जीवन में प्रवेश 5

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 520

यीशु का अनुसरण करने के दौरान, उसके बारे में उसके कई अभिमत थे और वह अपने परिप्रेक्ष्य से आँकलन करता था। यद्यपि पवित्रात्मा के बारे में उसकी एक निश्चित अंश में समझ थी, तब भी पतरस बहुत प्रबुद्ध नहीं था, इसलिए वह अपनी बातों में कहता हैः "मुझे उसका अवश्य अनुसरण करना चाहिए जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा चुना जाता है। मैं तेरा अनुसरण करूँगा।" उसने यीशु के द्वारा किये गए कामों को नहीं समझा और उसमें इनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किये गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और यीशु में रुचि बढ़ी। उसे महसूस होने लगा कि यीशु ने अनुराग और सम्मान दोनों प्रेरित किए; वह उसके साथ सम्बद्ध होना और उसके साथ ठहरना पसंद करता था, और यीशु के वचनों को सुनना उसे आपूर्ति और सहायता प्रदान करते थे। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय प्रकटन अत्यधिक साधारण था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और उसके साथ रहते हुए पतरस ने उन चीज़ों को देखा और सीखा जिन्हें उसने पहले कभी देखा या सीखा नहीं था। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है न ही असाधारण मानवता है, किन्तु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं समझ सका था, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सब से भिन्न कार्य करता है, क्योंकि उसके काम करने का तरीका किसी साधारण मनुष्य द्वारा किए गए कामों के तरीकों से कहीं अधिक भिन्न था। यीशु के साथ सम्पर्क के दौरान, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जिससे ऐसा चरित्र उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट, आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख मगर शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, जबकि किसी अन्य समय में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चपल और उल्लसित बन जाता था, और कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो दुख के बोझ से लदी और बेहद थकी कोई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार तो एक गरजने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु का आचरण कैसा था, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी दया, क्षमा, और लोगों से उसकी सख्त अपेक्षा, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाने लगते थे। निस्संदेह, पतरस को इस सब का एहसास धीरे-धीरे तब हुआ जब एक बार वह कुछ वर्षों तक यीशु के साथ रह लिया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 521

पतरस के अनुभवों में एक पराकाष्ठा थी, जब उसका शरीर लगभग पूरी तरह से टूट गया था, किन्तु यीशु ने उसे प्रोत्साहन दिया। और वह उसके सामने एक बार प्रकट हुआ। जब पतरस अत्यधिक पीड़ा में था और महसूस करता था कि उसका हृदय टूट गया है, तो यीशु ने उसे निर्देश दिया: "तू पृथ्वी पर मेरे साथ था, और मैं यहाँ तेरे साथ था। यद्यपि पहले हम स्वर्ग में एक साथ थे, यह सब कुछ आध्यात्मिक संसार के बारे में है। अब मैं आध्यात्मिक संसार में लौट आया हूँ, परन्तु तू पृथ्वी पर है। क्योंकि मैं पृथ्वी का नहीं हूँ, और यद्यपि तू भी पृथ्वी का नहीं है, किन्तु तुझे पृथ्वी पर अपना कार्य पूरा करना होगा। क्योंकि तू एक सेवक है, इसलिए तुझे अपना कर्तव्य अपनी पूरी योग्यता से निभाना होगा।" पतरस को यह सुनकर सांत्वना मिली कि वह परमेश्वर की ओर लौट सकता है। जब पतरस ऐसी पीड़ा में था कि वह लगभग बिस्तर पर पड़ा था, तो उसने पछतावा किया और यहाँ तक कहा: "मैं बहुत भ्रष्ट हूँ, मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।" यीशु ने उसके सामने प्रकट होकर कहा: "पतरस, कहीं ऐसा तो नहीं कि तू उस संकल्प को भूल गया जो तूने एक बार मेरे सामने लिया था? क्या तू वास्तव में वह सब कुछ भूल गया जो मैंने कहा था? क्या तू उस संकल्प को भूल गया है जो तूने मुझसे किया था?" पतरस ने देखा कि यह यीशु है और वह बिस्तर से उठ गया, और यीशु ने उसे सांत्वना दी: "मैं पृथ्वी का नहीं हूँ, मैं तुझे पहले ही कह चुका हूँ—यह तुझे समझ जाना चाहिए, किन्तु क्या तू कोई और बात भी भूल गया जो मैंने तुझसे कही थी? 'तू भी पृथ्वी का नहीं है, संसार का नहीं है।' अभी यहाँ पर जो कार्य है उसे तुझे करना है, तू इस तरह से दुःखी नहीं हो सकता है, तू इस तरह से पीड़ित नहीं हो सकता है। हालाँकि मनुष्य और परमेश्वर एक ही संसार में एक साथ नहीं रह सकते हैं, मेरे पास मेरा कार्य है और तेरे पास तेरा कार्य है, और एक दिन जब तेरा कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हम दोनों एक क्षेत्र में एक साथ रहेंगे, और मैं हमेशा मेरे साथ रहने के लिए तेरी अगुवाई करूँगा।" इन वचनों को सुनने के बाद पतरस को सांत्वना मिली और वह आश्वस्त हुआ। वह जानता था कि यह पीड़ा कुछ ऐसी थी जो उसे सहन और अनुभव करनी ही थी, और वह तब से प्रेरित था। यीशु हर महत्वपूर्ण क्षण में उसके सामने प्रकट हुआ, उसे विशेष प्रबुद्धता और मार्गदर्शन दिया, और उसमें अत्यधिक कार्य किया। और पतरस ने सबसे अधिक किस बात का पछतावा किया? पतरस के यह कहने के तुरंत बाद कि "तू जीवित परमेश्वर का पुत्र है", यीशु ने पतरस से एक और प्रश्न पूछा (यद्यपि यह बाइबल में इस प्रकार से दर्ज नहीं है), और वह प्रश्न यह था: "पतरस! क्या तूने कभी मुझे प्रेम किया है?" पतरस समझ गया कि क्या अभिप्राय है और, उसने कहाः "प्रभु! मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किन्तु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुझे कभी भी प्रेम नहीं किया।" फिर यीशु ने कहा, "यदि लोग स्वर्गिक परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं, तो वे पृथ्वी पर पुत्र को कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग परमपिता परमेश्वर द्वारा भेजे गए पुत्र को प्रेम नहीं करते हैं, तो वे स्वर्गिक पिता से कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग वास्तव में पृथ्वी पर पुत्र से प्रेम करते हैं, तो फिर वे स्वर्गिक पिता को भी वास्तव में प्रेम करते हैं।" जब पतरस ने इन वचनों को सुना तो उसने अपनी कमी को महसूस किया। उसे अपने वचनों पर हमेशा इतना पछतावा महसूस होता था कि उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। "मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया, किन्तु मैंने तेरे से कभी भी प्रेम नहीं किया है।" यीशु के पुनर्जीवन और स्वर्गारोहण के बाद उसने उन पर और भी अधिक पछतावा और दुःख महसूस किया। अपने अतीत के कार्यों को, अपनी वर्तमान कद-काठी को याद कर, वह प्रार्थना करने के लिए प्रायः यीशु के पास आता, परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट न कर पाने और परमेश्वर के मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण हमेशा पछतावा और आभार महसूस करता। ये मामले उसका सबसे बड़ा बोझ बन गए। उसने कहा, "एक दिन मैं तुझे वह सब अर्पित कर दूँगा जो मेरे पास है और सब कुछ जो मैं हूँ, मैं तुझे वह दूँगा जो सबसे अधिक मूल्यवान है।" उसने कहा, "परमेश्वर! मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है, और मेरे शरीर का कुछ भी मूल्य नहीं है। मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे मन में तेरे लिए विश्वास है और हृदय में तेरे लिए प्रेम है; ये ही दो चीज़ें मेरे पास तुझे देने के लिए हैं, इसके अलावा और कुछ नहीं है।" पतरस यीशु के वचनों से बहुत प्रोत्साहित हुआ, क्योंकि यीशु के क्रूसीकरण से पहले उसने उससे कहा थाः "मैं इस संसार का नहीं हूँ, और तू भी इस संसार का नहीं है।" बाद में, जब पतरस एक अत्यधिक पीड़ा वाली स्थिति तक पहुँचा, तो यीशु ने उसे स्मरण दिलायाः "पतरस, क्या तू भूल गया है? मैं इस संसार का नहीं हूँ, और मैं सिर्फ अपने कार्य के लिए ही पहले चला गया। तू भी इस संसार का नहीं है, क्या तू भूल गया है? मैंने तुझे दो बार बताया है, क्या तुझे याद नहीं है?" पतरस ने उसे सुना और कहाः "मैं नहीं भूला हूँ!" तब यीशु ने कहाः "तूने एक बार मेरे साथ स्वर्ग में एक खुशहाल समय और मेरे बगल में एक समयावधि बितायी था। तू मुझे याद करता है और मैं तुझे याद करता हूँ। यद्यपि प्राणी मेरी दृष्टि में उल्लेख किए जाने के योग्य नहीं हैं, फिर भी मैं किसी निर्दोष और प्यार करने योग्य प्राणी को कैसे प्रेम न करूँ? क्या तू मेरी प्रतिज्ञा को भूल गया है? तुझे धरती पर मेरे आदेश को स्वीकार करना होगा; तुझे वह कार्य पूरा करना होगा जो मैंने तुझे सौंपा है। एक दिन मैं तुझे अपनी ओर करने के लिए निश्चित रूप से तेरी अगुवाई करूँगा" इसे सुनने के बाद, पतरस और भी अधिक उत्साहित हो गया तथा उसे और भी अधिक प्रेरणा मिली, इतनी कि जब वह सलीब पर था, तो वह यह कहने में समर्थ थाः "परमेश्वर! मैं तुझे बेहद प्यार करता हूँ! यहाँ तक कि यदि तू मुझे मरने के लिए कहे, तब भी मैं तुझे बेहद प्यार करता हूँ! तू जहाँ कहीं भी मेरी आत्मा को भेजे, चाहे तू अपनी पिछली प्रतिज्ञाओं को पूरा करे या न करे, इसके बाद तू चाहे जो कुछ भी करे, मैं तुझे प्यार करता हूँ और तुझ पर विश्वास करता हूँ।" उसने जो थामे रखा वह था उसका विश्वास और सच्चा प्रेम।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 522

अब तुम्हें उस मार्ग को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ हो जाना चाहिए जो पतरस द्वारा लिया गया था। यदि तुमने इसे स्पष्ट रूप से से देख लिया, तो तुम उस कार्य के बारे में निश्चित होगे जो आज किया जा रहा है, इसलिए तुम शिकायत नहीं करोगे या निष्क्रिय नहीं होगे, या किसी भी चीज़ की लालसा नहीं करोगे। तुम्हें पतरस की उस समय की मनोदशा का अनुभव करना चाहिएः वह दुख से व्यथित था; उसने किसी भविष्य या किसी आशीष के लिए अब और नहीं कहा था। उसने संसारी लाभ, प्रसन्नता, प्रसिद्धि या धन-दौलत की कामना नहीं की, और केवल एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहा, जो कि परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और परमेश्वर को अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु को समर्पित करने के लिए था। तब वह अपने हृदय में संतुष्ट हो होगा। उसने प्रायः इन शब्दों के साथ परमेश्वर से प्रार्थना कीः "प्रभु यीशु मसीह, मैंने एक बार तुझे प्रेम किया, किन्तु मैंने तुझे वास्तव में प्रेम नहीं किया था। यद्यपि मैंने कहा था कि तुझ पर मेरा विश्वास है, किन्तु मैंने तुझे कभी भी एक सच्चे हृदय से प्रेम नहीं किया। मैंने केवल तेरी ओर देखा, तेरी सराहना की, और तुझे याद किया, किन्तु कभी भी तुझे प्रेम नहीं किया या तुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं किया।" वह हमेशा इस प्रकार का संकल्प करने के लिए प्रार्थना करता था, वह यीशु के वचनों के द्वारा निरंतर प्रोत्साहित होता था और उन्हें प्रेरणा में बदलता था। बाद में, एक अवधि तक अनुभव करने के बाद, यीशु ने, अपने लिए उसमें और अधिक तड़प पैदा करते हुए, उसकी परीक्षा ली। उसने कहाः "प्रभु यीशु मसीह! मैं तुझे कितना याद करता हूँ, तुझे देखने के लिए कितना लालायित रहता हूँ। मुझमें बहुत कमी है, और तेरे प्रेम को पूरा नहीं कर सकता हूँ। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे शीघ्र ही ले जा। तुझे मेरी कब आवश्यकता होगी? तू मुझे कब ले जाएगा? मैं कब एक बार फिर से तेरा चेहरा देखूँगा? मैं, भ्रष्ट होते रहने के लिए, इस शरीर में अब और नहीं जीना चाहता हूँ, और न ही अब और विद्रोह करना चाहता हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है वह मैं जितना शीघ्र कर सकता हूँ तुझे समर्पित करने के लिए तैयार हूँ, और अब मैं तुझे और उदास नहीं करना चाहता हूँ।" इस तरह से उसने प्रार्थना की, किन्तु उस समय उसे नहीं पता था कि यीशु उसमें क्या पूर्ण बनाएगा। अपनी परीक्षा की पीड़ा के दौरान, यीशु पुनः उसके सामने प्रकट हुआ और उसने कहाः "पतरस, मैं तुझे पूर्ण बनाना चाहता हूँ, इतना कि तू फल का एक टुकड़ा बन जाए, एक ऐसा जो मेरे द्वारा तेरी पूर्णता का ठोस रूप हो, और जिसका मैं आनन्द लूँगा। क्या तू वास्तव में मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या तूने वह किया जो मैं तुझे करने के लिए कहता हूँ? क्या मेरे कहे वचनों को तूने जीया है? तूने एक बार मुझे प्रेम किया, किन्तु यद्यपि तूने मुझे प्रेम किया, क्या तूने मुझे जिया है? तूने मेरे लिए क्या किया है? तू महसूस करता है कि तू मेरे प्रेम के अयोग्य है, किन्तु तूने मेरे लिए क्या किया है?" पतरस ने देखा कि उसने यीशु के लिए कुछ नहीं किया था और परमेश्वर के लिए अपना जीवन देने का पिछला वादा स्मरण किया। और इसलिए, उसने अब और शिकायत नहीं की, और उसकी प्रार्थनाएँ बाद में और बेहतर हो गईं। उसने यह कहते हुए प्रार्थना कीः "प्रभु यीशु मसीह! एक बार मैंने तुझे छोड़ा था, और एक बार तूने भी मुझे छोड़ा था। हमने अलग होकर, और साहचर्य में एक साथ समय बिताया। फिर भी तू मुझे अन्य सभी की अपेक्षा सबसे ज्यादा प्रेम करता है। मैंने बार-बार तेरे विरुद्ध विद्रोह किया और तुझे बार-बार दुःखी किया। ऐसी बातों को मैं कैसे भूल सकता हूँ? जो कार्य तूने मुझमें किया है और जो कुछ तूने मुझे सौंपा है मैं उसे हमेशा मन में रखता हूँ, मैं कभी नहीं भूलता हूँ। जो कार्य तूने मुझमें किया है उसके साथ मैंने अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है। तू जानता है कि मैं क्या कर सकता हूँ, और तू यह भी जानता है कि मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ। मैं तेरे आयोजनों को समर्पित होना चाहता हूँ और मेरे पास जो कुछ भी है वह सब मैं तेरे प्रति समर्पित कर दूँगा। केवल तू ही जानता है कि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ। यद्यपि शैतान ने मुझे बहुत अधिक मूर्ख बनाया और मैंने तेरे विरूद्ध विद्रोह किया, किन्तु मुझे विश्वास है कि तू मुझे उन अपराधों के लिए स्मरण नहीं करेगा, कि तू मेरे साथ उनके आधार पर व्यवहार नहीं करेगा। मैं अपना सम्पूर्ण जीवन तुझे समर्पित करना चाहता हूँ। मैं कुछ नहीं माँगता हूँ, और न ही मेरी अन्य आशाएँ या योजनाएँ हैं; मैं केवल तेरे इरादे के अनुसार कार्य करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ। मैं तेरे कड़वे कटोरे में से पीऊँगा और मैं तेरे आदेशों के लिए हूँ।"

तुम लोगों को उस मार्ग के बारे में स्पष्ट होना चाहिए जिस पर तुम लोग चलते हो; तुम लोगों को उस मार्ग के बारे में जिसे तुम भविष्य में लोगे, और इस बारे में कि यह क्या है जिसे परमेश्वर पूर्ण बनाएगा, और तुम्हें क्या सौंपा गया है, स्पष्ट होना चाहिए। एक दिन, शायद, तुम लोगों की परीक्षा ली जाएगी, और तब यदि तुम लोग पतरस के अनुभवों से प्रेरणा प्राप्त करने में समर्थ होगे, तो यह इस बात को दर्शाएगा कि तुम लोग वास्तव में पतरस के मार्ग पर चल रहे हो। पतरस के विश्वास और प्रेम के लिए, तथा परमेश्वर के प्रति उसकी निष्ठा के लिए उसकी परमेश्वर के द्वारा प्रशंसा की गई थी। और यह उसके हृदय में परमेश्वर के लिए ईमानदारी और ललक ही थी कि परमेश्वर ने उसे पूर्ण बनाया। यदि तुम लोगों के पास पतरस के जैसा प्रेम और विश्वास है, तो यीशु तुम लोगों को निश्चित रूप से पूर्ण बनाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 523

जब पतरस को परमेश्वर के द्वारा ताड़ना दी जा रही थी, तो उसने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मेरी देह अनाज्ञाकारी है, तू मुझे ताड़ना देता है और मेरा न्याय करता है। मैं तेरी ताड़ना और न्याय में आनन्दित होता हूँ, भले ही तू मुझे न चाहे, फिर भी मैं तेरे न्याय में तेरे पवित्र और धर्मी स्वभाव को देखता हूँ। जब तू मेरा न्याय करता है, ताकि अन्य लोग तेरे न्याय में तेरे धर्मी स्वभाव को देख सकें, तो मैं संतुष्टि का एहसास करता हूँ। अगर यह तेरा धर्मी स्वभाव प्रकट कर सके और सभी प्राणियों को तेरे धर्मी स्वभाव को देखने दे, और अगर यह तेरे लिए मेरे प्रेम को अधिक शुद्ध बना दे जिससे मैं एक धर्मी की सदृश्ता को प्राप्त कर सकूँ, तो तेरा न्याय अच्छा है, क्योंकि तेरी अनुग्रहकारी इच्छा ऐसी ही है। मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो विद्रोही है, और मैं अभी भी तेरे सामने आने के योग्य नहीं हूँ। मैं तुझसे चाहता हूँ कि तू मेरा और भी अधिक न्याय करे, चाहे क्रूर वातावरण के जरिए या बड़े क्लेश के जरिए; तू मेरा न्याय कैसे भी करे, यह मेरे लिए बहुमूल्य है। तेरा प्यार कितना गहरा है, और मैं बिना कोई शिकायत किए स्वयं को तेरे आयोजन पर छोड़ने को तैयार हूँ।" यह परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद का पतरस का ज्ञान है, और साथ ही यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम की गवाही है। आज, तुम लोगों को पहले से ही जीत लिया गया है—परन्तु यह जीत तुम लोगों में किस प्रकार प्रकट होती है? कुछ लोग कहते हैं, "मेरी जीत परमेश्वर का सर्वोच्च अनुग्रह और उसके द्वारा ऊँचा उठाया जाना है। केवल अब मुझे एहसास होता है कि मनुष्य का जीवन खोखला और महत्वहीन है। मनुष्य, पीढ़ी दर पीढ़ी सन्तानों को उत्पन्न करते और उनकी परवरिश करते और भागदौड़ करते हुए जीवन बिताता है, और अंत में उसको कुछ भी हासिल नहीं होता है। आज, परमेश्वर के द्वारा जीत लिए जाने के बाद ही मैंने देखा कि इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है; यह वास्तव में एक अर्थविहीन जीवन ही है। इससे बेहतर तो मैं मर जाऊँ और काम खत्म करूँ!" ऐसे लोग जिन पर विजय पायी जा चुकी है क्या उन्हें परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किया जा सकता है? क्या वे आदर्श और मिसाल बन सकते हैं? ऐसे लोग निष्क्रियता की मिसाल हैं, उनकी कोई आकांक्षाएँ नहीं हैं, और वे स्वयं की उन्नति के लिए संघर्ष नहीं करते हैं। भले ही वे ऐसा समझते हैं कि उन पर विजय पा ली गयी है, ऐसे निष्क्रिय लोग सिद्ध बनाए जाने के काबिल नहीं हैं। पतरस के जीवन के अंत के निकट, सिद्ध बना दिए जाने के बाद, उसने कहा "हे परमेश्वर! यदि मैं कुछ और वर्ष जीवित रहता, तो तेरे शुद्ध और गहरे प्रेम को हासिल करने की कामना करता।" जब वह क्रूस पर चढ़ाया ही जाने वाला था, उसने अपने हृदय में प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! तेरा समय आ गया है, वह समय जो तूने मेरे लिए तैयार किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना होगा, मुझे तेरे लिए इस गवाही को देना होगा, मैं आशा करता हूँ कि मेरा प्रेम तेरी अपेक्षाओं को सन्तुष्ट कर सकता है, और यह और अधिक शुद्ध हो सकता है। आज, तेरे लिए मरने, तेरे लिए क्रूस पर कीलों से ठोंके जाने के योग्य होना मेरे लिए तसल्ली और आश्वासन की बात है, क्योंकि तेरे लिए क्रूस पर चढ़ने और तेरी इच्छाओं को संतुष्ट करने, और स्वयं को तुझे दे पाने, और स्वयं के जीवन को तेरे लिए अर्पित करने से बढ़कर कोई और बात मुझे तृप्त नहीं कर सकती है। हे परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! यदि तू मुझे जीने की अनुमति देता है, तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहूँगा। जब तक मैं ज़िन्दा हूँ, मैं तुझसे प्रेम करूँगा। मैं तुझसे और भी अधिक गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है, और मेरी परीक्षा लेता है क्योंकि मैं धर्मी नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धर्मी स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम कर सकता हूँ, अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इस रीति से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरे धर्मी स्वभाव को देखने की इच्छा करता हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और काबिल बनाता है। मुझे लगता है कि मेरा अभी का जीवन और भी अधिक अर्थपूर्ण है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और तेरे लिए मरना सार्थक है। फिर भी मुझे अब तक संतुष्टि का एहसास नहीं हुआ है, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा ही जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाओं को सम्पूर्ण रीति से पूरा नहीं कर सकता हूँ, और मैंने बदले में तुझे बहुत ही कम अदा किया है। अपने जीवन में, मैं अपना सब कुछ तुझे वापस लौटाने में असमर्थ रहा हूँ; और मैं उससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी को याद करते हुए, मैं स्वयं को तेरा बहुत आभारी महसूस करता हूँ, और अपनी सभी ग़लतियों की क्षतिपूर्ति और उस सारे प्रेम का कर्ज़ जो मैंने तुझे नहीं चुकाया है, उसे अदा करने के लिए मेरे पास यही एक क्षण है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 524

मनुष्य को एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुसरण करना चाहिए, और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस के समान जीवन बिताने के लिए, उसे पतरस के ज्ञान और अनुभवों को धारण करना होगा। मुनष्य को ऐसी चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ऊँची और ज़्यादा गम्भीर हैं। उसे परमेश्वर को गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसे जीवन का अनुसरण करना होगा, जिसका मूल्य और अर्थ है। केवल यह ही जीवन है; केवल तब ही मनुष्य पतरस के समान होगा। तुझे सकारात्मक पहलु में प्रवेश करने के लिए सक्रिय होने की ओर ध्यान केन्द्रित करना होगा, और अति गम्भीर, अति विशिष्ट, और अति व्यावहारिक सच्चाईयों को नज़रअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए तुझे स्वयं को अधीनतापूर्वक पीछे हटने नहीं देना चाहिए। तेरा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुझे स्वयं को इस पथभ्रष्ट, और बेपरवाह जीवन से, जो किसी जानवर के जीवन के समान है, उससे स्वतंत्र होने के लिए रास्ते ढूँढ़ने होंगे। तुझे एक अर्थपूर्ण, मूल्यवान जीवन व्यतीत करना चाहिए, और तुझे स्वयं को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए, या अपने जीवन के खिलौने की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्योंकि हर व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम करने की आकांक्षा करता है, कोई सत्य अप्राप्य नहीं है, और कोई न्याय ऐसा नहीं है जिसके लिए वे दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं हो सकते हैं। तुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए? तुझे परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए, और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तेरे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है? सब से बढ़कर, तेरे पास ऐसी आकांक्षा और दृढ़ता होनी चाहिए, और तुझे उन बेहद कमज़ोर दुर्बल प्राणियों के समान नहीं होना चाहिए। तुझे सीखना होगा कि एक अर्थपूर्ण जीवन को कैसे अनुभव किया जाता है, तुझे अर्थपूर्ण सच्चाईयों का अनुभव करना चाहिए, और तुझे अपने आप से लापरवाही के साथ बर्ताव नहीं करना चाहिए। तेरे जाने बिना, तेरा जीवन यों ही गुज़र जाएगा; और उसके बाद, क्या तेरे पास परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तेरे पास पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और अंतरात्मा होनी चाहिए; तेरा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुझे स्वयं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुझे इस योग्य होना है कि तू सावधानी से विचार कर सके, कि तुझे अपने जीवन के साथ कैसा व्यवहार करना है, कि तुझे स्वयं को किस प्रकार परमेश्वर के सामने अर्पण करना चाहिए, कि तुझमें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए, चूँकि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, तुझे उससे उस रीति से कैसे प्रेम करना चाहिए जो ज़्यादा पवित्र, सुन्दर, एवं अच्छा हो। आज, तू केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकता है कि तुझ पर किस प्रकार विजय पायी गयी है, बल्कि तुझे उस पथ पर भी विचार करना होगा जिस पर तू भविष्य में चलेगा। तू सिद्ध बनाया जा सके, इसके लिए तेरे पास आकांक्षाएँ और साहस अवश्य होना चाहिए, और तुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि तू असमर्थ है। क्या सत्य की भी अपनी पसंदीदा चीज़ें होती हैं? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? यदि तू सत्य के पीछे पीछे चलता है, तो क्या यह तुझे अभीभूत कर सकता है? यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा रहता है, तो क्या यह तुझे मार कर नीचे गिरा देगा? यदि यह सचमुच में तेरी आकांक्षा है कि तू जीवन का अनुसरण करे, तो क्या जीवन तुझसे बच कर निकल जाएगा? यदि तेरे पास सत्य नहीं है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि सत्य तुझे नज़रंदाज़ करता है, बल्कि इसलिए है क्योंकि तू सत्य से दूर रहता है; यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि न्याय के साथ कुछ न कुछ गड़बड़ी है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तू विश्वास करता है कि यह तथ्यों से अलग है; कई सालों तक जीवन का पीछा करते हुए भी यदि तूने जीवन प्राप्त नहीं किया है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि जीवन के पास तेरे लिए कोई सद्विचार नहीं है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तेरे पास जीवन के लिए कोई सद्विचार नहीं है, और तूने जीवन को स्वयं से दूर कर दिया है; यदि तू ज्योति में जीता है, लेकिन ज्योति को पाने में असमर्थ रहा है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि ज्योति तुझे प्रकाशित करने में असमर्थ है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तूने ज्योति के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया, और इसलिए ज्योति तेरे पास से खामोशी से चली गई है। यदि तू अनुसरण नहीं करता है, तो केवल यह कहा जा सकता है कि तू फालतू कचरा है, तेरे जीवन में साहस बिल्कुल नहीं है, और तेरे पास अंधकार की ताकतों का विरोध करने के लिए हौसला नहीं है। तू बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर है! तू शैतान की उन ताकतों से बचने में असमर्थ है जो तुझे जकड़ लेती हैं, तू केवल इस प्रकार का सकुशल और सुरक्षित जीवन जीना और अपनी अज्ञानता में मरना चाहता है। जो तुझे हासिल करना चाहिए वह है विजय पा लिए जाने का तेरा अनुसरण; यह तेरा परम कर्तव्य है। यदि तू इस बात से संतुष्ट है कि तुझ पर विजय पा ली गयी है, तो तू ज्योति की अस्तित्व को दूर हटा देता है। तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 525

परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसको ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की मांग है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को इसकी आवश्यकता है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, और केवल तब ही वह परमेश्वर के लिए प्रेम को प्राप्त कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह आश्वस्त हो चुके हो, परन्तु जब तुम लोग जरा सा भी मुश्किलों का सामना करते हो तो तुम लोग परेशानी में आ जाते हो; तुम लोगों की कद-काठी अभी भी बहुत छोटी है, और एक गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का और भी अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति कुछ आदर है, तुम लोग परमेश्वर से डरते हो, और तुम लोग जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परन्तु तुम लोगों में उसके लिए बड़ा प्रेम नहीं है, और सच्चा प्रेम तो तुम लोगों ने बिलकुल भी हासिल नहीं किया है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही छिछला है, तुम लोगों की हस्ती अभी भी अपर्याप्त है। जब तुम लोग सचमुच में एक स्थिति का सामना करते हो, तब भी तुम लोग गवाही नहीं देते हो, तुम लोगों के प्रवेश का थोड़ा भाग ही अग्रसक्रिय होता है, और तुम लोगों में कोई समझ नहीं है कि अभ्यास कैसे करना है। बहुत से लोग निष्क्रिय और सुस्त होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किन्तु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं है, और न ही वे अपने लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट हैं। वे जिन्हें सिद्ध बनाया गया है उनके पास न केवल सामान्य मानवता है, बल्कि उनके पास ऐसे सत्य भी हैं जो विवेक के मापदण्डों से बढ़कर हैं, और जो विवेक के मानकों से ऊँचे हैं; वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, उससे बढ़कर, वे परमेश्वर को जान चुके हैं, यह देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रेमी है, वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है, और परमेश्वर में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है कि मनुष्य उसे प्रेम किये बिना नहीं रह सकता है। वे लोग जिन्हें सिद्ध किया गया है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं मांगता है, और जो एक व्यापार नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़ और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते हैं कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवाय और किसी भी चीज़ से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से मोल भाव नहीं करते हैं, और न ही वे विवेक के द्वारा परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को नापते हैं: तूने मुझे दिया है, तो उसके बदले मैं तुझसे प्रेम करता हूँ; यदि तू मुझे कुछ नहीं देता है, तो बदले में मेरे पास भी तेरे लिए कुछ नहीं है। वे जिन्हें सिद्ध किया गया है, हमेशा विश्वास करते हैं: परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर अपना कार्य करता है। चूँकि मेरा पास सिद्ध किए जाने के लिए यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यह बिलकुल वैसा ही है जैसा पतरस ने अनुभव किया था: जब वह बेहद कमज़ोर था, तब उसने प्रार्थना की और कहा, "हे परमेश्वर! तू जानता है कि मैंने समय और स्थान की परवाह न करते हुए, हमेशा तुझे याद किया है। तू जानता है कि चाहे कोई भी समय और स्थान हो, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी हस्ती बहुत छोटी है, मैं बहुत कमज़ोर और निर्बल हूँ, मेरा प्रेम बहुत सीमित है, और तेरे प्रति मेरी सत्यनिष्ठा बहुत थोड़ी सी है। तेरे प्रेम की तुलना में, मैं जीने के भी योग्य नहीं हूँ। मैं केवल यह कामना करता हूँ कि मेरा जीवन व्यर्थ न हो, और मैं न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल दे सकूँ, बल्कि, इसके अतिरिक्त, वह सब कुछ जो मेरे पास है उसे तेरे लिए समर्पित कर सकूँ। यदि मैं तुझे संतुष्ट कर सकूँ, तब एक प्राणी होने के नाते, मेरे पास मन की शांति होगी, और मैं कुछ और नहीं मांगूंगा। यद्यपि अब मैं कमज़ोर और निर्बल हूँ, फिर भी मैं तेरे प्रोत्साहन को नहीं भूलूंगा, और तेरे प्रेम को नहीं भूलूंगा। अब मैं तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के सिवाय कुछ और नहीं कर रहा हूँ। हे परमेश्वर, मुझे बहुत बुरा लग रहा है! मेरे हृदय में तेरे लिए जो प्रेम है उसे मैं तुझे वापस कैसे दे सकता हूँ, मेरी क्षमता में जो भी है उसे मैं कैसे कर सकता हूँ, मैं तेरी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य कैसे हो सकता हूँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ तुझे भेंट चढ़ाने के योग्य कैसे हो सकता हूँ? तू मनुष्य की कमज़ोरी को जानता है; मैं तेरे प्रेम के काबिल कैसे हो सकता हूँ? हे परमेश्वर! तू जानता है कि मेरी हस्ती छोटी सी है, कि मेरा प्रेम बहुत थोड़ा सा है। इस प्रकार की परिस्थितियों में मैं अपनी क्षमतानुसार सर्वोत्तम कार्य कैसे कर सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि मुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देना चाहिए, मैं जानता हूँ कि मुझे वह सब कुछ देना चाहिए जो मेरे पास है, परन्तु आज मेरी हस्ती बहुत छोटी है। मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे सामर्थ दे, और मुझे आत्मविश्वास दे, जिस से तुझे समर्पित करने के लिए मैं और अधिक शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के योग्य हो जाऊँगा, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ समर्पित करने के लिए और अधिक योग्य हो जाऊँगा; न केवल मैं तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो जाऊँगा, बल्कि तेरी ताड़ना, न्याय और परीक्षाओं, और यहाँ तक कि कठिन अभिशापों का भी अनुभव करने के लिए और अधिक योग्य हो जाऊँगा। तूने मुझे अपने प्रेम को देखने दिया है, और तुझसे प्रेम न करने में मैं असमर्थ हूँ, और आज भले ही मैं कमज़ोर और निर्बल हूँ, फिर भी मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ? तेरे प्रेम, ताड़ना और न्याय, इन सबसे मैंने तुझे जाना है, फिर भी तेरे प्रेम की पूर्ति करने में मैं असमर्थता भी महसूस करता हूँ, क्योंकि तू कितना महान है। जो कुछ मेरे पास है, वह सब कुछ मैं सृष्टिकर्ता को कैसे समर्पित कर सकता हूँ?" पतरस की विनती ऐसी ही थी, फिर भी उसकी हस्ती काफी नहीं थी। इस क्षण, उसने ऐसा महसूस किया मानो एक कटार उसके हृदय के आर-पार हो गया था और वह पीड़ा में था; वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या करना है। फिर भी वह लगातार प्रार्थना करता रहा: "हे परमेश्वर! मनुष्य की हस्ती बचकानी है, उसका विवेक कमज़ोर है, और तेरे प्रेम का प्रतिफल देना ही वह एक मात्र चीज़ है जिसे मैं हासिल कर सकता हूँ। आज, मैं नहीं जानता हूँ कि तेरी इच्छाओं को कैसे संतुष्ट करूँ, और मैं बस वह सब करना चाहता हो जो मैं कर सकता हूँ, जो कुछ मेरे पास है वो सब तुझे दूँ और वह सब कुछ तुझे समर्पित करूँ जो मेरे पास है। तेरे न्याय के बावजूद, तेरी ताड़नाओं के बावजूद, इसके बावजूद कि तू मुझे क्या देता है, इसके बावजूद कि तू मुझ से क्या ले लेता है, मुझे तेरे बारे में, छोटी सी भी शिकायत से आज़ाद कर। कई बार, जब तूने मुझे ताड़ना दी और मेरा न्याय किया, मैं अपने आप में कुड़कुड़ाता था, और मैं शुद्धता प्राप्त करने, या तेरी इच्छाओं की पूर्ति करने में असमर्थ था। मैंने मजबूरी में तेरे प्रेम का प्रतिफल दिया था, और इस घड़ी मैं अपने आप से और भी अधिक नफरत करता हूँ।" चूँकि पतरस परमेश्वर से शुद्ध प्रेम करने की खोज करता था इसलिए उसने इस प्रकार प्रार्थना की। वह खोज रहा था, और विनती कर रहा था, और, उससे बढ़कर, वह अपने आप पर इल्ज़ाम लगा रहा था, और परमेश्वर के सामने अपने पापों को अंगीकार कर रहा था। उसने महसूस किया कि वह परमेश्वर का ऋणी है, और उसने अपने आप से नफरत महसूस की, लेकिन फिर भी वह थोड़ा उदास और निष्क्रिय भी था। उसे हमेशा ऐसा महसूस होता था, कि मानो वह परमेश्वर की इच्छाओं के लिए बहुत उचित नहीं था, और वह अपना सर्वोत्तम कार्य करने में असमर्थ था। ऐसी स्थितियों में, पतरस ने अय्यूब के विश्वास का ही अनुसरण किया। उसने देखा था कि अय्यूब का विश्वास कितना बड़ा था, क्योंकि अय्यूब ने यह देखा था कि उसका सब कुछ परमेश्वर के द्वारा दिया गया था, और उसका सब कुछ ले लेना परमेश्वर के लिए स्वभाविक था, कि परमेश्वर जिसको चाहेगा उसको देगा-परमेश्वर का धर्मी स्वभाव ऐसा ही था। अय्यूब ने कोई शिकायत नहीं की थी, और वह तब भी परमेश्वर की स्तुति करने में समर्थ था। पतरस भी स्वयं को जानता था, और उसने अपने हृदय में प्रार्थना की, "आज अपने विवेक का इस्तेमाल करके तेरे प्रेम का बदला चुका कर मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए और मैंने तुझे जितना अधिक प्रेम वापस किया है उससे भी मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार बहुत ही भ्रष्ट हैं, और मैं तुझे सृष्टिकर्ता के रूप में देख पाने में असमर्थ हूँ। क्योंकि मैं अभी भी तुझसे प्रेम करने के योग्य नहीं हूँ, मुझे वह योग्यता हासिल करनी होगी जिससे मेरे पास जो भी है, वह सब कुछ मैं तुझे समर्पित कर सकूँ, और मैं यह खुशी से करूँगा। मुझे वह सब कुछ जानना होगा जो तूने किया है, और मेरे पास कोई विकल्प नहीं होना चाहिए, और मुझे तेरे प्रेम को देखना होगा, और मुझे तेरी स्तुति करने और तेरे पवित्र नाम का गुणगान करने योग्य होना होगा, ताकि तू मेरे ज़रिए बड़ी महिमा प्राप्त कर सके। मैं तेरी इस गवाही में तेरे साथ मज़बूती के साथ खड़े होने को तैयार हूँ। हे परमेश्वर! तेरा प्रेम कितना बहुमूल्य और सुन्दर है; मैं उस दुष्ट के हाथों में जीने की कामना कैसे कर सकता था? क्या मुझे तेरे द्वारा नहीं बनाया गया था? मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन कैसे जी सकता था? मैं यह ज़्यादा पसंद करता हूँ कि मेरा सारा सत्व तेरी ताड़नाओं के मध्य रहे। मैं उस दुष्ट के शासन के अधीन नहीं जीना चाहता हूँ। यदि मुझे पवित्र बनाया जा सकता है, और यदि मैं अपना सब कुछ तुझे समर्पित कर सकता हूँ, तो मैं तेरे न्याय और ताड़ना को अपने शरीर और मन की भेंट चढ़ाने को तैयार हूँ, क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ, और मैं उसके शासन के अधीन जीवन बिताने में इच्छुक नहीं हूँ। मेरा न्याय करने द्वारा तू अपने धर्मी स्वभाव को दर्शाता है; मैं खुश हूँ, और मुझे थोड़ी भी शिकायत नहीं है। यदि मैं प्राणी होने के कर्तव्य को निभा सकूँ, तो मैं तैयार हूँ कि मेरा सम्पूर्ण जीवन तेरे न्याय के साथ जुड़ जाए, जिसके जरिए मैं तेरे धर्मी स्वभाव को जान पाऊँगा, और उस दुष्ट के प्रभाव से अपने आपको छुड़ा पाऊँगा।" पतरस ने हमेशा इस प्रकार प्रार्थना की, हमेशा इस प्रकार ही खोज की, और सापेक्षिक रूप से कहें तो वह एक ऊँचे आयाम तक पहुँच गया। वह न केवल परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो पाया, बल्कि, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, उसने एक प्राणी होने के अपने कर्तव्य को भी निभाया। उस पर न केवल उसके विवेक के द्वारा दोष नहीं लगाया गया था, बल्कि वह विवेक के मानकों से परे होने में भी सक्षम हो गया था। उसकी प्रार्थनाएँ लगातार ऊपर परमेश्वर के सामने पहुँचती रहीं, कुछ इस तरह कि उसकी आकांक्षाएँ हमेशा से और ऊँची हो गईं, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम हमेशा से और विशाल हो गया। यद्यपि उसने अति पीड़ादायक दर्द सहा था, फिर भी वह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं भूला, और तब भी उसने परमेश्वर की इच्छा को समझने की क्षमता को प्राप्त करने का प्रयास किया। उसकी प्रार्थनाओं में निम्नलिखित वचन कहे गए: तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के अलावा मैंने और कुछ पूर्ण नहीं किया है। मैंने शैतान के सामने तेरे लिए गवाही नहीं दी है, मैंने अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद नहीं किया है, और मैं अब भी शरीर के बीच जीता हूँ। मैं अपने प्रेम का इस्तेमाल कर के शैतान को हराने की, और उसे लज्जित करने की, और इस प्रकार तेरी इच्छा को संतुष्ट कर पाने की कामना करता हूँ। मैं अपना सर्वस्व तुझे समर्पित कर पाने की, अपना थोड़ा सा भी अंश शैतान को देने की इच्छा नहीं करता हूँ, क्योंकि शैतान तेरा शत्रु है। जितना ज़्यादा उसने इस दिशा में प्रयास किया, उतना ही ज़्यादा वह द्रवित हुआ, और उतना ही ज़्यादा इन विषयों पर उसका ज्ञान बढ़ता गया। एहसास किए बगैर, उसे पता चल गया कि उसे अपने आपको शैतान के प्रभाव से मुक्त कर देना चाहिए, और स्वयं को पूरी तरह परमेश्वर के पास वापस लौटा देनाचाहिए। उसने ऐसा ही आयाम हासिल किया था। वह शैतान के प्रभाव से भी आगे बढ़ रहा था, और वह शरीर की अभिलाषाओं और मौज मस्ती से अपने आपको छुड़ा रहा था, और वह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय दोनों को और अधिक गम्भीरता से अनुभव करने को तैयार था। उसने कहा, "यद्यपि मैं तेरी ताड़नाओं और तेरे न्याय के बीच रहता हूँ, उससे जुड़ी कठिनाई के बावजूद, मैं अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन व्यतीत करना नहीं चाहता हूँ, और मैं शैतान के छल कपट को सहना नहीं चाहता हूँ। मैं तेरे अभिशापों के बीच जी कर आनन्दित हूँ, मैं शैतान की आशीषों के मध्य जी कर कष्ट में हूँ। मैं तुझसे प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं तेरे न्याय के बीच जीवन बिताता हूँ, और इस से मुझे बहुत आनन्द प्राप्त होता है। तेरी ताड़ना और न्याय धर्मी और पवित्र है; यह मुझे शुद्ध करने के लिए है, और उससे बढ़कर मुझ बचाने के लिए है। मैं अधिक पसंद करूँगा कि अपना सारा जीवन तेरी देखरेख में तेरे न्याय के बीच बिता दूँ। मैं एक घड़ी भी शैतान के प्रभुत्व में जीवन बिताने को तैयार नहीं हूँ; मैं तेरे द्वारा शुद्ध होना चाहता हूँ; और मैं दुख-तकलीफ भी सहूँ, तो भी मैं शैतान के द्वारा शोषित होने और छले जाने को इच्छुक नहीं हूँ। मुझे, इस प्राणी को, तेरे द्वारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, तेरे द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए, और तेरे द्वारा न्याय किया जाना चाहिए, और तेरे द्वारा ताड़ना दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि मुझे तेरे द्वारा शापित भी किया जाना चाहिए। जब तू मुझे आशीष देने की इच्छा करता है तो मेरा हृदय आनन्दित होता है, क्योंकि मैं तेरे प्रेम को देख चुका हूँ। तू सृष्टिकर्ता है, और मैं एक सृष्टि हूँ: मुझे तुझको धोखा देकर शैतान के प्रभुत्व में जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए, और मुझे शैतान के द्वारा शोषित भी नहीं किया जाना चाहिए। शैतान के लिए जीने के बजाय मुझे तेरा घोड़ा, या बैल होना चाहिए। मैं तेरी ताड़नाओं के मध्य, बिना किसी शारीरिक आनन्द के, जीवन व्यतीत करना ज़्यादा पसंद करूँगा, और यदि मैं तेरा अनुग्रह खो भी दूँ तो भी इससे मुझे प्रसन्नता होगी। यद्यपि तेरा अनुग्रह मेरे साथ नहीं है, फिर भी मैं तेरे द्वारा ताड़ना दिए जाने और न्याय किए जाने से प्रसन्न हूँ; यह तेरी सर्वोत्तम आशीष है, और तेरा सबसे बड़ा अनुग्रह है। यद्यपि तू हमेशा प्रतापी है और मेरे प्रति क्रोधित है, किन्तु मैं तुझको नहीं छोड़ सकता हूँ, और मैं अभी भी तुझ से जी-भर कर प्रेम नहीं कर पाता हूँ। मैं तेरे घर में रहना अधिक पसंद करूँगा, मैं तेरे द्वारा शापित और प्रताड़ित किया जाना, और मार खाना अधिक पसंद करूँगा, मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीने को तैयार नहीं हूँ, न ही मैं केवल शरीर के लिए भाग-दौड़ करने की इच्छा करता हूँ, और शरीर के लिए जीने के लिए तो बिलकुल भी तैयार नहीं हूँ।" पतरस का प्रेम एक पवित्र प्रेम था। यह सिद्ध किए जाने का अनुभव है, और यह सिद्ध किए जाने का सर्वोच्च आयाम है, और इसको छोड़ और कोई जीवन नहीं है जो और अधिक सार्थक हो। उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार किया, उसने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को संजोकर रखा, और पतरस में इसको छोड़ कुछ भी और अधिक बहुमूल्य नहीं था। उसने कहा, "शैतान मुझे भौतिक आनन्द देता है, परन्तु मैं उनको संजोकर नहीं रखता हूँ। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय मुझ पर आती है—मैं इसी में अनुग्रहित हूँ, और मुझे इसी में आनन्द मिलता है, और मैं इसी में आशीषित हूँ। यदि परमेश्वर का न्याय ना होता तो मैं परमेश्वर से कभी प्यार नहीं कर पाता, मैं अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताता, मुझे अभी भी उसके द्वारा नियन्त्रित किया जाता, और उसके आदेश के अधीन होता। यदि स्थिति ऐसी होती, तो मैं कभी भी एक असल इंसान नहीं बन पाता, क्योंकि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहता, और मैं अपनी समग्रता को परमेश्वर को समर्पित नहीं कर पाता। भले ही परमेश्वर मुझे आशीष न दे, और मुझे बिना किसी भीतरी सुकून के इस तरह छोड़ दे, मानो एक आग मेरे भीतर जल रही हो, और बिना किसी शांति या आनन्द के छोड़ दे, और भले ही परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन कभी मुझ से दूर नहीं हुआ, फिर भी मैं परमेश्वर की ताड़ना और न्याय में उसके धर्मी स्वभाव को देखने में सक्षम हूँ। मैं इस में आनन्दित हूँ; जीवन में इस से बढ़कर कोई मूल्यवान और अर्थपूर्ण बात नहीं है। यद्यपि उसकी सुरक्षा और देखभाल क्रूर ताड़ना, न्याय, अभिशाप और पीड़ा बन चुके हैं, फिर भी मैं इन चीज़ों में आनन्दित होता हूँ, क्योंकि वे मुझे बेहतर ढंग से शुद्ध कर सकते हैं और बदल सकते हैं, मुझे परमेश्वर के नज़दीक ला सकते हैं, मुझे परमेश्वर से और भी अधिक प्रेम करने के योग्य बना सकते हैं, और परमेश्वर के प्रति मेरे प्रेम को और अधिक शुद्ध कर सकते हैं। यह मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं एक जीवधारी रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करूँ, यह मुझे परमेश्वर के सामने और शैतान के प्रभाव से दूर ले जाता है, ताकि मैं आगे से शैतान की सेवा न करूँ। जब मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन नहीं बिताता हूँ, और जब मैं, बिना हिचकिचाए, अपना सब कुछ जो मेरे पास है और वह सब कुछ जिसे मैं कर सकता हूँ उसे परमेश्वर को समर्पित करने के योग्य हो जाता हूँ—तब ही मैं पूरी तरह संतुष्ट होऊँगा। यह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय है जिसने मुझे बचाया है, और मेरे जीवन को परमेश्वर की ताड़नाओं और न्याय से अलग नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी पर मेरा जीवन शैतान के प्रभुत्व में है, और यदि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय की देखभाल और सुरक्षा नहीं होती, तो मैं हमेशा शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताता, और, इसके अतिरिक्त, मेरे पास एक सार्थक जीवन जीने का अवसर या साधन नहीं होता। बस अगर परमेश्वर की ताड़ना और न्याय मुझे कभी छोड़कर न जाए, तब ही मैं परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किए जाने के योग्य हो सकता हूँ। केवल परमेश्वर के कठोर शब्दों, धार्मिक स्वभाव, और परमेश्वर के प्रतापी न्याय के कारण ही, मैंने सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त की है, और ज्योति में रहा हूँ, और मैंने परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त किया है। शुद्ध किए जाने में, और अपने आपको शैतान से मुक्त कराने सक्षम होना, और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताना—यह आज मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी आशीष है।" यह पतरस के द्वारा अनुभव किया गया सर्वोच्च आयाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 526

मनुष्य शरीर में रहता है, इसका मतलब है कि वह मानवीय नरक में रहता है, और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना के बगैर, मनुष्य शैतान के समान ही गन्दा है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस ने यह विश्वास किया कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सब से बड़ी सुरक्षा और सब से महान अनुग्रह है। केवल परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा ही मनुष्य जागृत हो सकता है, और शरीर और शैतान से बैर कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, वह उसे उसके छोटे संसार से आज़ाद करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने देता है। ताड़ना और न्याय की अपेक्षा कोई बेहतर उद्धार नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता और मेरा न्याय करता है, मैं यह जानूँगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनन्द और शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से प्रताड़ित करे, किन्तु जब तक तू मुझे नहीं छोड़ता है तब तक मेरा हृदय सुकून से रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी सबसे बेहतरीन सुरक्षा और सबसे महान आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। जो अनुग्रह आज तू मुझे देता है वह तेरे धर्मी स्वभाव का प्रकटीकरण है, ताड़ना और न्याय है; इसके अतिरिक्त, यह एक परीक्षा है, और, उससे बढ़कर, यह दुखभोग का जीवन है।" पतरस देह के आनंदों को अलग रख सकता था, और एक अत्यंत गहरे प्रेम और सबसे बड़ी सुरक्षा की खोज कर सकता था, क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से इतना कुछ हासिल किया था। अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होना चाहता है और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और परमेश्वर के प्रहार को अपने आप से दूर नहीं होने देना चाहिए, इस प्रकार वह अपने आपको शैतान के छल प्रपंच और प्रभाव से मुक्त कर सकता है और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सकता है। यह जानो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ज्योति है, और वह मनुष्य के उद्धार की ज्योति है, और मनुष्य के लिए उससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव के अधीन जीता है, और देह में जीता है; यदि उसे शुद्ध नहीं किया जाता है और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है, तो वह पहले से कहीं ज़्यादा भ्रष्ट बन जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा। पतरस ने प्रार्थना की, "परमेश्वर जब तू मुझसे कृपा के साथ व्यवहार करता है तो मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, और मुझे सुकून मिलता है; जब तू मुझे ताड़ना देता है, तब मुझे उससे कहीं ज़्यादा सुकून और आनन्द मिलता है। यद्यपि मैं कमज़ोर हूँ, और अकथनीय कष्ट सहता हूँ, यद्यपि मेरे जीवन में आँसू और उदासी है, लेकिन तू जानता है कि यह उदासी मेरी अनाज्ञाकारिता के कारण है, और मेरी कमज़ोरी के कारण है। मैं रोता हूँ क्योंकि मैं तेरी इच्छाओं को संतुष्ट नहीं कर पाता हूँ, मैं दुखी और खेदित हूँ क्योंकि मैं तेरी अपेक्षाओं के प्रति नाकाफी हूँ, लेकिन मैं इस आयाम को हासिल करने के लिए तैयार हूँ, मैं वह सब करने के लिए तैयार हूँ जो मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए कर सकता हूँ। तेरी ताड़ना मेरे लिए सुरक्षा लेकर आई है, और मुझे सब से बेहतरीन उद्धार दिया है; तेरा न्याय तेरी सहनशीलता और धीरज को ढँक देता है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, मैं तेरी दया और करूणा का आनन्द नहीं ले पाऊँगा। आज, मैं यह और भी अधिक देखता हूँ कि तेरा प्रेम स्वर्ग से भी ऊँचा हो गया है और सबसे श्रेष्ठ हो गया है। तेरा प्रेम मात्र दया और करूणा नहीं है; किन्तु उससे भी बढ़कर, यह ताड़ना और न्याय है। तेरी ताड़ना और न्याय ने मुझे बहुत कुछ दिया है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, एक भी व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता है, और एक भी इंसान सृष्टिकर्ता के प्रेम को अनुभव करने के योग्य नहीं हो सकता है। यद्यपि मैंने सैकड़ों परीक्षाओं और क्लेशों को सहा है, और यहाँ तक कि मौत के करीब आ गया, फिर भी इन्होंने मुझे सचमुच में तुझे जानने और सर्वोच्च उद्धार प्राप्त करने दिया है। यदि तेरी ताड़ना, न्याय और अनुशासन मुझसे दूर हो गए होते, तो मैं अंधकार में शैतान के प्रभुत्व में जीवन बिताता। मनुष्य की देह से क्या लाभ है? यदि तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़ कर चले गए होते, तो यह ऐसा होता मानो तेरे आत्मा ने मुझे छोड़ दिया हो, मानो अब से तू मेरे साथ नहीं है। यदि ऐसा होता, तो मैं जीवन कैसे बिताता? यदि तू मुझे बीमारी देता है, और मेरी स्वतन्त्रता को ले लेता है, तो भी मैं जीवित रह सकता हूँ, परन्तु अगर तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़ देते, मेरे पास जीने का कोई रास्ता नहीं होगा। यदि मेरे पास तेरी ताड़ना और तेरा न्याय नहीं होता, तो मैंने तेरे प्रेम को खो दिया होता, एक ऐसे प्रेम को जो इतना गहरा है कि मैं इसे शब्दों में नहीं कह सकता हूँ। तेरे प्रेम के बिना, मैं शैतान के शासन के अधीन जीता, और तेरे महिमामय मुखड़े को देखने के काबिल नहीं हो पाता। मैं कैसे जीवित रह पाता? ऐसा अंधकार, ऐसा जीवन, मैं बिलकुल सह नहीं सकता था। तू मेरे साथ है तो यह ऐसा है मानो मैं तुझे देख रहा हूँ, तो मैं तुझे कैसे छोड़ सकता हूँ? मैं तुझ से विनती करता हूँ, मैं तुझ से याचना करता हूँ, तू मेरे सबसे बड़े सुकून को मत छीन, भले ही ये आश्वासन के मात्र थोड़े से शब्द हों। मैंने तेरे प्रेम का आनन्द लिया है, और आज मैं तुझ से दूर नहीं रह सकता हूँ; मैं तुझ से कैसे प्रेम नहीं कर सकता हूँ? मैंने तेरे प्रेम के कारण दुख में बहुत से आँसू बहाए हैं, फिर भी मैंने हमेशा से यह विश्वास किया है कि इस तरह का जीवन अधिक अर्थपूर्ण है, मुझे समृद्ध करने में अधिक योग्य है, मुझे बदलने में अधिक सक्षम है, और मुझे उस सत्य को हासिल करने देने में अधिक काबिल है जिसे सभी जीवधारियों के द्वारा धारण किया जाना चाहिए।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 527

