परमेश्वर को जानना 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 1

तुम में से प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर में विश्वास करने के जीवन को नए सिरे से जाँचकर यह देखना चाहिए कि परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया में, तुम परमेश्‍वर को सही अर्थों में समझ पाए हो, सही मायनों में उसे बूझ पाए हो, और वाकई में उसे जान पाए हो या नहीं, क्या तुम वाकई जानते हो कि, विभिन्न मनुष्यों के प्रति परमेश्वर कैसा रवैया रखता है, क्या तुम वास्तव में यह समझ पाए हो कि परमेश्वर तुम पर क्या कार्य कर रहा है और परमेश्वर कैसे तुम्हारे प्रत्येक कार्य को निर्धारित करता है। यह परमेश्वर जो तुम्हारे साथ है, तुम्हारे विकास को दिशा दे रहा है, तुम्हारी नियति को ठहरा रहा है और तुम्हारी सभी आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है—अंतिम विश्लेषण में, तुम उसे कितना समझते हो और वास्तव में उसके बारे में कितना जानते हो? क्या तुम जानते हो कि प्रत्येक दिन वह तुम पर कौन से कार्य करता है? क्या तुम उन नियमों और उद्देश्‍यों को जानते हो जिन पर वह अपने हर कृत्‍य को आधारित करता है? क्या तुम जानते हो कि वह कैसे तुम्हारा मार्गदर्शन करता है? क्या तुम जानते हो कि किन स्रोतों के द्वारा वह तुम्हारी सभी ज़रुरतों को पूरा करता है? क्या तुम जानते हो कि किन तरीकों से वह तुम्हारी अगुवाई करता है? क्या तुम जानते हो कि वह तुमसे किस बात की अपेक्षा रखता है और तुम में क्या हासिल करना चाहता है? क्या तुम उसके रवैये को जानते हो, जो वह तुम्हारे विभिन्न तरह के व्यवहार के प्रति अपनाता है? क्या तुम यह जानते हो कि तुम उसके पसंदीदा व्यक्ति हो या नहीं? क्या तुम उसके आनन्द, क्रोध, दु:ख और प्रसन्नता के पीछे छिपे विचारों और अभिप्रायों और उसके सार को जानते हो? अंत में, क्या तुम जानते हो कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह किस प्रकार का परमेश्वर है? क्या ये और इसी प्रकार के अन्य प्रश्न, ऐसे प्रश्न हैं जिनके बारे में तुमने पहले कभी भी न तो समझा और न ही उन पर विचार किया? परमेश्वर पर अपने विश्वास का अनुसरण करते हुए क्या तुमने परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक सराहना और अनुभव से, उसके प्रति अपनी सभी ग़लतफहमियों को दूर किया है? क्या तुमने कभी भी परमेश्वर का अनुशासन और ताड़ना प्राप्त करने के बाद, सच्ची आज्ञाकारिता और परवाह पायी है? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के मध्य मनुष्य की विद्रोही और शैतानी प्रकृति को जान पाए हो और तुमने परमेश्वर की पवित्रता की थोड़ी सी भी समझ प्राप्त की है? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन अपने जीवन को एक नए नज़रिए से देखना प्रारम्भ किया है? क्या तुमने परमेश्वर के द्वारा भेजे हुए परीक्षणों के मध्य, मनुष्य के अपराध के लिए उसकी असहिष्णुता को, साथ-ही-साथ वह तुमसे क्या अपेक्षा रखता है और वह तुम्हें कैसे बचा रहा है, उसे महसूस किया है? यदि तुम यह नहीं जानते कि परमेश्वर को गलत समझना क्या है या इन ग़लतफहमियों को ठीक कैसे किया जा सकता है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर के साथ कभी भी वास्तविक सहभागिता में नहीं आए हो और तुमने कभी परमेश्वर को समझा ही नहीं है, या कम-से-कम यह कहा जा सकता है कि तुमने उसे कभी भी समझने की इच्छा नहीं की है। यदि तुम परमेश्वर के अनुशासन और ताड़ना को नहीं जानते हो, तो निश्चित ही तुम नहीं जानते कि आज्ञाकारिता और परवाह क्‍या हैं, या फिर तुम कभी परमेश्वर के प्रति वास्तव में आज्ञाकारी नहीं हुए और तुमने परमेश्वर की परवाह तक नहीं की। यदि तुमने कभी भी परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को अनुभव नहीं किया है तो निश्चित तौर पर तुम उसकी पवित्रता को नहीं जान पाओगे, यह तो और भी नहीं समझ पाओगे कि मनुष्यों का विद्रोह क्या होता है। यदि तुम्हारे पास कभी भी जीवन के प्रति उचित दृष्टिकोण नहीं रहा है या जीवन में सही उद्देश्य नहीं रहा है, तुम अब तक अपने जीवन में भविष्य के पथ के प्रति दुविधा और अनिर्णय की स्थिति में हो, यहां तक कि आगे बढ़ने में भी हिचकिचाहट की स्थिति में हो, तो यह स्पष्ट है कि तुमने सही मायनों में परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन कभी नहीं पाई है और यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हें कभी भी परमेश्वर के वचनों का पोषण या आपूर्ति प्राप्त नहीं हुई है। यदि तुम अभी तक परमेश्वर की परीक्षा से नहीं गुज़रे हो तो कहने के जरूरत नहीं है कि तुम यकीनन यह नहीं जान पाओगे कि मनुष्य के अपराधों के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता क्या है और न ही यह समझ सकोगे कि आख़िरकार परमेश्वर तुमसे चाहता क्या है, और इसकी समझ तो और भी कम होगी कि अंतत: मनुष्य के प्रबंधन और बचाव का उसका कार्य क्‍या है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करता रहा हो, यदि उसने कभी भी उसके वचन का अनुभव या उनसे कोई बोध हासिल नहीं किया है तो फ़िर वह निश्चित तौर पर उद्धार के मार्ग पर नहीं चल रहा है, और परमेश्वर पर उसका विश्वास किसी वास्तविक विषयवस्तु से रहित है, उसका परमेश्वर के प्रति ज्ञान भी निश्चय ही शून्य है और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा क्या होती है इसका उसे बिल्कुल भी अनुमान नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 2

परमेश्वर का स्‍वरूप और अस्तित्‍व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव—इन सब से मानवजाति को उसके वचन के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। जब मनुष्‍य परमेश्वर के वचन को अनुभव करेगा, तो उनके अनुपालन की प्रक्रिया में, व‍ह परमेश्वर के कहे वचनों के पीछे छिपे हुए उद्देश्यों को समझेगा, परमेश्वर के वचन की पृष्ठभूमि, स्रोत और परमेश्वर के वचन के अभिप्रेरित प्रभाव को समझेगा तथा सराहना करेगा। मानवजाति के लिए, ये सभी वे बातें हैं जो जीवन और सत्य में प्रवेश करने और परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए, अपने स्वभाव में परिवर्तित होने और परमेश्वर की सम्प्रभुता और व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए मनुष्य को अवश्य ही अनुभव करनी, और समझनी चाहिए, और इनमें प्रवेश करना चाहिए। जब मनुष्य अनुभव करता, समझता और इन बातों में प्रवेश करता है, उसी वक्त वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर लेता है, और साथ ही उसके विषय में वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त करता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य की किसी कल्पना या रचना से नहीं आती है, परन्तु जिसकी वह सराहना करता है, जिसे वह अनुभव और महसूस करता है तथा अपने आप में जिसकी पुष्टि करता है, उससे आती है। केवल इन बातों की सराहना करने, अनुभव करने, महसूस करने और पुष्टि करने के बाद ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के ज्ञान में तात्‍विक प्राप्ति होती है, केवल वही ज्ञान वास्तविक, असली और सही है जो वह इस समय प्राप्त करता है और उसके वचनों की सराहना करने, उन्‍हें अनुभव करने, महसूस करने और उनकी पुष्टि करने के द्वारा परमेश्वर के प्रति सही समझ और ज्ञान को प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के संवाद के मध्य, मनुष्य परमेश्वर के उद्देश्यों को समझ पाता है, परमेश्वर के स्‍वरूप और अस्तित्‍व को सही तौर पर जान पाता है, परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके तत्व को ग्रहण कर पाता है, धीरे-धीरे परमेश्वर के स्वभाव को जान और समझ पाता है, परमेश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि के ऊपर प्रभुत्व की सही परिभाषा और असल निश्चितता पाता है और परमेश्वर की पहचान और स्थान का ज्ञान तथा मौलिक समझ प्राप्त करता है। इस प्रकार की सहभागिता के मध्य, मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने विचार थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, अब वह उसे अचानक से उत्पन्न हुआ नहीं मानता है, या वह उसके बारे में अपने अविश्‍वासों को बेलगाम नहीं दौड़ाता है, या उसे गलत नहीं समझता, उसकी भर्त्सना नहीं करता, उसकी आलोचना नहीं करता या उस पर संदेह नहीं करता है। फलस्वरुप, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद कम होंगे, परमेश्वर के साथ उसकी झड़पें कम होंगी, और ऐसे मौके कम आयेंगे जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करे। इसके विपरीत, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति सरोकार और आज्ञाकारिता बढ़ती ही जाती है और परमेश्वर के प्रति उसका आदर और अधिक गहन होने के साथ-साथ वास्तविक होता जाता है। इस प्रकार के संवाद के मध्य, मनुष्य केवल सत्य के प्रावधान और जीवन के बपतिस्मा को ही प्राप्त नहीं करेगा, अपितु उसी समय वह परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को भी प्राप्त करेगा। इस प्रकार के संवाद के मध्य, न केवल मनुष्य अपनी प्रकृति में परिवर्तित होगा और उद्धार पायेगा, अपितु उसी समय परमेश्वर के प्रति एक सृजित किए गए प्राणी की वास्तविक श्रद्धा और आराधना भी एकत्र करेगा। इस प्रकार का संवाद पा लेने के कारण, मनुष्य का परमेश्वर पर भरोसा एक कोरे कागज़ की तरह या सिर्फ़ दिखावटी प्रतिज्ञाओं के समान, या एक अंधानुकरण अथवा आदर्शवादी रूप में नहीं रहेगा; केवल इस प्रकार के संवाद से ही मनुष्य का जीवन दिन-प्रतिदिन परिपक्वता की ओर बढ़ेगा, और तभी उसका स्‍वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होगा और कदम-दर-कदम परमेश्वर के प्रति उसका अनिश्चित और संदेहयुक्त विश्वास, एक सच्ची आज्ञाकारिता, सरोकार और वास्तविक श्रद्धा में बदलेगा और मनुष्य परमेश्वर के अनुसरण की प्रक्रिया में, उत्‍तरोत्‍तर निष्क्रियता से सक्रियता में, नकारात्मक से सकारात्मक में प्रगति करेगा; केवल इसी प्रकार की सहभागिता से ही मनुष्य में परमेश्वर के बारे में वास्तविक समझ, बूझने की शक्ति और सच्चा ज्ञान आएगा। चूंकि अधिकतर लोगों ने कभी परमेश्वर के साथ वास्तविक सहभागिता में प्रवेश ही नहीं किया है, अत: परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान, नियमों, शब्‍दों और सिद्धांतों पर आकर ठहर जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों का एक बड़ा समूह, भले ही अनेक सालों से परमेश्वर पर विश्वास करता रहा हो, फिर भी वो परमेश्वर को जानने के बारे में अभी भी अपनी आरम्भिक अवस्था में, पौराणिक रंगों और सामंती अंधविश्‍वासों से युक्‍त भक्ति के पारंपरिक रूपों में ही अटका हुआ है। मनुष्य की परमेश्वर के प्रति समझ का उसके प्रारम्भिक बिन्दु पर ही रुके होने का अर्थ यह है कि एक तरह से यह अस्तित्वहीन ही है। मनुष्य की परमेश्वर के स्थान और पहचान के पुष्टीकरण के अलावा, मनुष्य का परमेश्वर पर भरोसा अभी भी अस्पष्ट अनिश्‍चय की स्थिति में ही है। ऐसा होने से, मनुष्य में परमेश्वर के प्रति कितनी वास्‍तविक श्रद्धा हो सकती है?

चाहे तुम कितनी ही दृढ़ता से उसके अस्तित्व पर विश्वास क्‍यों न करो, यह बात परमेश्वर के लिए तुम्‍हारे ज्ञान की और परमेश्वर के प्रति तुम्‍हारी श्रद्धा की जगह नहीं ले सकती है। चाहे तुमने उसकी आशीषों और अनुग्रह का कितना ही आनन्द क्‍यों न लिया हो, यह बात परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान की जगह नहीं ले सकती। चाहे तुम अपना सर्वस्व पवित्र करने के लिए और प्रभु के लिए अपना सब कुछ त्यागने को कितने भी तैयार हो, लेकिन यह परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान का स्थान नहीं ले सकता। शायद परमेश्वर के कहे वचन, तुम्हारे लिये चिरपरिचित हो गये हैं, या तुम्हें उसके वचन हृदयस्‍थ हों और तुम उन्‍हें किसी भी क्रम में दोहरा सकते हो; लेकिन यह परमेश्वर के तुम्हारे ज्ञान का स्थान नहीं ले सकता। परमेश्वर के पीछे चलने की मनुष्य की अभिलाषा कितनी भी तीव्र हो, यदि उसकी परमेश्वर की साथ वास्तविक सहभागिता नहीं हुई है या उसने परमेश्वर के वचन का वास्तविक अनुभव नहीं किया है, तो परमेश्वर का उसका ज्ञान बिल्कुल कोरा या एक अंतहीन दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं होगा; क्‍योंकि ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर तुम्‍हें "छूकर गुज़रा हो" या तुम उससे रू-ब-रू हुए हो, तब भी तुम्‍हारा परमेश्वर का ज्ञान शून्य ही होगा और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा खोखले नारे या आदर्श के अलावा और कुछ भी नहीं होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 3

कई लोग परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन पढ़ने के लिए ही उठाते हैं, यहां तक कि उसके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती सम्पत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं और इससे भी अधिक हर जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, दूसरों की उसके वचनों से, आपूर्ति करते हैं, सहायता करते हैं। वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना हुआ, उसके वचन की गवाही देना हुआ; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना हुआ; वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना हुआ, ऐसा करना उसके वचन को अपने जीवन में लागू करना हुआ, कि ऐसा करने से उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी और वे बचाए जाएंगे और पूर्ण बनेंगे। परन्तु, परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हुए भी, वे कभी परमेश्वर के वचन पर अमल नहीं करते या अपने आप को परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है उसके अनुरूप नहीं ढालते। इसके बजाय, वे छल से दूसरों की प्रशंसा और भरोसे को प्राप्त करने, अपने आप ही प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन करने और उसे चुराने के लिए परमेश्वर के वचन को काम में लाते हैं। वे परमेश्‍वर के वचन के प्रसार से मिले अवसर को, परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के रूप में उपयोग करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परन्तु ये लोग परमेश्वर के वचन के प्रचार करने की प्रक्रिया में, न केवल परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल वे उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिये, दूसरों को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से सहायता और आपूर्ति पहुंचाने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने अपने को उससे वंचित रखा है, और इन सभी बातों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने में या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा की जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, परमेश्वर के बारे में उनकी ग़लतफ़हमियां और भी गहरा रही हैं; उस पर भरोसा न करना और भी अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएं और भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के बारे में अपनी ही परिकल्पना से आपूर्ति और निर्देशन पाकर, वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिल्कुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हैं, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया है और बचा लिए गए हैं, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य तक पहुँच बना ली है, परमेश्वर के अभिप्राय को समझ लिया है और परमेश्वर को जानने के मार्ग को खोज लिया है, मानो प्रचार करने की प्रक्रिया में, वे परमेश्वर से कई बार रू-ब-रू होते हैं। और अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गांभीर्य भरी परवाह और उदार प्रयोजनों का निरंतर बोध करते प्रतीत होते हैं और साथ-ही-साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जानने वाले, उसके सार को जानने वाले और उसके धार्मिक स्वभाव को समझने वाले प्रतीत होते हैं। इस आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी महानता की स्थिति से और भी अच्छे से परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचन के ज्ञान की सतही जानकारी से ओत-प्रोत होने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्टों को सहने के उनके संकल्प को दृढ़ता मिली है और परमेश्वर के ज्ञान की उनकी गहराई और बढ़ी है। शायद ही वे यह जानते हैं कि जब तक वे परमेश्वर के वचन का वास्तविक अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर के बारे में सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी ही काल्पनिक इच्छाओं और अनुमान से निकला हुआ होगा। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी जांच के सामने ठहर नहीं सकेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उच्चता परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या जांच-पड़ताल के तहत बिल्कुल भी नहीं ठहर सकेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं, और उनका तथाकथित परमेश्वर का ज्ञान भी उनकी कोरी-कल्पनाओं की उड़ान है। वास्तव में, ये लोग, जिन्होंने एक दृष्टि से, परमेश्वर के वचनों में काफी श्रम डाला है, उन्होंने कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वास्तविक आस्‍था क्या है, वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है, वास्तविक सरोकार क्या है, या परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान क्या है। वे सिद्धान्तों, कल्पनाओं, ज्ञान, भेंट, परम्परा, अंधविश्वास और यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को लेकर उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसके पीछे चलने के लिए "निवेश पूंजी" और "सैन्य हथियार" में बदल देते हैं, यहां तक कि उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, परमेश्वर के निरीक्षण, परीक्षण, ताड़ना करने और न्याय का सामना करने, उनसे संघर्ष करने के लिए और परमेश्वर को जानने के लिए, वे इस पूंजी और असलहे को लेकर उसे जादुई ताबीज़ में बदल देते हैं। अंत में, जो कुछ भी वे एकत्रित करते हैं उसमें परमेश्वर के बारे में, धार्मिक संकेतार्थों, सामंती अंधविश्वासों, और सभी प्रकार की प्रेम, वीभत्‍स और रहस्‍यमयी कथाओं से ओत-प्रोत निष्‍कर्षों से अधिक और कुछ नहीं होता, तथा उनका परमेश्वर को जानने और परिभाषित करने का तरीका केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करने वाले लोगों के सांचे में ही ढला होता है होती है—जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व, जिन बातों का वास्ता सच्चे परमेश्वर से है—ऐसी बातें हैं जो उनकी समझ में नहीं आईं हैं, जो पूरी तरह से असंगत और दो ध्रुवों की समान पूरी तरह विपरीत हैं। इस प्रकार से, हालांकि वे परमेश्वर के वचन के प्रावधान और पालन-पोषण में जी रहे हैं, सही मायनों में वे फिर भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने में वाकई असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी सच्चा सम्बन्ध या संवाद रखा है अत: उनके लिए यह असम्भव है कि वे परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ स्‍थापित कर सकें या फिर वे स्‍वयं में परमेश्वर में सच्‍चा विश्‍वास, उसका अनुसरण या उसकी आराधना जागृत कर सकें। कि उन्हें इस प्रकार से परमेश्वर के वचनों देखना चाहिए, कि इस प्रकार उन्‍हें परमेश्वर देखना चाहिए—इस दृष्टिकोण और रवैये ने उन्हें उनके प्रयासों में खाली हाथ रहने और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर बने न रह पाने के लिए अनन्तकाल तक अभिशापित कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह इसको प्रदर्शित करता है कि अनन्त काल से वे परमेश्वर के शत्रु रहे हैं और अनन्त काल तक वे कभी भी उद्धार को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 4

यदि, किसी मनुष्‍य ने कई वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया और कई सालों तक उसके वचनों के प्रावधान का आनन्द लिया है, तो परमेश्वर की उसकी परिभाषा, उसके सार-तत्व में, वैसी ही है जैसे कि कोई व्यक्ति मूर्तियों की पूजा करने के लिए उनके आगे साष्टांग दंडवत करता है, इससे यह पता चलता है कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को नहीं पाया है। इसका कारण यह है कि उसने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में बिल्‍कुल भी प्रवेश नहीं किया है और इसी कारण से, वास्तविकता, सत्यता, प्रयोजन और मनुष्य से अपेक्षाएं, जो परमेश्वर के वचनों में निहित हैं, उससे उसे कुछ लेना-देना नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के सतही अर्थ पर कितनी भी मेहनत से कार्य करे, सब कुछ व्यर्थ हैः क्योंकि जिसका वह अनुसरण करता है वे मात्र शब्द ही हैं, इसलिए जो कुछ वह प्राप्त करेगा वे भी मात्र शब्द ही होंगे। चाहे परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन, बाहरी स्वरूप में केवल कोरे या अगाध हों, वे सभी सत्य हैं। जैसे ही कोई मनुष्‍य जीवन में प्रवेश करता है, तो ये सभी सत्य उसके लिए अपरिहार्य बन जाते हैं; ये जीवन के जल के ऐसे सोते हैं जो उसे आत्मा और शरीर दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़, उसके प्रतिदिन का जीवन जीने के लिए सिद्धांत और मत, उद्धार पाने के लिए मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा जिससे होकर उसे गुज़रना आवश्‍यक है; हर वह सत्‍य जो एक सृजित प्राणी के रूप में उसके पास होना ज़रूरी है; तथा मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करे, ऐसे सभी सत्‍य प्रदान करते हैं। वे ऐसे आश्‍वासन हैं जो मनुष्य का जीवित रहना सुनिश्चित करते हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं और वे ऐसे प्रबल समर्थक हैं जो मनुष्य को दृढ़ और स्थिर करते हैं। सृजित मनुष्य जिस प्रकार जीवन जीता है, उसमें वे सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता में बहुत ही गहरे हैं, और वे सृजनकार द्वारा सृजित मनुष्य को दिए जाने वाले ऐसे सत्य हैं जिसके माध्यम से मानवजाति भ्रष्टाचार से और शैतान के जाल से बच जाती है, साथ ही, वे अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं। वे ऐसे प्रकाश-पुंज हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, वे ऐसे आश्‍वासन हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि मनुष्य, वह सब कुछ जो न्‍यायसंगत और अच्‍छा है, जिन मापदंडों पर लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं, सभी को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिये और उनकी प्राप्ति करे जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग की ओर ले जाते हैं। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इसमें ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्‍या है, एक सार्थक जीवन क्या है, एक वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है; केवल इसी में मनुष्य को यह समझ आ सकता है कि उसे किस प्रकार से परमेश्वर की परवाह करनी चाहिए, एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी कैसे पूर्ण करनी चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य के समान गुणों को कैसे प्राप्त करना चाहिए; केवल यहीं वहमनुष्य को यह समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल यहीं वह यह समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल यहीं मनुष्य की मनुष्य की समझ में आ सकता है कि जो सारे सृजन का अधिपति है, किन साधनों से वह समस्त रचना पर शासन करता, उसकी अगुवाई करता और सृष्टि का पोषण करता है; और केवल यहीं वे साधन मनुष्य की समझ में आ सकते हैं और वह उन्हें ग्रहण कर सकता है जिनके ज़रिये सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी अस्तित्व में रहता, स्‍वयं को व्‍यक्‍त करता और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य के विषय में मनुष्य के पास कोई भी वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक जीवित लाश, बिल्कुल एक घोंघे के समान होता है और सृजनकार से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्‍ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी भी उस पर विश्वास नहीं किया है, न ही कभी उसका अनुसरण किया है और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी और न ही अपना अनुयायी मानता है, उसे एक सच्‍चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 5

एक सच्‍चे सृजित प्राणी को यह जानना चाहिए कि कौन सृजनकर्ता है, मनुष्‍य का सृजन किसलिए हुआ है, एक सृजित प्राणी की ज़िम्‍मेदारियों को किस तरह पूरा करें, और संपूर्ण सृष्टि के प्रभु की आराधना किस तरह करें, किस प्रकार सृजनकर्ता के इरादों, इच्‍छाओं और अपेक्षाओं को समझें, ग्रहण करें, जानें और उनकी परवाह करें, किस तरह सृजनकर्ता के मार्ग के अनुरूप कार्य करें—परमेश्‍वर का भय माने और दुष्‍टता का त्‍याग करें।

परमेश्‍वर का भय मानना क्‍या है? किस प्रकार कोई दुष्‍टता का त्‍याग कर सकता है?

"परमेश्‍वर का भय मानने" का अर्थ अज्ञात डर या दहशत नहीं होता, ना ही इसका अर्थ टाल-मटोल करना, दूर रखना, मूर्तिपूजा करना या अंधविश्‍वास होता है। वरन्, यह प्रशंसा, आदर, भरोसा, समझ, परवाह, आज्ञाकारिता, समर्पण, प्रेम, के साथ-साथ बिना शर्त और बिना शिकायत आराधना, प्रतिदान और समर्पण करना है। परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य के पास सच्‍ची प्रशंसा, सच्‍चा भरोसा, सच्‍ची समझ, सच्‍ची परवाह या आज्ञाकारिता नहीं रहेगी, वरन् केवल भय और व्‍यग्रता, केवल शंका, गलतफहमी, टालमटोल और परिहार रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य के पास सच्‍चा समर्पण और प्रतिदान भी न रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य के पास सच्‍ची आराधना और समर्पण नहीं रहेगा, मात्र अंधी मूर्तिपूजा और अंधविश्‍वास रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य परमेश्‍वर के मार्ग के अनुरूप संभवत: कार्य न कर पाएगा, परमेश्‍वर का भय नहीं मानेगा, या दुष्‍टता का त्‍याग नहीं कर पाएगा। इसके विपरीत, मनुष्‍य जिस भी क्रियाकलाप और आचरण में संलग्‍न होगा, वह परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह और अवज्ञा से, कलंकित करने वाले अभियोगों और निंदात्‍मक आकलनों से तथा सत्‍य के और परमेश्‍वर के वचनों के सही अर्थों के विपरीत चलने वाले दुष्‍ट व्‍यवहारों से भरा होगा।

जब मनुष्य को परमेश्‍वर में सच्‍चा भरोसा होगा, तो वह सच्चाई से उसका अनुसरण करेगा और उस पर निर्भर रहेगा; केवल परमेश्‍वर पर सच्‍चे भरोसे और निर्भरता से ही मनुष्य को सच्‍ची समझ और बोध होगा; परमेश्‍वर के वास्‍तविक बोध के साथ उसके प्रति वास्‍तविक परवाह आती है; केवल परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची परवाह के साथ ही मनुष्य में सच्‍ची आज्ञाकारिता आ सकती है; परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची आज्ञाकारिता के साथ ही मनुष्य में सच्‍चा समर्पण आ सकता है; केवल परमेश्वर के प्रति सच्‍चे समर्पण के साथ ही बिना शर्त और बिना शिकायत प्रतिदान हो सकता है; केवल सच्‍चे भरोसे और निर्भरता, सच्‍ची समझ और परवाह, सच्‍ची आज्ञाकारिता, सच्‍चे समर्पण और प्रतिदान के साथ ही मनुष्य परमेश्‍वर के स्‍वभाव और सार को जान सकता है, और सृजनकर्ता की पहचान को जान सकता है; जब मनुष्य सृजनकर्ता को वास्‍तव में जानेगा केवल तभी उसमें सच्‍ची आराधना और समर्पण जागृत होगा; जब मनुष्य में सृजनकर्ता के प्रति सच्‍ची आराधना और समर्पण होगा केवल तभी वह अपने बुरे तरीकों का वाकई त्‍याग कर पाएगा, अर्थात्, दुष्‍टता का त्‍याग कर पाएगा।

"परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने" की सम्‍पूर्ण प्रक्रिया इस प्रकार बनती है, और यही परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने का समग्र निहित तत्‍व भी है, साथ ही यही वह मार्ग भी है जिसे परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने के लिए तय करना आवश्‍यक है।

"परमेश्‍वर का भय मानना और दुष्‍टता का त्‍याग करना" तथा परमेश्‍वर को जानना अभिन्‍न रूप से अनगिनत धागों से जुड़े हैं, और उनके बीच का संबंध स्‍पष्‍ट है। यदि कोई दुष्‍टता का त्‍याग करना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वास्‍तविक भय को पाना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के ज्ञान को पाना चा‍हता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए; परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर के शुद्धिकरण और अनुशासन का अनुभव करना चाहिए, उसकी ताड़ना और न्याय का अनुभव करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों के सम्‍मुख आना चाहिए, परमेश्‍वर के समक्ष आना चाहिए, और परमेश्‍वर से लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं के सम्‍मेलन वाले सभी प्रकार के वातावरणों के रूप में परमेश्‍वर के वचनों को अनुभव करने के अवसर देने का निवेदन करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के और उसके वचनों के सम्‍मुख आना चाहता है, तो उसे पहले एक सरल और सच्‍चा हृदय, सत्‍य को स्‍वीकार करने की तत्‍परता, कष्‍ट झेलने की इच्‍छाशक्ति, दुष्‍टता का त्‍याग करने की दृढ़ता और साहस, और एक सच्‍चा सृजित प्राणी बनने की अभिलाषा रखनी चाहिए...। इस प्रकार कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए, जैसे-जैसे तुम परमेश्‍वर के करीब आते जाओगे, तुम्‍हारा हृदय और पावन होता जाएगा, तुम्‍हारा जीवन और जीवित रहने के मूल्‍य, परमेश्‍वर के तुम्‍हारे ज्ञान के साथ-साथ अधिक-से-अधिक अर्थपूर्ण होते जाएंगे और अधिक-से-अधिक ज्योतिर्मय होते जाएंगे। यकायक, एक दिन तुम अनुभव करोगे कि सृजनकर्ता अब कोई पहेली नहीं रह गया है, कि सृजनकर्ता कभी भी तुमसे छिपा नहीं था, कि सृजनकर्ता ने कभी भी अपना चेहरा तुमसे नहीं छुपाया, कि सृजनकर्ता तुमसे बिल्‍कुल भी दूर नहीं है, कि सृजनकर्ता अब बिल्‍कुल भी वह नहीं है जिसके लिए तुम अपने विचारों में लगातार तरस रहे हो लेकिन जिसके पास तुम अपनी भावनाओं से पहुँच नहीं पा रहे हो, कि वह वाकई और सच में तुम्‍हारे दायें-बायें खड़ा तुम्‍हारी सुरक्षा कर रहा है, तुम्‍हारे जीवन को पोषण दे रहा है और तुम्‍हारी नियति को नियंत्रित कर रहा है। वह किसी दूरस्‍थ क्षितिज पर नहीं, न ही उसने अपने आपको ऊपर कहीं बादलों पर छिपा लिया है। वह एकदम तुम्‍हारे बगल में है, तुम्‍हारे सर्वस्‍व पर आधिपत्‍य कर रहा है, जो कुछ भी तुम्‍हारे पास है वह सब कुछ है, और वही एकमात्र चीज़ है जो तुम्‍हारी है। ऐसा परमेश्‍वर तुम्‍हें अपने हृदय से प्रेम करने देता है, लिपट कर अपने करीब आने देता है, अपने को आलिंगन में लेने देता है, अपनी प्रशंसा करने देता है, अपने को खोने से भयभीत होने देता है, तभी तुम उसका और अधिक त्‍याग न करने, उसकी अवज्ञा न करने, अधिक टालमटोल न करने या उसे दूर न करने को इच्छुक होते हो। तुम फ़िर बस उसकी परवाह करना, उसका आज्ञापालन करना, जो भी वह देता है उसका प्रतिदान करना और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होना चाहते हो। तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित होने, पोषण पाने, उसकी निगरानी में रहने, उसके द्वारा देखभाल किए जाने से फ़िर कभी इंकार नहीं करते हो और न ही उसकी आज्ञा और आदेश का पालन करना अस्‍वीकार करते हो। तुम सिर्फ़ उसका अनुसरण करना, उसके दायें या बायें उसके साथ चलना चाहोगे। तुम केवल उसी को अपना एकमात्र जीवन स्‍वीकार करना चाहोगे, उसे अपना एकमात्र प्रभु, अपना एकमात्र परमेश्‍वर स्‍वीकार करना चाहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 6

