य किया, बल्कि अपने हृदय में भी उसने परमेश्वर के नाम को धन्य किया; उसका मुँह और हृदय एक जैसे थे। यह परमेश्वर द्वारा देखा गया सच्चा अय्यूब था, और बिल्कुल यही वह कारण था कि क्यों परमेश्वर ने अय्यूब को सँजोकर रखा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 46

अय्यूब के बारे में लोगों की अनेक ग़लतफ़हमियाँ

अय्यूब द्वारा झेली गई कठिनाईयाँ परमेश्वर द्वारा भेजे गए स्वर्गदूतों का कार्य नहीं थीं, न ही यह परमेश्वर द्वारा अपने हाथ से उत्पन्न था। इसके बजाय, यह परमेश्वर के शत्रु, शैतान, द्वारा व्यक्तिगत रूप से उत्पन्न किया गया था। परिणामस्वरूप, अय्यूब द्वारा झेली गई कठिनाईयों का स्तर अत्यधिक प्रगाढ़ था। फिर भी इस क्षण अय्यूब ने, बिना किसी संशय के, अपने हृदय में परमेश्वर के बारे में अपना प्रतिदिन का ज्ञान, अपने प्रतिदिन के कार्यकलापों के सिद्धांत, और परमेश्वर के प्रति अपनी प्रवृत्ति प्रदर्शित की थी—यही सत्य है। यदि अय्यूब को लुभाया नहीं गया होता, यदि परमेश्वर अय्यूब के ऊपर परीक्षण नहीं लाया होता, तो जब अय्यूब ने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," तब तुम कहते कि अय्यूब पाखंडी है; परमेश्वर ने उसे इतनी सारी संपत्तियाँ दी थीं, इसलिए सहज ही उसने यहोवा के नाम को धन्य कहा। यदि परीक्षाओं से गुज़ारे जाने से पहले, अय्यूब ने कहा होता, "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तो तुम कहते कि अय्यूब बढ़ा-चढ़ा कर बातें कर रहा था, और वह परमेश्वर के नाम को नहीं त्यागेगा क्योंकि उसे परमेश्वर के हाथ से प्रायः धन्य किया गया था। तुम कहते कि यदि परमेश्वर उसके ऊपर विपत्ति लाया होता, तो उसने निश्चित रूप से परमेश्वर के नाम को त्याग दिया होता। फिर भी जब अय्यूब ने अपने को ऐसी परिस्थितियों में पाया जिनकी कोई भी कामना नहीं करेगा या देखना नहीं चाहेगा, परिस्थितियाँ जो कोई नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर टूटें, जिनके अपने ऊपर आने से वे डरेंगे, परिस्थितियाँ जिन्हें परमेश्वर भी देखना सहन नहीं कर सकता था, उन परिस्थतियों में भी अय्यूब अपनी सत्यनिष्ठा को थामे रख पाया था : "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" और "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इस समय के अय्यूब के आचरण से सामना होने पर, जो लोग ऊँची-ऊँची बातें करना पसंद करते हैं, और जो शब्द और सिद्धांत बोलना पसंद करते हैं, वे सब अवाक रह जाते हैं। जो केवल भाषण में ही परमेश्वर के नाम का गुणगान करते हैं, किंतु जिन्होंने कभी परमेश्वर की परीक्षाओं को स्वीकार नहीं किया, वे उसी सत्यनिष्ठा द्वारा निंदित किए जाते हैं जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामे रखा था, और जिन्होंने कभी नहीं माना कि मनुष्य परमेश्वर के मार्ग को दृढ़ता से थामे रख पाता है वे अय्यूब की गवाही द्वारा परखे जाते हैं। इन परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के आचरण और उसके द्वारा बोले गए वचनों से सामना होने पर, कुछ लोग भ्रमित महसूस करेंगे, कुछ लोग ईर्ष्यालु महसूस करेंगे, कुछ लोग संदेहग्रस्त महसूस करेंगे, और यहाँ तक कि कुछ उदासीन भी दिखाई देंगे, अय्यूब की गवाही स्वीकार करने से इनकार कर देंगे क्योंकि वे न केवल उस यंत्रणा को देखते हैं जो परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के ऊपर आ पड़ी थी, और अय्यूब द्वारा बोले गए वचन पढ़ते हैं, बल्कि वे अय्यूब द्वारा उसके ऊपर परीक्षाएँ आने के समय दिखाई गई मानवीय "कमज़ोरी" को भी देखते हैं। इस "कमज़ोरी" को वे अय्यूब की पूर्णता में अपेक्षित अपूर्णता मानते हैं, उस मनुष्य में एक धब्बा जो परमेश्वर की नज़रों में पूर्ण था। कहने का तात्पर्य यह कि यह माना जाता है कि जो लोग पूर्ण होते हैं वे दाग़ या धब्बे से रहित, दोषहीन होते हैं, कि उनमें कोई कमज़ोरी नहीं होती है, उन्हें पीड़ा का ज्ञान नहीं होता है, कि वे कभी अप्रसन्न या उदास महसूस नहीं करते हैं, और वे घृणा या किसी भी बाह्य उग्र व्यवहार से रहित होते हैं; परिणामस्वरूप, लोगों का बड़ा बहुमत नहीं मानता कि अय्यूब सचमुच पूर्ण था। लोग परीक्षाओं के दौरान उसके बहुत-से व्यवहार का अनुमोदन नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब ने अपनी संपत्ति और बच्चों को गँवा दिया, तो वह फूट-फूट कर नहीं रोया, जैसा कि लोग कल्पना करते। उसमें "शिष्टचार का अभाव" लोगों को यह सोचने को विवश करता है कि वह भावशून्य था, क्योंकि अपने परिवार के प्रति वह आँसुओं, या लगाव से रहित था। यह आरंभिक बुरी छाप है जो अय्यूब की लोगों पर पड़ती है। वे उसके बाद उसका व्यवहार और भी उलझाने वाला पाते हैं : "बागा फाड़" की व्याख्या लोगों ने परमेश्वर के प्रति उसके अनादर के रूप में की है, और "सिर मुँडाने" का अर्थ ग़लत ढँग से परमेश्वर के प्रति अय्यूब की निंदा और विरोध माना जाता है। अय्यूब के इन शब्दों के अलावा कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," लोगों को अय्यूब में ऐसी कोई भी धार्मिकता अलग से दिखाई नहीं देती जिसकी प्रशंसा परमेश्वर द्वारा की गई थी, और इस प्रकार उनके एक बड़े बहुमत द्वारा किया गया अय्यूब का आँकलन अबूझता, ग़लतफ़हमी, संदेह, निंदा, और मात्र सैद्धांतिक स्वीकृति के अलावा कुछ नहीं है। उनमें से कोई भी यहोवा परमेश्वर के इन वचनों को सचमुच समझने और सराहने में समर्थ नहीं है कि अय्यूब पूर्ण और खरा मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था।

अय्यूब के बारे में उनकी उपरोक्त धारणा के आधार पर, लोगों में उसकी धार्मिकता को लेकर और भी संदेह हैं, क्योंकि पवित्र शास्त्र में दर्ज अय्यूब के कार्यकलाप और उसका आचरण उतने ज़ोरदार ढँग से मर्मस्पर्शी नहीं हैं जितनी लोगों ने कल्पना की थी। न केवल उसने कोई बड़ा साहसिक कार्य पूरा नहीं किया, बल्कि राख के बीच बैठकर उसने अपने को खुजाने के लिए मटके का एक टुकड़ा भी लिया। यह कार्य भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है और उन्हें अय्यूब की धार्मिकता पर संदेह करने—और यहाँ तक कि उसे नकारने—का कारण बनता है, क्योंकि स्वयं को खुजाते समय अय्यूब ने परमेश्वर से न तो प्रार्थना या न ही प्रतिज्ञाएँ कीं; इतना ही नहीं, न ही वह दर्द के आँसू रोते देखा गया। इस समय, लोग अय्यूब की केवल कमज़ोरी ही देखते हैं और उसके सिवा कुछ नहीं देखते, और इसलिए यहाँ तक कि जब वे अय्यूब को यह कहते हुए सुनते हैं, "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" तब वे बिल्कुल भावशून्य रह जाते हैं, या अन्यथा दुविधा में पड़ जाते हैं, और अय्यूब के वचनों से उसकी धार्मिकता को अब भी पहचान नहीं पाते हैं। अपने परीक्षणों की यंत्रणा के दौरान अय्यूब लोगों पर जो मूल छाप छोड़ता है वह यह है कि वह न तो दब्बू था और न ही दंभी। लोग उसके व्यवहार के पीछे की उस कहानी को नहीं देखते जो उसके हृदय की गहराइयों में घटी थी, न ही वे उसके हृदय के भीतर परमेश्वर का भय या बुराई से दूर रहने के मार्ग के सिद्धांत का अनुपालन देखते हैं। उसकी स्थिरचित्तता लोगों को यह सोचने को विवश करती है कि उसकी पूर्णता और खरापन खोखले शब्द मात्र थे, कि परमेश्वर के प्रति उसका भय सुनी-सुनाई बात भर थी; इसी बीच, उसने बाह्य रूप से जो "कमज़ोरी" प्रकट की थी, वह उनके ऊपर गहरी छाप छोड़ती है, परमेश्वर जिसे पूर्ण और खरे मनुष्य के रूप में परिभाषित करता है उसके बारे में एक "नया परिप्रेक्ष्य", और यहाँ तक कि उसके प्रति "एक नई समझ" भी देती है। ऐसा एक "नया परिप्रेक्ष्य" और "नई समझ" तब प्रमाणित होते हैं जब अय्यूब ने अपना मुँह खोला और उस दिन को कोसा जब वह पैदा हुआ था।

यद्यपि उसने जो यंत्रणा झेली उसका स्तर किसी भी मनुष्य के लिए अकल्पनीय और अबूझ है, फिर भी उसने कोई सुनी-सुनाई बात नहीं कही, बल्कि उसने तो स्वयं अपने उपायों से अपने शरीर का दर्द कम भर किया था। जैसा पवित्र शास्त्र में दर्ज है, उसने कहा : "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा'" (अय्यूब 3:3)। कदाचित, किसी ने भी इन वचनों को कभी महत्वपूर्ण नहीं माना है, और कदाचित ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने इन पर ध्यान दिया है। तुम लोगों के विचार से, क्या इनका अभिप्राय यह है कि अय्यूब परमेश्वर का विरोध करता था? क्या वे परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत हैं? मैं जानता हूँ कि अय्यूब के द्वारा कहे गए इन वचनों के बारे में तुम लोगों में से कइयों के कुछ निश्चित विचार हैं और वे मानते हैं कि यदि अय्यूब पूर्ण और खरा था, तो उसे कोई कमज़ोरी या वेदना नहीं दर्शानी चाहिए थी, और इसके बजाय शैतान के किसी भी आक्रमण का सकारात्मक ढँग से सामना करना ही चाहिए था, और यहाँ तक कि शैतान के प्रलोभनों के सामने मुस्कराना भी चाहिए था। उसे शैतान के द्वारा उसकी देह पर बरपाई गई किसी भी यंत्रणा के प्रति रत्ती भर भी प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए थी, न ही उसे अपने हृदय के भीतर की भावनाओं को ज़रा भी झलकने देना चाहिए था। उसे कहना चाहिए था कि परमेश्वर इन परीक्षाओं को और कठोर बना दे। यही वह है जो अविचल और सच्चे अर्थ में परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहे वाले किसी भी व्यक्ति को प्रदर्शित और धारण करना चाहिए। इस चरम यंत्रणा के बीच, अय्यूब ने अपने जन्म के दिन को कोसने के सिवा कुछ न किया। उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की, और परमेश्वर का विरोध करने का तो उसका और भी कोई इरादा नहीं था। यह कर पाना उतना आसान नहीं है जितना कहना, क्योंकि प्राचीन समयों से लेकर आज तक, किसी ने भी अब तक ऐसे प्रलोभन अनुभव नहीं किए या वह नहीं झेला जो अय्यूब पर टूटा था। तो, किसी को भी अब तक अय्यूब के समान प्रलोभनों से क्यों नहीं गुज़ारा गया है? ऐसा इसलिए है क्योंकि, जैसा कि परमेश्वर इसे देखता है, कोई भी ऐसा उत्तरदायित्व या आदेश वहन करने में समर्थ नहीं है, कोई भी वैसा नहीं कर सकता है जैसा अय्यूब ने किया, और इतना ही नहीं, कोई भी, अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा, ऐसा नहीं कर सकता था कि इतने सब के बाद भी परमेश्वर के नाम को नहीं त्यागे और यहोवा परमेश्वर के नाम को धन्य नहीं कहता रहे, जैसा अय्यूब ने उस समय किया था जब उस पर ऐसी यंत्रणा टूटी थी। क्या कोई यह कर सकता था? जब हम अय्यूब के बारे में ऐसा कहते हैं, तो क्या हम उसके व्यवहार की प्रशंसा कर रहे हैं? वह एक धार्मिक मनुष्य था, और परमेश्वर की ऐसी गवाही दे पाने में समर्थ था, और शैतान को अपना सिर अपने हाथों में लिए भागने को मजबूर करने में समर्थ था, ताकि वह उस पर दोष मढ़ने के लिए फिर कभी परमेश्वर के समक्ष न आए—तो उसकी प्रशंसा करने में क्या ग़लत है? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों के मानक परमेश्वर से भी ऊँचे हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि जब परीक्षाएँ तुम लोगों पर टूटें तब तुम अय्यूब से भी बेहतर करो? अय्यूब की प्रशंसा परमेश्वर द्वारा की गई थी—तुम लोगों को भला क्या आपत्तियाँ हो सकती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 47

अय्यूब अपने जन्म के दिन को कोसता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि परमेश्वर को उसके द्वारा पीड़ा पहुँचे

मैं अक्सर कहता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, जबकि लोग लोगों का बाह्य स्वरूप देखते हैं। चूँकि परमेश्वर लोगों के हृदयों के भीतर देखता है, इसलिए वह उनका सार समझता है, जबकि लोग अन्य लोगों का सार उनके बाह्य स्वरूप के आधार पर परिभाषित करते हैं। जब अय्यूब ने अपना मुँह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा, तब इस कृत्य ने, अय्यूब के तीन मित्रों सहित, सभी आध्यात्मिक महानुभावों को अचंभित कर दिया। मनुष्य परमेश्वर से आया, और उसे जीवन तथा देह के लिए, और साथ ही अपने जन्म के दिन के लिए भी, जो परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किया गया है, आभारी होना चाहिए, और उन्हें कोसना नहीं चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसे साधारण लोग समझ सकते और इसकी परिकल्पना कर सकते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, यह समझ पवित्र और अनुल्लंघनीय है, और यह ऐसा सत्य है जो कभी बदल नहीं सकता है। दूसरी ओर, अय्यूब ने नियम तोड़े : उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। यह ऐसा कृत्य है जिसे साधारण लोग सीमा पर करके निषिद्ध क्षेत्र में जाना मानते हैं। अय्यूब न केवल लोगों की समझ और सहानुभूति का अधिकारी नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की क्षमा का भी अधिकारी नहीं है। साथ ही साथ, और भी अधिक लोग अय्यूब की धार्मिकता के प्रति शंकालु हो जाते हैं, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि अपने प्रति परमेश्वर की कृपा ने अय्यूब को आत्म-आसक्त बना दिया था; इसने उसे इतना निर्भीक और उतावला बना दिया था कि उसने न केवल अपने जीवनकाल के दौरान उसे आशीष देने के लिए और उसकी देखभाल करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि उसने अपने जन्म के दिन को भी विनाश के लिए शापित कर दिया। यदि यह परमेश्वर के प्रति विरोध नहीं तो क्या है? ऐसे उथलेपन लोगों को अय्यूब के इस कृत्य की निंदा करने के लिए प्रमाण उपलब्ध कराते हैं, परंतु कौन जान सकता है कि अय्यूब उस समय सचमुच क्या सोच रहा था? कौन वह कारण जान सकता है कि अय्यूब ने उस तरह क्यों किया? इसकी अंतर्कथा और कारण तो बस परमेश्वर और स्वयं अय्यूब ही जानते हैं।

जब शैतान ने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुँचाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया, तो बचने के उपायों या प्रतिरोध करने की शक्ति के बिना, अय्यूब उसके चंगुल में फँस गया। उसके शरीर और उसकी आत्मा ने अत्यधिक पीड़ा झेली, और इस पीड़ा ने उसे देह में रह रहे मनुष्य की महत्वहीनता, निर्बलता, और शक्तिहीनता से गहराई से परिचित कराया। साथ ही साथ, उसने गहरी सराहना और समझ भी प्राप्त की कि परमेश्वर मनुष्यजाति की परवाह और देखभाल करने वाले मन का क्यों है। शैतान के चंगुल में, अय्यूब को एहसास हुआ कि मनुष्य, जो हाड़-माँस का है, वास्तव में बहुत ही निर्बल और कमज़ोर है। जब वह अपने घुटनों के बल गिरा और परमेश्वर से प्रार्थना की, तो उसने महसूस किया मानो परमेश्वर अपना चेहरा ढँक रहा और छिप रहा था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे पूरी तरह शैतान के हाथ में रख दिया था। साथ ही साथ, परमेश्वर उसके लिए रोया भी, और इतना ही नहीं, वह उसके लिए व्यथित था; परमेश्वर उसकी पीड़ा से पीड़ित, और उसकी चोट से चोटिल था...। अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा महसूस की, साथ ही यह भी कि परमेश्वर के लिए यह कितना असहनीय था...। अय्यूब परमेश्वर को और अधिक व्यथा पहुँचाना नहीं चाहता था, न ही वह यह चाहता था कि परमेश्वर उसके लिए रोए, परमेश्वर को अपने द्वारा पीड़ित होते देखना तो वह और भी नहीं चाहता था। इस क्षण, अय्यूब बस अपनी देह को उतार देना चाहता था, ताकि इस देह द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा को अब और न सहना पड़े, क्योंकि यह उसकी पीड़ा से परमेश्वर का उत्पीड़ित होना रोक देगा—तो भी वह नहीं कर सका, और उसे न केवल देह की पीड़ा, बल्कि परमेश्वर को उद्विग्न नहीं करने की इच्छा की यंत्रणा भी सहनी पड़ी। इन दो पीड़ाओं ने—एक देह से, और एक आत्मा से—अय्यूब पर हृदयविदारक, अत्यंत दारूण पीड़ा बरपाई, और उसे महसूस कराया कि कैसे हाड़-माँस से बने मनुष्य की सीमाएँ उसे कुंठित और असहाय बना सकती हैं। इन परिस्थितियों में, परमेश्वर के लिए उसकी ललक और भी तीव्र हो गई थी, और शैतान के लिए उसकी घृणा और भी गहरी हो गई थी। इस समय, परमेश्वर को उसके वास्ते आँसू-आँसू रोते या दर्द सहते देखने की अपेक्षा, अय्यूब ने मनुष्यों के इस संसार में कभी जन्म ही न लेना पसंद किया होता, बल्कि उसका अस्तित्व ही न होता। वह अपनी देह से गहरी घृणा करने लगा, और अपने आप से, अपने जन्म के दिन से, और यहाँ तक कि उस सबसे जो उससे जुड़ा था ऊबने और थकने लगा। वह अपने जन्म के दिन का और उसके साथ जुड़ी किसी भी चीज़ का अब और उल्लेख किया जाना नहीं चाहता था, और इसलिए उसने अपना मुँह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा : "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा।' वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो" (अय्यूब 3:3-4)। अय्यूब के वचन स्वयं अपने प्रति उसकी घृणा वहन करते हैं, "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा'," और साथ ही उनमें स्वयं अपने प्रति जो दोष उसने महसूस किया वह और परमेश्वर को पीड़ा पहुँचाने के लिए ऋणी होने का बोध भी है, "वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो।" ये दो अंश इस बात की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं कि अय्यूब ने तब कैसा महसूस किया था, और सभी को उसकी पूर्णता और खरापन प्रदर्शित करते हैं। साथ ही साथ, बिल्कुल वैसे ही जैसे अय्यूब ने चाहा था, परमेश्वर के प्रति उसकी आस्था और आज्ञाकारिता, साथ ही परमेश्वर के प्रति उसका भय सचमुच ऊँचे उठ गए थे। निस्संदेह, यह ऊँचा उठना ठीक वही प्रभाव है जिसकी परमेश्वर ने अपेक्षा की थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 48

अय्यूब शैतान को हराता है और परमेश्वर की नज़रों में सच्चा मनुष्य बन जाता है

जब अय्यूब पहले-पहल अपनी परीक्षाओं से गुज़रा, तब उसकी सारी संपत्ति और उसके सभी बच्चों को उससे छीन लिया गया था, परंतु इसके परिणामस्वरूप वह गिरा नहीं या उसने ऐसा कुछ नहीं कहा जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप था। उसने शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर ली थी, और उसने अपनी भौतिक संपत्ति, अपनी संतान और अपनी समस्त सांसारिक संपत्तियों को गँवाने की परीक्षा पर विजय प्राप्त कर ली थी, जिसका तात्पर्य यह है कि वह उस समय परमेश्वर का आज्ञापालन करने में समर्थ था जब उसने चीज़ें उससे ली थीं, और परमेश्वर ने जो किया उसके लिए वह परमेश्वर को धन्यवाद देने और उसकी स्तुति करने में समर्थ था। ऐसा था अय्यूब का आचरण शैतान के प्रथम प्रलोभन के दौरान, और ऐसी ही थी अय्यूब की गवाही भी परमेश्वर के प्रथम परीक्षण के दौरान। दूसरी परीक्षा में, अय्यूब को पीड़ा पहुँचाने के लिए शैतान ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और हालाँकि अय्यूब ने इतनी अधिक पीड़ा अनुभव की जितनी उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी, तब भी उसकी गवाही लोगों को अचंभित कर देने के लिए काफी थी। उसने एक बार फिर शैतान को हराने के लिए अपनी सहनशक्ति, दृढ़विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का, और साथ ही परमेश्वर के प्रति अपने भय का उपयोग किया, और उसका आचरण और उसकी गवाही एक बार फिर परमेश्वर द्वारा अनुमोदित और उपकृत की गई। इस प्रलोभन के दौरान, अय्यूब ने अपने वास्तविक आचरण का उपयोग करते हुए शैतान के समक्ष घोषणा की कि देह की पीड़ा परमेश्वर के प्रति उसकी आस्था और आज्ञाकारिता को पलट नहीं सकती है या परमेश्वर के प्रति उसकी निष्ठा और परमेश्वर के भय को छीन नहीं सकती है; इसलिए कि मृत्यु उसके सामने खड़ी है वह न तो परमेश्वर को त्यागेगा या न ही स्वयं अपनी पूर्णता और खरापन छोड़ेगा। अय्यूब के दृढ़संकल्प ने शैतान को कायर बना दिया, उसकी आस्था ने शैतान को भीतकातर और कँपकँपाता छोड़ दिया, जीवन और मरण की लड़ाई के दौरान वह शैतान के विरुद्ध जितनी उत्कटता से लड़ा था उसने शैतान के भीतर गहरी घृणा और रोष उत्पन्न कर दिया; उसकी पूर्णता और खरेपन ने शैतान की ऐसी हालत कर दी कि वह उसके साथ और कुछ नहीं कर सकता था, ऐसे कि शैतान ने उस पर अपने आक्रमण तज दिए और अपने वे आरोप छोड़ दिए जो उसने अय्यूब के विरुद्ध यहोवा परमेश्वर के समक्ष लगाए थे। इसका अर्थ था कि अय्यूब ने संसार पर विजय पा ली थी, उसने देह पर विजय पा ली थी, उसने शैतान पर विजय पा ली थी, और उसने मृत्यु पर विजय पा ली थी; वह पूर्णतः और सर्वथा ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर का था। इन दो परीक्षाओं के दौरान, अय्यूब अपनी गवाही पर डटा रहा, और उसने अपनी पूर्णता और खरेपन को सचमुच जिया, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के अपने जीवन जीने के सिद्धांतों का दायरा व्यापक कर लिया। इन दोनों परीक्षाओं से गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब में एक अधिक समृद्ध अनुभव ने जन्म लिया, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व तथा तपा हुआ बना दिया, इसने उसे और मज़बूत, और अधिक दृढ़विश्वास वाला बना दिया, और इसने जिस सत्यनिष्ठा पर वह दृढ़ता से डटा रहा था उसकी सच्चाई और योग्यता के प्रति उसे अधिक आत्मविश्वासी बना दिया। यहोवा परमेश्वर द्वारा ली गई अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के प्रति परमेश्वर की चिंता की गहरी समझ और बोध प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की अनमोलता को समझने दिया, जिस बिंदु से परमेश्वर के उसके भय में परमेश्वर के प्रति सोच-विचार और उसके लिए प्रेम भी जुड़ गए थे। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे पराया नहीं किया, बल्कि वे उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट ले आईं। जब अय्यूब द्वारा सही गई दैहिक पीड़ा अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई, तब परमेश्वर यहोवा से जो सरोकार उसने महसूस किया था उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिया। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, बल्कि यह उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के प्रति सोच-विचार का और उसके लिए प्रेम का स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के प्रति उसके सोच-विचार और उसके लिए उसके प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य यह है कि चूँकि वह स्वयं से घृणा करता था, और वह परमेश्वर को यंत्रणा देने का अनिच्छुक था, और यह सहन नहीं कर सकता था, इसलिए उसका सोच-विचार और प्रेम निःस्वार्थता के बिंदु पर पहुँच गए थे। इस समय, अय्यूब ने परमेश्वर के लिए अपनी लंबे समय से चली आती श्रृद्धा और ललक को और परमेश्वर के प्रति निष्ठा को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक ऊँचा उठा दिया था। साथ ही साथ, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था और आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक ऊँचा उठा दिया था। उसने स्वयं को ऐसा कोई कार्य नहीं करने दिया जो परमेश्वर को हानि पहुँचाता, उसने स्वयं को ऐसे किसी आचरण की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाता, और उसने अपने को स्वयं अपने कारणों से परमेश्वर पर कोई दुःख, संताप, या यहाँ तक कि अप्रसन्नता लाने की अनुमति नहीं दी। परमेश्वर की नज़रों में, यद्यपि अय्यूब अब भी वह पहले वाला अय्यूब ही था, फिर भी अय्यूब की आस्था, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय ने परमेश्वर को पूर्ण संतुष्टि और आनन्द पहुँचाया था। इस समय, अय्यूब ने वह पूर्णता प्राप्त कर ली थी जिसे प्राप्त करने की अपेक्षा परमेश्वर ने उससे की थी; वह परमेश्वर की नज़रों में सचमुच "पूर्ण और खरा" कहलाने योग्य व्यक्ति बन गया था। उसके धार्मिक कर्मों ने उसे शैतान पर विजय प्राप्त करने दी और परमेश्वर की अपनी गवाही पर डटे रहने दिया। इसलिए, उसके धार्मिक कर्मों ने उसे पूर्ण भी बनाया, और उसके जीवन के मूल्य को पहले किसी भी समय से अधिक ऊँचा उठाने, और श्रेष्ठतर होने दिया, और उन्होंने उसे वह सबसे पहला व्यक्ति भी बना दिया जिस पर शैतान अब और न हमले करेगा और न लुभाएगा। चूँकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए शैतान द्वारा उस पर दोष मढ़े गए और उसे प्रलोभित किया गया था; चूँकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसे शैतान को सौंपा गया था; चूँकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसने शैतान पर विजय प्राप्त की और उसे हराया था, और वह अपनी गवाही पर डटा रहा था। अब से, अय्यूब ऐसा पहला व्यक्ति बन गया जिसे फिर कभी शैतान को नहीं सौंपा जाएगा, वह सचमुच परमेश्वर के सिंहासन के सम्मुख आ गया और उसने, शैतान की जासूसी या तबाही के बिना, परमेश्वर की आशीषों के अधीन प्रकाश में जीवन जिया...। वह परमेश्वर की नज़रों में सच्चा मनुष्य बन गया था, उसे स्वतंत्र कर दिया गया था ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 49

अय्यूब के दैनिक जीवन में हम उसकी पूर्णता, खरापन, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूर रहना देखते हैं

यदि हमें अय्यूब की चर्चा करनी है, तो हमें उसके बारे में उस आँकलन से ही आरंभ करना चाहिए जो परमेश्वर के मुख से कहा गया था : "उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

आओ हम सबसे पहले अय्यूब की पूर्णता और खरेपन के बारे में जानें।

तुम लोग "पूर्ण" और "खरा" शब्दों से क्या समझते हो? क्या तुम मानते हो कि अय्यूब कलंक रहित था, कि वह सम्माननीय था? निस्संदेह, यह "पूर्ण" और "खरे" की शाब्दिक व्याख्या और समझ होगी। परंतु वास्तविक जीवन का परिप्रेक्ष्य अय्यूब की सच्ची समझ से अभिन्न है—वचन, किताबें, और सिद्धांत अकेले कोई उत्तर प्रदान नहीं करेंगे। हम अय्यूब के घरेलू जीवन पर नज़र डालते हुए आरंभ करेंगे, इस पर कि अपने जीवन के दौरान उसका सामान्य आचरण किस प्रकार का था। यह हमें जीवन में उसके सिद्धांतों और उद्देश्यों, और साथ ही उसके व्यक्तित्व और खोज के बारे में बताएगा। आओ अब हम अय्यूब 1:3 के अंतिम वचन पढ़ें : "पूर्वी देशों के लोगों में वह सबसे बड़ा था।" ये वचन जो कह रहे हैं वह यह है कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ऊँची थी, और यद्यपि हमें कारण नहीं बताया गया है कि पूर्वी देशों के लोगों में वह अपनी प्रचुर धन-संपत्ति के कारण सबसे बड़ा था, या इसलिए कि वह पूर्ण और खरा था और परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, कुल मिलाकर, हम इतना जानते हैं कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ही मूल्यवान थी। जैसा कि बाइबल में अभिलिखित है, अय्यूब के बारे में लोगों की पहली धारणा यह थी कि अय्यूब पूर्ण था, कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और यह कि उसके पास बहुत धन-संपत्ति और सम्माननीय हैसियत थी। ऐसे परिवेश में और ऐसी परिस्थितियों में रह रहे साधारण व्यक्ति के लिए, अय्यूब का आहार, जीवन की गुणवत्ता, और उसके व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पहलू अधिकांश लोगों के ध्यान के केंद्रबिंदु होंगे; इसलिए हमें पवित्र शास्त्र आगे पढ़ना होगा : "उसके बेटे बारी-बारी से एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे। जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, 'कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो।' इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था" (अय्यूब 1:4-5)। यह अंश हमें दो बातें बताता है : पहली यह कि अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ, बहुत खाने और पीने के साथ, नियमित रूप से भोज करते थे; दूसरी यह है कि अय्यूब बहुधा होमबलियाँ चढ़ाता था क्योंकि वह अपने पुत्रों और पुत्रियों के लिए प्रायः चिंतित रहता था, इस डर से कि वे पाप कर रहे थे, कि उन्होंने अपने हृदय में परमेश्वर को त्याग दिया था। इसमें दो अलग-अलग प्रकार के लोगों के जीवन का वर्णन किया गया है। पहले, अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ, जो अपनी संपन्नता के कारण अक़्सर भोज करते थे, ख़र्चीला जीवन जीते थे, वे अपने मन की संतुष्टि तक दाखरस पीते और दावत करते थे, और भौतिक संपदा से उत्पन्न उच्च जीवनशैली का आनंद उठाते थे। ऐसा जीवन जीते हुए, यह अवश्यंभावी ही था कि वे अक़्सर पाप करते होंगे और परमेश्वर को नाराज़ करते होंगे—फिर भी वे अपने को पवित्र नहीं करते थे या होमबलि नहीं चढ़ाते थे। तो, तुम देखो, कि परमेश्वर का उनके हृदय में कोई स्थान नहीं था, कि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रहों का कोई विचार नहीं किया, न ही वे परमेश्वर को नाराज़ करने से भयभीत हुए, अपने हृदय में परमेश्वर को त्यागने से तो वे और भी भयभीत नहीं हुए थे। निस्संदेह, हमारा ध्यान अय्यूब के बच्चों पर नहीं है, बल्कि उस पर है जो अय्यूब ने ऐसी चीज़ों से सामना होने पर किया; यह अय्यूब के दैनिक जीवन और उसकी मानवता के सार से जुड़ा दूसरा मामला है, जिसका इस अंश में वर्णन किया गया है। बाइबल अय्यूब के पुत्र और पुत्रियों के भोज का उल्लेख तो करती है, किंतु अय्यूब का कोई उल्लेख नहीं है; केवल इतना कहा गया है कि उसके पुत्र और पुत्रियाँ अक़्सर एक साथ मिलकर खाते और पीते थे। दूसरे शब्दों में, उसने भोज आयोजित नहीं किए, न ही वह अपने पुत्र और पुत्रियों के साथ ख़र्चीले ढँग से खान-पान में शामिल हुआ। धनाढ्य और कई संपत्तियों और सेवकों से संपन्न होते हुए भी, अय्यूब का जीवन विलासी जीवन नहीं था। वह जीवन जीने के अपने सर्वोत्कृष्ट परिवेश से मोहित नहीं हुआ था, और उसने, अपनी संपदा के कारण, स्वयं को देह के आनंदों से ठूँस-ठूँसकर नहीं भरा या होमबलि चढ़ाना नहीं भूला, और इसके कारण अपने हृदय में परमेश्वर से धीरे-धीरे दूर तो वह और भी नहीं हुआ। तो, स्पष्ट रूप से, अय्यूब अपनी जीवनशैली में अनुशासित था, और उसे मिले परमेश्वर के आशीषों के परिणामस्वरूप वह लोभी या सुखवादी नहीं था, और वह जीवन की गुणवत्ता में तल्लीन नहीं था। इसके बजाय, वह विनम्र और शालीन था, वह ठाठ-बाट का आदी नहीं था, और परमेश्वर के सामने वह सतर्क और सावधान था। वह परमेश्वर के अनुग्रहों और आशीषों पर बहुधा विचार करता था, और परमेश्वर से निरंतर भयभीत रहता था। अपने दैनिक जीवन में, अय्यूब अपने पुत्र और पुत्रियों के हेतु होमबलि चढ़ाने के लिए प्रायः जल्दी उठ जाता था। दूसरे शब्दों में, न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरुद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक संपदा का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही उसने परमेश्वर द्वारा ग्रहित स्थान लिया था; चाहे वे स्वयं अपने लिए हों या अपने बच्चों के लिए, अय्यूब के सभी दैनिक कार्यकलाप परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से जुड़े थे। यहोवा परमेश्वर का उसका भय उसके मुँह तक ही नहीं रुका, बल्कि वह कुछ ऐसा था जिसे उसने क्रियान्वित किया था और जो उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक और सभी भागों में प्रतिबिंबित होता था। अय्यूब का यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और उस सार से युक्त था जो न्याय और उन चीज़ो से जो सकारात्मक थीं प्रेम करता था। अय्यूब अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रायः भेजता और पवित्र करता था, इसका अर्थ है कि उसने अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकृति नहीं दी थी या अनुमोदित नहीं किया था; इसके बजाय, अपने हृदय में वह उनके व्यवहार से असंतुष्ट था, और उनकी भर्त्सना करता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके पुत्र और पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला नहीं था, और इसलिए वह प्रायः उनसे यहोवा परमेश्वर के सामने जाने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहता था। अय्यूब के कार्यकलाप हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं, वह पक्ष जिसमें वह कभी उनके साथ नहीं चलता था जो अक्सर पाप करते थे और परमेश्वर को नाराज़ करते थे, बल्कि इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे बचता था। यद्यपि ये लोग उसके पुत्र और पुत्रियाँ थे, फिर भी उसने अपने सिद्धांत इसलिए नहीं छोड़े कि वे उसके अपने सगे-संबंधी थे, न ही वह अपने मनोभावों के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ। अपितु, उसने उनसे स्वीकार करने और यहोवा परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने का आग्रह किया, और उसने उन्हें चेताया कि वे अपने लोभी आनंद के वास्ते परमेश्वर को न तजें। दूसरों के साथ अय्यूब के व्यवहार के सिद्धांत उसके परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सिद्धांतों से अलग नहीं किए जा सकते हैं। वह उससे प्रेम करता था जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत था, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे; और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के विरुद्ध बुराई या पाप करते थे। ऐसा प्रेम और ऐसी घृणा उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित होती थी, और यह अय्यूब का वही खरापन था जिसे परमेश्वर की नज़रों से देखा गया था। स्वाभाविक रूप से, यह उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में दूसरों के साथ उसके रिश्तों में अय्यूब की सच्ची मानवता की अभिव्यक्ति और जीवन यापन भी है, जिसके बारे में हमें अवश्य सीखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 50

अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी मानवता की अभिव्यंजनाएँ (अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी पूर्णता, खरापन, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूर रहने को समझना)

