जीवन में प्रवेश 4

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 483

तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अधिकांश लोग इस प्रश्न से हैरान हैं। उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से दो बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोण रहे हैं, जो दिखाता है कि वे आज्ञापालन के लिए नहीं, बल्कि कुछ निश्चित लाभ प्राप्त करने या आपदा के साथ आने वाली तकलीफ़ से बचने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं; केवल तभी वे थोड़े-बहुत आज्ञाकारी होते हैं। उनकी आज्ञाकारिता सशर्त है, यह उनकी व्यक्तिगत संभावनाओं की गरज़ से है, और उन पर जबरदस्ती थोपी गई है। तो, तुम परमेश्वर में विश्वास आखिर क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारी संभावनाओं, और तुम्हारे प्रारब्ध के लिए है, तो बेहतर यही होता कि तुम विश्वास ही न करते। इस प्रकार का विश्वास आत्म-वंचना, आत्म-आश्वासन और आत्म-प्रशंसा है। यदि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की नींव पर आधारित नहीं है, तो तुम्हें उसका विरोध करने के लिए अंततः दण्डित किया जाएगा। वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते, उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, वे उसके वचनों के प्यासे बनें, उसके वचनों को खाएँ-पिएँ और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बन सकें। यदि ये तुम्हारी सच्ची मंशाएँ हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा और तुम्हारे प्रति अनुग्रही होगा। कोई भी न तो इस पर संदेह कर सकता है और न ही इसे बदल सकता है। यदि तुम्हारी मंशा परमेश्वर के आज्ञापालन की नहीं है और तुम्हारे उद्देश्य दूसरे हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप भी परमेश्वर के विरोध में होगा। तुम भले ही मृदुभाषी और सौम्य हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति उचित दिखायी दे, और तुम भले ही आज्ञाकारी प्रतीत होते हो, किन्तु जब परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारी मंशाओं और विचारों की बात आती है, तो जो भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में होता है, वह बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं। वे सीधे-सीधे परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से एक-एक को प्रकट करेगा और सबको दिखाएगा कि पवित्र आत्मा उन सभी से, जो पाखण्डी हैं, निश्चित रूप से घृणा करेगा और उन्हें ठुकरा देगा। चिंता नहीं : परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से एक-एक से निपटेगा और उनका हिसाब करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 484

यदि तुम परमेश्वर से आने वाले नए प्रकाश को स्वीकार करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर आज जो कुछ करता है, वह सब नहीं समझ सकते, और तुम उसकी खोज नहीं करते, या तुम उस पर सन्देह करते हो, उसकी आलोचना करते हो, या उसकी जाँच-पड़ताल एवं विश्लेषण करते हो, तो तुम्हारा मन परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार नहीं है। यदि, जब वर्तमान समय का प्रकाश दिखाई देता है, तब भी तुम बीते हुए कल का प्रकाश सँजोकर रखते हो और परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते हो, तो तुम एक बेतुके इंसान से बढ़कर और कुछ नहीं हो—तुम उनमें से हो जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर की आज्ञापालन की कुंजी नए प्रकाश की सराहना करने, उसे स्वीकार करने और उसे अभ्यास में लाने में है। यही सच्ची आज्ञाकारिता है। जिनमें परमेश्वर के लिए तड़पने की इच्छाशक्ति का अभाव है, जो उसके समक्ष स्वेच्छा से समर्पित नहीं हो पाते और केवल यथास्थिति से संतुष्ट होकर परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं, ऐसा इंसान परमेश्वर का आज्ञापालन इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह अभी भी पहले के प्रभाव में है। जो चीज़ें पहले आईं, उन्होंने लोगों को परमेश्वर के बारे में तमाम तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ दीं, और ये उनके दिमाग़ में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार, वे जिसमें विश्वास करते हैं, वह उनकी स्वयं की धारणाएँ और उनकी अपनी कल्पनाओं के मापदण्ड हैं। यदि तुम अपनी कल्पनाओं के परमेश्वर के सामने उस परमेश्वर को मापते हो जो आज वास्तविक कार्य करता है, तो तुम्हारा विश्वास शैतान से आता है, और तुम्हारी अपनी पसंद की वस्तु से दाग़दार है—परमेश्वर इस तरह का विश्वास नहीं चाहता। इस बात की परवाह किए बिना कि उनकी साख कितनी ऊंची है, और उनके समर्पण की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके कार्य के लिए जीवनभर प्रयास किए हों, और अपनी जान कुर्बान कर दी हो—परमेश्वर इस तरह के विश्वास वाले किसी भी व्यक्ति को स्वीकृति नहीं देता। वह उनके ऊपर मात्र थोड़ा-सा अनुग्रह करता है और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता, परमेश्वर बारी-बारी से उन में प्रत्येक को हटा देगा। चाहे कोई युवा हो या बुजुर्ग, ऐसे सभी लोग जो अपने विश्वास में परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते और जिनकी मंशाएँ ग़लत हैं, जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करते और उसमें बाधा डालते हैं, ऐसे लोगों को परमेश्वर यकीनन हटा देगा। वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की दयालुता और मनोरमता की थोड़ी-सी भी समझ है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं, लेकिन उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए या पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और उसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का प्रयास करना—यही जागृत रहकर परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है; और परमेश्वर ऐसा ही विश्वास चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, प्रेम तथा धैर्य सभी सतही होते हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है, और वे "परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है", या "परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है" जैसी बातें करते हैं। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इससे यह सिद्ध होता है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं। यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब उन्हें अचानक परमेश्वर की परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं, तब लोग परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर पाते—बल्कि यदि वे संदिग्ध और ग़लत साबित हो जाते हैं—तब वे रत्ती भर भी आज्ञाकारी नहीं रहते हैं। परमेश्वर में विश्वास को लेकर उनके भीतर कई नियम और प्रतिबंध हैं, पुराने अनुभव हैं जो कई वर्षों के विश्वास का परिणाम हैं, या बाइबल पर आधारित विभिन्न सिद्धांत हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीज़ों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे कर सकते हैं? उनकी "आज्ञाकारिता" व्यक्तिगत पसंद के अनुसार होती है—क्या परमेश्वर ऐसी आज्ञाकारिता चाहेगा? यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता नहीं है, बल्कि सिद्धांतों से चिपके रहना है; यह आत्मसंतोष और आत्म-तुष्टिकरण है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन है, तो क्या तुम ईशनिंदा नहीं कर रहे हो? तुम एक मिस्री फिरौन हो, तुम बुरे काम करते हो। तुम जान-बूझकर परमेश्वर का विरोध करने के काम में लिप्त होते हो—क्या परमेश्वर तुमसे इस तरह की सेवा चाहता है? तुम्हारे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि जल्दी से जल्दी पश्चाताप करो और कुछ आत्म-जागरूकता पाने का प्रयत्न करो। ऐसा नहीं करने पर, चले जाने में तुम्हारी भलाई होगी: परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कथित "सेवा" से तो यही तुम्हारे लिए अधिक अच्छा होगा। तुम न हस्तक्षेप करोगे और न विघ्न डालोगे; तुम्हें अपनी जगह पता होगी और सकुशल रहोगे—क्या यह बेहतर नहीं होगा? और परमेश्वर का विरोध करने के लिए तुम्हें दण्डित नहीं किया जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 485

पवित्र आत्मा का कार्य दिन-ब-दिन बदलता रहता है। वह हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है, आने वाले कल का प्रकाशन आज से कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है। कदम-दर-कदम ऊपर चढ़ता जाता है। ऐसे ही कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है। यदि मनुष्य कदम से कदम न मिला पाए, तो उसे किसी भी समय बाहर किया जा सकता है। यदि उसका हृदय आज्ञाकारी न हो, तो वह बिलकल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकेगा। पहले का युग गुज़र चुका है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना चाहिए। विशेषकर अंतिम युग में, जिसमें लोगों को पूर्ण बनाया जाता है, परमेश्वर ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा, इसलिए, हृदय में आज्ञाकारिता के भाव के बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता, न ही वह अपने कार्य के किसी चरण को अपरिवर्तनीय मानता है। वह जो भी कार्य करता है, वह हमेशा नया और ऊँचा होता है। हर चरण के साथ उसका कार्य और भी व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप होता जाता है। इस प्रकार के कार्य का अनुभव करने पर ही मनुष्य अपने स्वभाव का अंतिम रूपांतरण कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है, और उसी तरह परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है। इसी तरह से मनुष्य को पूर्ण बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का मुकाबला करने तथा उन्हें पलटने के लिए इस तरह से कार्य करता है, और दूसरी ओर, मनुष्य की उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर में आस्था के उच्चतम आयाम में अगुवाई करने के लिए इस तरह कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। जो लोग अवज्ञाकारी प्रकृति के होते हैं और जानबूझ कर विरोध करते हैं, उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और मजबूती से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा बाहर कर दिया जाएगा; जो लोग स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं, केवल वही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी धारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए। यदि तुम लोग लापरवाह बनोगे, तो तुम्हें निश्चित रूप से पवित्र आत्मा द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, और तुम परमेश्वर के कार्य में रुकावट डालोगे। कार्य के इस चरण से गुज़रने से पहले, मनुष्य के पुराने नियम-कानून इतने ज़्यादा थे कि वह भटक गया, परिणामस्वरूप, वह अहंकारी होकर स्वयं को भूल गया। ये सारी ऐसी बाधाएँ हैं जो मनुष्य को परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से रोकती हैं; ये मनुष्य के परमेश्वर-ज्ञान की शत्रु हैं। मनुष्य के हृदय में आज्ञाकारिता और सत्य के लिए लालसा न होना खतरनाक है। यदि तुम केवल सरल कार्यों और वचनों के प्रति ही समर्पित होते हो, और गहन कार्यों या वचनों को स्वीकार नहीं कर पाते हो, तो तुम पुराने मार्गों से चिपके रहने वाले व्यक्ति हो और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 486

परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में अलग-अलग होता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक चरण में पूरी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले ही चरण में तुम्हारी आज्ञाकारिता कम हो जाती है या तुम कोई आज्ञाकारिता दिखा ही नहीं पाते, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाए तब भी तुम्हें उसके कदम से कदम मिलाना चाहिए; तभी तुम पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी बनोगे। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अटल रहना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम जब चाहे आज्ञाकारी बन जाओ, जब चाहे उसकी अवज्ञा कर दो। परमेश्वर इस प्रकार की आज्ञाकारिता पसंद नहीं करता। मैं जिस नए कार्य पर संगति कर रहा हूँ, यदि तुम उसके साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते, और पुरानी बातों से ही चिपके रहते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों से तुम्हें पोषण देना है। यदि तुम उसके वचनों का पालन करोगे, उन्हें स्वीकारोगे, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं बता रहा हूँ; जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के अवलोकन के लिए नया प्रकाश देता हूँ और तुम लोगों को आज के प्रकाश में लाता हूँ, और जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुममें कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अड़ियल हो सकते हैं, वे कहेंगे, "तुम जैसा कहते हो मैं वैसा बिलकुल नहीं करूँगा।" ऐसी स्थिति में, मैं कहूँगा कि तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है; तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुममें जीवन नहीं बचा है। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपांतरण का अनुभव करने के लिए, आज के प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना बहुत आवश्यक है। पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। किसी अन्य समय शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें शीघ्र अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। उसी प्रकार अनुभव करो जैसा उसने किया है, तो तुम्हें उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। ऐसा करने से तुम तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य के लिए पूर्णता का ऐसा मार्ग है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना, चीज़ के जरिए वह तुम्हें पाने या देखने देगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीज़ों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीज़ों का अनुभव करते हो, तो यह अनुभव तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसका पालन करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। सभी चीज़ों में तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को खोजना चाहिए और हर चीज़ से सीखना चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन विकसित हो सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।

