XI. मंज़िलें और परिणाम

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 580

बिजली की एक कौंध में, प्रत्येक जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार, मेरे प्रकाश से रोशन होकर मनुष्यों ने भी उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है, जो कभी उसके पास थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार! अंततः यह गंदे पानी में पलट गया है और सतह के नीचे डूबकर कीचड़ में घुल गया है! ओह, पूरी मानवजाति, मेरी अपनी सृष्टि! अंततः वे इस प्रकाश में फिर से जीवित हो गए हैं, उन्हें अस्तित्व का आधार मिल गया है और कीचड़ में संघर्ष करना बंद कर चुके हैं! ओह, सृष्टि की असंख्य वस्तुएं, जिन्हें मैं अपने हाथों में थामे हूँ! मेरे वचनों के माध्यम से वे पुन: नई कैसे नहीं हो सकतीं? वे इस प्रकाश में, अपने कामों को कैसे पूरी तरह विकसित नहीं कर सकते? पृथ्वी अब मौत सी स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है। स्वर्ग और पृथ्वी अब एक रिक्त स्थान द्वारा अलग नहीं हैं, कभी अलग न होने के लिए एकाकार हो गए हैं। इस उल्लासपूर्ण अवसर पर, इस हर्षोन्माद के क्षण में, मेरी धार्मिकता और मेरी पवित्रता पूरे ब्रह्मांड में फैल गई है और समस्त मानव जाति उनकी निरंतर जयकार कर रही है। स्वर्ग के नगर आनंद से हँस रहे हैं और पृथ्वी का साम्राज्य प्रसन्न होकर नृत्य कर रहा है। इस समय कौन आनंदित नहीं है और इस समय कौन रो नहीं रहा है? पृथ्वी अपनी मूल स्थिति में स्वर्ग से संबद्ध है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ जुड़ा है। मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बाँधे रखने वाली डोर है और मनुष्य की निर्मलता के कारण, मनुष्य के नवीनीकरण के कारण, स्वर्ग अब पृथ्वी से छुपा हुआ नहीं है और पृथ्वी अब स्वर्ग की ओर मौन नहीं है। मानवजाति के चेहरे आभार की मुस्कान से सज्जित हैं और उनके हृदय में एक असीमित मिठास छिपी है, जिसकी कोई सीमा नहीं। मनुष्य अन्य मनुष्य से झगड़ा नहीं करता, न मनुष्य एक दूसरे के साथ मारपीट करते हैं। क्या कुछ ऐसे हैं, जो मेरे प्रकाश में दूसरों के साथ शांति से नहीं रहते? क्या कुछ ऐसे हैं, जो मेरे दिवस में मेरा नाम बदनाम करते हैं? सभी मनुष्य मेरी ओर श्रद्धा से देखते हैं और अपने हृदय में वे चुपचाप मेरी दुहाई देते हैं। मैंने मानवजाति के हर कर्म को जांचा है: जिन मनुष्यों की शुद्धि कर दी गई है, उनमें से कोई भी मेरे समक्ष अवज्ञाकारी नहीं है, कोई भी मेरी आलोचना नहीं करता। समस्त मानवजाति मेरे स्वभाव से ओतप्रोत है। सभी मनुष्य मेरे बारे में जान रहे हैं, मेरे निकट आ रहे हैं और अत्यधिक प्रेम कर रहे हैं। मैं मनुष्य की आत्मा में अडिग खड़ा हूँ, उसकी आँखों में उच्चतम शिखर तक पहुँच गया हूँ और उसकी नसों में रक्त के साथ प्रवाहित हूँ। मनुष्यों के हृदय में आनंदमय उल्लास से पृथ्वी का हर स्थान भर जाता है, हवा तीव्र और ताज़ा है, घना कोहरा अब भूमि को नहीं ढकता और सूरज अपनी दीप्ति से प्रकाशित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 18' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 581

राज्य मनुष्यों के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मनुष्यों के मध्य बन रहा है और यह मनुष्यों के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। आज के राज्य में जो मेरे लोग हैं, उनमें से ऐसा कौन है जो मानवों में मानव नहीं है? तुम लोगों में से कौन मानवीय स्थिति से बाहर है? जब भीड़ के सामने मेरे प्रारम्भ बिन्दु का ऐलान किया जायेगा, तो लोग कैसे प्रतिक्रिया देंगे? तुम सबने अपनी आंखों से मानवजाति की दशा देखी है; निश्चय ही तुम लोग अब भी इस संसार में हमेशा के लिए बने रहने की आशा नहीं कर रहे हो? अब मैं अपने लोगों के मध्य चल रहा हूँ, और उनके मध्य रह रहा हूँ। आज जो लोग मेरे लिए वास्तविक प्रेम रखते हैं, ऐसे लोग धन्य हैं। धन्य हैं वे लोग जो मुझे समर्पित हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में रहेंगे। धन्य हैं वे लोग जो मुझे जानते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में शक्ति प्राप्त करेंगे। धन्य हैं वे जो मुझे खोजते हैं, वे निश्चय ही शैतान के बंधनों से स्वतंत्र होंगे और मेरे आशीषों का आनन्द लेंगे। धन्य हैं वे लोग जो अपनी दैहिक-इच्छाओं को मेरे लिए त्यागते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे राज्य की प्रचुरता पाएंगे। जो लोग मेरी खातिर दौड़-भाग करते हैं उन्हें मैं याद रखूंगा, जो लोग मेरे लिए व्यय करते हैं, मैं उन्हें आनन्द से गले लगाऊंगा, और जो लोग मुझे भेंट देते हैं, मैं उन्हें आनन्द दूंगा। जो लोग मेरे वचनों में आनन्द प्राप्त करते हैं, उन्हें मैं आशीष दूंगा; वे निश्चय ही ऐसे खम्भे होंगे जो मेरे राज्य में शहतीर को थामेंगे, वे निश्चय ही मेरे घर में अतुलनीय प्रचुरता को प्राप्त करेंगे और उनके साथ कोई तुलना नहीं कर पाएगा। क्या तुम लोगों ने कभी मिलने वाले आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुमने उन वादों को खोजा जो तुम्हारे लिए किए गए थे? तुम लोग निश्चय ही मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति को नहीं खोओगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी होगे। तुम लोग निश्चय ही शैतान के सामने विजेता बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन के समय, मेरी विजय की गवाही देने के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही सिनिम के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम लोग जो कष्ट सह रहे हो, उनसे तुम मेरे आशीष प्राप्त करोगे और निश्चय ही सकल ब्रह्माण्ड में मेरी महिमा का विस्तार करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 19' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 582

मेरे वचन ज्यों-ज्यों पूर्णता तक पहुँचते हैं, पृथ्वी पर धीरे-धीरे राज्य बनता जाता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्यता की ओर लौटता है, और इस प्रकार पृथ्वी पर वह राज्य स्थापित हो जाता है जो मेरे हृदय में है। राज्य में, परमेश्वर के सभी लोग सामान्य मनुष्य का जीवन पुनः प्राप्त कर लेते हैं। पाले वाली शीत ऋतु विदा हुई, उसका स्थान वासंती नगरों के संसार ने ले लिया है, जहाँ पूरे साल बहार रहती है। मनुष्य का उदास और अभागा संसार अब लोगों के सामने नहीं रह गया है, और न ही वे मनुष्य के संसार की ठण्डी सिहरन सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ते नहीं हैं, देश एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध में नहीं उतरते हैं, नरसंहार अब और नहीं हैं और न वह लहू जो नरसंहार से बहता है; सारे भूभागों में प्रसन्नता छाई है, और हर जगह मनुष्यों की आपसी गर्माहट से भरी है। मैं पूरे संसार में घूमता हूँ, मैं ऊपर अपने सिंहासन से आनंदित होता हूँ, और मैं तारों के बीच रहता हूँ। और स्वर्गदूत मेरे लिए नए-नए गीत और नए-नए नृत्य प्रस्तुत करते हैं। उनके चेहरों से उनकी अपनी क्षणभंगुरता के कारण अब और आँसू नहीं ढलकते हैं। मैं अब अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनता हूँ, और कोई मुझसे अब और कठिनाई की शिकायत नहीं करता है। आज, तुम सब लोग मेरे सामने रहते हो; कल तुम सब लोग मेरे राज्य में रहोगे। क्या यह सबसे बड़ा आशीष नहीं है जो मैं मनुष्य को देता हूँ? तुम आज जो क़ीमत चुकाते हो, उसके कारण तुम लोग विरासत में भविष्य के आशीष प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के बीच रहोगे। क्या तुम लोग अब भी मेरे आत्मा के सार से जुड़ना नहीं चाहते हो? क्या तुम लोग अब भी अपना वध करना चाहते हो? लोग उन प्रतिज्ञाओं के पीछे भागने को तैयार हैं जिन्हें वे देख सकते हैं, बावजूद इसके वे क्षणभंगुर हैं, परंतु कोई भी आने वाले कल की प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने का इच्छुक नहीं है, बावजूद इसके कि वे अनंत काल तक बनी रहेंगी। मनुष्य को जो चीज़ें दृष्टिगोचर हैं ये वही चीज़ें हैं जिन्हें मैं जड़ से मिटा दूँगा, और जो चीज़ें मनुष्य के लिए दुर्बोध हैं ये वही चीज़ें हैं जिन्हें मैं संपन्न करूँगा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच यही अंतर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 20' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 583

मेरे प्रकाश में, लोग फिर से रोशनी देखते हैं। मेरे वचन में, लोग उन चीज़ों को देखते हैं जिनसे उन्हें आनंद मिलता है। मैं पूरब से आया हूँ, मैं पूरब से हूँ। जब मेरी महिमा चमकती है, तो सभी देश प्रकाशित हो उठते हैं, सभी रोशनी में ले आए जाते हैं, एक भी चीज़ अंधकार में नहीं रहती। राज्य में, परमेश्वर के साथ परमेश्वर के लोग जो जीवन जीते हैं, वह अत्यंत उल्लासमय है। सागर लोगों के आशीषित जीवन पर आनंद से नृत्य करते हैं, पर्वत लोगों के साथ मेरी प्रचुरता का आनंद लेते हैं। सभी लोग प्रयास कर रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं, मेरे राज्य में अपनी निष्ठा दिखा रहे हैं। राज्य में, अब न विद्रोह है, न प्रतिरोध है; स्वर्ग और धरती एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इंसान और मैं गहरी भावना के साथ निकट आते हैं, जीवन के मधुर सुख-चैन के माध्यम से, एक-दूसरे की ओर झुक रहे हैं...। इस समय, मैं औपचारिक रूप से स्वर्ग में अपना जीवन आरंभ करता हूँ। अब शैतान का व्यवधान नहीं है, और लोग विश्राम में प्रवेश करते हैं। पूरी कायनात में, मेरे चुने हुए लोग मेरी महिमा में जीते हैं, अतुलनीय रूप से आशीषित हैं, लोग ऐसे नहीं रहते जैसे इंसानों के बीच रहते हैं, बल्कि ऐसे रहते हैं जैसे परमेश्वर के साथ रहते हैं। हर इंसान शैतान की भ्रष्टता से गुज़रा है, और उसने पूरी तरह से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव लिए हैं। अब, मेरी रोशनी में रहते हुए, कोई आनंद कैसे न उठाएगा? कोई इस खूबसूरत पल को यों ही कैसे छोड़ देगा और हाथ से कैसे जाने देगा? तुम लोग! मेरे लिए अपने दिलों के गीत गाओ और खुशी से नाचो! अपने सच्चे दिलों को उन्नत करो और उन्हें मुझे अर्पित करो! ढोल बजाओ और मेरे लिए खुशी से क्रीड़ा करो! मैं पूरी कायनात भर में अपनी प्रसन्नता बिखेरता हूँ! मैं सभी लोगों के सामने अपना महिमामय चेहरा प्रकट करता हूँ! मैं ऊँची आवाज़ में पुकारूँगा! मैं कायनात की सीमाओं के परे जाँऊगा! मैं पहले ही लोगों के मध्य शासन करता हूँ! लोगों ने मेरा उत्कर्ष किया है! मैं ऊपर नीले आसमान में बहता हूँ और लोग मेरे साथ चलते हैं। मैं लोगों के मध्य चलता हूँ और मेरे लोग मुझे घेर लेते हैं! लोगों के दिल प्रसन्नचित्त हैं, उनके गीत कायनात को हिलाते हैं, आकाश फाड़ देते हैं! अब कायनात धुंध से घिरी हुई नहीं है; अब न कीचड़ है, न मल का जमाव है। कायनात के पवित्र लोगो! मेरी निगरानी में, तुम अपना असली चेहरा दिखाते हो। तुम लोग मल से ढके हुए इंसान नहीं हो, बल्कि हरिताश्म की तरह निर्मल संत हो, तुम सब लोग मेरे प्रिय हो, तुम सब लोग मेरा आनंद हो! हर चीज़ पुन: जीवन को प्राप्त होती है! सभी संत स्वर्ग में मेरी सेवा के लिए लौट आए हैं, मेरे स्नेहपूर्ण आलिंगन में प्रवेश कर रहे हैं, अब वे विलाप नहीं कर रहे, अब वे बेचैन नहीं हैं, वे स्वयं को मुझे अर्पित कर रहे हैं, मेरे घर वापस आ रहे हैं, और वे अपनी जन्मभूमि में बिना रुके मुझसे प्रेम करेंगे! यह अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय होगा! कहाँ है दुख! कहाँ हैं आँसू! कहाँ है देह! धरती गुज़र जाती है, मगर स्वर्ग सदा के लिए हैं। मैं सभी लोगों के समक्ष प्रकट होता हूँ, और सभी लोग मेरी स्तुति करते हैं। यह जीवन, यह सुंदरता, चिरकाल से समय के अंत तक, बदलेगी नहीं। यही राज्य का जीवन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'ओ लोगो! आनंद मनाओ!' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 584

मैंने तुम लोगों के बीच बहुत काम किया है और निस्संदेह, बहुत से कथन भी कहे हैं। फिर भी मुझे महसूस होता है कि मेरे वचनों और कार्य ने अंत के दिनों में मेरे कार्य के उद्देश्य को अच्छी तरह से पूरा नहीं किया है। क्योंकि, अंत के दिनों में, मेरा कार्य किसी विशेष व्यक्ति या विशेष लोगों के लिए नहीं है, बल्कि मेरे अन्तर्निहित स्वभाव को प्रदर्शित करने के लिए है। लेकिन, असंख्य कारणों से—संभवतः समय की कमी या कार्य की व्यस्तता के कारण—लोगों ने मेरे स्वभाव से मेरे बारे में कोई ज्ञान प्राप्त नहीं किया है। इसलिए मैं अपनी नयी योजना की ओर, अपने अंतिम कार्य की ओर कदम बढ़ाता हूँ और अपने कार्य में एक नया पन्ना खोलता हूँ, ताकि वे सब जो मुझे देखते हैं, मेरे अस्तित्व के कारण लगातार अपनी छाती पीटेंगे, रोएँगे और निरंतर विलाप करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं संसार में मनुष्यों का अंत करता हूँ, और इस समय से, मैं मनुष्यों के सामने अपने सम्पूर्ण स्वभाव को प्रकट करता हूँ, ताकि वे सभी लोग जो मुझे जानते हैं, और जो नहीं जानते, अपनी आँखों को तृप्त कर सकें और देखें कि मैं वास्तव में मनुष्यों के संसार में आ गया हूँ, पृथ्वी पर आ गया हूँ, जहाँ सभी चीज़ें गुणात्मक रूप से बढ़ती रहती हैं। मनुष्यों के सृजन के समय से यह मेरी योजना है, तथा मेरी एकमात्र "स्वीकारोक्ति" है। तुम लोग अपना अखण्ड ध्यान मेरी प्रत्येक गतिविधि पर दो, क्योंकि मेरी छड़ी एक बार फिर मनुष्यों के, मेरा विरोध करने वालों के पास आती है।

