जीवन में प्रवेश VI

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 556

केवल सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति अपने स्वभाव में बदलाव ला सकता है : यह एक ऐसी बात है, जिसे लोगों को अच्छी तरह से जानना-बूझना चाहिए, और समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसल जाओगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीजों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह सत्य के अनुरूप है या नहीं और उसका कोई मूल्य और अर्थ है या नहीं। तुम वे काम कर सकते हो जो सत्य के अनुरूप हों, लेकिन तुम वो काम नहीं कर सकते जो सत्य के अनुरूप न हों। जहाँ तक उन चीजों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीजों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें जल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? फिर भी, बुरी या निरर्थक चीजें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिरोधी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीजें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य के प्रकृति सार से तय होता है। जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम उन चीजों को करना आसान पाओगे, जो सत्य के अनुरूप हैं। तुम सामान्य ढंग से अपना कर्तव्य निभाओगे और सत्य का अभ्यास करोगे—वह भी सहजता से और आनंद से, और तुम महसूस करोगे कि कोई नकारात्मक चीज करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो, तो तुम्हारे पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा कि तुम्हें किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए—किस तरह एक निष्कपट और सीधा-सादा व्यक्ति बनना चाहिए, एक ईमानदार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो। और एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तो तुम फिर कभी परमेश्वर की अवहेलना करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें गुमराह करे या कोई दुष्ट तुम्हें उकसाए, तुम वो नहीं करोगे; कोई तुम्हारे साथ कितनी भी ज़बरदस्ती करे, तुम फिर भी वैसा नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से घृणा करने लगेंगे और नकारात्मक चीजों से आंतरिक विरक्ति महसूस करेंगे। उनके लिए बुराई करना मुश्किल होगा, क्योंकि उनके जीवन स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया गया है।

अगर अपने हृदय में तुम वास्तव में सत्य को समझते हो तो तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है और तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह सही है, और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना कम से कम होगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी और दंभी है, तो तुम्हें परमेश्वर का विरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, तुम खुद को रोक नहीं सकते, यह तुम्हारे नियंत्रण के बाहर है। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, उनके कारण तुम खुद को ऊँचा उठाओगे, निरंतर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों का तिरस्कार करने के लिए मजबूर करेंगे, वे तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे, और अंततः तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे और चाहेंगे कि लोग तुम्हें समर्पित हों, तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं! बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति को सुधारना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम नफरत, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी इच्छा से कुछ काम करने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम अपनी इच्छा से परमेश्वर के वचन पढ़ने, उसका उत्कर्ष करने, परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और अपने दिल में, तुम खुशी महसूस करोगे। तुम अपनी इच्छा से अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम अपने आपको बेहतर मानसिक स्थिति में महसूस करोगे। अपने स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करना और सत्य में प्रवेश करना है। सत्य को समझकर ही तुम विवेकशीलता हासिल कर सकते हो; विवेकशीलता से ही तुम चीजों को पूरी तरह समझ सकते हो; चीजों को पूरी तरह समझकर ही तुम खुद को सचमुच जान सकते हो; जब तुम खुद को सचमुच जान लोगे तो केवल तभी तुम देह से विद्रोह कर सकते हो और इस प्रकार सत्य को अभ्यास में ला सकते हो, धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो और कदम-दर-कदम तुम परमेश्वर में अपने विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करोगे। यह इस पर निर्भर है कि सत्य का अनुसरण करते समय लोगों में किस तरह का संकल्प होता है। यदि किसी में वास्तव में संकल्प है तो छह महीने या एक साल के बाद वे सही रास्ते पर आने शुरू हो जाएंगे। तीन या पाँच वर्षों के भीतर, वे परिणाम देख लेंगे और महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, और सत्य के अभ्यास पर कभी ध्यान नहीं देते, तो दस या बीस साल में भी उन्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, वे सोचेंगे कि यही परमेश्वर में विश्वास रखना है; वे सोचेंगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे वे पहले धर्मनिरपेक्ष दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। वे कुछ वचन और सिद्धांत बोलने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन वे अभी भी असहज और बेचैन रहेंगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से रहने से उनके जीवन का अर्थ होगा, और परमेश्वर को संतुष्टि प्रदान करने, उसे प्रतिफल देने और सहजता महसूस करने के लिए उन्हें इसी तरह से रहना होगा। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, अपने खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर के इरादों के प्रति समर्पित और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो सत्य को सटीक रूप से व्यवहार में लाने, और सत्य को वास्तव में व्यवहार में लाने का यही अर्थ है। यह पहले की तरह नहीं है, केवल कल्पनाओं पर निर्भर रहना, नियमों का पालन करना और सोचना कि यह सत्य का अभ्यास करना है। वास्तव में, कल्पनाओं पर निर्भर रहना और नियमों का पालन करना बहुत थकाऊ है, सत्य न समझना और सिद्धांतों के बिना काम करना भी बहुत थकाने वाला है, बिना लक्ष्य के आँख मूँदकर काम करना तो और भी थका देने वाला है। जब तुम सत्य समझ जाते हो, तो कोई भी व्यक्ति, घटना या चीज तुम्हें विवश नहीं कर सकती, तुम स्वतंत्र और मुक्त होते हो। तुम सैद्धांतिक तरीके से कार्य करोगे, निश्चिंत और खुश रहोगे, और तुम्हें यह महसूस नहीं होगा कि इसमें बहुत मेहनत लगती है या यह बहुत पीड़ादायक है। यदि तुम्हारी स्थिति इस प्रकार की है, तो तुममें सत्य और मानवता है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसका स्वभाव बदल गया है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 557

जीवन के अनुभव की प्रक्रिया में, चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें सत्य की खोज करना सीखना चाहिए, परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार मामले पर पूरी तरह से विचार करना चाहिए। जब तुम जान जाते हो कि पूर्ण रूप से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कैसे कार्य करना है, तो तुम अपनी इच्छा से आने वाली चीजों को छोड़ पाओगे। एक बार जब तुम जान जाते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तो तुम्हें बस वैसे ही काम करना चाहिए, मानो सहजता से कार्य कर रहे हो; इस तरह कार्य करना बहुत ही आरामदायक और आसान लगता है। सत्य समझने वाले लोग इसी ढंग से काम करते हैं। यदि तुम लोगों को दिखा सको कि तुम अपना कर्तव्य निभाते समय सच में प्रभावी होते हो, और जो तुम करते हो वह सिद्धांतों के अनुसार है, कि तुम्हारा जीवन स्वभाव वास्तव में बदल गया है, कि तुमने परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए कई अच्छे काम किए हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम्हें सत्य की समझ है और निश्चित रूप से तुम मानव के समान हो; और जब तुम परमेश्वर के वचन खाते-पीते हो, तो यकीनन उसका असर होता है। जब कोई सही मायनों में सत्य समझ लेता है, तो वह अपनी विभिन्न दशाओं में सही-गलत में फर्क कर सकता है, वह जटिल मामलों को स्पष्ट रूप से देख पाता है और यह जान जाता है कि कैसे सही तरीके से अभ्यास करना है। यदि कोई व्यक्ति सत्य नहीं समझता और अपनी स्थिति को नहीं पहचान पाता, तो यदि वह अपने विरुद्ध विद्रोह करना चाहता है, तो उसे पता नहीं होगा कि क्या और कैसे विद्रोह करना है। यदि वह अपनी इच्छा का त्याग करना चाहता है, तो वह यह नहीं जान पाएगा कि उसकी इच्छा में क्या गलत है, उसे लगेगा कि उसकी इच्छा सत्य के अनुरूप है, यहाँ तक कि वह अपनी इच्छा को भी पवित्र आत्मा का प्रबोधन भी मान सकता है। ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छा का त्याग कैसे करेगा? वह ऐसा नहीं कर पाएगा, वह दैहिक इच्छाओं से विद्रोह तो बिल्कुल नहीं कर पाएगा। इसलिए, जब तुम्हें सत्य की समझ नहीं होती, तो तुम अपनी इच्छा से आई चीजों को, मानवीय धारणाओं के अनुरूप चीजों को, और अपनी ही दयालुता, प्रेम, पीड़ा और कीमत चुकाने को आसानी से सही और सत्य के अनुरूप समझने की गलती कर सकते हो। तो फिर तुम इन मानवीय चीजों से विद्रोह कैसे कर सकते हो? तुम्हें सत्य की समझ नहीं है, तुम नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास करने का क्या अर्थ होता है। तुम पूरी तरह अंधेरे में हो और नहीं जान पाते कि क्या करना है, इसलिए तुम वही कर सकते हो जो तुम्हें अच्छा लगता है, परिणामस्वरूप, तुम्हारे कुछ कार्यों में विकृति आ जाती है। इनमें से कुछ तो नियमों का पालन करने के कारण होता है, कुछ उत्साह के कारण और कुछ शैतान के विघ्न के कारण होता है। सत्य न समझने वाले लोग ऐसे ही होते हैं। जब वे चीजें करते हैं तो बेहद डावांडोल होते हैं, उनमें हमेशा विचलन दिखाई देते हैं और उनमें बिल्कुल भी सटीकता नहीं होती। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे चीजों को गैर-विश्वासियों की तरह ही बेतुके ढंग से समझते हैं। वे सत्य का अभ्यास कैसे कर सकते हैं? समस्याओं का समाधान कैसे कर सकते हैं? सत्य समझना कोई सरल बात नहीं है। किसी की काबिलियत कम हो या ज्यादा, जीवन भर के अनुभव के बाद भी, उनमें सत्य की समझ सीमित होती है, और परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ भी सीमित ही होती है। जो लोग अपेक्षाकृत अधिक अनुभवी होते हैं उनमें सत्य की समझ थोड़ी ज्यादा होती है, वे अधिक से अधिक ऐसे काम नहीं करते जो परमेश्वर के विरुद्ध हों और जाहिर तौर पर बुरे काम नहीं करते। उनके लिए अपने इरादों की मिलावट के बिना कार्य करना असंभव है। चूँकि मनुष्य की सोच सामान्य होती है और जरूरी नहीं कि उनके विचार हमेशा परमेश्वर के वचनों के अनुरूप ही हों, तो उनकी अपनी इच्छा की मिलावट होना अपरिहार्य है। महत्वपूर्ण है उन सभी चीजों की समझ होना जो अपनी इच्छा से आती हैं और परमेश्वर के वचनों, सत्य और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध होती हैं। इसके लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में मेहनत करनी पड़ेगी; जब तुम सत्य समझ लोगे, केवल तब ही तुममें विवेक होगा और तभी तुम यह सुनिश्चित कर पाओगे कि तुम बुरे कार्य नहीं करोगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 558

खुद को जानने के लिए तुम्हें अपनी भ्रष्टता के खुलासों, अपने भ्रष्ट स्वभाव, अपनी नाजुक कमजोरियों और अपने प्रकृति सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीजों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नजरिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन पहलुओं के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। बेशक, खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो। परमेश्वर के वचनों के न्याय को स्वीकार करते समय कष्ट या पीड़ा से न डरो, और इस बात से और भी न डरो कि परमेश्वर तुम लोगों के दिल को चीर देगा और तुम्हारी कुरूप अवस्थाओं को उजागर कर देगा। इन चीजों को झेलना बेहद हितकारी है। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो तो तुम्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना वाले वचनों को और ज्यादा पढ़ना चाहिए, खासकर वो वचन जो मानवजाति की भ्रष्टता का सार उजागर करते हैं। तुम्हें उनके साथ अपनी व्यावहारिक अवस्था की तुलना करनी चाहिए, और तुम्हें उन्हें खुद से ज्यादा और दूसरों से कम जोड़ना चाहिए। परमेश्वर जैसी अवस्थाएँ उजागर करता है, वे हर व्यक्ति में मौजूद हैं, और वे सभी तुम में मिल सकती हैं। अगर तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इसे अनुभव करके देखो। तुम जितना ज्यादा अनुभव करोगे, उतना ही ज्यादा खुद को जानोगे, और उतना ही ज्यादा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन बिल्कुल सही हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद से जोड़ने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को ईज़ेबेल और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफादार हैं, अतः ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि मनुष्य को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन बहुत कठोर हैं और वे वास्तविकता से मेल नहीं खाते, इसलिए वे उन्हें स्वीकारने से इनकार कर देते हैं। ऐसे भी लोग हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन सही नहीं हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? यह जाहिर तौर पर गलत है। सभी लोग खुद को अपने बाहरी व्यवहार के आधार पर देखते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के बीच आत्म-चिंतन करने और अपने भ्रष्ट सार के बारे में जान पाने में सक्षम नहीं होते। यहाँ “ईज़ेबेल” और “वेश्या” जैसे शब्द मानवजाति की भ्रष्टता, मलिनता और व्यभिचार के सार को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर किसी में व्यभिचार के भ्रष्ट विचार होते हैं—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह एक तथ्य नहीं है? हमें पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सत्य है और तथ्यों के अनुरूप है, और लोगों का न्याय करके उन्हें उजागर करने वाले उसके वचन चाहे जितने भी कठोर क्यों न हों, या लोगों के साथ सत्य की संगति करने या उन्हें प्रबोधित करने वाले उसके वचन कितने भी कोमल क्यों न हों, चाहे उसके वचन न्याय हों या आशीष, चाहे वे निंदा हों या शाप, और चाहे वे लोगों को कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का, लोगों को वे सब स्वीकार करने चाहिए। यही वह दृष्टिकोण है, जो लोगों को परमेश्वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, पवित्रता का दृष्टिकोण है, धैर्यशीलता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? तुम थोड़ी उलझन में हो। मैं तुमसे कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। अपनी आस्‍था में, लोगों को दृढ़ता से यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, लोगों को उन्हें विवेक के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिए। अगर परमेश्वर के वचन तुममें से किसी एक या सबको उजागर नहीं करते तो ये किसे उजागर करते हैं? और अगर यह तुम्हें उजागर करने के लिए नहीं है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने के लिए क्यों कहा जाता है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है? परमेश्वर समूची मानवजाति से बात करता है, परमेश्वर द्वारा बोला गया हर वाक्य भ्रष्ट मानवजाति को उजागर करता है, और कोई भी इसके बाहर नहीं है—स्वाभाविक रूप से तुम भी इसमें शामिल हो। परमेश्वर के कथनों की एक भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में या अवस्था की किसी किस्म के बारे में नहीं है, किसी बाह्य नियम के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को सिर्फ एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप को उजागर करने वाली मानते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, और तुम नहीं समझते हो कि सत्य क्या है। परमेश्वर के वचन सत्य हैं। लोग परमेश्वर के वचनों की गहराई का एहसास कर सकते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर का हर वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन अनिवार्य चीजों को उजागर करता है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए हैं। वे आवश्यक चीजें होती हैं, वे बाह्य रूप, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी रूप से देखने पर, वे सभी अच्छे लोग लग सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इसलिए व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों को मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं के आलोक में या मनुष्यों की सुनी-सुनाई बातों के आलोक में नहीं लेना चाहिए, और सत्तारूढ़ पार्टी के बयानों के आलोक में तो निश्चित रूप से नहीं लेना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं; मनुष्य के सभी वचन मिथ्या हैं। इस तरह से सहभागिता करने के बाद, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने रवैये में बदलाव का अनुभव किया है? बदलाव चाहे जितना भी छोटा या बड़ा हो, अगली बार जब तुम लोगों का न्याय और उन्हें उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन पढ़ोगे, तो तुम्हें कम-से-कम परमेश्वर से बहस करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें यह कहते हुए परमेश्वर के बारे में शिकायत करना बंद कर देना चाहिए, “लोगों को उजागर और उनका न्याय करने वाले परमेश्वर के वचन वाकई कठोर हैं, मैं इस पन्ने को नहीं पढ़ने वाला। मैं इसे छोड़ दूँगा! मुझे आशीषों और वादों के बारे में पढ़ने के लिए कुछ खोजना चाहिए, ताकि कुछ सुख-शांति मिल सके।” तुम्हें अब परमेश्वर के वचनों को अपनी मर्जी से छाँट-छाँटकर नहीं पढ़ना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए; सिर्फ तभी तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव को स्वच्छ किया जा सकता है, और सिर्फ तभी तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य के अनुसरण का महत्व और उसके अनुसरण का मार्ग

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 559

तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई में मौजूद चीजों का विश्लेषण करना; उन चीजों का विश्लेषण करना जो तुम्हारे जीवन में हैं उन शैतानी तर्क और शैतान के फलसफों का विश्लेषण करना जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो—जो कि शैतान का जीवन है जो तुम जी रहे हो। केवल अपने आत्मा में गहरे मौजूद चीजों को बाहर निकाल कर ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीज़ों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो मामलों द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता। कई बार काम खत्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान या समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। इसलिए, बहुत-सी परिस्थितियों में तुम्हें आत्म-चिंतन कर खुद को जानना चाहिए। कोई परिणाम देखने के लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार गहराई तक खोदना चाहिए और आत्म-विश्लेषण करना चाहिए। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज्यादा से ज्यादा गहरी होती जाएगी, तुम आत्मचिंतन और आत्मज्ञान के जरिये धीरे-धीरे अपने प्रकृति सार को जान जाओगे।

