XI. मंज़िलें और परिणाम

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 580

बिजली की एक चमक पर, प्रत्येक जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार, मेरे प्रकाश से रोशन हो कर मनुष्यों ने भी उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है जो उनके पास पहले कभी थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार! अंतत: यह गंदे पानी में पलट गया है, और सतह के नीचे डूब कर कीचड़ में घुल गया है! ओह, मैंने जो मानवजाति बनाई थी वह अंततः इस प्रकाश में पुनः जीवित हो गई है, उसने अस्तित्व की नींव खोज ली है और कीचड़ में संघर्ष करना बंद कर चुकी है! ओह, सृजन की असंख्य वस्तुएं जिन्हें मैं अपने हाथों में थामे हुये हूँ! मेरे वचनों के माध्यम से वे पुन: नई कैसे नहीं हो सकतीं? वे, इस प्रकाश में, अपने प्रयोजनों को कैसे कार्यान्वित नहीं कर सकतीं? पृथ्वी अब निष्प्राण रूप से स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है। स्वर्ग और पृथ्वी अब एक रिक्त स्थान द्वारा अलग नहीं हैं, कभी अलग ने होने के लिये एक हो गये हैं। इस उल्लासपूर्ण अवसर पर, इस आनंदित क्षण में, मेरी धार्मिकता और मेरी पवित्रता पूरे ब्रह्मांड में फैल गई है, और समस्त मानव जाति उनकी निरंतर जयकार कर रही है। स्वर्ग के नगर आनंद से हंस रहे हैं, और पृथ्वी के साम्राज्य प्रसन्न हो कर नृत्य कर रहे हैं। इस समय कौन आनंदित नहीं है? और इस समय कौन रो नहीं रहा है? पृथ्वी अपनी मौलिक स्थिति में स्वर्ग से संबद्ध है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ एक हो जाता है। मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बाँधे रखने वाली डोर है, और मनुष्य की पवित्रता के कारण, मनुष्य के नवीनीकरण के कारण, स्वर्ग अब पृथ्वी से छुपा हुआ नहीं है, और पृथ्वी अब स्वर्ग की ओर मौन नहीं है। मानवजाति के चेहरे आभार की मुस्कान से खिले हुये हैं, और उनके हृदय में एक असीमित मिठास छिपी है। मनुष्य अन्य मनुष्य से झगड़ा नहीं करता, न ही वे एक दूसरे के साथ मार-पीट करते हैं। क्या कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मेरे प्रकाश में, दूसरों के साथ शांति से नहीं रहते? क्या कुछ लोग ऐसे हैं, जो मेरे दिवस में, मेरा नाम बदनाम करते हैं? सभी मनुष्य मेरी ओर श्रद्धा से देखते हैं, और अपने हृदय में वे मुझे चुपके से पुकारते हैं। मैंने मानवजाति के हर कर्म को जांचा है: जिन मनुष्यों की शुद्धि कर दी गई है, उनमें से कोई भी मेरे समक्ष अवज्ञाकारी नहीं है, कोई भी मेरी आलोचना नहीं करता। समस्त मानवजाति मेरे स्वभाव से ओतप्रोत हैं। हर कोई मेरे बारे में जान रहा है, मेरे निकट आ रहा है, और मेरी उपासना कर रहा है। मैं मनुष्य की आत्मा में अडिग खड़ा हूँ, उसके नेत्रों में उच्चतम शिखर तक पहुंच गया हूँ, और उसकी नसों में रक्त के साथ प्रवाहित हूँ। मनुष्यों के हृदय में आनंदमय उमंग पृथ्वी का हर स्थान भरती है, हवा तीव्र और ताज़ा है, घना कोहरा अब भूमि को नहीं ढकता, और सूरज अपनी दीप्ति से प्रकाशित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 18' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 581

राज्य मनुष्यों के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मनुष्यों के मध्य बन रहा है, यह मनुष्यों के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। आज के राज्य में जो मेरे लोग हैं, उनमें से ऐसा कौन है जो मानवों में मानव नहीं है? तुम लोगों में से कौन मानवीय परिस्थितियों से बाहर है? जब भीड़ के मध्य मेरे प्रारम्भ बिन्दु को सुनाया जायेगा, तो मनुष्य किस प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे? तुम सबने अपनी आंखों से मानवजाति की दशा को देखा है; निश्चय ही तुम लोग अब भी इस संसार में हमेशा के लिए बने रहने की आशा नहीं कर रहे हो? अब मैं निर्बाध अपने लोगों के मध्य चल रहा हूँ, उनके मध्य में रहता हूँ। आज, जो मेरे लिए वास्तविक प्रेम रखते हैं, ऐसे लोग ही धन्य हैं। धन्य हैं वे जो मुझे समर्पित हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में रहेंगे। धन्य हैं वे जो मुझे जानते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में शक्ति प्राप्त करेंगे। धन्य हैं वे जो मुझे खोजते हैं, वे निश्चय ही शैतान के बंधनों से स्वतंत्र होंगे और मेरी आशीषों का आनन्द लेंगे। धन्य हैं वे जो अपने आप को मेरे लिए त्यागते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे राज्य की उदारता को पाएंगे। जो लोग मेरी खातिर हर ओर दौड़-भाग करते हैं उन्हें मैं याद रखूंगा, जो लोग मेरे लिए अपने आप को समर्पित करते हैं, मैं उन्हें आनन्द से गले लगाऊंगा, जो लोग मुझे भेंट देते हैं मैं उन्हें आनन्द दूंगा। जो लोग मेरे वचनों में आनन्द प्राप्त करते हैं उन्हें मैं आशीष दूंगा; वे निश्चय ही ऐसे खम्भे होंगे जो मेरे राज्य में शहतीर को थामेंगे, वे निश्चय ही मेरे घर में अतुलनीय प्रचुरता को प्राप्त करेंगे और उनके साथ कोई तुलना नहीं कर पाएगा। क्या तुम सबने कभी मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने तुमसे किए गए वायदों को खोजा है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य, निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति को नहीं खोओगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन के समय, मेरी विजय की गवाही देने के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही सिनिम के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके द्वारा तुम मेरे आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा को ब्रह्माण्ड भर में निश्चय ही बिखेरोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 19' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 582

जैसे-जैसे मेरे वचन पूर्णता तक पहुँचते हैं, राज्य धीरे-धीरे पृथ्वी पर आकार लेने लगता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्य हो जाता, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे हृदय में जो राज्य है वो स्थापित हो जाता है। उस राज्य में, परमेश्वर के सभी लोगों को सामान्य मनुष्य का जीवन वापस मिल जाता है। बर्फीली शीत ऋतु चली गई है, उसका स्थान बहारों के संसार ने ले लिया है, जहाँ साल भर बहार बनी रहती है। लोग आगे से मनुष्य के उदास और अभागे संसार का सामना नहीं करते हैं, और न ही वे आगे से मनुष्य के शांत ठण्डे संसार को सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ाई नहीं करते हैं। एक दूसरे के विरूद्ध युद्ध नहीं करते हैं, वहाँ अब कोई नरसंहार नहीं होता है और न ही नरसंहार से लहू बहता है; पूरी ज़मीं प्रसन्नता से भर जाती है, और यह हर जगह मनुष्यों के बीच उत्साह को बढ़ाता है। मैं पूरे संसार में घूमता हूँ, मैं ऊपर सिंहासन से आनन्दित होता हूँ, और मैं सितारों के मध्य रहता हूँ। और स्वर्गदूत मेरे लिए नए नए गीत गाते और नए नए नृत्य करते हैं। अब उनके चेहरों से उनकी स्वयं की क्षणभंगुरता के कारण आँसू नहीं ढलकते हैं। मैं अब अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनता हूँ, और अब कोई मुझ से किसी कठिनाई की शिकायत नहीं करता है। आज, तुम लोग मेरे सामने रहते हो; कल तुम लोग मेरे राज्य में बने रहोगे। क्या यह सब से बड़ा आशीष नहीं है जिसे मैं मनुष्य को देता हूँ? उस कीमत के कारण जो तुम लोग आज चुकाते हो, तुम लोग भविष्य की आशीषों को विरासत में प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के मध्य रहोगे। क्या तुम लोग अभी भी मेरे आत्मा के मुख्य तत्व के साथ शामिल नहीं होना चाहते हो? क्या तुम लोग अभी भी अपने आप को खत्म करना चाहते हो? लोग उस प्रतिज्ञा का अनुसरण करने के इच्छुक हैं जिसे वे देख सकते हैं, भले ही वे अल्पजीवी हैं, फिर भी कोई भी कल की प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं है, भले ही वे पूरे अनन्त काल के लिए हों। वे चीज़ें जो मनुष्य को दिखाई देती हैं वे ऐसी चीज़ें हैं जिनका मैं सम्पूर्ण विनाश करूँगा, और ऐसी चीज़ें जो मनुष्य के लिए दृष्टिगोचर नहीं है वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें मैं पूरा करूँगा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच में यही अन्तर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 20' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 583

मेरे प्रकाश में, लोग फिर से रोशनी देखते हैं। मेरे वचन में, लोग उन चीज़ों को देखते हैं जिनसे उन्हें आनंद मिलता है। मैं पूरब से आया हूँ, मैं पूरब से हूँ। जब मेरी महिमा चमकती है, तो सभी देश प्रकाशित हो उठते हैं, सभी रोशनी में ले आए जाते हैं, एक भी चीज़ अंधकार में नहीं रहती। राज्य में, परमेश्वर के साथ परमेश्वर के लोग जो जीवन जीते हैं, वह अत्यंत उल्लासमय है। सागर लोगों के आशीषित जीवन पर आनंद से नृत्य करते हैं, पर्वत लोगों के साथ मेरी प्रचुरता का आनंद लेते हैं। सभी लोग प्रयास कर रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं, मेरे राज्य में अपनी निष्ठा दिखा रहे हैं। राज्य में, अब न विद्रोह है, न प्रतिरोध है; स्वर्ग और धरती एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इंसान और मैं गहरी भावना के साथ निकट आते हैं, जीवन के मधुर सुख-चैन के माध्यम से, एक-दूसरे की ओर झुक रहे हैं...। इस समय, मैं औपचारिक रूप से स्वर्ग में अपना जीवन आरंभ करता हूँ। अब शैतान का व्यवधान नहीं है, और लोग विश्राम में प्रवेश करते हैं। पूरी कायनात में, मेरे चुने हुए लोग मेरी महिमा में जीते हैं, अतुलनीय रूप से आशीषित हैं, लोग ऐसे नहीं रहते जैसे इंसानों के बीच रहते हैं, बल्कि ऐसे रहते हैं जैसे परमेश्वर के साथ रहते हैं। हर इंसान शैतान की भ्रष्टता से गुज़रा है, और उसने पूरी तरह से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव लिए हैं। अब, मेरी रोशनी में रहते हुए, कोई आनंद कैसे न उठाएगा? कोई इस खूबसूरत पल को यों ही कैसे छोड़ देगा और हाथ से कैसे जाने देगा? तुम लोग! मेरे लिए अपने दिलों के गीत गाओ और खुशी से नाचो! अपने सच्चे दिलों को उन्नत करो और उन्हें मुझे अर्पित करो! ढोल बजाओ और मेरे लिए खुशी से क्रीड़ा करो! मैं पूरी कायनात भर में अपनी प्रसन्नता बिखेरता हूँ! मैं सभी लोगों के सामने अपना महिमामय चेहरा प्रकट करता हूँ! मैं ऊँची आवाज़ में पुकारूँगा! मैं कायनात की सीमाओं के परे जाँऊगा! मैं पहले ही लोगों के मध्य शासन करता हूँ! लोगों ने मेरा उत्कर्ष किया है! मैं ऊपर नीले आसमान में बहता हूँ और लोग मेरे साथ चलते हैं। मैं लोगों के मध्य चलता हूँ और मेरे लोग मुझे घेर लेते हैं! लोगों के दिल प्रसन्नचित्त हैं, उनके गीत कायनात को हिलाते हैं, आकाश फाड़ देते हैं! अब कायनात धुंध से घिरी हुई नहीं है; अब न कीचड़ है, न मल का जमाव है। कायनात के पवित्र लोगो! मेरी निगरानी में, तुम अपना असली चेहरा दिखाते हो। तुम लोग मल से ढके हुए इंसान नहीं हो, बल्कि हरिताश्म की तरह निर्मल संत हो, तुम सब लोग मेरे प्रिय हो, तुम सब लोग मेरा आनंद हो! हर चीज़ पुन: जीवन को प्राप्त होती है! सभी संत स्वर्ग में मेरी सेवा के लिए लौट आए हैं, मेरे स्नेहपूर्ण आलिंगन में प्रवेश कर रहे हैं, अब वे विलाप नहीं कर रहे, अब वे बेचैन नहीं हैं, वे स्वयं को मुझे अर्पित कर रहे हैं, मेरे घर वापस आ रहे हैं, और वे अपनी जन्मभूमि में बिना रुके मुझसे प्रेम करेंगे! यह अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय होगा! कहाँ है दुख! कहाँ हैं आँसू! कहाँ है देह! धरती गुज़र जाती है, मगर स्वर्ग सदा के लिए हैं। मैं सभी लोगों के समक्ष प्रकट होता हूँ, और सभी लोग मेरी स्तुति करते हैं। यह जीवन, यह सुंदरता, चिरकाल से समय के अंत तक, बदलेगी नहीं। यही राज्य का जीवन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'ओ लोगो! आनंद मनाओ!' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 584

मैंने तुम लोगों के बीच बहुत काम किया है और, निस्संदेह, बहुत से कथन भी कहे हैं। फिर भी मुझे महसूस होता है कि मेरे वचनों और कार्य ने अंत के दिनों में मेरे कार्य के उद्देश्य को अच्छी तरह से पूरा नहीं किया है। क्योंकि, अंत के दिनों में, मेरा कार्य किसी खास व्यक्ति या खास लोगों के वास्ते नहीं है, बल्कि मेरे अन्तर्निहित स्वभाव को प्रदर्शित करने के लिए है। लेकिन, असंख्य कारणों से—कदाचित् समय की कमी या कार्य की व्यस्तता के कारण—मेरे स्वभाव ने इंसान को इस योग्य नहीं बनाया कि वह मुझे ज़रा-सा भी जान सके। इसलिए अपने कार्य में एक नया पृष्ठ खोलने के लिए, मैं अपनी एक नयी योजना की ओर, अपने अंतिम कार्य में, कदम बढ़ाता हूँ ताकि वे सब जो मुझे देखते हैं, मेरे अस्तित्व के कारण लगातार अपनी छाती पीटेंगे और रोएँगे और विलाप करेंगे। क्योंकि मैं संसार में मनुष्यों का अंत कर दूँगा, और उसके बाद से, मैं मनुष्यों के सामने अपने पूरे स्वभाव को प्रकट करूंगा, ताकि वे सभी लोग जो मुझे जानते हैं, और जो नहीं जानते, अपनी आँखों को निहाल कर सकें और वे देखें कि मैं वास्तव में मनुष्यों के संसार में आ गया हूँ, पृथ्वी पर आ गया हूँ, जहाँ सभी चीज़ें बढ़ती रहती हैं। यह मेरी योजना है, यह मनुष्यों के सृजन के समय से मेरी एकमात्र "स्वीकारोक्ति" है। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपना अखण्ड ध्यान मेरी प्रत्येक गतिविधि पर दो, क्योंकि मेरी छड़ी एक बार फिर लोगों पर प्रहार करती है, विशेष रूप से उन लोगों पर जो मेरा विरोध करते हैं।

आसमानों के साथ मिलकर, मैं उस कार्य को आरंभ करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। इसलिए मैं किसी को भीअपनी गतिविधियों या अपने वचनों की ख़बर लगने दिये बिना, लोगों की भीड़ के बीच से निकलकर आसमान और पृथ्वी के बीच विचरण करता हूँ। इसलिये, मेरी योजना अभी भी निरंतर प्रगति कर रही है। बात केवल इतनी ही है कि तुम्हारी सभी इंद्रियाँ इतनी सुन्न हो गई हैं कि तुम लोग मेरे कार्य के चरणों को जरा-सा भी नहीं समझते हो। किन्तु, निश्चित रूप से एक दिन आएगा, जब तुम लोग मेरे अभिप्राय को जान जानोगे। आज, मैं तुम लोगों के साथ रहता और तुम लोगों के साथ ही दुःख सहता हूँ। मैंने बहुत पहले ही अपने प्रति इंसान की प्रवृत्ति को समझ लिया है। मैं तुम लोगों को और अधिक स्पष्टीकरण नहीं देना चाहता, और तुम्हें शर्मिंदा करने के लिये पीड़ादायक विषय के उदाहरण तो बिल्कुल नहीं देना चाहता। मेरी केवल यही इच्छा है कि तुम लोग वह सब अपने हृदय में रखो जो तुम लोगों ने किया है—ताकि जिस दिन हम पुनः मिलें तो अपने हिसाब-किताब का मिलान कर सकें। मैं तुम लोगों में से किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहता, क्योंकि मैंने सदैव न्यायपूर्वक, निष्पक्षता से, और सम्मानपूर्वक कार्य किया है। बेशक, मैं यह भी चाहता हूँ कि तुम लोग निष्कपट और उदार बनो और ऐसा कुछ न करो जो स्वर्ग, पृथ्वी और तुम्हारे विवेक के विरुद्ध जाता हो। मात्र यही एक चीज है जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ। बहुत से लोग बेचैनी और व्यग्रता महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने भयानक गलतियाँ की हैं, और बहुत से लोग स्वयं पर शर्मिंदा महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने कभी कोई अच्छा कर्म नहीं किया। फिर भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाय, अपने वीभत्स चेहरे को छुपाने वाले मुखौटे को पूरी तरह से फाड़ते हुए—जिसे अभी तक पूरी तरह से उजागर नहीं किया गया था—बद से बदतर हो जाते हैं, ताकि वे मेरे स्वभाव की परीक्षा ले सकें। मैं किसी व्यक्ति के कार्यों का न तो संज्ञान लेता हूँ, न ही उस पर विशेष ध्यान देता हूँ। बल्कि, मैं उस कार्य को करता हूँ जो मुझे करना चाहिए, चाहे यह जानकारी इकट्ठा करना हो, या देश भर में घूमना हो, या कुछ ऐसा करना हो जो मुझे रुचिकर लगता है। मैं विशेष समय पर, लोगों के बीच अपने कार्य को, एक भी पल की देरी या जल्दबाज़ी किये बिना, सहजता और स्थिरता से, उसी तरह से संपन्न करूँगा जैसा मैंने मूल रूप से सोचा था। हालाँकि, मेरे कार्य में हर चरण के साथ कुछ लोगों को त्याग दिया जाता है, क्योंकि मैं उनके चापलूसी तौर-तरीकों और उनकी झूठी विनम्रता से घृणा करता हूँ। जो मेरे विरोधी हैं, चाहे जानबूझकर या अनजाने में, निश्चित रूप से त्याग दिये जाएँगे। संक्षेप में, मैं चाहता हूँ, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, वे मुझसे दूर हो जाएँ। कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं अपने घर में बचे हुए दुष्टों को छोड़ूँगा नहीं। क्योंकि मनुष्यों को दण्ड देने का दिन निकट है, मुझे उन सभी घिनौनी आत्माओं को बाहर निकालने की जल्दबाजी नहीं है, क्योंकि मेरी अपनी एक योजना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 585

अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर कार्य आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कथनों और कार्यों को, और साथ ही मेरा अनुसरण करने में उनके मार्ग को, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उनके अंतिम प्रदर्शन को लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी अपने स्वयं के प्रकार के लोगों के साथ होंगे, जैसा मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं। मैंने अपनी योजना के आरंभ के बाद से उसमें एक भी परिवर्तन नहीं किया है। बात केवल इतनी ही है कि जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिनके प्रति मैं अपने वचनों को निर्देशित करता हूँ उनकी संख्या उसी तरह से घटती जा रही है जैसी कि सही मायनों में मेरी स्वीकृति पाने वालों की संख्या घट रही है। हालाँकि, मैं मानता हूँ कि मेरी योजना में कभी बदलाव नहीं आया है; बल्कि, यह मनुष्य का विश्वास और प्रेम हैं जो हमेशा बदलते रहते हैं, सदैव घटते जा रहे हैं, इस हद तक कि प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है कि वह मेरी चापलूसी करने से लेकर मेरे प्रति उदासीन रहे या मुझे निकालकर बाहर कर दे। जब तक मैं चिढ़ या घृणा महसूस न करूँ, और अंत में दण्ड न दे दूँ तब तक तुम लोगों के प्रति मेरी प्रवृत्ति न तो उत्साही और न ही उदासीन होगी। हालाँकि, तुम लोगों के दंड के दिन, मैं फिर भी तुम लोगों को देखूँगा, परंतु तुम लोग मुझे देखने में अब और समर्थ नहीं होगे। चूँकि मेरे प्रति तुम लोगों का जीवन पहले से ही थकाऊ और सुस्त हो गया है, इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि मैंने रहने के लिये एक अलग वातावरण चुन लिया है ताकि बेहतर रहे कि तुम लोगों के दूषित शब्दों की चोट से बचूँ और तुम लोगों के असहनीय रूप से गंदे व्यवहार से दूर रहूँ, ताकि तुम लोग मुझे अब और मूर्ख न बना सको या मेरे साथ बेपरवाह ढंग से व्यवहार न कर सको। इसके पहले कि मैं तुम लोगों को छोड़ कर जाऊँ, मुझे तुम लोगों को ऐसे कर्मों से परहेज करने के लिए प्रोत्साहित अवश्य करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं। बल्कि, तुम लोगों को वह करना चाहिए जो सबके लिए सुखद हो, जो सभी मनुष्यों को लाभ पहुँचाता हो, और जो तुम लोगों की अपनी मंज़िल के लिए लाभदायक हो, अन्यथा, ऐसा व्यक्ति जो आपदा के बीच दुःख उठाएगा वह तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 586

मेरी दया उन पर व्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का साक्षी है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह की दुष्टता कर चुके हैं, किन्तु जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी युगों-युगों तक कदाचित ही देखी गई आपदा में पड़ते हुए, लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है मेरी सामर्थ्य का आनंद लेंगे और तालियाँ बजाएँगे। वे अवर्णनीय संतुष्टि का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानवजाति को प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोए रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तब से मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को प्राप्त करने की आशा करता आ रहा हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले हों। मैं उन लोगों को नहीं भूला हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले नहीं हैं; केवल उन्हें अपना प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करते हुए, जिसे देखना मुझे आनंद देगा, मैंने उन्हें अपने हृदय में घृणा के साथ धारण किया हुआ है। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के वास्ते है बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के वास्ते भी है। इससे भी अधिक, यह उन सभी कार्यों के लिए सभी से स्वीकृति प्राप्त करने के वास्ते है जो मैं कर चुका हूँ। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एक मात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत निस्तब्ध हो जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देगा। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि जो मेरा कर्ज़ा चुका सकते हैं ऐसे लोग बहुत कम हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी इधर-उधर की सारी भाग-दौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। हर हाल में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। गहरी पीड़ा के बीच में, तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं थे, क्योंकि तुम लोगों का विश्वास और प्रेम खोखला था, और तुम लोगों ने अपने आप को केवल या तो डरपोक या रूखा प्रदर्शित किया। इस बारे में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरी चिंता तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने और अपने आप को व्यक्त करने के तरीके को लेकर बनी रहती है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों का अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे तुम लोगों को यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि: मैं उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मुझ पर रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 587

दुनिया के विशाल विस्तार में, अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार महासागर गाद भरने से मैदानों बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीजों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। इस मानवजाति के लिए श्रम करने या उसके लिए तैयारी करने वाला कोई भी शक्तिशाली नहीं है, और ऐसा तो कोई है ही नहीं जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्यजाति के भविष्य पर विलाप करता है, मनुष्यजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्यजाति, कदम-दर-कदम, क्षय की ओर और ऐसे मार्ग की ओर आगे बढ़ रही है जहाँ से वापसी नहीं है। ऐसी मनुष्यजाति जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और बुराई की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है: क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है जिसमें ऐसी मनुष्यजाति जा सकती है? ठीक इसी कारण से है कोई भी परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता है, कोई भी परमेश्वर को खुश करने के तरीके को नहीं खोजता है या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता है, और इससे भी अधिक, कोई भी परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता है। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी, मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल को अनदेखा करने और उसके सत्य से दूर रहने, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान, को बेचना पसंद करने में लगा रहता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को इस बात के लिये दुराग्रही बने रहना चाहिये—कि परमेश्वर इस मानवजाति की ओर कैसे कार्य करेगा जिसने उसे पीछे एक नज़र डाले बिना खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार याद दिलाने और प्रोत्साहनों का कारण यह है कि वह अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा रखता है जिसे उसने तैयार किया है, एक ऐसी आपदा जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का नहीं बल्कि आत्मा का भी दण्ड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है: जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और प्रोत्साहनों को कोई उत्तर नहीं मिलता है, तो वह किस प्रकार के क्रोध को छोड़ेगा? यह ऐसा होगा जिसे अब से पहले किसी सृजित प्राणी द्वारा अनुभव नहीं किया या नहीं सुना गया है। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी भी दोहराई नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह केवल इस एक बार मनुष्यजाति का सृजन करने और केवल इस एक बार मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर की योजना है। यह पहली और अंतिम बार है। इसलिए, इस बार जिस श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इंसान को बचाता है, उसे कोई समझ नहीं सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 588

मनुष्य आज के कार्य और भविष्य के कार्य के बारे में थोड़ा बहुत ही जानता है, किन्तु वह उस मंज़िल को नहीं समझता जिसमें मनुष्यजाति प्रवेश करेगी। एक प्राणी होने के नाते, मनुष्य को एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना चाहिएः जो कुछ परमेश्वर करता है उसमें उसे उसका अनुसरण करना चाहिए; और जो भी तरीका मैं तुम लोगों को बताता हूँ उसमें तुम सब को आगे बढ़ना चाहिए। तुम्हारे पास स्वयं के लिए चीज़ों का प्रबंधन करने का कोई तरीका नहीं है, और तुम्हारा स्वयं पर कोई आधिपत्य नहीं है; सब कुछ परमेश्वर के आयोजन पर अवश्य छोड़ दिया जाना चाहिए, और हर चीज़ उसके हाथों के भीतर जकड़ी हुई है। यदि परमेश्वर के कार्य ने मनुष्य को एक अन्त, एक अद्भुत मंज़िल, समय से पहले, प्रदान किए होते, और यदि परमेश्वर ने मनुष्य को लुभाने और उससे अपना अनुसरण करवाने के लिए इसका उपयोग किया होता—यदि उसने मनुष्य के साथ कोई सौदा किया होता—तो यह विजय नहीं होता, न ही यह मनुष्य के जीवन का कार्य करना होता। अगर मनुष्य को नियन्त्रित करने और उसके हृदय को पाने के लिए परमेश्वर को अन्त का उपयोग करना होता, तो इसमें वह मनुष्य को सिद्ध नहीं कर रहा होता, न ही वह मनुष्य को पाने में सक्षम होता, किन्तु इसके बजाय मनुष्य को नियन्त्रित करने के लिए उस मंज़िल का उपयोग कर रहा होता। भविष्य के अन्त, अन्तिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज़ है या नहीं उससे अधिक मनुष्य किसी और चीज़ के बारे में चिंता नहीं करता है। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दी गई होती, और यदि, मनुष्य पर विजय से पहले, उसे खोज करने के लिए उपयुक्त मंज़िल दी गई होती, तो न केवल मनुष्य पर विजय ने अपने प्रभाव को प्राप्त नहीं किया होता, बल्कि विजय के कार्य का प्रभाव भी प्रभावित हो गया होता। अर्थात्, विजय का कार्य मनुष्य के भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को दूर करने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना करने के द्वारा अपना प्रभाव प्राप्त करता है। इसे मनुष्य के साथ एक सौदा करके, अर्थात्, मनुष्य को आशीषें, और अनुग्रह दे कर प्राप्त नहीं किया जाता है, बल्कि मनुष्य को उसकी स्वतन्त्रता से वंचित करके और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़ कर उसकी वफादारी को प्रकट करने के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। यह विजय के कार्य का सार है। यदि मनुष्य को बिलकुल आरम्भ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना और न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य इस ताड़ना और न्याय को इस आधार पर स्वीकार कर लेता कि उसके पास भविष्य की संभावनाएँ हैं, और अन्त में, सभी प्राणियों के द्वारा सृजनकर्ता की शर्त रहित आज्ञाकारिता और आराधना को प्राप्त नहीं किया गया होता; वहाँ सिर्फ विवेकशून्य, अबोध आज्ञाकारिता ही होती, या फिर मनुष्य परमेश्वर से विवेकशून्य माँगें करता, और इसलिए मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असम्भव होता। इसके परिणामस्वरूप, विजय का ऐसा कार्य मनुष्य को प्राप्त करने में असमर्थ होता, इसके अतिरिक्त, न ही परमेश्वर की गवाही देता। ऐसे प्राणी अपने कर्तव्य को निभाने में असमर्थ होते, और परमेश्वर के साथ सिर्फ मोल-भाव ही करते; यह विजय नहीं होती, बल्कि करुणा और आशीष होता। मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के सिवाए और कुछ नहीं सोचता है, यह कि वह उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर की खोज करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता है। और इसलिए, मनुष्य पर विजय में, मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और ऐसी सभी चीज़ों को जो परमेश्वर की उसकी आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं, उन सभी का निपटारा करते हुए उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। ऐसा करने से, मनुष्य पर विजय के प्रभावों को प्राप्त कर लिया जाएगा। परिणामस्वरुप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह ज़रूरी है कि मनुष्य की अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाओं और जानलेवा कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और, इसके माध्यम से, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के प्रेम को प्रकट करने, और मानवीय जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के प्रेम की शुद्धि होती है, कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किन्तु सभी प्राणियों के प्रति परमेश्वर के रवैये में, वह सिर्फ जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता है; इसके बजाय, वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के वास्ते, और मनुष्य की प्राचीनतम, मूल सदृशता पुनः-प्राप्त करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि, मनुष्य पर विजय पाने के बाद, परमेश्वर मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता, और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मनुष्यजाति का प्रबंधन नहीं होता, न ही मनुष्य पर विजय उसके उद्धार के वास्ते होती। मनुष्य पर विजय पाना और अन्ततः एक अद्भुत मंज़िल पर उसके आगमन के बाद उसे सिर्फ प्राप्त करना ही उद्धार के समस्त कार्य के केन्द्र में होता है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक खूबसूरत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं जिन्हें सभी प्राणियों के द्वारा धारण किया जाना चाहिए, और वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता के द्वारा किया जाना चाहिए। अगर मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित होता; यह मनुष्य को एक निश्चित स्थिति तक ले जा सकता था, किन्तु यह मनुष्य को शाश्वत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम नहीं होता। मनुष्य की नियति को निर्धारित करने में मनुष्य समर्थ नहीं है, इसके अतिरिक्त, न ही वह मनुष्य के भविष्य की संभावनाओं और भविष्य की मंज़िल को सुनिश्चित करने में समर्थ है। हालाँकि, परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य भिन्न होता है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजित किया है, इसलिए वह मनुष्य की अगुवाई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा, और उसे पूरी तरह प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुवाई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य को सृजित किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। यही वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता के द्वारा किया जाता है। यद्यपि विजय के कार्य को भविष्य की संभावनाओं से मनुष्य को शुद्ध करके प्राप्त किया जाता है, फिर भी अन्ततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर अवश्य लाया जाना चाहिए जिसे परमेश्वर के द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है। ऐसा निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य में इसलिए कार्य करता है ताकि मनुष्य के पास एक मंज़िल हो और उसका भाग्य सुनिश्चित हो। यहाँ, वह उपयुक्त मंज़िल जिसकी ओर संकेत किया गया है वे मनुष्य की आशाएँ और उसके भविष्य की संभावनाएँ नहीं हैं जिन्हें बीते समयों में शुद्ध किया गया था; ये दोनों भिन्न हैं। मनुष्य जिसकी आशा और खोज करता है वे, मनुष्य के लिए नियत मंज़िल के बजाए, देह की फिज़ूल अभिलाषाओं की उसकी खोज की लालसाएँ हैं। इसी बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वह मनुष्य के लिए देय ऐसे आशीष और प्रतिज्ञाएँ हैं जिन्हें परमेश्वर ने संसार के सृजन के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जो पसंद, धारणाओं, कल्पनाओं या मनुष्य की देह के द्वारा दूषित नहीं हैं। इस मंज़िल को किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए तैयार नहीं किया जाता है, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए विश्राम का स्थान है। और इसलिए, यह मंज़िल मनुष्यजाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 589

सृजनकर्ता ने सभी प्राणियों के लिए आयोजन करने का इरादा किया है। तुम्हें किसी भी चीज़ को ठुकराना या उसकी अवज्ञा अवश्य नहीं करनी चाहिए, न ही तुम्हें उसके प्रति विद्रोही होना चाहिए। जब वह जिस कार्य को करता है वह अन्ततः उसके लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, वह इसमें महिमा प्राप्त करेगा। आज, ऐसा क्यों नहीं कहा जाता है कि तुम मोआब के वंशज हो, या बड़े लाल अजगर की संतान हो? क्यों चुने हुए लोगों के बारे में कोई बातचीत नहीं होती है, और केवल प्राणियों के बारे में ही बातचीत होती है? प्राणी—यह मनुष्य का मूल नाम था, और यही वह है जो उसकी स्वाभाविक पहचान है। नाम केवल इसलिए अलग-अलग होते हैं क्योंकि कार्य के युग और काल भिन्न-भिन्न होते हैं; वास्तव में, मनुष्य एक साधारण प्राणी है। सभी प्राणियों को, चाहे वे अत्यंत भ्रष्ट हों या अत्यंत पवित्र, एक प्राणी के कर्तव्य को अवश्य निभाना चाहिए। जब परमेश्वर विजय के कार्य को कार्यान्वित करता है, तो वह तुम्हारे भविष्य की संभावनाओं, भाग्य या मंज़िल का उपयोग करके तुम्हें नियन्त्रित नहीं करता है। वास्तव में इस तरह से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है। विजय के कार्य का लक्ष्य मनुष्य से एक प्राणी के कर्तव्य का पालन करवाना है, उससे सृजनकर्ता की आराधना करवाना है, और केवल इसके बाद ही वह उस अद्भुत मंज़िल में प्रवेश कर सकता है। मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। तुम स्वयं को नियन्त्रित करने में असमर्थ हो: हमेशा स्वयं के लिए दौड़-भाग करते रहने और व्यस्त रहने के बावजूद, मनुष्य स्वयं को नियन्त्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने स्वयं के भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने स्वयं के भाग्य को नियन्त्रित कर सकते, तो क्या तुम तब भी एक प्राणी होते? संक्षेप में, इस बात पर ध्यान दिए बना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, उसका समस्त कार्य सिर्फ मनुष्य के वास्ते होता है। उदाहरण के लिए, स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को लो जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया: चंद्रमा, सूर्य और तारे जिन्हें उसने मनुष्य के लिए बनाया: जानवर, पेड़-पौधे, बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु और शीत ऋतु, इत्यादि—इन सब को मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाया जाता है। और इसलिए, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर मनुष्य को कैसे ताड़ित करता है या उसका न्याय करता है, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि, वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, फिर भी यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण उसके अस्तित्व के वास्ते है। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, इसलिए मनुष्य स्वयं का नियन्त्रण कैसे कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 590

