जीवन में प्रवेश 6

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 556

केवल सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति अपने स्वभाव में बदलाव ला सकता है : यह एक ऐसी बात है, जिसे लोगों को अच्छी तरह से जानना-बूझना चाहिए, और समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसल जाओगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीज़ों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसका कोई मूल्य है या नहीं। तुम वे चीज़ें कर सकते हो जो अर्थपूर्ण हों, लेकिन तुम्हें वे चीज़ें नहीं करनी चाहिए जिनका कोई अर्थ न हो। जहाँ तक उन चीज़ों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीज़ों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें ज़ल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? बुरी या निरर्थक चीज़ें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिक्रियावादी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य की प्रकृति और सार द्वारा निश्चित किया जाता है। एक बार जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम्हारे पास उन चीजों को करने की शक्ति होगी, जो सत्य के अनुरूप हैं। तब यह सामान्य हो जाता है, यहाँ तक कि सहज और सुखद भी, और तुम महसूस करते हो कि कोई नकारात्मक चीज़ करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो और अगर तुम यह सत्य समझते हो कि किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए—किस तरह एक निष्कपट और सीधा-सादा व्यक्ति बनना चाहिए, एक ईमानदार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो—तो तुम फिर कभी परमेश्वर की अवहेलना करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें धोखा दे, या कोई दुष्ट तुम्हें उकसाए, तुम वो नहीं करोगे; कोई तुम्हारे साथ कितनी भी ज़बरदस्ती करे, तुम फिर भी वैसा नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से घृणा करने और नकारात्मक चीजों से आंतरिक विरक्ति महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके लिए बुराई करना मुश्किल होगा, क्योंकि उनके जीवन स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया गया है।

अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारे भीतर अहंकार और दंभ मौजूद हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम नफरत, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी इच्छा से कुछ काम करने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम अपनी इच्छा से परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम खुशी महसूस करोगे। तुम अपनी इच्छा से अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम अपने आपको बेहतर मानसिक स्थिति में महसूस करोगे। इसलिये, अपने स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करना और सत्य में प्रवेश करना है। केवल सत्य को समझकर ही तुम्हारे अंदर विवेक आएगा; केवल विवेक से ही तुम चीज़ों को पूरी तरह समझ पाओगे; चीज़ों को पूरी तरह समझकर ही तुम देह की इच्छाओं का त्याग कर सकते हो और परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ तुम कदम-दर-कदम सही मार्ग पर आगे बढ़ पाओगे। यह इस बात से जुड़ा है कि सत्य का अनुसरण करते समय लोग कितने दृढ़ होते हैं। यदि कोई वास्तव में दृढ़ है, तो छह महीने या एक साल के बाद वे सही रास्ते पर आने शुरू हो जाएंगे। तीन या पांच वर्षों के भीतर, वे परिणाम देख लेंगे, और महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो दस साल तक विश्वास कर सकते हो लेकिन तुम्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, तुम सोचोगे कि परमेश्वर में विश्वास करने का ठीक यही मतलब है; तुम सोचोगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे तुम पहले दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। तुम कुछ सैद्धांतिक शब्द बोलने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम अभी भी असहज और बेचैन महसूस करोगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने वाली कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से रहने से उनके जीवन का अर्थ होगा, और परमेश्वर को थोड़ी संतुष्टि प्रदान करने और कृतज्ञ महसूस करने के लिए उन्हें इसी तरह से रहना होगा। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, स्वयं को त्याग सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो सत्य को सटीक रूप से व्यवहार में लाने, और सत्य को वास्तव में व्यवहार में लाने का यही अर्थ है, और यह उनकी कल्पनाओं पर उनकी पिछली निर्भरता और सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहने से बिलकुल भिन्न है। वास्तव में, जब वे सत्य को नहीं समझते तो उनका कुछ भी करना थकाऊ है, सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहना थकाऊ है, और कोई लक्ष्य न होना और चीज़ों को आँखें मूँदकर करते रहना थकाऊ है। केवल सत्य के साथ ही वे मुक्त हो सकते हैं—यह कोई झूठ नहीं है—और उसके साथ वे चीज़ों को आसानी से और खुशी से कर सकते हैं। ऐसी स्थिति वाले लोग वे लोग हैं, जिनके पास सत्य है; वे ही हैं जिनके स्वभाव बदल दिए गए हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 557

प्रवेश करने की कोशिश करते समय, हर मामले की जाँच होनी चाहिए। सभी मामलों पर परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार पूरी तरह से चिंतन किया जाना चाहिए ताकि तुम यह जान सको कि कैसे उन्हें इस तरह से करना है कि वो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो। अपनी इच्छा से उत्पन्न होने वाली चीज़ें फिर त्यागी जा सकती हैं। तुम जानोगे कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीज़ों को कैसे करें, और फिर तुम जाकर उन्हें करोगे; ऐसा लगेगा कि जैसे हर चीज़ अपना स्वाभाविक रूप ले रही है, और यह अत्यंत आसान प्रतीत होगा। सत्य से युक्त लोग चीज़ों को ऐसे करते हैं। तब तुम वास्तव में दूसरों को दिखा सकोगे कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है, और वे देखेंगे कि तुमने वाकई कुछ अच्छे काम किए हैं, तुम सिद्धांतों के अनुसार काम करते हो, और तुम हर काम सही ढंग से करते हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य को समझता है और जिसके पास वास्तव में कुछ मानवीय सदृशता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन ने लोगों में परिणाम हासिल किये हैं। एक बार जब लोग सत्य को सचमुच में समझ लेते हैं, तो वे अपने अस्तित्व की अवस्थाओं को समझ सकते हैं, जटिल मामलों की तह तक जा सकते हैं और अभ्यास करने का उचित तरीका जान सकते हैं। अगर तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम अपने अस्तित्व की अवस्था को नहीं समझ पाओगे। तुम खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहोगे, लेकिन तुम्हें यह मालूम नहीं होगा कि विद्रोह कैसे करें और तुम किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हो। तुम अपने हठ को त्यागना चाहोगे, लेकिन अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हठ सत्य के अनुरूप है, तो फिर तुम उसे कैसे त्याग सकते हो? तुम्हें शायद यह भी लगे कि इसे पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया है, और इसलिए चाहे जो भी हो, तुम उसे त्यागने से इनकार कर दोगे। इस प्रकार, जब लोग सत्य को धारण नहीं करते, तो उनका यह सोचना काफी मुमकिन है कि जो कुछ उनकी मनमानी, उनकी मानवीय अशुद्धियों, नेक इरादों, उनके इंसानी उलझन-भरे प्रेम, और मानवीय अभ्यास से उपजता है, वो सही है, और सत्य के अनुरूप है। तो फिर तुम इन चीज़ों के खिलाफ विद्रोह कैसे कर सकते हो? अगर तुम सत्य को नहीं समझते या नहीं जानते कि सत्य पर अमल करने का अर्थ क्या होता है, अगर तुम्हारी आँखेँ धुँधलाई हुई हैं और तुम्हें नहीं मालूम कि किस तरफ मुड़ना है, इसलिए तुम उसी आधार पर काम करते हो जो तुम्हें सही लगता है, तो तुम कुछ ऐसे कार्य करोगे, जो सही दिशा में नहीं होंगे और ग़लत होंगे। इनमें से कुछ कार्य नियमों के अनुरूप होंगे, कुछ उत्साह से उपजे हुए होंगे, कुछ शैतान से निकले हुए होंगे और वे गड़बड़ी पैदा करेंगे। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे इस तरह से कार्य करते हैं : थोड़ा बायीं ओर, फिर थोड़ा दायीं तरफ; एक पल सही, दूसरे पल भटके हुए; बिल्कुल भी कोई सत्यता नहीं। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे सभी चीज़ों में एक बेतुका नज़रिया अपनाते हैं। ऐसे में, वे मामलों को सही ढंग से कैसे संभाल सकते हैं? वे किसी समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं? सत्य को समझना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के वचन समझने योग्य होना सत्य की समझ पर निर्भर है, और लोग जो सत्य समझ सकते हैं उसकी सीमा होती है। लोग अपनी पूरी ज़िंदगी परमेश्वर में विश्वास रखेँ, तब भी परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ सीमित ही होगी। जो लोग अपेक्षाकृत थोड़े अनुभवी हैं वे भी ज़्यादा-से-ज़्यादा उस स्थिति तक पहुँच सकते हैं जहां वे ऐसे काम बंद कर सकें जिनसे स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध होता है, ऐसे काम बंद कर सकें जो स्पष्ट रूप से बुरे हों और जो किसी भी व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचाते। उनके लिए उस अवस्था में पहुँचना मुमकिन नहीं है, जहां उनके हठ का कोई अंश शामिल न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि लोग सामान्य बातें सोचते हैं, और उनकी थोड़ी सोच परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होती है, और समझ-बूझ के एक ऐसे पहलू से संबंधित होती है जिसे हठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, मुख्य बात हठ के उन अंशों को समझना है जो परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध हैं, सत्य के विरुद्ध हैं, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध हैं। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जानने का प्रयास करना चाहिए, सत्य को समझ कर ही तुम विवेक पा सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 558