पवित्र आत्मा तुम्हारे व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हारे विश्वास के ज़रिए तुम्हें पूर्ण बनाता है। क्या तुम सचमुच पूर्ण बनना चाहते हो? यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण होना चाहते हो, तो तुम्हारे अंदर देह की इच्छाओं का त्याग करने का साहस होगा, तुम परमेश्वर के वचनों को कार्यांवित कर पाओगे और निष्क्रिय एवं कमज़ोर नहीं होगे। तुम परमेश्वर की हर बात का पालन कर पाओगे, तुम्हारे सभी सार्वजनिक और व्यक्तिगत कार्यकलाप, परमेश्वर के सामने लाने लायक होंगे। यदि तुम ईमानदार इंसान हो और सभी चीज़ों में सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम पूर्ण बनाए जाओगे। ऐसे धोखेबाज़ लोग जो दूसरों के सामने एक तरह से व्यवहार करते हैं और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से कार्य करते हैं तो वे पूर्ण बनने के इच्छुक नहीं होते। वे सब बरबादी और विनाश के पुत्र होते हैं; वे परमेश्वर के नहीं, शैतान के होते हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर नहीं चुनता! यदि तुम्हारे कार्य और व्यवहार को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सके या परमेश्वर के आत्मा द्वारा न देखा जा सके, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। यदि तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करो, और अपने स्वभाव के रूपांतरण पर ध्यान दो, तभी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ पर आ पाओगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करना चाहते हो, तो तुम्हें, बिना किसी शिकायत के, बिना परमेश्वर के कार्य का मूल्यांकन या आलोचना करने का ख़्याल किए, परमेश्वर के सभी कार्यों का पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ये सबसे कम आवश्यकताएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हैं उनके लिए अनिवार्य आवश्यकताएँ ये हैं : हर काम परमेश्वर से प्रेम करने वाले हृदय से करो। हर काम परमेश्वर से प्रेम करने वाले हृदय से करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे सारे काम और आचरण को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। चूँकि तुम्हारे इरादे सच्चे हैं, इसलिए चाहे तुम्हारे काम सही हों या गलत, तुम उन्हें परमेश्वर या भाई-बहनों को दिखाने से नहीं डरोगे; तुम परमेश्वर के सामने शपथ लेने का साहस रखोगे। तुम्हें अपना हर इरादा और सोच-विचार परमेश्वर के सामने जाँच के लिए प्रस्तुत करना चाहिए; यदि तुम इस प्रकार से अभ्यास और प्रवेश करोगे, तो जीवन में तुम्हारी प्रगति शीघ्र होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 487

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसका आज्ञापालन किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और गैर-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। ऐसे लोग दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो "खज़ाना" होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अलंघनीय" कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी थोड़ा-बहुत ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें ग्रहण करने की आशा और भी कम नहीं है? विजय-कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करना, मनुष्य के दण्ड के लिए प्रमाण प्राप्त करना, दुष्ट को दंडित करना, और उन लोगों को पूर्ण बनाना है जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं। अंत में, सभी को उनके प्रकार के अनुसार पृथक किया जाएगा, और जिन लोगों के सोच-विचार से भरे होते आज्ञाकारिता हैं, अंतत: उन्हें ही पूर्ण बनाया जाएगा। यही काम अंतत: संपन्न किया जाएगा। इस दौरान, जिन लोगों का हर काम विद्रोह से भरा है उन्हें दण्डित किया जाएगा, और आग में जलने के लिए भेज दिया जाएगा जहाँ वे अनंतकाल तक शाप के भागी होंगे। जब वह समय आएगा, तो बीते युगों के वे "महान और अदम्य नायक" सबसे नीच और परित्यक्त "कमज़ोर और नपुंसक कायर" बन जाएँगे। केवल यही परमेश्वर की धार्मिकता के हर पहलू और उसके उस स्वभाव को प्रकट कर सकता है जिसका मनुष्य द्वारा अपमान नहीं किया जा सकता, मात्र यही मेरे हृदय की नफ़रत को शांत कर सकता है। क्या तुम लोगों को यह पूरी तरह तर्कपूर्ण नहीं लगता?

न तो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करने वाले तमाम लोग जीवन पा सकते हैं, और न ही इस धारा में रहने वाले जीवन पा सकते हैं। जीवन कोई सार्वजनिक संपत्ति नहीं है जिसे सभी इंसान साझा करें, और स्वभाव में बदलाव कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे सभी आसानी से प्राप्त कर लें। परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण असली और सही अर्थों में वास्तविक होना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर की प्रशंसा नहीं पायी जा सकती, अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलू का पालन करके परमेश्वर के हृदय को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक ही बात है। जो लोग केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते, उन्हें आज्ञाकारी नहीं माना जा सकता, और उन्हें तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता जो सचमुच समर्पण न करके, सतही तौर पर चापलूस होते हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य से नया ज्ञान प्राप्त करते हैं और नए कार्य से उनमें बदलाव आता है। ऐसे लोग ही परमेश्वर की प्रशंसा पाते हैं, पूर्ण बनते हैं, और उनके स्वभाव का रूपांतरण होता है। जो लोग खुशी से परमेश्वर के प्रति, उसके वचन और कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वही परमेश्वर की प्रशंसा पाते हैं। ऐसे लोग ही सही मार्ग पर हैं; ऐसे लोग ही ईमानदारी से परमेश्वर की कामना करते हैं और ईमानदारी से परमेश्वर की खोज करते हैं। जहाँ तक ऐसे लोगों का सवाल है जो परमेश्वर में आस्था की केवल बात करते हैं, पर वास्तव में उसे कोसते हैं, ऐसे लोग मुखौटा लगाकर रखते हैं, ऐसे लोगों के अंदर साँप का ज़हर होता है; ऐसे लोग सबसे ज़्यादा विश्वासघाती होते हैं। कभी न कभी, ऐसे दुर्जन लोगों का मुखौटा अवश्य उतरेगा। क्या आज यही काम नहीं किया जा रहा है? दुष्ट इंसान हमेशा दुष्ट ही बना रहेगा, वह कभी दण्ड के दिन से बच नहीं सकता। अच्छे लोग हमेशा अच्छे बने रहेंगे और उन्हें तब प्रकट किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। किसी भी दुष्ट को धार्मिक नहीं समझा जाएगा, न ही किसी धार्मिक को दुष्ट समझा जाएगा। क्या मैं किसी इंसान पर गलत दोषारोपण होने दूँगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 488

जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, तुम्हारे अंदर नया प्रवेश और नयी उच्चतर अंतर्दृष्टि होनी होनी चाहिए, जो हर कदम के साथ और गहरा होता जाता है। इसी में हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए। संवाद करने, उपदेश सुनने, परमेश्वर का वचन पढ़ने, या किसी मसले को सँभालकर तुम्हें नयी अंतर्दृष्टि और नई प्रबुद्धता प्राप्त होगी, और तुम पुराने नियमों और पुराने समय में नहीं जियोगे; तुम हमेशा नई ज्योति में जियोगे, और परमेश्वर के वचन से भटकोगे नहीं। इसी को सही पथ पर आना कहते हैं। सतही तौर पर कीमत चुकाने से काम नहीं चलेगा; परमेश्वर का वचन दिन-प्रतिदिन एक उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करता है, और हर दिन नई चीज़ें दिखाई देती हैं, इंसान को भी हर दिन नया प्रवेश करना चाहिए। जब परमेश्वर बोलता है, तो वह उस सबको साकार करता है जो उसने बोला है, और यदि तुम ताल मिलाकर नहीं चलोगे, तो पीछे रह जाओगे। अपनी प्रार्थनाओं में और गहराई लाओ; रुक-रुक कर परमेश्वर के वचनों को खाया-पिया नहीं जा सकता। प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता एवं प्रकाशन को और गहरा करो, इससे तुम्हारी धारणाएं और कल्पनाएं धीरे-धीरे कम होती जाएँगी। अपने आकलन को और मज़बूत करो, और जो भी समस्याएँ आएँ, उनके बारे में तुम्हारे अपने विचार और अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। अपनी आत्मा में कुछ चीज़ों को समझ कर, तुम्हें बाहरी चीज़ों में परिज्ञान प्राप्त करना और समस्या के मूल को समझने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुममें ये चीज़ें न हों, तो तुम कलीसिया की अगुवाई कैसे कर पाओगे? यदि तुम किसी वास्तविकता और अभ्यास के मार्ग के बिना, केवल शब्दों और सिद्धांतों की बात करोगे, तो तुम केवल थोड़े समय के लिए ही काम चला पाओगे। नए विश्वासी इसे थोड़ा-बहुत ही स्वीकार कर पाएँगे, लेकिन कुछ समय बाद, जब नए विश्वासी कुछ वास्तविक अनुभव प्राप्त कर लेंगे, तो तुम उन्हें पोषण नहीं दे पाओगे। फिर तुम परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त कैसे हुए? नई प्रबुद्धता के बिना तुम कार्य नहीं कर सकते। जो लोग नई प्रबुद्धता से रहित हैं, वे नहीं जानते कि अनुभव कैसे करना है, और ऐसे लोग कभी भी नया ज्ञान या नया अनुभव प्राप्त नहीं कर पाते। जीवन आपूर्ति करने के मामले में, वे न तो कभी अपना कार्य कर सकते हैं, न ही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो सकते हैं। ऐसा व्यक्ति एकदम बेकार होता है, बस रद्दी माल होता है। दरअसल, ऐसे लोग अपने काम में पूरी तरह से अयोग्य होते हैं, और एकदम अनुपयोगी होते हैं। वे लोग अपना काम तो करते ही नहीं, ऊपर से कलीसिया पर अनावश्यक दबाव भी डालते हैं। मैं इन "आदरणीय वृद्ध जनों" को जल्दी से जल्दी कलीसिया छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ ताकि फिर लोग तुम्हें न देखें। ऐसे लोगों को नए कार्य की कोई समझ नहीं होती, उनके अंदर अनंत धारणाए भरी होती हैं। वे लोग कलीसिया में कोई काम नहीं करते; बल्कि, कलीसिया में शरारत करते फिरते हैं और हर जगह नकारात्मकता फैलाते हैं, कलीसिया के अंदर हद दर्जे के दुराचरण और उत्पात में लिप्त रहते हैं और जो लोग उन्हें पहचान नहीं पाते, उनके अंदर भ्रम और उलझन पैदा करते हैं। इन जीते-जागते हैवानों को, इन दुष्ट आत्माओं को, जितना जल्दी हो सके कलीसिया छोड़ देनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कारण कलीसिया को नुकसान पहुँचे। हो सकता है तुम आज के कार्य से भयभीत न हो, किन्तु क्या तुम आने वाले कल के धार्मिक दण्ड से भी भयभीत नहीं हो? कलीसिया में बहुत से लोग मुफ़्तखोर हैं, और और ढेरों भेड़िए हैं जो परमेश्वर के सामान्य कार्य को अस्तव्यस्त करने की कोशिश करते हैं। ये सब दुष्ट आत्माएँ हैं जिन्हें शैतानों के सरदार ने भेजा है, दुष्ट भेड़िए हैं जो नादान मेमनों को हड़पने की ताक में रहते हैं। अगर इन तथाकथित लोगों को निकाला नहीं गया, तो ये कलीसिया में परजीवी और चढ़ावों को हड़पने वाले कीड़े-मकौड़े बन जाएँगे। देर-सवेर इन कुत्सित, अज्ञानी, नीच, और अरुचिकर कीड़ों को दण्डित किया जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 489

व्यावहारिकता का ज्ञान प्राप्त होना और परमेश्वर के कार्य को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो जाना—ये दोनो सब उसके वचनों में दिखाई देते हैं, और केवल परमेश्वर के कथनों के माध्यम से ही तुम प्रबुद्धता को प्राप्त कर सकते हो। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों से लैस होने के लिए और अधिक प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ को संगति में प्रचारित करें, और इस तरह, तुम दूसरों को प्रबुद्ध कर सकते हो और उनको कोई उपाय बता सकते हो—यह एक व्यावहारिक मार्ग है। इससे पहले कि परमेश्वर तुम्हारे लिए एक परिवेश बनाये, तुम लोगों में से हर एक को पहले उसके वचनों से लैस हो जाना चाहिये। यह एक ऐसी चीज़ है जो हर किसी को करनी चाहिए; यह एक अत्यावश्यक प्राथमिकता है। पहले एक ऐसे बिंदु पर पहुँचो जहाँ तुम्हे पता हो कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाया और पिया जाए। जिस चीज़ को करने में तुम असमर्थ हो उसके लिए उसके वचनों से अभ्यास का मार्ग तलाशो, और उसके वचनों में अपनी समझ में न आने वाले मुद्दों या अपनी कठिनाइयों का हल खोजो। परमेश्वर के वचनों को अपनी आपूर्ति बनाओ, और उन्हें अपनी व्यावहारिक कठिनाइयों और समस्याओं को सुलझाने में अपनी सहायता करने दो, साथ ही उसके वचनों को जीवन में अपना सहायक बनने दो। इन चीज़ों के लिए तुम्हारी तरफ से प्रयास की आवश्यकता होगी। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने से तुम्हें परिणाम प्राप्त होने चाहिए; तुम्हें उसके सामने अपने दिल को शांत करने में समर्थ होना चाहिए, और जब कभी भी तुम किन्हीं समस्याओं का सामना करो तब परमेश्वर के कथनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। जब कोई समस्या तुम्हारे सामने न आए, तो तुम्हें बस उसके वचन को खाने और पीने की चिंता करनी चाहिए। कभी-कभी तुम प्रार्थना कर सकते हो और परमेश्वर के प्यार के बारे में चिंतन कर सकते हो, उसके वचनों की अपनी समझ को संगति में साझा कर सकते हो, और उस प्रबुद्धता और रोशनी को जिसे तुम अपने अंदर अनुभव करते हो और उन प्रतिक्रियाओं को, जो तुम्हारे भीतर उन कथनों को पढ़ते समय होती है, संप्रेषित कर सकते हो। इसके अलावा, तुम लोगों को एकउपाय बता सकते हो। केवल यही व्यावहारिक है। ऐसा करने का लक्ष्य परमेश्वर के वचनों को तुम्हारी व्यावहारिक आपूर्ति बनने देना है।