अपनी प्रकृति जानने के लिए, तुम्हें कुछ चीजों के द्वारा इसकी समझ हासिल करनी चाहिए : सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो, बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीजों का आनन्द लेते हो, किन चीजों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीजों की तुम आराधना करते हो, किन चीजों का तुम अनुसरण करते हो, और किन चीजों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, और किस प्रकार के लोगों को तुम पसंद करते हो और अपना आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों या उन लोगों को पसंद करते हैं जो चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं या उन्हें जो कि दिखावा करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक इसकी बात है कि लोग किन चीजों को पसंद करते हैं, इसमें शामिल है ऐसी कुछ चीजों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीजों को करने में आनन्द पाना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिन्हें लोग स्वीकृति देंगे और जिनकी तारीफ करेंगे। लोगों की प्रकृति में, जिन चीजों को वे पसंद करते हैं, उनकी एक जैसी विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन लोगों, घटनाओं, और चीजों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को पसंद करते हैं जो लोगों से अपनी आराधना करवाते हैं। ये चीजें जिन्हें लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ये चीजें, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, उन लोगों को विशेष रूप से अच्छी लगती प्रतीत होती हैं, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और ये वही चीजें होती हैं जिनका लोग विशेष रूप से अनुसरण करने के इच्छुक होते हैं। ... जिन चीजों का लोग अनुसरण और लालसा करते हैं, वे सांसारिक प्रवृत्तियों से संबंधित होती हैं, ये चीजें शैतान और दुष्टों की होती हैं, परमेश्वर उनसे घृणा करता है, वे सत्य से रहित होती हैं। जिन चीजों के लिए लोग तरसते हैं, वे उनकी प्रकृति सार का पता लगाने की अनुमति देती हैं। लोगों की पसंद उनके कपड़े पहनने के तरीके में देखी जा सकती है। कुछ लोग ध्यान खींचने वाले, रंगीन कपड़े या विचित्र पोशाक पहनने के इच्छुक होते हैं। वे ऐसी चीजें पहनने को तैयार होते हैं जो पहले किसी और ने नहीं पहनी होतीं, और वे ऐसी चीजें पसंद करते हैं जो विपरीत लिंग को आकर्षित कर सकें। उनका ये कपड़े और चीजें पहनना उनके जीवन और दिल की गहराइयों में इन चीजों के लिए उनकी प्राथमिकता दर्शाता है। जो चीजें वे पसंद करते हैं, वे गरिमापूर्ण या शालीन नहीं होतीं। वे सामान्य व्यक्ति द्वारा पसंद की जाने वाली चीजें नहीं होतीं। इन चीजों के लिए उनके लगाव में अधार्मिकता है। उनका दृष्टिकोण बिल्कुल वैसा ही है, जैसा सांसारिक लोगों का होता है। व्यक्ति उनमें ऐसा कुछ भी नहीं देख पाता जिनमें सत्य से जरा भी कोई सामंजस्य हो। इसलिए, तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किससे ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन सांसारिक चीजों से तुम्हारा अनुराग यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में तुम्हारी प्रकृति दुष्टतापूर्ण और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो सकते हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उसके चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए एक साथी को ढूँढ़ने की बात लो, लोग अपने जैसे लोगों की ही तलाश करते हैं। यदि कोई महिला वास्तव में किसी के प्यार में पड़ जाए, तो कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा। यहाँ तक कि अगर उसकी टाँग भी तोड़ दी जाए, तब भी वह उसके साथ ही रहना चाहेगी; अगर उसे उसके साथ विवाह करने का अर्थ उस महिला की मृत्यु हो तो भी वह विवाह करना चाहेगी। यह कैसे हो सकता है? इसका कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति उसे नहीं बदल सकता जो लोगों की हड्डियों में होता है, जो उनके दिल में होता है। यहाँ तक कि अगर कोई मर भी जाए, तो भी उसकी आत्मा बस वही चीजें ले जाएगी; ये चीजें मानव प्रकृति की हैं, और वे किसी व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व करती हैं। लोग जिन चीज़ों के शौकीन होते हैं, उनमें कुछ अधार्मिकता होती है। कुछ लोग उन चीजों के अपने शौक में स्पष्ट होते हैं और कुछ नहीं होते; कुछ तो उन्हें अत्यधिक पसंद करते हैं और कुछ नहीं करते; कुछ लोगों में आत्म-नियंत्रण होता है और कुछ स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते। कुछ लोग अंधकारपूर्ण और दुष्टतापूर्ण चीजों में डूबने के आदी होते हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास जीवन नहीं है। कुछ लोग देह के प्रलोभनों पर विजय पा सकते हैं और उन चीजों के वशीभूत या उनसे विवश नहीं होते, जो साबित करता है कि उनका थोड़ा आध्यात्मिक कद है और उनके स्वभाव में थोड़ा बदलाव आया है। कुछ लोग कुछ सत्य समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन है और वे परमेश्वर से प्यार करते हैं, लेकिन असल में, यह अभी भी बहुत जल्दी है, और अपने स्वभाव को बदलना कोई आसान बात नहीं है। क्या किसी व्यक्ति की प्रकृति सार को समझना आसान है? यदि कोई थोड़ा-बहुत समझता भी है, तो उस समझ को हासिल करने के लिए उस व्यक्ति को बहुत सारे घुमावदार रास्तों से गुजरना पड़ेगा और थोड़ी-बहुत समझ हो भी तो, बदलाव लाना आसान नहीं है। लोगों को इन तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और सत्य का अनुसरण करने के संकल्प के बिना लोग खुद को नहीं जान सकते। तुम्हारे इर्द-गिर्द लोग, घटनाएँ और चीजें चाहे कैसे भी बदलें, और चाहे दुनिया कैसे भी उलट-पुलट हो जाए, अगर सत्य भीतर से तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है, यदि उसने तुम्हारे भीतर जड़ें जमा ली हैं और परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीवन, प्राथमिकताओं, अनुभवों और अस्तित्व का मार्गदर्शन करते हैं, तो उस बिंदु पर तुम वास्तव में बदल गए होगे। वर्तमान में, लोगों का तथाकथित रूपांतरण केवल थोड़ा सहयोग करना, बेमन से काट-छाँट किए जाने को स्वीकारना, सक्रियता से अपने कर्तव्यों को निभाना और थोड़े उत्साह और विश्वास का होना है, लेकिन इसे स्वभावगत रूपांतरण नहीं माना जा सकता और इससे यह साबित नहीं होता कि लोगों के पास जीवन है। ये सिर्फ लोगों की प्राथमिकताएँ और प्रवृत्तियाँ हैं—और कुछ नहीं।

अपनी प्रकृति में लोग जिन चीजों को पसंद करते हैं, उन्हें उजागर करने के अलावा, प्रकृति की समझ के स्तर तक पहुँचने के लिए, उनकी प्रकृति से संबंधित कुछ बेहद महत्वपूर्ण पहलुओं को भी उजागर करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चीजों पर लोगों के दृष्टिकोण, लोगों के तरीके और जीवन के लक्ष्य, लोगों के जीवन के मूल्य और जीवन पर दृष्टिकोण, साथ ही सत्य से संबंधित सभी चीजों पर उनके नजरिए और विचार। ये सभी चीजें लोगों की आत्मा के भीतर गहरी समाई हुई हैं और स्वभाव में परिवर्तन के साथ उनका एक सीधा संबंध है। तो फिर, भ्रष्ट मानवजाति का जीवन को लेकर क्या दृष्टिकोण है? इसे इस तरह कहा जा सकता है : “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” सभी लोग अपने लिए जीते हैं; अधिक स्पष्टता से कहें तो, वे देह-सुख के लिए जी रहे हैं। वे केवल अपने मुँह में भोजन डालने के लिए जीते हैं। उनका यह अस्तित्व जानवरों के अस्तित्व से किस तरह भिन्न है? इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ होने की तो बात ही छोड़ दो। व्यक्ति के जीवन का दृष्टिकोण इस बारे में होता है कि दुनिया में जीने के लिए तुम किस पर भरोसा करते हो, तुम किसके लिए जीते हो, और किस तरह जीते हो—और इन सभी चीजों का मानव-प्रकृति के सार से लेना-देना है। लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं। वे सभी शैतान हैं और वास्तव में कोई भी अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके ही तुम वास्तव में मनुष्य की भ्रष्टता और सार को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में किससे संबंध रखते हैं, उनमें वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानव के समान कैसे जीना चाहिए। व्यक्ति की प्रकृति का वास्तव में विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का अनुभव किए बिना या वास्तविक अनुभव प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 560

किसी की प्रकृति को कैसे जानें? किसी व्यक्ति की प्रकृति किन चीजों से मिलकर बनती है? तुम केवल मनुष्य की कमियों, दोषों, इरादों, धारणाओं, नकारात्मकता और विद्रोहीपन के बारे में जानते हो, लेकिन तुम मनुष्य की प्रकृति के भीतर की चीजों को नहीं जान पाते। उसके उद्भव को जानने में समर्थ हुए बिना तुम केवल उसकी बाहरी परत को जानते हो, और इससे मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग अपनी कमियाँ और नकारात्मकताएँ स्वीकारते हैं और कहते हैं, “मैं अपनी प्रकृति समझता हूँ। देखो, मैं अपने अहंकार को स्वीकारता हूँ। क्या यह मेरा अपनी प्रकृति को जानना नहीं है?” अहंकार मनुष्य की प्रकृति का एक अंग है; यह सत्य है। लेकिन इसे केवल सैद्धांतिक अर्थ में स्वीकारना पर्याप्त नहीं है। अपनी प्रकृति को समझना क्या है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना जा सकता है? एक व्यक्ति जिन चीजों को प्रकट करता है, उसके माध्यम से किसी की प्रकृति को विशिष्ट रूप से कैसे देखा जाना चाहिए? सबसे पहले, तुम व्यक्ति की प्रकृति को उसकी रुचियों के माध्यम से देख सकते हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों में मशहूर और विशिष्ट लोगों के लिए विशेष श्रद्धा होती है, कुछ लोगों को विशेष रूप से गायक या फिल्मी सितारे पसंद हैं, कुछ लोगों को गेम खेलने का विशेष शौक होता है। इन रुचियों से हम देख सकते हैं कि इन लोगों की प्रकृति क्या है। एक सरल उदाहरण है : कुछ लोग किसी गायक को आदर्श मान सकते हैं। वे किस हद तक उन्हें आदर्श मानते हैं? इस हद तक कि वे उस गायक की हर हरकत, मुस्कान और शब्द के प्रति आसक्त हो जाते हैं। वे उस गायक पर फिदा हो जाते हैं, यहाँ तक कि हर उस चीज की तस्वीर खींचते हैं जो वह पहनता है, और उसकी नकल करते हैं। इस स्तर का आदर्शीकरण इस व्यक्ति के बारे में किस समस्या को दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के हृदय में केवल गैर-विश्वासी चीजें हैं, उसमें सत्य नहीं है, उसमें सकारात्मक चीजें नहीं हैं, और परमेश्वर तो उसके हृदय में बिल्कुल नहीं है। वे सभी चीजें, जिनके बारे में यह व्यक्ति सोचता है, जिनसे प्यार करता है और जिनका अनुसरण करता है, शैतान की होती हैं। ये चीजें इस व्यक्ति के हृदय पर कब्ज़ा कर लेती हैं, जो उन चीजों को अर्पित कर दिया जाता है। क्या तुम लोग बता सकते हो कि उसका प्रकृति सार क्या है? अगर किसी चीज को चरम सीमा तक प्रेम किया जाता है, तो वह चीज किसी का जीवन बन सकती है और उसके हृदय पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करती है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो परमेश्वर को नहीं चाहता है और उसके बजाय एक शैतान से प्यार करता है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति की प्रकृति एक शैतान से प्रेम और उसकी आराधना करने वाली होती है, जो सत्य से प्रेम नहीं करती और परमेश्वर को नहीं चाहती। क्या यह किसी व्यक्ति की प्रकृति को देखने का सही तरीका नहीं है? यह पूरी तरह सही है। मनुष्य की प्रकृति का गहन-विश्लेषण इसी तरह किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें भाषण देना और बाहर जाकर कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाएँ आयोजित करना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है कि लोग उन्हें सुनें, उन्हें आदर्श मानें और उनके चारों ओर घूमें। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के दिलों में उनकी एक जगह हो और दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व दें। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का गहन-विश्लेषण करें। उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं, वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं और वे ऊँचे रुतबे के पीछे भागते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिलों में एक जगह रखना चाहते हैं। यह शैतान की ठेठ छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो विशेष रूप से दिखाई देते हैं, वे अहंकारी और दंभी होते हैं, परमेश्वर की आराधना नहीं करते हैं और दूसरों से अपनी आराधना करवाने की कोशिश करते हैं। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग वाकई चीजों का अनुचित लाभ उठाना पसंद करते हैं और वे सभी मामलों में अपना ही हित साधना चाहते हैं। वे जो कुछ भी करें उससे उन्हें लाभ मिलना चाहिए, वरना वे उसे नहीं करेंगे। जब तक उन्हें किसी चीज में लाभ न मिलता हो, वे उस पर ध्यान नहीं देते हैं, और उनके कार्यों के पीछे हमेशा गुप्त उद्देश्य होते हैं। जो व्यक्ति उन्हें लाभ पहुँचाता है, वे उसकी प्रशंसा करते हैं, और जो कोई उनकी चापलूसी करता है, उसे वे बढ़ावा देते हैं। यहाँ तक कि अगर उनके पसंदीदा लोगों में समस्याएँ भी हों, तो भी वे कहेंगे कि वे लोग सही हैं, और उनका बचाव करने और उन पर पर्दा डालने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। इस तरह के व्यक्तियों की प्रकृति क्या होती है? तुम उनकी प्रकृति को इन व्यवहारों से साफ देख सकते हो। वे अपने कार्यों के माध्यम से चीजों का अनुचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं और हर स्थिति में लेन-देन के व्यवहार में संलग्न रहते हैं, इसलिए तुम यह निश्चित रूप से कह सकते हो कि उनकी प्रकृति लाभ के लिए ललचाते रहना है। वे हर चीज में स्वयं के बारे में सोचते हैं। अगर उन्हें कोई लाभ नहीं होगा, तो वे जल्दी नहीं उठेंगे। वे लोगों में सबसे स्वार्थी होते हैं, और वे बेहद लालची होते हैं। उनकी प्रकृति धन से उनके प्रेम और सत्य से प्रेम के अभाव के जरिये प्रदर्शित होती है। कुछ लोग महिलाओं से मोहित रहते हैं, जहाँ कहीं वे जाती हैं उनके साथ घूमते-फिरते रहते हैं। सुंदर महिलाएं ऐसे व्यक्तियों की चाहत का लक्ष्य होती हैं और उनके दिल में उनके लिए अत्यधिक सम्मान होता है। वे सुंदर महिलाओं के लिए अपना जीवन देने और सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं। केवल महिलाएं ही उनके दिल में रहती हैं। ऐसे पुरुषों की प्रकृति क्या होती है? उनका स्वभाव है सुंदर महिलाओं से प्रेम करना, उनकी पूजा करना और दुष्टता से प्रेम करना। वे दुष्ट, लालची प्रकृति वाले अय्याश व्यक्ति होते हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि यह उनकी प्रकृति है? क्योंकि ये इस बात की अभिव्यक्तियाँ हैं कि लालच व्यक्ति की प्रकृति बन चुका है। ये व्यवहार केवल कभी-कभी किए जाने वाले अपराध नहीं होते, न ही ऐसे लोग केवल सामान्य लोगों से थोड़े ज्यादा बुरे होते हैं, बल्कि उनका दिल पहले से ही इन चीजों से पूरी तरह से भरा होता है, जो उनकी प्रकृति, उनका सार बन जाती हैं। इस प्रकार, ये चीजें उनकी प्रकृति का प्रकटन बन गई हैं। व्यक्ति की प्रकृति के घटक लगातार प्रकट होते रहते हैं। कोई व्यक्ति चाहे कुछ भी करे, उससे उस व्यक्ति की प्रकृति प्रकट हो सकती है। लोगों के कुछ भी करने के अपने मंतव्य और उद्देश्य होते हैं, चाहे वह मेजबानी का कर्तव्य करना हो, सुसमाचार का प्रचार करना हो, या किसी भी अन्य तरह का कार्य हो, वे अनजाने में अपनी प्रकृति के कुछ हिस्सों को प्रकट कर सकते हैं, क्योंकि व्यक्ति की प्रकृति उसका जीवन होती है, और लोग जब तक जीवित रहते हैं, तब तक अपनी प्रकृति से नियंत्रित होते रहते हैं। व्यक्ति की प्रकृति केवल कुछ अवसरों पर या संयोग से प्रकट नहीं होती; बल्कि, यह पूरी तरह से व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व कर सकती है। जो भी व्यक्ति की हड्डियों और रक्त के भीतर से बहता है, वह उसकी प्रकृति और जीवन का द्योतक होता है। कुछ लोगों को सुंदर महिलाएं पसंद होती हैं। कुछ लोग पैसे से प्रेम करते हैं। कुछ लोगों को हैसियत से विशेष प्रेम होता है। कुछ विशेष रूप से प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत छवि को मूल्यवान समझते हैं। कुछ विशेष रूप से मूर्तियों से प्रेम या उनकी आराधना करते हैं। और कुछ लोग, विशेष रूप से अहंकारी और दंभी होते हैं, वे अपने दिल में किसी को स्थान नहीं देते और ऊँची हैसियत प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वे दूसरों से अलग दिखना चाहते हैं और उन पर अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं। विभिन्न प्रकार की प्रकृतियाँ होती हैं। वे लोगों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उनके साझे तत्व परमेश्वर का प्रतिरोध और उससे विश्वासघात हैं। इस मामले में वे सभी समान हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 561