स्वर्ग के साथ मिलकर, मैं उस कार्य को आरंभ करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। इसलिए मैं लोगों की भीड़ के बीच से निकलता हूँ, आसमान और पृथ्वी के बीच विचरण करता हूँ और किसी को भी मेरी गतिविधियों की भनक नहीं पड़ती, न कोई मेरे वचनों पर ध्यान देता है। इसलिये, मेरी योजना निरंतर अबाध गति से चलती रहती है। बात केवल इतनी ही है कि तुम्हारी सभी इंद्रियाँ इतनी सुन्न हो गई हैं कि तुम लोग मेरे कार्य के चरणों के प्रति अनजान रहते हो। किन्तु, निश्चित रूप से एक दिन आएगा, जब तुम लोग मेरे इरादों को जान जाओगे। आज, मैं तुम लोगों के साथ रहता हूँ और तुम लोगों के साथ ही दुःख सहता हूँ, मैंने बहुत पहले ही मेरे प्रति इंसान की जो प्रवृत्ति है, उसे समझ लिया है। मैं इसके बारे में और बात नहीं करना चाहता, और तुम्हें शर्मिंदा करने के लिये इस कष्टदायक विषय की अन्य घटनाओं को तो बिल्कुल नहीं उठाना चाहता। मेरी केवल यही आशा है कि तुम लोग वह सब अपने हृदय में याद रखो, जो तुम लोगों ने किया है ताकि जिस दिन हम पुनः मिलें, उस दिन अपने लेखे-जोखे का मिलान कर सकें। मैं तुम लोगों में से किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहता, क्योंकि मैंने सदैव न्यायपूर्वक, निष्पक्षता और सम्मानपूर्वक कार्य किया है। बेशक, मैं यह भी आशा करता हूँ कि तुम लोग निष्कपट और उदार बनो और ऐसा कुछ न करो जो स्वर्ग, पृथ्वी और तुम्हारे विवेक के विरुद्ध हो। यही एकमात्र चीज़ है जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ। कई लोग बेचैनी और व्यग्रता महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने भयानक गलतियाँ की हैं, और बहुत से लोग स्वयं पर शर्मिंदा होते हैं क्योंकि उन्होंने कभी कोई अच्छा कर्म नहीं किया है। फिर भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने पापों पर शर्मिंदा होने की बजाय, बद से बदतर होते हुए अपने घिनौने चेहरे को—जिसे अभी पूरी तरह से उजागर किया जाना बाकी था—छुपाने वाले मुखौटे को पूरी तरह से फाड़ देते हैं ताकि वे मेरे स्वभाव की परीक्षा ले सकें। मैं किसी एक व्यक्ति के कार्यों की न तो परवाह करता हूँ, न ही उस पर विशेष ध्यान देता हूँ। बल्कि, मैं उस कार्य को करता हूँ जो मुझे करना चाहिए, चाहे यह जानकारी इकट्ठा करना हो, या देश भर में घूमना हो, या कुछ ऐसा करना हो जो मुझे रुचिकर लगता है। मुख्य समयों पर, मैं लोगों के बीच अपने कार्य को, एक भी पल पहले या देर से किये बिना, सहजता और स्थिरता से, मूल योजना अनुसार आगे बढ़ाता हूँ। हालाँकि, मेरे कार्य में हर चरण के साथ कुछ लोगों को त्याग दिया जाता है, क्योंकि मैं उनके चापलूसी भरे तौर-तरीकों और उनकी झूठी आज्ञाकारिता से घृणा करता हूँ। जो मेरे विरोधी हैं, चाहे जानबूझकर या अनजाने में, निश्चित रूप से त्याग दिये जाएँगे। संक्षेप में, मैं चाहता हूँ, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, वे मुझसे दूर हो जाएँ। कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं अपने घर में बचे हुए दुष्टों को छोड़ूँगा नहीं। क्योंकि मनुष्य को दण्ड देने का दिन निकट है, मैं उन सभी नीच आत्माओं को अपने घर से बाहर निकालने की जल्दबाजी नहीं करता, क्योंकि मेरी अपनी एक योजना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 585

अब वह समय आ गया है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंत को निर्धारित करता हूँ, यह वो चरण नहीं जिसमें मैंने मनुष्यों को आकार देना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों और कथनों को, और साथ ही उस मार्ग को जिस पर चलकर उन्होंने मेरा अनुसरण किया है, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उन लोगों ने कैसा आचरण किया है, इन सबको लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी लोग अपने जैसे लोगों के साथ होंगे, जैसा कि मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल, उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता और जिस सीमा तक वे दया के पात्र होते हैं, उसके आधार पर तो बिल्कल भी तय नहीं करता बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह के दण्ड पाते हैं। मैंने अपनी योजना के आरंभ से उसमें एक भी परिवर्तन नहीं किया है। बात केवल इतनी ही है कि जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिनकी ओर मैं अपने वचनों को निर्देशित करता हूँ उनकी संख्या उसी तरह से घटती जा रही है जैसे कि उनकी संख्या घट रही है जिन्हें मैं सही मायनों में स्वीकार करता हूँ। लेकिन, मैं अभी भी यही कहता हूँ कि मेरी योजना में कभी बदलाव नहीं आया है; बल्कि, यह मनुष्य के विश्वास और प्रेम हैं जो हमेशा बदलते रहते हैं, सदैव कम होते हैं, इस हद तक कि प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है कि वह मेरी चापलूसी करने से लेकर मेरे प्रति उदासीन हो जाये या मुझे निकालकर बाहर कर दे। जब तक मैं चिढ़ न जाऊं या घृणा महसूस न करने लगूँ, और अंत में दण्ड न देने लगूँ, तब तक तुम लोगों के प्रति मेरी प्रवृत्ति न तो उत्साहपूर्ण होगी और न ही उत्साहहीन। हालाँकि, तुम लोगों के दंड के दिन भी मैं तुम लोगों को देखूँगा, परंतु तुम लोग अब से मुझे देखने में समर्थ नहीं होगे। चूँकि तुम लोगों के बीच जीवन पहले से ही थकाऊ और सुस्त हो गया है, इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि मैंने रहने के लिये एक अलग परिवेश चुन लिया है ताकि बेहतर रहे कि तुम लोगों के अभद्र शब्दों की चोट से बचूँ और तुम लोगों के असहनीय रूप से गंदे व्यवहार से दूर रहूँ, ताकि तुम लोग मुझे अब और मूर्ख न बना सको या मेरे साथ लापरवाह ढंग से व्यवहार न कर सको। इसके पहले कि मैं तुम लोगों को छोड़कर जाऊँ, मुझे तुम लोगों को ऐसे कर्मों को करने से बचने के लिए आग्रह अवश्य करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं। बल्कि, तुम लोगों को वह करना चाहिए जो सबके लिए सुखद हो, जो सभी मनुष्यों को लाभ पहुँचाता हो, और जो तुम लोगों की अपनी मंज़िल के लिए लाभदायक हो, अन्यथा, आपदा के बीच दुःख उठाने वाला इंसान, और कोई नहीं बल्कि तुम ही होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 586

मेरी दया उन पर होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं को नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का प्रमाण है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह के दुष्टतापूर्ण कर्म कर चुके हैं, किन्तु कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में शायद ही देखी गयी आपदा में डुबा दिये जाएँगे, और वे लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। और केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है, मेरी शक्ति का आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे। वे अवर्णनीय तृप्ति का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे घृणा करता हूँ, उन्हें प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जिसे देखना मुझे आनंद देगा। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के लिए है बल्कि मनुष्य की मंज़िल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह इसलिए है कि सभी लोग मेरे कर्मों और कार्यों को अभिस्वीकार करें। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और उसकी प्रकृति तो बिल्कुल भी नहीं है, जिसने मानवजाति की रचना की है, यह तो मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानवजाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दंड को भोगेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी को देखेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत रुक जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देता है। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि कुछ ही लोग मेरा कर्ज़ा चुका पाये हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने और जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। गहरी पीड़ा के बीच में, तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं माने गए थे, क्योंकि तुम लोगों का विश्वास और प्रेम खोखला था, और तुम लोगों ने स्वयं को केवल डरपोक या कठोर दिखाया। इस सन्दर्भ में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरी चिंता तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने और अपने आप को व्यक्त करने के तरीके को लेकर बनी रहती है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों का अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। चाहे व्यक्ति जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 587

दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार गाद भरने से महासागर मैदानों में बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीज़ों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव-जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। कोई ऐसा पराक्रमी नहीं है, जो इस मानव-जाति के लिए श्रम या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है, जो इस मानव-जाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्य-जाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मनुष्य-जाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्य-जाति, कदम-दर-कदम, क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है, जहाँ से वापसी संभव नहीं है। ऐसी मनुष्य-जाति, जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और दुष्ट की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है : क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है, जिस ओर ऐसी मनुष्य-जाति जा रही है? ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता, कोई परमेश्वर को खुश करने का तरीका नहीं खोजता या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को अपनी जिदपर अड़े रहना चाहिए—कि परमेश्वर इस मानव-जाति के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जिसने उसे मुड़कर एक नज़र देखे बिना ही खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा तैयार की है, एक ऐसी आपदा, जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी दंड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा, जिसे पहले किसी सृजित प्राणी ने कभी अनुभव किया या सुना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी दोहराई नहीं जाएगी। क्योंकि परमेश्वर की योजना मनुष्य-जाति का केवल एक बार सृजन करने और उसे केवल एक बार बचाने की है। यह पहली बार है, और यही अंतिम बार भी है। इसलिए, जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इस बार इंसान को बचाता है, उसे कोई नहीं समझ सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 588

मनुष्य आज के कार्य और भविष्य के कार्य को तो थोड़ा समझता है, किंतु वह उस मंज़िल को नहीं समझता, जिसमें मानव-जाति प्रवेश करेगी। एक प्राणी के रूप में मनुष्य को प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए : जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसमें मनुष्य को उसका अनुसरण करना चाहिए; जैसे मैं तुम लोगों को बताता हूँ, वैसे ही तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए। तुम्हारे पास अपने लिए चीज़ों का प्रबंधन करने का कोई तरीका नहीं है, और तुम्हारा स्वयं पर कोई अधिकार नहीं है; सब-कुछ परमेश्वर के आयोजन पर छोड़ दिया जाना चाहिए, और हर चीज़ उसके हाथों में है। यदि परमेश्वर के कार्य ने मनुष्य को एक अंत, एक अद्भुत मंज़िल समय से पहले प्रदान कर दिए होते, और यदि परमेश्वर ने इसका उपयोग मनुष्य को लुभाने और उससे अपना अनुसरण करवाने के लिए किया होता—यदि उसने मनुष्य के साथ कोई सौदा किया होता—तो यह विजय न होती, न ही यह मनुष्य के जीवन को आकार देने के लिए होता। यदि परमेश्वर को मनुष्य के अंत का उपयोग उसे नियंत्रित करने और उसके हृदय को पाने के लिए करना होता, तो इसमें वह मनुष्य को पूर्ण नहीं कर रहा होता, न ही वह मनुष्य को पाने में सक्षम होता, बल्कि इसके बजाय वह मंज़िल का उपयोग मनुष्य को नियंत्रित करने के लिए कर रहा होता। मनुष्य भावी अंत, अंतिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज़ है या नहीं, इससे अधिक और किसी चीज़ की परवाह नहीं करता। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दे दी जाती, और यदि मनुष्य पर विजय से पहले उसे पाने के लिए उपयुक्त मंज़िल दे दी जाती, तो न केवल मनुष्य पर विजय ने अपना परिणाम प्राप्त न किया होता, बल्कि विजय के कार्य का परिणाम भी प्रभावित हो गया होता। अर्थात्, विजय का कार्य मनुष्य के भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीनने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना करने से अपना परिणाम प्राप्त करता है। इसे मनुष्य के साथ सौदा करके, अर्थात् मनुष्य को आशीष और अनुग्रह देकर प्राप्त नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्य को उसकी "स्वतंत्रता" से वंचित करके और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़कर उसकी वफादारी प्रकट करके प्राप्त किया जाता है। यह विजय के कार्य का सार है। यदि मनुष्य को बिलकुल आरंभ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना और न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य इस ताड़ना और न्याय को इस आधार पर स्वीकार कर लेता कि उसके पास भविष्य की संभावनाएँ हैं, और अंत में, सभी प्राणियों द्वारा सृजनकर्ता की शर्त-रहित आज्ञाकारिता और आराधना प्राप्त नहीं होती; वहाँ केवल अंधी, ज्ञान से रहित आज्ञाकारिता ही होती, या फिर मनुष्य परमेश्वर से आँख मूँदकर माँगें करता, और मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असंभव होता। इसके परिणामस्वरूप, विजय के ऐसे कार्य के लिए मनुष्य को प्राप्त करना, या, इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के लिए गवाही देना असंभव होता। ऐसे प्राणी अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते, और वे परमेश्वर के साथ केवल मोल-भाव ही करते; यह विजय न होती, बल्कि करुणा और आशीष होता। मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के सिवाय और कुछ नहीं सोचता, और उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता। और इसलिए, मनुष्य पर विजय में, मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और ऐसी सभी चीज़ों से निपटकर उन्हें मिटा दिया जाना चाहिए, जो उसके द्वारा परमेश्वर की आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं। ऐसा करने से मनुष्य पर विजय के परिणाम प्राप्त कर लिए जाएँगे। परिणामस्वरूप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह ज़रूरी है कि मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और सबसे घातक कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और इसके माध्यम से परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रेम को प्रकट किया जाए, और मानव-जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और उसके अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रेम की शुद्धि होती है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किंतु सभी प्राणियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर केवल जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता; बल्कि वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के लिए, और मनुष्य की आदिम, मूल सदृशता पुन: हासिल करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि मनुष्य पर विजय पाने के बाद परमेश्वर मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता, और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मानव-जाति का प्रबंधन न होता, न ही मनुष्य पर विजय उसके उद्धार के वास्ते होती। मनुष्य पर विजय पाने के बाद उसे प्राप्त करना, और अंततः एक अद्भुत मंज़िल पर उसका आगमन ही उद्धार के समस्त कार्य के केंद्र में है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक खूबसूरत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं, जो सभी प्राणियों के पास होनी चाहिए, और वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित होता : यह मनुष्य को एक निश्चित बिंदु तक ले जा सकता था, किंतु यह मनुष्य को शाश्वत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम न होता। मनुष्य की नियति निर्धारित करने में मनुष्य सक्षम नहीं है, इसके अलावा, वह मनुष्य की भविष्य की संभावनाओं और भविष्य की मंज़िल सुनिश्चित करने में भी सक्षम नहीं है। किंतु परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य भिन्न है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजा है, इसलिए वह उसकी अगुआई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा और उसे पूरी तरह से प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुआई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य का सृजन किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे सृजनकर्ता द्वारा किया जाता है। यद्यपि विजय का कार्य मनुष्य को भविष्य की संभावनाओं से वंचित करके प्राप्त किया जाता है, फिर भी अंततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर अवश्य लाया जाना चाहिए, जिसे परमेश्वर द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आकार देने के कारण ही मनुष्य के पास एक मंज़िल है और उसका भाग्य सुनिश्चित है। यहाँ उल्लिखित उपयुक्त मंज़िल, अतीत में शुद्ध की गईं मनुष्य की आशाएँ और भविष्य की संभावनाएँ नहीं हैं; ये दोनों भिन्न हैं। जिन चीज़ों की मनुष्य आशा और खोज करता है, वे मनुष्य की नियत मंज़िल के बजाय, देह की फिज़ूल अभिलाषाओं के अनुसरण से उत्पन्न लालसाएँ हैं। इस बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वह उसे शुद्ध किए जाने के बाद देय ऐसे आशीष और प्रतिज्ञाएँ हैं, जिन्हें परमेश्वर ने संसार के सृजन के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जो मनुष्य की पसंद, धारणाओं, कल्पनाओं या देह के द्वारा दूषित नहीं हैं। यह मंज़िल किसी व्यक्ति-विशेष के लिए तैयार नहीं की गई है, बल्कि यह संपूर्ण मानव-जाति के लिए विश्राम का स्थल है। और इसलिए, यह मंज़िल मानव-जाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 589

सृजनकर्ता सृष्टि के सभी प्राणियों का आयोजन करने का इरादा रखता है। तुम्हें उसके द्वारा की जाने वाली किसी भी चीज़ को ठुकराना या उसकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए, न ही तुम्हें उसके प्रति विद्रोही होना चाहिए। जब उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य अंततः उसके लक्ष्य हासिल करेगा, तो वह इसमें महिमा प्राप्त करेगा। आज ऐसा क्यों नहीं कहा जाता कि तुम मोआब के वंशज हो, या बड़े लाल अजगर की संतान हो? क्यों चुने हुए लोगों के बारे में कोई बातचीत नहीं होती, और केवल सृजित प्राणियों के बारे में ही बातचीत होती है? सृजित प्राणी—यह मनुष्य का मूल नाम था, और यही उसकी स्वाभाविक पहचान है। नाम केवल इसलिए अलग-अलग होते हैं, क्योंकि कार्य के युग और काल अलग-अलग होते हैं; वास्तव में, मनुष्य एक साधारण प्राणी है। सभी प्राणियों को, चाहे वे अत्यंत भ्रष्ट हों या अत्यंत पवित्र, एक प्राणी का कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। जब परमेश्वर विजय का कार्य करता है, तो वह तुम्हारे भविष्य की संभावनाओं, भाग्य या मंज़िल का उपयोग करके तुम्हें नियंत्रित नहीं करता। वास्तव में इस तरह से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है। विजय के कार्य का लक्ष्य मनुष्य से एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का पालन करवाना है, उससे सृजनकर्ता की आराधना करवाना है; केवल इसके बाद ही वह अद्भुत मंज़िल में प्रवेश कर सकता है। मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : हमेशा अपनी ओर से भाग-दौड़ करते रहने और व्यस्त रहने के बावजूद मनुष्य स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम तब भी एक सृजित प्राणी होते? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मनुष्य के वास्ते होता है। उदाहरण के लिए, स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को लो, जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया : चंद्रमा, सूर्य और तारे, जिन्हें उसने मनुष्य के लिए बनाया, जानवर और पेड़-पौधे, बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए हैं। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, पर यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण इसलिए किया जाता है, ताकि वह जीवित रह सके। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 590

