परमेश्वर को जानना 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 1

तुम में से प्रत्येक व्यक्ति को नए सिरे से जाँच करनी चाहिए कि अपने पूरे जीवन में तुमने परमेश्वर पर किस तरह से विश्वास किया है, ताकि तुम यह देख सको कि परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया में तुम परमेश्‍वर को वास्तव में समझ, बूझ और जान पाए हो या नहीं, तुम वास्तव में जानते हो या नहीं कि विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के प्रति परमेश्वर कैसा रवैया रखता है, और तुम वास्तव में उस कार्य को समझ पाए हो या नहीं, जो परमेश्वर तुम पर कर रहा है और परमेश्वर तुम्हारे प्रत्येक कार्य को किस तरह परिभाषित करता है। यह परमेश्वर, जो तुम्हारे साथ है, तुम्हारी प्रगति को दिशा दे रहा है, तुम्हारी नियति निर्धारित कर रहा है, और तुम्हारी आवश्यकताओं के लिए आपूर्ति कर रहा है—आखिर तुम इस परमेश्वर को कितना समझते हो? तुम इस परमेश्वर के बारे में वास्तव में कितना जानते हो? क्या तुम जानते हो कि हर दिन वह तुम पर क्या कार्य करता है? क्या तुम उन सिद्धांतों और उद्देश्‍यों को जानते हो, जिन पर वह अपने हर क्रियाकलाप को आधारित करता है? क्या तुम जानते हो, वह कैसे तुम्हारा मार्गदर्शन करता है? क्या तुम उन साधनों को जानते हो, जिनसे वह तुम्हारे लिए आपूर्ति करता है? क्या तुम जानते हो कि किन तरीकों से वह तुम्हारी अगुआई करता है? क्या तुम जानते हो कि वह तुमसे क्या प्राप्त करना चाहता है और तुम में क्या हासिल करना चाहता है? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे अलग-अलग तरह के व्यवहार के प्रति उसका क्या रवैया रहता है? क्या तुम जानते हो कि तुम उसके प्रिय व्यक्ति हो या नहीं? क्या तुम उसके आनंद, क्रोध, दु:ख और प्रसन्नता के उद्गम और उनके पीछे छिपे विचारों और अभिप्रायों तथा उसके सत्व को जानते हो? अंतत:, क्या तुम जानते हो कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वह किस प्रकार का परमेश्वर है? क्या ये और इसी प्रकार के अन्य प्रश्न, ऐसे प्रश्न हैं जिनके बारे में तुमने पहले कभी नहीं सोचा या समझा? परमेश्वर पर अपने विश्वास का अनुसरण करते हुए, क्या तुमने परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और उनके अनुभव से उसके बारे में अपनी सभी गलतफहमियाँ दूर की हैं? क्या तुमने परमेश्वर के अनुशासन और ताड़ना से गुज़र कर सच्ची आज्ञाकारिता और परवाह पाई है? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के दौरान मनुष्य की विद्रोहशीलता और शैतानी प्रकृति को जान पाए हो और क्या तुमने परमेश्वर की पवित्रता के बारे में थोड़ी-सी भी समझ प्राप्त की है? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता से जीवन का कोई नया नज़रिया अपनाया है? क्या तुमने परमेश्वर द्वारा भेजे गए परीक्षणों के दौरान मनुष्य के अपराधों के प्रति उसकी असहिष्णुता के साथ-साथ यह महसूस किया है कि वह तुमसे क्या अपेक्षा रखता है और वह तुम्हें कैसे बचा रहा है? यदि तुम यह नहीं जानते कि परमेश्वर को गलत समझना क्या है या इस गलतफहमी को कैसे दूर किया जाए, तो यह कहा जा सकता है कि तुमने परमेश्वर के साथ कभी भी वास्तविक समागम में प्रवेश नहीं किया है और परमेश्वर को कभी नहीं समझा है, या कम-से-कम यह कहा जा सकता है कि तुमने उसे कभी समझना नहीं चाहा है। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का अनुशासन और ताड़ना क्या हैं, तो निश्चित रूप से तुम नहीं जानते कि आज्ञाकारिता और परवाह क्‍या हैं, या कम से कम तुमने कभी वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन और उसकी परवाह नहीं की। यदि तुमने कभी परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का अनुभव नहीं किया है, तो तुम निश्चित रूप से नहीं जान पाओगे कि उसकी पवित्रता क्या है, और यह तो बिलकुल भी नहीं समझ पाओगे कि मनुष्यों का विद्रोह क्या होता है। यदि जीवन के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण कभी उचित नहीं रहा है या जीवन में सही उद्देश्य नहीं रहा है, बल्कि तुम अभी भी अपने भविष्य के मार्ग के प्रति दुविधा और अनिर्णय की स्थिति में हो, यहाँ तक कि तुम्हें आगे बढ़ने में भी हिचकिचाहट महसूस होती है, तो यह निश्चित है कि तुमने कभी परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन नहीं पाया है; यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हें कभी वास्तव में परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति या पुन:पूर्ति प्राप्त नहीं हुई है। यदि तुम अभी तक परमेश्वर के परीक्षणों से नहीं गुज़रे हो, तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि तुम निश्चित रूप से नहीं जान पाओगे कि मनुष्य के अपराधों के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता क्या है, न ही तुम यह समझ पाओगे कि आख़िरकार परमेश्वर तुमसे क्या चाहता है, और यह तो बिलकुल भी नहीं समझ पाओगे कि अंतत: मनुष्य के प्रबंधन और बचाव का उसका कार्य क्‍या है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास कर रहा हो, यदि उसने कभी उसके वचनों में कुछ अनुभव नहीं किया या उनसे कोई बोध हासिल नहीं किया है, तो फिर वह निश्चित रूप से उद्धार के मार्ग पर नहीं चल रहा है, परमेश्वर पर उसका विश्वास किसी वास्तविक तत्त्व से रहित है, उसका परमेश्वर का ज्ञान भी निश्चित ही शून्य है, और कहने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा क्या होती है, इसका उसे बिलकुल भी पता नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 2

परमेश्वर का स्‍वरूप और अस्तित्‍व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव—यह सब मानवजाति को उसके वचनों के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। जब मनुष्‍य परमेश्वर के वचनों को अनुभव करता है, तो उन्हें अभ्यास में लाने की प्रक्रिया में व‍ह परमेश्वर के कहे वचनों के पीछे छिपे उद्देश्य को समझेगा, परमेश्वर के वचनों के स्रोत और पृष्ठभूमि को समझेगा, और परमेश्वर के वचनों के अभीष्ट प्रभाव को समझेगा और बूझेगा। जीवन और सत्य में प्रवेश करने, परमेश्वर के इरादों को समझने, अपना स्वभाव परिवर्तित करने, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम होने के लिए मनुष्य को ये सब चीज़ें अनुभव करनी, समझनी और प्राप्त करनी चाहिए। जिस समय मनुष्य इन चीज़ों को अनुभव करता, समझता और प्राप्त करता है, उसी समय वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ प्राप्त कर लेता है, और साथ ही उसके विषय में वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त कर लेता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य द्वारा कल्पित या निर्मित किसी चीज़ से नहीं आती, बल्कि उससे आती है, जिसे वह अपने भीतर समझता, अनुभव करता, महसूस करता और पुष्टि करता है। इन बातों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और पुष्टि करने के बाद ही मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान में तत्त्व की प्राप्ति होती है; केवल मनुष्य द्वारा इस समय प्राप्त ज्ञान ही वास्तविक, असली और सटीक होता है और यह प्रक्रिया—परमेश्वर के वचनों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और उनकी पुष्टि करने के माध्यम से परमेश्वर की वास्तविक समझ और ज्ञान प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं, वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य सच में परमेश्वर के उद्देश्यों को समझ-बूझ पाता है, परमेश्वर के स्‍वरूप और अस्तित्‍व को जान पाता है, सच में परमेश्वर के सार को समझ और जान पाता है, धीरे-धीरे परमेश्वर के स्वभाव को जान और समझ पाता है, संपूर्ण सृष्टि के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व के बारे में निश्चितता और उसकी सही परिभाषा पर पहुँच पाता है और परमेश्वर की पहचान और स्थिति का ठोस निश्चय और उसका ज्ञान प्राप्त कर पाता है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने विचार थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, वह परमेश्वर को अपनी कल्पना की उड़ान नहीं मानता, या वह उसके बारे में अपने संदेहों को बेलगाम नहीं दौड़ाता, या उसे गलत नहीं समझता, उसकी निंदा नहीं करता, उसकी आलोचना नहीं करता या उस पर संदेह नहीं करता। इस प्रकार, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद बहुत कम होंगे, वह परमेश्वर के साथ कम संघर्ष करेगा, और ऐसे मौके कम आएँगे, जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करेगा। इसके विपरीत, मनुष्य द्वारा परमेश्वर की परवाह और आज्ञाकारिता बढ़ेगी और परमेश्वर के प्रति उसका आदर अधिक वास्तविक और गहन होगा। ऐसे समागम के मध्य, मनुष्य न केवल सत्य का पोषण और जीवन का बपतिस्मा प्राप्त करेगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान भी प्राप्त करेगा। ऐसे समागम के मध्य न केवल मनुष्य का स्वभाव बदलेगा और वह उद्धार पाएगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर के प्रति एक सृजित प्राणी की वास्तविक श्रद्धा और आराधना भी प्राप्त करेगा। इस प्रकार का समागम कर लेने के बाद मनुष्य का परमेश्वर पर विश्वास किसी कोरे कागज़ की तरह या दिखावटी प्रतिज्ञा के समान, या एक अंधानुकरण अथवा मूर्ति-पूजा के रूप में नहीं रहेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य का जीवन दिन-प्रतिदिन परिपक्वता की ओर बढ़ेगा, और तभी उसका स्‍वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होगा और परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास कदम-दर-कदम अस्पष्ट और अनिश्चित विश्वास से एक सच्ची आज्ञाकारिता और परवाह में, वास्तविक श्रद्धा में बदलेगा और परमेश्वर के अनुसरण की प्रक्रिया में मनुष्य का रुख भी उत्‍तरोत्‍तर निष्क्रियता से सक्रियता, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में वास्तविक समझ-बूझ और सच्चा ज्ञान प्राप्त करेगा। चूँकि अधिकतर लोगों ने कभी परमेश्वर के साथ वास्तविक समागम नहीं किया है, अत: परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान सिद्धांत, शब्द और वाद पर आकर ठहर जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों का एक बड़ा समूह, भले ही कितने भी सालों से परमेश्वर पर विश्वास करता आ रहा हो, लेकिन परमेश्वर को जानने के संबंध में अभी भी उसी स्थान पर है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी, और वह सामंती अंधविश्‍वासों और रोमानी रंगों से युक्‍त भक्ति के पारंपरिक रूपों के बुनियादी चरण में ही अटका हुआ है। मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान के प्रस्थान-बिंदु पर ही रुके होने का अर्थ व्यावहारिक रूप से उसका न होना है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर की स्थिति और पहचान की पुष्टि के अलावा परमेश्वर पर मनुष्य का विश्वास अभी भी अस्पष्ट अनिश्‍चतता की स्थिति में ही है। ऐसा होने से, मनुष्य परमेश्वर के प्रति कितनी वास्‍तविक श्रद्धा रख सकता है?

चाहे तुम कितनी भी दृढ़ता से परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास क्‍यों न करो, वह परमेश्वर संबंधी तुम्‍हारे ज्ञान की जगह नहीं ले सकता, न ही वह परमेश्वर के प्रति तुम्‍हारी श्रद्धा की जगह ले सकता है। चाहे तुमने उसके आशीष और अनुग्रह का कितना भी आनंद क्‍यों न लिया हो, वह तुम्हारे परमेश्वर संबंधी ज्ञान की जगह नहीं ले सकता। चाहे तुम उस पर अपना सर्वस्व अर्पित करने और उसके लिए अपना सब-कुछ व्यय करने के लिए कितने भी तैयार हो, वह तुम्हारे परमेश्वर संबंधी ज्ञान का स्थान नहीं ले सकता। शायद तुम परमेश्वर के कहे हुए वचनों से बहुत परिचित हो गए हो, या शायद तुमने उन्हें रट भी लिया हो और तुम उन्‍हें तेजी से दोहरा सकते हो; लेकिन यह तुम्हारे परमेश्वर संबंधी ज्ञान का स्थान नहीं ले सकता। मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का कितना भी अभिलाषी हो, यदि उसका परमेश्वर के साथ वास्तविक समागम नहीं हुआ है, या उसने परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव नहीं किया है, तो परमेश्वर संबंधी उसका ज्ञान खाली शून्य या एक अंतहीन दिवास्वप्न पर आधारित होगा; तुम भले ही परमेश्वर के संपर्क में रहे हो या उससे रूबरू हुए हो, तुम्‍हारा परमेश्वर संबंधी ज्ञान फिर भी शून्य ही है और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा खोखले नारे या आदर्शवादी अवधारणा के अलावा और कुछ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 3

कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उसके अनुरूप अपने आप को ढालने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्‍वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीज़ों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिलकुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अकसर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उनका आध्‍यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिलकुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्ची आज्ञाकारिता क्या है, सच्ची देखभाल क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए "पूँजी" और "हथियार" का रूप दे देते हैं, उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज़ भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्‍यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। इस तरह, हालाँकि वे लोग परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और पोषण में जीते हैं, फिर भी वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सचमुच चलने में असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी वास्तविक संपर्क या समागम किया है, अत: उनके लिए परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ पर पहुँचना, या अपने भीतर परमेश्वर के प्रति सच्‍चा विश्‍वास पैदा कर पाना, उसका सच्चा अनुसरण या उसकी सच्ची आराधना जाग्रत कर पाना असंभव है। इस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण ने—कि उन्हें इस प्रकार परमेश्वर के वचनों को देखना चाहिए, उन्हें इस प्रकार परमेश्वर को देखना चाहिए, उन्हें अनंत काल तक अपने प्रयासों में खाली हाथ लौटने, और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पाने के लिए अभिशप्त कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह प्रदर्शित करता है कि अनंत काल से वे परमेश्वर के शत्रु हैं और अनंत काल तक वे कभी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 4

यदि किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसने कई वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है और कई सालों तक उसके वचनों के पोषण का आनंद लिया है, परमेश्वर संबंधी परिभाषा अनिवार्यत: वैसी ही है, जैसी मूर्तियों के सामने भक्ति-भाव से दंडवत करने वाले व्यक्ति की होती है, तो यह इस बात का सूचक है कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता प्राप्त नहीं की है। इसका कारण यह है कि उसने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में बिलकुल भी प्रवेश नहीं किया है और इस कारण से, परमेश्वर के वचनों में निहित वास्तविकता, सत्य, इरादों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं का उस व्यक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के सतही अर्थ पर चाहे कितनी भी मेहनत से कार्य करे, वह सब व्यर्थ है : क्योंकि वह मात्र शब्दों का अनुसरण करता है, इसलिए उसे अनिवार्य रूप से मात्र शब्द ही प्राप्त होंगे। परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा, जिससे होकर गुज़रना उद्धार पाने के लिए आवश्‍यक है; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिसे सृजित मनुष्य जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इनसे ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्‍या है, सार्थक जीवन क्या है, वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि उसे परमेश्वर की परवाह किस तरह करनी चाहिए, सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य की समानता कैसे प्राप्त करनी चाहिए; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ सकता है कि वह जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों से सृष्टि पर शासन करता है, उसकी अगुआई करता है और उसका पोषण करता है; और केवल इनसे ही मनुष्य समझ-बूझ सकता है कि वह, जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों के ज़रिये मौजूद रहता है, स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करता है और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, मनुष्य के पास परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य का कोई वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक ज़िंदा लाश, पूरा घोंघा होता है, और स्रष्टा से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्‍ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी उस पर विश्वास नहीं किया है, न कभी उसका अनुसरण किया है, और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी मानता है और न ही अपना अनुयायी, एक सच्‍चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 5

एक सच्‍चे सृजित प्राणी को यह जानना चाहिए कि स्रष्टा कौन है, मनुष्‍य का सृजन किसलिए हुआ है, एक सृजित प्राणी की ज़िम्‍मेदारियों को किस तरह पूरा करें, और संपूर्ण सृष्टि के प्रभु की आराधना किस तरह करें, उसे स्रष्टा के इरादों, इच्‍छाओं और अपेक्षाओं को समझना, बूझना और जानना चाहिए, उनकी परवाह करनी चाहिए, और स्रष्टा के तरीके के अनुरूप कार्य करना चाहिए—परमेश्‍वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो।

परमेश्‍वर का भय मानना क्‍या है? और बुराई से दूर कैसे रहा जा सकता है?

"परमेश्‍वर का भय मानने" का अर्थ अज्ञात डर या दहशत नहीं होता, न ही इसका अर्थ टाल-मटोल करना, दूर रहना, मूर्तिपूजा करना या अंधविश्‍वास होता है। वरन् यह श्रद्धा, सम्मान, विश्वास, समझ, परवाह, आज्ञाकारिता, समर्पण और प्रेम के साथ-साथ बिना शर्त और बिना शिकायत आराधना, प्रतिदान और समर्पण होता है। परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य में सच्‍ची श्रद्धा, सच्‍चा विश्वास, सच्‍ची समझ, सच्‍ची परवाह या आज्ञाकारिता नहीं होगी, वरन् केवल डर और व्‍यग्रता, केवल शंका, गलतफहमी, टालमटोल और आनाकानी होगी; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य में सच्‍चा समर्पण और प्रतिदान नहीं होगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य में सच्‍ची आराधना और समर्पण नहीं होगा, मात्र अंधी मूर्तिपूजा और अंधविश्‍वास होगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य परमेश्‍वर के तरीके के अनुसार कार्य नहीं कर पाएगा, या परमेश्‍वर का भय नहीं मानेगा, या बुराई का त्‍याग नहीं कर पाएगा। इसके विपरीत, मनुष्‍य का हर क्रियाकलाप और व्यवहार, परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह और अवज्ञा से, निंदात्‍मक आरोपों और आलोचनात्मक आकलनों से तथा सत्‍य और परमेश्‍वर के वचनों के वास्तविक अर्थ के विपरीत चलने वाले दुष्‍ट आचरण से भरा होगा।

जब मनुष्य को परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्वास होगा, तो वह सच्चाई से उसका अनुसरण करेगा और उस पर निर्भर रहेगा; केवल परमेश्‍वर पर सच्‍चे विश्वास और निर्भरता से ही मनुष्य में सच्‍ची समझ और सच्चा बोध होगा; परमेश्‍वर के वास्‍तविक बोध के साथ उसके प्रति वास्‍तविक परवाह आती है; परमेश्‍वर के प्रति सच्ची परवाह से ही मनुष्य में सच्‍ची आज्ञाकारिता आ सकती है; परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची आज्ञाकारिता से ही मनुष्य में सच्‍चा समर्पण आ सकता है; परमेश्वर के प्रति सच्‍चे समर्पण से ही मनुष्य बिना शर्त और बिना शिकायत प्रतिदान कर सकता है; सच्‍चे विश्वास और निर्भरता, सच्‍ची समझ और परवाह, सच्‍ची आज्ञाकारिता, सच्‍चे समर्पण और प्रतिदान से ही मनुष्य परमेश्‍वर के स्‍वभाव और सार को जान सकता है, स्रष्टा की पहचान को जान सकता है; स्रष्टा को वास्‍तव में जान लेने के बाद ही मनुष्य अपने भीतर सच्‍ची आराधना और समर्पण जाग्रत कर सकता है; स्रष्टा के प्रति सच्‍ची आराधना और समर्पण होने के बाद ही वह वास्तव में बुरे मार्गों का त्‍याग कर पाएगा, अर्थात्, बुराई से दूर रह पाएगा।

इससे "परमेश्‍वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने" की संपूर्ण प्रक्रिया बनती है, और यही परमेश्‍वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मूल तत्‍व भी है। यही वह मार्ग है, जिसे परमेश्‍वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए पार करना आवश्‍यक है।

"परमेश्‍वर का भय मानना और दुष्‍टता का त्‍याग करना" तथा परमेश्‍वर को जानना अभिन्‍न रूप से असंख्य सूत्रों से जुड़े हैं, और उनके बीच का संबंध स्वत: स्‍पष्‍ट है। यदि कोई बुराई से दूर रहना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय मानना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर का ज्ञान हासिल करना चा‍हता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर की ताड़ना, अनुशासन और न्याय का अनुभव करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों के रूबरू आना चाहिए, परमेश्‍वर के रूबरू आना चाहिए, और परमेश्‍वर से निवेदन करना चाहिए कि वह लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं से युक्त सभी प्रकार के परिवेशों के रूप में परमेश्‍वर के वचनों को अनुभव करने के अवसर प्रदान करे; यदि कोई परमेश्‍वर और उसके वचनों के रूबरू आना चाहता है, तो उसे पहले एक सरल और सच्‍चा हृदय, सत्‍य को स्‍वीकार करने की तत्‍परता, कष्‍ट झेलने की इच्‍छा, और बुराई से दूर रहने का संकल्प और साहस, और एक सच्‍चा सृजित प्राणी बनने की अभिलाषा रखनी चाहिए...। इस प्रकार कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए, तुम परमेश्‍वर के निरंतर करीब आते जाओगे, तुम्‍हारा हृदय निरंतर शुद्ध होता जाएगा, और तुम्‍हारा जीवन और जीवित रहने के मूल्‍य, परमेश्‍वर के तुम्‍हारे ज्ञान के साथ-साथ, निरंतर अधिक अर्थपूर्ण और दीप्तिमान होते जाएँगे। फिर एक दिन तुम अनुभव करोगे कि स्रष्टा अब कोई पहेली नहीं रह गया है, स्रष्टा कभी तुमसे छिपा नहीं था, स्रष्टा ने कभी अपना चेहरा तुमसे छिपाया नहीं था, स्रष्टा तुमसे बिलकुल भी दूर नहीं है, स्रष्टा अब बिलकुल भी वह नहीं है जिसके लिए तुम अपने विचारों में लगातार तरस रहे हो लेकिन जिसके पास तुम अपनी भावनाओं से पहुँच नहीं पा रहे हो, वह वाकई और सच में तुम्‍हारे दाएँ-बाएँ खड़ा तुम्‍हारी सुरक्षा कर रहा है, तुम्‍हारे जीवन को पोषण दे रहा है और तुम्‍हारी नियति को नियंत्रित कर रहा है। वह सुदूर क्षितिज पर नहीं है, न ही उसने अपने आपको ऊपर कहीं बादलों में छिपाया हुआ है। वह एकदम तुम्‍हारी बगल में है, तुम्‍हारे सर्वस्‍व पर आधिपत्‍य कर रहा है, वह वो सब है जो तुम्‍हारे पास है, और वही एकमात्र चीज़ है जो तुम्‍हारे पास है। ऐसा परमेश्‍वर तुम्‍हें स्वयं को अपने हृदय से प्रेम करने देता है, स्वयं से लिपटने देता है, स्वयं को पकड़ने देता है, अपनी स्तुति करने देता है, गँवा देने का भय पैदा करता है, अपना त्‍याग करने, अपनी अवज्ञा करने, अपने को टालने या दूर करने का अनिच्छुक बना देता है। तुम बस उसकी परवाह करना, उसका आज्ञापालन करना, जो भी वह देता है उस सबका प्रतिदान करना और उसके प्रभुत्व के प्रति समर्पित होना चाहते हो। तुम अब उसके द्वारा मार्गदर्शन किए जाने, पोषण दिए जाने, निगरानी किए जाने, उसके द्वारा देखभाल किए जाने से इंकार नहीं करते और न ही उसकी आज्ञा और आदेश का पालन करने से इंकार करते हो। तुम सिर्फ़ उसका अनुसरण करना चाहते हो, उसके साथ चलना चाहते हो, उसे अपना एकमात्र जीवन स्‍वीकार करना चाहते हो, उसे अपना एकमात्र प्रभु, अपना एकमात्र परमेश्‍वर स्‍वीकार करना चाहते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 6

लोगों का विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकता

कुछ लोग कठिनायाँ सह सकते हैं; वे कीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है, वे बहुत आदरणीय होते हैं; और लोग उनकी सराहना करते हैं। क्या तुम लोग इस प्रकार के बाहरी आचरण को, सत्य को अभ्यास में लाना कह सकते हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि ऐसे लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कररहे हैं? लोग बार-बार ऐसे व्यक्तियों को देखकर ऐसा क्यों समझ लेते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसका केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? स्पष्टीकरण यह है कि बहुत से लोगों को, ऐसे प्रश्न—जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और यथार्थ में सत्य-वास्तविकता से युक्त होना क्या है—ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग अक्सर ऐसे लोगों के हाथों धोखा खा जाते हैं जो बाहर से आध्यात्मिक, कुलीन, ऊँचे और महान प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो वाक्पटुता से शाब्दिक और सैद्धांतिक बातें कर सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके हाथों धोखा खा चुके हैं उन्होंने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धांतों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं, इसे कभी नहीं देखा है। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, वे लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हैं या नहीं हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना। बल्कि, उनसे परिचित होने के साथ ही, थोड़ा-थोड़ा करके वे उन लोगों की तारीफ करने, और आदर करने लगते हैं, और अंत में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, मानते हैं कि वे अपने परिवार एवं नौकरियाँ छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें मन में लगता है कि परमेश्वर इन आदर्श लोगों की प्रशंसा करता है। उनके ऐसे विश्वास की वजह क्या है? इस मुद्दे का सार क्या है? इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले पर चर्चा करें।

लोगों का दृष्टिकोण, उनका अभ्यास, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धांतों को चुनते हैं, और लोग किस चीज़ पर जोर देता है, इन सब बातों का लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का कोई लेना-देना नहीं है। चाहे लोग सतही मसलों पर ध्यान दें या गंभीर मसलों पर, शब्दों एवं सिद्धांतों पर ध्यान दें या वास्तविकता पर, लेकिन लोग उसके मुताबिक नहीं चलते जिसके मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और उन्हें जिसे सबसे अधिक जानना चाहिए, उसे जानते नहीं। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते; इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धांतों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार मान लेते हैं; तब यही सारांश, खोज करने के लिए उनका लक्ष्य बन जाता है, जिसे वे अभ्यास में लाए जाने वाला सत्य मान लेते हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि लोग अच्छे मानवीय व्यवहार को, सत्य को अभ्यास में लाने के विकल्प के तौर पर उपयोग करते हैं, इससे परमेश्वर की कृपा पाने की उनकी अभिलाषा भी पूरी हो जाती है। इससे लोगों को सत्य के साथ संघर्ष करने का बल मिलता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा स्पर्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और जिन आदर्शों को वे सराहते हैं उन्हें परमेश्वर के स्थान पर रख देते हैं। लोगों के ऐसे अज्ञानता भरे कार्य और दृष्टिकोण का, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास का केवल एक ही मूल कारण है, आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा : कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के कथन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते। और यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, और जानता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, किस चीज़ से वो घृणा करता है, वो क्या चाहता है, किस चीज़ को वो अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को वो नापसंद करता है, लोगों से अपेक्षाओं के उसके क्या मानक हैं, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति का व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँ ही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति लोगों का आदर्श बन सकता है? जो लोग परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, उनका दृष्टिकोण इसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्कसंगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करेंगे, न ही वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धांतों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 7

परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है, उस बारे में अनेक राय हैं