एक दिन के दौरान, तुम परमेश्वर के सामने कितने घंटे बिताते हो जिसमें तुम वास्तव में उसके सामने होते हो? तुम्हारे दिन का कितना हिस्सा परमेश्वर को दिया जाता है? कितना देह को दिया जाता है? अपना हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर मोड़े रखना परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर सही रास्ते पर पहला कदम है। अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो-देह के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए, परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो-तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और दृष्टिकोण सब युक्तिसंगत होंगे, और तब तुम परमेश्वर के सामने ऐसे व्यक्ति होगे, जो उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर उन्मुख हैं; वे वो लोग हैं जो केवल उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है वे वो लोग हैं जो आधे-अधूरे मन से उसकी ओर उन्मुख हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्यार करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है जो धोखा देने के लिए मनोहर और लच्छेदार वचनों का उपयोग करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण या उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है, वे विश्वासघाती लोग हैं और वे प्रकृति से अत्यधिक अभिमानी हैं। जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में आज्ञाकारी नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्त्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं वे उसके सामने अपना पूरा अस्तित्व रख देते हैं; वे वास्तव में उसके सभी कथनों का पालन करते हैं, और उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव बनाते हैं, और परमेश्वर के वचनों में अभ्यास करने के हिस्सों को गंभीरता तलाश करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं। यदि तुम जो करते हो वह तुम्हारे जीवन के लिए लाभदायक है, और उसके वचनों को खाने और पीने के द्वारा, तुम अपनी आंतरिक आवश्यकताओं और कमियों को पूरा कर सकते हो ताकि तुम्हारा जीवन स्वभाव रूपान्तरित हो जाए, तो यह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करेगा। यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, यदि तुम देह को संतुष्ट नहीं करते हो, बल्कि उसकी इच्छा को संतुष्ट करते हो, तो यह उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना है। जब तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में अधिक यथार्थता से प्रवेश करने के बारे में बात करते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हो और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो। केवल इस प्रकार के व्यावहारिक कार्यों को ही उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना कहा जा सकता है। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हो, तो तुममें सत्य होगा। यह वास्तविकता में प्रवेश करने की शुरुआत है; तुम्हें पहले यह प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए और केवल उसके बाद ही तुम गहरी वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। विचार करो कि कैसे आज्ञाओं का पालन करें और परमेश्वर के सामने निष्ठावान बनें; हमेशा यह न सोचो कि कब तुम राज्य में प्रवेश कर पाओगे। यदि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता है तो तुम जो भी सोचोगे वह बेकार होगा! परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए पहले वह स्थिति प्राप्त करनी चाहिये, अपने सभी मत और विचार परमेश्वर के लिए हों—यह न्यूनतम आवश्यकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 490

कई लोग हैं, जो वर्तमान में परीक्षणों के बीच में हैं और वे परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, लेकिन मैं तुम्हें बताता हूँ : यदि तुम इसे नहीं समझते, तो बेहतर है कि तुम इसके बारे में आलोचनाएँ मत करो। संभवतः एक दिन आएगा, जब सत्य अपनी सम्पूर्णता में प्रकाश में आ जाएगा और तब तुम इसे समझ लोगे। आलोचनाएँ न करना तुम्हारे लिए लाभदायक होगा, लेकिन तुम मात्र निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा नहीं कर सकते। तुम्हें सक्रिय रूप से प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए; केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बन पाओगे जो वास्तव में प्रवेश करता है। अपनी विद्रोहशीलता के कारण, लोग हमेशा व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में धारणाएँ विकसित कर रहे हैं। इसलिए सभी लोगों को यह सीखना आवश्यक हो जाता है कि आज्ञाकारी कैसे बनें, क्योंकि व्यावहारिक परमेश्वर मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा परिक्षण है। यदि तुम अडिग नहीं रह सकते, तो सब-कुछ खत्म हो जाता है; यदि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की व्यावहारिकता की समझ नहीं है, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने में सक्षम नहीं होगे। लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है या नहीं, इसमें एक महत्वपूर्ण कदम है परमेश्वर की व्यावहारिकता को समझना। देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता का पृथ्वी पर आना प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक परिक्षण है; यदि तुम इस पहलू में अडिग रहने में सक्षम हो तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को जानता है, और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो उसे सच में प्यार करता है। यदि तुम इस पहलू में अडिग नहीं रह सकते, यदि तुम केवल पवित्रात्मा में विश्वास करते हो और तुम परमेश्वर की व्यावहारिकता पर विश्वास नहीं कर सकते, तो इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास कितना अधिक है, वह बेकार होगा। यदि तुम दृश्यमान परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकते, तो क्या तुम परमेश्वर के पवित्रात्मा में विश्वास कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं कर रहे? अगर तुम दृश्यमान और मूर्त परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो, तो क्या तुम पवित्रात्मा की आज्ञा का पालन करने में सक्षम हो? आत्मा अदृश्य और अमूर्त है, इसलिए जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर के पवित्रात्मा की आज्ञा का पालन करते हो, तो क्या तुम सिर्फ निरर्थक बात नहीं कर रहे हो? आज्ञाओं का पालन करने की कुंजी व्यावहारिक परमेश्वर की समझ को पाना है। एक बार तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ प्राप्त हो जाए, तो तुम आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो जाओगे। उनका पालन करने के दो घटक हैं: एक है उसके पवित्रात्मा के सार को थामे रखना और पवित्रात्मा के सामने पवित्रात्मा की परीक्षा को स्वीकार करने में सक्षम होना; दूसरा है परमेश्वर द्वारा धारित देह की वास्तविक समझ प्राप्त करने में सक्षम होना और वास्तविक समर्पण प्राप्त करना। चाहे शरीर के सामने हो या पवित्रात्मा के सामने, परमेश्वर के प्रति हमेशा आज्ञाकारिता और श्रद्धा रखनी चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही पूर्ण बनाए जाने के योग्य है। यदि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की व्यावहारिकता की समझ है, अर्थात् यदि तुम इस परीक्षा में अडिग रहे हो, तब तुम्हारे लिए कुछ भी बहुत अधिक नहीं होगा।

कुछ लोग कहते हैं, "आज्ञाओं का पालन करना आसान है; तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के सामने स्पष्ट रूप से और श्रद्धापूर्वक बिना नाटकबाजी किए बोलने की आवश्यकता है, और यही आज्ञाओं का पालन करना है।" क्या यह सही है? तो अगर तुम परमेश्वर की पीठ पीछे कुछ काम करते हो, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं—क्या उसे आज्ञाओं का पालनकरना माना जाता है? तुम लोगों को इस बात की पूरी समझ अवश्य होनी चाहिए कि आज्ञाओं का पालन करने में क्या शामिल है। यह इस बात के साथ संबंधित है कि क्या तुम्हें परमेश्वर की व्यावहारिकता की एक वास्तविक समझ है या नहीं; यदि तुम्हें व्यावहारिकता की समझ है, और इस परीक्षा के दौरान लड़खड़ाते और गिरते नहीं हो, तो तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में माना जा सकता है जिसके पास मज़बूत गवाही है। परमेश्वर के लिए एक ज़बर्दस्त गवाही देना मुख्य रूप से इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने आज्ञापालन करने में सक्षम हो या नहीं जो कि न केवल साधारण है, बल्कि सामान्य है, और मृत्युपर्यंत भी उसका आज्ञापालन कर पाते हो या नहीं। यदि तुम इस आज्ञाकारिता के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तव में गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हो। अगर तुम मृत्यु तक समर्पण कर सकते हो, और उसके सामने शिकायतें नहीं करते, आलोचनाएँ नहीं करते, बदनामी नहीं करते, धारणाएँ नहीं रखते, और कोई गुप्त मंशा नहीं रखते, तो इस तरह परमेश्वर को महिमा मिलेगी। किसी नियमित व्यक्ति जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है, के सम्मुख समर्पण और किसी भी धारणा के बिना मृत्यु तक समर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है। परमेश्वर जिस वास्तविकता में प्रवेश की लोगों से अपेक्षा करता है वह यह है कि तुम उसके वचनों का पालन करने में सक्षम हो जाओ, उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाओ, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने झुकने और अपने स्वयं के भ्रष्टाचार को जानने में सक्षम हो जाओ, उसके सामने अपना हृदय खोलने में सक्षम हो जाओ, और अंत में उसके इन वचनों के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाओ। जब ये वचन तुम्हें जीत लेते हैं और तुम्हें पूरी तरह उसके प्रति आज्ञाकारी बना देते हैं तो परमेश्वर को महिमा प्राप्त होती है; इसके माध्यम से वह शैतान को लज्जित करता है और अपने कार्य को पूरा करता है। जब तुम्हारी देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता के बारे में कोई धारणा नहीं होती है—अर्थात्, जब तुम इस परीक्षा में अडिग रहते हो, तो तुम एक अच्छी गवाही देते हो। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की पूरी समझ हो जाती है और तुम पतरस की तरह मृत्युपर्यंत आज्ञापालन कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाओगे, और उसके द्वारा पूर्ण बना दिए जाओगे। परमेश्वर वह जो कुछ भी करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, वह तुम्हारे लिए एक परीक्षा होती है। यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो इसके लिए तुम्हें कष्ट भुगतने या शुद्ध किए जाने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका कार्य इतना व्यावहारिक है और तुम्हारी धारणाओं से इतना अलग है कि यह तुम्हारे लिए अपनी धारणाओं को छोड़ देना आवश्यक बनाता है। यही कारण है कि यह तुम्हारे लिए एक परीक्षा है। यह परमेश्वर की व्यावहारिकता के कारण है कि सभी लोग परीक्षाओं के बीच में हैं; उसका कार्य व्यावहारिक है, अलौकिक नहीं। किसी भी धारणा को रखे बिना उसके व्यावहारिक वचनों और उसके व्यावहारिक कथनों को पूरी तरह से समझकर, और जैसे-जैसे उसका कार्य बढ़ता है, वैसे-वैसे उसे वास्तव में प्यार करने में सक्षम हो कर, तुम उसके द्वारा प्राप्त किए जाओगे। उन लोगों का समूह जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करेगा वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, अर्थात्, जो उसकी व्यावहारिकता को जानते हैं, और उससे भी ज्यादा ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य का पालन करने में सक्षम हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 491