मनुष्य का सारा जीवन शैतान के प्रभुत्व के अधीन बीतता है, और ऐसा एक भी इंसान नहीं है जो अपने बलबूते पर अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद कर सकता है। सभी लोग भ्रष्टता और खालीपन में, बिना किसी अर्थ या मूल्य के, एक गन्दे संसार में रहते हैं; वे शरीर के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसी लापरवाह ज़िन्दगियाँ बिताते हैं। उनके अस्तित्व का जरा सा भी मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर देगा। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करता है और बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं जानता है कि वह अपने आपको शैतान के नियन्त्रण से आज़ाद कैसे करे। विभिन्न युगों के दौरान, बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, और बहुत ही कम लोगों ने इसे समझा है। वैसे तो, मनुष्य शैतान से और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता है कि अपने आपको शैतान के फँसानेवाले प्रभाव से कैसे बचाए। आज, क्या तुम लोग अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन नहीं हो? तुम लोग अपने अनाज्ञाकारी कार्यों पर खेद नहीं करते हो, और यह तो बिलकुल भी महसूस नहीं करते हो कि तुम लोग अशुद्ध और अनाज्ञाकारी हो। परमेश्वर का विरोध करने के बाद, तुम लोगों को मन की शांति भी मिलती है और बहुत निश्चलता का एहसास भी होता है। क्या तेरी निश्चलता इसलिए नहीं है क्योंकि तू भ्रष्ट है? क्या यह मन की शांति तेरी अनाज्ञाकारिता से नहीं आती है? मनुष्य एक मानवीय नरक में रहता है, वह शैतान के बुरे प्रभाव में रहता है; पूरी धरती में, प्रेत मनुष्य के सथ रहते हैं, और मनुष्य की देह पर अतिक्रमण करते हैं। पृथ्वी पर, तू एक सुन्दर स्वर्गलोक में नहीं रहता है। जहाँ तू रहता है वह दुष्ट आत्मा का संसार है, एक मानवीय नरक है, और अधोलोक है। यदि मनुष्य को स्वच्छ नहीं किया जाता है, तो वह गंदगी से सम्बन्धित है; यदि परमेश्वर के द्वारा उसकी सुरक्षा और देखभाल नहीं की जाती है, तो वह अभी भी शैतान का बन्धुआ है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाती है, तो उसके पास शैतान के बुरे प्रभाव के दमन से बचने का कोई उपाय नहीं होगा। वह भ्रष्ट स्वभाव जो तू दिखाता है और वह अनाज्ञाकारी व्यवहार जो तू करता है, वे इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि तू अभी भी शैतान के शासन के अधीन जी रहा है। यदि तेरे मस्तिष्क और विचारों को शुद्ध नहीं किया गया है, और तेरे स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की गई है, तो तेरी पूरी हस्ती को अभी भी शैतान के प्रभुत्व के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरा मस्तिष्क शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरे विचार शैतान के द्वारा कुशलता से इस्तेमाल किए जाते हैं, और तेरी पूरी हस्ती शैतान के हाथों नियन्त्रित होती है। क्या तू जानता है कि, अभी, तू पतरस के स्तर से कितना दूर है? क्या तुझमें वह योग्यता है? तू आज की ताड़ना और न्याय के विषय में कितना जानता है? जितना पतरस जान पाया उसमें से तू कितना जान पाया है? आज, यदि तू जानने में असमर्थ है, तो क्या तू इस ज्ञान को भविष्य में जानने के योग्य हो पाएगा? तेरे जैसा आलसी और डरपोक व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को जानने में असमर्थ होता है। यदि तू शारीरिक शांति, और शारीरिक आनन्द का अनुसरण करता है, तो तेरे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तू वापस शैतान के पास लौट जाएगा, क्योंकि जिस प्रकार की ज़िन्दगी तू जीता है वह शैतानी, और शारीरिक है। आज जिस प्रकार की स्थितियाँ हैं, बहुत से लोग जीवन की खोज नहीं करते हैं, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने, या जीवन सम्बन्धी अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते हैं। इस प्रकार कैसे उन्हें सिद्ध बनाया जा सकता है? वे जो जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं उनके पास सिद्ध किए जाने का कोई अवसर नहीं होता है, और ऐसे लोग जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते हैं, और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के बुरे प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं। परमेश्वर के विषय उनके ज्ञान और उनके स्वभाव में परिवर्तन के पश्चात् उनके प्रवेश के संबंध में, वे गम्भीर नहीं हैं, वे उनके समान हैं जो सिर्फ धर्म में विश्वास करते हैं, और जो अपनी आराधना में मात्र रस्म का पालन करते हैं। क्या यह समय की बर्बादी नहीं है? परमेश्वर पर अपने विश्वास के सन्दर्भ में, यदि मनुष्य, जीवन के विषयों के प्रति गम्भीर नहीं है, वह सत्य में प्रवेश करने की कोशिश नहीं करता है, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश नहीं करता है, और परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज तो बिलकुल भी नहीं करता है, तो उसे सिद्ध नहीं बनाया जा सकता है। यदि तू सिद्ध किए जाने की इच्छा करता है, तो तुझे परमेश्वर के कार्य को समझना ही होगा। विशिष्ट रूप से, तुझे उसकी ताड़ना और उसके न्याय के महत्व को समझना होगा, और यह समझना होगा कि इस कार्य को मनुष्य पर क्यों किया जाता है। क्या तू यह स्वीकार कर सकता है? इस प्रकार की ताड़ना के दौरान, क्या तू पतरस के समान ही अनुभव और ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ है? यदि तू परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है, और अपने स्वभाव में परिवर्तनों की कोशिश करता है, तो तेरे पास सिद्ध किए जाने का अवसर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 528

उनके लिए जिन्हें सिद्ध किया जाना है, उन पर विजयी होने के कार्य का यह कदम अति आवश्यक है; केवल जब मनुष्य पर विजय पा ली जाती है, तभी मनुष्य सिद्ध किए जाने के कार्य का अनुभव कर सकता है। केवल जीत लिए जाने की भूमिका को निभाने का कोई बड़ा मूल्य नहीं है, जो तुझे परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं बनाएगा। सुसमाचार फैलाने हेतु अपनी भूमिका को निभाने के लिए तेरे पास कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि तू जीवन का अनुसरण नहीं करता है, और स्वयं के परिवर्तन और नवीनीकरण का अनुसरण नहीं करता है, और इसलिए तेरे पास जीवन का कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता है। इस कदम दर कदम कार्य के दौरान, तूने एक बार एक सेवा कर्ता के, और एक विषमता के समान कार्य किया था, किन्तु अंततः यदि तू पतरस के समान बनने के लिए अनुसरण नहीं करता है, और यदि तेरा अनुसरण उस मार्ग के अनुसार नहीं है जिसके द्वारा पतरस को सिद्ध बनाया गया था, तो, स्वाभाविक रूप से, तू अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव नहीं करेगा। यदि तू ऐसा व्यक्ति है जो सिद्ध किए जाने का अनुसरण करता है, तो तुझे गवाही दी होगी, और तू कहेगा: "परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और यद्यपि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मेरे पास परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धर्मी स्वभाव मुझमें आ गया है, और मेरे लिए आशीषें और अनुग्रह लाया है; यह उसका न्याय और उसकी ताड़ना है जिसने मुझे शुद्ध किया है और मेरी सुरक्षा की है। यदि परमेश्वर के द्वारा मेरी ताड़ना और मेरा न्याय नहीं किया जाता, और यदि परमेश्वर के कठोर वचन मेरे ऊपर नहीं आते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान सकता था, न ही मुझे बचाया जा सकता था। एक जीवधारी के रूप में, आज मैं यह देखता हूँ, एक व्यक्ति न केवल परमेश्वर के द्वारा बनाए गए सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है, परन्तु, अति महत्वपूर्ण रूप से, सभी जीवधारियों को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनन्द उठाना चाहिए, और उसके धर्मी न्याय का आनन्द उठाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनन्द के योग्य है। एक ऐसे जीव के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिया गया है, एक व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धर्मी स्वभाव में उसकी ताड़ना और उसका न्याय है, और, इसके अतिरिक्त, उसमें बड़ा प्रेम है। यद्यपि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और इसमें मैं आशीषित हुआ हूँ।" यह वह पथ है जिस पर वे चलते हैं जो सिद्ध किए जाने का और जिस ज्ञान के बारे में वे बोलते हैं, उसका अनुभव करते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके पास पतरस के समान ही अनुभव होते हैं। वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने जीवन प्राप्त किया है, और जिनके पास सत्य है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक अनुभव करता है, तो परमेश्वर के न्याय के दौरान वह अनिवार्य रूप से पूरी तरह शैतान के प्रभाव से अपने आपको को छुड़ा लेगा, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 529

आदम और हव्वा जिन्हें परमेश्वर के द्वारा आदि में बनाया गया था, वे पवित्र थे, दूसरे शब्दों में, जब वे अदन की वाटिका में थे तब वे पवित्र थे, और उनमें कोई अशुद्धता नहीं थी। वे यहोवा के प्रति निष्‍ठावान भी थे, और यहोवा को धोखा देने के विषय में कुछ नहीं जानते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनमें शैतान के प्रभाव का विघ्न नहीं था, उनमें शैतान का ज़हर नहीं था, और वे सभी मानवजाति में सबसे अधिक शु़द्ध थे। वे अदन की वाटिका में रहते थे, वे हर प्रकार की गन्दगी से दूर थे, वे देह के कब्ज़े में नहीं थे, और वे यहोवा का आदर करते थे। बाद में, जब शैतान के द्वारा उनकी परीक्षा ली गई, तो उनके पास साँप का ज़हर था और यहोवा को धोखा देने की इच्छा थी, और वे शैतान के प्रभाव में जीवन बिताने लगे। आदि में, वे पवित्र थे और यहोवा का आदर करते थे; केवल इसी प्रकार से वे मानव थे। बाद में, जब शैतान के द्वारा उनकी परीक्षा ली गई, तब उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया, और शैतान के प्रभाव के अधीन जीवन बिताने लगे। धीरे धीरे उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया, और उन्होंने मनुष्य के मूल स्वरूप को खो दिया। आदि में, मनुष्य के पास यहोवा की श्वास थी, और वह थोड़ा भी अनाज्ञाकारी नहीं था, और उसके हृदय में कोई बुराई नहीं थी। उस समय, मनुष्य सचमुच में मानव था। शैतान के द्वारा कलुषित किए जाने के बाद, मनुष्य पशु बन गया। उसके विचार बुराई और गन्दगी से भर गए, और उनमें कोई अच्छाई और पवित्रता नहीं थी। क्या यह शैतान नहीं है? तूने परमेश्वर के बहुत से कार्य का अनुभव किया है, फिर भी तू नहीं बदला है और तुझे शुद्ध नहीं किया गया है। तू अभी भी शैतान के प्रभुत्व में जीवन बिताता है, और अभी भी परमेश्वर को समर्पित नहीं होता है। यह एक ऐसा व्यक्ति है जिस पर विजय पायी जा चुकी है लेकिन उसे सिद्ध नहीं बनाया गया है। और ऐसा क्यों कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति को सिद्ध नहीं किया गया है? क्योंकि यह व्यक्ति जीवन या परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण नहीं करता है, और शारीरिक आनन्द और क्षणिक सुख से अधिक किसी और चीज़ को नहीं चाहता है। इसके परिणामस्वरूप, उसके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और वो मनुष्य के उस मूल रूप को फिर से प्राप्त नहीं करता है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। ऐसे लोग चलती फिरती लाशें हैं, वे मरे हुए लोग हैं जिनमें कोई आत्मा नहीं है! वे जो आत्मा में विषयों के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते हैं, वे जो पवित्रता का अनुसरण नहीं करते हैं, और वे जो सत्य को जीने का अनुसरण नहीं करते हैं, वे जो केवल नकारात्मक पहलु पर विजय पा लिए जाने से ही संतुष्ट होते हैं, और जो परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं जी सकते और पवित्र मनुष्य बनने में असमर्थ होते हैं—ये ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है। क्योंकि, अगर मनुष्य सत्य के बिना है, तो वह परमेश्वर की परीक्षाओं के मध्य स्थिर खड़े रहने में असमर्थ होता है; केवल वे लोग जो परमेश्वर की परीक्षाओं के दौरान स्थिर खड़े रह सकते हैं वे ही ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया गया है। मैं ऐसे लोगों को चाहता हूँ जो पतरस के समान हैं, ऐसे लोग जो सिद्ध किए जाने का अनुसरण करते हैं। आज का सत्य उन्हें दिया जाता है जो उसके लिए लालसा और उसकी खोज करते हैं। यह उद्धार उन्हें दिया जाता है जो परमेश्वर के द्वारा उद्धार पाने की लालसा करते हैं, और यह उद्धार सिर्फ तुम लोगों द्वारा ग्रहण करने के लिए नहीं है, परन्तु यह इसलिए भी है ताकि तुम लोग परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाओ। तुम लोग परमेश्वर को ग्रहण करते हो ताकि परमेश्वर भी तुम लोगों को ग्रहण कर सके। आज मैंने ये वचन तुम लोगों से कहे हैं, और तुम लोगों ने इन्हें सुना है, और तुम लोगों को इन वचनों के अनुसार व्यवहार करना है। अंत में, जब तुम लोग इन वचनों को व्यवहार में लाओगे तब मैं इन वचनों के द्वारा तुम लोगों को ग्रहण कर लूँगा; उस समय ही, तुम लोगों ने भी इन वचनों को ग्रहण लिया होगा, दूसरे शब्दों में, तुम लोगों ने इस सर्वोच्च उद्धार को ग्रहण कर लिया होगा। तुम लोगों को शुद्ध कर दिए जाने के बाद, तुम लोग सच्चे मानव हो जाओगे। यदि तू सत्य को जीने में असमर्थ है, या उस व्यक्ति के समान जीवन बिताने में असमर्थ है, जिसे सिद्ध किया गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तू एक मानव नहीं है, तू एक चलती फिरती लाश है, और एक पशु है, क्योंकि तुझमें सत्य नहीं है, दूसरे शब्दों में कहें तो तुझमें यहोवा की श्वास नहीं है, और इस प्रकार तू मरा हुआ इंसान है जिसमें कोई आत्मा नहीं है! यद्यपि विजय पा लिए जाने के बाद गवाही देना संभव है, परन्तु जो तू प्राप्त करता है वह एक छोटा सा उद्धार है, और तू ऐसा जीवित प्राणी नहीं बन पाया है जिसमें आत्मा है। यद्यपि तूने ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है, फिर भी उसके परिणामस्वरूप तेरा स्वभाव नहीं बदला है या परिवर्तित नहीं हुआ है; तू अभी पुराना मनुष्य है, तू अभी भी शैतान का है, और तू कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हैं जिसे शुद्ध किया गया है। केवल ऐसे लोगों का मोल है जिन्हें सिद्ध किया गया है, और केवल ऐसे ही लोगों ने सच्चे जीवन को प्राप्त किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 530

आज, कुछ लोग परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जाने का लगातार प्रयास करते हैं, किन्तु जब उन पर विजय पा ली जाती है उसके बाद उन्हें सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। जहाँ तक आज बोले गए वचनों की बात है, यदि, जब परमेश्वर लोगों को इस्तेमाल करता है, तू अभी भी उन्हें पूरा करने में असमर्थ है, तो तुझे सिद्ध नहीं बनाया गया है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को सिद्ध बनाया जाने की समयावधि के अंत का आगमन यह निर्धारित करेगा कि परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को हटा दिया जाएगा या इस्तेमाल किया जाएगा। ऐसे लोग जिन पर विजय पा ली गयी है वे निष्क्रियता और नकारात्मकता के उदाहरणों से बढ़कर और कुछ नहीं हैं; वे नमूने और आदर्श हैं, किन्तु वे इसके विपरीत होनेसे बढ़कर और कुछ नहीं हैं। केवल जब मनुष्य के पास जीवन होता है, जब उसका स्वभाव बदलता है, और जब वह भीतरी और बाहरी परिवर्तन हासिल कर लेता है तभी उसे पूरी तरह सिद्ध बनाया जाएगा। आज, तुम क्या चाहते हो; तुम पर विजय पायी जाए, या सिद्ध बना दिया जाए? तू किसे हासिल करना चाहता है? क्या सिद्ध किए जाने की शर्तों को तूने पूरा कर लिया है? तुझमें अभी भी किसकी कमी है? तुझे स्वयं को कैसे सुसज्जित करना चाहिए, तुझे अपनी कमियों को कैसे पूरा करना चाहिए? तुझे सिद्ध किए जाने के पथ पर कैसे प्रवेश करना चाहिए? तुझे स्वयं को पूरी तरह कैसे सौंपना चाहिए? तू कहता है कि तुझे सिद्ध बनाया जाए, तो क्या तू पवित्रता का अनुसरण करता है? क्या तू ऐसा इंसान है जो ताड़ना और न्याय का अनुभव करने की चेष्टा करता है ताकि तुझे शुद्ध किया जा सके? तू शुद्ध होने का अनुसरण करता है, तो क्या तू ताड़ना और न्याय को स्वीकार करने के लिए तैयार है? तू परमेश्वर को जानने की बात कहता है, किन्तु क्या तेरे पास उसकी ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है? आज, अधिकतर कार्य जो वह तुझ पर करता है वो ताड़ना और न्याय है; उस कार्य के विषय में तेरा ज्ञान क्या है, जिसे तेरे ऊपर किया गया है? क्या वह ताड़ना और न्याय जिसका तूने अनुभव किया है उसने तुझे शुद्ध किया है? क्या इसने तुझे परिवर्तित किया है? क्या इसका तेरे ऊपर कोई प्रभाव पड़ा है? क्या तू आज के बहुत से कार्यों—शाप, न्याय, और रहस्यों के खुलासे—से थक गया है, या क्या तू महसूस करता है कि वे तेरे लिए बहुत लाभदायक हैं? तू परमेश्वर से प्रेम करता है, किन्तु तू किस कारण से उससे प्रेम करता है? क्या तू उससे इसलिए प्रेम करता है क्योंकि तूने अनुग्रह प्राप्त किया है? या तू शांति और आनन्द प्राप्त करने के बाद उससे प्रेम करता है? या तू उसकी ताड़ना और उसके न्याय के द्वारा शुद्ध किए जाने के बाद उससे प्रेम करता है? वह वास्तव में कौन सी बात है जो तुझे परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित करती है? सिद्ध होने के लिए पतरस ने वास्तव में किन शर्तों को पूरा किया था? सिद्ध होने के बाद, वह कौन सा निर्णायक तरीका था जिसके तहत इसे प्रकट किया गया था? क्या उसने प्रभु यीशु से इसलिए प्रेम किया क्योंकि वह उसकी लालसा करता था, या इसलिए क्योंकि वह उसे देख नहीं सकता था, या इसलिए क्योंकि उसकी निन्दा की गई थी? या उसने प्रभु यीशु से कहीं ज़्यादा प्रेम इसलिए किया क्योंकि उसने क्लेशों के कष्ट को स्वीकार कर लिया था, स्वयं की अशुद्धता और अनाज्ञाकारिता को जान पाया था, और प्रभु की पवित्रता को जान पाया था? क्या परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय के कारण परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम और अधिक शुद्ध हो गया था, या किसी और कारण से? इसमें से कौन सा कारण सही है? तू परमेश्वर के अनुग्रह के कारण उससे प्रेम करता है और इसलिए क्योंकि आज उसने तुझे थोड़ी सी आशीष दी है। क्या यह सच्चा प्रेम है? तुझे परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? क्या तुझे उसकी ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार करना चाहिए और उसके धर्मी स्वभाव को देखने के बाद, उसे सच में प्रेम करने में समर्थ होना चाहिए, कुछ इस तरह कि तू पूरी तरह विश्वस्त हो जाये, और तेरे पास उसका ज्ञान हो? पतरस के समान, क्या तू कह सकता है कि तू परमेश्वर से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता है? क्या ताड़ना और न्याय के बाद जीत लिए जाने के लिए तू अनुसरण करता है, या ताड़ना और न्याय के बाद शुद्ध, सुरक्षित और सँभाले जाने के लिए अनुसरण करता है? तू इनमें से किसका अनुसरण करता है? क्या तेरा जीवन अर्थपूर्ण है, या अर्थहीन और बिना किसी मूल्य का है? तुझे शरीर चाहिए, या तुझे सत्य चाहिए? तू न्याय की इच्छा करता है या राहत की? परमेश्वर के कार्यों का इतना अनुभव करने के बाद, और परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को देखने के बाद, तुझे किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए? तुझे इस पथ पर किस प्रकार चलना चाहिए? तू परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को व्यवहार में कैसे ला सकता है? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ने तुझ पर कोई असर डाला है? तुझमें परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है कि नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि तू किसे जीता है, और तू किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता है! तेरे होंठ कहते हैं कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, फिर भी तू उसी पुराने और भ्रष्ट स्वभाव को जीता है; तुझमें परमेश्वर का कोई भय नहीं है, और तेरे पास विवेक तो बिलकुल भी नहीं है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं? क्या वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार करते हैं? तू कहता है कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है और उस पर विश्वास करता है, फिर भी तू अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ता है। तेरे कार्य में, तेरे प्रवेश में, उन शब्दों में जो तू बोलता है, और तेरे जीवन में परमेश्वर के प्रति तेरे प्रेम का कोई प्रकटीकरण नहीं है, और परमेश्वर के प्रति कोई आदर नहीं है। क्या यह एक ऐसा इंसान है जिसने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है? क्या ऐसा कोई इंसान पतरस के समान हो सकता है? क्या वे लोग जो पतरस के समान हैं उनके पास केवल ज्ञान होता है, परन्तु वे उसे जीते नहीं हैं? आज, वह कौन सी शर्त है जिसके अनुसार मनुष्य को एक वास्तविक जीवन बिताना है? क्या पतरस की प्रार्थनाएँ उसके मुँह से निकलने वाले शब्दों से बढ़कर और कुछ नहीं थे? क्या वे उसके हृदय की गहराईयों से निकले हुए शब्द नहीं थे? क्या पतरस ने केवल प्रार्थना की थी, और सत्य को व्यवहार में नहीं लाया था? तेरा अनुसरण किसके लिए है? तुझे परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय के दौरान अपने आपको किस प्रकार सुरक्षित और शुद्ध रखना चाहिए? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से मनुष्य को कोई लाभ नहीं है? क्या सारा न्याय सज़ा है? क्या ऐसा हो सकता है कि केवल शांति एवं आनन्द, और केवल भौतिक आशीषें एवं क्षणिक राहत ही मनुष्य के जीवन के लिए लाभदायक हैं? यदि मनुष्य एक सुहावने और आरामदेह वातावरण में रहे, बिना किसी न्यायिक जीवन के, तो क्या उसे शुद्ध किया जा सकता है? यदि मनुष्य बदलना और शुद्ध होना चाहता है, तो उसे सिद्ध किए जाने को कैसे स्वीकार करना चाहिए? आज तुझे कौन सा पथ चुनना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 531

पतरस का उल्लेख होने पर, लोग उसके बारे में अच्छी बातें कहते नहीं थकते। वे तुरंत याद करते हैं कि उसने तीन बार परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया था, कैसे शैतान को अपनी सेवाएं प्रदान करते हुए उसने परमेश्वर की परीक्षा ली, और कैसे अंत में परमेश्वर की ही खातिर क्रूस पर उल्टा लटकाया गया, इत्यादि। अब मैं तुम लोगों को यह बताने पर ध्यान केन्द्रित करने वाला हूँ कि पतरस ने मुझे कैसे जाना और उसका अंतिम परिणाम क्या था। पतरस के पास उत्कृष्ट क्षमता थी, परन्तु उसकी परिस्थितियाँ पौलुस से भिन्न थीं : उसके माता-पिता ने मुझे सताया था, वे ऐसे दुष्टात्मा थे जो शैतान के अधीन थे, और इसी कारण उन्होंने पतरस को परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं सिखाया। पतरस बुद्धिमान, प्रतिभासम्पन्न था, बचपन से ही उसके माता-पिता उससे बहुत स्नेह करते थे। फिर भी, वयस्क होने पर, वह उनका शत्रु बन गया, क्योंकि उसने मेरे बारे में ज्ञान तलाशना कभी बंद नहीं किया, परिणामस्वरूप वह अपने माता-पिता से विमुख हो गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि, सबसे ज़्यादा उसे यह विश्वास था कि स्वर्ग और पृथ्वी और सभी वस्तुएं सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और सभी सकारात्मक बातें परमेश्वर से आती हैं, शैतान द्वारा संसाधित हुए बिना उसी से सीधे तौर पर जारी होती हैं। उसके माता-पिता की प्रतिकूलता ने उसे मेरे कृपालु प्रेम एवं दया का और भी ज्ञान दिया, इस प्रकार उसके भीतर मुझे खोजने की इच्छा और तीव्र हो गयी। उसने न केवल मेरे वचनों को खाने और पीने पर ध्यान दिया, बल्कि मेरी इच्छा को समझने पर भी ध्यान दिया, और वह अपने हृदय में हमेशा सतर्क रहा। परिणामस्वरूप वह अपनी आत्मा में हमेशा संवेदनशील बना रहा और इस प्रकार वह अपने हर काम में मेरे हृदय के अनुकूल रहा। उसने खुद को आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करने के लिए अतीत के लोगों की असफलताओं पर निरंतर ध्यान बनाए रखा, क्योंकि वह असफलता के जाल में फंसने से बुरी तरह डरता था। इसी प्रकार, उसने उन लोगों की आस्था और प्रेम को आत्मसात करने पर भी ध्यान दिया जो युगों से परमेश्वर से प्रेम करते आ रहे थे। इस प्रकार से न केवल नकारात्मक पहलू में, बल्कि और भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, सकारात्मक पहलू में उसने अधिक तेज़ी से विकास किया, कुछ इस तरह कि मेरी उपस्थिति में उसका ज्ञान सभी से बढ़कर हो गया। तो, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है कि किस प्रकार से उसने अपना सब कुछ मेरे हाथों में दे दिया, यहाँ तक कि उसने खाने-पीने, कपड़े पहनने, सोने और रहने के निर्णय भी मुझे सौंप दिये, और इनके बजाय मुझे सभी बातों में संतुष्टि प्रदान करने के आधार पर उसने मेरे उपहारों का आनन्द लिया। मैंने उसके अनगिनत परीक्षण लिए, स्वभाविक रूप से उन्होंने उसे अधमरा कर दिया, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षणों के मध्य, उसने कभी भी मुझमें अपनी आस्था नहीं खोयी या मुझसे मायूस नहीं हुआ। जब मैंने उससे कहा कि मैंने उसे त्याग दिया है, तो भी वह निराश नहीं हुआ और पहले के अभ्यास के सिद्धांतों के अनुसार एवं व्यावहारिक ढंग से मुझे प्रेम करना जारी रखा। जब मैंने उससे कहा कि भले ही वह मुझ से प्रेम करता है, तो भी मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा, अंत में मैं उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। लेकिन ऐसे परीक्षण जो उसकी देह ने नहीं भोगे, मगर जो वचनों के परीक्षण थे, उन परीक्षणों के मध्य भी उसने मुझसे प्रार्थना की और कहा : "हे परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी वस्तुओं के मध्य, क्या ऐसा कोई मनुष्य है, कोई प्राणी है, या कोई ऐसी वस्तु है जो तुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में न हो? जब तू मुझे अपनी दया दिखाता है, तब मेरा हृदय तेरी दया से बहुत आनन्दित होता है। जब तू मेरा न्याय करता है, तो भले ही मैं उसके अयोग्य रहूँ, फिर भी मैं तेरे कर्मों के अथाहपन की और अधिक समझ प्राप्त करता हूँ, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से परिपूर्ण है। हालाँकि मेरा शरीर कष्ट सहता है, लेकिन मेरी आत्मा में चैन है। मैं तेरी बुद्धि और कर्मों की प्रशंसा कैसे न करूँ? यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊँ, तो भी मैं उसके लिए सहर्ष और प्रसन्नता से तैयार रहूँगा। हे सर्वशक्तिमान! क्या तू सचमुच नहीं चाहता है कि मैं तुझे देखूँ? क्या मैं सच में तेरे न्याय को प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? कहीं मुझ में ऐसा कुछ तो नहीं जो तू नहीं देखना चाहता?" इस प्रकार के परीक्षणों के मध्य, भले ही पतरस मेरी इच्छा को सटीकता से समझने में असफल रहता था, लेकिन यह स्पष्ट था कि वह मेरे द्वारा उपयोग किए जाने के कारण खुद को बहुत गर्वान्वित और सम्मानित महसूस करता था (भले ही उसने मेरा न्याय इसलिए पाया ताकि मनुष्य मेरा प्रताप और क्रोध देख सके), और वह इन परीक्षणों के कारण बिल्कुल भी निरुत्साहित नहीं हुआ। मेरे समक्ष उसकी निष्ठा के कारण, और उस पर मेरे आशीषों के कारण, वह हज़ारों सालों के लिए मनुष्यों के लिए एक उदाहरण और आदर्श बना हुआ है। क्या तुम लोगों को उसकी इसी बात का अनुकरण नहीं करना चाहिए? ज़ोर लगा कर बहुत समय तक सोचो कि क्यों मैंने तुम लोगों को पतरस का इतना लम्बा वृत्तांत दिया है; तुम लोगों को इन सिद्धान्तों के अनुसार आचरण के करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 6' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 532

