जीवन में प्रवेश 6

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 557

प्रवेश करने की कोशिश करते समय, हर मामले की जाँच होनी चाहिए। सभी मामलों पर परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार पूरी तरह से चिंतन किया जाना चाहिए ताकि तुम यह जान सको कि कैसे उन्हें इस तरह से कैसे करना है कि वो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो। अपनी इच्छा से उत्पन्न होने वाली चीज़ें फिर त्यागी जा सकती हैं। तुम जानोगे कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीज़ों को कैसे करें, और फिर तुम जाकर उन्हें करोगे; ऐसा लगेगा कि जैसे हर चीज़ अपना स्वाभाविक रूप ले रही है, और यह अत्यंत आसान प्रतीत होगा। सत्य से युक्त लोग चीज़ों को ऐसे करते हैं। तब तुम वास्तव में दूसरों को दिखा सकोगे कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है, और वे देखेंगे कि तुमने वाकई कुछ अच्छे काम किए हैं, तुम सिद्धांतों के अनुसार काम करते हो, और तुम हर काम सही ढंग से करते हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य को समझता है और जिसके पास वास्तव में कुछ मानवीय सदृशता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन ने लोगों में परिणाम हासिल किये हैं। एक बार जब लोग सत्य को सचमुच में समझ लेते हैं, तो वे अपने अस्तित्व की अवस्थाओं को समझ सकते हैं, जटिल मामलों की तह तक जा सकते हैं और अभ्यास करने का उचित तरीका जान सकते हैं। अगर तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम अपने अस्तित्व की अवस्था को नहीं समझ पाओगे। तुम खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहोगे, लेकिन तुम्हें यह मालूम नहीं होगा कि विद्रोह कैसे करें और तुम किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हो। तुम अपने हठ को त्यागना चाहोगे, लेकिन अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हठ सत्य के अनुरूप है, तो फिर तुम उसे कैसे त्याग सकते हो? तुम्हें शायद यह भी लगे कि इसे पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया है, इसलिए चाहे जो हो, तुम उसे त्यागने से इनकार करोगे। इस प्रकार, जब लोग सत्य को धारण नहीं करते, तो उनका यह सोचना लाजिमी है कि मानवीय अशुद्धियाँ, नेक इरादे, उलझन-भरा प्रेम, और मानवीय अभ्यास—हठ से उपजने वाली तमाम चीज़ें—सही हैं, और ये सत्य के अनुरूप हैं। तो फिर तुम इन चीज़ों के खिलाफ विद्रोह कैसे कर सकते हो? अगर तुम सत्य को नहीं समझते या नहीं जानते कि सत्य पर अमल करने का अर्थ क्या होता है, अगर तुम्हारी आँखेँ धुँधलाई हुई हैं और तुम्हें नहीं मालूम कि किस तरफ मुड़ना है, इसलिए तुम उसी आधार पर काम करते हो जो तुम्हें सही लगता है, तो तुम कुछ ऐसे कार्य करोगे, जो रास्ते से भटके हुए और ग़लत हैं, कुछ नियमों के अनुसार, कुछ उत्साह से उपजे हुए, कुछ शैतान से निकले हुए होंगे और इनसे गड़बड़ियाँ पैदा होंगी। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे इस तरह से कार्य करते हैं : थोड़ा बायीं ओर, फिर थोड़ा दायीं तरफ; एक पल सही, दूसरे पल भटके हुए; बिल्कुल भी कोई सत्यता नहीं। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे चीज़ों को बिल्कुल गलत ढंग से देखते हैं। ऐसे में, वे मामलों को सही ढंग से कैसे संभाल सकते हैं? वे किसी समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं? सत्य को समझना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के वचन समझने योग्य होना सत्य की समझ पर निर्भर है, और लोग जो सत्य समझ सकते हैं उसकी सीमा होती है। लोग अपनी पूरी ज़िंदगी परमेश्वर में विश्वास रखेँ, तब भी परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ सीमित ही होगी। जो लोग अपेक्षाकृत थोड़े अनुभवी हैं वे भी ज़्यादा-से-ज़्यादा उस स्थिति तक पहुँच सकते हैं जहां वे ऐसे काम बंद कर सकें जिनसे स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध होता है, ऐसे काम बंद कर सकें जो स्पष्ट रूप से बुरे हों और जो किसी भी व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचाते। उनके लिए उस अवस्था में पहुँचना मुमकिन नहीं है, जहां उनके हठ का कोई अंश शामिल न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि लोग सामान्य बातें सोचते हैं, और उनकी थोड़ी सोच परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होती है, और समझ-बूझ के एक ऐसे पहलू से संबंधित होती है जिसे हठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, मुख्य बात हठ के उन अंशों को समझना है जो परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध हैं, सत्य के विरुद्ध हैं, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध हैं। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जानने का प्रयास करना चाहिए, सत्य को समझ कर ही तुम विवेक पा सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 558

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता की अभिव्यक्ति के बारे में पता होना चाहिए, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो। परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना नहीं करनी चाहिये। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें विश्वास नहीं है, तो खुद अनुभव करके देख लो। कुछ लोग कहते हैं: "मैं आश्वस्त नहीं हूँ। परमेश्‍वर के वचनों में एक पंक्ति है जो कहती है कि लोग वेश्‍याएं हैं, छिनाल हैं। यह किसके बारे में है?" एक भाई कहता है: "निश्‍चय ही यह मेरे बारे में नहीं है। मैं औरत नहीं हूं इसलिए मैं वेश्‍या या छिनाल नहीं हो सकता।" और एक बहन कहती है: "मेरी तो शादी भी नहीं हुई है। मैं अकेली हूं और मैंने ऐसी चीज़ कभी नहीं की है। खासकर मेरे मन में कभी पुरुषों के बारे में कोई गलत विचार नहीं आए।" कुछ बहनें कहती हैं: "मैं अपने पति के प्रति अडिग रूप से वफ़ादार हूं; मैंने कभी किसी और के साथ होने के बारे में सोचा नहीं। खासकर इसलिए क्‍योंकि मैं परमेश्‍वर में विश्‍वास करती हूं, मुझे अपनी पवित्रता की रक्षा करनी है और मैं परमेश्‍वर के नाम का निरादर नहीं कर सकती। इसलिए, ये वचन मुझ पर लागू नहीं होते।" और कुछ अन्‍य बहनें कहती हैं: "परमेश्‍वर के इस प्रकार के वचन कितने भयानक लगते हैं। मैं उन्‍हें स्‍वीकार नहीं करूंगी। इस प्रकार से बोलना लोगों को नीचा दिखाना है, और वास्तविकता से मेल नहीं खाता। मैं इसे स्‍वीकार नहीं कर सकती।" कुछ दूसरे लोग कहते हैं: "चूंकि परमेश्‍वर ने इसे कहा है और इसमें अशुद्ध भाग हैं, इसलिए अब मैं विश्‍वास ही नहीं करता।" क्‍या यह सही दृष्टिकोण है? स्‍पष्‍ट रूप से, निश्‍चय ही, यह कतई सही नहीं है, क्‍योंकि हम परमेश्‍वर के वचनों के प्रति ऐसा दृष्टिकोण रख ही नहीं सकते। हमें पहले जानना होगा कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके वचन सुनने में अच्‍छे लगते हैं, कि वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हैं या मिठास का—हमें उन सबको स्‍वीकार करना चाहिए। हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह परमेश्वर भक्ति का दृष्टिकोण है? सहिष्‍णुता का है? या यह कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम सब कहता हूं, यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की सभी पंक्तियाँ बाह्य घटनाओं के विषय में नहीं हैं, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सामान्य रूप के विषय में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। बात ऐसी नहीं है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त हर पँक्ति को इंसानी व्यवहार के सामान्य प्रकार के प्रदर्शन के तौर पर या किसी बाह्य घटना के रूप में देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं हैं, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ इंसान के भ्रष्ट स्वभाव और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, ये बाह्य घटनायें नहीं होतीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी स्वरूप से देखने पर, वे सभी ठीक लग सकते हैं–लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए रूप-रंग या जो बाहर से दिखता है उस पर निर्भर नहीं रह सकते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 559

तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई का विश्लेषण करना है; इसमें वह शामिल है जो तुम्हारे जीवन में है। यही शैतान का तर्क और शैतान के दृष्टिकोण हैं जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो। केवल अपने आत्मा के गहरे हिस्सों को निकाल करके ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीज़ों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो घटनाओं द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता; कई बार काम ख़त्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान और समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। बहुत सी परिस्थितियों में, तुम्हें खुद पर मनन कर खुद को जानना चाहिए। जब तुम गहराई तक खोदने का अभ्यास करोगे तभी तुम परिणाम पाओगे। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज़्यादा से ज़्यादा गहरी होती जायेगी, तुम धीरे-धीरे अपने सार और प्रकृति को आत्म-मंथन एवं आत्मज्ञान द्वारा जान जाओगे। अपनी प्रकृति को समझने के लिए, तुम्हें कुछ चीज़ों को अवश्य करना चाहिए: सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो; बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीज़ों का आनन्द लेते हो, किन चीज़ों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीज़ों की तुम आराधना करते हो, किन चीज़ों की तुम्हें तलाश है, और किन चीज़ों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो। क्या तुम इसे स्पष्टता से समझते हो? तुम्हें जो चीज़ें पसंद हैं उसमें किस तरह की चीज़ें शामिल हैं? ये वे चीज़ें हैं जिन पर तुम अक्सर ध्यान देते हो, जिनकी तुम आराधना करते हो, जिस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, जिस प्रकार की चीज़ें तुम करना चाहते हो, हो, और जिस प्रकार के लोगों को तुम अपने हृदय में आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों, या ऐसे हों जो वाक्पटु चापलूसी से बात करते हों या कुछ लोग ऐसे व्यक्तियों को पसंद करते हैं जो एक ढोंग करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं इस बात का प्रश्न है, इसमें शामिल है कुछ चीज़ों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीज़ों को करने का आनन्द लेना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिनके कारण लोगों की प्रशंसा और सराहनाएँ मिलेंगी। लोगों की प्रकृति में, जिन चीज़ों को वे पसंद करते हैं, उनकी समग्ररूप से एक विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन चीजों और लोगों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जो अपनी दिखावट के कारण अन्य लोग से अपनी आराधना करवाते हैं। जिन चीज़ों को लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ... तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किसकी ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में, तुम्हारी प्रकृति बुरी और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; अर्थात्, यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। शायद तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उस व्यक्ति के चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए एक साथी को ढूँढने की बात लो। यदि एक महिला वास्तव में किसी को पसंद करने लगे, तो अन्य लोग इसे रोक नहीं पाएँगे। यहाँ तक कि अगरउसकी टांग भी तोड़ दी जाये, तब भी वह उसके साथ ही रहना चाहेगी; अगर उसे उसके साथ विवाह करने का अर्थ उस महिला की मृत्यु हो तो भी वह विवाह करना चाहेगी। यह कैसे हो सकता है? इसका कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति उसे नहीं बदल सकता जो लोगों के अंदर गहराई में होता है। यहाँ तक कि अगर कोई मर भी जाए, तो भी उसकी आत्मा बस वही चीज़ें ले जाएगी; ये चीजें मानव प्रकृति की हैं, और वे किसी व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व करती हैं। जिन चीज़ों को लोग पसंद करते हैं उनमें कुछ अधार्मिकता होती है, कुछ स्पष्ट होती हैं और कुछ नहीं; कुछ उग्र होती हैं और कुछ नहीं; कुछ लोगों के पास आत्म-नियंत्रण होता है, और कुछ स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं; कुछ लोग अनैतिकता की चीजों में डूब सकते हैं, और यह साबित करता है कि उनके पास जीवन का थोड़ा-सा भी अंश नहीं है। यदि लोग उन चीजों के द्वारा अधिकृत और नियंत्रित न होने के लिए समर्थ होते, तो यह साबित होगा कि उनके स्वभाव में थोड़ा बदलाव आया है और उनके पास थोड़ा कद है। कुछ लोग कुछ सच्चाइयों को समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन है और वे परमेश्वर से प्यार करते हैं। वास्तव में, यह अभी भी बहुत जल्दी है, अपने स्वभाव को बदलना कोई आसान बात नहीं है। क्या प्रकृति को समझना आसान है? अगर तुम इसे थोड़ा समझ भी गए, तो भी इसे बदलना आसान नहीं होगा। यह लोगों के लिए एक कठिनाई का क्षेत्र है। तुम्हारे इर्द-गिर्द चाहे लोग, मामले, या चीजें कैसे भी बदलें, और चाहे दुनिया कैसे भी उलट-पुलट हो जाए, अगर तुम अपने अंदर सच्चाई के द्वारा निर्देशित होते हो, सत्य ने तुम्हारे भीतर जड़ें बनाई हैं, और परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीवन का, तुम्हारी पसंद का, और तुम्हारे अनुभव और अस्तित्व का मार्गदर्शन करते हैं, तो तुम वास्तव में बदल गए होगे। अब यह तथाकथित परिवर्तन केवल लोगों में थोड़ा सहयोग, थोड़ा उत्साह और विश्वास का होना है, लेकिन यह एक परिवर्तन नहीं माना जा सकता है और यह साबित नहीं करता कि लोगों के पास जीवन है; यह सिर्फ लोगों की पसंदों के कारण है।

उन चीजों को उजागर करने के अलावा जो लोग अपनी प्रकृतियों में पसंद करते हैं, उनकी प्रकृतियों से संबंधित अन्य पहलुओं को भी उघाड़ देना होगा; उदाहरण के लिए, चीज़ों पर लोगों के दृष्टिकोण, लोगों के तरीके और जीवन के लक्ष्य, लोगों के जीवन के मूल्य और जीवन पर दृष्टिकोण, साथ ही सच्चाई से संबंधित सभी चीजों पर उनकी राय। ये सभी वो चीजें हैं जो लोगों की आत्माओं के भीतर गहरी हैं और स्वभाव में परिवर्तन के साथ उनका एक सीधा संबंध है। आओ, देखें कि जीवन के बारे में एक भ्रष्ट प्रकृति के व्यक्ति के क्या विचार हैं। तुम कह सकते हो कि उनका मानना है कि "हर कोई बस अपनी चिंता करे, और जो पीछे रह गए, उन्हें भले शैतान ले जाए।" लोग खुद के लिए जीते हैं, और सीधे से कहें तो, वे सूअरों और कुत्तों की तरह हैं; वे केवल भोजन, कपड़े और खाने की परवाह करते हैं। उनके जीवन का अन्य कोई उद्देश्य नहीं है और इसमें महत्व या मूल्य का कोई लेश मात्र अंश भी नहीं है। जीवन के विचार वो हैं जिन पर तुम बचे रहने और जीवित रहने के लिए भरोसा करते हो; वे वो हैं जिनके लिए तुम जीते हो, और जिस तरह से तुम जीते हो। ये सभी मानव प्रकृति के सार हैं। लोगों की प्रकृतियों का विश्लेषण करने के द्वारा, तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं। वे सभी शैतान हैं और कोई यथार्थ में अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृतियों का विश्लेषण करके तुम वास्तव में मनुष्य के सार और उसकी भ्रष्टता को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में किसके हैं, लोगों में वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज़ से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानवीय सदृशता को कैसे जीना चाहिए। लोगों की प्रकृतियों का वास्तव में विश्लेषण करने में सक्षम होना आसान नहीं है। यह सच्चाई और अनुभव के बिना नहीं होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 560

मनुष्य का स्वभाव क्या है? तुम केवल मनुष्य के दूषण, अवज्ञा, कमियों, दोषों, धारणाओं और इरादों के बारे में जानते हो, लेकिन तुम मनुष्य के स्वभाव के भीतरी हिस्सों को नहीं जान सकते—तुम केवल बाहरी परत की जानकारी रखते हो, लेकिन तुम इसके उद्भव का पता नहीं लगा सकते। कुछ लोग इन सतही चीज़ों को मनुष्य के स्वभाव के रूप में भी मानते हैं, और कहते हैं, "मैं मनुष्य का स्वभाव समझता हूं; मैं अपने अहंकार को पहचानता हूं। क्या यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है?" अहंकार मनुष्य के स्वभाव का अंश है, और इतना बिल्कुल सत्य है, लेकिन इसे केवल सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। अपने स्वयं के स्वभाव को समझना क्या है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना जा सकता है? इसके अलावा, किसी के द्वारा प्रकट की गई चीज़ों के माध्यम से किसी की प्रकृति को विशिष्ट रूप से कैसे देखा जाना चाहिए? सबसे पहले, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को उसकी रुचि के माध्यम से देख सकते हो। कैसे? उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को नृत्य करना विशेष रूप से पसंद है, कुछ लोगों को विशेष रूप से गायक या फ़िल्मी सितारे पसंद हैं, कुछ लोग विशेष रूप से कुछ निश्चित प्रसिद्ध लोगों को आदर्श मानते हैं। इन रुचियों को देखने से, इन लोगों की प्रकृति क्या है? मैं एक और सरल उदाहरण दूँगा: कुछ लोग किसी गायक को आदर्श मान सकते हैं, यहाँ तक कि इस हद तक कि जहाँ वे गायक की हर हरकत, हर मुस्कान, और हर शब्द के प्रति आसक्त हो जाते हैं। वे गायक पर ध्यान लगाए रहते हैं, उस हर चीज़ की तस्वीर खींचते हैं जो गायक पहनता है और उसकी नक़ल करते हैं। इस स्तर का आदर्शीकरण एक व्यक्ति की प्रकृति के बारे में क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के हृदय में केवल वही चीज़ें हैं, परमेश्वर नहीं। वे सभी बातें जो यह व्यक्ति सोचता है, प्यार करता है, और खोजता है, पूरी तरह से शैतान द्वारा प्रकट की जाती हैं; वे इस व्यक्ति के हृदय पर कब्ज़ा कर लेती हैं, जिसे उन चीज़ों को अर्पित कर दिया जाता है। यहाँ क्या समस्या है? अगर किसी चीज़ को चरम सीमा तक प्रेम किया जाता है, तो वह चीज़ किसी का जीवन बन सकती है और उसके हृदय पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करती है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो परमेश्वर को नहीं चाहता है और उसके बजाय शैतान से प्यार करता है। इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ऐसे व्यक्ति की प्रकृति ऐसे व्यक्ति की होती है जो शैतान से प्रेम करता है और उसकी आराधना करता है, सच्चाई से प्रेम नहीं करता है, और परमेश्वर को नहीं चाहता है। क्या यह किसी व्यक्ति के स्वभाव को देखने का पूरी तरह से सही तरीका है? यह पूरी तरह सही है। यही वह तरीका है जिससे किसी व्यक्ति की प्रकृति का विश्लेषण किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं: उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें आपस में मिलना और बोलना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें घेरे रहते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनकी छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 561