परमेश्वर के देह में होने के दौरान, जिस आज्ञाकारिता की वह लोगों से अपेक्षा करता है, उसमें आलोचना से बचना या विरोध न करना शामिल नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं—इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों को अपने जीवन का सिद्धांत और अपने जीवन की नींव बना लें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे पूरी तरह से उसकी इच्छा को संतुष्ट करें। देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की लोगों से अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने को संदर्भित करता है, और दूसरा पहलू उसकी सादगी और व्यावहारिकता का पालन करने में सक्षम होने को संदर्भित करता है। ये दोनों पूर्ण होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं, वे ही हैं, जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम है। ये सभी वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्यार करते हैं जितना वे अपने जीवन से करते हैं। देहधारी परमेश्वर अपने कार्य में सामान्य और व्यावहारिक मानवता दिखाता है। इस तरह, उसकी सामान्य और व्यावहारिक मानवता, दोनों का बाह्य आवरण लोगों के लिए एक बड़ा परीक्षण बन जाता है; यह उनकी सबसे बड़ी कठिनाई बन जाता है। हालाँकि, परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से बचा नहीं जा सकता है। उसने समाधान खोजने के लिए हर प्रयास किया, लेकिन अंत में वह स्वयं को अपनी सामान्य मानवता के बाहरी आवरण से छुटकारा नहीं दिला सका। यह इसलिए था, क्योंकि अंततः, वह परमेश्वर है जो देह बन गया है, न कि स्वर्ग में आत्मा का परमेश्वर। वह ऐसा परमेश्वर नहीं है, जिसे लोग देख न सकें, बल्कि ऐसा परमेश्वर है, जिसने सृष्टि के एक सदस्य का आवरण पहना है। इस प्रकार, उसे अपने आप को अपनी सामान्य मानवता के आवरण से छुड़ाना किसी भी तरह से आसान नहीं होगा। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह अभी भी उस कार्य को करता है जो वह देह के परिप्रेक्ष्य से करना चाहता है। यह कार्य सामान्य और व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, तो लोगों का इसका पालन न करना कैसे ठीक हो सकता है? परमेश्वर के कार्यों के बारे में लोग आख़िर क्या कर सकते हैं? वह जो भी करना चाहता है, वह करता है; जिससे वह खुश होता है, वह वैसा ही है जैसा वह चाहता है। यदि लोग आज्ञापालन नहीं करते हैं, तो उनके पास और कौनसी ठोस योजनाएँ हो सकती हैं? अभी तक, यह सिर्फ आज्ञाकारिता ही है जो लोगों को बचा सकी है; किसी के पास कोई अन्य बुद्धिमत्तापूर्ण विचार नहीं हैं। यदि परमेश्वर लोगों की परीक्षा लेना चाहता है, तो वे इसके बारे में क्या कर सकते हैं? लेकिन यह सब स्वर्ग के परमेश्वर द्वारा नहीं सोचा गया है; यह देहधारी परमेश्वर द्वारा सोचा गया है। वह ऐसा करना चाहता है, तो कोई भी व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता है। देहधारी परमेश्वर जो कुछ करता है, उसमें स्वर्ग का परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता है, तो क्या यह लोगों को उसकी आज्ञा का और अधिक पालन करने का कारण नहीं होना चाहिए? यद्यपि वह व्यावहारिक और सामान्य दोनों है, किंतु वह पूरी तरह से देहधारण किया परमेश्वर है। उसके अपने स्वयं के विचारों के आधार पर, वह जो चाहता है वही करता है। स्वर्ग के परमेश्वर ने उसे सभी कार्य सौंप दिए हैं; वह जो भी करता है तुम्हें उसका पालन करना चाहिए। यद्यपि उसमें मानवता है और वह बहुत सामान्य है, उसने यह सब जान-बूझकर व्यवस्थित किया है, तो लोग उसे कैसे अस्वीकृति के साथ पूरी आँखें खोल कर देख सकते हैं? वह सामान्य होना चाहता है, तो वह सामान्य है। वह मानवता के भीतर रहना चाहता है, तो वह मानवता के भीतर रहता है। वह दिव्यता के भीतर रहना चाहता है, तो वह दिव्यता में रहता है। लोग इसे जैसा चाहें वैसा देख सकते हैं, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा और मनुष्य हमेशा मनुष्य रहेंगे। कुछ मामूली गौण बातों की वजह से उसके सार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, न ही उसे एक छोटी सी चीज़ के कारण परमेश्वर के "व्यक्ति" के बाहर धकेला जा सकता है। लोगों के पास मानवजाति की आज़ादी है, और परमेश्वर के पास परमेश्वर की गरिमा है; ये एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप नहीं करते हैं। क्या लोग परमेश्वर को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता नहीं दे सकते हैं? क्या वे परमेश्वर का थोड़ा अधिक लापरवाह होना सहन नहीं कर सकते हैं? परमेश्वर के साथ इतना कठोर मत बनो! हर किसी में एक-दूसरे के लिए सहिष्णुता होनी चाहिए; तब क्या हर चीज़ का समाधान नहीं हो जाएगा? क्या तब भी कोई मनमुटाव रह जायेगा? यदि कोई इतनी छोटी सी बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता है, तो वह एक उदारचरित या एक सच्चा आदमी होने के बारे में कैसे सोच सकता है? यह परमेश्वर नहीं है जो मानवजाति के लिए कठिनाइयों का कारण है, बल्कि मानवजाति ही परमेश्वर को कठिनाई देती है। वे हमेशा राई का पहाड़ बनाकर चीजों को नियंत्रित करते हैं—वे वास्तव में शून्य में से कुछ न कुछ चीजें बना लेते हैं, और यह बहुत अनावश्यक है! जब परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर कार्य करता है, तो वह जो करता है वह मानवजाति का कार्य नहीं होता है, बल्कि परमेश्वर का कार्य होता है। तथापि, लोगों को उसके कार्य का सार दिखाई नहीं देता है—वे हमेशा उसके मानवता के बाहरी आवरण को देखते हैं। उन्होंने इतना बड़ा कार्य नहीं देखा है, और फिर भी वे परमेश्वर की साधारण और सामान्य मानवता को देखने पर जोर देते हैं और वे इसे छोड़ेंगे नहीं। इसे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना कैसे कहा जा सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर अब पृथ्वी के "परमेश्वर" में बदल गया है, और पृथ्वी का परमेश्वर अब स्वर्ग में परमेश्वर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि उनके बाह्य रूप-रंग एक से हैं या वे ठीक किस तरह से काम करते है। अंत में, वह जो परमेश्वर का कार्य करता है, वह स्वयं परमेश्वर है। तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए, चाहे तुम करना चाहो या नहीं—यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें तुम्हारे पास कोई विकल्प हो! लोगों द्वारा परमेश्वर की आज्ञा का पालन अवश्य किया जाना चाहिए, और लोगों को जरा सा भी ढोंग किए बिना परमेश्वर की आज्ञा का पूर्णतः पालन अवश्य करना चाहिए।

लोगों का समूह जिन्हें देहधारी परमेश्वर आज प्राप्त करना चाहता है वे लोग हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। लोगों को केवल उसके कार्य का पालन करने की, न कि हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर के विचारों से स्वयं को चिंतित करने, अस्पष्टता में रहने, या देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाने की आवश्यकता है। जो लोग उसकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम हैं, वे ऐसे लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। ये लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में किस तरह का है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मानवजाति के बीच किस प्रकार का कार्य कर रहा है; लेकिन वे पृथ्वी के परमेश्वर को पूर्णतः अपना हृदय दे देते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी स्वयं की सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, और वे देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता पर कभी भी उपद्रव नहीं करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है जो लोगों को वादे और आशीष प्रदान करता है। लोगों को स्वर्ग के परमेश्वर की ही हमेशा प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और पृथ्वी के परमेश्वर को एक औसत व्यक्ति के रूप में नहीं देखना चाहिए; यह अनुचित है। स्वर्ग का परमेश्वर आश्चर्यजनक बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है; पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही औसत और नगण्य है; वह अति सामान्य भी है। उसके पास कोई असाधारण मन नहीं है और न ही वह धरती हिला देने वाले कार्य करता है। वह सिर्फ एक बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है। यद्यपि वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता है और न ही इसके लिए हवा और बारिश को बुलाता है, तब भी वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का देहधारण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। लोगों को उसे देखकर, जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते और अधम के रूप में तो बिलकुल भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे बढ़ा-काढ़कर नहीं देखना चाहिए, जिसे वे समझने में सक्षम हैं और जो परमेश्वर के रूप में उनकी अपनी कल्पनाओं से मेल खाता है। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता से आता है; यह परमेश्वर के प्रति मानवजाति के विरोध का स्रोत है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 492

लोग अगर केवल अपने विवेक की भावनाओं की सुनें, तो वे परमेश्वर की मनोहरता महसूस नहीं कर सकते। अगर वे सिर्फ अपने विवेक पर भरोसा करें, तो परमेश्वर के लिए उनका प्रेम कमजोर होगा। यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम का कर्ज़ चुकाने की बात करते हो, तो तुम्हारे पास उसके प्रति अपने प्रेम में कोई जोश नहीं होगा; अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर उससे प्रेम करना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है? यह एक व्यावहारिक मुद्दा है। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम किस तरह का प्रेम है? क्या वह परमेश्वर को मूर्ख बनाना और उसके लिए बेमन से काम करना नहीं है? अधिकांश लोगों का मानना है कि चूँकि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कोई पुरस्कार नहीं है, और उससे प्रेम न करने के लिए ताड़ना दी जाएगी, तो कुल मिलाकर पाप न करना ही काफी है। इसलिए अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर परमेश्वर से प्रेम करना और उसके प्रेम को चुकाना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है, और वह परमेश्वर के लिए किसी के हृदय से निकला स्वाभाविक प्रेम नहीं है। परमेश्वर के लिए प्रेम व्यक्ति के हृदय की गहराई से निकला एक वास्तविक मनोभाव होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : "मैं खुद परमेश्वर के पीछे जाने और उसका अनुसरण करने के लिए तत्पर हूँ। अब भले ही परमेश्वर मुझे त्याग देना चाहे, मैं फिर भी उसका अनुसरण करूँगा। वह मुझे चाहे या न चाहे, मैं फिर भी उससे प्रेम करता रहूँगा, और अंत में मुझे उसे प्राप्त करना होगा। मैं अपना हृदय परमेश्वर को अर्पण करता हूँ, और चाहे वह कुछ भी करे, मैं अपने पूरे जीवन उसका अनुसरण करूँगा। चाहे कुछ भी हो, मुझे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए और उसे प्राप्त करना चाहिए; मैं तब तक आराम नहीं करूँगा, जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता।" क्या तुम इस तरह का संकल्प रखते हो?

परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग उससे प्रेम करने का मार्ग ही है। यदि तुम उस पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम करना ही चाहिए; हालाँकि उससे प्रेम करने का तात्पर्य केवल उसके प्रेम का प्रतिदान करना या उससे अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर प्रेम करना नहीं है—यह परमेश्वर के लिए शुद्ध प्रेम है। कभी-कभी लोग सिर्फ अपने विवेक के आधार पर परमेश्वर के प्रेम को महसूस करने में सक्षम नहीं होते। मैंने हमेशा क्यों कहा : "परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्माओं को प्रेरित करे"? मैंने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए लोगों के विवेक को प्रेरित करने की बात क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि लोगों का विवेक परमेश्वर की मनोहरता को महसूस नहीं कर सकता। यदि तुम इन वचनों से आश्वस्त नहीं हो, तो उसके प्रेम को महसूस करने के लिए अपने विवेक का उपयोग करो। उस पल तुम्हारे पास कुछ प्रेरणा हो सकती है, लेकिन वह जल्दी ही गायब हो जाएगी। यदि तुम परमेश्वर की मनोहरता को महसूस करने के लिए केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो प्रार्थना करते समय तो तुम प्रेरणा प्राप्त करोगे, लेकिन उसके बाद जल्दी ही वह चली जाएगी और गायब हो जाएगी। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए अपना प्रेम जगाने में असमर्थ होगे; जब तुम वास्तव में अपने हृदय में उसकी मनोहरता महसूस करते हो, तो तुम्हारी आत्मा उसके द्वारा प्रेरित होगी, और केवल उसी समय तुम्हारा विवेक अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम होगा। अर्थात जब परमेश्वर मनुष्य की आत्मा को प्रेरित करता है और जब मनुष्य के पास ज्ञान होता है और वह हृदय में प्रोत्साहित होता है, अर्थात जब वह अनुभव प्राप्त कर लेता है, केवल तभी वह अपने विवेक से परमेश्वर को प्रभावी रूप से प्रेम करने में सक्षम होगा। अपने विवेक से परमेश्वर से प्रेम करना गलत नहीं है—यह परमेश्वर को प्रेम करने का सबसे निम्न स्तर है। "परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति बस इंसाफ करते हुए" प्रेम करना मनुष्य को सक्रिय ढंग से प्रवेश करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। जब लोग पवित्र आत्मा का कुछ कार्य प्राप्त करते हैं, यानी जब वे अपने व्यावहारिक अनुभव में परमेश्वर का प्रेम देखते और अनुभव करते हैं, जब उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है और वे वास्तव में देखते हैं कि परमेश्वर मानव-जाति के प्रेम के कितना योग्य है और वह कितना प्यारा है, केवल तभी वे परमेश्वर को सच में प्रेम करने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 493

जब लोग अपने हृदय से परमेश्वर से संपर्क करते हैं, जब उनके हृदय पूरी तरह से उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति मानव के प्रेम का पहला कदम होता है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले उसकी ओर अपना हृदय मोड़ने में सक्षम होना होगा। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना क्या है? ऐसा तब होता है, जब तुम्हारे हृदय के हर प्रयास परमेश्वर से प्रेम करने और उसे प्राप्त करने के लिए होते हैं। इससे पता चलता है कि तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ लिया है। परमेश्वर और उसके वचनों के अलावा तुम्हारे हृदय में लगभग कुछ नहीं होता (परिवार, धन, पति, पत्नी, बच्चे आदि)। अगर होता भी है, तो ऐसी चीज़ें तुम्हारे हृदय पर अधिकार नहीं कर सकतीं, और तुम अपने भविष्य की संभावनाओं के बारे में नहीं सोचते, केवल परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करने की ही सोचते हो। उस समय तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया होगा। मान लो, तुम अब भी अपने हृदय में अपने लिए योजना बना रहे हो और हमेशा अपने निजी लाभ के लिए प्रयास करते रहते हो, और हमेशा सोचते हो कि : "मैं कब परमेश्वर से एक छोटा-सा अनुरोध कर सकता हूँ? कब मेरा परिवार धनी बनेगा? मैं कैसे कुछ अच्छे कपड़े प्राप्त कर सकता हूँ? ..." यदि तुम उस स्थिति में रह रहे हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। यदि तुम्हारे हृदय में केवल परमेश्वर के वचन हैं और तुम हर समय परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हो और उसके करीब हो सकते हो—मानो वह तुम्हारे बहुत करीब हो, मानो परमेश्वर तुम्हारे भीतर हो और तुम उसके भीतर हो—यदि तुम उस तरह की अवस्था में हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में है। यदि तुम हर रोज़ परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचनों को खाते और पीते हो, हमेशा कलीसिया के कार्य के बारे में सोचा करते हो, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाते हो, अपने हृदय का उपयोग उससे सच्चा प्रेम करने और उसके हृदय को संतुष्ट करने के लिए करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर का होगा। यदि तुम्हारा हृदय अन्य कई चीजों में लिप्त है, तो उस पर अभी भी शैतान का कब्ज़ा है और वह पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। जब किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तो उसमें परमेश्वर के लिए सच्चा, स्वाभाविक प्रेम होगा और वह परमेश्वर के कार्य पर विचार करने में सक्षम होगा। यद्यपि वे अभी भी किसी पल मूर्खता और विवेकहीनता दिखा सकते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के घर के हितों, उसके कार्य, और अपने स्वभाव में बदलाव के संबंध में विचार करने में सक्षम होंगे और उनका हृदय सही ठिकाने पर होगा। कुछ लोग हमेशा यह दावा करते हैं कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह कलीसिया के लिए होता है; लेकिन वास्तव में वे अपने फायदे के लिए कार्य कर रहे हैं। ऐसे लोगों के इरादे गलत होते हैं। वे कुटिल और धोखेबाज हैं और वे जो अधिकांश चीज़ें करते हैं, वे उनके निजी लाभ के लिए होती हैं। इस तरह के व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास नहीं करते; उनका हृदय अब भी शैतान का है और वह परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ सकता। इसलिए, परमेश्वर के पास इस तरह के व्यक्ति को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।