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे क़ीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है; वे बहुत आदरणीय होते हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना होती है। तुम लोग क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को, सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्तियों को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसका केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? स्पष्टीकरण यह है कि बहुत से लोगों को, ऐसे प्रश्न जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अक्सर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो बाहर से आध्यात्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, उत्कृष्ट छवि वाले प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो पत्रों एवं सिद्धान्तों के बारे में बोल सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके द्वारा धोखा दिए गए हैं उन्होंनेने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं इसे कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी भी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा-थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का आदर करने लगते हैं, अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं कि वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर क़ीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मन में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस कारण से लोग इस प्रकार का विश्वास रखते हैं? इस मुद्दे का सार क्या है? यह कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले में चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के अभ्यासों, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धान्तों को चुनते हैं, और हर कोई सामान्य तौर पर किस चीज़ पर जोर देता है, इन सबसे संबंधित मुद्दों का अनिवार्य रूप से मनुष्यजाति से परमेश्वर की माँगों से कोई लेना देना नहीं है। चाहे लोग उथले मसलों पर ध्यान केन्द्रित करें या गंभीर मसलों पर, पत्रों एवं सिद्धान्तों करें पर या वास्तविकता पर, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जिस के मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जो उन्हें सबसे अधिक जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार सारांशित करते हैं। तब यह सारांश, खोज करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य बन जाता है, अभ्यास किया जाने वाला सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर का अनुग्रह पाने हेतु खुशामद करने की लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करता है। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए लोगों को पूँजी देता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जो लोगों से ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास करवाता है, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा। कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य पर अपनी माँगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार का मानक लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपना व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर की इच्छा को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्क-संगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करते है, न ही वे, सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 7

उस मानक के सम्बन्ध में अनेक राय हैं जिससे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम स्थापित करता है

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिणाम को लेकर चिन्तित होता है, इसलिए क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर किस प्रकार उस परिणाम को निर्धारित करता है? परमेश्वर किस तरीके से किसी व्यक्ति का परिणाम स्थापित करता है? और किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? जब किसी मनुष्य का परिणाम अभी तक निर्धारित नहीं हुआ है, तो परमेश्वर इस परिणाम को प्रकट करने के लिए क्या करता है? क्या कोई इसे जानता है? जैसा मैंने अभी-अभी कहा था, कुछ लोग हैं जिन्होंने पहले ही लम्बे समय तक परमेश्वर के वचन पर खोज की है। ये लोग मनुष्यजाति के परिणाम के बारे में, उन श्रेणियों के बारे में जिसमें इस परिणाम को विभाजित किया जाता है, और उन विभिन्न परिणामों के बारे में जो विभिन्न प्रकार के लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं, सुरागों की खोज कर रहे हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर का वचन मनुष्य के परिणाम को स्थापित करता है, किस प्रकार के मानक का परमेश्वर उपयोग करता है, और किस तरीके से वह मनुष्य के परिणाम को स्थापित करता है। फिर भी अन्त में ये लोग किसी भी चीज़ का पता नहीं लगा पाते हैं। वास्तविक तथ्य में, परमेश्वर के वचन के बीच इस मामले पर बहुमूल्य रूप से थोड़ा सा ही कहा गया है। ऐसा क्यों है? अगर मनुष्य का परिणाम अभी तक प्रकट नहीं किया गया है, तो परमेश्वर किसी को बताना नहीं चाहता है कि अन्त में क्या होने जा रहा है, न ही वह किसी को समय से पहले उसकी नियति के बारे में सूचित करना चाहता है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के ऐसा करने का मनुष्य को कुछ लाभ नहीं होगा। अभी, मैं तुम लोगों को केवल उस तरीके के बारे में बताना चाहता हूँ जिससे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है, वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए, और इस परिणाम को प्रदर्शित करने के लिए जिन सिद्धांतों को अपने कार्य में उपयोग में लाता है उसके बारे में बताना चाहता हूँ, और साथ ही उस मानक के बारे में भी बताना चाहता हूँ जिसे वह यह स्थापित करने के लिए उपयोग में लाता है कि कोई व्यक्ति जीवित बच सकता है या नहीं। क्या यह वह बात नहीं है जिसके बारे में तुम लोग सर्वाधिक चिन्तित हो? तो फिर, लोग किस प्रकार उस मार्ग की कल्पना करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है? तुम लोगों ने इस मामले पर अभी-अभी थोड़ा सा कहा था। तुम लोगों में से कुछ ने कहा था कि यह उनके कर्तव्य को निष्ठापूर्वक करने, परमेश्वर के लिए व्यय करने का एक प्रश्न है; कुछ ने कहा था कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है; कुछ लोगों ने कहा था कि यह परमेश्वर के आयोजनों में रहना है; और कुछ लोगों ने कहा था कि यह अति साधारण जीवन जीना है...। जब तुम लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाते हो, जब तुम लोग अपनी कल्पना के सिद्धान्तों को अभ्यास में लाते हो, तब क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर क्या सोचता है? क्या तुम लोगों ने विचार किया है कि इस प्रकार से आगे बढ़ना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करता है या नहीं? यह परमेश्वर के मानक को पूरा करता है या नहीं? यह परमेश्वर की माँग को पूरा करता है या नहीं? मेरा मानना है कि अधिकांश लोग इस पर वास्तव में विचार नहीं करते हैं। वे बस परमेश्वर के वचन के एक भाग को, या धर्मोपदेशों के एक भाग को, या उन कुछ आध्यात्मिक मनुष्यों के मानकों को यंत्रवत् लागू करते हैं जिनका वे आदर करते हैं, और फलां-फलां कार्य करने के लिए स्वयं को बाध्य करते हैं। वे मानते हैं कि यही सही तरीका है, अतः वे उसके मुताबिक चलते रहते हैं, उसे करते रहते हैं, चाहे अन्त में कुछ भी क्यों न हो। कुछ लोग सोचते हैं: "मैंने कुछेक वर्षों तक विश्वास किया है; मैंने सदैव इस मार्ग का अभ्यास किया है; मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि मैंने वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट किया है; मैं ऐसा भी महसूस करता हूँ कि मैंने इससे बहुत सा प्राप्त किया है। क्योंकि इस समयावधि के दौरान मैं बहुत सी सच्चाईयों को समझने लगा हूँ, और बहुत सी बातों को समझने लगा हूँ जिन्हें मैं पहले नहीं समझता था—विशेष रूप में, मेरे कई विचार और दृष्टिकोण बदल चुके हैं, मेरे जीवन के मूल्य काफी बदल चुके हैं, और मुझे इस संसार की अच्छी खासी समझ हो गई है।" ऐसे लोग मानते हैं कि यह एक उपज है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम परिणाम है। तुम लोगों की राय में, इन मानकों और तुम लोगों के सभी अभ्यासों को एक साथ लेकर, क्या तुम लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हो? कुछ लोग पूर्ण निश्चय के साथ कहेंगे: "निस्संदेह! हम परमेश्वर के वचन के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; ऊपर के लोगों ने जो उपदेश दिया था और संगति की थी हम उसके अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; हम हमेशा अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, हमेशा परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं, और हमने परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ा है। इसलिए हम पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। चाहे हम परमेश्वर के इरादों को कितना ही क्यों न समझते हों, चाहे हम परमेश्वर के वचन को कितना ही क्यों न समझते हों, हम हमेशा परमेश्वर के अनुकूल होने के मार्ग की खोज करते रहे हैं। यदि हम सही तरीके से कार्य करते हैं, और सही तरीके से अभ्यास करते हैं, तो परिणाम सही होगा।" इस दृष्टिकोण के बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? क्या यह सही है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हों जो यह कहते हों: "मैंने इन चीज़ों के बारे में पहले कभी नहीं सोचा है। मैं केवल इतना सोचता हूँ कि यदि मैं अपने कर्तव्य को करता रहूँ और परमेश्वर के वचन की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता रहूँ, तो मैं जीवित बचा रह सकता हूँ। मैंने कभी इस प्रश्न पर विचार नहीं किया है कि मैं परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता हूँ या नहीं, मैंने कभी यह विचार नहीं किया है कि मैं उसके द्वारा अपेक्षित मानक को प्राप्त कर रहा हूँ या नहीं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं बताया है, और न ही मुझे कोई स्पष्ट निर्देश प्रदान किए हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि जब तक मैं कार्य करता रहता हूँ, परमेश्वर संतुष्ट रहेगा और मुझसे उसकी कोई अतिरिक्त माँग नहीं होनी चाहिए।" क्या ये विश्वास सही हैं? जहाँ तक मेरी बात है, अभ्यास करने का यह तरीका, सोचने का यह तरीका, और ये दृष्टिकोण—वे सब अपने साथ कल्पनाओं और कुछ अंधेपन को लेकर आते हैं। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ऐसे हों जो थोड़ी निराशा महसूस करते हों: "अंधापन? यदि यह 'अंधापन' है, तो हमारे उद्धार की आशा, हमारे जीवित बचे रहने की आशा बहुत कम, और बहुत अनिश्चित है, है कि नहीं? क्या तुम्हारा इसे इस तरह से कहना हमारे उत्साह को मारने के समान नहीं है?" चाहे तुम लोग कुछ भी क्यों न मानते हो, जो बातें मैं कहता और करता हूँ उनका आशय तुम लोगों को यह महसूस करवाना नहीं है कि मानो कि तुम लोगों के उत्साह को मारा जा रहा है। इसके बजाय, यह परमेश्वर के इरादों के बारे में तुम लोग की समझ को बेहतर करने, और परमेश्वर क्या सोच रहा है, परमेश्वर क्या निष्पादित करना चाहता है, परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को पसन्द करता है, परमेश्वर किस से घृणा करता है, परमेश्वर किसे तुच्छ समझता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर पाना चाहता है, और किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर ठुकराता है, इस पर तुम लोगों की समझ को बेहतर करने के आशय से है। यह तुम लोगों के मन को स्पष्टता देने, तुम लोगों को स्पष्ट रूप से यह जानने में सहायता करने के आशय से है कि तुम लोगों में से हर एक व्यक्ति के कार्य और विचार उस मानक से कितनी दूर भटक गए हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई है। क्या इन विषयों पर विचार-विमर्श करना आवश्यक है? क्योंकि मैं जानता हूँ तुम लोगों ने लम्बे समय तक विश्वास किया है, और बहुत अधिक उपदेश सुना है, परन्तु ये निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें हैं जिनका अत्यंत अभाव है। तुम लोगों ने अपनी पुस्तिका में हर सत्य को लिख लिया है, तुम लोगों ने उसे भी दर्ज कर लिया है जिसे तुम लोग व्यक्तिगत रूप से अपने मन में और अपने हृदय में महत्वपूर्ण मानते हो। और तुम लोग अभ्यास करते समय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इसका उपयोग करने; जब तुम लोगों स्वयं के लिए आवश्यकता होती है तब इसका उपयोग करने, या तुम अपनी नजरों के सामने प्रस्तुत कठिन समयों से होकर गुज़रने के लिए इसका उपयोग करने की योजना बनाते हो; या जब तुम लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगियाँ जीते हो तब बस इन चीज़ों को अपने साथ होने देते हो। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, यदि तुम केवल अभ्यास कर रहे हो, तो तुम कितने सटीक रूप से अभ्यास कर रहे हो यह महत्वपूर्ण नहीं है। तब सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? यह बात है कि जब तुम अभ्यास कर रहे होते हो, तब तुम्हारा हृदय पूरी निश्चितता के साथ जानता है कि हर एक कार्य, हर कर्म जो तुम कर रहे हो, वह परमेश्वर की इच्छानुसार है या नहीं; हर कार्य जिसे तुम करते हो, हर चीज़ जो तुम सोचते हो, और तुम्हारे हृदय में जो परिणाम एवं लक्ष्य हैं वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करते हैं या नहीं, परमेश्वर की माँगों को पूरा करते हैं या नहीं, और परमेश्वर उन्हें अनुमोदित करता है या नहीं। ये ही महत्वपूर्ण चीज़ें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 8

परमेश्वर के मार्ग पर चलें: परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें

एक कहावत है जिस पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनगिनत बार आती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि हर बार जब मेरा किसी से सामना होता है, हर बार जब किसी की कहानी को सुनता हूँ, हर बार जब मैं किसी के अनुभव को या परमेश्वर में विश्वास करने की उनकी गवाही को सुनता हूँ, तो मैं इस बात का अंदाज़ा लगाने के लिए इस कहावत का उपयोग करता हूँ कि यह व्यक्ति उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर पसंद करता है। तो फिर वह कहावत क्या है? तुम सभी लोग पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं उस कहावत को प्रकट करूँगा, तो कदाचित् तुम लोग निराश महसूस करोगे क्योंकि ऐसे लोग हैं जो इसके प्रति कई वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखाते आ रहे हैं। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैंने इसके प्रति कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं दिखाया है। यह कहावत मेरे हृदय में बसी हुई है। तो यह कहावत क्या है? यह है "परमेश्वर के मार्ग में चलें: परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें।" क्या यह अत्यंत सरल वाक्यांश नहीं है? हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, तब भी कोई व्यक्ति जिसके पास असल में इसकी गहरी समझ है वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा महत्व है; कि अभ्यास करने के लिए इसका बड़ा मूल्य है; कि सत्य की वास्तविकता के साथ यह जीवन की भाषा है; कि यह उनके लिए प्रयास करने हेतु जीवनपर्यन्त उद्देश्य है जो परमेश्वर को संतुष्ट करने की खोज करते हैं; कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा अनुसरण करने हेतु जीवनपर्यन्त मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हैं। तो तुम लोग क्या सोचते हो: क्या यह कहावत सही नहीं है? क्या इसका इस प्रकार का महत्व है या नहीं? कदाचित् कुछ लोग हों जो इस कहावत के बारे में सोच रहे हों, इसे समझने का प्रयास कर रहे हों, और कुछ अभी भी ऐसे हों जो इसके बारे में शंकित हों: क्या यह कहावत अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह बहुत महत्वपूर्ण है? क्या यह इतनी ज़रूरी और जोर देने लायक है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हों जो इस कहावत को अधिक पसन्द नहीं करते हों, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर के मार्ग को लेना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसका अत्यधिक सरलीकरण है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा था वह सब लेना और एक कहावत में उसका संक्षेपण करना—क्या यह परमेश्वर को बहुत कम महत्वहीन बनाना नहीं है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश इन वचनों के पीछे के गंहन अर्थ को पूरी तरह से नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का इरादा नहीं करते हो; तुम लोग बस इसे अपनी पुस्तिका में लिख लेते हो, और अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़ते हो और इस पर विचार करते हो। कुछ अन्य लोग हैं जो इस कहावत को याद रखने की भी परवाह नहीं करते हैं, अच्छे उपयोग के लिए इसका अभ्यास करने की तो बात ही छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करता हूँ? तुम लोगों के दृष्टिकोण, या जो तुम लोग क्या सोचोगे इसकी परवाह किए बिना, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी है क्योंकि यह इस बात के अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इस कहावत के बारे में तुम लोगों की वर्तमान समझ चाहे कुछ भी क्यों न हो, या तुम सब इससे कैसा भी व्यवहार क्यों न करते हो, मैं तब भी तुम लोगों को यह बताऊँगा: यदि लोग इस कहावत के वचनों को अभ्यास में ला सकें और उनका अनुभव कर सकें, और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक को प्राप्त कर सकें, तो उसे जीवित बचे हुए इंसान होना आश्वस्त किया जाता है, तो उनके अच्छा परिणाम होना निश्चित है। यदि तुम उस मानक को प्राप्त नहीं कर सकते हो जिसे इस कहावत के द्वारा रखा गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तुम्हारा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम लोगों की स्वयं की मानसिक तैयारी के लिए इस कहावत के बारे में तुम लोगों से कहता हूँ, और जिससे तुम लोग जान लो कि तुम लोगों को मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 9

परमेश्वर इस बात का परीक्षण करने के लिए विभिन्न परीक्षाओं का उपयोग करता है कि लोग परमेश्वर का भय मानते और दुष्टता से दूर रहते हैं या नहीं

हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, मनुष्य को कुछ सत्य बताता है। ये सत्य ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करते हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जिसमें मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में सक्षम बनाता है, और ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। यह इन्हीं कारणों से है कि परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता है, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता है, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता है, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। और यदि वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और दुष्टता से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है; इस प्रकार के व्यक्ति के पास कोई परिणाम नहीं होता है। इसलिए तब परमेश्वर के कार्य के दौरान वह किस प्रकार किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परमेश्वर किस पद्धति का उपयोग करता है? कदाचित् इस वक्त इस बारे में तुम लोग बहुत अधिक स्पष्ट नहीं हो, परन्तु जब मैं तुम लोगों को वह प्रक्रिया बताऊँगा तो यह बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत से लोगों ने पहले से ही स्वयं इसका अनुभव कर लिया है।

परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरम्भ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए—या तुम लोग कह सकते हो, उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो उसका अनुसरण करता है—परीक्षाएँ निर्धारित कर रखी हैं और ये परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में आती हैं। ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा तिरस्कृत किए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने विपरीत परिवेश की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने गिरफ्तार किए जाने और यातनाएँ दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी विकल्प का सामना किए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; और ऐसे लोग हैं जिन्होंने धन एवं हैसियत की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम को देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ यह उसका महत्वपूर्ण बिन्दु है: परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता को दूर रखता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा ले रहा होता है, तुम्हें किसी परिस्थिति का सामना करने पर मजबूर कर रहा होता है, तो वह परीक्षा लेना चाहता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है, ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो दुष्टता से दूर रहता है। यदि किसी व्यक्ति का किसी भेंट को सुरक्षित रखने के कर्तव्य से सामना होता है, और वह परमेश्वर की भेंट के सम्पर्क में आता है, तो क्या तुम्हें लगता है कि यह कुछ ऐसी चीज़ है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है? कोई प्रश्न ही नहीं है! जिस किसी भी चीज़ का तुम सामना करते हो वह ऐसी चीज़ है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है। जब तुम्हारा सामना ऐसे मामले से होगा, तो परमेश्वर गुप्त रूप से तुम्हारा अवलोकन करेगा, तुम्हें देखेगा कि तुम किस प्रकार से चुनाव करते हो, तुम किस प्रकार से अभ्यास करते हो, तुम किसके बारे में सोच रहे हो। अंतिम परिणाम वह है जिससे परमेश्वर सबसे अधिक चिंतित है, चूँकि यह ऐसा परिणाम है जो उसे यह मापने देगा कि इस परीक्षा में तुमने परमेश्वर के मानक को हासिल किया है या नहीं। हालाँकि, जब लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तो वे प्रायः इस बारे में नहीं सोचते है कि उनका सामना इससे, या परमेश्वर के द्वारा माँग किए गए मानक से क्यों हो रहा है। वे इस बारे में नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर उनके बारे में क्या देखना चाहता है, वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है। ऐसे मामले से सामना होने पर, इस प्रकार का व्यक्ति केवल यह सोच रहा होता है: "यह कुछ ऐसा है जिसका मैं सामना करता हूँ; मुझे अवश्य सावधान रहना चाहिए, लापरवाह नहीं! चाहे कुछ भी हो, यह परमेश्वर की भेंट है और मैं इसे छू नहीं सकता हूँ।" ऐसे व्यक्ति विश्वास करते हैं कि वे ऐसी अत्यंत सरल सोच को धारण करके अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सकते हैं। क्या परमेश्वर इस परीक्षा के परिणाम के द्वारा संतुष्ट होगा? या वह संतुष्ट नहीं होगा? तुम लोग इस पर चर्चा कर सकते हो। (यदि कोई अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानता है, तो जब उस कर्तव्य से सामना होता है जो उसे परमेश्वर को चढ़ाई गई भेंट को स्पर्श करने की अनुमति देता है, तो वह विचार करेगा कि परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करना कितना आसान होगा, अतः वह सावधानी से आगे बढ़ना निश्चित करेगा।) तुम्हारा उत्तर सही राह पर है, परन्तु यह अभी तक वहाँ नहीं पहुँचा है। परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतही तौर पर नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है। इसके बजाय, इसका अर्थ है कि जब तुम्हारा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तुम इसे ऐसी परिस्थिति के रूप में देखो जिसकी व्यवस्था परमेश्वर के द्वारा की गई है, ऐसे उत्तरदायित्व के रूप में देखो जिसे उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया है, या किसी ऐसी चीज़ के रूप में देखो जो उसने तुम्हें सौंपी है, और जब तुम इस मामले का सामना कर रहे होते हो, तो तुम्हें इसे भी परमेश्वर से आयी किसी परीक्षा के रूप में देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तुम्हारे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुम्हें अवश्य सोचना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि कैसे इस मामले से इस तरह निपटो कि तुम अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सको, और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रह सको; इसे कैसे करो कि परमेश्वर को क्रोधित न करो, या उसके स्वभाव को अपमानित न करो। हमने अभी-अभी भेंटों की सुरक्षा के बारे में बात की। इस मामले में भेंटें शामिल हैं, और इसमें तुम्हारा कर्तव्य, एवं तुम्हारा उत्तरदायित्व भी शामिल है। तुम इस उत्तरदायित्व के प्रति कर्तव्य से बँधे हुए हो। फिर भी जब तुम्हारा सामना इस मामले से होता है, तो क्या कोई प्रलोभन है? हाँ है! यह प्रलोभन कहाँ से आता है? यह प्रलोभन शैतान की ओर से आता है, और यह मनुष्य की दुष्टता, और उसके भ्रष्ट स्वभाव से भी आता है। चूँकि यहाँ प्रलोभन है, इसमें स्थायी गवाही शामिल है; स्थायी गवाही भी तुम्हारा उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य है। कुछ लोग कहते हैं: "यह तो इतना छोटा सा मसला है; क्या वास्तव में इस बात का बतंगड़ बनाना ज़रूरी है?" हाँ यह ज़रूरी है! क्योंकि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए, हम किसी भी ऐसी चीज़ को जाने नहीं दे सकते हैं जिसका हमसे लेना देना है, या कोई ऐसी चीज़ जो हमारे आसपास घटित होती है, यहाँ तक कि छोटी-छोटी चीज़ें भी। इस बात की परवाह किए बिना कि हमें कोई मसला ध्यान देने योग्य लगता है नहीं, जब तक हमारा उससे सामना हो रहा है तब तक हमें उसे जाने नहीं देना चाहिए। इस सबको हमारे लिए परमेश्वर की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार की प्रवृत्ति कैसी है? यदि तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति है, तो यह एक तथ्य की पुष्टि करती है: तुम्हारा हृदय परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हारा हृदय दुष्टता से दूर रहने के लिए तैयार है। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए ऐसी इच्छा है, तो जिसे तुम अभ्यास में लाते हो वह परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक से दूर नहीं है।

प्रायः ऐसे लोग होते हैं जो मानते हैं कि ऐसे मामले जिन पर लोगों के द्वारा अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है, ऐसे मामले जिनका सामान्यतः उल्लेख नहीं किया जाता है—ये महज छोटी-मोटी निरर्थक बातें होती हैं, और उनका सत्य को अभ्यास में लाने से को कोई लेना देना नहीं है। जब ऐसे लोगों का सामना ऐसे मामले से होता है, तो वे उस पर अधिक विचार नहीं करते हैं और उसे जाने देते हैं। परन्तु वास्तविकता में, यह मामला एक सबक है जिसका तुम्हें अध्ययन करना चाहिए, और इस बारे में एक सबक है कि किस प्रकार परमेश्वर का भय मानना है, और किस प्रकार दुष्टता से दूर रहना है। इसके अतिरिक्त, जिस बारे में तुम्हें और भी अधिक चिंता करनी चाहिए वह यह जानना है कि जब यह मामला तुम्हारा सामना करने के लिए उठ खड़ा होता है तब परमेश्वर क्या कर रहा होता है। परमेश्वर ठीक तुम्हारे बगल में है, तुम्हारे प्रत्येक वचन और कर्म का अवलोकन कर रहा है, तुम्हारी करतूतों, तुम्हारे मन में हुए परिवर्तनों का अवलोकन कर रहा है—यह परमेश्वर का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं: "तो मुझे यह महसूस क्यों नहीं होता है?" तुमने इसका एहसास नहीं किया है क्योंकि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का मार्ग तुम्हारा अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग नहीं रहा है कि तुम उसके मुताबिक चलो। इसलिए, तुम मनुष्य में परमेश्वर के सूक्ष्म कार्य को महसूस नहीं कर सकते हो, जो लोगों के भिन्न-भिन्न विचारों और भिन्न-भिन्न कार्यकलापों के अनुसार स्वयं को प्रदर्शित करता है। तुम एक चंचलचित्त वाले व्यक्ति हो। बड़ा मामला क्या है? छोटा मामला क्या है? उन सभी मामलों को बड़े और छोटे मामलों में विभाजित नहीं किया जाता है जिसमें परमेश्वर के मार्ग पर चलना शामिल है। क्या तुम लोग उसे स्वीकार कर सकते हो? (हम इसे स्वीकार कर सकते हैं।) प्रतिदिन के मामलों के सम्बन्ध में, कुछ मामले हैं जिन्हें लोग बहुत बड़े और महत्वपूर्ण मामले के रूप में देखते हैं, और अन्य मामलें हैं जिन्हें छोटे-मोटे निरर्थक मामलों के रूप में देखा जाता है। लोग प्रायः इन बड़े मामलों को अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों के रूप में देखते हैं, और वे उन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा गया मानते हैं। हालाँकि, इन बड़े मामलों के चलते रहने के दौरान, अपनी अपरिपक्व कद-काठी के कारण, और अपनी कम क्षमता के कारण, मनुष्य प्रायः परमेश्वर के इरादों के मुताबिक नहीं होता है, कोई प्रकाशन प्राप्त नहीं कर सकता है, और ऐसा कोई वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है जो किसी मूल्य का हो। जहाँ तक छोटे-छोटे मामलों की बात है, लोगों के द्वारा बस इनकी अनदेखी की जाती है, और थोड़ा-थोड़ा करके हाथ से फिसलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के सामने जाँचे जाने, और उसके द्वारा परीक्षण किए जाने के अनेक अवसरों को गँवा दिया है। यदि तुम हमेशा लोगों, चीज़ों, और मामलों, और परिस्थितियों को अनदेखा करते हो जिनकी व्यवस्था परमेश्वर तुम्हारे लिए करता है, तो इसका क्या अर्थ होगा? इसका अर्थ है कि हर दिन, यहाँ तक कि हर क्षण, तुम हमेशा अपने बारे में परमेश्वर की सिद्धता का और परमेश्वर की अगुवाई का परित्याग कर रहे हो। जब कभी भी परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिस्थिति की व्यवस्था करता है, तो वह गुप्त रीति से देख रहा होता है, तुम्हारे हृदय को देख रहा होता है, तुम्हारी सोच और विचारों को देख रहा होता है, देख रहा होता है कि तुम किस प्रकार सोचते हो, देख रहा होता है कि तुम किस प्रकार कार्य करोगे। यदि तुम एक लापरवाह व्यक्ति हो—ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के मार्ग, परमेश्वर के वचन, या सत्य के बारे में कभी भी गंभीर नहीं रहा है—तो तुम सचेत नहीं होगे, तुम उस पर ध्यान नहीं दोगे जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, और जिसकी माँग परमेश्वर तुमसे उस समय करता है जब वह तुम्हारे लिए परिस्थितियों की व्यवस्था करता है। तुम यह भी नहीं जानोगे कि लोग, चीज़ें, और मामले जिनका तुम लोग सामना करते हो वे किस प्रकार सच्चाई से या परमेश्वर के इरादों से सम्बन्ध रखते हैं। तुम्हारे इस प्रकार बार-बार परिस्थितियों और बार-बार परीक्षणों का सामना करने के पश्चात्, जब परमेश्वर तुम्हारे नाम में किसी उपलब्धि को नहीं देखता है, तो परमेश्वर कैसे आगे बढ़ेगा? बार-बार परीक्षणों का सामना करने के बाद, तुम अपने हृदय में परमेश्वर को महिमान्वित नहीं करते हो, और तुम उन परिस्थितियों के साथ जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, वैसा व्यवहार नहीं करते हो जैसा उनके साथ किया जाना चाहिए—परमेश्वर के परीक्षणों या परमेश्वर की परीक्षाओं के रूप में। इसके बजाय तुम उन अवसरों को अस्वीकार करते हो जिन्हें परमेश्वर तुम्हें एक के बाद एक प्रदान करता है, और बार-बार उन्हें हाथ से जाने देते हो। क्या यह मनुष्य के द्वारा बहुत बड़ी अवज्ञा नहीं है? (हाँ है।) क्या इसकी वजह से परमेश्वर दुःखित होगा? (वह दुःखित होगा।) परमेश्वर दुःखित नहीं होगा! मुझे इस प्रकार कहते हुए सुनकर तुम लोगों को एक बार फिर से झटका लगा है। आखिरकार, क्या ऐसा पहले नहीं कहा गया था कि परमेश्वर हमेशा दुःखित होता है? परमेश्वर दुःखित नहीं होगा? तो परमेश्वर कब दुःखित होगा? खैर, परमेश्वर इस स्थिति से दुःखित नहीं होगा। तो उस प्रकार के व्यवहार के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जिसकी रूपरेखा ऊपर दी गई है? जब लोग उन परीक्षणों, परीक्षाओं को अस्वीकार करते हैं जिन्हें परमेश्वर उन पर भेजता है, जब वे उनसे बच कर भागते हैं, तो केवल एक ही प्रवृत्ति होती है जो इन लोगों के प्रति परमेश्वर की होती है। यह प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपने हृदय की गहराई से ठुकरा देता है। यहाँ "ठुकराने" शब्द के लिए अर्थ की दो परतें हैं। मैं उन्हें किस प्रकार समझाऊँ? भीतर गहराई में, यह शब्द घृणा का, नफ़रत का संकेतार्थ लिए हुए है। और जहाँ तक अर्थ की दूसरी परत की बात है? यह वह भाग है जो जिसका तात्पर्य है किसी चीज़ को त्याग देना। तुम सभी लोग जानते हो कि "त्याग देने" का क्या अर्थ है, ठीक है न? संक्षेप में, ठुकराने का अर्थ है ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की अंतिम प्रतिक्रिया और प्रवृत्ति जो इस तरह से व्यवहार कर रहे हैं। यह उनके प्रति चरम घृणा है, और चिढ़ है, और इसलिए उनका परित्याग करने का निर्णय लिया गया है। यह ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का अंतिम निर्णय है जो परमेश्वर के मार्ग पर कभी नहीं चला है, जिसने कभी भी परमेश्वर का भय नहीं माना है और जो कभी भी दुष्टता से दूर नहीं रहा है। क्या अब तुम सभी लोग इस कहावत के महत्व को देख सकते हो जो मैंने कही है?