जब अय्यूब ने सुना कि उसकी संपत्ति चुरा ली गई है, कि उसके पुत्र और पुत्रियों ने अपने प्राण गँवा दिए हैं, और उसके सेवकों को मार दिया गया है, तब उसने नीचे लिखे अनुसार प्रतिक्रिया की : "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा" (अय्यूब 1:20)। ये वचन हमें एक तथ्य बताते हैं : यह समाचार सुनने के बाद, अय्यूब घबराया नहीं, वह रोया नहीं या उन सेवकों को दोषी नहीं ठहराया जिन्होंने उसे यह समाचार दिया था, और उसने विवरणों की जाँच और सत्यापन करने तथा यह पता लगाने के लिए कि वास्तव में क्या हुआ था अपराध के दृश्य का मुआयना तो और भी नहीं किया। उसने अपनी संपत्तियों के नुक़्सान पर किसी पीड़ा या खेद का प्रदर्शन नहीं किया, न ही वह अपने बच्चों और अपने प्रियजनों को खो बैठने के कारण फूट-फूटकर रोया। इसके विपरीत, उसने अपना बागा फाड़ा, और अपना सिर मुँडाया, और भूमि पर गिर गया, और आराधना की। अय्यूब के कार्यकलाप किसी भी सामान्य मनुष्य के कार्यकलापों से भिन्न हैं। वे बहुत-से लोगों को भ्रमित करते हैं, और वे उन्हें अय्यूब की "नृशंसता" के कारण अपने हृदय में उसे धिक्कारने को विवश करते हैं। अचानक अपनी संपत्तियाँ गँवा बैठने पर, साधारण लोग हृदय विदीर्ण या हताश दिखाई देते हैं—या, कुछ लोग तो गहरे अवसाद में भी जा सकते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोगों के हृदय में उनकी संपत्ति जीवन भर के प्रयास की द्योतक होती है—यह वह है जिस पर उनका जीवित रहना निर्भर होता है, यह वह आशा है जो उन्हें जीवित रखती है; अपनी संपत्ति गँवा देने का अर्थ है कि उनके प्रयास व्यर्थ रहे हैं, कि वे आशा रहित है, और यहाँ तक कि उनका कोई भविष्य भी नहीं है। किसी भी सामान्य व्यक्ति की अपनी संपत्ति और उसके साथ उनका जो निकट संबंध होता है उसके प्रति यही प्रवृत्ति होती है, और यही लोगों की नज़रों में संपत्ति का महत्व भी है। ऐसे में, लोगों की बड़ी बहुसंख्या अपनी संपत्ति गँवा बैठने के प्रति उसकी उदासीन प्रवृत्ति से भ्रमित महसूस करती है। आज, हम इन सभी लोगों का भ्रम दूर करने जा रहे हैं, यह बताकर कि अय्यूब के हृदय में क्या चल रहा था।

सामान्य समझ कहती है कि परमेश्वर द्वारा इतनी प्रचुर संपत्ति दिए जाने के बाद, अय्यूब को परमेश्वर के सामने शर्मिंदा महसूस करना चाहिए, क्योंकि उसने ये संपत्तियाँ गँवा दी थीं, क्योंकि उसने उनकी देखरेख नहीं की थी या उनका ख्याल नहीं रखा था; उसने परमेश्वर द्वारा उसे दी गई संपत्तियाँ सँभालकर नहीं रखी थीं। इस प्रकार, जब उसने सुना कि उसकी संपत्ति चुरा ली गई है, तब उसकी पहली प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए थी कि वह अपराध के दृश्य पर जाता और जो गँवा बैठा था उन सब सामानों की सूची बनाता, और फिर परमेश्वर के सामने जाकर स्वीकार करता ताकि वह एक बार फिर परमेश्वर के आशीष प्राप्त कर सके। परंतु अय्यूब ने ऐसा नहीं किया, और उसके पास स्वाभाविक ही ऐसा न करने के अपने कारण थे। अपने हृदय में, अय्यूब गहराई से मानता था कि उसके पास जो कुछ भी था वह सब परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किया गया था, और उसके अपने श्रम की उपज नहीं था। इस प्रकार, वह इन आशीषों को कोई ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखता था जिसका लाभ उठाया जाए, बल्कि इसके बजाय उसने अपने जीवित रहने के सिद्धांतों का सहारा लेकर उस मार्ग को अपनी पूरी शक्ति से थामे रखा जो उसे थामना ही चाहिए था। उसने परमेश्वर की आशीषों को सँजोकर रखा और उनके लिए धन्यवाद दिया, किंतु वह आशीषों से आसक्त नहीं था, न ही उसने और अधिक आशीषों की खोज की। ऐसी थी उसकी प्रवृत्ति संपत्ति के प्रति। उसने आशीष प्राप्त करने की ख़ातिर न तो कभी कुछ किया था, न ही वह परमेश्वर के आशीषों के अभाव या हानि से चिंतित या व्यथित था; वह परमेश्वर के आशीषों के कारण न तो ख़ुशी से पागल या उन्मत्त हुआ था, न ही उसने बारंबार आनंद लिए गए इन आशीषों के कारण परमेश्वर के मार्ग की उपेक्षा की या परमेश्वर का अनुग्रह विस्मृत किया था। अपनी संपत्ति के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति लोगों के समक्ष उसकी सच्ची मानवता को प्रकट करती है : सबसे पहले, अय्यूब लोभी मनुष्य नहीं था, और अपने भौतिक जीवन में संकोची था। दूसरे, अय्यूब को कभी यह चिंता या डर नहीं था कि परमेश्वर उसका सब कुछ ले लेगा, जो उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति थी; अर्थात, उसकी कोई माँगें या शिकायतें नहीं थीं कि परमेश्वर उससे कब ले अथवा ले या नहीं, और उसने कारण नहीं पूछा कि क्यों ले, बल्कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन भर करने की चेष्टा की। तीसरे, उसने कभी यह नहीं माना कि उसकी संपत्तियाँ उसकी अपनी मेहनत से आई थीं, बल्कि यह कि वे परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान की गई थीं। यह परमेश्वर में अय्यूब की आस्था थी, और उसके दृढ़विश्वास का संकेत है। क्या अय्यूब की मानवता और उसका प्रतिदिन सच्चा अनुसरण उसके बारे में इस तीन-सूत्रीय सारांश में स्पष्ट कर दिया गया है? अय्यूब की मानवता और अनुसरण अपनी संपत्ति गँवा बैठने का सामना करते समय उसके शांत आचरण का अभिन्न भाग थे। यह निश्चित रूप से उसके प्रतिदिन के अनुसरण के कारण ही था कि परमेश्वर की परीक्षाओं के दौरान अय्यूब में यह कहने की कद-काठी और दृढ़विश्वास था, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" ये वचन रातों-रात प्राप्त नहीं किए गए थे, न ही वे बस यूँ ही अय्यूब के दिमाग़ में प्रकट हुए थे। ये वे थे जो उसने कई साल जीवन का अनुभव करने के दौरान देखे और अर्जित किए थे। उन सब लोगों की तुलना में जो परमेश्वर के आशीषों की तलाश भर करते हैं, और जो डरते हैं कि परमेश्वर उनसे ले लेगा, और जो इससे नफ़रत करते और इसकी शिकायत करते हैं, क्या अय्यूब की आज्ञाकारिता एकदम वास्तविक नहीं है? उन सब लोगों की तुलना में जो मानते हैं कि परमेश्वर है, किंतु जिन्होंने कभी नहीं माना कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, क्या अय्यूब अत्यधिक ईमानदारी और खरेपन से युक्त नहीं है?

अय्यूब की तर्कशक्ति

अय्यूब के वास्तविक अनुभवों और उसकी खरी और सच्ची मानवता का अर्थ था कि उसने अपनी संपत्तियाँ और अपने बच्चे गँवा बैठने पर सर्वाधिक तर्कसंगत निर्णय और चुनाव किए थे। ऐसे तर्कसंगत चुनाव उसके दैनिक अनुसरणों और परमेश्वर के कर्मों से अवियोज्य थे जिन्हें वह अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन के दौरान जानने लगा था। अय्यूब की ईमानदारी ने उसे यह विश्वास कर पाने में समर्थ बनाया कि यहोवा का हाथ सभी चीज़ों पर शासन करता है; उसके विश्वास ने उसे सभी चीज़ों के ऊपर यहोवा परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को जानने दिया; उसके ज्ञान ने उसे यहोवा परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानने का इच्छुक और समर्थ बनाया; उसकी आज्ञाकारिता ने उसे यहोवा परमेश्वर के प्रति अपने भय में अधिकाधिक सच्चा होने में समर्थ बनाया; उसके भय ने उसे बुराई से दूर रहने में अधिकाधिक वास्तविक बनाया; अंततः, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के कारण अय्यूब पूर्ण बन गया; उसकी पूर्णता ने उसे बुद्धिमान बनाया, और उसे उच्चतम तर्कशक्ति प्रदान की।

हमें इस "तर्कशक्ति" शब्द को कैसे समझना चाहिए? एक शाब्दिक व्याख्या यह है कि इसका अर्थ है अच्छी समझ का होना, अपनी सोच में तार्किक और समझदार होना, अच्छी वाणी, चाल-चलन, और परख का होना, और अच्छे तथा नियमित नैतिक मानदण्ड धारण करना। फिर भी अय्यूब की तर्कशीलता समझा पाना इतना आसान नहीं है। यहाँ जब कहा जाता है कि अय्यूब उच्चतम तर्कशक्ति से युक्त था, तो यह उसकी मानवता और परमेश्वर के समक्ष उसके आचरण के संबंध में कहा जाता है। चूँकि अय्यूब ईमानदार था, इसलिए वह परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास और उसका पालन कर पाता था, जिसने उसे ऐसा ज्ञान दिया जो दूसरों द्वारा अप्राप्य था, और इस ज्ञान ने उसे उस सबको जो उसके ऊपर बीता था अधिक सटीकता से पहचनाने, परखने, और परिभाषित करने में समर्थ बनाया, जिसने उसे अधिक सटीकता और चतुराई से यह चुनने में समर्थ बनाया कि उसे क्या करना है और किसे दृढ़ता से थामे रहना है। कहने का तात्पर्य यह है कि उसके वचन, व्यवहार, उसके कार्यकलापों के पीछे के सिद्धांत, और वह संहिता जिसके अनुसार उसने कार्य किया, सब नियमित, सुस्पष्ट और विनिर्दिष्ट थे, और अंधाधुँध, आवेगपूर्ण या भावनात्मक नहीं थे। वह जानता था कि उस पर जो भी बीते उससे कैसे पेश आना है, वह जानता था कि जटिल घटनाओं के बीच संबंधों को कैसे संतुलित करना और सँभालना है, वह जानता था कि जिस मार्ग को दृढ़ता से थामे रखना चाहिए उसे कैसे थामे रखना है, और, इतना ही नहीं, वह जानता था कि यहोवा परमेश्वर के देने और ले लेने के साथ कैसे पेश आना है। यही अय्यूब की तर्कशक्ति थी। जब वह अपनी संपत्तियों और पुत्रों और पुत्रियों से हाथ धो बैठा, उस समय ठीक इसीलिए कि अय्यूब ऐसी तर्कशक्ति से सुसज्जित था उसने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 51

अय्यूब का वास्तविक चेहरा : सच्चा, शुद्ध, और असत्यता से रहित

आओ हम अय्यूब 2:7-8 पढ़ें : "तब शैतान यहोवा के सामने से निकला, और अय्यूब को पाँव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया। तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा लेकर राख पर बैठ गया।" यह अय्यूब के उस समय के आचरण का वर्णन है जब उसके शरीर पर दर्दनाक़ फोड़े निकल आए थे। इस समय, अय्यूब राख पर बैठ गया और पीड़ा सहता रहा। किसी ने उसका उपचार नहीं किया, और उसके शरीर का दर्द कम करने में किसी ने उसकी सहायता नहीं की; इसके बजाय, उसने पीड़ादायक फोड़ों के ऊपरी भाग को खुजाने के लिए एक ठीकरे का उपयोग किया। सतही तौर पर, यह अय्यूब की यंत्रणा का एक चरण मात्र था, और इसका उसकी मानवता और परमेश्वर के भय से कोई नाता नहीं है, क्योंकि इस समय अय्यूब ने अपनी मनोदशा और विचार व्यक्त करने के लिए कोई वचन नहीं बोले थे। फिर भी, अय्यूब के कार्यकलाप और उसका आचरण अब भी उसकी मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति है। पिछले अध्याय के अभिलेख में हमने पढ़ा था कि अय्यूब पूर्वी देशों के सभी मनुष्यों में सबसे बड़ा था। इस बीच, दूसरे अध्याय का यह अंश हमें दिखाता है कि पूर्व के इस महान मनुष्य ने वास्तव में राख में बैठकर अपने आपको खुजाने के लिए एक ठीकरा लिया। क्या इन दोनों वर्णनों के बीच स्पष्ट अंतर्विरोध नहीं है? यह ऐसा अंतर्विरोध है जो हमें अय्यूब के सच्चे आत्म का दर्शन कराता है : अपनी प्रतिष्ठापूर्ण हैसियत और रुतबे के बावज़ूद, उसने इन चीज़ों से न कभी प्रेम किया था और न ही कभी उन पर ध्यान दिया था; उसने परवाह नहीं की कि दूसरे उसकी प्रतिष्ठा को कैसे देखते हैं, न ही वह अपने कार्यकलापों और आचरण का अपनी प्रतिष्ठा पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ने या न पड़ने के विषय में चिंतित था; वह प्रतिष्ठा के आशीषों में लिप्त नहीं हुआ, न ही उसने हैसियत और प्रतिष्ठा के साथ आने वाली महिमा का आनंद उठाया। उसने केवल यहोवा परमेश्वर की नज़रों में अपने मूल्य और अपने जीवन जीने के महत्व की परवाह की। अय्यूब का सच्चा आत्म ही उसका सार था : वह प्रसिद्धि और सौभाग्य से प्रेम नहीं करता था, और वह प्रसिद्धि और सौभाग्य के लिए नहीं जीता था; वह सच्चा, और शुद्ध और असत्यता से रहित था।

अय्यूब द्वारा प्रेम और घृणा का विभाजन

अय्यूब की मानवता का एक और पहलू उसके और उसकी पत्नी के बीच इस संवाद में प्रदर्शित होता है : "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।' उसने उससे कहा, 'तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?'" (अय्यूब 2:9-10)। वह जो यंत्रणा भुगत रहा था उसे देखकर, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस यंत्रणा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की, तो भी उसके "भले इरादों" को अय्यूब की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाय, उन्होंने उसका क्रोध भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसके विश्वास और उसके प्रति उसकी आज्ञाकारिता को नकारा था, और यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था, क्योंकि उसने, दूसरों की तो बात ही छोड़ दें, स्वयं अपने को भी कभी ऐसा कुछ नहीं करने दिया था जो परमेश्वर का विरोध करता हो या उसे ठेस पहुँचाता हो। उस समय वह कैसे चुपचाप रह सकता था जब उसने दूसरों को ऐसे वचन बोलते देखा जो परमेश्वर की निंदा और उसका अपमान करते थे? इस प्रकार उसने अपनी पत्नी को "मूढ़ स्त्री" कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्रोध और घृणा, और साथ ही भर्त्सना और फटकार की थी। यह अय्यूब की मानवता की—प्रेम और घृणा के बीच अंतर करने की—स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, और उसकी खरी मानवता का सच्चा निरूपण था। अय्यूब में न्याय की एक समझ थी—ऐसी समझ जिसकी बदौलत वह दुष्टता की हवाओं और ज्वारों से नफ़रत करता था, और अनर्गल मतांतरों, बेतुके तर्कों, और हास्यास्पद दावों से घृणा, उनकी भर्त्सना और उन्हें अस्वीकार करता था, और वह स्वयं अपने, सही सिद्धांतों और रवैये को उस समय सच्चाई से थामे रह सका जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उन लोगों द्वारा छोड़ दिया गया था जो उसके क़रीबी थे।

अय्यूब की उदार हृदयता और शुद्ध हृदयता

चूँकि, अय्यूब के आचरण से, हम उसकी मानवता के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त होते देख पाते हैं, तो जब उसने अपने जन्म के दिन को कोसने के लिए अपना मुँह खोला तब हम अय्यूब की मानवता का कौन-सा पहलू देखते हैं? यही वह विषय है जिसे हम नीचे साझा करेंगे।

ऊपर, मैंने अय्यूब द्वारा अपने जन्म के दिन को कोसने की उत्पत्तियों के बारे में बात की है। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यदि अय्यूब कठोर हृदय और प्रेम से रहित होता, यदि वह उत्साहहीन और भावनाहीन होता, और मानवता से वंचित होता, तो क्या वह परमेश्वर के हृदय की इच्छा की परवाह कर सकता था? चूँकि वह परमेश्वर के हृदय की परवाह करता था, क्या इसलिए स्वयं अपने जन्म के दिन का तिरस्कार कर सकता था? दूसरे शब्दों में, यदि अय्यूब कठोर हृदय और मानवता से पूर्णतया रहित होता, तो क्या वह परमेश्वर की पीड़ा से संतप्त हुआ हो सकता था? क्या वह अपने जन्म के दिन को इसलिए कोस सकता था क्योंकि परमेश्वर उसके द्वारा व्यथित हुआ था? उत्तर है, बिल्कुल नहीं! क्योंकि वह दयालु हृदय था, इसलिए अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय की परवाह की थी; क्योंकि उसने परमेश्वर के हृदय की परवाह की थी, इसलिए अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा समझ ली थी; क्योंकि वह दयालु हृदय था, इसलिए उसने परमेश्वर की पीड़ा को समझ लेने के परिणामस्वरूप और अधिक यंत्रणा भुगती; क्योंकि उसने परमेश्वर की पीड़ा समझ ली थी, इसलिए वह अपने जन्म के दिन से घृणा करने लगा, और इसलिए उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। बाहरी लोगों के लिए, अय्यूब की परीक्षा के दौरान उसका समूचा आचरण अनुकरणीय है। उसका केवल अपने जन्म के दिन को कोसना ही उसकी पूर्णता और खरेपन पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, या एक भिन्न आँकलन प्रस्तुत करता है। वास्तव में, यह अय्यूब की मानवता के सार की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति थी। उसकी मानवता का सार छिपा या बंद नहीं था, या किसी अन्य के द्वारा संशोधित नहीं था। जब उसने अपने जन्म के दिन को कोसा, तो उसने अपने हृदय की गहराई में उदार हृदयता और शुद्ध हृदयता का प्रदर्शन किया; वह उस जलसोत के समान था जिसका पानी इतना साफ़ और पारदर्शी था कि उसका तल दिखाई देता था।

अय्यूब के बारे में यह सब जानने के बाद, निस्संदेह अधिकांश लोगों के पास अय्यूब की मानवता के सार का समुचित रूप से सटीक और वस्तुनिष्ठ आँकलन होगा। उनके पास अय्यूब की उस पूर्णता और खरेपन की गहरी, व्यावहारिक, और अधिक उन्नत समझ और सराहना भी होनी चाहिए जिसके बारे में परमेश्वर द्वारा कहा गया था। आशा करनी चाहिए कि यह समझ और सराहना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने की शुरुआत करने में लोगों की सहायता करेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 52

परमेश्वर द्वारा अय्यूब को शैतान को सौंपने और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों के बीच संबंध

यद्यपि अधिकांश लोग अब यह पहचानते हैं कि अय्यूब पूर्ण और खरा था, और वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, किंतु यह पहचान उन्हें परमेश्वर के अभिप्राय की कहीं अधिक समझ प्रदान नहीं करती है। साथ ही अय्यूब की मानवता और अनुसरण से ईर्ष्या करते हुए, वे परमेश्वर के बारे में नीचे लिखा प्रश्न पूछते हैं : अय्यूब इतना पूर्ण और खरा था, लोग उससे इतना अधिक प्यार करते थे, तो परमेश्वर ने उसे शैतान को क्यों सौंप दिया और उसे इतनी अधिक यंत्रणा से क्यों गुज़ारा? ऐसे प्रश्नों का लोगों के हृदयों में उठना निश्चित है—या बल्कि, यह शंका वही प्रश्न है जो अनेक लोगों के हृदयों में है। चूँकि इसने इतने सारे लोगों को चकरा दिया है, इसलिए हमें इस प्रश्न को उठाना और इसे समुचित रूप से स्पष्ट अवश्य करना चाहिए।

वह सब जो परमेश्वर करता है आवश्यक है और असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह मनुष्य में जो कुछ करता है उसका सरोकार उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने अय्यूब में जो कार्य किया वह भी कोई भिन्न नहीं है, फिर भले ही परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब पूर्ण और खरा था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर चाहे जो करता हो या वह जो करता है उसे चाहे जिन उपायों से करता हो, क़ीमत चाहे जो हो, उसका ध्येय चाहे जो हो, किंतु उसके कार्यकलापों का उद्देश्य नहीं बदलता है। उसका उद्देश्य है मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, और साथ ही मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके लिए परमेश्वर की इच्छा को आकार देना; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर उस सबको आकार देना है जिसे परमेश्वर अपने सोपानों के अनुसार सकारात्मक मानता है, जो मनुष्य को परमेश्वर का हृदय समझने और परमेश्वर का सार बूझने में समर्थ बनाता है, और मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता को मानने और व्यवस्थाओं का पालन करने देता है, इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना प्राप्त करने देता है—यह सब परमेश्वर जो करता है उसमें निहित उसके उद्देश्य का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चूँकि शैतान परमेश्वर के कार्य में विषमता और सेवा की वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दिया जाता है; यह वह साधन है जिसका उपयोग परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों में शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घृणास्पदता को देखने देने के लिए करता है, इस प्रकार लोगों में शैतान के प्रति घृणा उपजाता है और उन्हें वह जानने और पहचानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें शैतान के नियंत्रण से और आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र करने देती है—जब तक कि परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों और आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे शैतान के अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः मुक्त कर दिए गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे अब और शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं—उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के प्रति आस्था, आज्ञाकारिता और भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे शैतान को पूरी तरह हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनका दृढ़विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसका भय शैतान को हरा देता है, और उन्हें पूरी तरह छोड़ देने के लिए शैतान को विवश कर देता है। केवल इस जैसे लोग ही परमेश्वर द्वारा सच में प्राप्त किए गए हैं, और यही मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे बचाए जाना चाहते हैं, और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह प्राप्त किए जाना चाहते हैं, तो उन सभी को जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं शैतान के बड़े और छोटे दोनों प्रलोभनों और हमलों का सामना करना ही चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान को पूरी तरह परास्त कर पाते हैं ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है। कहने का तात्पर्य यह, वे लोग जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से गुज़र चुके हैं, और अनगिनत बार शैतान द्वारा लुभाए और हमला किए जा चुके हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार कर पाते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है वे ईमानदारी से युक्त हैं, वे उदार हृदय हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अंतर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे तर्कसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह कर पाते और वह सब जो परमेश्वर का है सँजोकर रख पाते हैं। ऐसे लोग शैतान की बाध्यता, जासूसी, दोषारोपण या दुर्व्यवहार के अधीन नहीं होते हैं, वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं, उन्हें पूरी तरह मुक्त और रिहा कर दिया गया है। अय्यूब बिल्कुल ऐसा ही स्वतंत्र मनुष्य था, और ठीक यही परमेश्वर द्वारा उसे शैतान को सौंपे जाने का महत्व था।

अय्यूब शैतान द्वारा प्रताड़ित हुआ था, परंतु उसने चिरकालिक स्वतंत्रता और मुक्ति भी प्राप्त की थी, और उसने फिर कभी शैतान की भ्रष्टता, दुर्व्यवहार, और आरोपों से नहीं गुज़रने का, इसके बजाय परमेश्वर के हाव-भाव के प्रकाश में, और उसे दिए गए परमेश्वर के आशीषों के बीच, मुक्त और भारहीन जीवन जीने का अधिकार प्राप्त किया था। कोई भी इस अधिकार को छीन, या नष्ट, या झपट नहीं सकता है। यह अय्यूब को परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास, दृढ़निश्चय, और आज्ञाकारिता और उसके भय के बदले दिया गया था; अय्यूब ने पृथ्वी पर आनंद और प्रसन्नता अर्जित करने के लिए और, जैसा कि स्वर्ग द्वारा नियत और पृथ्वी द्वारा स्वीकार किया गया था, पृथ्वी पर परमेश्वर का सच्चा सृष्ट प्राणी होने के नाते सृष्टिकर्ता की आराधना करने का हस्तक्षेप रहित अधिकार और पात्रता अर्जित करने के लिए अपने जीवन की क़ीमत चुकाई थी। ऐसा ही अय्यूब द्वारा सहन किए गए प्रलोभनों का सबसे बड़ा परिणाम भी था।

अभी जब लोगों को बचाया नहीं गया है, तब शैतान के द्वारा उनके जीवन में प्रायः हस्तक्षेप, और यहाँ तक कि उन्हें नियंत्रित भी किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिन्हें बचाया नहीं गया है शैतान के क़ैदी होते हैं, उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं होती, उन्हें शैतान द्वारा छोड़ा नहीं गया है, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य या पात्र नहीं हैं, शैतान द्वारा उनका क़रीब से पीछा और उन पर क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने को भी कोई खुशी नहीं होती है, उनके पास कहने को भी सामान्य अस्तित्व का अधिकार नहीं होता, और इतना ही नहीं, उनके पास कहने को भी कोई गरिमा नहीं होती है। यदि तुम डटकर खड़े हो जाते हो और शैतान के साथ संग्राम करते हो, शैतान के साथ जीवन और मरण की लड़ाई लड़ने के लिए शस्त्रास्त्र के रूप में परमेश्वर में अपने विश्वास और अपनी आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय का उपयोग करते हो, ऐसे कि तुम शैतान को पूरी तरह परास्त कर देते हो और उसे तुम्हें देखते ही दुम दबाने और भीतकातर बन जाने को मज़बूर कर देते हो, ताकि वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह छोड़ दे—केवल तभी तुम बचाए जाओगे और स्वतंत्र हो पाओगे। यदि तुमने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ने का ठान लिया है, किंतु यदि तुम शैतान को पराजित करने में तुम्हारी सहायता करने वाले शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम अब भी खतरे में होगे; समय बीतने के साथ, जब तुम शैतान द्वारा इतना प्रताड़ित कर दिए जाते हो कि तुममें रत्ती भर भी ताक़त नहीं बची है, तब भी तुम गवाही देने में असमर्थ हो, तुमने अब भी स्वयं को अपने विरुद्ध शैतान के आरोपों और हमलों से पूरी तरह मुक्त नहीं किया है, तो तुम्हारे उद्धार की कम ही कोई आशा होगी। अंत में, जब परमेश्वर के कार्य के समापन की घोषणा की जाती है, तब भी तुम शैतान के शिकंजे में होगे, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ, और इस प्रकार तुम्हारे पास कभी कोई अवसर या आशा नहीं होगी। तो, निहितार्थ यह है कि ऐसे लोग पूरी तरह शैतान की दासता में होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 53

परमेश्वर की परीक्षाओं को स्वीकार करो, शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करो, और परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करने दो

मनुष्य के चिरकालिक भरण-पोषण और सहारे के अपने कार्य के दौरान, परमेश्वर अपनी इच्छा और अपेक्षाएँ मनुष्य को संपूर्णता में बताता है, और मनुष्य को अपने कर्म, स्वभाव, और वह जो है और उसके पास जो है दिखाता है। उद्देश्य है मनुष्य को कद-काठी से सुसज्जित करना, और मनुष्य को परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उससे विभिन्न सत्य प्राप्त करने देना—सत्य जो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा शैतान से लड़ने के लिए दिए गए हथियार हैं। इस प्रकार सुसज्जित, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना करना ही चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए कई साधन और मार्ग हैं, किंतु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु, शैतान, के "सहयोग" की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को हथियार देने के बाद, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य की कद-काठी की "परीक्षा" लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली होगी। परंतु यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं से छूटने में विफल हो जाता है, और शैतान के आगे समर्पण कर देता है, तो उसने परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की होगी। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू की जाँच करता है, उसकी कसौटी यही होती है कि मनुष्य शैतान द्वारा आक्रमण किए जाने पर अपनी गवाही पर डटा रहता है या नहीं, और उसने शैतान द्वारा फुसलाए जाने पर परमेश्वर को त्याग दिया है या नहीं और शैतान के आगे आत्मसमर्पण करके उसकी अधीनता स्वीकार की है या नहीं। कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि वह शैतान को परास्त करके उस पर विजय प्राप्त कर सकता है या नहीं, और वह स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि वह शैतान की दासता पर विजय पाने के लिए परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए हथियार, अपने दम पर, उठा सकता है या नहीं, शैतान को पूरी तरह आस तजकर उसे अकेला छोड़ देने के लिए विवश कर पाता है या नहीं। यदि शैतान आस तजकर किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान फिर कभी इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने की कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी इस व्यक्ति पर दोषारोपण और उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा, फिर कभी उन्हें निर्दतापूर्वक यातना नहीं देगा या आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस जैसे किसी व्यक्ति को ही परमेश्वर द्वारा सचमुच प्राप्त किया गया होगा। यही वह संपूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है।

अय्यूब की गवाही द्वारा बाद की पीढ़ियों को दी गई चेतावनी और प्रबुद्धता

परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को पूरी तरह प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझने के साथ ही साथ, लोग परमेश्वर द्वारा अय्यूब को शैतान को सौंपे जाने के लक्ष्य और महत्व भी समझ लेंगे। लोग अय्यूब की यंत्रणा से अब और परेशान नहीं होते हैं, और उसके महत्व की एक नई समझ उनमें है। वे अब और चिंता नहीं करते हैं कि उन्हें भी अय्यूब जैसे ही प्रलोभन से गुज़ारा जाएगा या नहीं, और वे परमेश्वर के परीक्षणों के आने का अब और विरोध या उन्हें अस्वीकार नहीं करते हैं। अय्यूब की आस्था, आज्ञाकारिता, और शैतान पर विजय पाने की उसकी गवाही लोगों के लिए अत्यधिक सहायता और प्रोत्साहन का स्रोत रहे हैं। वे अय्यूब में अपने स्वयं के उद्धार की आशा देखते हैं, और देखते हैं कि परमेश्वर के प्रति आस्था, और आज्ञाकारिता और उसके भय के माध्यम से, शैतान को हराना, और शैतान के ऊपर हावी होना पूरी तरह संभव है। वे देखते हैं कि जब तक वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करते हैं, और जब तक सब कुछ खो देने के बाद भी परमेश्वर को न छोड़ने का दृढ़संकल्प और विश्वास उनमें हैं, तब तक वे शैतान को लज्जित और पराजित कर सकते हैं, और वे देखते हैं कि शैतान को भयभीत करने और हड़बड़ी में पीछे हटने को मजबूर करने के लिए, उन्हें केवल अपनी गवाही पर डटे रहने की धुन और लगन की आवश्यकता है—भले ही इसका अर्थ अपने प्राण गँवाना हो। अय्यूब की गवाही बाद की पीढ़ियों के लिए चेतावनी है, और यह चेतावनी उन्हें बताती है कि यदि वे शैतान को नहीं हराते हैं, तो वे शैतान के दोषारोपणों और छेड़छाड़ से कभी अपना पीछा नहीं छुड़ा पाएँगे, न ही वे कभी शैतान के दुर्व्यवहार और हमलों से बचकर निकल पाएँगे। अय्यूब की गवाही ने बाद की पीढ़ियों को प्रबुद्ध किया है। यह प्रबुद्धता लोगों को सिखाती है कि यदि वे पूर्ण और खरे हैं, केवल तभी वे परमेश्वर का भय मान पाएँगे और बुराई से दूर रह पाएँगे; यह उन्हें सिखाती है कि यदि वे परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, केवल तभी वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गूँजती हुई गवाही दे सकते हैं; यदि वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गूँजती हुई गवाही देते हैं, केवल तभी वे शैतान द्वारा कभी नियंत्रित नहीं किए जा सकते हैं और परमेश्वर के मार्गदर्शन तथा सुरक्षा में रहते हैं—केवल तभी उन्हें सचमुच बचा लिया गया होगा। अय्यूब के व्यक्तित्व और जीवन के उसके अनुसरण की बराबरी हर उस व्यक्ति को करनी चाहिए जो उद्धार का अनुसरण करता है। अपने संपूर्ण जीवन के दौरान उसने जो जिया और अपनी परीक्षाओं के दौरान उसका आचरण उन सब लोगों के लिए अनमोल ख़ज़ाना है जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करते हैं।

अय्यूब की गवाही परमेश्वर को आराम पहुँचाती है

यदि अब मैं तुम लोगों से कहूँ कि अय्यूब प्यारा मनुष्य है, तो हो सकता है कि तुम लोग इन शब्दों के भीतर निहित अर्थ न समझ सको, और हो सकता है कि मैंने ये सब बातें क्यों कही हैं उनके पीछे की भावना को न पकड़ सको; परंतु उस दिन तक प्रतीक्षा करो जब तुम लोगों को अय्यूब के सदृश या वैसी ही परीक्षाओं का अनुभव हो चुका होगा, जब तुम लोग विपत्ति से गुज़र चुके होगे, जब तुम लोग व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों के लिए परमेश्वर द्वारा आयोजित परीक्षाओं का अनुभव कर चुके होगे, जब तुम प्रलोभनों के बीच शैतान को जीतने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए अपना सर्वस्व दे दोगे, और अपमान और कष्ट सहोगे—तब तुम इन वचनों का जो मैं बोलता हूँ अर्थ समझ पाओगे। उस समय, तुम महसूस करोगे कि तुम अय्यूब से बहुत हीनतर हो, तुम महसूस करोगे कि अय्यूब कितना प्यारा है, और अनुकरण करने के योग्य है; जब वह समय आएगा, तब तुम्हें अहसास होगा कि अय्यूब के द्वारा कहे गए वे उत्कृष्ट वचन उस व्यक्ति के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं जो भ्रष्ट है और जो इन समयों में रहता है, और तुम्हें अहसास होगा कि अय्यूब ने जो प्राप्त किया था वह आज के लोगों के लिए प्राप्त करना कितना कठिन है। जब तुम महसूस करोगे कि यह कठिन है, तब तुम समझोगे कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है, तुम समझोगे कि ऐसे लोगों को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत कितनी बड़ी है, और वह कितना बहुमूल्य है जो परमेश्वर मनुष्यजाति के लिए करता और खपाता है। अब जब तुम लोगों ने ये वचन सुन लिए हैं, तब क्या तुम लोगों के पास अय्यूब की सटीक समझ और सही आँकलन है? तुम लोगों की नज़रों में, क्या अय्यूब सचमुच पूर्ण और खरा मनुष्य था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था? मैं विश्वास करता हूँ कि अधिकांश लोग बिल्कुल निश्चित रूप से हाँ कहेंगे। क्योंकि अय्यूब ने जो कुछ किया और प्रकट किया उनके तथ्य किसी भी मनुष्य या शैतान के द्वारा अकाट्य हैं। वे शैतान पर अय्यूब की विजय का सर्वाधिक शक्तिशाली प्रमाण हैं। यह प्रमाण अय्यूब में उत्पन्न हुआ था, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त प्रथम गवाही थी। इस प्रकार, जब अय्यूब ने शैतान के प्रलोभनों में विजय प्राप्त की और परमेश्वर के लिए गवाही दी, तब परमेश्वर ने अय्यूब में आशा देखी, और उसके हृदय को अय्यूब से आराम मिला था। सृष्टि के समय से लेकर अय्यूब के समय तक, यह पहली बार था जब परमेश्वर ने सच में अनुभव किया कि आराम क्या होता है, और मनुष्य द्वारा आराम पहुँचाए जाने का क्या अर्थ होता है। यह पहली बार था जब उसने सच्ची गवाही देखी, और प्राप्त की, जो उसके लिए दी गई थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 54

अय्यूब कान की श्रवणशक्ति से परमेश्वर के बारे में सुनता है

अय्यूब 9:11 देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझको नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है।

अय्यूब 23:8-9 देखो, मैं आगे जाता हूँ परन्तु वह नहीं मिलता; मैं पीछे हटता हूँ, परन्तु वह दिखाई नहीं पड़ता; जब वह बाईं ओर काम करता है, तब वह मुझे दिखाई नहीं देता; वह दाहिनी ओर ऐसा छिप जाता है, कि मुझे वह दिखाई ही नहीं पड़ता।

अय्यूब 42:2-6 मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है, और तेरी युक्‍तियों में से कोई रुक नहीं सकती। तू ने पूछा, "तू कौन है जो ज्ञानरहित होकर युक्‍ति पर परदा डालता है?" परन्तु मैं ने तो जो नहीं समझता था वही कहा, अर्थात् जो बातें मेरे लिये अधिक कठिन और मेरी समझ से बाहर थीं जिनको मैं जानता भी नहीं था। तू ने कहा, "मैं निवेदन करता हूँ सुन, मैं कुछ कहूँगा, मैं तुझ से प्रश्न करता हूँ, तू मुझे बता।" मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं; इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूल और राख में पश्‍चाताप करता हूँ।

यद्यपि परमेश्वर ने अय्यूब पर अपने को प्रकट नहीं किया है, फिर भी अय्यूब परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करता है