जब एक बार विजय का कार्य पूरा कर लिया जाएगा, तब मनुष्य को एक सुन्दर संसार में लाया जाएगा। निस्सन्देह, यह जीवन तब भी पृथ्वी पर ही होगा, किन्तु यह मनुष्य के आज के जीवन के पूरी तरह से असदृश होगा। यह वह जीवन है जो सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्यजाति के पास होगा, यह पृथ्वी पर मनुष्यजाति के लिए एक नई शुरुआत होगी, और मनुष्यजाति के लिए इस प्रकार का जीवन होना इस बात का सबूत होगा कि मनुष्यजाति ने एक नए और सुन्दर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। यह पृथ्वी पर मनुष्य और परमेश्वर के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुन्दर जीवन का आधार ऐसा अवश्य होना चाहिए कि, मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने और उस पर विजय पा लिए जाने के बाद, वह परमेश्वर के सम्मुख समर्पण कर दे। और इसलिए, इससे पहले कि मनुष्यजाति अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करे, विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन ही पृथ्वी पर मनुष्य के भविष्य का जीवन है, यह पृथ्वी पर सबसे अधिक सुन्दर जीवन है, उस प्रकार का जीवन जिसकी लालसा मनुष्य करता है, और उस प्रकार का जीवन है जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी प्राप्त नहीं किया गया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबधंन के कार्य का अंतिम परिणाम है, यह वह है जिसकी मनुष्यजाति सर्वाधिक अभिलाषा करती है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी है। किन्तु यह प्रतिज्ञा तुरन्त पूरी नहीं हो सकती है: मनुष्य भविष्य की मंज़िल में केवल तभी प्रवेश करेगा जब एक बार अंत के दिनों का कार्य पूरा कर लिया जाएगा और उस पर पूरी तरह से विजय पा ली जाएगी, अर्थात्, जब एक बार शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया जाएगा। जब मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने के पश्चात् वह पापपूर्ण स्वभाव से रहित होगा, क्योंकि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर दिया होगा, जिसका अर्थ यह है कि शत्रुतापूर्ण ताक़तों के द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं होगा, और कोई शत्रुतापूर्ण ताक़तें मनुष्य की देह पर आक्रमण नहीं कर सकती हैं। और इसलिए मनुष्य स्वतन्त्र और पवित्र होगा—वह शाश्वतता में प्रवेश कर चुका होगा। जब अन्धकार की विरोधी ताकतों को बाँध दिया जाता है केवल तभी मनुष्य जहाँ कहीं जाएगा वहाँ स्वतन्त्र होगा, और विद्रोहशीलता या विरोध से रहित होगा। बस शैतान को क़ैद में रखना है, और मनुष्य ठीक हो जाएगा; वर्तमान स्थिति इसलिए विद्यमान है क्योंकि शैतान अभी भी पृथ्वी पर हर जगह परेशानियाँ खड़ी करता है, और क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन का समस्त कार्य अभी तक समाप्ति पर नहीं पहुँचा है। जब एक बार शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, तो मनुष्य पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा; जब मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त कर लेगा और शैतान के अधिकार क्षेत्र से बाहर आ जाएगा, तो वह धार्मिकता के सूर्य को देखेगा। सामान्य मनुष्य के लिए नियत जीवन पुनः-प्राप्त कर लिया जाएगा; वह सब कुछ जिसे एक सामान्य मनुष्य के द्वारा धारण किया जाना चाहिए—जैसे भले और बुरे में भेद करने की सामर्थ्य, और इस बात की समझ कि किस प्रकार भोजन करना है और स्वयं को वस्त्र से ढकना है, और सामान्य जीवन व्यतीत करने की सामर्थ्य—यह सब पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा। यदि हव्वा को साँप के द्वारा प्रलोभन नहीं भी दिया गया होता, तब भी शुरुआत में मनुष्य के सृजन के बाद उसके पास ऐसा ही सामान्य जीवन होना चाहिए था। उसे पृथ्वी पर भोजन करना, और कपड़े पहनना, और सामान्य मनुष्य का जीवन जीना चाहिए था। मगर मनुष्य के पथभ्रष्ट हो जाने के बाद, यह जीवन एक कल्पना बन गया था, और यहाँ तक कि आज भी मनुष्य ऐसी चीज़ों की कल्पना करने का साहस नहीं करता है। वास्तव में, यह सुन्दर जीवन जिसकी मनुष्य अभिलाषा करता है एक आवश्यकता हैः यदि मनुष्य ऐसी मंज़िल से रहित होता, तब पृथ्वी पर उसका पथभ्रष्ट जीवन कभी समाप्त नहीं होता, और यदि ऐसा कोई सुन्दर जीवन नहीं होता, तो शैतान के भाग्य का या उस युग का कोई समापन नहीं होता जिसके अंतर्गत शैतान पृथ्वी पर अपना अधिकार क्षेत्र रखता है। मनुष्य को ऐसे क्षेत्र में अवश्य पहुँचना चाहिए जो अंधकार की ताक़तों के लिए अगम्य हो, और जब मनुष्य वहाँ पहुँच जाएगा, तो यह प्रमाणित करेगा कि शैतान को पराजित कर दिया गया है। इस तरह से, जब एक बार शैतान के द्वारा कोई व्यवधान नहीं रहेगा, तो स्वयं परमेश्वर मनुष्यजाति को नियन्त्रित करेगा, और वह मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन के लिए आदेश देगा और उसे नियन्त्रित करेगा; केवल इसे ही शैतान की पराजय के रूप में गिना जाएगा। आज का मनुष्य का जीवन मुख्यतः गंदगी का जीवन है, और अभी भी पीड़ा और संताप का एक जीवन है। इसे शैतान की पराजय नहीं कहा जा सकता है; मनुष्य को अभी भी संताप के सागर से बच कर निकलना है, अभी भी मनुष्य के जीवन की कठिनाइयों से, या शैतान के प्रभाव से बचकर निकलना है, और उसके पास अभी भी परमेश्वर के बारे में अतिन्यून जानकारी है। मनुष्य की समस्त परेशानी शैतान के द्वारा उत्पन्न की गई थी, यह शैतान ही था जो मनुष्य के जीवन में पीड़ाएँ लाया था, और जब शैतान को बाँध दिया जाएगा केवल उसके पश्चात् ही मनुष्य संताप के सागर से पूरी तरह से बचकर निकलने में समर्थ होगा। मगर मनुष्य को शैतान के साथ युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बना कर, मनुष्य के हृदय पर विजय पाने और उसे प्राप्त करने के माध्यम से, शैतान को बाँधना प्राप्त किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 591

आज, विजयी बनने और सिद्ध बनाए जाने की मनुष्य की खोज ऐसी चीज़ें हैं जिनकी खोज मनुष्य के पास पृथ्वी पर एक समान्य जीवन होने से पहले से की जाती हैं, और ऐसे उद्देश्य हैं जिनकी मनुष्य शैतान के बंधन से पहले तलाश करता है। सार रूप में, विजयी बनने और सिद्ध बनाए जाने की मनुष्य की खोज, या मनुष्य का भरपूर उपयोग किया जाना, शैतान के प्रभाव से बचने के लिए है: मनुष्य की खोज विजेता बनने के लिए है, किन्तु अंतिम परिणाम शैतान के प्रभाव से उसका बचकर निकलना ही होगा। केवल शैतान के प्रभाव से बचकर निकलने से ही मनुष्य पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य का जीवन, और परमेश्वर की आराधना करने वाला जीवन जी सकता है। आज, विजेता बनने और सिद्ध बनाए जाने की मनुष्य की खोज ऐसी चीज़ें हैं जिनकी खोज पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन पाने से पहले की जाती हैं। उनकी खोज मुख्य रूप से शुद्ध किये जाने और सत्य को अभ्यास में लाने के वास्ते, और सृजनकर्ता की आराधना को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। यदि मनुष्य पृथ्वी पर एक साधारण मनुष्य का जीवन, और ऐसा जीवन धारण करता है जो कठिनाई या संताप से रहित है, तो मनुष्य एक विजेता बनने की खोज में संलग्न नहीं होगा। "विजेता बनना" और "सिद्ध बनाए जाना" ऐसे उद्देश्य हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को खोज करने के लिए देता है, और इन उद्देश्यों की खोज के माध्यम से वह मनुष्य के द्वारा सत्य को अभ्यास में लाने और एक महत्व का जीवन व्यतीत करने का कारण बनता है। उद्देश्य, मनुष्य को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना है, और विजेता बनने और सिद्ध किये जाने की खोज मात्र एक साधन है। यदि, भविष्य में, मनुष्य एक अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करता है, तो वहाँ विजेता बनने और सिद्ध बनाए जाने का कोई संकेत नहीं होगा; वहाँ सिर्फ हर एक प्राणी अपने कर्तव्य को निभा रहा होगा। आज, सिर्फ मनुष्य के लिए एक दायरा परिभाषित करने हेतु मनुष्य से इन चीज़ों की खोज इसलिए करवाई जाती है, ताकि मनुष्य की खोज अधिक लक्षित और अधिक व्यावहारिक हो। अन्यथा, मनुष्य अस्पष्ट अन्यमनस्कता के बीच रहेगा और शाश्वत जीवन में प्रवेश का अनुसरण करेगा, और यदि ऐसा होता, तो क्या मनुष्य और भी अधिक दयनीय नहीं होता? इस तरह से लक्ष्यों या सिद्धान्तों के बिना खोज करना—क्या यह आत्म-वंचना नहीं है? अन्ततः, यह खोज स्वाभाविक रूप से फलहीन होगी; अन्त में, मनुष्य तब भी शैतान के अधिकार क्षेत्र में जीवन बिताएगा और स्वयं को इससे छुड़ाने में अक्षम होगा। स्वयं को ऐसी लक्ष्यहीन खोज के अधीन क्यों करना? जब मनुष्य शाश्वत मंज़िल में प्रवेश करेगा, तो मनुष्य सृजनकर्ता की आराधना करेगा, और क्योंकि मनुष्य ने उद्धार प्राप्त कर लिया है और शाश्वतता में प्रवेश कर लिया है, इसलिए मनुष्य किसी उद्देश्य की खोज नहीं करेगा, इसके अतिरिक्त, न ही उसे इस बात की चिंता करने की आवश्यकता होगी कि शैतान के द्वारा उसकी घेराबंदी की जाती है। इस समय, मनुष्य अपने स्थान को जानेगा, और अपने कर्तव्य को निभाएगा, और भले ही उन्हें ताड़ना नहीं दी जाती है या उनका न्याय नहीं किया जाता है, तब भी प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को निभाएगा। उस समय, मनुष्य पहचान और हैसियत दोनों में एक प्राणी होगा। ऊँच और नीच का अब और भेद नहीं होगा; प्रत्येक व्यक्ति बस एक भिन्न कार्य करेगा। मगर मनुष्य तब भी मनुष्यजाति की एक व्यवस्थित और उपयुक्त मंज़िल में जीवन बिताएगा, मनुष्य सृजनकर्ता की आराधना करने के वास्ते अपना कर्तव्य निभाएगा, और इस प्रकार की मनुष्यजाति ही शाश्वतता की मनुष्यजाति होगी। उस समय, मनुष्य ने परमेश्वर के द्वारा रोशन किए गए जीवन को प्राप्त कर लिया होगा, ऐसा जीवन जो परमेश्वर की देखरेख और संरक्षण के अधीन है, और ऐसा जीवन जो परमेश्वर के साथ है। मनुष्यजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीयेगी, और सम्पूर्ण मनुष्यजाति सही मार्ग में प्रवेश करेगी। 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना ने शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया होगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के बाद उसकी मूल छवि को पुनः प्राप्त कर लिया होगा, और अपने आप में, परमेश्वर का मूल इरादा पूरा हो गया होगा। शुरुआत में, शैतान के द्वारा मनुष्यजाति को भ्रष्ट किये जाने से पहले, मनुष्यजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीती थी। बाद में, जब उसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो मनुष्य ने इस सामान्य जीवन को गँवा दिया, और इसलिए परमेश्वर के प्रबधंन का कार्य, और मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनः प्राप्त करने के लिए शैतान के साथ युद्ध शुरु हुआ। जब परमेश्वर का 6,000-वर्षीय कार्य समाप्ति पर पहुँचेगा केवल तभी पृथ्वी पर सम्पूर्ण मनुष्यजाति का जीवन आधिकारिक रूप से आरम्भ होगा, केवल तभी मनुष्य का एक अद्भुत जीवन होगा, और परमेश्वर आरम्भ में मनुष्य के सृजन के प्रयोजन को और साथ ही मनुष्य की मूल सदृशता को पुनः प्राप्त करेगा। और इसलिए, जब एक बार मनुष्य के पास मनुष्यजाति का सामान्य जीवन होगा, तो मनुष्य विजेता बनने या सिद्ध बनाए जाने की खोज नहीं करेगा, क्योंकि मनुष्य पवित्र होगा। "विजेता" विजय और "सिद्ध होना" जिसके बारे में लोग बोलते हैं ऐसे उद्देश्य हैं जो मनुष्य को परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध के दौरान खोज करने के लिए दिए गए हैं, और वे सिर्फ इसलिए अस्तित्व में हैं क्योंकि मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। ऐसा तुम्हें एक उद्देश्य देने के द्वारा, और तुमसे इस उद्देश्य की खोज करवाने के द्वारा हुआ है, कि शैतान पराजित हो जाएगा। तुमसे विजेता बनने या तुम्हें सिद्ध बनाए जाने या उपयोग किए जाने के लिए कहना यह अपेक्षा करना है कि तुम शैतान को लज्जित करने के लिए गवाही दो। अन्त में, मनुष्य पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य का जीवन जीयेगा, और मनुष्य पवित्र होगा, और जब ऐसा होगा, तो क्या वे तब भी विजेता बनने की खोज करेंगे? क्या वे सभी प्राणी नहीं हैं? विजेता बनने और सिद्ध व्यक्ति होने की बात करें तो ये वचन शैतान की ओर, तथा मनुष्य की मलिनता की ओर निर्देशित हैं। क्या यह "विजेता" शैतान पर और शत्रु ताक़तों पर विजय के संदर्भ में नहीं है? जब तुम कहते हो कि तुम्हें सिद्ध बना दिया गया है, तो तुम्हारे भीतर क्या सिद्ध बनाया गया है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने स्वयं को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अलग कर लिया है, ताकि तुम परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम को प्राप्त कर सको? ऐसी चीज़ों को मनुष्य के भीतर की गन्दी चीज़ों के सम्बन्ध में, और शैतान के सम्बन्ध में कहा जाता है; उन्हें परमेश्वर के सम्बन्ध में नहीं कहा जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 592

जब मनुष्य पृथ्वी पर मनुष्य के असली जीवन को प्राप्त कर लेगा और शैतान की सभी ताक़तों को बाँध दिया जाएगा, तब मनुष्य आसानी से पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा। चीज़ें उतनी जटिल नहीं होंगी जितनी आज हैं: मानवीय रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, जटिल कौटुम्बिक रिश्ते..., वे इतने परेशान करने वाले और बहुत दुःखदायी हैं! यहाँ पर मनुष्य का जीवन कितना दयनीय है! एक बार मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो, उसका दिल और दिमाग बदल जाएगा उसके पास ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर पर श्रद्धा रखेगा और ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर से प्रेम करेगा। जब एक बार ऐसे लोगों पर जो इस विश्व में हैं जो परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हैं विजय पा ली जाती है, कहने का तात्पर्य है कि, जब एक बार शैतान को हरा दिया जाएगा, और जब एक बार शैतान की अंधकार की सभी ताक़तों को बाँध दिया जाएगा, तो पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन शांत हो जाएगा, और वह पृथ्वी पर आज़ादी से जीवन जीने में सक्षम हो जाएगा। यदि मनुष्य का जीवन दैहिक रिश्तों से रहित हो, और देह की जटिलताओं से रहित हो, तो यह बहुत अधिक आसान होगा। मनुष्य के देह के रिश्ते बहुत जटिल होते हैं, और मनुष्य के लिए ऐसी चीज़ों का होना इस बात का प्रमाण है कि उसने स्वयं को अभी तक शैतान के प्रभाव से मुक्त नहीं किया है। यदि अपने प्रत्येक भाई-बहन के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, यदि अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, तो तुम्हें कोई चिंता नहीं होती, और किसी के बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, और इस तरह से मनुष्य को उसकी आधी तकलीफों से मुक्ति मिल गई होती। पृथ्वी पर एक सामान्य मानवीय जीवन जीने से, मनुष्य स्वर्गदूत के समान होगा; यद्यपि अभी भी वह देह का प्राणी होगा, फिर भी वह स्वर्गदूत के समान होगा। यही वह अंतिम प्रतिज्ञा है जो मनुष्य को प्रदान की गई है। आज मनुष्य ताड़ना और न्याय से होकर गुज़रता है; क्या तुम सोचते हैं कि ऐसी चीज़ों का मनुष्य का अनुभव अर्थहीन है? क्या ताड़ना और न्याय का कार्य बिना किसी कारण के किया जा सकता है? पहले ऐसा कहा गया है कि मनुष्य को ताड़ना देना और उसका न्याय करना उसे अथाह गड्ढे में डालना है, जिसका अर्थ है कि उसके भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को ले लेना। यह एक चीज़ के वास्ते हैः मनुष्य का शुद्धिकरण। मनुष्य को जानबूझकर अथाह गड्ढे में नहीं डाला जाता है, जिसके बाद परमेश्वर उससे अपना पीछा छुड़ा लेता है। इसके बजाय, यह मनुष्य के भीतर की विद्रोहशीलता से निपटने के लिए है, ताकि अन्त में मनुष्य के भीतर की चीज़ों को शुद्ध किया जा सके, ताकि उसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सके, और वह एक पवित्र इंसान के समान हो सके। यदि ऐसा कर लिया जाता है, तो सब कुछ पूरा हो जाएगा। वास्तव में, जब मनुष्य के भीतर की उन चीज़ों से निपटा जाता है जिनसे निपटा जाना है, और मनुष्य ज़बर्दस्त गवाही देता है, तो शैतान भी परास्त हो जाएगा, और यद्यपि उन चीज़ों में से कुछ चीज़ें हो सकती हैं जो मूल रूप से मनुष्य के भीतर हों जिन्हें पूरी तरह से शुद्ध नहीं किया गया हो, फिर भी जब एक बार शैतान को हरा दिया जाएगा, तो वह अब और समस्या खड़ी नहीं करेगा, और उस समय मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर लिया गया होगा। मनुष्य ने कभी भी ऐसे जीवन का अनुभव नहीं किया है, किन्तु जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तब सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा और मनुष्य के भीतर की उन सभी तुच्छ चीज़ों का समाधान हो जाएगा; जब एक बार मुख्य समस्या को सुलझा दिया जाएगा तो अन्य सभी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी। पृथ्वी पर परमेश्वर के इस देहधारण के दौरान, जब वह मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो वह सब कार्य जिसे वह करता है वह शैतान को हराने के लिए है, और वह मनुष्य पर विजय पाने और तुम लोगों को पूर्ण करने के माध्यम से शैतान को हराएगा। जब तुम लोग ज़बर्दस्त गवाही दोगे, तो यह भी शैतान की हार का एक चिह्न होगा। शैतान को हराने के लिए मनुष्य पर पहले विजय पायी जाती है और अन्ततः उसे पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाता है। सार रूप में, हालाँकि, शैतान की हार के साथ-साथ यह उसी समय संताप के इस खोखले सागर से सम्पूर्ण मनुष्यजाति का उद्धार भी है। इस बात की परवाह किये बिना कि इस कार्य को सम्पूर्ण जगत में क्रियान्वित किया जाता है या चीन में, यह सब शैतान को हराने और संपूर्ण मनुष्यजाति का उद्धार करने के लिए है ताकि मनुष्य विश्राम के स्थान में प्रवेश कर सके। देहधारी परमेश्वर, यह सामान्य देह, निश्चित रूप से शैतान को हराने के वास्ते है। देह के परमेश्वर के कार्य का उन सभी लोगों का उद्धार करने के लिए उपयोग किया जाता है जो स्वर्ग के नीचे हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय पाने की, और इसके अतिरिक्त, शैतान को हराने के वास्ते है। परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का मर्म सम्पूर्ण मनुष्यजाति का उद्धार करने के लिए शैतान की पराजय से अभिन्न है। क्यों इस कार्य में अधिकांशतः, तुम लोगों से हमेशा गवाही देने के लिए कहा जाता है? और यह गवाही किस की ओर निर्देशित है? क्या यह शैतान की ओर निर्देशित नहीं है? इस गवाही को परमेश्वर के लिए दिया जाता है, और इसे यह प्रमाणित करने के लिए दिया जाता है कि परमेश्वर के कार्य ने अपने प्रभाव को प्राप्त कर लिया है। गवाही देना शैतान को हराने के कार्य से सम्बन्धित है; यदि शैतान के साथ कोई युद्ध न हुआ होता, तो मनुष्य से गवाही देने की अपेक्षा नहीं की गई होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान को अवश्य हराया जाना चाहिए, ताकि मनुष्य को बचाने के साथ ही, परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे, जिसे वह मनुष्य का उद्धार करने और शैतान के साथ युद्ध करने के लिए उपयोग करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य उद्धार का लक्ष्य और शैतान को हराने का एक साधन दोनों है, और इसलिए मनुष्य परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबधंन के कार्य के केन्द्रीय भाग में है, और शैतान महज विनाश का लक्ष्य है और शत्रु है। हो सकता है तुम महसूस करते हो कि तुमने कुछ नहीं किया है, किन्तु तुम्हारे स्वभाव में बदलावों के कारण, गवाही दी गई है, और यह गवाही शैतान की ओर निर्देशित है और इसे मनुष्य के लिए नहीं दिया गया है। मनुष्य एक ऐसी गवाही का आनन्द लेने के लिए उपयुक्त नहीं है। वह परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य को कैसे समझ सकता है? परमेश्वर की लड़ाई का लक्ष्य शैतान है; इसी बीच मनुष्य केवल उद्धार का लक्ष्य है। मनुष्य के पास भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है, और वह इस कार्य को समझने में अक्षम है। यह शैतान की भ्रष्टता के कारण है और मनुष्य के लिए अंतर्निहित नहीं है, बल्कि इसे शैतान के द्वारा निर्देशित किया जाता है। आज, परमेश्वर का मुख्य कार्य शैतान को हराना है, अर्थात्, मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पाना है, ताकि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की अंतिम गवाही दे सके। इस तरह से, सभी चीज़ों को पूरा कर लिया जाएगा। बहुत से मामलों में, तुम्हारी खुली आँखों को ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ भी नहीं किया गया है, किन्तु वास्तव में, कार्य को पहले से ही पूरा किया जा चुका है। मनुष्य अपेक्षा करता है कि पूर्णता का समस्त कार्य दृश्यमान हो, मगर तुम्हारे लिए इसे दृश्यमान किये बिना ही, मैंने अपने कार्य को पूरा कर लिया है, क्योंकि शैतान ने समर्पण कर दिया है, जिसका मतलब है कि उसे पूरी तरह से पराजित किया जा चुका है, यह कि परमेश्वर की सम्पूर्ण बुद्धि, सामर्थ्य और अधिकार ने शैतान को परास्त कर दिया है। यह बिलकुल वही गवाही है जिसे दिया जाना चाहिए, और हालाँकि मनुष्य में इसकी कोई स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं है, हालाँकि यह खुली आँखों के लिए दृश्यमान नहीं है, फिर भी शैतान को पहले से ही पराजित किया जा चुका है। इस कार्य की सम्पूर्णता शैतान के विरुद्ध निर्देशित है, और शैतान के साथ युद्ध के कारण कार्यान्वित की जाती है। और इसलिए, ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिन्हें मनुष्य "सफल हो चुकी हैं" के रूप में नहीं देखता है किन्तु जो, परमेश्वर की नज़रों में, बहुत समय पहले ही सफल हो गई थीं। यह परमेश्वर के समस्त कार्य की एक भीतरी सच्चाई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 593