पतरस ने कई वर्षों तक यीशु का अनुगमन किया और उसमें कई बातें ऐसी देखीं, जो औरों में नहीं थीं। एक वर्ष तक अपना अनुगमन करने के पश्चात् यीशु ने उसे बारह शिष्यों में से एक चुना। (निस्संदेह यीशु ने इसे जोर से नहीं बोला और दूसरे इससे बिलकुल अनजान थे।) जीवन में, पतरस ने यीशु द्वारा की गई हर चीज से खुद को मापा। सबसे बढ़कर, यीशु ने जिन संदेशों का प्रचार किया, वे उसके हृदय में अंकित हो गए। वह यीशु के प्रति अत्यधिक समर्पित और वफादार था, और उसने यीशु के खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं की। परिणामस्वरूप जहाँ कहीं यीशु गया, वह यीशु का विश्वसनीय साथी बन गया। पतरस ने यीशु की शिक्षाओं, उसके नम्र शब्दों, उसके भोजन, उसके कपड़ों, उसके आश्रय और उसकी यात्राओं पर ग़ौर किया। उसने हर मामले में यीशु का अनुकरण किया। वह कभी पाखंडी नहीं था, लेकिन फिर भी उसने वह सब त्याग दिया, जो पुराना था और कथनी और करनी दोनों से यीशु के उदाहरण का अनुगमन किया। तभी उसे अनुभव हुआ कि आकाश और पृथ्वी और सभी वस्तुएँ सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और इस कारण उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं थी। उसने यीशु को पूर्णरूपेण आत्मसात कर लिया और उसे उदाहरण की तरह इस्तेमाल किया। यीशु का जीवन दर्शाता है कि उसने जो कुछ किया, वह पाखंडी नहीं था; अपने बारे में डींगें मारने के बजाय उसने प्रेम से लोगों को प्रभावित किया। विभिन्न चीजों ने दिखाया कि यीशु क्या था, और इस कारण से पतरस ने उसकी हर बात का अनुकरण किया। पतरस के अनुभवों ने उसे यीशु की मनोरमता का अधिकाधिक बोध कराया और उसने इस तरह की बातें कहीं : "मैंने पूरे ब्रह्मांड में सर्वशक्तिमान की खोज की है और आकाश, पृथ्वी और सभी चीजों के आश्चर्यों को देखा है, और इस प्रकार मैंने सर्वशक्तिमान की मनोरमता का गहरा अनुभव प्राप्त किया है। परंतु इस पर भी मेरे हृदय में वास्तविक प्रेम कदापि नहीं था और मैंने अपनी आँखों से सर्वशक्तिमान की मनोरमता को कभी नहीं देखा था। आज सर्वशक्तिमान की दृष्टि में मुझे उसके द्वारा कृपापूर्वक देखा गया है, और मैंने अंतत: परमेश्वर की मनोरमता का अनुभव कर लिया है। मैंने अंतत: जान लिया है कि मानव-जाति सिर्फ इसलिए परमेश्वर से प्रेम नहीं करती, क्योंकि उसने सब चीजें बनाई हैं, बल्कि अपने दैनिक जीवन में मैंने उसकी असीम मनोरमता पाई है। यह भला उस स्थिति तक सीमित कैसे हो सकती है, जो अभी दिखाई पड़ रही है?" जैसे-जैसे समय बीता, पतरस में भी बहुत-सी मनोहर बातें आती गईं। वह यीशु के प्रति बहुत आज्ञाकारी हो गया, और निस्संदेह उसे अनेक विघ्नों का भी सामना करना पड़ा। जब यीशु उसे विभिन्न स्थानों पर प्रचार करने के लिए ले गया, तो उसने सदैव विनम्र होकर यीशु के उपदेशों को सुना। वर्षों से यीशु का अनुगमन करने के कारण वह कभी अहंकारी नहीं हुआ। यीशु द्वारा यह बताए जाने के बाद कि उसके आने का कारण क्रूस पर चढ़ाया जाना है, ताकि वह अपना कार्य पूरा कर सके, पतरस अकसर अपने दिल में पीड़ा अनुभव करता और एकांत में छुपकर रोया करता। फिर भी, आखिरकार वह "दुर्भाग्यपूर्ण" दिन आ ही गया। यीशु के पकड़े जाने के बाद पतरस अपनी मछली पकड़ने की नाव में अकेले रोता रहा और उसके लिए बहुत प्रार्थनाएँ कीं। परंतु अपने हृदय में वह जानता था कि यह पिता परमेश्वर की इच्छा है और इसे कोई नहीं बदल सकता। यीशु के प्रति अपने प्रेम के कारण ही वह दुखी होकर रोता रहा था। निस्संदेह यह मानवीय दुर्बलता है। अत: जब उसे ज्ञात हुआ कि यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा, उसने यीशु से पूछा : "अपने जाने के बाद क्या तू हमारे बीच लौटेगा और हमारी देखभाल करेगा? क्या हम फिर भी तुझे देख पाएँगे?" हालाँकि ये शब्द बहुत सीधे-सादे और मानवीय धारणाओं से भरे थे, पर यीशु पतरस की पीड़ा की कड़वाहट के बारे में जानता था, अत: अपने प्रेम के द्वारा उसने उसकी दुर्बलता को ध्यान में रखा : "पतरस, मैंने तुझसे प्रेम किया है। क्या तू यह जानता है? हालाँकि तू जो कहता है, उसका कोई कारण नहीं है, फिर भी, पिता ने वादा किया है कि अपने पुनरुत्थान के बाद मैं 40 दिनों तक लोगों को दिखाई दूँगा। क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मेरा आत्मा तुम लोगों पर निरंतर अनुग्रह करता रहेगा?" हालाँकि इससे पतरस को कुछ सुकून मिला, फिर भी उसने महसूस किया कि किसी चीज की कमी है, और इसलिए, पुनरुत्थान के बाद, यीशु पहली बार खुले तौर पर उसके सामने आया। किंतु पतरस को अपनी धारणाओं से चिपके रहने से रोकने के लिए यीशु ने उस भव्य भोजन को अस्वीकार कर दिया, जो पतरस ने उसके लिए तैयार किया था, और पलक झपकते ही गायब हो गया। उस क्षण से पतरस को प्रभु यीशु की गहन समझ प्राप्त हुई, और वह उससे और अधिक प्रेम करने लगा। पुनरुत्थान के बाद यीशु अकसर पतरस के सामने आया। चालीस दिन पूरे होने पर स्वर्गारोहण करने के बाद वह पतरस को तीन बार और दिखाई दिया। हर बार जब वह दिखाई दिया, तब पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण होने वाला और नया कार्य आरंभ होने वाला था।

अपने पूरे जीवन में पतरस ने मछलियाँ पकड़कर अपना जीवनयापन किया, परंतु इससे भी अधिक वह सुसमाचार के प्रचार के लिए जीया। अपने बाद के वर्षों में उसने पतरस की पहली और दूसरी पत्री लिखी, साथ ही उसने उस समय के फिलाडेल्फिया की कलीसिया को कई पत्र भी लिखे। उस समय के लोग उससे बहुत प्रभावित थे। लोगों को अपनी खुद की साख का इस्तेमाल करके उपदेश देने के बजाय उसने उन्हें जीवन की उपयुक्त आपूर्ति उपलब्ध करवाई। वह जीते-जी कभी यीशु की शिक्षाओं को नहीं भूला और जीवनभर उनसे प्रेरित रहा। यीशु का अनुगमन करते हुए उसने प्रभु के प्रेम का बदला अपनी मृत्यु से चुकाने और सभी चीजों में उसके उदाहरण का अनुसरण करने का संकल्प लिया था। यीशु ने इसे स्वीकार कर लिया, इसलिए जब पतरस 53 वर्ष का था (यीशु के जाने के 20 से अधिक वर्षों के बाद), तो यीशु उसकी आकांक्षा की पूर्ति में मदद करने के लिए उसके सामने प्रकट हुआ। उसके बाद के सात वर्षों में पतरस ने अपना जीवन स्वयं को जानने में व्यतीत किया। इन सात वर्षों के पश्चात एक दिन उसे उलटा क्रूस पर चढ़ा दिया गया और इस तरह उसके असाधारण जीवन का अंत हो गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'पतरस के जीवन पर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 533

अंधकार का प्रभाव क्या है? "अंधकार का प्रभाव", शैतान का प्रभाव है, जो लोगों को धोखा देता, भ्रष्ट करता, बांधता और नियंत्रित करता है; शैतान का प्रभाव एक ऐसा प्रभाव है जिसमें मृत्यु का प्रभामण्डल है। जो भी शैतान के प्रभुत्व के भीतर रहते हैं वे नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं।

परमेश्वर में आस्था पाने के बाद, तुम अंधकार के प्रभाव से कैसे बच सकते हो? तुम ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना करने के बाद, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ दो, इस बिंदु पर, तुम्हारा हृदय परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित है, तुम खुद को पूरी तरह से देने के लिए तैयार हो, और इस क्षण में, तुम अंधकार के प्रभाव से बच निकले हो। यदि वह सब कुछ जो मनुष्य करता है परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के साथ सही बैठता है, तो वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के वचनों के अंदर रहता है, वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर की निगरानी और सुरक्षा के अधीन रहता है। यदि लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में असमर्थ हैं, हमेशा परमेश्वर को मूर्ख बना रहे हैं और परमेश्वर के साथ लापरवाह तरीके से कार्य कर रहे हैं, परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं कर रहे हैं, तो ऐसे सभी मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जिन लोगों ने परमेश्वर द्वारा उद्धार को नहीं प्राप्त किया है, वे सब शैतान की प्रभुता के अधीन रह रहे हैं, अर्थात्, वे सभी अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, वे शैतान की प्रभुता के अधीन रह रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, वे जरूरी नहीं कि परमेश्वर के प्रकाश में रह रहे हों, क्योंकि जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जरूरी नहीं कि परमेश्वर के वचनों के अंदर जी रहे हों, और जरूरी नहीं कि वे ऐसे मनुष्य हों जो परमेश्वर का पालन कर सकते हों। मनुष्य केवल परमेश्वर पर विश्वास करता है, और मनुष्य को परमेश्वर को जानने की विफलता के कारण, वह अभी भी पुराने नियमों के भीतर रह रहा है, मृत वचनों के भीतर जी रहा है, एक ऐसा जीवन जी रहा है जो अंधकारमय और अनिश्चित है, परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से शुद्ध नहीं किया गया है, पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा जीता नहीं गया है। इसलिए, जबकि कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे अभी भी अंधकार के प्रभाव में रह रहे हों, क्योंकि पवित्र आत्मा ने उन पर काम नहीं किया है। जिन लोगों ने परमेश्वर का अनुग्रह या परमेश्वर की दया नहीं प्राप्त की है, जो पवित्र आत्मा द्वारा किए गये कार्य को नहीं देख सकते हैं, वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं मगर परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे भी अधिकांश समय अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करता है मगर अपना अधिकांश जीवन अंधकार के प्रभाव में जीते हुए बिताता है, तो इस व्यक्ति का अस्तित्व अपना अर्थ खो चुका है, उन लोगों की तो बात ही छोड़ें जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं?

वे सभी लोग परमेश्वर के काम को स्वीकार नहीं कर सकते हैं या जो परमेश्वर को स्वीकार तो करते हैं लेकिन परमेश्वर की माँगों को पूरा करने में असमर्थ हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं; जो लोग सच्चाई का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की मांगों को पूरा करने में सक्षम हैं, वे परमेश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे, और वे अंधकार के प्रभाव से बच निकलेंगे। वे मनुष्य जिन्हें मुक्त नहीं किया गया है, जो हमेशा कुछ चीजों के द्वारा नियंत्रित होते हैं, अपने ह्रदय को परमेश्वर को नहीं दे पाते है, ये वे मनुष्य हैं जो शैतान के बंधन के अधीन हैं, और वे मौत के वातावरण में रह रहे हैं। जो अपने स्वयं के कर्तव्यों के प्रति बेईमान हैं, जो परमेश्वर के आदेश के प्रति बेईमान हैं, जो कलीसिया में अपना कार्य नहीं कर रहे हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। वे जानबूझकर कलीसिया के जीवन में बाधा डाल रहे हैं, जो जानबूझकर भाइयों और बहनों के बीच संबंधों को नष्ट कर रहे हैं, जो अपने स्वयं के गिरोहों को इकट्ठा कर रहे हैं, वे और भी गहराई से अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, वे शैतान के बंधन में रह रहे हैं। जिनका परमेश्वर के साथ एक असामान्य रिश्ता है, जो हमेशा अनावश्यक अभिलाषाओं वाले हैं, जो हमेशा हर परिस्थिति से लाभ लेना चाहते हैं, जो कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाना चाहते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग हमेशा मैले-कुचैले हैं, सत्य के अपने अभ्यास में गंभीर नहीं हैं, परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने के इच्छुक नहीं हैं, जो केवल अपने ही शरीर को संतुष्ट कर रहे हैं, ये भी ऐसे मनुष्य हैं जो अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, और वे मृत्यु में ढके हुए हैं। जो लोग परमेश्वर के लिए काम करते समय चालबाजी और धोखे को काम में लाते हैं, परमेश्वर के साथ लापरवाह तरीके से व्यवहार कर रहे हैं, परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, हमेशा स्वयं के लिए सोचते रह रहे हैं, ऐसे मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर से प्यार नहीं कर सकते हैं, जो सच्चाई अनुसरण नहीं कर रहे हैं, जो अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 534

यदि तुम परमेश्वर द्वारा प्रशंसा किया जाना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले शैतान के अंधकार के प्रभाव से अवश्य बच निकलना चाहिए, अपना ह्रदय परमेश्वर के लिए खोल देना चाहिए, और इसे पूरी तरह से परमेश्वर की और मोड़ देना चाहिए। क्या जिन कामों को तुम अभी कर रहे हो उनकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाती है? क्या तुमने अपना ह्रदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया है? तुमने जो काम किये हैं, क्या ये वही हैं जिनकी परमेश्वर ने तुमसे अपेक्षा की है? क्या वे सत्य के साथ सही बैठते हैं? तुम्हें हमेशा खुद की जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान एकाग्र करना चाहिए, अपने ह्रदय को परमेश्वर के सामने रख देना चाहिए, ईमानदारी से परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और निष्ठा के साथ परमेश्वर के लिए खुद को खर्च करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रशंसा मिलेगी।

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते हैं। जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते हैं, जो दूसरों के सामने किसी ऐसे व्यक्ति के जैसा होने का नाटक करते हैं जो वे नहीं हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूल रूप में वे कपटी, धूर्त हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं हैं, ऐसे मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं, वे सर्पों के सँपोले हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो खुद का दिखावा करते हैं, हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के संबंधी हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सतर्क नहीं हैं, स्वच्छ ह्रदय से परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हैं, हमेशा स्वयं के और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित हैं, परमेश्वर के लिए खर्च करने के लिए हर चीज का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी कभी नहीं जीते हैं, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं होगी।

जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तो यह इसलिए था कि मनुष्य परमेश्वर की समृद्धता का आनंद ले, मनुष्य वास्तव में उससे प्यार करे और इस तरह से, मनुष्य उसके प्रकाश में रहे। आज, जो लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं कर पाते हैं, परमेश्वर के बोझ के प्रति सतर्क नहीं हैं, परमेश्वर को पूरी तरह से अपना ह्रदय समर्पित नहीं कर पाते हैं, परमेश्वर के ह्रदय को स्वयं का हृदय नहीं मान पाते हैं, परमेश्वर के बोझ का दायित्व अपने ऊपर नहीं ले पाते हैं, परमेश्वर का प्रकाश ऐसे किसी भी मनुष्य पर नहीं चमक रहा है, इसलिए वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। ऐसे मनुष्य ऐसे रास्ते पर हैं जो परमेश्वर की इच्छा के ठीक विपरीत जाता है और जो कुछ भी वे करते हैं उसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है। वे शैतान के साथ दलदल में लोट रहे हैं और वे ऐसे लोग हैं जो अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। यदि तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हो और साथ ही परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति सतर्क रह सकते हो और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर के हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों के अंदर जी रहा है। क्या तुम शैतान के शासन से बच निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों के अंदर रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा; यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो पवित्र आत्मा के पास कोई भी काम करने का अवसर नहीं होगा। पवित्र आत्मा मनुष्यों पर जो काम करता है, वह प्रकाश जिसे वह मनुष्यों पर डालता है, वह विश्वास जो वह मनुष्य को प्रदान करता है केवल एक पल तक रहता है; यदि मनुष्य सावधान न हो और ध्यान नहीं दे, तो पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य उनके पास से गुजर जाएगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर रहते हैं, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर नहीं जी रहे हैं, तो वे शैतान के बंधन में जी रहे हैं। भ्रष्ट स्वभाव में रहने वाले मनुष्यों में पवित्र आत्मा की उपस्थिति नहीं होती है और पवित्र आत्मा उन पर काम नहीं करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के क्षेत्र में जी रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और परमेश्वर का काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के क्षेत्र में नहीं जी रहे हो, बल्कि इसके बजाय शैतान के क्षेत्र में जी रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों के अंतर्गत रहने के द्वारा, अपना ह्रदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें अवश्य वैसा करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता अवश्य बनाना चाहिए, तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम परमेश्वर की आशीष के अधीन रहोगे, तुम परमेश्वर भावाभिव्यक्ति की रोशनी में रहोगे, तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को भी समझने में सक्षम होगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 535

अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, पहले तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार अवश्य होना चाहिए और सत्य का अनुसरण करने की उत्सुकता अवश्य होनी चाहिए, तभी तुम्हारे पास सही परिस्थिति होगी। अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए सही परिस्थिति में रहना जरूरी है। सही परिस्थिति न होने का मतलब है कि तुम ईश्वर के प्रति वफादार नहीं हो और तुम में सच्चाई की खोज करने की उत्सुकता नहीं है, फिर अंधकार के प्रभाव से बच निकलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। अंधकार के प्रभाव से मनुष्य का बच निकलना मेरे वचनों पर आधारित है, और अगर मनुष्य मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकता है, तो मनुष्य अंधकार के प्रभाव के बंधन से बच निकल नहीं सकता है। सही परिस्थिति में जीने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में जीना, परमेश्वर के प्रति वफादार होने की परिस्थिति में जीना, सत्य को खोजने की परिस्थिति में जीना, ईमानदारी से परमेश्वर के लिए खर्च करने की वास्तविकता में जीना, वास्तव में परमेश्वर के प्यार की स्थिति में जीना। जो लोग इन परिस्थितियों में और इस वास्तविकता के भीतर रहते हैं, वे धीरे-धीरे रूपांतरित हो जाते हैं, जैसे-जैसे वे सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करते हैं, वे परमेश्वर के काम की गहराई के साथ रूपांतरित हो जाते हैं, जब तक कि अंततः वे परमेश्वर द्वारा निश्चित रूप से जीत नहीं लिए जाएँगे, और वे परमेश्वर से वास्तव में प्यार नहीं करने लगेंगे। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकले हैं वे धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझ पाएँगे, परमेश्वर की इच्छा को समझेंगे, और अंततः परमेश्वर के विश्वासपात्र हो जाएँगे; न केवल उन्हें परमेश्वर की कोई धारणा नहीं होगी, परमेश्वर के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं होगा, वे उन धारणाओं और विद्रोह से और भी अधिक घृणा करेंगे जो उनमें पहले थे, अपने ह्रदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा करेंगे। जो अंधकार के प्रभाव से बच निकलने में असमर्थ हैं, वे अपनी देह के साथ व्यस्त हैं, और वे विद्रोह से भरे हुए हैं; उनका ह्रदय मानव धारणाओं और जीवन के लिए दर्शन से, और साथ ही अपने स्वयं के इरादों और विचार-विमर्शों से भरा है। परमेश्वर को मनुष्य से केवल प्यार की अपेक्षा है, परमेश्वर को अपेक्षा है कि मनुष्य उसके वचनों द्वारा और उसके लिए प्यार से भरे हृदय से पूरी तरह से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों के भीतर रहना, यह पता लगाना कि कौन सा मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर से तलाश करता है, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप परमेश्वर से प्यार करना, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप इधर-उधर भागना, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप जीना, ये ऐसी चीजें हैं जो मनुष्य को प्राप्त करनी चाहिए। सब कुछ अवश्य परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए, और केवल तभी मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाऐंगे। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों से सज्जित नहीं है, तो आदमी केवल शैतान द्वारा ग्रस्त एक भुनगा है। इसे अपने स्वयं के दिल में तोलें, परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ जमा ली है? किन चीजो में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जी रहे हो? किन चीजों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं जी रहे हो? यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के कब्जे में नहीं हो, तो तुम किस सीमा तक कब्जे में किए गए हो? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा हो, या क्या तुम्हारा परमेश्वर के वचनों द्वारा मार्गदर्शन किया जा रहा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों से शुरू हुई हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के ज्ञान के कारण अपनी नकारात्मक परिस्थितियों से बाहर आ गए? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव के रूप में मानना, यही है वह जिसमें हर एक को प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर के विद्रोही हो, तुम परमेश्वर का विरोध कर रहे हो, तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो, और इस तरह के मनुष्यों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से एक शरारत है, एक रुकावट है। तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार रहा है? तुम्हारा जीवन कितना परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं रहा है? कि परमेश्वर के जिन वचनों की तुमसे अपेक्षा थी, उनमें से कितने तुम पर पूरे हुए हैं? कितने तुम में खो गए हैं? क्या तुमने ऐसी चीजों की बारीकी से जाँच की है?

अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, एक तरफ, इसे पवित्र आत्मा द्वारा किए गए कार्य की आवश्यकता होती है, जबकि दूसरी तरफ इसे मनुष्य से समर्पित सहयोग की आवश्यकता होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि आदमी सही रास्ते पर नहीं है? यदि कोई व्यक्ति सही रास्ते पर है, तो सबसे पहले, वह अपना हृदय ईश्वर को समर्पित कर पाएगा, और यह ऐसा कार्य है जिसमें प्रवेश करने के लिए लंबे समय की आवश्यकता होती है, क्योंकि मानव जाति हमेशा से अंधकार के प्रभाव में रहती आ रही है, हजारों सालों से शैतान की दासता के अधीन रह रही है, इसलिए यह प्रवेश एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। आज मैंने इस मुद्दे को इस तरह से उठाया है कि लोग अपनी स्वयं की स्थिति को समझ सकें; अंधकार का प्रभाव क्या है और प्रकाश के भीतर रहना क्या है इस बारे में समझ सकें, जब मनुष्य इन बातों को पहचान पाता है, तो प्रवेश संभव हो जाता है। क्योंकि इससे पहले कि तुम शैतान के प्रभाव से बच निकलो तुम्हें पता अवश्य होना चाहिए कि शैतान का प्रभाव क्या है, और केवल तभी तुम धीरे-धीरे स्वयं को इससे छुटकारा दिलाने के मार्ग तक पहुँचोगे। जहाँ तक उसके बाद क्या करना है, की बात है, यह मनुष्य का खुद का मामला है। तुम्हें अवश्य हमेशा सकारात्मक होकर प्रवेश करना चाहिए, तुम्हें अवश्य कभी भी निष्क्रियता से इंतजार नहीं करना चाहिए, और इसी तरह तुम को परमेश्वर द्वारा जीत लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 536

परमेश्वर का प्रत्येक वचन हमारे मर्मस्थल पर चोट करता है, और हमें एक टीस देता और भयभीत कर देता है। वह हमारी कल्पनाओं को और हमारे भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करता है। हम जो कुछ कहते और करते हैं से लेकर हमारे प्रत्येक विचार और सोच तक, हमारा स्वभाव और सार उसके वचनों के द्वारा प्रकट होता है, भय और कँपन की स्थिति में हम कहीं मुँह छिपाने लायक नहीं रहते। वह एक-एक करके, हमें हमारे कार्यों, लक्ष्यों, इरादों और भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बताता है, जो हम ख़ुद भी कभी नहीं जान पाए थे और हमें एहसास कराता है कि हमारी अधम अपूर्णता पूरी तरह से उजागर हो गई है, यहाँ तक कि हम उसके द्वारा जीत लिये गये हैं। परमेश्वर अपने प्रति हमारे विरोध के लिए हमारा न्याय करता है, अपनी ईशनिंदा और तिरस्कार के लिये हमें ताड़ना देता है, और हमें यह एहसास कराता है कि हमारे अंदर उद्धार पाने का एक भी गुण नहीं है, और हम ही जीते-जागते शैतान हैं। हमारी आशाएँ चूर-चूर हो जाती हैं, अब हम उससे अविवेकपूर्ण माँगें करने या कोई उम्मीद लगाने का साहस नहीं करते हैं, यहाँ तक कि रातोंरात हमारे स्वप्न गायब हो जाते हैं। यह ऐसा तथ्य है जिसकी हममें से न तो कोई कल्पना कर सकता है और न ही कोई स्वीकार कर सकता है। पल भर में, हम अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं, और हमें समझ में नहीं आता कि हम आगे कैसे बढ़ें, या अपने विश्वास को जारी कैसे रखें। ऐसा लगता है कि हमारा विश्वास जहाँ था वहीं वापस लौट गया है, या कि हम कभी प्रभु यीशु से कभी मिले ही नहीं या उसे जानते ही नहीं। हमारी आँखों के सामने हर बात हमें हक्का-बक्का कर देती है, और हमें अनिर्णय की स्थिति में डाल देती है। फिर हम बेचैन हो जाते हैं, हतोत्साहित हो जाते हैं, और हमारे अंदर भयंकर क्रोध और अपमान पैदा हो जाता है। हम उसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं, कोई तरीका ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं, और, उससे भी अधिक, हम अपने उद्धारकर्ता यीशु की प्रतीक्षा करना जारी रखने का प्रयास करते हैं ताकि उसके सामने हम अपने दिल की बात कह सकें। यद्यपि ऐसे अवसर भी आते हैं जब हम बाहर से संतुलित दिखाई देते हैं, न तो घमंडी, न ही विनम्र, तब भी अपने हृदयों में हम नाकामी की ऐसी भावना से व्यथित हो जाते हैं जैसे पहले कभी नहीं हुए। यद्यपि कभी-कभी हम बाहरी तौर पर असामान्य रूप से शांत दिखाई दे सकते हैं, किंतु भीतर हम तूफ़ानी समुद्र की जैसी यातना का अनुभव करते हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें हमारी सभी आशाओँ और स्वप्नों से वंचित कर दिया है, और हमारी अनावश्यक इच्छाओं से रहित कर दिया है, हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और हमारा उद्धार करने में सक्षम हैं। उसके न्याय एवं ताड़ना ने हमारे और उसके बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है और कोई उसे पार करने को तैयार नहीं है। उसके न्याय और ताड़ना के कारण पहली बार हमने इतना अधिक नुकसान और अपमान झेला है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें वास्तव में परमेश्वर के आदर और मनुष्य के अपराध की असहष्णुता को पहचानना सिखाया है, जिसकी तुलना में हम बहुत अधम और अशुद्ध हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने पहली बार हमें अनुभव कराया है कि हम कितने अभिमानी और आडंबरपूर्ण हैं, और कैसे मनुष्य कभी परमेश्वर की बराबरी नहीं कर सकता, और उसके समान नहीं बन सकता है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे भीतर यह उत्कंठा उत्पन्न की है कि हम ऐसे भ्रष्ट स्वभाव में अब और न रहें, और हमारे भीतर ऐसे स्वभाव तथा सार से जितना जल्दी हो सके छुटकारा पाने की, और आगे उसके द्वारा तिरस्कृत और उसके लिए घृणित न होने की इच्छा उत्पन्न की है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें ख़ुशी-ख़ुशी उसके वचनों का आज्ञापालन करने लायक बनाया है, और इस लायक बनाया है कि हम उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह न करें। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें एक बार फिर जीवित रहने की इच्छा दी है, और उसे हमारे उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने की प्रसन्नता दी है...। हम विजय के कार्य से बाहर निकल गए हैं, नरक से बाहर आ गए हैं, मृत्यु की छाया की घाटी से बाहर आ गए हैं...। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें, लोगों के इस समूह को जीत लिया है! उसने शैतान पर विजय पाई है, और अपने सभी शत्रुओं को पराजित कर दिया है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 537

जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ देते हो और सामान्य मनुष्यत्व का जीवन जीना प्राप्त कर लेते हो केवल तभी तुम परिपूर्ण कर दिए जाओगे। भले ही तुम भविष्यवाणी करने या कोई रहस्य बताने में असमर्थ हो, लेकिन तुम एक मनुष्य के स्वरूप को प्रगट करोगे और उसे जियोगे। परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की, जिसके बाद मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया और इस भ्रष्टाचार ने मनुष्यों को "मृत मनुष्य" बना दिया। तो तुम्हारे बदलने के बाद, तुम इन "मृत मनुष्यों" जैसे नहीं रह जाओगे। यह परमेश्वर के वचन हैं जो लोगों की आत्मा में नई जान डाल देते हैं और उनके पुनर्जन्म का कारण हैं, और जब लोगों की आत्माएं नया जन्म लेंगी तो वे जीवित हो उठेंगे। जब मैं "मृत मनुष्य" का उल्लेख करता हूँ तो मैं उन शवों को संदर्भित करता हूँ जिनमें आत्मा नहीं होती है, उन लोगों को संदर्भित करता हूँ जिनकी आत्मा उनके साथ ही मर चुकी है। जब लोगों की आत्मा में जीवन की नई ज्योत जलायी जाती है तो वे जीवित हो जाते हैं। जिन संतों की बात पहले की गई थी, ये वे लोग हैं जो जीवित हो उठे हैं, जो शैतान के अधिकार में थे परंतु उन्होंने शैतान को हरा दिया है। चीन के चुने हुए लोगों ने बड़े लाल अजगर के ऐसे क्रूर तथा अमानवीय अत्याचार व धोखेबाजी को सहन किया है, जिन्होंने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया और उनमें जीने का थोड़ा भी साहस ना छोड़ा। अतः आत्मा की जागरूकता का आरंभ उनके सार-तत्व से होना चाहिए : थोड़ा-थोड़ा करके उनके सार-तत्व में उनकी आत्मा को जगाना होगा। जब एक दिन वे जीवित हो उठेंगे, तब और रूकावट ना होगी और फिर सबकुछ सहजता से आगे बढ़ेगा। इस समय यह पहुँच से बाहर है। अधिकतर लोगों का जीवन जीने का ढंग, बहुत से प्राणघाती भावनाओं को सामने लाता है; वे मृत्यु के वातावरण में लिपटे होते हैं, और उनमें बहुत-सी कमियां होती हैं। कुछ लोगों के शब्दों में मृत्यु समायी होती है, उनके कार्यों में मृत्यु समायी होती है, और अपने पूरे रहन-सहन में वे जो भी प्रकट करते हैं उनमें मृत्यु समायी होती है। अगर आज, लोग सार्वजनिक रूप से परमेश्वर की गवाही दें तो वे इस कार्य में असफल हो जाएंगे क्योंकि उनका अभी भी पूर्णतः जीवित हो उठना शेष है और तुम लोगों के मध्य बहुत से मृतक हैं। आज कुछ लोग पूछते हैं कि परमेश्वर कुछ चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता है ताकि वह अन्यजाति राष्ट्रों में अपना कार्य शीघ्र ही फैला सके। मृतक परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; केवल जीवित दे सकते हैं, परंतु अधिकांश लोग आज "मृत मनुष्य" हैं, उनमें से बहुत से मृत्यु के कफ़न के नीचे रहते हैं, वे शैतान के प्रभाव में रहते हैं, और विजय पाने में असमर्थ हैं। जब बात ऐसी है तो फिर वे कैसे परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं? वे कैसे सुसमाचार के कार्य को फैला सकते हैं?