क्या अब वह तरीका तुम्हारी समझ में आ गया है जिसे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए उपयोग करता है? (हर दिन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना।) भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना—यह वह है जिसे लोग महसूस और स्पर्श कर सकते हैं। तो इसके लिए परमेश्वर की मंशा क्या है? मंशा यह है कि परमेश्वर हर एक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न तरीकों से, भिन्न-भिन्न समयों पर, और भिन्न-भिन्न स्थानों में परीक्षाएँ लेना चाहता है। किसी परीक्षा में मनुष्य के किन पहलुओं को जाँचा जाता है? तुम उस प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जो हर उस मामले में परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता हो जिसका तुम सामना करते हो, जिसके बारे में तुम सुनते हो, जिसे तुम देखते हो, और जिसका तुम व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो। हर कोई इस प्रकार के परीक्षण का सामना करेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष है। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है; ऐसा कैसे है कि मैंने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया है?" तुम्हें लगता है कि तुमने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया है क्योंकि जब कभी भी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए परिस्थितियों को व्यवस्थित किया है, तो तुमने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया है, और परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं चाहा है। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के परीक्षण का कोई बोध नहीं है। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने कुछ परीक्षणों का सामना किया है, किन्तु मैं अभ्यास करने के उचित तरीके को नहीं जानता हूँ। यद्यपि मैंने अभ्यास किया था, तब भी मैं नहीं जानता हूँ कि मैं परीक्षण के दौरान डटा रहा था या नहीं।" इस प्रकार की स्थिति वाले लोग निश्चित रूप से अल्पसंख्या में नहीं हैं। अतः तब वह मानक क्या है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को मापता है? यह ठीक ऐसा ही है जैसा मैंने कुछ क्षण पहले कहा था: जो कुछ भी तुम करते हो, जो कुछ भी तुम सोचते हो, और जो कुछ भी तुम व्यक्त करते हो—क्या यह परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना है? इसी प्रकार यह निर्धारित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है? क्या यह एक सरल धारणा है? इसे कहना काफी आसान है, किन्तु क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? (यह इतना आसान नहीं है।) यह इतना आसान क्यों नहीं है? (क्योंकि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, नहीं जानते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य को सिद्ध बनाता है, और इस प्रकार जब उनका सामना समस्याओं से होता है तब वे नहीं जानते हैं कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य की खोज कैसे करें; लोगों को भिन्न-भिन्न परीक्षणों, शुद्धिकरणों, ताड़नाओं, और न्यायों से होकर गुज़रना ही होगा, इससे पहले कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने की वास्तविकता हो।) तुम लोग इसे इस प्रकार रखते हो, परन्तु जहाँ तक तुम लोगों का संबंध है, परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना इस वक्त आसानी से करने योग्य प्रतीत होता है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ? क्योंकि तुम लोगों ने बहुत से धर्मोपदेशों को सुना है, और सत्य की वास्तविकता की सिंचाई को अच्छी मात्रा में प्राप्त किया है। इसने तुम्हें यह समझने दिया है कि किस प्रकार सिद्धान्त और सोच के सम्बन्ध में परमेश्वर का भय मानना है और दुष्टता से दूर रहना है। परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के तुम लोगों के अभ्यास के सम्बन्ध में, यह सब सहायक रहा है और इसने तुम लोगों को महसूस करवाया है कि ऐसी चीज़ आसानी से प्राप्त करने योग्य है। तब क्यों लोग वास्तव में इसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का सार परमेश्वर का भय नहीं मानता है, और दुष्टता को पसन्द करता है। यही वास्तविक कारण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 10

परमेश्वर का भय न मानना और दुष्टता से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आज तुम लोग परमेश्वर के आमने-सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हो। परमेश्वर के बारे में तुम लोगों का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक है। मैं इसकी बात क्यों करता हूँ? मैं इस प्रकार क्यों बोलता हूँ? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहूँगा, किन्तु इससे पहले कि मैं समझाऊँ, मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ: अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मान सकता था और दुष्टता से दूर रह सकता था। तो ऐसा क्यों है कि इन दिनों लोग ऐसा करने में असफल हैं? (गहन भ्रष्टता।) गहन भ्रष्टता—यह प्रश्न का ऊपरी भाग है, परन्तु मैं कभी भी इसे इस प्रकार से नहीं देखूँगा। तुम लोग प्रायः ऐसे सिद्धान्तों और शब्दों को अपनाते हो जिनके बारे में तुम लोग आम तौर पार बात करते हो, जैसे कि "गहन भ्रष्टता," "परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अवज्ञा," "सत्य को पसन्द नहीं करना", और हर एक प्रश्न के सार की व्याख्या करने के लिए तुम लोग इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक दोषपूर्ण तरीका है। भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के प्रश्नों को समझाने के लिए एकही उत्तर का उपयोग करना सत्य और परमेश्वर की निन्दा करने के सन्देहों को अनिवार्य रूप से उत्पन्न करता है। मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसन्द नहीं है। इसके बारे में सोचो! तुम लोगों में से किसी ने भी इस मामले के बारे में नहीं सोचा है, परन्तु हर एक दिन मैं इसे देख सकता हूँ, और हर एक दिन मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, तुम लोग कर रहे हो, और मैं देख रहा हूँ। जब तुम लोग इसे कर रहे होते हो, तब तुम लोग इस मामले के सार को महसूस नहीं कर सकते हो। किन्तु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को भी देख सकता हूँ, और मैं इसके सार को भी महसूस कर सकता हूँ। तो फिर यह सार क्या है? क्यों इन दिनों लोग परमेश्वर का भय नहीं मान सकते है और दुष्टता से दूर नहीं रह सकते हैं? तुम लोगों के उत्तर इस प्रश्न के सार की व्याख्या करने के योग्य होने से बहुत दूर हैं, और वे इस प्रश्न के सार का समाधान नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ एक स्रोत है जिसके बारे में तुम लोग नहीं जानते हो। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम सब इसके बारे में सुनना चाहते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को इस प्रश्न के स्रोत के बारे में बताऊँगा।

परमेश्वर के कार्य की बिलकुल शुरुआत में, वह मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर ने मनुष्य को बचाया; वह मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में, उस रूप में मानता था जिसे वह जीतना, बचाना चाहता था, और उस रूप में चाहता था जिसे वह सिद्ध करना चाहता था। अपने कार्य के आरम्भ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अजीब था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति ने सही परिणाम नहीं किए, और मनुष्य इस बारे स्पष्ट नहीं था कि उसे किस प्रकार परमेश्वर से व्यवहार करना चाहिए। इसलिए उसने उससे वैसा ही व्यवहार किया जैसा वह चाहता था, और जो कुछ भी चाहता था वही किया। क्या परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण था? आरम्भ में, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण नहीं था। परमेश्वर के सम्बन्ध में मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण बस कुछ अवधारणाएँ और कल्पनाएँ ही थीं। जो कुछ लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया; जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया; परन्तु अपने हृदय में लोग उसे कड़ाई से टक्कर देते थे और उसका विरोध करते थे। आरम्भ में यह मनुष्य और परमेश्वर का सम्बन्ध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी के रूप में व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समयावधि के पश्चात्, मनुष्य की समझ में आ गया कि परमेश्वर क्या प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है, और वे जानने लगे थे कि मनुष्य परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकता है। इस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में मानता था? मनुष्य अनुग्रह पाने, आशीषें पाने, एवं प्रतिज्ञाएँ पाने की आशा करते हुए परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में मानता था। और इस परिस्थिति में परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में मानता था। परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने के लिए, मनुष्य की परीक्षा लेने, मनुष्य के परीक्षण करने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। किन्तु इस समय जहाँ तक मनुष्यजाति का संबंध था, परमेश्वर एक वस्तु था जिसे वह अपने स्वयं के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकती थी। लोगों ने देखा कि परमेश्वर के द्वारा जारी किया गया सत्य उन पर विजय पा सकता था और उन्हें बचा सकता था, और यह कि उनके पास उन चीज़ों को जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे और उस मंज़िल को जिसे वे चाहते थे प्राप्त करने का एक अवसर था। इस कारण, उनके हृदयों में थोड़ी सी ईमानदारी ने रूप ले लिया था, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार थे। कुछ समय बीत गया, और लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ सतही और सैद्धान्तिक ज्ञान हो गया था। ऐसा कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर के साथ अधिकाधिक "परिचित" हो रहे थे। परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों, उसके उपदेश के साथ, उस सत्य के साथ जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ—लोग अधिकाधिक परिचित होने लगे थे। इसलिए, लोगों ने ग़लती से सोच लिया था कि परमेश्वर अब और अजनबी नहीं है, और यह कि वे पहले से ही परमेश्वर की संगतता के पथ पर चल रहे हैं। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत से धर्मोपदेशों को सुना है, और परमेश्वर के बहुत से कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी भिन्न-भिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेपों एवं अवरोधों के अंतर्गत, अधिकांश लोग सत्य को अभ्यास लाना प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर को संतुष्ट करना प्राप्त नहीं कर सकते हैं। लोग उत्तरोत्तर आलसी हो रहे हैं, और उनके आत्मविश्वास में उत्तरोत्तर कमी हो रही है। वे उत्तरोत्तर महसूस करते हैं मानो कि उनका स्वयं का परिणाम अज्ञात है। वे साहस नहीं करते हैं कि उनके पास कोई असाधारण विचार हो, और कोई प्रगति करने का प्रयास नहीं करते हैं; वे बस अनमने ढंग से अनुसरण करते है, और कदम दर कदम आगे बढ़ते जाते हैं। मनुष्य की वर्तमान अवस्था के संबंध में, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है कि वह मनुष्य को इन सच्चाईयों को दे, और अपने मार्ग से मनुष्य को भरपूर कर दे, और तब भिन्न-भिन्न तरीकों से मनुष्य को जाँचने के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों व्यवस्था करे। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सच्चाईयों, और अपने कार्य को लेना, और ऐसा परिणाम उत्पन्न करना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सके और दुष्टता से दूर रह सके। मैंने देखा है कि अधिकांश लोग बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धान्तों के रूप में मानते हैं, उसे पत्रों के रूप में मानते हैं, और उसे पालन किए जाने वाले विनियमों के रूप में मानते हैं। जब वे कार्यों को करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षणों का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते हैं जिसका उनको पालन करना चाहिए। यह विशेष रूप से सत्य है जब लोगों का बड़े परीक्षणों से सामना होता है; मैंने किसी एक भी व्यक्ति को नहीं देखा है जो परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की दिशा में अभ्यास कर रहा हो। इस वजह से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है। परमेश्वर द्वारा लोगों का बार-बार, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, परीक्षण कर लेने के पश्चात् उनके पास अभी भी अपने दृढ़ संकल्प को प्रदर्शित करने की कोई स्पष्ट प्रवृत्ति नहीं है—मैं परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना चाहता हूँ! चूँकि लोगों का ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते हैं, इसलिए उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति अब और वैसी नहीं है जैसी अतीत में थी, जब उसने दया प्रदान की थी, सहनशीलता प्रदान की थी, और सहिष्णुता और धैर्य प्रदान किया था। इसके बजाय, वह मनुष्य से अत्यंत निराश है। किसने इस निराशा को पैदा किया? जिस प्रकार की प्रवृत्ति मनुष्य के प्रति परमेश्वर की है, यह किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अपने अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक माँगें की है, और मनुष्य के लिए अनेक परिस्थितियाँ व्यवस्थित की हैं। किन्तु चाहे मनुष्य ने कैसा ही प्रदर्शन क्यों न किया हो, और चाहे परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति कुछ भी क्यों न हो, मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास नहीं कर सकता है। इस प्रकार, मैं एक कहावत में इसे सारांशित करूँगा, और हर उस चीज़ की व्याख्या करने के लिए इस कहावत का उपयोग करूँगा जिसके बारे में हमने अभी-अभी बात की थी कि क्यों लोग परमेश्वर के मार्ग—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर नहीं चल सकते हैं। यह कहावत क्या है! यह कहावत है: परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार की वस्तु के रूप में, अपने कार्य की वस्तु के रूप में मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में, विरोधी के रूप में मानता है। क्या अब तुम इस विषय पर स्पष्ट हो? मनुष्य की प्रवृत्ति क्या है; परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट हैं। चाहे तुम लोगों ने कितने ही धर्मोपदेशों को क्यों न सुना हो, जिन चीज़ों को तुम लोगों ने स्वयं सारांशित किया है—जैसे कि परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना, परमेश्वर का आज्ञा पालन करना, परमेश्वर के साथ संगतता का मार्ग खोजना, आजीवन परमेश्वर के लिए बिताने की इच्छा रखना, परमेश्वर के लिए जीना—मेरे विचार से वे चीज़ें परमेश्वर के मार्ग पर होश-हवाश में चलना नहीं है, जो कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना है! इसके बजाय, वे ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम लोग अनिच्छा से कुछ विनियमों का पालन करते हो। और निश्चित रूप से ये ऐसी विधियाँ हैं जो लोगों को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग से और भी अधिक दूर ले जाती हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर रख देती हैं।

आज जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं वह थोड़ा गंभीर है, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अभी भी आशा है कि जब तुम लोग आने वाले अनुभवों, और आने वाले समयों से होकर गुज़रते हो, तो तुम लोग वह कर सकते हो जो मैंने अभी-अभी तुम लोगों को कहा है। यह महसूस करते हुए कि जैसे वह उन समयों में मौजूद होता है जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी है, परन्तु जब उसका कोई उपयोग नहीं होता है तब ऐसा महसूस करते हुए कि वह मौजूद नहीं है, परमेश्वर की उपेक्षा न करो और उसे खाली हवा मत मानो। जब तुम अवचेतन रूप से इस प्रकार की समझ रखते हो, तो तुमने परमेश्वर को पहले से ही क्रोधित कर दिया है। कदाचित् ऐसे लोग हैं जो कहते हैं: "मैं परमेश्वर को खाली हवा के रूप में नहीं मानता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर को संतुष्ट करता हूँ, और हर काम जो मैं करता हूँ वह उस दायरे और मानक और सिद्धान्तों के अंतर्गत आता है जिसकी परमेश्वर के द्वारा माँग की जाती है। मैं निश्चित रूप से अपने स्वयं के विचारों के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा हूँ।" हाँ, जिस ढंग से तुम काम कर रहे हो वह सही है। किन्तु जब तुम किसी मसले के आमने-सामने होते हो तो तुम किस प्रकार सोचते हो? जब तुम्हारा सामना किसी मसले से होता है तो तुम किस प्रकार अभ्यास करते हो! कुछ लोग महसूस करते हैं कि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे आग्रह करते हैं तो वह मौजूद होता है। किन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने स्वयं के विचारों के साथ सामने आते हैं और उन पर अटल रहना चाहते हैं। यह परमेश्वर को खाली हवा मानना है। इस प्रकार की स्थिति परमेश्वर को अस्तित्वहीन ठहराती है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को तभी मौजूद होना चाहिए जब उन्हें उसकी ज़रूरत होती है, और जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत नहीं होती है तब उसे मौजूद नहीं होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि अभ्यास करने के लिए अपने स्वयं के विचारों के अनुसार चलना काफी है। वे मानते हैं कि वे चीज़ों को वैसे ही कर सकते हैं जैसी उन्हें अच्छी लगें। वे बस सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की आवश्यकता नहीं है। जो लोग वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, और इस प्रकार की अवस्था में हैं—क्या वे खतरे के कगार पर नहीं हैं? कुछ लोग कहते हैं: "इस बात की परवाह किए बिना कि मैं खतरे की कगार पर हूँ या नहीं, मैंने इतने वर्षों से विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मेरा परित्याग नहीं करेगा क्योंकि मुझे परित्याग करना वह सहन नहीं कर सकता है।" अन्य लोग कहते हैं: "यहाँ तक कि उस समय से जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था, अब तक, कुल मिलाकर 40 या 50 वर्ष तक, मैंने प्रभु पर विश्वास किया। समय के सन्दर्भ में, मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए अत्यंत योग्य हूँ; मैं ज़िन्दा बचे रहने के लिए अत्यंत योग्य हूँ। चार या पाँच दशकों की इस समय अवधि में, मैंने अपने परिवार और अपनी नौकरी का परित्याग कर दिया। जो कुछ मेरे पास था मैंने वह सब त्याग दिया, जैसे कि धन, हैसियत, उपभोग, और पारिवारिक समय; मैंने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजनों को नहीं खाया है; मैंने बहुत सी उपभोग की चीज़ों का आनन्द नहीं लिया है; मैंने बहुत से मनभावन स्थानों का दौरा नहीं किया हैं, मैंने यहाँ तक कि उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते हैं। यदि इन सब के कारण परमेश्वर मुझे नहीं बचा सकता है, तो मेरे साथ अन्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार किया जा रहा है और मैं इस प्रकार के परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता हूँ।" क्या ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका दृष्टिकोण इस प्रकार का है? (ऐसे से बहुत से हैं।) तो आज मैं एक तथ्य को समझने में तुम लोगों की सहायता करूँगा: उन में से हर एक व्यक्ति जो इस प्रकार का दृष्टिकोण रखता है वह अपने अपने पाँव में कुल्हाड़ी मार रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी आँखों को ढकने के लिए अपनी स्वयं की कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हैं। यह निश्चित रूप से उनकी कल्पनाएँ हैं, और उनके स्वयं के निष्कर्ष हैं जो उस मानक का स्थान लेते हैं जिसकी माँग परमेश्वर मनुष्य से करता है, परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से उन्हें रोकते हैं, उसे ऐसा बना देते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अनुभव नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा सिद्ध किए जाने के उनके अवसर की हानि करवा देते हैं और परमेश्वर की प्रतिज्ञा में उनका कोई भाग या अंश नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 11

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को और उस मानक को कैसे निर्धारित करता है जिसके द्वारा वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है

इससे पहले कि तुम्हारा अपनाकोई दृष्टिकोण या निष्कर्ष हो, तुम्हें सबसे पहले अपने प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझना चाहिए, परमेश्वर क्या सोच रहा है, और तब निर्णय लेना चाहिए कि तुम्हारी अपनी सोच सही है या नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी समय की इकाईयों का उपयोग नहीं किया है, और उसने उनके परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी किसी व्यक्ति के द्वारा सहे गए कष्ट की मात्रा का उपयोग नहीं किया है। तब परमेश्वर किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए मानक के रूप में किसका उपयोग करता है? किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए समय की इकाईयों का उपयोग करना—यही लोगों की धारणाओं से सर्वाधिक अनुरूप है। और ऐसे व्यक्ति भी हैं जिन्हें तुम लोग प्रायः देखते हो, ऐसे लोग जिन्होंने किसी समय बहुत कुछ समर्पित किया था, बहुत कुछ व्यय किया था, बहुत कुछ चुकाया था, और बहुत कष्ट सहा था। ये वे लोग हैं जिन्हें, तुम लोगों की दृष्टि में, परमेश्वर के द्वारा बचाया जा सकता था। वह सब जो ये लोग दिखाते हैं, वह सब जिसे ये लोग जीते हैं, वह निश्चित रूप से मनुष्यजाति की मानक के बारे में वो धारणा है जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है। चाहे तुम लोग जो भी मानो, मैं एक-एक करके इन उदाहरणों को सूचीबद्ध नहीं करूँगा। संक्षेप में, जब तक यह परमेश्वर की स्वयं की सोच का मानक नहीं है, तब तक यह मनुष्य की कल्पनाओं से आता है, और यह सब मनुष्य की धारणा है। अपनी स्वयं की अवधारणाओं और कल्पनाओं पर आँख बन्द करके जोर देने का क्या परिणाम होता है? स्पष्ट रूप से, वह परिणाम केवल परमेश्वर के द्वारा तुम्हें ठुकराना हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने अपनी योग्यताओं पर इतराते हो, परमेश्वर से स्पर्धा करते हो, और परमेश्वर से विवाद करते हो, तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सोच को समझने का प्रयास नहीं करते हो, न ही तुम मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करते हो। इस तरह से आगे बढ़ना, स्वयं को सबसे अधिक सम्मानित करना है, परमेश्वर को सम्मानित करना नहीं है। तुम स्वयं में विश्वास करते हो; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हो। परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं चाहता है, और परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं बचाएगा। यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को जाने दे सकते हो, और फिर अतीत के इन गलत दृष्टिकोणों को सुधार सकते हो; यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार आगे बढ़ सकते हो; तो अब से आगे परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का अभ्यास करना शुरू कर दो; सभी चीज़ों में परमेश्वर का सबसे महान के रूप में सम्मान करने का उपाय करो; स्वयं को परिभाषित करने के लिए, परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत कल्पनाओं, दृष्टिकोणों, या विश्वासों का उपयोग मत करो। इसके बजाय, तुम सभी मायनों में परमेश्वर के इरादों की खोज करो, तुम मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति का अहसास और समझ प्राप्त करो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के मानक का उपयोग करो—यह अद्भुत रहेगा! इसका अर्थ होगा कि तुम परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग की शुरुआत करने ही वाले हो।

चूँकि परमेश्वर लोगों के सोचने के ढंग, उनके विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए एक मानक के रूप में नहीं करता है, तो वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परीक्षणों का उपयोग करने के दो मानक हैं: पहला परीक्षणों की संख्या जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा इन परीक्षणों में लोगों का परिणाम है। ये दो संकेतक हैं जो मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करते हैं। अब हम इन दो मानकों पर सविस्तार बात करेंगे।

सबसे पहले, जब तुम्हारा सामना परमेश्वर की ओर से किसी परीक्षण से होता है (ध्यान दो: यह संभव है कि तुम्हारी नज़रों में यह परीक्षण छोटा सा हो और उल्लेख करने लायक नहीं हो), तो परमेश्वर तुम्हें स्पष्ट रूप से अवगत कराएगा कि तुम्हारे ऊपर परमेश्वर का हाथ है, और यह परमेश्वर है जिसने तुम्हारे लिए इस परिस्थिति की व्यवस्था की है। जब तुम्हारी कद-काठी अपरिपक्व होती है, तब परमेश्वर तुम्हारी जाँच करने के लिए परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। ये परीक्षण तुम्हारी कद-काठी के अनुरूप होंगे, जिन्हें समझने में तुम सक्षम होगे, और जिन्हें तुम सहन करने में सक्षम होगे। तुम्हारे किस भाग की जाँच करने के लिए? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति की जाँच करने के लिए। क्या यह प्रवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है? निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है! इसके अतिरिक्त, यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है! क्योंकि मनुष्य की यह प्रवृत्ति वह परिणाम है जो परमेश्वर चाहता है, जहाँ तक परमेश्वर की बात है यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। अन्यथा इस प्रकार के कार्य में संलग्न होने के द्वारा परमेश्वर लोगों पर अपने प्रयासों को व्यय नहीं करता। इन परीक्षणों के माध्यम से परमेश्वर अपने प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति को देखना चाहता है; वह देखना चाहता है कि तुम सही पथ पर हो या नहीं; और वह देखना चाहता है कि तुम परमेश्वर का भय मान रहे और दुष्टता से दूर रह रहे हो या नहीं। इसलिए, इसकी परवाह किए बिना कि उस विशेष समय पर तुम बहुत सी सच्चाई समझते हो या थोड़ी सी, तब भी तुम्हारा सामना परमेश्वर के परीक्षण से होगा, और सच्चाई की उस मात्रा में जिसे तुम समझते हो कोई वृद्धि होने के बाद, परमेश्वर तुम्हारे अनुरूप परीक्षणों की व्यवस्था करना निरन्तर जारी रखेगा। जब एक बार फिर से तुम्हारा सामना किसी परीक्षण से होता है, तो परमेश्वर देखना चाहता है कि इसी बीच तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारे विचार, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं: क्यों परमेश्वर सदैव लोगों की प्रवृत्ति को देखना चाहता है? क्या परमेश्वर ने नहीं देखा है कि वे किस प्रकार सत्य को अभ्यास में लाते हैं? क्यों वह अभी भी लोगों की प्रवृत्तियों को देखना चाहता है? यह निरर्थक बातें हैं! चूँकि परमेश्वर इस तरह से आगे बढ़ता है, तो परमेश्वर के इरादे ज़रूर उसमें निहित होंगे। परमेश्वर सदैव लोगों को उनकी तरफ से देखता है, उनके हर वचन और कर्म की, उनकी हर एक करतूत और हरकत की, यहाँ तक कि उनकी हर सोच और विचार की निगरानी करता है। जो कुछ भी लोगों के साथ घटित होता है: उनके भले कर्म, उनके दोष, उनके अपराध, और यहाँ तक कि उनके विद्रोह और विश्वासघात भी, परमेश्वर उनके परिणाम को निर्धारित करने में सबूत के रूप में उन सबको दर्ज करेगा। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य कदम दर कदम निर्मित होता जाता है, तुम अधिकाधिक सच्चाई को सुनते हो, तुम अधिकाधिक सकारात्मक बातों को, सकारात्मक जानकारियों को, और सत्य की वास्तविकता को स्वीकार करते हो। इस प्रक्रिया के दौरान, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बढ़ेंगी। उसके साथ-साथ, परमेश्वर तुम्हारे लिए और अधिक भारी परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। उसका लक्ष्य यह जाँच करना है कि इस बीच परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति परिपक्व हुई है या नहीं। निश्चित रूप से, इस समय के दौरान, जिस दृष्टिकोण की माँग परमेश्वर तुमसे करता है वह सत्य की वास्तविकता की तुम्हारी समझ के अनुरूप होता है।

जैसे-जैसे तुम्हारी कद-काठी धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे वह मानक भी धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा जिसकी माँग परमेश्वर तुमसे करता है। जब तुम अपरिपक्व होगे, तब परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही निम्न मानक देगा; जब तुम्हारी कद-काठी थोड़ी बड़ी होगी, तब परमेश्वर तुम्हें थोड़ा ऊँचा मानक देगा। परन्तु जब तुम समस्त सच्चाईयों को समझ जाओगे तो उसके पश्चात् परमेश्वर क्या करेगा? परमेश्वर तुमसे और भी अधिक बड़े परीक्षणों का सामना करवाएगा। इन परीक्षणों के बीच, परमेश्वर जो कुछ पाना चाहता है, परमेश्वर जो कुछ देखना चाहता है वह परमेश्वर के बारे में तुम्हारा गहरा ज्ञान और तुम्हारा सच्चा भय है। इस समय, तुमसे परमेश्वर की माँगें उस समय की अपेक्षा और अधिक ऊँची और "अधिक कठोर" होंगी जब तुम्हारी कद-काठी अधिक अपरिपक्व थी (ध्यान दो: लोग इसे कठोर के रूप में देखते हैं, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत के रूप में देखता है।) जब परमेश्वर लोगों के परीक्षण कर रहा है, तो परमेश्वर किस प्रकार की वास्तविकता की रचना करना चाहता है? परमेश्वर लगातार माँग कर रहा है कि लोग अपना हृदय उसे दें। कुछ लोग कहेंगे: "कोई कैसे अपना हृदय देता है? मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ, मैंने अपने घर और आजीविका का परित्याग किया है, मैंने परमेश्वर के लिए व्यय किया है! क्या ये सब परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और किस प्रकार से अपना हृदय परमेश्वर को दे सकता हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षा क्या है?" यह अपेक्षा बहुत साधारण है। वास्तव में, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परीक्षणों के विभिन्न चरणों में विभिन्न अंशों में अपना हृदय पहले से ही परमेश्वर को दे दिया है। परन्तु बड़ी मात्रा में लोग अपना हृदय परमेश्वर को कभी नहीं देते है। जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम परमेश्वर के विरोध में खड़े हो या तुम ऐसी स्थिति में खड़े हो जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तुम्हारा हृदय उसकी तरफ है या नहीं। जब तुम अपरिपक्व होते हो और परीक्षणों का सामना कर रहे होते हो, तब तुम्हारा आत्मविश्वास बहुत ही नीचे होता है, और तुम ठीक-ठीक नहीं जान सकते हो कि वह क्या है जिसकी परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें करने की आवश्यकता है क्योंकि तुम्हें सत्य की एक सीमित समझ है। इन सबके बावजूद, तुम तब भी ईमानदारी से और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हो, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो सकते हो, परमेश्वर को अपना अधिपति बना सकते हो, और परमेश्वर को उन चीज़ों को अर्पित करने के लिए तैयार हो सकते हो जिन्हें तुम अत्यंत बहुमूल्य मानते हो। यही परमेश्वर को पहले से ही अपना हदय देना है। जब तुम अधिकाधिक धर्मोपदेश को सुनोगे, और तुम अधिकाधिक सत्य को समझोगे, तो तुम्हारी कद-काठी भी धीरे-धीरे परिपक्व हो जाएगी। वह मानक जिसकी माँग इस समय परमेश्वर तुमसे करता है वही नहीं रहती है जो तब थी जब तुम अपरिपक्व थे; वह उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचे मानक की माँग करता है। जब धीरे-धीरे मनुष्य का हृदय परमेश्वर को दे दिया जाता है, तो यह परमेश्वर के निकटतर और निकटतर आ जाता है; जब मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के निकट आ सकते हैं, तो उनके पास उत्तरोत्तर ऐसा हदय होता है जो उसका भय मानता है। परमेश्वर को इस प्रकार का हदय चाहिए।

जब परमेश्वर किसी का हदय पाना चाहता है, तो वह उन्हें अनगिनित परीक्षण देता है। इन परीक्षणों के दौरान, यदि परमेश्वर उस व्यक्ति के हदय को नहीं पाता है, और न ही वह यह देखता है कि इस व्यक्ति में कोई प्रवृत्ति है—कहने का अभिप्राय है कि वह यह नहीं देखता है कि यह व्यक्ति काम में लगा रहता है या उस तरह से व्यवहार करता है जो परमेश्वर का भय मानता है, और वह उस प्रवृत्ति तथा दृढ़ संकल्प को नहीं देखता है जो इस व्यक्ति से दुष्टता को दूर करता है। यदि यह ऐसा ही है, तो अनगिनत परीक्षणों के बाद, ऐसे व्यक्तियों के प्रति परमेश्वर का धैर्य टूट जाएगा, और वह ऐसे व्यक्तियों को अब और बर्दाश्त नहीं करेगा। वह उनके अब और परीक्षण नहीं करेगा, तथा वह उनमें अब और कार्य नहीं करेगा। तब उस व्यक्ति के परिणाम के लिए उसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि उनके पास कोई परिणाम नहीं होगा। यह संभव है कि ऐसे व्यक्तियों ने कुछ बुरा न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने बाधित या परेशान करने के लिए कुछ न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया हो? हालाँकि, ऐसे व्यक्तियों का हदय परमेश्वर से छिपा हुआ होता है। उनकी परमेश्वर के प्रति कभी भी कोई स्पष्ट प्रवृत्ति और दृष्टिकोण नहीं रहा है, और परमेश्वर स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि उनका हदय परमेश्वर को दे दिया गया है, और वह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का प्रयास कर रहा है? परमेश्वर के पास इन लोगों के लिए अब और धैर्य नहीं है, वह अब और कोई कीमत नहीं चुकाएगा, वह अब और दया नहीं करेगा, और वह उन पर अब और कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति के परमेश्वर में विश्वास का जीवन पहले ही बीत चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन सभी परीक्षणों में जो परमेश्वर ने इस व्यक्ति को दिए हैं, परमेश्वर ने उस परिणाम को प्राप्त नहीं किया है जो वह चाहता है। इस प्रकार, बहुत से लोग हैं जिनमें मैंने कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी को नहीं देखा है। इसे देखना कैसे संभव है? हो सकता है कि इस प्रकार के व्यक्तियों ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो, और सतही तौर पर वे बहुत सक्रिय रहे हों। उन्होंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हों, बहुत से मामलों को सँभाला हो, टिप्पणियों से 10 पुस्तिकाएं भर ली हों, और बहुत से पत्रों और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली हो। तथापि, इस व्यक्ति की ओर से कभी भी कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई, और कभी भी परमेश्वर के प्रति कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं रहा है, और न ही कोई स्पष्ट प्रवृत्ति रही है। अर्थात् तुम ऐसे व्यक्तियों के हदय को नहीं देख सकते हो। उनका हदय हमेशा लपेटा हुआ रहता है, उनका हृदय मुहरबंद होता है—यह परमेश्वर के प्रति मुहरबंद होता है, इसलिए परमेश्वर ने इस व्यक्ति के सच्चे हदय को नहीं देखा है, उसने परमेश्वर के प्रति इस व्यक्ति के सच्चे भय को नहीं देखा है, और इससे भी बढ़कर, उसने नहीं देखा है कि किस प्रकार यह व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग में चलता है। यदि अब तक परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को प्राप्त नहीं किया है, तो क्या वह उन्हें भविष्य में प्राप्त कर सकता है? वह प्राप्त नहीं कर सकता है! क्या परमेश्वर उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहेगा जिन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता है? वह नहीं करेगा! तब इन लोगों के प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें ठुकरा देता है, वह उन पर ध्यान नहीं देता है।) वह उन पर ध्यान नहीं देता है! परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति पर ध्यान नहीं देता है; वह उन्हें ठुकरा देता है। तुम लोगों ने इन वचनों को बहुत शीघ्रता से, बहुत सटीकता से याद कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है वह तुम लोगों की समझ में आ गया है!