इन वचनों का ज़ोर किस बात पर है? क्या तुम में से किसी ने अहसास किया कि यहाँ एक तथ्य है? पहला, अय्यूब कैसे जानता था कि परमेश्वर है? फिर, वह कैसे जानता था कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा शासित होती हैं? एक अंश है जो इन दोनों प्रश्नों का उत्तर देता है : "मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं; इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूल और राख में पश्चाताप करता हूँ" (अय्यूब 42:5-6)। इन वचनों से हमें पता चलता है कि परमेश्वर को अपनी आँखों से देखा होने के बजाय, अय्यूब ने किंवदंती से परमेश्वर के बारे में जाना था। यह इन्हीं परिस्थितियों के अंतर्गत था कि उसने परमेश्वर का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना आरंभ किया, जिसके बाद उसने अपने जीवन में, और सभी चीज़ों के बीच, परमेश्वर के अस्तित्व की पुष्टि की। यहाँ एक अकाट्य तथ्य है—वह तथ्य क्या है? परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करने में समर्थ होने के बावज़ूद, अय्यूब ने परमेश्वर को कभी देखा नहीं था। इसमें, क्या वह आज के लोगों के समान नहीं था? अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, जिसका निहितार्थ है कि यद्यपि उसने परमेश्वर के बारे में सुना था, फिर भी वह नहीं जानता था कि परमेश्वर कहाँ है, या परमेश्वर किसके समान है, या परमेश्वर क्या कर रहा है। ये सब व्यक्तिपरक कारक हैं; तटस्थ भाव से कहें, तो यद्यपि वह परमेश्वर का अनुसरण करता था, फिर भी परमेश्वर कभी उसके सामने प्रकट नहीं हुआ या परमेश्वर ने उससे कभी बात नहीं की। क्या यह तथ्य नहीं है? यद्यपि परमेश्वर ने अय्यूब से बात नहीं की थी, या उसे कोई आदेश नहीं दिए थे, फिर भी अय्यूब ने सभी चीज़ों के बीच, और उन किंवदंतियों में जिनके माध्यम से अय्यूब ने अपने कान की श्रवणशक्ति से परमेश्वर के बारे में सुना था, परमेश्वर का अस्तित्व देखा था और उसकी संप्रभुता को निहारा था, जिसके पश्चात उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का जीवन प्रारंभ किया था। ऐसे थे वे उद्गम और प्रक्रिया जिनके द्वारा अय्यूब ने परमेश्वर का अनुसरण किया था। परंतु वह चाहे जितना परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता हो, उसने अपनी सत्यनिष्ठा को चाहे जितनी दृढ़ता से थामे रखा हो, फिर भी परमेश्वर कभी उसके समक्ष प्रकट नहीं हुआ। आओ हम यह अंश पढ़ें। उसने कहा, "देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझको नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है" (अय्यूब 9:11)। ये वचन जो कह रहे हैं वह यह है कि अय्यूब ने परमेश्वर को अपने आसपास महसूस किया हो सकता है या नहीं किया हो सकता है—परंतु वह परमेश्वर को कभी देख नहीं पाया था। ऐसे भी समय थे जब वह परमेश्वर के अपने सामने से होकर गुज़रने, या कुछ करने, या मनुष्य का मार्गदर्शन करने की कल्पना करता था, किंतु वह कभी जानता नहीं था। परमेश्वर मनुष्य पर तब आता है जब वह इसकी अपेक्षा नहीं कर रहा होता है; मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कब उस पर आता है, या वह कहाँ उस पर आता है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को देख नहीं सकता है, और इस प्रकार, मनुष्य के लिए, परमेश्वर उससे छिपा हुआ है।

परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास इस तथ्य से डोलता नहीं है कि परमेश्वर उससे छिपा हुआ है

पवित्र शास्त्र के नीचे लिखे अंश में, फिर अय्यूब कहता है, "देखो, मैं आगे जाता हूँ परन्तु वह नहीं मिलता; मैं पीछे हटता हूँ, परन्तु वह दिखाई नहीं पड़ता; जब वह बाईं ओर काम करता है, तब वह मुझे दिखाई नहीं देता; वह दाहिनी ओर ऐसा छिप जाता है, कि मुझे वह दिखाई ही नहीं पड़ता" (अय्यूब 23:8-9)। इस वृतांत में, हमें पता चलता है कि अय्यूब के अनुभवों में, परमेश्वर पूरे समय उससे छिपा रहा था; परमेश्वर उसके सामने खुलकर प्रकट नहीं हुआ था, न ही उसने खुलकर उससे कोई वचन कहे थे, फिर भी अपने हृदय में, अय्यूब को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में पूरा विश्वास था। वह हमेशा यही मानता था कि शायद परमेश्वर उसके आगे-आगे चल रहा है, या शायद उसके बगल में कुछ कर रहा है, और यह कि यद्यपि वह परमेश्वर को देख नहीं सकता था, किंतु परमेश्वर उसके बगल में था और उसकी सभी चीज़ों को शासित कर रहा था। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, परंतु वह अपने विश्वास के प्रति सच्चा रह पाता था, जो कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर पाता था। दूसरे लोग ऐसा क्यों नहीं कर पाते थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि परमेश्वर ने अय्यूब से बात नहीं की या उसके सामने प्रकट नहीं हुआ, और यदि उसने सच्चे अर्थ में विश्वास नहीं किया होता, तो वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न तो आगे बढ़ा सकता था, न ही उसे दृढ़ता से थामे रह सकता था। क्या यह सच नहीं है? जब तुम अय्यूब को ये वचन कहते पढ़ते हो तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि अय्यूब की पूर्णता और खरापन, और परमेश्वर के समक्ष उसकी धार्मिकता सच हैं, और परमेश्वर की ओर से की गई कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं? परमेश्वर ने अय्यूब के साथ भले ही अन्य लोगों के समान ही व्यवहार किया था, और उसके सामने प्रकट नहीं हुआ या उससे बात नहीं की थी, तब भी अय्यूब अपनी सत्यनिष्ठा को दृढ़ता से थामे रहा था, तब भी परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करता था, और इससे बढ़कर, वह परमेश्वर को नाराज़ करने के अपने भय के फलस्वरूप परमेश्वर के समक्ष बारंबार होमबलि चढ़ाता था और प्रार्थना करता था। परमेश्वर को देखे बिना परमेश्वर का भय मानने की अय्यूब की क्षमता में, हम देखते हैं कि वह सकारात्मक चीज़ों से कितना प्रेम करता था, और उसका विश्वास कितना दृढ़ और वास्तविक था। इसलिए कि परमेश्वर उससे छिपा हुआ था उसने परमेश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं, न ही इसलिए कि उसने उसे कभी देखा नहीं था उसने अपना विश्वास खोया और परमेश्वर को त्यागा। इसके बजाय, सभी चीज़ों पर शासन करने के परमेश्वर के छिपे हुए कार्य के बीच, उसने परमेश्वर के अस्तित्व का अहसास किया था, और परमेश्वर की संप्रभुता और सामर्थ्य को महसूस किया था। इसलिए कि परमेश्वर उससे छिपा हुआ था उसने खरा होना नहीं छोड़ा, न ही इसलिए कि परमेश्वर उसके सामने प्रकट नहीं हुआ था उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग त्यागा। अय्यूब ने कभी नहीं कहा कि अपना अस्तित्व सिद्ध करने के लिए परमेश्वर उसके सामने खुलकर प्रकट हो, क्योंकि उसने सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर की संप्रभुता के दर्शन पहले ही कर लिए थे, और वह विश्वास करता था कि उसने वे आशीष और अनुग्रह प्राप्त कर लिए थे जिन्हें अन्य लोगों ने प्राप्त नहीं किया था। यद्यपि परमेश्वर उससे छिपा रहा, फिर भी परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास कभी डगमगाया नहीं था। इस प्रकार, उसने वह फसल काटी जो अन्य किसी ने नहीं काटी थी : परमेश्वर की स्वीकृति और परमेश्वर का आशीष।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 55

अय्यूब परमेश्वर के नाम को धन्य करता है और आशीषों या आपदा के बारे में नहीं सोचता है

एक तथ्य है जिसका पवित्र शास्त्र की अय्यूब की कहानियों में कभी उल्लेख नहीं किया गया है, और यही तथ्य आज हमारे ध्यान का केंद्रबिंदु होगा। यद्यपि अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था या स्वयं अपने कानों से परमेश्वर के वचन कभी नहीं सुने थे, फिर भी अय्यूब के हृदय में परमेश्वर का स्थान था। परमेश्वर के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्या थी? जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यह थी, "यहोवा का नाम धन्य है।" उसके द्वारा परमेश्वर के नाम को धन्य कहना बेशर्त, संदर्भ से निरपेक्ष था, और किसी तर्क से बंधा नहीं था। हम देखते हैं कि अय्यूब ने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया था, उसे परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होने दिया था; अपने हृदय में वह जो सोचता था, वह जो निर्णय लेता था, और वह जिसकी योजना बनाता था वह सब परमेश्वर के लिए खुला छोड़ दिया गया था और परमेश्वर से बंद नहीं रखा गया था। उसका हृदय परमेश्वर के विरोध में खड़ा नहीं हुआ था, और उसने परमेश्वर से कभी नहीं कहा कि वह उसके लिए कुछ करे या उसे कुछ दे, और उसने अंधाधुँध इच्छाएँ नहीं पालीं कि परमेश्वर की उसकी आराधना से उसे कुछ न कुछ प्राप्त जाए। उसने परमेश्वर से किन्हीं लेन-देनों की बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई याचनाएँ या माँगें नहीं कीं। उसका परमेश्वर के नाम की स्तुति करना भी सभी चीज़ों पर शासन करने की परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार के कारण था, और वह इस पर निर्भर नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुईं या उस पर आपदा टूटी। वह मानता था कि परमेश्वर लोगों को चाहे आशीष दे या उन पर आपदा लाए, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, व्यक्ति की परिस्थितियाँ चाहे जो हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को धन्य किया जाता है तो परमेश्वर की संप्रभुता के कारण किया जाता है, और इसलिए जब मनुष्य पर आपदा टूटती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही टूटती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से संबंधित सब कुछ पर शासन करते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के सौभाग्य के उतार-चढ़ाव परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यंजना हैं, और जिसका चाहे जो दृष्टिकोण हो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यही वह है जो अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जानने लगा था। अय्यूब के सभी विचार और कार्यकलाप परमेश्वर के कानों तक पहुँचे थे, और परमेश्वर के सामने आए थे, और परमेश्वर द्वारा महत्वपूर्ण माने गए थे। परमेश्वर ने अय्यूब के बारे में इस ज्ञान को दुलारा, और ऐसा हृदय होने के लिए अय्यूब को सँजोया। यह हृदय सदैव, और सर्वत्र, परमेश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करता था, और समय या स्थान चाहे जो हो, उस पर जो कुछ भी टूटता उसका स्वागत करता था। अय्यूब ने परमेश्वर से कोई माँगें नहीं कीं। उसने स्वयं अपने से जो माँगा वह यह था कि परमेश्वर से आई सभी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करे, स्वीकार करे, सामना करे, और आज्ञापालन करे; अय्यूब इसे अपना कर्तव्य मानता था, और यह ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, न ही उसे कोई वचन बोलते, कोई आज्ञा देते, कोई शिक्षा देते, या उसे किसी चीज़ का निर्देश देते सुना था। आज के वचनों में, जब परमेश्वर ने उसे सत्य के संबंध में कोई प्रबुद्धता, मार्गदर्शन या पोषण नहीं दिया था, उसके लिए परमेश्वर के प्रति ऐसा ज्ञान और प्रवृत्ति रख पाना—यह बहुमूल्य था, और उसका ऐसी चीज़ें प्रदर्शित करना परमेश्वर के लिए पर्याप्त था, और उसकी गवाही परमेश्वर द्वारा सराही और सँजोई गई थी। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा या व्यक्तिगत रूप से उसे कोई शिक्षा देते नहीं सुना था, परंतु परमेश्वर के लिए उसका हृदय और वह स्वयं उन लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक अनमोल थे जो परमेश्वर के सामने केवल गहन सिद्धांतों की शब्दावली में बोल सकते थे, जो केवल शेखी बघार सकते थे, और बलिदान चढ़ाने की बात कर सकते थे, परंतु जिनके पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान कभी नहीं था, और जिन्होंने कभी सच में परमेश्वर का भय नहीं माना था। क्योंकि अय्यूब का हृदय शुद्ध था, और परमेश्वर से छिपा हुआ नहीं था, और उसकी मानवता ईमानदार और दयालु हृदय थी, और वह न्याय से और जो सकारात्मक था उससे प्रेम करता था। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही जो ऐसे हृदय और मानवता से युक्त था, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर पाने में समर्थ था, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम था। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की संप्रभुता देख सकता था, उसका अधिकार और सामर्थ्य देख सकता था, और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता प्राप्त करने में समर्थ था। केवल इस जैसा व्यक्ति ही परमेश्वर के नाम की सच्ची स्तुति कर सकता था। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह यह नहीं देखता था कि परमेश्वर उसे आशीष देगा या उसके ऊपर आपदा लाएगा, क्योंकि वह जानता था कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ से नियंत्रित होता है, और यह कि मनुष्य का चिंता करना मूर्खता, अज्ञानता, या तर्कहीनता का, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य के प्रति संदेह का, और परमेश्वर का भय न मानने का संकेत है। अय्यूब का ज्ञान ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था। तो, क्या परमेश्वर के बारे में अय्यूब का सैद्धांतिक ज्ञान तुम लोगों से अधिक था? चूँकि उस समय परमेश्वर का कार्य और उसके कथन बहुत ही कम थे, इसलिए परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करना कोई आसान बात नहीं थी। अय्यूब के द्वारा ऐसी उपलब्धि बहुत कठिनाई से प्राप्त बड़ी उपलब्धि थी। उसने परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं किया था, न ही कभी परमेश्वर को बोलते सुना था, न ही परमेश्वर का चेहरा देखा था। वह परमेश्वर के प्रति ऐसी प्रवृत्ति रख पाया था तो यह पूरी तरह उसकी मानवता और उसके व्यक्तिगत अनुसरण का परिणाम था, ऐसी मानवता और अनुसरण जो आज के लोगों में नहीं हैं। इस प्रकार, उस युग में, परमेश्वर ने कहा, "क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा मनुष्य और कोई नहीं है।" उस युग में, परमेश्वर ने पहले ही उसके बारे में ऐसा आँकलन कर लिया था, और ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच चुका था। आज तो यह और भी कितना अधिक सत्य होता?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 56

यद्यपि परमेश्वर मनुष्य से छिपा हुआ है, किंतु मनुष्य के लिए उसे जानने हेतु सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के कर्म पर्याप्त हैं

अय्यूब ने परमेश्वर का चेहरा नहीं देखा था या परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन नहीं सुने थे, उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो और भी नहीं किया था, तो भी परमेश्वर के प्रति उसका भय और उसकी परीक्षाओं के दौरान उसकी गवाही सभी लोगों द्वारा देखी जाती है, और वे परमेश्वर द्वारा प्रेम की जाती, उसे आनंदित करती, और उसके द्वारा प्रशंसित होती हैं, और लोग उनसे ईर्ष्या, और उनकी प्रशंसा करते हैं, और उससे भी अधिक, उनकी स्तुति गाते हैं। उसके जीवन के बारे में कुछ भी महान या असाधारण नहीं था : किसी भी साधारण मनुष्य के समान ही, उसने अनुल्लेखनीय जीवन जिया था, सूर्य उगने पर काम पर बाहर जाना और सूर्य अस्त होने पर विश्राम के लिए लौट आना। अंतर यह है कि अपने जीवन के अनेक अनुल्लेखनीय दशकों के दौरान, उसने परमेश्वर के मार्ग की अंतर्दृष्टि प्राप्त की थी, और परमेश्वर की महान सामर्थ्य और संप्रभुता का इस तरह अहसास किया और उसे समझ लिया था जैसा पहले कभी किसी अन्य व्यक्ति ने नहीं किया था। वह किसी साधारण मनुष्य की अपेक्षा अधिक चतुर नहीं था, उसका जीवन विशेष रूप से सुदृढ़ नहीं था, इसके अतिरिक्त, न ही उसके पास अदृश्य विशेष कौशल थे। यद्यपि जो उसके पास था वह ऐसा व्यक्तित्व था जो ईमानदार, दयालु हृदय, और खरा था, ऐसा व्यक्तित्व जो निष्पक्षता, धार्मिकता और सकारात्मक चीज़ों से प्रेम करता था—इनमें से कुछ भी बहुसंख्यक साधारण लोगों के पास नहीं है। उसने प्रेम और घृणा के बीच भेद किया, उसमें न्याय का बोध था, वह अटल और दृढ़ था, और अपने सोच-विचार के विवरणों पर सूक्ष्मता से ध्यान देता था। इस प्रकार, पृथ्वी पर अपने अनुल्लेखनीय समय के दौरान उसने वे सब असाधारण चीज़ें देखीं जो परमेश्वर ने की थीं, और उसने परमेश्वर की महानता, पवित्रता और धार्मिकता देखी, उसने मनुष्य के लिए परमेश्वर का सरोकार, अनुग्रहशीलता, और संरक्षण देखा, और उसने सर्वोच्च परमेश्वर की माननीयता और अधिकार देखा। अय्यूब क्यों इन चीज़ों को प्राप्त कर पाया था जो किसी भी साधारण मनुष्य से परे थीं, इसका पहला कारण यह था कि उसके पास शुद्ध हृदय था, और उसका हृदय परमेश्वर का था, और सृष्टिकर्ता द्वारा मार्गदर्शित होता था। दूसरा कारण था उसका अनुसरण : अवगुणरहित और पूर्ण होने का अनुसरण, और ऐसा व्यक्ति होने का अनुसरण जो स्वर्ग की इच्छा का पालन करता हो, जिसे परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता हो, और जो बुराई से दूर रहता हो। अय्यूब ने परमेश्वर को देखने या परमेश्वर के वचन सुनने में असमर्थ होते हुए भी इन चीज़ों को धारण और इनका अनुसरण किया; यद्यपि उसने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, फिर भी वह उन उपायों को जानने लगा था जिनसे परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है; और उसने उस बुद्धि को समझ लिया था जिससे परमेश्वर ऐसा करता है। यद्यपि उसने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन कभी नहीं सुने थे, फिर भी अय्यूब जानता था कि मनुष्य को फल देने और मनुष्य से ले लेने के सारे कर्म परमेश्वर से आते हैं। हालाँकि उसके जीवन के वर्ष किसी भी साधारण व्यक्ति के वर्षों से भिन्न नहीं थे, फिर भी उसने अपने जीवन की अनुल्लेखनीयता से सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के अपने ज्ञान को, या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग के अपने अनुसरण को प्रभावित नहीं होने दिया। उसकी नज़रों में, सभी चीज़ों के विधानों में परमेश्वर के कर्म समाए थे, और परमेश्वर की संप्रभुता व्यक्ति के जीवन के किसी भी भाग में देखी जा सकती थी। उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, परंतु वह यह अहसास कर पाता था कि परमेश्वर के कर्म हर जगह हैं, और पृथ्वी पर अपने अनुल्लेखनीय समय के दौरान, अपने जीवन के प्रत्येक कोने में वह परमेश्वर के असाधारण और चमत्कारिक कर्म देख पाता और उनका अहसास कर पाता था, और वह परमेश्वर की चमत्कारिक व्यवस्थाओं को देख सकता था। परमेश्वर की अदृश्यता और मौन ने परमेश्वर के कर्मों के अय्यूब के बोध में रुकावट नहीं डाली, न ही उन्होंने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के उसके ज्ञान को प्रभावित किया। उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन के दौरान, उसका जीवन हर चीज़ में छिपे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का बोध था। अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में उसने परमेश्वर के हृदय की आवाज़ और परमेश्वर के वचन सुने और समझे थे, उस परमेश्वर के जो सभी चीज़ों के बीच मौन रहकर भी अपने हृदय की आवाज़ और अपने वचन सभी चीज़ों के विधि-विधानों को शासित करने के द्वारा व्यक्त करता है। तो, तुम देखो, कि यदि लोगों के पास अय्यूब के समान ही मानवता और अनुसरण हो, तो वे अय्यूब के समान बोध और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और अय्यूब के समान ही सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की समझ और ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। परमेश्वर अय्यूब के समक्ष प्रकट नहीं हुआ था या परमेश्वर ने उससे बात नहीं की थी, किंतु अय्यूब पूर्ण, और खरा होने, तथा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के मनुष्य के समक्ष प्रकट हुए या उससे बात किए बिना भी, सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के कर्म और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य को परमेश्वर के अस्तित्व, सामर्थ्य और अधिकार से अवगत होने के लिए पर्याप्त है, और परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करवाने के लिए पर्याप्त हैं। चूँकि अय्यूब जैसा साधारण मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग अर्जित कर पाता था, इसलिए परमेश्वर का अनुसरण करने वाले प्रत्येक साधारण मनुष्य को भी ऐसा कर पाना चाहिए। हालाँकि ये शब्द तार्किक निष्कर्ष की तरह लग सकते हैं, फिर भी ये चीज़ों के विधि-विधानों की अवहेलना नहीं करते हैं। तो भी तथ्य अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे हैं : ऐसा प्रतीत होगा कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना अय्यूब और केवल अय्यूब के लिए परिरक्षित नहीं है। "परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने" का उल्लेख होने पर लोग सोचते हैं कि यह केवल अय्यूब द्वारा ही किया जाना चाहिए, मानो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग अय्यूब के नाम के साथ चस्पा हो गया था और दूसरों के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं था। इसका कारण स्पष्ट है : चूँकि केवल अय्यूब ही ऐसा व्यक्तित्व रखता था जो ईमानदार, दयालु हृदय, और खरा था, और जो निष्पक्षता और धार्मिकता तथा उन चीज़ों से जो सकारात्मक थीं प्रेम करता था, इस प्रकार केवल अय्यूब ही परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण कर सका था। तुम सबने इसके निहितार्थ अवश्य समझ लिए होंगे—चूँकि कोई भी उस मानवता से युक्त नहीं है जो ईमानदार, दयालु हृदय, और खरी है, और जो निष्पक्षता और धार्मिकता और उससे जो सकारात्मक है प्रेम करती है, इसलिए कोई भी न परमेश्वर का भय मान सकता है और न बुराई से दूर रह सकता है, और इस प्रकार लोग कभी परमेश्वर का आनंद प्राप्त नहीं कर सकते हैं या परीक्षाओं का सामना नहीं कर सकते हैं। इसका यह भी अर्थ है कि अय्यूब के अपवाद के साथ, सभी लोग अब भी शैतान द्वारा घेरे और फुसलाए जाते हैं; वे सब शैतान द्वारा उसके दोषारोपण, आक्रमण और दुर्व्यवहार के भागी बनाए जाते हैं। वे ही हैं जिन्हें शैतान निगलने की कोशिश करता है, और वे सब स्वतंत्रता से रहित, शैतान के द्वारा बंधक बनाए गए क़ैदी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 57

यदि मनुष्य के हृदय में परमेश्वर के प्रति शत्रुता हो, तो वह कैसे परमेश्वर का भय मान सकता और बुराई से दूर रह सकता है?

चूँकि आज के लोगों में अय्यूब जैसी मानवता नहीं है, इसलिए उनकी प्रकृति का सार, और परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति क्या है? क्या वे परमेश्वर का भय मानते हैं? क्या वे बुराई से दूर रहते हैं? वे जो परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते हैं उनका सार केवल तीन शब्दों में प्रस्तुत किया जा सकता है : "परमेश्वर के शत्रु।" तुम लोग ये तीन शब्द अक़्सर कहते हो, किंतु उनका वास्तविक अर्थ तुम लोगों ने कभी नहीं जाना है। "परमेश्वर के शत्रु" शब्दों का सार है : वे यह नहीं कह रहे हैं कि परमेश्वर मनुष्य को शत्रु के रूप में देखता है, बल्कि यह कि मनुष्य परमेश्वर को शत्रु के रूप में देखता है। पहला, जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं, तब उनमें से किसके पास स्वयं अपने लक्ष्य, कारण, और महत्वकांक्षाएँ नहीं होती हैं? उनका एक भाग भले ही परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता है और परमेश्वर के अस्तित्व को देख चुका होता है, फिर भी वे कारण परमेश्वर में उनके विश्वास में अब भी समाए होते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने में उनका अंतिम लक्ष्य उसके आशीष और अपनी मनचाही चीज़ें प्राप्त करना होता है। लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे इसमें अवश्य जोड़ना, और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कोई प्रतिज्ञाएँ दी हैं? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा अंत क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर के आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ... प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में निरंतर ऐसा गुणा-भाग करता है, और वे परमेश्वर से माँगें करते हैं जिनमें उनके कारण, महत्वाकांक्षाएँ, तथा लेन-देन की मानसिकता होती है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है, परमेश्वर के बारे में लगातार मनसूबे बनाता रहता है, और स्वयं अपने व्यक्तिगत मनोरथ के पक्ष में परमेश्वर के साथ तर्क-वितर्क करता रहता है, और परमेश्वर से कुछ न कुछ कहलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह दे सकता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान बर्ताव नहीं करता है। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत माँगें की हैं, और यहाँ तक कि एक इंच देने के बाद एक मील लेने की कोशिश करते हुए, हर क़दम पर उस पर दबाव भी डाला है। परमेश्वर के साथ सौदबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किन्हीं निश्चित स्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त पड़ जाते हैं, और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक स्विस आर्मी चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और कर्तव्य है, जबकि परमेश्वर का दायित्व मनुष्य की रक्षा और देखभाल करना, और उसे भरण-पोषण देना है। ऐसी है "परमेश्वर में विश्वास" की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ। मनुष्य की प्रकृति के सार से लेकर उसके व्यक्तिपरक अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से संबंधित हो। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ कोई लेना-देना संभवतः नहीं हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह, मनुष्य ने न कभी यह विचार किया और न समझा कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए परमेश्वर का भय मानने और आराधना करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थितियों के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। यह सार क्या है? यह सार यह है कि मनुष्य का हृदय द्वेषपूर्ण है, छल और कपट रखता है, निष्पक्षता और धार्मिकता और उससे जो सकारात्मक है प्रेम नहीं करता है, और यह तिरस्करणीय और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए और अधिक बंद नहीं हो सकता है; उसने इसे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य का सच्चा हृदय कभी नहीं देखा है, न ही उसकी मनुष्य द्वारा कभी आराधना की गई है। परमेश्वर चाहे जितनी बड़ी कीमत चुकाए, या वह चाहे जितना अधिक कार्य करे, या वह मनुष्य का चाहे जितना भरण-पोषण करे, मनुष्य इस सबके प्रति अंधा, और सर्वथा उदासीन ही बना रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह केवल स्वयं ही अपने हृदय का ध्यान रखना, स्वयं अपने निर्णय लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करना, या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का पालन करना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। ऐसी है आज मनुष्य की दशा। अब आओ हम फिर अय्यूब को देखें। सबसे पहले, क्या उसने परमेश्वर के साथ कोई सौदा किया? क्या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने में उसकी कोई छिपी हुई मंशा थी? उस समय, क्या परमेश्वर ने आने वाले अंत के बारे में किसी से बात की थी? उस समय, परमेश्वर ने किसी से भी अंत के बारे में प्रतिज्ञाएँ नहीं की थीं, और यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें अय्यूब परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ था। क्या आज के लोग अय्यूब के साथ तुलना में कहीं टिकते हैं? उनमें बहुत ही अधिक असमानता है, वे अलग-अलग स्तरों पर हैं। यद्यपि अय्यूब को परमेश्वर का अधिक ज्ञान नहीं था, फिर भी उसने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया था और यह परमेश्वर का था। उसने परमेश्वर के साथ कभी सौदा नहीं किया, और उसकी परमेश्वर के प्रति कोई अनावश्यक इच्छाएँ या माँगें नहीं थीं; इसके बजाय, वह विश्वास करता था कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" यही वह था जो उसने जीवन के अनेक वर्षों के दौरान परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को सच्चाई से थामे रहने से देखा और प्राप्त किया था। इसी प्रकार, उसने वह परिणाम भी प्राप्त किया जो इन वचनों में दर्शाया गया है : "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" ये दो वाक्य वह थे जो उसने अपने जीवन के अनुभवों के दौरान परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप देखे और जानना आरंभ किए थे, और वे उसके सबसे ताक़तवर हथियार भी थे जिनसे उसने शैतान के प्रलोभनों के दौरान विजय प्राप्त की थी, और वे परमेश्वर की गवाही पर उसके दृढ़ता से डटे रहने की नींव थे। इस बिंदु पर, क्या तुम लोग अय्यूब की एक प्यारे व्यक्ति के रूप में परिकल्पना करते हो? क्या तुम लोग ऐसा व्यक्ति बनने की आशा करते हो? क्या तुम लोग शैतान के प्रलोभनों से गुज़ारे जाने से डरते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर से तुम लोगों को अय्यूब के समान ही परीक्षाओं से गुज़ारने की प्रार्थना करने का संकल्प लेते हो? बिना संदेह, अधिकांश लोग ऐसी चीज़ों के लिए प्रार्थना करने का साहस नहीं करेंगे। तो यह स्पष्ट है कि तुम लोगों की आस्था दयनीय रूप से तुच्छ है; अय्यूब की तुलना में, तुम लोगों की आस्था उल्लेख के योग्य भी नहीं है। तुम लोग परमेश्वर के शत्रु हो, तुम लोग परमेश्वर का भय नहीं मानते हो, तुम लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही पर डटे रह पाने में असमर्थ हो, और तुम शैतान के हमलों, आरोपों और प्रलोभनों पर विजय पाने में असमर्थ हो। वह क्या है जो तुम लोगों को परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करने के योग्य बनाता है? अय्यूब की कहानी सुनने और मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का अभिप्राय और मनुष्य के उद्धार का अर्थ समझने के बाद, क्या अब तुम लोगों में अय्यूब के समान परीक्षण स्वीकार करने का विश्वास है? क्या तुममें स्वयं को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करने देने का थोड़ा-सा संकल्प नहीं होना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 58

परमेश्वर की परीक्षाओं के बारे में आशंकाएँ मत रखो

अय्यूब की परीक्षाएँ समाप्त होने पर उसकी गवाही मिलने के बाद, परमेश्वर ने संकल्प लिया कि वह अय्यूब के समान लोगों का एक समूह—या एक से अधिक समूह—प्राप्त करेगा, इसके अतिरिक्त उसने संकल्प लिया कि वह शैतान को फिर कभी, परमेश्वर से होड़ करते हुए, उन्हीं साधनों का उपयोग करके जिनके द्वारा उसने अय्यूब को लुभाया था, उस पर आक्रमण और उसके साथ दुर्व्यवहार किया था, किसी अन्य व्यक्ति पर आक्रमण या उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं करने देगा; परमेश्वर ने शैतान को फिर कभी मनुष्य के साथ, जो कमज़ोर, मूर्ख और अज्ञानी है, ऐसी चीज़ें नहीं करने दीं—बस इतना काफ़ी था कि शैतान ने अय्यूब को लुभाया था! शैतान को लोगों के साथ चाहे जैसा मनचाहा दुर्व्यवहार नहीं करने देना यह परमेश्वर की अनुकंपा है। परमेश्वर के लिए, इतना काफ़ी था कि अय्यूब ने शैतान के प्रलोभन और दुर्व्यवहार झेले थे। परमेश्वर ने शैतान को फिर कभी ऐसी चीज़ें करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उनका जीवन और सब कुछ परमेश्वर द्वारा शासित और आयोजित किया जाता है, और शैतान परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इच्छानुसार बहकाने का अधिकारी नहीं है—तुम लोगों को यह बात स्पष्ट होनी चाहिए! परमेश्वर मनुष्य की कमज़ोरी का ध्यान रखता है, और उसकी मूर्खता तथा अज्ञान को समझता है। यद्यपि, इसलिए कि मनुष्य को पूरी तरह बचाया जा सके, परमेश्वर को उसे शैतान के हाथों में सौंपना पड़ता है, परंतु परमेश्वर मनुष्य को कभी शैतान द्वारा मूर्ख मानकर छले जाते और प्रताड़ित होते देखने का इच्छुक नहीं है, और वह मनुष्य को हमेशा कष्ट भुगतते देखना नहीं चाहता है। मनुष्य परमेश्वर द्वारा सृजित किया गया था, और यह पूरी तरह न्यायोचित है कि परमेश्वर मनुष्य से संबंधित सब कुछ शासित और व्यवस्थित करे; यह परमेश्वर का उत्तरदायित्व है, और यह वह अधिकार है जिसके द्वारा परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है! परमेश्वर शैतान को मनुष्य के साथ मनमाने ढंग से दुर्व्यवहार और बुरा बर्ताव नहीं करने देता है, वह मनुष्य को भटकाने के लिए शैतान को नानाविध साधनों का प्रयोग नहीं करने देता है, और इससे भी बढ़कर, वह मनुष्य पर परमेश्वर की संप्रभुता में शैतान को हस्तक्षेप नहीं करने देता है, न ही वह शैतान को उन विधि-विधानों को कुचलने और नष्ट करने देता है जिनके द्वारा परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, मनुष्यजाति का प्रबंधन करने और बचाने के परमेश्वर के महान कार्य की तो बात ही छोड़ दें! वे जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, और वे जो परमेश्वर की गवाही देने में समर्थ हैं, परमेश्वर की छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना का मर्म और साकार रूप हैं, साथ ही उसके छह हज़ार वर्षों के कार्य के उसके प्रयासों इनाम है। परमेश्वर इन लोगों को यूँ ही शैतान को कैसे दे सकता है?