अंधकार के प्रभाव में रहने वाले वे होते हैं जो मृत्यु के मध्य रहते हैं, ये वे हैं जो शैतान द्वारा ग्रसित हैं। परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और उसके द्वारा न्याय व ताड़ना पाने के बगैर लोग मृत्यु के प्रभाव से बच नहीं सकते, वे जीवित नहीं बन सकते हैं। ये "मृत मनुष्य" परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, ना ही वे परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, परमेश्वर के राज्य में तो प्रवेश कर ही नहीं सकते। परमेश्वर को जीवितों की गवाही चाहिए, मृतकों की नहीं, और वो जीवितों से उसके लिए कार्य करने को कहता है न कि मृतकों को। "मृतक" वे हैं जो परमेश्वर का विरोध और उससे बगावत करते हैं, ये वे हैं जो आत्मा में सुन्न हैं, जो परमेश्वर के वचन नहीं समझते; ये वे हैं जो सत्य को अपने व्यवहार में नहीं लाते और परमेश्वर के प्रति ज़रा भी निष्ठा नहीं रखते, ये वे हैं जो शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रहते हैं और शैतान द्वारा शोषित है। मृतक सत्य के विरुद्ध खड़े होकर, परमेश्वर का विरोध कर, नीचता कर, घिनौना, दुर्भावनापूर्ण, पाशविक, धोखेबाजी और कपट का व्यवहार कर स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। अगर ऐसे लोग परमेश्वर का वचन खाते और पीते हैं, तो भी वे परमेश्वर के वचनों को जीने में समर्थ नहीं हैं। वे जीवित तो हैं, परंतु वे चलती-फिरती, सांस लेने वाली लाशें भर हैं। मृतक परमेश्वर को संतुष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ हैं, पूर्ण रूप से उसके प्रति आज्ञाकारी होने की तो बात ही दूर है। वे केवल उसे धोखा दे सकते हैं, उसकी निंदा कर सकते हैं, और उससे कपट कर सकते हैं, और जैसा जीवन वे जीते हैं उससे सामने आने वाली हर बात शैतान की प्रकृति को प्रगट करती है। अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करना होगा; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना होगा, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छांट और निपटारे को स्वीकार करना होगा। केवल तब ही वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तब ही वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जो जीवित हैं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं, वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राणों को परमेश्वर को देने के लिए तत्पर हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पण कर देंगे। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देते हैं, तब ही शैतान शर्मिन्दा हो सकता है। केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के मध्य रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों को सृजा था वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने सृजा था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थी, उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ और उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसकी ज्योति में जी सकें। मृतक वे हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होते हैं और परमेश्वर विरोधी हैं। मुख्यतः, ये वे लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं। ये लोग सत्य और गवाही धारण करते हैं और केवल यही हैं जो परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर के उद्धार को देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के देहधारण में और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो पाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के अनेक वचनों को सुना है परंतु वे उसकी इच्छा को नहीं समझते, वे अब भी उन्हें अपने आचरण में ला पाने में असमर्थ हैं। वे किसी भी सत्य को जीने में असमर्थ हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य नहीं कर सकते, वे उसे कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते, और वे गुप्त रूप से कलीसिया के पैसे खर्च करते और बिना दाम दिए परमेश्वर के घर में खाते हैं। ये लोग मरे हुए हैं और बचाए नहीं जाएंगे। परमेश्वर उन सब को बचाता है जो उसके लिए कार्यरत हैं परंतु उनमें से कुछ हैं जो परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण नहीं कर सकते; केवल कुछ ही उसके उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज़्यादातर लोगों को बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिया गया है और वे मृत हो चुके हैं, और उनका उद्धार नहीं हो सकता; वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हैं और स्वभाव से बहुत दुर्भावनापूर्ण हैं। ये अल्पसंख्यक लोग भी परमेश्वर की आज्ञा मानने में पूर्ण रूप से असक्षम हैं। ये वो लोग नहीं हैं जो आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति पूर्णतः निष्ठावान थे, या जिनमें आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति परम प्रेम रहा है, ये वे हैं जो परमेश्वर के प्रति उसके विजय कार्यों के कारण आज्ञाकारी बने हैं, वे परमेश्वर को उसके उत्कृष्ट प्रेम के कारण देखते हैं, उनके स्वभाव में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण परिवर्तन होते हैं, और वे परमेश्वर को उसके कार्यों के कारण जानते हैं जो वास्तविक भी है और सामान्य भी। परमेश्वर के इस कार्य के बिना, चाहे ये लोग कितने ही अच्छे क्यों ना हों, वे शैतान के ही रहेंगे, वे मृत्यु के ही होंगे, वे मृतक ही रहेगें। आज यदि ये लोग परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं तो केवल इसलिये कि ये परमेश्वर से सहयोग करने की इच्छा रखते हैं।

परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा के कारण, जीवित लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएंगे और उसके वादों के मध्य रहेगें। परमेश्वर के प्रति उनके विरोध के कारण, मृतकों से परमेश्वर घृणा करेगा, उन्हें तिरस्कृत करेगा और वे उसकी सज़ा और श्रापों के मध्य रहेंगे। ऐसा है परमेश्वर का धर्मी स्वभाव और कोई भी मनुष्य इसमें परिवर्तन नहीं ला सकता। अपनी स्वयं की खोज के कारण लोग परमेश्वर की स्वीकृति पाकर ज्योति में जीते हैं; उनकी कुटिल योजनाओं के कारण लोगों को परमेश्वर श्रापित करता है और वे सज़ा भोगते हैं; अपने दुष्कर्म के कारण लोग परमेश्वर से सज़ा पाते हैं, अपनी लालसा और ईमानदारी के कारण लोग परमेश्वर की आशीषें पाते हैं। परमेश्वर धर्मी है : वह जीवितों को आशीष देता है लेकिन मृतकों को श्राप देता है ताकि वे हमेशा मृत्यु में रहें और कभी भी परमेश्वर की ज्योति में ना रहें। परमेश्वर जीवितों को अपने राज्य में और अपनी आशीषों में हमेशा के लिए ले लेगा। लेकिन मृतकों पर वो प्रहार करेगा और उन्हें अनंत मृत्यु में ढकेल देगा। वे उसके विनाश की वस्तु हैं और हमेशा शैतान के रहेंगे। परमेश्वर किसी से अन्याय नहीं करता। जो कोई सच्चाई से परमेश्वर की खोज करेगा, वो परमेश्वर के घर में रहेगा, और जो परमेश्वर की अवज्ञा करता है, और उससे संगत नहीं होता, वह निश्चितरूप से उसके दंड के बीच जिएगा। संभवतः तुम देह में परमेश्वर के कार्यों के प्रति, अनिश्चित हो—पर एक दिन परमेश्वर का देह सीधे तौर पर मनुष्य का अंत निर्धारित नहीं करेगा, बल्कि उसका आत्मा मनुष्य का गंतव्य निश्चित करेगा। उस समय लोग यह जानेंगे कि परमेश्वर का देह और आत्मा एक ही है, उसका देह गलती नहीं कर सकता और उसका आत्मा तो गलती से और भी अधिक परे है। अंततः वह निश्चित ही अपने राज्य में उन लोगों को ले लेगा जो जीवित हो उठे हैं; न एक अधिक, न एक कम। जो मृतक हैं, जो जीवित नहीं हुए, वे शैतान की माँद में फेंक दिए जाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 538

मनुष्य में पवित्र आत्मा के मार्ग का पहला चरण है, सबसे पहले, मनुष्य के हृदय को सभी व्यक्तियों, घटनाओं और चीज़ों से अलग करते हुए परमेश्वर के वचनों में खींच लाना, जिससे मनुष्य का हृदय यह विश्वास करने लगे कि परमेश्वर के वचन संदेह से परे हैं और पूर्णतया सत्य हैं। अगर तू परमेश्वर पर विश्वास करता है, तो तुझे उसके वचनों पर विश्वास करना चाहिए; यदि, बरसों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, तू पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग से अवगत नहीं है, तो क्या तू सच में एक विश्वासी है? एक सामान्य इंसानी जीवन—एक सामान्य इंसानी जीवन जिसका परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध है—पाने करने हेतु तुझे पहले उसके वचनों पर विश्वास करना होगा। अगर तूने, लोगों में पवित्र आत्मा के कार्य के पहले चरण को हासिल नहीं किया है तो तुम्हारे पास कोई आधार नहीं है। अगर सबसे बुनियादी सिद्धांत भी तेरी पहुँच से परे है तो तू आगे का सफर कैसे तय करेगा? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण किए जाने के सही मार्ग में कदम रखने का अर्थ है पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य के सही मार्ग में प्रवेश करना; इसका अर्थ है पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग पर कदम रखना। इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों का पालन करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या उसे जानने की, हरेक के लिए उसके वचनों पर अधिक समय देने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के परिणामस्वरूप उसे जानने और संतुष्ट करने के आधार पर ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ उचित संबंध स्थापित कर सकते हैं। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। ऐसे अभ्यास के द्वारा वे परमेश्वर के जन होने की अपनी गवाही में मजबूत खड़े रह पाएंगे। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उसके सार का पालन करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के पथ पर जीते हैं और वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिद्ध करने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं। पहले लोग बस परमेश्वर के अनुग्रह की खोज करने या शांति और आनंद की खोज करने से परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर सकते थे, लेकिन अब बात अलग है। देहधारी परमेश्वर के वचनों के बगैर, उसके वचनों की वास्तविकता के बगैर, लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं और वे सभी परमेश्वर द्वारा खत्म कर दिए जाएँगे। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए, लोगों को पहले परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और उनका अभ्यास करना चाहिए; और फिर इस आधार पर परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए। तू कैसे सहयोग कर सकता है? तू परमेश्वर के जन की गवाही में मजबूती से कैसे खड़ा रह सकता है? तू परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध कैसे स्थापित कर सकता है?

रोजमर्रा की जिंदगी में परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं या नहीं, इसे कैसे जानें :

1. क्या तू परमेश्वर की स्वयं की गवाही पर विश्वास करता है?

2. क्या तू अपने मन में विश्वास करता है कि परमेश्वर के वचन पूरी तरह सत्य और अचूक हैं?

3. क्या तू उसके वचनों पर अमल करता है?

4. क्या तू उसके आदेशों के प्रति निष्ठावान है? उसके आदेशों के प्रति निष्ठावान होने के लिए तू क्या करता है?

5. क्या तू अपना हर कार्य परमेश्वर के प्रति वफादार रहने और उसे संतुष्ट करने के लिए करता है?

ऊपर सूचीबद्ध की गयी बातों से तू जाँच सकता है कि वर्तमान चरण में परमेश्वर के साथ तेरा संबंध सामान्य है या नहीं।

अगर तू परमेश्वर के आदेशों को स्वीकारने में उसके वादे को स्वीकारने में सक्षम है, और पवित्र आत्मा के मार्ग का अनुसरण कर पाता है, तो तू परमेश्वर की इच्छा का पालन कर रहा है। क्या तू भीतर से पवित्र आत्मा के मार्ग के बारे में स्पष्ट है? इस वक्त, क्या तू पवित्र आत्मा के मार्ग के अनुरूप आचरण करता है? क्या तेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है? क्या तू पवित्र आत्मा के नवीनतम प्रकाश के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहता है? क्या तू परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना चाहता है? क्या तुझमें परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का संकल्प है? जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं तब यदि तू सहयोग करने का संकल्प रखता है, और तू उसे संतुष्ट करने का संकल्प रखता है—यदि यही तेरी मानसिकता है—तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर के वचन ने तेरे हृदय में फल उत्पन्न किया है। यदि तुझमें ऐसा संकल्प नहीं है और तू किन्हीं भी लक्ष्यों को पाने की कोशिश नहीं करता, तो इसका यह अर्थ है कि तेरा हृदय अभी तक परमेश्वर द्वारा द्रवित नहीं हुआ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 539

अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करने में, अभ्यास का मार्ग सरल है। यदि, तू अपने व्यावहारिक अनुभव में, तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों का पालन और परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकता है, तो तेरा स्वभाव परिवर्तित हो सकता है। यदि तू पवित्र आत्मा की हर बात का पालन करता है, पवित्र आत्मा की कही हर बात की खोज करता है, तो तू उसकी आज्ञा का पालन करने वाला व्यक्ति है, और तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा। पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों से लोगों का स्वभाव परिवर्तित होता है; यदि तू हमेशा अपने पुराने अनुभवों और नियमों से चिपका रहता है, तो तेरे स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि पवित्र आत्मा के आज के वचन सभी लोगों को एक सामान्य मानवता की जिंदगी में प्रवेश करने को कहें, लेकिन तेरा ध्यान बाहरी चीज़ों पर ही अटका रहता है और तू वास्तविकता के बारे में अनिश्चित है और इसे गंभीरता से नहीं लेता है, तो तू पवित्रात्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाने में असफल हो गया है, तू कोई ऐसा है जिसने पवित्र आत्मा की रहनुमाई के मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों के साथ चलता है या नहीं और सच्ची समझ तुझमें है या नहीं। यह तुम लोगों की पूर्व की समझ से अलग है। स्वभाव परिवर्तन के विषय में पहले जो तेरी समझ थी वह ये थी कि तू, जो आलोचना करने को इतना तत्पर है, परमेश्वर द्वारा अनुशासित किये जाने के कारण अब लापरवाही से नहीं बोलता है। पर यह परिवर्तन का सिर्फ एक पहलू है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है पवित्र आत्मा के दिशा निर्देश में रहना : परमेश्वर की हर बात का अनुसरण करना और हर आज्ञा का पालन करना। लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं। पहले स्वभाव में बदलाव की बात मुख्यतः खुद को त्यागने, शरीर को कष्ट सहने देने, अपने शरीर को अनुशासित करने, और अपने आप को शारीरिक प्राथमिकताओं से दूर करने के बारे में होती थी—जो एक तरह का स्वभाव परिवर्तन है। आज, सभी जानते हैं कि स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति परमेश्वर के मौजूदा वचन को मानने में है, और साथ ही साथ उसके नए कार्य को सच में समझने में है। इस प्रकार, परमेश्वर के बारे लोगों का पूर्व ज्ञान जो उनकी धारणा से रंगी थी, वह मिटाई जा सकती है और वे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं—केवल यही है स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 540

लोगों की जीवन में प्रवेश की चेष्टा परमेश्वर के वचनों पर आधारित है। पहले, यह कहा गया था कि सब कुछ उसके वचनों के कारण ही पूरा होता है, मगर किसी ने भी इस तथ्य को नहीं देखा। अगर तू वर्तमान चरण को अनुभव करने में प्रवेश करेगा, तो तुझे सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी और तू भविष्य की परीक्षाओं के लिए एक अच्छी नींव खड़ी करेगा। परमेश्वर चाहे जो कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है। जब परमेश्वर कहता है कि वह लोगों को ताड़ना देना शुरू करेगा, तो उसकी ताड़ना को स्वीकार कर। जब परमेश्वर लोगों से प्राण त्यागने को कहे, तो यह परीक्षा स्वीकार कर। यदि तू सदा उसके नए कथनों के भीतर जीवन बिताता है, तो अंत में परमेश्वर के वचन तुझे पूर्ण कर देंगे। जितना अधिक तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, उतनी ही शीघ्रता से तुझे पूर्ण किया जाएगा। क्यों मैं हर संगति में तुम सबसे परमेश्वर के वचनों को जानने और उनमें प्रवेश करने को कहता हूँ? केवल जब तू परमेश्वर के वचनों में अनुसरण करता है और उसका अनुभव करता है, और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तभी पवित्र आत्मा को तेरे अंदर कार्य करने का अवसर मिलेगा। इसलिए परमेश्वर के कार्य की हर पद्धति में तुम सब प्रतिभागी हो, और इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी पीड़ा कितनी अधिक है, अंत में तुम सबको "स्मारिका" मिलेगी। अपनी अंतिम पूर्णता प्राप्त करने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे वचनों में प्रवेश करना होगा। पवित्र आत्मा द्वारा लोगों की पूर्णता एकतरफा नहीं है; वह लोगों का सहयोग चाहता है। वह चाहता है कि हर कोई पूरी मर्ज़ी से उसके साथ सहयोग करे। परमेश्वर चाहे जो भी कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है, यह तुम्हारे जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। सारी बातें तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए ही हैं। जब तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, तब तेरा हृदय परमेश्वर द्वारा द्रवित किया जाएगा और तू वह सारी बातें समझ पायेगा जो परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण में प्राप्त करना चाहता है और तुझमें उसे प्राप्त करने का संकल्प होगा। ताड़ना के समय के दौरान, कुछ लोग थे जिनका मानना था कि यह कार्य करने का एक तरीका है और उन्होंने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया। इसके फलस्वरूप, वे शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे और बिना कुछ पाये या समझे वे ताड़ना की अवधि से बाहर आ गए। कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने बिना किसी संदेह के इन वचनों में प्रवेश किया; जिन्होंने कहा कि परमेश्वर का वचन अचूक सत्य है और मनुष्यों को ताड़ना मिलनी चाहिए। कुछ समय के लिए उन्होंने अपने भविष्य और गंतव्य को छोड़ने में संघर्ष किया, और जब वे इससे बाहर निकले, तो उनका स्वभाव थोड़ा-बहुत बदल गया था और उन्होंने परमेश्वर की गहरी समझ पा ली थी। जो लोग ताड़ना से निकल आये, उन सब ने परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव किया, और वे जानते थे कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण उनमें परमेश्वर के महान प्रेम के अवतरित होने को मूर्त रूप देता है, यह चरण परमेश्वर के प्रेम का विजय और उद्धार है। उन्होंने यह भी कहा कि परमेश्वर के विचार सदैव अच्छे होते हैं, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य में करता है, वह प्रेम से उपजा है, द्वेष से नहीं। जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया, जिन्होंने उन वचनों सम्मान नहीं किया, जो ताड़ना के समय शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे, परिणामस्वरूप उनके साथ पवित्र आत्मा नहीं था, और उन्होंने कुछ भी नहीं पाया। जिन लोगों ने ताड़ना के समय में प्रवेश किया, वे भले ही शुद्धिकरण से होकर गुज़रे, लेकिन पवित्र आत्मा उनके अंदर गुप्त तरीके से कार्य कर रहा था और उसके फलस्वरूप उनके स्वभाव में बदलाव हुआ। कुछ लोग बाहर से हर तरह से, बहुत सकारात्मक दिखते थे, वे सदा आनंदित रहते थे, लेकिन उन्होंने परमेश्वर के वचनों के द्वारा शुद्धिकरण की अवस्था में प्रवेश नहीं किया और इसलिए वे बिल्कुल नहीं बदले, जो कि परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करने का परिणाम था। यदि तू परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं रखता है तो पवित्र आत्मा तेरे अंदर कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उन सबके सामने प्रकट होता है जो उसके वचनों पर विश्वास करते हैं। जो लोग उसके वचनों पर विश्वास रखते हैं और उन्हें स्वीकारते हैं, वे उसका प्रेम प्राप्त कर सकेंगे!

परमेश्वर के वचनों की सच्चाई में प्रवेश करने के लिए, तुझे अभ्यास के मार्ग को ढूँढ़ना चाहिए और ज्ञात होना चाहिए कि कैसे परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाएँ। केवल इस प्रकार से ही तेरे जीवन स्वभाव में परिवर्तन होगा। केवल इसी पथ से तू परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जा सकता है और केवल वे जो परमेश्वर द्वारा इस तरह से पूर्ण किए गए हैं वे ही उसकी इच्छा के अनुसार हो सकते हैं। नयी ज्योति पाने के लिए, तुझे उसके वचनों में जीना होगा। केवल एक बार पवित्र आत्मा के द्वारा द्रवित किया जाना काफी नहीं है, तुझे और गहराई में जाना होगा। जो केवल एक बार पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए गए हैं, उनमें उत्साह जाग जाता है और वे तलाश करने के इच्छुक बन जाते हैं, परंतु ये लंबे समय तक टिक नहीं सकता; उन्हें लगातार पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किया जाना चाहिए। पहले कई बार मैंने अपनी आशा को व्यक्त किया कि पवित्र आत्मा लोगों की आत्माओं को द्रवित करे, ताकि वे अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने का प्रयास करें, और परमेश्वर द्वारा द्रवित किए जाने का प्रयास करते हुए वे अपनी कमियों को समझ पाएँ, और उसके वचनों को अनुभव करने की प्रक्रिया में, वे अपने अंदर की अशुद्धताओं को निकाल फेंकें (अहंकार, घमंड, धारणाएँ इत्यादि)। यह न मान बैठ कि बस नई ज्योति को प्राप्त करने में सक्रिय होने से काम चल जाएगा—तुझे सभी नकारात्मक बातों को भी उतार फेंकना होगा। एक ओर, तुम लोगों को सकारात्मक पहलु से प्रवेश करने की जरूरत है, और दूसरी ओर, तुम लोगों को नकारात्मक पहलु से सभी अपवित्र चीज़ों से भी छुटकारा पाने की जरूरत है। तुझे लगातार स्वयं कि जाँच यह देखने के लिए करनी चाहिए कि अभी भी तेरे भीतर कौन-सी अपवित्र चीज़ें मौजूद हैं। इंसानों की धार्मिक धारणाएँ, इरादे, आशाएं, अहंकार, और घमंड आदि सारी अशुद्ध बातें हैं। अपने भीतर झाँक, परमेश्वर के प्रकाशन के वचनों से खुद की तुलना कर और देख कि तुझमें कौन-सी धार्मिक धारणाएँ हैं। उन्हें सही तरह से पहचान पाने के बाद ही तू उन्हें निकाल फेंक सकता है। कुछ लोग कहते हैं: "अब बस पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की ज्योति का अनुसरण करना पर्याप्त है। और किसी भी दूसरी चीज़ पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।" लेकिन जब, तेरी धार्मिक धारणाएं जागेंगी, तो तू उनसे कैसे छुटकारा पायेगा? क्या तू सोचता है कि आज परमेश्वर के वचनों का पालन करना एक सरल बात है? अगर तुम धर्म के कोई व्यक्ति हो तो धर्म से जुड़ी तुम्हारी धारणाओं और दिल में बसे पारंपरिक धार्मिक ज्ञान संबंधी सिद्धांतों से बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं, ये बातें तुम्हारे द्वारा नई चीज़ों की स्वीकृति में हस्तक्षेप करती हैं। यह सब समस्याएं वास्तविक हैं। यदि तू केवल पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों का ही अनुसरण करता है, तो तू परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकता। जब तू पवित्र आत्मा की वर्तमान ज्योति का अनुसरण करता है, तो इसके साथ ही तुझे यह पहचानना चाहिए कि तेरे भीतर कौन सी धारणाएँ और इरादे हैं, तुझमें कौन-से मानवीय अहंकार हैं, और कौन से व्यवहार परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं। और इन सारी चीज़ों को पहचान लेने के बाद, तुझे उन्हें निकाल फेंकना चाहिए। तुझसे तेरे पुराने क्रियाकलापों और व्यवहारों को त्याग करवाना, सब तुझे पवित्र आत्मा के आज बोले गए वचनों का अनुसरण करने देने के लिए है। स्वभाव में बदलाव, एक ओर परमेश्वर के वचनों द्वारा हासिल होता है और दूसरी ओर इसके लिए इंसान के सहयोग की आवश्यकता है। एक तो परमेश्वर का कार्य है और दूसरा लोगों का अभ्यास, दोनों ही अपरिहार्य हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 541