एक बार जब विजय का कार्य पूरा कर लिया जाएगा, तब मनुष्य को एक सुंदर संसार में लाया जाएगा। निस्संदेह, यह जीवन तब भी पृथ्वी पर ही होगा, किंतु यह मनुष्य के आज के जीवन के बिलकुल विपरीत होगा। यह वह जीवन है, जो संपूर्ण मानव-जाति पर विजय प्राप्त कर लिए जाने के बाद मानव-जाति के पास होगा, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए एक नई शुरुआत होगी, और मनुष्य के पास इस प्रकार का जीवन होना इस बात का सबूत होगा कि मनुष्य ने एक नए और सुंदर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। यह पृथ्वी पर मनुष्य और परमेश्वर के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुंदर जीवन का आधार ऐसा होना चाहिए, कि मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने और उस पर विजय पा लिए जाने के बाद वह परमेश्वर के सम्मुख समर्पण कर दे। और इसलिए, मानव-जाति के अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने से पहले विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन ही पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य का जीवन है, पृथ्वी पर सबसे अधिक सुंदर जीवन, उस प्रकार का जीवन जिसकी लालसा मनुष्य करता है, और उस प्रकार का जीवन, जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी प्राप्त नहीं किया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबधंन के कार्य का अंतिम परिणाम है, यह वही है जिसकी मानव-जाति सर्वाधिक अभिलाषा करती है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी है। किंतु यह प्रतिज्ञा तुरंत पूरी नहीं हो सकती : मनुष्य भविष्य की मंज़िल में केवल तभी प्रवेश करेगा, जब अंत के दिनों का कार्य पूरा कर लिया जाएगा और उस पर पूरी तरह से विजय पा ली जाएगी, अर्थात् जब शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया जाएगा। शुद्ध कर दिए जाने के बाद मनुष्य पापपूर्ण स्वभाव से रहित हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर दिया होगा, अर्थात् विरोधी ताक़तों द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं होगा, और कोई विरोधी ताक़तें नहीं होंगी जो मनुष्य की देह पर आक्रमण कर सकें। और इसलिए मनुष्य स्वतंत्र और पवित्र होगा—वह शाश्वतता में प्रवेश कर चुका होगा। अंधकार की विरोधी ताकतों को बंधन में रखे जाने पर ही मनुष्य जहाँ कहीं जाएगा, वहाँ स्वतंत्र होगा, और इसलिए वह विद्रोहशीलता या विरोध से रहित होगा। बस शैतान को क़ैद में रखना है, और मनुष्य के साथ सब ठीक हो जाएगा; वर्तमान स्थिति इसलिए विद्यमान है, क्योंकि शैतान अभी भी पृथ्वी पर हर जगह परेशानियाँ खड़ी करता है, और क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन का सपूर्ण कार्य अभी तक समाप्ति पर नहीं पहुँचा है। एक बार जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, तो मनुष्य पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा; जब मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त कर लेगा और शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बाहर आ जाएगा, तो वह धार्मिकता के सूर्य को देखेगा। सामान्य मनुष्य के लिए उचित जीवन पुन: प्राप्त कर लिया जाएगा; वह सब, जो सामान्य मनुष्य के पास होना चाहिए—जैसे भले और बुरे में भेद करने की योग्यता, और इस बात की समझ कि किस प्रकार भोजन करना है और किस प्रकार कपड़े पहनने हैं, और सामान्य मानव-जीवन जीने की योग्यता—यह सब पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा। यदि हव्वा को साँप द्वारा प्रलोभन न दिया गया होता, तब शुरुआत में मनुष्य के सृजन के बाद उसके पास ऐसा ही सामान्य जीवन होना चाहिए था। उसे पृथ्वी पर भोजन करना, कपड़े पहनना और सामान्य मानव-जीवन जीना चाहिए था। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट हो जाने के बाद यह जीवन एक अप्राप्य भ्रम बन गया, यहाँ तक कि आज भी मनुष्य ऐसी चीज़ों की कल्पना करने का साहस नहीं करता। वास्तव में, यह सुंदर जीवन, जिसकी मनुष्य अभिलाषा करता है, एक आवश्यकता है : यदि मनुष्य ऐसी मंज़िल से रहित होता, तब पृथ्वी पर उसका भ्रष्ट जीवन कभी समाप्त न होता, और यदि ऐसा कोई सुंदर जीवन न होता, तो शैतान के भाग्य का या उस युग का कोई समापन न होता, जिसमें शैतान पृथ्वी पर सामर्थ्य रखता है। मनुष्य को ऐसे क्षेत्र में पहुँचना चाहिए, जो अंधकार की ताक़तों के लिए अगम्य हो, और जब मनुष्य वहाँ पहुँच जाएगा, तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि शैतान को पराजित कर दिया गया है। इस तरह से, एक बार जब शैतान द्वारा कोई व्यवधान नहीं रहेगा, तो स्वयं परमेश्वर मानव-जाति को नियंत्रित करेगा, और वह मनुष्य के संपूर्ण जीवन को आदेशित और नियंत्रित करेगा; केवल तभी शैतान वास्तव में पराजित होगा। आज मनुष्य का जीवन अधिकांशत: गंदगी का जीवन है; वह अभी भी पीड़ा और संताप का जीवन है। इसे शैतान की पराजय नहीं कहा जा सकता; मनुष्य को अभी भी संताप के सागर से बचना है, अभी भी मानव-जीवन की कठिनाइयों से या शैतान के प्रभाव से बचना है, और उसे अभी भी परमेश्वर का बहुत कम ज्ञान है। मनुष्य की समस्त कठिनाई शैतान द्वारा उत्पन्न की गई थी, यह शैतान ही था जो मनुष्य के जीवन में पीड़ा लाया, और शैतान को बंधन में रखने के बाद ही मनुष्य संताप के सागर से पूरी तरह से बचने में सक्षम होगा। किंतु शैतान का बंधन मनुष्य को शैतान के साथ युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बनाकर, मनुष्य के हृदय पर विजय पाने और उसे प्राप्त करने के माध्यम से हासिल किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 591

आज, विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने की मनुष्य की कोशिश ऐसी चीज़ें हैं, जिनकी खोज वह अपने पास पृथ्वी पर समान्य जीवन होने से पहले से कर रहा है, और ये ऐसे उद्देश्य हैं जिनकी तलाश वह शैतान को बंधन में डालने से पहले करता है। सार रूप में, विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने, या अपना भरपूर उपयोग किए जाने की मनुष्य की कोशिश शैतान के प्रभाव से बचने के लिए है : मनुष्य की कोशश विजेता बनने के लिए है, किंतु अंतिम परिणाम उसका शैतान के प्रभाव से बचना ही होगा। केवल शैतान के प्रभाव से बचने से ही मनुष्य पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन, और परमेश्वर की आराधना करने वाला जीवन जी सकता है। आज, विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने की मनुष्य की कोशिश ऐसी चीज़ें हैं, जिनकी खोज पृथ्वी पर सामान्य जीवन पाने से पहले की जाती है। उनकी खोज मुख्य रूप से शुद्ध किए जाने और सत्य को अभ्यास में लाने, और सृजनकर्ता की आराधना करने के लिए की जाती है। यदि मनुष्य पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन, ऐसा जीवन जो कठिनाई या संताप से रहित है, धारण करता है, तो वह विजेता बनने की कोशिश में संलग्न नहीं होगा। "विजेता बनना" और "पूर्ण बनाया जाना" ऐसे उद्देश्य हैं, जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को खोज करने के लिए देता है, और इन उद्देश्यों की खोज के माध्यम से वह मनुष्य द्वारा सत्य को अभ्यास में लाने और एक अर्थपूर्ण जीवन व्यतीत करने का कारण बनता है। इसका उद्देश्य मनुष्य को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना है, और विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने की कोशिश मात्र एक साधन है। यदि भविष्य में मनुष्य अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करता है, तो वहाँ विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने का कोई संदर्भ नहीं होगा; वहाँ हर सृजित प्राणी केवल अपना कर्तव्य निभा रहा होगा। आज मनुष्य से इन चीज़ों की खोज केवल उसके लिए एक दायरा परिभाषित करने हेतु करवाई जाती है, ताकि मनुष्य की खोज अधिक लक्षित और अधिक व्यावहारिक हो सके। अन्यथा, मनुष्य अस्पष्ट अन्यमनस्कता के बीच रहता और शाश्वत जीवन में प्रवेश का अनुसरण करता, और यदि ऐसा होता, तो क्या मनुष्य और भी अधिक दयनीय न होता? इस तरह से लक्ष्यों या सिद्धांतों के बिना खोज करना—क्या यह आत्म-वंचना नहीं है? अंततः, यह खोज स्वाभाविक रूप से निष्फल होती; अंत में, मनुष्य अभी भी शैतान के अधिकार-क्षेत्र में जीवन बिताता और स्वयं को उससे छुड़ाने में अक्षम होता। स्वयं को ऐसी लक्ष्यहीन खोज के अधीन क्यों किया जाए? जब मनुष्य शाश्वत मंज़िल में प्रवेश करेगा, तो मनुष्य सृजनकर्ता की आराधना करेगा, और चूँकि मनुष्य ने उद्धार प्राप्त कर लिया है और शाश्वतता में प्रवेश कर लिया है, इसलिए मनुष्य किसी उद्देश्य की खोज नहीं करेगा, इसके अतिरिक्त, न ही उसे शैतान द्वारा घेरे जाने की चिंता करने की आवश्यकता होगी। इस समय मनुष्य अपने स्थान को जानेगा और अपना कर्तव्य निभाएगा, और भले ही लोगों को ताड़ना न दी जाए या उनका न्याय न किया जाए, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाएगा। उस समय मनुष्य पहचान और हैसियत दोनों से एक प्राणी होगा। तब ऊँच और नीच का भेद नहीं रहेगा; प्रत्येक व्यक्ति बस एक भिन्न कार्य करेगा। फिर भी मनुष्य एक मंज़िल में जीवन बिताएगा, जो मानव-जाति के लिए एक व्यवस्थित और उपयुक्त मंज़िल होगी; मनुष्य सृजनकर्ता की आराधना करने के वास्ते अपना कर्तव्य निभाएगा, और यही वह मानव-जाति होगी, जो शाश्वतता की मानव-जाति बनेगी। उस समय, मनुष्य ने परमेश्वर द्वारा रोशन किया गया जीवन प्राप्त कर लिया होगा, ऐसा जीवन जो परमेश्वर की देखरेख और संरक्षण के अधीन है, ऐसा जीवन जो परमेश्वर के साथ है। मानव-जाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीएगी, और सभी लोग सही मार्ग में प्रवेश करेंगे। 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना ने शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया होगा, अर्थात् परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय की उसकी मूल छवि पुनः प्राप्त कर ली होगी, और इस प्रकार, परमेश्वर का मूल इरादा पूरा हो गया होगा। शुरुआत में, शैतान द्वारा मानव-जाति को भ्रष्ट किए जाने से पहले, मानव-जाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीती थी। बाद में, जब मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो मनुष्य ने इस सामान्य जीवन को गँवा दिया, और इसलिए, मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनः प्राप्त करने के लिए परमेश्वर का प्रबधंन-कार्य और शैतान के साथ उसका युद्ध शुरू हुआ। जब परमेश्वर का 6,000-वर्षीय कार्य समाप्ति पर पहुँचेगा, केवल तभी पृथ्वी पर संपूर्ण मानव-जाति का जीवन आधिकारिक रूप से आरंभ होगा, केवल तभी मनुष्य के पास एक अद्भुत जीवन होगा, और परमेश्वर आरंभ में मनुष्य के सृजन के प्रयोजन को और साथ ही मनुष्य की मूल सदृशता को पुनः प्राप्त करेगा। और इसलिए, एक बार जब मनुष्य के पास पृथ्वी पर मानव-जाति का सामान्य जीवन होगा, तो मनुष्य विजेता बनने या पूर्ण बनाए जाने की कोशिश नहीं करेगा, क्योंकि मनुष्य पवित्र होगा। जिस "विजेता" और "पूर्ण बनाए जाने" के बारे में लोग बात करते हैं, वे ऐसे उद्देश्य हैं, जो मनुष्य को परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध के दौरान खोज करने के लिए दिए गए हैं, और वे केवल इसलिए अस्तित्व में हैं, क्योंकि मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। ऐसा है कि तुम्हें एक उद्देश्य देने और तुमसे उस उद्देश्य के लिए प्रयास करवाने से शैतान पराजित हो जाएगा। तुमसे विजेता बनने या तुम्हें पूर्ण बनाए जाने या उपयोग किए जाने के लिए कहना यह आवश्यक बनाता है कि तुम शैतान को लज्जित करने के लिए गवाही दो। अंत में, मनुष्य पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन जीएगा, और मनुष्य पवित्र होगा; जब ऐसा होगा, तो क्या लोग फिर भी विजेता बनना चाहेंगे? क्या वे सभी सृष्टि के प्राणी नहीं हैं? विजेता बनने और पूर्ण होने की बात करें, तो ये वचन शैतान की ओर, और मनुष्य की मलिनता की ओर निर्देशित हैं। क्या यह "विजेता" शब्द शैतान पर और विरोधी ताक़तों पर विजय के संदर्भ में नहीं है? जब तुम कहते हो कि तुम्हें पूर्ण बना दिया गया है, तो तुम्हारे भीतर क्या पूर्ण बनाया गया है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने स्वयं को अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अलग कर लिया है, ताकि तुम परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम प्राप्त कर सको? ऐसी बातें मनुष्य के भीतर की गंदी चीज़ों के संबंध में, और शैतान के संबंध में कही जाती हैं; उन्हें परमेश्वर के संबंध में नहीं कहा जाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 592