लोग परमेश्वर के परीक्षणों को लेकर प्रायः चिंतित और भयभीत रहते हैं, तो भी वे हर समय शैतान के फंदे में रह रहे होते हैं, और ख़तरों से भरे क्षेत्र में रह रहे होते हैं जिसमें उन पर शैतान द्वारा आक्रमण और दुर्व्यवहार किया जाता है—मगर वे नहीं जानते भय क्या है, और अविचलित रहते हैं। चल क्या रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित है जिन्हें वह देख सकता है। उसमें मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और सरोकार की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की रत्ती भर भी सराहना नहीं है। यदि परमेश्वर की परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के प्रति थोड़ी-सी घबराहट और डर को छोड़ दें, तो मनुष्य को परमेश्वर के अच्छे अभिप्रायों की रत्ती भर भी समझ नहीं है। परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो परमेश्वर के छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो यह तक मानते हैं कि परमेश्वर बुरे षडयंत्रों को प्रश्रय देता है, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं सब करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सावधान नहीं रहे तो उन्हें परमेश्वर द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ उनके पास है वह सब परमेश्वर द्वारा ले लिया जा सकता है, और यहाँ तक कि उनका जीवन भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य शैतान के खेमे में है, परंतु वह शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने की कभी चिंता नहीं करता है, और उसके साथ शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किया जाता है परंतु वह शैतान द्वारा बंधक बनाए जाने से भी कभी नहीं डरता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाता है, और अपना संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर का शासन स्वीकार और उसके प्रति समर्पण कर पाता है, तो इसमें खोने के लिए क्या है? इस प्रकार, मैं सुझाव देता हूँ कि तुम लोग अपने कार्यकलापों में सावधान रहो, और उस सब के प्रति चौकन्ने रहो जो तुम लोगों पर आने ही वाला है। तुम लोग उतावले या आवेगी न बनो, और परमेश्वर तथा लोगों, विषयों, और वस्तुओं के साथ, जिनकी उसने तुम लोगों के लिए व्यवस्था की है, अपने गर्म खून या अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हुए, या अपनी कल्पनाओं और अवधारणाओं के अनुसार व्यवहार मत करो; परमेश्वर के कोप को भड़काने से बचने के लिए, तुम लोगों को अपने कार्यकलापों में सचेत होना ही चाहिए, और अधिक प्रार्थना तथा खोज करनी चाहिए। यह याद रखो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 59

अपनी परीक्षाओं के पश्चात् अय्यूब

अय्यूब 42:7-9 ऐसा हुआ कि जब यहोवा ये बातें अय्यूब से कह चुका, तब उसने तेमानी एलीपज से कहा, "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही। इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा, क्योंकि तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" यह सुन तेमानी एलीपज, शूही बिलदद और नामाती सोपर ने जाकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया, और यहोवा ने अय्यूब की प्रार्थना ग्रहण की।

अय्यूब 42:10 जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने उसका सारा दु:ख दूर किया, और जितना अय्यूब के पास पहले था, उसका दुगना यहोवा ने उसे दे दिया।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

अय्यूब 42:17 अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया।

वे जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं परमेश्वर द्वारा दुलार से देखे जाते हैं, जबकि वे जो मूर्ख हैं परमेश्वर द्वारा दीन-हीन के रूप में देखे जाते हैं

अय्यूब 42:7-9 में, परमेश्वर कहता है कि अय्यूब उसका दास है। अय्यूब का उल्लेख करने के लिए उसके द्वारा "दास" शब्द का प्रयोग उसके हृदय में अय्यूब का महत्व दर्शाता है; यद्यपि परमेश्वर ने अय्यूब को कुछ ऐसा कहकर नहीं पुकारा था जो और अधिक सम्माननीय होता, फिर भी परमेश्वर के हृदय के भीतर अय्यूब के महत्व से इस उपाधि का कोई संबंध नहीं था। यहाँ "दास" अय्यूब के लिए परमेश्वर का दिया उपनाम है। परमेश्वर द्वारा "मेरे दास अय्यूब" का बहुत बार उल्लेख दिखाता है कि वह अय्यूब से कितना प्रसन्न था, और यद्यपि परमेश्वर ने "दास" शब्द के पीछे निहित अर्थ की बात नहीं की, फिर भी "दास" शब्द की परमेश्वर की परिभाषा पवित्र शास्त्र के इस अंश के उसके वचनों में देखी जा सकती है। परमेश्वर ने सबसे पहले तेमानी एलीपज से कहा : "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही।" यह पहली बार है जब परमेश्वर ने ये वचन स्पष्ट रूप से लोगों से कहे थे कि उसने वह सब स्वीकार किया जो अय्यूब ने परमेश्वर द्वारा अपनी परीक्षाओं के बाद कहा और किया था, और यह पहली बार है जब उसने अय्यूब द्वारा कहे और किए गए सब कुछ की सटीकता और औचित्य की पुष्टि की थी। परमेश्वर एलीपज और दूसरों के ग़लत, और बेतुके वार्तालाप के कारण क्रोधित था, क्योंकि, अय्यूब के समान, वे परमेश्वर का प्रकटन नहीं देख सके थे या उन वचनों को नहीं सुन सके थे जो उसने उनके जीवन में कहे थे, इसके अतिरिक्त अय्यूब को परमेश्वर का ऐसा सटीक ज्ञान था, जबकि वे परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन करते हुए और वे जो कुछ करते थे उनमें उसके धैर्य की परीक्षा लेते हुए, आँख मूँदकर परमेश्वर के बारे में केवल अनुमान ही लगा सके थे। परिणामस्वरूप, अय्यूब के द्वारा जो किया और कहा गया था उसे स्वीकार करने के साथ ही साथ, परमेश्वर दूसरों के प्रति कुपित हो गया, क्योंकि उनमें वह न केवल परमेश्वर के भय की कोई वास्तविकता नहीं देख पाया था, बल्कि वे जो कुछ कहते थे उसमें भी उसने परमेश्वर के भय के बारे में कुछ नहीं सुना था। और इसलिए इसके बाद परमेश्वर ने उनसे नीचे लिखी माँगें कीं : "इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा।" इस अंश में परमेश्वर एलीपज और दूसरों से कुछ ऐसा करने के लिए कह रहा है जो उन्हें उनके पापों से मुक्ति देगा, क्योंकि उनकी मूढ़ता यहोवा परमेश्वर के विरुद्ध पाप थी, और इस प्रकार उन्हें अपनी ग़लतियों का सुधार करने के लिए होमबलि चढ़ानी पड़ी थी। होमबलियाँ प्रायः परमेश्वर को चढ़ाई जाती हैं, परंतु इन होमबलियों के बारे में असामान्य बात यह है कि वे अय्यूब को चढ़ाई गई थीं। अय्यूब को परमेश्वर द्वारा इसलिए स्वीकार किया गया था क्योंकि उसने अपनी परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर के लिए गवाही दी थी। इस बीच, अय्यूब के इन मित्रों को उसकी परीक्षाओं के समय के दौरान उजागर किया गया था; उनकी मूर्खता के कारण, परमेश्वर द्वारा उनकी भर्त्सना की गई थी, और उन्होंने परमेश्वर का क्रोध भड़काया था, और परमेश्वर द्वारा दण्डित किए जाने चाहिए—अय्यूब के सामने होमबलि चढ़ाने के द्वारा दण्डित किए गए—जिसके बाद अय्यूब ने उनके लिए प्रार्थना की कि उनकी तरफ़ से परमेश्वर का दण्ड और कोप हट जाए। परमेश्वर का अभिप्राय उन्हें लज्जित करना था, क्योंकि वे ऐसे लोग नहीं थे जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते थे, और उन्होंने अय्यूब की सत्यनिष्ठा की भर्त्सना की थी। एक दृष्टि से, परमेश्वर उन्हें बता रहा था कि उसने उनके कार्यकलाप स्वीकार नहीं किए थे, किंतु अय्यूब को अत्यधिक स्वीकार किया और उससे प्रसन्न हुआ था; दूसरी दृष्टि से, परमेश्वर उन्हें बता रहा था कि परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाना मनुष्य को परमेश्वर के समक्ष ऊँचा उठा देता है, कि मनुष्य अपनी मूर्खता के कारण परमेश्वर की घृणा का भागी बनता है, और इसके कारण परमेश्वर को नाराज़ करता है, और वह परमेश्वर की नज़रों में दीन-हीन और नीच है। ये दो प्रकार के लोगों की परमेश्वर द्वारा दी गई परिभाषाएँ हैं, वे इन दो प्रकार के लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्तियाँ हैं, और वे इन दो प्रकार के लोगों के महत्व और प्रतिष्ठा के बारे में परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर ने अय्यूब को भले ही अपना दास कहा था, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में यह दास परमप्रिय था, और उसे दूसरों के लिए प्रार्थना करने और उनकी ग़लतियों को क्षमा करने का अधिकार प्रदान किया गया था। यह दास परमेश्वर से सीधे बातचीत कर पाता और सीधे परमेश्वर के समक्ष आ पाता था, उसकी हैसियत दूसरों की तुलना में अधिक ऊँची और सम्माननीय थी। यही परमेश्वर द्वारा बोले गए "दास" शब्द का सच्चा अर्थ है। अय्यूब को उसके द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की वजह से यह विशेष सम्मान दिया गया था, और दूसरों को परमेश्वर द्वारा दास नहीं कहा गया तो इसका कारण यह है कि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते थे और बुराई से दूर नहीं रहते थे। परमेश्वर की ये दो स्पष्ट रूप से भिन्न प्रवृत्तियाँ ही दो प्रकार के लोगों के प्रति उसकी प्रवृत्तियाँ हैं : वे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जाते हैं और उसकी नज़रों में अनमोल माने जाते हैं, जबकि वे लोग जो मूर्ख हैं परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं, बुराई से दूर रहने में अक्षम हैं, और परमेश्वर की कृपा प्राप्त नहीं कर पाते हैं; वे प्रायः परमेश्वर की घृणा और भर्त्सना के भागी बनते हैं, और वे परमेश्वर की नज़रों में दीन-हीन हैं।

परमेश्वर अय्यूब को अधिकार प्रदान करता है

अय्यूब ने अपने मित्रों के लिए प्रार्थना की, और उसके बाद, अय्यूब की प्रार्थनाओं की वजह से, परमेश्वर उनसे उनकी मूर्खता के अनुसार नहीं निपटा—उसने उन्हें दण्ड नहीं दिया या उनसे कोई बदला नहीं लिया। ऐसा क्यों था? ऐसा इसलिए था क्योंकि परमेश्वर के दास अय्यूब द्वारा उनके लिए की गई प्रार्थनाएँ परमेश्वर के कानों तक पहुँच गई थीं; परमेश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया था क्योंकि उसने अय्यूब की प्रार्थनाओं को स्वीकार कर लिया था। तो, इसमें हम क्या देखते हैं? जब परमेश्वर किसी को धन्य करता है, तो वह उन्हें बहुत-से पुरस्कार देता है, और केवल भौतिक पुरस्कार ही नहीं : परमेश्वर उन्हें अधिकार भी देता है, और दूसरों के लिए प्रार्थना करने का अधिकारी बनाता है, और परमेश्वर उन लोगों के अपराधों को भूल जाता और अनदेखा कर देता है, क्योंकि वह इन प्रार्थनाओं को सुन लेता है। यह वही अधिकार है जो परमेश्वर ने अय्यूब को दिया। उनके तिरस्कार को रोकने के लिए अय्यूब की प्रार्थनाओं के माध्यम से, यहोवा परमेश्वर ने उन मूर्ख लोगों को लज्जित किया—जो, निश्चित ही, एलीपज और दूसरों के लिए उसका विशेष दण्ड था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 60

अय्यूब को एक बार फिर परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाता है, और वह फिर कभी शैतान द्वारा दोषारोपित नहीं किया जाता है

यहोवा परमेश्वर के कथनों के बीच ऐसे वचन हैं कि "तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" वह क्या था जो अय्यूब ने कहा था? यह वह था जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, और साथ ही अय्यूब की पुस्तक में वचनों के अनेक पन्नों में बताया गया है जिनमें अय्यूब द्वारा बोला गया अंकित है। वचनों के इन अनेक पन्नों में से सभी में, अय्यूब को परमेश्वर के बारे में कभी एक बार भी कोई शिकायत या संदेह नहीं है। वह बस परिणाम की प्रतीक्षा करता है। यह वह प्रतीक्षा है जो आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति है, जिसके परिणामस्वरूप, और परमेश्वर को कहे गए उसके वचनों के परिणामस्वरूप, अय्यूब को परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया गया था। जब उसने परीक्षाएँ भुगतीं और कष्ट झेला, तब परमेश्वर उसके बगल में था, और यद्यपि परमेश्वर की उपस्थिति से उसका कष्ट कम नहीं हुआ था, फिर भी परमेश्वर ने वह देखा जो वह देखना चाहता था, और वह सुना जो वह सुनना चाहता था। अय्यूब के कार्यकलापों और वचनों में से प्रत्येक परमेश्वर की आँखों और कानों तक पहुँचा; परमेश्वर ने सुना, और उसने देखा—यह तथ्य है। परमेश्वर के बारे में अय्यूब का ज्ञान, और उस समय, उस अवधि के दौरान उसके हृदय में परमेश्वर के बारे में उसके विचार, वास्तव में उतने विशिष्ट नहीं थे जितने आज के लोगों के हैं, परंतु उस समय के संदर्भ में, परमेश्वर ने तब भी वह सब पहचान लिया जो उसने कहा था, क्योंकि उसका व्यवहार और उसके हृदय के विचार, साथ ही वह जो उसने अभिव्यक्त और प्रकट किया था, उसकी अपेक्षाओं के लिए पर्याप्त थे। उस समय के दौरान जब अय्यूब को परीक्षाओं से गुज़ारा गया था, उसने अपने हृदय में जो सोचा और करने का ठान लिया था, उसने परमेश्वर को परिणाम दिखाया, वह परिणाम जो परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, और उसके बाद परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षाएँ दूर कर दीं, अय्यूब अपने कष्टों से निकल गया, और उसकी परीक्षाएँ समाप्त हो गई थीं और फिर कभी दुबारा उस पर नहीं आईं। चूँकि अय्यूब इन परीक्षाओं से पहले ही गुज़ारा जा चुका था, और इन परीक्षाओं के दौरान वह डटा रहा था, और उसने शैतान पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली थी, इसलिए परमेश्वर ने उसे वे आशीष प्रदान किए जिनका वह समुचित रूप से अधिकारी था। जैसा कि अय्यूब 42:10,12 में अभिलिखित है, अय्यूब एक बार फिर धन्य किया गया था, और उससे कहीं अधिक धन्य किया गया जितना पहले दृष्टांत में किया गया था। इस समय शैतान पीछे हट गया था, तथा उसने अब और न कुछ कहा या न कुछ किया, और उसके बाद से शैतान ने अब और न अय्यूब के साथ छेड़छाड़ की या न ही उस पर आक्रमण किया, और शैतान ने अय्यूब को दिए गए परमेश्वर के आशीषों के विरुद्ध अब और कोई दोषारोपण नहीं किया।

अय्यूब ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध परमेश्वर के आशीषों के बीच बिताया

यद्यपि उस समय के उसके आशीष केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊँटों, भौतिक संपत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थे, फिर भी परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को जो आशीष प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थे। क्या उस समय यह अंकित किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनंत प्रतिज्ञाएँ अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब को अपने आशीषों में, परमेश्वर ने उसके अंत का उल्लेख नहीं किया या उसकी थोड़ी भी चर्चा नहीं की, और परमेश्वर के हृदय में अय्यूब चाहे जो महत्व और स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपने आशीषों में अत्यधिक नपा-तुला था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिंदु तक नहीं पहुँची थी, इस योजना को उसके कार्य के अंतिम चरण में अभी प्रवेश करना था, तब परमेश्वर ने मनुष्य को भौतिक आशीष मात्र ही प्रदान करते हुए, अंत का कोई उल्लेख नहीं किया था। इसका अर्थ यह है कि अय्यूब के जीवन का उत्तरार्द्ध परमेश्वर के आशीषों के बीच गुज़रा था, जो वही था जिसने उसे दूसरों से अलग बनाया था—किंतु उनके समान ही उसकी आयु बढ़ी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन आया जब उसने संसार को अलविदा कह दिया। इस प्रकार यह अभिलिखित है कि "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। यहाँ "वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" का क्या अर्थ है? परमेश्वर ने लोगों के अंत की घोषणा की उससे पहले के युग में, परमेश्वर ने अय्यूब के लिए एक जीवन काल निर्धारित किया था, और जब वह उस आयु तक पहुँच गया था तब उसने अय्यूब को स्वाभाविक रूप से इस संसार से जाने दिया। अय्यूब को दूसरे आशीष से उसकी मृत्यु तक, परमेश्वर ने और कोई कष्ट नहीं बढ़ाए। परमेश्वर के लिए, अय्यूब की मृत्यु स्वाभाविक, और आवश्यक भी थी; यह कुछ ऐसा था जो बहुत सामान्य था, और न तो न्याय था और न ही दण्डाज्ञा। जब वह जीवित था, तब अय्यूब परमेश्वर की आराधना करता और उसका भय मानता था; उसकी मृत्यु के बाद उसका अंत किस प्रकार हुआ, इस संबंध में परमेश्वर ने कुछ नहीं कहा, न ही इस बारे में कोई टिप्पणी की। परमेश्वर जो कहता और करता है उसमें उसके औचित्य का प्रबल बोध होता है, और उसके वचनों और कार्यों की विषयवस्तु और सिद्धांत उसके कार्य के चरण और उस अवधि के अनुसार होते हैं जिसमें वह कार्य कर रहा होता है। परमेश्वर के हृदय में अय्यूब जैसे किसी व्यक्ति का किस प्रकार का अंत हुआ? क्या परमेश्वर अपने हृदय में किसी भी प्रकार के निर्णय पर पहुँच गया था? निस्संदेह वह पहुँच गया था! बस इतना ही है कि मनुष्य को यह अविदित था; परमेश्वर मनुष्य को बताना नहीं चाहता था, न ही मनुष्य को बताने का उसका कोई इरादा था। इस प्रकार, ऊपरी तौर पर कहें, तो अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मरा, और ऐसा था अय्यूब का जीवन।

अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब द्वारा जिए गए जीवन का मूल्य

क्या अय्यूब ने मूल्यवान जीवन जिया? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि उसने मूल्यवान जीवन जिया? मनुष्य के लिए उसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने शैतान और संसार के लोगों के सामने गूँजती हुई गवाही में उस मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया जिसे परमेश्वर बचाना चाहता था। उसने वह कर्तव्य निभाया जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को निभाया ही चाहिए था, उन सभी लोगों के लिए जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, एक प्रतिमान स्थापित किया, और एक आदर्श के रूप में कार्य किया, लोगों को देखने दिया कि परमेश्वर पर भरोसा रखकर शैतान पर विजय प्राप्त करना पूरी तरह संभव है। परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने, और परमेश्वर के कर्मों की स्तुति करने, परमेश्वर को आराम देने और उसके आनंद लेने के लिए कुछ करने की उसकी क्षमता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि कैसे, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजय प्राप्त की, और शैतान के समक्ष परमेश्वर की गूँजती हुई गवाही दी, मनुष्यजाति के बीच परमेश्वर का महिमामंडन किया, परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाया, और परमेश्वर के आतुर हृदय को एक परिणाम देखने दिया और आशा देखने दी। उसकी गवाही ने मनुष्यजाति के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य में, परमेश्वर की अपनी गवाही में डटे रहने की क्षमता का, और परमेश्वर की ओर से शैतान को लज्जित करने में सक्षम होने का दृष्टांत स्थापित किया। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाया, उसने परमेश्वर को महिमान्वित होने की खुशी का पूर्वस्वाद चखाया, और परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए अद्भुत आरंभ प्रदान किया था। इस बिंदु से आगे, अय्यूब का नाम परमेश्वर की महिमा का प्रतीक, और शैतान पर मनुष्यजाति की विजय का चिन्ह बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जो जिया, वह और साथ ही शैतान के ऊपर उसकी उल्लेखनीय विजय परमेश्वर द्वारा हमेशा हृदय में सँजोकर रखी जाएगी, और आने वाली पीढ़ियों द्वारा उसकी पूर्णता, खरेपन, और परमेश्वर के भय का सम्मान और अनुकरण किया जाएगा। परमेश्वर द्वारा उसे दोषरहित, चमकदार मोती के समान हमेशा सँजोया जाएगा, और इसलिए वह मनुष्य के द्वारा भी सहेजकर रखे जाने योग्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 61

व्यवस्था के युग के नियम

दस आज्ञाएँ

वेदी बनाने के सिद्धांत

सेवकों के साथ व्यवहार के लिए नियम

चोरी और मुआवजे़ के लिए नियम

सब्त के वर्ष और तीन पर्वों का पालन करना

सब्त के दिन के लिए नियम

बलि चढ़ाने के लिए नियम

होमबलि

अन्न बलि

मेल बलि

पाप बलि

दोषबलि

याजकों द्वारा बलियाँ चढ़ाने के नियम (हारून और उसके पुत्रों को पालन करने का आदेश दिया जाता है)

याजकों द्वारा होमबलि

याजकों द्वारा अन्नबलि

याजकों द्वारा पापबलि

याजकों द्वारा दोषबलि

याजकों द्वारा मेलबलि

याजकों द्वारा बलि खाने के लिए नियम

स्वच्छ और अस्वच्छ पशु (जिन्हें खाया जा सकता और नहीं खाया जा सकता है)

बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के शुद्धिकरण के लिए नियम

कुष्ठ रोग की जाँच करने के लिए मानक

जो कुष्ठ रोग से चंगे हो चुके हैं उनके लिए नियम

संक्रमित घरों की सफ़ाई करने के लिए नियम

असामान्य स्राव से पीड़ित लोगों के लिए नियम

प्रायश्चित का दिन जो वर्ष में एक बार अवश्य मनाया जाना चाहिए

मवेशी और भेड़-बकरी की बलि चढ़ाने के लिए नियम

अन्यजातियों के घृण्य अभ्यासों का अनुसरण करने का निषेध (कौटुम्बिक व्यभिचार, इत्यादि नहीं करना)

नियम जिनका लोगों द्वारा पालन अवश्य किया जाना चाहिए ("तुम पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा पवित्र हूँ।")

उनका वध जो मोलेक को अपने बच्चों की बलि चढ़ाते हैं

व्यभिचार के अपराध के दण्ड के लिए नियम

नियम जिनका याजकों द्वारा पालन अवश्य किया जाना चाहिए (उनके प्रतिदिन के व्यवहार के लिए नियम, पवित्र वस्तुओं का उपभोग करने के लिए नियम, बलिदान चढ़ाने के लिए नियम, इत्यादि)

पर्व जिन्हें मनाया जाना चाहिए (सब्त का दिन, फसह, पिन्तेकुस्त, प्रायश्चित का दिन, इत्यादि)

अन्य नियम (दीपक जलाना, जुबली वर्ष, भूसंपत्ति छुड़ाना, मन्नत मानना, दसवें अंश की भेंटें, इत्यादि)

व्यवस्था के युग के नियम परमेश्वर द्वारा संपूर्ण मनुष्यजाति के निर्देशन के वास्तविक प्रमाण हैं

तो, तुम लोगों ने व्यवस्था के युग के ये नियम और सिद्धांत पढ़ लिए हैं, तुमने पढ़ लिए हैं न? क्या इन नियमों का दायरा व्यापक है? सबसे पहले, उनमें दस आज्ञाएँ शामिल हैं, जिसके बाद नियम हैं कि वेदियाँ कैसे बनाएँ, इत्यादि। इनके बाद सब्त का पालन करने और तीन पर्व मनाने के नियम हैं, जिसके बाद बलियाँ चढ़ाने के नियम हैं। क्या तुम लोगों ने देखा कि कितने प्रकार की बलियाँ हैं? होमबलि, अन्नबलि, मेलबलि, पापबलि, इत्यादि हैं। इनके बाद याजकों के लिए बलि के नियम आते हैं, जिसमें याजकों द्वारा होमबलि और अन्नबलि, और अन्य प्रकार की बलियाँ शामिल हैं। आठवां नियम याजकों द्वारा बलियों को खाने के लिए है। फिर इसके लिए नियम हैं कि लोगों के जीवन के दौरान किन चीज़ों का पालन किया जाना चाहिए। लोगों के जीवन के कई पहलुओं के लिए निर्धारित नियम हैं, जैसे इसके लिए नियम कि वे क्या खा सकते या क्या नहीं खा सकते हैं, बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के शुद्धिकरण के लिए नियम, और कोढ़ से चंगे हो गए लोगों के लिए नियम। इन नियमों में, परमेश्वर इस सीमा तक जाता है कि बीमारी के बारे में बात करता है, और इनमें भेड़-बकरी और मवेशी, इत्यादि का वध करने के लिए भी नियम हैं। भेड़-बकरी और मवेशी परमेश्वर द्वारा सृजित किए गए थे, और उनका वध तुम्हें उसी तरह करना चाहिए जिस तरह परमेश्वर तुमसे करने के लिए कहता है; बिना किसी संदेह, परमेश्वर के वचनों में तर्क है; परमेश्वर द्वारा दी गई आज्ञाओं के अनुसार कार्य करना निस्संदेह सही है, और निश्चित ही लोगों के लिए लाभदायक है! पर्व और उन्हें मनाने के नियम भी हैं, जैसे सब्त का दिन, फसह, और अन्य—परमेश्वर ने इन सबके बारे में बोला था। आओ हम अंतिम नियमों पर नज़र डालें : अन्य नियम—दीपक जलाना, जुबली वर्ष, भूसंपत्ति छुड़ाना, मन्नतें मानना, दशवाँ अंश चढ़ाना, इत्यादि। क्या इनका दायरा व्यापक है? सबसे पहले जिसकी बात की जाए वह है लोगों द्वारा बलियों का मुद्दा। फिर चोरी और मुआवज़े, और सब्त का दिन मनाने के लिए नियम हैं...; जीवन का एक-एक विवरण शामिल है। कहने का तात्पर्य यह, जब परमेश्वर ने अपनी प्रबंधन योजना का आधिकारिक कार्य आरंभ किया, तब उसने अनेक नियम निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य द्वारा किया जाना था। ये नियम मनुष्य को पृथ्वी पर मनुष्य का सामान्य जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का सामान्य जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य है। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियाँ कैसे बनाएँ, वेदियाँ किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि बलि कैसे चढ़ाएँ, और स्थापित किया कि मनुष्य को किस प्रकार जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो निर्दिष्ट किया वह सर्वव्यापी था, और इन रीति-रिवाज़ों, नियमों, और सिद्धांतों के साथ उसने लोगों के व्यवहार के मानक तय किए, उनके जीवन का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की व्यवस्थाओं में उनकी दीक्षा का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के समक्ष आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और उन सभी चीज़ों के बीच जीवन पाने के लिए उनका मार्गदर्शन किया जो परमेश्वर ने व्यवस्था, नियमितता, और संयम से युक्त मनुष्य के लिए बनाई थीं। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाएँ निर्धारित करने के उद्देश्य से सबसे पहले इन सीधे-सादे नियमों और सिद्धांतों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने वाला सामान्य जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का सामान्य जीवन हो; ऐसी है उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना के आरंभ की विशिष्ट विषयवस्तु। इन नियमों और व्यवस्थाओं में बहुत व्यापक विषयवस्तु समाहित है, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, इन्हें व्यवस्था के युग के लोगों द्वारा स्वीकार और इनका पालन किया जाना था, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर द्वारा अगुआई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

मनुष्यजाति परमेश्वर की शिक्षाओं और भरण-पोषण से सदा के लिए अवियोज्य है

इन नियमों में हम देखते हैं कि अपने कार्य के प्रति, अपने प्रबंधन के प्रति, और मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति गंभीर, कर्तव्यनिष्ठ, कठोर और दायित्वपूर्ण है। वह कार्य जो उसे मनुष्यजाति के बीच करना ही चाहिए, रत्ती भर भी विसंगति के बिना, वह अपने चरणों के अनुसार करता है, वे वचन जो मनुष्यजाति के बीच उसे बोलने ही चाहिए, रत्ती भर भी त्रुटि या चूक के बिना, वह बोल रहा है, मनुष्य को यह देखने दे रहा है कि वह परमेश्वर की अगुआई से अवियोज्य है, और उसे दिखा रहा है कि वह सब जो परमेश्वर करता और कहता है मनुष्यजाति के लिए कितना अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर ने बिलकुल आरंभ में—व्यवस्था के युग के दौरान—ये सीधी-सादी चीज़ें कीं, इस बात की परवाह किए बिना कि अगले युग में मनुष्य किस प्रकार का है। उस युग में परमेश्वर, संसार और मनुष्यजाति के बारे में लोगों की धारणाएँ परमेश्वर के लिए अमूर्त और अस्पष्ट थीं, और यद्यपि उनमें कुछ जाने-बूझे विचार और अभिप्राय थे, किंतु वे सब अस्पष्ट और ग़लत थे, और इस प्रकार मनुष्यजाति उनके लिए परमेश्वर की शिक्षाओं और भरण-पोषण से अवियोज्य थी। सबसे आरंभिक मनुष्यजाति बिल्कुल कुछ भी नहीं जानती थी, और इसलिए परमेश्वर को, इन नियमों के माध्यम से, और इन व्यवस्थाओं के माध्यम से, जो वचनों की थीं, मनुष्य को जीवित बचने के सर्वाधिक सतही और मूलभूत सिद्धांत और जीवन जीने के लिए आवश्यक नियम सिखाने से, इन चीज़ों को थोड़ा-थोड़ा करके मनुष्य के हृदय में उतारने से, और मनुष्य को परमेश्वर की क्रमिक समझ, परमेश्वर की अगुआई की क्रमिक सराहना और समझ, और मनुष्य तथा परमेश्वर के बीच संबंध की मूलभूत अवधारणा देने से आरंभ करना पड़ा था। यह प्रभाव प्राप्त करने के बाद ही, परमेश्वर, थोड़ा-थोड़ा करके, वह कार्य कर पाया था जो वह बाद में करता, और इस प्रकार ये नियम और व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य की आधारशिला, और परमेश्वर की प्रबंधन योजना के कार्य का पहला चरण हैं। यद्यपि, व्यवस्था के युग के कार्य से पहले, परमेश्वर ने आदम, हव्वा और उनके वंशजों से बात की थी, फिर भी वे आज्ञाएँ और शिक्षाएँ इतनी व्यवस्थित या विशिष्ट नहीं थीं कि एक-एक करके मनुष्य को दी जातीं, और उन्हें लिखा नहीं गया था, न ही वे नियम बनी थीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि, उस समय, परमेश्वर की योजना उतनी दूर तक नहीं गई थी; जब परमेश्वर मनुष्य को इस चरण तक ले आया, केवल तभी वह व्यवस्था के युग के ये नियम बोलना आरंभ कर सका, और मनुष्य से इन्हें कार्यान्वित करवाना आरंभ कर सका था। यह आवश्यक प्रक्रिया थी, और यह परिणाम अवश्यंभावी था। ये सीधे-सादे रीति-रिवाज़ और नियम मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के चरण और उसकी प्रबंधन योजना में प्रकट हुई परमेश्वर की बुद्धि दर्शाते हैं। परमेश्वर जानता है कि उसकी गवाही देने वाले लोगों का एक समूह प्राप्त कर सकने के उद्देश्य से, और उसके समान एक मन वाले लोगों का एक समूह प्राप्त कर सकने के उद्देश्य से, आरंभ करने के लिए किस विषयवस्तु और किन साधनों का उपयोग करना है, आगे बढ़ाने के लिए किन साधनों का उपयोग करना है, और समाप्त करने के लिए किन साधनों का उपयोग करना है। वह जानता है कि मनुष्य के भीतर क्या है, और जानता है कि मनुष्य में क्या कमी है। वह जानता है कि उसे क्या पोषण देना है, और उसे मनुष्य की अगुआई कैसे करनी चाहिए, और इसलिए वह यह भी जानता है कि मनुष्य को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। मनुष्य कठपुतली के समान है : उसे परमेश्वर की इच्छा की भले ही कोई समझ नहीं थी, किंतु उसके पास आज तक, चरण-दर-चरण, परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य की अगुआई में चलने के सिवा और कोई चारा नहीं था। परमेश्वर को जो करना था उसके बारे में उसके हृदय में कोई धुँधलापन नहीं था; उसके हृदय में बहुत ही सुस्पष्ट और सजीव योजना थी, और वह जो कार्य करना चाहता था उसे उसने, सतही से गहराई की ओर आगे बढ़ते हुए, अपने चरणों और अपनी योजना के अनुसार कार्यान्वित किया। यद्यपि उसने उस कार्य की ओर संकेत नहीं किया था जो उसे बाद में करना था, फिर भी उसका बाद का कार्य कड़ाई से उसकी योजना के अनुसार निरंतर कार्यान्वित होता और प्रगति करता रहा, जो परमेश्वर के स्वरूप का आविर्भाव है, और परमेश्वर का अधिकार भी है। वह अपनी प्रबंधन योजना के चाहे जिस चरण का कार्य कर रहा हो, उसका स्वभाव और उसका सार स्वयं उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बिल्कुल सत्य है। युग, या कार्य का चरण चाहे जो हो, ऐसी भी चीज़ें हैं जो कभी नहीं बदलेंगी : परमेश्वर किस प्रकार के लोगों से प्रेम करता है, किस प्रकार के लोगों से वह घृणा करता है, उसका स्वभाव और वह सब जो वह है और उसका है। यद्यपि ये नियम और सिद्धांत जो परमेश्वर द्वारा व्यवस्था के युग के दौरान स्थापित किए गए थे आज के लोगों को बहुत ही सीधे-सादे और सतही प्रतीत होते हैं, और यद्यपि उन्हें समझना और प्राप्त करना आसान है, फिर भी उनमें परमेश्वर की बुद्धि है, और फिर भी उनमें परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है। क्योंकि प्रकट रूप से इन सीधे-सादे नियमों के भीतर मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का उत्तरदायित्व और देखरेख, साथ ही उसके विचारों का उत्कृष्ट सार अभिव्यक्त हुए हैं, जो इस प्रकार मनुष्य को सच में इस तथ्य अहसास होने देते हैं कि परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ें उसके हाथ से नियंत्रित होती हैं। मनुष्यजाति चाहे जितना अधिक ज्ञान पर निपुणता प्राप्त कर ले, या वह चाहे जितने सिद्धांत और रहस्य समझ ले, परमेश्वर के लिए इनमें से कुछ भी मनुष्यजाति के लिए उसके भरण-पोषण का, और उसकी अगुवाई का स्थान लेने में सक्षम नहीं है; मनुष्यजाति परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य से हमेशा अवियोज्य रहेगी। ऐसा है मनुष्य और परमेश्वर के बीच अवियोज्य संबंध। परमेश्वर तुम्हें चाहे आज्ञा, या नियम दे, या उसकी इच्छा को समझने के लिए तुम्हें सत्य प्रदान करे, वह चाहे जो करे, परमेश्वर का लक्ष्य सुंदर कल की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करना है। परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन और वह जो कार्य करता है दोनों उसके सार के एक पहलू का प्रकाशन हैं, और उसके स्वभाव तथा उसकी बुद्धि के एक पहलू का प्रकाशन हैं; और वे उसकी प्रबंधन योजना का अपरिहार्य चरण हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए! परमेश्वर जो कुछ करता है उसमें उसकी इच्छा होती है; परमेश्वर ग़लत टीका-टिप्पणियों से भयभीत नहीं होता है, न ही वह अपने बारे में मनुष्य की किन्हीं भी धारणाओं या विचारों से डरता है। वह किसी भी मनुष्य, विषय या वस्तु से अबाधित, बस अपना कार्य करता है और अपनी प्रबंधन योजना के अनुसार अपना प्रबंधन आगे बढ़ाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 62

आज हम पहले मानवजाति के सृजन के बाद से परमेश्वर के विचारों, मतों और उसकी प्रत्येक गतिविधि का सार सारांश प्रस्तुत करेंगे। हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि उसने संसार की रचना करने से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक आरंभ तक कौन-सा कार्य किया है। तब हम यह पता लगा सकते हैं कि परमेश्वर के कौन-से विचार और मत मनुष्य के लिए अज्ञात हैं, और वहाँ से हम परमेश्वर की प्रबंधन योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस संदर्भ को अच्छी तरह से समझ सकते हैं, जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबंधन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और यह भी अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबंधन-कार्य से कौन-से परिणाम चाहता है—अर्थात् उसके प्रबंधन-कार्य का मर्म और उद्देश्य। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें एक सुदूर, स्थिर और शांत समय में जाने की आवश्यकता है, जब मनुष्य नहीं थे ...

जब परमेश्वर अपनी सेज से उठा, तो पहला विचार जो उसके मन में आया, वह यह था : एक जीवित व्यक्ति—एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—ऐसा मनुष्य, जो उसके साथ रहे और उसका निरंतर साथी बने; वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने मुट्ठीभर धूल उठाई और अपने मन में की गई कल्पना के अनुसार सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया, और फिर उसने उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को बना चुकने के बाद परमेश्वर ने कैसा महसूस किया? पहली बार उसने एक प्रियजन, एक साथी होने का आनंद महसूस किया। पहली बार उसने पिता होने के उत्तरदायित्व और उसके साथ आने वाली चिंता को भी महसूस किया। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनंद लेकर आया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था, जो परमेश्वर ने कभी किया था, जो परमेश्वर के विचारों या वचनों से संपन्न नहीं हुआ था, बल्कि जो उसने अपने हाथों से किया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, जो शरीर और आकार के साथ मांस और लहू से बना था, और जो परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने ऐसा आनंद महसूस किया, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। परमेश्वर ने वास्तव में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी-सी चेष्टा ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया। जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उसे उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार आया। यही घटनाओं की वह शृंखला थी, जो परमेश्वर को आए इस पहले विचार के साथ आरंभ हुई। परमेश्वर के लिए ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किंतु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा भी महसूस किया हो—आनंद, उत्तरदायित्व, चिंता—उसे साझा करने के लिए उसके पास कोई नहीं था। उस पल से आरंभ करके, परमेश्वर ने सच में ऐसा एकाकीपन और उदासी महसूस की, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। उसे लगा कि मनुष्य उसके प्रेम और चिंता को, या मनुष्य के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकता या समझ नहीं सकता, इसलिए उसे अभी भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने ये चीज़ें मनुष्य के लिए की थीं, किंतु मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे समझा नहीं था। प्रसन्नता के अलावा जो आनंद और संतुष्टि मनुष्य उसके लिए लाया था, वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आया। उस समय परमेश्वर के ये ही विचार और भावनाएँ थीं। जब परमेश्वर ये सब चीज़ें कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनंद से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, और ये सब भावनाएँ चिंता से घुल-मिल गईं। जो कुछ वह करना चाहता था, वह था इस व्यक्ति, इस मनुष्य को यह ज्ञात करवाना कि परमेश्वर के हृदय में क्या है, और शीघ्रता से अपनी इच्छाओं को समझवाना। तब वे लोग उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसकी इच्छा के अनुरूप हो सकते हैं। वे अब केवल परमेश्वर को बोलते हुए नहीं सुनेंगे और मूक नहीं बने रहेंगे; वे अब इस बात से अनजान नहीं रहेंगे कि परमेश्वर के साथ उसके कार्य में कैसे जुड़ें; इन सबसे ऊपर, वे अब परमेश्वर की अपेक्षाओं से उदासीन लोग नहीं रहेंगे। परमेश्वर द्वारा की गई ये पहली चीज़ें बहुत अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन-योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों का सृजन करने के बाद परमेश्वर ने आराम नहीं किया। वह अपने प्रबंधन को कार्यान्वित करने के लिए और उन लोगों को प्राप्त करने के लिए बेचैन और उत्सुक था, जिन्हें उसने मानवजाति के बीच बहुत प्रेम किया था।

आगे, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल-प्रलय आया। जल-प्रलय के अभिलेख में नूह का उल्लेख है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था, जिसने परमेश्वर का एक कार्य पूरा करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए उसका बुलावा प्राप्त किया था। निस्संदेह, यह भी पहली बार ही था, जब परमेश्वर ने अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए पृथ्वी पर किसी इंसान का आह्वान किया था। जब नूह ने जहाज़ बनाने का काम पूरा कर लिया, तो परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल-प्रलय किया। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल-प्रलय से नष्ट कर दिया, तो मनुष्यों का सृजन करने के समय से अब तक पहली बार ऐसा हुआ कि उसने अपने आप को उनके प्रति घृणा के वशीभूत महसूस किया था; इसी ने परमेश्वर को इस मानवजाति को जल-प्रलय द्वारा नष्ट करने का दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल-प्रलय द्वारा पृथ्वी को नष्ट देने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी, यह दर्शाने वाली वाचा कि वह दुनिया को फिर कभी जल-प्रलय से नष्ट नहीं करेगा। उस वाचा का चिह्न इंद्रधनुष था। यह मानवजाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इसलिए इंद्रधनुष परमेश्वर द्वारा दी गई वाचा का पहला चिह्न था; इंद्रधनुष एक वास्तविक, भौतिक चीज़ है, जो मौजूद है। यह इंद्रधनुष की मौजूदगी ही है, जो परमेश्वर को पूर्ववर्ती मानवजाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अकसर उदासी महसूस करवाता है, और उसके लिए एक निरंतर अनुस्मारक के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था...। परमेश्वर अपनी गति धीमी नहीं करना चाहता था—वह अपने प्रबंधन में अगला कदम उठाने के लिए बेचैन और उत्सुक था। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने संपूर्ण इस्राएल में अपने कार्य के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में अब्राहम को चुना। यह भी पहली बार था कि परमेश्वर ने ऐसे किसी उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने इस व्यक्ति के माध्यम से मानवजाति को बचाने का अपना कार्य शुरू करने और इस व्यक्ति के वंशजों के बीच अपना कार्य जारी रखने का संकल्प लिया। हम बाइबल में देख सकते हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ यही किया। तब परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी प्रथम चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों, के माध्यम से व्यवस्था के युग का अपना कार्य आरंभ किया। एक बार फिर पहली बार, परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान कीं, जिनका पालन मानवजाति को करना चाहिए, और उसने उन्हें विस्तार से समझाया। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, मानकीकृत नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें कौन-से त्योहार और दिन मनाने चाहिए, और अपने हर कार्य में उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को इस बारे में इतने विस्तृत, मानकीकृत विनियम और सिद्धांत दिए थे कि उन्हें अपना जीवन किस प्रकार जीना चाहिए।

हर बार जब मैं कहता हूँ "पहली बार", तो यह कार्य के उस प्रकार को संदर्भित करता है, जो परमेश्वर ने पहले कभी नहीं किया था। यह उस कार्य को संदर्भित करता है, जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मानवजाति और सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों का सृजन किया था, फिर भी उसने इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं किया था। इस समस्त कार्य में परमेश्वर द्वारा मनुष्यों का प्रबंधन शामिल था; यह सब मनुष्यों और परमेश्वर द्वारा उनके उद्धार और प्रबंधन से संबंधित था। अब्राहम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिर एक अन्य प्रथम कार्य किया—उसने अय्यूब को ऐसे व्यक्ति के रूप में चुना, जो व्यवस्था के अधीन रहता था और निरंतर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और परमेश्वर की गवाही देते हुए शैतान के प्रलोभनों का सामना कर सकता था। यह भी पहली बार ही था कि परमेश्वर ने शैतान को किसी इंसान को प्रलोभित करने दिया था, और पहली बार उसने शैतान के साथ शर्त लगाई थी। अंतत:, पहली बार उसने किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त किया, जो शैतान का सामना करते हुए परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम था, ऐसा व्यक्ति शैतान को पूर्णत: शर्मिंदा कर सकता था। जब से परमेश्वर ने मानवजाति को बनाया, तब से यह पहला व्यक्ति था, जिसे उसने प्राप्त किया था जो उसके लिए गवाही देने में सक्षम था। जब परमेश्वर ने इस व्यक्ति को प्राप्त कर लिया, तो अपने प्रबंधन को आगे बढ़ाने और अपने कार्य के अगले चरण के लिए स्थान और लोगों के चयन की तैयारी करते हुए वह अपने प्रबंधन को जारी रखने और अपने कार्य के अगले चरण को कार्यान्वित करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया।

इस सबके बारे में संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा की सही समझ प्राप्त हुई है? परमेश्वर अपने मानवजाति के प्रबंधन और उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता, केवल अपने वचनों से नहीं करता, और निश्चित रूप से आकस्मिक रवैये के साथ नहीं करता—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, मानकों के साथ और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मानवजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। कार्य चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, बाधाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने भी कमज़ोर क्यों न हों, या मानवजाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, इनमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपना श्रमसाध्य प्रयास करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है, उसका प्रबंधन करते हुए परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और उन सभी लोगों पर, जिन पर वह कार्य करेगा, और उस कार्य पर, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, अपनी संप्रभुता लागू कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है, जब परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मानवजाति को बचाने और उसका प्रबंधन करने की इस बड़ी परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है। कार्य करते हुए परमेश्वर थोड़ा-थोड़ा करके बिना किसी दुराव के मनुष्य के सामने अपने श्रमसाध्य प्रयास को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को व्यक्त और जारी कर रहा है। वह इन चीज़ों को उस तरह से जारी और व्यक्त करता है, जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है। इसलिए, पूरे ब्रह्मांड में, उन लोगों को छोड़कर जिन्हें परमेश्वर बचाने और जिनका प्रबंधन करने का उद्देश्य रखता है, कोई प्राणी कभी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग संबंध हो। उसके हृदय में मानवजाति, जिसका वह प्रबंधन और बचाव करना चाहता है, सबसे महत्वपूर्ण है; वह इस मानवजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह कभी उनका त्याग नहीं करता और बिना किसी शिकायत या पछतावे के अनथक रूप से अपना कार्य जारी रखता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह जानता है कि देर-सबेर लोग उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उसके वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उसकी ओर लौट आएँगे ...