अपनी सेवा के भविष्य के पथ में, तू परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा कर सकता है? एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करना, अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयत्न करना, और सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करने का यत्न करना—यह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाने का मार्ग है। तुम सब परमेश्वर के आदेश के प्राप्तकर्ता हो लेकिन आदेश क्या है? यह कार्य के अगले क़दम से जुड़ा है; अगले चरण का कार्य एक अधिक बड़ा कार्य होगा जो पूरी कायनात भर में किया जाता है, इसलिए आज, तुम लोगों को अपने जीवन स्वभाव बदलाव लाने की चेष्टा करनी चाहिए ताकि भविष्य में तुम सब परमेश्वर के अपने कार्य के माध्यम से महिमा पाने का एक प्रमाण बन जाओ, और उसके भविष्य के कार्यों के लिए एक नमूना बन जाओ। आज के प्रयास भविष्य के कार्य के लिए एक नींव है, ताकि तू परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जा सके और उसकी गवाही देने में सक्षम बन सके। अगर तू इसे अपने प्रयासों का लक्ष्य बना ले, तो तू पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त कर पायेगा। तू अपने लक्ष्य को जितना ऊंचा रखेगा, उतना ही अधिक तू पूर्ण किया जा सकेगा। जितना अधिक तू सत्य के लिए प्रयास करेगा, उतना ही अधिक पवित्र आत्मा कार्य करेगा। अपने प्रयासों में तू जितनी ऊर्जा लगाएगा, उतना अधिक तू प्राप्त करेगा। पवित्र आत्मा लोगों को उनकी आंतरिक अवस्था के आधार पर पूर्ण करता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर द्वारा उपयोग होने या उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के इच्छुक नहीं हैं, वे बस चाहते हैं कि उनकी देह सुरक्षित रहे और उन्हें कोई दुर्भाग्य न झेलना पड़े। कुछ लोग राज्य में प्रवेश करना नहीं चाहते लेकिन अथाह कुंड में उतरना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो परमेश्वर भी तेरी इच्छा को पूरा करेगा। तू जो भी प्रयास करेगा परमेश्वर उसे पूरा करेगा। तो इस समय तेरा प्रयास क्या है? क्या यह पूर्ण किया जाना है? क्या तेरे वर्तमान कार्यकलाप और व्यवहार परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की खातिर हैं, उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए हैं? तुझे अपने रोजमर्रा के जीवन में इस तरह से स्वयं का आंकलन निरंतर करना चाहिए। यदि तू पूरे दिल से एक लक्ष्य का पीछा करने में लग जाता है, तो निस्संदेह परमेश्वर तुझे पूर्ण करेगा। यह पवित्र आत्मा का मार्ग है। जिस मार्ग पर पवित्र आत्मा लोगों को ले जाता है, वह प्रयास से प्राप्त होता है। जितनी अधिक तेरे भीतर परमेश्वर के द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाने की प्यास होगी, पवित्र आत्मा तेरे अंदर उतना ही अधिक काम करेगा। जितना अधिक तू तलाश करने में असफल होता है, जितना अधिक तू नकारात्मक और पीछे हटनेवाला होता है, उतना ही तू पवित्र आत्मा से कार्य करने के अवसर छीन लेता है; जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा पवित्र आत्मा तुझे त्याग देगा। क्या तू परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाना चाहता है? तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, प्राप्त किए जाने, और उपयोग किए जाने के उद्देश्य से हर संभव कार्य करने का प्रयास करना चाहिए, जिससे ब्रह्मांड की सभी चीज़ें तुम्हारे भीतर परमेश्वर के प्रदर्शित हुए कार्य को देख सकें। तुम सभी चीज़ों के बीच स्वामी हो, और जो सभी चीज़ें हैं उन सबके बीच, तुम परमेश्वर को तुम्हारे माध्यम से गवाही और महिमा का आनंद लेने दोगे—यह प्रमाण है कि तुम सभी पीढ़ियों में सबसे सौभाग्यशाली हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 542

जितना अधिक तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहेगा, तेरा बोझ उतना अधिक हो जाएगा। तेरा बोझ जितना ज्यादा होगा, उतना तेरा अनुभव ज्यादा होगा। जब तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत होता है, परमेश्वर इस बोझ को तुझे देगा, और तू परमेश्वर द्वारा उन बातों पर प्रबुद्ध किया जाएगा, जो उसने तुझे सौंपा है। परमेश्वर द्वारा यह बोझ तुझे दिए जाने के बाद, तुझे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय इस पहलु की सच्चाईयों पर ध्यान देना होगा। यदि तेरे ऊपर भाइयों और बहनों की जीवन दशा से जुड़ा बोझ है तो यह बोझ परमेश्वर ने तुझे सौंपा है, तब तेरी प्रतिदिन की प्रार्थना में भी यह बोझ हमेशा रहेगा। परमेश्वर जो करता ह वह तुझे सौंपा गया है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है, उसे आगे ले जाने के लिए तू इच्छुक होगा, और यही अर्थ है परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ समझना। इस बिंदु पर, तेरा परमेश्वर के वचन को खाना और पीना इन बातों के पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करेगा, और तू सोचेगा: मैं कैसे इन बातों को हल करूंगा? कैसे मैं भाइयों और बहनों को उनकी आत्मा में आनंद प्राप्त करने के लिए, स्वतंत्र होने दूंगा। जब तू संगति में होगा तू इन मुद्दों को हल करने में ध्यान केन्द्रित करेगा, जब तू परमेश्वर के वचनों को खा और पी रहा होगा, तब तू इन समस्याओं से संबंधित वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करेगा, तू इस बोझ को ढोते समय परमेश्वर के वचनों को खाएगा और पीएगा, और तू परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझेगा। इस बिंदु पर, तू मार्ग पर चलने के बारे में स्पष्ट हो जाएगा। तेरे बोझ के बारे में पवित्र आत्मा द्वारा यह प्रबुद्धता और रोशनी लाई गई है, और यह परमेश्वर का तेरी अगुवाई के लिए होगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूं? यदि तेरे ऊपर कोई बोझ नहीं है, तब तू परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय इस पर ध्यान नहीं देता है; बोझ ढोने के दौरान जब तू परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता है, तो तू परमेश्वर के वचनों का सार समझने में सक्षम होता है, अपना मार्ग खोजो, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति सावधान रहो। इसलिए, तुझे परमेश्वर से अपनी प्रार्थना में और अधिक बोझ मांगना चाहिए, ताकि वह तुझे बड़ी चीज सौंप सके, तू आगे अभ्यास करने के लिए बेहतर मार्ग खोजने में सक्षम हो जाएगा, तू परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में और भी ज्यादा प्रभावशील हो जाएगा, तू उसके वचनों के सार को प्राप्त करने में सक्षम हो जाएगा, और तू और भी अधिक सरलता से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित कर दिए जाएगा।

परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना का अभ्यास करना, और परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना, उसे स्वीकार करना जो उसने तुझे सौपा है—ये सभी मार्ग को प्राप्त करने के उद्देश्य से है। परमेश्वर के आदेश के लिए जितना अधिक बोझ तेरे पास होता है, परमेश्वर के लिए तुझे पूर्ण बनाना उतना ही आसान होता है। कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में सहयोग करने की इच्छा नहीं रखते हैं जबकि वे बुलाए गए हैं; ये आलसी लोग हैं जो केवल आराम में आनंद के इच्छुक हैं। तुझसे परमेश्वर की सेवा में जितना अधिक सहयोग करने का आग्रह किया जाता है, उतना अधिक अनुभव तू प्राप्त करेगा। क्योंकि तेरे पास अधिक बोझ है, और तू अधिक अनुभव करता है, तेरे पास पूर्ण बनाए जाने का अधिक मौका होगा। इसलिए, यदि तू परमेश्वर की सेवा सच्चाई से कर सकता है, तब तू परमेश्वर के बोझ के प्रति सावधान रहेगा, और इस तरह तेरे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाये जाने के अधिक अवसर होगा। इनके जैसे मनुष्यों का एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। जितना अधिक पवित्र आत्मा तुझे प्रेरित करेगा, तू उतना अधिक परमेश्वर के बोझ के लिए सावधान होने के प्रति समर्पित होगा, तू परमेश्वर द्वारा और उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तू परमेश्वर से उतना अधिक लाभ प्राप्त करेगा, और अंत में, तू वह बन जाएगा जिसे परमेश्वर द्वारा उपयोग किया गया है। वर्तमान में, कुछ लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं ढोते हैं। ये लोग सुस्त और मैले हैं, और वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ये बहुत स्वार्थी हैं, और अंधे भी हैं। यदि तू इस मामले को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम नहीं होता है तो तेरे पास कोई बोझ नहीं होगा। जितना अधिक तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति सावधान होगा, उतना अधिक बोझ परमेश्वर तुझे सौंपेगा। स्वार्थी लोग ऐसी बातों से दुःख नहीं उठाना चाहते, वे कीमत चुकाने में अनिच्छुक होते हैं, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाते हैं। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तू ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर की इच्छा के प्रति सावधान है, तो तू कलीसिया के लिए वास्तविक बोझ विकसित करेगा। वास्तव में, इसे कलीसिया के लिए बोझ कहने की बजाय, यह खुद तेरे जीवन के लिए एक बोझ है, क्योंकि जो बोझ तू कलीसिया के लिए विकसित करता है यह तेरे लिए परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए है। ऐसे अनुभवों के माध्यम से, इसलिए, जो भी कलीसिया के लिए सबसे भारी बोझ उठाता है औरजो भी जीवन में प्रवेश के लिए भी बोझ उठाता है, ऐसे लोग होंगे जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाएंगे। क्या अब तूने इसे स्पष्ट रूप से देखा? यदि जिस कलीसिया के साथ तू है वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तू न तो चिंतित है और न ही व्याकुल है, और जब तेरे भाई-बहन परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाते-पीते नहीं हैं, तब तू आंख भी मूंद लेता है, तब तू कोई जिम्मेदारी वहन नहीं कर रहा है। ऐसा मनुष्य परमेश्वर द्वारा पसंद नहीं किया जाता। परमेश्वर को पसंद आने वाले लोग धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे उसकी इच्छा के प्रति सावधान होता है। इसलिए, तुम सब को परमेश्वर के बोझ के लिए अब सावधान होना चाहिए। तुझे परमेश्वर के बोझ के प्रति सावधान होने से पहले परमेश्वर के सभी लोगों के सामने प्रकट होने वाले धर्मी स्वभाव का इंतजार नहीं करना चाहिए। क्या यह बहुत देर नहीं होगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तू अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने देता है, तू अपने बाकी जीवन में खेद करता रहेगा, मूसा के समान जो कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और बाकी जीवन उसने उसका खेद किया, पछतावे के साथ मरा। एक बार परमेश्वर का धर्मी स्वभाव सभी लोगों को प्रकट हो जाने के बाद, तू पछताएगा। यदि परमेश्वर तुझे दण्डित नहीं करता है, तू स्वयं को अपने खुद के पछतावे के कारण दण्डित करेगा। कुछ लोग इससे प्रभावित नहीं होंगे। यदि तू मुझ पर विश्वास नहीं करता है, तो इन्तजार कर और देख। कुछ लोग इन वचनों की पूर्णता के लिए काम करते हैं। क्या तू इन वचनों के लिए बलिदान की भेंट बनने की इच्छा कर रहाहै?

यदि तू परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर को नहीं ढूँढता है, और यदि तू परिपूर्णता की अपनी खोज में सबसे आगे रहने जाने का प्रयास नहीं करता है, तब तू अंततः खेद से भर जाएगा। अभी पूर्ण बनाए जाने का श्रेष्ठ अवसर है—यह श्रेष्ठ समय है। यदि तू गंभीरतापूर्वक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश नहीं करता है, एक बार उसका काम सम्पन्न हो जाता है, तो बहुत देर हो जाएगी—तू अवसर से चूक जाएगा। भले ही तूने इसमें कोई प्रयास किया हो, तू कभी भी पूर्ण बनाए जाने में सक्षम नहीं होगा। जब पवित्र आत्मा अपना महान कार्य कर रहा है तब तुझे इस अवसर को अवश्य धर लेना चाहिए और सहयोग करना चाहिए, यदि तुम यह अवसर को खोते हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितना भी प्रयास किया है तुम्हें दूसरा नहीं दिया जाएगा। कुछ लोग चिल्लाते हैं: "परमेश्वर, मैं तेरे बोझ के लिए सावधान होने के लिए इच्छुक हूं, और मैं तुम्हारी इच्छा को संतुष्ट करने का इच्छुक हूं।" लेकिन अभी तक उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं है, इसलिए उनका बोझ अंत तक नहीं होगा। यदि तेरे सामने एक मार्ग है, तो चरण दर चरण अनुभव प्राप्त करेगा और यह संरचित और संयोजित होगा। एक बोझ पूरा हो जाने के बाद, तुझे दूसरा दिया जाएगा। तेरे जीवन के गहरे अनुभव के साथ, तेरा बोझ भी गहरा होगा। कुछ लोग केवल तब बोझ उठाते हैं जब वे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित होते हैं, और कुछ समय के बाद, वे किसी बोझ को उठाने के इच्छुक नहीं होते जब उनके पास अभ्यास के लिए कोई मार्ग नहीं होता है। केवल परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम बोझ का विकास नहीं कर सकते। बहुत सारे सत्य को समझ करके, तू प्रभेद प्राप्त कर पाएगा और तू सत्य के उपयोग द्वारा समस्याओं को हल करने में सक्षम बन जाएगा, और तेरे पास परमेश्वर के वचन और इच्छा की और भी सटीक समझ होगी। इन बातों के साथ, तू बोझ विकसित करेगा, और तू भले कामों को केवल तभी करना शुरू करेगा जब तेरे पास बोझ होगा। यदि तेरे पास केवल बोझ है, लेकिन तेरे पास सत्य की स्पष्ट समझ नहीं है, तो यह भी काम नहीं करेगा। तेरे पास परमेश्वर के वचनों का स्वयं अनुभव होना चाहिए, और, यह पता होना चाहिए उनका अभ्यास कैसे करना है, और इससे पहले कि तुम दूसरों के लिए प्रदान कर सको, दूसरों की अगुवाई कर सको, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओ तुम्हें सबसे पहले स्वयं को वास्तविकता में प्रवेश करवाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 543

इसी क्षण, परमेश्वर का काम हर व्यक्ति को सही पथ पर प्रवेश कराने का है, ताकि हर एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त हो, और हर व्यक्ति सच्चा अनुभव प्राप्त कर सके, कि हर व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित हो जाए, और इस नींव पर आधारित, उसे स्वीकार करे जो परमेश्वर ने सौंपा है। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने के कारण तुम लोगों का राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का उद्देश्य तुम सब के प्रत्येक वचन, प्रत्येक कार्य, प्रत्येक कार्यवाही, और प्रत्येक विचार और सुझाव परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने देताहै, तुम लोग परमेश्वर द्वारा अधिक हद तक प्रेरित हो पाओ और परमेश्वर के लिए प्रेम और परमेश्वर की इच्छा के लिए अधिक भारी बोझ उत्पन्न कर पाओ, ताकि हर व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर हो, ताकि हर मनुष्य सही मार्ग पर हो। एक बार जब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर होते हो, तब तुम सही मार्ग पर होते हो। तुम्हारा मन और विचार, साथ ही तुम्हारे गलत इरादे, जब सही किए जा सकते हैं और; जब तुम शरीर के लिए सचेत होने से हटकर परमेश्वर की इच्छा के लिए सचेत होने में सक्षम होते हो और, जब गलत इरादे सामने आते हैं, तुम उन इरादों से व्याकुल नहीं होते हो और तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करते हो—यदि तुम इस प्रकार के बदलाव को प्राप्त करने में सक्षम होते हो, तब तुम जीवन के अनुभव के सही मार्ग पर हो। जब तुम्हारा प्रार्थना अभ्यास सही मार्ग पर होता है, उसी समय तुम प्रार्थना में पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित किए जाओगे। हर बार जब तुम प्रार्थना करते हो, तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाओगे; हर बार जब प्रार्थना करते हो तुम परमेश्वर के सामने अपने ह्रदय को शांत रखने में सक्षम होते होगे। हर बार जब तुम परमेश्वर के वचन के अंश को खाते और पीते हो, यदि तुम उसके द्वारा अभी किये जा रहे कार्य को समझने में सक्षम होते हो और यह जानने में सक्षम हो कि प्रार्थना कैसे करें, कैसे सहयोग करें औरकैसे उसमें प्रवेश करें, और परमेश्वर के वचन को खाने और पीने से परिणामों से तुमने प्राप्त किया है। जब तू परमेश्वर के वचन से प्रवेश के पथ को प्राप्त करता है, और तू परमेश्वर के कार्य की वर्तमान चाल को समझने और पवित्र आत्मा के कार्य की प्रकृति को समझने में सक्षम होगा, उसके वचनों में यह दिखाएगा कि तू सही पथ पर है। यदि तू परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय मुख्य बिन्दुओं को नहीं समझता है, यदि तू परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हुए अभ्यास के लिए पथ प्राप्त करने में सक्षम नहीं होता है, तो यह दिखाता है तू अभी तक नहीं जानता कि कैसे परमेश्वर के वचन को खाया और पीया जाता है, यह दिखाता है कि तू अभी भी नहीं जानता कि उसके वचनों को कैसे खाया और पीया जाता है और तुम्हें उसके वचनों को खाने और पीने का तरीका और सिद्धांत नहीं मिला। यदि तू परमेश्वर के वर्तमान के काम को नहीं समझता, तू परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने में अक्षम होगा। परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया गया काम है जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, और यह कि वर्तमान में इसका ज्ञान हो। क्या तुम सब इन बातों को समझते हो?

यदि तू प्रभावी ढंग से परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता हो, तो तेरा आध्यात्मिक जीवन सामान्य हो जायेगा, और तू चाहे जिन भी परीक्षाओं का सामना करे, तू जिन भी परिस्थितियों को देखे, जो भी शारीरिक तकलीफ झेले, या भाइयों और बहनों के मनमुटाव, या पारिवारिक कठिनाइयों का अनुभव करे, तू परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाने-पीने में सक्षम होगा और कलिसियाई जीवन सामान्य ढंग से जी पाएगा; यदि तू यह सब हासिल कर ले, तब यह दिखायेगा कि तू सही मार्ग पर है। कुछ लोग बहुत नाजुक होते हैं और उनमें दृढ़ता की कमी होती है। छोटी-सी बाधा का सामना करते हुए वे बच्चों जैसे रोने लगते है और नकारात्मक हो जाते हैं। सत्य का अनुसरण दृढ़ता और दृढ संकल्प की मांग करता है। यदि इस समय तू परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में अक्षम है, तुझे अपने आप से अवश्य घृणा करनी चाहिए, चुपचाप अपने दिल में दृढ़ निश्चय करने के लिए कि तू अगली बार परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करेगा। यदि इस समय तू परमेश्वर के बोझ के लिए सचेत होने में अक्षम था, तुझे भविष्य में समान बाधा का सामना करने पर शरीर के खिलाफ विद्रोह के लिए संकल्पित, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना चाहिए। इस प्रकार तू प्रशंसनीय बनेगा। कुछ लोग यह भी नहीं जानते कि उनके विचार और ख्याल सही हैं या नहीं—ऐसे लोग मूर्ख होते हैं! यदि तू अपने दिल को वश में लाता है और शरीर के खिलाफ विद्रोह पसंद करेगा, तो पहले तुझे जानना होगा कि क्या तुम्हारे इरादे अच्छे हैं और उसके बाद ही तू अपने दिल को वश में कर सकता है। यदि तू अभी भी नहीं जानता कि तेरे इरादे सही हैं या नहीं, तो क्या तू अपने दिल को वश में कर सकता है और शरीर के विरोध में विद्रोह कर सकता है? यदि तू विद्रोह करता है, तो तू इसे भ्रमित रूप से कर रहा होता है। तुझे जानना चाहिए कि तेरे पथभ्रष्ट इरादों के विरोध में विद्रोह कैसे करें; देह के विरोध में विद्रोह करने का यही अर्थ है। जब तू जानता है कि तेरे इरादे, सोच और ख्याल गलत हैं, तो तुझे तत्काल मुड़ जाना चाहिए और सही पथ पर चलना चाहिए। सबसे पहले इस मुद्दे का समाधान कर, और इस संबंध में प्रवेश प्राप्त करने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित कर, क्योंकि तू बेहतर जानता है कि तेरे इरादे सही हैं या गलत हैं। जब गलत इरादे सही किये जाते हैं, और परमेश्वर के लिए होते हैं, तब तू अपने दिल को वश में करने के लक्ष्य को प्राप्त कर चुका होता है।

तुम लोगों के लिए कुंजी अब परमेश्वर का ज्ञान, परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करना है और तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे काम करता है; यह कुंजी है सही पथ पर जाने के लिए। तेरे लिए सही पथ में जाना सरल होगा जब एक बार तू इस कुंजी को समझ लेता है। तू परमेश्वर में विश्वास रखता है और और उसे जानता है, जो दिखाता है कि परमेश्वर में तेरा विश्वास खरा है। यदि तू अंत तक अनुभव जारी रखता है फिर भी परमेश्वर को जानने में सक्षम नहीं होता है, तब तू सचमुच वह है जो परमेश्वर का विरोध करता है। जो लोग केवल प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं लेकिन आज के देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे सभी दंडित किए जाएंगे। वे सभी बाद के दिनों के फरीसी हैं, क्योंकि वे आज के परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं और वे सब परमेश्वर के विरोधी हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका विश्वास यीशु में कितना ही समर्पित है, यह सब व्यर्थ हो जाएगा; वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं करेंगे। वे सब जो कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, फिर भी उनके ह्रदय में परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं है, वे पाखंडी हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 544

परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने के लिए, व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना क्या है, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में क्या शर्ते हैं और तब ऐसे मामलों की समझ हो जाने के बाद, अभ्यास के पथ को खोज। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के क्रम में एक व्यक्ति में निश्चित क्षमता होनी चाहिए। तुम में से कई लोग जरुरी क्षमता को धारण नहीं करते, जिसके लिए तुम्हें निश्चित कीमत चुकानी पड़ती है और व्यक्ति-निष्ठ प्रयास करना पड़ता है। तुम्हारी क्षमता जितनी कम होगी, तुम्हें उतना अधिक व्यक्ति-निष्ठ प्रयास करना पड़ेगा। परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी समझ जितनी अधिक विशाल होगी और जितना अधिक तुम उन्हें अभ्यास में लाते हो, उतनी ही जल्दी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश कर सकते हो। प्रार्थना करने के द्वारा, तुम्हें प्रार्थना के क्षेत्र में परिपूर्ण बनाया जा सकता है; परमेश्वर के वचनों को खाने एवं पीने के द्वारा भी तुम्हें परिपूर्ण बनाया जा सकता है, परमेश्वर के वचनों के सार को समझने के द्वारा, और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जीने के द्वारा, तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के द्वारा, तुझे यह जान लेना चाहिए कि तुझमें किस बात की कमी है, इसके अतिरिक्त, तुझे अपने घातक दोष एवं कमज़ोरियों को पहचान लेना चाहिए, और परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए। ऐसा करके, तुझे धीरे-धीरे परिपूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण किए जाने के रास्तेः प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना एवं पीना, परमेश्वर के वचनों के तत्वों को समझना, परमेश्वर के वचनों के अनुभव में प्रवेश करना, तुझमें जिस बात की कमी है उसे जानना, परमेश्वर के कार्य का पालन करना, परमेश्वर के बोझ के प्रति सचेत रहना एवं परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के द्वारा देह का त्याग करना, और अपने भाईयों एवं बहनों के साथ निरन्तर सहभागिता करना, जो तेरे अनुभवों को समृद्ध करता है। चाहे यह सामुदायिक जीवन हो या तेरा व्यक्तिगत जीवन, और चाहे यह बड़ी सभाएँ हों या छोटी हों, सभी तुम्हें अनुभव एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने दे सकते हैं, ताकि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांति से रहे और परमेश्वर के पास वापस आ जाए। यह सब कुछ पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया है। परमेश्वर के बोले गए वचनों का अनुभव करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों का वास्तव में स्वाद ले पाना है और उन्हें तुममें जीए जाने देना है ताकि तुझमें परमेश्वर के प्रति कहीं अधिक बड़ा विश्वास एवं प्रेम हो। इस तरीके से, तू धीरे धीरे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को निकाल देगा, तू अपने आपको अनुचित इरादों से वंचित करेगा, और सामान्य मनुष्य की समानता में जीवन बिताएगा। तेरे भीतर परमेश्वर का प्रेम जितना ज़्यादा होता है—दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के द्वारा तुम्हें जितना अधिक पूर्ण बनाया गया है—तू शैतान के द्वारा उतना ही कम भ्रष्ट किया जाता है। अपने व्यावहारिक अनुभवों के द्वारा, तू धीरे धीरे पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश करेगा। इसलिए, यदि तू सिद्ध किए जाने की लालसा करता है, तो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखना एवं परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना अति आवश्यक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 545

परमेश्वर अब एक विशेष लोगों के समूह को प्राप्त करना चाहता है, ऐसा समूह जिसमें वे लोग शामिल हैं जो उसके साथ सहयोग करने का प्रयास करते हैं, जो उसके कार्य का पालन कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा बोले हुए वचन सत्य हैं, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को अपने अभ्यास में ला सकते हैं; ये वे लोग हैं जिनके हृदयों में सच्ची समझ है, ये वे लोग हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है, और वे निःसंदेह पूर्णता के पथ पर चलने में समर्थ होंगे। जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ के बिना हैं, जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हैं, जो उसके वचनों पर कोई ध्यान नहीं देते, और जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं है। जो देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं, उसके बारे में हमेशा अनिश्चित रहते हैं, उसके वचनों को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते हैं, और हमेशा उसे धोखा देते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और शैतान के संबंधी हैं; ऐसे लोगों को परिपूर्ण बनाने का कोई तरीका नहीं है।

यदि तू पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो पहले तुझ पर परमेश्वर द्वारा कृपा की जानी चाहिए, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण बनाता है, जिन पर वह कृपा करता है, जो उसके हृदय के अनुसार होते हैं। यदि तू परमेश्वर के हृदय के अनुसार होना चाहता है, तो तेरे पास ऐसा हृदय अवश्य होना चाहिए जो उसके कार्यों का पालन करता हो, तुझे सत्य का अनुसरण करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, और तुझे सभी बातों में परमेश्वर की छानबीन को अवश्य स्वीकार करना चाहिए। क्या तू जो कुछ भी करता है, वो परमेश्वर की छानबीन से गुजरता है? क्या तेरा इरादा सही है? यदि तेरा इरादा सही है, तो परमेश्वर तेरी प्रशंसा करेगा; यदि तेरा इरादा ग़लत है, तो यह दिखाता है, कि जिसे तेरा दिल प्यार करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि यह देह और शैतान है। इसलिए तुझे सभी बातों में परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना को माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, तब भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से तेरे सामने खड़ा नहीं होता हूँ, लेकिन पवित्र आत्मा तेरे साथ होता है, और यह स्वयं मुझसे और पवित्र आत्मा से तू प्रार्थना कर रहा होता है। तू इस देह पर क्यों भरोसा करता है? तू इसलिए भरोसा करता है क्योंकि उसमें परमेश्वर का आत्मा है। यदि वह व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा के बिना होता तो क्या तू उस पर भरोसा करता? जब तू इस व्यक्ति पर भरोसा करता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा करता है। जब तू इस व्यक्ति से डरता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा से डरता है। परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा इस व्यक्ति पर भरोसा करना है, और इस व्यक्ति पर भरोसा करना, परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा करना भी है। जब तू प्रार्थना करता है, तो तू महसूस करता है कि परमेश्वर का आत्मा तेरे साथ है, और परमेश्वर तेरे सामने है; इसलिए तू उसके आत्मा से प्रार्थना करता है। आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं; जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। कोई भी बात, जो परमेश्वर की छानबीन का सामना नहीं कर सकती, वह सत्य के अनुरूप नहीं है, और उसे अलग कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर के विरूद्ध पाप करना है। इसलिए, तुझे हर समय, जब तू प्रार्थना करता है, जब तू अपने भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता है, और जब तू अपना कर्तव्य करता है और अपने काम में लगा रहता है, तो तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख अवश्य रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और छानबीन की तलाश करता है, यदि ये चीज़ें तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावशाली होंगी। यदि तू ईमानदारी से अपने दिल में परमेश्वर से प्रेम करता है, तो परमेश्वर से एक प्रतिज्ञा कर : "परमेश्वर, जो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सब वस्तुओं में है, मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ : तेरा आत्मा, जो कुछ मैं करता हूँ, उसे जाँचे और मेरी सुरक्षा करे और हर समय मेरी देखभाल करे, इसे संभव बनाए कि मेरे सभी कृत्य तेरी उपस्थिति में खड़े रह सकें। यदि कभी भी मेरा हृदय तुझसे प्यार करना बंद कर दे, या यह कभी भी तुझसे विश्वासघात करे, तो तू मुझे कठोरता से ताड़ना और श्राप दे। मुझे ना तो इस जगत में और न आगे क्षमा कर!" क्या तू ऐसी शपथ खाने की हिम्मत करता है? यदि तू नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि तू कायर है, और तू अभी भी खुद से ही प्यार करता है। क्या तुम लोगों के पास यह संकल्प है? यदि वास्तव में यही तेरा संकल्प है, तो तुझे प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। यदि तेरे पास ऐसी प्रतिज्ञा लेने का संकल्प है, तो परमेश्वर तेरे संकल्प को पूरा करेगा। जब तू परमेश्वर से प्रतिज्ञा करता है, तो वह सुनता है। परमेश्वर तेरी प्रार्थना और तेरे अभ्यास से निर्धारित करता है कि तू पापी है या धार्मिक। यह अब तुम लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया है, और यदि पूर्ण बनाए जाने पर वास्तव में तुझे विश्वास है, तो तू जो कुछ भी करता है, वह सब परमेश्वर के सम्मुख लाएगा और उसकी छानबीन को स्वीकार करेगा; और यदि तू कुछ ऐसा करता है जो उग्र रूप से विद्रोहशील है या यदि तू परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा, और तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तेरे साथ क्या होता है, चाहे वह विनाश हो या ताड़ना, यह तेरे स्वयं का कार्य है। तूने प्रतिज्ञा ली थी, इसलिए तुझे ही इसका पालन करना चाहिए। यदि तूने कोई प्रतिज्ञा की, लेकिन उसका पालन नहीं किया, तो तुझे विनाश भुगतना होगा। चूँकि प्रतिज्ञा तेरी थी, परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा। कुछ लोग प्रार्थना के बाद डरते हैं, और विलाप करते हैं, "सब ख़त्म हो गया! व्यभिचार का मेरा मौका चला गया; दुष्ट चीजें करने का मेरा मौका चला गया; सांसारिक लालचों में लिप्त होने का मेरा मौका चला गया!" ऐसे लोग अभी भी सांसारिकता और पाप को ही प्यार करते हैं, और उन्हें निश्चित ही विनाश को भुगतना पड़ेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 546