जब मनुष्य पृथ्वी पर मनुष्य का असली जीवन प्राप्त कर लेगा और शैतान की सभी ताक़तों को बंधन में डाल दिया जाएगा, तब मनुष्य आसानी से पृथ्वी पर जीवन-यापन करेगा। चीज़ें उतनी जटिल नहीं होंगी, जितनी आज हैं : मानवीय रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, जटिल पारिवारिक रिश्ते—वे इतनी परेशानी, इतना दर्द लेकर आते हैं! यहाँ मनुष्य का जीवन कितना दयनीय है! एक बार मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, तो उसका दिल और दिमाग बदल जाएगा : उसके पास ऐसा हृदय होगा, जो परमेश्वर पर श्रद्धा रखेगा और उससे प्रेम करेगा। एक बार जब विश्व के ऐसे लोगों पर, जो परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हैं, विजय पा ली जाएगी, अर्थात् एक बार जब शैतान को हरा दिया जाएगा, और एक बार जब शैतान को—अंधकार की सभी ताक़तों को—बंधन में डाल दिया जाएगा, तो पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन कष्टहीन हो जाएगा, और वह पृथ्वी पर आज़ादी से जीवन जीने में सक्षम हो जाएगा। यदि मनुष्य का जीवन दैहिक रिश्तों और देह की जटिलताओं से रहित होता, तो यह बहुत अधिक आसान होता। मनुष्य के दैहिक रिश्ते बहुत जटिल होते हैं, और मनुष्य के लिए ऐसी चीज़ों का होना इस बात का प्रमाण है कि उसने स्वयं को अभी तक शैतान के प्रभाव से मुक्त नहीं किया है। यदि अपने प्रत्येक भाई-बहन के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, यदि अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, तो तुम्हें कोई चिंता न होती और किसी के बारे में चिंता करने की आवश्यकता न होती। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, और इस तरह से मनुष्य को उसकी आधी तकलीफों से मुक्ति मिल गई होती। पृथ्वी पर एक सामान्य मानवीय जीवन जीने से मनुष्य स्वर्गदूतों के समान होगा; यद्यपि अभी भी वह देह का प्राणी होगा, फिर भी वह स्वर्गदूत के समान होगा। यही वह अंतिम प्रतिज्ञा है, आख़िरी वादा, जो मनुष्य को प्रदान किया गया है। आज मनुष्य ताड़ना और न्याय से होकर गुज़रता है; क्या तुम सोचते हो कि मनुष्य का इन चीज़ों का अनुभव अर्थहीन है? क्या ताड़ना और न्याय का कार्य बिना किसी कारण के किया जा सकता है? पहले ऐसा कहा गया है कि मनुष्य को ताड़ना देना और उसका न्याय करना उसे अथाह गड्ढे में डालना है, जिसका अर्थ है उसके भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीन लेना। यह एक चीज़ के वास्ते है : मनुष्य का शुद्धिकरण। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को जानबूझकर अथाह गड्ढे में डाला जाता है, जिसके बाद परमेश्वर उससे अपना पीछा छुड़ा लेता है। इसके बजाय, यह मनुष्य के भीतर की विद्रोहशीलता से निपटने के लिए है, ताकि अंत में मनुष्य के भीतर की चीज़ों को शुद्ध किया जा सके, ताकि उसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सके और वह एक पवित्र इंसान के समान हो सके। यदि ऐसा कर लिया जाता है, तो सब-कुछ पूरा हो जाएगा। वास्तव में, जब मनुष्य के भीतर की उन चीज़ों से निपटा जाता है जिनसे निपटा जाना है, और मनुष्य ज़बर्दस्त गवाही देता है, तो शैतान भी परास्त हो जाएगा, और यद्यपि उन चीज़ों में से कुछ चीज़ें हो सकती हैं, जो मूल रूप से मनुष्य के भीतर हों, जिन्हें पूरी तरह से शुद्ध न किया गया हो, फिर भी एक बार जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो वह अब और समस्या खड़ी नहीं करेगा, और उस समय मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर लिया गया होगा। मनुष्य ने कभी भी ऐसे जीवन का अनुभव नहीं किया है, किंतु जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तब सब-कुछ व्यवस्थित हो जाएगा और मनुष्य के भीतर की उन सभी तुच्छ चीज़ों का समाधान हो जाएगा; एक बार जब मुख्य समस्या को सुलझा दिया जाएगा, तो अन्य सभी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी। पृथ्वी पर परमेश्वर के इस देहधारण के दौरान, जब वह मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो वह सब कार्य जिसे वह करता है, शैतान को हराने के लिए है, और वह मनुष्य पर विजय पाने और तुम लोगों को पूर्ण करने के माध्यम से शैतान को हराएगा। जब तुम लोग ज़बर्दस्त गवाही दोगे, तो यह भी शैतान की हार का एक चिह्न होगा। शैतान को हराने के लिए पहले मनुष्य पर विजय पाई जाती है और अंततः उसे पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाता है। किंतु, सार रूप में, शैतान की हार के साथ-साथ यह संताप के इस खाली सागर से संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार भी है। कार्य चाहे संपूर्ण जगत में किया जाए या चीन में, यह सब शैतान को हराने और संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार करने के लिए है, ताकि मनुष्य विश्राम के स्थान में प्रवेश कर सके। देहधारी परमेश्वर, यह सामान्य देह, निश्चित रूप से शैतान को हराने के वास्ते है। देह में परमेश्वर के कार्य का उपयोग स्वर्ग के नीचे के उन सभी लोगों का उद्धार करने के लिए किया जाता है, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, यह संपूर्ण मानव-जाति पर विजय पाने, और इसके अतिरिक्त, शैतान को हराने के वास्ते है। परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के मर्म को संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार करने के लिए शैतान की पराजय से अलग नहीं किया जा सकता। क्यों इस कार्य में अधिकांशतः तुम लोगों से हमेशा गवाही देने की बात की जाती है? और यह गवाही किसकी ओर निर्देशित है? क्या यह शैतान की ओर निर्देशित नहीं है? यह गवाही परमेश्वर के लिए दी जाती है और यह प्रमाणित करने के लिए दी जाती है कि परमेश्वर के कार्य ने अपना परिणाम प्राप्त कर लिया है। गवाही देना शैतान को हराने के कार्य से संबंधित है; यदि शैतान के साथ कोई युद्ध न होता, तो मनुष्य से गवाही देने की अपेक्षा न की जाती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि शैतान को हराया जाना चाहिए, उसी समय, मनुष्य को बचाने के रूप में, परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे, जिसका उपयोग वह मनुष्य का उद्धार करने और शैतान के साथ युद्ध करने के लिए करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य उद्धार का लक्ष्य और शैतान को हराने का एक साधन दोनों है, और इसलिए मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबधंन-कार्य के केंद्रीय भाग में है, और शैतान महज विनाश का लक्ष्य है, शत्रु है। तुम्हें लग सकता है कि तुमने कुछ नहीं किया है, किंतु तुम्हारे स्वभाव में बदलावों के कारण गवाही दे दी गई है, और यह गवाही शैतान की ओर निर्देशित है और यह मनुष्य के लिए नहीं दी गई है। मनुष्य ऐसी गवाही का आनंद लेने के लिए उपयुक्त नहीं है। वह परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को कैसे समझ सकता है? परमेश्वर की लड़ाई का लक्ष्य शैतान है; इस बीच मनुष्य केवल उद्धार का लक्ष्य है। मनुष्य का भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है, और वह इस कार्य को समझने में अक्षम है। यह शैतान की भ्रष्टता के कारण है और मनुष्य में जन्मजात नहीं है, बल्कि शैतान द्वारा निर्देशित किया जाता है। आज परमेश्वर का मुख्य कार्य शैतान को हराना है, अर्थात् मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पाना है, ताकि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की अंतिम गवाही दे सके। इस तरह सभी चीज़ें पूरी कर ली जाएँगी। बहुत-से मामलों में, तुम्हारी खुली आँखों को ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ भी नहीं किया गया है, किंतु वास्तव में कार्य पहले ही पूरा किया जा चुका होता है। मनुष्य अपेक्षा करता है कि पूर्णता का समस्त कार्य दृष्टिगोचर हो, किंतु तुम्हारे लिए इसे दृष्टिगोचर किए बिना ही मैंने अपना कार्य पूरा कर लिया है, क्योंकि शैतान ने समर्पण कर दिया है, जिसका मतलब है कि उसे पूरी तरह से पराजित किया जा चुका है, कि परमेश्वर की बुद्धि, सामर्थ्य और अधिकार सबने शैतान को परास्त कर दिया है। यह ठीक वही गवाही है, जिसे दिया जाना चाहिए, और हालाँकि मनुष्य में इसकी कोई स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं है, हालाँकि यह खुली आँखों देखी नहीं जा सकती, फिर भी शैतान को पहले ही पराजित किया जा चुका है। यह संपूर्ण कार्य शैतान के विरुद्ध निर्देशित है और शैतान के साथ युद्ध के कारण किया जाता है। और इसलिए, ऐसी बहुत-सी चीज़ें हैं, जिन्हें मनुष्य सफल हुई नहीं देखता, किंतु जो परमेश्वर की नज़रों में बहुत समय पहले ही सफलतापूर्वक पूरी कर दी गई थीं। यह परमेश्वर के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाइयों में से एक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 593

उन सभी लोगों के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हर किसी को शांत हो जाना चाहिए : भविष्य में तुम सभी मंज़िल में प्रवेश करोगे। किंतु यदि तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा नहीं रखते, और अद्भुत क्षेत्र में प्रवेश करना नहीं चाहते, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है। वे सभी, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं, वे सभी जो आज्ञापालन करते हैं, और वे सभी जो वफ़ादारी से अपना कार्य करते हैं—ऐसे सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। आज, वे सभी जो वफादारी से अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार नहीं हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते, विशेष रूप से वे जिन्होंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर ली है किंतु उसे अभ्यास में नहीं लाते—ऐसे सभी लोग पूर्ण बनाए जाने में असमर्थ हैं। उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो वफ़ादार होने और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की इच्छा रखते हैं, भले ही वे थोड़े अज्ञानी हों; उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो खोज करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम इस दिशा में खोज करने के इच्छुक हो, तो तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निष्कासित करने का इच्छुक नहीं हूँ, किंतु यदि मनुष्य अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करता, तो वह केवल अपने आप को बरबाद कर रहा है; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निष्कासित करता है, बल्कि वह तुम स्वयं हो। यदि तुम स्वयं अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करते—यदि तुम आलसी हो, या अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, या वफादार नहीं हो, या सत्य की खोज नहीं करते, और हमेशा जैसा चाहते हो वैसा ही करते हो, यदि तुम लापरवाही से व्यवहार करते हो, अपनी प्रसिद्धि और सौभाग्य के लिए लड़ते हो, और विपरीत लिंग के साथ अपने व्यवहार में बेईमान हो, तो तुम अपने पापों के बोझ को स्वयं वहन करोगे; तुम किसी की भी दया के योग्य नहीं हो। मेरा इरादा तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, और कम से कम तुम लोगों पर विजय पाना है, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। यह मायने नहीं रखता कि मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या निम्न क्षमता वाला—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिलकुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का एक अवसर है : बशर्ते तुम तैयार हो, बशर्ते तुम खोज करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुममें से किसी एक को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि तुम निम्न क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निरक्षरता के अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस तथ्य के अनुसार होंगी कि तुम साक्षर हो; यदि तुम बुज़ुर्ग हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम आतिथ्य प्रदान करने में सक्षम हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम आतिथ्य प्रदान नहीं कर सकते और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे वह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी, जो तुम करते हो। वफ़ादार होना, बिल्कुल अंत तक आज्ञापालन करना, और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने की कोशिश करना—यह तुम्हें अवश्य करना चाहिए, और इन तीन चीज़ों से बेहतर कोई अभ्यास नहीं है। अंततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को प्राप्त करे, और यदि वह इन्हें प्राप्त कर सकता है, तो उसे पूर्ण बनाया जाएगा। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच में खोज करनी होगी, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा, और इसके संबंध में निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है, और प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने में सक्षम है, और यह सत्य है, किंतु तुम अपनी खोज में बेहतर होने की कोशिश नहीं करते। यदि तुम ये तीनों मापदंड प्राप्त नहीं करते, तो अंत में तुम्हें अवश्य निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस स्तर तक पहुँचे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबुद्धता हो, और वह बिलकुल अंत तक आज्ञापालन करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है, जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को करना चाहिए। जब तुम सभी लोगों ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया होगा, तो तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा चुका होगा, तुम लोगों के पास ज़बरदस्त गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है, वे सभी ऐसे लोग हैं, जो शैतान के ऊपर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है, और वे ऐसे लोग हैं, जो उस अद्भुत मंज़िल में जीने के लिए बने रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 594

आरंभ में परमेश्वर विश्राम में था। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य या अन्य कुछ भी नहीं था और परमेश्वर ने तब तक किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं किया था। उसने अपने प्रबंधन का कार्य केवल तब आरंभ किया, जब मानवता अस्तित्व में आ गई और जब मानवता भ्रष्ट कर दी गई; उस पल से, उसने विश्राम नहीं किया बल्कि इसके बजाय उसने स्वयं को मानवता के बीच व्यस्त रखना आरंभ कर दिया। मानवता के भ्रष्ट होने की वजह से और प्रधान स्वर्गदूत के विद्रोह के कारण भी परमेश्वर को विश्राम से उठना पड़ा। यदि परमेश्वर शैतान को परास्त नहीं करता और भ्रष्ट हो चुकी मानवता को नहीं बचाता, तो वह पुनः कभी भी विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगा। मनुष्य के समान ही परमेश्वर को भी विश्राम नहीं मिलता और जब वह एक बार फिर विश्राम करेगा, तो मनुष्य भी करेंगे। विश्राम में जीवन का अर्थ है युद्ध के बिना, गंदगी के बिना और स्थायी अधार्मिकता के बिना जीवन। कहने का अर्थ है कि यह जीवन शैतान की रुकावटों (यहाँ "शैतान" शत्रुतापूर्ण शक्तियों के संदर्भ में है) और शैतान की भ्रष्टता से मुक्त है और इसे परमेश्वर विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का ख़तरा नहीं है; यह ऐसा जीवन है, जिसमें हर चीज़ अपनी किस्म का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना कर सकती है और जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह शांत हैं—"मनुष्यों का विश्रामपूर्ण जीवन", इन शब्दों का यही अर्थ है। जब परमेश्वर विश्राम करेगा, तो पृथ्वी पर अधार्मिकता नहीं रहेगी, न ही शत्रुतापूर्ण शक्तियों का फिर कोई आक्रमण होगा और मानवजाति एक नए क्षेत्र में प्रवेश करेगी—शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवता नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवता होगी, जिसे शैतान के भ्रष्ट किए जाने के बाद बचाया गया है। मानवता के विश्राम का दिन ही परमेश्वर के विश्राम का दिन भी होगा। मानवता के विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया था, इसलिए नहीं कि वह मूल रूप से विश्राम करने में असमर्थ था। विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ यह नहीं कि सभी चीज़ों का चलना या विकसित होना बंद हो जाएगा, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर कार्य करना बंद कर देगा या मनुष्यों का जीवन रुक जाएगा। विश्राम में प्रवेश करने का चिह्न होगा जब शैतान नष्ट कर दिया गया है, जब उसके साथ बुरे कामों में शामिल दुष्ट लोग दंडित किए गए हैं और मिटा दिए गए हैं और जब परमेश्वर के प्रति सभी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवता के उद्धार का कार्य अब और नहीं करेगा। मानवता के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवता परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीष के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के बिना जिएगी और कोई अधार्मिकता नहीं होगी। परमेश्वर की देखभाल में मनुष्य सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेंगे। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवता को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा और वे वेअब शैतान के अधिकार क्षेत्र में और नहीं रहेंगे। वैसे तो, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा और मनुष्य लगातार गतिमान नहीं रहेंगे; परमेश्वर और मानवता एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपने मूल स्थान पर लौट जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान पर लौट जाएगा। ये वे गंतव्य हैं, जहाँ परमेश्वर का समस्त प्रबंधन पूरा होने पर परमेश्वर और मनुष्य रहेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मानवता के पास मानवता की। विश्राम करते समय, परमेश्वर पृथ्वी पर सभी मनुष्यों के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा, जबकि वे उसके प्रकाश में, स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर अब मानवता के बीच और नहीं रहेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के साथ उसके गंतव्य में रहने में समर्थ होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही क्षेत्र के भीतर नहीं रह सकते; बल्कि दोनों के जीने के अपने-अपने तरीक़े हैं। परमेश्वर वह है, जो समस्त मानवता का मार्गदर्शन करता है और समस्त मानवता परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य का ठोस स्वरूप है। मनुष्य वे हैं, जिनकी अगुआई की जाती है और वे परमेश्वर के सार के समान नहीं हैं। "विश्राम" का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। वह पृथ्वी पर अब और नहीं रहेगा, या मानवता की ख़ुशियाँ या उसके दु:ख साझा नहीं करेगा। जब मनुष्य विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सृष्टि की सच्ची वस्तु बन गए हैं; वे पृथ्वी से परमेश्वर की आराधना करेंगे और सामान्य मानवीय जीवन जिएंगे। लोग अब और परमेश्वर की अवज्ञा या प्रतिरोध नहीं करेंगे और वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएंगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के अपने-अपने जीवन और गंतव्य होंगे। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इसी तरह, अपना प्रबंधन-कार्य पूरा करने के बाद परमेश्वर का विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश अपरिहार्य प्रवृत्ति बन गए हैं। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। जब मनुष्य विश्राम में परमेश्वर की आराधना करते हैं, वे पृथ्वी पर रहेंगे और जब परमेश्वर बाकी मानवता को विश्राम में ले जाएगा, वह स्वर्ग से उनका नेतृत्व करेगा न कि पृथ्वी से। परमेश्वर तब भी पवित्र आत्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों अलग ढंग से विश्राम करते हैं। जब परमेश्वर विश्राम करता है, वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जबकि मनुष्यों को विश्राम के दौरान स्वर्ग की यात्रा करने और साथ ही वहाँ के जीवन का आनंद उठाने के लिए परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाएगी। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व नहीं रहेगा; उसी तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी पृथ्वी पर परमेश्वर को उत्पीड़ित किया था, साथ ही वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिए गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिए गए होंगे। उन दुष्ट लोगों के पूर्ण विनाश के बाद, पृथ्वी फिर कभी शैतान का उत्पीड़न नहीं जानेगी। केवल तब मानवता पूर्ण उद्धार को प्राप्त करेगी और परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्व अपेक्षाएँ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 595

सभी चीज़ों के अंत का पास आना परमेश्वर के कार्य की समाप्ति की ओर और साथ ही मानवता के विकास के अंत का संकेत करता है। इसका अर्थ है कि शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य अपने विकास के अंतिम चरण तक पहुँच गए होंगे और आदम व हव्वा के वंशजों ने अपनी वंश-वृद्धि पूरी कर ली होगी। इसका अर्थ यह भी है कि अब शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मानवता के लिए लगातार विकास करते रहना असंभव होगा। आदम और हव्वा को आरंभ में भ्रष्ट नहीं किया गया था, पर आदम और हव्वा जो अदन की वाटिका से निकाले गए, उन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए थे। जब परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो आदम और हव्वा—जो अदन वाटिका से बाहर निकाले गए थे—और उनके वंशजों का आखिरकार अंत हो जाएगा। भविष्य की मानवता आदम और हव्वा के वंशजों से ही बनेगी, परंतु वे ऐसे लोग नहीं होंगे, जो शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हों। बल्कि ये वे लोग होंगे, जिन्हें बचाया और शुद्ध किया गया है। यह वह मानवता होगी, जिसका न्याय किया गया है और जिसे ताड़ना दी गई है और जो पवित्र है। ये लोग उस मानवजाति के समान नहीं होंगे, जो वह मूल रूप से थी; यह कहा जा सकता है कि वे शुरुआती आदम और हव्वा से पूरी तरह भिन्न प्रकार की मानवता हैं। इन लोगों को उन सभी लोगों में से चुना गया है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया था और ये वे लोग होंगे, जो अंततः परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौरान अडिग रहे हैं; वे भ्रष्ट मानवजाति में से लोगों का अंतिम शेष समूह होंगे। केवल यही लोग परमेश्वर के साथ-साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश कर पाएँगे। जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; वैसे, वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवा भी दी थी। हालाँकि जब अंतिम दिन आएगा, तो भी उन्हें अपनी दुष्टता के कारण और अवज्ञा एवं छुटकारा न पाने की योग्यता के परिणामस्वरूप हटाया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी अस्तित्व में नहीं आएँगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पवित्र जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, बुराई करने वाले सभी अंततः नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होगा; बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था, या वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे हैं। पिछले युगों में जिन लोगों ने बुरा किया और जो उद्धार नहीं प्राप्त कर पाए, निःसंदेह वे दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तबसे अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने उनके बीच अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने दुष्टों का नाश नहीं किया होता, बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो प्रत्येक मनुष्य अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होता और परमेश्वर समस्त मानवता को एक बेहतर क्षेत्र में नहीं ला पाता। ऐसा कार्य पूर्ण नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानवता पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इसी तरीक़े से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 596