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिणाम को लेकर चिंतित होता है, क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर किस प्रकार उस परिणाम को निर्धारित करता है? परमेश्वर किस तरीके से किसी व्यक्ति का परिणाम निर्धारित करता है? और किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? अगर किसी मनुष्य का परिणाम निर्धारित नहीं हुआ है, तो परमेश्वर इस परिणाम को प्रकट करने के लिए क्या करता है? क्या कोई जानता है? जैसा मैंने अभी कहा, कुछ लोगों ने इंसान के परिणाम का, उन श्रेणियों के बारे में जिसमें इस परिणाम को विभाजित किया जाता है, और उन विभिन्न लोगों का जो परिणाम होने वाला है, उस के बारे में पता लगाने के लिए परमेश्वर के वचन पर शोध करने में पहले ही काफी समय बिता दिया है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि परमेश्वर के वचन किस प्रकार मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करते हैं, परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है, और किस तरह वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है। फिर भी, अंत में ये लोग कोई भी उत्तर नहीं खोज पाते। वास्तविक तथ्य में, परमेश्वर के कथनों में इस मामले पर ज़्यादा कुछ कहा नहीं गया है। ऐसा क्यों है? जब तक मनुष्य का परिणाम प्रकट नहीं किया जाता, परमेश्वर किसी को बताना नहीं चाहता है कि अंत में क्या होने जा रहा है, न ही वह किसी को समय से पहले उसकी नियति के बारे में सूचित करना चाहता है—क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य को कोई लाभ नहीं होगा। अभी मैं तुम लोगों को केवल उस तरीके के बारे में बताना चाहता हूँ जिससे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है, उन सिद्धांतों के बारे में बताना चाहता हूँ जिन्हें वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने और उस परिणाम को अभिव्यक्त करने के लिए अपने कार्य में उपयोग करता है, और उस मानक के बारे में बताना चाहता हूँ जिसे वह यह निर्धारित करने के लिए उपयोग में लाता है कि कोई व्यक्ति जीवित बच सकता है या नहीं। क्या इन्हीं सवालों को लेकर तुम लोग सर्वाधिक चिंतित नहीं हो? तो फिर, लोग कैसे विश्वास करते हैं परमेश्वर ही मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है? तुम लोगों ने इस मामले पर अभी-अभी कुछ कहा है : तुममें से किसी ने कहा था कि यह कर्तव्य को निष्ठापूर्वक करने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर है; कुछ ने कहा कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है; किसी ने कहा कि यह परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होना है; और किसी ने कहा था कि यह गुमनामी में जीना है...। जब तुम लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाते हो, जब तुम सिद्धांतों के अनुरूप अभ्यास करते हो जो तुम्हें सही लगते हैं, तो जानते हो परमेश्वर क्या सोचता है? क्या तुम लोगों ने विचार किया है कि इसी प्रकार से चलते रहना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करता है या नहीं? क्या यह परमेश्वर के मानक को पूरा करता है? क्या यह परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करता है? मेरा मानना है कि अधिकांश लोग इस पर विचार नहीं करते। वे बस परमेश्वर के वचन के किसी एक भाग को या धर्मोपदेशों के किसी एक भाग को या उन कुछ आध्यात्मिक मनुष्यों के मानकों को यंत्रवत् लागू करते हैं जिनका वे आदर करते हैं, और फलां-फलां कार्य करने के लिए स्वयं को बाध्य करते हैं। वे मानते हैं कि यही सही तरीका है, अतः वे उसी के मुताबिक चलते हुए काम करते रहते हैं, चाहे अंत में कुछ भी क्यों न हो। कुछ लोग सोचते हैं : "मैंने बहुत वर्षों तक विश्वास किया है; मैंने हमेशा इसी तरह अभ्यास किया है; लगता है मैंने वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट किया है; और मुझे यह भी लगता है कि मैंने बहुत कुछ प्राप्त किया है। क्योंकि इस दौरान मैं अनेक सत्य समझने लगा हूँ, और ऐसी बहुत-सी बातों को समझने लगा हूँ जिन्हें मैं पहले नहीं समझता था—विशेष रूप से, मेरे बहुत से विचार और दृष्टिकोण बदल चुके हैं, मेरे जीवन के मूल्य काफी बदल चुके हैं, और अब मुझे इस संसार की अच्छी-खासी समझ हो गई है।" ऐसे लोग मानते हैं कि यह पैदावार है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम परिणाम है। तुम्हारी राय में, इन मानकों और तुम लोगों के सभी अभ्यासों को एक साथ लेकर, क्या तुम लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हो? कुछ लोग पूर्ण निश्चय के साथ कहेंगे, "निस्संदेह! हम परमेश्वर के वचन के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; ऊपर के लोगों ने जो उपदेश दिया था और जो बताया था, हम उसी के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; हम लोग हमेशा अपना कर्तव्य निभाते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, हमने परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ा है। इसलिए हम पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। हम चाहे परमेश्वर के इरादों को कितना ही क्यों न समझते हों, उसके वचन को चाहे कितना ही क्यों न समझते हों, हम हमेशा परमेश्वर के अनुकूल होने के मार्ग की खोज करते रहे हैं। यदि हम सही तरीके से कार्य करते हैं, और सही तरीके से अभ्यास करते हैं, तो परिणाम निश्चित रूप से सही होगा।" इस दृष्टिकोण के बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? क्या यह सही है? शायद कुछ ऐसे लोग हों जो कहें, "मैंने इन चीज़ों के बारे में पहले कभी नहीं सोचा। मैं तो केवल इतना सोचता हूँ कि यदि मैं अपने कर्तव्य का पालन करता रहूँ और परमेश्वर के वचन की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता रहूँ, तो मैं जीवित रह सकता हूँ। मैंने कभी इस प्रश्न पर विचार नहीं किया कि मैं परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता हूँ या नहीं, न ही मैंने कभी यह विचार किया है कि मैं उसके द्वारा अपेक्षित मानक को प्राप्त कर रहा हूँ या नहीं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं बताया, और न ही मुझे कोई स्पष्ट निर्देश प्रदान किए हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि यदि मैं बिना रुके कार्य करता रहूँ, तो परमेश्वर संतुष्ट रहेगा और मुझसे उसकी कोई अतिरिक्त अपेक्षा नहीं होनी चाहिए।" क्या ये विश्वास सही हैं? जहाँ तक मेरी बात है, अभ्यास करने का यह तरीका, सोचने का यह तरीका, और ये सारे दृष्टिकोण—वे सब अपने साथ कल्पनाओं और कुछ अंधेपन को लेकर आते हैं। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो शायद थोड़ी निराशा महसूस करें और सोचें, "अंधापन? यदि यह अंधापन है, तो हमारे उद्धार की आशा, हमारे जीवित रहने की आशा बहुत कम और अनिश्चित है, है कि नहीं? क्याऐसी बातें बोलकर तुम हमारा उत्साह नहीं मार रहे?" तुम लोग कुछ भी मानो, मैं जो कहता और करता हूँ उसका आशय तुम लोगों को यह महसूस करवाना नहीं है, मानो तुम लोगों के उत्साह को मारा जा रहा है। बल्कि, यह परमेश्वर के इरादों के बारे में तुम लोग की समझ को बेहतर करने के लिए है और परमेश्वर क्या सोच रहा है, वो क्या करना चाहता है, वो किस प्रकार के व्यक्ति को पसंद करता है, किससे घृणा करता है, किसे तुच्छ समझता है, वो किस प्रकार के व्यक्ति को पाना चाहता है, और किस प्रकार के व्यक्ति को ठुकराता है, इस पर तुम लोगों की समझ को बेहतर करने के लिए है। यह तुम लोगों के मन को स्पष्टता देने, तुम्हें स्पष्ट रूप से यह जानने में सहायता करने के आशय से है कि तुम लोगों में से हर एक व्यक्ति के कार्य और विचार उस मानक से कितनी दूर भटक गए हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है। क्या इन विषयों पर विचार-विमर्श करना आवश्यक है? क्योंकि मैं जानता हूँ तुम लोगों ने लंबे समय तक विश्वास किया है, और बहुत उपदेश सुने हैं, लेकिन तुम लोगों में इन्हीं चीज़ों का अभाव है। हालाँकि, तुम लोगों ने अपनी पुस्तिका में हर सत्य लिख लिया है, तुम लोगों ने उसे भी कंठस्त और अपने हृदय में दर्ज कर लिया है जिसे तुम लोग महत्वपूर्ण मानते हो, हालाँकि तुम लोग अभ्यास करते समय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इसका उपयोग करने, अपनी आवश्यकता में इसका उपयोग करने, या आने वाले मुश्किल समय को काटने की खातिर इसका उपयोग करने की योजना बनाते हो, या फिर केवल इन चीज़ों को जीवन में अपने साथ रहने देना चाहते हो, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, यदि तुम केवल अभ्यास कर रहे हो, फिर चाहे जैसे भी करो, केवल अभ्यास कर रहे हो, तो यह महत्वपूर्ण नहीं है। तब सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्या है? महत्वपूर्ण यह है कि जब तुम अभ्यास कर रहे होते हो, तब तुम्हें अंतर्मन में पूरे यकीन से पता होना चाहिए कि तुम्हारा हर एक कार्य, हर एक कर्म परमेश्वर की इच्छानुसार है या नहीं, तुम्हारा हर कार्यकलाप, तुम्हारी हर सोच और जो परिणाम एवं लक्ष्य तुम हासिल करना चाहते हो, वे वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं या नहीं, परमेश्वर की माँगों को पूरा करते हैं या नहीं, और परमेश्वर उन्हें स्वीकृति देता है या नहीं। ये सारी बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 8

परमेश्वर के मार्ग पर चलो : परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो

एक कहावत है जिस पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनेक बार आती है। ऐसा क्यों है? इसलिए क्योंकि जब भी किसी से मेरा सामना होता है, जब भी किसी की कहानी सुनता हूँ, मैं जब भी किसी के अनुभव या परमेश्वर में विश्वास करने की उसकी गवाही सुनता हूँ, तो मैं अपने मन में इस बात का निर्णय करने के लिए कि यह व्यक्ति उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, या जिसे परमेश्वर पसंद करता है, मैं इस कहावत का उपयोग करता हूँ। तो, वह कहावत क्या है? तुम सभी लोग पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं वो कहावत तुम्हें बताऊँगा, तो शायद तुम्हें निराशा हो, क्योंकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इससे वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखाते आ रहे हैं। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैंने इससे कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं किया। यह कहावत मेरे दिल में बसी हुई है। तो वह कहावत क्या है? वो है: "परमेश्वर के मार्ग में चलो : परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो।" क्या यह बहुत ही सरल वाक्यांश नहीं है? हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, तब भी कोई व्यक्ति जिसमें असल में इसकी गहरी समझ है, वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा महत्व है, अभ्यास में इसका बड़ा मूल्य है; यह जीवन की भाषा से एक पंक्ति है जिसमें सत्य-वास्तविकता निहित है, जो लोग परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहते हैं, यह उनके लिए जीवन भर का लक्ष्य है, यह ऐसे व्यक्ति के लिए अनुसरण करने योग्य जीवन भर का मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है। तो तुम लोग क्या सोचते हो : क्या यह कहावत सत्य नहीं है? इसकी ऐसी महता है या नहीं? शायद कुछ लोग इस कहावत पर विचार करके, इसे समझने का प्रयास भी कर रहे हों, और शायद कुछ ऐसे हों जो इसके बारे में शंका रखते हों : क्या यह कहावत बहुत महत्वपूर्ण है? क्या यह बहुत महत्वपूर्ण है? क्या इस पर इतना ज़ोर देना ज़रूरी है? शायद कुछ ऐसे लोग भी हों जो इस कहावत को अधिक पसंद न करते हों, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर के मार्ग पर चलना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसका अत्यधिक सरलीकरण है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा, उसे लेकर एक छोटी-सी कहावत में पिरो देना—क्या ऐसा करना परमेश्वर को एकदम महत्वहीन बना देना नहीं है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश इन वचनों के पीछे के गहन अर्थ को पूरी तरह से न समझते हों। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का कोई इरादा नहीं रखते; तुमने इसे बस अपनी पुस्तिका में लिख लिया है ताकि अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़कर इस पर विचार कर सको। कुछ तो इस कहावत को याद रखने की भी परवाह नहीं करेंगे, इसे अच्छे उपयोग में लाने का प्रयास करने की तो बात छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करना चाहता हूँ? तुम लोगों का दृष्टिकोण या तुम लोग क्या सोचोगे, इसकी परवाह किए बिना, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी ही थी क्योंकि यह इस बात को लेकर अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इस कहावत के बारे में तुम लोगों की वर्तमान समझ चाहे कुछ भी क्यों न हो, या तुम इससे कैसे भी पेश क्यों न आओ, मैं तब भी तुम लोगों को यह बताऊँगा : यदि लोग इस कहावत के शब्दों को अभ्यास में ला सकें, उनका अनुभव कर सकें, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक को प्राप्त कर सकें, तो वे लोग जीवित बचे रहेंगे और यकीनन उनके परिणाम अच्छे होंगे। यदि तुम इस कहावत के द्वारा तय मानक को पूरा न कर पाओ, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तुम्हारा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम्हारी मानसिक तैयारी के लिए तुम्हें कहावत बता रहा हूँ, ताकि तुम लोग जान लो कि तुम्हें मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 9

परमेश्वर विभिन्न परीक्षणों से जाँच करता है कि लोग परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं या नहीं

हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, और उन्हें कुछ सत्य बताता है। ये सत्य ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करते हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना चाहिए, जिस पर मनुष्य को चलना चाहिए, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम बनाता है, ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। इन्हीं कारणों से परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। यदि लोग सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और बुराई से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाता, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता, ऐसे लोगों का कोई परिणाम नहीं होता। तब परमेश्वर अपने कार्य के दौरान, किस प्रकार किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परमेश्वर किस पद्धति का उपयोग करता है। शायद इस वक्त भी तुम लोग इस बारे में अस्पष्ट हो, परन्तु जब मैं तुम लोगों को प्रक्रिया बताऊँगा, तो यह बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा, क्योंकि तुममें से बहुत से लोगों ने पहले ही इसका अनुभव कर लिया है।

परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरंभ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए—या तुम लोग कह सकते हो, उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो उसका अनुसरण करता है—परीक्षाएँ निर्धारित कर रखी हैं और ये परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में होती हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा ठुकराए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ ने विपरीत परिवेश की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने गिरफ्तार किए जाने और यातना दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने विकल्प का सामना करने की परीक्षा का अनुभव किया है; और कुछ लोगों ने धन एवं हैसियत की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ उसका महत्वपूर्ण बिंदु यह है : परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले रहा होता है, तुम्हें किसी परिस्थिति का सामना करने पर मजबूर कर रहा होता है, तो वह यह जाँचना चाहता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो उसका भय मानता और बुराई से दूर रहता है। यदि किसी व्यक्ति को किसी भेंट को सुरक्षित रखने का काम दिया गया है, और वह अपने कर्तव्य के कारण परमेश्वर की भेंट के संपर्क में आता है, तो क्या तुम्हें लगता है कि यह ऐसा काम है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है? इसमें कोई शक ही नहीं है! हर चीज़ जो तुम्हारे सामने आती है, उसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की होती है। जब तुम्हारा सामना ऐसे मामले से होगा, तो परमेश्वर गुप्त रूप से तुम्हारा अवलोकन करेगा, देखेगा कि तुम क्या चुनाव करते हो, कैसे अभ्यास करते हो, तुम्हारे विचार क्या हैं। परमेश्वर को सबसे अधिक चिंता अंतिम परिणाम की होती है, चूँकि इसी परिणाम से वह मापेगा कि इस परीक्षा-विशेष में तुमने परमेश्वर के मानक को हासिल किया है या नहीं। हालाँकि, जब लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तो वे प्रायः इस बारे में नहीं सोचते कि उनका सामना इससे क्यों हो रहा है, परमेश्वर को उनसे किस मानक पर खरा उतारने की अपेक्षा है, वह उनमें क्या देखना चाहता है, या उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है। ऐसे मामले से सामना होने पर, इस प्रकार का व्यक्ति केवल यह सोच रहा होता है: "मैं इस चीज़ का सामना कर रहा हूँ; मुझे सावधान रहना चाहिए, लापरवाह नहीं! चाहे कुछ भी हो, यह परमेश्वर की भेंट है और मैं इसे छू नहीं सकता हूँ।" ऐसे सरल विचार रखकर वे सोचते हैं कि उन्होंने अपना उत्तरदायित्व पूरा कर लिया। परमेश्वर इस परीक्षा के परिणाम से संतुष्ट होगा या नहीं? तुम लोग इस पर चर्चा करो। (यदि कोई अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानता है, तो जब उस कर्तव्य से सामना होता है जिसमें वह परमेश्वर को अर्पित गई भेंट के संपर्क में आता है, तो वह विचार करेगा कि परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करना कितना आसान होगा, अतः वह सावधानी से कार्य करेगा।) तुम्हारा उत्तर सही दिशा में है, परन्तु यह अभी सटीक नहीं है। परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतही तौर पर नियमों का पालन करना नहीं है; बल्कि, इसका अर्थ है कि जब तुम्हारा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तुम इसे एक ऐसी परिस्थिति के रूप में देखते हो जिसकी व्यवस्था परमेश्वर के द्वारा की गई है, ऐसे उत्तरदायित्व के रूप में देखते हो जिसे उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया है, या किसी ऐसे कार्य के रूप में देखते हो जो उसने तुम्हें सौंपा है। जब तुम इस मामले का सामना कर रहे होते हो, तो तुम्हें इसे परमेश्वर से आयी किसी परीक्षा के रूप में भी देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तुम्हारे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुम्हें सोचना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि कैसे इस मामले से इस तरह से निपटा जाए कि तुम अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सको, और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार भी रह सको, इसे कैसे किया जाए कि परमेश्वर क्रोधित न हो, या उसके स्वभाव का अपमान न हो। हमने अभी-अभी भेंटों की सुरक्षा के बारे में बात की। इस मामले में भेंटें शामिल हैं, और इसमें तुम्हारा कर्तव्य, एवं तुम्हारा उत्तरदायित्व भी शामिल है। तुम इस उत्तरदायित्व के प्रति कर्तव्य से बँधे हुए हो। फिर भी जब तुम्हारा सामना इस मामले से होता है, तो क्या कोई प्रलोभन है? हाँ, है! यह प्रलोभन कहाँ से आता है? यह प्रलोभन शैतान की ओर से आता है, और यह मनुष्य की दुष्टता और उसके भ्रष्ट स्वभाव से भी आता है। चूँकि यहाँ प्रलोभन है, इसमें गवाही देने वाली बात आती है, जो लोगों को देनी चाहिए, जो तुम्हारा उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य भी है। कुछ लोग कहते हैं, "यह तो कितना छोटा-सा मसला है; क्या वास्तव में इस बात का बतंगड़ बनाना ज़रूरी है?" हाँ, यह ज़रूरी है! क्योंकि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए, हम किसी भी ऐसी चीज़ को जाने नहीं दे सकते जिसका हमसे लेना-देना है, या जो हमारे आसपास घटती है, यहाँ तक कि छोटी से छोटी चीज़ भी; हमें यह मसला ध्यान देने योग्य लगे या न लगे, अगर उससे हमारा सामना हो रहा है तो हमें उसे जाने नहीं देना चाहिए। इस सबको हमारे लिए परमेश्वर की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। चीज़ों को इस ढंग से देखने की प्रवृत्ति कैसी है? यदि तुम्हारी प्रवृत्ति इस प्रकार की है, तो यह एक तथ्य की पुष्टि करती है : तुम्हारा हृदय परमेश्वर का भय मानता है, और बुराई से दूर रहने के लिए तैयार है। यदि परमेश्वर को संतुष्ट करने की तुम्हारी ऐसी इच्छा है, तो जिसे तुम अभ्यास में लाते हो वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक से दूर नहीं है।

प्रायः ऐसे लोग होते हैं जो मानते हैं कि ऐसे मामले जिन पर लोगों के द्वारा अधिक ध्यान नहीं दिया जाता, और जिनका सामान्यतः उल्लेख नहीं किया जाता, वो महज छोटी-मोटी निरर्थक बातें होती हैं, और उनका सत्य को अभ्यास में लाने से कोई लेना-देना नहीं है। जब इन लोगों के सामने ऐसे मामले आते हैं, तो वे उस पर अधिक विचार नहीं करते और उसे जाने देते हैं। परन्तु वास्तव में, यह मामला एक सबक है जिसका तुम्हें अध्ययन करना चाहिए, यह एक सबक कि किस प्रकार परमेश्वर का भय मानना है, और किस प्रकार बुराई से दूर रहना है। इसके अतिरिक्त, जिस बारे में तुम्हें और भी अधिक चिंता करनी चाहिए वह यह जानना है कि जब यह मामला तुम्हारे सामने आता है तो परमेश्वर क्या कर रहा है। परमेश्वर ठीक तुम्हारी बगल में है, तुम्हारे प्रत्येक शब्द और कर्म का अवलोकन कर रहा है, तुम्हारे क्रियाकलापों, तुम्हारे मन में हुए परिवर्तनों का अवलोकन कर रहा है—यह परमेश्वर का कार्य है। कुछ लोग पूछते हैं, "अगर ये सच है, तो मुझे यह महसूस क्यों नहीं होता है?" तुमने इसका एहसास नहीं किया है क्योंकि तुम परमेश्वर के भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को अपना प्राथमिक मार्ग मानकर इसके मुताबिक नही चले हो; इसलिए, तुम मनुष्य में परमेश्वर के सूक्ष्म कार्य को महसूस नहीं कर पाते, जो लोगों के भिन्न-भिन्न विचारों और भिन्न-भिन्न कार्यकलापों के अनुसार स्वयं को अभिव्यक्त करता है। तुम एक चंचलचित्त वाले व्यक्ति हो। बड़ा मामला क्या है? छोटा मामला क्या है? उन सभी मामलों को बड़े और छोटे मामलों में विभाजित नहीं किया जाता जिसमें परमेश्वर के मार्ग पर चलना शामिल है, पर क्या तुम लोग उसे स्वीकार कर सकते हो? (हम इसे स्वीकार कर सकते हैं।) प्रतिदिन के मामलों के संबंध में, कुछ मामले ऐसे होते हैं जिन्हें लोग बहुत बड़े और महत्वपूर्ण मामले के रूप में देखते हैं, और अन्य मामलों को छोटे-मोटे निरर्थक मामलों के रूप में देखा जाता है। लोग प्रायः इन बड़े मामलों को अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों के रूप में देखते हैं, और वे उन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा गया मानते हैं। हालाँकि, इन बड़े मामलों के चलते रहने के दौरान, अपने अपरिपक्व आध्यात्मिक कद के कारण, और अपनी कम क्षमता के कारण, मनुष्य प्रायः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने योग्य नहीं होता, कोई प्रकाशन प्राप्त नहीं कर पाता, और ऐसा कोई वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता जो किसी मूल्य का हो। जहाँ तक छोटे-छोटे मामलों की बात है, लोगों द्वारा इनकी अनदेखी की जाती है, और थोड़ा-थोड़ा करके हाथ से फिसलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार, लोगों ने परमेश्वर के सामने जाँचे जाने, और उसके द्वारा परीक्षण किए जाने के अनेक अवसरों को गँवा दिया है। यदि तुम हमेशा लोगों, चीज़ों, मामलों और परिस्थितियों को अनदेखा कर देते हो जिनकी व्यवस्था परमेश्वर तुम्हारे लिए करता है, तो इसका क्या अर्थ होगा? इसका अर्थ है कि हर दिन, यहाँ तक कि हर क्षण, तुम अपने बारे में परमेश्वर की पूर्णता का और परमेश्वर की अगुवाई का परित्याग कर रहे हो। जब कभी परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिस्थिति की व्यवस्था करता है, तो वह गुप्त रीति से देख रहा होता है, तुम्हारे हृदय को देख रहा होता है, तुम्हारी सोच और विचारों को देख रहा होता है, देख रहा होता है कि तुम किस प्रकार सोचते हो, किस प्रकार कार्य करोगे। यदि तुम एक लापरवाह व्यक्ति हो—ऐसे व्यक्ति जो परमेश्वर के मार्ग, परमेश्वर के वचन, या जो सत्य के बारे में कभी भी गंभीर नहीं रहा है—तो तुम उसके प्रति सचेत नहीं रहोगे, उस पर ध्यान नहीं दोगे जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, न उन अपेक्षाओं पर ध्यान दोगे जिन्हें वो तुमसे तब पूरा करवाना चाहता था जब उसने तुम्हारे लिए परिस्थितियों की व्यवस्था की थी। तुम यह भी नहीं जानोगे कि लोग, चीज़ें, और मामले जिनका तुम लोग सामना करते हो वे किस प्रकार सत्य से या परमेश्वर के इरादों से संबंध रखते हैं। तुम्हारे इस प्रकार बार-बार परिस्थितियों और परीक्षणों का सामना करने के पश्चात्, जब परमेश्वर तुममें कोई परिणाम नहीं देखता, तो परमेश्वर कैसे आगे बढ़ेगा? बार-बार परीक्षणों का सामना करके, तुमने अपने हृदय में परमेश्वर को महिमान्वित नहीं किया है, न ही तुमने उन परिस्थितियों का अर्थ समझा है जिनकी व्यवस्था परमेश्वर ने तुम्हारे लिए की है—परमेश्वर के परीक्षण और परीक्षाएँ। इसके बजाय, तुमने एक के बाद एक उन अवसरों को अस्वीकार कर दिया जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किए, तुमने बार-बार उन्हें हाथ से जाने दिया। क्या यह मनुष्य के द्वारा बहुत बड़ी अवज्ञा नहीं है? (हाँ, है।) क्या इसकी वजह से परमेश्वर दुखी होगा? (वह दुखी होगा।) परमेश्वर दुखी नहीं होगा! मुझे इस प्रकार कहते हुए सुनकर तुम लोगों को एक बार फिर झटका लगा है। तुम सोच रहे होगे : "क्या ऐसा पहले नहीं कहा गया था कि परमेश्वर हमेशा दुखी होता है? इसलिए क्या परमेश्वर दुखी नहीं होगा? तो परमेश्वर दुखी कब होता है?" संक्षेप में, परमेश्वर इस स्थिति से दुखी नहीं होगा। तो उस प्रकार के व्यवहार के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जिसके बारे में ऊपर बताया गया है? जब लोग परमेश्वर द्वारा भेजे गए परीक्षणों, परीक्षाओं को अस्वीकार करते हैं, जब वे उनसे बच कर भागते हैं, तो इन लोगों के प्रति परमेश्वर की केवल एक ही प्रवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपने हृदय की गहराई से ठुकरा देता है। यहाँ "ठुकराने" शब्द के दो अर्थ हैं। मैं उन्हें अपने दृष्टिकोण से किस प्रकार समझाऊँ? गहराई में, यह शब्द घृणा का, नफ़रत का संकेतार्थ लिए हुए है। दूसरा अर्थ क्या? दूसरे भाग का तात्पर्य है किसी चीज़ को त्याग देना। तुम लोग जानते हो कि "त्याग देने" का क्या अर्थ है, ठीक है न? संक्षेप में, ठुकराने का अर्थ है ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की अंतिम प्रतिक्रिया और प्रवृत्ति जो इस तरह से व्यवहार कर रहे हैं; यह उनके प्रति भयंकर घृणा है, और चिढ़ है, इसलिए उनका परित्याग करने का निर्णय लिया जाता है। यह ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का अंतिम निर्णय है जो परमेश्वर के मार्ग पर कभी नहीं चला है, जिसने कभी भी परमेश्वर का भय नहीं माना है और जो कभी भी बुराई से दूर नहीं रहा है। क्या अब तुम लोग इस कहावत के महत्व को समझ गए जो मैंने कही थी?

क्या अब वह तरीका तुम्हारी समझ में आ गया है जिसे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए उपयोग करता है? (वह हर दिन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की व्यवस्था करता है।) "वह भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की व्यवस्था करता है"—ये वो चीज़ें हैं जिन्हें लोग महसूस और स्पर्श कर सकते हैं। तो ऐसा करने के पीछे परमेश्वर की मंशा क्या है? मंशा यह है कि परमेश्वर हर एक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न तरीकों से, भिन्न-भिन्न समय पर, और भिन्न-भिन्न स्थानों पर परीक्षाएँ लेना चाहता है। किसी परीक्षा में मनुष्य के किन पहलुओं को जाँचा जाता है? परीक्षण यह तय करता है कि क्या तुम हर उस मामले में परमेश्वर का भय मानते हो और बुराई से दूर रहते हो जिसका तुम सामना करते हो, जिसके बारे में तुम सुनते हो, जिसे तुम देखते हो, और जिसका तुम व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो। हर कोई इस प्रकार के परीक्षण का सामना करेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष है। तुममें से कुछ लोग कहते हैं, "मैंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है; ऐसा कैसे है कि मैंने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया?" तुम्हें लगता है कि तुमने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया है क्योंकि जब भी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए परिस्थितियों की व्यवस्था की, तुमने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया, और परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं चाहा। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के परीक्षण का कोई बोध ही नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, "मैंने कुछ परीक्षणों का सामना तो किया है, किन्तु मैं अभ्यास करने के उचित तरीके को नहीं जानता। जब मैंने अभ्यास किया तो भी मुझे पता नहीं कि मैं परीक्षण के दौरान डटा रहा था या नहीं।" इस प्रकार की अवस्था वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है। तो फिर वह कौन-सा मानक है जिससे परमेश्वर लोगों को मापता है? मानक वही है जो मैंने कुछ देर पहले कहा था : जो कुछ भी तुम करते हो, सोचते हो, व्यक्त करते हो, उसमें तुम परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हो या नहीं। इसी प्रकार से यह निर्धारित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। यह अवधारणा सरल है या नहीं? इसे कहना तो आसान है, किन्तु क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? (यह इतना आसान नहीं है।) यह इतना आसान क्यों नहीं है? (क्योंकि लोग परमेश्वर को नहीं जानते, नहीं जानते कि परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य को पूर्ण बनाता है, इसलिए जब उनका सामना समस्याओं से होता है तो वे नहीं जानते कि समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य की खोज कैसे करें। परमेश्वर का भय मानने की वास्तविकता को अंगीकृत करने से पहले, लोगों को भिन्न-भिन्न परीक्षणों, शुद्धिकरणों, ताड़नाओं, और न्यायों से होकर गुज़रना पड़ता है।) तुम इसे उस ढंग कह सकते हो, परन्तु जहाँ तक तुम लोगों का संबंध है, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना इस वक्त आसानी से करने योग्य प्रतीत होता है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ? क्योंकि तुम लोगों ने बहुत से धर्मोपदेशों को सुना है, और सत्य-वास्तविकता की सिंचाई को अच्छी मात्रा में प्राप्त किया है; इससे तुम लोग यह समझ गए हो कि किस प्रकार सिद्धान्त और सोच के संबंध में परमेश्वर का भय मानना है और बुराई से दूर रहना है। परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के तुम लोगों के अभ्यास के संबंध में, यह सब सहायक रहा है और इसने तुम लोगों को महसूस करवाया है कि इसे आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। तब क्यों लोग वास्तव में इसे कभी प्राप्त नहीं कर पाते? क्योंकि मनुष्य का स्वभाव-सार परमेश्वर का भय नहीं मानता, और बुराई को पसंद करता है। यही वास्तविक कारण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 10

परमेश्वर का भय न मानना और बुराई से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आज तुम लोग परमेश्वर के आमने-सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हो; परमेश्वर के बारे में तुम लोगों का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक है। मैं यह बात क्यों कह रहा हूँ? ये बातें कहने का मेरा क्या अभिप्राय है? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ : अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था; लेकिन आजकल लोग ऐसा करने में असफल क्यों रहते हैं? (क्योंकि वे बुरी तरह से भ्रष्ट हैं।) "बुरी तरह से भ्रष्ट"—यह एक सतही घटना है, लेकिन मैं कभी इसे इस तरह नहीं देखूँगा। तुम लोग प्रायः इस्तेमाल किए जाने वाले सिद्धांतों और शब्दों को अपनाते हो, जैसे कि "बुरी तरह से भ्रष्ट," "परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अवज्ञा," "सत्य को पसंद न करना", वगैरह-वगैरह, और हर एक समस्या के सार की व्याख्या करने के लिए तुम लोग इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक दोषपूर्ण तरीका है। भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के मामलों को समझाने के लिए एक ही उत्तर का उपयोग करना सत्य और परमेश्वर की निंदा करने के संदेह उत्पन्न करता है; मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसंद नहीं है। इसके बारे में अच्छी तरह सोचो! तुममें से किसी ने भी इस मामले पर विचार नहीं किया है, परन्तु मैं इसे हर दिन देख सकता हूँ, और हर दिन इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, जब तुम लोग कार्य कर रहे होते हो, तो मैं देख रहा होता हूँ। जब तुम लोग ये कर रहे होते हो, तब तुम इस मामले के सार को महसूस नहीं पाते। किंतु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को भी देख सकता हूँ, और मैं इसके सार को महसूस भी कर सकता हूँ। तो फिर यह सार क्या है? इन दिनों लोग परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान पाते और बुराई से दूर क्यों नहीं रह पाते? तुम लोगों के उत्तर दूर-दूर तक इस प्रश्न के सार की व्याख्या नहीं कर सकते, न ही वे इस प्रश्न के सार का समाधान कर सकते हैं। क्योंकि इसका एक स्रोत है जिसके बारे में तुम लोग नहीं जानते। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम लोग इस बारे में सुनना चाहते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को इस समस्या के स्रोत के बारे में बताऊँगा।