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के बारे में पता होना चाहिए, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो। परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; और इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना मत करो—हमें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें इसका विश्वास न हो, तो खुद अनुभव करके देख लो। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद पर लागू करने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को कुलटाओं और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार हैं, अत: ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के ऐसे वचन सुनने में बहुत अप्रिय लगते हैं और वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन गलत हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करने में असमर्थ हैं। यहाँ "कुलटा" और "वेश्या" लोगों के व्यभिचार की भ्रष्टता को संदर्भित करते हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर कोई व्यभिचार की भ्रष्टता से ग्रस्त है—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह तथ्य नहीं है? कुछ और करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमें परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों में से हर एक वचन को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे सुनने में अच्‍छे लगते हों या नहीं, और चाहे वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का। यही वह दृष्टिकोण है, जिसे हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, सहिष्‍णुता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की कोई भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में नहीं है, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप की तरह देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, वे बाह्य रूप नहीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी रूप से देखने पर, वे सभी ठीक लग सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए रूप-रंग या जो बाहर से दिखता है उस पर निर्भर नहीं रह सकते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 559

तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई का विश्लेषण करना; इसमें वह शामिल है जो तुम्हारे जीवन में है। यही शैतान का तर्क और शैतान के दृष्टिकोण हैं जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो। केवल अपने आत्मा के गहरे हिस्सों को निकाल करके ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीज़ों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो घटनाओं द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता; कई बार काम ख़त्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान और समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। बहुत सी परिस्थितियों में, तुम्हें खुद पर मनन कर खुद को जानना चाहिए। जब तुम गहराई तक खोदने का अभ्यास करोगे तभी तुम परिणाम पाओगे। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज़्यादा से ज़्यादा गहरी होती जायेगी, तुम धीरे-धीरे अपने सार और प्रकृति को आत्म-मंथन एवं आत्मज्ञान द्वारा जान जाओगे। अपनी प्रकृति को समझने के लिए, तुम्हें कुछ चीज़ों को अवश्य करना चाहिए: सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो; बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीज़ों का आनन्द लेते हो, किन चीज़ों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीज़ों की तुम आराधना करते हो, किन चीज़ों की तुम्हें तलाश है, और किन चीज़ों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, जिस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, जिस प्रकार की चीज़ें तुम करना चाहते हो, और जिस प्रकार के लोगों को तुम अपने हृदय में आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों, या ऐसे हों जो वाक्पटु चापलूसी से बात करते हों या कुछ लोग ऐसे व्यक्तियों को पसंद करते हैं जो एक ढोंग करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं इस बात का प्रश्न है, इसमें शामिल है कुछ चीज़ों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीज़ों को करने का आनन्द लेना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिनके कारण लोगों की प्रशंसा और सराहनाएँ मिलेंगी। लोगों की प्रकृति में, जिन चीज़ों को वे पसंद करते हैं, उनकी एक जैसी विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को पसंद करते हैं जो अपनी दिखावट के कारण अन्य लोगों से अपनी आराधना करवाते हैं। ये चीज़ें जिन्हें लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ... तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किसकी ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में, तुम्हारी प्रकृति बुरी और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; अर्थात्, यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। शायद तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उन के चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए एक साथी को ढूँढने की बात लो। यदि कोई महिला वास्तव में किसी के प्यार में पड़ जाए, तो कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा। यहाँ तक कि अगर उसकी टांग भी तोड़ दी जाये, तब भी वह उसके साथ ही रहना चाहेगी; अगर उसे उसके साथ विवाह करने का अर्थ उस महिला की मृत्यु हो तो भी वह विवाह करना चाहेगी। यह कैसे हो सकता है? इसका कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति उसे नहीं बदल सकता जो लोगों के अंदर गहराई में होता है। यहाँ तक कि अगर कोई मर भी जाए, तो भी उसकी आत्मा बस वही चीज़ें ले जाएगी; ये चीजें मानव प्रकृति की हैं, और वे किसी व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व करती हैं। लोग जिन चीज़ों के शौक़ीन होते हैं, उनमें कुछ अधार्मिकता होती है। कुछ लोग उन चीज़ों के अपने शौक में स्पष्ट होते हैं और कुछ नहीं होते; कुछ तो उन्हें अत्यधिक पसंद करते हैं और कुछ नहीं करते; कुछ लोगों में आत्म-नियंत्रण होता है और कुछ स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते। कुछ लोग अंधकारपूर्ण चीजों में डूबने के आदी होते हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास जीवन का लेश मात्र भी नहीं है। यदि लोग उन चीजों के वशीभूत और उनसे नियंत्रित न होने में समर्थ होते हैं, तो इससे साबित होता है कि उनके स्वभाव में थोड़ा बदलाव आया है और उनके पास थोड़ा कद है। कुछ लोग कुछ सत्य समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन है और वे परमेश्वर से प्यार करते हैं। वास्तव में, यह अभी भी बहुत जल्दी है, और अपने स्वभाव को बदलना कोई आसान बात नहीं है। क्या अपनी प्रकृति को समझना आसान है? अगर तुम इसे थोड़ा समझ भी गए, तो भी इसे बदलना आसान नहीं होगा। यह लोगों के लिए एक कठिन काम है। तुम्हारे इर्द-गिर्द लोग, मामले या चीजें चाहे कैसे भी बदलें, और चाहे दुनिया कैसे भी उलट-पुलट हो जाए, अगर सत्य तुम्हारा भीतर से मार्गदर्शन कर रहा है, यदि उसने तुम्हारे भीतर जड़ें जमा ली हैं और परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीवन का, तुम्हारी प्राथमिकताओं का, तुम्हारे अनुभवों और तुम्हारे अस्तित्व का मार्गदर्शन करते हैं, तो उस बिंदु पर तुम वास्तव में बदल गए होगे। अब यह तथाकथित रूपांतरण केवल लोगों में थोड़े सहयोग, थोड़े उत्साह और विश्वास का होना है, लेकिन इसे रूपांतरण नहीं माना जा सकता और इससे यह साबित नहीं होता कि लोगों के पास जीवन है; ये सिर्फ लोगों की प्राथमिकताएँ हैं—और कुछ नहीं।

अपनी प्रकृति में लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं, उन्हें उजागर करने के अलावा, उनकी प्रकृति से संबंधित अन्य पहलुओं को भी उजागर करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चीज़ों पर लोगों के दृष्टिकोण, लोगों के तरीके और जीवन के लक्ष्य, लोगों के जीवन के मूल्य और जीवन पर दृष्टिकोण, साथ ही सच्चाई से संबंधित सभी चीजों पर उनकी राय। ये सभी चीजें लोगों की आत्मा के भीतर गहरी समाई हुई हैं और स्वभाव में परिवर्तन के साथ उनका एक सीधा संबंध है। तो फिर, भ्रष्ट मनुष्य का क्या जीवन दृष्टिकोण है? इसे इस तरह कहा जा सकता है : "हर कोई बस अपनी चिंता करे, और जो पीछे रह गए, उन्हें भले ही शैतान ले जाए।" सभी लोग अपने लिए जीते हैं; अधिक स्पष्टता से कहें तो, वे देह-सुख के लिए जी रहे हैं। वे केवल अपने मुँह में भोजन डालने के लिए जीते हैं। उनका यह अस्तित्व जानवरों के अस्तित्व से किस तरह भिन्न है? इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ होने की तो बात ही छोड़ दो। व्यक्ति के जीवन का दृष्टिकोण इस बारे में होता है कि दुनिया में जीने के लिए तुम किस पर भरोसा करते हो, तुम किसके लिए जीते हो, और किस तरह जीते हो—और इन सभी चीज़ों का मानव-प्रकृति के सार से लेना-देना है। लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं। वे सभी शैतान हैं और वास्तव में कोई भी अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके ही तुम वास्तव में मनुष्य के सार और उसकी भ्रष्टता को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में किससे संबंध रखते हैं, उनमें वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज़ से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानवीय सदृशता को कैसे जीना चाहिए। व्यक्ति की प्रकृति का वास्तव में विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का अनुभव किए बिना या वास्तविक अनुभव प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 560

किसी व्यक्ति की प्रकृति किन चीजों से मिलकर बनती है? तुम केवल मनुष्य के दूषण, अवज्ञा, कमियों, दोषों, धारणाओं और इरादों के बारे में जानते हो, लेकिन तुम मनुष्य की प्रकृति के भीतर की चीज़ों को नहीं जान पाते। उसके उद्भव को जानने में समर्थ हुए बिना तुम केवल उसकी बाहरी परत को जानते हो, और इससे मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग इन सतही चीज़ों को मनुष्य की प्रकृति भी मानते हैं, और कहते हैं, "देखो, मैं मनुष्य की प्रकृति समझताहूँ; मैं अपने अहंकार को पहचानता हूँ। क्या यह मनुष्य की प्रकृति नहीं है?" अहंकार मनुष्य की प्रकृति का एक अंग है; यह सत्य है। लेकिन इसे केवल सैद्धांतिक अर्थ में स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। अपने स्वयं के स्वभाव को समझना क्या है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना जा सकता है? इसके अलावा, एक व्यक्ति जिन चीज़ों को प्रकट करता है, उसके माध्यम से किसी की प्रकृति को विशिष्ट रूप से कैसे देखा जाना चाहिए? सबसे पहले, तुम मनुष्य की प्रकृति को उसकी रुचि के माध्यम से देख सकते हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को नृत्य करना विशेष रूप से पसंद है, कुछ लोगों को विशेष रूप से गायक या फ़िल्मी सितारे पसंद हैं, कुछ लोग विशेष रूप से कुछ निश्चित प्रसिद्ध लोगों को आदर्श मानते हैं। इन रुचियों से हम देख सकते हैं कि इन लोगों की प्रकृति क्या है। उदाहरण के तौर पर : कुछ लोग किसी गायक को आदर्श मान सकते हैं, यहाँ तक कि इस हद तक कि जहाँ वे गायक की हर हरकत, हर मुस्कान, और हर शब्द के प्रति आसक्त हो जाते हैं। वे गायक पर ध्यान लगाए रहते हैं, उस हर चीज़ की तस्वीर खींचते हैं जो गायक पहनता है और उसकी नक़ल करते हैं। इस स्तर का आदर्शीकरण इस व्यक्ति की प्रकृति के बारे में क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के हृदय में केवल वही चीज़ें हैं, परमेश्वर नहीं। वे सभी बातें जो यह व्यक्ति सोचता है, प्यार करता है, और खोजता है, पूरी तरह से शैतान की हैं; वे इस व्यक्ति के हृदय पर कब्ज़ा कर लेती हैं, जिसे उन चीज़ों को अर्पित कर दिया जाता है। यहाँ क्या समस्या है? अगर किसी चीज़ को चरम सीमा तक प्रेम किया जाता है, तो वह चीज़ किसी का जीवन बन सकती है और उसके हृदय पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करती है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो परमेश्वर को नहीं चाहता है और उसके बजाय शैतान से प्यार करता है। इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ऐसे व्यक्ति की प्रकृति ऐसे व्यक्ति की होती है जो शैतान से प्रेम करता है और उसकी आराधना करता है, सच्चाई से प्रेम नहीं करता है, और परमेश्वर को नहीं चाहता है। क्या यह किसी व्यक्ति की प्रकृति को देखने का सही तरीका नहीं है? यह पूरी तरह सही है। यही वह तरीका है जिससे मनुष्य की प्रकृति का विश्लेषण किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उनके चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 561