यदि तुम वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना और उसके द्वारा प्राप्त किया जाना चाहते हो, तो उसका पहला चरण है, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ना। हर एक चीज़ में, जो तुम करते हो, आत्म-निरीक्षण करो और पूछो : "क्या मैं यह परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हृदय के आधार पर कर रहा हूँ? क्या इसके पीछे मेरे कोई निजी इरादे हैं? इसे करने में मेरा वास्तविक लक्ष्य क्या है?" यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को सौंपना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने हृदय को वश में करना होगा, अपने सभी इरादे छोड़ देने होंगे, और पूरी तरह से परमेश्वर के लिए समर्पित होने की अवस्था हासिल करनी होगी। यह अपना हृदय परमेश्वर को देने के अभ्यास का मार्ग है। अपने हृदय को वश में करने का क्या अभिप्राय है? यह अपनी देह की अनावश्यक इच्छाओं को छोड़ देना है, रुतबे की सुविधाओं और आशीषों का लालच न करना है। यह सब-कुछ परमेश्वर की संतुष्टि के लिए करना है, और अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर के लिए बनाना है, स्वयं के लिए नहीं। इतना काफी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 494

परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम हृदय की गहराई से आता है; यह ऐसा प्रेम है, जिसका अस्तित्व केवल मानव के परमेश्वर के ज्ञान पर आधारित होता है। जब किसी का हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तब उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम होता है, लेकिन वह प्रेम आवश्यक रूप से शुद्ध और आवश्यक रूप से पूरा नहीं होता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति के हृदय के परमेश्वर की तरफ पूरी तरह से मुड़ जाने और उस व्यक्ति में परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके लिए वास्तविक श्रद्धा होने के बीच अब भी कुछ दूरी होती है। जिस तरीके से मनुष्य परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करता है और परमेश्वर के स्वभाव को जान पाता है, वह तरीका अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ना है। जब मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है, तब वह जीवन के अनुभव में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इस तरह से उसका स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, परमेश्वर के लिए उसका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इसलिए जीवन-अनुभव के सही मार्ग पर आने के लिए अपना हृदय परमेश्वर की तरफ मोड़ना ही एकमात्र पूर्व-शर्त है। जब लोग अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देते हैं, तो उनके पास केवल उसके लिए लालायित हृदय ही होता है, परंतु उससे प्रेम करने वाला हृदय नहीं होता, क्योंकि उनके पास उसकी समझ नहीं होती। हालाँकि इस परिस्थिति में उनके पास उसके लिए कुछ प्रेम होता है, लेकिन वह स्वाभाविक और सच्चा नहीं होता। इसका कारण यह है कि मनुष्य की देह से उत्पन्न होने वाली हर चीज़ भावना की पैदाइश होती है और वास्तविक समझ से नहीं आती। यह सिर्फ एक क्षणिक आवेग होता है और वह लंबे समय तक चलने वाली श्रद्धा नहीं बन सकता। जब लोगों में परमेश्वर की समझ नहीं होती, तो वे उससे केवल अपनी पसंद और व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर प्रेम कर सकते हैं; इस प्रकार के प्रेम को स्वाभाविक प्रेम नहीं कहा जा सकता, न ही इसे वास्तविक प्रेम कहा जा सकता है। व्यक्ति का हृदय वास्तविक रूप में परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है, और वह हर चीज़ में परमेश्वर के हितों के बारे में सोचने में सक्षम हो सकता है, लेकिन अगर उसे परमेश्वर की कोई समझ नहीं है, तो वह वास्तविक रूप में स्वाभाविक प्रेम करने में सक्षम नहीं होगा। वह बस कलीसिया के लिए कुछ कार्य पूरे करने और अपने कर्तव्य का थोड़ा पालन करने में सक्षम होता है, लेकिन वह यह बिना आधार के करेगा। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव बदलना मुश्किल है; ऐसे लोग या तो सत्य का अनुसरण नहीं करते, या उसे समझते नहीं। यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति अपने हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ भी लेता है, तो भी इसका यह मतलब यह नहीं कि उसका परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय पूरी तरह से शुद्ध है, क्योंकि जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर है, उनके हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम होना आवश्यक नहीं है। इसका संबंध परमेश्वर की समझ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वालों और प्रयास न करने वालों के बीच के अंतर से है। एक बार जब व्यक्ति को उसके बारे में समझ हो जाती है, तो यह दर्शाता है कि उसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मुड़ गया है, इससे पता चलता है कि उसके हृदय में परमेश्वर के लिए उसका विशुद्ध प्रेम स्वाभाविक प्रेम है। केवल इस तरह के लोगों के हृदय में ही परमेश्वर होता है। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना सही मार्ग पर जाने, परमेश्वर को समझने और परमेश्वर के प्रति प्रेम प्राप्त करने की एक पूर्व-शर्त है। यह परमेश्वर से प्रेम करने का अपना कर्तव्य पूरा करने का चिह्नक (मार्कर) नहीं है, न ही यह उसके लिए वास्तविक प्रेम रखने का चिह्नक (मार्कर) है। व्यक्ति के लिए परमेश्वर के प्रति विशुद्ध प्रेम प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है अपना हृदय उसकी तरफ मोड़ना, जो कि वह पहली चीज़ भी है, जो व्यक्ति को उसकी रचना होने के नाते करनी चाहिए। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी वे लोग हैं जो जीवन की खोज करते हैं, अर्थात् वे लोग, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं; उन सभी में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता होती है और वे उसके द्वारा प्रेरित किए गए होते हैं। वे सब परमेश्वर का मार्गदर्शन पाने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 495

आज, जब तुम लोग परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने की कोशिश करते हो, तो एक ओर तुम लोगों को कठिनाई और शुद्धिकरण सहन करना चाहिए और दूसरी ओर, तुम लोगों को एक क़ीमत चुकानी चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और यह कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जो सबक सीखते हैं, वह यह है कि परमेश्वर से प्रेम कैसे करें। कहने का अर्थ यह है कि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परंतु उससे प्रेम नहीं करते, और तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे भाव से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम व्यर्थ ही जी रहे हो, और तुम्हारा संपूर्ण जीवन सभी जीवों में सबसे अधम है। यदि अपने संपूर्ण जीवन में तुमने कभी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बरबादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर एक खास तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराइयों में असली अंतर्दृष्टि की खोज करनी चाहिए। यदि तुम गाने और नाचने के बारे में उत्साही हो, परंतु सत्य को व्यवहार में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करो, और यह देखने की कोशिश करो कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : जब ऐसा कुछ होता है, जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को एक तरफ़ रख दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज़ नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने आपको एक तरफ़ रखना और देह को सभी चीज़ों में सबसे अधम समझना चाहिए। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक स्वतंत्रता लेता है; यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो, तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगा। जब यह जारी रहता है, लोग देह को और अधिक प्रेम करने लग जाते हैं। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहता है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीज़ों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो, या जिनमें आपा खो देते हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं, और उतना ही अधिक वह ऐयाश बन जाता है, जब तक कि वह उस स्थिति तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ लोगों का देह और अधिक गहरी धारणाओं को आश्रय देता है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है और स्वयं को महिमामंडित करता है, और परमेश्वर के कार्य के बारे में संशयात्मक हो जाता है। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उतनी ही बड़ी देह की कमज़ोरियाँ होती हैं; तुम हमेशा महसूस करोगे कि कोई भी तुम्हारी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता, तुम हमेशा विश्वास करोगे कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, और तुम कहोगे : "परमेश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? वह लोगों का पीछा क्यों नहीं छोड़ देता?" जब लोग देह को संतुष्ट करते हैं, और उससे बहुत अधिक प्यार करते हैं, तो वे अपने आपको बरबाद कर बैठते हैं। यदि तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हो, और देह को संतुष्ट नहीं करते, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह बहुत सही और बहुत अच्छा होता है, और यह कि तुम्हारे विद्रोह के लिए उसका शाप और तुम्हारी अधार्मिकता के बारे में उसका न्याय तर्कसंगत है। कई बार ऐसा होगा, जब परमेश्वर तुम्हें अपने सामने आने के लिए बाध्य करते हुए ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, और तुम्हें तैयार करने के लिए माहौल बनाएगा—और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है, वह अद्भुत है। इस प्रकार तुम ऐसा महसूस करोगे, मानो कोई ज्यादा पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। यदि तुम देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देते हो, और कहते हो कि परमेश्वर अति कर देता है, तो तुम हमेशा पीड़ा का अनुभव करोगे और हमेशा उदास रहोगे, और तुम परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में अस्पष्ट रहोगे, और ऐसा प्रतीत होगा मानो परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों के प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं रखता, और वह मनुष्यों की कठिनाइयों से अनजान है। और इस प्रकार से तुम हमेशा दुःखी और अकेला महसूस करोगे, मानो तुमने बड़ा अन्याय सहा है, और उस समय तुम शिकायत करना आरंभ कर दोगे। जितना अधिक तुम इस प्रकार से देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा दोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर बहुत अति कर देता है, जब तक कि यह इतना बुरा नहीं हो जाता कि तुम परमेश्वर के कार्य को नकार देते हो, और परमेश्वर का विरोध करने लगते हो, और अवज्ञा से भर जाते हो। इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और उसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए : "मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, सम्भावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए भरसक प्रयास करना चाहिए और देह को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।" तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, और अपने आप को एक ओर करोगे, तो तुम ऐसा बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाओगे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने एक साँप देखा, जो सड़क पर बर्फ में जम कर कड़ा हो गया था। किसान ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और साँप ने जीवित होने के पश्चात् उसे डस लिया, जिससे उस किसान की मृत्यु हो गई। मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार उसके जीवन को हानि पहुँचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तुम जीवन पर से अपना अधिकार खो बैठते हो। देह शैतान से संबंधित है। इसके भीतर असंयमित इच्छाएँ हैं, यह केवल अपने बारे में सोचता है, यह आरामतलब है और फुरसत में रंगरलियाँ मनाता है, सुस्ती और आलस्य में धँसा रहता है, और इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करने के बाद तुम अंततः इसके द्वारा खा लिए जाओगे। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे, तो अगली बार यह और अधिक की माँग करने आ जाएगा। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं, और अपने आपको और अधिक पोषित करवाने और उसके सुख के बीच रहने के लिए तुम्हारे द्वारा अपने को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाता है—और यदि तुम इस पर विजय नहीं पाओगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं, और तुम्हारा परम अंत क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे कार्यान्वित करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है, और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार नहीं हो, तुम सत्य को अभ्यास में लाने के लिए तैयार नहीं हो, तुम अपनी देह के विरुद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार नहीं हो, जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हो, तो अंततः तुम अपने आप को बरबाद कर लोगे, और इस प्रकार चरम पीड़ा सहोगे। यदि तुम हमेशा अपनी देह को खुश करते हो, तो शैतान तुम्हें धीरे-धीरे निगल लेगा, और तुम्हें जीवन या पवित्रात्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो जाते। जब तुम अंधकार में रहोगे, तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में अब परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इसलिए, यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें पीड़ा की क़ीमत चुकानी चाहिए और कठिनाई सहनी चाहिए। बाहरी जोश और कठिनाई, अधिक पढ़ने तथा अधिक भाग-दौड़ करने की कोई आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, उन्हें अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रख देना चाहिए : असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित, और उनके स्वयं के विचार, धारणाएँ और प्रेरणाएँ। परमेश्वर की यही इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 496