सारी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना मनुष्य की प्रकृति है। किंतु, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य स्वीकार कर सकते हैं। ये वे लोग हैं जो सत्य प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकते हैं। कुछ लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बस बहाव में बहते रहते हैं। वे तुम्हारी आज्ञा मानते हैं और जो कुछ भी करने को कहोगे, वे करते हैं, वे चीजें त्याग सकते हैं और खुद को खपा सकते हैं, और वे हर तरह की पीड़ा सह सकते हैं। ऐसे लोगों में थोड़ा जमीर और विवेक होता है, और उन्हें बचाए जाने और जीवित रहने की आशा होती है, लेकिन उनका स्वभाव नहीं बदल सकता क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और वे केवल सिद्धांत समझने से ही संतुष्ट रहते हैं। वे जमीर का उल्लंघन करने वाली बातें नहीं कहते या करते, वे ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, और किसी भी समस्या के बारे में सत्य पर संगति स्वीकार सकते हैं। लेकिन जब सत्य की बात आती है, तो वे गंभीर प्रयास नहीं करते, उनका दिमाग भ्रमित होता है और वे कभी भी सत्य के सार को नहीं समझ सकते। उनके स्वभाव को बदलना असंभव होता है। अगर तुम भ्रष्टता से स्वच्छ होना चाहते हो और अपने जीवनस्वभाव में बदलाव से गुजरते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने की योग्यता होनी चाहिए। सत्य स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य स्वीकारने का यह अर्थ है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो विष—शैतान के विष—तुम्हारी प्रकृति में हों, जब परमेश्वर के वचन इन चीजों को उजागर कर दें, तो तुम्हें उन्हें स्वीकारना और उनके प्रति समर्पित होना चाहिए, तुम कोई और विकल्प नहीं चुन सकते, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को जानना चाहिए। इसका मतलब है परमेश्वर के वचनों और सत्य को स्वीकारने में सक्षम होना। चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे, चाहे उसके कथन कितने भी कठोर हों, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त प्रकाश को स्वीकार सकते हो और उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, जिस पर तुम्हारे भाई-बहन सहभागिता करते हैं। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। अगर सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में थोड़ी-बहुत मानवता है, वे कुछ अच्छी चीजें कर सकते हैं, देह-सुख त्यागकर परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकते हैं, पर वे सत्य को लेकर भ्रमित हैं और उसे गंभीरता से नहीं लेते, तो उनका स्वभाव कभी नहीं बदलता। तुम देख सकते हो कि पतरस में भी अन्य शिष्यों जैसी ही इंसानियत थी, लेकिन सत्य के अपने उत्कट अनुसरण में वह दूसरों से अलग था। यीशु ने चाहे जो भी कहा, उसने उस पर गंभीरता से चिंतन किया। यीशु ने पूछा, “हे शमौन, योना के पुत्र, क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?” पतरस ने ईमानदारी से उत्तर दिया, “मैं केवल उस पिता से प्रेम करता हूँ जो स्वर्ग में है, अभी तक मैंने पृथ्वी के प्रभु से प्रेम नहीं किया है।” बाद में उसने समझा, यह सोचते हुए, “यह सही नहीं है, पृथ्वी का परमेश्वर स्वर्ग का परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का परमेश्वर एक ही नहीं है? अगर मैं केवल स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, तो मेरा प्रेम व्यावहारिक नहीं है। मुझे पृथ्वी के परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि तभी मेरा प्रेम व्यावहारिक होगा।” इस प्रकार, यीशु ने जो पूछा था, उससे पतरस ने परमेश्वर के वचनों का सच्चा अर्थ जाना। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, और इस प्रेम के वास्तविक होने के लिए, व्यक्ति को पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए। किसी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना न तो यथार्थपरक है और न ही व्यावहारिक, जबकि व्यावहारिक, दृश्यमान परमेश्वर से प्रेम करना सत्य है। यीशु के वचनों से पतरस ने सत्य को हासिल किया और परमेश्वर के इरादे की समझ प्राप्त की। स्पष्टतः, पतरस का परमेश्वर में विश्वास केवल सत्य की तलाश पर केंद्रित था। अंततः, उसने व्यावहारिक परमेश्वर का प्रेम प्राप्त किया—पृथ्वी के परमेश्वर का। सत्य की तलाश में पतरस विशेष रूप से ईमानदार था। जब भी यीशु ने उसे सलाह दी, उसने उत्साहपूर्वक यीशु के वचनों पर चिंतन किया। शायद पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध किए जाने और उससे परमेश्वर के वचनों का सार समझ पाने से पहले उसने महीनों, एक वर्ष, यहाँ तक कि वर्षों तक चिंतन किया। इस तरह, पतरस ने सत्य में प्रवेश किया, और जब उसने ऐसा किया, तो उसके जीवन के स्वभाव का रूपांतरण और नवीनीकरण हुआ। अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर दस हजार बार बोल सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और धर्म-सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, “मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।” अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें उसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अपना अनुभवजन्य ज्ञान साफ-साफ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर बोलना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम केवल तभी विवेक प्राप्त कर सकते हो जब तुम सत्य समझते हो। सत्य समझे बिना तुम परखने में असमर्थ रहते हो। तुम मामलों को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हें सत्य की समझ हो। सत्य समझे बिना तुम मामलों को साफ तौर पर नहीं समझ सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो। सत्य समझे बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है। सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कर सकते हो। सत्य प्राप्त किए बिना तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो। सत्य समझे बिना, भले ही तुम उसकी आराधना करो, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। सत्य के बिना तुम्हारा किया कोई भी काम वास्तविकता नहीं होता। सत्य प्राप्त करने से, तुम्हारे किए सभी कार्यों में वास्तविकता होती है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 562

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोचो : “मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।” यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तुमने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तुम उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकते हो, अगर तुम्हें इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो, तो यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार और अतिश्योक्तिपूर्ण व्याख्या दे सकते हो, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम इन्हें समझते हो। तुम चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाओ, तुम्हारी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और मनुष्य के सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है उनके भीतर से सत्य खोजना। केवल इसी तरह तुम परमेश्वर के वचनों को सच में समझ सकते हो। परमेश्वर कभी भी खोखले शब्द नहीं बोलता। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य में ऐसे विवरण निहित होते हैं जो उसके वचनों में निश्चित रूप से और अधिक उजागर किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किए जा सकते हैं। जिन तरीकों से परमेश्वर सत्य अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और उन्हें मनुष्य की सोच से आसानी से नहीं समझा जा सकता। अगर लोग प्रयास करें, तो वे सत्य के हर पहलू का लगभग पूरा अर्थ जान सकते हैं। शेष बचे विवरण उनके बाद के अनुभव के दौरान, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता द्वारा भरे जाने हैं। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर उन्हें समझना, उन्हें पढ़कर उनकी विशिष्ट विषयवस्तु खोजना। दूसरा हिस्सा अनुभव करके और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के अर्थ को समझना है। इन दो पहलुओं में निरंतर प्रगति से, तुम परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हो। यदि तुम इनका शाब्दिक अर्थ निकालोगे या अपनी सोच और कल्पनाओं से व्याख्या करोगे, तो आलंकारिक रूप से सजाकर व्याख्या करने पर भी तुम सत्य नहीं समझते और यह अब भी मानवीय सोच और कल्पनाओं पर ही आधारित होगा। यह पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त नहीं हुआ है। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर के वचनों की व्याख्या करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं, वे परमेश्वर के वचनों की गलत व्याख्या भी कर सकते हैं, जिससे उनके परमेश्वर को गलत समझकर उसकी आलोचना करने की संभावना होती है, और यह कष्टप्रद है। इसलिए, सत्य मुख्यतः परमेश्वर के वचनों को समझने और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किए जाने से प्राप्त होता है। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझकर उसकी व्याख्या कर पाने का मतलब यह नहीं कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है। अगर परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझने का मतलब यह हो कि तुमने सत्य समझ लिया है, तो तुम्हारे लिए केवल थोड़ी-बहुत शिक्षा और ज्ञान ही काफी है, फिर तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन की क्या आवश्यकता है? क्या परमेश्वर के कार्य को इंसानी दिमाग समझ सकता है? इसलिए, सत्य समझना मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वास्तविक अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाशन और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। यह सत्य समझने और प्राप्त करने की प्रक्रिया है और यह एक आवश्यक शर्त भी है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 563

तुम मनुष्य की प्रकृति को कैसे समझते हैं? सबसे महत्वपूर्ण बात इसे मनुष्य की विश्वदृष्टि, जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से सूक्ष्मता से पहचानना है। जो लोग दानवों के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यतः शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं,” और ऐसी अन्य भ्रांतियाँ। उन पिशाच राजाओं, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए ये सभी वचन मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसे चीनी लोगों द्वारा “ऋषि” के रूप में प्रचारित किया जाता है, के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा अक्सर दोहराई गई विशेष कहावतें हैं। ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति के जोड़ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं, और उनमें से छोटा-सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और सभी नकारात्मक चीजें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों को देखकर जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन और प्रकृति बन गए हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। सांसारिक आचरण के फलसफों के लिए कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश के लोगों को शिक्षित करने, गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का इस्तेमाल करता है, और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में, परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कुछ लोग समाज में कई वर्षों से लोक अधिकारी रहे हैं। उनसे यह प्रश्न पूछने की कल्पना करो : “तुमने इस पद पर रहते हुए इतना अच्छा काम किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?” शायद वे कहें, “मैंने एक चीज जो समझी है, वह है कि ‘अधिकारी उपहार देने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।’” उनका करियर इसी शैतानी दर्शन पर आधारित है। क्या ये शब्द ऐसे लोगों की प्रकृति का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करना उसकी प्रकृति बन गई है, अफसरशाही और करियर में सफलता उसके लक्ष्य हैं। अभी भी लोगों के जीवन, स्व-आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं। उदाहरण के लिए, सांसारिक आचरण के उनके फलसफे, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विषों से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, लोगों की हड्डियों और रक्त से बहने वाली सभी चीजें शैतान की हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और प्रवीण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीजें कर चुके हैं और उनके पीछे उनकी जो चालें और षड्यंत्र हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति भ्रष्ट, दुष्ट, प्रतिरोधात्मक और परमेश्वर के विरोध में है, शैतान के फलसफों और विषों से भरी हुई और उनमें डूबी हुई है। यह पूरी तरह शैतान का प्रकृति-सार बन गया है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरुद्ध खड़े रहते हैं। अगर इस तरह लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण किया जा सके, तो वे आसानी से खुद को जान सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 564

आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है : जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा किया है या सही चीज को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन-सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें खोजबीन करना उचित है। आओ, पौलुस का उदाहरण लें। पौलुस अत्यंत जानकार था, प्रचार और काम के दौरान उसने बहुत कष्ट उठाए और बहुत सारे लोग उसका विशेष रूप से सम्मान करते थे। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया कि उसके लिए एक अलग मुकुट रखा होगा। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते बहुत दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। अगर उसने उस समय आत्म-चिंतन और आत्म-विश्लेषण किया होता, तो उसने ऐसा नहीं सोचा होता। दूसरे शब्दों में, पौलुस ने प्रभु यीशु के वचनों में सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया; उसने केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास किया। उसने सोच लिया था कि सिर्फ कुछ अच्छे काम करके और कुछ अच्छे व्यवहारों का प्रदर्शन करके वह परमेश्वर से स्वीकृति और पुरस्कार पा लेगा। अंत में, उसकी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं ने उसके हृदय को अंधा बना दिया और उसकी भ्रष्टता की सच्चाई को ढँक दिया। पर लोग इसे भाँप नहीं सके, और उन्हें इन मामलों का कुछ भी पता नहीं था, इसलिए परमेश्वर द्वारा इसे उजागर किए जाने तक, वे पौलुस को अपने लक्ष्य का मानक और जीने के लिए उदाहरण मानते रहे, और उसे एक आदर्श और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते रहे जैसा बनने की वे खुद भी कामना और कोशिश करते थे। पौलुस का मामला परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से हरेक के लिए एक चेतावनी है। खासकर जब परमेश्वर का अनुसरण करने वाले हम लोग अपने कर्तव्यों में और परमेश्वर की सेवा करते हुए कष्ट उठा सकते हैं और मूल्य चुका सकते हैं, हमें लगता है कि हम परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं और उससे प्रेम करते हैं, ऐसी घड़ी में हमें आत्म-चिंतन करना चाहिए और खासकर अपने चुने हुए रास्ते के संबंध में खुद को समझना चाहिए, जो कि बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम जिसे अच्छा समझते हो उसी को तुम सही मानोगे, और तुम इस पर संदेह नहीं करोगे, इस पर चिंतन-मनन नहीं करोगे, और यह विश्लेषण नहीं करोगे कि क्या इसमें कुछ ऐसा है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को बेहद दयालु मानते हैं। वे कभी दूसरों से नफरत या उनका नुकसान नहीं करते, और वे हमेशा ऐसे भाई या बहन की मदद करते हैं जिनका परिवार जरूरतमंद होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि उनकी समस्या अनसुलझी रह जाए; उनके पास बहुत सद्भावना है, और वे हर किसी की मदद करने की भरसक कोशिश करते हैं। फिर भी वे कभी सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, और उनका कोई जीवन-प्रवेश नहीं होता। ऐसी मदद का परिणाम क्या है? उन्होंने अपने जीवन को रोक रखा है, फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न हैं, और उस सबसे बेहद संतुष्ट हैं जो उन्होंने किया है। इतना ही नहीं, वे इसमें बहुत गर्व का अनुभव करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो सत्य के विरुद्ध हो, और यह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों को पूरा करेगा, और वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हैं। वे अपनी स्वाभाविक दयालुता को पूँजी के रूप में देखते हैं और जैसे ही वे ऐसा करते हैं, वे इसे सत्य मानकर चलते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मानवीय भलाई है। वे सत्य का जरा भी अभ्यास नहीं करते, क्योंकि वे यह मनुष्य के सामने करते हैं, परमेश्वर के सामने नहीं, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास तो बिल्कुल भी नहीं करते। इसलिए, उनका सब किया-धरा व्यर्थ हो जाता है। उनका कोई भी कार्य सत्य या परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं है, वे उसकी इच्छा का पालन तो बिल्कुल भी नहीं है; बल्कि वे मानवीय दया और अच्छे व्यवहार का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करते हैं। संक्षेप में, वे अपने कार्यों में परमेश्वर के इरादे नहीं खोजते, न ही वे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हैं। परमेश्वर मनुष्य के ऐसे अच्छे व्यवहार को स्वीकृति नहीं देता; परमेश्वर के लिए यह निंदनीय है, और परमेश्वर द्वारा स्मरण किए जाने योग्य नहीं है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 565