सारी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना मनुष्य का स्वभाव है। किंतु, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं; ये वे हैं जो सत्य को प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो सत्य की तलाश पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। वे केवल सिद्धांतों को समझने से संतुष्ट हैं; वे अच्छे सिद्धांत को सुनते हैं और उसे रख लेते हैं, और उसे समझने के बाद, वे अपने कर्तव्य निभा सकते हैं—एक बिंदु तक। ये लोग वही करते हैं, जो उन्हें बताया जाता है और उनमें औसत दर्जे की मानवता होती है। वे एक निश्चित सीमा तक स्वयं को खपाने, सांसारिकता को त्यागने और दुख सहने के लिए तैयार होते हैं। किंतु वे सत्य के बारे में ईमानदार नहीं होते; वे मानते हैं कि यही काफ़ी है कि वे कोई पाप नहीं करते, और वे कभी भी सत्य के सार को समझ पाने में समर्थ नहीं होते। यदि ऐसे लोग अंत में स्थिर खड़े हो सकते हैं, तो उन्हें भी बख्शा जा सकता है, लेकिन वे अपने स्वभाव को रूपांतरित नहीं कर सकते। अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना चाहते हो और अपने जीवन-स्वभाव में बदलाव से गुज़रते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने की योग्यता होनी ही चाहिए। सत्य को स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य को स्वीकार करना यह इंगित करता है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो भी विष तुम्हारी प्रकृति में हों, तुम उसे तब स्वीकार कर लेते हो जब यह परमेश्वर के वचन द्वारा प्रकट किया जाता है और इन वचनों के प्रति समर्पित होते हो; तुम इसे बेशर्त स्वीकार करते हो, तुम बहाने नहीं बनाते या चुनने की कोशिश नहीं करते और खुद को इस आधार पर जान जाते हो कि परमेश्वर क्या कहता है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने का यही अर्थ है। चाहे वह कुछ भी कहे, चाहे उसके कथन तुम्हारे दिल को कितना भी भेद दें, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम इनके प्रति समर्पित हो सकते हो, तुम उस रोशनी को स्वीकार कर सकते हो और उसके प्रति समर्पित हो सकते हो जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रकट की गयी है और जिसकी तुम्हारे भाई-बहनों द्वारा सहभागिता की गयी है। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। यद्यपि सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में शिष्ट इंसानियत हो, लेकिन जब सत्य की बात आती है, वे भ्रमित होते हैं और इसे गंभीरता से नहीं लेते। भले ही वे कुछ अच्छे कर्म करने में समर्थ हों, खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हों, और त्याग करने में समर्थ हों, पर वे स्वभाव में बदलाव नहीं ला सकते। तुलना करने पर, पतरस की मानवता अन्य प्रेरितों और उसके भाई-बहनों जैसी ही थी, लेकिन सत्य के अपने उत्कट अनुसरण में वह दूसरों से अलग था; उसने यीशु द्वारा कही गई हर बात पर गंभीरता से चिंतन किया। यीशु ने पूछा, "हे शमौन, योना के पुत्र, क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?" पतरस ने ईमानदारी से उत्तर दिया, "मैं केवल उस पिता से प्रेम करता हूँ जो स्वर्ग में है, अभी तक मैंने पृथ्वी के प्रभु से प्रेम नहीं किया है।" बाद में उसने समझा, यह सोचते हुए, "यह सही नहीं है; पृथ्वी का परमेश्वर स्वर्ग का परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का परमेश्वर एक ही नहीं है? अगर मैं केवल स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, तो मेरा प्रेम वास्तविक नहीं है; मुझे पृथ्वी के परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, तभी मेरा प्रेम वास्तविक होगा।" इस प्रकार, पतरस ने यीशु के वचनों पर चिंतन करके उसके द्वारा कही गई बात का सही अर्थ समझा। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, और इस प्रेम के वास्तविक होने के लिए, व्यक्ति को पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए। किसी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना न तो यथार्थपरक है और न ही व्यावहारिक, जबकि व्यावहारिक, दृश्यमान परमेश्वर से प्रेम करना सत्य है। यीशु के वचनों से पतरस ने सत्य को हासिल किया और परमेश्वर की इच्छा की समझ प्राप्त की। स्पष्टतः, पतरस का परमेश्वर में विश्वास केवल सत्य की तलाश पर केंद्रित था; अंततः, उसने व्यावहारिक परमेश्वर का प्रेम प्राप्त किया—पृथ्वी के परमेश्वर का। सत्य की तलाश में पतरस विशेष रूप से ईमानदार था। जब भी यीशु ने उसे सलाह दी, उसने उत्साहपूर्वक यीशु के वचनों पर चिंतन किया। शायद पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध किए जाने और उससे परमेश्वर के वचनों का अर्थ समझ पाने से पहले उसने महीनों, एक वर्ष, यहाँ तक कि वर्षों तक चिंतन किया; इस तरह, पतरस ने सत्य में प्रवेश किया, और बाद में उसके जीवन के स्वभाव का रूपांतरण और नवीनीकरण हुआ। अगर कोई व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और सिद्धांतों को दस हजार बार कह सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें इसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को साफ़-साफ़ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको; केवल शब्दों और सिद्धांतों का उच्चारण करना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य हो, तभी तुम जान सकते हो; सत्य के बिना तुम नहीं जान सकते। तुम किसी मुद्दे को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को नहीं समझ सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। ये सभी चीज़ें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 562

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किये जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों को समझना, उन्हें पढ़ने के द्वारा उनकी विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू उसके वचनों की व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना के चश्मे से करता है, तो परमेश्वर के वचनों की तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से इनकी व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी उनका अर्थ निकाल ले और उनका ग़लत अर्थ निकाले, यह करना और भी अधिक तकलीफ़देह है। इस प्रकार, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का ज्ञान हासिल करने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझना या उन्हें समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचनों की शाब्दिक व्याख्या करने की आवश्यकता होती, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होता? अगर ऐसा होता तो तुझे बस कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होती, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होते। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचनों की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पाने पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 563

जब मनुष्य की प्रकृति को पहचानने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात इसे मनुष्य के विश्व दृष्टिकोण, जीवन के दृष्टिकोण, और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से देखना है। जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यत: शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं।" पृथ्वी के उन पिशाच राजाओं, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए वचन मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसके बारे में चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में शेखी बघारी जाती है, के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों की अक्सर उद्धृत की गई विशेष कहावते हैं; ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति की रूपरेखाएँ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों से जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन-प्रकृति बन गए हैं। "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे : "चूँकि तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?" शायद वह कहे, "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'अधिकारी उपहार देने वालों को नहीं मार गिराते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या ये शब्द उस व्यक्ति की प्रकृति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करना उसकी प्रकृति बन गयी है, और अधिकारी होना ही उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और प्रवीण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन के पीछे उनकी जो चालें और षड्यंत्र हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं। अगर इस तरह मनुष्य की प्रकृति का विश्लेषण किया जा सके तो वह आसानी से खुद को जान सकेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 564

आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है: जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा कर लिया है या सही चीज़ को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना तुम्हारे लिए उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन सी चीजें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें गहन परिश्रम करना तुम्हारे लिए उचित है। आओ, एक उदाहरण के रूप में हम पौलुस को लें। पौलुस विशेष रूप से जानकार था, और प्रचार के अपने काम में उसने बहुत कष्ट उठाये थे। बहुत सारे लोगों ने उसका विशेष रूप से सम्मान किया। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया था कि उसके लिए एक अलग मुकुट रखा होगा। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। अगर उस समय, उसने खुद पर चिंतन किया होता और अपना विश्लेषण किया होता, तो उसने ऐसा नहीं सोचा होता। दूसरे शब्दों में, पौलुस ने प्रभु यीशु के वचनों में सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था; उसे केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास था। उसने सोचा था कि जब तक वह कुछ अच्छा काम करेगा और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करेगा, तब तक परमेश्वर द्वारा उसकी प्रशंसा की जाएगी और उसे पुरस्कृत किया जाएगा। अंत में, उसकी अपनी धारणाओं और कल्पना ने उसकी आत्मा को अंधा बना दिया और उसके सच्चे चेहरे को ढंक दिया। बहरहाल, लोगों को यह पता नहीं था, और परमेश्वर द्वारा इसे प्रकाश में न लाये जाने से, लोगों ने पौलुस को एक मानक के रूप में स्थापित करना और जीने का एक उदाहरण मान लेना जारी रखा, और वे यही मानते रहे कि वे भी उसकी तरह बनने के लिए तरसते हैं, उन्होंने उसे अपनी खोज का उद्देश्य और अनुकरणीय व्यक्ति माना। पौलुस के बारे में यह कहानी उन सभी के लिए चेतावनी का काम करती है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो है कि जब कभी भी हम महसूस करते हैं कि हमने विशेष रूप से अच्छा किया है, या विश्वास करते हैं कि हम किसी पहलू में विशेष रूप से प्रतिभावान हैं, या सोचते हैं कि किसी संबंध में हमें बदले जाने या हमसे निपटे जाने की आवश्यकता नहीं है, तो हमें उस विशेष संबंध में स्वयं को बेहतर ढंग से जानने और सोच-विचार करने का प्रयास करना चाहिए; यह महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि तुमने, यह देखने के लिए कि क्या उनमें ऐसी चीजें समाविष्ट हैं या नहीं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, निश्चित रूप से अपने उन पहलुओं की खोज नहीं की है, उन पर ध्यान नहीं दिया है, या उनका विश्लेषण नहीं किया है जिन्हें तुम अच्छा समझते हो। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को बेहद दयालु मानते हैं। वे कभी दूसरों से नफ़रत या उनका नुकसान नहीं करते, और वे हमेशा ऐसे भाई या बहन की मदद करते हैं जिनका परिवार ज़रूरतमंद होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि उनकी समस्या अनसुलझी रह जाये; उनके पास बहुत सद्भावना है, और वे हर किसी की मदद करने की भरसक कोशिश करते हैं। ऐसी मदद का परिणाम क्या है? उन्होंने अपने जीवन को रोक रखा है, फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न हैं, और उस सबसे बेहद संतुष्ट हैं जो उन्होंने किया है। इतना ही नहीं, वे इसमें बहुत गर्व का अनुभव करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उन्होंने जो कुछ किया है, वह सब निश्चित रूप से परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए पर्याप्त है, और वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हैं। वे अपनी स्वाभाविक दयालुता को ऐसी वस्तु के रूप में देखते हैं, जिसका लाभ उठाया जा सकता है, और जैसे ही वे उसे उस रूप में देखते हैं, वे अनिवार्य रूप से इसे सत्य समझने लगते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मानवीय भलाई है। उन्होंने सत्य की ज़रा भी तलाश नहीं की है, और उनके सभी कार्य व्यर्थ हैं, क्योंकि वे उन्हें मनुष्य के सामने करते हैं, परमेश्वर के सामने नहीं, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास तो बिलकुल भी नहीं करते। उनका कोई भी कार्य सत्य का अभ्यास नहीं है, और कोई भी कार्य परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं है, वे उसकी इच्छा का पालन तो बिलकुल भी नहीं करते; बल्कि वे मानवीय दया और अच्छे व्यवहार का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करते हैं। संक्षेप में, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की इच्छा की तलाश नहीं करते, न ही वे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हैं। इसलिए, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, मनुष्य के अच्छे व्यवहार की निंदा की जाती है, और वह परमेश्वर द्वारा स्मरण किए जाने योग्य नहीं होता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 565

स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और तुम्हारे वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाने पर, लगातार परमेश्वर के वचन का पालन करो, और पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की इच्छा रखो, तब तुम पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होगे। परमेश्वर के अनुग्रह के बिना, और पवित्र आत्मा से प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त किए बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि लोगों के पास सत्य नहीं है और वे खुद को प्रकट कर देने में असमर्थ हैं। पतरस की पूर्णता के मार्ग पर चलना मुख्यतः संकल्पित होने, आस्था रखने और परमेश्वर पर भरोसा करने पर निर्भर है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्र आत्मा के काम के प्रति समर्पित होना चाहिए; किसी भी चीज़ में व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के बिना नहीं चल सकता। ये वे प्रमुख पहलू हैं, जिनमें से किसी का भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अनुभव के माध्यम से स्वयं को जान लेना बहुत कठिन है; पवित्र आत्मा के कार्य के बिना इसमें प्रवेश कर पाना बहुत मुश्किल है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पौलुस का मार्ग जीवन की तलाश या आत्म-बोध पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं था; उसने विशेष रूप से काम करने और उसके प्रभाव और गति पर ध्यान केंद्रित किया। उसकी प्रेरणा थी अपने काम और अपनी पीड़ा के बदले परमेश्वर के आशीष प्राप्त करना और परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करना। यह प्रेरणा गलत थी। पौलुस ने जीवन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, न ही उसने स्वभावगत परिवर्तन हासिल करने को कोई महत्व दिया; उसने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। चूँकि उसके लक्ष्य गलत थे, इसलिए जिस रास्ते पर वह चला, वह भी निस्संदेह गलत था। यह उसकी अभिमानी और दंभी प्रकृति के कारण हुआ। स्पष्टतः, पौलुस के पास कोई सत्य नहीं था, न ही उसके पास कोई जमीर या विवेक था। लोगों को बचाने और बदलने में परमेश्वर मुख्य रूप से उनके स्वभाव बदलता है। उसके वचनों का उद्देश्य लोगों में रूपांतरित स्वभाव और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने और सामान्य तरीके से उसकी आराधना करने की क्षमता के परिणाम हासिल करना है। परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य का यही उद्देश्य है। पौलुस की खोज का तरीका परमेश्वर की इच्छा के सीधे उल्लंघन और उसके साथ टकराव का था; यह पूरी तरह से उसके विरुद्ध जाता था। जबकि पतरस की तलाश का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था, जो ठीक वही परिणाम है, जिसे परमेश्वर इंसानों में हासिल करना चाहता है। इसलिए पतरस का मार्ग धन्य है और परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। चूँकि पौलुस का मार्ग परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन है, इसलिए परमेश्वर उससे घृणा करता है और उसे शाप देता है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा जाननी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सचमुच परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसकी इच्छा को पूरी तरह से समझने में सक्षम है—जिसका अर्थ यह समझना है कि परमेश्वर मनुष्य को क्या बनाना चाहता है और अंततः वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है—केवल तभी वह सटीक रूप से समझ सकता है कि किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम पतरस के मार्ग को पूरी तरह से नहीं समझते, और केवल उस पर चलने की इच्छा रखते हो, तो तुम उस पर नहीं चल पाओगे। दूसरे शब्दों में, हो सकता है तुम बहुत-से सिद्धांतों को जानते हो, लेकिन अंततः वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे। हालाँकि हो सकता है तुम सतही रूप से प्रवेश कर लो, लेकिन तुम कोई वास्तविक परिणाम प्राप्त करने में असमर्थ होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 566

आजकल, ज़्यादातर लोगों की अपने बारे में समझ बहुत सतही है। वे उन चीज़ों को बिलकुल भी ठीक से नहीं जान पाये हैं जो उनकी प्रकृति का हिस्सा हैं। उन्हें सिर्फ़ कुछ भ्रष्ट स्थितियों, अपने द्वारा की जाने वाली संभावित चीज़ों, या अपनी कुछ कमियों का ज्ञान है और इस वजह से उन्हें लगता है कि वे ख़ुद को जानते हैं। इसके अलावा, अगर वे कुछ नियमों का पालन करते हैं, कुछ क्षेत्रों में गलतियां न करना सुनिश्चित करते हैं, और कुछ पापों को करने से खुद को रोक लेते हैं, फिर तो वे मानने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में उनके पास वास्तविकता है और उन्हें बचा लिया जाएगा। यह पूरी तरह से मानवीय कल्पना है। अगर तुम उन चीज़ों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में किसी भी पाप को करने से बच पाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में सच्चा बदलाव हासिल कर लिया होगा? क्या तुम सच में इंसान की समानता को जी पाओगे? क्या इस तरह तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं, और यह बात तय है। परमेश्वर में विश्वास तभी काम करता है जब किसी व्यक्ति के मानकों का स्तर ऊँचा हो और उसने सत्य को हासिल किया हो और उसके जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया हो। इसलिए, यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 567

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जानने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन जीवन बन सकते थे और सत्य हैं, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका। पतरस की सेवा परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो सकी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 568

जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को प्राप्त नहीं कर लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। वह प्रकृति विशिष्ट रूप से किस चीज़ को अपरिहार्य बनाती है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन अधार्मिक चीज़ों से प्यार क्यों करते हो? ऐसी बुरी चीज़ें तुम्हें अच्छी क्यों लगती हैं? ऐसी चीजों को पसंद करने का आधार क्या है? ये चीज़ें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें स्वीकारकर इतने खुश क्यों हो? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे शैतान के जहर से युक्त हैं। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि शैतान का जहर क्या है, इसे वचनों के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ कुकर्मियों से पूछते हो उन्होंने बुरे कर्म क्यों किए, तो वे जवाब देंगे: "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये।" यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का तर्क लोगों का जीवन बन गया है। भले वे चीज़ों को इस या उस उद्देश्य से करें, वे इसे केवल अपने लिए ही कर रहे होते हैं। सब लोग सोचते हैं चूँकि जीवन का नियम, हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए, यही है, इसलिए उन्हें बस अपने लिए ही जीना चाहिए, एक अच्छा पद और ज़रूरत के खाने-कपड़े हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये"—यही मनुष्य का जीवन और फ़लसफ़ा है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह कथन वास्तव में शैतान का जहर है और जब इसे मनुष्य के द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है तो यह उनकी प्रकृति बन जाता है। इन वचनों के माध्यम से शैतान की प्रकृति उजागर होती है; ये पूरी तरह से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। और यही ज़हर मनुष्य के अस्तित्व की नींव बन जाता है और उसका जीवन भी, यह भ्रष्ट मानवजाति पर लगातार हजारों सालों से इस ज़हर के द्वारा हावी रहा है। शैतान जो कुछ भी करता है, वह उसके स्वयं के लिए होता है। यह परमेश्वर से परे जाना, परमेश्वर से मुक्त होना और स्वयं सामर्थ्य का प्रयोग करना, और उन सभी चीज़ों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है जो परमेश्वर ने रची हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, बहुत से लोगों के नीति-वाक्य उनकी प्रकृति के प्रतिनिधि और प्रतिबिंब बन सकते हैं। चाहे लोग खुद को छिपाने की कितनी भी कोशिश करें, जो कुछ भी वे करते हैं और हर बात जो वे कहते हैं, उनमें वे अपनी प्रकृति को छिपा नहीं सकते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी सच नहीं बोलते हैं और वे दिखावा करने में अच्छे होते हैं, लेकिन एक बार जब दूसरे लोग उनसे साथ थोड़ी देर बातचीत करते हैं, तो उनकी कपटी प्रकृति और अतिशय बेईमानी का खुलासा हो जाता है। अंत में, लोग एक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे : ये लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते, और वे धोखेबाज़ लोग हैं। यह कथन ऐसे व्यक्ति की प्रकृति को दर्शाता है; यह उनकी प्रकृति और सार का सर्वोत्तम चित्रण और प्रमाण है। उनके जीवन का फलसफ़ा है किसी को सच नहीं बताना, और किसी पर भी विश्वास नहीं करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में फ़लसफ़े से युक्त है। कभी-कभी तुम स्वयं ही इसके बारे में अवगत नहीं होते हो और इसे नहीं समझते हो, मगर तुम्हारे जीवन का हर पल इस पर आधारित है। इसके अलावा तुम्हें लगता है कि यह फ़लसफ़ा बहुत सही है, बहुत उचित है और गलत नहीं है। यह इसका चित्रण करने के लिए काफी है कि शैतान का फ़लसफ़ा लोगों की प्रकृति बन गया है और वे पूरी तरह से शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं और इसका जरा सा भी विद्रोह नहीं करते। इसलिए, वे लगातार शैतानी प्रकृति को प्रकट कर रहे हैं, और हर लिहाज़ से वे निरंतर शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 569

लोगों की अपनी प्रकृति के बारे में जो समझ है वह बहुत ही सतही है, और इसके तथा परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या ठोस समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग इस तरह सोचते हैं वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप में नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, वे मानकों के आसपास भी नहीं हैं, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

किसी व्यक्ति के व्यवहार या आचरण में बदलाव का अर्थ उसकी प्रकृति में बदलाव नहीं है। इसका कारण यह है कि किसी का आचरण उसके मूल स्वरूप को नहीं बदल सकता, न ही यह उसकी प्रकृति को बदल सकता है। केवल जब कोई अपने स्वयं के स्वभाव को जान लेता है, तभी उसका अभ्यास गहरा, और नियमों के एक समूह के पालन से भिन्न, हो सकता है। मनुष्य द्वारा किया जाने वाला सत्य का वर्तमान अभ्यास अभी भी पर्याप्त नहीं है, और वह सत्य की अपेक्षाओं पर पूरी तरह से खरा नहीं उतर सकता। लोग केवल सत्य के एक अंश का अभ्यास करते हैं, और केवल तभी करते हैं, जब वे कुछ अवस्थाओं और परिस्थितियों में होते हैं; वे सभी अवस्थाओं और परिस्थितियों में सत्य को व्यवहार में नहीं ला पाते। जब किसी अवसर पर व्यक्ति खुश होता है और उसकी अवस्था अच्छी होती है, या जब वह अपने समूह से सहभागिता कर रहा होता है और सामान्य से अधिक मुक्त महसूस करता है, तो वह अस्थायी रूप से कुछ ऐसी चीज़ें कर सकता है जो सत्य के अनुसार होती हैं; किंतु जब नकारात्मक लोगों और ऐसे लोगों की संगति में होता है, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो उसका अभ्यास बदतर और उसके कार्य कुछ हद तक अनुचित होते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग सत्य का अभ्यास दृढ़ता की मनोवृत्ति से करने के बजाय भावना या परिस्थिति के क्षणिक प्रभावों से निर्देशित होकर करते हैं। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि तुमने अपनी अवस्था को नहीं समझा है, न ही तुम अपनी प्रकृति को समझ पाए हो, इसलिए कई बार तुम फिर भी उन चीज़ों को करने में सक्षम होते हो, जिन्हें करने की तुम खुद कल्पना भी नहीं कर सकते। तुम अपनी कुछ ही अवस्थाओं को जानते हो, लेकिन, चूँकि तुमने अपनी प्रकृति को नहीं समझा है, इसलिए तुम इसे नियंत्रित नहीं कर सकते कि तुम भविष्य में क्या कर सकते हो—यानी तुम्हारे पास इसकी पूर्ण निश्चितता नहीं है कि तुम दृढ़ बने रहोगे। कई बार तुम ऐसी अवस्था में होते हो कि तुम सत्य को व्यवहार में ला सकते हो और तुम कुछ बदलाव प्रकट करते प्रतीत होते हो, लेकिन एक भिन्न परिवेश में तुम उसे व्यवहार में लाने में असमर्थ होते हो। यह तुम्हारे नियंत्रण के बाहर होता है। कभी तुम सत्य का अभ्यास कर पाते हो, और कभी तुम नहीं कर पाते। किसी क्षण, तुम समझते हो, और अगले ही क्षण तुम भ्रमित होते हो। वर्तमान में तुम कुछ बुरा नहीं कर रहे, लेकिन शायद कुछ ही देर में करोगे। इससे साबित होता है कि भ्रष्ट चीज़ें अभी भी तुम्हारे भीतर मौजूद हैं, और यदि तुम सच्चा आत्म-बोध पाने में असमर्थ हो, तो उन्हें दूर करना आसान नहीं होगा। यदि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव की पूरी समझ हासिल नहीं कर पाते, और अंततः उन चीज़ों को करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, तो तुम खतरे में हो। यदि तुम अपनी प्रकृति में एक तीक्ष्ण अंतर्दृष्टि हासिल कर सकते हो और उससे नफरत कर सकते हो, तो तुम अपने आपको नियंत्रित करने, अपने आपको त्यागने, और सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 570

सत्य के बारे में स्पष्ट सहभागिता का उद्देश्य लोगों को सत्य का अभ्यास करने और अपने स्वभाव बदलने में सक्षम करना है; यह उन्हें सत्य समझाने मात्र के लिए नहीं है। यदि तुम सत्य समझते हो लेकिन उसे अमल में नहीं लाते, तो इसके बारे में सहभागिता करने और तुम्हारे द्वारा इसे समझने का अब कोई मतलब नहीं होगा। यदि तुम सत्य को समझते हो लेकिन उसे अमल में नहीं लाते, तो तुम उसे हासिल करने का अवसर, और साथ ही बचाए जाने का कोई अवसर भी खो दोगे। यदि तुमने जो सत्य समझा है, उस पर अमल किया है तो तुम और अधिक, गहनतर सत्य प्राप्त करोगे; तुम परमेश्वर का उद्धार, और साथ ही पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता, रोशनी और मार्गदर्शन भी, प्राप्त करोगे। बहुत-से लोग केवल यह शिकायत करने में सक्षम हैं कि पवित्र आत्मा कभी उन्हें प्रबुद्ध नहीं करता, बिना यह समझे कि वे अनिवार्य रूप से सत्य को व्यवहार में नहीं ला रहे हैं। इसलिए, उनकी स्थिति कभी भी सामान्य नहीं होगी, और न ही वे कभी परमेश्वर की इच्छा को समझेंगे।