पूरी मानवजाति शैतान द्वारा दूषित है, और मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर को धोखा देना है। परन्तु, मानवजाति के बीच, जो शैतान द्वारा दूषित है, कुछ ऐसे हैं जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं; ऐसे लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो ईमानदारी से सत्य की तलाश तो नहीं करते हैं, फिर भी विश्वास के साथ अनुसरण करते हैं। उनसे जो कहा जाता है, वे वैसा करते हैं और उनमें सभ्य मानवता है। वे कुछ हद तक तैयार हैं, अर्पण करने के लिए, दुनियावी चीज़ों को छोड़ने के लिए और पीड़ा को सहने के लिए। ऐसा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होगा, लेकिन उसका स्वभाव नहीं बदला जाएगा। इसका कारण यह है कि वह दिल से सत्य के पीछे नहीं जाता, और वह केवल सिद्धांतों को समझने से संतुष्ट है। वह सिद्धांत को सुनता है, सोचता है कि यह अच्छा है और इसे अपने पास रखता है, और सिद्धांत को समझने के बाद वह कुछ हद तक अपना कर्तव्य पूरा करता है। उसके लिए जो तरीका उचित होता है वह उस तरीके से कार्य सकता है। परंतु, वह सत्य को लेकर दिल से जुड़ा नहीं है; उसका दिल धूमिल है, और वह सत्य का सार समझने में असमर्थ है। ऐसा व्यक्ति भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है और बख़्शा जा सकता है, लेकिन उसके स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता है। भ्रष्टता से शुद्धता और स्वभाव में रूपान्तरण पाने के लिए, सत्य से प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने में समर्थ होने की आवश्यकता है। तुम सत्य को कैसे स्वीकार करते हो? सत्य को स्वीकार करने का अर्थ यह है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जिस भी विष ने तुम्हारी प्रकृति को विषैला किया हो, तुम उसे तब स्वीकार कर लेते हो जब यह परमेश्वर के वचन द्वारा प्रकट किया जाता है और परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित होते हो; तुम तर्क या चुनाव के बगैर ही इसे बेशर्त स्वीकार करते हो, और तुम स्वयं को परमेश्वर के वचन के अनुसार जानते हो। परमेश्वर के वचन को स्वीकार करने का यही अर्थ है। चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे, चाहे वे वचन तुम्हारे दिल को कितना भी भेद दें, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इसे तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि यह सत्य है, और तुम इसे तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि यह वास्तविकता के अनुरूप है। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम इनके प्रति समर्पित हो सकते हो, और तुम पवित्र आत्मा से आई उस प्रबुद्धता की रोशनी को स्वीकार करते हो और उसके प्रति समर्पित होते हो जिसे भाई-बहनों द्वारा बताया जाता है। जब ऐसे व्यक्ति का सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु पर पहुंच जाता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। एक व्यक्ति जो सत्य से प्यार नहीं करता है, उसमें अच्छी मानवता हो सकती है, लेकिन वह सत्य के बारे में लापरवाह है और इसे तहेदिल से नहीं खोजता है; वह कुछ अच्छे काम कर सकता है, परमेश्वर के लिए खर्च कर सकता है, और परमेश्वर के लिए कुछ चीज़ें छोड़ सकता है, फिर भी वह स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त नहीं कर सकता। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो पतरस की मानवता अन्य प्रेरितों या भाइयों और बहनों के समान थी, लेकिन वह सत्य की अपनी उत्साही खोज में अलग था, और उसने पूरी तरह से यीशु की बातों पर ध्यान दिया। यीशु ने पूछा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने सीधे उत्तर दिया, "मैं केवल पिता से प्यार करता हूँ, जो स्वर्ग में है, और पृथ्वी पर प्रभु से नहीं।" बाद में वह समझ गया: "यह सही नहीं है। पृथ्वी पर परमेश्वर ही स्वर्ग में परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी पर एक ही परमेश्वर नहीं है? मेरा केवल स्वर्ग में परमेश्वर से प्रेम करना अभी तक वास्तविक नहीं है। मुझे पृथ्वी पर परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि उससे ही मेरा प्यार वास्तविक है।" उसने परमेश्वर के वचन को ध्यान में रखते हुए वास्तव में समझा कि यीशु ने क्या कहा था। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, प्रेम को वास्तविक बनाने के लिए पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करना होगा। एक अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना यथार्थवादी या व्यावहारिक नहीं है। वास्तविक, दृश्यमान परमेश्वर को प्यार करना सत्य है। पतरस ने यीशु के वचनों के अंदर से सत्य प्राप्त किया और परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया। स्पष्ट है कि पतरस का परमेश्वर पर विश्वास केवल सत्य की खोज पर केंद्रित था, और अंत में उसने व्यावहारिक परमेश्वर यानी पृथ्वी पर परमेश्वर का प्यार हासिल किया। पतरस सत्य की खोज में विशेष रूप से तत्पर था। हर बार जब यीशु ने उसे सलाह दी, तो उसने यीशु के वचनों को ध्यान से समझा। हो सकता है कि पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध करने के पहले महीनों, एक वर्ष या कई वर्ष के लिए उसने विचार किया और वह परमेश्वर के वचन का अर्थ समझ गया। इस तरह, उसने सत्य में प्रवेश किया, और सत्य में प्रवेश करने के बाद उसका जीवन स्वभाव बदल गया और नवीनीकृत हो गया। यदि कोई व्यक्ति सत्य का पीछा नहीं करता है, तो वह उसे कभी नहीं समझ पाएगा। तुम सत्य के वचन दस हज़ार बार कह सकते हो और वे फिर भी अक्षर और सिद्धांत हैं। कुछ लोग केवल यही कहेंगे, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" तुम्हारा इसे दोहराना, दस हज़ार बार भी दोहराना बेकार है; तुम इसका अर्थ नहीं समझते हो। तुम ऐसा क्यों कहते हो कि मसीह सत्य और मार्ग और जीवन है? क्या अनुभव से इसके बारे में जो तुमने समझ प्राप्त की है उसे स्पष्ट कर सकते हो? क्या तुम सत्य और मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हो? परमेश्वर का वचन तुम लोगों के लिए अनुभव करने और जानने के लिए दिया गया है; वचनों को केवल बोलना बेकार है। जब तुमने परमेश्वर के वचन को समझ लिया होगा और उसमें प्रवेश कर लिया होगा, तब तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन को नहीं समझते हो, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते हो। तुम केवल तब ही अंतर पहचान सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम अंतर नहीं पहचान सकते हो। जब तुम्हारे पास सत्य होता है, केवल तब ही तुम किसी मुद्दे को गहराई से समझ सकते हो, सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को गहराई से नहीं समझ सकते हो। तुम स्वयं को केवल तब ही जान सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते हो। तुम्हारा स्वभाव तब ही बदल सकता है, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव बदल नहीं सकता है। तुम्हारे पास जब सत्य होगा केवल तब ही तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा की सेवा नहीं कर सकते हो। तुम्हारे पास जब सत्य होगा केवल तब ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना तुम्हारी आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान का प्रदर्शन होगी। ये सब कुछ परमेश्वर के वचन से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर करता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 562

परमेश्वर के वचन में वास्तविक अर्थ की वास्तविक समझ आना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच: मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई इसे अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो यह परमेश्वर के वचन को समझने के रूप में गिना जाता है। यह परमेश्वर के वचन को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के वचन के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने परमेश्वर के वचन के वास्तविक महत्व को महसूस किया है, यदि तू परमेश्वर के वचन के इरादे को और वे अंततः जो प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, एक बार यह सब स्पष्ट हो जाने पर यह परमेश्वर के वचन को कुछ स्तर तक समझने के रूप में गिना जाता है। तो, परमेश्वर के वचन को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचन के पत्र की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इसे समझता है। भले ही तू परमेश्वर के वचन के पत्र की कितनी ही व्याख्या क्यों न कर सकता हो, यह अभी भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने का तरीका है—यह बेकार है। परमेश्वर के वचन कैसे समझे जाने चाहिए? परमेश्वर के वचन को समझने के लिए मुख्य बात है कि उसके वचन को वचन के भीतर से ही समझा जाए। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। प्रत्येक वाक्य के भीतर विस्तृत सामग्री होती है जो परमेश्वर के वचन में प्रकट होती है, और इसे एक अलग तरीके से व्यक्त किया जा सकता है। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसे समझ नहीं सकता। परमेश्वर का वचन बहुत गहरा है और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। जब तक वे प्रयास करते रहेंगे, लोग सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं, और शेष विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाता है जब पवित्र आत्मा अनुभवों के माध्यम से ठोस स्थितियों की तुम्हारी समझ को प्रबुद्ध करता है। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचन द्वारा उसके वचन को समझना, उसके वचन की विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। एक दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से ज्ञान प्राप्त करके परमेश्वर के वचन के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचन की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू इसकी व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना से करता है, तो तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी अर्थ निकाल सकता हो और परमेश्वर के वचन का ग़लत अर्थ निकाल सकता हो, यह और भी अधिक तकलीफ़देह है। तो, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जानने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचन के शाब्दिक अर्थ को समझना या समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचन के पत्र की व्याख्या करने की आवश्यकता है, तो पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होगा? उस मामले में तुझे कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होगी, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होगा। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचन की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 563