स्वभाव में बदलाव लाने की कुंजी अपनी प्रकृति को जानना है और यह परमेश्वर के प्रकाशन के अनुसार ही होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों में ही व्यक्ति अपनी घिनौनी प्रकृति, अपनी प्रकृति के भीतर छिपे शैतान के विभिन्न विषों, अपनी मूर्खता और अज्ञानता, और अपनी प्रकृति के कमजोर और नकारात्मक तत्वों को जान सकता है। इन बातों को तुम्हारे पूरी तरह से जानने के बाद, और तुम्हारे सच में खुद से नफरत करने, देह से विद्रोह करने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में लगे रहने, स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य के अनुसरण में लगे रहने और सच में परमेश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्ति बनने में सक्षम हो जाने के बाद, तुम पतरस के मार्ग पर चल पड़ते हो। परमेश्वर के अनुग्रह या पवित्रात्मा से मिलने वाले प्रबोधन और मार्गदर्शन के बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि सत्य के बिना, लोग खुद से विद्रोह नहीं कर सकते। पतरस के पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना मुख्य रूप से संकल्प रखने, आस्था रखने और परमेश्वर पर निर्भर रहने पर निर्भर करता है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्रात्मा के कार्य के प्रति समर्पण करना चाहिए और सभी चीजों में, परमेश्वर के वचनों से कभी भी भटकना नहीं चाहिए। ये वे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनका कभी भी उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। अपने अनुभवों के दौरान, खुद को जानना बहुत मुश्किल होता है और पवित्रात्मा के कार्य के बिना, कोई परिणाम नहीं मिलेगा। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को खुद को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पौलुस का मार्ग जीवन का अनुसरण करने या आत्म-ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं था, बल्कि काम करने पर और किए गए काम की भव्यता और प्रतिष्ठा पर विशेष ध्यान देने का मार्ग था। उसका इरादा अपने काम और कष्ट के बदले में परमेश्वर के आशीष और पुरस्कार पाने का था। यह इरादा गलत था। पौलुस ने जीवन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, न ही उसने अपने स्वभाव के बदलाव को कोई महत्व दिया। उसने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। जिस लक्ष्य का उसने अनुसरण किया, वह गलत था; स्वाभाविक रूप से, फिर जिस मार्ग पर वह चला, वह भी गलत था। यह उसकी घमंडी और दंभी प्रकृति के कारण हुआ। स्पष्ट रूप से, पौलुस में जरा भी सत्य नहीं था, न ही उसमें कोई जमीर या विवेक था। लोगों को बचाने और बदलने में, परमेश्वर मुख्य रूप से उनके स्वभाव को बदलता है। परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाना है और लोगों को उसे जानने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम बनाना है और एक सामान्य तरीके से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाना है। यही परमेश्वर के वचनों और कार्य का उद्देश्य है। पौलुस का अनुसरण करने का तरीका सीधे तौर पर परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध और उनके साथ टकराव में था। यह पूरी तरह से उनके विपरीत था। हालाँकि, पतरस का अनुसरण करने का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था। पतरस ने जीवन पर और स्वभाव में बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया, जो कि वास्तव में वही है जो परमेश्वर अपने कार्य से लोगों में पूरा करना चाहता है। इसलिए, पतरस का मार्ग परमेश्वर द्वारा धन्य और स्वीकृत था, जबकि पौलुस का मार्ग ठीक वही था जिससे परमेश्वर घृणा करता था और जिसे शाप देता था क्योंकि वह उसके इरादों के विपरीत था। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को परमेश्वर के इरादों को जानना होगा। वे किस मार्ग का अनुसरण करें, इसकी सटीक समझ उन्हें तभी हो सकती है जब वे उसके वचनों के माध्यम से परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह से समझने में सक्षम हों—जिसका अर्थ यह समझना है कि परमेश्वर इंसान में क्या पूरा करना चाहता है और अंततः, वह किस तरह के परिणाम हासिल करना चाहता है। अगर तुम पतरस का मार्ग पूरी तरह से नहीं समझते और केवल उसका अनुगमन करना चाहते हो, तो तुम उस पर चल नहीं पाओगे। दूसरे शब्दों में, तुम बहुत सारे धर्म-सिद्धांत जान सकते हो, लेकिन अंततः, तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे। भले ही तुम थोड़ा-बहुत सतही प्रवेश पा भी लो, तुम कोई वास्तविक परिणाम हासिल नहीं कर पाओगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 566

अधिकतर लोगों को अपनी बहुत सतही समझ होती है। वे अपनी प्रकृति के भीतर की चीजों को बिल्कुल भी साफ तौर पर नहीं जानते। उन्हें अपने द्वारा प्रकट की जाने वाली कुछ भ्रष्ट दशाओं, अपने द्वारा संभावित रूप से की जाने वाली चीजों और अपनी कमियों की जानकारी होती है और इससे उन्हें लगता है कि वे खुद को जानते हैं। फिर अगर वे कुछ विनियमों का पालन कर लेते हैं, यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि वे कुछ क्षेत्रों में गलतियाँ न करें, और कुछ अपराध करने से बच जाते हैं, तो वे सोचने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में वास्तविकता है और मान लेते हैं कि वे बचा लिए जाएँगे। यह सिर्फ इंसानी कल्पना है, और कुछ नहीं। अगर तुम उन चीजों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में अपराध करने से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में कोई बदलाव प्राप्त कर लिया होगा? क्या तुमने सच में एक मानव के स्वरूप को जी लिया होगा? क्या तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं। यह निश्चित है। लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने का एक ऊँचा मानक रखना चाहिए : सत्य प्राप्त करना और अपने जीवन स्वभाव में कुछ बदलाव लाना। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि लोग खुद को जानने की कोशिश करें। अगर किसी व्यक्ति का खुद के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो इससे कोई भी समस्या कतई हल नहीं होगी और उसका जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलेगा। तुम्हें खुद को बहुत गहराई से जानना होगा। इसका मतलब है अपनी प्रकृति को जानना, यह जानना कि उसमें कौन-से तत्व शामिल हैं, ये चीजें कहाँ से पैदा होती हैं और कहाँ से आती हैं। इसके अलावा, क्या तुम सच में इन चीजों से नफरत करने में समर्थ हो? क्या तुमने अपनी बदसूरत आत्मा और अपनी दुष्ट प्रकृति को देखा है? अगर तुम सच में अपनी सच्चाई देख लो, तो तुम खुद से नफरत करने लगोगे। जब तुम खुद से नफरत करते हो और फिर परमेश्वर के वचनों पर अमल करने की कोशिश करते हो, तो तुम देह से विद्रोह कर पाओगे और सत्य का अभ्यास करने की ताकत पा लोगे, और तब यह संघर्ष जैसा महसूस नहीं होगा। कई लोग अपनी दैहिक पसंद के अनुसार काम क्यों करते हैं? क्योंकि वे खुद को काफी अच्छा समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके काम काफी उचित और जायज हैं, उनमें कोई कमी नहीं है और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं और इसलिए वे पूरी आत्म-निश्चितता से काम करते हैं। जब वे सच में जान लेंगे कि उनकी प्रकृति कैसी है—यह कितनी बदसूरत, घिनौनी और दयनीय है—तो वे खुद को इतना बड़ा समझना और इतना घमंड करना बंद कर देंगे और वे खुद से इतने खुश नहीं रहेंगे। वे सोचेंगे, “मुझे जमीन से जुड़े रहकर परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। वरना, मैं मानव होने के मानक पर खरा नहीं उतरूँगा और परमेश्वर के सामने जीने में मुझे शर्म आएगी।” वे सच में खुद को छोटा और नितांत तुच्छ समझेंगे। इस मुकाम पर, उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान हो जाएगा और वे कुछ-कुछ वैसे दिखने लगेंगे जैसा एक इंसान को दिखना चाहिए। जब कोई व्यक्ति सच में खुद से नफरत करता है, केवल तभी वह देह से विद्रोह कर पाता है। अगर वह खुद से नफरत नहीं करता, तो वह देह से विद्रोह नहीं कर पाएगा। खुद से सचमुच नफरत करना कोई आसान मामला नहीं है। ऐसा करने के लिए, एक व्यक्ति में कई चीजें होनी चाहिए। सबसे पहले, व्यक्ति को अपनी प्रकृति का ज्ञान होना चाहिए। दूसरे, उसे यह देखना चाहिए कि वह दीन-हीन और दयनीय है, वह अत्यंत छोटा और तुच्छ है, और उसे अपनी दयनीय, गंदी आत्मा को देखना चाहिए। जब वह पूरी तरह से देख लेता है कि वह असल में क्या है—जब यह नतीजा हासिल हो जाता है—तो उसे सच में खुद का ज्ञान मिलता है और तब कहा जा सकता है कि खुद के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल सटीक है। केवल इस मुकाम पर वह खुद से नफरत कर सकता है, यहाँ तक कि खुद को कोस सकता है और सच में यह महसूस कर सकता है कि शैतान ने इंसानों को इतनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है कि उनमें मानवता का कोई स्वरूप ही नहीं बचा है। एक दिन, अगर उस पर सच में मौत का खतरा मँडराएगा, तो वह सोचेगा, “यह परमेश्वर का धार्मिक दंड है। परमेश्वर सच में धार्मिक है। मैं मरने के ही लायक हूँ!” इस मुकाम पर, वह अपनी कोई शिकायत व्यक्त नहीं करेगा, परमेश्वर की शिकायत करने की तो बात ही दूर है—वह सिर्फ यह महसूस करेगा कि वह अत्यंत दीन-हीन, दयनीय, गंदा और भ्रष्ट है और उसे परमेश्वर द्वारा हटाकर नष्ट कर दिया जाना चाहिए और वह महसूस करेगा कि उसकी जैसी आत्मा इस धरती पर जीने के लायक नहीं है। इसलिए, वह परमेश्वर की शिकायत या उसका प्रतिरोध नहीं करेगा और उसे धोखा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन अगर वह खुद को नहीं जानता और अब भी खुद को काफी अच्छा समझता है, तो जब मौत का खतरा करीब आएगा, तो वह सोचेगा, “मैंने अपनी आस्था में बहुत अच्छा किया है। मैंने इतनी मेहनत से सत्य का अनुसरण किया है, इतना कुछ त्यागा है और इतने कष्ट सहे हैं, लेकिन आखिर में, परमेश्वर मुझे मरने दे रहा है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है। वह मुझे क्यों मरने दे रहा है? अगर मुझ जैसा इंसान भी मरेगा, तो फिर कौन बचेगा? क्या पूरी मानव जाति का अंत नहीं हो गया?” सबसे पहले, उसके मन में परमेश्वर को लेकर धारणाएँ बनेंगी। दूसरे, वह परमेश्वर की शिकायत करेगा और उसमें जरा भी समर्पण नहीं होगा। वह बिल्कुल पौलुस की तरह है, जो मरते दम तक खुद को नहीं जान पाया। जब परमेश्वर का दंड उन पर आएगा, तब बहुत देर हो चुकी होगी।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 567

सटीक रूप से, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। पहले तो, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित प्रयासों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीजों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसकी आकांक्षाओं की खोज पर अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचन के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यतः परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसके आकांक्षाओं की खोज करना, परमेश्वर के इरादों को समझने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना व और अधिक प्राप्त करना शामिल है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था। इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर के इरादों को समझने पर, साथ ही परमेश्वर के स्वभाव और सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य के प्रकृति सार तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए आसानी से, उसकी अपेक्षाएँ पूरी कीं। पतरस के पास ऐसे बहुत-से सही अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे। यह परमेश्वर के इरादों के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्तम तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर के भेजे हुए सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय पतरस परमेश्वर के न्याय और उजागर करने के हर वचन और मनुष्य से उसकी माँगों के हर वचन से सख्ती से अपना मिलान करता था, स्वयं को जाँचता था और परमेश्वर के वचनों का अर्थ ठीक-ठीक जानने का प्रयास करता था। यीशु उससे जो कुछ कहता था, उस पर वह गंभीरता से मनन करता था, हर वचन को मन में दृढ़ता से धारण करता था—और इस तरीके से बहुत अच्छे परिणाम मिलते थे। इस तरीके से अभ्यास कर उसने परमेश्वर के वचनों के जरिए स्वयं को जान लिया और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और कमियों को जान गया, बल्कि वह मनुष्य के सार और प्रकृति को भी जान गया। यह दर्शाता है कि पतरस सच में स्वयं को जानता था। परमेश्वर के वचनों से पतरस ने एक ओर अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल किया और दूसरी ओर उसने देखा परमेश्वर द्वारा व्यक्त धार्मिक स्वभाव, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, परमेश्वर के अपने कार्य के लिए इरादे और मानवजाति से परमेश्वर की माँगें। इन वचनों से उसने परमेश्वर को सच में जाना, उसका स्वभाव और उसका सार उसे पता चला; परमेश्वर के पास जो है, जो वह स्वयं है, वे बातें उसने जानीं और समझीं, साथ ही परमेश्वर की मनोहरता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें भी जानीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज थी। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरा; उसका कष्ट सहना व्यर्थ नहीं गया। न केवल उसने परमेश्वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को जाना बल्कि उसने परमेश्वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, परमेश्वर के वचनों में पतरस ने विशेष रूप से मनुष्य से परमेश्वर की माँगों पर और उन पहलुओं पर ध्यान दिया जिनमें मनुष्य को परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर के इरादे के अनुरूप हो सके, और वह इन बातों में अत्यधिक प्रयास लगाने में समर्थ रहा और उनमें उसे पूरी स्पष्टता प्राप्त हुई। उसके जीवन प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्वर के वचनों का चाहे कोई भी पहलू हो जब तक वे वचन जीवन के रूप में कार्य करने योग्य थे और सत्य थे, तो पतरस ने उन्हें अपने हृदय में उकेर लिया, जहाँ वह अक्सर उन पर विचार करता और उन्हें समझता था। यीशु के वचनों को सुनकर, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों पर ही था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिए। अर्थात्, वह परमेश्वर के वचनों को कुशलतापूर्वक अभ्यास में ला सका, वह सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य सही ढंग से कर सका, वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य कर सका और अपने निजी मतों और कल्पनाओं का त्याग कर सका। इस तरीके से पतरस ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया। पतरस की सेवा परमेश्वर के इरादों के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो पाई क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने शब्दों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों ने उन पर पूरी तरह से प्रभाव प्राप्त कर लिया है, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, केवल तभी वे नए लोग बनेंगे। अगर परमेश्वर के वचन लोगों का जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, उसका प्रकाशन और मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, और मानव जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, लोगों का जीवन बन जाते हैं, अगर लोग इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया। यह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग है। पतरस परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बना, उसने परमेश्वर के वचनों से जीवन प्राप्त किया, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 568

जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को समझ नहीं लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन अधार्मिक चीजों से प्यार क्यों करते हो? ऐसी बुरी चीजें तुम्हें अच्छी क्यों लगती हैं? ऐसी चीजों को पसंद करने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें स्वीकार कर इतने खुश क्यों हो? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान का जहर है। तो शैतान का जहर क्या है? इसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, “लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसके लिए जीना चाहिए?” तो लोग जवाब देंगे, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वे ऐसा बस अपने लिए करते हैं, और इसलिए वे केवल अपने लिए जीते हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए”—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पहले ही भ्रष्ट इंसान के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जीया है। शैतान का हर काम अपनी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और उद्देश्यों के लिए होता है। वह परमेश्वर से आगे जाना चाहता है, परमेश्वर से मुक्त होना चाहता है, और परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीजों पर नियंत्रण पाना चाहता है। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं : उन सभी की प्रकृति शैतानी है, वे सभी परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने की कोशिश करते हैं, और वे अपने भाग्य पर अपना नियंत्रण चाहते हैं और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का विरोध करने की कोशिश करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ बिल्कुल शैतान की महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं जैसी हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, बहुत-से लोगों के नीति-वाक्य और सूक्तियाँ मानव प्रकृति को दर्शाती और इंसानी भ्रष्टता के सार को प्रतिबिंबित करती हैं। लोग जो कुछ भी चुनते हैं, वह उनकी अपनी पसंद होती है और वह लोगों के स्वभाव और प्रयासों का प्रतिनिधित्व करता है। इंसान जो कुछ कहता और करता है, उसका भेष कितना भी बदला हुआ क्यों न हो, वह उसकी प्रकृति नहीं छिपा सकता। जैसे, फरीसी आमतौर पर बहुत अच्छा उपदेश देते थे, लेकिन जब उन्होंने यीशु द्वारा व्यक्त उपदेश और सत्य सुने, तो उन्हें स्वीकारने के बजाय उनकी निंदा करने लगे। इसने फरीसियों की सत्य से विमुख होने और घृणा करने वाले प्रकृति सार को उजागर कर दिया। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं और खुद को बहुत अच्छे से छिपा लेते हैं, लेकिन जब अन्य लोग कुछ समय के लिए उनसे जुड़ते हैं, तो वे जान जाते हैं कि उस व्यक्ति की प्रकृति बेहद धोखेबाज और कपटपूर्ण है। लंबे समय तक उनके साथ जुड़ने के बाद, सभी को उनके प्रकृति सार का पता चल जाता है। अंत में, अन्य लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं : वे कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते और वे धोखेबाज हैं। यह कथन उन लोगों की प्रकृति को दर्शाता है और यह उनके प्रकृति सार का सर्वोत्तम चित्रण और सबूत है। सांसारिक आचरण का उनका फलसफा है किसी को सच न बताना, और साथ ही किसी पर विश्वास न करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में शैतानी फलसफों और विषों से युक्त है। कभी-कभी तुम स्वयं ही उनके बारे में अवगत नहीं होते और उन्हें नहीं समझते; फिर भी तुम्हारे जीवन का हर पल इन चीजों पर आधारित है। इसके अलावा तुम्हें लगता है कि ये चीजें बहुत सही और तर्कसम्मत हैं, और बिल्कुल भी गलत नहीं हैं। यह, यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि शैतान के फलसफे लोगों की प्रकृति बन गए हैं और वे पूरी तरह से उनके अनुसार जी रहे हैं, इस तरह से जीने को अच्छा मानते हैं और उनमें जरा-सा भी पश्चात्ताप का भाव नहीं होता। इसलिए, वे लगातार अपनी शैतानी प्रकृति प्रकट कर रहे हैं और वे निरंतर शैतानी फलसफे के अनुसार जीवन जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है, और वह मनुष्य का प्रकृति सार है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 569