कुछ लोग कहते हैं कि सत्य का अभ्यास करने से उनकी समस्याएँ हल नहीं हो सकतीं। दूसरों का मानना है कि सत्य पूरी तरह से व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव को सुधार नहीं सकता। तथ्य यह है कि लोगों की समस्याएँ हल की जा सकती हैं; कुंजी यह है कि लोग सत्य के अनुसार कार्य कर सकते हैं या नहीं। जो दोष तुम लोगों को वर्तमान में कष्ट देते हैं, वे कैंसर या असाध्य रोग नहीं हैं। यदि तुम लोग सत्य का अभ्यास कर सको, तो इन दोषों को बदला जा सकता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि तुम सत्य के अनुसार कार्य कर सकते हो या नहीं। यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल रहे हो, तो तुम्हारा सफल होना निश्चित है; लेकिन यदि तुम गलत रास्ते पर चल रहे हो, तो तुम गए काम से। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपना काम करते समय कभी यह नहीं सोचते कि वे चीज़ों को उस तरह कैसे करें, जो परमेश्वर के भवन के काम के लिए लाभदायक हो सके या उनका काम करने का तरीका परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं; नतीजतन, वे कई ऐसी चीज़ें कर डालते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। यदि वे अपना हर काम सत्य के अनुरूप करते, तो क्या वे ऐसे लोग न होते, जो परमेश्वर के दिल के अनुकूल हों? कुछ लोग सत्य को जानते हैं लेकिन उसका अभ्यास नहीं करते, और यह मानते हैं कि सत्य सिर्फ यही है, कुछ और नहीं। उनका विश्वास है कि यह उनकी इच्छा को नहीं मिटा सकता और उनकी भ्रष्टता दूर नहीं कर सकता। क्या इस तरह का व्यक्ति हास्यास्पद नहीं है? क्या ऐसे लोग बेतुके नहीं हैं? क्या वे खुद को चतुर नहीं समझते? यदि लोग सत्य के अनुसार कार्य करें, तो उनका भ्रष्ट स्वभाव बदल जाएगा; लेकिन यदि वे अपने प्राकृतिक व्यक्तित्व को ही परमेश्वर में अपने विश्वास और उसकी सेवा का आधार बनाते हैं, तो उनमें से कोई भी अपना स्वभाव बदलने में सफल नहीं होगा। कुछ लोग दिन भर अपनी ही चिंताओं में उलझे रहते हैं और उस सत्य की जांच या उसका अभ्यास नहीं कर पाते, जो आसानी से उपलब्ध है। अभ्यास का यह तरीका बहुत बेतुका है; इस तरह के लोग जन्मजात पीड़ित होते हैं, उनके पास आशीष तो होते हैं, लेकिन वे उनका आनंद नहीं लेते! आगे का मार्ग मौजूद है, तुम्हें सिर्फ उसका अभ्यास करना है। यदि तुम सत्य का अभ्यास करने के लिए कृत-संकल्प हो, तो तुम्हारी कमजोरियाँ और घातक खामियाँ बदली जा सकती हैं। लेकिन तुम्हें हमेशा सतर्क और सावधान रहना चाहिए और अधिक कठिनाइयाँ सहनी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने के लिए विवेक की आवश्यकता होती है। यदि तुम ऐसा बेढंगा तरीका अपनाते हो, तो क्या तुम परमेश्वर में उचित रूप से विश्वास कर सकते हो?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके पास एक मार्ग होता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 571

अगर तुम परमेश्वर के वचनों से परमेश्वर की इच्छा को और उसके कथनों के पीछे के अभिप्रायों को नहीं समझते हो, अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिसे उसके वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, अगर तुम इन बातों को नहीं समझते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह अपने हर वचन में इतना ईमानदार और निष्कपट क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर की इच्छा या उसके इरादों को नहीं समझते हो, तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो। अगर तुम यह समझ नहीं पाते हो, तो तुम सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हो? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है परमेश्वर द्वारा बोले जाने वाले हर वचन के माध्यम से परमेश्वर के अर्थ को समझना; इसका अर्थ है समझ लेने के बाद तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने में समर्थ हो ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को जी सको और वे तुम्हारी वास्तविकता बन जायेँ। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और सिद्धान्त समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यहाँ तक कि तुम कहते हो, "परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार हों और हमने इसका अभ्यास किया है।" लेकिन तुम इसका कारण समझने में असफल हो जाते हो कि परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग ईमानदार हों और कपटी न हों, और साथ ही परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग उससे प्रेम करें। वास्तव में, लोगों से ऐसी अपेक्षा रखने में परमेश्वर का उद्देश्य है उनका उद्धार करना और उन्हें पूर्ण बनाना।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य खोजते हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे लोग जो शब्दों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं और अध्ययन करते हैं कि वह आशीष पाने के बारे में और मनुष्य के गंतव्य के बारे में क्या कहता है। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और अपना अनुसरण बंद कर देते हैं। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को गंभीरता से नहीं लेते; वे बस अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छे कर्म करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और दूसरों के सामने खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंज़िल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, सभी के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, उन्हें सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम आवश्यक रूप से सत्य को न तो समझोगे, न सत्य को प्राप्त करोगे। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और सिद्धांतों को हासिल किया है। तुम नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। तुम अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हो, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद भी तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हो, तुम केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हो। सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में तुम्हारा पूरा जीवन-काल लग जाएगा। तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; तुमने उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं। अगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को कैसे समझ सकते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम अभी भी बिलकुल बदले नहीं हो, न ही तुमने कोई प्रगति की है। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। तुम्हारे और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी रुकावटें हैं। तुम्हें अभी भी उस पर संदेह है। न केवल तुम परमेश्वर को समझते नहीं हो, बल्कि तुम उसे बहाने देते हो और उसके प्रति धारणाएँ पालते हो। तुम उसका विरोध करते हो और उसका तिरस्कार भी करते हो। इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 572

प्रतिदिन होने वाली सभी चीज़ें, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को डगमगा सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा कर सकती हैं, या कर्तव्य-पालन की तुम्हारी क्षमता और आगे की प्रगति को सीमित कर सकती हैं, परिश्रमयुक्त उपचार माँगती हैं; उनकी सावधानीपूर्वक जाँच होनी चाहिए और उनकी सच्चाई का पता लगाया जाना चाहिए। ये सभी वे चीजें हैं, जो अनुभव के क्षेत्र में घटित होती हैं। कुछ लोगों पर जब नकारात्मकता आ पड़ती है, तो वे अपने कर्तव्यों को त्याग देते हैं, और प्रत्येक नाकामयाबी के बाद वे घिसटकर वापस अपने पैरों पर उठ खड़े होने में असमर्थ होते हैं। ये सभी लोग मूर्ख हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे जीवन भर के विश्वास के बाद भी उसे हासिल नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख अंत तक अनुसरण कैसे कर सकते थे? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है, लेकिन तुम उससे कुछ हासिल नहीं करते, तो तुम एक औसत दर्जे के, निकम्मे व्यक्ति हो। दक्ष और सच्ची योग्यता वाले लोग, जो आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, सत्य के अन्वेषक होते हैं; यदि उनके साथ कुछ दस बार घटित होता है, तो शायद उनमें से आठ मामलों में वे कुछ प्रेरणा प्राप्त करने, कुछ सबक सीखने, कुछ प्रबोधन हासिल करने, और कुछ प्रगति कर पाने में समर्थ होंगे। जब चीज़ें दस बार किसी मूर्ख पर पड़ती हैं—किसी ऐसे पर, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता है—तो इससे एक बार भी उनके जीवन को लाभ नहीं होगा, एक बार भी यह उन्हें नहीं बदलेगा, और न ही एक बार भी यह उनके लिए अपनी प्रकृति को समझने का कारण बनेगा, और यही उनके लिए अंत है। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर पड़ते हैं, और हर बार जब वे गिर पड़ते हैं, तो उन्हें समर्थन और दिलासा देने के लिए किसी और की ज़रूरत होती है; बिना सहारे और दिलासे के वे उठ नहीं सकते। अगर, हर बार जब कुछ होता है, तो उन्हें गिरने का खतरा होता है, और अगर, हर बार उन्हें अपमानित होने का खतरा होता है, तो क्या उनके लिए यही अंत नहीं है? क्या ऐसे निकम्मे लोगों के बचाए जाने का कोई और आधार बचा है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी सिफ़ारिश करवाने के लिए कुछ भी नहीं होता, उस पर कार्य किए जा सकने लायक कुछ भी नहीं होता। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे धार्मिकता के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे प्रतिक्रिया नहीं करते, मानो वे पहले से ही मृत हों। क्या उनके लिए खेल ख़त्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा। यदि कभी किसी समस्या का सामना करने पर तुम उससे कतराते हो और उससे बचने की कोशिश करते हो, तो इसका मतलब है कि तुमने गवाही नहीं दी है; इस तरह, तुम्हें कभी नहीं बचाया जा सकता, और तुम्हारा काम तमाम हो चुका है। जब कोई समस्या आ पड़ती है, तो तुम्हारा दिमाग ठंडा और रवैया सही होना चाहिए, और तुम्हें कोई विकल्प चुनना चाहिए। समस्या को हल करने के लिए तुम्हें सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। सामान्य स्थिति में, कुछ सत्यों को समझने का क्या उपयोग है? यह तुम्हारा पेट भरने के लिए नहीं होता, और यह तुम्हें केवल कहने को कुछ देने के लिए नहीं है, और न ही यह दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसका उपयोग तुम्हारी अपनी समस्याओं, अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए है—खुद की कठिनाइयों को सुलझाने के बाद ही तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल कर सकते हो। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीज़ें हैं, पूर्ण किए जाने योग्य चीज़ें; वह सत्य की तलाश करने के लिए कृतसंकल्प था और दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला था; उसमें विवेक था, वह कष्ट सहने को तैयार था, और अपने दिल में वह सत्य से प्रेम करता था, और जो कुछ भी होता था, उसे वह यूँ ही गुज़र जाने नहीं देता था। ये सभी ठोस बातें हैं। यदि तुम्हारे पास इन ठोस बातों में से एक भी नहीं है, तो इसका मतलब परेशानी है। तुम अनुभव करने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है, और तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम नहीं जानते कि प्रवेश कैसे करें। जब चीज़ें तुम पर आ पड़ती हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो; तुम व्यथित महसूस करते हो, रोते हो, नकारात्मक हो जाते हो, भाग जाते हो, और चाहे तुम कुछ भी करो, तुम उन्हें सही ढंग से संभाल नहीं पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 573

चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि "परमेश्वर का धन्यवाद," जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? जो भी तुम करते हो उसके द्वारा परमेश्वर के करीब जाना तुम पर है; और ऐसा करते हुए अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की इच्छा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करना, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकना तुम पर है। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 574