उन सभी लोगों के पास सिद्ध बनाए जाने का अवसर है जो सिद्ध बनाए जाने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हर किसी को शांत अवश्य हो जाना चाहिए: भविष्य में तुम सभी लोग मंज़िल में प्रवेश करोगे। किन्तु यदि तुम सिद्ध बनाए जाने की इच्छा नहीं रखते हो, और अद्भुत क्षेत्र में प्रवेश करने की इच्छा नहीं रखते हो, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है। वे सभी जो सिद्ध बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और जो परमेश्वर के प्रति वफादार हैं, वे सभी जो आज्ञापालन करते हैं, और वे सभी जो वफादारी से अपने कार्य को करते हैं—ऐसे सभी लोगों को सिद्ध बनाया जा सकता है। आज, वे सभी जो वफादारी से अपने अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हैं, विशेष रूप से वे जिन्होंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर ली है किन्तु उसे अभ्यास में नहीं लाते हैं—ऐसे सभी लोग सिद्ध बनाए जाने में असमर्थ हैं। उन सभी को सिद्ध बनाया जा सकता है जो वफादार होने और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की इच्छा रखते हैं, भले ही वे थोड़े अज्ञानी हों; उन सभी को सिद्ध बनाया जा सकता है जो खोज करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर तुम इस दिशा में खोज करने के इच्छुक हो, तो तुम्हें सिद्ध बनाया जा सकता है। मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निष्कासित करने का इच्छुक नहीं हूँ, किन्तु यदि मनुष्य अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करता है, तो वह सिर्फ अपने आप को बर्बाद कर रहा है; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निष्कासित करता है, किन्तु तुम स्वयं हो। यदि तुम स्वयं अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करते हो—यदि तुम आलसी हो, या अपने कर्तव्य को नहीं करते हो, या वफादार नहीं हो, या सत्य की खोज नहीं करते हो, और हमेशा जैसा चाहते हो वैसा ही करते हो, यदि तुम लापरवाही से व्यवहार करते हो, अपनी प्रसिद्धि और सौभाग्य के लिए लड़ते हो, और विपरीत लिंग के साथ अपने व्यवहार में बेईमान हो, तो तुम अपने पापों के बोझ को स्वयं वहन करोगे; तुम किसी की भी दया के योग्य नहीं हो। मेरा उद्देश्य तुम सभी लोगों को सिद्ध बनाना है, और कम से कम तुम लोगों पर विजय पाना है, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे सिद्ध बनाया जाए, अन्ततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ या निम्न क्षमता वाला कहता हूँ—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह सिद्ध नहीं करता है कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं है कि मैं तुम लोगों को बचाने की इच्छा नहीं करता हूँ। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, कहने का तात्पर्य है कि जिस कार्य को मैं करता हूँ वह उद्धार के कार्य की निरन्तरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध किये जाने का एक अवसर है: बशर्ते कि तुम तैयार हो, बशर्ते कि तुम खोज करते हो, अन्त में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुम में से किसी एक को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि तुम निम्न क्षमता वाले हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च क्षमता वाले हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निरक्षरता के स्तर के अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएं इस तथ्य के अनुसार होंगी कि तुम साक्षर हो; यदि तुम बुज़ुर्ग हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम आतिथ्य प्रदान करने में सक्षम हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ इसके अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम आतिथ्य प्रदान नहीं कर सकते हो, और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे यह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो, या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य हो, या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य हो, तो मेरे द्वारा तुम्हारी सिद्धता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अन्त तक आज्ञापालन करना, और परमेश्वर से सर्वोच्च प्रेम करने की खोज करना—यह तुम्हें अवश्य पूरा करना चाहिए, और इन तीन चीज़ों की अपेक्षा अन्य कोई बेहतर अभ्यास नहीं है। अन्ततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को प्राप्त करे, और यदि वह इन्हें प्राप्त कर सकता है तो उसे सिद्ध बनाया जाएगा। किन्तु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सचमुच में खोज करनी होगी, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा, उसके प्रति निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध बनाए जाने का अवसर है, और प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध बनाए जाने में सक्षम है, और यह सत्य है, किन्तु तुम अपनी खोज में बेहतर होने की कोशिश नहीं करते हो। यदि तुम इन तीनों मापदंडों को प्राप्त नहीं करते हो, तो अन्त में तुम्हें अवश्य निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस स्तर तक पहुँचे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबुद्धता हो, और वह बिल्कुल अन्त तक आज्ञापालन करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को करना चाहिए। जब तुम सभी लोग अपने कर्तव्य को कर लेते हो, तो तुम सभी लोगों को सिद्ध बनाया जा चुका होगा, तुम लोगों के पास ज़बरदस्त गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है वे सभी ऐसे लोग हैं जो शैतान के ऊपर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा को प्राप्त कर लिया है, और वे ऐसे लोग हैं जो उस अद्भुत मंज़िल में जीवन बिताने के लिए बने रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 594

आरंभ में परमेश्वर विश्राम कर रहा था। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य या अन्य कुछ भी नहीं था, और परमेश्वर ने किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं किया था। परमेश्वर ने अपने प्रबंधन के कार्य को केवल तब आरंभ किया जब एक बार मानवजाति अस्तित्व में आ गई और एक बार जब मानवजाति भ्रष्ट कर दी गई। इसके बाद से, परमेश्वर ने अब और विश्राम नहीं किया बल्कि इसके बजाय उसने स्वयं को मनुष्यजाति के बीच व्यस्त रखना आरंभ कर लिया। यह मनुष्यों की भ्रष्टता की वजह से था कि परमेश्वर को उसके विश्राम से उठा दिया गया, और यह प्रधान स्वर्गदूत के विद्रोह के कारण भी था कि जिसने परमेश्वर को उसके विश्राम से उठा दिया। यदि परमेश्वर शैतान को परास्त नहीं करता और मानवजाति को नहीं बचाता है, जो कि भ्रष्ट हो चुकी है, तो परमेश्वर पुनः कभी भी विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगा। जैसे मनुष्य में विश्राम का अभाव है, वैसे ही परमेश्वर में भी है। जब परमेश्वर पुनः विश्राम में प्रवेश करेगा, तो मनुष्य भी विश्राम में प्रवेश करेगा। विश्राम में जीवन बिना युद्ध, बिना गंदगी और लगातार बनी रहने वाली अधार्मिकता के बिना है। कहने का अर्थ है कि इसमें शैतान के उत्पीड़न (यहाँ "शैतान" का संकेत शत्रुतापूर्ण शक्तियों से हैं), शैतान की भ्रष्टता, और साथ ही परमेश्वर की विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का अभाव है। हर चीज अपने मूल स्वभाव का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना करती है। स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। यह मानवजाति का विश्राम से भरा जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करेगा, तो पृथ्वी पर अब और कोई अधार्मिकता नहीं रहेगी, और शत्रुतापूर्ण शक्तियों का आक्रमण नहीं होगा। मानवजाति एक नये राज्य में भी प्रवेश करेगी, वह शैतान द्वारा भ्रष्ट की गयी मानव जाति अब और नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानव जाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति के विश्राम का दिन परमेश्वर के भी विश्राम का दिन है। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने की असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया; ऐसा नहीं था कि वह मूलरूप में विश्राम करने में असमर्थ था। विश्राम में प्रवेश करने का यह अर्थ नहीं है कि सभी चीज़ों का चलना बंद हो जाएगा, या सभी चीजें विकसित होना बंद कर देंगी, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य होना बंद हो जाएगा, या मनुष्य का जीवित रहना बंद हो जाएगा। विश्राम में प्रवेश करने का चिह्न इस प्रकार है: शैतान नष्ट कर दिया गया है; शैतान के साथ बुरे कामों में शामिल दुष्ट लोगों को दण्डित किया गया है और मिटा दिया गया है; परमेश्वर के प्रति सभी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य को अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीषों के अधीन जीवन जियेगीजीएगी; वहाँ शैतान की कुछ भी भ्रष्टता नहीं होगी, न ही कोई अधार्मिक बात होगी। मानवजाति सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेगी, वह परमेश्वर की देखभाल के अधीन रहेगी। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवजाति को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा, और मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में अब और नहीं रहेगा। इसलिए, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा, और मनुष्य अब और जल्दबाजी नहीं करेगा; परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपनी मूल अवस्था में लौट जाएगा, और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान में लौट जाएगा। ये वे स्थान हैं जिनमें परमेश्वर के समस्त प्रबंधन के अंत के बाद परमेश्वर और मनुष्य अपने-अपने विश्राम करेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मनुष्य के पास मनुष्य की मंज़िल है। विश्राम करते हुए, परमेश्वर पृथ्वी पर समस्त मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा। जबकि परमेश्वर के प्रकाश में, मनुष्य स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेगा। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, और मनुष्य भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर की मंज़िल में रहने में असमर्थ होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही राज्य के भीतर नहीं रह सकते हैं; बल्कि दोनों के जीने के अपने स्वयं के तरीके हैं। एकमात्र परमेश्वर ही व है जो समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करता है, जबकि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का ठोस स्वरूप है। यह मानवजाति है जिसकी अगुवाई की जाती है; सार के संबंध में, मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं है। विश्राम करने का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, या मानवजाति के बीच होने के समय मानवजाति के आनंद या उसकी पीड़ाओं में सहभागी नहीं बनेगा। जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती है, तो इसका अर्थ है कि मनुष्य एक सच्ची सृष्टि बन गया है; मानवजाति पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करेगी और सामान्य मानवीय जीवन जियेगीजीएगी। लोग परमेश्वर के अब और अवज्ञाकारी और प्रतिरोध करने वाले नहीं होंगे; वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के संबंधित जीवन और उनकी मंज़िलें हैं। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस तरह, परमेश्वर का अपने प्रबंधन का कार्य पूरा करने के बाद विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश इसी तरह से अपरिहार्य प्रवृत्ति बन जाता है। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है, और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। जब मनुष्य विश्राम करते हुए परमेश्वर की आराधना करेगा, तो वो पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा, और जब परमेश्वर विश्राम करते हुए मानवजाति के बचे हुए हिस्से की अगुआई करेगा; तो वह उनकी स्वर्ग से अगुआई करेगा, पृथ्वी से नहीं। परमेश्वर तब भी पवित्रात्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों के विश्राम करने के स्वयं के संबंधित भिन्न-भिन्न तरीके हैं। जिस समय परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जिस समय मनुष्य विश्राम करेगा, तो वह स्वर्ग आने में और स्वर्ग के जीवन का आनंद उठाने में भी परमेश्वर द्वारा अगुवाई किया जाएगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व अब और नहीं रहेगा। और शैतान की तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में अब और नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी परमेश्वर को पृथ्वी पर उत्पीड़ित किया था और वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिये गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिये गए होंगे। उन दुष्ट व्यक्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिए जाने के बाद, पृथ्वी पुनः कभी भी शैतान की पीडाओं को नहीं जानेगी। मानवजाति संपूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी, और केवल तब कहीं जाकर परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्वापेक्षाएँ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 595

सभी चीजों का अंत की ओर पहुँचना परमेश्वर के कार्य की समाप्ति की ओर संकेत करता है और मानवजाति के विकास के अंत का संकेत करता है। इसका अर्थ है कि शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य अपने विकास के अंतिम चरण पर पहुँच गए होंगे, और यह कि आदम और हव्वा के वंशजों ने अपनी वंश-वृद्धि को पूरा कर लिया होगा। इसका अर्थ यह भी है कि अब ऐसी मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, के लिए लगातार विकास करते रहना असंभव होगा। आदम और हव्वा आरंभ में भ्रष्ट नहीं थे, पर आदम और हव्वा जो अदन के बगीचे से निकाले गए थे, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए थे। जब परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो आदम और हव्वा—जो अदन के बगीचे से बाहर निकाले गये थे—और उनके वंशजों का अन्त हो जाएगा; भविष्य की मानवजाति आदम और हव्वा के वंशजों से मिलकर बनेगी, परंतु वे ऐसे लोग नहीं होंगे जो शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हैं। बल्कि ये वे लोग होंगे जिन्हें बचाया और शुद्ध किया गया है। यह वह मानवजाति है जिसका न्याय किया जा चुका है और जिसे ताड़ना दी जा चुकी है, और ऐसी है जो पवित्र है। ये लोग उस मानव जाति के लोगों के समान नहीं होंगे, जैसे ये मूल रूप से थे; कोई कह सकता है कि वे मूल आदम और हव्वा से पूर्णतः भिन्न प्रकार के लोग हैं। इन लोगों को उन सभी लोगों में से चुना गया होगा जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया था, और ये वे लोग होंगे जो अंततः परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौरान अडिग रहे हैं; वह भ्रष्ट मानवजाति में से लोगों का अंतिम शेष समूह होगा। केवल लोगों का यह समूह ही परमेश्वर के साथ-साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश कर पाएगा। जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान—अर्थात्, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—अडिग रहने में समर्थ हैं, ये वे लोग होंगे जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; इसलिए, जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, वे सब शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और केवल परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद ही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग ही जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब यह कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जिन लोगों को बचे रहने की अनुमति मिलेगी वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और वे मानवता के उच्चतर स्तर में प्रवेश करेंगे जहाँ वे एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था, और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवाएँ भी दी थीं, परंतु जब अंतिम दिन आएगा, तो उन्हें तब भी उनकी अपनी दुष्टता, अवज्ञा व छुटकारा न पाने की योग्यता के कारण दूर और नष्ट कर दिया जाएगा। भविष्य के संसार में उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा, और भविष्य की मानवजाति के बीच उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा। जब मानवजाति में से पवित्र लोग विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो कोई भी और सभी कुकर्मी और कोई भी और सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है इस बात की परवाह किए बिना कि वे मृतकों की आत्माएँ हैं या अभी भी देह में जीवित हैं, नष्ट कर दिए जाएँगे। इस बात की परवाह किए बिना कि ये कुकर्मी लोगों की आत्माएँ और कुकर्मी जीवित लोग हैं, या फिर धार्मिक लोगों की आत्माएँ और वे लोग हैं जो धार्मिक कार्य करते हैं, किस युग से संबंधित हैं, प्रत्येक कुकर्मी नष्ट कर दिया जाएगा, और प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति जीवित रहेगा। कोई व्यक्ति या आत्मा उद्धार प्राप्त करती है कि नहीं यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है, बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था या वे परमेश्वर की अवज्ञा करते थे। यदि पिछले युगों में लोगों ने बुरा किया और बचाए नहीं जा सके थे, तो वे निःसंदेह दण्ड के भागी बनेंगे। यदि इस युग में लोग बुरा करते हैं और बचाए नहीं जा सकते हैं, तो वे भी निश्चित रूप से दण्ड के लिए भागी हैं। लोग अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार अच्छे और बुरे के आधार पर अलग-अलग कर दिए जाने पर, लोगों को तुरंत दण्ड या पुरस्कार नहीं दिया जाता है; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद बुराई को दण्डित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह अच्छे और बुरे का उपयोग मानवजाति को पृथक करने के लिए तब से कर रहा है जब से उसने मानव जाति के बीच अपना कार्य आरंभ किया था। कार्य का अंत करने पर वह दुष्टों और धार्मिकों को पृथक करने और फिर बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का कार्य आरंभ करने के बजाय, वह अपने कार्य की समाप्ति पर ही केवल धार्मिकों को पुरस्कार और दुष्टों को दण्ड देगा। बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर दुष्टों का नाश नहीं करता बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो संपूर्ण मानव जाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने योग्य नहीं होती, और परमेश्वर समस्त मानवजाति को एक बेहतर राज्य में नहीं पहुँचा पाता। इस प्रकार वह कार्य पूर्णतः समाप्त नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानव जाति पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इस तरह से ही परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 596