आज यह सब सुनने के बाद तुम लोग यह महसूस कर सकते हो कि हर चीज़, जो परमेश्वर करता है, बिलकुल सामान्य होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य से मनुष्यों ने हमेशा उसके कुछ इरादे महसूस किए हैं, लेकिन उनकी भावनाओं या उनके ज्ञान, और परमेश्वर जो सोच रहा है, उनके बीच हमेशा एक निश्चित दूरी रही है। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि सभी लोगों के साथ इस बारे में संवाद करना आवश्यक है कि परमेश्वर ने मानवजाति को क्यों बनाया, और उन लोगों को प्राप्त करने की उसकी इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी, जिनकी उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ साझा करना आवश्यक है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। चूँकि परमेश्वर का हर एक विचार और मत, और उसके कार्य का हर एक चरण और हर अवधि उसके संपूर्ण प्रबंधन-कार्य से बँधे और निकटता से जुड़े हैं, इसलिए जब तुम परमेश्वर के कार्य के हर कदम में उसके विचारों, मतों और उसकी इच्छा को समझ लेते हो, तो यह इस बात को समझने के समान है कि उसकी प्रबंधन-योजना का कार्य किस प्रकार घटित हुआ। इसी बुनियाद पर परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ गहरी होती है। यद्यपि वह सब-कुछ, जो परमेश्वर ने पहली बार संसार को बनाते हुए किया, जिसका जिक्र मैंने पहले किया था, अब सत्य की खोज के लिए अप्रासंगिक, "जानकारी" मात्र प्रतीत होता है, किंतु तुम्हारे अनुभव के दौरान एक ऐसा दिन आएगा, जब तुम नहीं सोचोगे कि यह जानकारी के कुछ टुकड़ों के समान इतना साधारण है और न ही यह मात्र किसी किस्म का रहस्य है। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, या जब परमेश्वर तुम्हारे हृदय में थोड़ी जगह ले लेगा, या जब तुम और अच्छी तरह से और गहराई से उसकी इच्छा को समझ जाओगे, तब तुम उसके महत्व और उसकी आवश्यकता को सच में समझ पाओगे, जिसके बारे में मैं आज कह रहा हूँ। चाहे तुम लोग जिस भी हद तक इसे स्वीकार करो; तुम लोगों का इन चीज़ों को समझना और जानना फिर भी आवश्यक है। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपना कार्य संपन्न करता है, चाहे वह उसे अपने विचारों से करे या अपने हाथों से, चाहे उसे उसने पहली बार किया हो या अंतिम बार, अंततः परमेश्वर की एक योजना है, और हर चीज़ जो वह करता है, उसमें उसके उद्देश्य और विचार होते हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं और उसके स्वरूप को प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़ें—परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप—हर एक व्यक्ति को समझनी चाहिए। जब व्यक्ति उसके स्वभाव और स्वरूप को समझ जाता है, तो वह धीरे-धीरे यह समझ सकता है कि परमेश्वर जो करता है, वह क्यों करता है और वह जो कहता है, वह क्यों कहता है। इससे उनमें तब परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य की खोज करने और अपने स्वभाव में परिवर्तन करने के लिए और अधिक विश्वास हो सकता है। अर्थात्, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसका विश्वास एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 63

यदि लोग जिसके बारे में जानते हैं या जिसकी समझ प्राप्त करते हैं, वह परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है, तो वे जो प्राप्त करते हैं, वह जीवन होगा जो परमेश्वर से आता है। जब यह जीवन तुम्हारे भीतर गढ़ दिया जाएगा, तो तुममें परमेश्वर का भय अधिक से अधिक होता जाएगा। यह एक ऐसा लाभ है, जो बहुत स्वाभाविक रूप से आता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते, यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केंद्रित करना तक नहीं चाहते, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास का अनुसरण कर रहे हो, वह तुम्हें कभी भी उसकी इच्छा पूरी करने या उसकी प्रशंसा प्राप्त करने नहीं दे सकता। इतना ही नहीं, तुम कभी वास्तव में उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते—ये अंतिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, तो वे रुचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरंभ कर देते हैं। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-कपट नहीं है, कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, अनुकंपा और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे अनुभव कर सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में तुम्हें घेरे रहने वाले लोग, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे शायद ही उल्लेखनीय हों। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, या कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, और तुम उसका धैर्य, उसकी सहनशीलता और अपने बारे में उसकी समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग और तुम्हारे जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता भी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सबसे ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 64

यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को और अधिक समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग पर नहीं रुक सकते—हमें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में उठाए गए कदमों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इसलिए, जिस प्रकार परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अंत और अनुग्रह के युग का आरंभ किया था, उसी प्रकार हमारे अपने कदम भी उसी का अनुसरण करते हुए अनुग्रह के युग में आ जाएँ—एक ऐसा युग, जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में परमेश्वर ने पुन: एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया, जो पहले नहीं किया गया था। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मानवजाति दोनों के लिए एक नया प्रारंभिक बिंदु था—ऐसा प्रारंभिक बिंदु, जिसमें परमेश्वर द्वारा किया गया एक और नया कार्य शामिल था, जो पहले कभी नहीं किया गया था। यह नया कार्य अभूतपूर्व था, जो मनुष्यों और समस्त प्राणियों की कल्पना-शक्ति से परे था। यह ऐसा कार्य है, जिसे अब सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं—पहली बार परमेश्वर एक मनुष्य बना, और पहली बार उसने एक मनुष्य के रूप, मनुष्य की पहचान के साथ, नया कार्य आरंभ किया। इस नए कार्य ने प्रकट किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया था, और कि वह व्यवस्था के अधीन अब और कुछ नहीं करेगा या बोलेगा। न ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के सिद्धांतों या नियमों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसका समस्त कार्य हमेशा के लिए रुक गया था और जारी नहीं रह गया था, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य आरंभ करना और नई चीज़ें करना चाहता था। उसकी योजना का एक बार फिर से एक नया प्रारंभिक बिंदु था, और इसलिए परमेश्वर को मानवजाति की एक नए युग में अगुआई करनी थी।

यह मनुष्य के लिए आनंददायक समाचार था या अशुभ, यह प्रत्येक व्यक्ति के सार पर निर्भर करता था। ऐसा कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह आनंददायक समाचार नहीं था, बल्कि अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो जिन लोगों ने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, जिन्होंने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था किंतु परमेश्वर का भय नहीं माना था, वे परमेश्वर के पुराने कार्य का उपयोग उसके नए कार्य पर दोष लगाने के लिए करने की ओर प्रवृत्त होने लगे। इन लोगों के लिए यह एक अशुभ समाचार था; परंतु हर उस व्यक्ति के लिए, जो निर्दोष और साफ़दिल था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके द्वारा छुटकारा पाने का इच्छुक था, परमेश्वर का पहला देहधारण बहुत आनंददायक समाचार था। क्योंकि जबसे मनुष्य अस्तित्व में लाए गए हैं, यह पहली बार था जब परमेश्वर एक ऐसे रूप में मानवजाति के बीच प्रकट हुआ और रहा था; जो पवित्रात्मा का रूप नहीं था; इस बार वह मनुष्य से जन्मा था और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच रहता था और काम करता था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला; यह सभी कल्पनाओं से परे था। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों को एक वास्तविक लाभ प्राप्त हुआ। परमेश्वर ने न केवल पुराने युग को समाप्त किया, बल्कि उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया। उसने अब अपने संदेशवाहकों को अपनी इच्छा संप्रेषित करने के लिए नहीं कहा, अब वह बादलों में छिपा हुआ नहीं रहा, और न ही अब वह गर्जना के माध्यम से आज्ञा देते हुए मनुष्यों के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला। पहले की किसी भी चीज़ के असदृश, एक ऐसी पद्धति के माध्यम से जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय थी और जिसे समझना और स्वीकार करना उनके लिए कठिन था—देह बनना—वह उस युग का कार्य शुरू करने के लिए मनुष्य का पुत्र बना। परमेश्वर के इस कार्य से मानवजाति हक्की-बक्की रह गई; इसने उन्हें शर्मिंदा कर दिया, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया, जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 65

मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ, पहले इस अंश पर नज़र डालें : "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

मैंने यह अंश क्यों चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या संबंध है? इस पाठ में पहली चीज़ जो हम जानते हैं, वह है कि यह सब्त का दिन था, लेकिन प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को मकई के खेतों में ले गया। इससे भी ज्यादा "विश्वासघाती" बात यह रही कि वे मकई की "बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते—बहुत-सी चीज़ें थीं, जो सब्त के दिन नहीं की जा सकती थीं। प्रभु यीशु द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए पेचीदा था, जो एक लंबे समय से व्यवस्था के अधीन रहे थे, और इसने आलोचना भी भड़काई। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया, उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले इस बात की चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने सभी दिनों में से सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था, जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है, जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु आया, तो उसने लोगों को यह बताने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा कह दिया है और नया कार्य शुरू किया है, और इस नए कार्य में सब्त का पालन करना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर का सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आना उसके नए कार्य का बस एक पूर्वाभास था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना बाकी था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारंभ किया, तो उसने व्यवस्था की बेड़ियों को पहले ही पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विनियम और सिद्धांत तोड़ दिए थे। उसमें व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का कोई निशान नहीं था; उसने उसे पूरी तरह से छोड़ दिया था और अब उसका पालन नहीं करता था, और उसने मानवजाति से आगे उसका पालन करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया; वह बाहर काम कर रहा था और आराम नहीं कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह अब व्यवस्था के अधीन नहीं रह रहा था, और उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया था और एक नई कार्यशैली के साथ वह मानवजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ था। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है, जो व्यवस्था के अधीन रहने से उभरने और सब्त से अलग होने से आरंभ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य किया, तो वह अतीत से चिपका नहीं रहा, और वह अब व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में चिंतित नहीं था, न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन भी उसी तरह से कार्य किया, जैसे वह दूसरे दिनों में करता था, और सब्त के दिन जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब परमेश्वर की निगाहों में बिलकुल सामान्य था। परमेश्वर अपना बहुत-सा नया कार्य करने के लिए, जिसे वह करना चाहता है, और नए वचन कहने के लिए, जिन्हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरुआत कर सकता है। जब वह एक नई शुरुआत करता है, तो वह न तो अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है, न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के अपने सिद्धांत हैं, जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानवजाति को अपने कार्य के एक नए चरण में ले जाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश करता है। यदि लोग पुरानी कहावतों या नियमों के अनुसार काम करते रहते हैं या उनसे चिपटे रहते हैं, तो वह इसे याद नहीं रखेगा या इसका अनुमोदन नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह पहले ही एक नया कार्य ला चुका है, और अपने कार्य के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह नया कार्य आरंभ करता है, तो वह मानवजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है, ताकि लोग उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुरानी चीज़ों से चिपका नहीं रहता या पुराने मार्ग पर नहीं चलता; जब वह कार्य करता और बोलता है, तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता, जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में सब-कुछ स्वतंत्र और मुक्त है, और कोई निषेध नहीं है, कोई बाधा नहीं है—वह मानवजाति के लिए आज़ादी और मुक्ति लाता है। वह एक जीवित परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर, जो वास्तव में, सच में मौजूद है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिलकुल भिन्न है, जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवंत है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए संपूर्ण जीवन और ज्योति, संपूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति लेकर आते हैं, क्योंकि वह सत्य, जीवन और मार्ग धारण करता है—वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता। लोग चाहे कुछ भी कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से देखें या कैसे भी उसका आकलन करें, वह बिना किसी आशंका के अपना कार्य पूरा करेगा। अपने कार्य और वचनों के संबंध में वह किसी की भी धारणाओं या उस पर उठी उँगलियों की, यहाँ तक कि अपने नए कार्य के प्रति उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिंता नहीं करेगा। परमेश्वर जो करता है, उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, नष्ट-भ्रष्ट करने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें, कोई निषेध नहीं है, वह किसी मनुष्य, घटना या चीज़ द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, न ही उसे किसी विरोधी ताक़त द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और सभी विरोधी ताक़तें और मानवजाति के सभी पाखंड और भ्रांतियाँ उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिए जाते हैं। वह अपने कार्य का चाहे जो भी नया चरण संपन्न कर रहा हो, उसे निश्चित रूप से मानवजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, और उसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाध रूप से कार्यान्वित किया जाएगा, जब तक कि उसका महान कार्य पूरा नहीं हो जाता। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, उसका अधिकार और सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु सब्त के दिन खुले तौर पर बाहर जा सकता था और कार्य कर सकता था, क्योंकि उसके हृदय में मानवजाति से उत्पन्न कोई नियम, ज्ञान या सिद्धांत नहीं थे। उसके पास केवल परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था। उसका कार्य मानवजाति को स्वतंत्र करने, लोगों को मुक्त करने, उन्हें प्रकाश में रहने देने और उन्हें जीने देने का मार्ग था। इस बीच, जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं, वे सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बंधनों में जीते हैं—आज एक चीज़ निषिद्ध होती है, कल दूसरी—उनके जीवन में कोई स्वतंत्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं, जिनके जीवन में कहने को कोई खुशी नहीं है। "निषेध" क्या दर्शाता है? यह विवशता, बंधन और बुराई दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है, तो वह एक झूठे ईश्वर और बुरी आत्मा की आराधना कर रहा होता है। इस तरह की गतिविधियाँ शामिल होने पर निषेध साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते, आज तुम बाहर नहीं जा सकते, कल तुम अपना खाना नहीं बना सकते, परसों तुम नए घर में नहीं जा सकते, विवाह और अंत्येष्टि के लिए, यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिन ही चुनने होंगे। इसे क्या कहा जाता हैं? इसे निषेध कहा जाता है; यह मानवजाति का बंधन है, और ये शैतान और बुरी आत्माओं की जंज़ीरें लोगों को नियंत्रित कर रही हैं, और उनके हृदय और शरीर को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबंध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? परमेश्वर की पवित्रता की बात करते समय तुम्हें पहले यह सोचना चाहिए : परमेश्वर के साथ कोई निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में सिद्धांत हैं, किंतु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि स्वयं परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 66

"पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मंदिर" किसे संदर्भित करता है? आसान शब्दों में कहें तो, यह एक भव्य, ऊँची इमारत को संदर्भित करता है, और व्यवस्था के युग में मंदिर याजकों के लिए परमेश्वर की आराधना करने का स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," तो "वह" किसे संदर्भित करता है? स्पष्ट रूप से "वह" देह में मौजूद प्रभु यीशु है, क्योंकि केवल वही मंदिर से बड़ा था। इन वचनों ने लोगों को क्या बताया? उन्होंने लोगों को मंदिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही मंदिर को छोड़ चुका है और अब उसमें कार्य नहीं कर रहा, इसलिए लोगों को मंदिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्न ढूँढ़ने चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तो उसके वचनों के पीछे एक आधार था और वह यह कि व्यवस्था के अधीन लोग मंदिर को स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा समझने लगे थे। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाय मंदिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि उनके बजाय परमेश्वर की आराधना करें, क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहा : "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकतर लोग अब यहोवा की आराधना नहीं करते थे, बल्कि बेमन से केवल बलिदान करते थे, और प्रभु यीशु ने तय किया कि यह मूर्ति-पूजा है। इन मूर्ति-पूजकों ने मंदिर को परमेश्वर से बड़ी और ऊँची चीज़ समझ लिया था। उनके हृदय में केवल मंदिर था, परमेश्वर नहीं, और यदि उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ता, तो उनका निवास-स्थान भी छूट जाता। मंदिर के अतिरिक्त उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी, और वे अपने बलिदान नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित "निवास-स्थान" वह था, जहाँ वे यहोवा परमेश्वर की आराधना करने का झूठा दिखावा करते थे, ताकि वे मंदिर में रह सकें और अपने खुद के क्रियाकलाप कर सकें। उनका तथाकथित "बलिदान" मंदिर में सेवा करने की आड़ में अपने खुद के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहार कार्यान्वित करना भर था। यही कारण था कि उस समय लोग मंदिर को परमेश्वर से भी बड़ा समझते थे। प्रभु यीशु ने ये वचन लोगों को चेतावनी देने के लिए बोले थे, क्योंकि वे मंदिर का उपयोग एक आड़ के रूप में, और बलिदानों का उपयोग लोगों और परमेश्वर को धोखा देने के एक आवरण के रूप में करते थे। यदि तुम इन वचनों को वर्तमान में लागू करो, तो ये अभी भी उतने ही वैध और प्रासंगिक हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों की तुलना में परमेश्वर के एक भिन्न कार्य का अनुभव किया है, किंतु उनकी प्रकृति का सार एक-समान है। आज के कार्य के संदर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ें करेंगे, जो इन वचनों में दर्शाई गई हैं, "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपना कर्तव्य निभाने को अपने कार्य के रूप में देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के लिए मानवाधिकारों की रक्षा हेतु किए जाने वाले राजनीतिक आंदोलनों के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को अपने कौशलों का उपयोग आजीविका में करने की ओर मोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं, बल्कि धार्मिक सिद्धांत के एक अंश के पालन के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या ये व्यवहार बिलकुल "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है" के समान नहीं हैं? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय भौतिक मंदिरों में कर रहे थे, जबकि आज लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय अमूर्त मंदिरों में करते हैं। जो लोग नियमों को महत्व देते हैं, वे नियमों को परमेश्वर से बड़ा समझते हैं; जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं, वे हैसियत को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं; जो लोग अपनी आजीविका से प्रेम करते हैं, वे आजीविका को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने के लिए बाध्य करती हैं : "लोग अपने वचनों से परमेश्वर को सबसे बड़ा कहकर उसकी स्तुति करते हैं, किंतु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बड़ी है।" ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने या अपना व्यवसाय या अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलता है, वे परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अपने आप को अपनी प्यारी आजीविका में झोंक देते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, उसे और उसकी इच्छा को बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। इन लोगों की स्थिति और दो हज़ार वर्ष पहले मंदिर में अपना व्यवसाय करने वाले लोगों की स्थिति में क्या अंतर है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 67

"मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" वाक्य लोगों को बताता है कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ भौतिक प्रकृति की नहीं है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, लेकिन जब तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों से मिलने वाली संतुष्टि तुम्हारी सत्य की खोज का स्थान ले सकती है? यह स्पष्टत: संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप, जिसके बारे में हमने संगति की है, दोनों सत्य हैं। इनका मूल्य भौतिक वस्तुओं से नहीं मापा जा सकता, चाहे वे कितनी भी मूल्यवान हों, न ही इनके मूल्य की गणना पैसों में की जा सकती है, क्योंकि ये कोई भौतिक वस्तुएँ नहीं है, और ये हर एक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन अमूर्त सत्यों का मूल्य ऐसी किसी भी भौतिक चीज़ से बढ़कर होना चाहिए, जिसे तुम मूल्यवान समझते हो, या नहीं? यह कथन ऐसा है, जिस पर तुम लोगों को सोच-विचार करने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा है, उसका मुख्य बिंदु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उससे संबंधित हर चीज़ प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और उन्हें किसी भौतिक चीज़ से बदला नहीं जा सकता। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगा : जब तुम भूखे होते हो, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन कमोबेश अच्छा हो सकता है, या कमोबेश असंतोषजनक हो सकता है, किंतु यदि उससे तुम्हारा पेट भर जाता है, तो भूखे होने का वह अप्रिय एहसास अब नहीं रहेगा—वह मिट जाएगा। तुम चैन से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम महसूस करेगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किंतु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हें उसके बारे में कोई समझ नहीं है, तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे? क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हो और उसकी इच्छा तुम्हारी समझ में नहीं आती, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का उपयोग कर सकते हो? परमेश्वर के माध्यम से उद्धार के अपने अनुभव की प्रक्रिया में, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश करने के दौरान, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझते हो या यह नहीं जानते कि सत्य क्या है, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो क्या तुम बहुत व्याकुल महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने हृदय में ज़बरदस्त भूख और प्यास महसूस नहीं करोगे? क्या ये एहसास तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति महसूस करने से रोकेंगे नहीं? तो तुम अपने हृदय की उस भूख की भरपाई कैसे कर सकते हो—क्या इसके समाधान का कोई तरीका है? कुछ लोग खरीददारी करने चले जाते हैं, कुछ लोग मन की बात कहने के लिए मित्रों को खोजते हैं, कुछ लोग लंबी तानकर सो जाते हैं, अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ते हैं, या वे अपने कर्तव्य निभाने के लिए और कड़ी मेहनत और प्रयास करते हैं। क्या ये चीज़ें तुम्हारी वास्तविक कठिनाइयों का समाधान कर सकती हैं? तुम सभी इस प्रकार के अभ्यासों को पूर्णत: समझते हो। जब तुम शक्तिहीन महसूस करते हो, जब तुम परमेश्वर से प्रबुद्धता पाने की दृढ़ इच्छा महसूस करते हो जो तुम्हें सत्य की वास्तविकता और उसकी इच्छा ज्ञात करा सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवश्यकता होती है? तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, वह भरपेट भोजन नहीं है, और वह कुछ उदार वचन नहीं हैं, देह का क्षणिक आराम और संतुष्टि का तो कहना ही क्या—तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह यह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताए कि सत्य क्या है। जब तुम इसे समझ लेते हो, चाहे थोड़ा-सा ही क्यों न समझो, तो क्या तुम अपने हृदय में उससे अधिक संतुष्ट महसूस नहीं करोगे, जितना कि अच्छा भोजन करने पर महसूस करते हो? जब तुम्हारा हृदय संतुष्ट होता है, तो क्या तुम्हारा हृदय और तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व सच्ची शांति प्राप्त नहीं करता? इस उपमा और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोग अब समझे कि क्यों मैं तुम लोगों के साथ इस वाक्य को साझा करना चाहता था, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है"? इसका अर्थ है कि जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब-कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर हैं, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर तुम किसी समय विश्वास करते थे कि उसे तुमने सबसे अधिक सँजोया है। अर्थात्, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के मुँह से वचन प्राप्त नहीं कर सकता या उसकी इच्छा को नहीं समझता, तो वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता। अपने भविष्य के अनुभवों में तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब सत्य और जीवन होता है। सत्य वह चीज़ है, जिसकी लोग अपने जीवन में कमी नहीं कर सकते, और यह वह चीज़ है, जिसके बिना उनका कभी काम नहीं चल सकता; तुम यह भी कह सकते हो कि यह सबसे बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; यही वह एकमात्र चीज़ है, जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 68

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

हम अभी जिस बारे में संवाद कर रहे हैं, वह सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में है। इन कहानियों के माध्यम से, और घटित हुई इन चीज़ों के विश्लेषण के माध्यम से, लोग उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को, जो उसने प्रकट किया है, समझ सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के हर पहलू को और अधिक व्यापकता से, अधिक गहराई से, अधिक विस्तार से और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है। तो क्या परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका इन कहानियों के माध्यम से जानना ही है? नहीं, यह एकमात्र तरीका नहीं है! क्योंकि राज्य के युग में परमेश्वर जो कहता है और जो कार्य वह करता है, वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में, और उसे पूरी तरह से जानने में लोगों की बेहतर सहायता कर सकते हैं। किंतु मुझे लगता है कि बाइबल में दर्ज कुछ उदाहरणों और कहानियों के माध्यम से, जिनसे लोग परिचित हैं, परमेश्वर के स्वभाव को जानना और उसके स्वरूप को समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं तुम्हें परमेश्वर को जानने में सक्षम करने के लिए न्याय और ताड़ना के उन वचनों और सत्यों को, जिन्हें आज परमेश्वर प्रकट करता है, शब्दशः लेता हूँ, तो तुम इसे बहुत उबाऊ और थकाऊ महसूस करोगे, और कुछ लोग तो यहाँ तक महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन सूत्रबद्ध प्रतीत होते हैं। परंतु यदि मैं बाइबल की इन कहानियों को उदाहरणों के रूप में लेता हूँ, ताकि परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को मदद मिल सके, तो वे इसे उबाऊ नहीं पाएँगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करने के दौरान, उस समय जो परमेश्वर के हृदय में था, उसका विवरण—उसकी मनोदशा या मनोभाव, या उसके विचार और मत—लोगों को मनुष्य की भाषा में बताए गए हैं, और इस सबका उद्देश्य उन्हें यह समझाना और महसूस कराना है कि परमेश्वर का स्वरूप सूत्रबद्ध नहीं है। यह कोई पौराणिक या कुछ ऐसा नहीं है, जिसे लोग देख और छू नहीं सकते। यह कुछ ऐसा है, जो सचमुच मौजूद है, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि इस युग में रहने वाले लोग धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्य की विस्तृत समझ प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उसके द्वारा किए गए कार्य से उसके स्वभाव को देख सकते हैं; वे उसके द्वारा व्यक्त किए गए इन स्वभावों से मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और उसकी पवित्रता की ठोस अभिव्यक्तियों और मनुष्यों के लिए उसकी देखरेख को समझ सकते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर के स्वभाव के अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि तुम सभी लोग अब इसे महसूस कर सकते हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 69

प्रभु यीशु द्वारा अनुग्रह के युग में पूर्ण किए गए कार्य के दायरे में तुम परमेश्वर के स्वरूप का एक अन्य पहलू देख सकते हो। यह पहलू उसके देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के कारण लोग उसे देखने और समझने में सक्षम थे। मनुष्य के पुत्र में लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता को जीया, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता देखी। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिलकुल सच्चा परमेश्वर दिखाया, और इनसे वे परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बना सके। किंतु संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अंत के बीच की समयावधि में, अर्थात् अनुग्रह के युग से पहले, लोगों द्वारा जो पहलू देखे, सुने और अनुभव किए गए, वे थे परमेश्वर की दिव्यता, परमेश्वर द्वारा अभौतिक क्षेत्र में की और कही गई चीज़ें, और वे चीज़ें, जो उसने अपने वास्तविक व्यक्तित्व से, जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता था, व्यक्त की थीं। प्रायः, ये चीजें लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर अपनी महानता में इतना बुलंद है कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते। परमेश्वर ने सामान्यतः लोगों पर जो प्रभाव छोड़ा, वह यह था कि वह स्वयं को समझने-बूझने की उनकी क्षमता के भीतर और बाहर झिलमिलाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमय और मायावी हैं कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं है, यहाँ तक कि वे उन्हें समझने-बूझने का प्रयास भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ बहुत दूर थी, इतनी दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिलकुल भी अस्तित्व में नहीं है। अत: लोगों के लिए परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना अलभ्य था, यहाँ तक कि उनकी पहुँच से बाहर था। भले ही परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए, और उसने कुछ विशेष वचन भी जारी किए और कुछ विशेष स्वभाव व्यक्त किए, ताकि लोग उसके बारे में कुछ सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकें और उसे समझ-बूझ सकें, फिर भी अंतत:, परमेश्वर के स्वरूप की ये अभिव्यक्तियाँ एक अभौतिक क्षेत्र से आई थीं, और लोगों ने जो समझा, जो उन्होंने जाना, वह फिर भी उसके स्वरूप का दिव्य पहलू ही था। इस अभिव्यक्ति से मानवजाति उसके स्वरूप की ठोस अवधारणा प्राप्त नहीं कर सकी, और परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा अभी भी "एक आध्यात्मिक देह, जिसके करीब जाना कठिन है, जो अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है" के दायरे में ही अटकी हुई थी। चूँकि लोगों के सामने प्रकट होने के लिए परमेश्वर ने भौतिक क्षेत्र की किसी विशिष्ट वस्तु या छवि का उपयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा का उपयोग करके उसे परिभाषित करने में असमर्थ थे। अपने हृदय और मस्तिष्क में लोग परमेश्वर के लिए एक मानक स्थापित करने, उसे मूर्त मानवीय बनाने के लिए हमेशा अपनी भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना ऊँचा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह ठीक-ठीक क्या पसंद करता है और उसका व्यक्तित्व कैसा है। वास्तव में, अपने हृदय में परमेश्वर जानता था कि लोग इस तरह से सोचते हैं। वह लोगों की आवश्यकताओं के बारे में बहुत स्पष्ट था, और निस्संदेह वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए अनुग्रह के युग में उसने एक अलग तरीके से अपने कार्य को अंजाम दिया। यह नया तरीका दिव्य और मानवीय दोनों था। जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उसमें लोग देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था और उनके साथ विभिन्न मामलों में चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत-सा ऐसा कार्य भी पूरा किया, जो उसकी दिव्यता दर्शाता था, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। इस दौरान, चूँकि परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण देह में उस रूप में साकार हुई थी, जिसे लोग देख और छू सकते थे, इसलिए अब उन्होंने यह महसूस नहीं किया कि वह अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है, या वे उसके करीब नहीं जा सकते। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हर गतिविधि, उसके वचनों और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। मनुष्य के देहधारी पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता व्यक्त की और परमेश्वर की इच्छा को मानवजाति तक पहुँचाया। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को भी प्रकट किया, जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता और जो आध्यात्मिक क्षेत्र में रहता है। लोगों ने स्वयं परमेश्वर को मूर्त रूप में, माँस और रक्त से निर्मित देखा। तो मनुष्य के देहधारी पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। भले ही परमेश्वर की छवि के संबंध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, किंतु उसका सार और स्वरूप स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—केवल अभिव्यक्ति के रूप में कुछ भिन्नताएँ थीं। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता और दिव्यता, दोनों रूपों में स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाई। हालाँकि इस दौरान परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की और मानवजाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और इसने लोगों को मानवजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य को देखने-सुनने और अनुभव करने का अवसर दिया। इसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और महानता के संबंध में अंतर्दृष्टि और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारंभिक समझ और परिभाषा भी प्रदान की। भले ही प्रभु यीशु द्वारा पूर्ण किया गया कार्य, कार्य करने के उसके तरीके और उसके बोलने का परिप्रेक्ष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व से भिन्न थे, फिर भी उसकी हर चीज़ वास्तव में स्वयं परमेश्वर को दर्शाती थी, जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था—इससे इनकार नहीं किया जा सकता! अर्थात्, परमेश्वर चाहे किसी भी रूप में प्रकट हो, वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में बात करे, या किसी भी छवि में वह मानवजाति के सामने आए, वह अपने सिवाय किसी को नहीं दर्शाता। वह न तो किसी मनुष्य को दर्शा सकता है, न ही भ्रष्ट मानवजाति को दर्शा सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 70

खोई हुई भेड़ का दृष्टांत

मत्ती 18:12-14 तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।

यह अंश एक दृष्टांत है—यह लोगों को किस प्रकार की भावना देता है? यहाँ उपयोग किया गया अभिव्यक्ति का यह तरीका—दृष्टांत—मानवीय भाषा में एक अलंकार है, और इस प्रकार यह मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर आता है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा ही कुछ कहा होता, तो लोगों को लगता कि ये वचन वास्तव में परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं, लेकिन जब अनुग्रह के युग में मनुष्य के पुत्र ने ये वचन कहे, तब लोगों को ये सुकून देने वाले, गर्मजोशी से भरे और अंतरंग महसूस हुए। जब परमेश्वर देह बन गया, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने अपने हृदय की वाणी व्यक्त करने के लिए अपनी मानवता से आए एक बहुत ही उचित दृष्टांत का उपयोग किया। इस वाणी ने परमेश्वर की अपनी वाणी और उस कार्य का प्रतिनिधित्व किया, जो वह उस युग में करना चाहता था। इसने अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये को भी दर्शाया। लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के परिप्रेक्ष्य से देखें तो, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए वह जो कुछ भी कर सकता है, सो करेगा। इसने उस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को दर्शाया, जब वह देह में था। परमेश्वर ने उस कार्य में अपने संकल्प और रवैये को दर्शाने के लिए इस दृष्टांत का उपयोग किया। यह परमेश्वर के देह बनने का लाभ था : वह मानवजाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने और अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्य को अपनी गहन, दिव्य भाषा, जिसे समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था, मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से समझाई या "अनुवादित" की। इससे लोगों को उसकी इच्छा को समझने और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता है। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके मानवीय परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और लोगों के साथ उस तरीके से बातचीत कर सकता था, जिसे वे समझ सकते थे। यहाँ तक कि वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग करके बोल और कार्य कर सकता था, ताकि लोग परमेश्वर की दयालुता और घनिष्ठता महसूस कर सकें, ताकि वे उसके हृदय को देख सकें। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? क्या परमेश्वर के वचनों और कार्यों में कोई निषेध है? लोग समझते हैं कि ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे परमेश्वर यह बताने के लिए कि स्वयं परमेश्वर क्या कहना चाहता है, कौन-सा कार्य करना चाहता है, या अपनी स्वयं की इच्छा व्यक्त करने के लिए वह मनुष्यों के ज्ञान, भाषा या बोलने के तरीकों का उपयोग कर सके। किंतु यह गलत सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के दृष्टांत का उपयोग इसलिए किया, ताकि लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी महसूस कर सकें, और उस समयावधि के दौरान लोगों के प्रति उसके रवैये को देख सकें। इस दृष्टांत ने लंबे समय से व्यवस्था के अधीन जी रहे लोगों को स्वप्न से जगा दिया, और इसने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेरित किया। इस दृष्टांत वाले अंश को पढ़कर लोग मानवजाति को बचाने में परमेश्वर की ईमानदारी को जानते हैं और परमेश्वर के हृदय में मानवजाति को दिए गए वजन और महत्व को समझते हैं।