कुछ लोग हैं जो, परमेश्वर के अनुसरण के आरम्भ में, अपरिपक्व और अज्ञानी होते हैं; वे परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हैं; वे परमेश्वर में विश्वास करने, परमेश्वर का अनुसरण करने के मानव-निर्मित और ग़लत मार्ग को अपनाते हुए, यह भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना क्या होता है। जब इस प्रकार के व्यक्ति का सामना किसी परीक्षण से होता है, तो वे इसके विषय में अवगत नहीं होते हैं, और वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के प्रति सुन्न होते हैं। वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या होता है, और किसी परीक्षण के दौरान दृढ़ता से खड़ा रहना क्या होता है? परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को सीमित मात्रा में समय देगा, और इस समय के दौरान, वह उन्हें समझने देगा कि परमेश्वर का परीक्षण क्या है, और परमेश्वर के इरादे क्या हैं। बाद में, ऐसे व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण प्रदर्शित करने की आवश्यकता होती है। ऐसे लोगों के बारे में जो इस चरण में हैं, परमेश्वर अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जिनके कुछ दृष्टिकोण तो हैं फिर भी आगे पीछे डगमगाते रहते हैं, जो अपना हदय परमेश्वर को देना तो चाहते हैं किन्तु ऐसा करने के लिए सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए हैं, जिन्होंने, यद्यपि कुछ मूल सच्चाईयों को अभ्यास में लगा लिया है, फिर भी किसी बड़े परीक्षण से सामने होने पर, वे उससे जी चुराते हैं और छोड़ देना चाहते हैं—इन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर को ऐसे लोगों के प्रति अभी भी थोड़ी बहुत अपेक्षा है। परिणाम उनके दृष्टिकोणों एवं प्रदर्शनों पर निर्भर करता है। परमेश्वर किस प्रकार उत्तर देता है यदि लोग प्रगति करने के लिए सक्रिय नहीं होते हैं? वह त्याग देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे पहले कि परमेश्वर तुम्हें त्यागे, तुमने पहले ही स्वयं को त्याग दिया है। इस प्रकार, ऐसा करने के लिए तुम परमेश्वर को दोष नहीं दे सकते हो, क्या तुम दोष दे सकते हो? क्या यह उचित है? (हाँ उचित है।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 12

परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग कभी कभार ही परमेश्वर के इरादों पर ध्यान देते हैं, और कभी कभार ही परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति पर ध्यान देते हैं। लोग लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते हैं, अतः जब ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनमें परमेश्वर के इरादे शामिल होते हैं, और परमेश्वर का स्वभाव शामिल होता है, तो तुम लोग गड़बड़ा जाते हो; और अत्यंत अनिश्चित हो जाते हो, और तुम लोग या तो अन्दाज़ा लगाते हो या दाँव लगाते हो। यह प्रवृत्ति क्या है? यह एक तथ्य को साबित करता है: कि परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोग उसे खाली हवा के एक खाली गुच्छे के रूप में, एक ऐसी चीज़ के रूप में मानते हैं जो एक मिनट मौज़ूद है और अगले मिनट मौज़ूद नहीं प्रतीत होती है। मैं इसे इस प्रकार से क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब भी तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तब तुम लोग परमेश्वर के इरादों को नहीं जानते हो। तुम लोग क्यों नहीं जानते हो? ऐसा नहीं है कि तुम लोग बस अभी नहीं जानते हो। इसके बजाय, आरम्भ से लेकर अंत तक तुम लोग नहीं जानते हो कि इस मामले के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। उन समयों में जब तुम परमेश्वर की प्रवृत्ति को नहीं देख सकते और नहीं जान सकते हो, क्या तुमने उस पर विचार किया है? क्या तुमने इसकी खोज की है? क्या तुमने उसका संवाद किया है? नहीं! यह एक तथ्य की पुष्टि करता है: तुम्हारे विश्वास का परमेश्वर और सच्चा परमेश्वर आपस में सम्बद्ध नहीं हैं। तुम, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हो, केवल अपनी स्वयं की इच्छा पर विचार करते हो, केवल अपने अगुवों की इच्छा का विचार करते हो, और परमेश्वर के वचन के केवल सतही एवं सैद्धान्तिक अर्थ पर विचार करते हो, किन्तु सचमुच में परमेश्वर की इच्छा को जानने और खोजने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं करते हो। क्या ऐसा ही नहीं होता है? इस मामले का सार डरावना है! बहुत वर्षों से, मैंने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा हो। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के बारे में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, इसे साफ-साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ है जिन्हें करने में वे असमर्थ हैं, और परमेश्वर को वैसा ही सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य और अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर में इस तरह से विश्वास करता है मानो कि वह कोई कठपुतली हो; ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएँ नहीं होती हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर मिट्टी की एक मूर्ति है, और यह कि जब किसी मसले से सामना होता है, तो परमेश्वर के पास कोई प्रवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, कोई विचार नहीं होता है; वे मानते हैं कि वह मानवजाति की दया पर है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है; यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहिष्णुता की आवश्यकता होती है, परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने स्वयं के मन में एक परमेश्वर को गढ़ लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी माँगों को पूरा करवाते हैं और अपनी सभी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाते हैं। चाहे यह व्यक्ति कभी भी या कहीं भी क्यों न करे, और चाहे कुछ भी क्यों न करे, वे परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में, और परमेश्वर में अपने विश्वास में इस कल्पना को अपनाएँगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को भड़का देते हैं उसके पश्चात् परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, और चाहे लोग परमेश्वर का कैसे भी अपमान क्यों न करें, परमेश्वर उनमें से किसी का भी स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य के दोष, मनुष्य के अपराध, और मनुष्य की अवज्ञा उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहिष्णु एवं धैर्यवान रहेगा। परमेश्वर तब भी उनसे पहले के समान ही प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, चाहे कोई व्यक्ति परमेश्वर पर किसी भी प्रकार से विश्वास क्यों न करें, अगर वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तो परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक प्रवृत्ति रखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब तुम परमेश्वर पर विश्वास कर रहे होत हो उस समय, हो सकता है कि तुम परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखते हो, तुम प्रतिदिन उसका अध्ययन कर रहे होते हो, तुम हर दिन इसे पढ़ते हो, किन्तु तुम वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देते हो, तुम उसे खाली हवा के रूप में मानते हो, उसे एक व्यक्ति के रूप में मानते हो, और तुममें से कुछ लोग उसे केवल एक कठपुतली के रूप में मानते हों। मैं इसे इस प्रकार क्यों कहता हूँ? क्योंकि जिस प्रकार से मैं इसे देखता हूँ, उसमें चाहे तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या किसी परिस्थिति से होता है, वे बातें जो तुम लोगों के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज करने से नहीं होता है? तुम केवल वही जानते हो जो तुम स्वयं सोच रहे हो, और जो तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तुम्हारे स्वयं के विचारों, और तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोणों को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोप दिया जाता है। तुम्हारे मन में वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, और तुम इन दृष्टिकोणों को मानक बना लेते हो जिन्हें तुम बिना डाँवाडोल हुए सँभाले रहते हो। समय के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुम्हें परमेश्वर से निरंतर दूर हीकरता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 13

परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझो और परमेश्वर के बारे में सभी गलत धारणाओं को छोड़ दो

यह परमेश्वर जिस पर तुम लोग वर्तमान में विश्वास करते हो, क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (वह उससे घृणा करता है।) जब वह अज्ञानी लोगों की ग़लतियों को देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (उदासी।) जब वह लोगों को उसकी भेटों को चुराते हुए देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है।) यह सब बिलकुल साफ है, है न? जब वह किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास में लापरवाह होते हुए, और किसी भी तरह से सत्य की खोज नहीं करते हुए देखता है, तो परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, है न? लापरवाही ऐसी प्रवृत्ति है जो पाप नहीं है, और यह परमेश्वर का अपमान करना नहीं है। लोग मानते हैं कि इसे एक गहरी भूल नहीं मानना चाहिए। तब तुम्हें क्या लगता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह इसका उत्तर देने के लिए तैयार नहीं है।) इसका उत्तर देने के लिए तैयार नहीं है—यह कैसी प्रवृत्ति है? यह ऐसी है कि परमेश्वर इन लोगों को तुच्छ मानता है, और इन लोगों का तिरस्कार करता है! परमेश्वर ऐसे लोगों से निपटने के लिए जानबूझकर उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। उसका तरीका है उन्हें दरकिनार करना, उन पर ऐसे किसी कार्य में संलग्न नहीं होना, जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन शामिल है। इस प्रकार के व्यक्ति की परमेश्वर के कार्य में गिनती नहीं की जाती है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करते हैं? चरम घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों से अत्यंत क्रोधित होता है जो उसके स्वभाव को क्रोधित करने के बारे में पश्चातापी नहीं हैं! "क्रोधित होना" मात्र एक अनुभूति, एक मनोदशा है; यह एक स्पष्ट प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है। परन्तु यह अनुभूति, यह मनोदशा, इस व्यक्ति के लिए एक परिणाम उत्पन्न करती है: यह परमेश्वर को चरम घृणा से भर देगा! इस अत्यंत चरम का परिणाम क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को दरकिनार कर देगा, और फिलहाल उन्हें कोई उत्तर नहीं देगा। फिर वह "शदर ऋतु के बाद" उन्हें छाँटकर अलग करने की प्रतीक्षा करेगा। इसका क्या तात्पर्य है? क्या इस व्यक्ति का अभी भी कोई परिणाम है? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी भी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! तो तब क्या यह सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर वर्तमान में इस प्रकार के व्यक्ति को कोई उत्तर नहीं देता है? (हाँ।) अब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें उन नकारात्मक परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उनके व्यवहार एवं उनके द्वारा की गई दुष्टता के द्वारा उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए यह परमेश्वर का उत्तर है। इसलिए अब मैं इस प्रकार के व्यक्ति से साफ-साफ कहता हूँ: भ्रान्तियों को अब और पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में अब और मत लगे रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं रहेगा। वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों और अवज्ञा को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे: "मैंने भी इस प्रकार के कुछ लोगों को देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा स्पर्श किया जाता है, और वे फूट-फूट कर रोते हैं? सामान्यतया वे खुश भी बहुत रहते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति, और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें मत करो! फूट-फूट कर रोना आवश्यक रूप से परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाना या परमेश्वर की उपस्थिति होना नहीं है, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने, उनका परित्याग करने का निर्धारण कर लिया है, तो उस व्यक्ति के पास पहले से ही कोई परिणाम नहीं होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जब वे प्रार्थना करते हैं तो वे स्वयं के बारे में कितना आत्मसंतुष्ट महसूस करते हैं, और उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना आत्मविश्वास है; यह पहले से ही महत्वहीन है। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के आत्मविश्वास की आवश्यकता नहीं है, कि परमेश्वर ने पहले से ही ऐसे व्यक्तियों को ठुकरा दिया है। उनके साथ बाद में कैसे निपटा जाए यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। जो महत्वपूर्ण है वह है कि जिस क्षण वह व्यक्ति परमेश्वर को क्रोधित करता है, उसका परिणाम पहले ही निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को नहीं बचाना निर्धारित कर दिया है, तब उन्हें दण्डित होने के लिए पीछे छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की प्रवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी करते हैं और उसे भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग मुक्तभाव से उसका अपमान कर सकते हैं और उसे कोई अनुभूति या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होती है। यह कि उसके पास करुणा है इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस प्रकार लोगों से व्यवहार करता है उसमें उसके कोई सिद्धान्त नहीं है। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कल्पना की गई कठपुतली या कुछ और नहीं है। चूँकि वह अस्तित्व में है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों और इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्यजाति से व्यवहार करता है उसमें परमेश्वर से मनुष्य की शैली और सोच को काम में नहीं लगवाना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम परमेश्वर के कोप को फुसला रहे हो, और तुम परमेश्वर की महिमा को चुनौती दे रहे हो! इस प्रकार, तुम लोगों के इस मसले की गंभीरता को समझ लेने के पश्चात्, मैं तुम लोगों में से हर एक से उसके कार्यकलापों में सावधान और विवेकी होने का आग्रह करता हूँ। अपने बोलने में सावधान और विवेकी रहो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके बारे में, तुम लोग जितना अधिक सावधान और विवेकी रहते हो, उतना ही बेहतर है! जब तुम्हारी समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और लापरवाही से उपनाम मत रखो। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। इसके बजाय, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम सब बातों से बढ़कर इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हो, और सब से बढ़कर इस प्रवृत्ति को धारण कर सकते हो, तब परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, अज्ञानता, और चीज़ों के पीछे तर्कों की समझ की कमी के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। इसके बजाय, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय, परमेश्वर के इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता की प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर तुम्हें स्मरण करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धा विहीन होती है—मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करना, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाना और उन्हें परिभाषित करना—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुम्हें कोई कथन कहेगा। कदाचित् यह कथन तुम्हारे परिणाम को सम्मिलित करता हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना चाहता हूँ: हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति तुम्हें सावधान और विवेकी रहना चाहिए। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत रहो। इससे पहले कि तुम कुछ कहो, तुम्हें सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें वास्तव में तब भी इन प्रश्नों को समझना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर जगह, सभी चीज़ों में, हर समय, इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकते हो, एक इस तरह की प्रवृत्ति अपना सकते हो विशेषरूप जब कोई चीज़ तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो परमेश्वर हमेशा तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें हमेशा अनुसरण करने के लिए एक मार्ग देगा। चाहे लोग कुछ भी प्रदर्शित क्यों न कर रहे हों, परमेश्वर इस सब को स्पष्ट रूप से और सरल रूप से देखता है, और वह तुम्हें इन प्रदर्शनों का सटीक और उपयुक्त मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तुम अंतिम परीक्षण का अनुभव कर लेते हो उसके पश्चात्, परमेश्वर तुम्हारे समस्त व्यवहार को लेगा और तुम्हारा परिणाम निर्धारित करने के लिए इसे पूरी तरह से सारांशित करेगा। यह परिणाम बिना किसी लेशमात्र सन्देह के हर एक को आश्वस्त करेगा। जो कुछ मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ वह है कि तुम लोगों का हर कर्म, तुम लोगों का हर कार्यकलाप, और तुम लोगों का हर विचार तुम लोगों के भाग्य को निर्धारित करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 14

मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है?

एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है, और वह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति निर्णायक है! यह निर्धारित करती है कि तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या उस सुन्दर मंज़िल की ओर जाओगे जिसे परमेश्वर ने तुम लोगों के लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर ने पहले से ही 20 से अधिक वर्षों तक कार्य किया है, और इन 20 वर्षों के दौरान कदाचित् तुम लोगों का हृदय तुम्हारे प्रदर्शन के बारे में थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा हो। हालाँकि, परमेश्वर के हृदय में, उसने तुम लोगों में से हर एक व्यक्ति का एक वास्तविक एवं सच्चा अभिलेख बनाया है। शुरुआत में उस समय से लेकर जब हर एक व्यक्ति ने परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके उपदेश को सुनना, अधिक से अधिक सच्चाई को समझना शुरू किया था, उस समय तक जब वे अपने कर्तव्य को निभाते हैं—परमेश्वर के पास इन प्रदर्शनों में से हर एक का अभिलेख है। जब कोई अपने कर्तव्य को निभाता है, जब उनका सामना सभी प्रकार की परिस्थितियों, सभी प्रकार के परीक्षणों से होता है, तो ऐसे व्यक्तियों की प्रवृत्ति क्या होती है? वे किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं? वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं? ... परमेश्वर के पास इन सभी चीज़ों का लेखा, इन सबका अभिलेख है? कदाचित् तुम लोगों के दृष्टिकोण से, ये मामले भ्रमित करने वाले हों। हालाँकि, जहाँ परमेश्वर खड़ा है वहाँ से, वे सभी मामले बिलकुल स्पष्ट हैं, और लापरवाही का जरा सा भी संकेत नहीं है। यह ऐसा मामला है जो हर एक व्यक्ति के परिणाम को, और साथ ही उसके भाग्य और भविष्य की संभावनाओं को सम्मिलित करता है। इससे भी बढ़कर, यह वह स्थान है जहाँ परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयासों को व्यय करता है। इस प्रकार परमेश्वर इसकी जरा सी भी उपेक्षा करने का साहस नहीं करता है, और किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगा। शुरुआत से लेकर बिलकुल अन्त तक परमेश्वर मनुष्यजाति के इस हिसाब-किताब को अभिलिखित कर रहा है, मनुष्य के परमेश्वर का अनुसरण करने के पूरे मार्ग को अभिलिखित कर रहा है। ऐसे समय में परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति तुम्हारा भाग्य तय करेगी। क्या यह सही नहीं है? अब, क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? क्या परमेश्वर के कार्य उचित हैं? क्या तुम लोगों के दिमाग में अभी भी परमेश्वर की कोई दूसरी तस्वीर है? (नहीं।) तुम लोग कहते क्या हो कि मनुष्य का परिणाम, परमेश्वर द्वारा तय किया जानाचाहिए या स्वयं मनुष्य द्वारा? (इसे परमेश्वर द्वारा तय किया जाना चाहिए।) वह कौन है जो उसे तय करता है? (परमेश्वर।) तुम लोग निश्चित नहीं हो, क्या तुम लोग हो? हांग कांग के भाईयो और बहनो, बोलो—इसे कौन तय करता है? (मनुष्य स्वयं इसे तय करता है।) मनुष्य स्वयं इसे तय करता है? तब क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? दक्षिणी कोरिया के भाई-बहन बोलें (परमेश्वर मनुष्य के सभी कार्यकलापों और कर्मों के आधार पर, और उस मार्ग के आधार पर जिस पर वे चलते हैं उनके परिणाम निर्धारित करता है।) यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ प्रत्युत्तर है। यहाँ एक तथ्य है जिसे मुझे तुम सब लोगों को सूचित अवश्य करना चाहिए: परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान, वह मनुष्य के लिए एक मानक निर्धारित करता है। यह मानक ऐसा है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन कर सकता है, और परमेश्वर के मार्ग में चल सकता है? यही वह मानक है जिसे मनुष्य के परिणाम को तौलने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि तुम परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकते हो; यदि तुम नहीं करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते हो। तब वह कौन है जिसके लिए तुम कहते हो कि वह इस परिणाम को तय करता है? यह केवल परमेश्वर ही नहीं है जो इसे तय करता है, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर और मनुष्य साथ मिलकर तय करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ।) ऐसा क्यों है? क्योंकि यह परमेश्वर ही है जो सक्रिय रूप से मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य में शामिल होना चाहता है, और मनुष्य के लिए एक खूबसूरत मंज़िल तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, और यह परिणाम, यह मंज़िल ऐसी है जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए तैयार करता है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, तो परमेश्वर को इस कार्य को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; यदि परमेश्वर ने इस कार्य को नहीं किया होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने का कोई अवसर नहीं होता। मनुष्य ही उद्धार का लक्ष्य है, और यद्यपि इस प्रक्रिया में मनुष्य निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की प्रवृत्ति ही है जो यह निर्धारित करती है कि मनुष्यजाति का उद्धार करने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं? यदि वह मार्गदर्शन नहीं होता जिसे परमेश्वर तुम्हें देता है, तो तुम उसके मानक को नहीं जान पाते, और तुम्हारे पास कोई उद्देश्य नहीं होता। यदि तुम्हारे पास यह मानक, यह उद्देश्य है, फिर भी तुम सहयोग नहीं करते हो, तुम इसे अभ्यास में नहीं लाते हो, तुम क़ीमत नहीं चुकाते हो, तो तब भी तुम इस परिणाम को प्राप्त नहीं करोगे। इसी कारण से, मैं कहता हूँकि किसी के परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है, और इसे उस व्यक्ति से भी अलग नहीं किया जा सकता है। और अब तुम लोग जानते हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन तय करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 15

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने की ओर प्रवृत्त होते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय में वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने किसी चीज़ पर ध्यान दिया है? क्या तुम लोगों ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति एक परिवर्तन से होकर गुज़री है? क्या मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना समस्त प्रेम और करुणा प्रदान करता रहेगा? इस मामले में परमेश्वर का सार भी शामिल होता है। ... जब एक बार लोग यह जान जाते हैं कि परमेश्वर मनुष्यजाति से प्रेम करता है, तो वे परमेश्वर को प्रेम के एक प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं: चाहे लोग कुछ भी क्यों न करें, चाहे वे किसी भी प्रकार से व्यवहार करें, चाहे वे परमेश्वर से कैसा ही व्यवहार क्यों न करें, चाहे वे कितने ही अवज्ञाकारी क्यों न हों, इनमें से किसी भी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि परमेश्वर के पास प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम असीमित और अथाह है। परमेश्वर के पास प्रेम है, इसलिए वह लोगों के साथ सहिष्णु हो सकता है; परमेश्वर के पास प्रेम है, इसलिए वह लोगों के प्रति करुणावान हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति करुणावान हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति करुणावान हो सकता है। और उनकी अवज्ञा के प्रति करुणावान हो सकता है। क्या यह वास्तव में इसी तरह से है? कुछ लोगों के लिए, जब वे एक बार, या कुछ बार, परमेश्वर के धैर्य का अनुभव कर लेते हैं, तो वे, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर उनके प्रति सदैव धैर्यवान रहेगा, उनके प्रति सदैव दयावान रहेगा, परमेश्वर के बारे में अपनी स्वयं की समझ में उसके साथ एक पूँजी के रूप में बर्ताव करते हैं, और वे अपने जीवन के दौरान परमेश्वर के धैर्य को अपनाएँगे और उसे एक मानक के रूप में मानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर उनके साथ बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, जब वे एक बार परमेश्वर की सहिष्णुता का अनुभव कर लेते हैं, तो हमेशा परमेश्वर को सहिष्णुता के रूप में परिभाषित करेंगे, और यह सहिष्णुता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, और यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ये विश्वास सही हैं? हर बार जब परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों की चर्चा की जाती है, तो तुम लोग घबराए हुए दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस प्रकार देखना मुझे बहुत चिंतित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत सी सच्चाईयों को सुना है; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से सम्बन्धित बहुत से विषयों को भी सुना है। हालाँकि, तुम लोगों के मन में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई, सिद्धांत और लिखित वचनों पर आधारित मात्र स्मृतियाँ हैं। तुम लोगों में से कोई भी यह अनुभव करने में सक्षम नहीं है कि तुम लोगों के वास्तविक जीवन में परमेश्वर का स्वभाव क्या है, और न ही तुम लोग यह देख सकते हो कि परमेश्वर का स्वभाव आखिर क्या है। इसलिए, तुम सभी लोग अपने-अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम सब लोग आँखें मूँदकर उस हद तक विश्वास करते हो, कि तुम लोगों की परमेश्वर के प्रति श्रद्धाहीन प्रवृत्ति है, कि तुम लोग उसे एक ओर धकेल देते हो। तुम लोगों की परमेश्वर के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम लोग हमेशा परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष बनाते हो। एक बार जब तुम लोगों को थोड़ा सा ज्ञान मिल जाता है, तो तुम लोग अत्यंत संतुष्ट महसूस करते हो, तुम लोग महसूस करते हो कि तुम लोगों ने परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में पा लिया है। उसके बाद, तुम लोग निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम लोग उसे स्वतन्त्र रूप से चलने नहीं देते हो। और जब कभी भी परमेश्वर कुछ नया करता है, तो तुम लोग बस स्वीकार नहीं करते हो कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहेगा: "मैं मनुष्य से अब और प्रेम नहीं करता हूँ; मैं मनुष्य को अपनी दया अब और प्रदान नहीं करता हूँ; मनुष्य के प्रति मेरे पास अब और सहिष्णुता या धैर्य नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ", तो लोग अपने हृदय की गहराईयों से इस प्रकार के कथन से असहमत होंगे। कुछ लोग तो यहाँ तक भी कहेंगे कि: "तू अब और मेरा परमेश्वर नहीं है, तू अब और वह परमेश्वर नहीं है जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। यदि तू यही कहता है, तो तू अब और मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं है, और मुझे तेरा अनुसरण करते रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तू मुझे करुणा नहीं देता है, मुझे प्रेम नहीं देता है, मुझे सहिष्णुता नहीं देता है, तो मैं अब और तेरा अनुसरण नहीं करूँगा। यदि तू अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहिष्णु बना रहता है, और हमेशा मेरे साथ धैर्यवान रहता है, और मुझे यह देखने देता है कि तू प्रेम है, कि तू धैर्यवान है, कि तू सहिष्णु है, केवल तभी मैं तेरा अनुसरण कर सकता हूँ, और केवल तभी मेरे पास वह आत्मविश्वास हो सकता है कि अन्त तक अनुसरण करूँ। चूँकि मेरे पास तेरा धैर्य और करुणा है, मेरी अवज्ञा और मेरे अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, और मैं किसी भी समय और कहीं पर भी पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और कहीं पर भी पाप अंगीकार कर सकता हूँ और माफ किया जा सकता हूँ, और किसी भी समय और कहीं पर भी तुझे क्रोधित कर सकता हूँ। तेरे पास मुझ से सम्बन्धित अपने स्वयं के कोई विचार और निष्कर्ष नहीं होने चाहिए।" यद्यपि हो सकता है कि तुम इस प्रकार के प्रश्न के बारे में ऐसे आत्मनिष्ठ रूप से और सचेतन रूप से नहीं सोच सको, फिर भी जब कभी भी परमेश्वर को तुम अपने पापों को क्षमा करने का एक यन्त्र और एक खूबसूरत मंज़िल पाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक वस्तु होना विचार करते हो, तो तुमने पहले से ही अतिसूक्ष्म रूप से जीवित परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में, अपने विरोध में रख दिया है। यही है जो मैं देखता हूँ। हो सकता है कि तुम कहते रहो, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ"; "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव को तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर का आज्ञा पालन करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना चाहता हूँ, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना चाहता हूँ"; इत्यादि। हालाँकि, चाहे तुम जो कुछ भी कहते हो वह कितना अच्छा क्यों न सुनाई देता हो, चाहे तुम सिद्धान्त को कितना ही अधिक क्यों न जानते हो, चाहे वह सिद्धान्त कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, यह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, मामले का तथ्य यह है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने पहले से ही सीख लिया है कि किस प्रकार परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को निकालने के लिए उस विनियम, मत, और सिद्धान्त का उपयोग करें जिन पर तुम लोगों ने महारत हासिल कर ली है, और पूर्णतः स्वभाविक तरीके से उसे स्वयं के विरुद्ध रखें। यद्यपि तुमने शब्दों में महारत हासिल कर ली है और मतों पर महारत हासिल कर ली है, फिर भी तुमने वास्तव में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे लिए परमेश्वर के करीब होना, परमेश्वर को जानना, और परमेश्वर को समझना बहुत कठिन है। यह दयनीय है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 16

उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तुम इस प्रकार के व्यक्तियों को हर जगह पाओगे: जब वे परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि क्यों ऐसा व्यक्ति छोड़कर चला जाता है। पहले हम देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण ऐसे व्यक्ति छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। ये वे व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने इसे समाप्त किया है, बल्कि परमेश्वर ने समाप्त किया है। यह कि ऐसे व्यक्तियों ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि वे पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं करते हैं। चूँकि ऐसे व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब ऐसे व्यक्तियों की ऐसी प्रवृत्ति, ऐसा दृष्टिकोण हैं, और वे परमेश्वर को छोड़ने पर दृढ़ हैं, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी अधम या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा होता है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से भर जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस आऊँगा। या यदि परमेश्वर मुझे बुलाता है, तो मैं वापस आऊँगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाता हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं बहाव के साथ अब और बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आऊँगा। यद्यपि ऐसे व्यक्तियों ने अपने मन में गणना कर ली होती है कि वे किस समय पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे अनुभव नहीं करते हैं कि चाहे वे किसी भी प्रकार से क्यों न सोचें और किसी भी प्रकार से योजना क्यों न बनाएँ, यह सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? कि यह व्यक्ति चूहों में से एक है, और वह उनके साथ ही नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, परन्तु वह दण्ड नहीं पाता है। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख पाते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष केवल परमेश्वर के हृदय में ही निकाला जाता है, इसलिए लोग परिणाम को नहीं देख सकते हैं। जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पक्ष नहीं है; परन्तु अन्य पक्ष है, ऐसा पक्ष जिसे तुम नहीं देखते हो—यही परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष हैं।

जो लोग परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग का परित्याग कर देते हैं

इसलिए परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड क्यों दे सकता है? क्यों परमेश्वर उनके प्रति बहुत क्रोधित है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप है, कोप है। वह वध किए जाने हेतु कोई भेड़ नहीं है; इससे भी अधिक, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। वह कोई खाली हवा का झोंका भी नहीं है जिसे धौंस दी जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता हो, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं करना है। यह क्रोध कदाचित् किसी किसी शब्द; कदाचित् किसी विचार; किसी प्रकार के अधम व्यवहार; हल्के व्यवहार, ऐसे व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में और नैतिकता में कामचलाऊ हो, के द्वारा उत्पन्न हुआ हो सकता है; या कदाचित् किसी मत, किसी सिद्धान्त के द्वारा उत्पन्न हुआ हो सकता है। हालाँकि, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर खो जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तो हो सकता है तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और हो सकता है तुम उसे हर समय अपमानित करते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ हो, और तुम नहीं जानोगे कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर अपने आप को कैसे रखना है। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत रह सकते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तब तुम जानोगे कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना क्या होता है।

परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इस बारे में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितने अधिक परीक्षणों का अनुभव किया है, या तुम्हें कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारे हृदय में क्या प्रवृत्ति है, और कौन सा सार तुम व्यक्त करते हो। लोगों का सार और उनकी आत्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ—ये अत्यंत महत्वपूर्ण, अत्यंत प्रमुख बातें हैं। उन लोगों के संबंध में जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी कुत्सित प्रवृत्ति ने और सत्य से घृणा करने वाले उनके हृदय ने परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने का एक मामला नहीं है, और न ही ऐसा है कि वे इसके बारे में अस्पष्ट हैं। यह उन्हें इसमें जबरदस्ती इसमें धकेले जाने का मामला तो बिल्कुल नहीं है। बल्कि उन्होंने सचेत रूप से, और स्पष्ट मन से, परमेश्वर को छोड़कर जाना चुना है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे ऐसा, मेम्ना नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, उड़ाऊ पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को गँवा दिया था। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी दशा, ऐसी स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और यह इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? इसलिए यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को अपमानित कर सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई परमेश्वर की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेते हैं, और तब भी मानते हैं कि परमेश्वर उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की खोई हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनका हृदय परिवर्तन होने की प्रतीक्षा कर रहा है—तो ऐसे व्यक्ति अपने दण्ड के दिन से बहुत दूर नहीं किए गए हैं। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से यूँही मना नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धाहीन प्रवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को अपमानित किया है। क्या वह अब भी उसे स्वीकार करेगा? इस मामले के बारे में परमेश्वर के हृदय में उसके सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानबूझ कर और स्पष्ट मन से परमेश्वर को अस्वीकार कर सकता है और स्वयं को परमेश्वर से प्रस्थान कर सकता है, तो परमेश्वर उसके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य के दरवाजे को उसके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति एक बार फिर द्वार खटखटाते हुए आता है, तो परमेश्वर उसके लिए पुनः द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए निकाल दिया जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा हो। मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त कर दिए जाने के पश्चात्, 250 अगुवों ने मूसा के प्रति उसके कार्यकलापों और विभिन्न अन्य कारणों की वजह से अपनी अवज्ञा व्यक्त की। उन्होंने किसका आज्ञापालन करने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने से इनकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया था। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तुम ने बहुत किया, अब बस करो; क्योंकि सारी मण्डली का एक एक मनुष्य पवित्र है, और यहोवा उनके मध्य में रहता है...।" मनुष्य की नज़रों में, क्या ये वचन बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ तो गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, वे किसी नियम को नहीं तोड़ते हैं, क्योंकि बिल्कुल सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये वचन परमेश्वर के इतने क्रोध को भड़का सकते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों के लिए नहीं कहा गया है, बल्कि परमेश्वर के लिए कहा गया है। उनके द्वारा व्यक्त की गई प्रवृत्ति और स्वभाव निश्चित रूप से वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, और वे परमेश्वर के उस स्वभाव को अपमानित करते हैं जिसे अपमानित अवश्य नहीं किया जाना चाहिए। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के बारे में जो परमेश्वर का परित्याग कर दिया है, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी प्रवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण और प्रवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से निपटता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है मगर तब भी वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चुनते हैं। इसीलिए उन्हें उद्धार के उनके अवसर से पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक जैसे कि बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 17

मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति के द्वारा निर्धारित होता है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और ठीक जैसे लोग भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही इन प्रदर्शनों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि वह कोई कठपुतली नहीं है, और न ही वह खाली हवा है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानना मनुष्यजाति के लिए एक नेक खोज है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानने के द्वारा लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा-थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगोगे, तो तुम्हें नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने को अंजाम देना कोई कठिन कार्य है। इससे अधिक, जब तुम परमेश्वर को समझते हो, तो उसके बारे में निष्कर्षों को बनाने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है। जब तुम परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को बनाना बन्द कर देते हो, तो उसे अपमानित करने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है, और अनजाने में परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके बारे में ज्ञान को पाओ, और इसके द्वारा तुम अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानोगे। तुम उन मतों, पत्रों, एवं सिद्धान्तों का उपयोग करके परमेश्वर को परिभाषित करना बन्द करोगे जिनमें तुमने महारत हासिल की है। बल्कि, सभी चीज़ों में सदैव परमेश्वर के इरादों को खोजने के द्वारा, तुम अनजाने में ही ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार है।

परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के द्वारा अदृष्ट और अस्पर्शनीय है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, हर एक व्यक्ति के कार्यकलाप, साथ में उसके प्रति उनकी प्रवृत्ति—परमेश्वर के द्वारा मात्र महसूस नहीं किए जाते हैं, बल्कि ये दृष्टिगोचर भी हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर किसी को पहचानना चाहिए और इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। हो सकता है कि तुम स्वयं से हमेशा पूछते रहते हो: "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं ठीक इस समय किस बारे में विचार कर रहा हूँ? हो सकता है कि वह जानता हो, हो सकता है कि वह नहीं जानता हो"। यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करना और उसमें विश्वास करना मगर उसके कार्य और उसके अस्तित्व पर सन्देह करना, तो देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करोगे, क्योंकि तुम पहले से ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान के किनारे पर डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, परन्तु उन्होंने अभी तक सत्य की वास्तविकता को प्राप्त नहीं किया है, और ना ही वे परमेश्वर की इच्छा को भी समझते हैं। केवल अत्यंत छिछले मतों के मुताबिक चलते हुए, उनके जीवन और कद-काठी में कोई प्रगति नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने स्वयं के जीवन के रूप में नहीं लिया है, और उन्होंने कभी भी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार नहीं किया है। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को देख कर आनन्द से भर जाता है? क्या वे उसे आराम पहुँचाते हैं? उस स्थिति में, यह परमेश्वर में विश्वास करने की लोगों की विधि है जो उनका भाग्य तय करती है। इस बात की चिंता करना लोग किस प्रकार खोज करते हैं और किस प्रकार लोग परमेश्वर के समीप आते हैं, लोगों की प्रवृत्ति, प्राथमिक महत्व के हैं। परमेश्वर की ऐसे उपेक्षा मत करो मानो कि वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा हो। अपने विश्वास के परमेश्वर के बारे में हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, हर एक छोटे वचन और हर एक छोटे से कर्म को देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंतर्तम सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने हैं, और परमेश्वर के द्वारा देखे जा रहे हैं। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कर्मों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं कुछ लोगों को कुछ सलाह देना चाहूँगा: अपने आपको परमेश्वर के हाथों में छोटे शिशु के समान मत रखो, मानो कि उसे तुम से लाड़-प्यार करना चाहिए, मानो कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, और मानो कि तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है, और मैं तुम्हें सपने देखना छोड़ने की सलाह देता हूँ! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है। वह मनुष्यजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य में ईमानदारी से बढ़ता है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाले या बिगाड़ने वाले प्रकार का प्रेम नहीं है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने के लिए, दया करने के लिए, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी करुणा और सहिष्णुता ऐसी चीज़ें हैं जिनकी ज़िन्दा बचे रहने के लिए मनुष्यजाति को आवश्यकता है। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में अस्तित्व में है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिल्कुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। इसलिए तुम्हें अपने हृदय में पूर्ण स्पष्टता के साथ जान लेना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, और कि उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। हो सकता है कि तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मुद्दा है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को करना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण का बिल्कुल विपरीत सही होता है, और यह कि परमेश्वर का प्रयास करने और उसे मापने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करके, तुम पहले ही उसे क्रोधित कर देते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर उस तरह संचालन नहीं करता है जैसा तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह से व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुँच में सावधान एवं बुद्धिमान रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करें—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ अवश्य विकसित करनी चाहिए; तुम्हारे साथ इसका संवाद करने के लिए तुम्हें प्रबुद्ध लोगों को अवश्य खोजना चाहिए, और ईमानदारी से खोजना चाहिए। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में मत देखो—मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर पहुँचना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसके वह योग्य है। परमेश्वर द्वारा उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो चाहे वह तुम्हें करुणा, या सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना क्यों न प्रदान करता हो, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू को परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करने दो। एक मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। यह याद रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सत्यों पर चर्चा की है, ऐसे सत्य जिन्हें सुनने की तुम लोगों को आवश्यकता थी, फिर भी तुम लोगों की वर्तमान दशा और वर्तमान कद-काठी के आलोक में, मैं तुम्हारे उत्साह को ख़त्म करने के लिए कोई बड़ी माँग नहीं करूँगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक उदासी से भर सकता है, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों को बहुत अधिक निराशा महसूस करवा सकता है। इसके बजाय मुझे आशा है कि तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर के लिए जो प्रेम है उसका उपयोग कर सकते हो, और ऐसी प्रवृत्ति का उपयोग कर सकते हो जो आगे के मार्ग पर चलते समय परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक हो। परमेश्वर के बारे में विश्वास के साथ किस प्रकार से व्यवहार करें इस मामले में मत गडबड़ाओ। इसके साथ ऐसा व्यवहार करो मानो कि यह बहुत बड़े प्रश्नों में से एक है। इसे अपने हृदय में रखो, इसे अभ्यास में लाओ, और इसे वास्तविक जीवन के साथ जोड़ो—इसका केवल दिखावटी आदर मत करो। क्योंकि यह ज़िन्दगी और मौत का मामला है, और ऐसी बात है जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगी। इसके साथ एक मजाक के रूप में, या किसी बच्चे के खेल के रूप में व्यवहार मत करो! आज तुम लोगों के साथ इन वचनों को साझा करने के बाद, मैं जानने का उत्सुक हूँ कि तुम लोगों के मन में समझ की फसल क्या है। आज जो कुछ मैंने यहाँ पर कहा है क्या उसके बारे में कोई प्रश्न है जिन्हें तुम लोग पूछना चाहते हो?

यद्यपि ये विषय थोड़े नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से और जिसकी तुम लोग सामान्यतः खोज करते हो और जिस पर ध्यान देते हो उससे थोड़ा हट गए हैं, फिर भी मैं सोचता हूँ कि एक समयावधि तक उनका संवाद किए जाने के पश्चात्, जो कुछ भी मैंने यहाँ कहा है उसके बारे में तुम लोग एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। चूँकि ये नए विषय हैं, ऐसे विषय हैं जिन पर तुम लोगों ने पहले कभी विचार नहीं किया था, इसलिए मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएँगे। मैं आज इन वचनों को तुम लोगों को भयभीत करने के लिए नहीं बोलता हूँ, और न ही मैं तुम लोगों से निपटते का प्रयास करता हूँ; इसके बजाए, मेरा लक्ष्य तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करना है। आखिरकार, मनुष्यजाति और परमेश्वर के बीच एक दूरी हैः यद्यपि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है; उसने परमेश्वर की प्रवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य परमेश्वर की प्रवृत्ति के लिए अपनी दिलचस्पी में कभी भी उत्साही नहीं रहा है। इसके बजाए, उसने आँख मूँदकर विश्वास किया है, वह आँख मूँदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान और अपनी समझ में लापरवाह रहा है। अतः मैं इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने, और यह समझने में तुम लोगों की सहायता करने हेतु विवश महसूस करता हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ उसके व्यवहार में उसकी प्रवृत्ति क्या है; उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से तुम लोग कितनी दूर हो; और तुम लोगों के कार्यकलापों और उस मानक के बीच की असमानता और वह मानक क्या है जिसकी वह माँग करता है। तुम लोगों के जानने का लक्ष्य तुम लोगों के हृदयों में मापने की एक मापदण्ड देना है जिससे मापा जाए और जाना जाए कि जिस मार्ग पर तुम लोग हो वह किस प्रकार की फसल की ओर ले गया है, तुम लोगों ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम लोग किन क्षेत्रों में शामिल नहीं हुए हो। जब तुम लोग अपनों के बीच संवाद कर रहे होते हो, तो तुम लोग आम तौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो; दायरा संकरा होता है, और विषयवस्तु बहुत सतही होती है। जिस पर तुम लोग चर्चा करते हो और परमेश्वर के इरादों के बीच में, तुम लोगों की चर्चाओं और परमेश्वर की माँगों के दायरे एवं मानक के बीच में एक दूरी, एक अंतर होता है। इस प्रकार से आगे बढ़ना समय के साथ तुम लोगों को परमेश्वर के मार्ग से निरंतर दूर करता जाएगा। तुम लोग बस परमेश्वर के मौजूदा वचनों को लेकर उन्हें आराधना की वस्तुओं में, रीति-रिवाज़ों और नियमों में बदल रहे हो। बात बस इतनी ही है! वास्तव में, परमेश्वर का तुम लोगों के हृदय में कोई स्थान ही नहीं है, और परमेश्वर ने तुम लोगों के हृदय को कभी प्राप्त नहीं किया है। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है—यही सत्य है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य को निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, यदि उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तो लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे के भीतर आता है। मगर जैसे ही यह विषय परमेश्वर के इरादों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति के क्षेत्रों की ओर जाता है, तो जहाँ तक हर एक व्यक्ति की बात है चीज़ें और भी अधिक कठिन हो जाती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें सत्य के बारे में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनका प्रवेश शामिल है; वास्तव में इसमें कठिनाई का अंश है! किन्तु जब तुम लोग पहले द्वार से निकल जाते हो तो उसके बाद, जब तुम इसके भीतर प्रवेश करना शुरू करते हो तो उसके बाद, यह धीरे-धीरे अधिक आसान होता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 18

परमेश्वर का भय मानने का आरम्भिक बिन्दु उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार करना है

किसी ने अभी-अभी एक प्रश्न उठाया था: ऐसा कैसे है कि जितना अय्यूब जानता था उसकी तुलना में हम परमेश्वर के बारे में अधिक जानते हैँ, फिर भी हम परमेश्वर का भय नहीं मान सकते हैं? हमने पहले ही इस मामले पर थोड़ी बहुत चर्चा की थी, सही है न? वास्तव में, इस प्रश्न के सार पर भी पहले चर्चा की जा चुकी है, कि यद्यपि बीते समय में अय्यूब परमेश्वर को नहीं जानता था, फिर भी उसने उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार किया था, और उसे स्वर्ग तथा पृथ्वी की सभी चीज़ों के मालिक के रूप में माना था। अय्यूब ने परमेश्वर को एक शत्रु नहीं माना था। इसके बजाय, उसने सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में उसकी आराधना की थी। ऐसा क्यों है कि आजकल लोग परमेश्वर का इतना अधिक विरोध करते हैं? वे परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान सकते हैं? एक कारण यह है कि उन्हें शैतान के द्वारा गहराई तक भ्रष्ट कर दिया गया है। गहराई से समायी हुई अपनी शैतानी प्रकृति के साथ, लोग परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं। इस प्रकार, यद्यपि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, तब भी वे परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं और स्वयं को उसके विरोध में रख सकते हैं। यह मानव प्रकृति के द्वारा निर्धारित होता है। दूसरा कारण यह है कि यद्यपि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, फिर भी वे उसके साथ बस परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे विचार करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य का विरोधी है, उसे मनुष्य के शत्रु के रूप में मानते हैं, और वे परमेश्वर के साथ अनमेल हैं। यह इतना आसान है। क्या इस मामले को पिछले सत्र में नहीं उठाया गया था? इसके बारे में सोचो: क्या यही वह कारण है? यद्यपि तुम्हें परमेश्वर का थोड़ा सा ज्ञान है, फिर भी यह ज्ञान क्या है? क्या यह ऐसी बात नहीं है जिसके बारे में हर कोई बात कर रहा है? क्या यह वह नहीं जो परमेश्वर ने तुम्हें बताया था? तुम केवल सिद्धान्त और मत सम्बन्धी पहलुओं को जानते हो; क्या तुमने कभी परमेश्वर के वास्तविक पहलू का अनुभव किया है? क्या तुम्हें आत्मगत ज्ञान है? क्या तुम्हें व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव है? यदि परमेश्वर तुम्हें नहीं बताता, तो क्या तुम इसे जान सकते थे? सिद्धान्त का तुम्हारा ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं दर्शाता है। संक्षेप में, चाहे इसके बारे में तुम्हें कितना ही और कैसे ही क्यों न पता चला हो, तुम्हारे द्वारा परमेश्वर की वास्तविक समझ प्राप्त किए जाने से पहले, परमेश्वर तुम्हारा शत्रु है, और तुम्हारे द्वारा परमेश्वर से इस प्रकार व्यवहार किए जाने से पहले, उसे तुम्हारे विरुद्ध रखा जाता है, क्योंकि तुम शैतान के मूर्त रूप हो।

जब तुम मसीह के साथ होते हो, तो प्रकट रूप से मसीह के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार करते हुए, कदाचित् तुम उसे दिन में तीन बार भोजन परोस सकते हो। कदाचित् उसे चाय दे सकते हो, उसके जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हो। जब कभी भी कुछ होता है, तो लोगों के दृष्टिकोण हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण से विपरीत होते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण को समझने में असफल रहते हैं, उसे स्वीकार करने में असफल रहते हैं। यद्यपि हो सकता है कि लोग ऊपरी तौर पर परमेश्वर के साथ हों, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर के सुसंगत हैं। जैसे ही कुछ होता है, तो उस शत्रुता की पुष्टि करते हुए जो मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच में मौजूद है, मुनष्य की अवज्ञा की असलियत प्रकट होती है। यह शत्रुता ऐसी नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य का विरोध करता है; यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य का शत्रु होना चाहता है, और यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य को विरोध में रखता है और इस तरह से मनुष्य से व्यवहार करता है। इसके बजाय, यह परमेश्वर के प्रति ऐसे विरोधात्मक सार का मामला है जो मनुष्य की आत्मगत इच्छा शक्ति में, और मनुष्य के अवचेतन मन में घात लगाता है। चूँकि मनुष्य उन सब को अपने अनुसंधान की वस्तु के रूप में मानता है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु जो कुछ परमेश्वर से आता है और जो कुछ परमेश्वर को शामिल करता है उसके प्रति उसका उत्तर, सर्वोपरि, अन्दाज़ा लगाना, और सन्देह करना, और उसके बाद शीघ्रता से ऐसी प्रवृत्ति को अपनाना है जो परमेश्वर से संघर्ष करती है, और परमेश्वर का विरोध करती है। उसके बाद, मनुष्य इन शिथिल मनोदशाओं को अपनाएगा और परमेश्वर से विवाद करेगा या उससे स्पर्धा करेगा, यहाँ तक कि उस हद तक जहाँ वह सन्देह करेगा कि इस प्रकार का परमेश्वर उसके अनुसरण के योग्य है भी या नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य की तर्कशक्ति उसे बताती है कि उसे इस तरह से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, तब भी वह स्वयं की सुनने के बजाय ऐसा ही करना चुनेगा, इस तरह से कि वह अन्त तक बिना किसी संकोच के बढ़ता जाएगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों की प्रथम प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या निन्दात्मक बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया है: मुझे नहीं पता कि यह अफवाह सही है या नहीं, इसका अस्तित्व है या नहीं, इसलिए मैं प्रतीक्षा करूँगा और देखूँगा। तब वे विचार करना आरम्भ कर देते हैं: इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या इसका अस्तित्व है? क्या यह अफवाह सच है या नहीं? यद्यपि ऐसे व्यक्ति इसे ऊपरी तौर पर प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं, फिर भी उसके हृदय ने पहले से ही सन्देह करना आरम्भ कर दिया है, पहले से ही परमेश्वर का इनकार करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार की प्रवृत्ति, इस प्रकार के दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? उनका सामना किसी मामले से होने से पहले, तुम नहीं देख सकते हो कि इस व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है—ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे परमेश्वर से संघर्ष नहीं करते हैं, मानो कि वे परमेश्वर को एक शत्रु के रूप में नहीं मानते हैं। हालाँकि, जैसे ही उनका सामना इससे होता है, वे तुरन्त शैतान के साथ खड़े हो जाते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य और परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने शत्रु के रूप में मानता है, बल्कि मनुष्य का सार ही अपने आपमें परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण करता हो, वह कितनी भी कीमत चुकाता हो; किस भी प्रकार से परमेश्वर की स्तुति करता हो, किस भी प्रकार से वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकता हो, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए अपने आपको उकसाता भी हो, लेकिन वह कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं कर सकता है। क्या यह मनुष्य के सार के द्वारा निर्धारित नहीं होता है? यदि तुम उसके साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार करते हो, तुम सचमुच में विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो क्या तब भी तुम्हें उसके प्रति कोई सन्देह होता है? क्या तब भी तुम्हारे हृदय में उसके सम्बन्ध में कोई प्रश्न चिन्ह हो सकता है? नहीं हो सकता है। इस संसार के चलन बहुत ही दुष्टतापूर्ण हैं, यह मनुष्यजाति बहुत बुरी है; तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणाएँ न हों? तुम स्वयं ही बहुत दुष्ट हो, तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? फिर भी थोड़ी सी अफवाहें और कुछ निन्दा, परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी धारणाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकती हैं, जो दर्शाता है कि तुम्हारी कद-काठी कितनी अपरिपक्व है! बस थोड़े से मच्छरों की "भनभनाहट," और कुछ घिनौनी मक्खियाँ, बस इतना ही काफी है तुम्हें धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति के बारे में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस बारे में उसकी प्रवृत्ति वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है। यह केवल इतना ही है कि इन लोगों के प्रति परमेश्वर का बर्ताव उन पर जानबूझकर कोई ध्यान नहीं देना है—उसकी प्रवृत्ति उन पर कोई ध्यान नहीं देना है, और इन अज्ञानी लोगों के साथ गंभीर नहीं होना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की कभी योजना नहीं बनाई है जिन्होंने बिल्कुल अन्त तक उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के सुसंगत होने के मार्ग की खोज करने की योजना नहीं बनाई है। कदाचित् ये वचन जो मैंने कहे हैं कुछ लोगों को ठेस पहुँचाते हों। अच्छा, क्या तुम लोग मुझे हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाने देने के लिए तैयार हो? इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग तैयार हो या नहीं, जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सत्य है! यदि मैं हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाऊँ, हमेशा तुम लोगों के दागों को उजागर करूँ, तो क्या यह तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर की उत्कृष्ट तस्वीर को प्रभावित करेगा? (यह नहीं करेगा।) मैं सहमत हूँ कि यह प्रभावित नहीं करेगा। क्योंकि तुम लोगों के हृदय में कोई ईश्वर ही नहीं है। वह उत्कृष्ट परमेश्वर जो तुम लोगों के हृदय में निवास करता है, वह एक जिसका तुम लोग दृढ़ता से समर्थन करते हो और बचाते हो, वह परमेश्वर ही नहीं है। बल्कि यह मनुष्य की कल्पना की मनगढ़ंत बात है; इसका अस्तित्व ही नहीं है। अतः यह और भी बेहतर है कि मैं इस पहेली के उत्तर का खुलासा करूँ। क्या यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है? वास्तविक परमेश्वर मनुष्य की कल्पनाएँ नहीं है। मुझे आशा है कि तुम लोग इस वास्तविकता का सामना कर सकते हो, और यह परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 19

परमेश्वर के द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने वाले लोग

कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। क्योंकि ये लोग, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कितने वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं। वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धान्तों और चीज़ों को करने के तरीके के मुताबिक चलते हैं, और ज़िन्दा बचे रहने के उनके नियम एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में ग्रहण नहीं किया, कभी भी विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर का वचन सत्य है, परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कभी इरादा नहीं किया, और परमेश्वर को कभी भी अपने परमेश्वर के रूप में नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म की शौकिया रुचि के रूप में मानते हैं, परमेश्वर के साथ महज एक आध्यात्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं, इसलिए वे नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव, या परमेश्वर का सार कोशिश किए जाने और समझे जाने लायक है। तुम कह सकते हो कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर के अनुरूप है उसका इन लोगों से कोई लेना देना नहीं है। उनकी रूचि नहीं है, और वे ध्यान देने का कोई प्रयास नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है: परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, और परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; यह अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे मानते हैं कि कोई वास्तविक कदम उठाए बिना अथवा किन्हीं भी वास्तविक कार्यकलापों में स्वयं को निवेश किए बिना, बस वचनों के साथ परमेश्वर को स्वीकार करके, वे बहुत चालाक हो रहे हैं। साथ ही वे व्यावहारिक रूप से भी कुछ नहीं करते हैं, और सोचते हैं कि वे बहुत चतुर हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं: "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं? क्या वे इन शब्दों को कह सकते हैं: 'मैं परमेश्वर के लिए जीऊँगा'?" जो कुछ मनुष्य प्रायः देखता है वे लोगों के सतही प्रदर्शन होते हैं, और उनका सार नहीं। फिर भी परमेश्वर इन सतही प्रदर्शनों को नहीं देखता है; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इस प्रकार, परमेश्वर की इन लोगों के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति है, और इस प्रकार की परिभाषा है। जो कुछ ये लोग कहते हैं उसके बारे में: "परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? परमेश्वर वैसा क्यों करता है? मैं इसे समझ नहीं सकता हूँ; मैं उसे समझ नहीं सकता हूँ; यह मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है; तुम्हें इसे मुझे अवश्य समझाना चाहिए; ..." मेरा उत्तर है: क्या तुम्हें यह मामला समझाना आवश्यक है? क्या इस मामले का तुमसे कुछ लेना देना है? तुम क्या सोचते हो कि तुम कौन हो? तुम कहाँ से आए हो? क्या तुम परमेश्वर के लिए इन संकेतकों को देने के योग्य हो? क्या तुम उसमें विश्वास करते हो? क्या वह तुम्हारे विश्वास को स्वीकार करता है? चूँकि तुम्हारे विश्वास का परमेश्वर से कोई लेना देना नहीं है, तो उसके कार्य का तुमसे क्या सरोकार है? तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के हृदय में तुम कहाँ हो, फिर भी क्या तुम परमेश्वर से संवाद करने के योग्य हो?

चेतावनी के शब्द

क्या तुम लोग इन टिप्पणियों को सुनने के बाद असहज नहीं हो? यद्यपि हो सकता है कि तुम लोग इन वचनों को सुनने के अनिच्छुक हो, या उन्हें स्वीकार करने के अनिच्छुक हो, फिर भी वे सब तथ्य हैं। क्योंकि कार्य का यह चरण परमेश्वर के करने के लिए है, यदि तुम परमेश्वर के इरादों से सम्बन्धित नहीं हो, परमेश्वर की प्रवृत्ति से सम्बन्धित नहीं हो, और परमेश्वर के सार और स्वभाव को नहीं समझते हो, तो अन्त में तुम ऐसे व्यक्ति हो जो नष्ट हो जाएगा। मेरे शब्द सुनने में कठोर लगें तो उन्हें दोष मत दो, और तुम लोगों के उत्साह की हवा निकालने के लिए उन्हें दोष मत दो। मैं सत्य बोलता हूँ; मेरा अभिप्राय तुम लोगों को हतोत्साहित करना नहीं है। चाहे मैं तुम लोगों से कुछ भी क्यों न माँगू, और चाहे इसे कैसे भी करने की तुम लोगों से अपेक्षा क्यों न हो, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग सही पथ पर चलो, और आशा करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करो और इस पथ से विचलित न हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे नहीं बढ़ते हो, और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते हो, तो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता है कि तुम परमेश्वर के विरुद्ध बलवा कर रहे हो और सही पथ से भटक चुके हो। इसलिए मुझे लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं जो मुझे तुम लोगों के लिए स्पष्ट अवश्य करने चाहिए, और तुम लोगों से स्पष्ट रूप से, साफ-साफ, और जरा सी भी अनिश्चितता के बिना विश्वास अवश्य करवाना चाहिए, और परमेश्वर की प्रवृत्ति, परमेश्वर के इरादों, किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है, और वह किस तरीके से मनुष्य के परिणाम को तय करता है, इसे स्पष्ट रूप से जानने में तुम लोगों की सहायता करनी चाहिए। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम इस मार्ग पर चलना शुरु करने में असमर्थ होते हो, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, क्योंकि इन वचनों को पहले ही तुम लोगों को बिल्कुल साफ-साफ बता दिया गया है। जहाँ तक यह बात है कि तुम अपने स्वयं के परिणाम से किस प्रकार व्यवहार करते हो—यह मामला पूरी तरह से तुम्हारे ऊपर है। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के परिणामों के बारे में परमेश्वर की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। मनुष्य को तौलने के उसके स्वयं के तरीके हैं, और साथ ही उनके प्रति अपेक्षाओं का उसका स्वयं का मानक है। लोगों के परिणामों को तौलने का उसका मानक ऐसा है जो हर एक के लिए निष्पक्ष है—इस बारे में कोई सन्देह नहीं है! इसलिए कुछ लोगों के भय अनावश्यक हैं। क्या अब तुम लोगों को तसल्ली मिली है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 20