जब से परमेश्वर ने कार्य की शुरुआत की, तब से उसने मनुष्य को कैसे देखा है? परमेश्वर ने मनुष्य को बचाया; वह मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में, उस रूप में देखा है जिसे वह जीतना और बचाना चाहता था, जिसे वह पूर्ण करना चाहता था। अपने कार्य के आरंभ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अपरिचित था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति ने सही परिणाम नहीं दिए, और मनुष्य इस बारे स्पष्ट नहीं था कि उसे परमेश्वर के साथ कैसे पेश आना चाहिए। इसलिए उसने परमेश्वर के साथ मनमाना व्यवहार किया और जैसा चाहा वैसा किया। क्या परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण था? आरंभ में नहीं था; परमेश्वर के संबंध में मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण उसके बारे में बस कुछ धारणाओं और कल्पनाओं तक ही सीमित था। जो कुछ लोगों की धारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया, और जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया, लेकिन मन ही मन एक संघर्ष चल रहा था और वे उसका विरोध करते थे। आरंभ में यह मनुष्य और परमेश्वर का संबंध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी-सा व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समयावधि के पश्चात्, मनुष्य की समझ में आ गया कि परमेश्वर क्या प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि वही सच्चा परमेश्वर है; वे यह भी जान गए थे कि वे परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकते हैं। उस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में देखता था? मनुष्य अनुग्रह, आशीष एवं प्रतिज्ञाएँ पाने की आशा करते हुए परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में देखता था। उस समय परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में देखता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में देखता था। परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने, उसकी परीक्षा लेने, उसका परीक्षण करने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। किन्तु उस समय जहाँ तक मनुष्य का संबंध था, परमेश्वर एक वस्तु था जिसे वह अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकता था। लोगों ने देखा कि परमेश्वर द्वारा जारी सत्य उन पर विजय पा सकता है, उन्हें बचा सकता है, उनके पास उन चीज़ों को जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे और उस मंज़िल को जिसे वे चाहते थे, प्राप्त करने का एक अवसर है। इस कारण, उनके हृदय में थोड़ी सी ईमानदारी आ गयी, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार हो गए। कुछ समय बीत गया, और लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ सतही और सैद्धांतिक ज्ञान हो जाने से, ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर और उसके द्वारा कहे गए वचनों के साथ, उसके उपदेशों के साथ, उस सत्य के साथ जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ "परिचित" होने लगे थे। इसलिए, लोग इस गलतफहमी का शिकार हो गए कि परमेश्वर अब अजनबी नहीं रहा, और वे पहले ही परमेश्वर के अनुरूप होने के पथ पर चल पड़े हैं। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत से धर्मोपदेश सुने हैं, और परमेश्वर के बहुत से कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी भिन्न-भिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेप एवं अवरोधों के कारण, अधिकांश लोग सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते, न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर पाते हैं। लोग उत्तरोत्तर आलसी होते जा रहे हैं, और उनके आत्मविश्वास में उत्तरोत्तर कमी आती जा रही है। वे उत्तरोत्तर महसूस कर रहे हैं कि उनका परिणाम अज्ञात है। वे कोई अनावश्यक विचार लेकर नहीं आते, और कोई प्रगति नहीं करते; वे बस अनमने ढंग से अनुसरण करते हैं, और धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहते हैं। मनुष्य की वर्तमान अवस्था के संबंध में, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है कि वह मनुष्य को ये सत्य प्रदान करे, उसके मन में अपना मार्ग बैठा दे, और फिर भिन्न-भिन्न तरीकों से मनुष्य को जाँचने के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की व्यवस्था करे। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सत्यों, और अपने कार्य को लेकर ऐसा परिणाम उत्पन्न करना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सके और बुराई से दूर रह सके। मैंने देखा है कि अधिकांश लोग बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धांत मान लेते हैं, उस कागज़ पर लिखे शब्दों के रूप में मानते हैं, और पालन किए जाने वाले विनियमों के रूप में मानते हैं। जब वे कार्य करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षणों का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते जिसका उन्हें पालन करना चाहिए। यह बात विशेष रूप से तब लागू होती है जब लोगों का बड़े परीक्षणों से सामना होता है; मैंने किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की दिशा में अभ्यास करते नहीं देखा। इस वजह से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है! परमेश्वर द्वारा लोगों का बार-बार, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, परीक्षण कर लेने पर भी उनमें यह दृढ़संकल्प प्रदर्शित करने की कोई स्पष्ट प्रवृत्ति नहीं होती कि "मैं परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना चाहता हूँ!" चूँकि लोगों का ऐसा दृढ़संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते, इसलिए उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति अब वैसी नहीं है जैसी पहले थी, जब उसने उन पर दया दिखायी थी, सहनशीलता, सहिष्णुता और धैर्य प्रदान किया था। बल्कि वह मनुष्य से बेहद निराश है। किसने ये निराशा पैदा की? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अपने अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक माँगें की हैं, और मनुष्य के लिए उसने अनेक परिस्थितियों की व्यवस्था की है। चाहे मनुष्य ने कैसा ही प्रदर्शन क्यों न किया हो, और परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति कैसी भी क्यों न हो, मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास करने में असफल रहा है। मैं इस बात को एक वाक्यांश में समेटूँगा, और उसकी व्याख्या करने के लिए इस वाक्यांश का उपयोग करूँगा जिसके बारे में हमने अभी बात की है कि क्यों लोग परमेश्वर के भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर नहीं चल पाते। यह वाक्यांश क्या है! यह वाक्यांश है : परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार को अपना लक्ष्य, अपने कार्य लक्ष्य मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपना शत्रु, अपना विरोधी मानता है। क्या अब तुम लोग इस विषय को अच्छी तरह समझ गए? मनुष्य की प्रवृत्ति क्या है; परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट है। चाहे तुम लोगों ने कितने ही धर्मोपदेश क्यों न सुने हों, जिन चीज़ों का निष्कर्ष तुम लोगों ने स्वयं निकाला है—जैसे कि परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना, परमेश्वर के प्रति समर्पित होना, परमेश्वर के अनुरुप होने के लिए मार्ग खोजना, पूरा जीवन परमेश्वर के लिए खपाने की इच्छा रखना, परमेश्वर के लिए जीना चाहना—मेरे लिए ये चीज़ें होशोहवास में परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं है, जो कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है। ये केवल ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम लोग अनिच्छा से कुछ नियमों का पालन करते हो। यही नियम लोगों को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग से और भी दूर ले जाते हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर रख देते हैं।

आज जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं वह थोड़ा गंभीर है, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अभी भी आशा है कि तुम लोग जब आने वाले अनुभवों से और आने वाले समय से गुज़रोगे तो तुम वो कर सकोगे जो मैंने अभी तुमसे कहा है। परमेश्वर को ऐसी हवाबाज़ी मत समझो कि जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी हो तो वह मौजूद है, पर जब उसका कोई उपयोग न हो तो वह मौजूद नहीं है। अगर तुम्हारे अवचेतन में ऐसे विचार हैं, तो समझो, तुमने परमेश्वर को पहले ही क्रोधित कर दिया है। शायद ऐसे कुछ लोग हों जो कहते हैं, "मैं परमेश्वर को खाली हवाबाज़ी नहीं मानता, मैं हमेशा उससे प्रार्थना करता हूँ, उसे संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ, मेरा हर काम उसकी अपेक्षाओं के दायरे, मानक और सिद्धांतों के अंतर्गत आता है। मैं निश्चित रूप से अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं कर रहा हूँ।" हाँ, जिस ढंग से तुम अभ्यास कर रहे हो वह सही है! किन्तु जब कोई समस्या आती है तो क्या सोचते हो? जब तुम्हारा सामना किसी मसले से होता है तो तुम किस प्रकार अभ्यास करते हो? कुछ लोग महसूस करते हैं कि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे आग्रह करते हैं तो वह मौजूद होता है। किन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने विचारों के अनुसार ही चलना चाहते हैं। इसका मतलब है कि वे परमेश्वर को खाली हवाबाज़ी मानते हैं और ऐसी स्थिति में उनके दिमाग में परमेश्वर नहीं होता। लोग सोचते हैं कि जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत होती तो उसे मौजूद होना चाहिए, न कि तब जब उन्हें उसकी ज़रूरत न हो। लोगों को लगता है कि अभ्यास करने के लिए अपने विचारों के अनुसार चलना ही काफी है। वे मानते हैं कि वे सबकुछ अपने मन-मुताबिक कर सकते हैं; वे सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है। जो लोग वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, और इस प्रकार की अवस्था में हैं—क्या वे खतरे को दावत नहीं दे रहे? कुछ लोग कहते हैं, "चाहे मैं खतरे को बुलावा दे रहा हूँ या नहीं, मैंने अनेक वर्षों से विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मेरा परित्याग नहीं करेगा, क्योंकि मेरे परित्याग को वह सहन नहीं कर सकता।" अन्य लोग कहते हैं, "मैं तो तब से प्रभु में विश्वास करता आ रहा हूँ जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था। करीब चालीस, पचास वर्ष हो गए, समय की दृष्टि से देखा जाये तो मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के अत्यंत योग्य हूँ और मैं जीवित रहने के अत्यंत योग्य हूँ। चार या पाँच दशकों की इस समय अवधि में, मैंने अपने परिवार और अपनी नौकरी का परित्याग कर दिया। जो कुछ मेरे पास था, जैसे धन, हैसियत, मौज-मस्ती, और पारिवारिक समय, मैंने वह सब त्याग दिया; मैंने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन नहीं खाए; मैंने बहुत-सी मनोरंजन की चीज़ों का आनंद नहीं लिया; मैंने बहुत से दिलचस्प जगहों का दौरा नहीं किया, यहाँ तक कि मैंने उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते। यदि इन सब कारणों से परमेश्वर मुझे नहीं बचा सकता, तो यह मेरे साथ अन्याय है और मैं इस तरह के परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता।" क्या इस तरह का दृष्टिकोण रखने वाले लोग काफी संख्या में हैं? (हाँ, काफी हैं।) ठीक है, तो आज मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझने में मदद करता हूँ : इस प्रकार के दृष्टिकोण वाले लोग अपने ही पाँव में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। क्योंकि वे अपनी कल्पनाओं से अपनी आँखें ढक रहे हैं। ये कल्पनाएँ और उनके निष्कर्ष, उस मानक का स्थान ले लेते हैं जिसे परमेश्वर इंसान से पूरा करने की अपेक्षा करता है, और उन्हें परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से रोकता है। यह उन्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का बोध नहीं होने देता, और उन्हें परमेश्वर की प्रतिज्ञा के किसी भी अंश का त्याग करते हुए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर गँवाने का कारण बनता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 11

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम और परिणाम-निर्धारण के मानकों को कैसे तय करता है

इससे पहले कि तुम्हारा अपना कोई दृष्टिकोण या निष्कर्ष हो, तुम्हें सबसे पहले अपने प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति को और वह क्या सोच रहा है, इसे समझना चाहिए, और तब तुम्हें निर्णय लेना चाहिए कि तुम्हारी सोच सही है या नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी समय का माप की इकाई के रूप में उपयोग नहीं किया है, और न ही कभी उसने परिणाम निर्धारित करने के लिए किसी व्यक्ति द्वारा सहे गए कष्ट की मात्रा का उपयोग किया है। तब परमेश्वर किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए मानक के रूप में किसका उपयोग करता है? समय के आधार पर परिणाम-निर्धारण लोगों की धारणाओं के सर्वाधिक अनुरूप होता है। इसके अलावा, ऐसे लोग अक्सर नज़र आ जाएँगे, जिन्होंने किसी समय बहुत कुछ समर्पित किया था, खुद को बहुत खपाया था, बड़ी कीमत चुकायी थी, और बहुत कष्ट सहा था। ये वे लोग हैं जिन्हें, तुम लोगों की दृष्टि में, परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकता है। जो कुछ ये लोग दिखाते हैं और जीते हैं, वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए परमेश्वर द्वारा तय मानकों के बारे में लोगों की धारणाओं के अनुरूप है। तुम लोग चाहे जो मानो, मैं एक-एक करके इन उदाहरणों को सूचीबद्ध नहीं करूँगा। संक्षेप में, अगर कोई चीज़ परमेश्वर की सोच के अनुसार मानक नहीं है, तो वह मनुष्य की कल्पना की उपज है और ऐसी सारी चीज़ें उसकी धारणाएँ हैं। अगर तुम आँख बंद करके अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर ही ज़ोर देते रहो, तो क्या परिणाम होगा? स्पष्ट रूप से, इसका परिणाम केवल परमेश्वर के द्वारा तुम्हें ठुकराना हो सकता है। क्योंकि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने अपनी योग्यताओं का दिखावा करते हो, परमेश्वर से स्पर्धा करते हो, और उससे बहस करते हो, तुम लोग परमेश्वर की सोच को समझने का प्रयास नहीं करते, न ही तुम मानवजाति के प्रति परमेश्वर की इच्छा और प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करते हो। इस तरह तुम सबसे अधिक अपना सम्मान बढ़ाते हो, परमेश्वर का नहीं। तुम स्वयं में विश्वास करते हो, परमेश्वर में नहीं। परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता, न ही वह उनका उद्धार करेगा। यदि तुम इस प्रकार का दृष्टिकोण त्याग सको, और अतीत के अपने उन गलत दृष्टिकोणों को सुधार लो, यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार आगे बढ़ सको, अगर तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अभ्यास कर सको, अगर तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करो, खुद को और परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए अपनी निजी कल्पनाओं, दृष्टिकोणों या आस्था का सहारा न लो, बल्कि सभी मायनों में परमेश्वर के इरादों की खोज करो, मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति का एहसास करो और समझो, परमेश्वर के मानकों पर खरा उतरकर परमेश्वर को संतुष्ट करो, तो यह शानदार बात होगी! इसका अर्थ यह होगा कि तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर कदम रखने वाले हो।

अगर परमेश्वर लोगों के सोचने के ढंग, उनके विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए एक मानक के रूप में नहीं करता, तो वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परमेश्वर के परीक्षणों का उपयोग करने के दो मानक हैं : पहला तो परीक्षणों की संख्या है जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा मानक इन परीक्षणों का लोगों पर परिणाम है। ये दो सूचक हैं जो मनुष्य का परिणाम निर्धारित करते हैं। आओ, अब हम इन दो मानकों पर विस्तार से बात करें।

सबसे पहले, जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करता है (नोट: यह संभव है कि तुम्हारी नज़र में यह परीक्षण छोटा-सा हो और उल्लेख करने लायक भी न हो), तो परमेश्वर तुम्हें स्पष्ट रूप से अवगत कराएगा कि तुम्हारे ऊपर परमेश्वर का हाथ है, और उसी ने तुम्हारे लिए इस परिस्थिति की व्यवस्था की है। तुम्हारे आध्यात्मिक कद की अपरिपक्वता की स्थिति में ही, परमेश्वर तुम्हारी जाँच करने के लिए परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। ये परीक्षण तुम्हारे आध्यात्मिक कद, और तुम जो कुछ समझने और सहन करने योग्य हो, उसके अनुरूप होते हैं। तुम्हारे कौन-से हिस्से की जाँच की जाएगी? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति की जाँच की जाएगी। क्या यह प्रवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है? निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है! इसका विशेष महत्व है! मनुष्य की यह प्रवृत्ति ही वो परिणाम है जो परमेश्वर चाहता है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है, यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। वरना परमेश्वर इस तरह के कार्य में लगकर लोगों पर अपने प्रयास व्यर्थ नहीं करता। इन परीक्षणों के माध्यम से परमेश्वर अपने प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति देखना चाहता है; वह देखना चाहता है कि तुम सही पथ पर हो या नहीं। वह यह भी देखना चाहता है कि तुम परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रह रहे हो या नहीं। इसलिए, समय-विशेष पर चाहे तुम बहुत-सा सत्य समझो या थोड़ा-सा, तुम्हें परमेश्वर के परीक्षण का सामना तो करना ही होगा, और जैसे-जैसे तुम अधिक सत्य समझने लगोगे, परमेश्वर उसी के अनुरूप तुम्हारे लिए परीक्षणों की व्यवस्था करता रहेगा। और जब फिर से तुम्हारा सामना किसी परीक्षण से होगा, तो परमेश्वर देखना चाहेगा कि इस बीच तुम्हारा दृष्टिकोण, तुम्हारे विचार, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। कुछ लोग सोचते हैं, "परमेश्वर हमेशा लोगों की प्रवृत्ति क्यों देखना चाहता है? क्या उसने देखा नहीं कि लोग किस प्रकार सत्य को अभ्यास में लाते हैं? वह अभी भी लोगों की प्रवृत्ति क्यों देखना चाहता है?" यह निरर्थक बात है! चूँकि परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है, तो ज़रूर उसमें परमेश्वर की इच्छा निहित होगी। परमेश्वर हमेशा किनारे रहकर लोगों को देखता है, उनके हर शब्द और कर्म को देखता है, उनके हर कर्म और कृत्य पर नज़र रखता है; उनकी हर सोच और हर विचार का भी अवलोकन करता है। वो लोगों के साथ होने घटने वाली हर घटना को ध्यान में रखता है—उनके नेक कर्मों को, उनके दोषों को, उनके अपराधों को, यहाँ तक कि उनके विद्रोह और विश्वासघात को भी—परमेश्वर उनके परिणाम को निर्धारित करने के लिए इन्हें सबूत के रूप में अपने पास रखता है। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ेगा है, तुम ज़्यादा से ज़्यादा सत्य सुनकर ज़्यादा से ज़्यादा सकारात्मक बातों और जानकारी को स्वीकार करोगे, और तुम अधिक से अधिक सत्य की वास्तविकता प्राप्त करोगे। इस प्रक्रिया के दौरान, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बढ़ेंगी। उसके साथ-साथ, परमेश्वर तुम्हारे लिए और भी कठिन परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। उसका लक्ष्य यह जाँच करना है कि इस बीच परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। निश्चित रूप से, इस दौरान, परमेश्वर तुमसे जिस दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, वह सत्य-वास्तविकता की तुम्हारी समझ के अनुरूप होगा।

जैसे-जैसे तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, वैसे-वैसे वह मानक भी बढ़ता जाएगा जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुमसे करता है। जब तक तुम अपरिपक्व हो, तब तक परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही निम्न मानक देगा; जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद थोड़ा बड़ा होगा, तो परमेश्वर तुम्हें थोड़ा ऊँचा मानक देगा। परन्तु जब तुम सारे सत्य समझ जाओगे तब परमेश्वर क्या करेगा? परमेश्वर तुमसे और भी अधिक बड़े परीक्षणों का सामना करवाएगा। इन परीक्षणों के बीच, परमेश्वर जो तुमसे कुछ पाना चाहता है, जो कुछ तुमसे देखना चाहता है, वो है कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारा गहन ज्ञान और उसके प्रति तुम्हारी सच्ची श्रद्धा। इस समय, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ पहले की तुलना में, जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद अपरिपक्व था, और ऊँची और "अधिक कठोर" होंगी (नोट : लोग शायद इसे कठोर मानें, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत मानता है।) जब परमेश्वर लोगों की परीक्षा लेता है, तो परमेश्वर किस प्रकार की वास्तविकता की रचना करना चाहता है? परमेश्वर लगातार चाहता है कि लोग उसे अपना हृदय दें। कुछ लोग कहेंगे : "मैं अपना हृदय कैसे दे सकता हूँ? मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, अपना घर-बार, रोज़ी-रोटी त्याग दी, खुद को खपा दिया! क्या ये सब परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और कैसे परमेश्वर को अपना हृदय दूँ? क्या ये परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और किस तरह अपना हृदय परमेश्वर को दे सकता हूँ? क्या ऐसा हो सकता है कि वास्तव में ये तरीके परमेश्वर को अपना हृदय देने के नहीं थे? परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षा क्या है?" अपेक्षा बहुत साधारण है। वास्तव में, कुछ लोग परीक्षणों के अलग-अलग चरणों में विभिन्न स्तर पर अपना हृदय पहले ही परमेश्वर को दे चुके होते हैं, परन्तु ज़्यादातर लोग अपना हृदय परमेश्वर को कभी नहीं देते। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब वह देखता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि तुम परमेश्वर के विरोध में खड़े हो या तुम ऐसी स्थिति में खड़े हो जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तुम्हारा हृदय उसकी तरफ है या नहीं। जब तुम अपरिपक्व होते हो और परीक्षणों का सामना कर रहे होते हो, तब तुम्हारा आत्मविश्वास बहुत ही कम होता है, और तुम्हें ठीक से पता नहीं होता कि वह क्या है जिससे तुम परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकते हो, क्योंकि तुम्हें सत्य की एक सीमित समझ है। लेकिन अगर तुम ईमानदारी और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना करो, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो जाओ, परमेश्वर को अपना अधिपति बना सको, और वे चीज़ें अर्पित करने के लिए तैयार हो जाओ जिन्हें तुम अत्यंत बहुमूल्य मानते हो, तो तुम पहले ही उसे अपना दिल दे चुके हो। जब तुम अधिक धर्मोपदेश सुनोगे, और अधिक सत्य समझोगे, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद भी धीरे-धीरे परिपक्व होता जाएगा। इस समय तुमसे परमेश्वर की वे अपेक्षाएँ नहीं होंगी जो तब थीं जब तुम अपरिपक्व थे; उसे तुमसे अधिक ऊँचे स्तर की अपेक्षा होगी। जैसे-जैसे लोग परमेश्वर को अपना हृदय देते हैं, वह परमेश्वर के निकटतर आते हैं; जब लोग सचमुच परमेश्वर के निकट आ जाते हैं, तो उनका हृदय परमेश्वर के प्रति और भी अधिक श्रद्धा रखने लगता है। परमेश्वर को ऐसा ही हृदय चाहिए।

जब परमेश्वर किसी का हृदय पाना चाहता है, तो वह उसकी अनगिनित परीक्षाएँ लेता है। इन परीक्षणों के दौरान, यदि परमेश्वर उस व्यक्ति के हृदय को नहीं पाता है, और या वह उस व्यक्ति में किसी तरह की प्रवृति नहीं देखता—यानी वह उस व्यक्ति को उस तरह से अभ्यास या व्यवहार करते नहीं देखता जिससे परमेश्वर के प्रति उसकी श्रद्धा नज़र आए, और अगर उसे उस व्यक्ति में बुराई से दूर रहने की प्रवृत्ति तथा दृढ़ता नज़र न आए—तो अनगिनत परीक्षणों के बाद, ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का धैर्य टूट जाएगा, और वह उसे बर्दाश्त नहीं करेगा, उसका परीक्षण नहीं लेगा और उस पर कार्य नहीं करेगा। तो उस व्यक्ति के परिणाम के लिए इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उसका कोई परिणाम नहीं होगा। संभव है ऐसे व्यक्ति ने कुछ बुरा न किया हो; संभव है उसने कोई रुकावट या परेशानी पैदा करने के लिए कुछ न किया हो। शायद उसने खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध न किया हो। लेकिन ऐसे व्यक्ति का हृदय परमेश्वर से छिपा रहता है; परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति और दृष्टिकोण कभी स्पष्ट नहीं रहा है, परमेश्वर स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता कि उसका हृदय परमेश्वर को दिया गया है या नहीं या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने का प्रयास कर रहा है या नहीं? ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर का धैर्य जवाब देने लगता है, और अब वह उनके लिए कोई कीमत नहीं चुकायेगा, वह उन पर दया नहीं करेगा, या उन पर कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति के परमेश्वर में विश्वास का जीवन पहले ही समाप्त हो चुका होता है। क्योंकि उन सभी परीक्षणों में जो परमेश्वर ने इस व्यक्ति को दिए हैं, परमेश्वर ने वह परिणाम प्राप्त नहीं किया जो वह चाहता है। इस प्रकार, ऐसे बहुत से लोग हैं जिनमें मैंने कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी नहीं देखी। इसे देखना कैसे संभव है? शायद इस प्रकार के व्यक्तियों ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो, और सतही तौर पर वे बहुत सक्रिय रहे हों, उनका व्यवहार काफी जोशीला रहा हो; उन्होंने बहुत-सी पुस्तकें पढ़ी हों, बहुत से मामलों को सँभाला हो, दर्जनों नोटबुक भर दी हों, और बहुत से वचनों और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली हो। लेकिन, उनमें कभी कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई, परमेश्वर के प्रति उनका दृष्टिकोण अदृश्य रहता है, और उनकी प्रवृत्ति अभी भी अस्पष्ट है। यानी ऐसे व्यक्तियों के हृदय को नहीं देखा जा सकता; वे हमेशा ढके हुए और सीलबंद लिफाफे की तरह रहते हैं—वे परमेश्वर के प्रति सीलबंद रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि परमेश्वर ने उनके सच्चे हदय को कभी देखा ही नहीं होता, उसने अपने प्रति ऐसे व्यक्ति में सच्ची श्रद्धा कभी देखी ही नहीं, और तो और उसने कभी नहीं देखा कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग पर कैसे चलता है। यदि अब तक भी परमेश्वर ने ऐसे व्यक्ति को प्राप्त नहीं किया है, तो क्या वह उन्हें भविष्य में प्राप्त कर सकता है? नहीं! क्या परमेश्वर उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहेगा जिन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता? नहीं! तब ऐसे लोगों के प्रति आज परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें ठुकरा देता है, उन पर ध्यान नहीं देता।) वह उन्हें अनदेखा कर देता है! परमेश्वर ऐसे लोगों पर ध्यान नहीं देता; वह उन्हें ठुकरा देता है। तुम लोगों ने इन बातों को बहुत शीघ्रता से, बहुत सटीकता से याद कर लिया है। ऐसा लगता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है वह सब तुम्हारी समझ में आ गया!

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो परमेश्वर के अनुसरण के आरंभ में, अपरिपक्व और अज्ञानी होते हैं; वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते; न ही वे यह समझते हैं कि वे उसमें विश्वास करने का क्या अर्थ है। वे परमेश्वर में विश्वास करने, उसका अनुसरण करने के मानव-निर्मित और गलत मार्ग को अपना लेते हैं। जब इस प्रकार के व्यक्ति का सामना किसी परीक्षण से होता है, तो उन्हें इसका पता ही नहीं होता; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के प्रति सुन्न होते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या होता है, या किसी परीक्षण के दौरान दृढ़ता से खड़ा रहना क्या होता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को सीमित समय देगा, और इस दौरान, वह उन्हें समझने देगा कि उसके परीक्षण और इरादे क्या हैं। बाद में, इन लोगों को अपना दृष्टिकोण प्रदर्शित करना होता है। जो लोग इस चरण में हैं, उनकी परमेश्वर अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है। जहाँ तक उनकी बात है जिनके कुछ दृष्टिकोण तो हैं फिर भी डगमगाते रहते हैं, जो अपना हृदय परमेश्वर को देना तो चाहते हैं किन्तु ऐसा करने के लिए सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए हैं, जो कुछ मूल सत्यों को अभ्यास में लाने के बावजूद, किसी बड़े परीक्षण से सामने होने पर, छुपना और हार मान लेना चाहते हैं—उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर अभी भी ऐसे लोगों से थोड़ी-बहुत अपेक्षा रखता है। परिणाम उनके दृष्टिकोण एवं प्रदर्शन पर निर्भर करता है। यदि लोग प्रगति करने के लिए सक्रिय नहीं होते तो परमेश्वर क्या करता है? वह उनसे आशा रखना छोड़ देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के तुमसे आशा छोड़ने से पहले ही तुमने स्वयं से आशा छोड़ दी है। इस प्रकार, ऐसा करने के लिए तुम परमेश्वर को दोष नहीं दे सकते, है न? क्या यह उचित है? (हाँ, उचित है।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 12

परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग परमेश्वर की इच्छा, विचारों और मनुष्य के प्रति उसकी प्रवृत्ति पर कभी-कभार ही ध्यान देते हैं। लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते, अतः जब परमेश्वर के इरादों और स्वभाव पर प्रश्न पूछे जाते हैं, तो तुम लोग हड़बड़ा जाते हो; फिर गहरी अनिश्चितता की स्थिति में पड़ जाते हो और फिर या तो अनुमान लगाते हो या दाँव खेलते हो। यह किस तरह की मानसिकता है? इससे एक तथ्य तो साबित होता है कि परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोग उसे हवाबाज़ी समझते हैं और ऐसी चीज़ समझते हैं जिसका एक पल अस्तित्व है और अगले ही पल नहीं है। मैंने ऐसा क्यों कहा? क्योंकि जब भी तुम लोगों के सामने समस्या आती है, तो तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानते। क्यों नहीं जानते? बस अभी नहीं, बल्कि तुम तो आरंभ से लेकर अंत तक नहीं जानते कि इस समस्या को लेकर परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। तुम नहीं जान सकते, तुम नहीं जानते कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, लेकिन क्या तुमने उस पर विचार किया है? क्या तुमने जानने की कोशिश की है? क्या तुमने उस पर संगति की है? नहीं! इससे एक तथ्य की पुष्टि होती है : तुम्हारे विश्वास के परमेश्वर का वास्तविकता के परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में, तुम केवल अपने और अपने अगुआओं के इरादों पर विचार करते हो; और परमेश्वर के वचन के केवल शाब्दिक एवं सैद्धांतिक अर्थ पर विचार करते हो, मगर सच में परमेश्वर की इच्छा को जानने और खोजने की कोशिश नहीं करते। क्या ऐसा ही नहीं होता है? इस मामले का सार बहुत डरावना है! मैंने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को देखा है। उनके विश्वास ने परमेश्वर को उनके मन में क्या आकार दिया है? कुछ लोग तो परमेश्वर में ऐसे विश्वास करते हैं मानो वह मात्र हवाबाज़ी हो। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के बारे में कोई उत्तर नहीं होता क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर पाते, न ही उसका बोध कर पाते हैं, इसे साफ-साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है। कुछ लोग परमेश्वर को मनुष्य समझते हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को करने में असमर्थ है जिन्हें करने में वे भी असमर्थ हैं, और परमेश्वर को वैसा ही सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। उनकी परमेश्वर की परिभाषा एक "अदृश्य और अस्पर्शनीय व्यक्ति" की है। कुछ लोग परमेश्वर को कठपुतली समझते हैं; उन्हें लगता है कि परमेश्वर के अंदर कोई भावनाएँ नहीं होतीं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर मिट्टी की एक मूर्ति है, और जब कोई समस्या आती है, तो परमेश्वर के पास कोई प्रवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, कोई विचार नहीं होता; वे मानते हैं कि वह मानवजाति की दया पर है। जो दिल चाहे लोग उस पर विश्वास कर लेते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान हो जाता है; वे उसे छोटा बनाते हैं, तो वह छोटा हो जाता है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया, सहिष्णुता और प्रेम की आवश्यकता होती है, वे मानते हैं कि परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। ये लोग अपने मन में एक "परमेश्वर" को गढ़ लेते हैं, और फिर उस "परमेश्वर" से अपनी माँगें पूरी करवाते हैं और अपनी सारी इच्छाएँ पूरी करवाते हैं। ऐसे लोग कभी भी, कहीं भी, कुछ भी करें, वे परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में, और परमेश्वर में अपने विश्वास में इसी कल्पना का इस्तेमाल करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी होते हैं, जो परमेश्वर के स्वभाव को भड़काकर भी सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें बचा सकता है, क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, उसका स्वभाव धार्मिक है, चाहे कोई परमेश्वर का कितना भी अपमान करे, परमेश्वर कुछ याद नहीं रखेगा। उन्हें लगता है चूँकि मनुष्य के दोष, अपराध, और उसकी अवज्ञा इंसान के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहिष्णु एवं धैर्यवान रहेगा; परमेश्वर तब भी उनसे पहले की तरह प्रेम करेगा। अतः वे अपने उद्धार की आशा बनाए रखते हैं। वास्तव में, चाहे कोई व्यक्ति परमेश्वर पर कैसे भी विश्वास करे, अगर वह सत्य की खोज नहीं करता, तो परमेश्वर उसके प्रति नकारात्मक प्रवृत्ति रखेगा। क्योंकि जब तुम परमेश्वर पर विश्वास कर रहे होते हो उस समय, भले ही तुम परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखते हो, तुम प्रतिदिन उसका अध्ययन करते हो, उसे पढ़ते हो, फिर भी तुम वास्तविक परमेश्वर को दरकिनार कर देते हो। तुम उसे निरर्थक मानते हो, या मात्र एक व्यक्ति मानते हो, और तुममें से कुछ तो उसे केवल एक कठपुतली ही समझते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जिस प्रकार से मैं इसे देखता हूँ, उसमें चाहे तुम लोगों का सामना किसी मसले से हो या किसी परिस्थिति से, वे बातें जो तुम्हारे अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, जिन बातों को तुम भीतर ही भीतर विकसित करते हो, उनमें से किसी का भी संबंध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज करने से नहीं होता। तुम केवल वही जानते हो जो तुम स्वयं सोच रहे होते हो, जो तुम्हारा अपना दृष्टिकोण होता है, और फिर तुम अपने विचारों, और दृष्टिकोण को ज़बरदस्ती परमेश्वर पर थोप देते हो। तुम्हारे मन में वह परमेश्वर का दृष्टिकोण बन जाता है, और तुम इस दृष्टिकोण को मानक बना लेते हो जिसे तुम दृढ़ता से कायम रखते हो। समय के साथ, इस प्रकार का चिंतन तुम्हें परमेश्वर से निरंतर दूर करता चला जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 13

परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझो और परमेश्वर के बारे में सभी गलत धारणाओं को छोड़ दो

आज जिस परमेश्वर पर तुम लोग विश्वास करते हो, वह किस तरह का परमेश्वर है? क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (हाँ, घृणा करता है।) जब वह अज्ञानी लोगों की गलतियाँ करते देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (दु:ख।) जब वह लोगों को अपनी भेटें चुराते हुए देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है।) यह सब बिलकुल साफ है, है न? जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने प्रति विश्वास में भ्रमित होते हुए, और किसी भी तरह से सत्य की खोज न करते हुए देखता है, तो परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, है न? प्रवृत्ति के तौर पर "भ्रमित होना" कोई पाप नहीं है, न ही यह परमेश्वर का अपमान करता है। लोगों को लगता है कि यह कोई बड़ी भूल नहीं है। तो बताओ, इस मामले में, परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।) "स्वीकार करने के लिए तैयार न होना"—यह कैसी प्रवृत्ति है? इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर उन लोगों को तुच्छ मानकर उनका तिरस्कार करता है! परमेश्वर ऐसे लोगों से निपटने के लिए उनके प्रति उदासीन हो जाता है। उसका तरीका है उन्हें दरकिनार करना, उन पर कोई कार्य न करना जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन के कार्य शामिल हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के कार्य की गिनती में नहीं आते। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हैं? भयंकर घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों से अत्यंत क्रोधित हो जाता है जो उसके स्वभाव को भड़काने को लेकर पश्चाताप नहीं करते! "अत्यंत क्रोधित होना" मात्र एक अनुभूति, एक मनोदशा है; यह एक स्पष्ट प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं होती। परन्तु यह अनुभूति, यह मनोदशा, ऐसे लोगों के लिए परिणाम उत्पन्न करती है : यह परमेश्वर को भयंकर घृणा से भर देगी! इस भयंकर घृणा का परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम यह होता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को दरकिनार कर देता है और कुछ समय तक उन्हें कोई उत्तर नहीं देता। फिर वह "शरद ऋतु के बाद" उन्हें छाँटकर अलग करने की प्रतीक्षा करता है। इसका क्या तात्पर्य है? क्या ऐसे लोगों का तब भी कोई परिणाम होगा? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी भी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! तो क्या यह एकदम सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को कोई उत्तर नहीं देता? (हाँ, सामान्य बात है।) ऐसे लोगों को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें अपने व्यवहार एवं दुष्ट कृत्यों से पैदा हुए नकारात्मक परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए यह परमेश्वर का उत्तर है। इसलिए अब मैं ऐसे लोगों से साफ-साफ कहता हूँ : अब भ्रांतियों को पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में न लगे रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं रहेगा; वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों और अवज्ञा को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे, "मैंने भी इस प्रकार के कुछ लोगों को देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से लगता है कि परमेश्वर उन्हें स्पर्श कर रहा है, और वे फूट-फूट कर रोते हैं। सामान्यतया वे भी बहुत खुश होते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति, और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें मत करो! ज़रूरी नहीं कि फूट-फूट कर रोने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति परमेश्वर द्वारा स्पर्श किया जा रहा हो या परमेश्वर की उपस्थिति आनंद ले रहा हो, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने, उसका परित्याग करने का निश्चय कर लिया है, तो उस व्यक्ति का परिणाम समाप्त हो जाता है। प्रार्थना करते समय किसी की भावनाएँ कितनी ही अनुकूल हों, उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना ही विश्वास हो; उसका कोई परिणाम नहीं होता। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के विश्वास की आवश्यकता नहीं है; परमेश्वर ने पहले ही ऐसे लोगों को ठुकरा दिया है। उनके साथ आगे कैसे निपटा जाए यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि जैसे ही ऐसा इंसान परमेश्वर को क्रोधित करता है, उसका परिणाम निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने तय कर लिया कि ऐसे इंसान को नहीं बचाना, तो उसे दण्डित होने के लिए छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की प्रवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी कर भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। उसके प्रेममय होने का अर्थ यह नहीं है कि लोग खुलकर उसका अपमान कर सकते हैं, ऐसा नहीं है कि उसकी भावनाएँ नहीं भड़केंगी या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होगी। उसमें करुणा होने का अर्थ यह नहीं है कि लोगों से व्यवहार करने का उसका कोई सिद्धांत नहीं है। परमेश्वर सजीव है; सचमुच उसका अस्तित्व है। वह न तो कोई कठपुतली है, न ही कोई वस्तु है। चूँकि उसका अस्तित्व है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें अपनी कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, न ही हमें अपने विचार और इच्छाएँ परमेश्वर पर थोपनी चाहिए, जिससे कि परमेश्वर इंसान के साथ इंसानी कल्पनाओं के आधार पर मानवीय व्यवहार करे। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम उसके कोप को बुलावा देते हो, उसकी महिमा को चुनौती देते हो! एक बार जब तुम लोग इस मसले की गंभीरता को समझ लोगे, मैं तुम लोगों से आग्रह करूँगा कि तुम अपने कार्यकलापों में सावधानी और विवेक का उपयोग करो। अपनी बातचीत में सावधान और विवेकशील रहो। साथ ही, तुम लोग परमेश्वर के प्रति व्यवहार में जितना अधिक सावधान और विवेकशील रहोगे, उतना ही बेहतर होगा! अगर तुम्हें परमेश्वर की प्रवृत्ति समझ में न आ रही हो, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और यूँ ही कोई लेबल न लगा दो। और सबसे महत्वपूर्ण बात, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। बल्कि, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; ये कृत्य भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की अभिव्यक्ति है। सबसे बड़ी बात, यदि तुम ऐसा कर सको, और ऐसी प्रवृत्ति अपना सको, तो परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, अज्ञानता, और चीज़ों के पीछे तर्कों की समझ की कमी के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। बल्कि, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय मानने, उसके इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता के कारण, परमेश्वर तुम्हें याद रखेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धाविहीन होती है—तुम मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करते हो, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाकर उन्हें परिभाषित करते हो—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, बल्कि दण्ड भी देगा; या वह तुम पर टिप्पणी करेगा। हो सकता है कि इस टिप्पणी में ही तुम्हारा परिणाम शामिल हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस बात पर जोर देना चाहता हूँ : परमेश्वर से आने वाली हर चीज़ के प्रति तुम्हें सावधान और विवेकशील रहना चाहिए। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत हो। कुछ भी कहने से पहले रुककर सोचो : क्या मेरा ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर के प्रति श्रद्धा दिखाना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें इन प्रश्नों को समझकर उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर चीज़ में, हर समय, इन सिद्धांतों के अनुसार सही मायने में अभ्यास करो, विशेषरूप से इस तरह की प्रवृत्ति तब अपना सको, जब कोई चीज़ तुम्हारी समझ में न आए, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें अनुसरण योग्य मार्ग देगा। लोग चाहे जो दिखावा करें, लेकिन परमेश्वर सबकुछ स्पष्ट रूप में देख लेता है, और वह तुम्हारे दिखावे का सटीक और उपयुक्त मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तुम अंतिम परीक्षण का अनुभव कर लोगे, तो परमेश्वर तुम्हारे समस्त व्यवहार को लेकर उससे तुम्हारा परिणाम निर्धारित करेगा। यह परिणाम निस्सन्देह हर एक को आश्वस्त करेगा। मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि तुम लोगों का हर कर्म, हर कार्यकलाप, हर विचार तुम्हारे भाग्य को निर्धारित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 14

मनुष्य के परिणाम कौन निर्धारित करता है?

चर्चा करने के लिए एक और बेहद महत्वपूर्ण मामला है, और वह है परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति। यह प्रवृत्ति बेहद अहम है! इससे यह निर्धारित होगा कि तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या उस सुन्दर मंज़िल की ओर जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर पहले ही बीस से अधिक वर्षों तक कार्य चुका है, और इन बीस वर्षों के दौरान शायद तुम लोगों का हृदय तुम्हारे प्रदर्शन को लेकर थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा है। लेकिन, परमेश्वर ने मन ही मन तुममें से हर एक व्यक्ति का एक वास्तविक और सच्चा अभिलेख बना लिया है। जबसे इंसान ने परमेश्वर का अनुसरण करना, उसके उपदेश सुनना, और धीरे-धीरे अधिक सत्य समझना शुरू किया है, तब से लेकर इंसान के अपना कर्तव्य निभाने तक, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के हर एक कार्यकलापों का लेखा-जोखा है। कर्तव्य निभाने, परिस्थितियों, परीक्षणों का सामना करते समय लोगों की प्रवृत्ति क्या होती है? उनका प्रदर्शन कैसा रहता है? मन ही मन वे परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं?...परमेश्वर के पास इन सभी चीज़ों का लेखा-जोखा रहता है; उसके पास सभी चीजों का लेखा-जोखा है। शायद तुम्हारे नज़रिए से, ये मामले भ्रमित करने वाले हों। लेकिन परमेश्वर नज़रिए से, वे मामले एकदम स्पष्ट हैं, उसमें ज़रा-सी भी लापरवाही नहीं होती। इस मामले में हर एक व्यक्ति का परिणाम शामिल है, इसमें, उनके भाग्य और भविष्य की संभावनाएँ सम्मिलित हैं। इससे भी बढ़कर, इसी स्थान पर परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयास लगाता है। इसलिए परमेश्वर कभी इसकी उपेक्षा नहीं करता, न ही वह कोई लापरवाही बर्दाश्त करता है। परमेश्वर शुरु से लेकर अंत तक मनुष्य के परमेश्वर का अनुसरण करने के सारे क्रम का हिसाब-किताब रख रहा है। इस समय के दौरान परमेश्वर के प्रति तुम्हारी जो प्रवृत्ति रही है, उसी ने तुम्हारी नियति तय की है। क्या यह सच नहीं है? क्या अब तुम्हें भरोसा है कि परमेश्वर धार्मिक है? क्या उसके कार्य उचित हैं? क्या तुम्हारे दिमाग में अभी भी परमेश्वर के बारे में दूसरी कल्पनाएँ हैं? (नहीं।) तो क्या तुम लोग कहोगे कि मनुष्य का परिणाम निर्धारित करना परमेश्वर का कार्य है, या स्वयं मनुष्य को निर्धारित करना चाहिए? (इसे परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।) उसे कौन तय करता है? (परमेश्वर।) तुम निश्चित नहीं हो न? हांग कांग के भाई-बहनो, बोलो—इसे कौन निर्धारित करता है? (मनुष्य स्वयं निर्धारित करता है।) क्या मनुष्य स्वयं इसे निर्धारित करता है? तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? दक्षिण कोरिया के भाई-बहनो, बोलो (परमेश्वर लोगों के कार्यकलापों, कर्मों और उस मार्ग के आधार पर उनका परिणाम निर्धारित करता है जिस पर वे चलते हैं।) यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ उत्तर है। मैं यहाँ तुम्हें एक तथ्य बता दूँ : परमेश्वर ने उद्धार के कार्य के दौरान, मनुष्य के लिए एक मानक निर्धारित किया है। और वो मानक यह है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन करे और परमेश्वर के मार्ग में चले। लोगों का परिणाम इसी मानक की कसौटी पर कसा जाता है। यदि तुम परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकते हो; यदि नहीं करते, तो तुम अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते। अब तुम क्या कहोगे, यह परिणाम कौन निर्धारित करता है? इसे अकेला परमेश्वर निर्धारित नहीं करता, बल्कि परमेश्वर और मनुष्य मिलकर निर्धारित करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ।) ऐसा क्यों है? क्योंकि परमेश्वर ही सक्रिय रूप से मनुष्य के उद्धार के कार्य में शामिल होकर मनुष्य के लिए एक खूबसूरत मंज़िल तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, यही वो परिणाम, मंज़िल है जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए तैयार करता है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य न होता, तो परमेश्वर को यह कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती; यदि परमेश्वर ने यह कार्य न कर रहा होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने का कोई अवसर ही न होता। मनुष्यों को बचाना है, और यद्यपि बचाया जाना इस प्रक्रिया का निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की भूमिका निभाने वाले की प्रवृत्ति ही निर्धारित करती है कि मनुष्य को बचाने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं। यदि परमेश्वर तुम्हें मार्गदर्शन न देता, तो तुम उसके मानक को न जान पाते, और न ही तुम्हारा कोई उद्देश्य होता। यदि इस मानक और उद्देश्य के होते हुए भी, तुम सहयोग न करो, इसे अभ्यास में न लाओ, कीमत न चुकाओ, तो तुम्हें यह परिणाम प्राप्त न होगा। इसीलिए, मैं कहता हूँ कि किसी के परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता, और इसे उस व्यक्ति से भी अलग नहीं किया जा सकता। अब तुम लोग जान गए हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 15

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने का प्रयास करते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय पर वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने एक बात पर ध्यान दिया है? क्या तुम लोगों ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति में एक परिवर्तन हुआ है? क्या लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना समस्त प्रेम और करुणा प्रदान करता रहेगा? इस मामले में परमेश्वर का सार भी शामिल है। ... यह जानकर कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, लोग परमेश्वर को प्रेम के प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं : उन्हें लगता है, चाहे लोग कुछ भी करें, कैसे भी पेश आएँ, चाहे परमेश्वर से कैसा ही व्यवहार करें, चाहे वे कितने ही अवज्ञाकारी क्यों न हों जाएँ, किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि परमेश्वर में प्रेम है, परमेश्वर का प्रेम असीमित और अथाह है। परमेश्वर में प्रेम है, इसलिए वह लोगों के साथ सहिष्णु हो सकता है; परमेश्वर में प्रेम है, इसलिए वह लोगों के प्रति करुणाशील हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति करुणाशील हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति करुणाशील हो सकता है, और उनकी अवज्ञा के प्रति करुणाशील हो सकता है। क्या वास्तव में ऐसा ही है? कुछ लोग एक बार या कुछ बार परमेश्वर के धैर्य का अनुभव कर लेने पर, वे इन अनुभवों को परमेश्वर के बारे में अपनी समझ एक पूँजी मानने लगते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनके प्रति हमेशा धैर्यवान और दयालु रहेगा, और फिर जीवन भर परमेश्वर के धैर्य को एक ऐसे मानक के रूप में मानते हैं जिससे परमेश्वर उनके साथ बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, एक बार परमेश्वर की सहिष्णुता का अनुभव कर लेने पर, हमेशा के लिए परमेश्वर को सहिष्णु के रूप में परिभाषित करते हैं, उनकी नज़र में यह सहिष्णुता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ऐसा विश्वास सही है? जब भी परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों पर चर्चा की जाती है, तो तुम लोग उलझन में दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस तरह देखना मुझे बहुत चिंतित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत से सत्य सुने हैं; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से संबंधित बहुत-सी चर्चाएँ भी सुनी हैं। लेकिन, तुम लोगों के मन में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई, सिद्धांत और लिखित वचनों पर आधारित मात्र स्मृतियाँ हैं। तुममें से कोई भी अपने दैनिक जीवन में, यह अनुभव करने या देखने में सक्षम नहीं है कि वास्तव में परमेश्वर का स्वभाव क्या है। इसलिए, तुम सभी लोग अपने-अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम आँखें मूँदकर इस हद तक विश्वास करते हो कि परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की प्रवृत्ति श्रद्धाहीन हो जाती है, बल्कि तुम लोग उसे एक ओर धकेल भी देते हो। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम हमेशा परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष निकालते रहते हो। थोड़ा सा ज्ञान मिलते ही तुम एकदम संतुष्ट हो जाते हो, जैसे कि तुमने परमेश्वर को उसकी संपूर्णता में पा लिया हो। उसके बाद, तुम लोग निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम उसे स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने नहीं देते। इसके अलावा, परमेश्वर जब कभी भी कुछ नया करता है, तो तुम स्वीकार नहीं करते कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहेगा : "मैं मनुष्य से अब प्रेम नहीं करता; अब मैं मनुष्य पर दया नहीं करूँगा; अब मनुष्य के प्रति मेरे मन में सहिष्णुता या धैर्य नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ", तो लोगों के दिल में द्वंद्व पैदा हो जाएगा। कुछ लोग तो यहाँ तक कहेंगे, "अब तुम हमारे परमेश्वर नहीं हो, ऐसे परमेश्वर नहीं हो जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। यदि तुम ऐसा कहते हो, तो अब तुम मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं हो, और मुझे तुम्हारा अनुसरण करते रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम मुझे करुणा, प्रेम सहिष्णुता नहीं दोगे तो मैं तुम्हारा अनुसरण नहीं करूँगा। यदि तुम अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहिष्णु बने रहते हो, धैर्यवान बने रहते हो, और मुझे देखने देते हो कि तुम प्रेम हो, धैर्य हो, सहिष्णुता हो, तभी मैं तुम्हारा अनुसरण कर सकता हूँ, और तभी मेरे अंदर अंत तक तुम्हारा अनुसरण करने का आत्मविश्वास आ सकता है। चूँकि मेरे पास तुम्हारा धैर्य और करुणा है, तो मेरी अवज्ञा और अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, मैं किसी भी समय और कहीं पर भी पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और कहीं पर भी पाप स्वीकार कर माफी पा सकता हूँ, और किसी भी समय और कहीं पर भी मैं तुम्हें क्रोधित कर सकता हूँ। तुम मेरे बारे में कोई राय नहीं रख सकते और निष्कर्ष नहीं निकाल सकते।" यद्यपि तुममें से कोई भी ऐसे मसलों पर आत्मनिष्ठ या सचेतन रूप से न सोचे, फिर भी जब कभी परमेश्वर को तुम अपने पापों को क्षमा करने का कोई यंत्र या एक खूबसूरत मंज़िल पाने के लिए उपयोग की जाने वाली कोई वस्तु समझते हो, तो तुमने धीरे से जीवित परमेश्वर को अपने विरोधी, अपने शत्रु के स्थान पर रख लिया है। मैं तो यही देखता हूँ। भले ही तुम ऐसी बातें कहते रहो, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ"; "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव से आज़ाद होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को समर्पित होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना चाहता हूँ, और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाना चाहता हूँ"; इत्यादि। लेकिन, तुम्हारी बातें कितनी ही मधुर हों, चाहे तुम्हें कितने ही सिद्धांतों का ज्ञान हो, चाहे वह सिद्धांत कितना ही प्रभावशाली या गरिमापूर्ण हो, लेकिन सच्चाई यही है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने पहले से ही जान लिया है कि किस प्रकार परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए उन नियमों, मतों और सिद्धांतों का उपयोग करना है जिन पर तुम लोगों ने महारत हासिल कर ली है, और स्वाभाविक है कि ऐसा करके तुमने परमेश्वर को अपने विरुद्ध कर लिया है। हालाँकि तुमने शब्दों और सिद्धांतों में महारत हासिल कर ली है, फिर भी तुमने असल में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे लिए परमेश्वर के करीब होना, उसे जानना-समझना बहुत कठिन है। यह बेहद खेद योग्यहै!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 16

उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

ऐसे लोग हर जगह होते हैं : परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाने के बाद, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप बिना अलविदा कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका दिल चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि ऐसे लोग छोड़कर क्यों चले जाते हैं; पहले हम यह देखेंगे कि ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस समय ऐसे लोग छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। इसे वो लोग नहीं, बल्कि परमेश्वर समाप्त करता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर को छोड़कर जाने का अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, यानी अब वे परमेश्वर को नहीं चाहते, अब उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार्य नहीं है। चूँकि ऐसे लोग परमेश्वर को नहीं चाहते, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाह सकता है? इसके अतिरिक्त, जब इस प्रकार के लोगों की प्रवृत्ति और दृष्टिकोण ऐसा है और वे परमेश्वर को छोड़ने पर अडिग हो चुके हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। इस तथ्य के बावजूद कि शायद आवेश में आकर, उन्होंने परमेश्वर को न कोसा हो, उनके व्यवहार में कोई नीचता या ज़्यादती न रही हो, और इस तथ्य के बावजूद कि ऐसे लोग सोच रहे हों, "यदि कभी ऐसा दिन आया जब मुझे बाहर भरपूर खुशियाँ मिलीं, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता हुई, तो मैं वापस आ जाऊँगा। या कभी परमेश्वर मुझे बुलाए, तो मैं वापस आ जाऊँगा," या वे कहते हैं, "अगर मैं कभी बाहर की दुनिया में चोट खाऊँ, या कभी यह देखूँ कि बाहरी दुनिया अत्यंत अंधकारमय और दुष्ट है और अब मैं उस प्रवाह के साथ नहीं बहना चाहता, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आ जाऊँगा।" भले ही ऐसे लोग अपने मन में इस तरह का हिसाब-किताब लगाएँ कि कब उन्हें वापस आना है, भले ही वे अपनी वापसी के लिए द्वार खुला छोड़कर रखने की कोशिश करें, फिर भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि वे चाहे जो सोचें और कैसी भी योजना बनाएँ, यह सब उनकी खुशफहमी है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट होते हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। जिस पल वे परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करते हैं, परमेश्वर उसी पल उन्हें पूरी तरह से छोड़ चुका होता है; परमेश्वर पहले ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर चुका होता है। वह परिणाम क्या है? ऐसा व्यक्ति चूहों में से ही एक चूहा होगा और उन्हीं के साथ नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति देखते हैं : कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, लेकिन उसे दण्ड नहीं मिलता। परमेश्वर अपने सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; कुछ चीज़ें देखने में आती हैं, और कुछ चीज़ें परमेश्वर के हृदय में ही तय होती हैं, इसलिए लोग परिणाम नहीं देख पाते। जो हिस्सा लोग देख पाते हैं वह आवश्यक नहीं कि चीज़ों का सही पक्ष हो, परन्तु दूसरा पक्ष होता है, जिसे तुम देख नहीं पाते—उसी में परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष निहित होते हैं।

परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाने वाले लोग सच्चे मार्ग का परित्याग कर देते हैं

तो, परमेश्वर ऐसे लोगों को इतना कठोर दंड कैसे दे सकता है? परमेश्वर उन पर इतना क्रोधित क्यों है? पहली बात तो, हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप और कोप है; वह कोई भेड़ नहीं है, जिसका वध किया जाए; वह कठपुतली तो बिल्कुल नहीं है जिसे लोग जैसा चाहें, वैसा नचाएँ। उसका अस्तित्व निरर्थक भी नहीं है कि उसपर धौंस जमाई जाए। यदि तुम वास्तव में मानते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हें परमेश्वर का भय मानना चाहिए, और तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं किया जा सकता। वह क्रोध किसी शब्द से पैदा हो सकता है या शायद किसी विचार से या शायद किसी अधम और हल्के व्यवहार से, किसी ऐसे व्यवहार से जो मनुष्य की नज़र में और नैतिकता की दृष्टि से महज़ कामचलाऊ हो; या वह किसी मत, सिद्धांत से भी भड़क सकता है। लेकिन, अगर एक बार तुमने परमेश्वर को क्रोधित कर दिया, तो समझो तुम्हारा अवसर गया, और तुम्हारे अंत के दिन आ गए। यह बेहद खराब बात है! यदि तुम इस बात को नहीं समझते कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए, तो शायद तुम परमेश्वर से नहीं डरते और शायद तुम उसे अक्सर अपमानित करते रहते हो। अगर तुम नहीं जानते कि परमेश्वर से कैसे डरना चाहिए, तो तुम परमेश्वर से नहीं डर पाओगे, और नहीं जान पाओगे कि परमेश्वर के सच्चे मार्ग पर कैसे चलना है—यानी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर। एक बार जब तुम जान गए और सचेत हो गए कि परमेश्वर को अपमानित नहीं करना चाहिए, तो तुम समझ जाओगे कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या होता है।

परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सच्चे मार्ग पर चलने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सत्य से कितने परिचित हो, तुमने कितने परीक्षणों का अनुभव किया है, या तुम कितने अनुशासित हो। बल्कि यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है, और तुम कौन-सा सार व्यक्त करते हो। लोगों का सार और उनकी आत्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ—ये अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रमुख बातें हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गए हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी कुत्सित प्रवृत्ति ने और सत्य से घृणा करने वाले उनके हृदय ने परमेश्वर के स्वभाव को पहले ही भड़का दिया है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है, उन्हें कभी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जान लिया है, उनके पास यह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का अनुभव भी कर लिया है। उनका चला जाना छले जाने या भ्रमित हो जाने का मामला नहीं था, ऐसा तो और भी नहीं कि उन्हें जाने के लिए बाध्य किया गया हो। बल्कि उन्होंने होशोहवास में, सोच-समझ कर परमेश्वर को छोड़कर जाने का विकल्प चुना। उनका जाना अपने मार्ग को खोना नहीं था, न ही उन्हें दरकिनार किया गया। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे लोग कोई मेमने नहीं हैं, जो झुंड से भटक गए हों, भटके हुए फिज़ूलखर्च पुत्र होने की तो बात ही छोड़ दो। वे दंड से मुक्त हो कर गए हैं और ऐसी दशा, ऐसी स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और उसका यही क्रोध उन्हें निराशाजनक परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? इसलिए यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते, तो वे परमेश्वर को अपमानित कर सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि लोग परमेश्वर की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेते, और यह मानकर चलते हैं कि परमेश्वर उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की खोई हुई भेड़ हैं और परमेश्वर अभी भी उनके हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहा है, तो फिर ऐसे लोग दंड के दिन से बहुत दूर नहीं हैं। परमेश्वर उन्हें केवल अस्वीकार ही नहीं करेगा—बल्कि चूँकि उन्होंने दूसरी बार उसके स्वभाव को क्रोधित किया है, इसलिए यह और भी अधिक भयानक बात है! ऐसे लोगों की श्रद्धाहीन प्रवृत्ति पहले ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर चुकी है। क्या वह अब भी उन्हें स्वीकार करेगा? इस मामले में परमेश्वर के सिद्धांत हैं कि यदि कोई व्यक्ति सत्य मार्ग के विषय में निश्चित है, फिर भी वह जानबूझकर और स्पष्ट मन से परमेश्वर को अस्वीकार करता है और उसे छोड़कर चला जाता है, तो परमेश्वर ऐसे व्यक्ति के उद्धार-मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, उसके बाद राज्य के दरवाजे उस व्यक्ति के लिए बंद कर दिए जाएँगे। जब ऐसा व्यक्ति फिर से आकर द्वार खटखटाएगा, तो परमेश्वर द्वार नहीं खोलेगा; वह सदा के लिए बाहर ही रह जाएगा। शायद तुम में से किसी ने बाइबल में मूसा की कहानी पढ़ी हो। मूसा को परमेश्वर द्वारा अभिषिक्त कर दिए जाने के बाद, 250 अगुआओं ने मूसा के कार्यकलापों और कई अन्य कारणों से उसके प्रति अपनी असहमति व्यक्त की। उन्होंने किसके आगे समर्पित होने से इनकार किया? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने से इनकार किया; उन्होंने इस मामले में परमेश्वर के कार्य को मानने से इनकार किया था। उन्होंने निम्नलिखित बातें कहीं : "तुम ने बहुत किया, अब बस करो; क्योंकि सारी मण्डली का एक एक मनुष्य पवित्र है, और यहोवा उनके मध्य में रहता है...।" क्या इंसानी नज़रिए से, ये बातें बहुत गंभीर हैं? गंभीर नहीं हैं! कम-से-कम शाब्दिक अर्थ तो गंभीर नहीं है। कानूनी नज़रिए से भी, वे कोई नियम नहीं तोड़ते, क्योंकि देखने में यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, इसमें ईश-निन्दा जैसी कोई बात तो बिल्कुल नहीं है। ये केवल साधारण से वाक्य हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। तो फिर, ये शब्द परमेश्वर के क्रोध को इतना क्यों भड़का सकते हैं? उसकी वजह यह है कि ये शब्द लोगों के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के लिए बोले गए थे। उन शब्दों में व्यक्त प्रवृत्ति और स्वभाव परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हैं जिसे अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। हम सब जानते हैं कि अंत में उन अगुआओं का परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के बारे में जिन्होंने परमेश्वर का परित्याग कर दिया है, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी प्रवृत्ति क्या है? और उनका दृष्टिकोण और प्रवृत्ति ऐसे कारण क्यों बनते हैं कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से निपटता है? कारण यह है कि हालाँकि वे साफ तौर पर जानते हैं कि वह परमेश्वर है, मगर फिर भी वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं, और इसीलिए उन्हें उद्धार के अवसर से पूरी तरह वंचित कर दिया जाता है। जैसा कि बाइबल में लिखा है, "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।" क्या अब तुम लोग इस विषय को अच्छी तरह समझ गए हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 17

मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति से निर्धारित होता है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और जैसे लोग भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न तरीकों से बर्ताव करते हैं, वैसे ही इन बर्तावों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि वह न तो कोई कठपुतली है, और न ही वह शून्य है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानना मनुष्य के लिए एक नेक खोज है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानकर लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा-थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगोगे, तो तुम्हें नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना कोई कठिन कार्य है। जब तुम परमेश्वर को समझ जाओगे, तो उसके बारे में निष्कर्ष नहीं निकालोगे। जब तुम परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष निकालना बन्द कर दोगे, तो उसे अपमानित करने की संभावना नहीं रहेगी और अनजाने में ही परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करो; इससे तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा पैदा होगी। तुम उन मतों, शब्दों एवं सिद्धांतों का उपयोग करके परमेश्वर को परिभाषित करना बंद कर दोगे जिनमें तुम महारत हासिल कर चुके हो। बल्कि, सभी चीज़ों में सदा परमेश्वर के इरादों को खोजकर, तुम अनजाने में ही परमेश्वर के हृदय के अनुरूप बन जाओगे।