आओ, इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के अपने वचन थे या उसके स्वर्गिक पिता के वचन थे? सतही तौर पर ऐसा लगता है कि यह प्रभु यीशु है जो बोल रहा है, किंतु उसकी इच्छा स्वयं परमेश्वर की इच्छा को दर्शाती है, इसीलिए उसने कहा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गिक पिता को ही परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते थे, और यह मानते थे कि यह व्यक्ति, जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते हैं, बस उसके द्वारा भेजा हुआ है और यह स्वर्गिक पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसीलिए प्रभु यीशु को इस दृष्टांत के अंत में यह वाक्य जोड़ना पड़ा, ताकि लोग वास्तव में मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा अनुभव कर सकें, और उसके कथन की प्रामाणिकता और सटीकता महसूस कर सकें। भले ही यह वाक्य कहना एक साधारण बात थी, किंतु यह बहुत परवाह और प्रेम के साथ बोला गया था और इसने प्रभु यीशु की विनम्रता और प्रच्छन्नता प्रकट की। चाहे परमेश्वर देह बना या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य किया, वह मनुष्य के हृदय को सर्वोत्तम ढंग से जानता था, और सर्वोत्तम ढंग से समझता था कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, और जानता था कि लोग किस बात से चिंतित हैं और क्या चीज़ उन्हें भ्रमित करती है, इसीलिए उसने यह वाक्य जोड़ा। इस वाक्य ने मानवजाति में छिपी एक समस्या उजागर कर दी : मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ कहा, लोगों को उस पर संशय था, अर्थात्, जब प्रभु यीशु बोल रहा था, तो उसे यह जोड़ना पड़ा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो," और केवल इस आधार पर ही उसके वचन लोगों को अपनी सटीकता का विश्वास दिलाने और उनकी विश्वसनीयता बढ़ाने में सफल हो सकते थे। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य का पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मानवजाति के बीच एक बड़ा असहज संबंध था, और कि मनुष्य के पुत्र की स्थिति बड़ी उलझनभरी थी। इससे यह भी पता चलता है कि उस समय मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की हैसियत कितनी मामूली थी। जब उसने यह कहा, तो यह वास्तव में लोगों को यह बताने के लिए था : तुम लोग निश्चिंत हो सकते हो—ये वचन मेरे अपने हृदय की बात नहीं दर्शाते, बल्कि ये उस परमेश्वर की इच्छा हैं, जो तुम लोगों के हृदय में है। मानवजाति के लिए, क्या यह एक विडंबना नहीं थी? भले ही देह में रहकर काम कर रहे परमेश्वर को अनेक ऐसे फायदे थे, जो उसके अपने व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके संदेहों और अस्वीकृति को और साथ ही उनकी संवेदनशून्यता और मूढ़़ता को भी सहन करना पड़ा। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मनुष्य की अस्वीकृति और उसके द्वारा अपने साथ प्रतिस्पर्धा किए जाने का अनुभव करने की प्रक्रिया थी। इससे भी अधिक, यह मानवजाति के भरोसे को निरंतर जीतने और अपने स्वरूप और सार के माध्यम से मानवजाति पर विजय पाने के लिए कार्य करने की प्रक्रिया थी। यह इतना ही नहीं था कि देहधारी परमेश्वर शैतान के विरुद्ध जमीनी लड़ाई लड़ रहा था; इससे भी अधिक यह परमेश्वर का एक सामान्य मनुष्य बनकर अपने अनुयायियों के साथ संघर्ष शुरू करना था, और इस संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी विनम्रता के साथ, अपने स्वरूप के साथ और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूरा किया। उसने उन लोगों को प्राप्त किया जिन्हें वह चाहता था, वह पहचान और हैसियत प्राप्त की जिसका वह हकदार था, और अपने सिंहासन की ओर "लौट" गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 71

सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में से एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में। ये दोनों विषय वास्तव में उस कार्य पर प्रकाश डालते हैं, जिसे प्रभु यीशु अनुग्रह के युग में करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह अपने साथ अपने कार्य का एक चरण, जो कि एक विशिष्ट कार्य था, और उस स्वभाव को लेकर आया, जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में जो कुछ भी मनुष्य के पुत्र ने किया, वह सब उस कार्य के चारों ओर घूमता था, जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न तो उससे कुछ ज़्यादा करता, न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया, वह सब इस युग से संबंधित था। चाहे उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से, और चाहे उसने ऐसा किसी भी तरह से या किसी भी परिप्रेक्ष्य से किया हो, उसका उद्देश्य लोगों को यह समझने में मदद करना था कि वह क्या करना चाहता है, उसकी क्या इच्छा है और लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं। वह अपनी इच्छा समझने और जानने, और मानवजाति को बचाने के अपने कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम प्रभु यीशु को यह व्यक्त करने के लिए कि वह मानवजाति को क्या बताना चाहता है, अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए देखते हैं। इससे भी अधिक्, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ बात करते हुए, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए और उनके अनुरोध के अनुसार उनकी सहायता करते हुए देखते हैं। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में नहीं देखा गया था, जो अनुग्रह के युग से पहले आया था। वह मानवजाति के साथ अधिक अंतरंग और उनके प्रति अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणाम प्राप्त करने में अधिक सक्षम हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने का रूपक इस बिंदु को वास्तव में स्पष्ट करता है। इस रूपक में प्रयुक्त संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा था, उस समय उसका क्या इरादा था। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" के विचार के भीतर किस प्रकार का विचार निहित है? वह विचार यह है कि लोग क्षमा को अपना खुद का उत्तरदायित्व बना लें, ऐसी चीज़ जो उन्हें अवश्य सीखनी चाहिए, और ऐसा मार्ग जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। हालाँकि यह मात्र एक रूपक था, किंतु इसने एक महत्त्वपूर्ण बिंदु को उजागर करने का काम किया। इसने उसका आशय गहराई से समझने और अभ्यास के उचित तरीके, सिद्धांत और मानक खोजने में लोगों की सहायता की। इस रूपक ने लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझने में सहायता की और उन्हें एक सही धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, किंतु दूसरों के प्रति सहनशीलता और समझदारी के रवैये के साथ। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में "सात बार के सत्तर गुने" की संख्या के बारे में सोच रहा था? नहीं, वह उसके बारे में नहीं सोच रहा था। क्या परमेश्वर दवारा मनुष्य को क्षमा किए जाने की कोई संख्या है? ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो यहाँ उल्लिखित "बारियों की संख्या" में बहुत रुचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या का उद्गम और अर्थ समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। किंतु वास्तव में यह सिर्फ मनुष्य की बोली की एक संख्या थी, जिसका परमेश्वर ने उपयोग किया था। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानवजाति से प्रभु यीशु की अपेक्षाओं के साथ लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब लोग उसके कथन को अधिक नहीं समझते थे, क्योंकि उसके वचन पूर्ण दिव्यता से आते थे। उसके कथन का परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मानवजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से व्यक्त होता था, जिसे लोग देख नहीं सकते थे। वे लोग जो देह में जीते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परंतु देह बनने के बाद परमेश्वर ने मानवजाति से मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उसे पार कर गया। वह अपना स्वभाव, अपनी इच्छा और अपना रवैया उन चीज़ों के माध्यम से, जिनकी मनुष्य कल्पना कर सकते थे, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा था और जो उनके सामने आई थीं, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, और ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा व्यक्त कर सका, जिसे वे ग्रहण कर सकते थे, ताकि मानवजाति अपनी क्षमता के दायरे के भीतर और अपनी योग्यता की सीमा तक परमेश्वर को समझ और जान सके, और उसके इरादे और अपेक्षित मानक समझ सके। यह मानवता में परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत था। यद्यपि देह में कार्य करने के परमेश्वर के तरीके और सिद्धांत मुख्यतः मानवता के द्वारा या उसके माध्यम से प्राप्त किए गए थे, फिर भी इसने सचमुच ऐसे परिणाम प्राप्त किए, जिन्हें सीधे दिव्यता में कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक और लक्ष्यित था, उसकी पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में वह व्यवस्था के युग से आगे निकल गया।

आगे, आओ प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह सीधे दिव्यता में व्यक्त की गई चीज़ है? नहीं, स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़ें थीं, जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल मनुष्य ही ऐसी बात कहेंगे, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से उसी तरह प्रेम कर, जिस तरह तू अपने जीवन को सँजोता है।" बोलने का यह तरीका केवल मनुष्य का है। परमेश्वर ने कभी इस तरह बात नहीं की। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं है, क्योंकि उसे मनुष्य के प्रति अपने प्रेम को विनियमित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकाशन है। तुम लोगों ने कभी परमेश्वर को ऐसा कुछ कहते हुए सुना है : "मैं मनुष्य से उसी तरह प्रेम करता हूँ, जिस तरह मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? तुमने नहीं सुना होगा, क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार और स्वरूप में है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम, उसका रवैया और लोगों के साथ उसके व्यवहार का तरीका उसके स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और प्रकाशन हैं। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित पद्धति या किसी नैतिक संहिता का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हो? जब परमेश्वर ने मानवता में काम किया, तो उसकी बहुत-सी पद्धतियाँ, वचन और सत्य मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परंतु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, स्वरूप और उसकी इच्छा भी लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा, वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत दर्शाते हैं। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव सटीक तरीके से व्यक्त किया। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतःक्रिया में कोई व्यवधान या बाधा नहीं थी, बल्कि वास्तव में वह मानवजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। अब, इस बिंदु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण में अनेक समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण भी परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषा का उपयोग करता है, और यह स्वयं परमेश्वर की इच्छा व्यक्त करने के लिए मनुष्य के दैनिक जीवन और उसके ज्ञान में से ढेर सारी भाषा और पद्धतियों का प्रयोग करता है। जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात करे या दिव्य परिप्रेक्ष्य से, अभिव्यक्ति की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ मनुष्य की भाषा और पद्धतियों के माध्यम से आती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर होता है। जब परमेश्वर देह बना, तो मानवता में बड़े होते हुए उसने मानवजाति के ज्ञान, सामान्य ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर में ये चीज़ें उन मनुष्यों से आई थीं, जिन्हें उसने सृजित किया था। वे देहधारी परमेश्वर के लिए अपने स्वभाव और दिव्यता को व्यक्त करने के साधन बन गए, जिससे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा के उपयोग द्वारा मानवजाति के बीच कार्य करते हुए अपने कार्य को अधिक प्रासंगिक, अधिक प्रामाणिक और अधिक सटीक बना पाया। इससे उसका कार्य लोगों के लिए अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बन गया, और इस प्रकार उसने वे परिणाम प्राप्त किए, जो परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, तो ऐसा तब हुआ जब वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त कर सकता था, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरुआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब कोई "पीढ़ी का अंतर" नहीं रहा था, कि परमेश्वर शीघ्र ही संदेशवाहकों के माध्यम से संवाद करने का अपना कार्य रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर देह में वे सभी वचन और कार्य व्यक्तिगत रूप से व्यक्त कर सकेगा, जिन्हें वह व्यक्त करना चाहता है। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है, वे उसके अधिक करीब थे, और उसके प्रबंधन-कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और संपूर्ण मानवजाति का सामना एक नए युग से होने वाला था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 72

जिस किसी ने भी बाइबल पढ़ी है, वह जानता है कि जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ था, तो बहुत-सी चीज़ें घटित हुई थीं। उन घटनाओं में से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा द्वारा उसका शिकार किया जाना, जो इतनी चरम घटना थी कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उससे कम उम्र के सभी बच्चों की हत्या कर दी गई थी। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह धारण कर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम उठाया था; और मानवजाति को बचाने के अपने प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई, वह भी स्पष्ट है। परमेश्वर द्वारा देह में मानवजाति के बीच किए गए अपने कार्य से रखी गई बड़ी आशाएँ भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मानवजाति के बीच अपना कार्य करने में सक्षम हुआ, तो उसे कैसा लगा? लोगों को इसे थोड़ा-बहुत समझने में सक्षम होना चाहिए, है न? कम से कम, परमेश्वर प्रसन्न था, क्योंकि वह मानवजाति के बीच अपना नया कार्य आरंभ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई पूरी करने का अपना कार्य आरंभ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनंद से अभिभूत हो गया, क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद वह अंततः एक सामान्य मनुष्य की देह धारण कर सका था और मांस और रक्त से बने मनुष्य के रूप में, जिसे लोग देख और छू सकते थे, अपना नया कार्य आरंभ कर सका था। अंततः वह मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। अंततः परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मानवजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानवजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठकर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को देख भी सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और हर चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं, और वह भी अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में अपने कार्य की उसकी पहली विजय थी। यह भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—निस्संदेह परमेश्वर इससे सबसे अधिक प्रसन्न था। तबसे परमेश्वर ने मानवजाति के बीच अपने कार्य में पहली बार एक प्रकार का सुकून महसूस किया। घटित होने वाली ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और स्वाभाविक थीं, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया, वह भी बहुत ही वास्तविक था। मानवजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्ट महसूस करता है, तो ऐसा तब होता है, जब मनुष्य परमेश्वर और उद्धार के निकट आ सकता है। परमेश्वर के लिए यह उसके नए कार्य की शुरुआत भी है, अपनी प्रबंधन-योजना में आगे बढ़ना भी है, और इसके अतिरिक्त, ये वे अवसर भी होते हैं, जब उसके इरादे पूर्णता की ओर अग्रसर होते हैं। मानवजाति के लिए, ऐसे अवसर का आगमन सौभाग्यशाली और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर के उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य का एक नया चरण कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरुआत करता है, और जब इस नए कार्य और नई शुरुआत का सूत्रपात और प्रस्तुति मानवजाति के बीच की जाती है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण का परिणाम पहले से ही निर्धारित और पूरा कर लिया जाता है, और उसका अंतिम परिणाम और फल परमेश्वर द्वारा पहले ही देख लिया गया होता है। साथ ही, ऐसा तब होता है, जब ये परिणाम परमेश्वर को संतुष्टि महसूस कराते हैं, और निस्संदेह ऐसा तब होता है, जब उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, क्योंकि अपनी नज़रों में उसने पहले ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर लिया है जिनकी उसे तलाश है, और वह पहले ही इस समूह को प्राप्त कर चुका है, ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने और उसे संतुष्टि प्रदान करने में सक्षम है। इस प्रकार, वह अपनी चिंताएँ एक ओर रख देता है और प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरंभ करने में समर्थ होता है, और वह उस कार्य को बिना किसी बाधा के करना आरंभ कर देता है जो उसे करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब-कुछ पूरा किया जा चुका है, तो अंत उसकी नज़र में पहले से ही होता है। इस कारण से वह संतुष्ट होता है और उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग सोच सकते हो कि इसका क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? यदि हाँ, तो वह कौन-सा गीत गाएगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुंदर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनंद और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता हो। वह उसे मनुष्य के लिए गा सकता है, अपने लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब सामान्य है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनंद और दुःख हैं, और उसकी विभिन्न भावनाएँ विभिन्न तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। यह उसका अधिकार है, और इससे अधिक कुछ भी सामान्य और उचित नहीं हो सकता। लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] का उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, और इस प्रकार उसकी खुशी या कोई भी अन्य भावना सीमित नहीं करनी चाहिए। लोगों के विचार में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता, आँसू नहीं बहा सकता, रो नहीं सकता—वह कोई मनोभाव व्यक्त नहीं कर सकता। इन दो संगतियों के दौरान हमने जो बातचीत की है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतंत्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग परमेश्वर की उदासी के बारे में सुनकर सचमुच उसकी उदासी महसूस कर पाओ, और उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनकर तुम लोग सचमुच उसकी प्रसन्नता महसूस कर पाओ, तो कम से कम तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर को क्या चीज़ प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उदास करती है। जब तुम परमेश्वर के उदास होने पर उदास महसूस कर पाओ और उसके प्रसन्न होने पर प्रसन्न महसूस कर पाओ, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और अब उसके और तुम्हारे बीच में कोई बाधा नहीं होगी। तुम परमेश्वर को अब मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं और ज्ञान से विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम लोगों की इस प्रकार की आकांक्षा है? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम इसे हासिल कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

फुटनोट :

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 73

प्रभु यीशु के दृष्टांत

बीज बोने वाले का दृष्टांत (मत्ती 13:1-9)

जंगली बीज का दृष्टांत (मत्ती 13:24-30)

राई के बीज का दृष्टांत (मत्ती 13:31-32)

खमीर का दृष्टांत (मत्ती 13:33)

जंगली बीज के दृष्टांत की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)

छिपे हुए खजाने का दृष्टांत (मत्ती 13:44)

अनमोल मोती का दृष्टांत (मत्ती 13:45-46)

जाल का दृष्टांत (मत्ती 13:47-50)

पहला बीज बोने वाले का दृष्टांत है। यह एक बहुत ही रोचक दृष्टांत है; बीज बोना लोगों के जीवन में एक सामान्य घटना है। दूसरा जंगली बीज का दृष्टांत है। जिसने भी फसलें लगाई हैं, और निश्चित ही सभी वयस्कों ने लगाई होंगी, वे जान जाएँगे कि "जंगली बीज" क्या होते हैं। तीसरा राई के बीज का दृष्टांत है। तुम सभी लोग जानते हो कि राई क्या होती है, है न? यदि तुम नहीं जानते, तो तुम लोग बाइबल में देख सकते हो। चौथा खमीर का दृष्टांत है। अब, अधिकतर लोग जानते हैं कि खमीर को किण्वन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, और यह ऐसी चीज़ है, जिसका लोग अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। अगले दृष्टांत, जिनमें से छठा छिपे हुए खजाने का दृष्टांत, सातवाँ अनमोल मोती का दृष्टांत और आठवाँ जाल का दृष्टांत है, लोगों के वास्तविक जीवन से लिए गए हैं। ये दृष्टांत किस प्रकार की तसवीर चित्रित करते हैं? यह परमेश्वर के एक सामान्य व्यक्ति बनने और मनुष्यों के साथ रहने, मनुष्यों से बात करने और उन्हें उनकी आवश्यकता की चीज़ें प्रदान करने के लिए जीवन की भाषा, मनुष्य की भाषा का उपयोग करने की तसवीर है। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लंबे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन-शैलियों का अनुभव करने और उन्हें देखने के बाद, ये अनुभव उसकी शिक्षण-सामग्री बन गए, जिसके जरिये उसने अपनी दिव्य भाषा को मानवीय भाषा में रूपांतरित कर लिया। निस्संदेह, इन चीज़ों ने भी, जो उसने जीवन में देखीं और सुनीं, मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव को समृद्ध किया। जब वह लोगों को कुछ सत्य, परमेश्वर की कोई इच्छा समझाना चाहता था, तो वह लोगों को परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं के बारे में बताने के लिए उपर्युक्त जैसे दृष्टांत इस्तेमाल कर सकता था। ये सभी दृष्टांत लोगों के जीवन से संबंधित थे; एक भी दृष्टांत ऐसा नहीं था जो मनुष्य के जीवन से अछूता था। जब प्रभु यीशु मनुष्यों के साथ रहता था, तो उसने किसानों को अपने खेतों की देखभाल करते हुए देखा था, और वह जानता था कि जंगली बीज कौन-से होते हैं और खमीर उठना क्या होता है; वह समझता था कि मनुष्य खजाने को पसंद करते हैं, इसलिए उसने खजाने और मोती दोनों रूपकों का उपयोग किया। जीवन में उसने बार-बार मछुआरों को जाल फैलाते हुए देखा था; प्रभु यीशु ने इसे और मनुष्यों के जीवन से संबंधित अन्य गतिविधियों को देखा; और उसने उस प्रकार के जीवन का अनुभव भी किया। किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य के समान ही उसने मनुष्यों की दिनचर्या और उनके तीन वक्त भोजन करने का अनुभव किया था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत व्यक्ति के जीवन का अनुभव किया और दूसरों की ज़िंदगी को भी देखा। जब उसने यह सब देखा और व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव किया, तो उसने यह नहीं सोचा कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार से अधिक स्वतंत्रता और आराम से जी सकता है। इसके बजाय अपने प्रामाणिक मानव-जीवन के अनुभव से प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन में कठिनाई देखी, उसने शैतान के अधिकार-क्षेत्र में और उसकी भ्रष्टता के अधीन पाप का जीवन जी रहे लोगों की कठिनाई, दुर्दशा और विषाद को देखा। जब वह व्यक्तिगत रूप से मानव-जीवन का अनुभव ले रहा था, तब उसने यह भी अनुभव किया कि भ्रष्टता के बीच जी रहे लोग कितने असहाय हैं, और उसने पाप में जीने वाले मनुष्यों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया, जो शैतान और बुराई द्वारा दी गई यातना में हर दिशा खो बैठे थे। जब प्रभु यीशु ने ये चीज़ें देखीं, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता से देखा या अपनी मानवता से? उसकी मानवता सचमुच मौजूद थी और वह बहुत अधिक जीवित थी; वह इस सबका अनुभव कर सकता था और इसे देख सकता था। किंतु निस्संदेह, उसने इन चीज़ों को अपने सार में भी देखा, जो उसकी दिव्यता है। अर्थात्, स्वयं मसीह, प्रभु यीशु, जो एक मनुष्य था, ने इसे देखा, और उसके द्वारा देखी गई हर चीज़ ने उसे उस कार्य का महत्व और आवश्यकता महसूस कराई, जिसे उसने उस समय हाथ में लिया था, जब वह देह में रहा था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि जो उत्तरदायित्व उसे देह में लेना आवश्यक है, वह बहुत बड़ा है, और वह जानता था कि जिस पीड़ा का वह सामना करेगा, वह कितनी दारुण होगी, फिर भी जब उसने पाप में जी रहे मनुष्यों को असहाय देखा, जब उसने उनकी ज़िंदगी की दुर्दशा और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने अधिकाधिक पीड़ा का अनुभव किया, और वह मानवजाति को पाप से बचाने के लिए अधिकाधिक व्याकुल हो गया। चाहे उसे किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़े या किसी भी प्रकार की पीड़ा सहनी हो, वह पाप में जी रही मानवजाति को बचाने के लिए और अधिक कृतसंकल्प हो गया। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना आरंभ कर दिया था, जो उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। वह उस कार्य को पूरा करने के लिए अधिकाधिक उत्सुक भी हो गया, जो उसे करना था—मानवजाति के समस्त पाप ग्रहण करना, मनुष्यों के लिए प्रायश्चित करना ताकि वे अब पाप में न जीएँ, और साथ ही परमेश्वर पापबलि की वजह से मनुष्य के पाप क्षमा कर सके, जिससे उसे मानवजाति को बचाने का अपना कार्य आगे बढ़ाने की अनुमति मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि अपने हृदय में प्रभु यीशु अपने आप को मानवजाति के लिए अर्पित करने, अपना बलिदान करने के लिए तैयार था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने, सूली पर चढ़ाए जाने के लिए भी तैयार था, और निस्संदेह, वह इस कार्य को पूरा करने के लिए उत्सुक था। जब उसने मानव-जीवन की दयनीय दशा देखी, तो वह बिना एक भी क्षण या क्षणांश की देरी के, जल्दी से जल्दी अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए और अधिक इच्छुक हो गया। ऐसी अत्यावश्यकता महसूस करते हुए उसने यह भी नहीं सोचा कि उसका अपना दर्द कितना भयानक होगा, न ही उसने कोई और आशंका पाली कि उसे कितना अपमान सहना होगा। उसके हृदय में बस एक ही दृढ़ विश्वास था : यदि वह अपने को अर्पित करेगा, यदि वह पापबलि के रूप में सूली पर चढ़ जाएगा, तो परमेश्वर की इच्छा पूरी हो जाएगी और परमेश्वर अपना नया कार्य शुरू कर पाएगा। मनुष्य का जीवन और पाप में उसके अस्तित्व की स्थिति पूर्णत: रूपांतरित हो जाएगी। उसका दृढ़ विश्वास और जो कुछ करने के लिए वह कृतसंकल्प था, वे मनुष्य को बचाने से संबंध रखते थे, और उसका एक ही उद्देश्य था : परमेश्वर की इच्छा पर चलना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरुआत कर सके। उस समय प्रभु यीशु के मन में बस यही था।

देह में रहते हुए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता थी; उसके अंदर एक सामान्य व्यक्ति की भावनाएँ और चेतना थी। वह जानता था कि खुशी क्या होती है, पीड़ा क्या होती है, और जब उसने मनुष्य को इस प्रकार का जीवन जीते देखा, तो उसने गहराई से महसूस किया कि लोगों को मात्र कुछ शिक्षाएँ देने, कुछ प्रदान करने या कुछ सिखाने से पाप से बाहर नही निकाला जा सकता। न ही उनसे कुछ आज्ञाओं का पालन करवाने से उन्हें पाप से छुटकारा दिया जा सकता था—केवल मानवजाति के पाप अपने ऊपर लेकर और पापमय देह के समान बनकर ही वह मानवजाति की स्वतंत्रता जीत सकता था और बदले में मानवजाति के लिए परमेश्वर की क्षमा प्राप्त कर सकता था। इसलिए जब प्रभु यीशु ने लोगों की पापमय ज़िंदगी का अनुभव कर लिया और उसे देख लिया, तो उसके हृदय में एक प्रबल इच्छा प्रकट हुई—मनुष्यों को उनकी पाप में संघर्ष करती ज़िंदगी से छुटकारा दिलाने की। इस इच्छा ने उसे अधिकाधिक यह महसूस करवाया कि उसे यथाशीघ्र सूली पर चढ़ना चाहिए और मानवजाति के पाप अपने ऊपर ले लेने चाहिए। लोगों के साथ रहने और उनके पापमय जीवन की दुर्गति देखने, सुनने और महसूस करने के बाद उस समय प्रभु यीशु के ये विचार थे। देहधारी परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए इस प्रकार की इच्छा करना, उसके द्वारा इस प्रकार का स्वभाव व्यक्त और प्रकट करना—क्या यह कोई औसत व्यक्ति कर सकता है? इस प्रकार के परिवेश में रहते हुए कोई औसत व्यक्ति क्या देखेगा? वह क्या सोचेगा? यदि किसी औसत व्यक्ति ने इस सबका सामना किया होता, तो क्या वह समस्याओं को उच्च परिप्रेक्ष्य से देख पाता? निश्चित रूप से नहीं! यद्यपि देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप-रंग ठीक मनुष्य के समान है, और यद्यपि वह मानवीय ज्ञान सीखता है और मानवीय भाषा बोलता है, और कभी-कभी अपने विचार मनुष्य की पद्धतियों या बोलने के तरीकों से भी व्यक्त करता है, फिर भी, जिस तरीके से वह मनुष्यों को और चीज़ों के सार को देखता है, वह भ्रष्ट लोगों द्वारा मनुष्यों को और चीज़ों के सार को देखने के तरीके के समान बिलकुल नहीं है। उसका परिप्रेक्ष्य और वह ऊँचाई, जिस पर वह खड़ा है, किसी भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा अप्राप्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर सत्य है, क्योंकि उसके द्वारा धारित देह में भी परमेश्वर का सार है, और उसके विचार तथा जो कुछ उसकी मानवता के द्वारा प्रकट किया जाता है, वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वह देह में व्यक्त करता है, वह सत्य और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवजाति के लिए हैं। किसी भ्रष्ट व्यक्ति के हृदय में केवल वे थोड़े-से लोग ही होते हैं, जो उससे संबद्ध होते हैं। वह केवल उन मुट्ठीभर लोगों की ही परवाह करता है और उन्हीं के बारे में चिंता करता है। जब आपदा क्षितिज पर होती है, तो वह पहले अपने बच्चों, जीवनसाथी, या माता-पिता के बारे में सोचता है। अधिक से अधिक, कोई ज्यादा दयालु व्यक्ति किसी रिश्तेदार या अच्छे मित्र के बारे में कुछ सोच लेगा; पर क्या ऐसे दयालु व्यक्ति के विचार भी इससे आगे जाते हैं? नहीं, कभी नहीं! क्योंकि मनुष्य अंततः मनुष्य हैं, और वे सब-कुछ एक मनुष्य की ऊँचाई और परिप्रेक्ष्य से ही देख सकते हैं। किंतु देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णत: अलग है। देहधारी परमेश्वर का देह कितना ही साधारण, कितना ही सामान्य, कितना ही निम्न क्यों न हो, या लोग उसे कितनी ही नीची निगाह से क्यों न देखते हों, मानवजाति के प्रति उसके विचार और उसका रवैया ऐसी चीज़ें है, जो किसी भी मनुष्य में नहीं हैं, जिनका कोई मनुष्य अनुकरण नहीं कर सकता। वह मानवजाति का अवलोकन हमेशा दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, सृजनकर्ता के रूप में अपनी स्थिति की ऊँचाई से करेगा। वह मानवजाति को हमेशा परमेश्वर के सार और मानसिकता से देखेगा। वह मानवजाति को एक औसत व्यक्ति की निम्न ऊँचाई से, या एक भ्रष्ट व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से बिलकुल नहीं देख सकता। जब लोग मानवजाति को देखते हैं, तो मनुष्य की दृष्टि से देखते हैं, और अपने पैमाने के रूप में वे मनुष्य के ज्ञान और मनुष्य के नियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों का उपयोग करते हैं। यह उस दायरे के भीतर है, जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं; उस दायरे के भीतर है, जो भ्रष्ट लोगों द्वारा प्राप्य है। जब परमेश्वर मानवजाति को देखता है, तो वह दिव्य दृष्टि से देखता है, और पैमाने के रूप में अपने सार और स्वरूप का उपयोग करता है। इस दायरे में वे चीज़ें शामिल हैं जिन्हें लोग नहीं देख सकते, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्य पूरी तरह से भिन्न हैं। यह भिन्नता मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न-भिन्न सार से निर्धारित होती है—ये भिन्न-भिन्न सार ही उनकी पहचान और स्थिति को और साथ ही उस परिप्रेक्ष्य और ऊँचाई को निर्धारित करते हैं, जिससे वे चीज़ों को देखते हैं। क्या तुम लोग प्रभु यीशु में स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकाशन देखते हो? तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने जो किया और कहा, वह उसकी सेवकाई से और परमेश्वर के अपने प्रबंधन-कार्य से संबंधित था, कि वह सब परमेश्वर के सार की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति मानवीय थी, किंतु उसके दिव्य सार और उसकी दिव्यता के प्रकाशन को नकारा नहीं जा सकता। क्या यह मानवीय अभिव्यक्ति वास्तव में मानवता की ही अभिव्यक्ति थी? उसकी मानवीय अभिव्यक्ति अपने मूल सार में, भ्रष्ट लोगों की मानवीय अभिव्यक्ति से पूर्णत: भिन्न थी। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था। यदि वह वास्तव में एक सामान्य, भ्रष्ट मनुष्य रहा होता, तो क्या वह पापमय मानवजाति के जीवन को दिव्य परिप्रेक्ष्य से देख सकता था? बिलकुल नहीं! मनुष्य के पुत्र और एक सामान्य मनुष्य के बीच यही अंतर है। सभी भ्रष्ट लोग पाप में जीते हैं, और जब कोई पाप को देखता है, तो उसमें उसके बारे में कोई विशेष भावना उत्पन्न नहीं होती; वे सब एकसमान होते हैं, ठीक कीचड़ में रहने वाले सूअर के समान, जो बिलकुल भी असहज या गंदा महसूस नहीं करता—इसके विपरीत, वह अच्छी तरह से खाता है और गहरी नींद में सोता है। यदि कोई सूअरों के बाड़े को साफ करता है, तो सूअर वास्तव में बेचैनी महसूस करेगा, और वह साफ-सुथरा नहीं रहेगा। जल्दी ही वह दोबारा पूरी सहजता से कीचड़ में लोट लगा रहा होगा, क्योंकि वह एक गंदा जीव है। मनुष्य सूअर को गंदा समझते हैं, किंतु यदि तुम सूअर के रहने की जगह को साफ करो, तो उसे अच्छा नहीं लगता—इसीलिए कोई भी सूअर को अपने घर में नहीं रखता। मनुष्य सूअरों को जिस तरह से देखते हैं, वह हमेशा उससे भिन्न होगा, जैसा सूअर खुद महसूस करते हैं, क्योंकि मनुष्य और सूअर एक ही तरह के नहीं होते। और चूँकि देहधारी मनुष्य का पुत्र उसी तरह का नहीं है जैसे भ्रष्ट मनुष्य हैं, इसलिए केवल देहधारी परमेश्वर ही दिव्य परिप्रेक्ष्य में, परमेश्वर की ऊँचाई पर खड़ा हो सकता है, जहाँ से वह मानवजाति और सभी चीज़ों को देखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 74

जब परमेश्वर देह बनता है और मानवजाति के बीच रहता है, तो वह किस प्रकार की पीड़ा अनुभव करता है? क्या कोई सचमुच इस बात को समझता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर बड़ी पीड़ा सहता है, और यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर है, फिर भी लोग उसके सार को नहीं समझते और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार करते हैं, जिससे उसे दुःख और अन्याय महसूस होता है—वे कहते हैं कि इन कारणों से परमेश्वर की पीड़ा सचमुच बहुत बड़ी है। अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परंतु वह मनुष्य के समान पीड़ा भुगतता है और मानवजाति के साथ रहकर उत्पीड़न, बदनामी और अपमान का सामना करता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियाँ और अवज्ञा भी सहता है—इस तरह, वे कहते हैं कि परमेश्वर की पीड़ा को सचमुच मापा नहीं जा सकता। अब, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझते। वास्तव में यह पीड़ा, जिसके बारे में तुम लोग बात करते हो, परमेश्वर के लिए वास्तविक पीड़ा नहीं है, उसकी पीड़ा इससे कहीं बड़ी है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? देहधारी परमेश्वर के देह के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? परमेश्वर के लिए, मानवजाति का उसे नहीं समझना पीड़ा नहीं गिनी जाता, और न ही लोगों में परमेश्वर के बारे में कुछ ग़लतफहमियाँ होना और उनका उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखना पीड़ा गिना जाता है। हालाँकि, लोग प्रायः महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने अवश्य ही बहुत बड़ा अन्याय सहा है, कि जितने समय तक परमेश्वर देह में रहता है, वह अपना व्यक्तित्व मानवजाति को नहीं दिखा सकता और लोगों को अपनी महानता नहीं देखने दे सकता, और कि परमेश्वर विनम्रता से एक मामूली देह में छिपा रहता है, जो उसके लिए बहुत बड़ी यातना होनी चाहिए। लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझ सकते हैं और जो कुछ देख सकते हैं, उसे गंभीरता से ले लेते हैं, और परमेश्वर पर हर प्रकार की सहानुभूति प्रक्षेपित कर देते हैं, यहाँ तक कि उसकी पीड़ा के लिए उसकी थोड़ी स्तुति भी प्रस्तुत कर देते हैं। वास्तव में, इसमें एक अंतर है; लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझते हैं और वह वास्तव में जो महसूस करता है, उसके बीच एक अंतर है। मैं तुम लोगों को सच बता रहा हूँ—परमेश्वर के लिए, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या देहधारी परमेश्वर का देह, ऊपर वर्णित पीड़ा सच्ची पीड़ा नहीं है। तो फिर वह क्या है, जिसे परमेश्वर वास्तव में भुगतता है? आओ, केवल देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पीड़ा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बनकर, मानवजाति के बीच लोगों के साथ-साथ रहकर क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं और फ़लसफ़ों को देख और महसूस नहीं कर सकता? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? वह घृणा क्यों महसूस करेगा? मानवजाति के जीने की क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में समाहित हैं? वे किस चीज़ पर आधारित हैं? मानवजाति की पद्धतियाँ, नियम इत्यादि, जिन्हें वे जीवन के तरीके से जोड़ते हैं—वे सब शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े पर निर्मित हैं। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सत्य नहीं होता—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं और परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। ऐसे सार वाले और ऐसी मानवजाति के बीच रहने वाले परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? वह अपने हृदय में क्या महसूस करता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, ऐसा दर्द जिसे कोई व्यक्ति समझ या महसूस नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिसका भी वह सामना या मुक़ाबला करता है या जो भी वह सुनता, देखता और अनुभव करता है, वह सब मानवजाति की भ्रष्टता, दुष्टता और सत्य के प्रति उनका विद्रोह और प्रतिरोध है। जो कुछ भी मनुष्यों से आता है, वह सब उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, चूँकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के सार के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाता है, जिसकी भाषा उसके समान हो? ऐसा व्यक्ति मानवजाति में नहीं पाया जा सकता। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल सकता, जो परमेश्वर के साथ संवाद या विचार-विनिमय कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे भागते हैं और जिनकी लालसा करते हैं, वे सभी पाप और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर जब इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में कटार जैसा नहीं लगता? इन चीज़ों का सामना करके क्या उसे अपने हृदय में आनंद मिल सकता है? क्या वह सांत्वना पा सकता है? उसके साथ जो रह रहे हैं, वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता? वास्तव में कितनी बड़ी है यह पीड़ा, और कौन इस बारे में परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इसे समझ पाने में सक्षम है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा ऐसी है, जिसे समझ पाने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवजाति की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा कर देती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो मसीह की दुर्दशा पर अकसर सहानुभूति दिखाते हैं, क्योंकि बाइबल में एक पद है जिसमें कहा गया है : "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे गंभीरता से ले लेते हैं और मान लेते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहन करता है। अब, इसे तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से देखने पर, क्या मामला ऐसा ही है? नहीं; परमेश्वर इन कठिनाइयों को पीड़ा नहीं मानता। उसने कभी देह की पीड़ाओं के कारण अन्याय के विरुद्ध चीख-पुकार नहीं की है, और उसने कभी मनुष्यों को प्रतिफल या पुरस्कारस्वरूप कोई चीज़ देने के लिए बाध्य नहीं किया है। किंतु जब वह मानवजाति की हर चीज़ और मनुष्यों का भ्रष्ट जीवन और उनकी बुराई देखता है, जब वह देखता है कि मानवजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान द्वारा क़ैद कर ली गई है और बचकर नहीं निकल सकती, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते कि सत्य क्या है, तो वह ये सब पाप सहन नहीं कर सकता। मनुष्यों के प्रति उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किंतु उसे यह सब सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाएँ व्यक्त तक नहीं कर सकता, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश तक नहीं करता, जो दिन-प्रतिदिन, साल-दर-साल, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इस सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों को जो कुछ दिया है, उसके बदले में वह उनसे कुछ नहीं चाहता, किंतु अपने सार की वजह से वह मानवजाति की दुष्टता, भ्रष्टता और पाप बिलकुल भी सहन नहीं कर सकता, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसके देह को अनंत पीड़ा की ओर ले जाती हैं। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? ज़्यादा संभावना इस बात की है कि तुम लोगों में से कोई भी इसे नहीं देख सकता, क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझ सकता। समय के साथ तुम लोगों को धीरे-धीरे इसे अपने आप समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 75