आज लोग देह की बातों को छोड़ने में असमर्थ हैं, वे देह के सुख को त्याग नहीं सकते हैं, न वे संसार, धन और अपने भ्रष्ट स्वभाव का त्याग कर पाते हैं। अधिकांश व्यक्ति ये कार्य सतही तौर पर करते हैं। वास्तव में इन लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं, इससे भी बढ़कर वे परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं। परमेश्वर उनके हृदयों में नहीं है, और इसलिए वे वह सब समझ नहीं सकते कि परमेश्वर क्या करता है और इससे भी बढ़कर बात यह है कि वे उन वचनों पर विश्वास नहीं कर पाते हैं, जो वह स्वयं अपने मुख से कहता है। ये लोग अत्यधिक देह के स्तर पर हैं, वे आकंठ भ्रष्ट हैं, और उनमें सत्य का अभाव है, इसके साथ-साथ वे विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर देहधारण कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के देह धारण पर विश्वास नहीं करता है, अर्थात कोई जो प्रत्यक्ष परमेश्वर के कार्य और बातों पर और प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास न करके स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—उसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों के पास मानवीयता और विवेक का अभाव होता है, फिर सत्य के बारे में तो क्या कहें। ये वे लोग हैं जो प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते किंतु अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर इनके लिए सर्वाधिक विश्वसनीय है और उनके हृदयों को सबसे अधिक खुशी देता है। वे जिसे खोजते हैं वह वास्तविकता का सत्य नहीं है, न ही जीवन का वास्तविक सार है, परमेश्वर की योजना तो है ही नहीं; वे केवल रोमांच का पीछा करते हैं। वे सब बातें या वस्तुएँ जो उन्हें अधिक से अधिक उनकी अपनी इच्छाओं को पूरा करने का अवसर देती हैं, वे ही हैं जिन पर वे विश्वास करते और जिनका वे पीछा करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं कि निज इच्छाओं को पूरा करें—सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ये लोग बुरे कार्य करने वाले नहीं हैं? वे अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, और वे यह विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उन्हें नष्ट कर देगा, इन "इन भले लोगों को"। बल्कि ये विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें बचाकर रखेगा, और इससे भी अधिक यह कि प्रचुरता से पुरस्कार देगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत से कार्य किये हैं, और बड़े परिमाण में परमेश्वर के प्रति "निष्ठा" का प्रदर्शन किया है। यदि उन्हें साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करना हो, तो जैसे ही उनकी अभिलाषाएँ अधूरी रहें, वे तुरंत परमेश्वर के विरुद्ध बोलने लगेंगे और क्रोध से भर जाएँगे। ये बुरे लोग हैं जो अपनी अभिलाषाएँ पूरी करने की खोज में रहते हैं, ये लोग सत्य का पीछा करने वाले निष्ठावान लोग नहीं हैं। ऐसे लोग तथाकथित दुष्ट लोग हैं जो मसीह के पीछे चलते हैं। जो लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं वे सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। वे मानवजाति के भविष्य के परिणाम को समझने में और भी अधिक अयोग्य हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी कार्य या वाणी पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे मानव जाति के भविष्य के गंतव्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। इस कारण, यदि वे साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करें तब भी वे बुरा करेंगे और सत्य को नहीं खोजेंगे, और न उस सत्य पर अमल करेंगे, जिसे मैं चाहता हूँ। वे लोग जो यह विश्वास नहीं करते कि वे नष्ट होंगे, वे ही लोग असल में नष्ट होंगे। वे सब विश्वास करते हैं कि वे बहुत चतुर हैं, और वे ही सत्य पर अमल करते हैं। वे अपने बुरे आचरण को सत्य मानते हैं और उसमें सुख पाते हैं। ये दुष्ट लोग अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, वे सत्य को धर्मशिक्षा मानते हैं, और अपने बुरे कार्यों को सत्य मानते हैं, और अंत में वे केवल वहीं काटेंगे जो उन्होंने बोया है। लोग जितना अधिक आत्मविश्वास रखते हैं और जितना अधिक हठ करते हैं, वे उतना ही अधिक सत्य को पाने में असमर्थ हैं; लोग जितना ज्यादा स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ये वे लोग हैं जो दण्डित किये जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 597

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर मनुष्यों द्वारा विश्वास किये जाने के लिए है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकरते रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। यह उसी प्रकार है जैसे तुम लोगों के बीच यदि कोई मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानता है, परंतु देहधारी परमेश्वर के प्रति सत्य को अमल में नहीं ला पाता है, तो वह अंत में निकाल दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा और यदि कोई मौखिक रूप में साक्षात् परमेश्वर को मानता है और देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है परंतु फिर भी अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर को खोजता है, तो भविष्य में और भी अधिक उसका नाश किया जाएगा। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने व उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बच सकता है; विश्राम के समय जो लोग बच जाएँगे, उनमें इन लोगों के समान कोई भी नहीं होगा। दुष्ट लोग वे हैं जो सत्य पर अमल नहीं करते, उनका मूल तत्व प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है, उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट होंगे। चाहे तुममें सत्य हो, चाहे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करो, इसका निर्धारण तुम्हारे रूपरंग या कुछेक अवसरों पर तुम्हारी बातचीत और आचरण से नहीं, बल्कि तुम्हारे मूलतत्व के आधार पर होगा। प्रत्येक व्यक्ति का मूलतत्व तय करेगा कि उनका नाश किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उनके आचरण में प्रकट उनके मूलतत्व और उनकी सत्य की खोज में प्रकट होता है। उन लोगों में जो यही कार्य करते हैं और उतने ही परिमाण में कार्य करते हैं, वे लोग जिनका मानवीय मूलतत्व अच्छा है, और जो सत्य धारण करते हैं, वे ही लोग बच सकते हैं, परंतु वे जिनके मानवीय मूलतत्व बुरे हैं और जो साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, वे नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य की नियति के संबंध में परमेश्वर के कोई भी कार्य या वचन, मनुष्यों के मूलतत्व के आधार पर उचित रीति से प्रत्येक मनुष्य में कार्य करते हैं, वहाँ कोई संयोग नहीं है, और निश्चय ही लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है। केवल जब एक मनुष्य कार्य करेगा तब मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होंगे। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है, वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करेगा। अब बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानवजाति के भविष्य की नियति को समझने में असमर्थ हैं, और वे उन वचनों पर भी विश्वास नहीं करते जो मैं कहता हूँ, वे सब जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य पर अमल नहीं करते हैं, वे सब दुष्टात्माएँ हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 598

वे जो खोज करते हैं और वे जो खोज नहीं करते, वे अब दो भिन्न प्रकार के लोग हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के दो अलग-अलग गंतव्य हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य पर अमल करते हैं, परमेश्वर केवल उन्हीं का उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते हैं वे दुष्टात्माएँ और शत्रु के समान हैं। वे महादूत के वंशज हैं, और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। यहाँ तक कि एक अस्पष्ट परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? लोग जो विवेक रखते हैं परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं, उनका मूलतत्व भी परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और भले ही ऐसे व्यक्ति बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरें, वे तब भी नष्ट होंगे। वे जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होने की बात नहीं सह सकते, और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, वे सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं—और वे सब नष्ट होंगे। प्रत्येक व्यक्ति जो देहधारण करने वाले परमेश्वर को नहीं मानता वह दुष्ट है, और वे सब के सब नष्ट होंगे। वे सब जो विश्वास करते हैं पर सत्य पर अमल नहीं करते, वे जो देह में आए परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं करते हैं, वे सब नष्ट होंगे। यदि कोई अंत में बचा रहता है तो वह व्यक्ति है जो परिष्कार की कड़वाहट से गुजरा है और विश्वास में दृढ़ रहा है। ये वे हैं जो वास्तव में परीक्षाओं से गुजरे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता है वह शत्रु है, अर्थात जो इस धारा के भीतर या बाहर है, पर परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करता है वह मसीह-विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं, और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे लोग नहीं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं? क्या ये वे नहीं जो सिर्फ़ ज़बानी तौर पर विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं हैं? क्या ये लोग वे नहीं हैं जो आशीषों को पाने की फ़िराक में रहते हैं परंतु परमेश्वर के लिए गवाही नहीं बन सकते हैं? तुम आज भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलतेमिलते हो और उनके प्रति विवेक और प्रेम रखते हो, लेकिन इस मामले में क्या तुम शैतान के प्रति सद्भावना नहीं दिखा रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि इन दिनों में भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा मन में लिए बिना, आँखें मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रह सकते हैं, या परमेश्वर के इरादों को अपना इरादा मानने में किसी भी तरह सक्षम नहीं हैं, तो उनका अंत और भी अधिक दुःखदायी होगा। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम विवेक को तनाव में डालकर शत्रु से प्रेम कर सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता के संज्ञान की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ, और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और व्यक्तिगत सद्भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम आज्ञाकारी हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य है? यदि लोग शत्रुओं को स्थान देते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रूकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और जो अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते हैं, और जो ज़बानी तौर परदेहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह विरोधी हैं, उनको छोड़ दो जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। ये सभी लोग नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवजाति सही मार्ग में प्रवेश कर लेगी उसके बाद, लोगों का सामान्य मानव जीवन होगा। वे सब अपने संबंधित कर्तव्यों को निभाएँगे और पूर्णतः परमेश्वर के प्रति विश्वसनीय होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे, और वे परमेश्वर के कारण और परमेश्वर के लिए जीएँगे। उनमें अवज्ञा और प्रतिरोध का अभाव होगा। वे पूर्णतः परमेश्वर की आज्ञा पालन कर पाएँगे। यही परमेश्वर और मनुष्य का जीवन है और राज्य का जीवन है, और यही विश्राम का जीवन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 599

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को कलीसिया में लाते हैं, वे बहुत स्वार्थी हैं और अपनी दयालुता का प्रदर्शन करते हैं। ये लोग इस बात की कोई परवाह न करते हुए कि क्या वे विश्वास करते हैं या यह परमेश्वर की इच्छा है या नहीं, केवल प्रेमपूर्ण बनने पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नी को परमेश्वर के सामने लाते हैं, या अपने माता-पिता को परमेश्वर के सामने लाते हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि क्या पवित्र आत्मा सहमत है या अपना कार्य करता है, वे आँखें बंद करके परमेश्वर के लिए "प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते हैं"। इन लोगों के प्रति इस तरह की दया को बढ़ाने से संभवतः क्या लाभ मिल सकता है जो विश्वास नहीं करते हैं? भले ही ये अविश्वासी लोग जो पवित्रात्मा की उपस्थिति से रहित हैं, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए संघर्ष करते हैं, तब भी वे बचाए नहीं जा सकते हैं जैसा कि कोई सोचता हो कि वह बचाया जा सकता है। जो लोग उद्धार प्राप्त करते हैं उनके लिए वास्तव में प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुज़रे हैं और देहधारी परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, उन्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता है। इसलिए जिस क्षण से ये लोग नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण करना आरंभ करते हैं उसी क्षण से उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति का अभाव होता है। उनकी स्थिति और वास्तविक अवस्था के अनुसार, उन्हें बस पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा व्यय करने का निर्णय नहीं लेता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार की प्रबुद्धता प्रदान करता है या उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ अनुसरण की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम को प्रकट करता है—यही पर्याप्त है। मनुष्य का उत्साह और अभिप्राय शैतान से आते हैं और वे किसी भी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते हैं। चाहे कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का हो, उसमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए—क्या कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पूर्ण कर सकता है? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार के अभिप्रायों को आश्रय देते हैं? क्या यह किसी की अपनी योजनाओं और स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करने के लिए नहीं है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए है? क्या यह परमेश्वर के कार्य के लिए है? क्या यह प्राणी के कर्तव्य पूरा करने के लिए है? वे जो पहले परमेश्वर पर विश्वास करते थे और पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके थे, वे कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पा सकते हैं; यह निर्धारित हो चुका है कि ये लोग नष्ट हो जाएँगे। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। मनुष्य का उत्साह और प्रेम, मनुष्य के अभिप्रायों का प्रतिनिधित्व करता है, परंतु परमेश्वर के अभिप्राय का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और परमेश्वर के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। भले ही कोई उन व्यक्तियों की ओर सर्वाधिक संभव मात्रा में प्रेम और दया बढ़ाए जो नाममात्र के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करने का दिखावा करते हैं परंतु नहीं जानते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या है, किन्तु वे लोग तब भी परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं कर पाएँगे या पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमजोर क्षमता वाले हों, और बहुत सी सच्चाईयों को नहीं समझते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि जो अच्छी क्षमता वाले हैं मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते हैं, बस पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ऐसे लोगों के उद्धार की कोई संभावना नहीं है। यद्यपि वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ें या कभी-कभी सुनें या परमेश्वर की स्तुति गाएँ, किंतु अंत में विश्राम के समय में शेष नहीं बचेंगे। कोई व्यक्ति ईमानदारी से खोज करता है या नहीं यह इस बात से निर्धारित नहीं होता है कि अन्य लोग उसके बारे में क्या अनुमान लगाते हैं और आसपास के लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि क्या पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य करता है, और कि क्या उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति है, यह तो और भी इस बात से निर्धारित होता है कि क्या एक निश्चित अवधि तक पवित्र आत्मा के कार्य से गुज़रने के बाद उसके स्वभाव में परिवर्तन आता है, और कि क्या उसे परमेश्वर का ज्ञान मिल गया है; यदि पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति के ऊपर कार्य करेगा, तो उस व्यक्ति का स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा, परमेश्वर पर विश्वास करने का उसका विचार धीरे-धीरे और अधिक शुद्ध हो जाएगा। जब तक उनमें परिवर्तन होता रहता है, तब तक इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि कोई कितने समय तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उनके ऊपर कार्य करता है। यदि उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है, तो इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य नहीं करता है। यद्यपि ऐसे व्यक्ति कुछ सेवा तो करते हैं, किन्तु वे एक अच्छा भविष्य प्राप्त करने के अपने अभिप्रायों से प्रेरित होते हैं। कभी-कभी की सेवा उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकती है। अंततः वे तब भी नष्ट कर दिए जाएँगे, क्योंकि उन लोगों की आवश्यकता नहीं है जो केवल राज्य के भीतर सेवाएँ देते हैं, न ही ऐसे किसी व्यक्ति की आवश्यकता है जिसका स्वभाव उन लोगों की सेवा के योग्य होने के लिए नहीं बदला है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है और जो परमेश्वर के प्रति विश्वसनीय हैं। अतीत के ये वचन, "जब कोई प्रभु पर विश्वास करता है, तो सौभाग्य उसके पूरे परिवार पर मुस्कुराता है" अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त है परंतु मनुष्य की नियति से संबंधित नहीं हैं। ये केवल अनुग्रह के युग के दौरान एक चरण के लिए ही उपयुक्त हैं। इन वचनों का अभीष्ट अर्थ उस शांति और भौतिक आशीषों पर निर्देशित है जिनका लोग आनंद लेते हैं; इनका अर्थ यह नहीं है कि प्रभु में विश्वास करने वाले व्यक्ति के पूरे परिवार को बचाया जाएगा, न ही इनका अर्थ यह है कि जब कोई व्यक्ति अच्छे भविष्य को पाता है, तो उसके पूरे परिवार को भी विश्राम में लाया जाएगा। चाहे किसी व्यक्ति को आशीषें मिलें या दुर्भाग्य सहना पड़े, इसका निर्धारण व्यक्ति के भाव के अनुसार होगा, यह उस आम भाव के अनुसार नहीं होगा जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। राज्य में बस इस प्रकार की लोकोक्ति या इस प्रकार का नियम नहीं है। यदि कोई अंत में बच कर जीवित रहने में सक्षम रहता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को प्राप्त कर लिया है, और यदि कोई विश्राम के दिनों में बचने में सक्षम नहीं हो पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं है और उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक की एक अनूकूल नियति है। ये नियतियाँ प्रत्येक व्यक्ति के मूलतत्व के अनुसार निर्धारित होती हैं और दूसरों से इनका कोई संबंध नहीं है। किसी बच्चे का दुष्ट आचरण उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता को उसके माता-पिता के साथ साझा किया जा सकता है। माता-पिता का दुष्ट आचरण उसकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, माता-पिता की धार्मिकता को उनके बच्चों के साथ साझा नहीं किया जा सकता है। हर कोई अपने-अपने पापों को ढोता है। और हर कोई अपने-अपने सौभाग्य का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता है। यही धार्मिकता है। मनुष्य के विचार में, यदि माता-पिता अच्छा सौभाग्य पाते हैं, तो उनके बच्चे भी वैसा ही पा सकते हैं, यदि बच्चे बुरा करते हैं, उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है, और कार्य करने का मनुष्य का तरीका है। यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उस मूलतत्व के अनुसार होता है जो उसके आचरण से आता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी किसी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; इससे भी अधिक, कोई भी किसी दूसरे के बदले में दण्ड प्राप्त नहीं कर सकता है। यह परम सिद्धान्त है। माता-पिता का अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं है कि वे अपनी संतान के बदले में धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। न ही किसी बच्चे के अपने माता-पिता के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वह अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकता है। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, "उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।" कोई भी अपने बच्चों के लिए अपने गहन प्रेम के आधार पर बुरा कार्य करने वाले अपने बच्चों को विश्राम में नहीं ले जा सकता है, न कोई अपने स्वयं के धार्मिक आचरण के आधार पर अपनी पत्नी (या पति) को विश्राम में पहुँचा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; और इसमें किसी के लिए भी कोई अपवाद नहीं हो सकता है। धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करेंगे और बुरा करने वाले, बुरा ही करेंगे। धार्मिकता करने वाले जीवित बच सकेंगे, और बुरा करने वाले नष्ट हो जाएँगे। जो पवित्र हैं, वे पवित्र हैं; वे अशुद्ध नहीं हैं। जो अशुद्ध हैं वे अशुद्ध हैं, और उनमें पवित्रता का एक अंश भी नहीं है। सभी दुष्ट लोग नष्ट कर दिए जाएँगे, और सभी धार्मिक लोग जीवित बचेंगे, भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं है, और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं है। ये दोनों असंगत प्रकार हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले, उसके रक्त-संबंधी थे, किन्तु एक बार विश्राम में प्रवेश कर लेने पर, कहने के लिए उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं और जो नहीं करते हैं वे शत्रु हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो घृणा करते हैं वे एक दूसरे के विरोध में हैं। जो विश्राम में प्रवेश करते हैं और जो नष्ट किए जा चुके हैं वे दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी है। अपने कर्तव्यों को करने वाले प्राणी जीवित बच पाने में समर्थ होंगे, और अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करने वाले प्राणी नष्ट हो जाएँगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा। क्या तुम एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम अपने नास्तिक माता-पिता के प्रति एक प्राणी के रूप में कर्तव्यनिष्ठ हो? क्या परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में मनुष्य का दृष्टिकोण सही है? तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम क्या पाना चाहते हो? तुम परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर सकते हैं और पूरा प्रयास नहीं कर सकते हैं, वे नष्ट कर दिए जाएँगे। आजकल लोगों में एक दूसरे के बीच रक्त-संबंध हैं, उनके बीच खून का रिश्ता है, किंतु बाद में यह सब ध्वस्त हो जाएगा। विश्वासी और अविश्वासी सुसंगत नहीं हैं बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी है। वे जो विश्राम में हैं विश्वास करते हैं कि कोई परमेश्वर है और उसके प्रति आज्ञाकारी होते हैं। वे जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं, वे सब नष्ट कर दिये गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; माता-पिता या संतानें या पतियों और पत्नियों के बीच के संबंध कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की अत्यंत असंगतता से ये रक्त-संबंध टूट चुके होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 600