तुम लोगों को अब स्वयं द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभाव का थोड़ा-बहुत भेद पहचानने को मिला है। जब तुम्हें यह स्पष्टता से समझ आ जाता है कि तुम अब भी नियमित रूप से कौन-सी भ्रष्ट चीजें प्रकट कर सकते हो और संभावित रूप से ऐसी कौन-सी चीजें कर सकते हो जो सत्य के विपरीत हैं, तब अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करना आसान हो जाएगा। क्यों, कई मामलों में, लोग खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते? क्योंकि हर समय, और हर तरह से, वे अपने भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में होते हैं, जो उन्हें सभी चीजों में विवश और परेशान करते हैं। जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, और वे लड़खड़ाते नहीं या नकारात्मक नहीं होते, तो कुछ लोग हमेशा यह महसूस करते हैं कि उनके पास आध्यात्मिक कद है, और जब किसी कुकर्मी, झूठे अगुआ या किसी मसीह-विरोधी का खुलासा कर उसे निकाला जाता है, तो यह देखकर वे इसे कोई गंभीर बात नहीं मानते। वे सभी के सामने यह शेखी भी बघारते हैं कि, “कोई भी लड़खड़ा सकता है, लेकिन मैं नहीं। हो सकता है कि कोई और परमेश्वर से प्रेम न करे, लेकिन मैं करता हूँ।” उन्हें लगता है कि वे किसी भी स्थिति या हालात में अपनी गवाही पर अडिग रह सकते हैं। और नतीजा क्या होता है? एक दिन आता है जब उनका परीक्षण किया जाता है और वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करते और कुड़कुड़ाते हैं। क्या यह विफल होना नहीं है, क्या यह लड़खड़ाना नहीं है? कोई चीज ऐसी नहीं है जो परीक्षणों की तुलना में लोगों का अधिक खुलासा करती हो। परमेश्वर इंसान के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है, और लोगों को किसी भी समय डींग नहीं मारनी चाहिए। वे जिस चीज के बारे में डींग मारते हैं, वहीं देर-सबेर, एक दिन वे लड़खड़ाएँगे। दूसरों को लड़खड़ाते और किसी परिस्थिति में असफल होते देखकर वे इसे कोई गंभीर बात नहीं मानते, और यहाँ तक सोचते हैं कि वे खुद कुछ गलत नहीं कर सकते, कि वे मजबूती से खड़े हो सकेंगे—लेकिन उस परिस्थिति में वे खुद भी लड़खड़ा जाते और असफल हो जाते हैं। यह कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग अपने प्रकृति सार को पूरी तरह से नहीं समझते; अपने प्रकृति सार की समस्याओं के बारे में उनके ज्ञान की गहराई अभी भी अपर्याप्त है, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाना उनके लिए बहुत कठिन है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत धोखेबाज होते हैं, और अपनी कथनी-करनी में बेईमान होते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे पूछो कि उनका भ्रष्ट स्वभाव किस संबंध में सबसे गंभीर है, तो वे कहेंगे, “मैं थोड़ा धोखेबाज हूँ।” वे केवल इतना कहते हैं कि वे थोड़े धोखेबाज हैं, लेकिन वे यह नहीं कहते कि उनकी प्रकृति ही धोखा देने की है, और वे यह नहीं कहते कि वे धोखेबाज हैं। अपनी भ्रष्ट अवस्था के बारे में उनका ज्ञान उतना गहरा नहीं होता, और वे उसे न तो उतनी गंभीरता से देखते हैं और न ही उतनी पूरी तरह से, जितनी गंभीरता और पूरी तरह से दूसरे देखते हैं। दूसरे लोगों के परिप्रेक्ष्य से, यह व्यक्ति बहुत धोखेबाज और बहुत कुटिल है, और उसके हर शब्द में चाल है, उसकी बातें और कार्य कभी ईमानदार नहीं होते—लेकिन वह व्यक्ति खुद को इतनी गहराई से नहीं जान पाता। उसके पास जो भी ज्ञान होता है, वह केवल सतही होता है। जब भी वह बोलता और कार्य करता है, तो वह अपनी प्रकृति का कुछ भाग प्रकट करता है, लेकिन वह इससे अनजान होता है। वह मानता है कि उसका इस तरह से कार्य करना भ्रष्टता का खुलासा करना नहीं है, उसे लगता है कि वह पहले ही सत्य को अभ्यास में ला चुका है—लेकिन देखने वालों के लिए, यह व्यक्ति बहुत कुटिल और धोखेबाज है, उसकी बातें और काम बेईमानी से भरे हैं। कहने का अर्थ यह है कि लोगों को अपनी प्रकृति की बहुत सतही समझ होती है, और उनकी इस समझ तथा परमेश्वर के उन वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है, जो उनका न्याय कर उन्हें उजागर करते हैं। परमेश्वर जो उजागर करता है उसमें कोई गलती नहीं है, बल्कि इंसान अपनी ही प्रकृति को भली-भाँति गहराई से नहीं समझता। लोगों को स्वयं की मौलिक या सारभूत समझ नहीं है; इसके बजाय, वे अपने कार्यों और बाहरी खुलासों को जानने पर ध्यान केंद्रित करते और अपनी ऊर्जा लगाते हैं। भले ही कुछ लोग कभी कभार अपने आत्मज्ञान के बारे में कुछ कहने में समर्थ हों, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि कोई एक काम करने या कोई चीज प्रकट करने के कारण वह एक निश्चित प्रकार का व्यक्ति है या उसकी एक निश्चित प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को उजागर कर दिया है, लेकिन लोग समझते हैं कि उनके चीजों को करने के तरीके और बोलने के तरीके दोषपूर्ण और खराब हैं; नतीजतन, उनके लिए सत्य को अभ्यास में लाना अपेक्षाकृत अधिक मेहनत का काम होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस लापरवाही से प्रकट क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, न कि उनकी प्रकृति के खुलासे हैं। जब लोग इस तरह से सोचते हैं, तो उनके लिए स्वयं को वास्तव में जानना बहुत कठिन हो जाता है, और उनके लिए सत्य को समझना और उसका अभ्यास करना बहुत कठिन हो जाता है। चूँकि वे सत्य को नहीं जानते और उसके लिए उनमें प्यास नहीं होती, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाते समय वे केवल अनमने ढंग से विनियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृति को बहुत बुरा नहीं मानते हैं, और उन्हें नहीं लगता कि वह इतनी बुरी है कि उसे नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन परमेश्वर के मानकों के अनुसार, लोग अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं, वे अभी भी उद्धार के मानकों से दूर हैं, क्योंकि लोगों के पास केवल कुछ तरीके हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन करते नहीं प्रतीत होते, जबकि वस्तुतः वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते।

लोगों के व्यवहार या आचरण में बदलाव का अर्थ उनकी प्रकृति में बदलाव नहीं है। इसका कारण यह है कि लोगों के आचरण में बदलाव मौलिक रूप से उनके मूल स्वरूप को नहीं बदल सकते, उनकी प्रकृति को तो वे बिल्कुल भी नहीं बदल सकते। केवल जब लोग सत्य समझते हैं, अपने प्रकृति सार को जानते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं, तभी उनका अभ्यास पर्याप्त रूप से गहरा, और कुछ तय विनियमों का पालन करने से भिन्न हो सकता है। आज जिस तरह से लोग सत्य का अभ्यास करते हैं वह अभी भी मानक स्तर पर नहीं पहुँचा है और यह वह सब पूरी तरह हासिल नहीं कर सकता जिसकी माँग सत्य करता है। लोग केवल सत्य के एक अंश का अभ्यास करते हैं, और केवल कुछ विशेष अवस्थाओं और परिस्थितियों में होने पर ही थोड़ा-सा सत्य अभ्यास में ला सकते हैं; ऐसा नहीं है कि वे सभी हालातों और परिस्थितियों में सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। जब किसी अवसर पर व्यक्ति खुश होता है और उसकी अवस्था अच्छी होती है, या जब वह दूसरों के साथ सहभागिता कर रहा होता है और उसके दिल में अभ्यास करने का एक मार्ग होता है, तो वह अस्थायी रूप से कुछ ऐसे काम करने में सक्षम होता है जो सत्य के अनुरूप होते हैं। लेकिन जब वह ऐसे लोगों के साथ रहता है, जो नकारात्मक होते हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते, और वह इन लोगों से प्रभावित हो जाता है, तो वह अपने हृदय में अपना मार्ग खो देता है और सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हो जाता है। इससे पता चलता है कि उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, और वह अभी भी वास्तव में सत्य को नहीं समझता। कुछ इंसान ऐसे होते हैं, जो सही लोगों द्वारा मार्गदर्शन और अगुआई किए जाने पर सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं; लेकिन किसी झूठे अगुआ या मसीह-विरोधी से गुमराह और जिनके द्वारा बाधा डाली जाती है, ऐसे हालात में वे न केवल सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि यह भी संभावना होती है कि वे गुमराह होकर उन्हीं लोगों का अनुसरण भी करने लगें। ऐसे लोग अभी भी खतरे में हैं, है न? ऐसे लोग, इस तरह के आध्यात्मिक कद के साथ, सभी मामलों और स्थितियों में सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो ही नहीं सकते। अगर वे सत्य का अभ्यास करते भी हैं, तो यह केवल तभी होगा जब वे अच्छे मूड में हों या दूसरों द्वारा उनका मार्गदर्शन किया जाए; किसी अच्छे इंसान द्वारा उनकी अगुआई न किए जाने पर, वे कभी-कभार ऐसी चीजें कर सकते हैं जो सत्य का उल्लंघन करती हैं, और वे परमेश्वर के वचनों से भटक जाएँगे। और यह क्यों होता है? यह इस वजह से होता है, क्योंकि तुम केवल अपनी कुछ ही अवस्थाएँ जान पाए हो, और तुम्हें अपने प्रकृति सार का ज्ञान नहीं है, और तुम्हें अभी देह से विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने वाला आध्यात्मिक कद प्राप्त करना है; इसलिए भविष्य में तुम क्या करोगे, इस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है, और तुम इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि तुम किसी भी स्थिति या परीक्षण में दृढ़ रह सकोगे। कई बार तुम ऐसी अवस्था में होते हो कि तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो और ऐसा लगता है कि तुम कुछ बदल गए हो, लेकिन फिर भी, एक भिन्न परिस्थिति में तुम सत्य को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हो। यह कुछ ऐसा है जो तुम्हारे नियंत्रण से परे होता है। कभी तुम सत्य का अभ्यास कर पाते हो, और कभी तुम नहीं कर पाते। किसी क्षण, तुम समझते हो, और अगले ही क्षण तुम भ्रमित हो जाते हो। वर्तमान में, तुम कुछ बुरा नहीं कर रहे, लेकिन शायद कुछ ही देर में करोगे। इससे साबित होता है कि भ्रष्ट चीजें अभी भी तुम्हारे भीतर मौजूद हैं, और यदि तुम सचमुच खुद को नहीं जान पाते, तो इन चीजों का समाधान करना आसान नहीं होगा। यदि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव की पूरी समझ हासिल नहीं कर पाते, और अंततः उन चीजों को करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, तो तुम खतरे में हो। यदि तुम अपनी प्रकृति की असलियत समझ सकते हो और उससे नफरत कर सकते हो, तो तुम अपने आपको नियंत्रित करने, अपने आपसे विद्रोह करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 570

सत्य की स्पष्ट रूप से संगति करने का उद्देश्य लोगों को सत्य को समझने और उसका अभ्यास करने और अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम बनाना है। यह सत्य को समझने के बाद उनके दिलों में रोशनी और थोड़ी-सी खुशी लाना भर नहीं है। अगर तुम सत्य को समझते हो लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करते हो तो सत्य के बारे में संगति करने और उसे समझने की सार्थकता खो जाती है। जब लोग सत्य को समझते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं लाते तो क्या समस्या है? यह इस बात का प्रमाण है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, कि वे अपने हृदय में सत्य को स्वीकार नहीं करते, ऐसे में वे परमेश्वर के आशीषों से और उद्धार के अवसर से चूक जाएँगे। जब यह बात आती है कि क्या लोग उद्धार हासिल करने में सक्षम हैं तो इसमें यह महत्वपूर्ण है कि क्या वे सत्य को स्वीकार और उसका अभ्यास करने में सक्षम हैं। अगर तुम उन सत्यों को अभ्यास में लाते हो जिन्हें तुम समझते हो तो तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता, रोशनी और मार्गदर्शन प्राप्त करोगे और तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे, सत्य की गहरी समझ प्राप्त कर लोगे और आखिरकार सत्य और परमेश्वर का उद्धार हासिल कर लोगे। कुछ लोग सत्य का अभ्यास करने में अक्षम होते हैं, वे हमेशा शिकायत करते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें प्रबुद्ध या रोशन नहीं करता, कि परमेश्वर उन्हें शक्ति नहीं देता। यह गलत है; यह परमेश्वर को गलत समझना है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी लोगों के सहयोग की नींव पर निर्मित होती है। लोगों के पास एक सच्चा दिल होना चाहिए और उन्हें सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक होना चाहिए, और चाहे उनकी समझ गहरी हो या सतही, उन्हें सत्य को अभ्यास में लाने में अवश्य ही सक्षम होना चाहिए। तभी वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाएँगे। अगर लोग सत्य को समझते हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं लाते और केवल यह प्रतीक्षा करते हैं कि पवित्र आत्मा कार्य करे और उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करे तो क्या वे अत्यधिक निष्क्रिय नहीं हो रहे हैं? परमेश्वर लोगों को कुछ करने के लिए कभी बाध्य नहीं करता। अगर लोग सत्य को समझते हैं लेकिन उसे अभ्यास में लाने के इच्छुक नहीं हैं तो यह दर्शाता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते या उनकी दशा असामान्य है और उन्हें कोई चीज बाधित कर रही है। लेकिन अगर लोग परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हैं तो परमेश्वर भी कार्य करेगा; असली चिंता यह है कि अगर वे सत्य का अभ्यास करने के अनिच्छुक हैं और परमेश्वर से प्रार्थना भी नहीं करते हैं तो पवित्र आत्मा के पास उनमें कार्य करने का कोई उपाय नहीं होता है। वास्तव में, लोगों को चाहे किसी भी प्रकार की कठिनाई हो, इसका हमेशा समाधान किया जा सकता है; मुख्य बात यही है कि वे सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हैं कि नहीं। अब तुम लोगों में भ्रष्टता की समस्याएँ कैंसर नहीं हैं, वे लाइलाज बीमारियाँ नहीं हैं। अगर तुम लोग सत्य का अभ्यास करने का संकल्प ले सकते हो तो तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करोगे और इन भ्रष्ट स्वभावों को बदलना संभव होगा। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम सत्य का अभ्यास करने का संकल्प ले सकते हो—यही मुख्य बात है। अगर तुम सत्य का अभ्यास करते हो और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलते हो तो तब तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर लोगे और निश्चित रूप से बचाए जा सकते हो। अगर तुम जिस मार्ग पर चलते हो वह गलत है तो तुम पवित्र आत्मा का कार्य खो दोगे; एक गलत कदम दूसरे गलत कदम की ओर ले जाएगा और तुम्हारे लिए सब खत्म हो जाएगा और चाहे तुम कितने ही वर्षों तक विश्वास करते रहो, तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर पाओगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जब काम कर रहे होते हैं तो वे इस बारे में कभी नहीं सोचते कि काम उस तरह कैसे किया जाए जिससे परमेश्वर के घर के कार्य को लाभ हो और जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो। नतीजतन वे बहुत सी ऐसी चीजें करते हैं जो स्वार्थपूर्ण और नीचतापूर्ण होती हैं, वे परमेश्वर का विकर्षण और घृणा प्राप्त करते हैं और इसलिए वे प्रकट कर दिए और हटा दिए जाते हैं। अगर लोग सभी चीजों में सत्य खोजने और सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाते हैं तो फिर उन्होंने पहले ही परमेश्वर पर आस्था के सही मार्ग पर प्रवेश लिया होता है और इसलिए उनके पास परमेश्वर के इरादों के अनुरूप इंसान बनने की आशा होती है। कुछ लोग सत्य को समझते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं लाते हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि सत्य कोई बड़ी चीज नहीं है और यह उनकी अपनी मरजी और भ्रष्ट स्वभावों की समस्या का समाधान करने में असमर्थ है। क्या ऐसे लोग वास्तव में हँसी के पात्र नहीं हैं? क्या वे अत्यंत बेहूदे नहीं होते हैं? क्या वे खुद को बहुत ही चतुर नहीं समझते? अगर लोग सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हैं तो तब उनके भ्रष्ट स्वभाव बदल सकते हैं। अगर परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास और सेवा उनके अपने स्वाभाविक व्यक्तित्व के अनुसार है तो उनमें से एक भी अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी गलत पसंदगियों के कारण होने वाली चिंता में दिन भर फँसे रहते हैं। आसानी से उपलब्ध सत्य उन्हें दिया जाता है तो वे उसकी जाँच नहीं करते या उसे अभ्यास में लाने का प्रयास नहीं करते, बल्कि अपना ही रास्ता चुनने पर जोर देते हैं। यह कार्य करने का कैसा बेहूदा तरीका है! वे सचमुच यह नहीं जानते कि उनके पास जो आशीषें हैं उनका आनंद कैसे लिया जाए; वे पीड़ा सहने के लिए ही जन्मे हैं। सत्य का अभ्यास करना इतना सरल है; तुम अभ्यास करते हो या नहीं, बस यही मायने रखता है। अगर तुम कोई ऐसे इंसान हो जिसके पास सत्य का अभ्यास करने का संकल्प है तो फिर तुम्हारी नकारात्मकता, कमजोरी और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे हल हो जाएँगे और बदल जाएँगे; यह इस पर निर्भर करता है कि तुम्हारा हृदय सत्य से प्रेम करता है कि नहीं, तुम सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हो कि नहीं, सत्य हासिल करने के लिए तुम पीड़ा सह और कीमत चुका सकते हो कि नहीं। अगर तुम सत्य से सचमुच प्रेम करते हो तो इसे हासिल करने के लिए तमाम तरह की पीड़ा सहने में सक्षम होगे—यानी चाहे लोग बदनाम करें, आलोचना करें या अस्वीकार करें, तुम्हें यह सब धैर्य और सहनशीलता के साथ सहन करना चाहिए। परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा और तुम्हारी रक्षा करेगा, वह तुम्हें त्यागेगा नहीं या तुम्हारी उपेक्षा नहीं करेगा—यह पक्का है। अगर तुम परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय से परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर पर निर्भर रहते हो और परमेश्वर की ओर देखते हो तो ऐसी कोई कठिनाई नहीं है जिससे तुम पार न पा सको। हो सकता है तुममें भ्रष्ट स्वभाव हो और तुम अपराध कर बैठो लेकिन अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है और अगर तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर सावधानी से चलते हो तो तुम निर्विवाद रूप से अडिग रहने में सक्षम होगे और निर्विवाद रूप से परमेश्वर द्वारा तुम्हारी अगुआई और सुरक्षा की जाएगी।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 571