जब मनुष्य की प्रकृति को पहचानने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात इसे उनके विश्व दृष्टिकोण, जीवन के दृष्टिकोण, और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से जानना है। जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यत: शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए।" पृथ्वी के उन पिशाचों, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए वचन उनका जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसके बारे में चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में शेखी बघारी जाती है, के अधिकांश वचन, लोगों का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों की अक्सर उद्धृत की गई विशेष कहावते हैं; ये सभी शैतान के फ़लसफ़े और शैतान की प्रकृति की रूपरेखाएँ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मानव जाति के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये झूठ और बकवास भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों से जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। "हर कोई अपने लिए और बाकियों को शैतान ले जाये" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मानव जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवता को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसमें निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे : "चूँकि तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?" "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'अधिकारी उपहार देने वालों को नहीं मार गिराते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या ये शब्द उस व्यक्ति की प्रकृति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए कोई भी साधन न छोड़ना उसकी प्रकृति बन गयी है, और अधिकारी होना ही उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, और दूसरों के साथ उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—वे यहाँ तक कि व्यवहारिक रूप से सच्चाई के पास भी नहीं है—उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और निपुण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन के पीछे उनकी जो चालें हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मानवीय प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं। इस तरह से अगर विच्छेदित किया जाए तो मनुष्य की प्रकृति को सब जान सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 565

स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और आप वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाएँ, लगातार परमेश्वर के वचन को पूरा करें, और आपमें पूरी तरह से पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के लिए समर्पित होने की इच्छा हो जाए, तो आप पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होंगे। परमेश्वर के अनुग्रह के बिना, यदि पवित्र आत्मा से कोई ज्ञान और मार्गदर्शन नहीं आता है, तो इस मार्ग पर चलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि लोगों के पास सच्चाई नहीं है और स्वयं को धोखा देने में असमर्थ हैं। सिद्ध बनने के जिस मार्ग पर पतरस चले उस पर चलने के लिए, मुख्यतः व्यक्ति में ऐसा करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए, उसमें अवश्य आत्मविश्वास, और परमेश्वर पर भरोसा होना चाहिए। इसके अलावा, उसे पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति, और हर उस चीज में जो परमेश्वर के वचन से विचलन में नहीं हैं, समर्पित अवश्य होना चाहिए। ये कई महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिनमें से किसी का भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। अनुभव के भीतर स्वयं को जानना बहुत कठिन है। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना इसमें प्रवेश करना अत्यंत कठिन है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को स्वयं को जानने और स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने पर ध्यान केन्द्रित अवश्य करना चाहिए। पौलुस ऐसे मार्ग पर चले जिसने जीवन की तलाश नहीं की, और स्वयं को जानने पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया। पौलुस ने विशेष रूप से कार्य, कार्य की प्रतिष्ठा और प्रभाव पर जोर दिया। उनकी प्रेरणा अपने कार्य और दुःख के बदले में परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना थी,परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करना थी। उनकी प्रेरणा गलत थी। उन्होंने जीवन पर ज़ोर नहीं दिया, न ही उन्होंने स्वभाव के परिवर्तन पर जोर डाला। उन्होंने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। चूँकि उन्होंने गलत लक्ष्य की तलाश की, इसलिए जिस रास्ते पर वह चला वह भी निस्संदेह गलत है। यह उसके दर्प और अहं द्वारा घटित हुआ है। स्पष्ट रूप से, उनके पास कोई सत्य नहीं था, और उनके पास कोई विवेक या तर्क भी नहीं था। लोगों को बचाने में, परमेश्वर मुख्यतः उनके स्वभाव को बदलने के माध्यम से परिवर्तन करते हैं। परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य लोगों में स्वभाव के परिवर्तन के परिणाम प्राप्त करना है, इस तरह से कि लोग परमेश्वर को जान पाएँ, उनके प्रति समर्पित हो सकें, और सामान्य तरीके से उनकी आराधना कर पाएँ। यह परमेश्वर के वचनों और उनके कार्य का लक्ष्य है। पौलुस की प्रार्थना करने की पद्धति परमेश्वर के आशय के सीधे उल्लंघन और टकराव में है। इसके प्रयोजन पूरी तरह से विपरीत हैं। हालाँकि, पतरस की प्रार्थना का मार्ग, पूरी तरह से परमेश्वर के आशय के अनुसार है, जो कि वास्तव में वह परिणाम है जिसे परमेश्वर मानवजाति में प्राप्त करने की कामना करते हैं। इसलिए पतरस का मार्ग धन्य है और परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। क्योंकि पौलुस का मार्ग परमेश्वर के आशय का उल्लंघन है, इसलिए परमेश्वर इससे घृणा करते हैं, और इसे श्राप देते हैं। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए परमेश्वर के आशय को अवश्य जानना चाहिए। यदि कोई वास्तव में उनके वचनों में परमेश्वर के आशय को पूरी तरह से समझने में सक्षम है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर मनुष्य को क्या बनाना चाहते हैं, और अंततः वे क्या परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं, केवल तब ही कोई सही ढंग से पता लगाने में समर्थ होता है कि किस मार्ग का अनुसरण करना है। यदि आप पतरस के मार्ग को पूरी तरह से नहीं समझते हैं, और केवल इसका पालन करने की इच्छा रखते है, तो आप उस पर चलने में सक्षम नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, आप बहुत सारे सिद्धांतों को जानते हैं, लेकिन अंततः वास्तविकता में प्रवेश करने में असमर्थ हैं। यद्यपि आप एक उथला प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन आप सच्चा परिणाम प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानव-स्वभाव को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 566

आजकल, ज़्यादातर लोगों की अपने बारे में समझ बहुत सतही है। वे उन चीज़ों को बिलकुल भी ठीक से नहीं जान पाये हैं जो उनकी प्रकृति का हिस्सा हैं। उन्हें सिर्फ़ कुछ भ्रष्ट स्थितियों, अपने द्वारा की जाने वाली संभावित चीज़ों, या अपनी कुछ कमियों का ज्ञान है और इस वजह से उन्हें लगता है कि वे ख़ुद को जानते हैं। इसके अलावा, अगर वे कुछ नियमों का पालन करते हैं, कुछ क्षेत्रों में गलतियां न करना सुनिश्चित करते हैं, और कुछ पापों को करने से खुद को रोक लेते हैं, फिर तो वे मानने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में उनके पास वास्तविकता है और उन्हें बचा लिया जाएगा। यह पूरी तरह से मानवीय कल्पना है। अगर तुम उन चीज़ों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में किसी भी पाप को करने से बच पाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में सच्चा बदलाव हासिल कर लिया होगा? क्या तुम सच में इंसान की समानता को जी पाओगे? क्या इस तरह तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं, और यह बात तय है। परमेश्वर में विश्वास तभी काम करता है जब किसी व्यक्ति के मानकों का स्तर ऊँचा हो और उसने सत्य को हासिल किया हो और उसके जीवन जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया हो। इसलिए, यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं?क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते है। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत दयनीय है, को इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है।" इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है।यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानव-स्वभाव को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 567

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जाने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन पतरस का जीवन बन सकते थे और सत्य से संबंधित थे, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका। पतरस की सेवा परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो सकी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा सिद्ध किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करे, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैंऔर नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य की खोज की; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से सिद्ध बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 568

जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को प्राप्त नहीं कर लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। वह प्रकृति विशिष्ट रूप से किस चीज़ को अपरिहार्य बनाती है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन अधार्मिक चीज़ों से प्यार क्यों करते हो? ऐसी बुरी चीज़ें तुम्हें अच्छी क्यों लगती हैं? ऐसी चीजों को पसंद करने का आधार क्या है? ये चीज़ें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें स्वीकारकर इतने खुशी क्यों हो? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे शैतान के जहर से युक्त हैं। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि शैतान का जहर क्या है, इसे वचनों के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ कुकर्मियों से पूछते हो कि वे उस तरह से क्यों करते हैं, तो वे जवाब देंगे: "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं।" यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का तर्क लोगों का जीवन बन गया है। भले वे चीज़ों को इस या उस उद्देश्य से करें, वे इसे केवल अपने लिए ही कर रहे होते हैं। सब लोग सोचते हैं चूँकि जीवन का नियम, हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए, यही है, इसलिए उन्हें बस अपने लिए ही जीना चाहिए, एक अच्छा पद और ज़रूरत के खाने-कपड़े हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं"—यही मनुष्य का जीवन और फ़लसफ़ा है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह कथन वास्तव में शैतान का जहर है और जब इसे मनुष्य के द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है तो यह उनकी प्रकृति बन जाता है। इस वचनों के माध्यम से शैतान की प्रकृति उजागर होती है; ये पूरी तरह से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जहर मनुष्य का जीवन और साथ ही उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है; यह भ्रष्ट मानवजाति पर लगातार हजारों सालों से इस ज़हर के द्वारा हावी रहा है। शैतान जो कुछ भी करता है, वह उसके स्वयं के लिए होता है। यह परमेश्वर से परे जाना, परमेश्वर से मुक्त होना और स्वयं सामर्थ्य का प्रयोग करना, और उन सभी चीज़ों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है जो परमेश्वर ने रची हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, बहुत से लोगों के नीति-वाक्य उनकी प्रकृति के प्रतिनिधि और प्रतिबिंब बन सकते हैं। चाहे लोग खुद को छिपाने की कितनी भी कोशिश करें, जो कुछ भी वे करते हैं और हर बात जो वे कहते हैं, उनमें वे अपनी प्रकृति को छिपा नहीं सकते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी सच नहीं बोलते हैं और वे दिखावा करने में अच्छे होते हैं, लेकिन एक बार जब दूसरे लोग उनसे साथ थोड़ी देर बातचीत करते हैं, तो उनकी कपटी प्रकृति और अतिशय बेईमानी का खुलासा हो जाता है। अंत में, लोग एक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे : ये लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते, और वे धोखेबाज़ लोग हैं। यह कथन उनकी प्रकृति की सच्चाई बताता है; यह उनकी प्रकृति और सार का सर्वोत्तम चित्रण और प्रमाण है। उनके जीवन का फलसफ़ा है किसी को सच नहीं बताना, और किसी पर भी विश्वास नहीं करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में फ़लसफ़े से युक्त है। कभी-कभी तुम स्वयं ही इसके बारे में अवगत नहीं होते हो और इसे नहीं समझते हो, मगर तुम्हारे जीवन का हर पल इस पर आधारित है। इसके अलावा तुम्हें लगता है कि यह फ़लसफ़ा बहुत सही है, बहुत उचित है और गलत नहीं है। यह इसका चित्रण करने के लिए काफी है कि शैतान का फ़लसफ़ा लोगों की प्रकृति बन गया है और वे पूरी तरह से शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं और इसका जरा सा भी विद्रोह नहीं करते। इसलिए, वे लगातार शैतानी प्रकृति को प्रकट कर रहे हैं, और हर लिहाज़ से वे निरंतर शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 569