मानवजाति के बीच मूल रूप से परिवार नहीं थे; केवल पुरुष और महिला—दो प्रकार के लोग अस्तित्व में थे! कोई देश नहीं थे, परिवारों की तो बात ही छोड़ो, परंतु मनुष्य की भ्रष्टता के कारण, सभी प्रकार के लोगों ने स्वयं को कबीलों में संगठित कर लिया, बाद में ये देशों और राष्ट्रों में विकसित हो गए। ये देश और राष्ट्र छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर गठित हुए थे, और इस तरीके से सभी प्रकार के लोग, भाषा की भिन्नताओं और विभाजित करने वाली सीमाओं के अनुसार, विभिन्न नस्लों में बँट गए। वास्तव में, इस बात की परवाह किए बिना कि दुनिया में कितनी नस्लें हैं, मावजाति का केवल एकही पूर्वज है। आरंभ में, केवल दो प्रकार के ही लोग थे, और ये दो प्रकार पुरुष और स्त्री थे। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की प्रगति, इतिहास और भौगोलिक परिवर्तनों के गुज़रने के कारण, विभिन्न अंशों तक ये दो प्रकार के लोग और भी अधिक प्रकारों में विकसित हो गए। जब हम इसका विचार करते हैं, तो इस बात की परवाह किए बिना कि मानवजाति में कितनी नस्लें शामिल हैं, समस्त मानवजाति परमेश्वर का सृजन है। लोग चाहे किसी भी नस्ल से संबंधित हों, वे सब उसका सृजन हैं; वे सब आदम और हव्वा के वंशज हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के हाथों से सृजन नहीं किए गए हैं, फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज हैं, जिन्हें परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से सृजित किया है। लोग चाहे किसी भी श्रेणी से संबंधित हों, वे सभी उसके प्राणी हैं; चूँकि वे मनुष्य जाति से संबंधित हैं जिसका सृजन परमेश्वर ने किया था, इसलिए उनकी नियति वही है जो मानवजाति की होनी चाहिए, और वे उन नियमों के कारण विभाजित हैं जो मानवजाति को संगठित करते हैं। कहने का अर्थ है, कि बुरा करने वाले और धार्मिक लोग अंततः प्राणी ही हैं। वे प्राणी जो बुरा करते हैं अंततः नष्ट हो जाएँगे, और वे प्राणी जो धार्मिक कर्म करते हैं वे फलस्वरूप जीवित बचे रहेंगे। इन दो प्रकार के प्राणियों के लिए यह सर्वथा उपयुक्त व्यवस्था है। कुकर्मी लोग, अपनी अवज्ञा के कारण, इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे परमेश्वर की सृष्टि हैं किन्तु शैतान के द्वारा लूट लिये गए हैं और इस कारण वे बचाए जाने में असमर्थ हैं। धार्मिक आचरण वाले प्राणी इस तथ्य पर भरोसा नहीं कर सकते हैं कि इस बात से इनकार करने के लिए जीवित बचे रहेंगे कि वे परमेश्वर के द्वारा सृजन किए गए हैं मगर शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उद्धार प्राप्त कर चुके हैं। कुकर्मी लोग ऐसे प्राणी हैं जो परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं; ये ऐसे प्राणी हैं जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है और ये पहले से ही शैतान के द्वारा पूरी तरह से लूट लिए गए हैं। पाप करने वाले लोग भी मनुष्य ही हैं; वे ऐसे लोग हैं जो चरम सीमा तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं और ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है। ठीक जिस प्रकार वे भी प्राणी हैं, धार्मिक आचरण वाले लोग भी भ्रष्ट किए गए हैं, परंतु ये वे लोग हैं जो अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़कर मुक्त होना चाहते हैं और परमेश्वर का आज्ञा पालन करने में सक्षम हैं। धार्मिक आचरण वाले लोग धार्मिकता से नहीं भरे हैं; बल्कि, वे उद्धार प्राप्त कर चुके हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ कर स्वतंत्र हो गए हैं; वे अंत में डटे रहेंगे, परंतु कहने का यह अर्थ नहीं है कि वे शैतान के द्वारा भ्रष्ट नही किए गए थे। परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने के बाद, उसके सभी प्राणियों में, वे लोग होंगे जो नष्ट किए जाएँगे और वे होंगे जो जीवित बचे रहेंगे। यह उसके प्रबंधन कार्य की एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। कुकर्मी लोग जीवित नहीं बच सकते हैं; जो लोग अंत तक उसका आज्ञापालन और अनुसरण करते हैं वे निश्चित रूप से जीवित बचेंगे। चूँकि यह कार्य मानवजाति के प्रबंधन का है, इसलिए कुछ होंगे जो बचे रहेंगे और कुछ होंगे जो नष्ट कर दिए जाएँगे। ये अलग-अलग प्रकार के लोगों के अलग-अलग परिणाम है और उसके प्राणियों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं। मानवजाति के लिए परमेश्वर का अंतिम प्रबंधन परिवारों को ध्वस्त करके, देशों को ध्वस्त करके और राष्ट्रीय सीमाओं को ध्वस्त करके विभाजित करना है। यह परिवारों और राष्ट्र की सीमाओं के बिना एक है, क्योंकि, अंततः, मनुष्य एक ही पूर्वज का है, और परमेश्वर का सृजन है। संक्षेप में, कुकर्मी प्राणी नष्ट कर दिए जाएँगे, और जो परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं, वे जीवित बचेंगे। इस तरह, शेष भविष्य में कोई परिवार नहीं होगा, कोई देश नहीं होगा, विशेषरूप से कोई राष्ट्र नहीं होगा; इस प्रकार की मानवजाति सबसे अधिक पवित्र प्रकार की मानवजाति होगी। आदम और हव्वा का सृजन मूल रूप से इसलिए किया गया था ताकि मनुष्य पृथ्वी की सभी चीजों की देखभाल कर सके; आरंभ में मनुष्य सभी चीजों का स्वामी था। मनुष्य के सृजन में यहोवा का अभिप्राय मनुष्य को पृथ्वी पर अस्तित्व बनाए रखने की और इसके ऊपर की सभी चीजों की देखभाल करने की अनुमति देना भी था, क्योंकि आरंभ में मनुष्य भ्रष्ट नहीं किया गया था, और पाप करने में असमर्थ था। हालांकि मनुष्य के भ्रष्ट हो जाने के बाद वह चीज़ो का देखभालकर्ता नहीं रहा। और परमेश्वर द्वारा उद्धार मनुष्य के इस प्रकार्य को, मनुष्य के मूल कारण को पुनः-स्थापित करना और मूल आज्ञाकारिता को पुर्नस्थापित करना है; विश्राम में मानवजाति उस परिणाम का सटीक चित्र होगी जो उसका उद्धार का कार्य प्राप्त करने की आशा रखता है। यद्यपि यह अदन के बगीचे के जीवन के समान अब और नहीं होगा, किन्तु उसका मूलतत्व वही होगा; अब मानवजाति अपनी उस भ्रष्टता-रहित अवस्था में नहीं होगी जैसी वह आरंभ में थी। बल्कि ये ऐसी मानवजाति होगी जिसे भ्रष्ट किया गया था और फिर उसने उद्धार प्राप्त कर लिया। ये लोग जिन्होंने उद्धार प्राप्त कर लिया है अंततः (अर्थात् जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है) विश्राम में प्रवेश करेंगे। इसी प्रकार, जिन्हें दण्ड दिया गया है उनके परिणाम भी अंत में पूर्ण रूप से प्रकट किए जाएँगे, और उन्हें केवल तभी नष्ट किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। कहने का अभिप्राय है कि जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो वे जो कुकर्मी हैं और वे जिन्हें बचाया जा चुका है, सभी प्रकट किये जाएँगे, क्योंकि सभी प्रकार के लोगों को प्रकट करने का कार्य (इस बात की परवाह किए बिना कि वे कुकर्मी हैं या बचाए गए हैं) सभी मनुष्यों पर एक साथ संपन्न किया जाएगा। कुकर्मी हटा दिए जाएँगे, और जो बचे रह सकते हैं वे साथ-साथ प्रकट किए जाएँगे। इसलिए, सभी प्रकार के लोगों के परिणाम एक साथ प्रकट किए जाएँगे। वह कुकर्मी लोगों को अलग रखने और एक बार में उनका थोड़ा सा न्याय करने या उन्हें दण्डित करने से पूर्व, पहले ऐसे लोगों को विश्राम में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देगा जिन्हें बचाया जा चुका है; सत्य वास्तव में ऐसा नहीं है। जब कुकर्मी नष्ट हो जाते हैं और जो बचे रह सकते हैं वे विश्राम में प्रवेश कर लेते हैं, तब समस्त ब्रम्हाण्ड में उसका कार्य समाप्त हो चुका होगा। वहाँ जो आशीषें पाएँगे और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे उन के बीच प्राथमिकता का क्रम नहीं होगा; जो आशीष पाएँगे वे अनंतकाल तक जीवित रहेंगे, और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, वे समस्त अनंतकाल तक नष्ट होंगे। कार्य के ये दोनों कदम साथ-साथ पूर्ण होंगे। यह ठीक-ठीक इसलिए है क्योंकि आज्ञाकारी लोग नहीं हैं ताकि आज्ञाकारी लोगों की धार्मिकता प्रकट हो, और यह ठीक-ठीक इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग हैं जो आशीषें प्राप्त कर चुके हैं ताकि उन कुकर्मियों के दुष्ट आचरण के कारण उनके द्वारा सहे जा रहे दुर्भाग्य प्रकट किए जाएँगे। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों को प्रकट नहीं किया, तो वे लोग जो ईमानदारी से परमेश्वर का आज्ञा पालन करते हैं कभी भी प्रकाश को नहीं देखेंगे; यदि परमेश्वर उन्हें उचित नियति में नहीं पहुँचाता है जो आज्ञा पालन करते हैं, तो जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहींहैं वे अपने योग्य दण्ड को प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यही परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया है। यदि वह बुरे को दण्ड देने एवं अच्छे को पुरस्कृत करने का यह कार्य नहीं करता, तो उसके प्राणी कभी भी अपनी संबंधित नियतियों में पहुँचने में सक्षम नहीं हो पाते। एक बार जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश कर लेगी तब कुकर्मियों को नष्ट कर दिया जाएगा, समस्त मानवजाति सही मार्ग पर आ जाएगी, और हर प्रकार का व्यक्ति उन कामों के अनुसार जो उसे करने चाहिए, अपने स्वयं के प्रकार के साथ हो जाएगा। केवल यही मानवजाति के विश्राम का दिन होगा और मानव जाति के विकास की अपरिहार्य प्रवृत्ति होगी, और जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी केवल तभी परमेश्वर की महान और चरम कार्यसिद्धि पूर्णता पर पहुँचेगी; यह उसके कार्य का समापन अंश होगा। यह कार्य मानवजाति के ह्रासोन्मुख भौतिक जीवन का अंत करेगा, और यह भ्रष्ट मानवजाति का अंत करेगा। यहाँ से मानवजाति एक नए राज्य में प्रवेश करेगी। यद्यपि मनुष्य का भौतिक अस्तित्व रहता है, किंतु उसके इस जीवन के मूलतत्व और भ्रष्ट मानवजाति के मूलतत्व में महत्त्वपूर्ण अंतर होते हैं। उसके अस्तित्व का अर्थ और भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का अर्थ भी भिन्न होता है। यद्यपि यह एक नए प्रकार के व्यक्ति का जीवन नहीं है, किंतु यह कहा जा सकता है कि यह उस मानवजाति का जीवन है जो उद्धार प्राप्त कर चुकी है और ऐसा जीवन है जिसने मानवता और विवेक को पुनःप्राप्त कर लिया है। ये वे लोग हैं जो कभी परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं थे, और जिन्हें कभी परमेश्वर के द्वारा जीता गया था और फिर उसके द्वारा बचाया गया था; ये वे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर को लज्जित किया और बाद में उसकी गवाही दी। उसकी परीक्षा से गुज़रकर बचे रहने के बाद, उनका अस्तित्व ही सबसे अधिक अर्थपूर्ण अस्तित्व है; ये वे लोग हैं जिन्होंने शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दी; ये वे लोग हैं जो जीवित रहने के योग्य हैं। जो नष्ट किए जाएँगे ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के गवाह नहीं बन सकते हैं और जो जीवित रहने के योग्य नहीं हैं। उनका विनाश, उनके दुष्ट आचरण के कारण होगा, और विनाश ही उनकी सर्वोत्तम नियति है। जब मनुष्य बाद में एक अच्छे राज्य में प्रवेश करेगा, तब पति और पत्नी के बीच, पिता और पुत्री के बीच या माँ और पुत्र के बीच ऐसा कोई भी संबंध नहीं होगा जैसी मनुष्य कल्पना करता है कि उसे मिलेगा। उस समय, मनुष्य अपने प्रकार के लोगों का अनुसरण करेगा, और परिवार पहले ही ध्वस्त हो चुका होगा। पूरी तरह से असफल होने पर, शैतान फिर कभी मानवजाति को परेशान नहीं करेगा, और मनुष्य का भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अब और नहीं होगा। वे आज्ञाकारी लोग नहीं पहले ही नष्ट किये जा चुके होंगे, और केवल वे आज्ञाकारी लोग ही जीवित बचेंगे। और इस प्रकार बहुत थोड़े से परिवार पूर्ण जीवित बचेंगे; तब मनुष्यों के बीच भौतिक संबंध अस्तित्व में रहने में कैसे समर्थ होंगे? मनुष्य का अतीत का भौतिक जीवन पूरी तरह से निषिद्ध होगा; लोगों के बीच भौतिक संबंध कैसे अस्तित्व में रहने में समर्थ होंगे? शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के बिना, लोगों का जीवन अतीत के पुराने जीवन के समान अब और नहीं होगा, बल्कि एक नया जीवन होगा। माता-पिता बच्चों को गँवा देंगे, और बच्चे माता-पिता को गँवा देंगे। पति पत्नियों को गँवा देंगे, और पत्नियाँ पतियों को गँवा देंगी। लोगों का अब एक दूसरे के साथ भौतिक संबंध होता है। जब वे सब विश्राम में प्रवेश कर जाएँगे तो उनके बीच अब और कोई रक्त-संबंध नहीं होगा। केवल इस प्रकार की मानवजाति में ही धार्मिकता और पवित्रता होगी, और केवल इस प्रकार की मानवजाति ही वह होगी जो परमेश्वर की आराधना करेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 601

परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, उसे पृथ्वी पर रखा, और उसकी आज के दिन तक अगुआई की। उसने तब मानवजाति को बचाया और मानवजाति के लिये पापबली के रूप में कार्य किया। अंत में उसे अभी भी मानवजाति को जीतना चाहिए, मानवजाति को पूर्णतः बचाना चाहिए और उसे उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित करना चाहिए। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से लेकर अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि में और उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित करना। वह अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता पुनर्स्थापित करेगा, जिसका अर्थ है कि वह पृथ्वी पर अपने अधिकार को पुनर्स्थापित करेगा, और समस्त प्राणियों के बीच अपने अधिकार को पुर्नस्थापित करेगा। शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने पर मनुष्य ने, परमेश्वर की अवज्ञा करने वाले शत्रु बनते हुए, अपना धर्मभीरू हृदय गँवा दिया है और उस कार्य को गँवा दिया जो परमेश्वर के सृजित प्राणियों में से एक के पास होना चाहिए। मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहा और उसने उसके आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई मार्ग नहीं था, और तो और अपने प्राणियों से परमेश्वर का भय प्राप्त करने में असमर्थ था। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सृजित था, और उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, परंतु मनुष्य ने वास्तव में परमेश्वर की ओर से पीठ फेर ली और शैतान की आराधना की। शैतान मनुष्य के हृदय में प्रतिमा बन गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मनुष्य के सृजन के अपने अर्थ को खो दिया, और इसलिए मनुष्य के सृजन के अपने अर्थ को पुनर्स्थापित करने के लिए उसे अवश्य मनुष्य की मूल समानता को पुनर्स्थापित करना चाहिए, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुड़ाना चाहिए। शैतान से मनुष्य को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे अवश्य मनुष्य को पाप से बचाना चाहिए। केवल इसी तरह से वह धीरे-धीरे मनुष्य की मूल समानता को पुनर्स्थापित कर सकता है और मनुष्य के मूल कार्य को पुनर्स्थापित कर सकता है, और अंत में अपने राज्य को पुनर्स्थापित कर सकता है। अवज्ञा करने वाले उन पुत्रों को अंतिम रूप से इसलिए भी नष्ट किया जाएगा ताकि मनुष्य को बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना करने दी जाए और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से जीने दिया जाए। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया है, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; चूँकि वह मनुष्य के मूल कार्य को पुनर्स्थापित करना चाहता है, इसलिए वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के पुनर्स्थापित करेगा। अपना अधिकार पुनर्स्थापित करने का अर्थ है, मनुष्य से अपनी आराधना करवाना और मनुष्य से अपना आज्ञापालन करवाना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्य को जीवित रखवाएगा, और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं को नष्ट करवाएगा; इसका अर्थ है कि वह अपने हर अंतिम भाग को मानवजाति के बीच और मनुष्य द्वारा किसी भी प्रतिरोध के बिना बनाए रखेगा। जो राज्य वह स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। जिस मानवजाति की वह इच्छा करता है वह है जो उसकी आराधना करती है, जो पूर्णतः उसकी आज्ञा का पालन करती है और उसकी महिमा रखती है। यदि वह भ्रष्ट मानवजाति को नहीं बचाता है, तो मनुष्य का सृजन करने का उसका अर्थ व्यर्थ हो जाएगा; मनुष्यों के बीच उसका अब और अधिकार नहीं रहेगा, और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि वह उन शत्रुओं का नाश नहीं करता है जो उसके प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा को प्राप्त करने में असमर्थ होगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना करने में समर्थ होगा। ये परमेश्वर का कार्य पूरा होने के प्रतीक हैं और उसकी महान उपलब्धियों की पूर्णता के प्रतीक हैं: मानवजाति में से उन सबको सर्वथा नष्ट करना जो उसके प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं, और जो पूर्ण किए जा चुके हैं उन्हें विश्राम में लाना। जब मनुष्यजाति को उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित कर दिया जाता है, जब मानवजाति अपने संबंधित कर्तव्यों को पूरा कर सकती है, अपने स्वयं के स्थान को सुरक्षित रख सकती है और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन कर सकती है, तो परमेश्वर पृथ्वी पर लोगों के एक समूह को प्राप्त कर चुका होगा जो उसकी आराधना करते हैं, वह पृथ्वी पर एक राज्य स्थापित कर चुका होगा जो उसकी आराधना करता है। उसके पास पृथ्वी पर अनंत विजय होगी, और जो उसके विरोध में है वे अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा; इससे सब चीजों के सृजन का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा, और इससे पृथ्वी पर उसका अधिकार, सभी चीजों के बीच उसका अधिकार और उसके शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी पुनर्स्थापित हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक हैं। इसके बाद से मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी जो सही मार्ग का अनुसरण करता है। मनुष्य के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा, और एक अनंत जीवन में प्रवेश करेगा जो परमेश्वर और मनुष्य द्वारा साझा किया जाता है। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, वैसे ही पृथ्वी पर से विलाप ग़ायब हो जाएगा। उन सभी का अस्तित्व पृथ्वी पर नहीं रहेगा जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। केवल परमेश्वर और वे ही शेष बचेंगे जिन्हें उसने बचाया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 602