परमेश्वर में विश्वासी होने का अर्थ है कि तेरे सारे कृत्य उसके सम्मुख लाये जाने चाहिए और उन्हें उसकी छानबीन के अधीन किया जाना चाहिए। यदि तू जो कुछ भी करता है उसे परमेश्वर के आत्मा के सम्मुख ला सकते हैं लेकिन परमेश्वर की देह के सम्मुख नहीं ला सकते, तो यह दर्शाता है कि तूने अपने आपको उसके आत्मा की छानबीन के अधीन नहीं किया है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? कौन है वो व्यक्ति जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी जाती है? क्या वे एक समान नहीं है? अधिकांश उसे दो अलग अस्तित्व के रूप में देखते हैं, ऐसा विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का आत्मा तो परमेश्वर का आत्मा है, और परमेश्वर जिसकी गवाही देता है वह व्यक्ति मात्र एक मानव है। लेकिन क्या तू गलत नहीं है? किसकी ओर से यह व्यक्ति काम करता है? जो लोग देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, उनके पास आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। परमेश्वर का आत्मा और उसका देहधारी देह एक ही हैं, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह रूप में प्रकट हुआ है। यदि यह व्यक्ति तेरे प्रति निर्दयी है, तो क्या परमेश्वर का आत्मा दयालु होगा? क्या तू भ्रमित नही है? आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 547

जिनके पास परमेश्वर की समझ नहीं होती वे कभी भी पूरी तरह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो सकते। ऐसे लोग अनाज्ञाकारिता के पुत्र हैं। वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं, और उनमें बहुत अधिक विद्रोह है, इसलिए वे खुद को परमेश्वर से दूर कर लेते हैं और उसकी छानबीन को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। ऐसे लोग आसानी से पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अपने ढंग के मामले में, और उनके प्रति अपनी स्वीकृति में चयनशील होते हैं। वे परमेश्वर के वचन के उन भागों को ग्रहण करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार होते हैं जबकि उन्हें अस्वीकार कर देते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार नहीं हैं। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ सबसे स्पष्ट विद्रोह और प्रतिरोध नहीं है? यदि कोई परमेश्वर के बारे में थोड़ी-सी भी समझ हासिल किए बगैर वर्षों से उस पर विश्वास कर रहा हो, तो वह एक अविश्वासी है। जो लोग परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करने के इच्छुक हैं वे परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करते हैं, वे उसके वचनों को ग्रहण करना चाहते हैं। ये वे हैं, जो परमेश्वर का उत्तराधिकार और आशीषें प्राप्त करेंगे, और वे सबसे धन्य हैं। परमेश्वर उन्हें श्राप देता है जिनके दिलों में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। वह ऐसे लोगों को ताड़ना देता है और उन्हें त्याग देता है। यदि तू परमेश्वर से प्यार नहीं करता, तो वो तुझे त्याग देगा और यदि मैं जो कहता हूँ तू उसे नहीं सुनता है, तो मैं वादा करता हूँ कि परमेश्वर का आत्मा तुझे त्याग देगा। यदि तुझे भरोसा नहीं है, तो कोशिश करके देख ले! आज, मैं तुझे अभ्यास के लिए एक रास्ता स्पष्ट रूप से बताता हूँ, लेकिन तू इसे अभ्यास में लाता है या नहीं यह तेरे ऊपर है। यदि तू इसमें विश्वास नहीं करता है, यदि तू इसे अभ्यास में नहीं लाता है, तो तू स्वयं देखेगा कि पवित्र आत्मा तुझमें कार्य करता है या नहीं! यदि तू परमेश्वर के बारे में समझ पाने की कोशिश नहीं करता है, तो पवित्र आत्मा तुझमें कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। परमेश्वर के सभी कार्य को संजोना, उसकी प्रबुद्धता को संजोना, परमेश्वर की उपस्थिति को संजोना, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोना, इस बात को संजोना कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह सब परमेश्वर के दिल के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, अर्थात यदि उसने तुझ पर जो सारे कार्य किए हैं, तू उसे संजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों को नहीं संजोता है, तो परमेश्वर तुझ पर कार्य नहीं करेगा, बल्कि वह केवल तेरे विश्वास के लिए ज़रा-सा अनुग्रह देगा, या तुझे कुछ धन की आशीष या तेरे परिवार के लिए थोड़ी सुरक्षा देगा। परमेश्वर के वचनों को अपनी वास्तविकता बनाने, उसे संतुष्ट करने और उसके दिल के अनुसार होने के लिए तुझे कडा प्रयास करना चाहिए; तुझे केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का ही प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्वासियों के लिए परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने, पूर्णता पाने, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करनेवालों में से एक बनने की अपेक्षा कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यह वो लक्ष्य है जिसे पूरा करने का तुझे प्रयास करना चाहिए।

अनुग्रह के युग में जिसका मनुष्य ने अनुसरण किया, वह अब अप्रचलित हो गया है क्योंकि वर्तमान में अनुसरण का एक उच्चतर मानक है, जिसका अनुसरण किया जाता है वह अधिक उत्कृष्ट भी है और अधिक व्यावहारिक भी, जिसका अनुसरण किया जाता है वो मनुष्य की भीतरी आवश्यकता को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। पिछले युगों में, परमेश्वर लोगों पर उस तरह कार्य नहीं करता था जैसे आज करता है, वह लोगों से उतनी बातें नहीं करता था जितनी आज करता है, न ही उसे उनसे उतनी अपेक्षा थी जितनी की आज के लोगों से है। आज जो परमेश्वर इन बातों को तुम लोगों को बताता है, वह दिखाता है कि परमेश्वर का अंतिम इरादा तुम लोगों पर, यानि इस समूह पर ध्यान केन्द्रित करना है। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में इसका अनुसरण कर। कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या तू भाग-दौड़ करता है, खुद को खपाता है, किसी काम में आता है, या तूने परमेश्वर द्वारा आदेश पाया है या नहीं, पूर्ण बनाया जाना और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना, इन लक्ष्यों को पाना ही हमेशा उद्देश्य होता है। यदि कोई कहता है, कि वह परमेश्वर द्वारा पूर्णता या जीवन में प्रवेश का अनुसरण नहीं करता है, बल्कि केवल शारीरिक शांति और आनंद का पीछा करता है, तो वह सभी लोगों से अधिक अंधा है। जो लोग जीवन की वास्तविकता का अनुसरण नहीं करते बल्कि केवल आने वाली दुनिया में अनन्त जीवन और इस दुनिया में सुरक्षा के लिए प्रयास करते हैं, वे सभी लोगों से अधिक अंधे हैं। इसलिए सब कुछ जो तू करता है, वह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।

परमेश्वर लोगों पर जो कार्य करता है, वह उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के आधार पर उनकी आपूर्ति करने के लिए है। जितनी बड़ी एक आदमी की जिन्दगी होती है, उसकी आवश्यकताएं उतनी ही ज्यादा होती हैं, और उतना ही ज्यादा वह अनुसरण करता है। यदि इस चरण में तेरे पास कोई लक्ष्य नहीं हैं, यह साबित करता है कि पवित्र आत्मा ने तुझे छोड़ दिया है। सभी जो जीवन की तलाश करते हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं त्यागे जाएंगे; ऐसे लोग हमेशा तलाश करते हैं, उनके दिल में हमेशा लालसा होती है। इस प्रकार के लोग चीज़ों की वर्तमान स्थिति से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। पवित्र आत्मा के कार्यों के प्रत्येक चरण का उदेश्य तुम में एक प्रभाव प्राप्त करना है, लेकिन यदि तुम आत्मसंतुष्टि विकसित कर लेते हो, यदि तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हो, तो वह तुम्हें छोड़ देगा। लोगों को हर दिन परमेश्वर की छानबीन की आवश्यकता होती है; उन्हें परमेश्वर से हर दिन भरपूर मात्रा में प्रावधान की आवश्यकता होती है। क्या लोग प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को खाए और पीए बिना रह सकते हैं? यदि कोई ऐसा हमेशा महसूस करता है कि वह परमेश्वर के वचनों को जितना भी खा-पी ले, यह कम ही रहेगा, यदि वह इसे हमेशा खोजता है, और हमेशा इसके लिए भूखा और प्यासा होता है, तो पवित्र आत्मा हमेशा उसमें कार्य करेगा। जितना ज्यादा कोई लालसा करता है, उतना ही ज्यादा व्यवहारिक चीजें सहभागिता से मिल सकती हैं। जितनी गहनता से कोई सत्य को खोजता है, उतनी ही तेजी से उसका जीवन बढ़ता है, जिससे वो अनुभव से भरपूर हो जाता है और परमेश्वर के भवन का समृद्ध बाशिंदा हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 548

प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए पवित्र आत्मा के पास एक मार्ग है और प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण होने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के द्वारा तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता दिखाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को उतार फेंकने के द्वारा तुम अभ्यास करने के लिए एक मार्ग प्राप्त करोगे; इन सब तरीकों से तुम पूर्ण किए जाते हो। इसके अलावा, निरन्तर मार्गदर्शन और तुम में कुछ सकारात्मक बातों की रोशनी के द्वारा तुम अपने कार्य को अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, अंतर्दृष्टि में विकसित होओगे और पहचानने की योग्यता प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी परिस्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम विशेषकर परमेश्वर के वचन पढ़ने और परमेश्वर से प्रार्थना करने के इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समयों में परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ बातें एहसास कराता है। इस तरह सकारात्मक पहलू में तुम पूर्ण किए जाते हो। नकारात्मक परिस्थितियों में, तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो; और तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने के लिए एक मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है। परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है, कि तुम अनुभव करने में समर्थ हो और क्या तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने की कोशिश करते हो। यदि तुम सचमुच परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने की कोशिश करते हो, तब नकारात्मक तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, परन्तु तुम्हारे लिए वे बातें ला सकता है, जो अधिक वास्तविक हैं, और तुम्हें यह जानने के लिए और अधिक योग्य बना सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक परिस्थतियों को अधिक समझने में और यह देखने योग्य बना सकता है कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षाओं को अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम सर्वदा महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से उत्तम हो। इस सब के द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले आया था वह परमेश्वर के द्वारा किया गया और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षाओं में प्रवेश तुम्हें प्रेम या विश्वास रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है, और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और अनजाने में ही तुम इन सब के मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के वातावरण का प्रयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है, एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है और दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और एक अन्य बात में वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित "रहस्यों" को खोदकर और ज़ाहिर करते हुए, मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ दिखा करके उसकी प्रकृति को प्रकट करता है। परमेश्वर अनेक विधियों जैसे कि प्रकाशन, व्यवहार करने, शुद्धिकरण, और ताड़ना के द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाता है, जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 549

वह क्या है जो तुम सब अब खोज रहे हो? परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना, परमेश्वर को जानना, परमेश्वर को प्राप्त करना हो—या शायद तुम नब्बे के दशक के पतरस के अंदाज़ में व्यवहार करना चाहते हो, या ऐसा विश्वास रखना चाहते हो जो अय्यूब से भी अधिक हो, या शायद तुम परमेश्वर के द्वारा धर्मी कहलाए जाने और परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आने की कोशिश कर रहे हो या पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रकट करने के योग्य होने या परमेश्वर के लिए सशक्त और गुंजायमान गवाही देने में समर्थ होने की कोशिश कर रहे हो। तुम लोग जिस भी बात के लिए प्रयास करते हो, कुल मिलाकर, तुम्हारा प्रयास परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए ही है। इससे फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम धर्मी बनने की कोशिश करते हो, या तुम पतरस के अंदाज़, या अय्यूब के विश्वास, या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करते हो; वह सब वह कार्य है जो परमेश्वर मनुष्य पर करता है। दूसरे शब्दों में, चाहे जिसकी भी तुम कोशिश करते हो, यह सब परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किये जाने के उद्देश्य से है, यह सब परमेश्वर के वचन को अनुभव करने, परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के उद्देश्य से है; तुम चाहे जो भी तलाशो, सब परमेश्वर की मनोरमता की खोज के लिए है, यह सब वास्तविक अनुभव में अभ्यास का पथ खोजने के लिए है, और अपने विद्रोही स्वभाव को उतार फेंकने, अपने भीतर एक सामान्य स्थिति को प्राप्त करने, पूर्ण रूप से परमेश्वर की इच्छा के अधीन होने के योग्य होने, एक सही व्यक्ति बनने और जो कुछ तुम करते हो उसमें सही मन्तव्य रखने के लक्ष्य से है। तुम्हारे द्वारा इन सब बातों को अनुभव करने का कारण परमेश्वर को जानने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए है। यद्यपि जो तुम अनुभव करते हो वह परमेश्वर का वचन है, जो तुम अनुभव करते हो वे वास्तविक घटनाएँ हैं, साथ ही लोग, विषय और आस-पास की वस्तुएँ हैं, लेकिन अन्ततः तुम परमेश्वर को जानने और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य हो जाते हो। एक धर्मीजन के मार्ग पर चलने की कोशिश करना या परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की कोशिश करना : ये दौड़ने के मार्ग हैं, जबकि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना मंजिल है। चाहे तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने, या परमेश्वर के लिए गवाही देने की कोशिश करो, यह सब अन्ततः परमेश्वर को जानने के लिए है; यह इसलिए है कि जो कार्य वह तुम में करता है, वह व्यर्थ न हो, जिससे अन्ततः तुम परमेश्वर की वास्तविकता, उसकी महानता और इससे भी अधिक परमेश्वर की नम्रता और गोपनीयता जान जाओ और तुम में उसके द्वारा बड़ी मात्रा में किए गए कार्य को जान जाओ। परमेश्वर ने इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों में कार्य करने और इस समूह के लोगों को पूर्ण बनाने के लिए इस स्तर तक स्वयं को दीन किया है। परमेश्वर लोगों के मध्य जीने और खाने-पीने, वह लोगों की चरवाही करने, और लोगों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही देह में नहीं आया। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और जीतने का विशाल कार्य इन असहनीय रूप से भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केन्द्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, यह मात्र वह कष्ट नहीं है जो देहधारी परमेश्वर सहन करता है, परन्तु मुख्यतः यह वह अत्यधिक निरादर है जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक दीन करता है और छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने देहधारण किया और देह का रूप ले लिया था ताकि लोग देखें कि उसका जीवन एक साधारण मानव-जीवन है, और उसकी साधारण मानवीय आवश्यकताएँ भी हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को हद से ज़्यादा दीन किया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा सर्वोच्च और महान है, परन्तु फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक सामान्य मानव, तुच्छ मनुष्य का रूप ले लेता है। तुम में से प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता, अंतर्दृष्टि, समझ, मानवता और जीवन दर्शाते हैं कि तुम सब परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को स्वीकार करने के लिए वास्तव में अयोग्य हो। तुम सब परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए इस कष्ट को सहन किए जाने के लिए वास्तव में अयोग्य हो। परमेश्वर अत्यधिक महान है। वह इतना सर्वोच्च है और लोग बहुत नीच हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने न केवल इसलिए देहधारण किया कि लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करे, लोगों से बात करे, अपितु वह लोगों के साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना दीन और इतना प्रेम करने वाला है। जैसे ही परमेश्वर के प्रेम का उल्लेख किया जाता है, जैसे ही परमेश्वर के अनुग्रह का उल्लेख किया जाता है, वैसे ही यदि तुम उसकी अत्यधिक प्रशंसा करते हुए आँसू बहाते हो, यदि तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तब तुम परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर चुके हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 550

आजकल लोगों की तलाश में एक भटकाव है; वे मात्र परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं, परन्तु उनके पास परमेश्वर के विषय में कोई ज्ञान नहीं है, उन्होंने अपने भीतर की पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी की उपेक्षा कर दी है। उनके पास परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान का आधार नहीं है। इस रीति से, जैसे-जैसे उनका अनुभव बढ़ता है वे अपनी ऊर्जा खोते जाते हैं। वे सभी जो परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को पाने की खोज करते हैं, वे लोग भले ही बीते समय में अच्छी स्थितियों में नहीं थे, और उनका झुकाव नकारात्मकता और दुर्बलता की ओर हुआ करता था, और वे प्रायः आँसू बहाते, निरुत्साहित और हताश हो जाते थे; ऐसे लोग, जैसे-जैसे अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं उनकी परिस्थितियाँ बेहतर होती जाती हैं। टूट जाने और निपटारा किए जाने के अनुभव के पश्चात, और एक बार शुद्धिकरण और परीक्षण के प्रकरण से गुज़रने के पश्चात, उन्होंने बहुत अधिक उन्नति की है। नकारात्मक परिस्थितियाँ कम हो गयी हैं, और उनके जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन हुआ है। जैसे-जैसे वे और परीक्षण से गुज़रते हैं, उनका हृदय परमेश्वर से प्रेम करने लगता है। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारे योग्य भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए एक मार्ग हो और तुम समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से खुद को अलग कर सको, तुम्हारी आत्मा को स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सहायता करता है, और तुम्हें उससे प्रेम करने के और योग्य बनाता है। इस रीति से तुम शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने के योग्य हो जाते हो। तुम सरल और उदार, स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा, अतः जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, वह दोहरे रूप से तुम्हें प्रबुद्ध करता है, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करता है, स्वयं के लिए पश्चाताप करने के और अधिक इच्छुक होने, और उन बातों का अभ्यास करने के योग्य करता है, जिन बातों का अभ्यास तुम्हें करना चाहिए। मात्र इसी रीति से तुम्हारा हृदय शांतिपूर्ण और सहज होता है। एक व्यक्ति, जो साधारणतः परमेश्वर और स्वयं को जानने और अपने अभ्यास पर ध्यान देता है, वही परमेश्वर के कार्य को निरन्तर प्राप्त करने और परमेश्वर से निरन्तर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने के योग्य होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी, ऐसा व्यक्ति विवेक के कार्य से या परमेश्वर के वचन से प्रबुद्धता द्वारा तुरन्त कायापलट करने के योग्य हो जाता है। एक व्यक्ति के स्वभाव का परिवर्तन सर्वदा तभी प्राप्त होता है जब वह अपनी वास्तविक अवस्था और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य को जानता है। एक व्यक्ति, जो स्वयं को जानने और स्वयं को सामने लाने का इच्छुक है, वही सत्य का निर्वाह करने के योग्य होगा। इस प्रकार का व्यक्ति एक ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान है, और ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है उसके पास परमेश्वर के विषय में समझ होती है, भले ही यह समझ गहरी हो या उथली, अल्प हो या प्रचुर। यह परमेश्वर की धार्मिकता है, और यही वह बात है जिसे लोग ग्रहण करते हैं; यह उनका अपना लाभ है। एक व्यक्ति जिसके पास परमेश्वर का ज्ञान है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास एक आधार है, जिसके पास एक दर्शन है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की देह, परमेश्वर के वचन और उसके कार्य के विषय में निश्चित होता है। चाहे परमेश्वर कैसे भी कार्य करे या बोले या अन्य लोग कैसे भी अशान्ति उत्पन्न करें, वह अपनी बात पर अडिग रह सकता है, और परमेश्वर के लिए गवाह बन सकता है। एक व्यक्ति जितना अधिक इस प्रकार का होता है, वह उस सत्य का उतना ही अधिक निर्वाह कर सकता है, जिस सत्य को वह समझता है। क्योंकि वह परमेश्वर के वचन का सर्वदा अभ्यास करता है, इसलिए वह परमेश्वर के विषय में और समझ प्राप्त करता है और परमेश्वर के लिए सर्वदा गवाह बने रहने का दृढ़-निश्चय रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 551

पहचानने की योग्यता रखना, अधीनता में रहना, और चीज़ों को समझने की योग्यता रखना ताकि तुम आत्मा में प्रखर हो, इसका अर्थ है कि जैसे ही तुम्हारा सामना किसी बात से होता है, तब परमेश्वर के वचन तुम्हें भीतर से रोशन और प्रबुद्ध करते हैं। यही आत्मा में प्रखर होना है। हर बात जो परमेश्वर करता है, वह लोगों की आत्माओं को पुनर्जीवित करने में उनकी सहायता करने के लिए है। परमेश्वर सर्वदा क्यों कहता रहता है कि लोग सुन्न और मन्द-बुद्धि हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों की आत्माएँ मर चुकी हैं, और वे इस सीमा तक सुन्न हो चुके हैं कि वे आत्मा की बातों के लिए पूर्णत: अचेत हो गए हैं। परमेश्वर का कार्य, लोगों के जीवनों की उन्नति कराने और लोगों की आत्माओं को जीवित करने में सहायता करने के लिए है, जिससे वे आत्मा की बातों को समझ सकें और सर्वदा अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ रहें। इस चरण पर पहुँचना यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति की आत्मा पुनर्जीवित कर दी गई है, और अगली बार जब वह किसी बात का सामना करता है, वह उसी समय प्रतिक्रिया कर सकता है। वह उपदेशों के प्रति प्रतिक्रिया देता है और परिस्थितियों के प्रति अतिशीघ्र प्रतिक्रिया करता है। यही आत्मा की प्रखरता प्राप्त करना है। ऐसे अनेक लोग हैं, जिनकी बाहरी घटना के प्रति अतिशीघ्र प्रतिक्रिया होती है, परन्तु जैसे ही वास्तविकता में प्रवेश, या आत्मा की विस्तृत बातों का उल्लेख किया जाता है, तो वे सुन्न और मन्द-बुद्धि बन जाते हैं। वे तभी कुछ समझते हैं, जब यह उनके बिलकुल सामने हो। ये सभी आत्मिक रीति से सुन्न और मन्द-बुद्धि होने और आत्मा की बातों का कम अनुभव रखने के चिह्न हैं। कुछ लोग आत्मा में प्रखर होते हैं और पहचानने की योग्यता रखते हैं। जैसे ही वे अपनी अवस्था बताने वाले वचनों को सुनते हैं, तो वे समय व्यर्थ किए बिना जल्दी से इसे लिख लेते हैं। एक बार जब वे अभ्यास के सिद्धांतों के बारे में सुन लेते हैं, तो वे इसे स्वीकारने लगते हैं और इसे अपने अनुवर्ती अनुभव में लागू करने में समर्थ हो जाते हैं और इस तरह स्वयं को परिवर्तित करते हैं। यह एक ऐसा व्यक्ति है जो आत्मा में प्रखर है। और वह अतिशीघ्र प्रतिक्रिया करने में क्यों समर्थ है? क्योंकि वह प्रतिदिन के जीवन में इन बातों पर ध्यान लगाता है। जब ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे इससे तुलना कर अपनी अवस्था को जाँचने में और खुद पर मंथन करने में समर्थ होते हैं। जब वे सहभागिता, उपदेश, और ऐसे वचन सुनते हैं जो उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करते हैं, वे इन्हें तुरंत ग्रहण करने के योग्य होते हैं। यह एक भूखे व्यक्ति को भोजन प्रदान करने के समान है; वे उसी समय खाने में समर्थ होते हैं। यदि तुम किसी व्यक्ति को भोजन दो जो भूखा नहीं है, तो वो अतिशीघ्र प्रतिक्रिया नहीं करेगा। तुम प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, और जब तुम्हारा सामना किसी बात से होता है, तब तुम तुरन्त प्रतिक्रिया करने के योग्य होते हो : इस विषय में परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है, और तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए। पिछली बार इस विषय में परमेश्वर ने तुम्हारा मार्गदर्शन किया था; जब आज तुम इसी प्रकार के विषय का सामना करते हो, तो स्वाभाविक रूप से तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें किस तरह अभ्यास करना है। यदि तुम सर्वदा इसी रीति से अभ्यास करते हो और इसी रीति से अनुभव करते हो, तो एक बिन्दु पर जा कर तुम इसमें माहिर बन जाओगे। परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हुए तुम जानते हो परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति की ओर संकेत कर रहा है, तुम जानते हो कि वह आत्मा की किन प्रकार की परिस्थितियों की बात कर रहा है, और तुम मुख्य बात समझ लेने और इसे अभ्यास में लाने के योग्य होते हो; यह दिखाता है कि तुम अनुभव करने के योग्य हो। इस विषय में कुछ लोगों में कमी क्यों होती है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अभ्यास करने के पहलू पर अधिक प्रयास नहीं करते हैं। यद्यपि वे सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, उनमें सेवा की विस्तृत जानकारी की, उनके जीवन के सत्य की विस्तृत जानकारी की सच्ची अन्तर्दृष्टि नहीं होती है। जब कुछ घटित हो जाता है तो वे भ्रमित हो जाते हैं। इस रीति से, जब कोई झूठा नबी या एक झूठा शिष्य सामने आता है तो तुम्हें पथभ्रष्ट किया जा सकता है। तुम्हें अक्सर परमेश्वर के वचनों और कार्य पर सहभागिता करनी चाहिए—केवल इसी तरह तुम सत्य को समझने में और पहचानने की योग्यता विकसित करने में समर्थ होगे। अगर तुम सत्य नहीं समझते, तो तुममें पहचानने की योग्यता नहीं होगी। उदाहरण के लिए, परमेश्वर क्या बोलता है, परमेश्वर कैसे कार्य करता है, लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, तुम्हारा सम्पर्क किस प्रकार के लोगों से होना चाहिए और तुम्हें किस प्रकार के लोगों को अस्वीकार करना चाहिए—तुम्हें अक्सर इन बातों पर सहभागिता करनी चाहिए। यदि तुम सर्वदा परमेश्वर के वचनों का इसी रीति से अनुभव करो, तो तुम सत्य और अनेक बातों को पूरी तरह से समझ जाओगे और तुम्हें पहचानने की योग्यता भी प्राप्त होगी। पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासन क्या है, मनुष्य की इच्छा से जन्मा दोष क्या है, पवित्र आत्मा की ओर से मार्गदर्शन क्या है, किसी वातावरण का प्रबन्ध क्या है, परमेश्वर के वचनों का भीतर से प्रबुद्ध करना क्या है? यदि तुम इन बातों के विषय में ही स्पष्ट नहीं हो, तो तुम्हारे पास पहचानने की योग्यता नहीं होगी। तुम्हें जानना चाहिए पवित्र आत्मा की ओर से क्या आता है, विद्रोही स्वभाव क्या है, परमेश्वर के वचन का पालन कैसे करें, और अपने विद्रोहीपन को कैसे उतार फेंकें; अगर तुम्हारे पास इन बातों की अनुभवजन्य समझ होगी, तो तुम्हारे पास एक आधार होगा; जब कुछ घटित होगा, तो तुम्हारे पास उपयुक्त सत्य होगा जिससे तुलना कर तुम इसे माप सकते हो, आधार के रूप में उपयुक्त दर्शन होंगे। प्रत्येक चीज़ जो तुम करते हो उसमें तुम्हारे पास सिद्धान्त होंगे और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। तब तुम्हारा जीवन परमेश्वर की प्रबुद्धता और परमेश्वर की आशीषों से परिपूर्ण होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति से अनुचित व्यवहार नहीं करेगा, जो निष्ठा से उसे खोजता है या जो उसे जीता और उसकी गवाही देता है, और वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को शाप नहीं देगा जो दिल से सत्य का प्यासा होने के योग्य है। यदि परमेश्वर के वचन को खाने-पीने के दौरान, तुम अपनी वास्तविक स्थिति, अपने अभ्यास, और अपनी समझ पर ध्यान दे सकते हो, तब जब तुम्हारा सामना किसी समस्या से होगा, तुम प्रबुद्धता प्राप्त करोगे, तुम व्यावहारिक समझ प्राप्त करोगे। तब सब बातों में तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग और पहचानने की योग्यता होगी। एक व्यक्ति, जिसके पास सत्य है, उसे धोखा देना असंभव है और उसका अशान्ति से व्यवहार करना या अधिकता वाला कार्य करना असंभव है। सत्य के कारण वह सुरक्षित है, और सत्य के कारण ही वह और अधिक समझ प्राप्त करता है। सत्य के कारण अभ्यास के लिए उसके पास अधिक मार्ग हैं, पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें कार्य करने के लिए और पूर्ण होने के लिए वह अनेक सुअवसर प्राप्त करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 552