इंसान परमेश्वर के कार्य को न तो देख सकता है, न ही छू सकता है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, वह हर एक व्यक्ति के कार्यकलापों को, परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति को, न केवल समझ सकता है, बल्कि देख भी सकता है। इसे हर किसी को पहचानना और इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। हो सकता है कि तुम स्वयं से पूछते हो, "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं इस समय क्या सोच रहा हूँ? हो सकता है वह जानता हो, हो सकता है न भी जानता हो"। यदि तुम इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसमें विश्वास करते हो, मगर उसके कार्य और अस्तित्व पर सन्देह भी करते हो, तो देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करोगे, क्योंकि तुम पहले ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान के कगार पर खड़े डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, परंतु उन्होंने अभी तक सत्य-वास्तविकता प्राप्त नहीं की है, और वे परमेश्वर की इच्छा को तो और भी नहीं समझते। केवल अत्यंत छिछले मतों के मुताबिक चलते हुए, उनके जीवन और आध्यात्मिक कद में कोई प्रगति नहीं होती। क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को जीवन नहीं माना, और न ही कभी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार किया है। तुम्हें लगता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को देखकर आनंद से भर जाता है? क्या वे उसे आराम पहुँचाते हैं? यह है लोगों का परमेश्वर में विश्वास करने का तरीका जो उनका भाग्य तय करता है। जहाँ तक सवाल यह है कि लोग परमेश्वर की खोज कैसे करते हैं, कैसे परमेश्वर के समीप आते हैं, तो यहाँ लोगों की प्रवृत्ति प्राथमिक महत्व की हो जाती है। अपने सिर के पीछे तैरती खाली हवा समझ कर परमेश्वर की उपेक्षा मत करो; जिस परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है उसे हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर मानो। वह तीसरे स्वर्ग में हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, वह हर छोटे वचन और हर छोटे कर्म को देख रहा है, वो यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा संपूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंदर की सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने खुले हैं, और परमेश्वर उन्हें देख रहा है। तुम्हारे व्यवहार, तुम्हारे कर्मों, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार ही तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं कुछ लोगों को कुछ सलाह देना चाहूँगा : अपने आपको परमेश्वर के हाथों में छोटे शिशु के समान मत रखो, जैसे कि उसे तुमसे लाड़-प्यार करना चाहिए, जैसे कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता, और जैसे कि तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थायी हो जो कभी नहीं बदल सकती, और मैं तुम्हें सपने देखना छोड़ने की सलाह देता हूँ! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है, और वह मनुष्य को जीतने और उसके उद्धार के कार्य के प्रति अपने दृष्टिकोण में ईमानदार है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़-प्यार या बिगाड़ने वाला प्रेम नहीं है, न ही मनुष्य के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह है। इसके विपरीत, मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने, दया करने और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता बताती हैं कि मनुष्य से उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं, और यही वे चीज़ें हैं जो मनुष्य के जीने के लिए ज़रूरी हैं। परमेश्वर जीवित है, वास्तव में उसका अस्तित्व है; मनुष्य के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धांतिक है, कट्टर नियमों का समूह नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्य के लिए उसके इरादे, परिस्थितियों और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपांतरित हो रहे हैं। इसलिए तुम्हें पूरी स्पष्टता के साथ जान लेना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, उसका स्वभाव अलग-अलग समय और संदर्भों के अनुसार प्रकट होता है। शायद तुम्हें यह कोई गंभीर मुद्दा न लगे, और तुम्हारी व्यक्तिगत अवधारणा हो कि परमेश्वर को कैसे कार्य करना चाहिए। परंतु कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे दृष्टिकोण से बिल्कुल विपरीत नज़रिया सही हो, और अपनी अवधारणाओं से परमेश्वर को आंकने के पहले ही तुमने उसे क्रोधित कर दिया हो। क्योंकि परमेश्वर उस तरह कार्य नहीं करता जैसा तुम सोचते हो, और न ही वह उस मसले को उस नज़र से देखेगा जैसा तुम सोचते हो कि वो देखेगा। इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपने नज़रिए में सावधान एवं विवेकशील रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धांत का अनुसरण करना चाहिए, जो कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और उसकी प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ विकसित करनी चाहिए; तुम्हें ईमानदारी से प्रबुद्ध लोगों को खोजना चाहिए जो इस पर तुम्हारे साथ संवाद करें। अपने विश्वास में परमेश्वर को एक कठपुतली मत समझो—उसे मनमाने ढंग से मत परखो, उसके बारे में मनमाने निष्कर्षों पर मत पहुँचो, परमेश्वर के साथ सम्मान-योग्य व्यवहार करो। एक तरफ जहाँ परमेश्वर तुम्हारा उद्धार कर रहा है, तुम्हारा परिणाम निर्धारित कर रहा है, वहीं वह तुम्हें करुणा, सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना भी प्रदान कर सकता है, लेकिन किसी भी स्थिति में, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं होती। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू के ज़रिए परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करो। किसी मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। यह बात याद रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सत्यों पर चर्चा की है, ऐसे सत्य जिन्हें तुम लोगों को सुनना चाहिए, फिर भी तुम्हारी वर्तमान दशा और आध्यात्मिक कद के मद्देनज़र, मैं तुम्हारे उत्साह को ख़त्म करने के लिए कोई बड़ी माँग नहीं करूँगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक उदासी से भर सकता है, और तुम्हें परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक निराशा हो सकती है। इसके बजाय मुझे आशा है कि तुम लोग, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे हृदय में जो प्रेम है, उसका उपयोग कर सकते हो, और मार्ग पर चलते समय परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक प्रवृत्ति का उपयोग कर सकते हो। परमेश्वर में विश्वास करने को लेकर इस मामले में भ्रमित मत हो; इसे एक बड़ा मसला समझो। इसे अपने हृदय में रखो, अभ्यास में लाओ, और वास्तविक जीवन से जोड़ो; इसका केवल दिखावटी आदर मत करो। क्योंकि यह जीवन और मृत्यु का मामला है, जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगा। इसके साथ कोई मजाक मत करो या इसे बच्चों का खेल मत समझो! आज तुम लोगों के साथ इन वचनों को साझा करने के बाद, मुझे नहीं पता कि तुम लोगों ने इन बातों को कितना आत्मसात किया है। आज जो कुछ मैंने यहाँ पर कहा है क्या उसके बारे में तुम्हारे मन में कोई प्रश्न है जो तुम पूछना चाहते हो?

हालाँकि ये विषय थोड़े नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से, तुम्हारी सामान्य खोज से, और जिसपर ध्यान देने की तुम्हारी प्रवृत्ति है, उससे थोड़ा हट कर हैं, फिर भी मेरा ख्याल है कि कुछ समय तक उनपर संवाद करके, जो कुछ मैंने यहाँ कहा है, उसके बारे में तुम लोग एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। ये सारे विषय नए हैं, और ऐसे विषय हैं जिनपर तुमने पहले कभी विचार नहीं किया, इसलिए मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएँगे। मैं आज ये बातें तुम्हें भयभीत करने के लिए नहीं बोल रहा, न ही मैं इनका उपयोग तुमसे निपटने के लिए कर रहा हूँ; बल्कि, मेरा लक्ष्य तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करना है। चूँकि इंसान और परमेश्वर के बीच एक दूरी है : यद्यपि इंसान परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है, उसकी प्रवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर की प्रवृत्ति के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाया है। बल्कि उसने आँख मूँदकर विश्वास किया है, वह आँख मूँदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान और समझ में लापरवाह रहा है। अतः मैं इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने, और यह समझने में तुम लोगों की सहायता करने को मजबूर हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिसपर तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ उसके व्यवहार में उसकी प्रवृत्ति क्या है; तुम लोग उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से कितनी दूर हो; और तुम्हारे कार्यकलापों और उस मानक के बीच कितनी असमानता है जिसकी वह तुमसे अपेक्षा करता है। तुम लोगों को ये बातें बताने का मकसद तुम्हें वह पैमाना देना है जिससे तुम खुद को माप सको, ताकि तुम जान सको कि जिस मार्ग पर तुम हो, उसमें तुम्हें कितनी प्राप्ति हुई है, तुम लोगों ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम किन क्षेत्रों में शामिल नहीं हुए हो। तुम लोग आपस में संवाद करते समय, आमतौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो जिनका दायरा संकरा होता है, और विषयवस्तु बहुत सतही होती है। तुम लोगों की चर्चा के विषय और परमेश्वर के इरादों में, तुम्हारी चर्चाओं और परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे एवं मानक में एक दूरी, एक अंतर होता है। इस प्रकार चलते हुए कुछ समय बाद तुम लोग परमेश्वर के मार्ग से बहुत दूर होते चले जाओगे। तुम लोग बस परमेश्वर के मौजूदा कथनों को लेकर उन्हें आराधना की वस्तुओं में बदल रहे हो, और उन्हें रीति-रिवाजों और नियमों के तौर पर देख रहे हो। बस यही कर रहे हो! वास्तव में, तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं है, दरअसल परमेश्वर ने तुम लोगों के हृदय को कभी प्राप्त ही नहीं किया। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है—यही सत्य है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तो लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे में आता है। मगर जैसे ही यह विषय परमेश्वर के इरादों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति की ओर जाता है, तो सभी के नज़रिए से चीज़ें निश्चित रूप से थोड़ी कठिन हो जाती हैं। क्योंकि इसमें सत्य के बारे में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनका प्रवेश शामिल है, तो निश्चित ही इसमें थोड़ी कठिनाई तो है! किन्तु जैसे ही तुम लोग पहले द्वार को पार कर जाते हो और प्रवेश करना शुरू कर देते हो तो धीरे-धीरे चीज़ें आसान होने लगती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 18

परमेश्वर का भय मानने का आरंभिक बिन्दु उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार करना है

अभी थोड़ी देर पहले, किसी ने एक प्रश्न उठाया था : ऐसा कैसे है कि हम परमेश्वर के बारे में अय्यूब से अधिक जानते हैं, फिर भी हम परमेश्वर का आदर नहीं कर पाते? हमने पहले ही इस मामले पर थोड़ी-बहुत चर्चा कर ली है, है न? वास्तव में इस प्रश्न के सार पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं, हालाँकि तब अय्यूब परमेश्वर को नहीं जानता था, फिर भी उसने उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार किया था, और उसे स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का मालिक माना था। अय्यूब ने परमेश्वर को शत्रु नहीं माना था; बल्कि, उसने सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में उसकी आराधना की थी। ऐसा क्यों है कि आजकल लोग परमेश्वर का इतना अधिक विरोध करते हैं? वे परमेश्वर का आदर क्यों नहीं कर पाते? एक कारण तो यह है कि उन्हें शैतान ने बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया है। गहरी शैतानी प्रकृति के कारण, लोग परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं। हालाँकि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उसे स्वीकार करते हैं, तब भी वे परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। यह मानव प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है। दूसरा कारण यह है कि लोग परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, पर वे उसके साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं करते। वे सोचते हैं कि परमेश्वर मनुष्य का विरोधी है, उसे मनुष्य का शत्रु मानते हैं, और सोचते हैं कि परमेश्वर के साथ उनका कोई मेल नहीं है। बस इतनी-सी बात है। क्या इस मामले को पिछले सत्र में नहीं उठाया गया था? इसके बारे में सोचो : क्या यही कारण नहीं है? तुम्हें परमेश्वर का थोड़ा-बहुत ज्ञान हो सकता है, फिर भी इस ज्ञान में क्या है? क्या हर कोई इसी के बारे में बात नहीं कर रहा है? क्या परमेश्वर ने तुम्हें इसी के बारे में नहीं बताया था? तुम केवल इसके सैद्धांतिक और मत-संबंधी पहलुओं को ही जानते हो; लेकिन क्या तुमने कभी परमेश्वर की सच्ची मुखाकृति को समझा है? क्या तुम्हारा ज्ञान आत्मनिष्ठ है? क्या तुम्हें व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव है? यदि परमेश्वर तुम्हें न बताता, तो क्या तुम जान पाते? तुम्हारा सैद्धांतिक ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं दर्शाता। संक्षेप में, चाहे इसके बारे में तुमने कितना भी और कैसे भी जाना हो, जबतक तुम परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे, परमेश्वर तुम्हारा शत्रु ही बना रहेगा, और जबतक तुम परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं करोगे, वह तुम्हारा विरोध करेगा, क्योंकि तुम शैतान के मूर्त रूप हो।

जब तुम मसीह के साथ होते हो, तो शायद तुम उसे दिन में तीन बार भोजन परोस सकते हो या उसे चाय पिला सकते हो और उसके जीवन की आवश्यकताओं का ध्यान रख सकते हो; ऐसा लगेगा जैसे तुमने मसीह के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार किया है। जब कभी कुछ होता है, तो लोगों का दृष्टिकोण हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण से विपरीत होता है; लोग हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण को समझने और स्वीकारने में असफल रहते हैं। जबकि हो सकता है कि लोग केवल ऊपरी तौर पर परमेश्वर के साथ हों, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर के अनुरूप हैं। जैसे ही कुछ होता है, तो मनुष्य और परमेश्वर के बीच मौजूद शत्रुता की पुष्टि करते हुए, मुनुष्य की अवज्ञा की असलियत प्रकट हो जाती है। यह शत्रुता ऐसी नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य का विरोध करता है या परमेश्वर मनुष्य का शत्रु होना चाहता है, न ही ऐसा है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने विरोध में रखकर उसके साथ ऐसा व्यवहार करता है। बल्कि, यह परमेश्वर के प्रति ऐसे विरोधात्मक सार का मामला है जो मनुष्य की आत्मनिष्ठ इच्छा में, और मनुष्य के अवचेतन मन में घात लगाता है। चूँकि मनुष्य उस सब को अपने अनुसंधान की वस्तु मानता है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु जो कुछ परमेश्वर से आता है और जिस चीज़ में भी परमेश्वर शामिल है उसके प्रति मनुष्य की प्रतिक्रिया, सर्वोपरि, अंदाज़ा लगाने, संदेह करने और उसके बाद तुरंत ऐसी प्रवृत्ति को अपनाने वाली होती है जो परमेश्वर से टकराव रखती है, और परमेश्वर का विरोध करती है। उसके तुरंत बाद, मनुष्य एक नकारात्मक मनोदशा में परमेश्वर से विवाद या स्पर्धा करता है, वह यहाँ तक संदेह करता है कि ऐसा परमेश्वर उसके अनुसरण के योग्य है भी या नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य की तर्कशक्ति उसे कहती है कि ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए, वह न चाहते हुए भी ऐसा ही करेगा, और वह अंत तक बेहिचक ऐसी ही हरकतें जारी रखेगा। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोगों की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या अपयश की बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया यह होती है कि ये अफवाहें सही हैं या नहीं, इनका कोई अस्तित्व है या नहीं, और तब वे प्रतीक्षा करके देखने वाला रवैया अपनाते हैं। और फिर वे सोचने लगते हैं : इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या वाकई ऐसा हुआ है? यह अफवाह सच है या नहीं? हालाँकि ऐसे लोग ऊपरी तौर पर नहीं दिखाते, मन ही मन संदेह करने लगते हैं, वे पहले ही परमेश्वर पर संदेह करना और परमेश्वर को नकारना शुरू कर चुके होते हैं। ऐसी प्रवृत्ति और दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? जबतक उनका सामना किसी समस्या से नहीं होता, तुम ऐसे लोगों का दृष्टिकोण नहीं जान पाते; ऐसा प्रतीत होता है जैसे परमेश्वर से उनका कोई टकराव नहीं है, मानो वे परमेश्वर को शत्रु नहीं मानते। हालाँकि, जैसे ही उनके सामने कोई समस्या आती है, वे तुरंत शैतान के साथ खड़े होकर परमेश्वर का विरोध करने लगते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य और परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपना शत्रु मानता है, बल्कि मनुष्य का सार ही अपने आप में परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण करता रहा हो, उसने कितनी ही कीमत चुकाई हो; वह कैसे भी परमेश्वर की स्तुति करता हो, कैसे भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकता हो, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए वह अपने आपसे कितनी भी सख्ती करता हो, लेकिन वह कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं कर सकता। क्या यह मनुष्य के सार से निर्धारित नहीं होता? यदि तुम उसके साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार करते हो, सचमुच मानते हो कि वह परमेश्वर है, तो क्या तब भी तुम उसपर संदेह कर सकते हो? क्या तब भी तुम्हारा हृदय उसपर कोई प्रश्नचिह्न लगा सकता है? नहीं लगा सकता, है न? इस संसार के चलन बहुत ही दुष्टतापूर्ण हैं, यह मनुष्यजाति भी बहुत बुरी है; तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? तुम स्वयं ही बहुत दुष्ट हो, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? फिर भी थोड़ी-सी अफवाहें और कुछ निंदा, परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी अवधारणाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, और तुम्हारी कल्पना इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकती हैं, जो दर्शाता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना अपरिपक्व है! क्या थोड़े से मच्छरों और कुछ घिनौनी मक्खियों की बस "भिनभिनाहट" ही काफी है तुम्हें धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? तुम जानते हो परमेश्वर इस प्रकार के इंसान के बारे में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस बारे में उसका दृष्टिकोण वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर ठंडा रुख अपनाता है—उसकी प्रवृत्ति उन पर कोई ध्यान न देना है, और इन अज्ञानी लोगों को गंभीरता से न लेना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की योजना कभी नहीं बनाई जिन्होंने अंत तक उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के अनुरूप होने का मार्ग खोजने की योजना नहीं बनाई है। शायद मेरी इन बातों से कुछ लोगों को ठेस पहुँचे। अच्छा, क्या तुम लोग इस बात के लिए तैयार हो कि मैं तुम्हें हमेशा इसी तरह ठेस पहुँचाता रहूँ? तुम लोग तैयार हो या न हो, लेकिन जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सत्य है! यदि मैं हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाऊँ, तुम्हारे कलंक उजागर करूँ, तो क्या इससे तुम्हारे हृदय में बसी परमेश्वर की ऊँची छवि प्रभावित होगी? (नहीं होगी।) मैं मानता हूँ कि नहीं होगी। क्योंकि तुम्हारे हृदय में कोई ईश्वर है ही नहीं। वह ऊँचा परमेश्वर जो तुम्हारे हृदय में निवास करता है, जिसका तुम लोग दृढ़ता से समर्थन और बचाव करते हो, वह परमेश्वर है ही नहीं। बल्कि वह मनगढ़ंत इंसानी कल्पना है; उसका अस्तित्व ही नहीं है। अतः यह और भी अच्छा है कि मैं इस पहेली के उत्तर का खुलासा करूँ; क्या यह संपूर्ण सत्य को उजागर नहीं करता? वास्तविक परमेश्वर वो नहीं जिसके होने की कल्पना मनुष्य करता है। मुझे आशा है कि तुम लोग इस वास्तविकता का सामना कर सकते हो, और यह परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 19

परमेश्वर जिन्हें स्वीकार नहीं करता

कुछ लोगों के विश्वास को परमेश्वर के हृदय ने कभी स्वीकार नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता। क्योंकि ये लोग, भले ही कितने ही वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण करते रहे हों, लेकिन इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं; वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धांतों और कार्य करने के तौर-तरीकों, और ज़िन्दा रहने के उनके नियमों एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचन को कभी अपना जीवन नहीं माना, कभी नहीं माना कि परमेश्वर का वचन सत्य है, कभी परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया, और परमेश्वर को कभी अपना परमेश्वर नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को एक किस्म का शगल मानते हैं, परमेश्वर को महज एक आध्यात्मिक सहारा समझते हैं, इसलिए वे नहीं मानते कि परमेश्वर का स्वभाव, या उसका सार इस लायक है कि उसे समझने की कोशिश की जाए। कहा जा सकता है कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर से संबद्ध है उसका इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; उनकी कोई रुचि नहीं है, और न ही वे ध्यान देने की परवाह करते हैं। क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है : "परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है।" वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; ऐसा करना अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे मानते हैं कि कोई वास्तविक कदम उठाए बिना अथवा किसी भी वास्तविक कार्यकलाप में स्वयं को लगाए बिना, सिर्फ शब्दों में परमेश्वर को स्वीकार करके, वे बहुत चालाक बन रहे हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं : "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपना कर्तव्य निभा सकते हैं? क्या वे ये शब्द कह सकते हैं : 'मैं परमेश्वर के लिए जिऊँगा'?" लोग प्रायः जो देखते हैं वह लोगों का सतही प्रदर्शन होता है; वे लोगों का सार नहीं देखते। लेकिन परमेश्वर इन सतही प्रदर्शनों को नहीं देखता; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इसलिए, इन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति और परिभाषा ऐसी है। ये लोग कहते हैं : "परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? परमेश्वर वैसा क्यों करता है? मैं ये नहीं समझ पाता; मैं वो नहीं समझ पाता; यह मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है; तुम मुझे यह बात अवश्य समझाओ...।" इसके उत्तर में मैं पूछता हूँ : क्या तुम्हें यह मामला समझाना सचमुच आवश्यक है? क्या इस मामले का तुमसे वास्तव में कुछ लेना-देना है? तुम कौन हो इस बारे में क्या सोचते हो? तुम कहाँ से आए हो? क्या तुम परमेश्वर को ये संकेत देने योग्य हो? क्या तुम उसमें विश्वास करते हो? क्या वह तुम्हारे विश्वास को स्वीकार करता है? चूँकि तुम्हारे विश्वास का परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है, तो उसके कार्य का तुमसे क्या सरोकार है? तुम नहीं जानते कि परमेश्वर के हृदय में तुम कहाँ ठहरते हो, तो तुम परमेश्वर से संवाद करने योग्य कैसे हो सकते हो?

चेतावनी के शब्द

क्या तुम लोग इन टिप्पणियों को सुनने के बाद असहज नहीं हो? हो सकता है कि तुम लोग इन वचनों को सुनना नहीं चाहते, या उन्हें स्वीकार करना नहीं चाहते, फिर भी वे सब तथ्य हैं। क्योंकि कार्य का यह चरण परमेश्वर के करने के लिए है, यदि परमेश्वर के इरादों से तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है, परमेश्वर की प्रवृत्ति की तुम्हें कोई परवाह नहीं है, और तुम परमेश्वर के सार और स्वभाव को नहीं समझते हो, तो अंत में तुम्हारा ही विनाश होगा। मेरे शब्द सुनने में कठोर लगें तो उन्हें दोष मत देना, यदि तुम्हारा उत्साह ठंडा पड़ जाए तो उन्हें दोष मत देना। मैं सत्य बोलता हूँ; मेरा अभिप्राय तुम लोगों को हतोत्साहित करना नहीं है। चाहे मैं तुमसे कुछ भी माँगू, और चाहे इसे कैसे भी करने की तुमसे अपेक्षा की जाए, मैं चाहता हूँ कि तुम लोग सही पथ पर चलो, और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करो और सही पथ से कभी विचलित न हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे नहीं बढ़ोगे, और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करोगे, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर रहे हो और सही पथ से भटक चुके हो। इसलिए मुझे लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं जो मुझे तुम लोगों के लिए स्पष्ट कर दिए जाने चाहिए, और मुझे तुम लोगों को साफ-साफ, और पूरी निश्चितता के साथ विश्वास करवा देना चाहिए, और परमेश्वर की प्रवृत्ति, परमेश्वर के इरादों, किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है, और वह किस तरीके से मनुष्य के परिणाम को तय करता है, इसे स्पष्ट रूप से जानने में तुम लोगों की सहायता करनी चाहिए। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम इस मार्ग पर नहीं चल पाते हो, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, क्योंकि ये बातें तुम्हें पहले ही साफ-साफ बता दी गयी हैं। जहाँ तक यह बात है कि तुम अपने परिणाम से कैसे निपटोगे—तो यह मामला पूरी तरह से तुम पर है। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के परिणामों के बारे में परमेश्वर की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। मनुष्य को तौलने के उसके अपने तरीके हैं, और उनसे अपेक्षाओं का उसका अपना मानक है। लोगों के परिणामों को तौलने का उसका मानक ऐसा है जो हर एक के लिए निष्पक्ष है—इसमें कोई संदेह नहीं! इसलिए, कुछ लोगों का भय अनावश्यक है। क्या अब तुम लोगों को तसल्ली मिल गयी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 20

वास्तव में, परमेश्वर का स्वभाव सब के सामने है और वह छिपा हुआ नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने कभी किसी व्यक्ति को जान-बूझकर नज़रअंदाज़ नहीं किया है और उसने कभी भी लोगों को उसे जानने या समझने से रोकने के लिए जानबूझकर स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं किया है। परमेश्वर का स्वभाव हमेशा खुला रहना और खुलकर प्रत्येक व्यक्ति का सामना करना रहा है। अपने प्रबंधन में, परमेश्वर सबका सामना करते हुए अपना कार्य करता है और उसका कार्य हर व्यक्ति पर किया जाता है। यह कार्य करते हुए वह प्रत्येक व्यक्ति के मार्गदर्शन और भरण-पोषण के लिए लगातार अपने स्वभाव का प्रकटन और अपने सार का उपयोग कर रहा है कि उसके पास क्या है और वह कौन है। हर युग में और हर चरण पर, चाहे परिस्थितियाँ अच्छी हों या बुरी, परमेश्वर का स्वभाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुला होता है और उसकी चीज़ें एवं अस्तित्व भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुले होते हैं, वैसे ही जैसे उसका जीवन लगातार एवं बिना रुके मानवजाति का भरण-पोषण कर रहा है और उसे सहारा दे रहा है। इस सब के बावजूद, परमेश्वर का स्वभाव कुछ लोगों के लिए छिपा रहता है। क्यों? क्योंकि भले ही ये लोग परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी उन्होंने न तो कभी परमेश्वर को समझने का प्रयास किया, न ही परमेश्वर को जानना चाहा, परमेश्वर के निकट आने की तो बात ही छोड़ो। इन लोगों के लिए, परमेश्वर के स्वभाव को समझना इस बात की पूर्वसूचना देता है कि उनका अंत निकट है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के स्वभाव द्वारा उनका न्याय किया जाने वाला है और उन्हें दोषी ठहराया जाने वाला है। इसलिए, उन्होंने कभी भी परमेश्वर या उसके स्वभाव को समझने की इच्छा नहीं की है, न ही कभी उन्होंने परमेश्वर की इच्छा की गहरी समझ या उसके ज्ञान की अभिलाषा की है। वे सचेत सहयोग के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा समझने का प्रयास नहीं करते—वे तो बस जो करना चाहते हैं, हमेशा वही करने में आनंद लेते हैं और उसे करते हुए कभी नहीं थकते; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जिसमें वे विश्वास करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो केवल उनकी कल्पनाओं में ही मौजूद है, ऐसा परमेश्वर जो केवल उनकी धारणाओं में मौजूद है; और एक ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जिसे उनके दैनिक जीवन में उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। जब स्वयं सच्चे परमेश्वर की बात आती है, तो वे उसे पूरी तरह खारिज कर देते हैं और उसे समझने या उस पर ध्यान देने की उनमें कोई इच्छा नहीं होती और उसके करीब आने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं होता। वे केवल परमेश्वर द्वारा व्यक्त शब्दों का प्रयोग स्वयं को सजाने, स्वयं को अच्छी तरह से प्रस्तुत करने के लिए कर रहे हैं। उनके विचार से, यह उनको पहले से ही सफल विश्वासी एवं अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति आस्था रखने वाला व्यक्ति बना देता है। अपने हृदय में वे अपनी कल्पनाओं, अपनी धारणाओं और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में अपनी व्यक्तिगत परिभाषाओं से निर्देशित होते हैं। दूसरी ओर, स्वयं सच्चे परमेश्वर का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि, यदि वे सच्चे परमेश्वर को समझना चाहते, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेशवर क्या है और उसके पास क्या है, उसे समझना चाहते तो इसका अर्थ होता कि उनके कार्यों, उनकी आस्था उनके अनुसरण की निंदा की जाएगी। इसीलिए वे परमेश्वर का सार समझने के अनिच्छुक रहते हैं और इसीलिए वे परमेश्वर को अच्छे से समझने, परमेश्वर की इच्छा को अच्छे से जानने और परमेश्वर के स्वभाव को अच्छे से समझने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करने या प्रार्थना करने के अनिच्छुक रहते हैं और उसके लिए तैयार नहीं होते। इसके बजाय, वे चाहते हैं कि परमेश्वर कुछ ऐसा हो, जिसे गढ़ा गया हो, जो कुछ खोखला और अज्ञात हो। वे चाहते हैं कि परमेश्वर बिल्कुल ऐसा हो, जिसकी उन्होंने कल्पना की है, जो उनके इशारों और मांग पर चले, जिसका भंडार अक्षय हो और जो हमेशा उपलब्ध रहे। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेना चाहते हैं, तो वे परमेश्वर से वह अनुग्रह बन जाने की माँग करते हैं। जब उन्हें परमेश्वर के आशीष की आवश्यकता होती है, तो वे परमेश्वर से वह आशीष बन जाने की माँग करते हैं। विपत्ति का सामना करने पर वे परमेश्वर से माँग करते हैं कि वह उन्हें मज़बूत बनाए और उनकी पीछे की ढाल बन जाए। परमेश्वर के बारे में इन लोगों का ज्ञान अनुग्रह एवं आशीष की परिधि के दायरे में ही अटका हुआ है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर के विषय में उनकी समझ भी उनकी कल्पनाओं और शब्दों एवं सिद्धांतों तक ही सीमित होती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए उत्सुक हैं, वास्तव में परमेश्वर को देखना चाहते हैं और वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव और जो वह स्वयं है और जो उसके पास हैं, उसे समझना चाहते हैं। ये लोग सत्य की वास्तविकता एवं परमेश्वर द्वारा उद्धार की खोज में रहते हैं और परमेश्वर से विजय, उद्धार एवं पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, प्रत्येक परिस्थिति एवं प्रत्येक व्यक्ति, घटना या ऐसी प्रत्येक चीज़ को समझने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उनके लिए की है और वे ईमानदारी से प्रार्थना और खोज करते हैं। वे सबसे अधिक परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हैं और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव एवं सार को समझना चाहते हैं, ताकि वे आगे से परमेश्वर को और ठेस न पहुँचाएँ और अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर की सुंदरता और उसके सच्चे पहलू को और भी देख सकें। वे ऐसा इसलिए भी करते हैं ताकि उनके हृदय में वास्तव में एक सच्चा परमेश्वर विराजमान हो सके और ताकि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान हो, जिससे अब उन्हें कल्पनाओं, धारणाओं या अस्पष्टता के बीच न जीना पड़े। इन लोगों में परमेश्वर के स्वभाव एवं सार को समझने की एक प्रबल इच्छा होने का कारण यह है कि मानवजाति को अपने अनुभवों के दौरान पल-पल परमेश्वर के स्वभाव एवं सार की आवश्यकता होती है; यह उसका स्वभाव और सार ही है, जो व्यक्ति के पूरे जीवनकाल के दौरान जीवन की आपूर्ति करता है। जब एक बार वे परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हैं, तो वे और भी अच्छे से परमेश्वर का आदर करने, परमेश्वर के कार्य के साथ और अच्छे से सहयोग करने और परमेश्वर की इच्छा के प्रति और अधिक विचारशील बनने और अपनी पूरी योग्यता के साथ अपने कर्तव्य को निभाने में सक्षम होंगे। परमेश्वर के स्वभाव के प्रति इस प्रकार के रुख दो प्रकार के लोग रखते हैं। प्रथम प्रकार के लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझना नहीं चाहते। भले ही वे कहते हों कि वे परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहते हैं, स्वयं परमेश्वर को जानना चाहते हैं, देखना चाहते हैं जो उसके पास है और जो वह खुद है तथा ईमानदारी से परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहते हैं, किंतु अपने हृदय की गहराई में वे मानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस प्रकार के लोग निरंतर परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करते हैं; वे अपने हृदय में पद के लिए परमेश्वर से लड़ते हैं और अक्सर परमेश्वर के अस्तित्व पर संदेह करते हैं और यहाँ तक कि उससे इनकार कर देते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव या स्वयं वास्तविक परमेश्वर को अपने हृदय पर काबिज़ नहीं होने देना चाहते। वे सिर्फ अपनी ही इच्छाएँ, कल्पनाएँ एवं महत्वाकांक्षाएँ पूरी करना चाहते हैं। अतः हो सकता है ये लोग परमेश्वर में विश्वास करते हों, परमेश्वर का अनुसरण करते हों और उसके लिए अपने परिवार एवं नौकरियां भी त्याग सकते हों, लेकिन वे अपने बुरे तरीक़ों से बाज़ नहीं आते। यहाँ तक कि कुछ लोग भेंटों की चोरी भी करते हैं या उसे लुटा देते हैं या एकांत में परमेश्वर को कोसते हैं, जबकि अन्य लोग बार-बार अपने बारे में गवाही देने, अपनी शक्ति बढ़ाने और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने हेतु अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं और लोगों को जीतने एवं उनको नियंत्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं ताकि उनके साथ परमेश्वर की तरह व्यवहार किया जाए। वे किसी को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है-कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, उनकी आराधना नहीं करनी है और चाहे वे कितना भी अच्छा करते हों, यह सब परमेश्वर द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने के कारण है और वे वही कर रहे हैं जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातें क्यों नहीं कहते? क्योंकि वे लोगों के हृदय में अपना स्थान खोने से बहुत डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को समझने की कभी कोशिश नहीं की है। क्या वे परमेश्वर को समझे बिना ही उसे जान सकते हैं? असंभव! इस प्रकार, यद्यपि "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर" विषय के शब्द साधारण हो सकते हैं, किंतु प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनका अर्थ अलग हो सकता है। अक्सर परमेश्वर की अवज्ञा करने वाले, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले, और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले व्यक्ति के लिए ये वचन निंदा का पूर्वाभास हैं; जबकि सत्य वास्तविकता की खोज करने वाला और अक्सर परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आने वाला व्यक्ति ऐसे वचनों को उस तरह लेगा, जैसे मछली जल को लेती है। अतः तुम लोगों के बीच ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के कार्य की बात सुनकर सिरदर्द होने लगता है, जिनके हृदय प्रतिरोध से भर जाते हैं और वे अत्यधिक बेचैन हो जाते हैं। लेकिन तुम्हारे बीच कुछ ऐसे लोग हैं, जो सोचते हैं : यह विषय बिल्कुल वैसा है, जिसकी मुझे आवश्यकता है, क्योंकि यह विषय मेरे लिए बहुत लाभदायक है। यह ऐसी चीज़ है, जो मेरे जीवन के अनुभव से अनुपस्थित नहीं हो सकती है; यह निचोड़ का निचोड़ है, परमेश्वर में आस्था का आधार है और यह ऐसी चीज़ है, जिसका मानवजाति त्याग नहीं कर सकती है। तुम सबको यह विषय निकट एवं दूर दोनों लग सकता है, अपरिचित होते हुए भी परिचित महसूस हो सकता है। किंतु चाहे जो भी हो, यह ऐसा विषय है जिसे हर एक को सुनना चाहिए, जानना चाहिए और समझना चाहिए। चाहे तुम इससे कैसे भी निपटो, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो या चाहे तुम इसे कैसे भी ग्रहण करो, इस विषय के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 21