लोगों की अपनी प्रकृति के बारे में जो समझ है वह बहुत ही सतही है, और इसके तथा परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या सारभूत समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग स्वयं को इस तरह से समझते हैं वे सत्य को अभ्यास में नहीं लाते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, वे मानकों के आसपास भी नहीं हैं, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

कार्य बदल देने का मतलब यह नहीं है कि लोगों की प्रकृतियाँ बदल गई हैं। यह सब बताने का कारण यह है कि कार्य लोगों के पुराने स्वरूप को मूल रूप से नहीं बदलते हैं या लोगों की प्रकृतियों को नहीं बदलते हैं। केवल अपनी प्रकृतियों को समझ लेने के बाद ही लोग नियमों का बस पालन करने की बजाय गहराई से अभ्यास कर सकते हैं। आज कल लोग सत्य को व्यवहार में लाने के लिए वांछित स्तर तक नहीं पहुँच पाते हैं; वे सत्य की आवश्यकताओं को संपूर्णता में पूरा नहीं करते हैं। लोग केवल कुछ ही सत्य को व्यवहार में लाते हैं, सत्य के कुछ ही हिस्सों को व्यवहार में लाते हैं। वे केवल कुछ विशेष परिस्थितियों और विशेष परिवेशों में ही सत्य को व्यवहार में लाते हैं। वे प्रत्येक परिवेश और प्रत्येक संदर्भ में सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं। कभी-कभार जब कोई व्यक्ति खुश हो या बढ़िया स्थिति में हो, या जब सभी लोग एक साथ समागम में हों और वह अंदर से अधिक सहजता का अनुभव कर रहा हो, तो वह कुछ समय के लिए कुछ चीजें सत्य के अनुसार करेगा और कुछ उचित टिप्पणियाँ करेगा; लेकिन जब वही व्यक्ति नकारात्मक लोगों या पीछे छूट गए लोगों के साथ होगा तो, वह थोड़ा उदास होगा और अच्छे ढंग से व्यवहार नहीं करेगा। यही वह जगह है जहाँ लोग सत्य को व्यवहार में शामिल करने के लिए एक दृढ़ रवैया नहीं अपनाते हैं। बल्कि, यह अभ्यास अनियत और अस्थायी मूड और परिवशों के प्रभाव में किया जाता है; यह इसलिए भी है कि आपको अपनी स्वयं की स्थिति और प्रकृति की समझ नहीं है। इसलिए, कभी-कभी आप कुछ ऐसा करते हैं जिसकी अपेक्षा आपने कभी नहीं की होगी। क्या आप लोग मुझ पर विश्वास करते हैं? आप लोग केवल कुछ स्थितियों को समझते हैं और आपको स्वयं अपनी प्रकृति की समझ नहीं है; इसलिए, आप गारंटी नहीं दे पाएंगे कि भविष्य में आप क्या करेंगे, अर्थात्, आपका पूर्ण नियंत्रण नहीं होगा। कभी-कभी, आप किसी परिस्थिति में सत्य को व्यवहार में ला पाते हैं मानो आप थोड़े बदल गए हैं, लेकिन दूसरे परिवेश में आप सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं। आप स्वयं की सहायता नहीं कर सकते। आप ऐसा इस बार नहीं करते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद ही यह कर बैठते हैं और भीतर जो कुछ भी है मौजूद ही रहता है। इससे यह साबित होता है कि आप अभी भी इस मामले को पूरी तरह से नहीं देखते हैं या गहराई से समझ नहीं पाए हैं, और आप गहराई से अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझ नहीं पाते हैं और अंततः आप गलत ही करेंगे। सामान्य परिस्थितियों में, अगर आप अपनी प्रकृति को पूरी तरह समझने में सक्षम होते और उससे घृणा करते, तो फिर आप स्वयं को नियंत्रित कर पाते और सत्य को व्यवहार में ला पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 570

सच्चाई के बारे में स्पष्ट सहभागिता करने का उद्देश्य लोगों द्वारा सच्चाई का अभ्यास कराना और उनके स्वभाव को बदलना है, न सिर्फ उन्हें खुश करना। यदि तुम सच्चाई को समझते तो हो लेकिन इसका अभ्यास नहीं करते, तो सच्चाई के बारे में सहभागिता और सच्चाई की समझ का कोई महत्व नहीं होगा। यदि तुम सच्चाई को समझते तो हो लेकिन इसका अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम सच्चाई को पाने का मौका और बचाए जाने की सभी संभावनाओं को खो दोगे। यदि तुम उस सच्चाई का अभ्यास करते हो जिसे तुम समझते हो, तो तुम और अधिक, और गहरी सच्चाई को प्राप्त करोगे; तुम परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त करोगे; तुम पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाश और मार्गदर्शन को प्राप्त करोगे। बहुत लोग केवल शिकायत करते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें कभी भी प्रबोधित नहीं करता है, लेकिन वे इसे नहीं समझते कि तत्वतः वे सच्चाई को अभ्यास में नहीं ढाल रहे हैं। इसलिए, उनके हालात कभी भी सामान्यता प्राप्त नहीं करेंगे और वे ईश्वर की इच्छा को कभी नहीं समझेंगे।

कुछ लोग कहते हैं कि सच्चाई का अभ्यास करने से उनकी समस्याएँ हल नहीं हो जाएँगी। दूसरों का मानना है कि सच्चाई पूरी तरह से लोगों के भ्रष्ट स्वभाव को हल नहीं कर सकती है। सच यह है कि लोगों की सारी समस्याएँ हल की जा सकती हैं; कुंजी यह है कि लोग सत्य के अनुसार कार्य कर सकते हैं या नहीं। तुम लोगों की वर्तमान समस्याएँ कैंसर या असाध्य रोग नहीं हैं; यदि तुम लोग सच्चाई को अभ्यास में डाल सकते हो, तो इन सभी समस्याओं को बदला जा सकता है, जो इस पर निर्भर करता है कि तुम सच्चाई के अनुसार कार्य कर सकते हो या नहीं। यदि तुम सही रास्ते पर चल रहे हो, तो तुम सफल होगे; यदि तुम गलत रास्ते पर चल रहे हो, तो तुम गए काम से हो जाओगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपने काम को करते समय कभी यह नहीं सोचते कि वे किस तरह से चीज़ों को करें जो काम के लिए उपयोगी हो सके या उनका काम करने का तरीका परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं; नतीजतन, वे कई ऐसी चीज़ों को करते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। यदि वे हर बात में सच्चाई के अनुसार काम करते, तो क्या वे ऐसे लोग नहीं होते जो परमेश्वर के दिल के अनुकूल हों? कुछ लोग सच्चाई को जानते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं डालते, वे ऐसा मानते हैं कि सच्चाई सिर्फ यही है और कुछ और नहीं। उनका विश्वास है कि यह उनकी धारणाओं और उनकी भष्टता को हल नहीं कर सकता है। क्या इस तरह का व्यक्ति हास्यास्पद नहीं है? क्या वे बेतुके नहीं हैं? क्या वे खुद को चतुर नहीं समझते हैं? यदि लोग सच्चाई के अनुसार कार्य करते हैं, तो उनका भ्रष्ट स्वभाव बदल जाएगा; यदि लोग अपने प्राकृतिक व्यक्तित्व के अनुसार ही परमेश्वर में विश्वास और उसकी सेवा करते हैं, तो उनमें से कोई भी अपना स्वभाव परिवर्तित नहीं कर सकता। कुछ लोग अपनी ही चिंताओं में दिन भर उलझे रहते हैं और उस सच्चाई की जांच या उसका अभ्यास नहीं कर पाते हैं जो आसानी से उपलब्ध होती है। यह व्यवहार बहुत बेतुका है; इस तरह के लोग अंतर्निहित रूप से पीड़ित होते हैं, उनके पास आशीषें तो होती हैं लेकिन वे उनका आनंद नहीं लेते! रास्ता तो है, तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि इसे अभ्यास में डालना है। यदि तुम सच्चाई को व्यवहार में डालने के लिए कृत-संकल्प हो, तो तुम्हारी कमजोरी और घातक खामियों को बदला जा सकता है, लेकिन तुम्हें हमेशा सतर्क और सावधान रहना होगा और अधिक कठिनाइयों को सहना होगा। परमेश्वर में विश्वास करने के लिए एक विवेकी हृदय होना चाहिए-यदि तुम ऐसा लापरवाह तरीका अपनाते हो, तो क्या तुम परमेश्वर में उचित रूप से विश्वास कर सकते हो?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके पास अनुसरण करने का एक मार्ग होता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 571