वास्तव में, परमेश्वर का स्वभाव सब के लिए खुला हुआ है और यह छिपा हुआ नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने जान-बूझकर कभी भी किसी व्यक्ति को दूर नहीं किया है और उसने कभी भी जान-बूझकर स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं किया है जिससे लोग उसे जानने या समझने के योग्य नहीं हो पाएँगे। परमेश्वर का स्वभाव हमेशा से ही खुला हुआ है और हमेशा से ही खुले तौर पर प्रत्येक व्यक्ति का सामना करता आया है। परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान, परमेश्वर अपना कार्य करता है, प्रत्येक का सामना करता है; और उसका कार्य हर एक व्यक्ति पर किया जाता है। जब वह यह कार्य करता है, तो वह लगातार अपने स्वभाव को प्रकट करता है, और वह हर एक व्यक्ति की अगुवाई एवं आपूर्ति करने के लिए लगातार अपने सार का और अस्तित्‍व का उपयोग करता है। चाहे परिस्थितियाँ अच्छी हों या बुरी, हर युग में और हर चरण पर, परमेश्वर का स्वभाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुला होता है, और उसका स्वरूप एवं अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुले होते हैं, उसी रीति से उसका जीवन लगातार एवं बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्ति कर रहा है और मानवजाति को सहारा दे रहा है। इन सब के बावजूद, परमेश्वर का स्वभाव कुछ लोगों के लिए छुपा रहता है। ऐसा क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही ये लोग परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी परमेश्वर को समझने का प्रयास या परमेश्वर को जानने की इच्छा नहीं की है, परमेश्वर के निकट आने की तो बात ही छोड़ दीजिए। इन लोगों के लिए, परमेश्वर के स्वभाव को समझने का अर्थ है कि उनका अंत आ रहा है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के स्वभाव के द्वारा उनका न्याय किया जाने वाला है और उन्हें दोषी ठहराया जानेवाला है। इसलिए, इन लोगों ने कभी भी परमेश्वर या उसके स्वभाव को समझने की इच्छा नहीं की है, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा की गहरी समझ या ज्ञान की लालसा नहीं की है। वे सचेत सहयोग के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को समझने का इरादा नहीं करते हैं—वे तो बस सदा मौज-मस्ती करते हैं और उन कार्यों को करते हुए कभी नहीं थकते हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसमें वे विश्वास करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जो केवल उनकी कल्पनाओं में ही मौजूद है, ऐसा परमेश्वर जो केवल उनकी अवधारणाओं में ही मौजूद है; और ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसे उनके दैनिक जीवन में उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। जब स्वयं सच्चे परमेश्वर की बात आती है, तो वे पूर्णतः उपेक्षापूर्ण हो जाते हैं, उसे समझने के लिए, एवं उस पर ध्यान देने के लिए उनमें कोई इच्छा नहीं होती है, और उनके पास उसके करीब आने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं होता है। वे स्वयं को सँवारने के लिए, एवं स्वयं को विशेष रीति से प्रस्तुत करने के लिए उन वचनों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर अभिव्यक्त करता है। उनके लिए, यह उनको पहले से ही सफल विश्वासी एवं ऐसा बना देता है जिनके हृदय के भीतर परमेश्वर के प्रति विश्वास है। उनके हृदय में, उनकी कल्पनाओं, उनकी अवधारणाओं, और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में उनकी व्यक्तिगत परिभाषाओं के द्वारा उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरी ओर, स्वयं सच्चे परमेश्वर का उनके साथ कोई वास्ता नहीं है। क्योंकि जब वे एक बार स्वयं सच्चे परमेश्वर को समझ जाते हैं, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को समझ जाते हैं, और जो वह है उसे समझ जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके कार्य, उनके विश्वास, और उनके अनुसरण को दोषी ठहराया जाएगा। इसीलिए वे परमेश्वर के सार को समझने के लिए तैयार नहीं हैं, और इसीलिए वे परमेश्वर को अच्छे से समझने, परमेश्वर की इच्छा को अच्छे से जानने, और परमेश्वर के स्वभाव को अच्छे से समझने के लिए सक्रिय रूप से खोजने या प्रार्थना करने की इच्छा नहीं रखते और उसके खिलाफ हैं। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कुछ ऐसा हो जिसे बनाया गया हो, जो कुछ खोखला और अज्ञात हो। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कोई ऐसा हो जो बिलकुल उनकी कल्पना जैसा हो, कोई ऐसा जो उनके आदेश को मानने के लिए हमेशा तैयार रहे, आपूर्ति करने में सदा भरपूर और हमेशा उपलब्ध रहे। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेना चाहते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो अनुग्रह बन जाए। जब उन्हें परमेश्वर की आशीष की आवश्यकता होती है, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो आशीष बन जाए। जब वे कठिनाई का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह उन्हें मजबूत बनाए, और उनका सुरक्षा-जाल बन जाए। परमेश्वर के विषय में इन लोगों का ज्ञान अनुग्रह एवं आशीष की परिधि के भीतर ही अटका रहता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के विषय में उनकी समझ भी उनकी कल्पनाओं और मात्र पत्रों एवं सिद्धान्तों तक ही सीमित होती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए उत्सुक हैं, जो असल में परमेश्वर को देखना चाहते हैं, और सचमुच में परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को समझना चाहते हैं। ये लोग सच्चाई की वास्तविकता एवं परमेश्वर के उद्धार की निरन्तर खोज में रहते हैं, और परमेश्वर के विजय, उद्धार एवं सिद्धता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ये लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, प्रत्येक परिस्थिति एवं प्रत्येक व्यक्ति, घटना या ऐसी चीज़ की तारीफ करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उनके लिए की है। और प्रार्थना करते हैं और ईमानदारी से तलाश करते हैं। जिसे वे सब से अधिक चाहते हैं वह यह है कि वे परमेश्वर की इच्छा को जानें और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव एवं सार को समझें। ऐसा इसलिए है ताकि वे आगे से परमेश्वर को ठेस नहीं पहुँचाएं, और अपने अनुभवों के माध्यम से, वे परमेश्वर की सुंदरता और उसके सच्चे पहलू को देखने के योग्य हों। यह इसलिए भी है जिससे एक असल सच्चा परमेश्वर उनके हृदय के भीतर बसेगा, और जिससे उनके हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान होगा, कुछ इस तरह कि वे आगे से कल्पनाओं, अवधारणाओं या छलावे के मध्य जीवन नहीं बिता रहे होंगे। इन लोगों के पास परमेश्वर के स्वभाव एवं उसके सार को समझने कीएक प्रबल इच्छा होने का कारण यह है कि परमेश्वर का स्वभाव एवं सार ऐसी चीज़ें हैं जिनकी आवश्यकता मानवजाति को उनके अनुभवों में किसी भी क्षण पड़ सकती है, ऐसी चीज़ें जो उनके पूरे जीवनकाल के दौरान जीवन की आपूर्ति करती हैं। जब एक बार वे परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हैं, तो वे और भी अच्छे से परमेश्वर का आदर करने, परमेश्वर के कार्य के साथ और भी अच्छे से सहयोग करने, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति और अधिक विचारशील बनने और अपनी बेहतरीन योग्यता के साथ अपने कर्तव्य को निभाने में सक्षम होंगे। जब परमेश्वर के स्वभाव के प्रति उनके रवैये के सम्बन्ध में दो प्रकार के लोग होते हैं। प्रथम प्रकार के लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझना नहीं चाहते हैं। यद्यपि वे कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहते हैं, स्वयं परमेश्वर को जानना चाहते हैं, और जो वह है उसे देखना चाहते हैं, और परमेश्वर की इच्छा का सचमुच सम्मान करना चाहते हैं, फिर भी अपने हृदय की गहराई में वे चाहते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में न रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस प्रकार के लोग निरन्तर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन और उसका विरोध करते हैं; वे अपने स्वयं के हृदयों में पद के लिए परमेश्वर से लड़ते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व पर अक्सर सन्देह और यहाँ तक कि उससे इंकार भी करते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव को, या स्वयं वास्तविक परमेश्वर को अपने हृदयों पर काबिज़ होने नहीं देना चाहते हैं। वे सिर्फ अपनी इच्छाओं, कल्पनाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करना चाहते हैं। अतः हो सकता है ये लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और उसके लिए अपने परिवारों एवं नौकरियों को भी त्याग सकते हैं, लेकिन वे अपने बुरे मार्गों का अंत नहीं करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग भेंटों की भी चोरी करते हैं या उसे उड़ा देते हैं, या एकांत में परमेश्वर को कोसते हैं, जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करनी है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर के ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने से बहुत अधिक डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को समझने की कभी कोशिश नहीं की है। क्या वे परमेश्वर को समझे बिना ही उसे जान सकते हैं? असंभव! इस प्रकार, जबकि "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर", इस विषय के वचन साधारण हो सकते हैं, प्रत्येक के लिए उनका अर्थ अलग होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए जो अक्सर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है, परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और परमेश्वर के प्रति अत्यंत उग्र है, इसका अर्थ दंडाज्ञा है; जबकि जो व्यक्ति सत्य की वास्तविकता को खोजता है और जो अक्सर परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आता है, वह ऐसे वचनों को मछली के लिए जल की तरह लेगा। अतः तुम लोगों के बीच में, जब कोई परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के कार्य के विषय में बातचीत को सुनता है, तो उन्हें सिरदर्द होने लगता है, उनके हृदय प्रतिरोध से भर जाते हैं, और वे अत्यधिक बेचैन हो जाते हैं। लेकिन तुम लोगों में से कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचते हैं: यह विषय बिल्कुल वैसा है जैसी मुझे आवश्यकता है, क्योंकि यह विषय मेरे लिए बहुत लाभदायक है। यह एक ऐसा हिस्सा है जो मेरे जीवन के अनुभव से अनुपस्थित नहीं हो सकता है; यह मूल बिंदु का मूल बिंदु है, परमेश्वर में विश्वास का आधार है, और यह कुछ ऐसा है जिसे त्यागना मानवजाति सहन नहीं कर सकती है। तुम लोगों के लिए, हो सकता है कि यह विषय निकट एवं दूर, अनजान फिर भी सुपरिचित, दोनों ही लगे। किन्तु चाहे जो भी हो, यह एक ऐसा विषय है जिसे हर एक को सुनना होगा, जानना होगा, और समझना होगा। चाहे तुम इसके साथ कैसा भी व्यवहार करो, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो या ग्रहण करो, इस विषय के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 21

मानवजाति की सृष्टि करने के समय से ही परमेश्वर अपना कार्य करता रहा है। शुरूआत में, यह एक बहुत सहज कार्य था, लेकिन इसकी सहजता के बावजूद, यह परमेश्वर के सार एवं स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त था। जबकि अब परमेश्वर के कार्य को, उसका अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर परमेश्वर के बड़ी मात्रा में ठोस कार्य करने के द्वारा, और आदि से लेकर अब तक अर्थपूर्ण मात्रा में उसके वचनों की अभिव्यक्ति द्वारा ऊँचा किया गया है, फिर भी परमेश्वर का व्यक्तित्व मानवजाति से छिपा हुआ है। हालाँकि वह दो बार देहधारण कर चुका है, फिर भी बाइबल के लेखों के समय से लेकर हाल के दिनों तक, किसने कभी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? तुम लोगों की समझ के आधार पर, क्या कभी किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? नहीं। किसी ने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा है, अर्थात् किसी ने भी परमेश्वर के असल रूप को कभी नहीं देखा है। यह कुछ ऐसा है जिसके साथ हर कोई सहमत है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर का वास्तविक व्यक्तित्व, या परमेश्वर का आत्मा सारी मानवता से छिपा हुआ है, जिसमें आदम और हव्वा भी शामिल हैं, जिन्हें उसने बनाया था, और जिसमें धर्मी अय्यूब शामिल है, जिसे उसने स्वीकार किया था। यहाँ तक कि उन्होंने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा था। लेकिन क्यों परमेश्वर जान-बूझकर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को ढंकता है? कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर लोगों को भयभीत करने से डरता है।" दूसरे कहते हैं: "परमेश्वर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छुपाता है क्योंकि मनुष्य बहुत छोटा है और परमेश्वर बहुत बड़ा है; मनुष्यों को उसे देखने की अनुमति नहीं दी गई है, अन्यथा वे मर जाएँगे।" कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं: "परमेश्वर हर दिन अपने कार्य का प्रबंधन करने में व्यस्त रहता है, शायद उसके पास प्रकट होने के लिए समय नहीं है कि लोगों को उसे देखने की अनुमति मिले।" इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, यहाँ मेरे पास एक निष्कर्ष है। वह निष्कर्ष क्या है? वह निष्कर्ष यह है कि परमेश्वर चाहता भी नहीं है कि लोग उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देखें। मानवता से छिपा रहना कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर जान-बूझकर करता है। दूसरे शब्दों में, लोगों के लिए परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे उसके वास्तविक व्यक्तित्व को न देखें। अब तक यह सब को स्पष्ट हो जाना चाहिए। यदि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी किसी को नहीं दिखाया है, तो क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर का व्यक्तित्व अस्तित्व में है? (वह अस्तित्व में है।) निश्चय ही वह अस्तित्व में है। परमेश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्व निर्विवादित है। किन्तु जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर का व्यक्तित्व कितना बड़ा है या वह कैसा दिखता है, क्या ये वे प्रश्न हैं जिनकी मानवजाति को छानबीन करनी चाहिए? नहीं। उत्तर नकारात्मक है। यदि परमेश्वर का व्यक्तित्व ऐसा विषय नहीं है जिसकी छानबीन की जाना चाहिए, तो फिर वह कौन सा प्रश्न है जिस पर हमें विचार करना चाहिए? (परमेश्वर का स्वभाव।) (परमेश्वर का कार्य।) इससे पहले कि हम आधिकारिक विषय पर बातचीत करना शुरू करें, आओ हम उसी विषय पर वापस लौटें जिस पर हम उस समय चर्चा कर रहे थे: क्यों परमेश्वर ने मानवजाति को कभी अपना व्यक्तित्व नहीं दिखाया है? परमेश्वर क्यों जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को मानवजाति से छिपाता है? सिर्फ एक ही कारण है, और वह है: यद्यपि सृजा गया मनुष्य परमेश्वर के हज़ारों वर्षों के कार्य से होकर गुज़रा है, फिर भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार को जानता है। परमेश्वर की नज़रों में ऐसे लोग उसके विरुद्ध हैं, और परमेश्वर अपने आप को ऐसे लोगों को नहीं दिखाएगा जो उसके प्रति अत्यंत उग्र हैं। यही एकमात्र कारण है कि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी मानवजाति को नहीं दिखाया है और क्यों वह जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को उनसे बचा कर रखता है। क्या अब तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को जानने के महत्व के बारे में स्पष्ट हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 22

परमेश्वर के प्रबंधन के अस्तित्व के समय से ही, वह अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमेशा ही पूरी तरह से समर्पित रहा है। उनसे अपने व्यक्तित्व को छिपाने के बावजूद, वह हमेशा मनुष्य के अगल बगल ही रहा है, उन पर कार्य करता रहा है, अपने स्वभाव को प्रकट करता रहा है, अपने सार से समूची मानवजाति की अगुवाई करता रहा है, और अपनी सामर्थ्‍य, अपनी बुद्धि, और अपने अधिकार के माध्यम से हर एक व्यक्ति पर अपना कार्य करता रहा है, इस प्रकार वह व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग, और अब राज्य के युग को अस्तित्व में लाया है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य से अपने व्यक्तित्व को छुपाता है, फिर भी उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा को खुले तौर से मनुष्य पर देखने एवं अनुभव करने के लिए प्रकट किया गया है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि मानव परमेश्वर को देख या स्पर्श नहीं कर सकता है, फिर भी परमेश्वर का स्वभाव एवं परमेश्वर का सार जिसके सम्पर्क में मानवता रही है वे पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या यह सत्य नहीं है? इसके बावजूद कि परमेश्वर किस तरीके से एवं किस कोण से अपना कार्य करता है, वह हमेशा लोगों से अपनी सच्ची पहचान के अनुसार बर्ताव करता है, ऐसा कार्य करता है जो उसे करना चाहिए और वैसी बातें कहता है जो उसे कहने चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर किस स्थान से बोलता है—वह तीसरे आसमान में खड़ा हो सकता है, या देह में खड़ा हो सकता है, या यहाँ तक कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में भी—वह बिना किसी छल या छिपाव के हमेशा अपने सारे हृदय और अपने सारे मन के साथ मनुष्य से बोलता है। जब वह अपने कार्य को क्रियान्वित करता है, परमेश्वर अपने वचन एवं अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और बिना किसी प्रकार के सन्देह के जो वह है उसे प्रकट करता है। वह अपने जीवन और अपने स्वरूप के साथ मानवजाति की अगुवाई करता है। इसी तरह से मनुष्य ने व्यवस्था के युग—मानवता के बचपने के युग—के दौरान अदृश्य एवं अस्पृश्य परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन जीवन बिताया था।

व्यवस्था के युग के बाद पहली बार परमेश्वर ने देहधारण किया था, ऐसा देहधारण जो साढ़े तैंतीस वर्षों तक बना रहा। एक मनुष्य के लिए, क्या साढ़े तैंतीस साल का समय एक लम्बा समय है? (ज़्यादा लम्बा नहीं है।) जबकि किसी मानव प्राणी की जीवन अवधि सामान्यत: तीस या ऐसे कुछ सालों से कहीं ज़्यादा लम्बी होती है, यह मनुष्य के लिए एक बहुत ही लम्बा समय नहीं है। किन्तु देहधारी परमेश्वर के लिए, ये साढ़े तैंतीस साल बहुत ही लम्बा है। वह एक व्यक्ति बन गया—एक साधारण व्यक्ति जिसने परमेश्वर के कार्य और आदेश को अपने ऊपर उठाया था। इसका अर्थ था कि उसे ऐसा कार्य करना था जिसे एक सामान्य व्यक्ति संभाल नहीं सकता है, जबकि उसने पीड़ा को भी सहन किया जिसका सामना सामान्य लोग नहीं कर सकते हैं। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के द्वारा सहन की गई पीड़ा की मात्रा, उसके कार्य की शुरूआत से लेकर उस समय तक जब उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था, शायद यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे आज के लोग किसी व्यक्ति में देख सकते थे, किन्तु क्या तुम लोग कम से कम बाइबल की कहानियों के जरिए इसकी थोड़ी सराहना कर सकते हो? इसकी परवाह किए बगैर कि इन लिखित तथ्यों में कितने विवरण हैं, कुल मिलाकर, इस समयावधि के दौरान परमेश्वर का कार्य कष्ट एवं पीड़ा से भरा हुआ था। एक भ्रष्ट मनुष्य के लिए, साढ़े तैंतीस साल का समय एक लम्बा समय नहीं है; थोड़ी सी पीड़ा कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन पवित्र, निष्कलंक परमेश्वर के लिए, जिसे सारी मानवजाति के पापों को सहना है, और जिसे पापियों के साथ खाना, सोना और रहना है, यह पीड़ा बहुत ही बड़ी है। वह सृष्टिकर्ता, सभी चीज़ों का स्वामी और सब कुछ का शासक है, फिर भी जब वह संसार में आया तो उसे भ्रष्ट मनुष्यों के अत्याचार एवं क्रूरता को सहना पड़ा था। अपने कार्य को पूर्ण करने और मानवता को दुर्गति से छुड़ाने के लिए, उसे मनुष्य के द्वारा दोषी ठहराया जाना था, और उसे सारी मानवजाति के पापों को उठाना था। पीड़ा की मात्रा जिससे होकर वह गुज़रा था उसकी गहराई को संभवतः साधारण लोगों के द्वारा नापा एवं सराहा नहीं जा सकता है। यह पीड़ा क्या दर्शाती है? यह मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर के अत्यधिक प्रेम को दर्शाती है। यह उस अपमान का प्रतीक है जिसे उसने सहा था और उस कीमत का प्रतीक है जिसे उसने मनुष्य के उद्धार के लिए, उनके पापों से उन्हें छुड़ाने के लिए, और अपने कार्य के इस चरण को पूर्ण करने के लिए चुकाया था। इसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य परमेश्वर के द्वारा क्रूस से छुड़ाया जाएगा। यह एक ऐसी कीमत है जिसे लहू से, एवं जीवन से चुकाया गया है, यह एक ऐसी कीमत है जिसे देना सृजित किए गए प्राणी के बस में नहीं है। चूँकि उसके पास परमेश्वर का सार है और वह परमेश्वर के स्वरूप से सुसज्जित है इसलिए वह इस प्रकार की पीड़ा और इस प्रकार के कार्य को सहन कर सकता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी सृजित किया गया प्राणी उसके स्थान पर नहीं कर सकता है। यह अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य है और उसके स्वभाव का एक प्रकाशन है। क्या यह जो परमेश्वर है उसके विषय में कोई चीज़ प्रकट करता है? क्या यह इस योग्य है कि मानवजाति इसे जाने?

उस युग में, यद्यपि मनुष्य ने परमेश्वर के व्यक्तित्व को नहीं देखा था, फिर भी उन्होंने परमेश्वर के पाप के बलिदान को प्राप्त किया और उन्हें परमेश्वर के द्वारा क्रूस से छुड़ाया गया। हो सकता है कि मानवजाति उस कार्य से अपरिचित नहीं थी जिसे अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर ने किया था, लेकिन क्या कोई उस स्वभाव एवं इच्छा से परिचित था जिसे परमेश्वर के द्वारा इस समयावधि के दौरान अभिव्यक्त किया गया था? विभिन्न युगों के दौरान विभिन्न माध्यमों के जरिए मनुष्य महज परमेश्वर के कार्य की विषय-वस्तु को ही जानता है, या परमेश्वर से सम्बन्धित उन कहानियों को जानता है जो उसी समय घटित हुई थीं जब परमेश्वर अपने कार्य को क्रियान्वित कर रहा था। ये विवरण एवं कहानियाँ ज़्यादा से ज़्यादा परमेश्वर के विषय में कुछ सूचनाएं या प्राचीन कथाएँ हैं, और इनका परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के साथ कोई वास्ता नहीं है। अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग परमेश्वर के बारे में कितनी कहानियाँ जानते हैं, इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार की एक गहरी समझ एवं ज्ञान है। यद्यपि ऐसे लोग जो अनुग्रह के युग से थे उन्होंने देहधारी परमेश्वर के साथ बहुत ही करीबी एवं घनिष्ठ सम्पर्क का अनुभव किया था, फिर भी व्यवस्था के युग के समान ही, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार के विषय में उनका ज्ञान वस्तुतः अस्तित्वहीन था।

राज्य के युग में, परमेश्वर ने फिर से देहधारण किया, उसी प्रकार से जैसे उसने पहली बार किया था। कार्य की इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर अब भी अपने कार्य को स्पष्टता से अभिव्यक्त करता है, उस कार्य को करता है जिसे उसे करना चाहिए, जो वह है उसे प्रकट करता है। ठीक उसी समय, वह मनुष्य की अनाज्ञाकारिता एवं अज्ञानता को निरन्तर सहता एवं बर्दाश्त करता है। क्या इस समयावधि के दौरान भी परमेश्वर ने निरन्तर अपने स्वभाव को प्रकट नहीं किया है और अपनी इच्छा को अभिव्यक्त नहीं किया है? इसलिए, मनुष्य की सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर का स्वभाव, उसका स्वरूप, और उसकी इच्छा, वे हमेशा से ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुले हुए हैं। परमेश्वर ने कभी भी जानबूझकर अपने सार, अपने स्वभाव, या अपनी इच्छा को नहीं छुपाया है। बात बस इतनी है कि मानवजाति इसकी परवाह नहीं करती कि परमेश्वर क्या कर रहा है, उसकी इच्छा क्या है—इसी लिए परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ इतनी दयनीय है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को छिपाता है, तो वह हर एक क्षण मानवजाति के साथ खड़ा भी हो रहा है, और सभी समयों पर खुले तौर पर अपनी इच्छा, स्वभाव एवं सार को भी प्रकट कर रहा है। एक अर्थ में, परमेश्वर का व्यक्तित्व भी सभी लोगों के लिए खुला हुआ है, लेकिन मनुष्य के अंधेपन एवं अनाज्ञाकारिता के कारण, वे हमेशा परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ होते हैं। अतः यदि स्थिति ऐसी है, तो क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को समझना आसान नहीं होना चाहिए? उत्तर देने के लिए यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है, है ना? तुम लोग कह सकते हो कि यह आसान है, लेकिन जबकि कुछ लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में उसे नहीं जान सकते हैं या उसके विषय में एक स्पष्ट समझ प्राप्त नहीं कर सकते हैं—यह हमेशा ही धुंधला एवं अस्पष्ट होता है। किन्तु यदि तुम लोग कहो कि यह आसान नहीं है, तो वह भी सही नहीं है। इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के कार्य का विषय होने के बाद, प्रत्येक के पास अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर के साथ वास्तविक व्यवहार होना चाहिए। उन्हें कम से कम अपने हृदयों में कुछ हद तक परमेश्वर का एहसास करना चाहिए था या उन्हें पहले आत्मिक स्तर पर परमेश्वर के साथ टकराना चाहिए था, और उनके पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव के विषय में थोड़ी बहुत भावनात्मक जागरूकता होनी चाहिए थी या उन्हें उसकी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए थी। जब मनुष्य ने परमेश्वर का अनुसरण करना शुरू किया था उस समय से लेकर अब तक, मानवजाति ने बहुत कुछ प्राप्त किया है, मानवजाति की अल्‍प क्षमता, अज्ञानता, विद्रोहीपन एवं विभिन्न प्रयोजनों के कारणवश मानवजाति ने इसमें से बहुत कुछ को खो भी दिया है। क्या परमेश्वर ने मानवजाति को पहले से ही काफी कुछ नहीं दिया है? यद्यपि परमेश्वर अपने व्यक्तित्व को मनुष्यों से छुपाता है, फिर भी अपने स्वरूप से, और यहाँ तक कि अपने जीवन से भी उनकी आपूर्ति करता है; परमेश्वर के विषय में मानवता का ज्ञान केवल उतना ही नहीं होना चाहिए जितना अब है। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, एवं स्वयं परमेश्वर के विषय में तुम लोगों के साथ आगे संगति करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह है ताकि हज़ारों सालों की देखभाल एवं विचार जो परमेश्वर ने मनुष्य पर न्‍योछावर किए हैं वे व्यर्थ न हो जाए, और मानवजाति अपने प्रति परमेश्वर की इच्छा को सचमुच में समझ सके और उसकी सराहना कर सके। यह इसलिए है ताकि लोग परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान में एक नए कदम की ओर आगे बढ़ सकें। साथ ही यह परमेश्वर को लोगों के हृदयों में अपने असली स्थान पर वापस लौटाएगा, अर्थात्, उसके साथ इंसाफ करने के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 23

आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा

उत्पत्ति 2:15-17 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

क्या तुम लोगों को इन वचनों से कुछ समझ आया? पवित्र शास्त्र का यह भाग तुम लोगों को कैसा महसूस कराता है? पवित्र शास्त्र से "आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा" के उद्धरण को क्यों लिया गया? क्या अब तुम लोगों में से प्रत्येक के पास अपने-अपने मन में परमेश्वर और आदम की एक तस्वीर है? तुम लोग कल्पना करने की कोशिश कर सकते हो: यदि तुम लोग उस दृश्य में होते, तो तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर किस के समान होता? यह तस्वीर तुम लोगों को कौन सी भावनाओं का एहसास कराती है? यह एक द्रवित करनेवाली और दिल को छू लेनेवाली तस्वीर है। यद्यपि इसमें केवल परमेश्वर एवं मनुष्य ही हैं, फिर भी उनके बीच की घनिष्ठता ईर्ष्या के अत्यंत योग्य है: परमेश्वर का प्रचुर प्रेम मनुष्य को अकारण ही प्रदान किया गया है, यह मनुष्य को घेरे रहता है; मनुष्य भोला-भाला एवं निर्दोष, भारमुक्त एवं लापरवाह है, वह आनन्दपूर्वक परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीवन बिताता है; परमेश्वर मनुष्य के लिए चिंता करता है, जबकि मनुष्य परमेश्वर की सुरक्षा एवं आशीष के अधीन जीवन बिताता है; हर एक चीज़ जिसे मनुष्य करता एवं कहता है वह परमेश्वर से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ होता है और उससे अविभाज्य है।

तुम लोग कह सकते हो कि यह पहली आज्ञा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था जब उसने उसे बनाया था। यह आज्ञा क्या लिए हुए है? यह परमेश्वर की इच्छा को लिए हुए है, परन्तु साथ ही यह मानवजाति के लिए उसकी चिंताओं को भी लिए हुए है। यह परमेश्वर की पहली आज्ञा है, और साथ ही यह पहली बार भी है जब परमेश्वर मनुष्य के विषय में चिंता करता है। कहने का तात्पर्य है, जब से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया उस घड़ी से उसके पास उसके प्रति एक ज़िम्मेदारी है। उसकी ज़िम्मेदारी क्या है? उसे मनुष्य की सुरक्षा करनी है, और मनुष्य की देखभाल करनी है। वह आशा करता है कि मनुष्य भरोसा कर सकता है और उसके वचनों का पालन कर सकता है। यह मनुष्य से परमेश्वर की पहली अपेक्षा भी है। इसी अपेक्षा के साथ परमेश्वर निम्नलिखित वचन कहता है: "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" ये साधारण वचन परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। वे यह भी प्रकट करते हैं कि परमेश्वर के हृदय ने पहले से ही मनुष्य के लिए चिंता प्रकट करना शुरू कर दिया है। सब चीज़ों के मध्य, केवल आदम को ही परमेश्वर के स्वरुप में बनाया गया था; आदम ही एकमात्र जीवित प्राणी था जिसके पास परमेश्वर के जीवन की श्वास है; वह परमेश्वर के साथ चल सकता था, परमेश्वर के साथ बात कर सकता था। इसीलिए परमेश्वर ने उसे ऐसी आज्ञा दी थी। परमेश्वर ने इस आज्ञा में बिलकुल साफ कर दिया था कि मनुष्य क्या कर सकता है, साथ ही साथ वह क्या नहीं कर सकता है।

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसमें कोई चिंता है? इन वचनों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल लोगों के द्वारा सराहा जा सकता है, लेकिन इसे भली भांति एवं सचमुच में महसूस भी किया जा सकता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? अब जब मैंने इन बातों को कह दिया है, क्या तुम लोग अब भी सोचते हो कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? इतने साधारण नहीं हैं, है ना? क्या तुम लोग इसे पहले से देख सकते थे? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें इन थोड़े से वचनों को कहा होता, तो तुम भीतर से कैसा महसूस करते? यदि तुम एक दयालु व्यक्ति नहीं हो, यदि तुम्हारा हृदय बर्फ के समान ठण्डा है, तो तुम कुछ भी महसूस नहीं करोगे, तुम परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करोगे, और तुम परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करोगे। लेकिन यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास विवेक है, एवं मानवता है, तो तुम कुछ अलग महसूस करोगे। तुम स्नेह को महसूस करोगे, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारी परवाह की जाती है और तुम्हें प्रेम किया जाता है, और तुम खुशी महसूस करोगे। क्या यह सही नहीं है? जब तुम इन चीज़ों को महसूस करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार कार्य करोगे? क्या तुम परमेश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करोगे? क्या तुम अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और उसका सम्मान करोगे? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? तुम इससे देख सकते हो कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है। वास्तव में, क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान ऐसी बहुत सी चीज़ों को नहीं कहा था? लेकिन क्या आज के लोग परमेश्वर के हृदय की सराहना करते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा का आभास कर सकते हो जिसके बारे में मैंने बस अभी-अभी कहा था? तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को तब भी परख नहीं सकते हो जब यह इतना ठोस, साकार, एवं यथार्थवादी है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में वास्तविक ज्ञान एवं समझ नहीं है। क्या यह सत्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 24

परमेश्वर हव्वा को बनाता है

उत्पत्ति 2:18-20 फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, "आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए।" और यहोवा परमेश्‍वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम के पास ले आया कि देखे कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। अत: आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उस से मेल खा सके।

उत्पत्ति 2:22-23 और यहोवा परमेश्‍वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। तब आदम ने कहा, "अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।"

पवित्र शास्त्र के इस भाग में एक मुख्य पंक्ति है: "जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया।" अतः किसने सभी जीवित प्राणियों को उनका नाम दिया था? यह आदम था, परमेश्वर नहीं। यह पंक्ति मानवजाति को एक तथ्य बताता है: परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी जब उसने उसकी सृष्टि की थी। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य की बुद्धि परमेश्वर से आई थी। यह एक निश्चितता है। लेकिन क्यों? परमेश्वर ने आदम को बनाया उसके बाद, क्या आदम विद्यालय गया था? क्या वह जानता था कि कैसे पढ़ते हैं? परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों को बनाया उसके बाद, क्या आदम ने इन सभी प्राणियों को पहचाना था? क्या परमेश्वर ने उसे बताया कि उनके नाम क्या थे? हाँ वास्तव में, परमेश्वर ने उसे यह भी नहीं सिखाया था कि इन प्राणियों के नाम कैसे रखने हैं। यही सच्चाई है! तो उसने कैसे जाना कि इन जीवित प्राणियों को उनके नाम कैसे देने थे और उन्हें किस प्रकार के नाम देने थे? यह उस प्रश्न से जुड़ा हुआ है कि परमेश्वर ने आदम में क्या जोड़ा जब उसने उसकी सृष्टि की थी। तथ्य यह साबित करते हैं कि जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की तो उसने अपनी बुद्धि को उसमें जोड़ दिया था। यह एक मुख्य बिन्दु है। क्या तुम सब लोगों ने ध्यानपूर्वक सुना? एक अन्य मुख्य बिन्दु है जो तुम लोगों को स्पष्ट होना चाहिए: आदम ने इन जीवित प्राणियों को उनका नाम दिया उसके बाद, ये नाम परमेश्वर के शब्दकोश में निर्धारित हो गए थे। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यह परमेश्वर के स्वभाव को भी शामिल करता है, और मुझे इसे समझाना ही होगा।