मानवजाति के सृजन के समय से ही परमेश्वर अपना कार्य करता रहा है। शुरुआत में, यह एक बहुत सरल कार्य था, लेकिन इसकी सरलता के बावजूद, यह परमेश्वर के सार एवं स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त था। अब जबकि परमेश्वर का कार्य उन्नत हो गया है और परमेश्वर के वचन की महान अभिव्यक्ति के साथ उसका अनुसरण करने वाले हर व्यक्ति पर यह कार्य आश्चर्यजनक रूप से महान और मूर्त हो गया है, फिर भी इस दौरान परमेश्वर का व्यक्तित्व मानवजाति से पूर्णतया छिपा हुआ रहा है। बाइबल के लेखों के समय से लेकर हाल के दिनों तक हालाँकि वह दो बार देहधारण कर चुका है, फिर भी कभी भी किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को कभी देखा है? तुम लोगों की समझ के आधार पर क्या कभी किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? नहीं। किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा है, अर्थात किसी ने भी परमेश्वर के असल रूप को कभी नहीं देखा है। यह कुछ ऐसा है, जिससे हर कोई सहमत है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का वास्तविक व्यक्तित्व या परमेश्वर का आत्मा सारी मानवता से छिपा हुआ है, जिसमें आदम और हव्वा भी शामिल हैं, जिन्हें उसने बनाया था और जिसमें धार्मिक अय्यूब शामिल है, जिसे उसने स्वीकार किया था। इनमें से किसी ने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा था। लेकिन परमेश्वर क्यों जान-बूझकर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को ढँकता है? कुछ लोग कहते हैं : "परमेश्वर को डर है कि कहीं लोग डर न जाएँ।" दूसरे कहते हैं : "परमेश्वर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाता है क्योंकि मनुष्य बहुत छोटा है और परमेश्वर बहुत बड़ा है; मनुष्य उसे नहीं देख पाएँगे, या फिर वे मर जाएँगे।" कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं : "परमेश्वर हर दिन अपने कार्य का प्रबंधन करने में व्यस्त रहता है, और शायद उसके पास प्रकट होने के लिए समय नहीं है कि लोग उसे देख पाएँ।" इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमलोग किस पर विश्वास करते हो, यहाँ मेरा एक निष्कर्ष है। वह निष्कर्ष क्या है? वह निष्कर्ष यह है कि बस परमेश्वर चाहता ही नहीं कि लोग उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देखें। मानव जाति से छिपे रहना कुछ ऐसा है, जिसे परमेश्वर जानबूझकर करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि लोग उसके वास्तविक व्यक्तित्व को न देखें। अब तक यह सबको स्पष्ट हो जाना चाहिए। यदि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी किसी को नहीं दिखाया है, तो क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्वहै? (उसका अस्तित्व है।) निश्चय ही उसका अस्तित्व है। परमेश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्व सभी संदेह से परे है। किन्तु जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर का व्यक्तित्व कितना बड़ा है या वह कैसा दिखता है, क्या ये वे प्रश्न हैं जिनकी मानवजाति को छानबीन करनी चाहिए? नहीं। उत्तर नकारात्मक है। यदि परमेश्वर का व्यक्तित्व ऐसा विषय नहीं है, जिसकी हमें छानबीन करनी चाहिए, तो फिर किसकी करनी चाहिए? (परमेश्वर का स्वभाव।) (परमेश्वर का कार्य।) इससे पहले कि हम आधिकारिक विषय पर संगति शुरू करें, आओ हम उसी पर लौटें, जिस पर थोड़ी देर पहले चर्चा कर रहे थे : परमेश्वर ने मानवजाति को कभी अपना व्यक्तित्व क्यों नहीं दिखाया है? परमेश्वर क्यों जानबूझकर अपने व्यक्तित्व को मानवजाति से छिपाता है? इसका सिर्फ एक ही कारण है, और वह है : यद्यपि परमेश्वर द्वारा सृजित किए गए मनुष्य ने परमेश्वर के हज़ारों वर्षों के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जो परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार को जानता हो। परमेश्वर की नज़रों में ऐसे लोग उसके विरुद्ध हैं और परमेश्वर अपने आप को ऐसे लोगों को नहीं दिखाएगा, जो उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। यही एकमात्र कारण है कि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी मानवजाति को नहीं दिखाया है और क्यों वह जानबूझकर अपने व्यक्तित्व को मानवता से बचाकर रखता है। क्या अब तुम लोगों को परमेश्वर का स्वभाव जानने का महत्व स्पष्ट है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 22

परमेश्वर के प्रबंधन के अस्तित्व के समय से ही, वह अपना कार्य कार्यान्वित करने के लिए हमेशा ही पूरी तरह से समर्पित रहा है। मनुष्य से अपने व्यक्तित्व को छिपाने के बावजूद, वह हमेशा मनुष्य के अगल-बगल ही रहा है, मनुष्य पर कार्य करता रहा है, अपने स्वभाव को व्यक्त करता रहा है, अपने सार से समूची मानवजाति का मार्गदर्शनकरता रहा है और अपनी शक्ति, अपनी बुद्धि और अपने अधिकार के माध्यम से हर एक व्यक्ति पर अपना कार्य करता रहा है, इस प्रकार वह व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और आज के राज्य के युग को अस्तित्व में लाया है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य से अपने व्यक्तित्व को छिपाता है, फिर भी उसका स्वभाव, उसका अस्तित्व और चीज़ें और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा खुलकर मनुष्य पर प्रकट हैं, ताकि मनुष्य उन्हें देख एवं अनुभव कर सके। दूसरे शब्दों में, यद्यपि मानव परमेश्वर को देख या स्पर्श नहीं कर सकते, फिर भी मानवता के सामने आने वाला परमेश्वर का स्वभाव एवं सार पूरी तरह स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या यह सत्य नहीं है? परमेश्वर अपने कार्य के लिए चाहे जिस रास्ते या कोण को चुने, वह हमेशा अपनी सच्ची पहचान के ज़रिए लोगों से बर्ताव करता है, वह कार्य करता है जिन्हें करना उसका फर्ज़ है और वे वचन कहता है, जो उसे कहने हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर किस स्थान से बोलता है—वह तीसरे स्वर्ग में खड़ा हो सकता है या देह में खड़ा हो सकता है या यहाँ तक कि एक साधारण व्यक्ति हो सकता है—वह मनुष्य से बिना किसी छल या छिपाव के हमेशा अपने पूरे दिल और अपने पूरे मन के साथ बोलता है। जब वह अपने कार्य को क्रियान्वित करता है, परमेश्वर अपने वचन एवं अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करता है और बिना किसी प्रकार के संदेह के जो वह स्वयं है और जो उसके पास है, उसे प्रकट करता है। वह अपने जीवन, अस्तित्व और अपनी चीज़ों के साथ मानवजाति का मार्गदर्शन करता है। इसी तरह से मनुष्य ने व्यवस्था के युग—मानवता के शैशव युग—के दौरान "अदृश्य एवं अस्पृश्य" परमेश्वर के मार्गदर्शन में जीवन बिताया था।

व्यवस्था के युग के बाद पहली बार परमेश्वर ने देहधारण किया था-ऐसा देहधारण जो साढ़े तैंतीस वर्षों तक रहा। एक मनुष्य के लिए, क्या साढ़े तैंतीस साल का समय लंबा समय है? (ज़्यादा लंबा नहीं है।) जबकि किसी मानव का जीवनकाल सामान्यत: तीस-एक सालों से कहीं ज़्यादा लंबा होता है, यह एक मनुष्य के लिए बहुत लंबा समय नहीं है। किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए ये साढ़े तैंतीस साल वास्तव में बहुत ही लंबे थे। वह एक व्यक्ति बन गया—एक सामान्य व्यक्ति, जिसने परमेश्वर के कार्य और आदेश को अपने हाथ में लिया था। इसका अर्थ था कि उसे ऐसा कार्य करना था, जिसे एक सामान्य व्यक्ति नहीं संभाल सकता है, जबकि वह पीड़ा भी सहन कर रहा था, जिसका सामना सामान्य लोग नहीं कर सकते। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु द्वारा सहन की गई पीड़ा की मात्रा, उसके कार्य की शुरुआत से लेकर उसे सलीब पर कीलों से जड़े जाने तक, शायद कुछ ऐसा नहीं है जिसे आज के लोग व्यक्तिगत रूप से देख सकते, किंतु क्या तुम लोग कम से कम बाइबल की कहानियों के ज़रिए इसका अंदाज़ा तक नहीं ले सकतेसकते? चाहे इन लिखित तथ्यों में कितने भी विवरण हों, कुल मिलाकर, इस समयावधि के दौरान परमेश्वर का कार्य कष्ट एवं पीड़ा से भरा था। एक भ्रष्ट मनुष्य के लिए, साढ़े तैंतीस साल का समय एक लंबा समय नहीं है; थोड़ी सी पीड़ा छोटी बात है। लेकिन पवित्र, निष्कलंक परमेश्वर के लिए, जिसे सारी मानवजाति के पापों को सहना था और जिसे पापियों के साथ खाना, सोना और रहना था, यह पीड़ा अविश्वसनीय तौर पर बहुत ही बड़ी थी। वह सृष्टिकर्ता है, सभी चीज़ों का स्वामी और हर चीज़ का शासक है, फिर भी जब वह संसार में आया, तो उसे भ्रष्ट मनुष्यों के दमन एवं क्रूरता को सहना पड़ा था। अपने कार्य को पूर्ण करने और मानवता को दुर्गति के समुद्र से निकालने के लिए, उसे मनुष्य द्वारा दोषी ठहराया जाना था और सारी मानवजाति के पापों को सहना था। वह जितनी पीड़ा से होकर वह गुज़रा था, उसकी थाह संभवतः सामान्य लोगों द्वारा नापी एवं आंकी नहीं जा सकती है। यह पीड़ा क्या दर्शाती है? यह मानवजाति के प्रति परमेश्वर के समर्पण को दर्शाती है। यह उस अपमान का प्रतीक है, जिसे उसने सहा था और उस कीमत का प्रतीक है, जिसे उसने मनुष्य के उद्धार के लिए, उनके पापों से छुटकारे के लिए और अपने कार्य के इस चरण को पूर्ण करने के लिए चुकाया था। इसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सलीब से छुड़ाया जाएगा। यह एक ऐसी कीमत है जिसे लहू से एवं जीवन से चुकाया गया और एक ऐसी कीमत, जिसे चुका पाना सृजित किए गए किसी भी प्राणी के बस में नहीं है। उसके पास परमेश्वर का सार और वह है जोकि परमेश्वर के पास है, इसलिए वह ऐसी पीड़ा सह सका और इस प्रकार का कार्य कर सका। यह कुछ ऐसा है, जिसे उसकी जगह कोई भी अन्य सृजित किया गया प्राणी नहीं कर सकता था। यह अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य है और उसके स्वभाव का एक प्रकाशन है। क्या इससे कुछ भी जो वह है या उसके पास है, प्रकट होता है? क्या यह मानवजाति के जानने योग्य है?

उस युग में, यद्यपि मनुष्य ने परमेश्वर के व्यक्तित्व को नहीं देखा था, फिर भी उन्होंने परमेश्वर की पाप बलि को प्राप्त किया और उन्हें परमेश्वर द्वारा सलीब से छुड़ाया गया। हो सकता है कि मानवजाति उस कार्य से अपरिचित न हो, जिसे अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर ने किया था, लेकिन क्या कोई उस स्वभाव एवं इच्छा से परिचित है, जिसे परमेश्वर द्वारा इस समयावधि के दौरान अभिव्यक्त किया गया था? विभिन्न युगों के दौरान विभिन्न माध्यमों से मनुष्य महज़ परमेश्वर के कार्य के विवरण ही जानता है या परमेश्वर से संबंधित उन कहानियों को जानता है, जो उसी समय घटित हुई थीं जब परमेश्वर अपने कार्य को क्रियान्वित कर रहा था। ये विवरण एवं कहानियाँ ज़्यादा से ज़्यादा परमेश्वर के विषय में कुछ सूचनाएँ या प्राचीन किंवदंतियां हैं और इनका परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के साथ कोई वास्ता नहीं है। अतः चाहे लोग परमेश्वर के बारे में कितनी भी कहानियाँ जानते हों, इसका यह मतलब नहीं कि उनके पास परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार की गहरी समझ एवं ज्ञान है। व्यवस्था के युग के समान, यद्यपि लोगों ने अनुग्रह के युग में देहधारी परमेश्वर के साथ बहुत करीबी एवं घनिष्ठ संपर्क का अनुभव किया था, फिर भी परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार के विषय में उनका ज्ञान वस्तुतः न के बराबर था।

राज्य के युग में, परमेश्वर ने फिर से देहधारण किया, उसी प्रकार जैसे उसने पहली बार किया था। कार्य की इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर अभी भी खुलकर अपने वचन को अभिव्यक्त करता है, वह कार्य करता है जो उसे करना है और वह अभिव्यक्त करता है, जो वह स्वयं है और जो उसके पास है। साथ ही, वह निरंतर मनुष्य की अवज्ञा एवं अज्ञानता को सहता एवं बर्दाश्त करता जाता है। क्या इस समयावधि के कार्य के दौरान भी परमेश्वर निरंतर अपने स्वभाव को प्रकट नहीं करता और अपनी इच्छा को अभिव्यक्त नहीं करता? इसलिए, मनुष्य के सृजन से लेकर अब तक, परमेश्वर का स्वभाव, उसका अस्तित्व और उसकी चीज़ें एवं उसकी इच्छा हमेशा से ही प्रत्येक व्यक्ति के सामने रहे हैं। परमेश्वर ने कभी भी जानबूझकर अपने सार, अपने स्वभाव या अपनी इच्छा को नहीं छिपाया है। बात बस इतनी है कि मानवजाति इसकी परवाह नहीं करती कि परमेश्वर क्या कर रहा है, उसकी इच्छा क्या है—इसीलिए परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ इतनी दयनीय है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को छिपाता है, तो भी हर समय खुले तौर पर अपनी इच्छा, स्वभाव एवं सार को प्रकट करते हुए वह हर क्षण मानवजाति के साथ खड़ा होता है। एक अर्थ में, परमेश्वर का व्यक्तित्व भी सभी लोगों के सामने है लेकिन मनुष्य के अंधेपन एवं अवज्ञा के कारण वे कभी भी परमेश्वर का प्रकटन नहीं देख पाते। अतः यदि ऐसी स्थिति है, तो क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को समझना आसान नहीं होना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर देना बहुत ही कठिन है, है ना? तुम कह सकते हो कि यह आसान है, लेकिन जब कुछ लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में उसे नहीं जान पाते या उसके विषय में एक स्पष्ट समझ प्राप्त नहीं कर पाते—वह हमेशा ही धुंधली और अस्पष्ट रहती है। किंतु यदि तुम कहो कि यह आसान नहीं है, तो वह भी सही नहीं है। इतने लंबे समय तक परमेश्वर के कार्य के अधीन रहने के बाद, अपने अनुभवों के माध्यम से, प्रत्येक का परमेश्वर के साथ वास्तव में व्यवहार हो चुका होना चाहिए। उन्हें कम से कम कुछ हद तक अपने हृदय में परमेश्वर का अहसास करना चाहिए था या उन्हें पहले परमेश्वर के साथ आध्यात्मिक संस्पर्श करना चाहिए था और उनके पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव के विषय में थोड़ी बहुत अनुभव लायक जागरूकता होनी चाहिए थी या उन्हें उसकी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए थी। जब से मनुष्य ने परमेश्वर का अनुसरण करना शुरू किया था, तब से अब तक मानवजाति ने बहुत कुछ प्राप्त किया है, लेकिन कई वजहों से-मनुष्य की नाकाबिलियत, अज्ञानता, विद्रोहीपन एवं विभिन्न प्रयोजनों के कारणवश—मानवजाति ने इसमें से बहुत कुछ खो भी दिया है। क्या परमेश्वर ने मानवजाति को पहले से ही काफी कुछ नहीं दिया है? यद्यपि परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को मनुष्यों से छिपाता है, फिर भी जो वह स्वयं है, जो उसके पास है और अपने जीवन से वह मनुष्य को आपूर्ति करता है; परमेश्वर के विषय में मानव जाति का ज्ञान केवल उतना ही नहीं होना चाहिए जितना अभी है। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर के विषय में तुम लोगों के साथ आगे संगति करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह है कि हज़ारों साल की देखभाल एवं परवाह, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य पर न्योछावर किया है, व्यर्थ न हो जाएँ और मानवजाति अपने प्रति परमेश्वर की इच्छा को सचमुच में समझ सके और सराह सके। यह इसलिए है ताकि लोग परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान में एक नए चरण की ओर बढ़ सकें। साथ ही यह परमेश्वर को लोगों के हृदय में, अपने असली स्थान पर वापस लौटाएगा; अर्थात उसके साथ इंसाफ करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 23

आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा

उत्पत्ति 2:15-17 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

तुम लोगों को इन पदों से क्या समझ आया? पवित्र शास्त्र का यह भाग तुम लोगों को कैसा महसूस कराता है? मैंने आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा के बारे में चर्चा का फ़ैसला क्यों किया? क्या अब तुम लोगों में से प्रत्येक के मन में परमेश्वर और आदम की एक तस्वीर है? तुम कल्पना करने की कोशिश कर सकते हो : यदि तुम लोग उस दृश्य में होते, तो तुम लोगों के हृदय में, कहीं गहरे, परमेश्वर किसके समान होता? इस बारे में सोचने से तुम लोगों को कैसा लगता है? यह एक द्रवित करने और दिल को छू लेने वाली तस्वीर है। यद्यपि इसमें केवल परमेश्वर एवं मनुष्य ही हैं, फिर भी उनके बीच की घनिष्ठता तुम्हें आदर से भर देती है : परमेश्वर का प्रचुर प्रेम मनुष्य को खुलकर प्रदान किया गया है और यह मनुष्य को घेरे रहता है; मनुष्य भोला-भाला एवं निर्दोष, भारमुक्त एवं लापरवाह है, आनंदपूर्वक परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीवन बिताता है; परमेश्वर मनुष्य के लिए चिंता करता है, जबकि मनुष्य परमेश्वर की सुरक्षा एवं आशीष के अधीन जीवन बिताता है; हर एक चीज़ जिसे मनुष्य करता एवं कहता है वह परमेश्वर से घनिष्ठता से जुड़ी है और अभिन्न है।

यह परमेश्वर की पहली आज्ञा कही जा सकती है, जो मनुष्य को बनाने के बाद उसे दी गई। यह आज्ञा क्या सूचित करती है? यह परमेश्वर की इच्छा दर्शाती है, परंतु साथ ही यह मानवजाति के लिए उसकी चिंताओं को भी बताती है। यह परमेश्वर की पहली आज्ञा है, और साथ ही यह भी पहली बार है, जब परमेश्वर मनुष्य के विषय में चिंता व्यक्त करता है। कहने का तात्पर्य है, जिस घड़ी परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तब से उसने उसके प्रति ज़िम्मेदारी महसूस की है। उसकी ज़िम्मेदारी क्या है? उसे मनुष्य की सुरक्षा करनी है और मनुष्य की देखभाल करनी है। वह आशा करता है कि मनुष्य उस पर भरोसा कर सकता है और उसके वचनों का पालन कर सकता है। यह मनुष्य से परमेश्वर की पहली अपेक्षा भी है। इसी अपेक्षा के साथ परमेश्वर निम्नलिखित वचन कहता है : "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" ये साधारण वचन परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। वे यह भी प्रकट करते हैं कि परमेश्वर ने अपने हृदय में मनुष्य के लिए चिंता प्रकट करना शुरू कर दिया है। सब चीज़ों के मध्य, केवल आदम को ही परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था; आदम ही एकमात्र जीवित प्राणी था, जिसके पास परमेश्वर के जीवन की श्वास थी; वह परमेश्वर के साथ चल सकता था, परमेश्वर के साथ बात कर सकता था। इसीलिए परमेश्वर ने उसे ऐसी आज्ञा दी। परमेश्वर ने इस आज्ञा में बिलकुल साफ कर दिया था कि मनुष्य क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता।

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर का हृदय देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसमें कोई चिंता है? इन पदों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल सराहा जा सकता है, इसे घनिष्ठता से महसूस भी किया जा सकता है। क्या तुम इससे सहमत नहीं होंगे? मेरे यह कहने के बाद, क्या तुम लोग अब भी सोचते हो कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? ये इतने साधारण भी नहीं हैं, है ना? क्या तुम लोगों को पहले इसका पता था? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें इन थोड़े से वचनों को कहा होता, तो तुम भीतर से कैसा महसूस करते? यदि तुम एक दयालु व्यक्ति नहीं होते, यदि तुम्हारा हृदय बर्फ के समान ठंडा होता, तो तुम कुछ भी महसूस न करते, तुम परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करते और तुम परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करते। लेकिन एक विवेकशील और मानवता की समझ रखने वाले व्यक्ति के रूप में तुम कुछ अलग महसूस करोगे। तुम गर्मजोशी महसूस करोगे, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारी परवाह की जाती है और तुम्हें प्रेम किया जाता है, और तुम खुशी महसूस करोगे। क्या यह सही नहीं है? जब तुम इन चीज़ों को महसूस करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति कैसे पेश आओगे? क्या तुम परमेश्वर से जुड़ाव महसूस करोगे? क्या तुम अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और उसका सम्मान करोगे? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? तुम इससे देख सकते हो कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है, वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है। असल में, क्या परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण के दौरान ऐसी बहुत सी चीज़ें नहीं कहता? क्या आज ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के हृदय की सराहना करते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा का आभास कर सकते हो, जिसके बारे में मैंने अभी-अभी कहा था? तुम लोग परमेश्वर की इच्छा की तब भी सराहना नहीं सकते, जब यह इतनी ठोस, साकार एवं असली होती है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में वास्तविक ज्ञान एवं समझ नहीं है। क्या यह सत्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 24

परमेश्वर हव्वा को बनाता है

उत्पत्ति 2:18-20 फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, "आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए।" और यहोवा परमेश्‍वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम के पास ले आया कि देखे कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। अत: आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उस से मेल खा सके।

उत्पत्ति 2:22-23 और यहोवा परमेश्‍वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। तब आदम ने कहा, "अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।"

पवित्र शास्त्र के इस भाग में एक मुख्य पंक्ति है: "जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया।" अतः किसने सभी जीवित प्राणियों को उनके नाम दिए थे? वह आदम था, परमेश्वर नहीं। यह पंक्ति मानवजाति को एक तथ्य बताती है : परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी, जब उसने उसकी सृष्टि की थी। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य की बुद्धि परमेश्वर से आई थी। यह एक निश्चितता है। लेकिन क्यों? परमेश्वर ने आदम को बनाया, उसके बाद क्या आदम विद्यालय गया था? क्या वह जानता था कि कैसे पढ़ते हैं? परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों को बनाया, उसके बाद क्या आदम ने इन सभी प्राणियों को पहचाना था? क्या परमेश्वर ने उसे बताया कि उनके नाम क्या थे? निश्चित ही, परमेश्वर ने उसे यह भी नहीं सिखाया था कि इन प्राणियों के नाम कैसे रखने हैं। यही सत्य है! तो आदम ने कैसे जाना कि इन जीवित प्राणियों को उनके नाम कैसे देने थे और उन्हें किस प्रकार के नाम देने थे? यह उस प्रश्न से संबंधित है कि परमेश्वर ने आदम में क्या जोड़ा जब उसने उसकी सृष्टि की थी। तथ्य साबित करते हैं कि जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, तो उसने अपनी बुद्धि को उसमें जोड़ दिया था। यह एक मुख्य बिंदु है, तो ध्यानपूर्वक सुनो? एक अन्य मुख्य बिंदु भी है, जो तुम लोगों को समझना चाहिए : आदम ने जब इन जीवित प्राणियों को उनका नाम दिया, उसके बाद ये नाम परमेश्वर के शब्दकोश में निर्धारित हो गए। मैं इसका उल्लेख क्यों करता हूँ? क्योंकि इसमें भी परमेश्वर का स्वभाव शामिल है और यह एक बिंदु है, जिसे मुझे और समझाना होगा।

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, उसमें जीवन श्वास फूंकी और उसे अपनी कुछ बुद्धि, अपनी योग्यताएँ और वह दिया जो वह स्वयं है और उसके पास है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को ये सब चीज़ें दीं, उसके बाद मनुष्य स्वतंत्र रूप से कुछ चीज़ों को करने और अपने आप सोचने के योग्य हो गया। यदि मनुष्य जो सोचता है और जो करता है, वह परमेश्वर की नज़रों में अच्छा है, तो परमेश्वर उसे स्वीकार करता है और हस्तक्षेप नहीं करता। जो कुछ मनुष्य करता है यदि वह सही है, तो परमेश्वर उसे रहने देगा। अतः वह वाक्यांश "जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया" क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के नामों में कोई बदलाव करने की ज़रूरत नहीं समझी। आदम उनका जो भी नाम रखता, परमेश्वर कहता "ऐसा ही हो" और प्राणी के नाम की पुष्टि करता। क्या परमेश्वर ने कोई राय व्यक्त की? नहीं, निश्चित ही नहीं। तो तुम लोग इससे क्या नतीजा निकालते हो? परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी और मनुष्य ने कार्यों को अंजाम देने के लिए अपनी परमेश्वर-प्रदत्त बुद्धि का उपयोग किया। यदि जो कुछ मनुष्य करता है, वह परमेश्वर की नज़रों में सकारात्मक है, तो इसे बिना किसी मूल्यांकन या आलोचना के परमेश्वर के द्वारा पुष्ट, मान्य एवं स्वीकार किया जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई व्यक्ति या दुष्ट आत्मा या शैतान नहीं कर सकता। क्या तुम लोग यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का प्रकाशन देखते हो? क्या एक मानव, एक भ्रष्ट किया गया मानव या शैतान अपने नाम पर किसी को अपनी नाक के नीचे कुछ करने देगा? निश्चित ही नहीं! क्या वे इस पद के लिए उस अन्य व्यक्ति या अन्य शक्ति से लड़ेंगे, जो उनसे अलग है? निश्चित ही, वे लड़ेंगे! उस घड़ी, यदि वह एक भ्रष्ट किया गया व्यक्ति या शैतान आदम के साथ होता, तो जो कुछ आदम कर रहा था, उन्होंने निश्चित रूप से उसे ठुकरा दिया होता। यह साबित करने के लिए कि उनके पास स्वतंत्र रूप से सोचने की योग्यता है और उनके पास अपनी अनोखी अंतर्दृष्टि हैं, उन्होंने हर उस चीज़ को बिल्कुल नकार दिया होता, जो आदम ने किया था : "क्या तुम इसे यह कहकर बुलाना चाहते हो? ठीक है, मैं इसे यह कहकर नहीं बुलाने वाला, मैं इसे वह कहकर बुलाने वाला हूँ; तुमने इसे सीता कहा था लेकिन मैं इसे गीता कहकर बुलाने वाला हूँ। मुझे दिखाना है कि मैं कितना चतुर हूँ।" यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह अनियंत्रित रूप से अहंकारी होना नहीं है? और परमेश्वर का क्या? क्या उसका स्वभाव ऐसा है? जो आदम कर रहा था, क्या उसके प्रति परमेश्वर की कुछ असामान्य आपत्तियाँ थीं? स्पष्ट रूप से उत्तर है नहीं! उस स्वभाव को लेकर जिसे परमेश्वर प्रकाशित करता है, उसमें जरा भी वाद-विवाद, अहंकार या आत्म-तुष्टता का आभास नहीं है। इतना तो यहाँ स्पष्ट है। यह बस एक छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं समझते हो, यदि तुम्हारा हृदय यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है और उसका रवैया क्या है, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानोगे या परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति एवं प्रकाशन को नहीं जानोगे। क्या यह ऐसा नहीं है? क्या तुम लोग उससे सहमत हो, जो मैंने अभी-अभी तुम्हें समझाया? आदम के कार्यों के प्रत्युत्तर में, परमेश्वर ने दिखावटी घोषणा नहीं की, "तुमने अच्छा किया, तुमने सही किया और मैं सहमत हूँ!" जो भी हो, जो कुछ आदम ने किया, परमेश्वर ने अपने हृदय में उसे स्वीकृति दी, उसकी सराहना एवं तारीफ की। सृष्टि के समय से यह पहला कार्य था, जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के निर्देशन पर उसके लिए किया था। यह कुछ ऐसा था, जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के स्थान पर और परमेश्वर की ओर से किया था। परमेश्वर की नज़रों में, यह उस बुद्धिमत्ता से उदय हुआ था जो उसने मनुष्य को प्रदान की थी। परमेश्वर ने इसे एक अच्छी चीज़, एक सकारात्मक चीज़ के रूप में देखा था। जो कुछ आदम ने उस समय किया था, वह मनुष्य में परमेश्वर की बुद्धिमत्ता का पहला प्रकटीकरण था। परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह एक उत्तम प्रकटीकरण था। जो कुछ मैं यहाँ तुम लोगों को बताना चाहता हूँ, वह यह है कि उसकी बुद्धिमत्ता और जो वह स्वयं है और जो उसके पास है, उसे मनुष्य को देने का परमेश्वर का यह लक्ष्य था कि मानवजाति ऐसा जीवित प्राणी बन सके, जो उसे प्रकट करे। क्योंकि एक जीवित प्राणी का उसकी ओर से कार्य करना बिलकुल वैसा था, जिसे देखने की लालसा परमेश्वर को थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 25