अगर तुम परमेश्वर के वचनों से परमेश्वर की इच्छा को और उसके कथनों के पीछे के अभिप्रायों को नहीं समझते हो, अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिसे उसके वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, अगर तुम इन बातों को नहीं समझते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह अपने हर वचन में इतना ईमानदार और निष्कपट क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर की इच्छा या उसके इरादों को नहीं समझते हो, तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो। अगर तुम यह समझ नहीं पाते हो, तो तुम सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हो? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है उसके द्वारा बोले जाने वाले हर वचन के माध्यम से उसकी इच्छा को समझना; इसका अर्थ है समझ लेने के बाद परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर के वचनों को जीना और अपनी वास्तविकता बन जाने देना। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और सिद्धान्त समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यहाँ तक कि तुम कहते हो, "परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार हों और हमने इसका अभ्यास किया है।" लेकिन तुम इसका कारण समझने में असफल हो जाते हो कि परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग ईमानदार हों और कपटी न हों, और साथ ही परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग उससे प्रेम करें। वास्तव में, लोगों से ऐसी अपेक्षा रखने में परमेश्वर का उद्देश्य है उनका उद्धार करना और उन्हें पूर्ण बनाना।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य खोजते हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे लोग जो शब्दों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं और अध्ययन करते हैं कि वह आशीष पाने के बारे में और मनुष्य के गंतव्य के बारे में क्या कहता है। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और अपना अनुसरण बंद कर देते हैं। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को गंभीरता से नहीं लेते; वे बस अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छे कर्म करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और दूसरों के सामने खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंज़िल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, सभी के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, उन्हें सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम आवश्यक रूप से सत्य को न तो समझोगे, न सत्य को प्राप्त करोगे। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और सिद्धांतों को हासिल किया है। तुम नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। तुम अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हो, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद भी तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हो, तुम केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हो। सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में तुम्हारा पूरा जीवन-काल लग जाएगा। तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; तुमने उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं। अगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को कैसे समझ सकते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम अभी भी बिलकुल बदले नहीं हो, न ही तुमने कोई प्रगति की है। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। तुम्हारे और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी रुकावटें हैं। तुम्हें अभी भी उस पर संदेह है। न केवल तुम परमेश्वर को समझते नहीं हो, बल्कि तुम उसे बहाने देते हो और उसके प्रति धारणाएँ पालते हो। तुम उसका विरोध करते हो और उसका तिरस्कार भी करते हो। इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 572

जो चीजें हर दिन होती हैं, चाहे बड़ी हो या छोटी, तुम्हारे संकल्प को डगमगा सकती हैं, तुम्हारे हृदय को भर सकती हैं, तुम्हारे कर्तव्य करने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं, अथवा तुम्हारी आगे की प्रगति पर अंकुश लगा सकती हैं—इन सब बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, सच्चाई जानने के लिए उनका ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए, और सभी बातें वह हैं जो अनुभव के दायरे के भीतर घटती हैं। कुछ लोग अपने कर्तव्यों को त्याग देते हैं जब उन पर नकारात्मकता आ जाती है, और हर एक झटके के बाद उठने में असमर्थ हो जाते हैं। ये सभी लोग बेवकूफ हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, वे सत्य को पाने में विफ़ल होंगे, भले ही वे अपना पूरा जीवन आस्था में बिता दें। यदि एक ही चीज़ तेरे साथ दस बार होती है लेकिन तुझे इससे कुछ हासिल नहीं होता है, तो तू एक औसत दर्जे का और एक बेकार व्यक्ति है। ऐसे बेवकूफ लोग अंत तक अनुसरण कैसे करेंगे? बुद्धिमान लोग और वे लोग जिनके पास सच में आध्यात्मिक मामलों को समझने की आंतरिक गुणवत्ता है, वे सत्य के साधक हैं, और दस में से आठ बार वे शायद कुछ प्रेरणा, सबक, प्रबुद्धता और प्रगति हासिल करने में सक्षम हैं। जब एक ही चीज़ ऐसे बेवकूफ व्यक्ति के साथ दस बार होती है, जो आध्यात्मिक बातों को नहीं समझता है, तो वह एक बार भी कोई जीवन लाभ प्राप्त नहीं करेगा, वह एक बार भी कोई बदलाव नहीं करेगा और एक बार भी अपनी प्रकृति को नहीं समझेगा और फिर वह बर्बाद हो जाएगा। हर बार जब यह होता है तो वे गिर जाते हैं, हर बार वापस खड़ा होने, उसे मीठी बातों से समझाने, के लिए उन्हें किसी और व्यक्ति के सहारे की ज़रूरत होती है। अगर ऐसे व्यक्ति को समझाया या सहारा नहीं दिया जाता है, तो वह फिर से खड़ा नहीं हो पाएगा। हर बार ऐसा होता है, जब गिरने का खतरा होता है, और हर बार उनके बिगड़ने का खतरा रहता है। क्या यह इनके लिए अंत नहीं है? इन निरर्थक लोगों को बचाने के लिए क्या अभी भी कोई आधार बाकी है? मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार उनके एक हिस्से का उद्धार है जो कि उनकी इच्छा और उनका संकल्प है, और उनके हृदय के भीतर उनका एक हिस्सा है जो कि सत्य और धार्मिकता के लिए उनकी ललक है। ऐसे लोगों के उद्धार के लिए जो सत्य से प्रेम करते हैं। यह उन लोगों के लिए उद्धार है जिनके पास इच्छाशक्ति और संकल्प है, जो सत्य और धार्मिकता की आकाँक्षा रखते हैं। किसी व्यक्ति के पास संकल्प है यह कहना उसके हृदय के भीतर उसके उस हिस्से को संदर्भित करता है जो धार्मिकता, अच्छाई और सत्य की लालसा रखता है और जिसमें विवेक है। परमेश्वर लोगों में इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और सत्य को पा सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता को शुद्ध किया जा सके और उनके जीवन स्वभाव को परिवर्तित किया जा सके। यदि तुम्हारे पास ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुम बचाए नहीं जा सकते हो। अगर तुम्हारे अंदर सत्य के लिए प्रेम नहीं है या धार्मिकता और प्रकाश की आकांक्षा नहीं है, तो जब कभी भी शैतान से तुम्हारा सामना होगा, तुम्हारे पास बुरी चीज़ों को छोड़ देने का साहस या कठिनाइयों को सहने का संकल्प नहीं होगा, और यदि तुम्हारा विवेक सुन्न है, तो सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, सत्य या होनेवाली चीजों के प्रति तुम संवेदनशील नहीं हो, तुम कुछ भी भेद समझ नहीं पा रहे हो, और चीजों को संभालने या हल करने के लिए तुम्हारे पास कोई क्षमता नहीं है, तो फिर बचाव का कोई रास्ता नहीं है। इस तरह के व्यक्ति को सुझाव देने के लिए कुछ भी नहीं होता, उसके साथ काम करने के लिए कुछ भी नहीं होता। उनकी अंतरात्मा सुन्न है, उनका मन गंदा है, वे सत्य में आनन्दित नहीं होते या अपने हृदय के भीतर गहराई में धार्मिकता के लिए लालसा नहीं रखते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने भी स्पष्ट रूप से अथवा पारदर्शिता से सत्य के बारे में बात करते हैं, वे प्रतिक्रिया नहीं देते हैं, जैसे कि वे पहले से ही मर चुके हैं। क्या उनके लिए सब खत्म नहीं हो चुका है? जिसके पास सांस है उसे कृत्रिम सांस देकर बचाया जा सकता है। लेकिन अगर वे पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्मा जा चुकी है, तो कृत्रिम सांस से कुछ नहीं होगा। जब भी तुम किसी परेशानी का सामना करते हो, तब अगर तुम उससे कतराने लगो और उससे बचने की कोशिश करो, तो इसका अर्थ है कि तुमने कोई गवाही नहीं दी है, इस प्रकार तुम्हें कभी भी बचाया नहीं जा सकता और तुम्हारा पूरी तरह से काम तमाम हो चुका है। जब तुम किसी समस्या का सामना करते हो, तो दिमाग ठंडा रखने की ज़रूरत है, तुमको उनका सही तरीके से सामना करना चाहिए, और तुम्हें एक चुनाव करने की ज़रूरत है। तुमको समस्या का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। कुछ सत्यों के बारे में तुम्हारी साधारण समझ का क्या उपयोग है? वे सिर्फ अपने पेट को भरने के लिए नहीं हैं और वे केवल बात करने के लिए वहां नहीं हैं और इसके अलावा और कुछ नहीं, न ही वे दूसरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए हैं। सबसे ज़रूरी है, वे तुम्हारी खुद की समस्याओं, तुम्हारी अपनी परेशानियों का समाधान करने के लिए हैं, और तुम अपनी खुद की परेशानियों को हल करने के बाद ही दूसरों की परेशानियों का समाधान कर सकते हो। ऐसा क्यों कहा गया है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसके पास कुछ मूल्यवान चीज है, या ऐसा कुछ जो परिपूर्ण करने योग्य है, उसके पास सत्य जानने का एक संकल्प है और दृढ़ इच्छा है; उसके पास कारण है, कठिनाई का सामना करने के लिए तैयार है, और वह अपने दिल में सत्य में प्रसन्न है, और जब उसका किसी चीज से सामना होता है, तो वह उसे जाने नहीं देता। ये सभी मजबूत बिंदु हैं। यदि तुम्हारे पास इनमें से कोई भी मजबूत बिंदु नहीं है, तो यह मुसीबत की निशानी है और यह एक बुरी बात है। तुम्हें कोई भी चीज को कैसे अनुभव करना है इसका ज्ञान नहीं हैं, तुम्हें कोई अनुभव नहीं है, और तुम्हारे नीचे वाले लोगों की कठिनाइयों को हल करने में तुम सक्षम नहीं होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुमको पता नहीं है कि प्रवेश कैसे करें, जब चीजें तुम पर आ गिरती हैं, तुम उलझन में पड़ जाते हो, तुम परेशान हो जाते हो, तुम रोते हो, तुम नकारात्मक हो जाते हो, तुम भाग जाते हो, और किसी भी उचित प्रकार से उनसे संपर्क करने में तुम असमर्थ हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों का उद्धार नहीं हो सकता' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 573

चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहि; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है; यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि 'परमेश्वर का धन्यवाद,' परमेश्वर का धन्यवाद’जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की मंशा क्या है? जो तुम कहते हो उसके माध्यम से परमेश्वर के करीब हों; ऐसा करने में, तुम अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की मंशा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करते हो, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकोगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। पर जब कोई बात लोगों के साथ होती है, चाहे वास्तविक परिस्थिति कैसी भी हो, उन्हें लगता है कि वे यह या वह कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते हैं, और वे अपने स्वयं के इरादों के अनुसार इसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का दौर उपयुक्त हो या नहीं, या वह सच्चाई के अनुरूप हो या नहीं, वे केवल अपनी गर्दन उठा कर अपने निजी इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। ऐसा आम तौर पर लगता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः भगवान उनके दिल में नहीं होते हैं। कुछ लोग कहते हैं: "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं बढ़ सकता हूँ ; अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठानों को करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आना चाहा, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ; मैं उनके पास नहीं जा सका।" इस तरह के व्यक्ति के दिल में परमेश्वर नहीं हैं, बल्कि वह स्वयं ही अपने दिल में है, और वह सच्चाई को अपने कार्यों में लागू नहीं कर सकता है। सच्चाई के अनुसार काम न करने का अर्थ है आप अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहे हैं, और अपनी इच्छा के आधार पर काम करने का अर्थ है परमेश्वर को त्याग देना; अर्थात, परमेश्वर आपके दिल में नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, लोग वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं और न ही इस बारे में परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं। वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है; और उनकी ऐसी अभिलाषा नहीं है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है जो लोग अपने अभ्यासों में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 574

परमेश्वर आपके किसी कार्य से विशेष रूप से बहुत असंतुष्ट थे ; यदि आप इस कार्य को करने के दौरान सोचते : परमेश्वर को यह कैसा लगेगा अगर यह उनके सामने लाया जाता है? यदि वे इस मामले के बारे में जानें तो क्या वे प्रसन्न होंगे या कुपित? क्या भगवान इससे घृणा करेंगे? पर आपने यह सब खोज नहीं की, क्या आपने की? भले ही लोगों ने आपको याद दिलाया हो, पर आपने तब भी सोचा कि यह मामला कोई बड़ी बात नहीं, और यह सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करता, यह कोई पाप नहीं। परिणाम यह हुआ कि आपने इसे बर्बाद कर दिया और भगवान को उकसाया, बहुत क्रुद्ध किया, यहां तक कि आप उनकी निगाह में घृणा के योग्य हो गए। चीजों को अच्छी तरह सोच-परख लो, ताकि आप उन पर पछतावा न करें ; यही है वह बात जिस पर आपको अमल करना चाहिए। अगर आपने पहले मामले की अच्छी तरह से खोज-बीन और जांच कर ली होती, तो इस मामले पर क्या आपका कुछ नियंत्रण न बना रहता? हालांकि कभी-कभी लोगों की परिस्थितियां अच्छी नहीं होती, अगर वे ईश्वर की उपस्थिति में जो कुछ भी करने की ज़रूरत होती है उसका गंभीरता से निरीक्षण करें, तो कोई बड़ी गलतियां न होंगी। सत्य के अभ्यास में लोगों का गलतियों से दूर रहना मुश्किल है। जब आप काम करते हों, यदि आप सत्य के अनुसार उसे करना तो जानते हैं, लेकिन आप उसे सच्चाई के अनुसार पूरा नहीं करते हैं, तो समस्या यह है कि आप सच्चाई के प्रेमी नहीं हैं। एक व्यक्ति जो सच्चाई का प्रेमी नहीं है, स्वभाव में नहीं बदला जाएगा। यदि आप परमेश्वर की इच्छा को सही ढंग से नहीं समझ सकते और कैसे अभ्यास करें यह नहीं जानते, तो आपको दूसरों के साथ संवाद करना चाहिए। यदि कोई भी व्यक्ति मामले को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाए, तो आपको उस समय जो सबसे उचित लगे वह उपाय करना चाहिए ; लेकिन यदि आप अंततः यह पता लगाते हैं कि इस तरह से इसे पूरा करने में कोई त्रुटि है, तो आपको इसे तुरंत ठीक करना चाहिए, और परमेश्वर इस त्रुटि को पाप के रूप में नहीं गिनेंगे। क्योंकि आपका इरादा इस मामले को व्यवहार में लागू करने के समय सही था, और आप सच्चाई के अनुसार अभ्यास कर रहे थे, केवल आप इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाए थे, और इससे आपके कार्यों में कुछ त्रुटियां रह गईं ; यह एक लघु परिस्थिति है। लेकिन बहुत से लोग अपने स्वयं के दो हाथों के बल पर ही काम करते हैं और यह करने के लिए अपने स्वयं के मन पर ही भरोसा करते हैं, और वे शायद ही कभी चिंतन करते हों : क्या इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? अगर मैं ऐसा करूं तो क्या भगवान प्रसन्न होंगे? अगर मैं ऐसा करूं तो क्या भगवान मुझ पर भरोसा करेंगे? क्या मैं सच्चाई को व्यवहार में लाऊँगा यदि मैं ऐसा करूं? यदि परमेश्वर यह सुनते हैं, तो क्या वे कह पाएँगे : "यह मामला सही और उचित रूप से किया गया है! इसे निभाए रखो!"? क्या आप इस तरह से सब कुछ गंभीरता से जांच सकते हैं? क्या आप हर बात में सावधानी बरतने में सक्षम हैं? या आपको इस बात पर विचार करना चाहिए कि आप जिस तरीके से यह कर रहे हैं, क्या उसे परमेश्वर तुच्छ मानते हैं, जिस तरह से आप इसे कर रहे हैं वह हर अन्य व्यक्ति को कैसा लगता है, क्या आप इसे स्वयं की इच्छा के आधार पर या मात्र अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर रहे हैं...? आपको इसमें बहुत अधिक विचार करना होगा, कई प्रश्न पूछने होंगे, और अधिक तलाश करनी होगी, और तब त्रुटियां छोटी, और छोटी होती जाएंगी। इस तरह से करने करने से यह साबित हो जाता है कि आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसे सच्चाई की तलाश है, और आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो ईश्वर का सम्मान करते हैं, क्योंकि आप सत्य की अपेक्षित दिशा के अनुसार काम कर रहे हैं।