आजकल लोग अभी भी देह की चीज़ें छोड़ने में असमर्थ हैं; वे देह के सुख नहीं छोड़ सकते, न वे संसार, धन और अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ पाते हैं। अधिकांश लोग अपनी कोशिशें बेपरवाही से करते हैं। वास्तव में इन लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं; इससे भी बुरा यह है कि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं है और इसलिए वे वह सब नहीं समझ पाते, जो परमेश्वर करता है और वे उसके द्वारा कहे गए वचनों पर विश्वास करने में तो और भी असमर्थ हैं। ऐसे लोग अत्यधिक देह में रमे होते हैं, वे आकंठ भ्रष्ट होते हैं और उनमें पूरी तरह सत्य का अभाव होता है। और तो और, उन्हें विश्वास नहीं कि परमेश्वर देहधारी हो सकता है। जो कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता—अर्थात, जो कोई प्रत्यक्ष परमेश्वर या उसके कार्य और वचनों पर विश्वास नहीं करता और इसके बजाय स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—वह व्यक्ति है, जिसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये लोग विद्रोही हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों में मानवता और तर्क का अभाव होता है, सत्य के बारे में तो कहना ही क्या। इसके अतिरिक्त, इन लोगों के लिए, प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर तो और भी विश्वास के योग्य नहीं है, फिर भी वे अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर को सर्वाधिक विश्वसनीय और खुशी देने वाला मानते हैं। वे जिसे खोजते हैं, वह वास्तविक सत्य नहीं है, न ही वह जीवन का वास्तविक सार है; परमेश्वर की इच्छा तो और भी नहीं। इसके उलट वे रोमांच खोजते हैं। जो भी वस्तुएं उन्हें अधिक से अधिक उनकी इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम बनाती हैं, बिना शक वे वो वस्तुएँ हैं जिनमें उनका विश्वास है और जिसका वे अनुसरण करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं ताकि निजी इच्छाएं पूरी कर पाएं, सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ऐसे लोग बुराई करने वाले नहीं हैं? वे आत्मविश्वास से अत्यधिक भरे हैं, और वे यह बिल्कुल विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उनके जैसे इन "भले लोगों" को नष्ट कर देगा। इसके बजाय, उनका मानना है कि परमेश्वर उन्हें बना रहने देगा और इसके अलावा, उन्हें परमेश्वर के लिए कई चीज़ें करने और उसके प्रति यथेष्ट "वफ़ादारी" दिखाने के कारण उन्हें अच्छी तरह पुरस्कृत करेगा। अगर वे भी प्रत्यक्ष परमेश्वर का भी अनुसरण करते, तो जैसे ही उनकी इच्छाएँ पूरी न होतीं, वे तुरंत परमेश्वर के ख़िलाफ़ जवाबी हमला कर देते या बेहद नाराज़ हो जाते। वे ख़ुद को नीच और अवमानना करने वाले लोगों की तरह दिखाते हैं, जो हमेशा अपनी इच्छाएँ पूरी करना चाहते हैं; वे सत्य की खोज में लगे ईमानदार लोग नहीं हैं। ऐसे लोग वे तथाकथित दुष्ट हैं, जो मसीह के पीछे चलते हैं। जो लोग सत्य की खोज नहीं करते, वे संभवत: सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते और मानवता के भविष्य का परिणाम समझने में और भी अधिक अयोग्य हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी कार्य या वचनों पर विश्वास नहीं करते—और इसमें मानवता के भविष्य के गंतव्य पर विश्वास नहीं कर पाना शामिल है। इसलिए, यदि वे साक्षात परमेश्वर का अनुसरण करते भी हैं, तब भी वे बुरा करेंगे और सत्य को बिल्कुल नहीं खोजेंगे, न ही वे उस सत्य का अभ्यास करेंगे, जिसकी मुझे अपेक्षा है। वे लोग जो यह विश्वास नहीं करते कि वे नष्ट हो जाएंगे, वही लोग असल में नष्ट होंगे। वे सब स्वयं को बहुत चतुर मानते हैं और वे सोचते हैं कि वे ही वो लोग हैं, जो सत्य का अभ्यास करते हैं। वे अपने बुरे आचरण को सत्य मानते हैं और इसलिए उसे सँजोते हैं। ऐसे दुष्ट लोग अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं; वे सत्य को सिद्धांत मानते हैं और अपने बुरे कार्यों को सत्य मानते हैं, लेकिन अंत में, वे केवल वहीं काटेंगे, जो उन्होंने बोया है। लोग जितना अधिक आत्मविश्वासी हैं और जितना अधिक घमंडी हैं, उतना ही अधिक वे सत्य को पाने में असमर्थ हैं; लोग जितना ज़्यादा स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उतना अधिक परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ये वे लोग हैं, जो दंडित किए जाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 597

मानवता के विश्राम में प्रवेश से पहले, हर एक व्यक्ति का दंडित होना या पुरस्कृत होना इस बात पर आधारित होगा कि क्या उन्होंने सत्य की खोज की है, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं और क्या वे प्रत्यक्ष परमेश्वर को समर्पण कर सकते हैं। जिन्होंने प्रत्यक्ष परमेश्वर को सेवा दी है, पर उसे न तो जानते हैं न ही उसे समर्पण करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ऐसे लोग बुराई करने वाले हैं और बुराई करने वाले निःसंदेह दंड के भागी होंगे; इससे अलावा, वे अपने दुष्ट आचरण के अनुसार दंड पाएंगे। परमेश्वर मनुष्यों के विश्वास करने के लिए है और वह उनकी आज्ञाकारिता के योग्य भी है। वे जो केवल अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर को समर्पण करने में असमर्थ हैं। यदि ये लोग तब भी दृश्यमान परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, जब उसका विजय कार्य समाप्त होता है और लगातार अवज्ञाकारी बने रहते हैं और देह में दिखाई देने वाले परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो ये "अज्ञातवादी" बिना संदेह विनाश की वस्तुएँ बन जाएँगे। यह उसी प्रकार है, जैसे तुम सब के बीच के कुछ लोग जो मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को पहचानते हैं, फिर भी देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण के सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, तो वे अंत में हटाने और विनाश की वस्तु बनेंगे। इसके अलावा, जो कोई मौखिक रूप में प्रत्यक्ष परमेश्वर को मानता है, देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है जबकि अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर को भी खोजता है, तो भविष्य में उसके नष्ट होने की और भी अधिक संभावना होगी। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने के बाद उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बचेगा, न ही उस विश्राम के समय, ऐसे लोगों के समान एक भी व्यक्ति बच सकता है। दुष्टात्मा लोग वे हैं, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते; उनका सार प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है और उनमें परमेश्वर के समक्ष समर्पण की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट किए जाएँगे। तुम्हारे पास सत्य है या नहीं और तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो या नहीं, यह तुम्हारे प्रकटन पर या तुम्हारी कभीकभार की बातचीत और आचरण पर नहीं बल्कि तुम्हारे सार पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति का सार तय करता है कि उसे नष्ट किया जाएगा या नहीं; यह किसी के व्यवहार और किसी की सत्य की खोज द्वारा उजागर हुए सार के अनुसार तय किया जाता है। उन लोगों में जो कार्य करने में एक दूसरे के समान हैं, और जो समान मात्रा में कार्य करते हैं, जिनके मानवीय सार अच्छे हैं और जिनके पास सत्य है, वे लोग हैं जिन्हें रहने दिया जाएगा, जबकि वे जिनका मानवीय सार दुष्टता भरा है और जो दृश्यमान परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं, वे विनाश की वस्तु होंगे। परमेश्वर के सभी कार्य या मानवता के गंतव्य से संबंधित वचन प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार उचित रूप से लोगों के साथ व्यवहार करेंगे; थोड़ी-सी भी त्रुटि नहीं होगी और एक भी ग़लती नहीं की जाएगी। केवल जब लोग कार्य करते हैं, तब ही मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होते हैं। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है; वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करता। अभी बहुत से लोग हैं, जो मानवता के भविष्य के गंतव्य को समझने में असमर्थ हैं और वे उन वचनों पर विश्वास नहीं करते, जो मैं कहता हूँ। वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, दुष्टात्मा हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 598

आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंत:करण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं और वे सब विनाश की वस्तु बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है और इसके अलावा, वे नष्ट किए जाएँगे। वे सब जो विश्वास करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब नष्ट होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं, जो शोधन के दुख से गुज़रे हैं और डटे रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुज़रे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे नहीं, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ़ आशीष पाने की फ़िराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनके प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रखते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि आज कल भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा न रखते हुए या परमेश्वर की इच्छाओं को अपनी इच्छा की तरह मानने में असमर्थ रहते हुए, आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं, तो उनके अंत और भी अधिक ख़राब होंगे। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम शत्रु के प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रख सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता की समझ का अभाव नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और निजी भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य होता है? यदि लोग शत्रुओं के प्रति साफ़ अंत:करण रखते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो ज़बानी तौर पर देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। ये सभी लोग विनाश की वस्तु बनेंगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; वे जिनका आचरण अच्छा है, धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है, दुष्ट हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; वह जो परमेश्वर को समर्पित है, धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हो या ग़लत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंज़िल हासिल करने में करना चाहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह ग़लत विश्वास है कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार को देखकर या उनकी बातें सुनकर उसका परिणाम निर्धारित करता है; इसलिए बहुत से लोग परमेश्वर को धोखा देने के लिए इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं, ताकि वह उन पर क्षणिक कृपा कर दे। भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने की इच्छा के साथ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के दुष्ट व्यवहार के प्रति नर्मी कतई नहीं करेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए एक बार स्वयं को खपाने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग तब परमेश्वर के लिए वफ़ादार हैं, जब उन्हें आशीष दिखते हैं और जब उन्हें आशीष नहीं दिखाई देते, तो अपनी वफ़ादारी खो देते हैं और अगर अंत में भी वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं या उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जिसके लिए वे ज़िम्मेदार हैं, तो पहले वफ़ादारी से की गई परमेश्वर की सेवा के बावजूद वे विनाश की वस्तु बनेंगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवता सही मार्ग पर होगी, लोग सामान्य मानवीय जीवन जिएँगे। वे सब अपने-अपने कर्तव्य निभाएँगे और परमेश्वर के प्रति पूर्णतः वफ़ादार होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे और वे अवज्ञा और प्रतिरोध दोनों के बिना परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के कारण जिएंगे। वे पूर्णतः परमेश्वर को समर्पित होने में सक्षम होंगे। यही परमेश्वर और मानवता का जीवन होगा; यह राज्य का जीवन होगा और यह विश्राम का जीवन होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 599

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को कलीसिया में खींचकर लाते हैं, वे बेहद स्वार्थी हैं और सिर्फ़ अपनी दयालुता का प्रदर्शन कर रहे हैं। ये लोग इसकी परवाह किए बिना कि उनका विश्वास है भी या नहीं और यह परमेश्वर की इच्छा है या नहीं, केवल प्रेमपूर्ण बने रहने पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नी को परमेश्वर के सामने लाते हैं या अपने माता-पिता को परमेश्वर के सामने खींचकर लाते हैं और इसकी परवाह किए बिना कि क्या पवित्र आत्मा सहमत है या उनमें कार्य कर रहा है, वे आँखें बंद कर परमेश्वर के लिए "प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते रहते हैं"। इन गैर-विश्वासियों के प्रति दयालुता दिखाने से आखिर क्या लाभ मिल सकता है? यहाँ तक कि अगर वे जिनमें पवित्र आत्मा उपस्थित नहीं है, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए संघर्ष भी करते हैं, तब भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता। जो लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं, उनके लिए वास्तव में इसे प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुज़रे हैं और देहधारी परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, वे पूर्ण बनाए जाने में सर्वथा असमर्थ हैं। इसलिए जिस क्षण से वे नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण आरंभ करते हैं, उन लोगों में पवित्र आत्मा मौजूद नहीं होता। उनकी स्थिति और वास्तविक अवस्थाओं के प्रकाश में, उन्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा व्यय न करने का निर्णय लेता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार का प्रबोधन प्रदान करता है, न उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ चलने की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम प्रकट करेगा—यही पर्याप्त है। मानवता का उत्साह और इच्छाएँ शैतान से आते हैं और किसी भी तरह ये चीज़ें पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण नहीं कर सकतीं। चाहे लोग किसी भी प्रकार के हों, उनमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए। क्या मनुष्य दूसरे मनुष्यों को पूरा कर सकते हैं? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार की इच्छाएँ पालते हैं? क्या उनकी मंशा उनकी खुद की योजनाओं और स्वार्थी आकांक्षाओं को पूरा करने की नहीं है? क्या उनका इरादा वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने का है? क्या वे परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या उनकी मंशा सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की है? वे जो परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के समय से पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पा सकते; ये लोग विनाश की वस्तुओं के रूप में नामित किए गए हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। लोगों का उत्साह और प्रेम, मानवीय इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, पर परमेश्वर की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और न ही वे परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं। यहाँ तक कि अगर कोई उन लोगों के प्रति अत्यधिक प्रेम या दया दिखा भी दे, जो नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके अनुसरण का दिखावा करते हैं, बिना यह जाने कि वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करने का क्या मतलब है, फिर भी वे परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं करेंगे, न ही वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करेंगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमज़ोर काबिलियत वाले हों, और बहुत सी सच्चाइयाँ न समझते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं; लेकिन जो अपेक्षाकृत अच्छी काबिलियत वाले हैं, मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते, वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ही नहीं सकते। ऐसे लोगों के उद्धार की कोई संभावना नहीं है। यदि वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ें या कभी-कभी उपदेश सुनें, या परमेश्वर की स्तुति गाएं, तब भी वे अंतत: विश्राम के समय तक बच नहीं पाएंगे। लोग सचमुच खोजते हैं या नहीं यह इससे निर्धारित नहीं होता कि दूसरे उन्हें कैसे आंकते हैं या आसपास के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि इससे निर्धारित होता है कि क्या पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य करता है और क्या उन्होंने पवित्र आत्मा की उपस्थिति हासिल कर ली है। इसके अतिरिक्त यह इस बात पर निर्भर है कि क्या एक निश्चित अवधि तक पवित्र आत्मा के कार्य से गुज़रने के बाद उनके स्वभाव बदलते हैं और क्या उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान मिला है। यदि किसी व्यक्ति पर पवित्र आत्मा कार्य करेगा, तो धीरे-धीरे उस व्यक्ति का स्वभाव बदल जाएगा और परमेश्वर में विश्वास करने का उसका विचार धीरे-धीरे और शुद्ध होता जाएगा। जब तक लोगों में परिवर्तन होता है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे कितने समय परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रहा है। यदि उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं कर रहा है। ऐसे लोग कुछ सेवा करते भी हैं, तो भी ऐसा करने की प्रेरणा अच्छा भविष्य पाने की आकांक्षा ही होती है। कभी-कभी सेवा करना, उनके स्वभावों में परिवर्तन के अनुभव का स्थान नहीं ले सकती। आख़िरकार वे तब भी नष्ट किए जाएंगे, क्योंकि राज्य में सेवाकर्मियों की आवश्यकता नहीं होगी, न ही उनकी आवश्यकता होगी, जिनका स्वभाव उन लोगों की सेवा के योग्य होने के लिए नहीं बदला है, जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है और जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं। अतीत में बोले गए ये वचन, "जब कोई प्रभु पर विश्वास करता है, तो सौभाग्य उसके पूरे परिवार पर मुस्कराता है" अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, परंतु मानवता के गंतव्य से संबंधित नहीं हैं। ये केवल अनुग्रह के युग के दौरान एक चरण के लिए ही उपयुक्त थे। उन वचनों का अर्थ शांति और भौतिक आशीष पर आधारित था, जिनका लोगों ने आनंद लिया; उनका मतलब यह नहीं था कि प्रभु को मानने वाले का पूरा परिवार बच जाएगा, न ही उनका मतलब था कि जब कोई सौभाग्य पा लेता है, तो पूरे परिवार को भी विश्राम में लाया जा सकता है। किसी को आशीष मिलेगा या दुर्भाग्य सहना पड़ेगा, इसका निर्धारण व्यक्ति के सार के अनुसार होता है, न कि सामान्य सार के अनुसार, जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। इस प्रकार की लोकोक्ति या नियम का राज्य में कोई स्थान है ही नहीं। यदि कोई अंत में बच पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा किया है और यदि कोई विश्राम के दिनों तक बचने में सक्षम नहीं हो पाता, तो इसलिए क्योंकि वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे हैं और उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक के पास एक उचित गंतव्य है। ये गंतव्य प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं और दूसरे लोगों से इनका कोई संबंध नहीं होता। किसी बच्चे का दुष्ट व्यवहार उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता को उसके माता-पिता के साथ साझा किया जा सकता है। माता-पिता का दुष्ट आचरण उनकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, न ही माता-पिता की धार्मिकता उनके बच्चों के साथ साझा की जा सकती है। हर कोई अपने-अपने पाप ढोता है और हर कोई अपने-अपने सौभाग्य का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता; यही धार्मिकता है। मनुष्य के नज़रिए से, यदि माता-पिता अच्छा सौभाग्य पाते हैं, तो उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए, यदि बच्चे बुरा करते हैं, तो उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है और कार्य करने का मनुष्य का तरीक़ा है; यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उसके आचरण से पैदा होने वाले सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीक़े से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; यहाँ तक कि कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह सुनिश्चित है। माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं कि वे अपनी संतान के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं, न ही किसी बच्चे के माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वे अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, "उस समय दो जन खेत में होंगे; एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी; एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।" लोग बुरा करने वाले बच्चों के प्रति गहरे प्रेम के आधार पर उन्हें विश्राम में नहीं ले जा सकते, न ही कोई अपनी पत्नी (या पति) को अपने धार्मिक आचरण के आधार पर विश्राम में ले जा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; किसी के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता। अंत में, धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करते हैं और बुरा करने वाले, बुरा ही करते हैं। अंतत: धार्मिकों को बचने की अनुमति मिलेगी, जबकि बुरा करने वाले नष्ट हो जाएंगे। पवित्र, पवित्र हैं; वे गंदे नहीं हैं। गंदे, गंदे हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं है। जो लोग नष्ट किए जाएँगे, वे सभी दुष्ट हैं और जो बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं होता और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग पूरी तरह असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले एक व्यक्ति के रक्त-संबंधी होते हैं, किंतु एक बार जब उसने विश्राम में प्रवेश कर लिया, तो उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं, उनके शत्रु हैं जो कर्तव्य नहीं करते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, एक दूसरे के उलट हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे, दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी हैं। जो प्राणी अपने कर्तव्य निभाते हैं, बचने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, विनाश की वस्तु बनेंगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा। क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने कर्तव्य पूरा करने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने नास्तिक माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हो? परमेश्वर पर विश्वास करने के मामले में मनुष्य का दृष्टिकोण सही या ग़लत है? तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम क्या पाना चाहते हो? तुम परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग पैदा हुए प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते और जो पूरा प्रयास नहीं कर सकते, वे विनाश की वस्तु बनेंगे। आज लोगों में एक दूसरे के बीच भौतिक संबंध होते हैं, उनके बीच खून के रिश्ते होते हैं, किंतु भविष्य में, यह सब ध्वस्त हो जाएगा। विश्वासी और अविश्वासी संगत नहीं हैं, बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं। वे जो विश्राम में हैं, विश्वास करेंगे कि कोई परमेश्वर है और उसके प्रति समर्पित होंगे, जबकि वे जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं, वे सब नष्ट कर दिए गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; तो माता-पिता या संतानें या पतियों और पत्नियों के बीच के रिश्ते कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की अत्यंत असंगतता से ये संबंध पूरी तरह टूट चुके होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 600