परमेश्वर द्वारा लोगों के बाहरी स्वभाव से निपटना भी उसके कार्य का एक भाग है; उदाहरण के लिए, लोगों की बाहरी, असामान्य मानवता से, या उनकी जीवनशैली और आदतों, उनके तौर-तरीकों और रीति-रिवाजों, और साथ ही उनके बाहरी अभ्यासों और उनके जोश से निपटना। किंतु जब वह कहता है कि लोग सत्य को अभ्यास में लाएँ और अपने स्वभावों को बदलें, तो प्राथमिक रूप से जिन चीज़ों के साथ निपटा जा रहा है, वे हैं उनके भीतर के इरादे और प्रेरणाएँ। केवल तुम्हारे बाहरी स्वभाव से निपटना कठिन नहीं है; यह तुम्हें उन चीज़ों को खाने से मना करने के समान है जो तुम्हें पसंद हैं, जो कि आसान है। लेकिन जो तुम्हारे भीतर की धारणाओं को छूता है, उसे छोड़ना आसान नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग देह के खिलाफ़ विद्रोह करें, और एक क़ीमत चुकाएँ, और परमेश्वर के सामने कष्ट सहें। ऐसा विशेष रूप से लोगों के इरादों के साथ है। जबसे लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उन्होंने कई ग़लत इरादों को प्रश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारे सभी इरादे सही हैं, किंतु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत-से गलत इरादे हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम पहचान लेते हो कि तुम्हारे इरादे ग़लत हैं, तब यदि तुम अपनी धारणाओं और इरादों के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाते हो, और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो और अपने साथ घटित होने वाली हर बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। जब तुम देह के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान लोगों से अपना अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा, उनसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा और देह के हितों को बनाए रखेगा—किंतु परमेश्वर के वचन भीतर से लोगों को प्रबुद्ध करेंगे और उन्हें रोशनी प्रदान करेंगे, और उस समय यह तुम पर निर्भर करेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो या शैतान का। परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से, उनके उन विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सब के पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि अपने देह से सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किंतु वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। क्योंकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के विपरीत होता है, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शुद्धिकरण सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब-कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीज़ें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का बहुत विद्रोही स्वभाव है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुज़रने के लिए कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना हो, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई सहना चाहता हूँ, और चाहे मैं कितनी भी बड़ी असफलताओं का सामना करूँ, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना संपूर्ण जीवन भी त्यागना पड़े, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए!" इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे, तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, हर बार जब वे शुद्धिकरण से गुज़रते हैं, हर बार जब उन्हें आजमाया जाता है, और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, तो उन्हें चरम पीड़ा सहनी होगी। यह सब लोगों के लिए एक परीक्षा है, और इसलिए इन सबके भीतर एक संघर्ष होता है। यही वह वास्तविक मूल्य है, जो वे चुकाते हैं। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना तथा अधिक दौड़-भाग उस क़ीमत का एक भाग है। यही है, जो लोगों को करना चाहिए, यही उनका कर्तव्य और उनकी ज़िम्मेदारी है, जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, किंतु लोगों को अपने भीतर की उन बातों को एक ओर रखना चाहिए, जिन्हें एक ओर रखे जाने की आवश्यकता है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो चाहे तुम्हारी बाह्य पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हों, और चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न कर लो, सब व्यर्थ रहेगा! कहने का अर्थ है कि, केवल तुम्हारे भीतर के बदलाव ही निर्धारित कर सकते हैं कि तुम्हारी बाहरी कठिनाई का कोई मूल्य है या नहीं। जब तुम्हारा आंतरिक स्वभाव बदल जाता है और तुम सत्य को अभ्यास में ले आते हो, तब तुम्हारी समस्त बाहरी पीड़ाओं को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हो जाएगा; यदि तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो चाहे तुम कितनी भी पीड़ा क्यों न सह लो या तुम बाहर कितनी भी दौड़-भाग क्यों न कर लो, परमेश्वर की ओर से कोई अनुमोदन नहीं होगा—और ऐसी कठिनाई व्यर्थ है जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं है। इसलिए, तुम्हारे द्वारा जो क़ीमत चुकाई गई है, वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित की जाती है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि तुम्हारे भीतर कोई बदलाव आया है या नहीं, और कि परमेश्वर की इच्छा की संतुष्टि, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी प्राप्त करने के लिए तुम सत्य को अभ्यास में लाते हो या नहीं, और अपने इरादों और धारणाओं के विरुद्ध विद्रोह करते हो या नहीं। चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न करो, यदि तुमने कभी अपने इरादों के विरुद्ध विद्रोह करना नहीं जाना, बल्कि केवल बाहरी कार्यकलापों और जोश की खोज करना ही जानते हो, और कभी अपने जीवन पर ध्यान नहीं देते, तो तुम्हारी कठिनाई व्यर्थ रही होगी। यदि, किसी निश्चित परिवेश में, तुम्हारे पास कुछ है जो तुम कहना चाहते हो, किंतु अंदर से तुम महसूस करते हो कि यह कहना सही नहीं है, कि इसे कहने से तुम्हारे भाइयों और बहनों को लाभ नहीं होगा, और यह उन्हें ठेस पहुँचा सकता है, तो तुम इसे नहीं कहोगे, भीतर ही भीतर कष्ट सहना पसंद करोगे, क्योंकि ये वचन परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में अक्षम हैं। उस समय तुम्हारे भीतर एक संघर्ष होगा, किंतु तुम पीड़ा सहने और उस चीज़ को छोड़ने की इच्छा करोगे जिससे तुम प्रेम करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इस कठिनाई को सहने की इच्छा करोगे, और यद्यपि तुम भीतर कष्ट सहोगे, लेकिन तुम देह को बढ़ावा नहीं दोगे, और इससे परमेश्वर का हृदय संतुष्ट हो जाएगा, और इसलिए तुम्हें भी अंदर सांत्वना मिलेगी। यही वास्तव में क़ीमत चुकाना है, और परमेश्वर द्वारा वांछित क़ीमत है। यदि तुम इस तरीके से अभ्यास करोगे, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा; यदि तुम इसे प्राप्त नहीं कर सकते, तो चाहे तुम कितना ही अधिक क्यों न समझते हो, या तुम कितना अच्छा क्यों न बोल सकते हो, यह सब कुछ व्यर्थ होगा! यदि परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर तुम उस समय परमेश्वर की ओर खड़े होने में समर्थ हो, जब वह शैतान के साथ संघर्ष करता है, और तुम शैतान की ओर वापस नहीं जाते, तब तुमने परमेश्वर के लिए प्रेम प्राप्त कर लिया होगा, और तुम अपनी गवाही में दृढ़ खड़े रहे होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 497

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अपने भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, तो तुम्हारे पास ऐसे वचन होंगे जो तुम कहना चाहते हो—ऐसे वचन, जो तुम्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले लगते हैं—किंतु अगर तुम उन्हें न कहो तो तुम्हें भीतर से बेचैनी महसूस होगी, और उस क्षण तुम्हारे भीतर एक संघर्ष शुरू हो जाएगा : "मैं बोलूँ या नहीं?" यही संघर्ष है। इस प्रकार, हर उस चीज़ में, जिसका तुम सामना करते हो, एक संघर्ष है, और जब तुम्हारे भीतर एक संघर्ष चलता है, तो तुम्हारे वास्तविक सहयोग और पीड़ा के कारण, परमेश्वर तुम्हारे भीतर कार्य करता है। अंततः, अपने भीतर तुम मामले को एक ओर रखने में सक्षम होते हो और क्रोध स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है। परमेश्वर के साथ तुम्हारे सहयोग का ऐसा ही प्रभाव होता है। हर चीज़ जो लोग करते हैं, उसमें उन्हें अपने प्रयासों के लिए एक निश्चित क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो। हालाँकि ये बाहर से महत्त्वहीन लग सकती हैं, किंतु जब ये चीज़ें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे, और यदि तुम उसके प्रेम को अभ्यास में नहीं लाए हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, यह कि तुम सत्य से रहित हो, और जीवन से रहित हो, यह कि तुम भूसा हो! लोगों के साथ जो कुछ भी होता है, वह तब होता है जब परमेश्वर को आवश्यकता होती है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहें। भले ही इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ बड़ा घटित न हो रहा हो, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते, किंतु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही का मामला है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि किसी दिन अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ़ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो तुमने गवाही दे दी होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी पूर्णता के माध्यम से तुम उसे संतुष्ट करने और उसकी इच्छा के प्रति सचेत होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को दर्शाते हो कि सबसे कमज़ोर क्षमता के लोगों में उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब किसी में इस समूह के लोगों से अधिक आधार नहीं होता, और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते, लेकिन तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपनी वास्तविक कद-काठी और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल इसी को परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करना माना जाता है। यदि तुम इसमें अक्षम हो, तो तुम अपने परिवार के सदस्यों के बीच, अपने भाइयों और बहनों के बीच, या संसार के अन्य लोगों के सामने गवाही नहीं देते। यदि तुम शैतान के सामने गवाही नहीं दे सकते, तो शैतान तुम पर हँसेगा, वह तुम्हें एक मजाक के रूप, एक खिलौने के रूप में लेगा, वह बार-बार तुम्हें मूर्ख बनाएगा, और तुम्हें विक्षिप्त कर देगा। भविष्य में, महान परीक्षण तुम्हारे ऊपर पड़ेंगे—किंतु आज यदि तुम परमेश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करते हो, और चाहे आगे कितनी भी बड़ी परीक्षाएँ हों, चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी होता जाए, तुम अपनी गवाही में अडिग रहते हो, और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाते हो, तब तुम्हारे हृदय को सांत्वना मिलेगी, और भविष्य में चाहे कितने भी बड़े परीक्षण क्यों न आएँ, तुम निर्भय रहोगे। तुम लोग नहीं देख सकते कि भविष्य में क्या होगा; तुम लोग केवल आज की परिस्थितियों में ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। तुम लोग कोई भी महान कार्य करने में अक्षम हो, और तुम लोगों को वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने के माध्यम से उसे संतुष्ट करने, और एक मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो शैतान के लिए शर्मिंदगी लाती है। यद्यपि तुम्हारी देह असंतुष्ट रहेगी और उसने पीड़ा भुगती होगी, लेकिन तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया होगा और तुम शैतान के लिए शर्मिंदगी लाए होगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने एक मार्ग खोल देगा। किसी दिन जब कोई बड़ा परीक्षण आएगा, तो अन्य लोग गिर जाएँगे, लेकिन तुम तब भी अडिग रहने में समर्थ होगे : तुमने जो क़ीमत चुकाई है, उसकी वजह से परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा, ताकि तुम अडिग रह सको और गिरो नहीं। यदि, साधारणतया, तुम सत्य को अभ्यास में लाने और परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले हृदय से परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो परमेश्वर भविष्य के परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से तुम्हारी सुरक्षा करेगा। यद्यपि तुम मूर्ख और छोटी कद-काठी और कमज़ोर क्षमता वाले हो, तब भी परमेश्वर तुम्हारे खिलाफ भेदभाव नहीं करेगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं। आज, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, जिसमें तुम छोटी से छोटी बात का ध्यान रखते हो, तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, तुम्हारे पास परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करने वाला हृदय है, तुम अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देते हो और यद्यपि कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम नहीं समझ सकते, लेकिन तुम अपने इरादों को सुधारने और परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आ सकते हो, और तुम वह सब-कुछ करते हो, जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए आवश्यक है। हो सकता है कि तुम्हारे भाई और बहन तुम्हारा परित्याग कर दें, किंतु तुम्हारा हृदय परमेश्वर को संतुष्ट कर रहा होगा, और तुम देह के सुख का लालच नहीं करोगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो जब तुम्हारे ऊपर बड़े परीक्षण आएँगे, तुम्हें बचा लिया जाएगा।

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परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 498