यदि किसी का कर्म सत्य से हट जाता है, तो वह नास्तिक के समान ही है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है जो अपने दिल में परमेश्वर से रहित है, जो भगवान को छोड़ देता है, और इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के परिवार में पारिश्रमिक पाते एक कर्मचारी की तरह है जो अपने स्वामी के लिए काम करता है और थोड़ा मेहनताना पाता है, और फिर वह चला जाता है। यह वह व्यक्ति कतई नहीं है जो ईश्वर में विश्वास करता है। क्या इससे पहले इसका उल्लेख नहीं हुआ, "भगवान की मंजूरी पाने के लिए आप क्या कर सकते हैं"? यह बात पहले कही गई है, ना? परमेश्वर से अनुमोदन पाना वह पहली बात है जिसके बारे में आपको सोचना और काम करना चाहिए; यह आपके अभ्यास में सिद्धांत हो और इसकी गुंजाइश हो। आपको पहले क्यों यह तय करना चाहिए कि आप सत्य के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं, उसका कारण यह है कि यदि यह सत्य के अनुरूप है, तो यह निश्चय ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी है। ऐसा नहीं है कि आपको यह तय करना चाहिए कि कोई बात सही है या गलत है, या यह कि हर किसी की रूचि के अनुसार यह है या नहीं, या यह आपकी अपनी इच्छाओं के अनुसार है या नहीं। बल्कि, यह तय करना है कि क्या यह सत्य के अनुरूप है, क्या यह चर्च के कार्य और हितों को लाभ पहुंचाता है। यदि आप इन पहलुओं पर विचार करते हैं, तो आप कार्यों को करते समय परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप अधिकाधिक होंगे। यदि आप इन पहलुओं पर विचार नहीं करते हैं और चीजों को करते समय केवल अपनी इच्छा-शक्ति पर भरोसा करते हैं, तो यह निश्चित है कि आप उन्हें गलत तरीके से ही करेंगे, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और यकीनन परमेश्वर के अनुरूप नहीं। यदि आप परमेश्वर द्वारा अनुमोदित होना चाहते हैं, तो आपको सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपने स्वयं के इरादों के अनुसार। कुछ लोग बंद दरवाजों के पीछे छिपकर गलत काम करते हैं या कुछ निजी हरकतें करते हैं। उन कामों के किए जाने के बाद, उनके भाइयों और बहनों का यह कहना होगा कि उन्होंने जो किया वह सही न था, पर वे उन्हें इस तरह से नहीं मान पाएंगे। उन्हें लगता है कि यह एक व्यक्तिगत मामला है और इसमें चर्च के काम का कोई सरोकार नहीं है, इसका आर्थिक तौर पर चर्च के साथ कुछ लेना-देना नहीं है और इसमें चर्च के लोग भी शामिल नहीं, इसलिए इसकी गणना सत्य के उल्लंघन करने के रूप में नहीं की जा सकती और परमेश्वर को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीजें आपको ऐसी प्रतीत हो सकती हैं कि वे निजी मामले हैं और उनका किसी सिद्धांत या सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है। परन्तु, भाइयों और बहनों के नज़रिए से, जब आप ऐसा करते हैं तब ऐसा लगता है कि आप बहुत स्वार्थी हैं और आप परमेश्वर के परिवार के काम और परमेश्वर के परिवार को यह कैसे प्रभावित करेगा, इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं, और आप केवल अपने खुद के लाभ पर विचार कर रहे हैं। यह बात पहले से ही संतों की व्यवस्था से जुड़ी हुई है और इसमें मानव प्रकृति के मुद्दे पहले से जुड़े हुए हैं। आप जो कर रहे हैं वह चर्च के हितों को शामिल नहीं करता है और इसमें सत्य शामिल नहीं है, लेकिन आप जो कर रहे हैं वह मानव प्रकृति के नैतिक नियमों का उल्लंघन करता है और अंत में, यह सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे तुम इसे परमेश्वर के परिवार में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए या अपने निजी कारणों के लिए यह कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त व्यक्ति को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। यदि तुम हर बात और हर सत्य से इस ढंग से पेश आते हो, तो तुम अपने स्वभाव को बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। कुछ लोगों को लगता है कि जब वे कुछ निजी कार्य कर रहे होते हैं, तो वे सत्य की उपेक्षा कर सकते हैं, इच्छानुसार काम कर सकते हैं और वैसे कर सकते हैं जैसे उन्हें खुशी मिले, और उस ढंग से जो उनके लिए फायदेमंद हो; वे इस तरफ ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते कि यह परमेश्वर के परिवार को कैसे प्रभावित करेगा और न ही वे यह सोचते हैं कि यह संतों के आचरण को शोभा देता है या नहीं। अंत में, जब मामला समाप्त हो जाता है, तो वे भीतर अंधकारमय और असहज हो जाते हैं; लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि यह सब क्यों हो रहा है। क्या यह प्रतिशोध उचित नहीं है? यदि तुम ऐसी चीजें करते हो जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं, तो तुमने परमेश्वर को नाराज़ किया है। यदि लोगों को सत्य में रूचि नहीं है, और अक्सर अपनी इच्छा के आधार पर काम करते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर को रुष्ट या अपमानित करेंगे। ऐसे लोग आम तौर पर अपने कर्मों में परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं होते और अगर वे पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे सज़ा से ज़्यादा दूर नहीं होंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 575

तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन-प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा काम नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन-प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किये गये काम एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही काम करते रहते हैं। मगर, इनको करते समय, ये लोग अपनी जो दशाएं प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मन:स्थिति में होने पर लोग थोड़े ज़्यादा चौकस होते हैं और बेहतर काम करते हैं। बाकी समय, किसी अनजान प्रभाव के चलते, उनका शैतानी स्वभाव उनमें शैतानी जगाता है जिससे उनमें अनुचित विचार उपजते हैं, वे बुरी हालत और मन:स्थिति में आ जाते हैं; परिणाम यह होता है कि वे अपना काम सतही ढंग से करते हैं। लोगों की आतंरिक दशाएं निरंतर बदलती रहती हैं; ये किसी भी स्थान पर किसी भी वक्त बदल सकती हैं। तुम्हारी दशा चाहे जैसे बदले, अपनी मन:स्थिति के अनुसार कर्म करना हमेशा ग़लत होता है। मान लो कि जब तुम अच्छी मन:स्थिति में होते हो, तो थोड़ा बेहतर करते हो, और बुरी मन:स्थिति में होते हो तो थोड़ा बदतर करते हो—क्या यह काम करने का कोई सैद्धांतिक ढंग है? क्या तुम इस प्रकार अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकते हो? मन:स्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को पता होना चाहिए कि सिर्फ परमेश्वर के सामने प्रार्थना कर खुद को संभालने से, और सत्य को खोज कर सिद्धांत के साथ कर्म करने से ही, वे अपनी मन:स्थिति द्वारा नियंत्रित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जांच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे सतही तौर पर तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुमने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने से जी चुराने की कोशिश तो नहीं की है, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बारे तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीज़ों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदारी लेता है और भरोसेमंद है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, जोकि मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभाने की पूर्व-अपेक्षाएं हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे महज़ सतही ढंग से कार्य नहीं करते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए अहंकारी हो कर दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 576

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय वे किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर नहीं करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। यह अलग प्रकार की प्रकृति है, है ना? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते राह, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 578

परमेश्वर के वचन को पढ़कर और समझकर परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति है। तुम परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम और उसके उद्धार के साथ-साथ यह भी देख सकते हो कि वह किस तरह से उन्हें बचाता है...। क्योंकि परमेश्वर का वचन, स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया जाता है, उसे लिखने के लिए किसी मनुष्य का उपयोग नहीं किया जाता है। यह व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि वे दिल से महसूस किए जाने वाले वचन हैं? क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसकी इच्छा, उसके विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त कर रहे हैं। परमेश्वर के वचनों में कठोर वचन, शांत एवं कोमल वचन, कुछ विचारशील वचन हैं, और कुछ प्रकाशित करने वाले वचन भी हैं जो इंसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। यदि तुम केवल प्रकाशित करने वाले वचनों को देखोगे, तो तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर काफी कठोर हैl यदि तुम केवल शांत एवं कोमल वचन को देखोगे, तो तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर के पास ज़्यादा अधिकार नहीं हैl इसलिए इस विषय को तुम्हें सन्दर्भ से बाहर होकर नहीं समझना चाहिए, तुम को इसे हर एक कोण से देखना चाहिए। कभी-कभी परमेश्वर शांत एवं करुणामयी दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग परमेश्वर के अपमान न सहन करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य बुरी तरह से गंदा है और परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य नहीं है, और परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। लोगों का परमेश्वर के सामने आना अब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह से ही संभव है। जिस तरह परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य के अर्थ से परमेश्वर की बुद्धि को देखा जा सकता है। भले ही लोग परमेश्वर के सीधे सम्पर्क में न आएँ, तब भी वे परमेश्वर के वचनों में इन चीज़ों को देखने में सक्षम होंगे। जब परमेश्वर की सच्ची समझ वाला कोई व्यक्ति मसीह के सम्पर्क में आता है, तो परमेश्वर के बारे में उसकी मौजूदा समझ उसके साथ मेल खा सकती है, किन्तु जब केवल सैद्धान्तिक समझ वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर के सम्पर्क में आता है, तो वह इस संबंध को नहीं देख सकता है। सत्य का ये पहलू सबसे गम्भीर रहस्य है, जिसकी गहराई को नापना कठिन है। उन वचनों का सार निकालो जिन्हें परमेश्वर देहधारण के रहस्य के विषय में कहता है, विभिन्न कोणों से उन्हें देखो , फिर अपने बीच इन चीज़ों की चर्चा करो। तुम सब साथ मिलकर प्रार्थना कर सकते हो , इन चीज़ों पर बहुत अधिक विचार और चर्चा कर सकते हो । कदाचित् पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करे और समझ दे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के पास परमेश्वर के सम्पर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, मनुष्य को एक बार में अपने मार्ग का थोड़ा सा एहसास करने, तथा परमेश्वर की सच्ची समझ हासिल करने के लिए इस तरीके से अनुभव करने पर भरोसा रखना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 579

परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को समझ पाना, परमेश्वर को जानना यही है। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दयालुता को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किन चीज़ों को पसंद करता है और किनसे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण तो कर पाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास करने में सक्षम हों; इसी में अंतर निहित है। यदि तुम परमेश्वर को जानते हो, उसे समझते हो, उसकी कुछ इच्छाओं को समझने एवं ग्रहण करने में सक्षम हो, तो तुम सचमुच उस पर विश्वास कर सकते हो, सचमुच में उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सचमुच में उससे प्रेम कर सकते हो, और सचमुच में उसकी आराधना कर सकते हैं। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझते हो, तो तुम सिर्फ एक अनुयायी हो भीड़ के साथ में दौड़ता और धारा के साथ बहता है। इसे सच्चा समर्पण या सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता है। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? ऐसा कोई भी नहीं है जो सचमुच में परमेश्वर को जान जाये और फिर जब उसे देखे तो उसकी आराधना न करे और जो उसका आदर न करे। जैसे ही वे परमेश्वर को देखते हैं वे भयभीत हो जाते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और उसके स्वरूप की जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का आदर करेंगे। आम तौर पर, जितनी कम समझ लोगों के पास होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाही होते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। यदि लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय के मारे काँपने लगते। "जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं"—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास गहन समझ नहीं थी, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का आदर करने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका आदर कर सकते हैं? लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, न ही परमेश्वर की आराधना करने में और भी समर्थ नहीं होते हैं। यदि वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक सामान्य मनुष्य की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक अपमानजनक प्रवृत्ति अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसकी अवज्ञा कर सकते हैं, उस पर दोष लगा सकते हैं, और दुराग्रही हो सकते हैं। वे दंभी हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें, वे परमेश्वर के बारे में धारणाएं भी बना सकते हैं, उसकी निंदा और तिरस्कार कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यवहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश और जिसे हासिल करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

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