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, उसमें जीवन का श्वास फूंका, और उसे अपनी कुछ बुद्धि, अपनी योग्यताएँ, और अपना स्वरूप भी दिया। परमेश्वर ने मनुष्य को ये सब चीज़ें दीं उसके बाद, मनुष्य आत्मनिर्भरता से कुछ चीज़ों को करने और अपने आप सोचने के योग्य हो गया। यदि मनुष्य जो सोचता है और जो करता है वह परमेश्वर की नज़रों में अच्छा है, तो परमेश्वर इसे स्वीकार करता है और हस्तक्षेप नहीं करता है। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह सही है, तो परमेश्वर उसे भलाई के लिए ऐसे ही होने देगा। अतः वह वाक्यांश "और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया" क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के नामों में कोई भी सुधार नहीं किया था। आदम उनका जो भी नाम रखता, परमेश्वर कहता "हाँ" और उस नाम को वैसे ही दर्ज करता है। क्या परमेश्वर ने कोई राय व्यक्त की? नहीं, यह बिलकुल निश्चित है। तो तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी और मनुष्य ने कार्यों को अंजाम देने के लिए अपनी परमेश्वर-प्रदत्त बुद्धि का उपयोग किया। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह परमेश्वर की नज़रों में सकारात्मक है, तो इसे बिना किसी मूल्यांकन या आलोचना के परमेश्वर के द्वारा पुष्ट, मान्य, एवं स्वीकार किया जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई व्यक्ति या दुष्ट आत्मा, या शैतान नहीं कर सकता है। क्या तुम लोग यहाँ परमेश्वर के स्वभाव के एक प्रकाशन को देखते हो? क्या एक मानव, एक भ्रष्ट किया गया मानव, या शैतान दूसरों को स्वीकार करेंगे कि उनकी नाक के नीचे कार्यों को अंजाम देने के लिए उनका प्रतिनिधित्व करें? बिलकुल भी नहीं! क्या वे पदवी के लिए उस अन्य व्यक्ति या अन्य शक्ति से लड़ाई करेंगे जो उनसे अलग है? हाँ बिल्कुल वे करेंगे! उस घड़ी, यदि वह एक भ्रष्ट किया गया व्यक्ति या शैतान होता जो आदम के साथ था, तो जो कुछ आदम कर रहा था उन्होंने निश्चित रूप से उसे ठुकरा दिया होता। यह साबित करने के लिए कि उनके पास स्वतन्त्र रूप से सोचने की योग्यता है और उनके पास अपनी अनोखी अंतर्दृष्टियाँ हैं, वे हर उस चीज़ को बिल्कुल नकार देते जो आदम ने किया था: "क्या तुम इसे यह कहकर बुलाना चाहते हो? ठीक है, मैं इसे यह कहकर नहीं बुलानेवाला, मैं इसे वह कहकर बुलानेवाला हूँ; तुमने इसे सीता कहा था लेकिन मैं इसे गीता कहकर बुलानेवाला हूँ। मुझे अपनी प्रतिभा का दिखावा करना है।" यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह अनियन्त्रित रूप से अहंकारी होना नहीं है? लेकिन क्या परमेश्वर के पास ऐसा स्वभाव है? जो कार्य आदम ने किया था क्या उसके प्रति परमेश्वर की कुछ असामान्य आपत्तियाँ थीं? स्पष्ट रूप से उत्तर है नहीं! उस स्वभाव के विषय में जिसे परमेश्वर प्रकाशित करता है, उसमें जरा भी वाद-विवाद, अहंकार, या आत्म-दंभ नहीं है। यहाँ यह बहुतायत से स्पष्ट है। यह तो बस एक छोटी सी बात है, लेकिन यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं समझते हो, यदि तुम्हारा हृदय यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है और उसका रवैया क्या है, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानोगे या परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्तियों एवं प्रकाशन को नहीं देखोगे। क्या यह ऐसा नहीं है? क्या तुम सब उससे सहमत हो जिसे मैंने अभी अभी तुम्हें समझाया? आदम के कार्यों के प्रत्युत्तर में, परमेश्वर ने जोर से घोषणा नहीं की, "तुमने अच्छा किया। तुमने सही किया मैं सहमत हूँ।" फिर भी, जो कुछ आदम ने किया परमेश्वर ने अपने हृदय में उसकी स्वीकृति दी, उसकी सराहना, एवं तारीफ की थी। सृष्टि के समय से यह पहला कार्य था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के निर्देशन पर उसके लिए किया था। यह कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर के स्थान पर और परमेश्वर की ओर से किया था। परमेश्वर की नज़रों में, यह उस बुद्धिमत्ता से उदय हुआ था जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया था। परमेश्वर ने इसे एक अच्छी चीज़, एवं एक सकारात्मक चीज़ के रूप में देखा था। जो कुछ आदम ने उस समय किया था वह मनुष्य पर परमेश्वर की बुद्धिमत्ता का पहला प्रकटीकरण था। परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह एक उत्तम प्रकटीकरण था। जो कुछ मैं यहाँ तुम लोगों को बताना चाहता हूँ वह यह है कि उसकी बुद्धिमत्ता और स्वरूप के एक अंश को मनुष्य से जोड़ने में परमेश्वर का यह लक्ष्य था कि मानवजाति ऐसा जीवित प्राणी बन सके जो उसको प्रदर्शित करे। एक ऐसे जीवित प्राणी के लिए उसकी ओर से कार्यों को करना बिलकुल वैसा था जिसे देखने हेतु परमेश्वर लालसा कर रहा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 25

परमेश्वर ने आदम और हव्वा के लिए चमड़े के अँगरखे बनाये

उत्पत्ति 3:20-21 आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।

"और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए," इसकी छवि में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका निभाता है जब वह आदम और हव्वा के साथ है? मात्र दो मानव प्राणियों के साथ एक संसार में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका में प्रकट होता है? परमेश्वर की भूमिका में? हाँगकाँग के भाइयों एवं बहनों, कृपया उत्तर दीजिए। (एक अभिवावक की भूमिका में।) दक्षिण कोरिया के भाइयों एवं बहनों, तुम लोग क्या सोचते हो कि परमेश्वर किस भूमिका में प्रकट होता है? (परिवार के मुखिया की।) ताइवान के भाइयों एवं बहनों, तुम लोग क्या सोचते हो? (आदम और हव्वा के परिवार में किसी व्यक्ति की भूमिका, परिवार के एक सदस्य की भूमिका।) तुम लोगों में से कुछ सोचते हैं कि परमेश्वर आदम और हव्वा के परिवार के एक सदस्य के रूप में प्रकट होता है, जबकि कुछ कहते हैं कि परमेश्वर परिवार के एक मुखिया के रूप में प्रकट होता है वहीं दूसरे कहते हैं वो अभिभावक के रूप में है। इनमें से सब बिलकुल उपयुक्त हैं। लेकिन वह क्या है जिस ओर मैं इशारा कर रहा हूँ? परमेश्वर ने इन दो लोगों की सृष्टि की और उनके साथ अपने सहयोगियों के समान व्यवहार किया। उनके एकमात्र परिवार के समान, परमेश्वर ने उनके रहन-सहन का ख्याल रखा और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा। यहाँ, परमेश्वर आदम और हव्वा के माता-पिता के रूप में प्रकट होता है। जब परमेश्वर यह करता है, मनुष्य नहीं देखता कि परमेश्वर कितना ऊंचा है; वह परमेश्वर की सबसे ऊँची सर्वोच्चता, उसकी रहस्यमयता को नहीं देखता है, और ख़ासकर उसके क्रोध या प्रताप को नहीं देखता है। जो कुछ वह देखता है वह परमेश्वर की नम्रता, उसका स्नेह, मनुष्य के लिए उसकी चिंता और उसके प्रति उसकी ज़िम्मेदारी एवं देखभाल है। वह रवैया एवं तरीका जिसके अनुसार परमेश्वर आदम और हव्वा के साथ व्यवहार करता है वह इसके समान है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंता करते हैं। यह इसके समान भी है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने पुत्र एवं पुत्रियों से प्रेम करते हैं, उन पर ध्यान देते हैं, और उनकी देखरेख करते हैं—वास्तविक, दृश्यमान, और स्पर्शगम्य। अपने आपको एक ऊँचे एवं सामर्थी पद पर रखने के बजाए, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के लिए पहरावा बनाने के लिए चमड़ों का उपयोग किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी लज्जा को छुपाने के लिए या उन्हें ठण्ड से बचाने के लिए इस रोएँदार कोट का उपयोग किया गया था। संक्षेप में, यह पहरावा जो मनुष्य के शरीर को ढंका करता था उसे परमेश्वर के द्वारा उसके अपने हाथों से बनाया गया था। इसे लोगों की सोच के अनुसार सरलता से विचार के माध्यम से या चमत्कारी तरीके से बनाने के बजाय, परमेश्वर ने वैधानिक तौर पर कुछ ऐसा किया जिसके विषय में मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर नहीं कर सकता था और उसे नहीं करना चाहिए। यह एक साधारण कार्य हो सकता है कि कुछ लोग यहाँ तक सोचें कि यह जिक्र करने के लायक भी नहीं है, परन्तु यह ऐसे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं लेकिन उसके विषय में पहले अस्पष्ट विचारों से भरे हुए थे, उन्‍हें उसकी विशुद्धता एवं मनोहरता में अन्तःदृष्टि प्राप्त करने, और उसके विश्वासयोग्य एवं दीन स्वभाव को देखने की गुंजायश भी देता है। यह अत्यधिक अभिमानी लोगों को, जो सोचते हैं कि वे ऊँचे एवं शक्तिशाली हैं, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता के सामने लज्जा से अपने अहंकारी सिरों को झुकाने के लिए मजबूर करता है। यहाँ, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता लोगों को यह देखने के लिए और अधिक योग्य बनाती है कि परमेश्वर कितना प्यारा है। इसके विपरीत, "असीम" परमेश्वर, "प्यारा" परमेश्वर और "सर्वशक्तिमान" परमेश्वर लोगों के हृदय में कितना छोटा, एवं नीरस है, और एक प्रहार को भी सहने में असमर्थ है। जब तुम इस वचन को देखते हो और इस कहानी को सुनते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को नीचा समझते हो क्योंकि उसने एक ऐसा कार्य किया था? शायद कुछ लोग ऐसा सोचें, लेकिन दूसरों के लिए यह पूर्णत: विपरीत होगा। वे सोचेंगे कि परमेश्वर विशुद्ध एवं प्यारा है, यह बिलकुल परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता है जो उन्हें द्रवित करती है। जितना अधिक वे परमेश्वर के वास्तविक पहलू को देखते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के प्रेम के सच्चे अस्तित्व की, अपने हृदय में परमेश्वर के महत्व की, और वह किस प्रकार हर घड़ी उनके बगल में खड़ा होता है, उसकी सराहना कर सकते हैं।

इस बिन्दु पर, हमें हमारी बातचीत को वर्तमान से जोड़ना चाहिए। यदि परमेश्वर मनुष्यों के लिए ये विभिन्न छोटी छोटी चीज़ें कर सकता था जिनका सृजन उसने बिलकुल शुरुआत में किया था, यहाँ तक कि ऐसी चीज़ें भी जिनके विषय में लोग कभी सोचने या अपेक्षा करने की हिम्मत भी नहीं करेंगे, तो क्या परमेश्वर आज के लोगों के लिए ऐसी चीज़ें करेगा? कुछ लोग कहते हैं, "हाँ!" ऐसा क्यों है? क्योंकि परमेश्वर का सार जाली नहीं है, उसकी मनोहरता जाली नहीं है। क्योंकि परमेश्वर का सार सचमुच में अस्तित्व में है और यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें दूसरों के द्वारा कुछ जोड़ा गया है, और निश्चित रूप से ऐसी चीज़ नहीं है जो समय, स्थान एवं युगों में परिवर्तन के साथ बदलता जाता है। परमेश्वर की विशुद्धता एवं मनोहरता को कुछ ऐसा करने के द्वारा सामने लाया जा सकता है जिसे लोग सोचते हैं कि साधारण एवं मामूली है, ऐसी चीज़ जो इतनी छोटी है कि लोग सोचते भी नहीं हैं कि वह कभी करेगा। परमेश्वर ढोंगी नहीं है। उसके स्वभाव एवं सार में कोई अतिशयोक्ति, छद्मवेश, गर्व, या अहंकार नहीं है। वह कभी डींगें नहीं मारता है, बल्कि इसके बजाए प्रेम करता है, चिंता करता है, ध्यान देता है, और मनुष्‍यों की अगुवाई करता है जिन्हें उसने निष्‍ठा एवं ईमानदारी से बनाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग इसमें से कितनी चीज़ों की सराहना, एवं एहसास कर सकते हैं, या देख सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर निश्चय ही इन चीज़ों को कर रहा है। क्या यह जानना कि परमेश्वर के पास ऐसा सार है उसके लिए लोगों के प्रेम को प्रभावित करेगा? क्या यह परमेश्वर के विषय में उनके भय को प्रभावित करेगा? मैं आशा करता हूँ कि जब तुम परमेश्वर के वास्तविक पहलु को समझ जाते हो तो तुम उसके और भी करीब हो जाओगे और तुम मानवजाति के प्रति उसके प्रेम एवं देखभाल की सचमुच में और भी अधिक सराहना करने के योग्य होगे, जबकि ठीक उसी समय तुम अपना हृदय भी परमेश्वर को देते हो और आगे से तुम्हें उसके प्रति कोई सन्देह या शंका नहीं होगी। परमेश्वर मनुष्य के लिए सब कुछ चुपचाप कर रहा है, वह यह सब अपनी ईमानदारी, निष्‍ठा एवं प्रेम के ज़रिए खामोशी से कर रहा है। लेकिन वह जो भी करता है उसे लेकर उसे कभी कोई शंका या खेद नहीं होता है, न ही उसे कभी आवश्यकता होती है कि कोई उसे किसी रीति से बदले में कुछ दे या न ही उसके पास कभी मानवजाति से कोई चीज़ प्राप्त करने के इरादे हैं। वह सब कुछ जो उसने हमेशा किया है उसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि वह मानवजाति के सच्चे विश्वास एवं प्रेम को प्राप्त कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 26

परमेश्वर संसार को जलप्रलय से नाश करने का इरादा करता है, नूह को एक जहाज बनाने का निर्देश देता है

उत्पत्ति 6:9-14 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था; और नूह परमेश्‍वर ही के साथ साथ चलता रहा। और नूह से शेम, और हाम, और येपेत नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। उस समय पृथ्वी परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था। तब परमेश्‍वर ने नूह से कहा, "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा। इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उसमें कोठरियाँ बनाना, और भीतर-बाहर उस पर राल लगाना।"

उत्पत्ति 6:18-22 "परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। एक एक जाति के पक्षी, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएँगे, कि तू उनको जीवित रखे। और भाँति भाँति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपने पास इकट्ठा कर रखना; जो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा।" परमेश्‍वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

इन अंशों को पढ़ने के बाद क्या अब तुम लोगों के पास नूह के बारे में एक सामान्य समझ है कि वह कैसा है? नूह किस प्रकार का व्यक्ति था? मूल पाठ है: "नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था।" वर्तमान लोगों की समझ के अनुसार, उस समय अतीत में, एक धर्मी व्यक्ति किस प्रकार का व्यक्ति था? एक धर्मी पुरुष को सिद्ध या खरा होना चाहिए। क्या तुम लोग जानते हो कि यह सिद्ध व्यक्ति मनुष्य की दृष्टि में सिद्ध है या परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध है? बिना किसी शंका के, यह सिद्ध व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध है और मनुष्य की दृष्टि में नहीं। यह तो निश्चित है! ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य अंधा है और देख नहीं सकता है, और सिर्फ परमेश्वर ही पूरी पृथ्वी पर और हर एक व्यक्ति को देखता है, सिर्फ परमेश्वर ही जानता है कि नूह एक सिद्ध व्यक्ति है। इसलिए, संसार को जलप्रलय से नष्ट करने की परमेश्वर की योजना उस क्षण शुरू हो गई थी जब उसने नूह को बुलाया था।

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नूह का बुलाया जाना एक साधारण तथ्य है, परन्तु वह मुख्य बिन्दु जिसके विषय में हम बात कर रहे हैं—इस अभिलेख में परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की इच्छा एवं उसका सार—वह साधारण नहीं है। परमेश्वर के इन विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए, हमें पहले समझना होगा कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को बुलाने की इच्छा करता है, और इसके माध्यम से, हमें उसके स्वभाव, इच्छा एवं सार को समझना होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः परमेश्वर की नज़रों में, यह किस प्रकार का व्यक्ति है जिसे वह बुलाता है? यह ऐसा व्यक्ति होगा जो उसके वचनों को सुन सके, जो उसके निर्देशों का अनुसरण कर सके। साथ ही, यह ऐसा व्यक्ति भी होगा जिसके पास ज़िम्मेदारी की भावना हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को ऐसी ज़िम्मेदारी एवं कर्तव्य मानकर क्रियान्वित करेगा जिसे निभाने के लिए वो बाध्य है। तब क्या इस व्यक्ति को ऐसा व्यक्ति होने की आवश्यकता है जो परमेश्वर को जानता है? नहीं। उस समय अतीत में, नूह ने परमेश्वर की शिक्षाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं सुना था या परमेश्वर के किसी कार्य का अनुभव नहीं किया था। इसलिए, परमेश्वर के बारे में नूह का ज्ञान बहुत ही कम था। हालाँकि यहाँ लिखा है कि नूह परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, फिर भी क्या उसने कभी परमेश्वर के व्यक्तित्व को देखा था? उत्तर है पक्के तौर पर नहीं! क्योंकि उन दिनों में, सिर्फ परमेश्वर के संदेशवाहक ही लोगों के पास आते थे। जबकि वे चीज़ों को कहने एवं करने के द्वारा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, वे महज परमेश्वर की इच्छा एवं इरादों को सूचित कर रहे थे। परमेश्वर का व्यक्तित्व मनुष्य पर आमने-सामने प्रकट नहीं हुआ था। पवित्र शास्त्र के इस भाग में, हम सब मूल रूप से देखते हैं कि इस व्यक्ति नूह को क्या करना था और उसके लिए परमेश्वर के निर्देश क्या थे। अतः वह सार क्या था जिसे यहाँ परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था? सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होगा, और यह मापदंड निर्धारित करेगा कि इसके साथ निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसके पास सभी चीज़ों के प्रति कोई भावनाएँ नहीं हैं। यह असल में पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक वचन है जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था: "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।" इस समय परमेश्वर के वचनों में, क्या उसने कहा था कि वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह हाड़-मांस के सब जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है: परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी प्राणियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अनाज्ञाकारिता के प्रति उसके धीरज की एक सीमा होती है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था: "और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।" इस वाक्यांश "क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, परमेश्वर का अनुसरण करने वालों समेत, ऐसे लोग जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि तक पहुँच गया, तो उसे उन्हें नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी प्राणियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक कि मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता था कि परमेश्वर के द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों को ज्योति में और सही मार्ग पर ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व को तुच्छ जाना और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य की भ्रष्टता इस बिन्दु पर पहुँच गई, तो परमेश्वर के पास और अधिक धीरज नहीं होगा। इसके बजाए उसका स्थान कौन लेगा? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दण्ड का आगमन। क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का एक आंशिक प्रकाशन नहीं था? इस वर्तमान युग में, क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई धर्मी मनुष्य है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई सिद्ध मनुष्य है? क्या यह युग ऐसा युग है जिसके अंतर्गत परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी पर सभी प्राणियों का व्यवहार भ्रष्ट हो गया है? आज के दिन और युग में, ऐसे लोगों को छोड़ कर जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करना चाहता है, ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण और उसके उद्धार को स्वीकार कर सकते हैं, क्या हाड़-मांस के सभी लोग परमेश्वर के धीरज की सीमा को चुनौती नहीं दे रहे हैं? क्या सभी चीज़ें जो तुम लोगों के आस-पास घटित होती हैं, जिन्हें तुम लोग अपनी आँखों से देखते हो और अपने कानों से सुनते हो, और इस संसार में व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो उपद्रव से भरी हुई नहीं हैं? परमेश्वर की दृष्टि में, क्या एक ऐसे संसार, एवं ऐसे युग को समाप्त नहीं कर देना चाहिए? यद्यपि इस वर्तमान युग की पृष्ठभूमि नूह के समय की पृष्ठभूमि से पूर्णतः अलग है, फिर भी वे भावनाएँ एवं क्रोध जो मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति परमेश्वर में है वे वैसी ही बनी रहती हैं जैसी वे पिछले समय में थीं। परमेश्वर अपने कार्य के कारण सहनशील होने में समर्थ है, किन्तु सब प्रकार की परिस्थितियों एवं हालातों के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में इस संसार को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। जैसा पिछले समय में था जब जलप्रलय के द्वारा संसार का विनाश किया गया था उसके लिहाज से परिस्थिति बिल्कुल अलग है। किन्तु अन्तर क्या है? साथ ही यह ऐसी चीज़ है जो परमेश्वर के हृदय को अत्यंत दुःखी करती है, और कदाचित् कुछ ऐसा है जिसकी तुम लोगों में से कोई भी सराहना नहीं कर सकता है।

जब वह जलप्रलय के द्वारा संसार का नाश कर रहा था, तब परमेश्वर नूह को जहाज़ बनाने, और कुछ तैयारी के काम के लिए बुला सकता था। परमेश्वर एक पुरुष—नूह—को बुला सकता था कि वह उसके लिए कार्यों की इन श्रृंखलाओं को अंजाम दे। किन्तु इस वर्तमान युग में, परमेश्वर के पास कोई नहीं है जिसे वो बुलाए। ऐसा क्यों है? हर एक व्यक्ति जो यहाँ बैठा है वह शायद उस कारण को बहुत अच्छी तरह समझता और जानता है। क्या तुम लोगों के लिए आवश्यक है कि मैं इसे बोलकर बताऊँ? ज़ोर से कहने से हो सकता है कि तुम लोगों का सम्मान खो जाये या सब परेशान हो जाएँ। कुछ लोग कह सकते हैं: "हालाँकि परमेश्वर की दृष्टि में हम धर्मी लोग नहीं हैं और हम सिद्ध लोग नहीं हैं, फिर भी यदि परमेश्वर हमें कोई चीज़ करने के लिए निर्देश देता है, तो हम अभी भी इसे करने में समर्थ होंगे। इससे पहले, जब उसने कहा कि एक विनाशकारी तबाही आ रही थी, तो हमने भोजन एवं ऐसी चीज़ों को तैयार करना शुरू कर दिया था जिनकी आवश्यकता किसी आपदा में होगी। क्या यह सब परमेश्वर की माँगों के अनुसार नहीं किया गया था? क्या हम सचमुच में परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे? जो चीज़ें हमने कीं क्या उनकी तुलना जो कुछ नूह ने किया उससे नहीं की जा सकती है? हमने जो किया क्या वो सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है? क्या हम परमेश्वर के निर्देशों का अनुसरण नहीं कर रहे थे? क्या हमने जो परमेश्वर ने कहा वो इसलिए नहीं किया क्योंकि हमें परमेश्वर के वचनों में विश्वास है? तो परमेश्वर अब भी दुःखी क्यों है? परमेश्वर क्यों कहता है कि उसके पास बुलाने के लिए कोई भी नहीं है?" क्या तुम लोगों के कार्यों और नूह के कार्यों के बीच कोई अन्तर है? अन्तर क्या है? (आपदा के लिए आज भोजन तैयार करना हमारा अपना इरादा था।) (हमारे कार्य "धर्मिता" तक नहीं पहुँच सकते हैं, जबकि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक धर्मी पुरुष था।) जो कुछ तुम लोगों ने कहा वह बहुत गलत नहीं है। जो नूह ने किया वह भौतिक रूप से उससे अलग है जो लोग अब कर रहे हैं। जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी, उसे कुछ करने के लिए निर्देश दिया था, किन्तु अधिक विवरण नहीं दिया, पर वह आगे बढ़ा और उसने इसे किया। उसने अकेले में परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या न ही वह दोमना था। उसने मात्र इसे एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ तदनुसार किया। जो कुछ करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी उसने उसे किया, और कार्यों को करने के लिए परमेश्वर के वचन को मानने एवं सुनने में उसका दृढ़ विश्वास था। जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था उसके साथ उसने इसी प्रकार स्पष्टवादिता एवं सरलता से व्यवहार किया था। उसका सार—उसके कार्यों का सार आज्ञाकारिता थी, आलोचना या प्रतिरोध नहीं था, और इसके अतिरिक्त, अपनी व्यक्तिगत रुचियों और अपने लाभ एवं हानि के विषय में सोचना नहीं था। और, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो नूह ने नहीं पूछा कब या नहीं पूछा कि चीज़ों का क्या होगा, और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने केवल वही किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। चाहे जैसे भी परमेश्वर इसे बनाना चाहता था या जिस भी चीज़ से बनाना चाहता था, उसने बिलकुल वैसा ही किया जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और उसके तुरन्त बाद कार्य का प्रारम्भ भी किया था। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया था। क्या वह स्वयं की आपदा से बचने में सहायता करने के लिए इसे कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने के लिए कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने केवल आज्ञा को माना, ध्यान से सुना, और इसके अनुसार किया। इस समय के लोग वैसे नहीं हैं: जैसे ही परमेश्वर के वचन से हल्की सी जानकारी निकलती है, जैसे ही लोग परेशानी या समस्या के किसी चिन्ह का आभास करते हैं, वे तुरन्त, किसी भी चीज़ और कीमत की परवाह किए बगैर, आपदा के बाद क्या खाएँगे, क्या पियेंगे एवं क्या उपयोग करेंगे, इसकी तैयारी करने के लिए कार्य करने को कूद पड़ते हैं, यहाँ तक कि जब विपत्ति आती है तो वे बच निकलने के अपने मार्गों की योजना बना लेते हैं। इससे भी अधिक दिलचस्प तो यह है कि, इस मुख्य क्षण में, मानवीय दिमाग बहुत ही "उपयोगी" होते हैं। उन परिस्थितियों के अंतर्गत जहाँ परमेश्वर ने कोई निर्देश नहीं दिया है, मनुष्य बिलकुल उपयुक्त ढंग से सब कुछ की योजना बना लेता है। तुम लोग इसका वर्णन करने के लिए "सिद्ध" शब्द का उपयोग कर सकते हो। जहाँ तक इसकी बात है कि परमेश्वर क्या कहता है, परमेश्वर के इरादे क्या हैं, या परमेश्वर क्या चाहता है, कोई भी परवाह नहीं करता है और कोई भी इसकी सराहना करने की कोशिश नहीं करता है। क्या यह आज के लोगों और नूह के बीच में सबसे बड़ा अन्तर नहीं है?

नूह की कहानी के इस अभिलेख में, क्या तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को देखते हो? मनुष्य की भ्रष्टता, अशुद्धता एवं उपद्रव के प्रति परमेश्वर के धीरज की एक सीमा है। जब वह उस सीमा तक पहुँच जाता है, तो वह और अधिक धीरज नहीं धरता है और इसके बजाए वह अपने नए प्रबंधन और नई योजना को शुरू करेगा, जो उसे करना है उसे प्रारम्भ करेगा, और अपने कार्यों और अपने स्वभाव के दूसरे पहलु को प्रकट करेगा। उसका यह कार्य यह दर्शाने के लिए नहीं है कि मनुष्य के द्वारा कभी उसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए या यह कि वह अधिकार एवं क्रोध से भरा हुआ है, और यह इस बात को दर्शाने के लिए नहीं है कि वह मानवता का नाश कर सकता है। बात यह है कि उसका स्वभाव एवं उसका पवित्र सार इस प्रकार की मानवता को परमेश्वर के सामने जीवन बिताने हेतु, और उसकी प्रभुता के अधीन जीवन जीने हेतु न तो और अनुमति दे सकता है, और न ही अधिक धीरज रख सकता है। कहने का तात्पर्य है, जब सारी मानवजाति उसके विरुद्ध है, जब सारी पृथ्वी में ऐसा कोई नहीं है जिसे वह बचा सकता है, तो ऐसी मानवता के लिए उसके पास और अधिक धीरज नहीं होगा, और वह बिना किसी सन्देह के अपनी योजना को सम्पन्न करेगा—इस प्रकार की मानवता को नाश करने के लिए। परमेश्वर के द्वारा किए गए ऐसे कार्य को उसके स्वभाव के द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह एक आवश्यक परिणाम है, और ऐसा परिणाम है जिसे परमेश्वर की प्रभुता के अधीन प्रत्येक सृजित किए गए प्राणी को सहना होगा। क्या यह नहीं दर्शाता है कि इस वर्तमान युग में, परमेश्वर अपनी योजना को पूर्ण करने और उन लोगों को बचाने के लिए जिन्हें वह बचाना चाहता है और इन्तज़ार नहीं कर सकता है? इन परिस्थितियों के अंतर्गत, परमेश्वर किस बात की सबसे अधिक परवाह करता है? इसकी नहीं कि किस प्रकार ऐसे लोग जो उसका अनुसरण बिलकुल भी नहीं करते हैं या ऐसे लोग जो हर तरह से उसका विरोध करते हैं वे उससे कैसा व्यवहार करते हैं या उसका कैसे प्रतिरोध करते हैं, या मानवजाति किस प्रकार उस पर कलंक लगा रही है। वह केवल इसके विषय में परवाह करता है कि वे लोग जो उसकी प्रबंधन योजना में उसके उद्धार के विषय हैं, जो उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया गया है या नहीं, उन्होंने उसकी संतुष्टि को हासिल किया है या नहीं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो उसका अनुसरण करने वालों के अतिरिक्त हैं, वह मात्र कभी कभार ही अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए थोड़ा सा दण्ड देता है। उदाहरण के लिए: सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी का विस्फोट, एवं इत्यादि। ठीक उसी समय, वह उनको भी प्रभावशाली ढंग से बचाता है, उनकी देखरेख करता है जो उसका अनुसरण करते हैं और जिन्हें उसके द्वारा बचाया जानेवाला है। परमेश्वर का स्वभाव यह है: एक ओर, वह उन लोगों को अधिकतम धीरज एवं सहनशीलता प्रदान कर सकता है जिन्हें वह पूर्ण बनाने का इरादा करता है, और जब तक वह संभवतः कर सकता है वह उनके लिए इंतज़ार करता है; दूसरी ओर, परमेश्वर शैतान-प्रकार के लोगों से, जो उसका अनुसरण नहीं करते हैं और उसका विरोध करते हैं, अत्यंत नफ़रत एवं घृणा करता है। यद्यपि वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि ये शैतान-प्रकार के लोग उसका अनुसरण करते या उसकी आराधना करते हैं या नहीं, वह तब भी उनसे घृणा करता है जबकि उसके हृदय में उनके लिए धीरज होता है, और चूँकि वह इन शैतान-प्रकार के लोगों के अन्त को निर्धारित करता है, इसलिए वह अपने प्रबंधकीय योजना के चरणों के आगमन का भी इन्तज़ार कर रहा होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 27

जलप्रलय के बाद नूह के लिए परमेश्वर की आशीष

उत्पत्ति 9:1-6 फिर परमेश्‍वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, "फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृथ्वी में भर जाओ। तुम्हारा डर और भय पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियों पर बना रहेगा: ये सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूँ। पर मांस को प्राण समेत अर्थात् लहू समेत तुम न खाना। और निश्‍चय ही मैं तुम्हारे लहू अर्थात् प्राण का बदला लूँगा: सब पशुओं और मनुष्यों, दोनों से मैं उसे लूँगा; मनुष्य के प्राण का बदला मैं एक एक के भाई बन्धु से लूँगा। जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा, क्योंकि परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।"