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात्, मनुष्य को शुद्धिकरण और क्लेश के अधीन किया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाही दे सकते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें अन्ततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजेता हैं। इस क्लेश के दौरान, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस शुद्धिकरण को स्वीकार करे, और यह शुद्धिकरण परमेश्वर के कार्य की अन्तिम घटना है। यह अंतिम समय है कि परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को शुद्ध किया जाएगा, और जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन सभी को इस अंतिम परीक्षा को, इस अंतिम शुद्धिकरण को अवश्य स्वीकार करना चाहिए। जो लोग क्लेश से व्याकुल हैं वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किन्तु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं जो मानवता को धारण करते हैं, और जो सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, इन विजयी लोगों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा, और तब भी ये अपनी गवाही में असफल हुए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये ऐसे लोग हैं जो अंततः बड़े क्लेश से उभर कर निकलेंगे। यद्यपि जो लोग किसी की कठिन परिस्थिति का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं वे आज भी मुफ़्तख़ोरी कर सकते हैं, फिर भी कोई भी व्यक्ति अंतिम क्लेश से बचने में समर्थ नहीं है, और कोई भी अंतिम परीक्षा से बच नहीं सकता है। जो लोग विजय प्राप्त करते हैं उनके लिए, ऐसा क्लेश भयंकर शुद्धिकरण हैं; किन्तु जो लोग किसी की कठिन परिस्थिति का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं उनके लिए, यह पूरी तरह से उनके उन्मूलन का कार्य है। उनकी चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षा क्यों न की जाती हो, उन लोगों की स्वामी भक्ति अपरिवर्तनीय बनी रहती है जिनके हृदय में परमेश्वर है; किन्तु जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है उनके लिए, जब एक बार परमेश्वर का कार्य उनकी देह के लिए फायदेमन्द नहीं होता है, तो वे परमेश्वर के बारे में अपने दृष्टिकोण को बदल देते हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जो अंत में डटे नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर के आशीषों को ही खोजते हैं और उनके पास परमेश्वर के लिए अपने आपको व्यय करने और उसके प्रति अपने आपका समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं होती है। ऐसे सभी अधम लोगों को तब बहिष्कृत कर दिया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा, और वे किसी भी प्रकार की सहानुभूति के योग्य नहीं हैं। जो मानवता से रहित हैं वे सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करने में अक्षम हैं। जब परिवेश सही सलामत और सुरक्षित होता है, या जब वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह आज्ञाकारी रहते हैं, किन्तु जब एक बार जिस वस्तु की वे इच्छा करते हैं उससे समझौता किया जाता है या अंतत: उसका खंडन कर दिया जाता है, तो वे एकदम से बगावत कर देते हैं। यहाँ तक कि एक रात के अन्तराल में ही, वे अपने कल के उपकारियों के साथ अचानक बिना किसी तुक या तर्क के अपने घातक शत्रु के समान व्यवहार करते हुए, एक मुस्कुराते हुए, "उदार हृदय" वाले व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं। यदि इन दुष्ट आत्माओं को निकाला नहीं जाता है, ऐसी दुष्ट आत्माएँ जो बिना पलक झपके हत्या कर देंगी, तो क्या वे एक छुपा हुआ ख़तरा नहीं बन जाएँगी? विजय के समापन के कार्य के बाद मनुष्य को बचाने का कार्य प्राप्त नहीं होता है। यद्यपि विजय का कार्य समाप्ति पर आ गया है, फिर भी मनुष्य को शुद्ध करने का कार्य समाप्ति पर नहीं आया है; ऐसा कार्य केवल तभी समाप्त होगा जब एक बार मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर दिया जाएगा, जब एक बार ऐसे लोगों को पूर्ण कर दिया जाएगा जो सचमुच में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं, और जब एक बार उन छद्मवेशियों को शुद्ध कर दिया जाएगा जो अपने हृदय में परमेश्वर से रहित हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के अन्तिम चरण में उसे संतुष्ट नहीं करते हैं उन्हें पूरी तरह से निष्कासित कर दिया जाएगा, और जिन लोगों को निकाल दिया जाता है वे शैतान के हैं। चूँकि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हैं, इसलिए वे परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोहशील हैं, और भले ही ये लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता है कि ये ऐसे लोग हैं जो अंततः बने रहेंगे। "जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे वे उद्धार प्राप्त करेंगे," इन वचनों में "अनुसरण" का अर्थ-क्लेश के बीच डटे रहना है। आज, बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना आसान है, किन्तु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने ही वाला होगा, तब तुम "अनुसरण करने" का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इसलिए क्योंकि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि तुम उन लोगों में से एक हो जिन्हें सिद्ध बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षाओं को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अन्ततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और इसलिए वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे अपने कार्य की परीक्षा का सामना करने में समर्थ हैं, जबकि जो लोग सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हैं वे परमेश्वर की किसी भी परीक्षा का सामना करने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य परमेश्वर को खोजता है या नहीं इसका निर्धारण उसके कार्य की परीक्षा के द्वारा किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर की परीक्षाओं के द्वारा किया जाता है, और इसका स्वयं मनुष्य के द्वारा लिए गए निर्णय से कोई लेना देना नहीं होता है। परमेश्वर बस यों ही अपनी मर्ज़ी सेकिसी मनुष्य को अस्वीकार नहीं करता है; वह जो सब करता है वो मनुष्य को पूर्णरूप से आश्वस्त कर सकता है। वह ऐसा कुछ भी नहीं करता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्य को आश्वस्त न कर सके। मनुष्य का विश्वास सही है या नहीं यह तथ्यों के द्वारा साबित होता है, और इसे मनुष्य के द्वारा तय नहीं किया जा सकता है। कि "गेहूँ को जंगली घासपात नहीं बनाया जा सकता है, और जंगली घासपात को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता है" इसमें कोई सन्देह नहीं है। जो सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे, और परमेश्वर किसी ऐसे के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा जो वास्तव में उससे प्रेम करता है। उनके विभिन्न कार्यों और गवाहियों के आधार पर, राज्य के भीतर विजेता लोग याजकों और अनुयायियों के रूप में सेवा करेंगे, और जो क्लेश के बीच विजेता हैं वे राज्य के भीतर याजकों का एक समूह बन जाएँगे। याजकों का समूह तब बनाया जाएगा जब सम्पूर्ण विश्व में सुसमाचार का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा। जब वह समय आएगा, तब जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए वह परमेश्वर के राज्य के भीतर उसके कर्तव्य का निष्पादन होगा, और राज्य के भीतर परमेश्वर के साथ उसका जीवन जीना होगा। याजकों के समूह में महायाजक और याजक होंगे, और शेष लोग परमेश्वर के पुत्र और उसके लोग होंगे। यह सब क्लेश के दौरान परमेश्वर के प्रति उनकी गवाहियों के द्वारा निर्धारित होता है, ये ऐसी उपाधियाँ नहीं हैं जो सनक पर दी जाती हैं। जब एक बार मनुष्य की हैसियत स्थापित कर दी जाएगी, तो परमेश्वर का कार्य रुक जाएगा, क्योंकि प्रत्येक को प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है और उसकी मूल स्थिति में लौटाया जाता है, और यह परमेश्वर के कार्य के समापन का चिह्न है, यह परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास का अन्तिम परिणाम है, और यह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों और मनुष्य के सहयोग का साकार रुप है। अंत में, मनुष्य परमेश्वर के राज्य में विश्राम पाएगा, और परमेश्वर भी विश्राम करने के लिए अपने निवास स्थान में लौट जाएगा। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच 6,000 वर्षों के सहयोग का अन्तिम परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 603

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 604

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 605

जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने वालों के प्रति ईर्ष्या-भाव रखते हैं, और हमेशा ऐसे लोगों के साथ विश्वासघात करना चाहते हैं जो नासमझ हैं और जिनमें विवेक की कमी है। जिन बातों को ये उगलते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में गिरने का, तुझमें असामान्य परिस्थिति पैदा होने का और तुझमें अंधकार भरने का कारण बनती हैं; वे तुझे परमेश्वर से दूर रहने, देह में आनंद लेने और तेरा अपने आप में आसक्त होने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के प्रति सदैव लापरवाह रवैया अपनाते हैं, उनमें आत्म-जागरूकता नहीं होती; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर की अवहेलना के लिये बहकाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और न ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते हैं और उनमें स्वयं के प्रति कोई नफ़रत नहीं होती है। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य की लालसा करने से रोकते हैं। जिनके साथ वे विश्वासघात करते हैं वे प्रकाश को नहीं देख सकते। वे अंधेरे में पड़ जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने नहीं देते हैं, और उन सभी मूर्खों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनके दिल में बसी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह समय अलग किए जाने का है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब हटा दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूंगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 606

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होता है। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग कलीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुटबंदी करते हैं और पाखंड पैदा करते हैं, और वे स्थानीय गुण्डे तो और भी जल्दी अवश्य छोड़ कर चले जाएँ। जिनकी प्रवृत्ति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जायें और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन को परेशान न करें और परिणास्वरूप परमेश्वर के दंड से बचें। तुम लोगों में से जो लोग उनके साथ चले गये हैं, वे आत्म-मंथन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे दुष्टों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे, या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 607

परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम लोगों को सभी बातों में परमेश्वर के अलावा और किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और सभी बातों में उसकी इच्छा के अनुरूप होने में समर्थ होना चाहिए। यद्यपि हर कोई इस सिद्धांत को समझता है, फिर भी ये सच्चाइयाँ जो अत्यधिक स्पष्ट और बुनियादी हैं, जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, उसकी अज्ञानता, बेहूदगी, और भ्रष्टता जैसी नानाविध मनोव्यथाओं के कारण उसमें पूरी तरह से नहीं देखी जा सकती हैं। इसलिए, तुम लोगों का अंत निर्धारित करने से पहले, मुझे सबसे पहले तुम लोगों को कुछ चीज़ें बतानी चाहिए, जो तुम लोगों के लिए अत्यधिक महत्व की हैं। इससे पहले कि मैं आरंभ करूँ, तुम लोगों को पहले इसे समझना चाहिएः जिन वचनों को मैं कहता हूँ वे समस्त मानवजाति पर निर्देशित सत्य हैं, और केवल किसी खास व्यक्ति या विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति को संबोधित नहीं की जाती हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के दृष्टिकोण से प्राप्त करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और साथ ही अखण्डित एकाग्रता और ईमानदारी की प्रवृत्ति बनाए रखनी चाहिए। किसी एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो जो मैं कहता हूँ, और मेरे सभी वचनों का तिरस्कार मत करो। मैं तुम लोगों के जीवन में बहुत कुछ देखता हूँ जो तुम लोग करते हो, जो सत्य के लिए अप्रासंगिक है, और इसलिए मैं तुम लोगों से सत्य के सेवक बनने और दुष्टता और कुरूपता द्वारा दास न बनाए जाने के लिए खास तौर से कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है। अब मैं उस प्रसंग पर बात करूँगा जो हाथ में हैः

सबसे पहले, तुम लोगों के भाग्य के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। कहने का अर्थ है कि, चूँकि तुम लोग यह मानते करते हो कि तुम लोग परमेश्वर के घर में गिने जाते हो, तो तुम लोगों को मन की शांति को परमेश्वर में ले जाना चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सैद्धांतिक और सत्य के अनुरूप अवश्य होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो तुम परमेश्वर के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाओगे और हर मनुष्य के द्वारा ठुकराए जाओगे। जब तुम एक बार ऐसी दुर्दशा में पड़ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के घर में से नहीं गिने जा सकते हो। परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित नहीं किये जाने का यही अर्थ है।

दूसरा, तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर एक ईमानदार मनुष्य को पसंद करता है। परमेश्वर के पास निष्ठा का सार है, और इसलिए उसके वचन पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है। यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उससे ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। जो मैं कहता हूँ वह बहुत साधारण है, किन्तु तुम लोगों के लिए दुगुना दुष्कर है। बल्कि बहुत से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की अपेक्षा नरक के लिए दण्डित किए जाएँगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भण्डार में अन्य उपचार है। वास्तव में, मैं उस बड़ी कठिनाई को समझता हूँ जिसका तुम लोग ईमानदार मनुष्य बनने का प्रयास करते समय सामना करते हो। तुम सभी लोग अपने स्वयं के क्षुद्र मानकों से किसी शिष्ट मनुष्य का विश्लेषण करने में बहुत चतुर और निपुण हो; अतः मेरा कार्य अधिक सरल हो जाता है। चूँकि तुम लोगों में से प्रत्येक अपने रहस्यों को अपने-अपने सीने से लगाए रहता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को, एक-एक करके, आग द्वारा "सिखाये जाने" के लिए विपत्ति में भेजूँगा, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर विश्वास करने के लिए सर्वथा समर्पित हो जाओगे। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर निष्ठा का परमेश्वर है" शब्द खींच निकालूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती को पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है मनुष्य का हृदय!" इस परिस्थिति में तुम लोगों की मनःस्थिति क्या होगी? मैं कल्पना करता हूँ कि तुम लोग अहंकार में नहीं बह जाओगे जैसे कि तुम लोग अभी हो। तुम लोग "थाह लेने के लिए अत्यंग गहन" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जैसे कि तुम अभी हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाला और काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व खर्च करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे लोगों में से हो जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है कि नहीं, परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई अभिलेख है कि नहीं, और तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है कि नहीं। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत बची है। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और कभी भी प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसे सम्पन्न होता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पास एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है कि नहीं, और उसके पास एक शुद्ध आत्मा है कि नहीं। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो अत्यधिक बेईमान है, जिसके पास दुर्भावनापूर्ण हृदय है, और कोई ऐसे व्यक्ति हो जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह पहुँचोगे जहाँ मनुष्य को दण्ड दिया जाता है, जैसा कि तुम्हारे भाग्य के अभिलेख में लिखा है। यदि तुम अत्यधिक ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर कभी भी सत्य के अनुसार कार्य करने या सत्य का एक भी वचन बोलने का प्रबंध नहीं करते हो, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से तुम्हें पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा करते हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँखों के तारे के समान माने? क्या यह सोचने का हास्यास्पद तरीका नहीं है? तुम सभी बातों में परमेश्वर को धोखा देते हो, तो परमेश्वर का घर तुम जैसे किसी को कैसे जगह दे सकता है जिसके हाथ अशुद्ध हैं?

तीसरी बात जो मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ वह हैः हर व्यक्ति ने अपना जीवन जीने के दौरान, अपने-अपने मार्ग के किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर पर विश्वास का, परमेश्वर का प्रतिरोध किया है और उसे धोखा दिया है। कुछ दुष्कर्मों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य हैं; क्योंकि बहुत से ऐसे कर्म हैं जो प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं, अर्थात्, जो परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हैं। बहुत से लोग जो अपने भाग्य के बारे में चिंतित हैं, पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौन से हैं। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि तुम लोग प्रकृति से ही अहंकारी और दंभी हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के अनिच्छुक हो। इस कारण से, जब तुम लोग अपने ऊपर चिंतन कर लोगे तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताऊँगा। मैं तुम लोगों को प्रशासनिक आज्ञाओं के सार की बेहतर समझ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयत्न करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। अन्यथा, तुम लोगों को अपने होठों को सीलबंद करने और अपनी जीभ को आडंबरपूर्ण बातचीत के साथ बहुत बेरोक-टोक हिलने से रोकने में कठिनाई होगी, और तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपमान करोगे और पवित्र आत्मा और प्रकाश की उपस्थिति को खोते हुए अंधकार में गिरोगे। चूँकि तुम लोग अपने कार्यों में असैद्धांतिक हो, जो तुम्हें करना या कहना नहीं चाहिए वो करते और कहते हो, इसलिए तुम्हें एक यथोचित दण्ड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि यद्यपि तुम वचन और कर्म में असैद्धांतिक हो, तब भी परमेश्वर दोनों में अत्यधिक सैद्धांतिक है। तुम्हें दण्ड मिलने का कारण है क्योंकि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी मनुष्य का नहीं। यदि, अपने जीवन में, तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अनेक अपराध करते हो, तो तुम नरक की सन्तान बनने के लिए बाध्य हो। मनुष्य को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने केवल कुछ ही ऐसे कर्म किए हैं जो सत्य के अनुरूप होने में असफल हैं, और उससे अधिक कुछ नहीं किया है। हालाँकि, क्या तुम इस बात से अवगत हो कि परमेश्वर की निगाहों में, तुम पहले से ही एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके लिए और कोई पापबलि नहीं है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और इसके अलावा तुमने पश्चाताप का कोई चिन्ह नहीं दिखाया है, इसलिए तुम्हारे पास नरक में पड़ने के सिवाए कोई विकल्प नहीं है जहाँ परमेश्वर मनुष्य को दण्ड देता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के समय, कुछ लोगों ने सिद्धांतों के उल्लंघन में कुछ कर्म किए, किन्तु निपटे जाने और मार्गदर्शन दिए जाने के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी स्वयं की भ्रष्टता का पता लगा लिया, उसके बाद सत्य के सही मार्ग पर प्रवेश किया, और आज वे सुप्रतिष्ठित बने हुए हैं। ये ऐसे लोग हैं जो अंत में बने रहेंगे। किन्तु वह ईमानदार ही है जिसकी मैं खोज करता हूँ; यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और एक ऐसे व्यक्ति हो जो सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है, तो तुम परमेश्वर के विश्वासपात्र हो सकते हो। यदि अपने कार्यों में तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपमान नहीं करते हो, और तुम परमेश्वर की इच्छा की खोज करते हो और तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए आदर वाला हृदय है, तो तुम्हारा विश्वास मानक तक है। जो कोई भी परमेश्वर का आदर नहीं करता है और जिनके पास ऐसा हृदय नहीं है जो भय से काँपता हो, वह आसानी से परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करेगा। अनेक लोग अपने आवेश की शक्ति के आधार पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, किन्तु उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती है, उसके वचनों के निहितार्थों का तो बिलकुल भी आभास नहीं होता है। इसलिए, अपने अच्छे इरादों के साथ, वे प्रायः उन चीज़ों को करना समाप्त कर देते हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन को बाधित करती हैं। गंभीर मामलों में, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित, वे फेंक दिए जाते हैं, और उन्हें नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने अनभिज्ञ अच्छे इरादों की शक्ति पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करके समाप्त हो जाते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में लाते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें काम में लाते हैं। उन्होंने कभी भी यह कल्पना नहीं की कि परमेश्वर के पास एक मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ रहे हैं, वे उससे संवाद करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि परमेश्वर का हृदय मनुष्य के समान नहीं है। जब तुम अनेक सत्यों को समझ जाते हो, केवल उसके बाद ही तुम परमेश्वर को लगातार जान सकते हो। यह ज्ञान वाक्यांशों या सिद्धान्तों से नहीं बना होता है, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिसके माध्यम से तुम परमेश्वर के साथ घनिष्ठ विश्वास में प्रवेश करते हो और एक प्रमाण के रूप में उपयोग किए जा सकते हो कि वह तुममें आनंदित होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम्हारी आवेशपूर्ण सेवा तुम्हारे ऊपर परमेश्वर की सिर्फ घृणा और नफ़रत ही लाएगी। अब तक तुम्हें समझ जाना चाहिए कि परमेश्वर में विश्वास अध्यात्म-विज्ञान का अध्ययन जैसा बिल्कुल नहीं है।

यद्यपि वे वचन जिनसे मैं तुम लोगों को चेतावनी देता हूँ संक्षिप्त हैं, फिर भी जो कुछ भी मैंने वर्णन किया है वह है जिसका तुम लोगों में अत्यंत अभाव है। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि अब जिस बारे में मैं कहता हूँ वह मनुष्य के बीच मेरे अंतिम कार्य के वास्ते, मनुष्य के अंत का निर्धारण करने के वास्ते है। मैं ऐसा कार्य और अधिक नहीं करना चाहता हूँ जो किसी उद्देश्य को पूरा न करता हो, न ही मैं उन मनुष्यों का मार्गदर्शन करते रहना चाहता हूँ जो सड़ी हुई लकड़ी के समान आशाहीन हैं, उनकी अगुवाई तो बिलकुल भी नहीं करना चाहता हूँ जो गुप्त रूप से बुरे इरादों को आश्रय देते हैं। शायद एक दिन तुम लोग मेरे वचनों के पीछे के ईमानदार इरादों को और उन योगदानों को समझ जाओगे जो मैंने मानवजाति के लिए किए हैं। शायद एक दिन तुम लोग उस सिद्धांत को समझ जाओगे जो तुम्हें तुम्हारे स्वयं के अंत का निर्णय लेने में समर्थ बनाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 608

मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के इरादे से कई सत्य दिए हैं। अब तक, तुम लोग अतीत की तुलना में काफी अधिक समृद्ध अनुभव करते हो, इस बारे में कई सिद्धांत समझ गए हो कि व्यक्ति को कैसा होना चाहिए, और तुमने उतना सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है जो वफ़ादार लोगों में होना चाहिए। अनेक वर्षों के दौरान तुम लोगों ने यही फसल काटी है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से इनकार नहीं करता, लेकिन मुझे यह भी स्पष्ट रूप से कहना है कि मैं इन कई वर्षों में मेरे प्रति की गई तुम्हारी अवज्ञाओं और विद्रोहों से भी इनकार नहीं करता, क्योंकि तुम लोगों के बीच एक भी संत नहीं है। बिना किसी अपवाद के तुम शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोग हो; तुम मसीह के शत्रु हो। आज तक तुम लोगों के अपराधों और अवज्ञाओं की संख्या इतनी ज्यादा रही है कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती, इसलिए इसे शायद ही अजीब माना जाए कि मैं लगातार तुम लोगों के सामने अपने आपको दोहरा रहा हूँ। मैं तुम लोगों के साथ इस तरह सह-अस्तित्व की इच्छा नहीं रखता, लेकिन तुम्हारे भविष्य की खातिर, तुम्हारी मंज़िल की खातिर मैं, यहाँ और अभी, एक बार फिर वह दोहराऊँगा, जो मैं पहले ही कह चुका हूँ। मुझे आशा है, तुम लोग मुझे कहने दोगे, और इतना ही नहीं, मेरे हर कथन पर विश्वास करने में सक्षम होगे और मेरे वचनों का गहरा निहितार्थ समझ पाओगे। मेरे कहे पर संदेह न करो, मेरे वचनों को जैसे चाहो, वैसे लेकर उन्हें दरकिनार करने की बात तो छोड़ ही दो; यह मेरे लिए असहनीय होगा। मेरे वचनों की आलोचना मत करो, उन्हें हलके में तो तुम्हें बिलकुल नहीं लेना चाहिए, न ऐसा कुछ कहना चाहिए कि मैं हमेशा तुम लोगों को फुसलाता हूँ, या उससे भी ज्यादा ख़राब यह कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह ठीक नहीं है। ये चीज़ें भी मेरे लिए असहनीय हैं। चूँकि तुम लोग मुझे और मेरी कही गई बातों को संदेह की नज़र से देखते हो, मेरे वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते और मेरी उपेक्षा करते हो, मैं तुम सब लोगों से पूरी गंभीरता से कहता हूँ : मेरी कही बातों को दर्शन-शास्त्र से मत जोड़ो; मेरे वचनों को कपटी लोगों के झूठ से मत जोड़ो। मेरे वचनों की अवहेलना तो तुम्हें बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए। भविष्य में शायद कोई तुम्हें वह नहीं बता पाएगा जो मैं बता रहा हूँ, या तुम्हारे साथ इतनी उदारता से नहीं बोलेगा, या तुम लोगों को एक-एक बात इतने धैर्य से समझाने वाला तो बिलकुल नहीं मिलेगा। इन अच्छे दिनों को तुम लोग केवल याद करते रह जाओगे, या ज़ोर-ज़ोर से सुबकोगे, अथवा दर्द से कराहोगे, या फिर अँधेरी रातों में जीवन-यापन कर रहे होगे जहाँ सत्य या जीवन का अंश-मात्र भी नहीं होगा, या नाउम्मीदी में बस इंतज़ार कर रहे होगे, या फिर भयंकर पश्चात्ताप में विवेक ही खो बैठोगे...। वस्तुत: तुममें से कोई इन संभावनाओं से नहीं बच सकता। क्योंकि तुममें से किसी के पास वह आसन नहीं है, जिससे तुम परमेश्वर की सच्ची आराधना कर सको, इसके बजाय तुम लोग व्यभिचार और बुराई की दुनिया में निमग्न हो गए हो, और तुम्हारे विश्वासों में, तुम्हारी आत्मा, रूह और शरीर में ऐसी बहुत-सी चीज़ें घुल-मिल गई हैं, जिनका जीवन और सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि जो इनके विरोध में हैं। इसलिए मुझे तुम लोगों को लेकर बस यही आशा है कि तुम लोगों को प्रकाश-पथ पर लाया जा सके। मेरी एकमात्र आशा है कि तुम लोग अपना ख़याल रख पाओ, और अपने व्यवहार और अपराधों को उदासीनता से देखते हुए तुम अपनी मंज़िल पर इतना अधिक बल न दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 609

एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से चलते रहना चाहते हो, गलत मार्ग पर बने रहते हो और तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों पर एक नज़र डालो, और जाँच करो कि तुम्हारे व्यवहार तथा विचारों में से कोई ऐसा तो नहीं है, जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह एक ऐसी चीज़ है, जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है, और जिसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।

तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

मेरी माँगें सरल हो सकती हैं, लेकिन मैं जो कह रहा हूँ, वह उतना सरल नहीं है, जितना सरल एक जमा एक बराबर दो होते हैं। अगर तुम लोग इस बारे में केवल कुछ भी बोलोगे, या बेसिर-पैर की बातें करोगे या ऊँची-ऊँची फेंकोगे, तो फिर तुम्हारी योजनाएँ और ख़्वाहिशें धरी की धरी रह जाएँगी। मुझे तुममें से ऐसे लोगों के साथ कोई सहानुभूति नहीं होगी, जो बरसों कष्ट झेलते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन जिनके पास दिखाने के लिए कुछ नहीं होता। इसके विपरीत, जिन्होंने मेरी माँगें पूरी नहीं की हैं, मैं उन्हें पुरस्कृत नहीं, दंडित करता हूँ, उनसे सहानुभूति तो बिलकुल नहीं रखता। तुम लोग सोचते होगे कि बरसों अनुयायी बने रहकर तुमने बहुत मेहनत कर ली है, और कुछ भी हो, केवल सेवा-कर्मी होने के नाते ही तुम्हें परमेश्वर के भवन में एक कटोरी चावल मिल जाना चाहिए। मैं कहूँगा कि तुममें से अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं, क्योंकि तुम लोगों ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया है कि चीज़ों का फ़ायदा कैसे उठाया जाए, न कि अपना फायदा कैसे उठाने दिया जाए। इसलिए अब मैं तुम लोगों से बहुत गंभीरता से कहता हूँ : मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि तुम्हारी मेहनत कितनी उत्कृष्ट है, तुम्हारी योग्यताएँ कितनी प्रभावशाली हैं, तुम कितनी निकटता से मेरा अनुसरण करते हो, तुम कितने प्रसिद्ध हो, या तुमने अपने रवैये में कितना सुधार किया है; जब तक तुम मेरी अपेक्षाएँ पूरी नहीं करते, तब तक तुम कभी मेरी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाओगे। अपने विचारों और गणनाओं को जितनी जल्दी हो सके, बट्टे खाते डाल दो, और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लेना शुरू कर दो; वरना मैं अपना काम समाप्त करने के लिए सभी को भस्म कर दूँगा और, सबसे अच्छा यह होगा कि मैं अपने वर्षों के कार्य और पीड़ा को शून्य में बदल दूँ, क्योंकि मैं अपने शत्रुओं और उन लोगों को, जिनमें से दुर्गंध आती है और जो शैतान जैसे दिखते हैं, अपने राज्य में नहीं ला सकता या उन्हें अगले युग में नहीं ले जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 610

मुझे बहुत उम्मीदें हैं। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग उपयुक्त और अच्छी तरह से व्यवहार करो, अपना कर्तव्य निष्ठा से पूरा करो, सत्य और मानवता को अपनाओ, ऐसे व्यक्ति बनो जो अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना जीवन भी परमेश्वर के लिए न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी आशाएँ तुम लोगों की कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं। अगर तुम लोगों से मेरी कोई भी बातचीत तुम्हारा ध्यान आकर्षित के लिए पर्याप्त नहीं रही है, तो शायद मैं यही कर सकता हूँ कि अब कुछ न कहूँ। हालाँकि, तुम लोग इसके परिणाम को समझते हो। मैं कभी आराम नहीं करता, इसलिए अगर मैं बोलूँगा नहीं, तो कुछ ऐसा करूँगा कि लोग देखते रह जाएँगे। मैं किसी की जीभ गला सकता हूँ, या किसी के अंग भंग करके उसे मार सकता हूँ, या लोगों को स्नायु की विषमताएँ दे सकता हूँ और उन्हें अनेक प्रकार से कुरूप बना सकता हूँ। इसके अतिरिक्त, मैं लोगों को ऐसी यातनाएँ दे सकता हूँ, जो मैंने खास तौर से उनके लिए निर्मित की हैं। इस तरह मुझे ख़ुशी होगी, और मैं बहुत ज्यादा सुखी और प्रसन्न हो जाऊँगा। हमेशा से यही कहा गया है कि "भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से दिया जाता है", तो फिर अभी क्यों नहीं? यदि तुम मेरा विरोध करना चाहते हो और मेरी आलोचना करना चाहते हो, तो मैं तुम्हारे मुँह को गला दूँगा, और उससे मुझे अपार प्रसन्नता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आख़िरकार जो कुछ तुमने किया है, वह सत्य नहीं है, ज़िंदगी से उसका कुछ लेना-देना तो बिलकुल भी नहीं है, जबकि मैं जो कुछ करता हूँ, वह सत्य होता है; मेरी समस्त क्रियाएँ मेरे कार्य के सिद्धांतों और मेरे द्वारा निर्धारित प्रशासनिक आदेशों के लिए प्रासंगिक होती हैं। अत: मेरी तुम सभी से गुज़ारिश है कि कुछ गुण संचित करो, इतनी बुराई करना बंद करो, और अपने फुरसत के समय में मेरी माँगों पर ध्यान दो। तब मुझे ख़ुशी होगी। तुम लोग जितना प्रयास देह-सुख के लिए करते हो, उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सत्य के लिए योगदान (या दान) करो, तो मैं कहता हूँ कि तुम बहुधा अपराध नहीं करोगे और अपना मुँह भी नहीं गलवाओगे। क्या यह स्पष्ट नहीं है?

तुम जितने अधिक अपराध करोगे, उतने ही कम अवसर तुम्हें अच्छी मंज़िल पाने के लिए मिलेंगे। इसके विपरीत, तुम जितने कम अपराध करोगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बेहतर हो जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो तुम क्षमा किए जाने के अपने अवसर पूरी तरह से गँवा दोगे। इस तरह, तुम्हारी मंज़िल उच्च नहीं, निम्न होगी। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन न हो, तो बेधड़क गलत काम करो और उसके नतीजे देखो। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सत्य पर अमल करते हो, तो तुम्हें अपने अपराधों के लिए क्षमा किए जाने का अवसर अवश्य मिलेगा, और तुम कम से कम अवज्ञा करोगे। और यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य पर अमल नहीं करना चाहता, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराधों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ जाएगी और तुम तब तक बार-बार अवज्ञा करोगे, जब तक कि सीमा पार नहीं कर लोगे, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। यह तब होगा, जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका हो जाएगा। अपने अपराधों को किसी अपरिपक्व या मूर्ख व्यक्ति की गलतियाँ मात्र मत समझो, यह बहाना मत करो कि तुमने सत्य पर अमल इसलिए नहीं किया, क्योंकि तुम्हारी ख़राब क्षमता ने उसे असंभव बना दिया था। इसके अतिरिक्त, स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य भी मत समझ लेना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने और अपने साथ उदारता का व्यवहार करने में अच्छे हो, तो मैं कहता हूँ, तुम एक कायर हो, जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, न ही तुम्हारे अपराध तुम्हारा पीछा छोड़ेंगे, वे तुम्हें कभी सत्य की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करने देंगे और तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का वफ़ादार साथी बनाए रखेंगे। तुम्हें फिर भी मेरी यही सलाह है : अपने गुप्त अपराधों का पता लगाने में विफल रहते हुए केवल अपनी मंज़िल पर ध्यान मत दो; अपने अपराधों को गंभीरता से लो, अपनी मंज़िल की चिंता में उनमें से किसी को नज़रअंदाज़ मत करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 611

आज, मैं तुम लोगों की उत्तरजीविता के वास्ते इस प्रकार से धिक्कारता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारू रूप से प्रगति करे, और ताकि सम्पूर्ण जगत में मेरा आरंभिक कार्य, मेरे वचनों, अधिकार, प्रताप और मेरे न्याय को सभी देशों और राष्ट्रों के लोगों के लिए प्रकट करते हुए, और भी अधिक उचित ढंग से और उत्तम तरह से किया जा सके। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ वह सम्पूर्ण जगत में मेरे कार्य का आरम्भ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, फिर भी ज्ञात रहे कि "अंत के दिन" केवल एक नए युग का नाम हैः ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान, यह एक युग का संकेत है, और यह, अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय, एक सम्पूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से काफ़ी अलग हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में नहीं, बल्कि अन्यजातियों के बीच किया जाता है; यह मेरे सिंहासन के सामने इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय है, ताकि सम्पूर्ण जगत की मेरी महिमा ब्रह्माण्ड और नभमंडल को भर सके। यह इसलिए है ताकि मैं और भी अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी महिमा को हर राष्ट्र को, निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी सौंप सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी उस समस्त महिमा को देख सकें जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान किया गया कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी पर सभी लोगों के जीवन का मार्गदर्शन नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्षों लंबे अविनाशी दुःखों का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में किए गए हज़ार वर्षों के कार्य के जैसा नहीं हो सकता है, न ही यहूदिया में महज़ दस सालों के कार्य के जैसा हो सकता है जो बाद में परमेश्वर के दूसरे देहधारण तक कई हज़ार सालों तक जारी रहा। अंतिम दिनों के लोग केवल देह में आये मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन से मिलते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हज़ार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय के जैसे जब यीशु मसीह ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतिम दिन सम्पूर्ण युग का उपसंहार हैं। ये परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना की पूर्णता और समाप्ति हैं, और ये मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करते हैं। ये समस्त मानवजाति को एक नए युग में नहीं ले जाते हैं या मानवजाति के जीवन को जारी नहीं रहने देते हैं। यह मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं रखेगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो देर-सवेर उसे शैतान द्वारा पूरी तरह से निगल लिया जाएगा, और वे आत्माएँ जो मुझ से सम्बन्ध रखती हैं अंततः पूरी तरह से उसके हाथों द्वारा बर्बाद कर दी जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हजार वर्ष तक रहेगा, और मैंने वचन दिया है कि समस्त मानवजाति पर शैतान का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों से अधिक तक नहीं रहेगा। और इसलिए, समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखूँगा और न ही विलंब करूँगा: अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी सम्पूर्ण महिमा वापस ले लूँगा, और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस ले लूँगा जो मुझसे संबंधित हैं ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच कर बाहर आ जाएँ, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद, मैं पृथ्वी पर फिर कभी भी देहधारी नहीं बनूँगा, और पूर्ण-नियंत्रण करने वाला मेरा आत्मा फिर कभी भी पृथ्वी पर काम नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक कार्य करूँगाः मैं मानवजाति को पुनः बनाऊँगा, ऐसी मानवजाति जो पवित्र हो, और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वसनीय शहर हो। परन्तु जान लो कि मैं सम्पूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति को जड़ से मिटाऊँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मुझसे प्रेम करता है और मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है, और उन्हें अत्यधिक भेड़ों, पशुओं पृथ्वी की समस्त संपदा से पोषित करते हुए, मैं इस तृतीयांश को उपजाऊ बनाऊँगा और पृथ्वी पर कई गुना बढ़ाऊँगा ठीक वैसे ही जैसे इस्राएलियों ने व्यवस्था के अधीन किया था। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की बुरी तरह से गंदी मानवजाति की तरह नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवजाति होगी जो उन सभी लोगों का जनसमूह होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। इस प्रकार की मानवजाति को शैतान के द्वारा नष्ट, व्याकुल नहीं किया जाएगा या घेरा नहीं जायेगा, और ऐसी एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा शैतान पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वी पर विद्यमान रहेगी। यही वह मानवजाति है जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसने मेरी प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है। और इसलिए, अंत के दिनों के दौरान मेरे द्वारा जीती गई मानवजाति वह मानवजाति भी होगी, जिसे छोड़ दिया जाएगा और जो मेरे अनन्त आशीष प्राप्त करेगी। शैतान पर मेरी विजय की यही एकमात्र गवाही होगी, और शैतान के साथ मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार होगा। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचाया गए हैं और ये ही मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के ठोस-रूप और परिणाम हैं। ये विश्वभर के हर राष्ट्र और संप्रदाय, और हर स्थान और देश से आते हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाज़ों और त्वचा के रंगों वाले हैं, और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हुए हैं। अंततः, वे पूर्ण मानवजाति, मनुष्यों का ऐसा जनसमूह जो शैतान की ताकतों द्वारा अगम्य है, की रचना करने के लिए एक साथ आएँगे। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराईयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों और मवेशियों को जड़ से मिटाया, केवल इस्राएलियों को छोड़ते हुए, जिन्होंने मेमने का मांस खाया, मेमने का लहू पीया, और अपने दरवाजे की चौखट को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं वे भी ऐसे लोग नहीं हैं जो मुझ मेमने के मांस को खाते हैं और मुझ मेमने के लहू को पीते हैं, और मेरे द्वारा छुटकारा दिलाये गये हैं और मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती है? क्या वे लोग जो मुझ मेमने के देह के बिना हैं पहले से ही चुपचाप सागर की गहराईयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा विरोध करते हो, और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचन के अनुसार ही हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराईयों में उपस्थित कठोरता मेरे कोप के संचय का कारण बन रही है, तुम लोगों की देह पर और भी अधिक दुःख, तुम लोगों के पापों पर और अधिक न्याय, और तुम लोगों की अधार्मिकता पर और भी अधिक क्रोध ला रही है। जब आज तुम लोग मुझसे इस प्रकार का व्यवहार करते हो, तो किसे मेरे कोप के दिन पर छोड़ा जा सकता है? किसकी अधार्मिकता ताड़ना की मेरी आँखों से बच कर भाग सकती है? किसके पाप मुझ, सर्वशक्तिमान के, हाथों से बच सकते हैं? किसकी अवज्ञा मुझ, सर्वशक्तिमान के, न्याय से बच सकती है? मैं, यहोवा, इस प्रकार, तुम लोगों से, अन्यजातियों के वंशजों से, बात करता हूँ, और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़ कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से ज्यादा कठोर हो। जब मैं विश्राम में काम करता हूँ तो क्या तुम लोग मेरे कोप को संचित नहीं करते हो? कैसे तुम लोग मुझ, सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच कर निकल सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 612

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

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अध्याय 19

मेरे वचनों को अपने अस्तित्व के आधार के रूप में लेना—यह मानव-जाति का दायित्व है। लोगों को मेरे वचनों के प्रत्येक भाग में अपना खुद का अंश...

मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना

मनुष्य आज के कार्य और भविष्य के कार्य के बारे में थोड़ा बहुत ही जानता है, किन्तु वह उस मंज़िल को नहीं समझता जिसमें मनुष्यजाति प्रवेश करेगी।...

देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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