मानवता के बीच मूल रूप से परिवार नहीं थे; केवल एक पुरुष और एक महिला का ही अस्तित्व था—दो भिन्न प्रकार के मनुष्य। कोई देश नहीं थे, परिवारों की तो बात ही छोड़ो, परंतु मानवता की भ्रष्टता के कारण, सभी प्रकार के लोगों ने स्वयं को व्यक्तिगत क़बीलों में संगठित कर लिया, बाद में ये देशों और राष्ट्रों में विकसित हो गए। ये देश और राष्ट्र छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर बने थे और इस तरीक़े से सभी प्रकार के लोग, भाषा की भिन्नताओं और सीमाओं के अनुसार विभिन्न नस्लों में बंट गए। वास्तव में, दुनिया में चाहे कितनी भी नस्लें हों, मानवता का केवल एक ही पूर्वज है। आरंभ में, केवल दो प्रकार के ही मनुष्य थे और ये दो प्रकार पुरुष और स्त्री थे। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की प्रगति, इतिहास की गति और भौगोलिक परिवर्तनों के कारण, विभिन्न अंशों तक ये दो प्रकार के लोग और अधिक प्रकारों में विकसित हो गए। आधारभूत रूप में, मानवता में चाहे कितनी नस्लें शामिल हों, समस्त मानवता अभी भी परमेश्वर का सृजन है। लोग चाहे किसी भी नस्ल से संबंधित हों, वे सब उसका सृजन हैं; वे सब आदम और हव्वा के वंशज हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के हाथों से नहीं बनाए गए थे, फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज हैं, जिन्हें परमेश्वर ने निजी तौर पर सृजित किया। लोग चाहे किसी भी श्रेणी से संबंधित हों, वे सभी उसके प्राणी हैं; चूँकि वे मानवता से संबंधित हैं जिसका सृजन परमेश्वर ने किया था, इसलिए उनकी मंज़िल वही है, जो मानवता की होनी चाहिए और वे उन नियमों के तहत विभाजित किए गए हैं, जो मनुष्यों को संगठित करते हैं। कहने का अर्थ है कि सभी बुरा करने वाले और सभी धार्मिक लोग अंततः प्राणी ही हैं। प्राणी जो बुरा करते हैं अंततः नष्ट किए जाएंगे, और प्राणी जो धार्मिक कर्म करते हैं, बचे रहेंगे। इन दो प्रकार के प्राणियों के लिए यह सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। बुरा करने वाले अपनी अवज्ञा के कारण इनकार नहीं कर सकते कि परमेश्वर की सृष्टि होने पर भी वे शैतान द्वारा क़ब्ज़ा लिए गए हैं और इस कारण बचाए नहीं जा सकते। प्राणी जो स्वयं धार्मिक आचरण करते हैं, इस तथ्य के मुताबिक़ कि वे बच जाएँगे, इनकार नहीं कर सकते कि उन्हें परमेश्वर ने बनाया है और शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद भी उद्धार प्राप्त किया है। बुरा करने वाले ऐसे प्राणी हैं, जो परमेश्वर के लिए अवज्ञाकारी हैं; ये ऐसे प्राणी हैं, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता और वे पहले ही पूरी तरह शैतान की पकड़ में जा चुके हैं। बुराई करने वाले लोग भी मनुष्य ही हैं; वे ऐसे मनुष्य हैं, जो चरम सीमा तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं और जो बचाए नहीं जा सकते। ठीक जिस प्रकार वे भी प्राणी हैं, धार्मिक आचरण वाले लोग भी भ्रष्ट किए गए हैं, परंतु ये वे मनुष्य हैं, जो अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर मुक्त होना चाहते हैं और परमेश्वर को समर्पित होने में सक्षम हैं। धार्मिक आचरण वाले लोग धार्मिकता से नहीं भरे हैं; बल्कि, वे उद्धार प्राप्त कर चुके हैं और अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर मुक्त हो गए हैं; वे परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं। वे अंत तक डटे रहेंगे, परंतु कहने का अर्थ यह नहीं कि वे शैतान द्वारा कभी भ्रष्ट नहीं किए गए हैं। परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने के बाद, उसके सभी प्राणियों में, वे लोग होंगे, जो नष्ट किए जाएंगे और वे होंगे जो बचे रहेंगे। यह उसके प्रबंधन कार्य की एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है; इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। बुरा करने वालों को बचने की अनुमति नहीं होगी; जो अंत तक परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका अनुसरण करते हैं, उनका जीवित रहना निश्चित है। चूँकि यह कार्य मानवता के प्रबंधन का है, इसलिए कुछ होंगे जो बचे रहेंगे और कुछ होंगे जो हटा दिए जाएंगे। ये अलग-अलग प्रकार के लोगों के लिए अलग-अलग परिणाम हैं और ये परमेश्वर के प्राणियों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं। मानवजाति के लिए परमेश्वर का अंतिम प्रबंधन परिवारों को तोड़कर उसे बाँटना है, देशों को ध्वस्त करके और राष्ट्रीय सीमाओं को ध्वस्त कर ऐसा प्रबंधन बनाना जिसमें परिवारों और राष्ट्रों की सीमाएं न हों क्योंकि अंततः मनुष्यों का पूर्वज एक ही है और वे परमेश्वर की सृष्टि हैं। संक्षेप में, बुरा करने वाले सभी प्राणी नष्ट कर दिए जाएंगे और जो प्राणी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं, वे बचेंगे। इस तरह, न कोई परिवार होंगे न देश होंगे, विशेष रूप से आने वाले विश्राम के समय कोई राष्ट्र नहीं होंगे; इस प्रकार की मानवता सबसे अधिक पवित्र प्रकार की मानवता होगी। आदम और हव्वा का सृजन मूल रूप से इसलिए किया गया था ताकि मानवता पृथ्वी की सभी चीज़ों की देखभाल कर सके; आरंभ में मनुष्य सभी चीज़ों के स्वामी थे। मनुष्य के सृजन में यहोवा की इच्छा मनुष्य का पृथ्वी पर अस्तित्व बनाए रखने और इसके ऊपर सभी चीज़ों की देखभाल करने की अनुमति देना था, क्योंकि आरंभ में मानवता भ्रष्ट नहीं की गई थी और बुरा करने में असमर्थ थी। हालांकि मनुष्य भ्रष्ट हो जाने के बाद सभी चीज़ों का रखवाला नहीं रहा। परमेश्वर द्वारा उद्धार का उद्देश्य मानवता की इस भूमिका को वापस लाना है, मानवजाति की मूल समझ और मूल आज्ञाकारिता को वापस लाना है; विश्राम में मानवता उस परिणाम को सटीक रूप से दर्शाती है जो परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य से प्राप्त करने की आशा रखता है। हालाँकि यह अदन की वाटिका के जीवन के समान जीवन नहीं होगा, किंतु उसका सार वही होगा; अब मानवता न सिर्फ़ अपनी आरंभिक भ्रष्टता-रहित अवस्था जैसी होगी बल्कि ऐसी मानवता होगी, जिसे भ्रष्ट किया गया था और जिसने बाद में उद्धार प्राप्त किया। ये लोग जिन्होंने उद्धार प्राप्त कर लिया है, अंततः (यानी जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है) विश्राम में प्रवेश करेंगे। इसी प्रकार, जिन्हें दंड दिया गया है, उनके परिणाम भी अंत में पूर्ण रूप से प्रकट किए जाएँगे और उन्हें केवल तभी नष्ट किया जाएगा, जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो वे बुरा करने वाले और वे जिन्हें बचाया जा चुका है, सभी प्रकट किए जाएँगे, क्योंकि सभी प्रकार के लोगों को प्रकट करने का कार्य (चाहे वे बुरा करने वाले हों या उनमें से हों जो बचाए गए हैं) सभी मनुष्यों पर एक साथ संपन्न किया जाएगा। बुरा करने वाले हटा दिए जाएँगे और जिन्हें बचे रहने की अनुमति है, वे साथ-साथ प्रकट किए जाएँगे। इसलिए सभी प्रकार के लोगों के परिणाम एक साथ प्रकट किए जाएँगे। बुराई करने वालों को अलग करके धीरे-धीरे उनका न्याय या उन्हें दंडित करने से पहले परमेश्वर उद्धार पा चुके लोगों के समूह को विश्राम में प्रवेश की अनुमति नहीं देगा; यह तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। जब बुरा करने वाले नष्ट हो जाते हैं और जो बचे रह सकते हैं, वे विश्राम में प्रवेश करते हैं, तब समस्त ब्रह्मांड में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। वहाँ जो आशीष पाएँगे और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, उनके बीच प्राथमिकता का क्रम नहीं होगा; जो आशीष पाएँगे, वे अनंतकाल तक जीवित रहेंगे जबकि जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, वे अनंतकाल तक नष्ट होते रहेंगे। कार्य के ये दोनों क़दम साथ-साथ पूर्ण होंगे। यह अवज्ञाकारी लोगों के अस्तित्व के कारण ही है कि समर्पण करने वालों की धार्मिकता प्रकट होगी, और चूँकि ऐसे लोग हैं जिन्होंने आशीष प्राप्त किए हैं, इसलिए ही दुष्टों द्वारा झेले जाने वाला दुर्भाग्य प्रकट किया जाएगा जो उन्हें उनके दुष्ट आचरण के लिए मिलता है। यदि परमेश्वर ने बुरा करने वालों को प्रकट न किया, तो वे लोग, जो ईमानदारी से परमेश्वर को समर्पण करते हैं, कभी भी प्रकाश नहीं देखेंगे; यदि परमेश्वर उन्हें उचित गंतव्य पर नहीं पहुँचाता जो उसे समर्पण करते हैं, तो जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं, वे उचित दंड प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यही परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया है। यदि वह बुरे को दंड देने एवं अच्छे को पुरस्कृत करने का यह कार्य नहीं करता, तो उसके प्राणी कभी अपने-अपने गंतव्यों तक पहुँचने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। जब एक बार मानवजाति विश्राम में प्रवेश कर लेती है, तो बुराई करने वाले नष्ट किए जा चुके होंगे, समस्त मानवता सही मार्ग पर होगी; सभी प्रकार के लोग अपने-अपने प्रकार के साथ होंगे, उन कार्यों के अनुसार जिनका उन्हें अभ्यास करना चाहिए। केवल यही मानवता के विश्राम का दिन होगा, यह मानवता के विकास की अपरिहार्य प्रवृत्ति होगी और केवल जब मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी केवल तभी परमेश्वर की महान और चरम कार्यसिद्धि पूर्णता पर पहुँचेगी; यह उसके कार्य का समापन अंश होगा। यह कार्य मानवता के पतनशील भौतिक जीवन का अंत करेगा, साथ ही यह भ्रष्ट मानवता के जीवन का अंत करेगा। इसके बाद से मनुष्य एक नए क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यद्यपि सभी मनुष्य देहधारी होते हैं, किंतु उसके इस जीवन के सार और भ्रष्ट मानवता के सार में महत्त्वपूर्ण अंतर होते हैं। उसके अस्तित्व का अर्थ और भ्रष्ट मानवता के अस्तित्व का अर्थ भी भिन्न होता है। हालाँकि यह एक नए प्रकार के व्यक्ति का जीवन नहीं होगा, यह कहा जा सकता है कि यह उस मानवता का जीवन है, जो उद्धार प्राप्त कर चुकी है, साथ ही ऐसा जीवन, जिसने मानवता और तर्क को पुनः प्राप्त कर लिया है। ये वे लोग हैं, जो कभी परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी थे, जिन्हें परमेश्वर द्वारा जीता गया था और फिर उसके द्वारा बचाया गया था; ये वे लोग हैं, जिन्होंने परमेश्वर का अपमान किया और बाद में उसकी गवाही दी। उसकी परीक्षा से गुज़रकर बचने के बाद उनका अस्तित्व सबसे अधिक अर्थपूर्ण अस्तित्व है; ये वे लोग हैं, जिन्होंने शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दी और वे मनुष्य हैं, जो जीवित रहने के योग्य हैं। जो नष्ट किए जाएँगे वे लोग हैं, जो परमेश्वर के गवाह नहीं बन सकते और जो जीवित रहने के योग्य नहीं हैं। उनका विनाश उनके दुष्ट आचरण के कारण होगा और ऐसा विनाश ही उनके लिए सर्वोत्तम गंतव्य है। भविष्य में, जब मानवता एक सुंदर क्षेत्र में प्रवेश करेगी, तब पति और पत्नी के बीच, पिता और पुत्री के बीच या माँ और पुत्र के बीच ऐसे कोई संबंध नहीं होंगे, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। उस समय, प्रत्येक मनुष्य अपने प्रकार के लोगों का अनुसरण करेगा और परिवार पहले ही ध्वस्त हो चुके होंगे। पूरी तरह असफल होने के बाद, शैतान फिर कभी मानवता को परेशान नहीं करेगा और मनुष्यों में अब और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं होंगे। वे अवज्ञाकारी लोग पहले ही नष्ट किए जा चुके होंगे और केवल समर्पण करने वाले लोग ही बचेंगे। जब बहुत थोड़े से परिवार पूरी तरह बचेंगे; तो भौतिक संबंध कैसे बने रह सकते हैं? अतीत का मनुष्य का दैहिक जीवन पूरी तरह निषिद्ध होगा; तो लोगों के बीच भौतिक संबंध कैसे अस्तित्व में रह सकते हैं? शैतान के भ्रष्ट स्वभावों के बिना, मनुष्यों का जीवन अब अतीत के पुराने जीवन के समान नहीं होगा बल्कि एक नया जीवन होगा। माता-पिता बच्चों को गँवा देंगे और बच्चे माता-पिता को गँवा देंगे। पति पत्नियों को गँवा देंगे और पत्नियाँ पतियों को गँवा देंगी। फिलहाल लोगों का एक दूसरे के साथ भौतिक संबंध होता है, पर जब प्रत्येक विश्राम में प्रवेश कर लेगा, तो उनके बीच कोई संबंध नहीं होगा। केवल इस प्रकार की मानवता में ही धार्मिकता और पवित्रता होगी; केवल इस प्रकार की मानवता ही परमेश्वर की आराधना कर सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 601

परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की। फिर उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिये पापबलि बना। अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है, जिसे वह आरंभ से करता रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी और समस्त सृष्टि पर अपने अधिकार को बहाल करेगा। मानवता ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद परमेश्वर के प्राणियों के साथ-साथ अपने धर्मभीरु हृदय भी गँवा दिए, जिससे वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण और अवज्ञाकारी हो गया। तब मानवता शैतान के अधिकार क्षेत्र में रही और शैतान के आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीक़ा नहीं था और वह अपने प्राणियों से भयपूर्ण श्रद्धा पाने में असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में बस गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मानवता के सृजन के पीछे का अर्थ खो दिया। इसलिए मानवता के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवता को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंत में, अपने राज्य को बहाल कर सकता है। अवज्ञा करने वाले उन पुत्रों का अंतिम तौर पर विनाश भी क्रियान्वित किया जाएगा, ताकि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं के विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है, वह है, जो उसकी आराधना करेगी, जो उसे पूरी तरह समर्पण करेगी और उसकी महिमा का प्रदर्शन करेगी। यदि परमेश्वर भ्रष्ट मानवता को नहीं बचाता, तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर उन शत्रुओं का नाश नहीं करता, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना भी नहीं कर पाएगा। ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के प्रतीक होंगे : मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा, और जब वे अपने-अपने कर्तव्य निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं को समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीज़ों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर सभी चीज़ों पर और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और मनुष्यों और स्वयं के साथ एक अनंत जीवन का आरंभ करेगा। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 602

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात् मनुष्य को शुद्धिकरण और क्लेश का भागी बनाया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाही दे सकते हैं, वे वो लोग हैं जिन्हें अंततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजेता हैं। इस क्लेश के दौरान मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस शुद्धिकरण को स्वीकार करे, और यह शुद्धिकरण परमेश्वर के कार्य की अंतिम घटना है। यह अंतिम बार है कि परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को शुद्ध किया जाएगा, और जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन सभी को यह अंतिम परीक्षा स्वीकार करनी चाहिए, और उन्हें यह अंतिम शुद्धिकरण स्वीकार करना चाहिए। जो लोग क्लेश से व्याकुल हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किंतु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं, वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं, जिनमें मानवता है, और जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, इन विजयी लोगों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा, और ये फिर भी अपनी गवाही में असफल हुए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये वे लोग हैं, जो अंततः बड़े क्लेश से उभरेंगे। भले ही आपदा को अवसर में बदलने वाले आज भी मुफ़्तख़ोरी कर सकते हों, किंतु अंतिम क्लेश से बच निकलने में कोई सक्षम नहीं है, और अंतिम परीक्षा से कोई नहीं बच सकता। जो लोग विजय प्राप्त करते हैं, उनके लिए ऐसा क्लेश जबरदस्त शुद्धिकरण हैं; किंतु आपदा को अवसर में बदलने वालों के लिए यह पूरी तरह से उनके उन्मूलन का कार्य है। जिनके हृदय में परमेश्वर है, उनकी चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षा क्यों न ली जाए, उनकी निष्ठा अपरिवर्तित रहती है; किंतु जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है, वे अपने देह के लिए परमेश्वर का कार्य लाभदायक न रहने पर परमेश्वर के बारे में अपना दृष्टिकोण बदल लेते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जो अंत में डटे नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर के आशीष खोजते हैं और उनमें परमेश्वर के लिए अपने आपको व्यय करने और उसके प्रति समर्पित होने की कोई इच्छा नहीं होती। ऐसे सभी अधम लोगों को परमेश्वर का कार्य समाप्ति पर आने पर बहिष्कृत कर दिया जाएगा, और वे किसी भी प्रकार की सहानुभूति के योग्य नहीं हैं। जो लोग मानवता से रहित हैं, वे सच में परमेश्वर से प्रेम करने में अक्षम हैं। जब परिवेश सही-सलामत और सुरक्षित होता है, या जब लाभ कमाया जा सकता है, तब वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी रहते हैं, किंतु जब जो वे चाहते हैं, उसमें कमी-बेशी की जाती है या अंतत: उसके लिए मना कर दिया जाता है, तो वे तुरंत बगावत कर देते हैं। यहाँ तक कि एक ही रात के अंतराल में वे अपने कल के उपकारियों के साथ अचानक बिना किसी तुक या तर्क के अपने घातक शत्रु के समान व्यवहार करते हुए, एक मुसकराते, "उदार-हृदय" व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं। यदि इन पिशाचों को निकाला नहीं जाता, तो ये पिशाच बिना पलक झपकाए हत्या कर देंगे, तो क्या वे एक छिपा हुआ ख़तरा नहीं बन जाएँगे? विजय के कार्य के समापन के बाद मनुष्य को बचाने का कार्य हासिल नहीं किया जाता। यद्यपि विजय का कार्य समाप्ति पर आ गया है, किंतु मनुष्य को शुद्ध करने का कार्य नहीं; वह कार्य केवल तभी समाप्त होगा, जब मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर दिया जाएगा, जब परमेश्वर के प्रति वास्तव में समर्पण करने वाले लोगों को पूर्ण कर दिया जाएगा, और जब अपने हृदय में परमेश्वर से रहित छद्मवेशियों को शुद्ध कर दिया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के कार्य के अंतिम चरण में उसे संतुष्ट नहीं करते, उन्हें पूरी तरह से निष्कासित कर दिया जाएगा, और जिन्हें निष्कासित कर दिया जाता है, वे शैतान के हो जाते हैं। चूँकि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हैं, इसलिए वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं, और भले ही वे लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हों, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता कि ये वो लोग हैं, जो अंततः बने रहेंगे। "जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, वे उद्धार प्राप्त करेंगे," इन वचनों में "अनुसरण" का अर्थ क्लेश के बीच डटे रहना है। आज बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना आसान है, किंतु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला होगा, तब तुम "अनुसरण करने" का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इस बात से कि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम उन लोगों में से एक हो, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षणों को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अंततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और इसलिए वे बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा का सामना करने में समर्थ हैं, जबकि जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण का सामना करने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य की परीक्षा द्वारा किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा लिए गए निर्णय से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर सनक के आधार पर किसी मनुष्य को अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को आश्वस्त न कर सके। मनुष्य का विश्वास सही है या नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है, और इसे मनुष्य द्वारा तय नहीं किया जा सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि "गेहूँ को जंगली दाने नहीं बनाया जा सकता, और जंगली दानों को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता"। जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे, और परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा, जो वास्तव में उससे प्रेम करता है। अपने विभिन्न कार्यों और गवाहियों के आधार पर राज्य के भीतर विजेता लोग याजकों और अनुयायियों के रूप में सेवा करेंगे, और जो क्लेश के बीच विजेता होंगे, वे राज्य के भीतर याजकों का एक निकाय बन जाएँगे। याजकों का निकाय तब बनाया जाएगा, जब संपूर्ण विश्व में सुसमाचार का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा। जब वह समय आएगा, तब जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, वह परमेश्वर के राज्य के भीतर अपने कर्तव्य का निष्पादन होगा, और राज्य के भीतर परमेश्वर के साथ उसका जीना होगा। याजकों के निकाय में महायाजक और याजक होंगे, और शेष लोग परमेश्वर के पुत्र और उसके लोग होंगे। यह सब क्लेश के दौरान परमेश्वर के प्रति उनकी गवाहियों से निर्धारित होता है, ये ऐसी उपाधियाँ नहीं हैं जो सनक के आधार पर दी जाती हैं। जब मनुष्य की हैसियत स्थापित कर दी जाएगी, तो परमेश्वर का कार्य रुक जाएगा, क्योंकि प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया जाएगा और उसकी मूल स्थिति में लौटा दिया जाएगा, और यह परमेश्वर के कार्य के समापन का चिह्न है, यह परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास का अंतिम परिणाम है, और यह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों और मनुष्य के सहयोग का स्फटिकवत् ठोस रूप है। अंत में, मनुष्य परमेश्वर के राज्य में विश्राम पाएगा, और परमेश्वर भी विश्राम करने के लिए अपने निवास-स्थान में लौट जाएगा। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच 6,000 वर्षों के सहयोग का अंतिम परिणाम होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 603

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 604

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 605

जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने वालों के प्रति ईर्ष्या-भाव रखते हैं, और हमेशा ऐसे लोगों के साथ विश्वासघात करना चाहते हैं जो नासमझ हैं और जिनमें विवेक की कमी है। जिन बातों को ये उगलते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में गिरने का, तुझमें असामान्य परिस्थिति पैदा होने का और तुझमें अंधकार भरने का कारण बनती हैं; वे तुझे परमेश्वर से दूर रहने, देह में आनंद लेने और तेरा अपने आप में आसक्त होने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के प्रति सदैव लापरवाह रवैया अपनाते हैं, उनमें आत्म-जागरूकता नहीं होती; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर की अवहेलना के लिये बहकाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और न ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते हैं और उनमें स्वयं के प्रति कोई नफ़रत नहीं होती है। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य की लालसा करने से रोकते हैं। जिनके साथ वे विश्वासघात करते हैं वे प्रकाश को नहीं देख सकते। वे अंधेरे में पड़ जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने नहीं देते हैं, और उन सभी मूर्खों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनके दिल में बसी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह समय अलग किए जाने का है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब हटा दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूंगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 606

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होता है। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग कलीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुटबंदी करते हैं और पाखंड पैदा करते हैं, और वे स्थानीय गुण्डे तो और भी जल्दी अवश्य छोड़ कर चले जाएँ। जिनकी प्रवृत्ति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जायें और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन को परेशान न करें और परिणास्वरूप परमेश्वर के दंड से बचें। तुम लोगों में से जो लोग उनके साथ चले गये हैं, वे आत्म-मंथन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे दुष्टों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे, या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 607

परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम लोगों को हर चीज में परमेश्वर के अलावा अन्य किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और हर चीज में उसी की इच्छा के अनुरूप बनना चाहिए। यद्यपि हर कोई इस संदेश को समझता है, लेकिन इंसान की तरह-तरह की मुश्किलों—उदाहरण के लिए, अज्ञानता, बेतुकेपन और भ्रष्टता के कारण, ये सच्चाइयाँ जो एकदम साफ और बुनियादी हैं, इंसान में पूरी तरह से दिखाई नहीं देतीं। इसलिए, इससे पहले कि तुम लोगों का अंत पत्थर की लकीर बन जाए, मैं पहले कुछ ऐसी बातें बता दूँ जो तुम लोगों के लिए अत्यधिक महत्व की हैं। इससे पहले कि मैं आरंभ करूँ, तुम्हें पहले इस बात को समझ लेना चाहिए : मैं जो वचन कहता हूँ वे सत्य हैं और समूची मानवजाति के लिए हैं; केवल किसी विशिष्ट या खास किस्म के व्यक्ति के लिए नहीं हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के नजरिए से समझने पर ध्यान देना चाहिए और पूरी एकाग्रता एवं ईमानदारी की प्रवृत्ति रखनी चाहिए; मेरे द्वारा बोले गए एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो, और उन्हें हल्के में मत लो। मैं देखता हूँ कि तुम लोगों ने अपने जीवन में ऐसा बहुत कुछ किया है जो सत्य के अनुरूप नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों से खास तौर से सत्य के सेवक बनने, दुष्टता और कुरूपता का दास न बनने के लिए कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है। अब मैं मौजूदा प्रसंग पर बात करूँगा।

सबसे पहले, अपनी नियति के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहिए। कहने का अर्थ है, चूँकि तुम लोग यह मानते हो कि तुम परमेश्वर के घर के एक सदस्य हो, तो तुम्हें परमेश्वर के मन को शांति प्रदान करनी चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सिद्धांतवादी और सत्य के अनुरूप होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा और तुम्हें अस्वीकृत कर देगा, और हर इंसान तुम्हें ठुकरा देगा। अगर एक बार तुम ऐसी दुर्दशा में पड़ गए, तो तुम्हारी गिनती परमेश्वर के घर में नहीं की जा सकती। परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं किए जाने का यही अर्थ है।

दूसरा, तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए दुगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार" के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है, और क्या तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति की नियति कैसे काम करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और भावुक हृदय है, और क्या उसके पास एक शुद्ध आत्मा है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसाकि तुम्हारी नियति में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुमने कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं किया है या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोला है, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या यह सोचने का बेहूदा तरीका नहीं है? तुम हर बात में परमेश्वर को धोखा देते हो; तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?

मैं तुम लोगों से तीसरी बात यह कहना चाहता हूँ : हर व्यक्ति ने अपने जीवन में परमेश्वर में आस्था के दौरान किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर का प्रतिरोध किया है, उसे धोखा दिया है। कुछ गलत कामों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होते हैं; क्योंकि बहुत से कर्म ऐसे होते हैं जिनसे प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन होता है, जो परमेश्वर के स्वभाव के प्रति अपराध होते हैं। भाग्य को लेकर चिंतित बहुत से लोग पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौनसे हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से ही अहंकारी और अकड़बाज हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक नहीं हो। इसलिए जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म तो ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब पाप करने की कोई और छूट नहीं बची है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर तुममें पश्चाताप के कोई लक्षण भी नहीं दिखते, इसलिए तुम्हारे पास नरक में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है। परमेश्वर का अनुसरण करते समय, कुछ थोड़े-से लोगों ने कुछ ऐसे कर्म कर दिए जिनसे सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ, लेकिन निपटारे और मार्गदर्शन के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता का अहसास किया, उसके बाद वास्तविकता के सही मार्ग में प्रवेश किया, और आज वे एक ठोस जमीन पर खड़े हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत तक बने रहेंगे। मुझे ईमानदार इंसान की तलाश है; यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासपात्र हो सकते हो। यदि अपने कामों से तुम परमेश्वर के स्वभाव का अपमान नहीं करते, और तुम परमेश्वर की इच्छा की खोज करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारे मन में आदर है, तो तुम्हारी आस्था मापदंड के अनुरूप है। जो कोई भी परमेश्वर का आदर नहीं करता, और उसका हृदय भय से नहीं काँपता, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि वह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करेगा। बहुत-से लोग अपनी तीव्र भावना के बल पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती, उसके वचनों में छिपे अर्थों का तो उन्हें कोई भान तक नहीं होता। इसलिए, नेक इरादों के बावजूद वे प्रायः ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा पहुँचती है। गंभीर मामलों में, उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित कर दिया जाता है, नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने नादान नेक इरादों की शक्ति के आधार पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और अंत में परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर बैठते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में ले आते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि परमेश्वर का स्वभाव किसी मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ते हैं, वे उससे संवाद नहीं कर पाते, क्योंकि परमेश्वर का हृदय इंसान की तरह नहीं है। जब तुम बहुत-से सत्य समझ जाते हो, तभी तुम परमेश्वर को निरंतर जान पाते हो। यह ज्ञान शब्दों या धर्म सिद्धांतों से नहीं बनता, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिससे तुम परमेश्वर के साथ गहरा विश्वास पैदा कर सकते हो और इसे एक प्रमाण के रूप में उपयोग सकते हो कि वह तुमसे प्रसन्न होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से युक्त नहीं हो, तो मनोवेग में की गई तुम्हारी सेवा से परमेश्वर सिर्फ तुमसे घृणा और ग्लानि ही करेगा। अब तक तो तुम समझ ही गए होगे कि परमेश्वर में विश्वास धर्मशास्त्र का अध्ययन मात्र नहीं है!