परमेश्वर ने आदम और हव्वा के लिए चमड़े के अँगरखे बनाए

उत्पत्ति 3:20-21 आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।

"और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए," इस दृश्य में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका निभाता है जब वह आदम और हव्वा के साथ होता है? मात्र दो मानवों के साथ इस संसार में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका में प्रकट होता है? क्या वह स्वयं को परमेश्वर की भूमिका में प्रकट करता है? हाँगकाँग के भाइयो एवं, बहनो कृपया उत्तर दीजिए। (एक अभिभावक की भूमिका में।) दक्षिण कोरिया के भाइयो एवं बहनो, तुम लोग क्या सोचते हो कि परमेश्वर किस भूमिका में प्रकट होता है? (परिवार के मुखिया की।) ताइवान के भाइयो एवं बहनो, तुम लोग क्या सोचते हो? (आदम और हव्वा के परिवार में किसी व्यक्ति की भूमिका में, परिवार के एक सदस्य की भूमिका में।) तुम लोगों में से कुछ सोचते हैं कि परमेश्वर आदम और हव्वा के परिवार के एक सदस्य के रूप में प्रकट होता है, जबकि कुछ कहते हैं कि परमेश्वर परिवार के एक मुखिया के रूप में प्रकट होता है वहीं दूसरे कहते हैं, वह अभिभावक के रूप में है। इनमें से सब बिलकुल उपयुक्त हैं। लेकिन क्या तुम्हें पता है मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ? परमेश्वर ने इन दो लोगों की सृष्टि की और उनके साथ अपने साथियों के समान व्यवहार किया। उनके एकमात्र परिवार के समान, परमेश्वर ने उनके जीवन का ख्याल रखा और उनकी भोजन, कपड़े और घर जैसी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा। यहाँ, परमेश्वर आदम और हव्वा के माता-पिता के रूप में प्रकट होता है। जब परमेश्वर यह करता है, मनुष्य नहीं देखता कि परमेश्वर कितना ऊँचा है; वह परमेश्वर की सर्वोच्चता, उसकी रहस्यमयता और ख़ासकर उसके क्रोध या प्रताप को नहीं देखता। जो कुछ वह देखता है वह परमेश्वर की विनम्रता, उसका स्नेह, मनुष्य के लिए उसकी चिंता और उसके प्रति उसकी ज़िम्मेदारी एवं देखभाल है। जिस रवैये एवं तरीके से परमेश्वर ने आदम और हव्वा के साथ व्यवहार किया, वह वैसा है जैसे माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंता करते हैं। यह ऐसा है, जैसे माता-पिता अपने पुत्र एवं पुत्रियों से प्रेम करते हैं, उन पर ध्यान देते हैं और उनकी देखरेख करते हैं—वास्तविक, दृश्यमान और स्पर्शगम्य। खुद को एक उच्च और शक्तिमान पद पर रखने के बजाय, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के लिए पहरावा बनाने के लिए चमड़ों का उपयोग किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस रोएँदार कोट का उपयोग उनकी लज्जा छिपाने के लिए किया गया था या उन्हें ठंड से बचाने के लिए। जो मायने रखता है वह यह कि मनुष्य के शरीर को ढँकने वाला पहरावा, परमेश्वर द्वारा अपने हाथों से बनाया गया था। बस कपड़ों को सोचकर अस्तित्व में लाने या कुछ अन्य चमत्कारी साधनों का उपयोग करने के बजाय, जैसा लोग कल्पना कर सकते हैं कि परमेश्वर करेगा, परमेश्वर ने वैध रूप से कुछ ऐसा किया, जो मनुष्य ने सोचा होगा कि परमेश्वर नहीं करेगा और उसे नहीं करना चाहिए। यह एक मामूली बात लग सकती है—कुछ लोग यहाँ तक भी सोच सकते हैं कि यह जिक्र करने लायक भी नहीं है—परंतु यह परमेश्वर का अनुसरण करने वाले किसी भी व्यक्ति को, जो उसके विषय में पहले अस्पष्ट विचारों से घिरा हुआ था, उसकी सच्चाई एवं मनोहरता में अन्तःदृष्टि प्राप्त करने और उसकी निष्ठा एवं विनम्रता को देखने की गुंजाइश भी देता है। यह असह्य रूप से अभिमानी लोगों को, जो सोचते हैं कि वे ऊँचे एवं शक्तिशाली हैं, परमेश्वर की सच्चाई एवं विनम्रता के सामने लज्जा से अपने अहंकारी सिरों को झुकाने के लिए मजबूर करता है। यहाँ, परमेश्वर की सच्चाई एवं विनम्रता लोगों को और यह देखने लायक बनाती है कि परमेश्वर कितना मनभावन है। इसके विपरीत, "असीम" परमेश्वर, "मनभावन" परमेश्वर और "सर्वशक्तिमान" परमेश्वर लोगों के हृदय में कितना छोटा एवं नीरस हो गया है और हल्के स्पर्श से भी बिखर जाता है। जब तुम इस पद को देखते हो और इस कहानी को सुनते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को नीचा समझते हो क्योंकि उसने ऐसा कार्य किया था? शायद कुछ लोग ऐसा सोचें, लेकिन दूसरे पूर्णत: विपरीत प्रतिक्रिया देंगे। वे सोचेंगे कि परमेश्वर सच्चा एवं मनभावन है और यह बिलकुल परमेश्वर की सच्चाई एवं विनम्रता ही है, जो उन्हें द्रवित करती है। जितना अधिक वे परमेश्वर के वास्तविक पहलू को देखते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के प्रेम के सच्चे अस्तित्व की, अपने हृदय में परमेश्वर के महत्व की और वह किस प्रकार हर घड़ी उनके बगल में खड़ा होता है, उसकी सराहना कर सकते हैं।

अब हम अपनी चर्चा को वर्तमान से जोड़ते हैं। यदि परमेश्वर उन मनुष्यों के लिए ये विभिन्न छोटी-छोटी चीज़ें कर सकता था, जिनका सृजन उसने बिलकुल शुरुआत में किया था, यहाँ तक कि ऐसी चीज़ें भी जिनके विषय में लोग कभी सोचने या अपेक्षा करने की हिम्मत भी नहीं करेंगे, तो क्या परमेश्वर आज लोगों के लिए ऐसी चीज़ें कर सकता है? कुछ कहते हैं, "हाँ!" ऐसा क्यों है? क्योंकि परमेश्वर का सार झूठा नहीं है, उसकी मनोहरता झूठी नहीं है। परमेश्वर का सार सचमुच अस्तित्व में है और यह ऐसी चीज़ नहीं है, जिसमें दूसरों द्वारा कुछ जोड़ा गया हो और निश्चित रूप से ऐसी चीज़ नहीं है जो समय, स्थान एवं युगों में परिवर्तन के साथ बदलती हो। परमेश्वर की सच्चाई एवं मनोहरता को केवल कुछ ऐसा करने से सामने लाया जा सकता है, जिसे लोग मामूली एवं महत्वहीन मानते हैं-ऐसी चीज़ जो इतनी छोटी है कि लोग सोचते भी नहीं कि वह कभी करेगा। परमेश्वर ढोंगी नहीं है। उसके स्वभाव एवं सार में कोई अतिशयोक्ति, छद्मवेश, गर्व या अहंकार नहीं है। वह कभी डींगें नहीं मारता, बल्कि इसके बजाय निष्‍ठा एवं ईमानदारी से प्रेम करता है, चिंता करता है, ध्यान रखता है और मनुष्‍यों की अगुआई करता है, जिन्हें उसने बनाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग इसकी कितनी ही कम सराहना करते हैं, अहसास करते हैं या देखते हैं जो परमेश्वर करता है, वह निश्चय ही यह कर रहा है। क्या यह जानना कि परमेश्वर के पास ऐसा सार है, उसके लिए लोगों के प्रेम को प्रभावित करेगा? क्या यह परमेश्वर के लिए उनके भय को प्रभावित करेगा? मैं आशा करता हूँ कि जब तुम परमेश्वर के वास्तविक पहलू को समझ जाओगे, तो तुम उसके और करीब हो जाओगे और तुम मानवजाति के प्रति उसके प्रेम एवं देखभाल की सचमुच में और अधिक सराहना करने के योग्य हो जाओगे, अपना हृदय परमेश्वर को देने लायक हो जाओगे और उसके प्रति तुम्हें कोई संदेह और शंका नहीं रहेगी। परमेश्वर चुपचाप मनुष्य के लिए सब कुछ कर रहा है, वह यह सब अपनी ईमानदारी, निष्‍ठा एवं प्रेम के ज़रिए खामोशी से कर रहा है। लेकिन वह जो भी करता है, उसे लेकर उसे कभी शंकाएँ या खेद नहीं होते, न ही उसे कभी आवश्यकता होती है कि कोई उसे किसी रीति से बदले में कुछ दे या कभी मानवजाति से कोई चीज़ प्राप्त करने के उसके इरादे हैं। वह सब कुछ जो उसने हमेशा किया है उसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि वह मानवजाति के सच्चे विश्वास एवं प्रेम को प्राप्त कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 26

परमेश्वर संसार को जलप्रलय से नष्ट करने का इरादा करता है और नूह को एक जहाज बनाने का निर्देश देता है

उत्पत्ति 6:9-14 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था; और नूह परमेश्‍वर ही के साथ साथ चलता रहा। और नूह से शेम, और हाम, और येपेत नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। उस समय पृथ्वी परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था। तब परमेश्‍वर ने नूह से कहा, "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा। इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उसमें कोठरियाँ बनाना, और भीतर-बाहर उस पर राल लगाना।"

उत्पत्ति 6:18-22 "परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। एक एक जाति के पक्षी, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएँगे, कि तू उनको जीवित रखे। और भाँति भाँति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपने पास इकट्ठा कर रखना; जो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा।" परमेश्‍वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

इन अंशों को पढ़ने के बाद क्या अब तुम लोगों को सामान्य समझ है कि नूह कौन था? नूह किस प्रकार का व्यक्ति था? मूल पाठ है : "नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था।" वर्तमान लोगों की समझ के अनुसार, उन दिनों, एक "धर्मी पुरुष" किस प्रकार का व्यक्ति होता था? एक धर्मी पुरुष को पूर्ण होना चाहिए। क्या तुम लोग जानते हो कि यह पूर्ण व्यक्ति मनुष्य की दृष्टि में पूर्ण था या परमेश्वर की दृष्टि में पूर्ण था? बिना किसी शंका के, यह पूर्ण व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में पूर्ण था और मनुष्य की दृष्टि में नहीं। यह तो निश्चित है! ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्य अंधा है और देख नहीं सकता, और सिर्फ परमेश्वर ही पूरी पृथ्वी और हर एक व्यक्ति को देखता है, सिर्फ परमेश्वर ही जानता था कि नूह एक पूर्ण व्यक्ति था। इसलिए, संसार को जलप्रलय से नष्ट करने की परमेश्वर की योजना उस क्षण शुरू हो गई थी, जब उसने नूह को बुलाया था।

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नूह का बुलाया जाना एक साधारण तथ्य है, परंतु वह मुख्य बिंदु जिसके विषय में हम बात कर रहे हैं—परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की इच्छा एवं उसका सार—वह इतना साधारण नहीं है। परमेश्वर के इन विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए, हमें पहले समझना होगा कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को बुलाने की इच्छा करता है, और इसके माध्यम से, हमें उसके स्वभाव, इच्छा एवं सार को समझना होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः परमेश्वर की नज़रों में, यह किस प्रकार का व्यक्ति होता है, जिसे वह बुलाता है? यह ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो उसके वचनों को सुन सके, जो उसके निर्देशों का अनुसरण कर सके। साथ ही, यह ऐसा व्यक्ति भी होना चाहिए, जिसमें ज़िम्मेदारी की भावना हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को ऐसी ज़िम्मेदारी एवं कर्तव्य मानकर क्रियान्वित करेगा, जिसे निभाने के लिए वो बाध्य है। तब क्या इस व्यक्ति को ऐसा व्यक्ति होने की आवश्यकता है, जो परमेश्वर को जानता है? नहीं। उस समय अतीत में, नूह ने परमेश्वर की शिक्षाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं सुना था या परमेश्वर के किसी कार्य का अनुभव नहीं किया था। इसलिए, परमेश्वर के बारे में नूह का ज्ञान बहुत ही कम था। हालाँकि यहाँ लिखा है कि नूह परमेश्वर के साथ-साथ चलता रहा, तो क्या उसने कभी परमेश्वर के व्यक्तित्व को देखा था? उत्तर है, पक्के तौर पर नहीं! क्योंकि उन दिनों, सिर्फ परमेश्वर के दूत ही लोगों के बीच आते थे। जबकि वे चीज़ों की कथनी और करनी में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, वे महज परमेश्वर की इच्छा एवं इरादों को सूचित कर रहे होते थे। परमेश्वर का व्यक्तित्व मनुष्य पर आमने-सामने प्रकट नहीं हुआ था। पवित्र शास्त्र के इस भाग में, हम सब मूल रूप से यही देखते हैं कि नूह को क्या करना था और उसके लिए परमेश्वर के निर्देश क्या थे। अतः वह सार क्या था जिसे यहाँ परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया था? सब कुछ जो परमेश्वर करता है, उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होता है और यह मापदंड निर्धारित करता है कि इससे निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसमें सभी चीज़ों के प्रति भावनाओं की कमी नहीं है। असल में इसका पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक पद है, जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था : "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।" जब परमेश्वर ने यह कहा तो क्या उसका मतलब था वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह देह वाले सभी जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है; परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी देहधारियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अवज्ञा के प्रति उसके धीरज की एक सीमा है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था : "और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।" इस वाक्यांश "क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, इनमें परमेश्वर का अनुसरण करने वाले, वे जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि में आ गया, तो उसे उनका नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी देहधारियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे वे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक जब मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था, जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति के होने की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता हो कि परमेश्वर द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों के लिए प्रकाश का और सही मार्ग ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व से घृणा की और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य का भ्रष्टाचार इस बिंदु पर पहुँच गया, तो परमेश्वर इसे और अधिक नहीं सह सका। उसका स्थान कौन लेता? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दंड का आगमन। क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का एक आंशिक प्रकाशन नहीं था? इस वर्तमान युग में, क्या ऐसे कोई मनुष्य नहीं हैं, जो परमेश्वर की दृष्टि में धार्मिक हों? क्या ऐसे कोई मनुष्य नहीं हैं, जो परमेश्वर की दृष्टि में पूर्ण हों? क्या यह युग ऐसा युग है, जिसके अंतर्गत परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी पर सभी देहधारियों का व्यवहार भ्रष्ट हो गया है? आज के दिन और युग में, ऐसे लोगों को छोड़कर जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करना चाहता है और जो परमेश्वर का अनुसरण और उसके उद्धार को स्वीकार कर सकते हैं, क्या सभी देहधारी लोग परमेश्वर के धीरज की सीमा को चुनौती नहीं दे रहे हैं? क्या सभी चीज़ें, जो तुम लोगों के आसपास घटित होती हैं, जिन्हें तुम लोग अपनी आँखों से देखते हो और अपने कानों से सुनते हो और इस संसार में व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो, उपद्रव से भरी हुई नहीं हैं? परमेश्वर की दृष्टि में, क्या एक ऐसे संसार एवं ऐसे युग को समाप्त नहीं कर देना चाहिए? यद्यपि इस वर्तमान युग की पृष्ठभूमि नूह के समय की पृष्ठभूमि से पूर्णतः अलग है, फिर भी वे भावनाएँ एवं क्रोध जो मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति परमेश्वर में है, वे वैसी ही बना रहता है। परमेश्वर अपने कार्य के कारण सहनशील होने में समर्थ है, किन्तु सब प्रकार की परिस्थितियों एवं हालात के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में इस संसार को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। जब जलप्रलय द्वारा संसार का विनाश किया गया था, उस लिहाज से तो परिस्थितियाँ कहीं ज़्यादा खराब हैं। किंतु अंतर क्या है? यह भी ऐसी चीज़ है, जो परमेश्वर के हृदय को अत्यंत दुःखी करती है, और कदाचित कुछ ऐसा है, जिसकी तुम लोगों में से कोई भी सराहना नहीं कर सकता।

जब उसने जलप्रलय द्वारा संसार का नाश किया, तब परमेश्वर नूह को जहाज़ बनाने और कुछ तैयारी के काम के लिए बुलाने में सक्षम था। परमेश्वर एक पुरुष—नूह—को बुला सकता था कि वह उसके लिए कार्यों की इन श्रृंखलाओं को अंजाम दे। किंतु इस वर्तमान युग में, परमेश्वर के पास कोई नहीं है, जिसे वो बुलाए। ऐसा क्यों है? हर एक व्यक्ति जो यहाँ बैठा है, वह शायद उस कारण को बहुत अच्छी तरह समझता और जानता है। क्या तुम चाहते हो कि मैं इसे बोलकर बताऊँ? ज़ोर से कहने से हो सकता है कि तुम लोगों के सम्मान को चोट पहुँचे या सब परेशान हो जाएँ। कुछ लोग कह सकते हैं : "हालाँकि परमेश्वर की दृष्टि में हम लोग धार्मिक और पूर्ण नहीं हैं, फिर भी यदि परमेश्वर हमें कुछ करने के लिए निर्देश देता है, तो हम अभी भी इसे करने में समर्थ होंगे। इससे पहले, जब उसने कहा कि एक विनाशकारी तबाही आ रही थी, तो हमने भोजन एवं ऐसी चीज़ों को तैयार करना शुरू कर दिया था, जिनकी आवश्यकता किसी आपदा में होगी। क्या यह सब परमेश्वर की माँगों के अनुसार नहीं किया गया था? क्या हम सचमुच में परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे? जो चीज़ें हमने कीं क्या उनकी तुलना जो कुछ नूह ने किया, उससे नहीं की जा सकती? हमने जो किया क्या वो सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है? क्या हम परमेश्वर के निर्देशों का अनुसरण नहीं कर रहे थे? क्या जो परमेश्वर ने कहा हमने वो इसलिए नहीं किया क्योंकि हमें परमेश्वर के वचनों में विश्वास है? तो परमेश्वर अभी भी दुःखी क्यों है? परमेश्वर क्यों कहता है कि उसके पास बुलाने के लिए कोई भी नहीं है?" क्या तुम लोगों के कार्यों और नूह के कार्यों के बीच कोई अंतर है? अंतर क्या है? (आपदा के लिए आज भोजन तैयार करना हमारा अपना इरादा था।) (हमारे कार्य "धार्मिक" नहीं कहला सकते हैं, जबकि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक धार्मिक पुरुष था।) जो कुछ तुमने कहा वह बहुत गलत नहीं है। जो नूह ने किया वह आवश्यक रूप से उससे अलग है, जो लोग अब कर रहे हैं। जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था, तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर कौनसा कार्य पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी और अधिक स्पष्टीकरण के बिना उसे कुछ करने का निर्देश दिया था, नूह ने आगे बढ़कर इसे कर दिया। उसने गुप्त रूप से परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या निष्ठाहीनता दिखाई। वह बस गया और एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ इसे तदनुसार कर डाला। परमेश्वर उससे जो कुछ भी करवाना चाहता था, उसने किया और कार्यों को करने के लिए परमेश्वर के वचनों को मानने एवं सुनने में विश्वास उसका सहारा बना। इस प्रकार जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था, उसने ईमानदारी एवं सरलता से उसे निपटाया था। उसका सार—उसके कार्यों का सार आज्ञाकारिता थी, अपने अनुमान लगाना या प्रतिरोध नहीं था और इसके अतिरिक्त, अपनी व्यक्तिगत रुचियों और अपने लाभ एवं हानि के विषय में सोचना नहीं था। इसके आगे, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो नूह ने नहीं पूछा कब या उसने नहीं पूछा कि चीज़ों का क्या होगा और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने बस वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। हालाँकि परमेश्वर चाहता था कि इसे बनाया जाए और जिससे बनाया जाए, उसने बिलकुल वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और तुरंत कार्रवाई भी शुरू कर दी। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया। क्या वह आपदा से खुद को बचाने में सहायता करने के लिए यह कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने में कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने बस आज्ञा मानी, सुना और तदनुसार कार्य किया। अब के लोग वैसे नहीं हैं : जैसे ही परमेश्वर के वचन से हल्की सी जानकारी निकलती है, जैसे ही लोग परेशानी या समस्या के किसी चिह्न का आभास करते हैं, वे किसी भी चीज़ और कीमत की परवाह किए बगैर, आपदा के बाद क्या खाएँगे, क्या पियेंगे एवं क्या उपयोग करेंगे, इसकी तैयारी करने के लिए हरकत में आ जाते हैं, यहाँ तक कि विपत्ति से बच निकलने के अपने मार्गों की योजना बना लेते हैं। इससे भी अधिक दिलचस्प तो यह है कि इस अहम घड़ी में, मानवीय दिमाग "काम पूरा करने" में बहुत अच्छे होते हैं। उन परिस्थितियों में जहाँ परमेश्वर ने कोई निर्देश नहीं दिया है, मनुष्य बिलकुल उपयुक्त ढंग से हर चीज़ की योजना बना सकता है। तुम ऐसी योजनाओं का वर्णन करने के लिए "पूर्ण" शब्द का उपयोग कर सकते हो। जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर क्या कहता है, परमेश्वर के इरादे क्या हैं या परमेश्वर क्या चाहता है, कोई भी परवाह नहीं करता और न कोई इसकी सराहना करने की कोशिश करता है। क्या यह आज के लोगों और नूह के बीच में सबसे बड़ा अंतर नहीं है?

नूह की कहानी के इस अभिलेख में, क्या तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को देखते हो? मनुष्य की भ्रष्टता, गंदगी एवं उपद्रव के प्रति परमेश्वर के धीरज की एक सीमा है। जब वह उस सीमा तक पहुँच जाता है, तो वह और अधिक धीरज नहीं रखेगा और इसके बजाय वह अपने नए प्रबंधन और नई योजना को शुरू करेगा, जो उसे करना है उसे प्रारम्भ करेगा, अपने कर्मों और अपने स्वभाव के दूसरे पहलू को प्रकट करेगा। उसका यह कार्य यह दर्शाने के लिए नहीं है कि मनुष्य द्वारा कभी उसे नाराज़ नहीं किया जाना चाहिए या यह कि वह अधिकार एवं क्रोध से भरा हुआ है और यह इस बात को दर्शाने के लिए नहीं है कि वह मानवता का नाश कर सकता है। बात यह है कि उसका स्वभाव एवं उसका पवित्र सार इस प्रकार की मानवता को परमेश्वर के सामने जीवन बिताने हेतु और उसके प्रभुत्व के अधीन जीवन जीने हेतु न तो और अनुमति दे सकता है और न धीरज रख सकता है। कहने का तात्पर्य है, जब सारी मानवजाति उसके विरुद्ध है, जब सारी पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं है जिसे वह बचा सके, तो ऐसी मानवता के लिए उसके पास और अधिक धीरज नहीं होगा और वह बिना किसी संदेह के इस प्रकार की मानवता का नाश करने के लिए अपनी योजना को कार्यान्वित करेगा। परमेश्वर के द्वारा ऐसा कार्य उसके स्वभाव से निर्धारित होता है। यह एक आवश्यक परिणाम है और ऐसा परिणाम है, जिसे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन प्रत्येक सृजित प्राणी को सहना होगा। क्या यह नहीं दर्शाता है कि इस वर्तमान युग में, परमेश्वर अपनी योजना को पूर्ण करने और उन लोगों को बचाने के लिए जिन्हें वह बचाना चाहता है और इंतज़ार नहीं कर सकता? इन परिस्थितियों में, परमेश्वर किस बात की सबसे अधिक परवाह करता है? इसकी नहीं कि किस प्रकार वे जो उसका बिलकुल अनुसरण नहीं करते या वे जो हर तरह से उसका विरोध करते हैं, वे उससे कैसा व्यवहार करते हैं या उसका कैसे प्रतिरोध करते हैं, या मानवजाति किस प्रकार उस पर कलंक लगा रही है। वह केवल इसकी परवाह करता है कि वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, वे जो उसकी प्रबंधन योजना में उसके उद्धार के विषय हैं, उन्हें उसके द्वारा पूरा किया गया है या नहीं, कि वे उसकी संतुष्टि के योग्य बन गए हैं या नहीं। जहाँ तक उसका अनुसरण करने वालों के अलावा अन्य लोगों की बात है, वह मात्र कभी-कभार ही अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए थोड़ा सा दंड देता है। उदाहरण के लिए: सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी का विस्फोट। ठीक उसी समय, वह उनको भी मजबूती से बचा रहा होता और देखरेख कर रहा होता है, जो उसका अनुसरण करते हैं और जिन्हें उसके द्वारा बचाया जाना है। परमेश्वर का स्वभाव यह है : एक ओर, वह उन लोगों के प्रति अधिकतम धीरज एवं सहनशीलता रख सकता है, जिन्हें वह पूर्ण बनाने का इरादा करता है और उनके लिए वह तब तक इंतज़ार कर सकता है, जब तक वह संभवत: कर सकता है; दूसरी ओर, परमेश्वर शैतान-जैसे लोगों से, जो उसका अनुसरण नहीं करते और उसका विरोध करते हैं, अत्यंत नफ़रत एवं घृणा करता है। यद्यपि वह इसकी परवाह नहीं करता कि ये शैतान-जैसे लोग उसका अनुसरण या उसकी आराधना करते हैं या नहीं, वह तब भी उनसे घृणा करता है, जबकि उसके हृदय में उनके लिए धीरज होता है और चूँकि वह इन शैतान-जैसे लोगों के अंत को निर्धारित करता है, इसलिए वह अपनी प्रबंधकीय योजना के चरणों के आगमन का भी इंतज़ार कर रहा होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 27

जलप्रलय के बाद नूह के लिए परमेश्वर की आशीष

उत्पत्ति 9:1-6 फिर परमेश्‍वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, "फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृथ्वी में भर जाओ। तुम्हारा डर और भय पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियों पर बना रहेगा: ये सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूँ। पर मांस को प्राण समेत अर्थात् लहू समेत तुम न खाना। और निश्‍चय ही मैं तुम्हारे लहू अर्थात् प्राण का बदला लूँगा: सब पशुओं और मनुष्यों, दोनों से मैं उसे लूँगा; मनुष्य के प्राण का बदला मैं एक एक के भाई बन्धु से लूँगा। जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा, क्योंकि परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।"

जब नूह ने परमेश्वर के निर्देशों को स्वीकारा, जहाज़ बनाया और परमेश्वर द्वारा संसार का नाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग करने के दौरान जीवित रहा, उसके बाद आठ लोगों का उसका पूरा परिवार जीवित बच गया। नूह के परिवार के आठ लोगों को छोड़कर, सारी मानवजाति का नाश कर दिया गया था और पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का नाश कर दिया गया था। नूह को परमेश्वर ने आशीषें दीं और उससे और उसके बेटों से कुछ बातें कहीं। ये बातें वे थीं, जिन्हें परमेश्वर उसे प्रदान कर रहा था और उसके लिए परमेश्वर की आशीष भी थीं। यह वह आशीष एवं प्रतिज्ञा है, जिसे परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को देता है, जो उसे सुन सकता है और उसके निर्देशों को स्वीकार कर सकता है और साथ ही ऐसा तरीका भी है, जिससे परमेश्वर लोगों को प्रतिफल देता है। कहने का तात्पर्य है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक पूर्ण पुरुष या एक धार्मिक पुरुष था या नहीं और इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह परमेश्वर के बारे में कितना जानता था, संक्षेप में, नूह और उसके सभी तीन पुत्रों ने परमेश्वर के वचनों को सुना था, परमेश्वर के कार्य में सहयोग किया था और वही किया था, जिसे परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार उनसे करने की अपेक्षा थी। परिणामस्वरूप, जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश के बाद उन्होंने परमेश्वर के लिए मनुष्यों एवं विभिन्न प्रकार के जीवित प्राणियों को संरक्षित किया था और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के अगले चरण में बड़ा योगदान दिया था। वह सब कुछ जो उसने किया, उसके कारण परमेश्वर ने उसे आशीष दी। शायद आज के लोगों के लिए, जो कुछ नूह ने किया था वह उल्लेख करने के भी लायक नहीं था। कुछ लोग सोच सकते हैं : नूह ने कुछ भी नहीं किया था; परमेश्वर ने उसे बचाने के लिए अपना मन बना लिया था, अतः उसे निश्चित रूप से बचाया ही जाना था। उसका जीवित बचना उसकी अपनी उपलब्धियों की वजह से नहीं था। यह वह है, जिसे परमेश्वर घटित करना चाहता था, क्योंकि मनुष्य निष्क्रिय है। लेकिन यह वह नहीं, जो परमेश्वर सोच रहा था। परमेश्वर को, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति महान है या मामूली, जब तक वे उसे सुन सकते हैं, उसके निर्देशों और जो कुछ वह सौंपता है उसका पालन कर सकते हैं और उसके कार्य, उसकी इच्छा एवं उसकी योजना के साथ सहयोग कर सकते हैं, ताकि उसकी इच्छा एवं उसकी योजना निर्विघ्न से पूरी की जा सके, तो ऐसा आचरण उसके द्वारा स्मरण रखने और उसकी आशीष प्राप्त करने के योग्य है। परमेश्वर ऐसे लोगों को बहुमूल्य समझता है और वह उनके कार्यों एवं अपने लिए उनके प्रेम एवं उनके स्नेह को हृदय में संजोता है। यह परमेश्वर का रवैया है। तो परमेश्वर ने नूह को आशीष क्यों दी? क्योंकि परमेश्वर इसी तरह ऐसे कार्यों एवं मनुष्‍य की आज्ञाकारिता से पेश आता है।