नूह के परमेश्वर के निर्देशों को स्वीकार करने, जहाज़ बनाने और परमेश्वर द्वारा संसार का नाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किये जाने के दौरान जीवित रहने के पश्चात, आठ लोगों का उसका पूरा परिवार जीवित बच गया। नूह के परिवार के आठ लोगों को छोड़कर, सारी मानवजाति का नाश कर दिया गया था, और पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का नाश कर दिया गया था। नूह को, परमेश्वर ने आशीषें दीं, और उससे और उसके बेटों से कुछ बातें कहीं। ये बातें वे थीं जिन्हें परमेश्वर उसे प्रदान कर रहा था और उसके लिए परमेश्वर की आशीष भी थी। यह वह आशीष एवं प्रतिज्ञा है जिसे परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को देता है जो उसे ध्यान से सुन सकता है और उसके निर्देशों को स्वीकार कर सकता था, और साथ ही ऐसा तरीका भी है जिससे परमेश्वर लोगों को प्रतिफल देता है। कहने का तात्पर्य है, इसके बावजूद कि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध पुरुष था या एक धर्मी पुरुष था, और इसके बावजूद कि वह परमेश्वर के बारे में कितना कुछ जानता था, संक्षेप में, नूह और उसके तीन पुत्र सभी ने परमेश्वर के वचनों को सुना था, परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग किया था, और वही किया था जिसे उनसे परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार करने की अपेक्षा की गई थी। परिणामस्वरूप, जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश के बाद उन्होंने मनुष्यों एवं विभिन्न प्रकार के जीवित प्राणियों को पुनः प्राप्त करने में परमेश्वर की सहायता की थी, और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के अगले चरण में बड़ा योगदान दिया था। वह सब कुछ जो उसने किया था उसके कारण, परमेश्वर ने उसे आशीष दी। शायद आज के लोगों के लिए, जो कुछ नूह ने किया था वह उल्लेख करने के भी लायक नहीं है। कुछ लोग सोच सकते हैं: नूह ने कुछ भी नहीं किया था; परमेश्वर ने उसे बचाने के लिए अपना मन बना लिया था, अतः उसे निश्चित रूप से बचाया जाना था। उसके जीवित बचने का श्रेय उसे नहीं जाता है। यह वह है जिसे परमेश्वर घटित करना चाहता था, क्योंकि मनुष्य निष्क्रिय है। लेकिन यह वह नहीं है जो परमेश्वर सोच रहा था। परमेश्वर को, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति महान है या मामूली, जब तक वे उसे ध्यान से सुन सकते हैं, उसके निर्देशों और जो कुछ वह सौंपता है उसका पालन कर सकते हैं, और उसके कार्य, उसकी इच्छा एवं उसकी योजना के साथ सहयोग कर सकते हैं, ताकि उसकी इच्छा एवं उसकी योजना को निर्विघ्नता से पूरा किया जा सके, तो ऐसा आचरण उसके द्वारा उत्सव मनाए जाने के योग्य है और उसकी आशीष को प्राप्त करने के योग्य है। परमेश्वर ऐसे लोगों को मूल्यवान जानकर सहेजकर रखता है, और वह उनके कार्यों एवं अपने लिए उनके प्रेम एवं उनके स्नेह को ह्रदय में संजोता है। यह परमेश्वर का रवैया है। तो परमेश्वर ने नूह को आशीष क्यों दी? क्योंकि परमेश्वर इसी तरह से मनुष्‍य के ऐसे कार्यों एवं उसकी आज्ञाकारिता से पेश आता है।

नूह के विषय में परमेश्वर की आशीष के लिहाज से, कुछ लोग कहेंगे: "यदि मनुष्य परमेश्वर को ध्यान से सुनता है और परमेश्वर को संतुष्ट करता है, तो परमेश्वर को मनुष्य को आशीष देना चाहिए। क्या यह स्पष्ट नहीं है?" क्या हम ऐसा कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "नहीं।" हम ऐसा क्यों नहीं कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "मनुष्य परमेश्वर की आशीष का आनन्द उठाने के लायक नहीं है।" यह पूर्णतः सही नहीं है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जो कुछ परमेश्वर सौंपता है उसे स्वीकार करता है, तो परमेश्वर के पास न्याय करने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे और उस व्यक्ति ने आज्ञा का पालन किया है या नहीं, और उस व्यक्ति ने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट किया है या नहीं और जो कुछ वे करते हैं वो उपयुक्त है या नहीं। परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह किसी व्यक्ति का हृदय है, न कि सतह पर किए गए उनके कार्य। स्थिति ऐसी नहीं है कि परमेश्वर को किसी व्यक्ति को तब तक आशीष देना चाहिए जब तक वे इसे करते हैं, इसके बावजूद कि वे इसे कैसे करते हैं। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ चीज़ों के अंत के परिणाम को ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक जोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीज़ों के विकास के दौरान किसी व्यक्ति का रवैया कैसा है, और यह देखता है कि उनके हृदय में आज्ञाकारिता, विचार, एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं। उस समय नूह परमेश्वर के विषय में कितना जानता था? क्या यह उतना था जितने ये सिद्धान्त हैं जिन्हें अब तुम लोग जानते हो? परमेश्वर की अवधारणाएँ एवं उसका ज्ञान जैसे सत्य के पहलुओं के सम्बन्ध में, क्या उसने उतनी सिंचाई एवं चरवाही पाई थी जितनी तुम लोगों ने पाई है? नहीं, उसने नहीं पाई! लेकिन एक तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता है: चेतना में, मस्तिष्कों में, और यहाँ तक कि आज के लोगों के हृदयों की गहराई में भी, परमेश्वर के विषय में उनकी अवधारणाएँ और रवैया धुंधला एवं अस्पष्ट है। तुम लोग यहाँ तक कह सकते हो कि लोगों का एक हिस्सा परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति एक नकारात्मक रवैया रखता है। लेकिन नूह के हृदय एवं चेतना में, परमेश्वर का अस्तित्व पूर्ण एवं बिना किसी सन्देह के था, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता शुद्ध थी और परीक्षा का सामना कर सकती थी। परमेश्वर के प्रति उसका हृदय शुद्ध एवं खुला हुआ था। उसे परमेश्वर के हर एक वचन का अनुसरण करने हेतु अपने आपको आश्वस्त करने के लिए सिद्धान्तों के बहुत अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी, न ही उसे परमेश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए बहुत सारे तथ्यों की आवश्यकता थी, ताकि जो कुछ परमेश्वर ने सौंपा था वह उसे स्वीकार कर सके और जो कुछ भी करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी थी वह उसे करने के योग्य हो सके। यह नूह और आज के लोगों के बीच आवश्यक अन्तर है, और साथ ही यह बिलकुल सही परिभाषा भी है कि परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध व्यक्ति कैसा होता है। जिन्हें परमेश्वर चाहता है वे नूह के समान लोग हैं। वह उस प्रकार का व्यक्ति है जिसकी प्रशंसा परमेश्वर करता है, और बिलकुल उसी प्रकार का व्यक्ति है जिसे परमेश्वर आशीष देता है। क्या तुम लोगों ने इससे कोई प्रबोधन प्राप्त किया है? लोग मनुष्यों को बाहर से देखते हैं, जबकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह लोगों के हृदय एवं उनके सार हैं। परमेश्वर किसी को भी अपने प्रति अधूरा-मन या सन्देह रखने की अनुमति नहीं देता है, न ही वह लोगों को किसी रीति से उस पर सन्देह करने या उसकी परीक्षा लेने की इजाज़त देता है। इस प्रकार, हालाँकि आज लोग परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हैं, या तुम लोग यह भी कह सकते हो कि परमेश्वर के आमने-सामने हैं, फिर भी किसी चीज़ के कारण जो उनके हृदयों की गहराई में है, उनके भ्रष्ट मूल-तत्व के अस्तित्व, और उसके प्रति उनके प्रतिकूल रवैये के कारण, परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास से उन्हें अवरोधित किया गया है, और उसके प्रति उनकी आज्ञाकारिता में उन्हें बाधित किया गया है। इस कारण, यह उनके लिए बहुत कठिन है कि वे उसी आशीष को हासिल करें जिसे परमेश्वर ने नूह को प्रदान किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 28

परमेश्वर मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को चिन्ह के रूप में ठहराता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

इसके आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के इस भाग पर एक नज़र डालें कि किस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को एक चिन्ह के रूप में ठहराया।

अधिकांश लोग जानते हैं कि इंद्रधनुष क्या है और उन्होंने इंद्रधनुष से जुड़ी कुछ कहानियों को सुना है। जहाँ तक बाइबल में इंद्रधनुष के बारे में उस कहानी की बात है, कुछ लोग इसका विश्वास करते हैं, कुछ दंतकथा के रूप में इससे व्यवहार करते हैं, जबकि अन्य लोग इस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते हैं। चाहे कुछ भी हो, सब कुछ जो इंद्रधनुष के सम्बन्ध में घटित हुआ था वह सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर ने किसी समय किया था, और ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रबंधन की प्रक्रिया के दौरान घटित हुई थीं। इन चीज़ों को बाइबल में हू-बहू लिखा गया है। ये लेख हमें यह नहीं बताते हैं कि उस समय परमेश्वर किस मनोदशा में था या इन वचनों के पीछे उसके क्या इरादे थे जिन्हें परमेश्वर ने कहा था। इसके अतिरिक्त, कोई भी समझ नहीं सकता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा था जब उसने उन्हें कहा था। फिर भी, इस समूचे हालात के लिहाज से परमेश्वर के मन की दशा को पाठ की पंक्तियों के बीच प्रकट किया गया है। यह ऐसा है मानो उस समय के उसके विचार परमेश्वर के वचन के प्रत्येक शब्द एवं वाक्यांश के ज़रिये पन्नों से निकल पड़ते हैं।

परमेश्वर के विचार वो विषय है जिसके बारे में लोगों को चिन्ताशील होना चाहिए और जिन्हें जानने के लिए उन्हें सबसे अधिक कोशिश करनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के विचार परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ से नज़दीकी से जुड़े हुए हैं, और मनुष्य के द्वारा जीवन में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ एक अनिवार्य कड़ी है। अतः परमेश्वर उस समय क्या सोच रहा था जब ये परिस्थितियाँ घटित हुई थीं?

मूल रूप से, परमेश्वर ने ऐसी मानवता की सृष्टि की थी जो उसकी दृष्टि में बहुत ही अच्छी और उसके बहुत ही निकट थी, किन्तु उसके विरुद्ध विद्रोह करने के पश्चात् जलप्रलय के द्वारा उनका विनाश कर दिया गया था। क्या इसने परमेश्वर को कष्ट पहुँचाया कि एक ऐसी मानवता तुरन्त ही इस तरह विलुप्त हो गई थी? निश्चय ही इसने कष्ट पहुँचाया था! तो उसकी इस दर्द की अभिव्यक्ति क्या थी? बाइबल में इसे कैसे लिखा गया था? इसे बाइबल में इस रूप से लिखा गया: "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" यह साधारण वाक्य परमेश्वर के विचारों को प्रकट करता है। संसार के इस विनाश ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया। मनुष्य के शब्दों में, वह बहुत ही दुःखी था। हम कल्पना कर सकते हैं: जलप्रलय के द्वारा नाश किए जाने के बाद पृथ्वी जो किसी समय जीवन से भरी हुई थी वह कैसी दिखाई देती थी? वह पृथ्वी जो किसी समय मानवों से भरी हुई थी अब कैसी दिखती थी? कोई मानवीय निवास नहीं, कोई जीवित प्राणी नहीं, हर जगह पानी ही पानी और जल की सतह पर सब कुछ अस्तव्यस्त था। जब परमेश्वर ने संसार को बनाया तो क्या उसका मूल इरादा ऐसा कोई दृश्य था? बिलकुल भी नहीं! परमेश्वर का मूल इरादा था कि समूची धरती पर जीवन को देखे, कि उन मानवों को जिन्हें उसने बनाया था, उन्हें अपनी आराधना करते हुए देखे, सिर्फ नूह के लिए ही नहीं कि वह उसकी आराधना करनेवाला एकमात्र व्यक्ति हो या ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसकी बुलाहट का उत्तर दे सके ताकि जो कुछ उसे सौंपा गया था उसे पूर्ण करे। जब मानवता विलुप्त हो गई, तो परमेश्वर ने वह नहीं देखा जिसका उसने मूल रूप से इरादा किया था बल्कि पूर्णतः विपरीत देखा। उसका हृदय तकलीफ में कैसे नहीं हो सकता था? अतः जब वह अपने स्वभाव को प्रकट कर रहा था और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा था, तब परमेश्वर ने एक निर्णय लिया। उसने किस प्रकार का निर्णय लिया? मनुष्य के साथ एक वाचा के रूप में बादल में एक धनुष बनाने का (टिप्पणी: वह इंद्रधनुष जो हम देखते हैं), ऐसी प्रतिज्ञा कि परमेश्वर मानवजाति का जलप्रलय से दोबारा नाश नहीं करेगा। साथ ही, यह लोगों को यह बताने के लिए भी था कि परमेश्वर ने संसार का किसी समय जलप्रलय से नाश किया था, ताकि मानवजाति हमेशा याद रखे कि परमेश्वर ने ऐसा कार्य क्यों किया था।

क्या इस समय संसार का विनाश कुछ ऐसा था जो परमेश्वर चाहता था? यह निश्चित रूप से वह नहीं था जो परमेश्वर चाहता था। संसार के विनाश के बाद हम शायद पृथ्वी के दयनीय दृश्य के एक छोटे से भाग की कल्पना कर सकते हैं, परन्तु हम कल्पना कर ही नहीं सकते हैं कि उस समय परमेश्वर की निगाहों में वह तस्वीर कैसी थी। हम कह सकते हैं कि, चाहे यह आज के लोग हों या उस समय के, कोई भी यह सोच या सराह नहीं सकता कि, परमेश्वर ने उस समय क्या महसूस किया जब उसने वो दृश्य, संसार की वो तस्वीर देखी जो जलप्रलय के द्वारा विनाश के बाद की थी। मनुष्य की अनाज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर इसे करने के लिए मजबूर था, परन्तु जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश से परमेश्वर के हृदय के द्वारा सहा गया वह दर्द एक वास्तविकता है जिसे कोई नाप या सराह नहीं सकता है। इसीलिए परमेश्वर ने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, जो लोगों को यह बताने के लिए थी कि वे स्मरण रखें कि परमेश्वर ने किसी समय ऐसा कुछ किया था, और उन्हें यह वचन देने के लिए था कि परमेश्वर कभी इस संसार का इस तरह से दोबारा नाश नहीं करेगा। इस वाचा में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं—हम देखते हैं कि परमेश्वर का हृदय पीड़ा में था जब उसने मानवता का नाश किया। मनुष्य की भाषा में, जब परमेश्वर ने मानवजाति का नाश किया और मानवजाति को विलुप्त होते हुए देखा, तो उसका हृदय रो रहा था और उससे लहू बह रहा था। क्या उसके वर्णन का यह सबसे उत्तम तरीका नहीं है? मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए इन शब्दों को मनुष्य के द्वारा उपयोग किया जाता है, परन्तु चूँकि मनुष्य की भाषा में बहुत कमी है, तो परमेश्वर के एहसासों एवं भावनाओं का वर्णन करने के लिए उनका उपयोग करना मुझे बुरा नहीं लगता है, और न ही यह बहुत ज़्यादा है। कम से कम यह तुम लोगों को उस समय परमेश्वर की मनोदशा क्या थी उसके विषय में एक बहुत ही स्पष्ट, एवं बहुत ही उपयुक्त समझ प्रदान करता है। जब तुम लोग इंद्रधनुष को दोबारा देखोगे तो अब तुम लोग क्या सोचोगे? कम से कम तुम लोग स्मरण करोगे कि किस प्रकार एक समय परमेश्वर जल-प्रलय के द्वारा संसार के विनाश पर दुःखी था। तुम लोग स्मरण करोगे कि, परमेश्वर ने इस संसार से नफ़रत की और इस मानवता को तुच्छ जाना था, फिर भी जब उसने उन मनुष्यों का विनाश किया जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था, तो उसका हृदय दुख रहा था, उसका हृदय उन्हें छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका हृदय नहीं चाह रहा था, उसके हृदय को इसे सहना कठिन महसूस हो रहा था। उसका सुकून सिर्फ नूह के परिवार के आठ लोगों में ही था। यह नूह का सहयोग था जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि करने के उसके अत्यधिक सावधानी से किए गए प्रयासों को सार्थक बनाया था। एक समय जब परमेश्वर कष्ट सह रहा था, तब यह एकमात्र चीज़ थी जो उसकी पीड़ा की क्षतिपूर्ति कर सकती थी। उस बिन्दु से, परमेश्वर ने मानवता की अपनी सारी अपेक्षाओं को नूह के परिवार के ऊपर डाल दिया था, यह आशा करते हुए कि वे उसकी आशीषों के अधीन जीवन बिताएँगे और उसके श्राप के अधीन नहीं, यह आशा करते हुए कि वे परमेश्वर को फिर कभी संसार का जलप्रलय से नाश करते हुए नहीं देखेंगे, और साथ ही यह भी आशा करते हुए कि उनका विनाश नहीं किया जाएगा।

यहाँ से हमको परमेश्वर के स्वभाव के किस भाग को समझना चाहिए? परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक गंभीर हद तक भ्रष्टता एवं अवज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने न तो इसे समझा न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक, वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आख़िरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना प्रेमयोग्य है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए, या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही हैं? नहीं! बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 29

परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने सबसे अधिक दुलारे प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं—और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसीलिए, चाहे यह बाइबल हो या कोई अन्य पुस्तक, हम परमेश्वर को कभी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं, और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को यह वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है, या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे वह मानवजाति को अपने प्रति आभारी बनाए या उससे अपनी स्तुति कराए। यहाँ तक कि जब उसे क़़ष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिन्ता को कभी नहीं भूलता है, वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरन्तर मानवजाति को प्रदान करता है जैसा वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अक्सर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, फिर भी इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर के द्वारा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर, किसी भी अच्छे कार्य के लिए जिसे वह मानवजाति के लिए करता है, कभी ऐसा इरादा नहीं करता है कि उसे धन्यवाद से बदल दिया जाए या उसका मूल्य वापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसको ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं, और ऐसे लोग जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ये ऐसे लोग हैं जो प्रायः परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसे आशीष प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी आशीष जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं वे अक्सर उनकी कल्पना से परे होती हैं, और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होती हैं जिसे मानव उससे बदल सकते हैं जो उन्होंने किया है या उस कीमत से बदल सकते हैं जिसे उन्होंने चुकाया है। जब मानवजाति परमेश्वर की आशीषों का आनन्द ले रही है, तब क्या कोई परवाह करता है कि परमेश्वर क्या कर रहा है? क्या कोई किसी प्रकार की चिन्ता को दर्शाता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा है? क्या कोई परमेश्वर की पीड़ा की सराहना करने की कोशिश करता है? इन प्रश्नों का बिलकुल सही उत्तर है: नहीं! क्या नूह समेत, कोई मनुष्य, उस दर्द की सराहना कर सकता है जिसे परमेश्वर उस समय महसूस कर रहा था? क्या कोई समझ सकता है कि क्यों परमेश्वर एक ऐसी वाचा ठहराएगा? वे नहीं समझ सकते हैं! मानवजाति परमेश्वर की पीड़ा की सराहना नहीं करती है इसलिए नहीं कि वो परमेश्वर की पीड़ा को नहीं समझती है, और परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच अन्तर या उनकी हैसियत के बीच अन्तर के कारण नहीं; बल्कि इसलिए क्योंकि मानवजाति परमेश्वर की किसी भावना की परवाह भी नहीं करती है। मानवजाति सोचती है कि परमेश्वर तो आत्मनिर्भर है—परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि लोग उसकी देखरेख करें, उसे समझें या उसके प्रति विचारशीलता दिखाएं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, अतः उसे कोई दर्द नहीं है, उसकी कोई भावनाएँ नहीं हैं; वह दुःखी नहीं होगा, वह शोक महसूस नहीं करता है, यहाँ तक कि वह रोता भी नहीं है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए उसे किसी भावनात्मक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और उसे किसी भावनात्मक सुकून की आवश्यकता नहीं है। यदि उसे कुछ निश्चित परिस्थितियों के अंतर्गत इनकी आवश्यकता होती है, तो वह स्वयं ही इसे सुलझा लेगा और उसे मानवजाति से किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके विपरीत, यह तो कमज़ोर, एवं अपरिपक्व मनुष्य हैं जिन्हें परमेश्वर की सांत्वना, प्रयोजन एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है, और यहाँ तक कि उन्हें उनकी भावनाओं को किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर सांत्वना देने के लिए भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है। ऐसा विचार मानवजाति के हृदय के भीतर गहराई में छुपा होता है: मनुष्य कमज़ोर प्राणी है; उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है कि वह हर तरीके से उनकी देखरेख करे, वे सब प्रकार की देखभाल के हकदार हैं जिन्हें वे परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, और उन्हें परमेश्वर से किसी भी ऐसी चीज़ की माँग करनी चाहिए जिसे वे महसूस करते हैं कि वह उनकी होनी चाहिए। परमेश्वर बलवान है; उसके पास सब कुछ है, और उसे मानवजाति का अभिभावक और आशीष प्रदान करने वाला अवश्य होना चाहिए। जबकि वह पहले से ही परमेश्वर है, वह सर्वशक्तिमान है और उसे मानवजाति से कभी किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के किसी भी प्रकाशन पर ध्यान नहीं देता है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर के शोक, पीड़ा, या आनन्द को महसूस नहीं किया है। परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य की सभी अभिव्यक्तियों को अपनी हथेली के समान जानता है। परमेश्वर सभी समयों एवं सभी स्थानों में प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, प्रत्येक मनुष्य के बदलते विचारों का अवलोकन करता है और इस प्रकार उनको सांत्वना एवं प्रोत्साहन देता है, और उन्हें मार्गदर्शन देता है और प्रकाशित करता है। उन सभी चीजों के सम्बन्ध में जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति पर किया है और पूरी कीमत जो उसने उनके कारण चुकाई है, क्या लोग बाइबल में से या किसी ऐसी चीज़ से एक अंश ढूँढ़ सकते हैं जिसे अब तक परमेश्वर ने कहा है जो साफ़-साफ़ कहता हो कि परमेश्वर मनुष्य से किसी चीज़ की माँग करेगा? नहीं! इसके विपरीत, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार लोग परमेश्वर की सोच को अनदेखा करते हैं, वह फिर भी लगातार मानवजाति की अगुवाई करता है, लगातार मानवजाति की आपूर्ति करता है और उनकी सहायता करता है, कि वे परमेश्वर के मार्गों पर चल सकें ताकि वे उस खूबसूरत मंज़िल को प्राप्त कर सकें जो उसने उनके लिए तैयार की है। जब परमेश्वर की बात आती है, तो जो वह है, उसके अनुग्रह, उसकी दया और उसके सभी प्रतिफलों को बिना किसी हिचकिचाहट के उन लोगों को प्रदान किया जाएगा जो उससे प्रेम एवं उसका अनुसरण करते हैं। किन्तु वह उस पीड़ा को जो उसने सहा है या अपनी मनोदशा को कभी किसी व्यक्ति पर प्रकट नहीं करता है, और वह किसी के विषय में कभी शिकायत नहीं करता कि वह उसके प्रति ध्यान नहीं देता है या उसकी इच्छा नहीं जानता है। वह खामोशी से यह सब सह लेता है, उस दिन का इंतज़ार करता है जब मानवजाति समझने के योग्य हो जाएगी।

मैं यहाँ ये बातें क्यों कहता हूँ? तुम लोग उन बातों से क्या देखते हो जिन्हें मैंने कहा है? परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से अनदेखा किया जा सकता है, ऐसी चीज़ जो केवल परमेश्वर के द्वारा ही धारण की जाती है और किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं, उन लोगों समेत जिनके विषय में अन्य लोग सोचते हैं कि वे महान लोग, एवं अच्छे लोग हैं, या उनकी कल्पना का परमेश्वर है। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचते हो कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो, क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी मोलभाव नहीं करते हो और तुम उनके प्रति उदार होते हो, या तुम सोचते हो कि तुम तब भी बहुत निःस्वार्थ हो जब तुम्हारे माता पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास "निःस्वार्थ" शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द के रूप में सोचते हो, और ऐसा निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही श्रेष्ठ है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम सोचते हो कि तुम महान हो। परन्तु ऐसा कोई नहीं है जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं, एवं वस्तुओं के मध्य, और परमेश्वर के कार्य के जरिए परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। शायद तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु तुम कभी देखते नहीं या तारीफ नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारी आपूर्ति करता है, तुम्हें प्रेम करता है, और तुम्हारे लिए चिन्ता दिखाता है। अतः तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों के विषय में परवाह करते हो जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। फिर भी ऐसे "निःस्वार्थ" लोग कभी भी उस परमेश्वर के विषय में परवाह नहीं करते हैं जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निन्दनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है वह खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत, एवं परमेश्वर से असम्बद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का एक सच्चा प्रकाशन है। यह बिलकुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे आपूर्ति की एक सतत धारा प्राप्त करता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परन्तु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही जान जाओगे: सभी लोगों, मुद्दों एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता पूरी तरह से झूठी, ऊपरी एवं कपटपूर्ण है; इसका एक उद्देश्य, एवं इसके निश्चित इरादे हैं, यह एक समझौते को लिए हुए है, और परीक्षा लिए जाने पर स्थिर नहीं रह सकता है। तुम लोग यह भी कह सकते हो कि यह गन्दा, एवं घिनौना है। क्या तुम लोग सहमत हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 30

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

नूह की कहानी के अंत में, हम देखते हैं कि उस समय परमेश्वर ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक असामान्य तरीके का उपयोग किया था। यह तरीका बहुत ही ख़ास है, और वह मनुष्य के साथ एक वाचा बांधने के लिए है। यह ऐसा तरीका है जो संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर द्वारा जल-प्रलय के उपयोग के अंत की घोषणा करता है। बाहर से, ऐसा प्रतीत होता है कि एक वाचा बांधना बहुत ही साधारण सी बात है। यह नियमों का उल्लंघन करनेवाले कार्यों से दोनों दलों को बांधने के लिए शब्दों के उपयोग से बढ़कर और कुछ नहीं हैं, ताकि दोनों पक्षों के हितों की रक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायता मिले। आकार में, यह बहुत ही साधारण सा कार्य है, किन्तु इस कार्य के पीछे की उन प्रेरणाओं से और परमेश्वर द्वारा इस कार्य को करने के अर्थ से, यह परमेश्वर के स्वभाव एवं मनोदशा का एक सच्चा प्रकाशन है। यदि तुम बस इन वचनों को एक तरफ रखते और उन्हें अनदेखा करते, यदि मैं तुम लोगों को चीज़ों की सच्चाई कभी न बताऊँ, तो मानवजाति परमेश्वर की सोच को वास्तव में कभी नहीं जानेगी। कदाचित् तुम्हारी कल्पना में परमेश्वर मुस्कुरा रहा है जब वह यह वाचा बाँध रहा है, या कदाचित् उसके हाव-भाव गंभीर है, परन्तु इसकी परवाह किए बगैर कि लोगों की कल्पनाओं में परमेश्वर के पास कौन सी सबसे सामान्य अभिव्यक्ति है, कोई भी परमेश्वर के हृदय या उसकी पीड़ा को देख नहीं पाता है, उसके अकेलेपन की तो बात ही छोड़ दीजिए। कोई भी परमेश्वर से अपने ऊपर भरोसा नहीं करवा सकता है या परमेश्वर के विश्वास के लायक नहीं हो सकता है, या ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता है जिस पर वह अपने विचारों को व्यक्त कर सके या उसे अपनी पीड़ा बता सके। इसीलिए परमेश्वर के पास ऐसा कार्य करने के सिवाए कोई और विकल्प नहीं था। सतह पर, परमेश्वर ने पूर्व मानवता को विदाई देने के लिए एक आसान कार्य किया, भूतकाल को व्यवस्थित किया और जलप्रलय के द्वारा संसार के अपने विनाश का सिद्ध निष्कर्ष निकाला। फिर भी, परमेश्वर ने इस क्षण से उस पीड़ा को अपने हृदय की गहराई में दफन कर दिया था। एक समय जब परमेश्वर के पास कोई नहीं था, जिस पर भरोसा करके वह गोपनीय बातों को बताए, तो उसने मानवजाति के साथ एक वाचा बांधी, यह बताते हुए कि वह दोबारा संसार का जलप्रलय के द्वारा नाश नहीं करेगा। जब इंद्रधनुष प्रकट होता है तो यह लोगों को स्मरण दिलाने के लिए है कि किसी समय एक ऐसी घटना घटी थी, यह उन्हें चेतावनी देने के लिए है कि बुरे काम न करें। यहाँ तक कि ऐसी दुखदायी दशा में भी, परमेश्वर मानवजाति के विषय में नहीं भूला और तब भी उसने उनके लिए अत्यधिक चिन्ता दिखाई। क्या यह परमेश्वर का प्रेम एवं निःस्वार्थता नहीं है? किन्तु लोग क्या सोचते हैं जब वे कष्ट सह रहे होते हैं? क्या यह वह समय नहीं है जब उन्हें परमेश्वर की सबसे अधिक ज़रूरत है? ऐसे समयों पर, लोग हमेशा परमेश्वर को घसीटते हैं ताकि परमेश्वर उन्हें सांत्वना दे। चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर लोगों को कभी निराश होने नहीं देगा, और वह हमेशा लोगों को अनुमति देगा कि वे अपनी दुर्दशाओं से बाहर निकलें और प्रकाश में जीवन बिताएँ। हालाँकि परमेश्वर इस प्रकार से ही मानवजाति की आपूर्ति करता है, फिर भी मनुष्य के हृदय में परमेश्वर एक आश्वासन की गोली, और सांत्वना के स्फूर्तिदायक द्रव्य के अलावा और कुछ नहीं होता है। जब परमेश्वर दुख उठा रहा होता है, जब उसका हृदय ज़ख्मी होता है, तब उसका साथ देने या उसे सांत्वना देने के लिए किसी सृजित किए गए प्राणी या किसी व्यक्ति का होना निःसन्देह परमेश्वर के लिए बस एक फिज़ूल की इच्छा है। मनुष्य कभी परमेश्वर की भावनाओं पर ध्यान नहीं देता है, अतः परमेश्वर कभी नहीं माँगता या अपेक्षा नहीं करता है कि कोई हो जो उसे सांत्वना दे। अपनी मनोदशा को व्यक्त करने के लिए वह महज अपने स्वयं के तरीकों का उपयोग करता है। लोग नहीं सोचते हैं कि कुछ दु:ख-दर्द से होकर गुज़रना परमेश्वर के लिए कोई बहुत बड़ी बात है, लेकिन जब तुम सचमुच में परमेश्वर को समझने की कोशिश करते हो, जब वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसमें तुम सचमुच उसके सच्चे इरादों की सराहना कर सकते हो, केवल तभी तुम परमेश्वर की महानता एवं उसकी निःस्वार्थता को महसूस कर सकते हो। यद्यपि परमेश्वर ने इंद्रधनुष का उपयोग करते हुए मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी फिर भी उसने किसी को कभी नहीं बताया कि क्यों उसने ऐसा किया था, क्यों उसने इस वाचा को ठहराया था, मतलब उसने कभी किसी को अपने वास्तविक विचारों को नहीं बताया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो उस प्रेम की गहराई को बूझ सकता है जो मानवजाति के लिए परमेश्वर के पास है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया था, और साथ ही ऐसा कोई भी नहीं है जो इसकी सराहना कर सके कि मानवता का विनाश करते हुए उसके हृदय ने वास्तव में कितनी पीड़ा सहन की थी। इसलिए, भले ही वह लोगों को बताता है कि वह कैसा महसूस करता है, फिर भी वे इस भरोसे की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते है। पीड़ा में होने के बावजूद, वह अभी भी अपने कार्य के अगले चरण के साथ आगे बढ़ता जाता है। परमेश्वर हमेशा मानवजाति को अपना सर्वोतम पहलू एवं बेहतरीन चीजें देता है जबकि स्वयं ही सारे दुखों को खामोशी से सहता रहता है। परमेश्वर कभी भी इन दुखों को खुले तौर पर प्रकट नहीं करता है। इसके बदले में, वह उन्हें सहता है और खामोशी से इन्तज़ार करता है। परमेश्वर की सहनशीलता रुखी, सुन्न, या असहाय नहीं है, न ही यह कमज़ोरी का एक चिन्ह है। बात यह है कि परमेश्वर का प्रेम एवं सार हमेशा से ही निःस्वार्थ रहा है। यह उसके सार एवं स्वभाव का एक प्राकृतिक प्रकाशन है, और एक सच्चे सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर की पहचान का एक असली जीता-जागता नमूना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

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