यीशु पाँच हज़ार लोगों को खिलाता है

यूहन्ना 6:8-13 उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" का क्या विचार है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ आम तौर पर कितने लोगों के लिए पर्याप्त होंगी? यदि तुम एक औसत व्यक्ति की भूख के आधार पर मापो, तो ये केवल दो व्यक्तियों के लिए ही पर्याप्त होंगी। "पाँच रोटियों और दो मछलियों" का मूलत: यही विचार है। किंतु इस अंश में, पाँच रोटियों और दो मछलियों से कितने लोगों को खिलाया गया? पवित्रशास्त्र में यह दर्ज है : "उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इतनी बड़ी संख्या क्या दर्शाती है? मानवीय परिप्रेक्ष्य से पाँच हज़ार लोगों में पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ बाँटना असंभव होगा, क्योंकि लोगों और भोजन के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक छोटा-सा टुकड़ा भी मिलता, तब भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी न होता। परंतु यहाँ प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने न केवल यह सुनिश्चित किया कि पाँच हज़ार लोग भरपेट खा लें, बल्कि कुछ भोजन बच भी गया। पवित्रशास्त्र में लिखा है : "जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, 'बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।' अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।" इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और हैसियत देखने में सक्षम बनाया, और यह भी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—इस तरह उन्होंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त थीं, परंतु यदि वहाँ कोई भोजन न होता, तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को खिला सकता था? निस्संदेह वह खिला सकता था! यह एक चमत्कार था, इसलिए अनिवार्य रूप से लोगों को लगा कि यह समझ से बाहर, अविश्वसनीय और रहस्यमय है, परंतु परमेश्वर के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं थी। जब परमेश्वर के लिए यह एक सामान्य चीज़ थी, तो इसे अब व्याख्या करने के क्यों चुना है? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे प्रभु यीशु की इच्छा निहित है, जिसे मानवजाति द्वारा कभी देखा नहीं गया है।

पहले, आओ यह समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्रशास्त्र से हम जानते हैं कि वे उसके अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? निश्चित रूप से नहीं! कम से कम, वे यह नहीं जानते थे कि जो व्यक्ति उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु है, या हो सकता है कि कुछ लोग केवल इतना जानते हों कि उसका नाम क्या है, और वे उसके द्वारा की गई चीज़ों के बारे कुछ जानते हों या उनके बारे में उन्होंने कुछ सुना हो। प्रभु यीशु के बारे में उनकी उत्सुकता केवल तभी जाग्रत हुई थी, जब उन्होंने उसके बारे में कहानियाँ सुनी थीं, पर तुम लोग निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि वे उसका अनुसरण करते थे, और यह तो बिलकुल भी नहीं कह सकते कि वे उसे समझते थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, तो वे भूखे थे और केवल अपना पेट भरने के बारे में ही सोच सकते थे, इसलिए यह इस संदर्भ में था कि प्रभु यीशु ने उनकी इच्छा पूरी की। जब उसने उनकी इच्छा पूरी की, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसका रवैया क्या था, जो केवल अपना पेट भरना चाहते थे? इस समय प्रभु यीशु के विचार और उसका रवैया परमेश्वर के स्वभाव और सार से संबंधित थे। इन लोगों का सामना करने पर, जो खाली पेट थे और केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे, और जो उसके प्रति उत्सुकता और आशा से भरे थे, प्रभु यीशु ने केवल उन पर अनुग्रह करने के लिए इस चमत्कार का उपयोग करने के बारे में सोचा। किंतु उसने यह आशा नहीं की कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे केवल मौज-मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए उसने वहाँ जो कुछ उसके पास था, उसका सर्वोत्तम उपयोग किया, और पाँच हज़ार लोगों को खिलाने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखें खोल दीं, जिन्हें रोमांचक चीज़ें देखने में मज़ा आता था, जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा, जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूरी कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ मूर्त चीज़ों का उपयोग किया, किंतु वह अपने हृदय में पहले से जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस अच्छा भोजन करना चाहते हैं, इसलिए उसने उन्हें उपदेश नहीं दिया, बल्कि उनसे कुछ भी नहीं कहा—उसने बस उन्हें वह चमत्कार घटित होता देखने दिया। वह इन लोगों के साथ ठीक उसी तरह से व्यवहार नहीं कर सकता था, जिस तरह से वह अपने उन शिष्यों के साथ करता था जो वास्तव में उसका अनुसरण करते थे, परंतु परमेश्वर के हृदय में सभी प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और आवश्यकता पड़ने पर वह अपनी दृष्टि में सभी प्राणियों को परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने देता है। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन है या वे उसे समझते नहीं थे या रोटियाँ और मछली खाने के बाद भी उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था या उसके प्रति उनमें कोई कृतज्ञता नहीं थी, यह ऐसा कुछ नहीं था जिसका परमेश्वर ने मुद्दा बनाया हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने का एक अद्भुत अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसमें उसके सिद्धांत होते हैं, कि वह अविश्वासियों पर नज़र नहीं रखता या उनकी सुरक्षा नहीं करता, और कि, विशेष रूप से, वह उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद नहीं उठाने नहीं देता। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे ऐसे जीवित प्राणी हैं जिन्हें उसने स्वयं बनाया है, वह उनका प्रबंधन और उनकी परवाह करेगा; और अनेक तरीकों से वह उनके साथ व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा और उन पर शासन करेगा। सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के यही विचार और यही रवैया है।

यद्यपि रोटी और मछली खाने वाले पाँच हज़ार लोगों ने प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं बनाई, फिर भी उसने उनसे कोई कठोर माँग नहीं की; जब उन्होंने भरपेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया? क्या उसने उन्हें ज़रा भी उपदेश दिया? ऐसा करने के बाद वह कहाँ गया? पवित्रशास्त्र में दर्ज नहीं है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; बस अपना चमत्कार पूरा करके वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कोई अपेक्षा की? क्या उसके मन में उनके प्रति कोई नफ़रत थी? नहीं, ऐसा कुछ नहीं था। वह बस इन लोगों पर अब और ध्यान देना नहीं चाहता था, जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे, और इस समय उसके हृदय में दर्द था। क्योंकि उसने मानवजाति की भ्रष्टता को देखा था और उसके द्वारा नकारे जाने का अनुभव किया था, जब उसने इन लोगों को देखा और जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता से वह बहुत दुःखी हुआ और उसके हृदय को पीड़ा पहुँची, वह बस इन लोगों को जल्दी से जल्दी छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु ने अपने हृदय में उनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं कीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, और इससे भी अधिक, वह अपनी ऊर्जा उन पर व्यय नहीं करना चाहता था। वह जानता था कि वे उसका अनुसरण नहीं कर सकते, किंतु इस सबके बावजूद, उनके प्रति उसका रवैया अभी भी बिलकुल स्पष्ट था। वह बस उनके साथ दयालुता का बरताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह प्रदान करना चाहता था, और निस्संदेह, यह अपने शासन के अधीन प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर का रवैया था—प्रत्येक प्राणी के साथ दयालुता का व्यवहार करना, उनका भरण-पोषण करना, उनका पालन-पोषण करना। जिस मुख्य कारण से प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, उस कारण से उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकट किया और इन लोगों के साथ दयालुता का बरताव किया। उसने उनके साथ परोपकार और सहनशीलता वाले हृदय से व्यवहार किया, और ऐसे हृदय से उसने उन पर दया दिखाई। चाहे इन लोगों ने प्रभु यीशु को जैसे भी देखा, और चाहे इसका जैसा भी परिणाम होता, उसने हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु की अपनी स्थिति के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो कुछ भी प्रकट किया, वह बिना किसी अपवाद के परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप था। प्रभु यीशु ने चुपचाप यह काम किया, और फिर चुपचाप चला गया—परमेश्वर के स्वभाव का यह कौन-सा पहलू है? क्या तुम कह सकते हो कि यह परमेश्वर की प्रेममय करुणा है? क्या तुम कह सकते हो कि यह परमेश्वर की निस्स्वार्थता है? क्या कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे, जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलाईं? क्या तुम कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे, जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे प्रभु यीशु के बिलकुल भी अनुरूप नहीं थे, और उनका सार परमेश्वर के प्रति एकदम शत्रुतापूर्ण था। परंतु परमेश्वर ने उनके साथ कैसा बरताव किया? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों का विरोध शांत करने के लिए एक तरीके का उपयोग किया था—इस तरीके को "दयालुता" कहते हैं। अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा, किंतु परमेश्वर की नज़रों में वे फिर भी उसकी रचना थे, इसलिए उसने इन पापियों के साथ फिर भी दयालुता का व्यवहार किया। यह परमेश्वर की सहनशीलता है, और यह सहनशीलता परमेश्वर की अपनी पहचान और सार से निर्धारित होती है। इसलिए, यह ऐसी चीज़ है, जिसे करने में परमेश्वर द्वारा सृजित कोई भी मनुष्य सक्षम नहीं है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 76

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसके रवैये को समझने में वास्तव में समर्थ होते हो, जब तुम प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को वास्तव में समझ सकते हो, तब तुम सृजनकर्ता द्वारा सृजित हर एक मनुष्य पर व्यय की गई उसकी लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तब तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे। वे कौन-से दो शब्द हैं? कुछ लोग कहते हैं "निस्स्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "परोपकारी।" इन दोनों में से "परोपकारी" शब्द परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। इस शब्द का उपयोग लोग किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए करते हैं, जो उदारमना या व्यापक सोच वाला हो। मैं इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, बिना सिद्धांतों की परवाह किए दान देने को संदर्भित करता है। यह एक अत्यधिक भावुकतापूर्ण झुकाव है, जो मूर्ख और भ्रमित लोगों के लिए आम है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास यहाँ दो शब्द हैं, जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं। वे दो शब्द कौन-से हैं? पहला शब्द है "विशाल।" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा शब्द है "अनंत।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है, जिसका मैं परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" शब्द किसी चीज़ की मात्रा और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो, वह ऐसी होती है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मौजूद है—वह कोई अमूर्त चीज़ नहीं है, बल्कि ऐसी चीज़ है, जो लोगों को अपेक्षाकृत सटीक और व्यावहारिक रूप में विचार दे सकती है। चाहे तुम इसे द्विआयामी दृष्टिकोण से देखो या त्रिआयामी दृष्टिकोण से; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में मौजूद है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करना उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित करने का प्रयास लग सकता है, किंतु यह इस बात का एहसास भी देता है कि उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित किया जा सकता, क्योंकि उसका प्रेम खोखला नहीं है, और न ही वह कोई किंवदंती है। बल्कि वह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा शासित सभी प्राणियों द्वारा साझा किया जाता है, ऐसी चीज़, जिसका सभी प्राणियों द्वारा विभिन्न मात्राओं में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से आनंद लिया जाता है। यद्यपि लोग उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी यह प्रेम सभी के जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रकट होकर उनके लिए पोषण और जीवन लाता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम का मान करते और उसकी गवाही देते हैं, जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य ऐसी चीज़ है, जिसकी थाह पाना मनुष्यों के लिए कठिन है, और ऐसे ही सभी चीज़ों के लिए, और विशेष रूप से मानवजाति के लिए, परमेश्वर के विचार हैं। अर्थात्, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए बहाए गए लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता। उस मानवजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और वज़न को कोई नहीं बूझ सकता, कोई नहीं समझ सकता, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया है। परमेश्वर के प्रेम को विशाल बताना उसके अस्तित्व के विस्तार और सच्चाई को समझने-बूझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है, ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग "सृष्टि" नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "अनंत" शब्द आम तौर पर किस चीज़ का वर्णन करता है? यह सामान्यतः महासागर या ब्रहांड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे "अनंत ब्रहांड", या "अनंत महासागर"। ब्रहांड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है; वह ऐसी चीज़ है, जो मनुष्य की कल्पना को पकड़ लेती है, जिसके प्रति वे बहुत प्रशंसा महसूस करते हैं। उसका रहस्य और गहराई दृष्टि के भीतर हैं, किंतु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तो तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और चीज़ों को धारण करने की उसकी महान क्षमता महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "अनंत" शब्द का उपयोग किया है, ताकि लोगों को यह महसूस करने में मदद मिल सके कि उसके प्रेम की अगाध सुंदरता महसूस करना कितना बहुमूल्य है, और कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनंत और व्यापक है। मैंने इस शब्द का प्रयोग लोगों को परमेश्वर के प्रेम की पवित्रता, और उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी गरिमा और अनुल्लंघनीयता महसूस करने में सहायता करने के लिए किया। अब क्या तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "अनंत" एक उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर के प्रेम का मापन इन दो शब्दों "विशाल" और "अनंत" से हो जाता है? पूर्ण रूप से! मानवीय भाषा में केवल ये दो शब्द ही कुछ उपयुक्त, और परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोगों को ऐसा नहीं लगता? यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का उपयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग न करते, क्योंकि परमेश्वर के प्रेम की तुम लोगों की समझ-बूझ एक द्विआयामी परिप्रेक्ष्य तक ही सीमित है, और वह त्रिआयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँची है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो तुम लोगों को लगता कि तुम्हारे पास शब्दों का अभाव है या शायद तुम लोग अवाक् भी रह जाते। आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने बात की है, उन्हें समझना तुम लोगों के लिए कठिन हो सकता है, या शायद तुम लोग उनसे सहमत ही न हों। यह केवल यही दर्शाता है कि परमेश्वर के प्रेम के बारे में तुम लोगों की समझ-बूझ सतही और एक संकीर्ण दायरे तक सीमित है। मैंने पहले कहा है कि परमेश्वर निस्स्वार्थ है; तुम लोगों को यह शब्द "निस्स्वार्थ" याद है। क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर के प्रेम का केवल निस्स्वार्थ के रूप में वर्णन किया जा सकता हो? क्या यह बहुत संकीर्ण दायरा नहीं है? तुम लोगों को इस मुद्दे पर और अधिक चिंतन करना चाहिए, ताकि तुम इससे कुछ प्राप्त कर सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 77

लाज़र का पुनरुत्थान परमेश्वर को महिमामंडित करता है

यूहन्ना 11:43-44 यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ!" जो मर गया था वह कफन से हाथ पाँव बँधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, "उसे खोल दो और जाने दो।"

इस अंश को पढ़ने के बाद इसका तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु द्वारा किए गए इस चमत्कार का महत्व पहले वाले चमत्कार से बहुत अधिक था, क्योंकि कोई भी चमत्कार किसी मरे हुए व्यक्ति को क़ब्र से बाहर लाने से ज्यादा आश्चर्यजनक नहीं हो सकता। उस युग में प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना अत्यंत महत्वपूर्ण था। चूँकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, इसलिए लोग केवल उसके शारीरिक रूप-रंग, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख सकते थे। यदि कुछ लोगों ने उसके चरित्र की कोई चीज़ या कुछ विशेष योग्यताएँ देखी और समझी भी थीं, जो उसमें दिखाई देती थीं, तो भी यह कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया है, अपने सार में वह वास्तव में कौन है, और वह वास्तव में और क्या कर सकता है। यह सब मानवजाति को अज्ञात था। इसलिए बहुत-से लोग प्रभु यीशु से संबंधित इन प्रश्नों का उत्तर देने और सत्य जानने के लिए प्रमाण ढूँढ़ना चाहते थे। क्या अपनी पहचान साबित करने के लिए परमेश्वर कुछ कर सकता था? परमेश्वर के लिए यह एक आसान बात थी—बच्चों का खेल था। वह अपनी पहचान और सार साबित करने के लिए कहीं भी, किसी भी समय कुछ कर सकता था, परंतु चीज़ों को करने का परमेश्वर का अपना तरीका था—वह हर चीज़ एक योजना के साथ और चरणों में करता था। उसने चीज़ों को विवेकहीनता से नहीं किया; मनुष्य को दिखाने हेतु कुछ करने के लिए सही समय और सही अवसर का इंतज़ार किया, कुछ ऐसा जो अर्थपूर्ण हो। इस तरह उसने अपना अधिकार और अपनी पहचान प्रमाणित की। तो क्या तब लाज़र का फिर से जी उठना प्रभु यीशु की पहचान प्रमाणित कर पाया? आओ, पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें : "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, तो उसने बस एक बात कही : "हे लाज़र, निकल आ!" तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु द्वारा बोले गए कुछ वचनों के कारण संपन्न हुआ था। इस दौरान प्रभु यीशु ने न तो कोई वेदी स्थापित की, न ही उसने कोई अन्य गतिविधि की। उसने बस यह एक बात कही। इसे कोई चमत्कार कहा जाना चाहिए या आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो, तो निस्संदेह तुम तब भी इसे एक चमत्कार ही कह सकते हो। किंतु इसे किसी मृत आत्मा को वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, और यह किसी तरह की जादूगरी तो बिलकुल भी नहीं थी। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, छोटा-सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति को मारने, उसकी आत्मा उसके शरीर से निकालने और अधोलोक में या जहाँ भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है और मृत्यु के बाद कहाँ जाता है—यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह ये निर्णय किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है, वह मनुष्यों, घटनाओं, वस्तुओं, स्थान या भूगोल द्वारा विवश नहीं होता। यदि वह इसे करना चाहता है, तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन और अधिकार द्वारा उत्पन्न होती हैं, अस्तित्व में रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। वह किसी मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित कर सकता है, और यह भी वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है, जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने मृत लाज़र को पुनर्जीवित करने जैसी चीज़ें कीं, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान के देखने के लिए प्रमाण देना, और मनुष्य और शैतान को यह ज्ञात करवाना था कि मानवजाति से संबंधित सभी चीज़ें, मानवजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी इस भौतिक संसार का, जिसे देखा जा सकता है, और साथ ही आध्यात्मिक संसार का भी, जिसे मनुष्य नहीं देख सकते, वही नियंत्रक था। यह इसलिए था, ताकि मनुष्य और शैतान जान लें कि मानवजाति से संबंधित कुछ भी शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को यह संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मानवजाति का जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु द्वारा लाज़र को पुनर्जीवित किया जाना मानवजाति को शिक्षा और निर्देश देने का सृजनकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था, जिसमें उसने मानवजाति को निर्देश और पोषण प्रदान करने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया था। यह सृजनकर्ता द्वारा बिना वचनों का इस्तेमाल किए मानवजाति को यह सच्चाई दिखाने का एक तरीका था कि वह सभी चीज़ों का नियंत्रक है। यह उसके द्वारा व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मानवजाति को यह बताने का एक तरीका था कि उसके माध्यम से मिलने वाले उद्धार के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मानवजाति को निर्देश देने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त यह मूक उपाय चिरस्थायी, अमिट और मनुष्य के हृदय को एक ऐसा आघात और प्रबुद्धता देने वाला है, जो कभी फीके नहीं पड़ सकते। लाज़र को पुनर्जीवित करने के कार्य ने परमेश्वर को महिमामंडित किया—इसका परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह हर उस व्यक्ति में, जो इस घटना को गहराई से समझता है, यह समझ और दर्शन मज़बूती से जमा देता है कि केवल परमेश्वर ही मानवजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने लाज़र को पुनर्जीवित करने के माध्यम से मानवजाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी संप्रभुता के बारे में एक संदेश भेजा, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर बिना किसी अर्थ के कभी कोई कार्य नहीं करता। हर एक चीज़ जो वह करता है, उसका बड़ा मूल्य होता है और वह खजानों के भंडार में एक नायाब नगीना होती है। वह "किसी व्यक्ति को क़ब्र से बाहर लाने" को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या मद बिलकुल नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसी कोई चीज़ नहीं करता, जिसका कोई अर्थ न हो। एक विलक्षण घटना के रूप में लाज़र को पुनर्जीवित करना परमेश्वर का अधिकार प्रदर्शित करने और प्रभु यीशु की पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार का चमत्कार दोहराया नहीं। परमेश्वर चीज़ों को अपने सिद्धांतों के अनुसार करता है। मनुष्य की भाषा में यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर अपना मस्तिष्क केवल गंभीर कार्यों में व्यस्त रखता है। अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है, तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं। वह जानता है कि इस चरण में वह कौन-सा कार्य करना चाहता है, वह क्या संपन्न करना चाहता है, और वह एकदम अपनी योजना के अनुसार कार्य करेगा। यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की क्षमता होती, तो वह बस अपनी योग्यता प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोचता रहता, ताकि अन्य लोगों को पता चल जाए कि वह कितना दुर्जेय है, जिससे वे उसके सामने झुक जाएँ, ताकि वह उन्हें नियंत्रित कर सके और उन्हें निगल सके। यह बुराई शैतान से आती है—इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसका इस प्रकार का सार नहीं है। चीज़ों को करने के पीछे उसका उद्देश्य अपना दिखावा करना नहीं है, बल्कि मानवजाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, और यही कारण है कि लोगों को बाइबल में इस तरह की घटनाओं के बहुत कम उदाहरण देखने को मिलते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु का सामर्थ्य सीमित था, या वह इस प्रकार की चीज़ें नहीं कर सकता था। इसका कारण केवल था कि परमेश्वर ऐसा करना नहीं चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु द्वारा लाज़र को पुनर्जीवित करने का बहुत व्यावहारिक महत्व था, और परमेश्वर के देहधारी होने का प्राथमिक कार्य चमत्कार करना नहीं था, मुर्दों को जीवित करना नहीं था, बल्कि मानवजाति के छुटकारे का कार्य करना था। इसलिए प्रभु यीशु ने जो कार्य पूरा किया, उसमें अधिकांशत: लोगों को शिक्षा देना, उन्हें पोषण प्रदान करना और उनकी सहायता करना था, और लाज़र को पुनर्जीवित करने जैसी घटनाएँ प्रभु यीशु द्वारा की गई सेवकाई का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा था। इससे भी अधिक, तुम लोग कह सकते हो कि "दिखावा करना" परमेश्वर के सार का अंग नहीं है, इसलिए अधिक चमत्कार न दिखाकर प्रभु यीशु जानबूझकर संयम नहीं बरत रहा था, न ही यह पर्यावरणीय सीमाओं के कारण था, और यह सामर्थ्य की कमी के कारण तो बिलकुल भी नहीं था।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को पुनर्जीवित किया, तो उसने इन वचनों का उपयोग किया : "हे लाज़र, निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ नहीं कहा। तो ये वचन क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी कर सकता है, जिसमें एक मरे हुए व्यक्ति को पुनर्जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन किया, जब उसने संसार बनाया, तो उसने ऐसा अपने वचनों—मौखिक आज्ञाओं, अधिकार-युक्त वचनों का उपयोग करके ही किया था, और सभी चीज़ों का सृजन इसी तरह हुआ था, और यह कार्य इसी तरह संपन्न हुआ था। प्रभु यीशु द्वारा कहे गए ये कुछ वचन परमेश्वर द्वारा उस समय कहे गए वचनों के समान थे, जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन किया था; वे उसी तरह से परमेश्वर का अधिकार और सृजनकर्ता का सामर्थ्य रखते थे। परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों की वजह से सभी चीज़ें बनीं और कायम रहीं, और बिलकुल वैसे ही प्रभु यीशु के मुँह से निकले वचनों के करण लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आ गया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके द्वारा धारित देह में प्रदर्शित और साकार हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और क्षमता सृजनकर्ता की और मनुष्य के उस पुत्र की है, जिसमें सृजनकर्ता साकार हुआ था। लाज़र को पुनर्जीवित करके परमेश्वर द्वारा मानवजाति को यही समझ सिखाई गई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 78

फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

उपर्युक्त दो अंशों की विषयवस्तु अलग-अलग है। आओ, पहले हम पहले वाले अंश पर नज़र डालें : फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना।

बाइबल में फरीसियों द्वारा स्वयं यीशु और उसके द्वारा की गई चीज़ों का मूल्यांकन इस प्रकार था : "वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना उनके द्वारा दूसरे लोगों के शब्दों को दोहराना भर नहीं था, न ही वह कोई निराधार अनुमान था—वह तो उनके द्वारा प्रभु यीशु के बारे में उसके कार्यों को देख-सुनकर निकाला गया निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष प्रकट रूप में न्याय के नाम पर निकाला गया था और लोगों को ऐसा दिखता था, मानो वह तथ्यों पर आधारित हो, किंतु जिस हेकड़ी के साथ उन्होंने प्रभु यीशु की आलोचना की थी, उस पर काबू रखना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के प्रति उनकी घृणा की उन्मत्त ऊर्जा ने उनकी अपनी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने वाली उनकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को भी उजागर कर दिया था। उनके द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना करते हुए कही गई ये बातें उनकी जंगली महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सत्य के प्रति उनकी शत्रुता की कुरूप और द्वेषपूर्ण प्रकृति से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, न ही उन्होंने उसके द्वारा कही या की गई चीज़ों के सार की खोज की। बल्कि उन्होंने उसके कार्य पर आँख मूँदकर, सनकभरे आवेश में और सोचे-समझे द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। वे यहाँ तक चले गए कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, जो कि परमेश्वर का आत्मा है, को भी जानबूझकर बदनाम कर दिया। "उसका चित ठिकाने नहीं है," "शैतान" और "दुष्टात्माओं का सरदार" कहने से उनका यही आशय था। अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने देह का वस्त्र पहने परमेश्वर के देहधारी आत्मा के कार्य को पागलपन कहा। उन्होंने न केवल शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की और प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा का सार पूरी तरह से शैतान और दुष्टात्माओं द्वारा किए गए परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा के समान था। वे केवल भ्रष्ट मनुष्यों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते थे, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मानवजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सह-अपराधी और अनुचर थे। उनकी ईशनिंदा और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना का सार हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा और उनके द्वारा परमेश्वर की कभी न खत्म होने वाली परीक्षा था। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के सार ने, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था, उसके आधार पर परमेश्वर ने एक उचित न्याय का निर्धारण किया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप ठहराया। यह पाप इस लोक और परलोक, दोनों में अक्षम्य है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश से प्रमाणित होता है : "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन वचनों के सच्चे अर्थ के बारे में बात करें : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" अर्थात्, आओ इस पर से रहस्य हटाएँ कि परमेश्वर किस प्रकार इन वचनों को पूरा करता है : "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

हमने जो कुछ भी बात की है, वह परमेश्वर के स्वभाव से, और लोगों, घटनाओं और चीज़ों के प्रति उसके रवैये से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दो अंश भी इसके अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर का क्रोध देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे इनमें परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं, जो मानवजाति से अपमान सहन नहीं कर सकता, और यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दो अंशों में परमेश्वर का क्रोध और मानवजाति द्वारा किए जाने वाले अपमान के प्रति उसकी असहनशीलता देखते और महसूस करते हैं, वे वास्तव में उसके रवैये को नहीं समझते। इन दो अंशों में परमेश्वर की निंदा करने वाले और उसे क्रोध दिलाने वाले लोगों के प्रति उसके सच्चे रवैये और दृष्टिकोण के छिपे संदर्भ निहित हैं। उसका रवैया और दृष्टिकोण इस अंश के सच्चे अर्थ को प्रदर्शित करते हैं : "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं और जब वे उसे क्रोधित करते हैं, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसके द्वारा जारी किया गया एक परिणाम होता है। यह बाइबल में इस प्रकार से वर्णित है : "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। किंतु, क्या बाइबल में यह दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम था, जिन्होंने प्रभु यीशु द्वारा ये चीज़ें कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दंड सहा था? नहीं—यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है। यहाँ " नहीं" कने का यह अर्थ नहीं है कि उसमें ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है, बल्कि वास्तव में वह कोई ऐसा परिणाम नहीं था, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता हो। "यह दर्ज नहीं था" कहना कुछ चीज़ों को सँभालने के संबंध में परमेश्वर के रवैये और सिद्धांत को स्पष्ट करता है। जो लोग परमेश्वर की निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं, यहाँ तक कि जो उसकी बदनामी करते हैं—वे लोग, जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसे कोसते हैं—परमेश्वर उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं कर लेता, बल्कि उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है और अपने हृदय में उनकी निंदा करता है। यहाँ तक कि वह यह भी खुलकर घोषित कर देता है कि उनका परिणाम क्या होगा, ताकि लोग जान जाएँ कि जो लोग उसकी निंदा करते हैं, उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जान जाएँ कि वह उनका परिणाम कैसे निर्धारित करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर द्वारा उनके लिए जारी किए जाने वाले परिणाम और निर्णय के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझ सकते। अर्थात्, मानवजाति परमेश्वर द्वारा उन्हें सँभालने के विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख सकती। इसका संबंध चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता, बल्कि उनका दंड और उचित प्रतिफल प्रदान करने के लिए वह सीधे तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; अर्थात् दंड ऐसा होता है, जिसे मनुष्य की आँखें देख सकती हैं। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते हुए परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है और उसका क्रोध भी उनके ऊपर पड़ता है, किंतु उन्हें मिलने वाला दंड ऐसा हो सकता है, जिसे लोग देख नहीं सकते। फिर भी, इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है, जिन्हें लोग देख सकते हैं, जैसे कि दंडित किया जाना या मार दिया जाना। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिन परिस्थितियों में परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को न बचाने या उन पर अब और दया अथवा सहनशीलता न दिखाने और उन्हें अब और अवसर न देने का निश्चय किया है, उनमें उनके प्रति उसका रवैया उन्हें अलग कर देने का होता है। "अलग कर देने" का यहाँ क्या अर्थ है? इन शब्दों का मूल अर्थ है "किसी चीज़ को एक तरफ रखना, उस पर अब और ध्यान न देना।" किंतु यहाँ, जब परमेश्वर "किसी को अलग कर देता है", तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं : पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति का जीवन और उसकी हर चीज़ शैतान को दे दी है, ताकि वह उसके साथ निपटे, और परमेश्वर अब उस व्यक्ति के लिए उत्तरदायी नहीं होगा और अब वह उसका प्रबंधन नहीं करेगा। चाहे वह व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वह अपना दंड भोगने के लिए नरक में उतर जाए, इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि इस तरह के प्राणी का सृष्टिकर्ता के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने ही हाथों से, कुछ करना चाहता है। संभव है, वह इस व्यक्ति की सेवा का उपयोग करे, या वह उसका एक विषमता के रूप में उपयोग करे। संभव है, इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए उसके पास कोई विशेष तरीका हो, उसके साथ व्यवहार करने का कोई विशेष तरीका हो, उदाहरण के लिए, पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है, जिससे उसने इस प्रकार के व्यक्ति से निपटना तय किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, अथवा यदि वे परमेश्वर को उसकी सहनशीलता की सीमा से परे धकेल देते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे गंभीर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िंदगी और उनकी हर चीज़ शैतान को सौंप देता है। उन्हें अनंत काल तक क्षमा नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, उसके हाथ का खिलौना बन गया है, और तब से परमेश्वर का उसके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभन दिया था, तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? उस स्थिति में भी, जबकि शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या उस विनाश की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है, जिसे शैतान उस व्यक्ति पर ढाएगा, जिसे पूरी तरह से शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूरी तरह से शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा पूरी तरह से गँवा दी है, जो अब सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है और जिसका सृष्टि के प्रभु के साथ पूरे तरह से संबंध-विच्छेद कर दिया गया है? शैतान द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना ऐसी ही थी, जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परंतु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति का जीवन शैतान को सौंप देता है, तो इसके परिणाम मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का गाय या गधे के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है, जबकि कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं द्वारा कब्जा किया जा सकता है, इत्यादि। ऐसे परिणाम होते हैं उन लोगों में से कुछ के, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शैतान को सौंप दिया जाता है। बाहर से ऐसा दिखाई देता है, जैसे कि प्रभु यीशु का उपहास करने वाले, उसे बदनाम करने वाले, उसकी भर्त्सना करने वाले और उसकी ईशनिंदा करने वाले लोगों ने कोई परिणाम नहीं भुगता। किंतु सच्चाई यह है कि परमेश्वर का हर एक चीज़ से निपटने का एक दृष्टिकोण है। हो सकता है कि वह लोगों को यह बताने के लिए स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे कि जिस प्रकार वह हर तरह के लोगों से निपटता है, उसका क्या परिणाम होता है। कभी-कभी वह सीधे बात नहीं करता, बल्कि सीधे कार्रवाई करता है। वह परिणाम के बारे में बात नहीं करता, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई परिणाम ही नहीं है—वस्तुत:, ऐसे मामले में संभव है कि परिणाम बहुत ज़्यादा गंभीर हो। बाहर से ऐसा लग सकता है, मानो कुछ लोग ऐसे हैं, जिनसे परमेश्वर अपने रवैये के बारे में बात नहीं करता, लेकिन वास्तव में परमेश्वर ने लंबे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उन्हें अब और देखना नहीं चाहता। उनके द्वारा की गई चीज़ों और उनके व्यवहार की वजह से, उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से परमेश्वर केवल उन्हें अपनी नज़रों से गायब देखना चाहता है, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान को दे देना चाहता है, शैतान को उनके साथ जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दोबारा देखना तक नहीं चाहता और उन्हें पूर्णत: छोड़ देना चाहता है, इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उससे निपटना भी नहीं चाहता—यदि वह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि परमेश्वर उसे उसके साथ जो चाहे वह करने और उसे मनचाहे तरीके से नियंत्रित करने, उसका मनचाहे तरीके से उपभोग करने और उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने के लिए शैतान को सौंप देगा—तो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से समाप्त है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और परमेश्वर की सृष्टि का एक प्राणी होने का उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सबसे गंभीर किस्म का दंड नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 79

अपने पुनरुत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

यूहन्ना 20:26-29 आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्‍वर!" यीशु ने उससे कहा, "तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्‍वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया।"

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

ये अंश कुछ ऐसी चीज़ों के बारे में बताते हैं, जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद कीं और अपने चेलों से कहीं। पहले, आओ पुनरुत्थान से पहले और बाद में प्रभु यीशु में आए किसी अंतर पर नज़र डालें। क्या वह अभी भी वही पुराने दिनों वाला प्रभु यीशु था? पवित्रशास्त्र में पुनरुत्थान के बाद के प्रभु यीशु का वर्णन करने वाली निम्नलिखित पंक्ति है : "और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, 'तुम्हें शान्ति मिले।'" यह बहुत स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में अवस्थित नहीं था, बल्कि अब वह एक आध्यात्मिक देह में था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि उसने देह की सीमाओं का अतिक्रमण कर लिया था; यद्यपि द्वार बंद था, फिर भी वह लोगों के बीच आ सकता था और उन्हें अपने आपको देखने दे सकता था। पुनरुत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरुत्थान के पहले के देह में रहने वाले प्रभु यीशु के बीच यह सबसे बड़ा अंतर है। यद्यपि उस समय के आध्यात्मिक देह के रूप-रंग और उससे पहले के प्रभु यीशु के रूप-रंग में कोई अंतर नहीं था, फिर भी उस पल प्रभु यीशु ऐसा बन गया था, जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मरकर जी उठने के बाद वह एक आध्यात्मिक देह बन गया था, और उसके पिछले देह की तुलना में यह आध्यात्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा रहस्यमय और भ्रमित करने वाला था। इसने प्रभु यीशु और लोगों के बीच की दूरी और अधिक बढ़ा दी, और लोगों ने अपने हृदय में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमय बन गया था। लोगों की ये अनुभूतियाँ और भावनाएँ अचानक उन्हें वापस उस परमेश्वर पर विश्वास करने के युग में ले गईं, जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। तो, प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद पहली चीज़ यह की, कि उसने इस बात की पुष्टि करने के लिए कि वह मौजूद है, और अपने पुनरुत्थान के तथ्य की पुष्टि करने के लिए अपने को सबको देखने दिया। इसके अतिरिक्त, इस कार्य ने लोगों के साथ उसका संबंध उसी रूप में बहाल कर दिया, जैसा वह तब था जब वह देह में कार्य कर रहा था, वह वो मसीह था जिसे वे देख और छू सकते थे। इसका एक परिणाम यह है कि लोगों को इस बात में कोई संदेह नहीं रहा कि सूली पर चढ़ाए जाने के बाद प्रभु यीशु मरकर पुन: जी उठा है, और उन्हें मानवजाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में भी कोई संदेह नहीं रहा था। दूसरा परिणाम यह है कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के लोगों के सामने प्रकट होने और लोगों को अपने को देखने और छूने देने के तथ्य ने मानवजाति को अनुग्रह के युग में दृढ़ता से सुरक्षित किया, और यह सुनिश्चित किया कि अब से, इस कल्पित तथ्य के आधार पर कि प्रभु यीशु "गायब" हो गया है या "बिना कुछ कहे छोड़कर चला गया है", लोग व्यवस्था के पिछले युग में नहीं लौटेंगे। इस प्रकार उसने सुनिश्चित किया वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उसके द्वारा किए गए कार्य का अनुसरण करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहेंगे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नया चरण खुल गया था, और उस क्षण से व्यवस्था के अधीन रह रहे लोग औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए और उन्होंने एक नए युग में, एक नई शुरुआत में प्रवेश किया। पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के मानवजाति के सामने प्रकट होने के ये बहुआयामी अर्थ हैं।