यदि तुम्हें पूर्ण बनाया जाना है, तो कुछ मानदंड पूरे करने होंगे। अपने संकल्प, अपनी दृढ़ता और अपने अंतःकरण के माध्यम से और अपनी खोज के माध्यम से तुम जीवन को अनुभव करने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में समर्थ हो जाओगे। यह तुम्हारा प्रवेश है, और ये वे चीज़ें हैं, जो पूर्णता के मार्ग पर आवश्यक हैं। पूर्णता का कार्य सभी लोगों पर किया जा सकता है। जो कोई भी परमेश्वर को खोजता है, उसे पूर्ण बनाया जा सकता है और उसके पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर और योग्यताएँ हैं। यहाँ कोई नियत नियम नहीं है। कोई व्यक्ति पूर्ण बनाया जा सकता है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या खोजता है। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य को जीने में सक्षम हैं, वे निश्चित रूप से पूर्ण बनाए जाने में सक्षम हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, परमेश्वर उनकी प्रशंसा नहीं करता; वे ऐसा जीवन धारण नहीं करते, जिसकी परमेश्वर माँग करता है और वे पूर्ण बनाए जाने में अक्षम हैं। पूर्णता का कार्य केवल लोगों को प्राप्त करने के वास्ते है और शैतान से युद्ध करने के कार्य का अंग नहीं है; विजय का कार्य केवल शैतान से युद्ध करने के वास्ते है, जिसका अर्थ है मनुष्य पर विजय का उपयोग शैतान को हराने के लिए करना। विजय का कार्य ही मुख्य कार्य है, नवीनतम कार्य है, ऐसा कार्य है जो सभी युगों में कभी नहीं किया गया है। कहा जा सकता है कि इस चरण के कार्य का लक्ष्य मुख्य रूप से सभी लोगों को जीतना है, ताकि शैतान को हराया जा सके। लोगों को पूर्ण बनाने का कार्य—यह नया कार्य नहीं है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान समस्त कार्य का मर्म सभी लोगों को जीतना है। यह अनुग्रह के युग के समान है, जब सलीब पर चढ़ने के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति का छुटकारा मुख्य कार्य था। "लोगों को प्राप्त करना" देह में किए गए गए कार्य से अतिरिक्त था और केवल सलीब पर चढ़ने के बाद किया गया था। जब यीशु ने आकर अपना कार्य किया, तो उसका लक्ष्य मुख्य रूप से मृत्यु और अधोलोक के बंधन पर विजय प्राप्त करने के लिए, शैतान के प्रभाव पर विजय प्राप्त करने के लिए, अर्थात् शैतान को हराने के लिए अपने सलीब पर चढ़ने का उपयोग करना था। यीशु के सलीब पर चढ़ने के बाद ही पतरस एक-एक कदम उठाकर पूर्णता के मार्ग पर चला। बेशक, पतरस उन लोगों में से था, जिन्होंने तब यीशु का अनुसरण किया, जब यीशु कार्य कर रहा था, परंतु उस दौरान वह पूर्ण नहीं बना था। बल्कि, यीशु के अपना कार्य समाप्त करने के बाद उसने धीरे-धीरे सत्य को समझा और तब पूर्ण बना। देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर थोड़े-से समय में केवल कार्य के एक मुख्य, महत्वपूर्ण चरण को पूरा करने आता है, पृथ्वी पर लोगों को पूर्ण बनाने के इरादे से उनके बीच लंबे समय तक रहने के लिए नहीं। वह उस कार्य को नहीं करता। वह अपना कार्य पूरा करने के लिए उस समय तक प्रतीक्षा नहीं करता, जब तक कि मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण नहीं बना दिया जाता। यह उसके देहधारण का लक्ष्य और मायने नहीं है। वह केवल मानवजाति को बचाने का अल्पकालिक कार्य करने आता है, न कि मानवजाति को पूर्ण बनाने का अति दीर्घकालिक कार्य करने। मानवजाति को बचाने का कार्य प्रातिनिधिक है, जो एक नया युग आरंभ करने में सक्षम है। इसे एक अल्प समय में समाप्त किया जा सकता है। परंतु मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए मनुष्य को एक निश्चित स्तर तक लाना आवश्यक है; ऐसे कार्य में लंबा समय लगता है। यह वह कार्य है, जिसे परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाना चाहिए, परंतु यह उस सत्य की उस बुनियाद पर किया जाता है, जिसके बारे में देह में कार्य के दौरान बोला गया था। इसे मानवजाति को पूर्ण बनाने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए चरवाही का दीर्घकालिक कार्य करने हेतु प्रेरितों को उन्नत करने के उसके कार्य के माध्यम से भी किया जाता है। देहधारी परमेश्वर इस कार्य को नहीं करता। वह केवल जीवन के मार्ग के बारे में बोलता है, ताकि लोग समझ जाएँ, और वह मानवजाति को केवल सत्य प्रदान करता है, सत्य का अभ्यास करने में लगातार मनुष्य के साथ नहीं रहता, क्योंकि यह उसकी सेवकाई के अंतर्गत नहीं है। इसलिए वह मनुष्य के साथ उस दिन तक नहीं रहेगा, जब तक कि मनुष्य सत्य को पूरी तरह से न समझ ले और सत्य को पूरी तरह से प्राप्त न कर ले। देह में उसका कार्य तभी समाप्त हो जाता है, जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर औपचारिक रूप से प्रवेश कर लेता है, जब मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के सही मार्ग पर कदम रख लेता है। यह भी वास्तव में तब होगा, जब परमेश्वर ने शैतान को पूरी तरह से हरा दिया होगा और संसार पर विजय प्राप्त कर ली होगी। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य ने अंततः उस समय सत्य में प्रवेश कर लिया होगा या नहीं, न ही वह इस बात की परवाह करता है कि मनुष्य का जीवन बड़ा है या छोटा। इसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसका देह में उसे प्रबंधन करना चाहिए; इसमें से कुछ भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के अंदर नहीं है। एक बार जब वह अपना अभीष्ट कार्य पूरा कर लेगा, तो वह देह में अपने कार्य का समापन कर देगा। इसलिए, जो कार्य देहधारी परमेश्वर करता है, वह केवल वही कार्य है, जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, यह उद्धार का अल्पकालिक कार्य है, ऐसा कार्य नहीं है जिसे वह पृथ्वी पर दीर्घकालिक आधार पर करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 553

तुम लोगों के बीच किया जा रहा यह कार्य तुम लोगों पर उस कार्य के अनुसार किया जा रहा है, जिसे किए जाने की आवश्यकता है। इन व्यक्तियों पर विजय के बाद लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया जाएगा। इसलिए वर्तमान में बहुत-सा कार्य तुम लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य की तैयारी के लिए भी है, क्योंकि कई लोग सत्य के लिए भूखे हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि विजय का कार्य तुम लोगों पर किया जाना होता और इसके बाद कोई और कार्य न किया जाता, तो क्या यह ऐसा मामला न होता कि जो व्यक्ति सत्य की अभिलाषा रखता है, वह इसे प्राप्त नहीं करेगा? वर्तमान कार्य का लक्ष्य बाद में लोगों को पूर्ण बनाने के लिए मार्ग खोलना है। यद्यपि मेरा कार्य सिर्फ़ विजय का कार्य है, फिर भी मेरे द्वारा बोला गया जीवन का मार्ग बाद में लोगों को पूर्ण बनाने की तैयारी के लिए है। जो कार्य विजय के बाद आता है, वह लोगों को पूर्ण बनाने पर केंद्रित है, और विजय पूर्णता के कार्य की नींव डालने के लिए की जाती है। मनुष्य को केवल जीते जाने के बाद ही पूर्ण बनाया जा सकता है। अभी मुख्य कार्य जीतना है; बाद में, सत्य की खोज और कामना करने वालों को पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने में लोगों के प्रवेश के सक्रिय पहलू शामिल हैं: क्या तुम्हारे पास ईश्वर से प्रेम करने वाला हृदय है? इस मार्ग पर चलते हुए तुम्हारे अनुभव की गहराई कितनी रही है? परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम कितना शुद्ध है? सत्य का तुम्हारा अभ्यास कितना सही है? पूर्ण बनने के लिए व्यक्ति को मानवता के सभी पहलुओं की आधारभूत जानकारी होनी चाहिए। यह एक मूलभूत आवश्यकता है। जीते जाने के बाद जो लोग पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, वे सेवा की वस्तुएँ बन जाते हैं और फिर भी अंततः वे आग और गंधक की झील में डाल दिए जाएँगे और फिर भी वे अतल गड्डे में गिर जाएँगे, क्योंकि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला है और तुम अभी भी शैतान से संबंधित हैं। यदि किसी मनुष्य में पूर्णता के लिए आवश्यक स्थितियों का अभाव है, तो वह बेकार है—वह रद्दी है, उपकरण है, और ऐसी चीज़ है जो अग्निपरीक्षा में ठहर नहीं सकती! अभी ईश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना अधिक है? तुम्हारी स्वयं के प्रति घृणा कितनी अधिक है? तुम शैतान को कितनी गहराई से जानते हो? क्या तुम लोगों ने अपना संकल्प मजबूत कर लिया है? क्या मानवता के बीच तुम्हारा जीवन अच्छी तरह से विनियमित है? क्या तुम्हारा जीवन बदल गया है? क्या तुम एक नया जीवन जी रहे हो? क्या तुम लोगों का जीवन-दृष्टिकोण बदल गया है? यदि ये चीजें नहीं बदली हैं, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, भले ही तुम पीछे नहीं हटते; बल्कि, तुम्हें केवल जीता गया है। तुम्हारी परीक्षा का समय आने पर तुममें सत्य का अभाव होगा, तुम्हारी मानवता असामान्य होगी, और तुम बोझ ढोने वाले जानवर जितने निम्न होगे। तुम्हारी एकमात्र उपलब्धि यह होगी कि तुम्हें जीता गया है—तुम सिर्फ़ मेरे द्वारा जीती गई एक वस्तु होगे। बस एक गधे की तरह, जिसे एक बार मालिक के कोड़े की मार का अनुभव हो जाए, तो वह भयभीत हो जाता है और हर बार जब भी वह अपने मालिक को देखता है, तो घबरा जाता है और ख़राब काम करने से डरता है, तुम भी केवल एक जीते गए गधे होगे। यदि किसी व्यक्ति में उन सकारात्मक पहलुओं का अभाव है और इसके बजाय वह सभी बातों में निष्क्रिय और भयभीत, डरपोक और संकोची है, किसी भी चीज को स्पष्टता से पहचानने में असमर्थ है, सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ है, अभी भी उसके पास अभ्यास का मार्ग नहीं है, और इससे भी परे, परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है—यदि किसी व्यक्ति को इस बात की समझ नहीं है कि ईश्वर से कैसे प्रेम किया जाए, एक अर्थपूर्ण जीवन कैसे जीया जाए, या एक असली व्यक्ति कैसे बना जाए—ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की गवाही कैसे दे सकता है? यह दर्शाएगा कि तुम्हारे जीवन का बहुत कम मूल्य है और तुम सिर्फ़ एक जीते गए गधे हो। तुम्हें जीता जाएगा, परंतु इसका सिर्फ यह अर्थ होगा कि तुमने बड़े लाल अजगर को त्याग दिया है और उसके अधिकार-क्षेत्र में समर्पण करने से इनकार कर दिया है; इसका अर्थ होगा कि तुम मानते हो कि परमेश्वर है, तुम परमेश्वर की सभी योजनाओं का पालन करना चाहते हो, और तुम्हें कोई शिकायत नहीं है। परंतु जहाँ तक सकारात्मक पहलुओं की बात है, क्या तुम परमेश्वर के वचन को जीने और परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो? अगर तुम्हारे पास इनमें से कोई भी पहलू नहीं है, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त नहीं किए गए हो, और तुम सिर्फ़ एक जीते गए गधे हो। तुममें कुछ भी वांछनीय नहीं है, और पवित्र आत्मा तुममें कार्य नहीं कर रहा है। तुम्हारी मानवता में बहुत कमी है, परमेश्वर के लिए तुम्हारा उपयोग करना असंभव है। तुम्हें परमेश्वर द्वारा अनुमोदित होना है और अविश्वसनीय जानवरों और चलते-फिरते मृतकों से सौ गुना बेहतर होना है—केवल इस स्तर तक पहुँचने वाले ही पूर्ण किए जाने के योग्य होते हैं। केवल यदि किसी में मानवता और अंत:करण हैं, तो ही वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य है। केवल पूर्ण बनाए जाने पर ही तुम मानव समझे जा सकते हो। केवल पूर्ण बनाए गए लोग ही अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के लिए और अधिक प्रबलता से गवाही दे सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 554

वह कौन-सा मार्ग है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है? कौन-कौन से पहलू उसमें शामिल हैं? क्या तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना स्वीकार करना चाहते हो? तुम इन प्रश्नों से क्या समझते हो? यदि तुम ऐसे ज्ञान के बारे में बात नहीं कर सकते, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम अभी तक परमेश्वर के कार्य को नहीं जान पाए हो और तुम पवित्र आत्मा द्वारा बिलकुल भी प्रबुद्ध नहीं बनाए गए हो। ऐसे व्यक्ति को पूर्ण बनाया जाना असंभव है। उन्हें केवल थोड़ी मात्रा में ही अनुग्रह का आनंद दिया जाता है, और यह लंबे समय तक नहीं रहेगा। यदि लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का ही आनंद उठाते हैं, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। कुछ लोग संतुष्ट हो जाते हैं, जब उन्हें शारीरिक शांति और आनंद मिलता है, जब उनका जीवन आसानी से चलता है और उसमें कोई विपत्ति या दुर्भाग्य नहीं होता, जब उनका पूरा परिवार मेल-मिलाप से रहता है और उसमें कोई कलह या विवाद नहीं होता—और वे यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यही परमेश्वर का आशीष है। पर सच्चाई यह है कि यह केवल परमेश्वर का अनुग्रह है। तुम लोगों को सिर्फ परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ऐसी सोच कितनी भद्दी है। भले ही तुम प्रतिदिन परमेश्वर के वचन पढ़ो, प्रतिदिन प्रार्थना करो, और तुम्‍हारी आत्मा अत्यधिक आनंद और खास तौर से शांति का अनुभव करो, लेकिन यदि अंतत: तुम्हारे पास परमेश्वर और उसके कार्य के अपने ज्ञान के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है, और तुमने कुछ अनुभव नहीं किया है, और चाहे तुमने परमेश्वर का वचन कितना भी क्यों न खाया और पीया हो, यदि तुम केवल आध्यात्मिक शांति और आनंद का अनुभव करते हो और यह भी कि परमेश्वर के वचन अतुलित रूप से मीठे हैं, मानो तुम उसका पर्याप्त आनंद नहीं उठा सकते, पर तुम्‍हें परमेश्वर के वचन का कोई वास्तविक अनुभव नहीं हुआ है और तुम उसके वचनों की वास्तविकता से पूर्णत: वंचित हो, तो परमेश्वर में ऐसे विश्वास से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों के सार को जीवन में उतार नहीं सकते, तो इन वचनों को खाना-पीना और तुम्‍हारी प्रार्थनाएँ धार्मिक विश्वास के सिवा कुछ नहीं हैं। ऐसे लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त नहीं किए जा सकते। परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लोग वे होते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं। परमेश्वर मनुष्य की देह प्राप्त नहीं करता, न उससे संबंधित चीजें ही प्राप्त करता है, बल्कि उसके भीतर का वह भाग प्राप्त करता है, जो परमेश्वर का है। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उनकी देह को नहीं, बल्कि उनके हृदय को पूर्ण बनाता है, और उनके हृदय को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का अवसर देता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाया जाना सार रूप में परमेश्वर द्वारा मनुष्य के हृदय को पूर्ण बनाया जाना है, ताकि वह हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाए और उससे प्रेम करने लगे।

मनुष्य की देह रक्त-मांस से बनी है। मनुष्य की देह प्राप्त करने से परमेश्वर का कोई प्रयोजन पूरा नहीं होता, क्योंकि वह ऐसी चीज है, जो अनिवार्य रूप से नष्ट हो जाती है और उसकी विरासत या आशीष प्राप्त नहीं कर सकती। यदि मनुष्य की देह प्राप्त की जाती, और यदि केवल मनुष्य की देह ही इस धारा में होती, तो मनुष्य हालाँकि इस धारा में नाममात्र के लिए होगा, पर उसका हृदय शैतान का होगा। ऐसा होने पर न केवल लोग परमेश्वर की अभिव्यक्ति बनने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे उसके लिए बोझ बन जाएँगे, और इसलिए परमेश्वर का मनुष्य को चुनना निरर्थक होगा। जिन लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाने का इरादा रखता है, वे सब उसके आशीष और उसकी विरासत प्राप्त करेंगे। अर्थात्, वे वही ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर के पास है और वह जो है, ताकि यह वह बन जाए जो उनके भीतर है; उनमें परमेश्वर के सारे वचन गढ़े हुए हैं; परमेश्वर जो है, तुम लोग उसे ठीक जैसा है वैसा लेने और इस प्रकार सत्य को जीवन में उतारने में सक्षम हो। ऐसे ही व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जाता है। केवल इसी प्रकार का मनुष्य परमेश्वर द्वारा दिए जाने वाले आशीष पाने योग्य है :

1. परमेश्वर के संपूर्ण प्रेम को पाना।

2. सभी बातों में परमेश्वर की इच्छानुसार चलना।

3. परमेश्वर के मार्गदर्शन को पाना, परमेश्वर के प्रकाश में जीवन व्यतीत करना और परमेश्वर का प्रबोधन प्राप्त करना।

4. पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय लगने वाली छवि जीना; परमेश्वर से सच्चा प्रेम करना जैसा कि पतरस ने किया, जिसे परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया और जो परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान में मरने के लिए तैयार हो गया; पतरस के समान महिमा प्राप्त करना।

5. पृथ्वी पर सभी का प्रिय, सम्मानित और प्रशंसित बनना।

6. मृत्यु और पाताल के सारे बंधनों पर काबू पाना, शैतान को कार्य करने का कोई अवसर न देना, परमेश्वर के अधीन रहना, एक ताज़ा और जीवंत आत्मा के भीतर रहना, और हारा-थका नहीं रहना।

7. जीवन भर हर समय उत्साह और उमंग की एक अवर्णनीय भावना रखना, मानो परमेश्वर की महिमा के दिन का आगमन देख लिया हो।

8. परमेश्वर के साथ महिमा को जीतना और परमेश्वर के प्रिय संतों जैसा चेहरा रखना।

9. वह बनना जो पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय है, अर्थात्, परमेश्वर का प्रिय पुत्र।

10. स्वरूप बदलना और परमेश्वर के साथ तीसरे स्वर्ग में आरोहण करना तथा देह के पार जाना।

केवल परमेश्वर के आशीषों को विरासत में प्राप्त कर सकने वाले लोग ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाते हैं। क्या तुमने वर्तमान में कुछ प्राप्त किया है? किस सीमा तक परमेश्वर ने तुम्हें पूर्ण बनाया है? परमेश्वर मनुष्य को संयोग से पूर्ण नहीं बनाता; उसका मनुष्य को पूर्ण बनाना सशर्त है, और उसके स्पष्ट, गोचर परिणाम हैं। ऐसा नहीं है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, कि जब तक परमेश्वर में उसका विश्वास है, उसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जा सकता है, और वह पृथ्वी पर परमेश्वर के आशीष और विरासत प्राप्त कर सकता है। ऐसी बातें बहुत ही कठिन हैं—लोगों के स्वरूप बदलने के बारे में तो कहना ही क्या! वर्तमान में, तुम लोगों को जो मुख्य रूप से कोशिश करनी चाहिए, वह है सब बातों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, और उन सब लोगों, मामलों और चीजों के माध्यम से परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, जिनसे तुम लोगों का सामना होता है, ताकि परमेश्वर जो है, वह और अधिक तुम्हारे अंदर गढ़ा जाए। तुम्हें पहले पृथ्वी पर परमेश्वर की विरासत को पाना है; केवल तभी तुम और अधिक विरासत पाने के पात्र बनोगे। ये सब ही वे चीज़ें हैं, जिन्हें तुम लोगों को खोजना चाहिए और अन्य सब चीजों से पहले समझना चाहिए। जितना अधिक तुम परमेश्वर द्वारा हर चीज़ में पूर्ण किए जाने की कोशिश करोगे, उतना अधिक तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का हाथ देख पाओगे, जिसके परिणामस्वरूप तुम, विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और विभिन्न मामलों के माध्यम से, परमेश्वर के वचन की सत्ता और उसके वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने की सक्रियता से कोशिश करोगे। तुम ऐसी निष्क्रिय स्थितियों से संतुष्ट नहीं हो सकते, जैसे कि मात्र पाप नहीं करना, या जीने के लिए कोई धारणा, कोई दर्शन नहीं रखना, या कोई मानवीय इच्छा नहीं होना। परमेश्वर मनुष्य को कई तरीकों से पूर्ण बनाता है; सभी मामलों में पूर्ण बनाए जाने की संभावना है, और वह तुम्हें न केवल सकारात्मक रूप में पूर्ण बना सकता है, बल्कि नकारात्मक रूप में भी बना सकता है, ताकि जो तुम प्राप्त करो, वह प्रचुर मात्रा में हो। हर एक दिन परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर और प्राप्त किए जाने के मौके होते हैं। कुछ समय तक ऐसा अनुभव करने के बाद तुम बहुत बदल जाओगे और स्वाभाविक रूप से ऐसी कई चीज़ें समझ जाओगे, जिनसे तुम पहले अनभिज्ञ थे। तुम्हें दूसरों से निर्देश पाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी; तुम्हारे जाने बिना परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध बनाएगा, ताकि तुम सभी चीज़ों में प्रबोधन प्राप्त कर सको और अपने सभी अनुभवों में विस्तार से प्रवेश कर सको। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, ताकि तुम दाएँ-बाएँ न भटक जाओ, और इस तरह तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर पैर रख दोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 555

परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के द्वारा पूर्णता तक सीमित नहीं किया सकता। इस प्रकार का अनुभव बहुत एकतरफा होगा, इसमें बहुत कम चीज़ शामिल होगी और यह लोगों को केवल बहुत छोटे दायरे में सीमित कर देगा। ऐसा होने से लोगों को उस आध्यात्मिक पोषण की बहुत कमी होगी, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, तो तुम्हें यह सीखना कि सभी मामलों में कैसे अनुभव किया जाए, और अपने साथ घटित होने वाली हर चीज़ में प्रबोधन प्राप्त करने योग्य बनना आवश्यक है। वह चीज़ अच्छी हो या बुरी, तुम्हें वह लाभ ही पहुँचाए और तुम्हें नकारात्मक न बनाए। इस बात पर ध्यान दिए बिना, तुम्हें चीज़ों पर परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर विचार करने में सक्षम होना चाहिए और मानवीय दृष्टिकोण से उनका विश्लेषण या अध्ययन नहीं करना चाहिए (यह तुम्हारे अनुभव में भटकना होगा)। यदि तुम ऐसा अनुभव करते हो, तो तुम्हारा हृदय तुम्हारे जीवन के बोझ से भर जाएगा; तुम निरंतर परमेश्वर के मुखमंडल की रोशनी में जियोगे, और अपने अभ्यास में आसानी से विचलित नहीं होओगे। ऐसे लोगों का भविष्य उज्ज्वल होता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बहुत सारे अवसर हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है क्या तुम लोग सच में परमेश्वर से प्यार करते हो और क्या तुम लोगों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने, और उसके आशीष और विरासत प्राप्त करने का संकल्प है। केवल संकल्प ही काफी नहीं है। तुम लोगों के पास बहुत ज्ञान होना चाहिए, अन्यथा तुम लोग अपने अभ्यास में हमेशा भटकते रहोगे। परमेश्वर तुम लोगों में से प्रत्येक को पूर्ण बनाने का इच्छुक है। वर्तमान में, लंबे समय से अधिकांश लोगों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उन्होंने अपने आपको मात्र परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद लेने तक सीमित कर लिया है, और वे केवल उससे देह के कुछ सुख पाने के लिए लालायित हैं, उससे अधिक और उच्चतर खुलासे प्राप्त करने के इच्छुक नहीं है। इससे पता चलता है कि मनुष्य का हृदय अभी भी हमेशा बाहरी बातों में लगा रहता है। भले ही मनुष्य के कार्य, उसकी सेवा और परमेश्वर के लिए उसके प्रेमी हृदय में कुछ अशुद्धताएँ कम हों, पर जहाँ तक उसके भीतरी सार और उसकी पिछड़ी सोच का संबंध है, मनुष्य अभी भी निरंतर देह की शांति और आनंद की खोज में लगा है और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की शर्तों और प्रयोजनों की जरा भी परवाह नहीं करता। और इसलिए, ज्यादातर लोगों का जीवन अभी भी असभ्य और पतनशील है। उनका जीवन जरा भी नहीं बदला है; वे स्पष्टत: परमेश्वर में विश्वास को कोई महत्वपूर्ण मामला नहीं मानते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे बस दूसरों की खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, प्रेरणाओं से संचालित हैं, और निष्प्रयोजन अस्तित्व में भटकते हुए लापरवाही से जी रहे हैं। कुछ ही हैं, जो सब चीज़ों में परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने की कोशिश कर पाते हैं, अधिक और कीमती वस्तुएँ पाते हैं, परमेश्वर के घर में आज बड़े धनी बन गए हैं, और परमेश्वर के अधिक आशीष पा रहे हैं। यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और पृथ्वी पर परमेश्वर ने जो देने का वादा किया है, उसे प्राप्त करने में समर्थ हो; यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध होना चाहते हो और वर्षों को बेकार गुज़रने नहीं देते, तो सक्रियता से प्रवेश करने का यह आदर्श मार्ग है। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य और पात्र बनोगे। क्या तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने वाले व्यक्ति हो? क्या तुम सचमुच सभी चीज़ों में ईमानदार रहने वाले व्यक्ति हो है? क्या तुममें परमेश्वर के लिए प्रेम की वही भावना है, जो पतरस में थी? क्या तुममें परमेश्वर से प्रेम करने की वैसी ही इच्छा है, जैसी यीशु में थी? तुमने अनेक वर्षों से यीशु पर विश्वास रखा है; क्या तुमने देखा है कि यीशु परमेश्वर को कैसे प्यार करता था? क्या तुम सच में यीशु में ही विश्वास रखते हो? तुम आज के व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो; क्या तुमने देखा है कि देहधारी व्यावहारिक परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर से किस तरह प्यार करता है? तुम्हें प्रभु यीशु मसीह में विश्वास है; और वह इसलिए क्योंकि मनुष्य को छुड़ाने के लिए यीशु का सलीब पर चढ़ाया जाना और उसके द्वारा किए गए चमत्कार सामान्यतः स्वीकृत सत्य है। फिर भी मनुष्य का विश्वास यीशु मसीह के ज्ञान और सच्ची समझ से नहीं आता। तुम केवल यीशु मसीह के नाम में विश्वास करते हो, उसके आत्मा में विश्वास नहीं करते, क्योंकि तुम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि यीशु ने परमेश्वर से किस तरह प्यार किया था। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास कहीं अधिक भोला है। यीशु पर कई वर्षों तक विश्वास करने के बावजूद तुम नहीं जानते कि परमेश्वर को कैसे प्यार करना है। क्या यह तुम्हें संसार का सबसे बड़ा मूर्ख नहीं बनाता? यह इस बात का प्रमाण है कि वर्षों से तुम प्रभु यीशु मसीह का भोजन बेकार में ही खाते आ रहे हो। न सिर्फ मैं ऐसे लोगों को नापसंद करता हूँ, बल्कि यह भी मानता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह—जिसकी तुम आराधना करते हो—भी उन्हें नापसंद करेगा। ऐसे लोगों को पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है? क्या तुम शर्मिंदगी से लाल नहीं होते? क्या क्या तुहें लज्जा नहीं आती? क्या तुममें अभी भी अपने प्रभु यीशु मसीह का सामना करने की धृष्टता है? क्या तुम लोग उसका मतलब समझते हो, जो मैंने कहा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

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