नूह के विषय में परमेश्वर की आशीष के लिहाज से, कुछ लोग कहेंगे : "यदि मनुष्य परमेश्वर को सुनता है और परमेश्वर को संतुष्ट करता है, तो परमेश्वर को मनुष्य को आशीष देना चाहिए। क्या कहे बिना ही ऐसा नहीं होता?" क्या हम ऐसा कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं : "नहीं।" हम ऐसा क्यों नहीं कह सकते? कुछ लोग कहते हैं : "मनुष्य परमेश्वर की आशीष का आनंद उठाने के लायक नहीं है।" यह पूर्णतः सही नहीं है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के सौंपे हुए को स्वीकार करता है, तो परमेश्वर के पास न्याय करने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे और उस व्यक्ति ने आज्ञा का पालन किया है या नहीं और उस व्यक्ति ने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट किया है या नहीं और वे मानक पूरे करते हैं या नहीं। परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह है व्यक्ति का हृदय, न कि ऊपरी तौर पर किए गए उसके कार्य। ऐसी बात नहीं है कि परमेश्वर को किसी व्यक्ति को तब तक आशीष देना चाहिए जब तक वे कुछ करते हैं, इसकी परवाह किए बिना कि वे इसे कैसे करते हैं। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ चीज़ों का अंतिम परिणाम ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक ज़ोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीज़ों के आगे बढ़ने के दौरान किसी व्यक्ति का रवैया कैसा रहता है और वह यह देखता है कि उसके हृदय में आज्ञाकारिता, विचार एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं। उस समय नूह परमेश्वर के बारे में कितना जानता था? क्या यह उतना था, जितना इन सिद्धांतों को अब तुम लोग जानते हो? परमेश्वर की अवधारणाएँ एवं उसका ज्ञान जैसे सत्य के पहलुओं के लिहाज से क्या उसने उतनी सिंचाई एवं चरवाही पाई थी, जितनी तुम लोगों ने पाई है? नहीं, उसने नहीं पाई थीं! लेकिन एक तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता : चेतना में, मन में और यहाँ तक कि आज के लोगों के हृदय की गहराई में भी, परमेश्वर के विषय में उनकी अवधारणाएँ और रवैया अज्ञात एवं अस्पष्ट हैं। तुम लोग यहाँ तक कह सकते हो कि लोगों का एक हिस्सा परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति एक नकारात्मक रवैया रखता है। लेकिन नूह के हृदय एवं चेतना में, परमेश्वर का अस्तित्व परम एवं ज़रा भी संदेह के परे था, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता मिलावट रहित थी और परीक्षा का सामना कर सकती थी। उसका हृदय शुद्ध एवं परमेश्वर के प्रति खुला हुआ था। उसे परमेश्वर के हर एक वचन का अनुसरण करने हेतु अपने आपको आश्वस्त करने के लिए सिद्धांतों के बहुत अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी, न ही उसे परमेश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए बहुत सारे तथ्यों की आवश्यकता थी, ताकि जो कुछ परमेश्वर ने सौंपा था, वह उसे स्वीकार कर सके और जो कुछ भी करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी थी, वह उसे करने के योग्य हो सके। यह नूह और आज के लोगों के बीच आवश्यक अंतर है। साथ ही यह बिलकुल सही परिभाषा भी है कि परमेश्वर की दृष्टि में एक पूर्ण मनुष्य कैसा होता है। परमेश्वर जो चाहता है, वे नूह जैसे लोग हैं। वह उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसकी परमेश्वर प्रशंसा करता है और बिलकुल उसी प्रकार का व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर आशीष देता है। क्या तुम लोगों ने इससे कोई प्रबोधन प्राप्त किया है? लोग लोगों को बाहर से देखते हैं, जबकि जो परमेश्वर देखता है वह लोगों के हृदय एवं उनके सार हैं। परमेश्वर किसी को भी अपने प्रति अधूरा-मन या शंका रखने की अनुमति नहीं देता, न ही वह लोगों को किसी तरीके से उस पर संदेह करने या उसकी परीक्षा लेने की इजाज़त देता है। इस प्रकार, हालाँकि आज लोग परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हैं—तुम लोग यह भी कह सकते हो कि परमेश्वर के आमने-सामने हैं—फिर भी किसी चीज़ के कारण जो उनके हृदय की गहराई में है, उनके भ्रष्ट सार के अस्तित्व और परमेश्वर के प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण, लोगों को परमेश्वर में सच्चे विश्वास से अवरोधित किया गया है और उसके प्रति उनकी आज्ञाकारिता में उन्हें बाधित किया गया है। इस कारण, उनके लिए यह बहुत कठिन है कि वे वह आशीष हासिल कर पाएँ, जिसे परमेश्वर ने नूह को प्रदान किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 28

परमेश्वर मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को प्रतीक के रूप में उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

इसके आगे, आओ, हम पवित्र शास्त्रों के इस भाग पर एक नज़र डालें कि किस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को एक चिह्न के रूप में उपयोग किया।

अधिकांश लोग जानते हैं कि इंद्रधनुष क्या है और उन्होंने इंद्रधनुष से जुड़ी कुछ कहानियों को सुना है। जहाँ तक बाइबल में इंद्रधनुष के बारे में उस कहानी की बात है, कुछ लोग इसका विश्वास करते हैं, कुछ इसे किंवदंती की तरह मानते हैं, जबकि अन्य लोग इस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते। चाहे जो हो, इंद्रधनुष के संबंध में घटित सभी घटनाएं परमेश्वर का कार्य थीं और मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रबंधन की प्रक्रिया के दौरान घटित हुई थीं। इन घटनाओं को बाइबल में हूबहू लिखा गया है। ये अभिलेख हमें यह नहीं बताते हैं कि उस समय परमेश्वर किस मनोदशा में था या इन वचनों के पीछे उसके क्या इरादे थे, जिन्हें परमेश्वर ने कहा था। इसके अतिरिक्त, कोई भी इसका आकलन नहीं कर सकता कि जब परमेश्वर ने उन्हें कहा तो वह कैसा महसूस कर रहा था। फिर भी, इस समूचे हालात के लिहाज से परमेश्वर के मन की दशा को पाठ की पंक्तियों के बीच प्रकट किया गया है। यह ऐसा है, मानो परमेश्वर के वचन के प्रत्येक शब्द एवं वाक्यांश के ज़रिये उस समय के उसके विचार पन्नों से निकल पड़ते हैं।

ये परमेश्वर के विचार हैं, जिनके बारे में लोगों को चिंतित होना चाहिए और जिन्हें जानने के लिए उन्हें सबसे अधिक कोशिश करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि परमेश्वर के विचार परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ से जटिल ढंग से जुड़े हैं और परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ जीवन में मनुष्य के प्रवेश की एक अनिवार्य कड़ी है। अतः परमेश्वर उस समय क्या सोच रहा था जब ये घटनाएं घटित हुई थीं?

मूल रूप से, परमेश्वर ने ऐसी मानवता की सृष्टि की थी जो उसकी दृष्टि में बहुत ही अच्छी और उसके बहुत ही निकट थी, किंतु उसके विरुद्ध विद्रोह करने के पश्चात जलप्रलय द्वारा उनका विनाश कर दिया गया। क्या इससे परमेश्वर को कष्ट पहुँचा कि एक ऐसी मानवता तुरंत ही इस तरह विलुप्त हो गई थी? निश्चय ही इससे कष्ट पहुँचा! तो उसकी इस दर्द की अभिव्यक्ति क्या थी? बाइबल में इसे कैसे लिखा गया? इसे बाइबल में इस रूप से लिखा गया : "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" यह साधारण वाक्य परमेश्वर के विचारों को प्रकट करता है। संसार के इस विनाश ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया। मनुष्य के शब्दों में, वह बहुत ही दुःखी था। हम कल्पना कर सकते हैं : जलप्रलय के द्वारा नाश किए जाने के बाद पृथ्वी जो किसी समय जीवन से भरी हुई थी, वह कैसी दिखाई देती थी? वह पृथ्वी जो किसी समय मानवों से भरी हुई थी, अब कैसी दिखती थी? कोई मानवीय निवास नहीं, कोई जीवित प्राणी नहीं, हर जगह पानी ही पानी और जल की सतह पर पूरी तरह तबाही। जब परमेश्वर ने संसार को बनाया तो क्या उसकी मूल इच्छा ऐसा ही कोई दृश्य था? बिलकुल भी नहीं! परमेश्वर की मूल इच्छा थी कि वह समूची धरती पर जीवन देखे, जिन मानवों को उसने बनाया था उन्हें अपनी आराधना करते देखे, सिर्फ नूह ही उसकी आराधना करने वाला एकमात्र व्यक्ति न हो या ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसकी पुकार का उत्तर दे सके और जो कुछ उसे सौंपा गया था, उसे पूर्ण करे। जब मानवता विलुप्त हो गई, तो परमेश्वर ने वह नहीं देखा, जिसकी उसने मूल रूप से इच्छा की थी बल्कि पूर्णतः विपरीत देखा। उसका हृदय तकलीफ में कैसे नहीं होता? अतः जब वह अपने स्वभाव को प्रकट कर रहा था और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा था, तब परमेश्वर ने एक निर्णय लिया। उसने किस प्रकार का निर्णय लिया? मनुष्य के साथ वाचा के रूप में बादल में एक धनुष बनाने का (यानी, वे इंद्रधनुष जो हम देखते हैं), एक प्रतिज्ञा कि परमेश्वर दोबारा मानवजाति का जलप्रलय से नाश नहीं करेगा। उसी समय, यह लोगों को बताने के लिए भी था कि परमेश्वर ने संसार को जलप्रलय से नाश किया था, ताकि मानवजाति हमेशा याद रखे कि परमेश्वर ने ऐसा कार्य क्यों किया था।

क्या उस समय संसार का विनाश कुछ ऐसा था जो परमेश्वर चाहता था? यह निश्चित रूप से वह नहीं था, जो परमेश्वर चाहता था। संसार के विनाश के बाद हम शायद पृथ्वी के दयनीय दृश्य के एक छोटे से भाग की कल्पना कर सकते हैं, परंतु हम सोच भी नहीं सकते कि उस समय परमेश्वर की निगाहों में वह दृश्य कैसा था। हम कह सकते हैं कि चाहे यह आज के लोग हों या उस समय के, कोई भी यह कल्पना या आकलन नहीं कर सकता कि परमेश्वर उस समय क्या महसूस कर रहा था, जब उसने वो दृश्य, संसार की वो तस्वीर देखी जो जलप्रलय के द्वारा विनाश के बाद की थी। मनुष्य की अवज्ञा की वजह से परमेश्वर इसे करने के लिए मजबूर हुआ था, परंतु जलप्रलय द्वारा संसार के विनाश की वजह से परमेश्वर के हृदय के द्वारा सहा गया दर्द एक वास्तविकता है, जिसकी कोई थाह नहीं ले सकता या आँक नहीं सकता। इसीलिए परमेश्वर ने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, जो लोगों को यह बताने के लिए थी कि वे स्मरण रखें कि परमेश्वर ने किसी समय ऐसा कुछ किया था और उन्हें यह वचन देने के लिए था कि परमेश्वर कभी संसार का इस तरह दोबारा नाश नहीं करेगा। इस वाचा में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं—हम देखते हैं कि परमेश्वर का हृदय पीड़ा में था, जब उसने मानवता का नाश किया। मनुष्य की भाषा में, जब परमेश्वर ने मानवजाति का नाश किया और मानवजाति को विलुप्त होते हुए देखा, तो उसका हृदय रो रहा था और उससे लहू बह रहा था। क्या उसके वर्णन का यह सबसे उत्तम तरीका नहीं है? मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए इन शब्दों को मनुष्य द्वारा उपयोग किया जाता है, पर चूँकि मनुष्य की भाषा में बहुत कमी है, तो परमेश्वर के अहसास एवं भावनाओं का वर्णन करने के लिए उनका उपयोग करना मुझे बहुत बुरा नहीं लगता और न ही यह बहुत ज़्यादा है। कम से कम यह तुम लोगों को उस समय परमेश्वर की मनोदशा क्या थी, उसकी एक बहुत जीवंत एवं बहुत ही उपयुक्त समझ प्रदान करता है। जब तुम लोग इंद्रधनुष को दोबारा देखोगे, तो अब तुम क्या सोचोगे? कम से कम तुम लोग स्मरण करोगे कि किस प्रकार एक समय परमेश्वर जल-प्रलय के द्वारा संसार के विनाश पर दुःखी था। तुम लोग स्मरण करोगे कि कैसे, यद्यपि परमेश्वर ने इस संसार से नफ़रत की और इस मानवता को तुच्छ जाना था, जब उसने उन मनुष्यों का विनाश किया, जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था तो उसका हृदय दुख रहा था, उसका हृदय उन्हें छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका हृदय अनिच्छुक था और इसे सहना कठिन महसूस हो रहा था। उसका सुकून सिर्फ नूह के परिवार के आठ लोगों में ही था। यह नूह का सहयोग था, जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि करने के परमेश्वर के श्रमसाध्य प्रयासों को व्यर्थ नहीं जाने दिया। एक समय जब परमेश्वर कष्ट में था, तब यह एकमात्र चीज़ थी जो उसकी पीड़ा की क्षतिपूर्ति कर सकती थी। उस बिंदु से, परमेश्वर ने मानवता की अपनी सारी अपेक्षाओं को नूह के परिवार के ऊपर डाल दिया, इस उम्मीद में कि वे उसके आशीषों के अधीन जीवन बिताएँगे और उसके शाप के अधीन नहीं, इस उम्मीद में कि वे परमेश्वर को फिर कभी संसार का जलप्रलय से नाश करते हुए नहीं देखेंगे, और इस उम्मीद में भी कि उनका विनाश नहीं किया जाएगा।

इससे हमको परमेश्वर के स्वभाव के किस भाग को समझना चाहिए? परमेश्वर ने मनुष्य से घृणा की थी क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक गंभीर हद तक भ्रष्टता एवं अवज्ञा से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण और अपने सिद्धांतों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की और यहाँ तक कि वह मानवजाति के छुटकारे के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरंतर जीवित रह सकें। लेकिन, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरंतर परमेश्वर की अवज्ञा करता रहा और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इनकार किया; अर्थात् उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इनकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की या कैसे उनको सहन किया, मनुष्य ने न तो इसे समझा, न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य के प्रति अधिकतम सहनशील बना रहा था, इस इंतज़ार में कि मनुष्य ढर्रा बदलेगा। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात, परमेश्वर ने बिना किसी हिचकिचाहट के वह किया, जो उसे करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी जब परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनाई, तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत तक, एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को ढर्रा बदलने योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी और यह वह आख़िरी मौका था, जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं प्रोत्साहन देने का कार्य किया था। चाहे परमेश्वर का हृदय कितनी भी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और भरपूर दया को जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा हो। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, न कि जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता या झूठी छवियाँ नहीं बनाता कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना मनभावन है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग कभी नहीं करता। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या ये आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या ये संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिंदु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ : इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए खोखले शब्द मात्र है? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही है? नहीं! निश्चित रूप से नहीं! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिलती है, जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है और प्रत्येक व्यक्ति में पूर्ण एवं प्रतिबिंबित होते हैं। चाहे तुमने इसे पहले महसूस किया हो या नहीं, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की हर संभव तरीके से देखभाल कर रहा है, वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने और प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 29

परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किए बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या वे उसका अनुसरण करते हैं, परमेश्वर मनुष्य से अपने सबसे अधिक दुलारे प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं—और उसके खिलौनों जैसा नहीं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अंतर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है, वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिंता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्तियाँ करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या जिसे ढेर सारा श्रेय मिलना चाहिए। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनके लिए आपूर्तियाँ करना, और उन्हें सब कुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है। वह मानवजाति को अपने तरीके से और स्वयं के सार और जो वह स्वयं है और जो उसके पास है, उसके माध्यम से बस खामोशी से एवं चुपचाप प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति को उससे कितना भोजन प्रबंध एवं कितनी सहायता प्राप्त होती है, परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता या श्रेय लेने की कोशिश नहीं करता। यह परमेश्वर के सार द्वारा निर्धारित होता है और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसीलिए, चाहे यह बाइबल में हो या किसी अन्य पुस्तक में, हम परमेश्वर को कभी अपने विचार व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को यह वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे वह मानवजाति को अपने प्रति आभारी बनाए या उससे अपनी स्तुति कराए। यहाँ तक कि जब उसे क़़ष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, तब भी वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिंता को कभी नहीं भूलता; वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरंतर मानवजाति को प्रदान करता रहता है जैसा कि वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अक्सर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, पर इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर द्वारा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि परमेश्वर कभी ऐसा इरादा नहीं रखता कि मानवजाति के लिए किए गए उसके अच्छे कार्य के बदले उसे धन्यवाद दिया जाए या उसका मूल्य वापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, जो सचमुच परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हैं, उसको सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं और जो उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं—ये ऐसे लोग हैं, जो प्रायः परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसे आशीष प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसे आशीष जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, अक्सर उनकी कल्पना से परे होते हैं और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होते हैं, जिसका औचित्य मानव उससे सिद्ध कर सकते हों जो उन्होंने किया है या जो कीमत उन्होंने चुकाई है। जब मानवजाति परमेश्वर के आशीष का आनंद ले रही होती है, तब क्या कोई परवाह करता है कि परमेश्वर क्या कर रहा है? क्या कोई किसी प्रकार की चिंता करता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा होता है? क्या कोई परमेश्वर की पीड़ा के आकलन की कोशिश करता है? इन प्रश्नों का साफ उत्तर है, नहीं! क्या नूह समेत कोई मनुष्य उस दर्द का आकलन कर सकता है, जिसे परमेश्वर उस समय महसूस कर रहा था? क्या कोई समझ सकता है कि क्यों परमेश्वर एक ऐसी वाचा तैयार करेगा? वे नहीं समझ सकते! मानवजाति परमेश्वर की पीड़ा का आकलन नहीं करती है, इसलिए नहीं कि वो परमेश्वर की पीड़ा नहीं समझती और इसलिए नहीं कि परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच अंतर है या उनकी हैसियत में अंतर है; बल्कि इसलिए क्योंकि मानवजाति परमेश्वर की किसी भावना की बिल्कुल परवाह नहीं करती। मानवजाति सोचती है कि परमेश्वर तो आत्मनिर्भर है—परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि लोग उसकी देखरेख करें, उसे समझें या उसके प्रति परवाह दिखाएं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, अतः उसे कोई दर्द नहीं होता, उसकी कोई भावनाएँ नहीं हैं; वह दुःखी नहीं होगा, वह शोक महसूस नहीं करता है, यहाँ तक कि वह रोता भी नहीं है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए उसे किसी भावनात्मक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और उसे किसी भावनात्मक सुकून की आवश्यकता नहीं है। यदि उसे कुछ निश्चित परिस्थितियों में इनकी आवश्यकता होती भी है, तो वह अकेले ही इस सबसे निपट सकता है और उसे मानवजाति से किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके विपरीत, यह तो "कमज़ोर, अपरिपक्व" मनुष्य हैं, जिन्हें परमेश्वर की सांत्वना, भोजन-प्रबंध एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है और यहाँ तक कि उन्हें अपनी भावनाओं को किसी भी समय एवं स्थान पर सांत्वना देने के लिए भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है। ऐसी चीज़ें मानवजाति के हृदय के भीतर गहराई में छिपी होती हैं : मनुष्य कमज़ोर प्राणी है; उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है कि वह हर तरीके से उनकी देखरेख करे, वे परमेश्वर से मिलने वाली सब प्रकार की देखभाल के हकदार हैं और उन्हें परमेश्वर से किसी भी ऐसी चीज़ की माँग करनी चाहिए जिसे वे महसूस करते हैं कि वह उनकी होनी चाहिए। परमेश्वर बलवान है; उसके पास सब कुछ है और उसे मानवजाति का अभिभावक और आशीष प्रदान करने वाला होना चाहिए। चूँकि वह पहले से ही परमेश्वर है, वह सर्वशक्तिमान है और उसे मानवजाति से कभी किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के किसी भी प्रकाशन पर ध्यान नहीं देता है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर के शोक, पीड़ा या आनंद को महसूस नहीं किया है। परंतु इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य की सभी अभिव्यक्तियों को अंदर-बाहर अच्छी तरह जानता है। परमेश्वर सभी समय एवं सभी स्थानों पर प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, प्रत्येक मनुष्य के बदलते विचारों का अवलोकन करता है और इस प्रकार उनको सांत्वना एवं प्रोत्साहन देता है और उन्हें मार्गदर्शन देता और रोशन करता है। उन सभी चीजों के संदर्भ में जो परमेश्वर ने मानवजाति पर की हैं और उनके कारण उसने जो कीमतें चुकाई हैं, क्या लोग बाइबल से या किसी ऐसी चीज़ से एक अंश भी ढूँढ़ सकते हैं, जो परमेश्वर ने अब तक कहा है, जो साफ़-साफ़ कहता हो कि परमेश्वर मनुष्य से किसी चीज़ की माँग करेगा? नहीं! इसके विपरीत, चाहे लोग परमेश्वर की सोच को कितना भी अनदेखा करें, वह फिर भी बार-बार मानवजाति की अगुआई करता है, बार-बार मानवजाति की आपूर्ति करता है और उनकी सहायता करता है कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल सकें ताकि वे उस खूबसूरत मंज़िल को प्राप्त कर सकें जो उसने उनके लिए तैयार की है। जब परमेश्वर की बात आती है, जो वह स्वयं है और जो उसके पास है, उसके अनुग्रह, उसकी दया और उसके सभी प्रतिफल बिना किसी हिचकिचाहट के उन लोगों को प्रदान किए जाएँगे, जो उससे प्रेम एवं उसका अनुसरण करते हैं। किंतु वह उस पीड़ा को, जो उसने सही है या अपनी मनोदशा को कभी किसी व्यक्ति पर प्रकट नहीं करता और वह किसी के बारे में कभी शिकायत नहीं करता कि वह उसके प्रति ध्यान नहीं देता या उसकी इच्छा को नहीं जानता है। वह खामोशी से यह सब सहता है, उस दिन का इंतज़ार करते हुए जब मानवजाति यह समझने के योग्य हो जाएगी।

मैं यहाँ ये बातें क्यों कहता हूँ? तुम लोग उन बातों में क्या देखते हो जिन्हें मैंने कहा है? परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से नज़रअंदाज़ किया सकता है, कुछ ऐसा जो केवल परमेश्वर के ही पास है और किसी व्यक्ति के पास नहीं, इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें अन्य महान, अच्छे लोग या अपनी कल्पना में परमेश्वर मानते हैं। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचोगे कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी सौदा या मोलभाव नहीं करते या तुम्हें लगता है कि तुम तब भी बहुत निःस्वार्थ होते हो, जब तुम्हारे माता-पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास "निःस्वार्थ" शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द और यह तो मानते हो निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही श्रेष्ठ होना है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम स्वयं को अत्यधिक सम्मान देते हो। परंतु ऐसा कोई नहीं है, जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं एवं वस्तुओं के मध्य और उसके कार्य में परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। तुम परमेश्वर का अनुसरण तो करते हो, किंतु तुम कभी नहीं देखते या तारीफ नहीं करते कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्तियाँ करता है, तुम्हें प्रेम करता है और तुम्हारे लिए चिंता करता है। तो तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो, जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो, जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों की परवाह करते हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। ऐसे "निःस्वार्थ" लोग कभी भी उस परमेश्वर की चिंता नहीं करते, जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निंदनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है, खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत एवं परमेश्वर से असंबद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का सच्चा प्रकाशन है। यह बिलकुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे निरंतर आपूर्ति प्राप्त करता रहता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परंतु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही इसे जान जाओगे: सभी लोगों, मामलों एवं चीज़ों के मध्य, जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता झूठी, सतही एवं अप्रामाणिक है; उसका एक उद्देश्य होता है, निश्चित इरादे होते हैं, समझौते होते हैं और वह परीक्षा में नहीं ठहर सकती। तुम यह तक कह सकते हो कि यह गंदी एवं घिनौनी है। क्या तुम लोग इन वचनों से सहमत हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 30

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

नूह की कहानी के अंत में, हम देखते हैं कि उस समय परमेश्वर ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक असामान्य तरीके का उपयोग किया था। यह तरीका बहुत ही ख़ास था: मनुष्य के साथ एक वाचा बांधना, जिसने जलप्रलय से संसार के विनाश के अंत की घोषणा की। ऊपर से, एक वाचा बांधना बहुत ही साधारण सी बात लग सकती है। यह दो पक्षों को आबद्ध करने और अपने समझौते का उल्लंघन करने से रोकने के लिए शब्दों का उपयोग करने के अलावा और कुछ नहीं है, ताकि दोनों के हितों की रक्षा हो सके। देखने में, यह बहुत ही साधारण बात है, किंतु इसे करने के पीछे की प्रेरणा और परमेश्वर द्वारा इसे करने के इरादे से यह परमेश्वर के स्वभाव एवं मनोदशा का एक सच्चा प्रकाशन है। यदि तुम बस इन वचनों को एक तरफ रखते और उन्हें अनदेखा करते, यदि मैं तुम लोगों को इन चीज़ों की सच्चाई कभी न बताऊँ, तो मानवजाति परमेश्वर की सोच को वास्तव में कभी नहीं जान पाएगी। कदाचित तुम्हारी कल्पना में परमेश्वर मुस्कुरा रहा था जब उसने यह वाचा बाँधी, या कदाचित उसकी अभिव्यक्ति गंभीर थी, परंतु इसकी परवाह किए बगैर कि लोगों की कल्पनाओं में परमेश्वर के पास कौन सी सबसे सामान्य अभिव्यक्ति थी, कोई भी परमेश्वर के हृदय या उसकी पीड़ा को नहीं देख पाया था, उसके अकेलेपन की तो बात ही छोड़ो। कोई भी परमेश्वर से अपने ऊपर भरोसा नहीं करवा सकता या परमेश्वर के भरोसे के लायक नहीं हो सकता, या ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जिसके सामने परमेश्वर अपने विचारों को व्यक्त कर सके या जिसे अपनी पीड़ा बता सके। इसीलिए परमेश्वर के पास ऐसा कार्य करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं था। ऊपरी तौर पर, परमेश्वर ने मानवता को वैसे ही विदाई देकर एक आसान कार्य किया जैसी वह थी, भूतकाल के मुद्दे को व्यवस्थित किया और जलप्रलय द्वारा संसार के अपने विनाश का उपयुक्त निष्कर्ष निकाला। हालाँकि, परमेश्वर ने इसी क्षण से उस पीड़ा को अपने हृदय की गहराई में दफन कर दिया। ऐसे समय जब परमेश्वर के पास भरोसा करने लायक कोई नहीं था, उसने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, उन्हें यह बताते हुए कि वह दोबारा संसार का जलप्रलय द्वारा नाश नहीं करेगा। जब इंद्रधनुष प्रकट हुआ तो यह लोगों को स्मरण दिलाने के लिए था कि किसी समय एक ऐसी घटना घटी थी और उन्हें चेतावनी देने के लिए था कि वे बुरे काम न करें। यहाँ तक कि ऐसी दुखदायी दशा में भी, परमेश्वर मानवजाति के बारे में नहीं भूला और तब भी उसने उनके लिए अत्यधिक चिंता दिखाई। क्या यह परमेश्वर का प्रेम एवं निःस्वार्थता नहीं है? किंतु लोग क्या सोचते हैं जब वे कष्ट सह रहे होते हैं? क्या यह वह समय नहीं, जब उन्हें परमेश्वर की सबसे अधिक ज़रूरत होती है? ऐसे समय, लोग हमेशा परमेश्वर को घसीट लाते हैं ताकि परमेश्वर उन्हें सांत्वना दे। चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर लोगों को कभी निराश होने नहीं देगा, और वह हमेशा लोगों को इस लायक बनाएगा कि वे अपनी दुर्दशा से बाहर निकलें और प्रकाश में जीवन बिताएँ। हालाँकि परमेश्वर मानवजाति के लिए इतना प्रदान करता है, फिर भी मनुष्य के हृदय में परमेश्वर एक आश्वासन की गोली और सांत्वना के स्फूर्तिदायक द्रव्य के अलावा और कुछ नहीं है। जब परमेश्वर दुख उठा रहा होता है, जब उसका हृदय ज़ख्मी होता है, तब उसका साथ देने या उसे सांत्वना देने के लिए किसी सृजित किए गए प्राणी या किसी व्यक्ति का होना निःसन्देह परमेश्वर के लिए एक असाधारण इच्छा ही होगी। मनुष्य कभी परमेश्वर की भावनाओं पर ध्यान नहीं देता है, अतः परमेश्वर कभी यह माँग या अपेक्षा नहीं करता है कि कोई हो जो उसे सांत्वना दे। अपनी मनोदशा व्यक्त करने के लिए वह महज अपने तरीकों का उपयोग करता है। लोग नहीं सोचते हैं कि थोड़े-बहुत दु:ख-दर्द से होकर गुज़रना परमेश्वर के लिए कोई बहुत बड़ी बात है, लेकिन जब तुम सचमुच में परमेश्वर को समझने की कोशिश करते हो, जब वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है, उसमें तुम सचमुच उसके सच्चे इरादों की सराहना कर सकते हो, केवल तभी तुम परमेश्वर की महानता एवं उसकी निःस्वार्थता को महसूस कर सकते हो। यद्यपि परमेश्वर ने इंद्रधनुष का उपयोग करते हुए मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, फिर भी उसने किसी को कभी नहीं बताया कि उसने ऐसा क्यों किया था-क्यों उसने इस वाचा को स्थापित किया था-मतलब उसने कभी किसी को अपने वास्तविक विचार नहीं बताए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा कोई नहीं है, जो उस प्रेम की गहराई को बूझ सके, जो अपने हाथों से बनाई मानवजाति के लिए परमेश्वर के पास है और साथ ही ऐसा भी कोई नहीं है जो इसकी सराहना कर सके कि मानवता का विनाश करते हुए उसके हृदय ने वास्तव में कितनी पीड़ा सहन की थी। इसलिए, भले ही परमेश्वर ने लोगों को बताया होता कि उसने कैसा महसूस किया था, फिर भी वे उस पर भरोसा नहीं कर पाते। पीड़ा में होने के बावजूद, वह अभी भी अपने कार्य के अगले चरण को जारी रखे हुए है। परमेश्वर हमेशा मानवजाति को अपना सर्वोतम पहलू एवं बेहतरीन चीजें देता है जबकि स्वयं ही सारे दुखों को खामोशी से सहता रहता है। परमेश्वर कभी भी इन पीड़ाओं को खुले तौर पर प्रकट नहीं करता। इसके बजाय, वह उन्हें सहता है और खामोशी से इंतज़ार करता है। परमेश्वर की सहनशीलता शुष्क, सुन्न, या असहाय नहीं है, न ही यह कमज़ोरी का चिह्न है। बल्कि परमेश्वर का प्रेम एवं सार हमेशा से ही निःस्वार्थ रहा है। यह उसके सार एवं स्वभाव का एक प्राकृतिक प्रकाशन है और एक सच्चे सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर की पहचान का एक सच्चा मूर्तरूप है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

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