हालाँकि मैं तुम लोगों को बहुत कम शब्दों में चेतावनी देता हूँ, फिर भी जो कुछ भी मैंने बताया है उसका तुम लोगों में सबसे ज़्यादा अभाव है। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि मैं अब जिस बारे में बता रहा हूँ वह इंसानों के बीच मेरे अंतिम कार्य के लिए है, इंसान के अंत का निर्धारण करने के लिए है। मैं ऐसा और कोई कार्य नहीं करना चाहता जिसका कोई प्रयोजन न हो, न ही मैं ऐसे लोगों का मार्गदर्शन करते रहना चाहता हूँ जिनसे सड़ी-गली लकड़ी की तरह कोई उम्मीद नहीं की जा सकती, उनकी अगुवाई तो मैं बिलकुल नहीं करना चाहता हूँ जो गुप्त रूप से बुरे इरादे पाले रहते हैं। शायद एक दिन तुम लोग इंसान के लिए मेरे वचनों के पीछे छिपे ईमानदार इरादों को और मानवजाति के लिए मेरे योगदान को समझ पाओगे। शायद एक दिन तुम लोग उस संदेश को समझ पाओगे जिससे तुम अपना अंत तय करने के योग्य बन सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 608

मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के इरादे से कई सत्य दिए हैं। अब तक, तुम लोग अतीत की तुलना में काफी अधिक समृद्ध अनुभव करते हो, इस बारे में कई सिद्धांत समझ गए हो कि व्यक्ति को कैसा होना चाहिए, और तुमने उतना सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है जो वफ़ादार लोगों में होना चाहिए। अनेक वर्षों के दौरान तुम लोगों ने यही फसल काटी है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से इनकार नहीं करता, लेकिन मुझे यह भी स्पष्ट रूप से कहना है कि मैं इन कई वर्षों में मेरे प्रति की गई तुम्हारी अवज्ञाओं और विद्रोहों से भी इनकार नहीं करता, क्योंकि तुम लोगों के बीच एक भी संत नहीं है। बिना किसी अपवाद के तुम शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोग हो; तुम मसीह के शत्रु हो। आज तक तुम लोगों के अपराधों और अवज्ञाओं की संख्या इतनी ज्यादा रही है कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती, इसलिए इसे शायद ही अजीब माना जाए कि मैं लगातार तुम लोगों के सामने अपने आपको दोहरा रहा हूँ। मैं तुम लोगों के साथ इस तरह सह-अस्तित्व की इच्छा नहीं रखता, लेकिन तुम्हारे भविष्य की खातिर, तुम्हारी मंज़िल की खातिर मैं, यहाँ और अभी, एक बार फिर वह दोहराऊँगा, जो मैं पहले ही कह चुका हूँ। मुझे आशा है, तुम लोग मुझे कहने दोगे, और इतना ही नहीं, मेरे हर कथन पर विश्वास करने में सक्षम होगे और मेरे वचनों का गहरा निहितार्थ समझ पाओगे। मेरे कहे पर संदेह न करो, मेरे वचनों को जैसे चाहो, वैसे लेकर उन्हें दरकिनार करने की बात तो छोड़ ही दो; यह मेरे लिए असहनीय होगा। मेरे वचनों की आलोचना मत करो, उन्हें हलके में तो तुम्हें बिलकुल नहीं लेना चाहिए, न ऐसा कुछ कहना चाहिए कि मैं हमेशा तुम लोगों को फुसलाता हूँ, या उससे भी ज्यादा ख़राब यह कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह ठीक नहीं है। ये चीज़ें भी मेरे लिए असहनीय हैं। चूँकि तुम लोग मुझे और मेरी कही गई बातों को संदेह की नज़र से देखते हो, मेरे वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते और मेरी उपेक्षा करते हो, मैं तुम सब लोगों से पूरी गंभीरता से कहता हूँ : मेरी कही बातों को दर्शन-शास्त्र से मत जोड़ो; मेरे वचनों को कपटी लोगों के झूठ से मत जोड़ो। मेरे वचनों की अवहेलना तो तुम्हें बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए। भविष्य में शायद कोई तुम्हें वह नहीं बता पाएगा जो मैं बता रहा हूँ, या तुम्हारे साथ इतनी उदारता से नहीं बोलेगा, या तुम लोगों को एक-एक बात इतने धैर्य से समझाने वाला तो बिलकुल नहीं मिलेगा। इन अच्छे दिनों को तुम लोग केवल याद करते रह जाओगे, या ज़ोर-ज़ोर से सुबकोगे, अथवा दर्द से कराहोगे, या फिर अँधेरी रातों में जीवन-यापन कर रहे होगे जहाँ सत्य या जीवन का अंश-मात्र भी नहीं होगा, या नाउम्मीदी में बस इंतज़ार कर रहे होगे, या फिर भयंकर पश्चात्ताप में विवेक ही खो बैठोगे...। वस्तुत: तुममें से कोई इन संभावनाओं से नहीं बच सकता। क्योंकि तुममें से किसी के पास वह आसन नहीं है, जिससे तुम परमेश्वर की सच्ची आराधना कर सको, इसके बजाय तुम लोग व्यभिचार और बुराई की दुनिया में निमग्न हो गए हो, और तुम्हारे विश्वासों में, तुम्हारी आत्मा, रूह और शरीर में ऐसी बहुत-सी चीज़ें घुल-मिल गई हैं, जिनका जीवन और सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि जो इनके विरोध में हैं। इसलिए मुझे तुम लोगों को लेकर बस यही आशा है कि तुम लोगों को प्रकाश-पथ पर लाया जा सके। मेरी एकमात्र आशा है कि तुम लोग अपना ख़याल रख पाओ, और अपने व्यवहार और अपराधों को उदासीनता से देखते हुए तुम अपनी मंज़िल पर इतना अधिक बल न दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 609

एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से चलते रहना चाहते हो, गलत मार्ग पर बने रहते हो और तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों पर एक नज़र डालो, और जाँच करो कि तुम्हारे व्यवहार तथा विचारों में से कोई ऐसा तो नहीं है, जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह एक ऐसी चीज़ है, जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है, और जिसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।

तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

मेरी माँगें सरल हो सकती हैं, लेकिन मैं जो कह रहा हूँ, वह उतना सरल नहीं है, जितना सरल एक जमा एक बराबर दो होते हैं। अगर तुम लोग इस बारे में केवल कुछ भी बोलोगे, या बेसिर-पैर की बातें करोगे या ऊँची-ऊँची फेंकोगे, तो फिर तुम्हारी योजनाएँ और ख़्वाहिशें धरी की धरी रह जाएँगी। मुझे तुममें से ऐसे लोगों के साथ कोई सहानुभूति नहीं होगी, जो बरसों कष्ट झेलते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन जिनके पास दिखाने के लिए कुछ नहीं होता। इसके विपरीत, जिन्होंने मेरी माँगें पूरी नहीं की हैं, मैं उन्हें पुरस्कृत नहीं, दंडित करता हूँ, उनसे सहानुभूति तो बिलकुल नहीं रखता। तुम लोग सोचते होगे कि बरसों अनुयायी बने रहकर तुमने बहुत मेहनत कर ली है, और कुछ भी हो, केवल सेवा-कर्मी होने के नाते ही तुम्हें परमेश्वर के भवन में एक कटोरी चावल मिल जाना चाहिए। मैं कहूँगा कि तुममें से अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं, क्योंकि तुम लोगों ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया है कि चीज़ों का फ़ायदा कैसे उठाया जाए, न कि अपना फायदा कैसे उठाने दिया जाए। इसलिए अब मैं तुम लोगों से बहुत गंभीरता से कहता हूँ : मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि तुम्हारी मेहनत कितनी उत्कृष्ट है, तुम्हारी योग्यताएँ कितनी प्रभावशाली हैं, तुम कितनी निकटता से मेरा अनुसरण करते हो, तुम कितने प्रसिद्ध हो, या तुमने अपने रवैये में कितना सुधार किया है; जब तक तुम मेरी अपेक्षाएँ पूरी नहीं करते, तब तक तुम कभी मेरी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाओगे। अपने विचारों और गणनाओं को जितनी जल्दी हो सके, बट्टे खाते डाल दो, और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लेना शुरू कर दो; वरना मैं अपना काम समाप्त करने के लिए सभी को भस्म कर दूँगा और, सबसे अच्छा यह होगा कि मैं अपने वर्षों के कार्य और पीड़ा को शून्य में बदल दूँ, क्योंकि मैं अपने शत्रुओं और उन लोगों को, जिनमें से दुर्गंध आती है और जो शैतान जैसे दिखते हैं, अपने राज्य में नहीं ला सकता या उन्हें अगले युग में नहीं ले जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 610

मुझे बहुत उम्मीदें हैं। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग उपयुक्त और अच्छी तरह से व्यवहार करो, अपना कर्तव्य निष्ठा से पूरा करो, सत्य और मानवता को अपनाओ, ऐसे व्यक्ति बनो जो अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना जीवन भी परमेश्वर के लिए न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी आशाएँ तुम लोगों की कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं। अगर तुम लोगों से मेरी कोई भी बातचीत तुम्हारा ध्यान आकर्षित के लिए पर्याप्त नहीं रही है, तो शायद मैं यही कर सकता हूँ कि अब कुछ न कहूँ। हालाँकि, तुम लोग इसके परिणाम को समझते हो। मैं कभी आराम नहीं करता, इसलिए अगर मैं बोलूँगा नहीं, तो कुछ ऐसा करूँगा कि लोग देखते रह जाएँगे। मैं किसी की जीभ गला सकता हूँ, या किसी के अंग भंग करके उसे मार सकता हूँ, या लोगों को स्नायु की विषमताएँ दे सकता हूँ और उन्हें अनेक प्रकार से कुरूप बना सकता हूँ। इसके अतिरिक्त, मैं लोगों को ऐसी यातनाएँ दे सकता हूँ, जो मैंने खास तौर से उनके लिए निर्मित की हैं। इस तरह मुझे ख़ुशी होगी, और मैं बहुत ज्यादा सुखी और प्रसन्न हो जाऊँगा। हमेशा से यही कहा गया है कि "भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से दिया जाता है", तो फिर अभी क्यों नहीं? यदि तुम मेरा विरोध करना चाहते हो और मेरी आलोचना करना चाहते हो, तो मैं तुम्हारे मुँह को गला दूँगा, और उससे मुझे अपार प्रसन्नता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आख़िरकार जो कुछ तुमने किया है, वह सत्य नहीं है, ज़िंदगी से उसका कुछ लेना-देना तो बिलकुल भी नहीं है, जबकि मैं जो कुछ करता हूँ, वह सत्य होता है; मेरी समस्त क्रियाएँ मेरे कार्य के सिद्धांतों और मेरे द्वारा निर्धारित प्रशासनिक आदेशों के लिए प्रासंगिक होती हैं। अत: मेरी तुम सभी से गुज़ारिश है कि कुछ गुण संचित करो, इतनी बुराई करना बंद करो, और अपने फुरसत के समय में मेरी माँगों पर ध्यान दो। तब मुझे ख़ुशी होगी। तुम लोग जितना प्रयास देह-सुख के लिए करते हो, उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सत्य के लिए योगदान (या दान) करो, तो मैं कहता हूँ कि तुम बहुधा अपराध नहीं करोगे और अपना मुँह भी नहीं गलवाओगे। क्या यह स्पष्ट नहीं है?

तुम जितने अधिक अपराध करोगे, उतने ही कम अवसर तुम्हें अच्छी मंज़िल पाने के लिए मिलेंगे। इसके विपरीत, तुम जितने कम अपराध करोगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बेहतर हो जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो तुम क्षमा किए जाने के अपने अवसर पूरी तरह से गँवा दोगे। इस तरह, तुम्हारी मंज़िल उच्च नहीं, निम्न होगी। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन न हो, तो बेधड़क गलत काम करो और उसके नतीजे देखो। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सत्य पर अमल करते हो, तो तुम्हें अपने अपराधों के लिए क्षमा किए जाने का अवसर अवश्य मिलेगा, और तुम कम से कम अवज्ञा करोगे। और यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य पर अमल नहीं करना चाहता, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराधों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ जाएगी और तुम तब तक बार-बार अवज्ञा करोगे, जब तक कि सीमा पार नहीं कर लोगे, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। यह तब होगा, जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका हो जाएगा। अपने अपराधों को किसी अपरिपक्व या मूर्ख व्यक्ति की गलतियाँ मात्र मत समझो, यह बहाना मत करो कि तुमने सत्य पर अमल इसलिए नहीं किया, क्योंकि तुम्हारी ख़राब क्षमता ने उसे असंभव बना दिया था। इसके अतिरिक्त, स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य भी मत समझ लेना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने और अपने साथ उदारता का व्यवहार करने में अच्छे हो, तो मैं कहता हूँ, तुम एक कायर हो, जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, न ही तुम्हारे अपराध तुम्हारा पीछा छोड़ेंगे, वे तुम्हें कभी सत्य की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करने देंगे और तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का वफ़ादार साथी बनाए रखेंगे। तुम्हें फिर भी मेरी यही सलाह है : अपने गुप्त अपराधों का पता लगाने में विफल रहते हुए केवल अपनी मंज़िल पर ध्यान मत दो; अपने अपराधों को गंभीरता से लो, अपनी मंज़िल की चिंता में उनमें से किसी को नज़रअंदाज़ मत करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 611

आज, मैं तुम लोगों को तुम्हारे ही अस्तित्व के लिए इस प्रकार धिक्कारता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़े और पूरे ब्रह्मांड में मेरा उद्घाटन कार्य अधिक उचित और उत्तम ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। मैं सभी देशों और राष्ट्रों के लोगों के लिए अपने वचनों, अधिकार, प्रताप और न्याय को प्रकट करता हूँ। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ, वह संपूर्ण जगत में मेरे कार्य का आरंभ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, याद रहे कि "अंत के दिन" केवल एक युग का नाम है; ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान यह एक युग का संकेत देता है और यह अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय एक संपूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से काफ़ी अलग हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में क्रियान्वित नहीं किया जाता बल्कि अन्यजाति राष्ट्रों के बीच किया जाता है; यह मेरे सिंहासन के सामने, इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय है, ताकि संपूर्ण जगत में मेरी जो महिमा है, वो ब्रह्मांड और नभमंडल को भर सके। यह इसलिए ताकि मैं और अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी महिमा को हर राष्ट्र को, निरंतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंप सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी उस समस्त महिमा को देख सकें, जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान क्रियान्वित कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी पर सभी लोगों के जीवन का मार्गदर्शन नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्ष लंबे अविनाशी दुःख का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में किए गए हज़ारों वर्षों के कार्य जैसा नहीं हो सकता, न ही यह यहूदिया में महज़ कुछ सालों के कार्य जैसा हो सकता है, जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण होने तक दो हज़ार साल तक जारी रहा। अंतिम दिनों के लोग केवल देह में आए मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन को देखते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हज़ार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय की तरह जैसे जब यीशु ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंत के दिन संपूर्ण युग का उपसंहार हैं। ये परमेश्वर की छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की पूर्णता और समाप्ति हैं और ये मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करते हैं। ये समस्त मानवजाति को एक नए युग में नहीं ले जाते या मानवजाति का जीवन जारी नहीं रहने देते; इसका मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं होगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो देर-सवेर उसे शैतान द्वारा पूरी तरह निगल लिया जाएगा, और वे आत्माएँ जो मुझ से संबद्ध हैं, अंततः पूरी तरह उसके हाथों द्वारा बर्बाद कर दी जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हज़ार वर्ष तक चलता है और मैंने वादा किया कि समस्त मानवजाति पर उस दुष्ट का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों से अधिक तक नहीं रहेगा। इसलिए, अब समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखूँगा और न ही विलंब करूँगा : अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी संपूर्ण महिमा वापस ले लूँगा और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस प्राप्त करूँगा जो मुझसे संबंधित हैं, ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच सकें और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद, मैं पृथ्वी पर फिर कभी भी देहधारी नहीं बनूँगा और फिर कभी भी पूर्ण-नियंत्रण करने वाला मेरा आत्मा पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक कार्य करूँगा : मैं मानवजाति को पुनः बनाऊँगा, ऐसी मानवजाति जो पवित्र हो और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वसनीय शहर हो। पर जान लो कि मैं संपूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति को जड़ से मिटाऊँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मुझसे प्रेम करता है और मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है और मैं इस तीसरे तृतीयांश को फलदायी बनाऊँगा और पृथ्वी पर कई गुना बढ़ाऊँगा, ठीक वैसे जैसे इस्राएली व्यवस्था के तहत फले-फूले थे, उन्हें ख़ूब सारी भेड़ों और मवेशियों और पृथ्वी की सारी समृद्धि के साथ पोषित करूँगा। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की बुरी तरह से गंदी मानवजाति की तरह नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवजाति होगी, जो उन सभी लोगों का जनसमूह होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। इस प्रकार की मानवजाति को शैतान के द्वारा नष्ट, बिगाड़ा या घेरा नहीं जाएगा और ऐसी एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा शैतान पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वी पर विद्यमान रहेगी। यही वह मानवजाति है, जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसे मेरी प्रतिज्ञा हासिल है। और इसलिए, अंत के दिनों के दौरान मेरे द्वारा जीती गई मानवजाति वह मानवजाति भी होगी, जिसे बख़्श दिया जाएगा और जिसे मेरे अनंत आशीष प्राप्त होंगे। शैतान पर मेरी विजय का यही एकमात्र सुबूत होगा और शैतान के साथ मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार होगा। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचाए गए हैं और ये ही मेरी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के ठोस-रूप और परिणाम हैं। ये विश्वभर के हर राष्ट्र और संप्रदाय, हर स्थान और देश से हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाज़ों और त्वचा के रंगों वाले हैं और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हैं। अंततः वे पूर्ण मानवजाति बनाने के लिए साथ आएंगे, मनुष्यों का ऐसा जनसमूह, जिस तक शैतान की ताकतें नहीं पहुँच सकतीं। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है, वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराइयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा, जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों और मवेशियों को जड़ से मिटाया था, केवल इस्राएलियों को छोड़ा था, जिन्होंने मेमने का माँस खाया, मेमने का लहू पिया और अपने दरवाज़े की चौखटों को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं, वे भी ऐसे लोग नहीं, जो उस मेमने का माँस खाते हैं जो मैं हूँ और उस मेमने का लहू पीते हैं जो मैं हूँ और जिन्हें मेरे द्वारा छुटकारा दिलाया गया है और जो मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती? क्या वे लोग जो उस मेमने के माँस के बिना हैं, जो मैं हूँ, पहले ही चुपचाप सागर की गहराइयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा विरोध करते हो और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचनों के अनुसार हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराइयों में मौजूद कठोरता मेरे कोप के संचय का कारण बन रही है, जो तुम लोगों की देह पर और अधिक दुःख, तुम्हारे पापों पर और अधिक न्याय, और तुम लोगों की अधार्मिकता पर और अधिक क्रोध ला रही है। जब आज तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार करते हो, तो मेरे कोप के दिन किसे बख़्शा जा सकता है? किसकी अधार्मिकता ताड़ना की मेरी आँखों से बच सकती है? किसके पाप मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों से बच सकते हैं? किसकी अवज्ञा मुझ सर्वशक्तिमान के न्याय से बच सकती है? मैं, यहोवा इस प्रकार तुम लोगों से, अन्यजातियों के परिवार के वंशजों से बात करता हूँ और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ, वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से ज़्यादा कठोर हो। जब मैं तसल्ली से काम करता हूँ, तो क्या तुम लोग मेरे कोप को संचित नहीं करते? कैसे तुम लोग मुझ सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कोई भी जो देह में है, कोप के दिन से नहीं बच सकता' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 612

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

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