यदि तुम सत्य की समझ प्राप्त करना चाहते हो, तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तुम्हें पता हो कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना-पीना है। अगर तुम परमेश्वर के केवल थोड़े-बहुत वचन पढ़ते हो और उन्हें भी पूरी ईमानदारी से नहीं पढ़ते, मन से उन पर चिंतन नहीं करते, तो तुम सत्य नहीं समझ पाओगे। तब तुम केवल सिद्धांत की थोड़ी-बहुत समझ हासिल कर पाओगे। ऐसे में तुम्हारे लिए परमेश्वर के इरादों और उसके वचनों में छिपे उसके उद्देश्यों को समझना बहुत मुश्किल होगा। अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिन्हें परमेश्वर के वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह जो भी वचन बोलता है, उसमें इतना गंभीर और ईमानदार क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के इरादों या उसके उद्देश्यों को नहीं समझते हो। अगर तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को समझ या उसका अभ्यास कैसे कर सकते हो? सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले परमेश्वर द्वारा कहे जाने वाले हर वचन का अर्थ समझना होगा, फिर इन वचनों को समझकर उन्हें अभ्यास में लाना होगा, जिससे तुम परमेश्वर के वचनों को अपने भीतर जी सको और वे तुम्हारी वास्तविकता बन जाएँ। ऐसा करके तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह अपने आपको धोखा देना है। तुम यह भी नहीं समझते कि परमेश्वर लोगों से सत्य का अभ्यास करने की अपेक्षा क्यों करता है। इससे साबित होता है कि तुम्हें परमेश्वर के इरादों की समझ नहीं है और तुम अभी भी सत्य की समझ नहीं रखते। वास्तव में, परमेश्वर लोगों को शुद्ध करके बचाने के लिए उनसे यह अपेक्षा करता है, ताकि लोग अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागकर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसे जानने वाले बन सकें। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए परमेश्वर चाहता है कि लोग सत्य का अभ्यास करें।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जो सत्य से प्रेम करते हैं, जिनमें सत्य की प्यास है, और जो सत्य खोजते हैं। वे लोग जो शब्दों और धर्म-सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। परमेश्वर के वचनों और सत्य के बारे में उनके दृष्टिकोण गलत हैं, जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करना पसंद करते हैं। वे हमेशा इस बात का अध्ययन करते हैं कि कैसे परमेश्वर के वचन गंतव्य के बारे में या आशीष प्राप्त करने के तरीके के बारे में बात करते हैं। उन्हें ऐसे वचनों में सर्वाधिक रुचि होती है। यदि परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और आशीष पाने की उनकी इच्छा पूरी नहीं करते, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं, फिर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाना नहीं चाहते। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को लेकर गंभीर नहीं हैं; वे बस उन्हीं सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं, जो उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छी चीजें करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंजिल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, वे सत्य का अभ्यास नहीं करेंगे, न उसे प्राप्त करेंगे। कुछ लोग होते हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस लापरवाही से काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालाँकि, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद यह जरूरी नहीं कि कोई सत्य समझ ही ले, और सत्य प्राप्त कर ले। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को हासिल किया है। यदि तुम सत्य का अभ्यास करना या सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना नहीं जानते, तो फिर तुम सत्य वास्तविकता से वंचित रह जाते हो। भले ही तुम अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, लेकिन बाद में तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ पाते, तुम्हें केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही हासिल हो पाते हैं। सत्य समझने के लिए परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएं-पिएँ? सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य का अनुभव करने में भी पूरा जीवन लग जाता है। कुछ वर्षों के अनुभव के बगैर तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? यदि परमेश्वर के वचन पढ़ते हुए, तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो और उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझते जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं, तो क्या इसका यह अर्थ है कि तुम सत्य समझते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते और तुम बिल्कुल नहीं बदले हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। जब तुम्हारे सामने कोई ऐसी चीज आती है जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाती, तो तुम परमेश्वर के प्रति संदेहास्पद रहते हो, तुम उसे समझ नहीं पाते, उससे तर्क करते हो, उसके बारे में धारणाएँ बना लेते हो और गलतफहमियाँ पाल लेते हो, उसका प्रतिरोध और यहाँ तक कि ईशनिंदा करते हो। यह किस तरह का स्वभाव है? यह अहंकार का, सत्य से विमुख हो जाने का स्वभाव है। जो लोग इतने अहंकारी और सत्य से विमुख हुए हों, वे इसे कैसे स्वीकार सकते हैं या कैसे इसका अभ्यास कर सकते हैं? ऐसे लोग कभी भी सत्य या परमेश्वर को प्राप्त नहीं करेंगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 572

यह कहा गया है कि “वह जो अंत तक अनुसरण करता है, उसे निश्चित ही बचाया जाएगा,” लेकिन क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? यह आसान नहीं है, और बड़ा लाल अजगर जिन कई लोगों का पीछा कर सताता है, वे बहुत डरपोक बन जाते हैं परमेश्वर का अनुसरण करने से डरते हैं। उनका पतन क्यों हुआ? क्योंकि उनमें सच्ची आस्था नहीं थी। कुछ लोग सत्य स्वीकार सकते हैं, परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, उस पर निर्भर रह सकते हैं, परीक्षणों और क्लेशों में अडिग रह सकते हैं, कुछ लोग अंत तक अनुसरण नहीं कर पाते। परीक्षणों और क्लेशों के दौरान वे किसी एक मुकाम पर आकर गिर पड़ते हैं, अपनी गवाही गँवा देते हैं और फिर से उठकर चल नहीं पाते। प्रतिदिन होने वाली सभी चीजें, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को डगमगा सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्जा कर सकती हैं या तुम्हें अपने कर्तव्य में बाधित कर सकती हैं और तुम्हें आगे की प्रगति में बाधित कर सकती हैं, उनसे गंभीरता से निपटना जरूरी है और तुम्हें उनकी सावधानीपूर्वक जाँच करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए। ये सारी वो चीजें हैं जिनका जैसे-जैसे तुम अनुभव करते हो, समाधान किया ही जाना चाहिए। कुछ लोग नकारात्मक हो जाते हैं, शिकायत करते हैं और मुश्किलें आने पर अपने कर्तव्य छोड़ देते हैं और प्रत्येक नाकामयाबी के बाद वे रेंगकर वापस अपने पैरों पर उठ खड़े होने में असमर्थ होते हैं। ये सभी लोग मूर्ख हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते और वे जीवन भर की आस्था के बाद भी सत्य को हासिल नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख अंत तक अनुसरण कैसे कर सकते थे? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है, लेकिन तुम उससे कुछ हासिल नहीं करते, तो तुम एक औसत दर्जे के, निकम्मे व्यक्ति हो। तीक्ष्ण और सच्ची काबिलियत वाले जिन लोगों के पास आध्यात्मिक समझ होती है, वे सत्य के खोजी होते हैं; यदि उनके साथ कुछ दस बार घटित होता है, तो शायद उनमें से आठ मामलों में वे कुछ प्रबोधन प्राप्त करने, कुछ सबक सीखने, कुछ सत्य समझने और कुछ प्रगति कर पाने में समर्थ होंगे। जब चीजें दस बार किसी मूर्ख पर पड़ती हैं—किसी ऐसे पर जिसे आध्यात्मिक समझ नहीं होती है—तो इससे एक बार भी उनके जीवन को लाभ नहीं होगा, एक बार भी यह उन्हें नहीं बदलेगा, और न ही एक बार भी यह उनके बदसूरत चेहरे को जानने का कारण बनेगा, और ऐसे में यही उनके लिए अंत है। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर पड़ते हैं, और हर बार जब वे गिर पड़ते हैं, तो उन्हें समर्थन और दिलासा देने के लिए किसी और की जरूरत होती है; बिना सहारे और दिलासे के वे उठ नहीं सकते, और हर बार जब कुछ होता है, तो उन्हें गिरने और पतित होने का खतरा होता है। तो क्या उनके लिए यही अंत नहीं है? क्या ऐसे निकम्मे लोगों के बचाए जाने का कोई और आधार बचा है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जो उनके दिल में सत्य और न्याय के लिए लालायित है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो न्याय, अच्छाई और सत्य के लिए तरसता है और जमीर से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता शुद्ध हो सके, और उनका जीवन स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीजें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या न्याय और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुरी चीजों का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो उन्हें दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य या होने वाली घटनाओं को महसूस करने में सक्षम नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और कोई भी मुसीबत आने पर समस्या का हल ढूँढ़ने के लिए सत्य नहीं खोज पाते हो और लगातार नकारात्मक हो रहे हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास कोई ऐसा गुण नहीं होता जिसके आधार पर उसकी सिफारिश की जाए, जिस पर परमेश्वर काम कर सके। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे न्याय के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे जरा-सी भी प्रतिक्रिया नहीं देते, मानो पहले से ही उनका हृदय मृत हो। क्या उनके लिए खेल खत्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा। यदि, समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करने पर, कोई व्यक्ति पीछे हट जाता है और उनसे बचता है, तो वह सत्य नहीं खोजता, और अपने काम में नकारात्मक और सुस्त होने का चुनाव करता है, फिर उसकी असलियत उजागर कर दी जाती है। ऐसे लोगों के पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं होती। वे मुफ्तखोर और व्यर्थ का बोझ होते हैं, परमेश्वर के घर में बेकार होते हैं और वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके होते हैं। जो लोग समस्याओं के हल के लिए सत्य खोजते हैं, उन्हीं के पास आध्यात्मिक कद होता है और वही लोग दृढ़ता से गवाही दे सकते हैं। जब समस्याएँ और कठिनाइयाँ सामने आएँ तो तुम्हें उनका सामना अवश्य ही ठंडे दिमाग से करना चाहिए और उनसे सही से पेश आना चाहिए और कोई एक विकल्प चुनना चाहिए। तुम्हें समस्याओं के हल के लिए सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। जिन सत्यों को तुम आमतौर पर समझते हो, वे चाहे गहन हों या उथले, तुम्हें उनका उपयोग करना चाहिए। सत्य केवल वे शब्द नहीं हैं जो तुम्हारे मुंह से उस समय निकलते हैं जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाता है, न ही वे खास तौर पर दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग किए जाते हैं; इसके बजाय, उनका उपयोग तुम्हारी समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने के लिए किया जाना चाहिए। यही सबसे महत्वपूर्ण है। जब तुम अपनी समस्याएँ हल करोगे तभी तुम दूसरों की समस्याएँ भी हल कर पाओगे। पतरस को फल क्यों कहा जाता है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीजें हैं, जो पूर्ण करने के लायक हैं। उसने सभी बातों में सत्य की खोज की, उसमें संकल्प था और दृढ़ इच्छाशक्ति थी; उसमें विवेक था, वह कठिनाई सहने के लिए तैयार था और दिल से सत्य से प्रेम करता था; जब उस पर चीजें आईं तो उसने उन्हें बेकार नहीं जाने दिया और हर चीज से सबक सीख सका। ये सभी बड़ी खूबियाँ हैं। यदि तुम्हारे पास इनमें से कोई भी बड़ी खूबी नहीं है, तो यह परेशानी की बात है। तुम्हारे लिए सत्य प्राप्त करना और बचाया जाना आसान नहीं होगा। यदि तुम्हें नहीं पता कि अनुभव कैसे करना है या तुम्हें कोई अनुभव नहीं है, तो तुम अन्य लोगों की कठिनाइयों को हल करने में सक्षम नहीं होगे। चूँकि तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने में असमर्थ हो, इसलिए तुम नहीं जानते कि अगर कुछ हो जाए तो क्या करना है, जब तुम समस्याओं का सामना करते हो तो तुम परेशान हो जाते हो और आंसू बहाने लगते हो, तुम नकारात्मक हो जाते हो और छोटी-मोटी असफलता पर भाग खड़े होते हो और तुम उनसे सही से पेश आने में असमर्थ होते हो। इस कारण तुम्हारे लिए जीवन प्रवेश पाना असंभव है। तुम जीवन प्रवेश के बिना दूसरों को पोषण कैसे दे सकते हो? लोगों के जीवन को पोषण देने के लिए तुम्हें सत्य की स्पष्ट रूप से संगति करनी चाहिए और समस्याओं को हल करने के लिए अभ्यास के सिद्धांतों की स्पष्ट संगति करना आना चाहिए। जिसमें दिल और आत्मा है, उसे ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है, वह थोड़ी बातों से ही समझ जाएगा। लेकिन केवल सत्य की थोड़ी सी समझ से काम नहीं चलेगा। उनके पास अभ्यास के मार्ग और सिद्धांत भी होने चाहिए। इसी से उन्हें सत्य का अभ्यास करने में मदद मिलेगी। भले ही लोगों में आध्यात्मिक समझ हो और थोड़ा-सा ही बोलने पर वे समझ जाते हों, पर यदि वे सत्य का अभ्यास नहीं करते तो जीवन प्रवेश नहीं होगा। यदि वे सत्य नहीं स्वीकार पाते, तो उनके लिए सब खत्म है और वे कभी भी सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। तुम कुछ लोगों का हाथ पकड़कर उन्हें सिखा सकते हो, उस समय तो लगेगा कि वे समझ रहे हैं, लेकिन जैसे ही तुम उनका हाथ छोड़ते हो, वे फिर से भ्रमित हो जाते हैं। यह ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें आध्यात्मिक समझ हो। चाहे कोई भी समस्या सामने हो, अगर तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो, तुम्हारे पास कोई गवाही नहीं होती और जब उन चीजों की बात आती है जो चीजें लोगों को करनी चाहिए और जो चीजें लोगों को अपने हिस्से की भूमिका के रूप निभानी चाहिए तब अगर तुम अपने हिस्से की भूमिका नहीं निभाते तो इससे साबित होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य से प्रेम करता है। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को चाहे जैसे प्रेरित करे, कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके, इतने सारे सत्य सुनकर, थोड़ा जमीर रखकर और आत्म-संयम पर भरोसा करके ही, लोगों को कम से कम न्यूनतम मानक पूरा करने में सक्षम होना चाहिए—अपने जमीर से फटकार नहीं खानी चाहिए। लोगों को उतना सुस्त और कमजोर नहीं होना चाहिए जितना वे अब हैं, उनका ऐसी स्थिति में होना अकल्पनीय है। शायद तुम लोगों के पिछले कुछ वर्ष संभ्रम की अवस्था में, सत्य का अनुसरण और कोई प्रगति न करते हुए गुजरे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो तुम अभी भी इतने सुन्न और मंदबुद्धि कैसे हो सकते हो? तुम्हारा इस तरह होना, पूरी तरह से तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता के कारण है, इसके लिए तुम किसी और को दोष नहीं दे सकते। सत्य दूसरों के मुकाबले कुछ खास लोगों के प्रति पक्षपातपूर्ण नहीं होता। यदि तुम सत्य नहीं स्वीकारते और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, तो तुम कैसे बदल सकते हो? कुछ लोगों को लगता है कि उनमें बहुत कम काबिलियत है और उनमें समझने की क्षमता नहीं है, इसलिए वे अपने बारे में फैसला सुना देते हैं, उन्हें लगता है कि वे चाहे कितना भी सत्य का अनुसरण कर लें, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते। वे सोचते हैं कि चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें, सब बेकार है, और इसमें बस इतना ही है, इसलिए वे हमेशा नकारात्मक होते हैं, परिणामस्वरूप, बरसों परमेश्वर में विश्वास रखकर भी, उन्हें सत्य प्राप्त नहीं होता। सत्य का अनुसरण करने के लिए कड़ी मेहनत किए बिना, तुम कहते हो कि तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है, तुम हार मान लेते हो और हमेशा एक नकारात्मक स्थिति में रहते हो। नतीजतन उस सत्य को नहीं समझते जिसे तुम्हें समझना चाहिए या जिस सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो, उसका अभ्यास नहीं करते—क्या तुम अपने लिए बाधा नहीं बन रहे हो? यदि तुम हमेशा यही कहते रहो कि तुममें पर्याप्त काबिलियत नहीं है, क्या यह अपनी जिम्मेदारी से बचना और जी चुराना नहीं है? यदि तुम कष्ट उठा सकते हो, कीमत चुका सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो, तो तुम निश्चित ही कुछ सत्य समझकर कुछ वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। यदि तुम परमेश्वर की ओर नहीं देखते, उस पर निर्भर नहीं रहते और बिना कोई प्रयास किए या कीमत चुकाए बस हार मान लेते हो और समर्पण कर देते हो, तो तुम किसी काम के नहीं हो, तुममें अंतरात्मा और विवेक का जरा-सा भी अंश नहीं है। चाहे तुम्हारी काबिलियत खराब हो या अत्युत्तम हो, यदि तुम्हारे पास थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक है, तो तुम्हें वह ठीक से पूरा करना चाहिए, जो तुम्हें करना है और जो तुम्हारा मिशन है; कर्तव्य छोड़कर भागना एक भयानक बात है और परमेश्वर के साथ विश्वासघात है। इसे सही नहीं किया जा सकता। सत्य का अनुसरण करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, और जो लोग बहुत अधिक नकारात्मक या कमजोर होते हैं, वे कुछ भी संपन्न नहीं करेंगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, और, यदि वे सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं और स्वभावगत बदलाव हासिल करना चाहते हैं, तो उनके लिए अभी भी उम्मीद कम है। केवल वे, जो दृढ़-संकल्प वाले हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, ही उसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 573