चूँकि प्रभु यीशु अब एक आध्यात्मिक देह में था, तो लोग उसे कैसे छू और देख सकते थे? इस प्रश्न का प्रभु यीशु के मानवजाति के सामने प्रकट होने के महत्व से संबंध है। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन अंशों में, जो हमने अभी पढ़े, किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आध्यात्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता, और पुनरुत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने हाथ में लिया था, वह पहले ही पूर्ण हो चुका था। इसलिए सिद्धांतत:, उसे लोगों के बीच उनसे मिलने के लिए अपनी मूल छवि में वापस आने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं थी, किंतु थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आध्यात्मिक देह के प्रकटन ने उसके प्रकटन के महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, जिससे वह लोगों के हृदय में अधिक गहराई तक प्रवेश कर गया। जब वह थोमा के पास आया, तो उसने संदेह करने वाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उससे कहा : "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" ये वचन और ये कार्य ऐसी चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरुत्थान के बाद कहना या करना चाहता था; वस्तुत:, ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले करना चाहता था। यह स्पष्ट है कि सूली पर चढ़ाए जाने से पहले ही उसे थोमा जैसे लोगों की समझ थी। तो हम इससे क्या देख सकते हैं? अपने पुनरुत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार नहीं बदला था। थोमा के संदेह केवल तभी शुरू नहीं हुए थे, बल्कि जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था, तब से पूरे समय उसके साथ थे। परंतु यह प्रभु यीशु था, जो मरकर जी उठा था और आध्यात्मिक संसार से अपनी मूल छवि के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के समय से मानवजाति की अपनी समझ के साथ लौटा था, इसलिए वह पहले थोमा के पास गया और उससे अपने पंजर पर हाथ रखवाया, पुनरुत्थान के बाद उसने थोमा को अपनी आध्यात्मिक देह ही नहीं दिखाई, बल्कि अपनी आध्यात्मिक देह के अस्तित्व को स्पर्श और महसूस भी कराया, और उसके संदेह पूरी तरह से मिटा दिए। प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले थोमा ने हमेशा उसके मसीह होने पर संदेह किया था, और वह विश्वास करने में असमर्थ था। परमेश्वर पर उसका विश्वास जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सका था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सका था, केवल उसके आधार पर ही स्थापित हुआ था। प्रभु यीशु को इस प्रकार के व्यक्तियों के विश्वास के बारे में अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा था, उस पर या देहधारी मसीह पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, न ही वे उसे स्वीकार करते थे। थोमा को प्रभु यीशु का अस्तित्व स्वीकार करवाने और उसका विश्वास दिलाने के लिए, और यह भी कि वह सचमुच देहधारी परमेश्वर है, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ाकर अपने पंजर को छूने दिया। क्या प्रभु यीशु के पुनरुत्थान के पहले और बाद में थोमा के संदेह करने में कुछ अंतर था? वह हमेशा संदेह करता था, और सिवाय प्रभु यीशु के आध्यात्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से उसके सामने प्रकट होने और उसे अपने देह में कीलों के निशान छूने देने के, कोई उपाय नहीं था कि कोई उसके संदेहों का समाधान कर सके और उन्हें मिटा सके। इसलिए प्रभु यीशु द्वारा उसे अपने पंजर को छूने देने और कीलों के निशानों की मौज़ूदगी को वास्तव में महसूस करने देने के बाद से थोमा के संदेह गायब हो गए, और उसने सच में जान लिया कि प्रभु यीशु मरकर जी उठा है, और उसने स्वीकार किया और माना कि प्रभु यीशु सच्चा मसीह और देहधारी परमेश्वर है। यद्यपि इस समय थोमा ने अब और संदेह नहीं किया, किंतु उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने उसके साथ रहने, उसका अनुसरण करने और उसे जानने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने स्वयं को प्रभु यीशु द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अवसर गँवा दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटन और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष और एक निर्णय दे दिया, जो संदेहों से भरे हुए थे। उसने संदेह करने वालों को, उन लोगों को जो केवल स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे और मसीह पर विश्वास नहीं करते थे, यह बताने के लिए अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया : परमेश्वर ने उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं की, न ही उसने उनके द्वारा संदेह करते हुए अनुसरण करने की प्रशंसा की। उनके द्वारा परमेश्वर और मसीह पर पूरी तरह से विश्वास करने का दिन ही परमेश्वर द्वारा अपना महान कार्य पूरा करने का दिन हो सकता था। निस्संदेह, यही वह दिन भी था, जब उनके संदेहों पर निर्णय दिया गया। मसीह के प्रति उनके रवैये ने उनका भाग्य निर्धारित कर दिया, और उनके अड़ियल संदेह का मतलब था कि उनके विश्वास ने उन्हें कोई फल प्रदान नहीं किया, और उनकी कठोरता का तात्पर्य था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। चूँकि स्वर्गिक परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रांतियों पर पला था, और मसीह के प्रति उनका संदेह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनका वास्तविक रवैया था, इसलिए भले ही उन्होंने प्रभु यीशु के देह की कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को बाँस की टोकरी से पानी खींचने के रूप में वर्णित किया जा सकता था—वह सब व्यर्थ था। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा, वह उसका हर एक व्यक्ति से स्पष्ट रूप से कहने का भी तरीका था : पुनरुत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है, जिसने साढ़े तैंतीस वर्ष मानवजाति के बीच काम करते हुए बिताए थे। यद्यपि उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु की छाया की घाटी का अनुभव किया था, और यद्यपि उसने पुनरुत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसमें किसी भी पहलू से कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब उसके शरीर पर कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरुत्थित हो गया था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मानवजाति की उसकी समझ, और मानवजाति के प्रति उसके इरादे ज़रा भी नहीं बदले थे। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह सूली से नीचे उतर आया है, उसने पाप पर विजय पाई है, कठिनाइयों पर काबू पाया है, और मुत्यु पर जीत हासिल की है। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के प्रमाण मात्र थे, संपूर्ण मानवजाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एक पापबलि होने के प्रमाण थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले ही मानवजाति के पापों को अपने ऊपर ले लिया है और छुटकारे का अपना कार्य पूरा कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने के लिए लौटा, तो उसने अपने प्रकटन के माध्यम से यह संदेश दिया : "मैं अभी भी जीवित हूँ, मैं अभी भी मौजूद हूँ; आज मैं वास्तव में तुम लोगों के सामने खड़ा हूँ, ताकि तुम लोग मुझे देख और छू सको। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु थोमा के मामले का उपयोग भविष्य के लोगों को यह चेतावनी देने के लिए भी करना चाहता था : यद्यपि तुम प्रभु यीशु पर अपने विश्वास में उसे न तो देख सकते हो और न ही छू सकते हो, फिर भी तुम अपने सच्चे विश्वास के कारण धन्य हो, और तुम अपने सच्चे विश्वास के कारण प्रभु यीशु को देख सकते हो, और इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

बाइबल में दर्ज ये वचन, जिन्हें प्रभु यीशु ने तब कहा था जब वह थोमा के सामने प्रकट हुआ था, अनुग्रह के युग में सभी लोगों के लिए बड़े सहायक हैं। थोमा के सामने उसका प्रकटन और उससे कहे गए उसके वचनों का भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर एक गहरा प्रभाव पड़ा है; उनका सार्वकालिक महत्व है। थोमा उस प्रकार के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, मगर उस पर संदेह भी करते हैं। वे शंकालु प्रकृति के होते हैं, उनका हृदय कुटिल होता है, वे विश्वासघाती होते हैं, और उन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते, जिन्हें परमेश्वर संपन्न कर सकता है। वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसकी संप्रभुता पर विश्वास नहीं करते, न ही वे देहधारी परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। किंतु प्रभु यीशु का पुनरुत्थान उनके इन लक्षणों के लिए एक चुनौती था, और इसने उन्हें अपने संदेह की खोज करने, अपने संदेह को पहचानने और अपने विश्वासघात को स्वीकार करने, और इस प्रकार प्रभु यीशु के अस्तित्व और पुनरुत्थान पर सचमुच विश्वास करने का एक अवसर भी प्रदान किया। थोमा के साथ जो कुछ हुआ, वह बाद की पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और सावधानी थी, ताकि अधिक लोग अपने आपको थोमा के समान शंकालु न होने के लिए सचेत कर सकें, और यदि वे खुद को संदेह से भरेंगे, तो वे अंधकार में डूब जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किंतु बिलकुल थोमा के समान इस बात की पुष्टि, सत्यापन और अनुमान करने के लिए कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं, हमेशा प्रभु के पंजर को छूना और उसके कीलों के निशानों को महसूस करना चाहते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। इसलिए प्रभु यीशु लोगों से अपेक्षा करता है कि वे थोमा के समान न बनें, जो केवल उसी बात पर विश्वास करते हैं जिसे वे अपनी आँखों से देख सकते हैं, बल्कि शुद्ध और ईमानदार व्यक्ति बनें, परमेश्वर के प्रति संदेहों को आश्रय न दें, बल्कि केवल उस पर विश्वास करें और उसका अनुसरण करें। इस प्रकार के लोग धन्य हैं। यह लोगों से प्रभु यीशु की एक बहुत छोटी अपेक्षा है, और यह उसके अनुयायियों के लिए एक चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 80

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

इस वार्तालाप में प्रभु यीशु ने बार-बार पतरस से एक बात पूछी : "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" यह वह उच्चतर मानक है, जिसकी प्रभु यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद पतरस जैसे लोगों से अपेक्षा करता है, जो वास्तव में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की जाँच और पूछताछ थी, परंतु इससे भी अधिक, यह पतरस जैसे लोगों से एक माँग और एक अपेक्षा थी। प्रभु यीशु ने पूछताछ करने के इस तरीके का उपयोग किया, ताकि लोग अपने बारे में विचार करें और अपने भीतर झाँकें और पूछें : प्रभु यीशु की लोगों से क्या अपेक्षाएँ हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ, जो प्रभु से प्रेम करता है? मुझे प्रभु से कैसे प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा हो, परंतु सच्चाई यह है कि अपने हृदय में वह पतरस से पूछने के इस अवसर का उपयोग इसी प्रकार का प्रश्न परमेश्वर से प्रेम करने के इच्छुक अधिक लोगों से पूछने के लिए करना चाहता था। बस, पतरस धन्य था, जो इस प्रकार के व्यक्तियों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर पाया, जिससे स्वयं प्रभु यीशु द्वारा अपने मुँह से यह पूछताछ की गई।

निम्नलिखित वचनों की तुलना में, जो अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने थोमा से कहे थे : "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो," उसका पतरस से तीन बार यह पूछना : "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" लोगों को प्रभु यीशु के रवैये की कठोरता और पूछताछ करने के दौरान उसके द्वारा महसूस की गई अत्यावश्यकता को बेहतर ढंग से महसूस कराता है। जहाँ तक शंकालु, धोखेबाज प्रकृति के थोमा की बात है, प्रभु यीशु ने उसे अपना हाथ बढ़ाकर अपने शरीर पर कीलों के निशान छूने दिए, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र है जो पुनरुत्थित हुआ है, और उससे मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान स्वीकार कराई। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से डाँटा नहीं, न ही उसने मौखिक रूप से उसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई न्याय व्यक्त किया था, फिर भी उसने उसे जताने के लिए कि वह उसे समझता है, व्यावहारिक कार्यकलापों का उपयोग किया, साथ ही उसने उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपने रवैये और निश्चय को भी प्रदर्शित किया। उस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को, जो कुछ उसने कहा था, उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता, क्योंकि थोमा जैसे लोगों में सच्चे विश्वास का एक टुकड़ा भी नहीं होता। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें केवल इतनी ही होती हैं, लेकिन पतरस जैसे लोगों के प्रति उसके द्वारा प्रकट किया गया रवैया बिलकुल भिन्न था। उसने पतरस से यह अपेक्षा नहीं की कि वह अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, न ही उसने पतरस से यह कहा : "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" इसके बजाय, उसने बार-बार पतरस से एक ही प्रश्न पूछा। वह प्रश्न विचारोत्तेजक और अर्थपूर्ण था, ऐसा प्रश्न, जो मसीह के प्रत्येक अनुयायी को ग्लानि और भय ही महसूस नहीं कराएगा, बल्कि प्रभु यीशु की चिंतित, दुःखित मनोदशा भी महसूस कराए बिना नहीं रहेगा। और जब वे अत्यधिक पीड़ा और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिंता और परवाह को और अधिक समझ पाते है; वे उसकी ईमानदार शिक्षाओं और शुद्ध, ईमानदार लोगों से उसकी कड़ी अपेक्षाओं को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास कराता है कि इन सरल वचनों में प्रकट प्रभु की लोगों से अपेक्षाएँ मात्र उसमें विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, बल्कि अपने प्रभु और अपने परमेश्वर से प्रेम करते हुए प्रेम प्राप्त करने के लिए हैं। इस प्रकार का प्रेम परवाह करना और आज्ञापालन करना होता है। यह मनुष्यों का परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, सर्वस्व परमेश्वर को समर्पित करना है, और सब-कुछ परमेश्वर के लिए व्यय करना और उसे दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को आराम देना, उसे गवाही का आनंद लेने देना, और उसे चैन से रहने देना भी है। यह मानवजाति की परमेश्वर को चुकौती, उसकी जिम्मेदारी, दायित्व और कर्तव्य है, और यह वह मार्ग है, जिसका अनुसरण मानवजाति को जीवन भर करना चाहिए। ये तीन प्रश्न एक अपेक्षा और प्रोत्साहन थे, जो प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किए थे, जो पूर्ण बनाए जाना चाहते थे। ये वे तीन प्रश्न थे, जो पतरस को जीवन में अपने मार्ग पर ले गए और उसका अनुसरण करने की प्रेरणा दी, और प्रभु यीशु के जाने पर ये तीन प्रश्न ही थे, जिन्होंने पूर्ण बनाए जाने के अपने मार्ग पर चलने की शुरुआत करने में पतरस की अगुआई की, जिन्होंने प्रभु के प्रति उसके प्रेम की वजह से प्रभु के हृदय का ख़्याल रखने, प्रभु का आज्ञापालन करने, प्रभु को आराम प्रदान करने और इस प्रेम की वजह से अपना संपूर्ण जीवन और अपना संपूर्ण अस्तित्व अर्पित करने में उसकी अगुआई की।

अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य मुख्यत: दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला प्रकार उन लोगों का था, जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं का पालन कर सकते थे, जो सूली सहन कर सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का आशीष प्राप्त करता है और परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाता है। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस जैसा था, जिसे पूर्ण बनाया जा सकता था। इसलिए अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने सबसे पहले ये दो सर्वाधिक अर्थपूर्ण चीज़ें कीं। एक थोमा के साथ की गई और दूसरी पतरस के साथ। ये दो चीज़ें क्या दर्शाती हैं? क्या ये मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सच्चे इरादे दर्शाती हैं? क्या ये मानवजाति के प्रति परमेश्वर की ईमानदारी दर्शाती हैं? उसके द्वारा थोमा के साथ किया गया कार्य लोगों को चेतावनी देने के लिए था कि वे शंकालु न बनें, बल्कि केवल विश्वास करें। पतरस के साथ किया गया उसका कार्य पतरस जैसे लोगों का विश्वास दृढ़ करने और इस प्रकार के लोगों से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करने और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन लक्ष्यों का अनुसरण करना चाहिए।

अपने पुनरुत्थित होने के बाद प्रभु यीशु उन लोगों के सामने प्रकट हुआ जिन्हें वह आवश्यक समझता था, उनसे बातें कीं, और उनसे अपेक्षाएँ कीं, और लोगों के बारे में अपने इरादे और उनसे अपनी अपेक्षाएँ पीछे छोड़ गया। कहने का अर्थ है कि देहधारी परमेश्वर के रूप में मानवजाति के लिए उसकी चिंता और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ कभी नहीं बदलीँ; जब वह देह में था तब, और सलीब पर चढ़ाए जाने और पुनरुत्थित होने के बाद जब वह आध्यात्मिक देह में था तब भी, वे एक-जैसी रहीं। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों के बारे में चिंतित था, और अपने हृदय में वह हर एक व्यक्ति की स्थिति को लेकर स्पष्ट था और वह प्रत्येक व्यक्ति की कमियाँ समझता था, और निस्संदेह, अपनी मृत्यु, पुनरुत्थान और आध्यात्मिक शरीर बन जाने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति के बारे में उसकी समझ वैसी थी, जैसी तब थी जब वह देह में था। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, किंतु देह में रहने के दौरान उसने लोगों से कठोर माँगें नहीं कीं। परंतु पुनरुत्थित हो जाने के बाद वह उनके सामने प्रकट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित किया कि प्रभु यीशु परमेश्वर से आया है और वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने अपने प्रकटन और पुनरुत्थान के तथ्य का उपयोग मानवजाति द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सबसे बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में किया। मृत्यु से उसके पुनरुत्थान ने न केवल उन सभी को मज़बूत किया जो उसका अनुसरण करते थे, बल्कि उसने अनुग्रह के युग के उसके कार्य को मानवजाति के बीच अच्छी तरह से कार्यान्वित कर दिया, और इस प्रकार अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए जाने वाले उद्धार का सुसमाचार धीरे-धीरे मानवजाति के हर छोर तक पहुँच गया। क्या तुम कहोगे कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटन का कोई महत्व था? उस समय यदि तुम थोमा या पतरस होते, और तुमने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतनी अर्थपूर्ण थी, तो इसका तुम्हारे ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या तुमने इसे परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सबसे बड़े दर्शन के रूप में देखा होता? क्या तुमने परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयत्न करते हुए और अपने जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हुए इसे परमेश्वर का अनुसरण करने की एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखा होता? क्या तुमने इस सबसे बड़े दर्शन को फैलाने के लिए जीवन भर का प्रयास व्यय किया होता? क्या तुमने प्रभु यीशु द्वारा उद्धार का सुसमाचार फैलाने को परमेश्वर की आज्ञा के रूप में लिया होता? भले ही तुम लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों द्वारा परमेश्वर और उसकी इच्छा की एक स्पष्ट समझ प्राप्त करने के लिए थोमा और पतरस के दो उदाहरण काफी हैं। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, जब उसने मानवजाति के बीच रहकर जीवन का अनुभव प्राप्त कर लिया और मानव-जीवन का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर लिया, और जब उसने उस समय मानवजाति की भ्रष्टता और मानव-जीवन की दशा देख ली, तो देहधारी परमेश्वर ने ज्यादा गहराई से यह महसूस किया कि मानवजाति कितनी असहाय, शोचनीय और दयनीय है। देह में रहते हुए परमेश्वर में जो मानवता थी, उसकी वजह से, अपनी दैहिक अंत:प्रेरणाओं की वजह से, परमेश्वर ने मनुष्य की स्थिति के प्रति और अधिक समवेदना हासिल की। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिंतित हो गया। ये शायद ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें तुम लोग नहीं समझ सकते, परंतु मैं देहधारी परमेश्वर द्वारा अपने हर एक अनुयायी के लिए अनुभव की गई इस चिंता और परवाह का केवल इन दो शब्दों में वर्णन कर सकता हूँ : "गहन चिंता"। यद्यपि ये शब्द मानवीय भाषा से आते हैं, और यद्यपि ये बहुत मानवीय हैं, फिर भी ये अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर की भावनाओं को वास्तव में व्यक्त और वर्णित करते हैं। जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की गहन चिंता की बात है, अपने अनुभवों के दौरान तुम लोग धीरे-धीरे इसे महसूस करोगे और इसका स्वाद लोगे। किंतु इसे केवल अपने स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करने के आधार पर परमेश्वर के स्वभाव को धीरे-धीरे समझकर ही प्राप्त किया जा सकता है। जब प्रभु यीशु प्रकट हुआ, तो इसने मानवजाति में उसके अनुयायियों के लिए उसकी गहन चिंता को मूर्त रूप दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक देह को, या तुम यह कह सकते हो कि उसकी दिव्यता को, सौंप दिया। उसके प्रकटन ने लोगों को परमेश्वर की चिंता और परवाह का एक बार और अनुभव और एहसास कराया, साथ ही सशक्त रूप से यह भी प्रमाणित किया कि वह परमेश्वर ही है, जो युग का सूत्रपात करता है, युग का विकास करता है, और युग का समापन भी करता है। अपने प्रकटन के माध्यम से उसने सभी लोगों का विश्वास मज़बूत किया, और संसार के सामने इस तथ्य को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। इससे उसके अनुयायियों को अनंत पुष्टि मिली, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने नए युग में अपने कार्य के एक चरण का सूत्रपात किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 81

अपने पुनरुत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्रशास्त्र समझाता है

लूका 24:30-32 जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशा स्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?"

चेलों ने यीशु को खाने के लिए भुनी हुई मछली दी

लूका 24:36-43 वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" परन्तु वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्‍चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया। उसने लेकर उनके सामने खाया।

आगे हम पवित्रशास्त्र के उपर्युक्त अंशों पर नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्रशास्त्र को समझाने का वर्णन करता है, और दूसरे अंश में प्रभु यीशु के भुनी हुई मछली खाने का वर्णन है। ये दो अंश परमेश्वर के स्वभाव को जानने में तुम्हारी किस प्रकार सहायता करते हैं? क्या तुम लोग प्रभु यीशु के रोटी और फिर भुनी हुई मछली खाने के इन विवरणों से प्राप्त तसवीर के प्रकार की कल्पना कर सकते हो? क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि यदि प्रभु यीशु तुम लोगों के सामने रोटी खाता हुआ खड़ा होता, तो तुम लोगों को कैसा महसूस होता? अथवा यदि वह तुम लोगों के साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा होता, लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा होता, तो उस क्षण तुम्हारे मन में किस प्रकार की भावना आती? यदि तुम महसूस करते कि तुम प्रभु के बेहद करीब हो, कि वह तुम्हारे साथ बहुत अंतरंग है, तो यह भावना सही है। यह बिलकुल वही परिणाम है, जो अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु इकट्ठे हुए लोगों के सामने रोटी और मछली खाकर लाना चाहता था। यदि प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद लोगों से सिर्फ बात की होती, यदि वे उसकी देह और हड्डियों को महसूस न कर पाते, बल्कि यह महसूस करते कि वह एक अगम्य पवित्रात्मा है, तो वे कैसा महसूस करते? क्या वे निराश नहीं हो जाते? निराशा अनुभव करके क्या लोग परित्यक्त महसूस न करते? क्या वे अपने और प्रभु यीशु मसीह के बीच एक दूरी महसूस न करते? परमेश्वर के साथ लोगों के संबंध पर यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती? लोग निश्चित रूप से भयभीत हो जाते, वे उसके करीब आने की हिम्मत न करते, और उनका उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने का रवैया होता। तब से वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने अंतरंग संबंध को तोड़ देते, और वापस मानवजाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच के संबंध की ओर लौट जाते, जैसा कि अनुग्रह के युग के पहले था। वह आध्यात्मिक देह, जिसे लोग छू या महसूस न कर पाते, परमेश्वर के साथ उनकी अंतरंगता का उन्मूलन कर देती, और वह उस अंतरंगता के अस्तित्व को भी, जो प्रभु यीशु मसीह के देह में रहने के समय स्थापित हुई थी, जिसमें मानवजाति और उसके बीच कोई दूरी नहीं थी, खत्म कर देती। आध्यात्मिक देह से लोगों में केवल डरने, बचने और निःशब्द टकटकी लगाकर देखने की भावनाएँ उभरी थीं। वे उसके करीब आने या उससे बात करने की हिम्मत न करते, उसका अनुसरण करने, उसका विश्वास करने या उसका आदर करने की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर मनुष्यों के मन में अपने लिए इस प्रकार की भावना देखने का इच्छुक नहीं था। वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उससे बचकर निकलें या अपने आप को उससे दूर हटा लें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ और उसका परिवार बन जाएँ। यदि तुम्हारा अपना परिवार, तुम्हारे बच्चे तुम्हें देखें लेकिन तुम्हें पहचानें नहीं, और तुम्हारे करीब आने की हिम्मत न करें बल्कि हमेशा तुमसे बचते रहें, और जो कुछ तुमने उनके लिए किया, वे उसे समझ न पाएँ, तो इससे तुम्हें कैसा महसूस होगा? क्या यह दर्दनाक नहीं होगा? क्या इससे तुम्हारा हृदय टूट नहीं जाएगा? बिलकुल ऐसा ही परमेश्वर महसूस करता है, जब लोग उससे बचते हैं। इसलिए, अपने पुनरुत्थान के बाद भी प्रभु यीशु लोगों के सामने मांस और लहू के अपने रूप में ही प्रकट हुआ, और तब भी उसने उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह मनुष्यों से भी यही चाहता है कि वे उसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के रूप में देखें; केवल इसी तरह से परमेश्वर वास्तव में लोगों को प्राप्त कर सकता है, और केवल इसी तरह से लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या तुम लोग पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों का उद्धरण देने के मेरे इरादे को समझ सकते हो, जिनमें प्रभु यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद रोटी खाता है और पवित्रशास्त्र को समझाता है, और चेले उसे खाने के लिए भुनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि कार्यों की जो शृंखलाएँ प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद कहीं और कीं, उनमें एक गंभीर विचार रखा गया था। वे उस दयालुता और स्नेह से भरी हुई थीं, जो परमेश्वर मानवजाति के प्रति रखता है, और वे दुलार और सूक्ष्म परवाह से भी भरी हुई थीं, जो वह उस अंतरंग संबंध के प्रति रखता था, जिसे उसने देह में रहने के दौरान मानवजाति के साथ स्थापित किया था। इससे भी अधिक, वे अतीत की उस ललक और लालसा से भी भरी हुई थीं, जो उसने देह में रहने के दौरान अपने अनुयायियों के साथ खाने-पीने के अपने जीवन के लिए महसूस की थी। इसलिए, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी महसूस करें, न ही वह यह चाहता था कि मानवजाति स्वयं को परमेश्वर से दूर रखे। इससे भी बढ़कर, वह नहीं चाहता था कि मानवजाति यह महसूस करे कि प्रभु यीशु पुनरुत्थान के बाद वह प्रभु नहीं रहा जो लोगों से बहुत अंतरंग था, कि वह अब मानवजाति के साथ नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में लौट गया है, उस पिता के पास लौट गया है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते या जिस तक वे कभी पहुँच नहीं सकते। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मानवजाति के बीच हैसियत का कोई अंतर पैदा हो गया है। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है, जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परंतु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसके हृदय में पीड़ा होती है, क्योंकि इसका मतलब यह है कि उनका हृदय उससे बहुत दूर है और उसके लिए उनके हृदय को पाना बहुत कठिन होगा। इसलिए यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हुआ होता जिसे वे देख या छू न सकते, तो इसने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इससे मानवजाति गलती से यह समझ बैठती कि पुनरुत्थान के बाद मसीह अभिमानी, मनुष्यों से भिन्न प्रकार का और ऐसा बन गया है, जो अब मनुष्यों के साथ मेज पर नहीं बैठ सकता और उनके साथ खा नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य पापी और गंदे हैं, और कभी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते। मानवजाति की इन ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए प्रभु यीशु ने कई चीज़ें कीं, जिन्हें वह देह में रहते हुए किया करता था, जैसा कि बाइबल में दर्ज है : "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" उसने उन्हें पवित्रशास्त्र भी समझाया, जैसा कि वह अतीत में किया करता था। प्रभु यीशु द्वारा की गई इन सब चीज़ों ने हर उस व्यक्ति को, जिसने उसे देखा था, यह महसूस कराया कि प्रभु बदला नहीं है, वह अभी भी वही प्रभु यीशु है। भले ही उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, किंतु वह पुनर्जीवित हो गया है और उसने मानवजाति को छोड़ा नहीं है। वह मनुष्यों के बीच रहने के लिए लौट आया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। लोगों के सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र अभी भी वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और बातचीत का उसका तरीका बहुत परिचित लगता था। वह अभी भी प्रेममय करुणा, अनुग्रह और सहनशीलता से उतना ही भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था, जो लोगों से वैसे ही प्रेम करता था जैसे वह अपने आप से करता था, जो मानवजाति को सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा कर सकता था। उसने हमेशा की तरह लोगों के साथ खाया, उनके साथ पवित्रशास्त्र पर चर्चा की, और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह पहले के समान ही माँस और लहू से बना था और उसे छुआ और देखा जा सकता था। पहले की तरह के मनुष्य के पुत्र के रूप में उसने लोगों को अंतरंगता महसूस कराई, सहजता महसूस कराई, और किसी खोई हुई चीज़ को पुनः प्राप्त करने का आनंद दिलाया। बड़ी आसानी से उन्होंने बहादुरी और आत्मविश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा और उसका आदर करना आरंभ कर दिया, जो मानवजाति को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। वे बिना किसी हिचकिचाहट के प्रभु यीशु के नाम से प्रार्थना भी करने लगे, वे उसका अनुग्रह, उसका आशीष प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए, उससे देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने लगे, और प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करने लगे और दुष्टात्माओं को निकालने लगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 82

जिस दौरान प्रभु यीशु ने देह में रहकर काम किया, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उसके द्वारा कही गई चीज़ों को पूरी तरह से सत्यापित नहीं कर सके। जब वह सूली की ओर बढ़ रहा था, तो उसके चेलों का रवैया पर्यवेक्षण का था। फिर, उसे सूली पर चढ़ाए जाने से लेकर क़ब्र में डाले जाने के समय तक उसके प्रति लोगों का रवैया निराशा का था। इस दौरान लोगों ने पहले ही अपने हृदय में उन चीज़ों के बारे में संदेह करने से एकदम नकारने की ओर जाना आरंभ कर दिया था, जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के समय कहा था। फिर जब वह क़ब्र से बाहर आया और एक-एक करके लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो उन लोगों में से अधिकांश, जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरुत्थान का समाचार सुना था, धीरे-धीरे नकारने से संशय करने की ओर आने लगे। केवल जब अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु ने थोमा से उसका हाथ अपने पंजर में डलवाया, और जब प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खाई, और फिर उनके सामने भुनी हुई मछली खाने के लिए बढ़ा, तभी उन्होंने वास्तव में इस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ही देहधारी मसीह है। तुम कह सकते हो कि यह ऐसा था, मानो माँस और रक्त वाला यह आध्यात्मिक शरीर उन लोगों के सामने खड़ा उन्हें स्वप्न से जगा रहा था : उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र वह था, जो अनादि काल से अस्तित्व में था। उसका एक रूप, माँस और हड्डियाँ थीं, और वह पहले ही लंबे समय मानवजाति के साथ तक रह और खा चुका था...। इस समय लोगों ने महसूस किया कि उसका अस्तित्व बहुत यथार्थ और बहुत अद्भुत था। साथ ही, वे भी बहुत आनंदित और प्रसन्न थे और भावनाओं से भरे थे। उसके पुनः प्रकटन ने लोगों को वास्तव में उसकी विनम्रता दिखाई, मानवजाति के प्रति उसकी नज़दीकी और अनुरक्ति अनुभव कराई, और यह महसूस कराया कि वह उनके बारे में कितना सोचता है। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को, जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था, यह महसूस कराया मानो एक पूरा जीवन-काल गुज़र चुका हो। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिंतित, लालायित और संवेदनशून्य हृदय को आराम मिला। वे अब शंकालु या निराश नहीं रहे, क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब आशा और भरोसा करने के लिए कुछ है। उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र अब हर समय उनका पृष्ठरक्षक रहेगा; वह उनका दृढ़ दुर्ग, अनंत काल के लिए उनका आश्रय होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरुत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मानवजाति को नहीं छोड़ा था। लोगों के सामने प्रकट होकर उसने उन्हें बताया कि वह किसी भी रूप में मौजूद क्यों न हो, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। उसने उन्हें बताया कि वह हर समय और हर जगह मनुष्यों का भरण-पोषण और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें अपने को देखने और छूने देगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि वे फिर कभी असहाय महसूस न करें। प्रभु यीशु यह भी चाहता था कि लोग यह जानें कि इस संसार में वे अकेले नहीं रहते। मानवजाति के पास परमेश्वर की देखरेख है; परमेश्वर उनके साथ है। वे हमेशा परमेश्वर पर आश्रित हो सकते हैं, और वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आश्रित होकर मानवजाति अब और एकाकी या असहाय नहीं रहेगी, और जो उसे अपनी पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं, वे अब और पाप में बँधे नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, प्रभु यीशु द्वारा अपने पुनरुत्थान के बाद किए गए उसके कार्य के ये भाग बहुत छोटी चीज़ें थीं, परंतु जिस तरह से मैं उन्हें देखता हूँ, उसके द्वारा की गई छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत अर्थपूर्ण, बहुत मूल्यवान, बहुत प्रभावशाली और भारी महत्व रखने वाली थी।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाइयों और पीड़ा से भरा हुआ था, फिर भी मांस और रक्त की अपनी आध्यात्मिक देह के प्रकटन के माध्यम से, उसने उस समय के मानवजाति को छुड़ाने के देह के अपने कार्य को पूर्णता और कुशलता से संपन्न किया था। उसने देह बनकर अपनी सेवकाई की शुरुआत की और मनुष्यों के सामने अपने दैहिक रूप में प्रकट होकर उसने अपनी सेवकाई का समापन किया। मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से नए युग की शुरुआत करते हुए उसने अनुग्रह के युग की उद्घोषणा की। मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से उसने अनुग्रह के युग में अपना कार्य किया और अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को मज़बूत किया और उनकी अगुआई की। परमेश्वर के कार्य के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह जो आरंभ करता है, उसे वास्तव में पूरा करता है। इस कार्य में कदम और योजना होती है, और वह परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वशक्तिमत्ता, उसके अद्भुत कर्मों, उसके प्रेम और दया से भी भरपूर होता है। निस्संदेह, परमेश्वर के समस्त कार्य का मुख्य सूत्र मानवजाति के लिए उसकी देखभाल है; यह उसकी परवाह की भावनाओं से ओतप्रोत है, जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता। बाइबल के इन पदों में, अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु द्वारा की गई एक-एक चीज़ में मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपरिवर्तनीय आशाएँ और चिंता प्रकट हुई, और साथ ही प्रकट हुई मनुष्यों के लिए परमेश्वर की कुशल देखरेख और दुलार। शुरू से लेकर आज तक इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय अनजाने ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता? यदि तुम लोग उस युग में रह रहे होते और प्रभु यीशु पुनरुत्थान के बाद तुम लोगों के सामने मूर्त रूप में प्रकट होता जिसे तुम लोग देख सकते, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और तुम लोगों को पवित्रशास्त्र समझाता, तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? या तुम दोषी महसूस करते? परमेश्वर के बारे में पिछली ग़लतफहमियाँ और उससे बचना, परमेश्वर के साथ टकराव और उसके बारे में संदेह—क्या ये सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच का रिश्ता और अधिक सामान्य और उचित न हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की व्याख्या से, क्या तुम लोगों को परमेश्वर के स्वभाव में किसी खामी का पता चलता है? क्या तुम लोगों को परमेश्वर के प्रेम में कोई मिलावट मिलती है? क्या तुम लोगों को परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में कोई धोखा या बुराई दिखती है? निश्चित रूप से नहीं! अब क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर की प्रत्येक भावना उसके सार और उसके स्वभाव का प्रकाशन है? मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम लोगों को इनसे प्राप्त होने वाली समझ से सहायता मिलेगी और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन और परमेश्वर से भय मानने के तुम्हारे प्रयास में तुम लोगों को लाभ पहुँचाएँगे, और वे तुम लोगों के लिए ऐसे फल लाएँगे जो दिन प्रति दिन बढ़ते ही जाएँगे, जिससे खोज की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, उस मानक के अधिकाधिक करीब ले आएगी जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है। तुम लोग सत्य की खोज करने में अब और ऊबा हुआ महसूस नहीं करोगे और तुम लोग अब और ऐसा महसूस नहीं करोगे कि सत्य की और स्वभाव में परिवर्तन की खोज एक कष्टप्रद या निरर्थक चीज़ है। इसके बजाय, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके पवित्र सार की अभिव्यक्ति से प्रेरित होकर तुम लोग ज्योति की लालसा करोगे, न्याय की लालसा करोगे, और सत्य की खोज करने, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का प्रयास करने की आकांक्षा करोगे, और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए व्यक्ति बन जाओगे, एक वास्तविक व्यक्ति बन जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

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