जब तुमने कुछ काम किया था, तो परमेश्वर बहुत असंतुष्ट हुआ था। जब तुम उसे करने जा रहे थे, तब क्या तुमने उससे प्रार्थना की थी? क्या तुमने कभी यह सोचा, "यदि यह बात परमेश्वर के सामने लाई जाएगी, तो उसे कैसी लगेगी? अगर उसे इसका पता चलेगा, तो वह खुश होगा या कुपित? क्या वह इससे घृणा करेगा?" तुमने यह जानने की कोशिश नहीं की, है ना? यहाँ तक कि अगर दूसरे लोगों ने तुम्हें याद भी दिलाया, तो तुम तब भी यही सोचोगे कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और यह किसी भी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता और न ही कोई पाप है। परिणामस्वरूप, इस बात ने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ कर दिया और उसे बहुत क्रोध करने के लिए उकसाया, इस हद तक कि उसे तुमसे नफ़रत हो जाए। यदि तुमने जानने की कोशिश की होती और जाँच की होती, और करने से पहले मामले को स्पष्ट रूप से देखा होता, तो क्या तुम इसे सँभाल न पाते? भले ही लोग कभी अच्छी स्थिति में न हों, लेकिन अगर वे जो कुछ करने की योजना बना रहे हैं, उसे पहले निष्ठापूर्वक परमेश्वर के सामने जाँच और खोज के लिए ले आते हैं, तो वे कोई बड़ी भूल नहीं करेंगे। सत्य का अभ्यास करते समय लोगों के लिए भूल करने से बचना कठिन होता है, लेकिन अगर चीज़ों को करते समय तुम जानते हो कि उन्हें सत्य के अनुसार कैसे करना है, लेकिन फिर भी तुम उन्हें सत्य के अनुसार नहीं करते, तो फिर समस्या यह है कि तुम्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है। सत्य के प्रति प्रेम से रहित व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलेगा। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को ठीक से नहीं समझ पाते, और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, तो तुम्हें दूसरों के साथ सहभागिता करनी चाहिए। यदि किसी को भी नहीं लगता कि वे इस मामले को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, तो फिर तुम्हें सबसे तर्कसंगत समाधान लागू करना चाहिए। किंतु, यदि तुम्हें अंततः यह पता चले कि इसे इस तरह से करने में तुमने थोड़ी-सी भूल कर दी है, तो तुम्हें जल्दी से उसे सही कर लेना चाहिए, और तब परमेश्वर इस भूल को पाप के रूप में नहीं गिनेगा। चूँकि इस मामले को व्यवहार में लाते समय तुम्हारे इरादे सही थे, और तुम सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहे थे और केवल इसे स्पष्ट रूप से देख नहीं पाए, और तुम्हारे कार्यों के परिणामस्वरूप कुछ भूलें हो गईं, तो यह एक अपराध घटाने वाली परिस्थिति थी। किंतु, आजकल बहुत-से लोग काम करने के लिए केवल अपने दो हाथों पर, और बहुत-कुछ करने के लिए केवल अपने मन पर भरोसा करते हैं, और वे शायद ही कभी इन सवालों पर कोई विचार करते हैं : क्या इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर खुश होगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर मुझ पर भरोसा करेगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या मैं सत्य को अभ्यास में लाऊँगा? यदि परमेश्वर इसके बारे सुनेगा, तो क्या वह कह सकेगा, "तुमने यह सही तरह से और उपयुक्त तरीके से किया है। इसे जारी रखो"? क्या तुम अपने सामने आने वाले हर मामले की सावधानीपूर्वक जाँच करने में सक्षम हो? क्या तुम उनमें से प्रत्येक के बारे में गंभीर और सतर्क हो सकते हो? या क्या तुम यह सोच पाते हो कि तुम जिस तरीके से इसे कर रहे हो, परमेश्वर उसे घृणास्पद तो नहीं समझता, अन्य सभी लोग तुम्हारे तरीकों के बारे में कैसा महसूस करते हैं, और कहीं तुम इसे अपनी ही इच्छा के आधार पर या अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए तो नहीं कर रहे...? तुम्हें इसके बारे में अधिक विचार करना होगा और अधिक जानने की कोशिश करनी होगी, और तुम्हारी गलतियाँ छोटी से छोटी होती जाएँगी। चीज़ों को इस तरह करना यह साबित करेगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो वास्तव में सत्य की तलाश करता है और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखता है, क्योंकि तुम चीज़ों को सत्य द्वारा अपेक्षित निर्देशन के अनुसार कर रहे हो।

अगर किसी विश्वासी के कर्म सत्य के अनुरूप नही हैं, तो वह किसी अविश्वासी के समान ही है। वह उस तरह का व्यक्ति है, जिसके दिल में परमेश्वर नहीं होता, और जो परमेश्वर को छोड़ देता है, और ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के परिवार में काम पर रखे गए उस कर्मचारी की तरह होता है, जो अपने मालिक के लिए कोई छोटे-मोटे कार्य कर देता है, कुछ मुआवज़ा पाता है और फिर चला जाता है। यह ऐसा व्यक्ति बिलकुल नहीं हो सकता, जो परमेश्वर में विश्वास करता है। पीछे इस बात का उल्लेख हुआ था कि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने के लिए क्या कर सकते हो। परमेश्वर का अनुमोदन वह पहली चीज़ है, जिसके बारे में तुम्हें सोचना और जिसके लिए तुम्हें काम करना चाहिए; यह तुम्हारे अभ्यास का सिद्धांत और दायरा होना चाहिए। तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, इसका निश्चय तुम्हें इसलिए करना चाहिए, क्योंकि यदि वह सत्य के अनुरूप है, तो वह निश्चित रूप से ईश्वर की इच्छा के अनुरूप है। ऐसा नहीं है कि तुम्हें यह मापना चाहिए कि यह बात सही है या गलत है, या क्या यह हर किसी की रुचि के अनुरूप है, या क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छाओं के अनुसार है; बल्कि तुम्हें यह निश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और यह कलीसिया के काम और हितों को लाभ पहुँचाता है या नहीं। यदि तुम इन बातों पर विचार करते हो, तो तुम चीज़ों को करते समय परमेश्वर की इच्छा के अधिकाधिक अनुरूप होते जाओगे। यदि तुम इन पहलुओं पर विचार नहीं करते, और चीज़ों को करते समय केवल अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हो, तो तुम्हारा उन्हें गलत तरीके से करना गारंटीशुदा है, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और निश्चित रूप से, वह परमेश्वर के साथ असंगत होती है। यदि तुम ईश्वर द्वारा अनुमोदित होने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपनी इच्छा के अनुसार। कुछ लोग अपने कर्तव्य पूरे करने के नाम पर कुछ निजी मामलों में संलग्न रहते हैं। उनके भाई और बहन इसे अनुचित मानते हैं और इसके लिए उन्हें फटकारते हैं, लेकिन ये लोग भूल स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि चूँकि यह एक व्यक्तिगत मामला है, जिसमें कलीसिया का कार्य, वित्त या उसके लोग शामिल नहीं हैं, इसलिए इसे सत्य के दायरे का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, और परमेश्वर को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीज़ें तुम्हें निजी मामले लग सकती हैं, जिन पर कोई सिद्धांत या सत्य लागू नहीं होता। किंतु, तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य को देखते हुए, तुम इस दृष्टि से बहुत स्वार्थी रहे कि तुमने परमेश्वर के परिवार के कार्य पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही यह सोचा कि तुमने जो किया, उसका इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा; तुम केवल अपने फायदे पर विचार करते रहे। इसमें पहले ही संतों का औचित्य और साथ ही व्यक्ति की मानवता से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। भले ही तुम जो कर रहे थे, उससे चर्च के हित नहीं जुड़े थे, न ही उसमें सत्य शामिल था, फिर भी अपने कर्तव्य के पालन करने का दावा करते हुए एक निजी मामले में संलग्न होना सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे तुम इसे परमेश्वर के परिवार में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए या अपने निजी कारणों के लिए यह कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त व्यक्ति को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। यदि तुम हर बात और हर सत्य को इस ढंग से लेते हो, तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। कुछ लोगों को लगता है कि जब वे कुछ निजी कार्य कर रहे होते हैं, तो वे सत्य की उपेक्षा कर सकते हैं, इच्छानुसार काम कर सकते हैं और वैसे कर सकते हैं जैसे उन्हें खुशी मिले, और उस ढंग से जो उनके लिए फायदेमंद हो। वे इस तरफ ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते कि यह परमेश्वर के परिवार को कैसे प्रभावित करेगा और न ही वे यह सोचते हैं कि यह संतों के आचरण को शोभा देता है या नहीं। अंत में, जब मामला समाप्त हो जाता है, तो वे भीतर अंधकारमय और असहज हो जाते हैं; लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि यह सब क्यों हो रहा है। क्या यह प्रतिशोध उचित नहीं है? यदि तुम ऐसी चीजें करते हो जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं, तो तुमने परमेश्वर को नाराज़ किया है। यदि लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, और अक्सर अपनी इच्छा के आधार पर काम करते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर को रुष्ट या अपमानित करेंगे। ऐसे लोग आम तौर पर अपने कर्मों में परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं होते और अगर वे पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे सज़ा से ज़्यादा दूर नहीं होंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 575

तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन-प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा काम नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन-प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किये गये काम एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही काम करते रहते हैं। मगर, इनको करते समय, ये लोग अपनी जो दशाएं प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मन:स्थिति में होने पर लोग थोड़े ज़्यादा चौकस होते हैं और बेहतर काम करते हैं। बाकी समय, किसी अनजान प्रभाव के चलते, उनका शैतानी स्वभाव उनमें शैतानी जगाता है जिससे उनमें अनुचित विचार उपजते हैं, वे बुरी हालत और मन:स्थिति में आ जाते हैं; परिणाम यह होता है कि वे अपना काम सतही ढंग से करते हैं। लोगों की आतंरिक दशाएं निरंतर बदलती रहती हैं; ये किसी भी स्थान पर किसी भी वक्त बदल सकती हैं। तुम्हारी दशा चाहे जैसे बदले, अपनी मन:स्थिति के अनुसार कर्म करना हमेशा ग़लत होता है। मान लो कि जब तुम अच्छी मन:स्थिति में होते हो, तो थोड़ा बेहतर करते हो, और बुरी मन:स्थिति में होते हो तो थोड़ा बदतर करते हो—क्या यह काम करने का कोई सैद्धांतिक ढंग है? क्या तुम इस प्रकार अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकते हो? मन:स्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और खुद को संभालना आना चाहिए, और सत्य की खोज करना और सिद्धांत के साथ कर्म करना आना चाहिए, तभी वे अपनी मन:स्थिति द्वारा नियंत्रित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जांच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे सतही तौर पर तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुमने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने से जी चुराने की कोशिश तो नहीं की है, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीज़ों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदार है और दायित्व का निर्वहन करता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे सतही ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 576

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। क्या यह अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है? क्या यह अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना है? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते रहे, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 577

सृष्टि के प्रभु का सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का एक बुनियादी सिद्धांत है, जो सर्वोच्च सिद्धांत है। वह सृजित प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरी तरह से उसकी प्रबंधन योजना और उसकी अपेक्षाओं पर आधारित है; उसे किसी व्यक्ति से सलाह लेने की जरूरत नहीं है, न ही उसे इसकी आवश्यकता है कि कोई व्यक्ति उससे सहमत हो। जो कुछ भी उसे करना चाहिए और जिस भी तरह से उसे लोगों से व्यवहार करना चाहिए, वह करता है, और भले ही वह कुछ भी करता हो और जिस भी तरह से लोगों से व्यवहार करता हो, वह सब उन सिद्धांतों के अनुरूप होता है, जिनके द्वारा सृष्टि का प्रभु कार्य करता है। एक सृजित प्राणी के रूप में करने लायक केवल एक ही चीज़ है और वह है समर्पण करना; इसका कोई और विकल्प नहीं होना चाहिए। यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि सृष्टि का प्रभु हमेशा सृष्टि का प्रभु ही रहेगा; उसके पास किसी भी सृजित प्राणी पर जैसे चाहे वैसे आयोजन और शासन करने की शक्ति और योग्यता है, और ऐसा करने के लिए उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यह उसका अधिकार है। सृजित प्राणियों में से किसी एक में भी, जिस सीमा तक वे सृजित प्राणी हैं, इस बात पर निर्णय देने की शक्ति या योग्यता नहीं है कि सृष्टिकर्ता को कैसे कार्य करना चाहिए या वह जो करता है, वह सही है या गलत है, न ही कोई सृजित प्राणी यह चुनने के योग्य है कि सृष्टि का प्रभु उन पर शासन, आयोजन या उनका निपटान करे या नहीं। इसी तरह, एक भी सृजित प्राणी में यह चुनने की योग्यता नहीं है कि सृष्टि के प्रभु द्वारा उनका शासन या निपटान किस तरह से हो। यह सर्वोच्च सत्य है। सृष्टि के प्रभु ने चाहे सृजित प्राणियों के साथ कुछ भी किया हो या कैसे भी किया हो, उसके द्वारा सृजित मनुष्यों को केवल एक ही काम करना चाहिए : सृष्टि के प्रभु द्वारा प्रस्तुत इस तथ्य को खोजना, इसके प्रति समर्पित होना, इसे जानना और स्वीकार करना। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि सृष्टि के प्रभु ने अपनी प्रबंधन योजना और अपना काम पूरा कर लिया होगा, जिससे उसकी प्रबंधन योजना बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ेगी; इस बीच, चूँकि सृजित प्राणियों ने सृष्टिकर्ता का नियम और उसकी व्यवस्थाएँ स्वीकार कर ली हैं, और वे उसके शासन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो गए हैं, इसलिए उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया होगा, सृष्टिकर्ता की इच्छा को समझ लिया होगा, और उसके स्वभाव को जान लिया होगा। एक और सिद्धांत है, जो मुझे तुम्हें बताना चाहिए : सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करे, जिस भी तरह से अभिव्यक्त करे, उसका कार्य बड़ा हो या छोटा, वह फिर भी सृष्टिकर्ता ही है; जबकि समस्त मनुष्य, जिन्हें उसने सृजित किया, चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, या वे कितने भी प्रतिभाशाली और अभीष्ट क्यों न हों, वे सृजित प्राणी ही रहते हैं। जहाँ तक सृजित मनुष्यों का सवाल है, चाहे जितना भी अनुग्रह और जितने भी आशीष उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्राप्त कर लिए हों, या जितनी भी दया, प्रेमपूर्ण करुणा और उदारता प्राप्त कर ली हो, उन्हें खुद को भीड़ से अलग नहीं मानना चाहिए, या यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के बराबर हो सकते हैं और सृजित प्राणियों में ऊँचा दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। परमेश्वर ने तुम्हें चाहे जितने उपहार दिए हों, या जितना भी अनुग्रह प्रदान किया हो, या जितनी भी दयालुता से उसने तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या चाहे उसने तुम्हें कोई विशेष प्रतिभा दी हो, इनमें से कुछ भी तुम्हारी संपत्ति नहीं है। तुम एक सृजित प्राणी हो, और इस तरह तुम सदा एक सृजित प्राणी ही रहोगे। तुम्हें कभी नहीं सोचना चाहिए, "मैं परमेश्वर के हाथों में उसका लाड़ला हूँ। वह मुझ पर हाथ नहीं उठाएगा। परमेश्वर का रवैया मेरे प्रति हमेशा प्रेम, देखभाल और नाज़ुक दुलार के साथ-साथ सुकून के गर्मजोशी भरे बोलों और प्रोत्साहन का होगा।" इसके विपरीत, सृष्टिकर्ता की दृष्टि में तुम अन्य सभी सृजित प्राणियों की ही तरह हो; परमेश्वर तुम्हें जिस तरह चाहे, उस तरह इस्तेमाल कर सकता है, और साथ ही तुम्हारे लिए जैसा चाहे, वैसा आयोजन कर सकता है, और तुम्हारे लिए सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीज़ों के बीच जैसी चाहे वैसी प्रत्येक भूमिका निभाने की व्यवस्था कर सकता है। लोगों को यह ज्ञान होना चाहिए और उनमें यह अच्छी समझ होनी चाहिए। अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो परमेश्वर के साथ उसका संबंध अधिक सामान्य हो जाएगा, और वह उसके साथ एक सबसे ज़्यादा वैध संबंध स्थापित कर लेगा; अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो वह अपने स्थान को सही ढंग से उन्मुख कर पाएगा, वहाँ अपना आसन ग्रहण कर पाएगा और अपना कर्तव्य निभा पाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 578

परमेश्वर के वचनों को पढ़ और समझकर परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर ही अपने वचनों और अपनी आंतरिक आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। उन्हें दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसकी इच्छा, उसके विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर कोमल एवं करुणामय दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग उसके अपमान सहन न करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। अब लोगों को परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है वो पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीज़ों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाला कोई व्यक्ति मसीह के संपर्क में आता है, तो मसीह के साथ उसका अनुभव परमेश्वर के बारे में उसकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर के संपर्क में आता है, तो वह इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकता। सत्य का यह पहलू सबसे गंभीर रहस्य है; इसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण के रहस्य के संबंध में परमेश्वर के वचनों का सार निकालो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 579

परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को समझ पाना, और इस प्रकार उसके स्वभाव को जानना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दयालुता को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किन चीज़ों को पसंद करता है और किनसे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण तो कर पाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास करने में सक्षम हों; इसी में अंतर निहित है। यदि तुम परमेश्वर को जानते हो, उसे समझते हो, उसकी कुछ इच्छाओं को समझने एवं ग्रहण करने में सक्षम हो, तो तुम सचमुच उस पर विश्वास कर सकते हो, सचमुच में उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सचमुच में उससे प्रेम कर सकते हो, और सचमुच में उसकी आराधना कर सकते हो। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझते हो, तो तुम सिर्फ एक अनुयायी हो जो भीड़ के साथ में दौड़ता और धारा के साथ बहता है। इसे सच्चा समर्पण या सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता है। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो भी सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं वे जब उसे देखते हैं तो उसकी आराधना और आदर करते हैं। जैसे ही वे परमेश्वर को देखते हैं वे भयभीत हो जाते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और उसके स्वरूप की जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का आदर करेंगे। आम तौर पर, जितनी कम समझ लोगों के पास होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। यदि लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय के मारे काँपने लगते। "जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं"—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास गहन समझ नहीं थी, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का आदर करने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका आदर कर सकते हैं? लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, न ही परमेश्वर की आराधना करने में और भी समर्थ नहीं होते हैं। यदि वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक सामान्य मनुष्य की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक अपमानजनक प्रवृत्ति अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसकी अवज्ञा कर सकते हैं, उस पर दोष लगा सकते हैं, और दुराग्रही हो सकते हैं। वे दंभी हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें, वे परमेश्वर के बारे में धारणाएं भी बना सकते हैं, उसकी निंदा और तिरस्कार कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यवहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश और जिसे हासिल करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

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