ऐसे बहुत लोग हैं, जो अपने कर्तव्य में व्यस्त होते ही अनुभव करने में असमर्थ हो जाते हैं और सामान्य स्थिति बनाए नहीं रख पाते, और नतीजतन, लगातार सभा आयोजित कर अपने साथ सत्य की संगति किए जाने की माँग करते रहते हैं। यहाँ क्या चल रहा है? वे सत्य नहीं समझते, वे सच्चे मार्ग में नींव नहीं जमा पाए हैं, ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाते समय जोश से प्रेरित होते हैं, और लंबे समय तक नहीं टिक सकते हैं। जब लोग सत्य नहीं समझते, तो वे जो कुछ भी करते हैं उसमें कोई सिद्धांत नहीं होता। अगर उनके लिए कुछ करने की व्यवस्था की जाती है, तो वे उसमें गड़बड़ी कर देते हैं, वे जो करते हैं उसमें लापरवाह होते हैं, वे सिद्धांतों की तलाश नहीं करते हैं, और उनके दिलों में कोई आज्ञाकारिता नहीं होती है—जो यह साबित करता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में असमर्थ हैं। चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन-सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सब मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; तुम्हारे लिए यह नितांत आवश्यक है कि तुम सिद्धांत के साथ कार्य कर सको। अगर तुम कुछ कर रहे हो जिसे तुम्हारा कर्तव्य माना जा सकता है, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए : मुझे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कैसे करना चाहिए, ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न करूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके निकट आना चाहिए। परमेश्वर से प्रार्थना करना इसलिए है कि हम सत्य को खोजें, अभ्यास करने का तरीका खोजें, परमेश्वर की इच्छाएँ खोजें, और परमेश्वर को संतुष्ट करने का तरीका खोजें। प्रार्थना इन प्रभावों को प्राप्त करने के लिए होती है। परमेश्वर से प्रार्थना करना, परमेश्वर के निकट आना और परमेश्वर के वचन पढ़ना धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी कर्म नहीं हैं। यह परमेश्वर के इरादों को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम कार्य करने से पहले हमेशा “परमेश्वर को धन्यवाद,” कहते हो और तुम बहुत आध्यात्मिक और गहरी अंतर्दृष्टि वाले लग सकते हो, लेकिन अगर कार्य करने का समय आने पर तुम जैसा चाहते हो वैसा ही करते हो, सत्य की तलाश बिल्कुल नहीं करते, तो यह “परमेश्वर को धन्यवाद” एक मंत्र से ज्यादा कुछ नहीं है, यह झूठी आध्यात्मिकता है। अपना कर्तव्य करते समय तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए : “मुझे यह कर्तव्य कैसे करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है?” अपने कार्यों के लिए सिद्धांत और सत्य खोजने हेतु परमेश्वर से प्रार्थना करना और उसके करीब जाना, अपने दिल में परमेश्वर की इच्छाओं की तलाश करना, और जो भी तुम करते हो उसमें परमेश्वर के वचनों या सत्य सिद्धांतों से न भटकना—केवल ऐसा करने वाला इंसान ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है; यह सब उन लोगों के लिए अप्राप्य है जो सत्य से प्रेम नहीं करते। ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो चाहे कुछ भी करें, अपने ही विचारों का पालन करते हैं, और चीजों को अत्यधिक सरलीकृत ढंग से समझते हैं, और सत्य की तलाश भी नहीं करते। वहाँ सिद्धांत का पूर्ण अभाव रहता है, और अपने दिल में वे इस पर कोई विचार नहीं करते कि परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार या उस तरीके से कैसे कार्य करें जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है, और केवल हठपूर्वक अपनी ही इच्छा का पालन करना जानते हैं। ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं, “मैं परमेश्वर से सिर्फ कठिनाई आने पर ही प्रार्थना करता हूँ, लेकिन फिर भी ऐसा नहीं लगता कि इसका कोई प्रभाव होता है—इसलिए आम तौर पर अब जब मेरे साथ कुछ घटता है, तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करता, क्योंकि परमेश्वर से प्रार्थना करना बेकार है।” ऐसे लोगों के दिलों से परमेश्वर बिल्कुल नदारद होता है। वे सामान्य समय में चाहे जो भी कर रहे हों, सत्य की तलाश नहीं करते; वे केवल अपने विचारों का ही पालन करते हैं। तो क्या उनके कार्यों के सिद्धांत हैं? निश्चित रूप से नहीं। वे सब कुछ अत्यधिक सरलीकृत ढंग से देखते हैं। यहाँ तक कि जब लोग उनके साथ सत्य सिद्धांतों की संगति करते हैं, तो वे उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते, क्योंकि उनके कार्यों में कभी कोई सिद्धांत नहीं रहा होता, उनके हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं होता, और उनके हृदय में उनके सिवा कोई नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनके इरादे नेक हैं, कि वे बुराई नहीं कर रहे, कि उनके इरादों को सत्य का उल्लंघन करने वाला नहीं माना जा सकता, उन्हें लगता है कि अपने इरादों के अनुसार कार्य करना सत्य का अभ्यास करना होना चाहिए, कि इस प्रकार कार्य करना परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता करना है। वस्तुतः, इस मामले में वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश या उससे प्रार्थना नहीं कर रहे, बल्कि आवेग पर कार्य करते हुए, अपने ही जोशीले इरादों के अनुसार, वे उस तरह अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे जिस तरह परमेश्वर कहता है, उनमें परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का हृदय नहीं है, उनमें यह इच्छा अनुपस्थित रहती है। लोगों के अभ्यास में यह सबसे बड़ी गलती होती है। अगर तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो और फिर भी वह तुम्हारे दिल में नहीं है, तो क्या तुम परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश नहीं कर रहे? और परमेश्वर पर ऐसी आस्था का क्या परिणाम हो सकता है? आखिर तुम इससे क्या हासिल कर लोगे? और परमेश्वर पर ऐसी आस्था का क्या प्रयोजन है?

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 574

अगर तुमने कुछ ऐसा किया है, जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन कर परमेश्वर को अप्रसन्न करता है, तो तुम्हें आत्मचिंतन कैसे करना चाहिए और खुद को जानने की कोशिश कैसे करनी चाहिए? जब तुम उसे करने जा रहे थे, तब क्या तुमने उससे प्रार्थना की थी? क्या तुमने कभी यह विचार किया, “क्या चीजें इस तरह से करना सत्य के अनुरूप है? अगर यह बात परमेश्वर के सामने लाई जाएगी, तो परमेश्वर इसे कैसे देखेगा? अगर उसे इसका पता चलेगा, तो वह खुश होगा या नाराज? वह इससे घृणा करेगा या घिन करेगा?” तुमने इसकी खोज नहीं की, है ना? यहाँ तक कि अगर दूसरे लोगों ने तुम्हें याद भी दिलाया, तो तुम तब भी यही सोचोगे कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और यह किसी भी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता और न ही कोई पाप है। नतीजतन, तुमने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया और उसे क्रोध करने के लिए उकसाया, इस हद तक कि उसे तुमसे नफरत हो जाए। यह लोगों के विद्रोहीपन से उत्पन्न होता है। इसलिए, तुम्हें सभी चीजों में सत्य खोजना चाहिए। तुम्हें इसी का पालन करना चाहिए। अगर तुम पहले से प्रार्थना करने के लिए गंभीरता से परमेश्वर के सामने आ सको, और फिर परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य की तलाश कर सको, तो तुम्हारा मार्ग गलत नहीं होगा। सत्य के तुम्हारे अभ्यास में कुछ विचलन हो सकते हैं, लेकिन इससे बचना कठिन है, और कुछ अनुभव प्राप्त करने के बाद तुम सही ढंग से अभ्यास करने में सक्षम होगे। लेकिन अगर तुम जानते हो कि सत्य के अनुसार कैसे कार्य करना है, फिर भी इसका अभ्यास नहीं करते, तो समस्या सत्य के प्रति तुम्हारी नापसंदगी है। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, वे उसे कभी नहीं खोजेंगे, चाहे उनके साथ कुछ भी हो जाए। केवल सत्य से प्रेम करने वालों के पास ही परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता है, और जब ऐसी चीजें होती हैं जो उन्हें समझ नहीं आतीं, तो वे सत्य की खोज करने में सक्षम होते हैं। अगर तुम परमेश्वर के इरादे नहीं समझ सकते और अभ्यास करना नहीं जानते, तो तुम्हें सत्य समझने वाले कुछ लोगों के साथ संगति करनी चाहिए। अगर तुम्हें सत्य समझने वाले लोग न मिल पाएँ, तो तुम्हें शुद्ध समझ वाले कुछ लोगों को ढूँढ़कर एकचित्त होकर एक-साथ परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर से खोजना चाहिए, परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए एक रास्ता खोले जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अगर तुम सभी सत्य के लिए तरसते हो, सत्य की खोज करते हो, और सत्य पर एक-साथ संगति करते हो, तो संभव है कि एक समय आए जब तुममें से किसी को कोई अच्छा समाधान सूझ जाए। अगर तुम सभी को वह समाधान उपयुक्त लगता है और वह एक अच्छा उपाय है, तो यह पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी के कारण हो सकता है। फिर अगर तुम अभ्यास का और भी सटीक मार्ग निकालने के लिए एक-साथ संगति करते हो, तो यह निश्चित रूप से सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होगा। अपने अभ्यास में, अगर तुम पाते हो कि तुम्हारे अभ्यास का तरीका अभी भी कुछ ठीक नहीं है, तो तुम्हें उसे जल्दी से सही करने की आवश्यकता है। अगर तुम थोड़ी गलती करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दोषी नहीं ठहराएगा, क्योंकि तुम जो करते हो उसमें तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहे हो। तुम बस सिद्धांतों के बारे में थोड़े भ्रमित हो और तुमने अपने अभ्यास में एक त्रुटि कर दी है, जो क्षम्य है। लेकिन जब ज्यादातर लोग चीजें करते हैं, तो वे इसे किए जाने के तरीके को लेकर अपनी कल्पना के आधार पर इसे करते हैं। सत्य के अनुसार अभ्यास कैसे करें या परमेश्वर की स्वीकृति कैसे प्राप्त करें, इस पर विचार करने के लिए वे परमेश्वर के वचनों को आधार नहीं बनाते। इसके बजाय, वे केवल इस बारे में सोचते हैं कि कैसे स्वयं को लाभ पहुँचाया जाए, कैसे दूसरों से अपना आदर करवाया जाए, और कैसे दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाई जाए। वे चीजें पूरी तरह से अपने विचारों के आधार पर और विशुद्ध रूप से खुद को संतुष्ट करने के लिए करते हैं, जो परेशानी भरा है। ऐसे लोग कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं करेंगे, और परमेश्वर हमेशा उनसे घृणा करेगा। अगर वास्तव में तुम्हारे पास अंतरात्मा और विवेक है, तो चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें प्रार्थना करने और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, अपने कामों में उद्देश्यों और मिलावट की गंभीरता से जाँच करने में सक्षम होना चाहिए, यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार क्या करना उचित है, और बार-बार तोलना और विचारना चाहिए कि कौन-से कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, कौन-से कार्य परमेश्वर में घृणा उत्पन्न करते हैं, और कौन-से कार्य परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करते हैं। तुम्हें मन में इन मामलों पर तब तक बार-बार विचार करना चाहिए, जब तक तुम उन्हें स्पष्ट रूप से समझ नहीं लेते। अगर तुम जान जाते हो कि कुछ करने के पीछे तुम्हारे अपने उद्देश्य हैं, तो तुम्हें इस पर चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारे उद्देश्य क्या हैं, वे खुद को संतुष्ट करने के लिए हैं या परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, वे तुम्हारे लिए फायदेमंद हैं या परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए, और उनके क्या परिणाम होंगे...। अगर तुम अपनी प्रार्थनाओं में इस तरह से और अधिक खोज और चिंतन करते हो और सत्य खोजने के लिए खुद से और अधिक प्रश्न पूछते हो तो तुम्हारे क्रियाकलापों में विचलन छोटे से छोटे होते जाएँगे। इस तरह से सत्य खोज सकने वाले लोग ही परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहकर उसका भय मानते हैं, क्योंकि ऐसे में तुम परमेश्वर के वचनों की अपेक्षाओं के अनुसार और आज्ञाकारी हृदय से खोजते हो, और इस तरह खोजने से तुम जिन निष्कर्षों पर पहुँचते हो, वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होंगे।

अगर किसी विश्वासी के कर्म सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो वह किसी अविश्वासी के समान ही है। वह उस तरह का इंसान है, जिसके दिल में परमेश्वर नहीं होता, और जो परमेश्वर से भटक जाता है, और ऐसा इंसान परमेश्वर के घर में काम पर रखे गए उस कर्मचारी की तरह होता है, जो अपने मालिक के लिए कोई छोटे-मोटे कार्य कर देता है, कुछ मुआवजा पाता है और फिर चला जाता है। यह ऐसा इंसान बिल्कुल नहीं है, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है। परमेश्वर से मान्यता प्राप्त करने के लिए क्या करना है, यह वह पहली चीज है जिसकी, काम करते समय तुम्हें जाँच करनी चाहिए और जिस पर काम करना चाहिए; यह तुम्हारे क्रियाकलापों का सिद्धांत और दायरा होना चाहिए। तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, इसका निश्चय तुम्हें इसलिए करना चाहिए, क्योंकि अगर वह सत्य के अनुरूप है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। ऐसा नहीं है कि तुम्हें यह मापना चाहिए कि यह बात सही है या गलत है, या क्या यह हर किसी की रुचि के अनुरूप है, या क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छाओं के अनुसार है; बल्कि तुम्हें यह निश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और यह कलीसिया के काम और हितों को लाभ पहुँचाता है या नहीं। अगर तुम इन बातों पर विचार करते हो, तो तुम चीज़ों को करते समय परमेश्वर के इरादों के अधिकाधिक अनुरूप होते जाओगे। अगर तुम इन पहलुओं पर विचार नहीं करते, और चीज़ों को करते समय केवल अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हो, तो तुम्हारा उन्हें गलत तरीके से करना गारंटीशुदा है, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और निश्चित रूप से, वह परमेश्वर के साथ असंगत होती है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा मान्य होने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपनी इच्छा के अनुसार। कुछ लोग अपने कर्तव्य करने के नाम पर कुछ निजी मामलों में संलग्न रहते हैं। उनके भाई और बहन इसे अनुचित मानते हैं और इसके लिए उन्हें टोकते हैं, लेकिन ये लोग दोष स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि यह एक व्यक्तिगत मामला है, जिसमें कलीसिया का कार्य, वित्त या उसके लोग शामिल नहीं हैं, और यह कोई बुरा काम नहीं है, इसलिए लोगों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीजें तुम्हें निजी मामले लग सकती हैं, जिन पर कोई सिद्धांत या सत्य लागू नहीं होता। किंतु तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य को देखते हुए, तुम बहुत स्वार्थी रहे। तुमने कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के घर के हितों पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही इस बात पर ध्यान दिया कि क्या यह परमेश्वर के लिए संतोषजनक होगा; तुम केवल अपने फायदे पर विचार करते रहे। इसमें पहले ही संतों का उचित आचरण और साथ ही इंसान की मानवता शामिल हैं। भले ही तुम जो कर रहे थे, उससे चर्च के हित नहीं जुड़े थे, न ही उसमें सत्य शामिल था, फिर भी अपने कर्तव्य के पालन करने का दावा करते हुए एक निजी मामले में संलग्न होना सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे वह परमेश्वर के परिवार में तुम्हारा कर्तव्य हो या तुम्हारा निजी मामला, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त इंसान को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। अगर तुम हर बात और हर सत्य को इस तरह गंभीरता से लेते हो, तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। ऐसे लोग हैं, जो सोचते हैं, “जब मैं अपना कर्तव्य करता हूँ, तब मेरा सत्य का अभ्यास करना तो ठीक है, लेकिन जब मैं अपने निजी कार्य कर रहा होता हूँ, तो मुझे परवाह नहीं कि सत्य क्या कहता है—मैं वही करूँगा जो मुझे पसंद है, जो कुछ भी मुझे अपने फायदे के लिए करना पड़े।” इन शब्दों से तुम देख सकते हो कि वे सत्य के प्रेमी नहीं हैं। वे जो कुछ करते हैं, उसमें कोई सिद्धांत नहीं होता। इस बात पर विचार तक किए बिना कि परमेश्वर के घर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, वे जो कुछ भी उनके लिए फायदेमंद होगा, करेंगे। नतीजतन, जब वे कुछ कर लेते हैं, तो परमेश्वर उनमें मौजूद नहीं होता, और वे महसूस करते हैं कि वे अंधकार में हैं और परेशान हैं, और नहीं जानते कि क्या हो रहा है। क्या यह उनके लिए समुचित दंड नहीं हैं? अगर तुम अपने कार्यों में सत्य का अभ्यास नहीं करते और परमेश्वर का अपमान करते हो, तो तुम उसके खिलाफ पाप कर रहे हो। अगर कोई इंसान सत्य से प्रेम नहीं करता और अक्सर अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है, तो वह अक्सर परमेश्वर का अपमान करेगा। परमेश्वर उसका तिरस्कार करके उसे ठुकरा देगा और एक किनारे कर देगा। ऐसा इंसान जो कुछ करता है, वह अक्सर परमेश्वर की मान्यता पाने में विफल हो जाता है, और अगर उसमें पश्चात्ताप नहीं है, तो दंड उससे दूर नहीं है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 575

तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा कर्तव्य काफी नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किए गए कर्तव्य एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही चीज करते रहते हैं। मगर, इनको निभाते समय, ये लोग अपनी जो दशाएँ प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मनःस्थिति में होने पर लोग थोड़े ज्यादा चौकस होते हैं और बेहतर काम करते हैं। बाकी समय, किसी अनजान प्रभाव के चलते, उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव उनमें बदमाशी जगाता है जिससे उनमें अनुचित विचार उपजते हैं, वे बुरी दशा और मनोदशा में आ जाते हैं; परिणाम यह होता है कि वे अपना कर्तव्य लापरवाह ढंग से निभाते हैं। लोगों की आंतरिक दशाएँ निरंतर बदलती रहती हैं; ये किसी भी स्थान पर किसी भी वक्त बदल सकती हैं। तुम्हारी दशा चाहे जैसे बदले, अपनी मनःस्थिति के अनुसार कर्म करना हमेशा गलत होता है। मान लो कि जब तुम अच्छी मनःस्थिति में होते हो, तो थोड़ा बेहतर करते हो, और बुरी मनःस्थिति में होते हो तो थोड़ा बदतर करते हो—क्या यह काम करने का कोई सैद्धांतिक ढंग है? क्या यह तरीका तुम्हें अपने कर्तव्य को एक मानक स्तरीय ढंग से निभाने देगा? मनःस्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और सत्य की खोज करना आना चाहिए, सिर्फ इसी तरीके से वे अपनी मनःस्थिति द्वारा बाधित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जाँच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे लापरवाह ढंग से तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने से जी चुराने की कोशिश तो नहीं की है, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीजों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज से सामना हो—काट-छाँट के बाद नकारात्मकता और कमजोरी या बुरी मनःस्थिति में हो—तुम्हें इससे ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर के इरादों को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मनःस्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमजोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो जिम्मेदार है और बोझ उठाता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपना कर्तव्य मानक स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपने कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर का कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मनोदशा में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे लापरवाह ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊँचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मनःस्थिति में होने पर भी वे अपने रोजमर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्यों के निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके कर्तव्य निर्वहन में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक मैं जीवित हूँ, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निभाऊँगा, ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस साँस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूँगा क्योंकि अपना कर्तव्य पूरा करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!” जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मनःस्थिति या बाहरी स्थिति से बेबस नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन प्रवेश हासिल किया है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे सच्ची और व्यावहारिक अभिव्यक्तियों में से एक है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 576

कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाते समय चाहे किसी भी मसले का सामना कर रहे हों, वे सत्य नहीं खोजते और हमेशा अपने विचारों, अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। शुरू से अंत तक वे अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव उनके क्रियाकलापों पर नियंत्रण करते हैं। हो सकता है वे हमेशा अपने कर्तव्य निभाते प्रतीत हों, पर क्योंकि उन्होंने सत्य को कभी स्वीकार नहीं किया है और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजें करने में विफल रहे हैं, इसलिए वे आखिरकार सत्य और जीवन हासिल नहीं करते और वे मजदूरों के नाम के ही लायक बन जाते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्यों को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनी खुद की योग्यताओं और प्रतिभाओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। अगर बात ऐसी है, तो क्या वे अपने कर्तव्यों को मानक स्तर तक निभाने में सक्षम होंगे? जब लोग अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, धारणाओं, कल्पनाओं, विशेषज्ञता और शिक्षा पर निर्भर करते हैं, तो भले ही ऐसा प्रतीत हो कि वे अपने कर्तव्य निभा रहे हैं और कोई दुष्टता नहीं कर रहे हैं, पर वे सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे होते, और कुछ भी ऐसा नहीं करते जिससे परमेश्वर संतुष्ट हो। साथ ही एक दूसरी समस्या भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता : अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तुम्हारी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और तुम्हारी इच्छा कभी नहीं बदलतीं और कभी भी सत्य से प्रतिस्थापित नहीं होतीं, और यदि तुम्हारे कार्य और कर्म कभी भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तुम्हें जीवन प्रवेश नहीं मिलेगा, तुम एक मजदूर बन जाओगे और इस प्रकार बाइबल में लिखे गए प्रभु यीशु के ये वचन पूरे करोगे : “उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर कोशिश करने वालों और मजदूरी करने वाले इन लोगों को कुकर्मी क्यों कहता है? एक बात को लेकर हम निश्चित हो सकते हैं और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, प्रेरक शक्तियाँ, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी अपनी इच्छाओं से पैदा होते हैं। ये पूरी तरह से अपने ही हितों और संभावनाओं की रक्षा के लिए होते हैं, अपने सम्मान और रुतबे को सुरक्षित रखने के लिए भी होते हैं और अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने के लिए होते हैं। उनकी विचारशीलता और हिसाब-किताब इन्हीं चीजों के आसपास केंद्रित होता है, उनके दिलों में कोई सत्य नहीं होता और उनके पास ऐसा दिल नहीं होता जो परमेश्वर का भय मानता हो और उसके प्रति समर्पण करता हो। समस्या की जड़ यही है। आज, तुम लोगों के लिए अपना अनुसरण किस तरह करना बहुत जरूरी है? सभी मामलों में, तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादों और उसकी माँग के अनुसार अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति पाओगे। तो परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने में खासतौर से क्या शामिल है? तुम जो कुछ भी करो, उसमें परमेश्वर से प्रार्थना करना सीखो, तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारी मंशाएँ क्या हैं, तुम्हारे विचार क्या हैं, कि क्या ये मंशाएँ और विचार सत्य के अनुरूप हैं; अगर नहीं हैं तो उन्हें एक तरफ कर देना चाहिए, जिसके बाद तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार चलना चाहिए, और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि तुम सत्य को अभ्यास में लाओ। अगर तुम्हारे अपने इरादे और लक्ष्य हैं, और तुम्हें अच्छी तरह पता है कि वे सत्य का उल्लंघन करते हैं और परमेश्वर के इरादों के उलट हैं, फिर भी तुम प्रार्थना नहीं करते और समाधान के लिए सत्य नहीं खोजते, तो यह बहुत खतरनाक है, और तुम्हारे लिए बुराई करना और परमेश्वर का विरोध करने वाले काम करना आसान हो जाएगा। अगर तुम एक-दो बार कोई बुरा काम करके प्रायश्चित कर लेते हो, तो तुम्हारे उद्धार की अब भी उम्मीद है। अगर तुम बुराई करते रहते हो, तो तुम हर तरह की बुराई के काम करने वाले व्यक्ति हो। अगर तुम इस बिंदु पर भी प्रायश्चित नहीं कर सकते, तो तुम संकट में हो : परमेश्वर तुम्हें दरकिनार कर देगा या त्याग देगा, जिसका मतलब है कि तुम्हें निकाले जाने का खतरा है; जो लोग तमाम तरह के बुरे कर्म करते हैं, उन्हें निश्चित ही दंडित कर निकाल दिया जाएगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 577

लोगों को यह समझना चाहिए कि सृष्टिकर्ता का सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का एक बुनियादी सिद्धांत है जो सर्वोच्च सिद्धांत भी है। सृष्टिकर्ता सृजित प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरी तरह से उसकी प्रबंधन योजना और उसके कार्य की जरूरतों पर आधारित है; उसे किसी व्यक्ति से सलाह लेने की जरूरत नहीं है, न ही उसे किसी व्यक्ति से स्वीकृति प्राप्त करने की आवश्यकता है। जो कुछ भी उसे करना चाहिए और जिस भी तरह से उसे लोगों से व्यवहार करना चाहिए, वह करता है और वह चाहे जो भी करता हो और जिस भी तरह से लोगों से व्यवहार करता हो, वह सब सत्य सिद्धांतों और उन सिद्धांतों के अनुरूप होता है जिनके अनुसार सृष्टिकर्ता कार्य करता है। एक सृजित प्राणी के रूप में करने लायक केवल एक ही चीज है और वह है सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण करना; व्यक्ति को अपनी किसी पसंद का चयन नहीं करना चाहिए। यही वह विवेक है जो सृजित प्राणियों में होना चाहिए और अगर किसी व्यक्ति के पास यह नहीं है तो वह व्यक्ति कहलाने योग्य नहीं है। लोगों को अवश्य ही समझना चाहिए कि सृष्टिकर्ता हमेशा सृष्टिकर्ता ही रहेगा; उसके पास किसी भी सृजित प्राणी के बारे में जैसे चाहे वैसे आयोजन करने और उन पर संप्रभुता रखने का सामर्थ्य है और वह इसके योग्य है और ऐसा करने के लिए उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती है। यह उसका अधिकार है। सृजित प्राणियों के पास यह फैसला देने का कोई अधिकार और योग्यता नहीं है कि सृष्टिकर्ता जो कुछ भी करता है वह सही है या गलत है या उसे कैसे कार्य करना चाहिए। कोई भी सृजित प्राणी यह चुनने का हक नहीं रखता कि उसे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना है या नहीं; किसी भी सृजित प्राणी को यह माँग करने का हक नहीं है कि सृष्टिकर्ता को उस पर संप्रभुता कैसे रखनी चाहिए या उसकी नियति की व्यवस्था कैसे करनी चाहिए। यह सर्वोच्च सत्य है। सृष्टिकर्ता ने अपने सृजित प्राणियों के साथ चाहे जो भी किया हो या उसने यह चाहे जैसे भी किया हो, सृजित मनुष्यों को केवल एक ही काम करना चाहिए : सृष्टिकर्ता द्वारा की गई हरेक चीज खोजना, इसके प्रति समर्पण करना, इसे जानना और स्वीकार करना। इसका अंतिम नतीजा यह होगा कि सृष्टिकर्ता ने अपनी प्रबंधन योजना और अपना काम पूरा कर लिया होगा और उसकी प्रबंधन योजना बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ चुकी होगी; इस बीच, चूँकि सृजित प्राणियों ने सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ स्वीकार कर ली हैं और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर लिया है, इसलिए वे सत्य हासिल कर चुके होंगे, सृष्टिकर्ता के इरादे समझ चुके होंगे और उसके स्वभाव को जानने लगे होंगे। एक और सिद्धांत है जो मुझे तुम्हें बताना चाहिए : सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करे, उसकी अभिव्यक्तियाँ जिस भी प्रकार की हों, उसका कार्य बड़ा हो या छोटा, वह फिर भी सृष्टिकर्ता ही है; जबकि समस्त मनुष्य, जिन्हें उसने सृजित किया, चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, या वे कितने भी प्रतिभाशाली और गुणी क्यों न हों, वे सृजित प्राणी ही रहते हैं। जहाँ तक सृजित मनुष्यों का सवाल है, चाहे जितना भी अनुग्रह और जितने भी आशीष उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्राप्त कर लिए हों, या जितनी भी दया, प्रेमपूर्ण करुणा और उदारता प्राप्त कर ली हो, उन्हें खुद को भीड़ से अलग नहीं मानना चाहिए, या यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के बराबर हो सकते हैं और सृजित प्राणियों में ऊँचा दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। परमेश्वर ने तुम्हें चाहे जितने उपहार दिए हों, या जितना भी अनुग्रह प्रदान किया हो, या जितनी भी दयालुता से उसने तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या चाहे उसने तुम्हें कोई विशेष खूबी दी हो, इनमें से कुछ भी तुम्हारी पूँजी नहीं है। तुम एक सृजित प्राणी हो, और इस तरह तुम सदा एक सृजित प्राणी ही रहोगे। तुम्हें कभी नहीं सोचना चाहिए, “मैं परमेश्वर के हाथों में उसका लाड़ला हूँ। परमेश्वर मुझे कभी नहीं त्यागेगा, परमेश्वर का रवैया मेरे प्रति हमेशा प्रेम, देखभाल और नाजुक दुलार के साथ-साथ सुकून के गर्मजोशी भरे बोलों और प्रबोधन का होगा।” इसके विपरीत, सृष्टिकर्ता की दृष्टि में तुम अन्य सभी सृजित प्राणियों की ही तरह हो; परमेश्वर तुम्हें जिस तरह चाहे, उस तरह इस्तेमाल कर सकता है, और साथ ही तुम्हारे लिए जैसा चाहे, वैसा आयोजन कर सकता है, और तुम्हारे लिए सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के बीच जैसी चाहे वैसी कोई भी भूमिका निभाने की व्यवस्था कर सकता है। लोगों को यह ज्ञान होना चाहिए और उनमें यह विवेक होना चाहिए। अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो परमेश्वर के साथ उसका संबंध अधिक सामान्य हो जाएगा, और वह उसके साथ एक सबसे ज्यादा वैध संबंध स्थापित कर लेगा; अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो वह अपने स्थान को सही ढंग से उन्मुख कर पाएगा, वहाँ अपना आसन ग्रहण कर पाएगा और अपना कर्तव्य निभा पाएगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य समझकर ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 578

परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने, और साथ ही कई परीक्षणों, शोधनों और काट-छाँट का अनुभव करने के द्वारा होना चाहिए; केवल तभी परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान होना संभव है। कुछ लोग कहते हैं : “मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मुझे परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए?” वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर अपने वचनों और अपने दिल की आवाज़ व्यक्त कर रहा है, जिन्हें उसके दिल से निकले वचन भी कहा जा सकता है। उन्हें उसके दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसके इरादों, उसके ख्यालों और विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखते हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर दयापूर्ण परिप्रेक्ष्य से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग देखते हैं कि उसका स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता, कि मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है कि उसे अब परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीजों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि उसके सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो मसीह के साथ उनका अनुभव परमेश्वर के बारे में उनकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो वे इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकते। देहधारण का सत्य सबसे गंभीर रहस्य है; मनुष्य के लिए उसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण के रहस्य पर परमेश्वर के वचनों को एक साथ एकत्रित करो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें टटोलते हुए आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और अगर उन्हें अंततः परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है, तो एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 579

परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को जानना, और इस प्रकार उसके स्वभाव को जानना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न तुम उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दया को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किसे पसंद करता है और किससे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हों। परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होना है। जो लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते, वे परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास नहीं करते—अंतर यहीं पर है। जब तुमने कई वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया होता है और तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान और समझ होती है, जब तुम्हें परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ और उन पर पकड़ होती है, जब तुम मनुष्य को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को जानते हो तो यह तब होता है, जब तुम वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हो, वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हो, और वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हो। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो लेकिन परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते, और परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं रखते, तो तुम सिर्फ एक ऐसे अनुयायी हो, जो परमेश्वर के लिए दौड़-भाग करता है और जो कुछ बहुसंख्यक लोग करते हैं, उसका अनुसरण करता है। इसे सच्चा समर्पण नहीं कहा जा सकता, सच्ची आराधना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो लोग परमेश्वर को देखते हैं और वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं, वे सब उसकी आराधना करते और उसका भय मानते हैं; वे सभी उसके सामने झुककर उसकी आराधना करने के लिए बाध्य होते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसकी जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का भय मानेंगे। आम तौर पर, परमेश्वर की जितनी कम समझ लोगों में होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। अगर लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय से काँप उठते और जमीन पर गिरकर दंडवत करते। “जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं” (मत्ती 3:11)—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास परमेश्वर का बहुत गहरा ज्ञान नहीं था, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का भय मानने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका भय मान सकते हैं? अगर लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, तो वे व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना करने में और भी कम सक्षम होंगे। अगर वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक साधारण व्यक्ति की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक असम्मानजनक रवैया अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसके खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं और उसकी आलोचना कर सकते हैं। वे आत्मतुष्ट हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें; वे परमेश्वर के बारे में धारणाएँ भी बना सकते हैं, उस पर आरोप लगा सकते हैं और उसकी ईश-निंदा कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए और जिसे उन्हें हासिल करना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

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परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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