लोगों की कौन-सी आंतरिक स्थिति परीक्षणों का लक्ष्य है? उनका लक्ष्य लोगों का विद्रोही स्वभाव है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम है। लोगों के भीतर बहुत-कुछ अशुद्ध है, और बहुत-कुछ पाखंडपूर्ण है, और इसलिए परमेश्वर लोगों को शुद्ध बनाने के लिए उन्हें परीक्षणों का भागी बनता है। किंतु यदि आज तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हारे लिए पूर्णता होंगे। यदि तुम आज परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हें लुभाएँगे, और तुम अनजाने में नीचे गिर जाओगे, और उस समय तुम अपनी सहायता करने में असमर्थ होगे, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य का पालन नहीं कर सकते और तुममें वास्तविक कद-काठी नहीं है। और इसलिए, यदि तुम भविष्य में अडिग रहने में समर्थ होना चाहते हो, तो बेहतर है कि परमेश्वर को संतुष्ट करो, और अंत तक उसका अनुसरण करो। आज तुम्हें एक मजबूत बुनियाद का निर्माण करना चाहिए। तुम्हें सभी चीज़ों में सत्य को अभ्यास में लाकर और उसकी इच्छा के प्रति सावधान रहकर परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे भीतर एक बुनियाद बनेगी, और परमेश्वर तुम्हारे भीतर ऐसे हृदय को प्रेरित करेगा जो परमेश्वर से प्रेम करेगा, और वह तुम्हें विश्वास देगा। किसी दिन जब कोई परीक्षण वास्तव में तुम्हारे ऊपर आ पड़ेगा, तो तुम्हें कुछ पीड़ा का अनुभव अवश्य हो सकता है, और तुम एक निश्चित बिंदु तक व्यथित महसूस कर सकते हो और तीव्र व्यथा से पीड़ित हो सकते हो, मानो तुम मर जाओगे—किंतु परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम नहीं बदलेगा, बल्कि और अधिक गहरा हो जाएगा। परमेश्वर के आशीष ऐसे ही होते हैं। आज परमेश्वर जो कुछ भी कहता और करता है, यदि तुम उसे आज्ञाकारी हृदय से स्वीकारने में समर्थ हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा आशीष दिया जाएगा, और इसलिए तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे, जिसे परमेश्वर द्वारा आशीष दिया जाता है और जिसे उसका वादा प्राप्त होता है। यदि आज तुम अभ्यास नहीं करते, तो जब किसी दिन तुम्हारे ऊपर परीक्षण पड़ेंगे, तो तुम विश्वास या प्रेममय हृदय से रहित होगे, और उस समय परीक्षण प्रलोभन बन जाएँगे; तुम शैतान के प्रलोभनों के बीच डूब जाओगे और तुम्हारे पास बच निकलने का कोई उपाय नहीं होगा। आज जब तुम पर कोई छोटा-सा परीक्षण पड़ता है, तो हो सकता है कि तुम अडिग रहने में समर्थ हो, किंतु किसी दिन जब कोई बड़ा परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएगा, तो ज़रूरी नहीं कि तुम अडिग रहने में समर्थ रहोगे। कुछ लोग दंभी होते हैं, और सोचते हैं कि वे पहले से ही लगभग पूर्ण हैं। यदि तुम ऐसे समय में गहराई से नहीं सोचोगे और आत्मसंतुष्ट बने रहोगे, तो तुम खतरे में पड़ जाओगे। आज परमेश्वर बड़े परीक्षणों के कार्य नहीं करता, और सब-कुछ ठीक दिखाई देता है, किंतु जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करेगा, तो तुम पाओगे कि तुममें बहुत कमियाँ हैं, क्योंकि तुम्हारी कद-काठी बहुत छोटी है, और तुम बड़े परीक्षणों को सहने में अक्षम हो। यदि तुम वैसे ही बने रहते हो, जैसे तुम हो, और निष्क्रियता की अवस्था में रहते हो, तो जब परीक्षण आएँगे, तुम गिर जाओगे। तुम लोगों को अक्सर देखना चाहिए कि तुम लोगों की कद-काठी कितनी छोटी है; केवल इसी तरह से तुम लोग प्रगति करोगे। यदि ऐसा केवल परीक्षण के दौरान होता है कि तुम देखते हो कि तुम्हारी कद-काठी बहुत छोटी है, कि तुम्हारी इच्छाशक्ति बहुत कमज़ोर है, कि तुम्हारे भीतर वास्तविक चीज़ बहुत कम है, और कि तुम परमेश्वर की इच्छा के लिए अपर्याप्त हो—और यदि तुम केवल तभी इन बातों को महसूस करते हो, तो बहुत देर हो जाएगी।

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण कैसे बनाता है, और किन उपायों से वह उन्हें पूर्ण बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे, तो तुम अडिग रहने में असमर्थ होगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका संपूर्ण स्वभाव है, और जब परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाता है, तो वह तुम्हें निश्चित रूप से अपना संपूर्ण स्वभाव दिखाएगा। सृष्टि की रचना के बाद से आज तक, परमेश्वर ने अपना संपूर्ण स्वभाव मनुष्य को कभी नहीं दिखाया है—किंतु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के लिए प्रकट करता है, जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है, और लोगों को पूर्ण बनाने के द्वारा वह अपने स्वभाव को प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाता है। लोगों के लिए परमेश्वर का यही सच्चा प्रेम है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करने के लिए लोगों को अत्यधिक पीड़ा सहना और एक ऊँची क़ीमत चुकाना आवश्यक है। केवल इसके बाद ही वे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाएँगे और परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस दे पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा पर चलना चाहते हैं, और अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह से परमेश्वर को देते हैं, तो उन्हें मृत्यु से भी बदतर कष्ट सहने के लिए अत्यधिक पीड़ा और अपनी परिस्थितियों से कई यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा। अंततः उन्हें परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय वापस देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है या नहीं, यह कठिनाई और शुद्धिकरण के दौरान प्रकट होता है। परमेश्वर लोगों के प्रेम को शुद्ध करता है, और यह भी केवल कठिनाई और शुद्धिकरण के बीच ही प्राप्त किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 499

परमेश्वर में अधिकांश लोगों के विश्वास का सार धर्म से जुड़ा दृढ़ विश्वास है : वे परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ हैं, और केवल एक रोबोट की तरह परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हैं, उनमें परमेश्वर के लिए सच्ची तड़प नहीं होती, और न ही वे उसे बहुत ज्यादा चाहते हैं। वे बस उसका मूक अनुसरण करते हैं। बहुत-से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु बहुत कम लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं; वे केवल परमेश्वर का "आदर" करते हैं क्योंकि वे विनाश से डरते हैं, या फिर वे परमेश्वर की इसलिए "प्रशंसा" करते हैं क्योंकि वह ऊँचा और शक्तिमान है—परंतु उनके आदर और प्रशंसा में प्रेम या सच्ची तड़प नहीं होती। अपने अनुभवों में वे सत्य की अनावश्यक बारीकियाँ या फिर कुछ महत्वहीन रहस्य खोजते हैं। अधिकतर लोग सिर्फ अनुसरण करते हैं, वे आशीष प्राप्त करने के लिए अनाड़ियों की तरह अशांत सागर में मछली का शिकार करते हैं; वे सत्य की खोज नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने के लिए सच्चे अर्थ में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं। परमेश्वर में सभी लोगों के विश्वास का जीवन अर्थहीन है, वह मूल्यविहीन है, और इसमें उनके व्यक्तिगत सोच-विचार और लक्ष्य शामिल रहते हैं; वे परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर से प्रेम करने के उद्देश्य से नहीं, अपितु धन्य होने के लिए करते हैं। कई लोग वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है; वे जो चाहते हैं वही करते हैं और कभी परमेश्वर के हितों का या इस बात का ध्यान नहीं रखते कि वे जो करते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। ऐसे लोग सच्चा विश्वास तक प्राप्त नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति प्रेम तो दूर की बात है। परमेश्वर का सार मनुष्य के विश्वास मात्र के लिए नहीं है; इससे भी बढ़कर यह मनुष्य के प्रेम के लिए है। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह "रहस्य" खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल अपने वास्तविक अनुभवों में ही वे परमेश्वर की सुंदरता को महसूस कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुडने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक झूठ और कल्पना से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति प्रेम उतना वास्तविक नहीं है जितना पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके वास्तविक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान की अपेक्षा हजारों गुना अधिक वास्तविक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी वास्तविक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह वास्तविक है। परमेश्वर वास्तविक कार्य के माध्यम से उसे जानने के लिए लोगों को उत्प्रेरित करता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को इतना चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिए परमेश्वर मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 500

परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाने के लिए वास्तविकता और तथ्यों के उद्भव का उपयोग करता है; परमेश्वर के वचन उसके द्वारा लोगों को पूर्ण बनाए जाने के एक हिस्से को पूरा करते हैं, और यह मार्गदर्शन तथा राह खोलने का कार्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के वचनों में तुम्हें अभ्यास का मार्ग और दर्शनों का ज्ञान ढूँढ़ना चाहिए। इन बातों को समझने से मनुष्य के पास अपने वास्तविक अभ्यास में एक मार्ग होगा, और दर्शन होंगे, और वह परमेश्वर के वचनों के माध्यम से प्रबुद्धता प्राप्त कर पाएगा; वह समझ पाएगा कि ये चीजें परमेश्वर से आई हैं और वह बहुत कुछ पहचान पाएगा। यह समझ लेने के बाद मनुष्य को तुरंत इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, और अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसके वचनों का उपयोग करना चाहिए। परमेश्वर सारी बातों में तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें अभ्यास का मार्ग देगा, और तुम्हें महसूस करवाएगा कि वह विशेष रूप से सुंदर है, और तुम्हें यह देखने देगा कि तुममें परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अभीष्ट तुम्हें पूर्ण बनाना है। यदि तुम परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हो, यदि तुम उसका प्रेम सच में अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविकता की गहराई में जाना चाहिए, तुम्हें वास्तविक जीवन की गहराई में जाना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर जो भी करता है वह सब प्रेम और उद्धार है, कि वह सब कुछ इसलिए करता है ताकि जो भी अशुद्ध है लोग उसे पीछे छोड़ पाएँ, और मनुष्य के भीतर परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर पाने वाली चीजों को शुद्ध कर पाएँ। परमेश्वर मनुष्य को पोषण प्रदान करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; वह लोगों के अनुभव के लिए वास्तविक जीवन की परिस्थितियाँ सँजोता है, और यदि लोग परमेश्वर के अनेक वचनों को खाते और पीते हैं, और फिर जब वे उन्हें वास्तव में अभ्यास में लाते हैं, तब वे परमेश्वर के अनेक वचनों का उपयोग करके अपने जीवन की सभी कठिनाइयाँ हल कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की गहराई में जाने के लिए तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन होने चाहिए; यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो और परमेश्वर के कार्य से वंचित हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी खाओगे और पीओगे नहीं, तो जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम भौंचक्के रह जाओगे। तुम बस इतना जानते हो कि तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, लेकिन तुम भेद कर पाने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास अभ्यास का मार्ग नहीं है; तुम मंदबुद्धि और भ्रमित हो, और कभी-कभी तुम यह तक मान लेते हो कि देह को संतुष्ट करके तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हो—यह सब परमेश्वर के वचनों को न खाने और पीने का ही परिणाम है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि तुम परमेश्वर के वचनों की मदद के बिना हो, और वास्तविकता के भीतर बस टटोलते भर हो, तो तुम अभ्यास का मार्ग खोजने में मूलतः असमर्थ हो। ऐसे लोग समझते ही नहीं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, परमेश्वर से प्रेम करने का अर्थ तो वे और भी नहीं समझते। यदि परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन का उपयोग करके तुम प्रायः प्रार्थना, खोजबीन और तलाश करते हो, और इसके माध्यम से तुम उसका पता लगाते हो जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के लिए अवसरों को ढूँढ़ पाते हो, परमेश्वर के साथ सचमुच सहयोग करते हो, और मंदबुद्धि तथा भ्रमित नहीं हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास एक मार्ग होगा और तुम परमेश्वर को सच में संतुष्ट कर पाओगे। जब तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा, तब तुम्हारे भीतर परमेश्वर का मार्गदर्शन होगा और तुम परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से धन्य किए जाओगे, जो तुम्हें आनंद की अनुभूति देगा : तुम विशेष रूप से सम्मानित महसूस करोगे कि तुमने परमेश्वर को संतुष्ट किया है, तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे, और तुम्हारा हृदय शुद्ध और शांत होगा। तुम्हारी अंतरात्मा को सुकून मिलेगा और वह दोषारोपणों से मुक्त होगी, और जब तुम अपने भाइयों और बहनों को देखोगे तो मन में प्रसन्नता महसूस करोगे। परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने का यही अर्थ है, और केवल यही परमेश्वर का सचमुच आनंद लेना है। लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रेम का आनंद अनुभव के माध्यम से प्राप्त किया जाता है : कष्ट का अनुभव करके, और सत्य को अभ्यास में लाने का अनुभव करके, वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं। यदि तुम केवल कहते हो कि परमेश्वर तुमसे वास्तव में प्रेम करता है, कि परमेश्वर ने लोगों की ख़ातिर सचमुच भारी मूल्य चुकाया है, कि उसने धैर्यपूर्वक और कृपापूर्वक इतने सारे वचन कहे हैं और वह हमेशा लोगों को बचाता है, तो तुम्हारे द्वारा इन शब्दों को कहा जाना परमेश्वर के आनंद का बस एक पक्ष है। तथापि इससे भी अधिक बड़ा आनंद—वास्तविक आनंद—तब है जब लोग अपने वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाते हैं, जिसके बाद वे अपने हृदय में शांत और शुद्ध महसूस करते हैं। वे अपने भीतर बहुत ही द्रवित महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर सर्वाधिक प्रेम करने योग्य है। तुम महसूस करोगे कि जो कीमत तुमने चुकाई है, वह सर्वथा उपयुक्त है। अपने प्रयासों में भारी कीमत चुकाने के बाद तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे : तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले रहे हो और तुम यह समझ जाओगे कि परमेश्वर ने लोगों में उद्धार का कार्य किया है, कि उसके द्वारा लोगों के शुद्धिकरण का अभीष्ट उन्हें शुद्ध करना है, और परमेश्वर यह परखने के लिए कि लोग उसे सचमुच प्रेम करते हैं या नहीं, उनकी परीक्षा लेता है। यदि तुम हमेशा सत्य को इस तरह अभ्यास में लाते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के बहुत-से कार्य का स्पष्ट ज्ञान विकसित कर लोगे, और उस समय तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन तुम्हारे सामने शीशे की तरह साफ हैं। यदि तुम कई सत्य स्पष्ट रूप से समझ सकते हो, तो तुम महसूस करोगे कि सभी विषयों को अभ्यास में लाना आसान है, कि तुम किसी भी विषय पर विजय पा सकते हो और किसी भी प्रलोभन पर विजय पा सकते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है, जो तुम्हें अत्यधिक मुक्त कर देगा और स्वतंत्र कर देगा। इस क्षण तुम परमेश्वर के प्रेम का आनंद ले रहे होगे और परमेश्वर का सच्चा प्रेम तुम तक पहुँच गया होगा। परमेश्वर उन्हें धन्य करता है जिनके पास दर्शन होते हैं, जिनके पास सत्य होता है, जिनके पास ज्ञान होता है, और जो उससे सचमुच प्रेम करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हैं, तो उन्हें वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाना होगा, उन्हें पीड़ा सहने और जिससे वे प्यार करते हैं उसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए त्याग देने के लिए तैयार रहना होगा, और आँखों में आँसू होने के बावजूद उन्हें परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना होगा। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें निश्चित रूप से धन्य करेगा, और यदि तुम ऐसे कष्ट सहोगे, तो इसके बाद पवित्र आत्मा का कार्य शुरू होगा। वास्तविक जीवन के माध्यम से, और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के माध्यम से लोग परमेश्वर की सुंदरता को देख पाने में सक्षम होते हैं, और यदि उन्होंने परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखा है, तभी वे सचमुच उससे प्रेम कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 501

तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक सत्य तुम्हारे पास होता है; तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे पास होता है; और तुम जितना अधिक सत्य को अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हो। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें उत्तरोत्तर देखने में सक्षम बनाएगा, ठीक वैसे ही जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाई हैं, बल्कि, इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को उत्तराधिकार में अपना प्रेम देने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : "क्या स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते और चलते-फिरते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें तो लोगों का प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें उसे वास्तविक जीवन में खोजना और ढूँढ़ना चाहिए और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। ऐसे भी अवसर हो सकते हैं जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट न कर पाओ। वह इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें अधिक प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों की सृष्टि कर सकता है, कि वह देहधारी हुआ ही इसलिए है कि लोग वास्तव में उसे देख सकें और वास्तव में उसके साथ जुड़ सकें; तुम देखोगे कि वह मनुष्यों के बीच चलने में सक्षम है, और उसका पवित्र आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उन्हें अपनी सुंदरता देखने और अपना अनुशासन, अपनी ताड़ना और अपने आशीष अनुभव करने दे सकता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम डाँट-फटकार झेल पाओगे और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें छोड़ देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा छोड़े जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हारे मन में ये भावनाएँ आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 502

लोग प्रायः परमेश्वर को ही अपना जीवन समझने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, कि तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, और तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो, इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़कर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास का लक्ष्य पा लिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, और जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा पर्याप्त निकट संबंध होगा, तब वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम होगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।" यही लोगों की सच्ची कद-काठी है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्हें हमेशा लगता है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। इस तरह, तुमने वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर लिया होगा, और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तब तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करोगे, और यह एक विलक्षण, विशुद्ध प्रेम होगा। एक दिन, जब तुम्हारे अनुभव ऐसे होंगे कि तुम्हारा जीवन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच चुका होगा, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, और परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तब तुम अंदर से परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, न ही तुम उसे चाहकर भी भूल पाओगे। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल सकते हो, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल सकते हो, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा, यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। जब परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तब किसी भी दूसरे के प्रति उनका प्रेम परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम के बराबर नहीं होता; परमेश्वर से उनका प्रेम सबसे पहले आता है। इस तरह तुम अन्य सब कुछ छोड़ पाते हो, और परमेश्वर से सारे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार करने के इच्छुक होते हो। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 503

ज्यों ही परमेश्वर लोगों के भीतर जीवन बन जाता है, लोग परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ हो जाते हैं। क्या यह परमेश्वर का कर्म नहीं है? इससे बड़ी कोई गवाही नहीं है! परमेश्वर ने एक निश्चित बिंदु तक कार्य किया है; उसने लोगों के लिए कहा है कि सेवा करें, ताड़ित हों या मर जाएँ, और लोग पीछे नहीं हटे हैं, जो यह दिखाता है कि वे परमेश्वर द्वारा जीत लिए गए हैं। जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवनयापन करना और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवनयापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन संप्रेषित करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा कह पाते हो, वास्तविकता संप्रेषित कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम अपनी वाणी में खरे हो, तुम शालीन और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं हो और मर्यादित हो, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कर पाते हो और जब तुम पर कुछ बीतती है तब तुम अपनी गवाही पर दृढता से डटे रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब उन्होंने एक निश्चित बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तो उनमें परमेश्वर के प्रति एक अंतर्दृष्टि होगी, और उनका बाहरी स्वभाव भी स्थिर हो जाएगा। बहुत-से लोग सत्य को व्यवहार में नहीं लाते और अपनी गवाही पर डटे नहीं रहते। ऐसे लोगों में परमेश्वर का प्रेम, या परमेश्वर की गवाही नहीं होती, और यही वे लोग हैं जिनसे परमेश्वर सर्वाधिक घृणा करता है। वे सभाओं में परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, परंतु वे जिसे जीते हैं वह शैतान है, और यह परमेश्वर का अनादर करना, परमेश्वर की झूठी निंदा करना, और परमेश्वर की ईशनिंदा करना है। ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रेम का कोई चिन्ह नहीं होता, और उनमें पवित्र आत्मा का बिलकुल भी कोई कार्य नहीं होता। ऐसे लोगों के शब्द और कृत्य शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि परमेश्वर के सामने तुम्हारा हृदय सदैव शांत रहता है, और तुम हमेशा अपने आसपास के लोगों और चीजों और अपने चारों ओर जो चल रहा है उस पर ध्यान देते हो, और यदि तुम परमेश्वर के दायित्व के प्रति सचेत हो, और तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर का आदर करता है, तो परमेश्वर अक्सर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करेगा। कलीसिया में ऐसे लोग हैं जो "पर्यवेक्षक" हैं : वे दूसरों की विफलताओं पर नजर रखते हैं, और फिर उनकी नकल और उनका अनुकरण करते हैं। वे भेद कर पाने में अक्षम होते हैं, वे पाप से घृणा नहीं करते और शैतान की चीजों के प्रति घृणा या जुगुप्सा महसूस नहीं करते। ऐसे लोग शैतान की चीजों से भरे होते हैं, और वे अंतत: परमेश्वर द्वारा पूरी तरह त्याग दिए जाएँगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने सदा श्रद्धावान होना चाहिए, तुम्हें अपने शब्दों और कार्यों में संयत होना चाहिए और कभी परमेश्वर का विरोध करने या उसे परेशान करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें कभी भी अपने भीतर परमेश्वर के कार्य को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए, या तुमने जो कष्ट झेले हैं और जो कुछ अपने अभ्यास में खपाया है, उस सबको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। तुम्हें आगे के मार्ग पर अधिक परिश्रम करने और परमेश्वर से अधिक प्रेम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ये वे लोग हैं जिनके पास अपनी नींव के रूप में एक दर्शन है। ये वे लोग हैं जो प्रगति की कामना करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 504

यदि लोग परमेश्वर का आदर करने वाले हृदय के साथ परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके वचनों को अनुभव करते हैं, तो ऐसे लोगों में परमेश्वर का उद्धार और परमेश्वर का प्रेम देखा जा सकता है। ये लोग परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं; वे सत्य को जीते हैं, और जिसकी वे गवाही देते हैं, वह भी सत्य, परमेश्वर का स्वरूप और परमेश्वर का स्वभाव ही होता है। वे परमेश्वर के प्रेम के मध्य में रहते हैं और वे परमेश्वर का प्रेम देख चुके हैं। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुंदरता का स्वाद चखना चाहिए और परमेश्वर की सुंदरता को देखना चाहिए; केवल तभी उनमें परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय जागृत हो सकता है, एक ऐसा हृदय जो लोगों को अपना सर्वस्व निष्ठापूर्वक परमेश्वर के लिए देने को प्रेरित करता है। परमेश्वर लोगों को वचनों और अभिव्यक्तियों के माध्यम से, या उनकी कल्पना के माध्यम से अपने से प्रेम नहीं कराता, और न ही वह अपने से प्रेम करने के लिए उन्हें बाध्य करता है। इसकी बजाय वह उन्हें उनकी इच्छा से अपने से प्रेम करने देता है, और वह अपने कार्य और कथनों में उन्हें अपनी सुंदरता को देखने देता है, जिसके बाद उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम जन्म लेता है। केवल इसी तरह लोग सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो इसलिए नहीं कि दूसरों ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग होता है। वे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी सुंदरता देखी है, उन्होंने देखा है कि उसमें कितना कुछ है जो लोगों के प्रेम के योग्य है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उद्धार, बुद्धि और आश्चर्यजनक कर्म देखे हैं—और परिणामस्वरूप, वे सचमुच परमेश्वर का गुणगान करते हैं, और सचमुच उसके लिए तड़पते हैं, और उनमें ऐसा जुनून उत्पन्न हो जाता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते। जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे उसकी शानदार गवाही इसलिए दे पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार नहीं, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी वास्तविकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, वह वास्तविक होती है और उसका महत्व एवं मूल्य वास्तविक होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है, और केवल वही लोग क्यों परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, इसका कारण यह है कि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं, और केवल वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कर पाते हैं। वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के अंतरंग हैं; वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, और वे परमेश्वर के साथ आशीषों का आनंद ले सकते हैं। केवल ऐसे लोग ही अनंत काल तक जीवित रहेंगे, और केवल वे ही हमेशा के लिए परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है, और वह सभी लोगों द्वारा प्रेम किए जाने योग्य है, परंतु सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, और न ही सभी लोग परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और परमेश्वर के सामर्थ्य में सहभागी हो सकते हैं। चूँकि परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग ही परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित कर पाते हैं, इसलिए वे स्वर्ग के नीचे कहीं भी घूम सकते हैं और कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, और वे पृथ्वी पर शक्ति का प्रयोग और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन कर सकते हैं। ये लोग दुनिया भर से एक-साथ आए हैं। वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी त्वचा के रंग भिन्न-भिन्न हैं, परंतु उनके अस्तित्व का समान अर्थ है; उन सबके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय है, वे सब एक ही गवाही देते हैं, और उनका एक ही संकल्प और एक ही इच्छा है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे समूचे संसार में कहीं भी स्वतंत्रता से घूम सकते हैं; और जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे संपूर्ण ब्रह्मांड में यात्रा कर सकते हैं। वे लोग परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए गए लोग हैं, और वे सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 505

आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर किया है, उस सबके बारे में तुम कितना जानते हो? ये वे बातें हैं जो तुम्हें सीखनी चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो जो कुछ उसने मनुष्य में किया और जो कुछ उसने मनुष्य को देखने की अनुमति दी, वह इसलिए था कि मनुष्य उससे प्रेम करे और सही मायने में उसे जाने। मनुष्य यदि परमेश्वर के लिए कष्ट सहने योग्य है और यहाँ तक आ पाया है, तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है, दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण; इससे बढ़कर, यह न्याय और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य में कार्यान्वित किए हैं। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षण से रहित हो, और यदि परमेश्वर ने तुम्हें कष्ट नहीं दिया है, तो सच यह है कि तुम लोग परमेश्वर से सच में प्रेम नहीं करते। मनुष्य में परमेश्वर का काम जितना बड़ा होता है, और जितने अधिक मनुष्य के कष्ट होते हैं, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक उस मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर पाता है। तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना―और इसके अलावा यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती―तो क्या तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर पाते? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाली परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी कमियों को जान पाता है और देख पाता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निकृष्ट है, और उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, उसके परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो असहनीय हो जाती है—मिटा कर रख देने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के सार को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियों को और इस बात को जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। इस प्रकार, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है। शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को सफल नहीं माना जा सकता। परमेश्वर ने अनुग्रह के कार्य के एक चरण को देह में पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें पहले ही प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। मनुष्य अपने अनुभवों में परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह, उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं, और मनुष्य के भीतर के भ्रष्ट तत्वों को प्रकट करने में भी असमर्थ हैं, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, न उसके प्रेम और विश्वास को पूर्ण बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए उसके अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 506

आज अधिकांश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी संभावनाएं बहुत धूमिल होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तो हर प्रकार के कष्ट से तुम्हारा सामना होगा—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, तुम्हारा शोधन किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे और हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत बड़ी है, यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सारी वजहों से तुम्हें परिशुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से परिशुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसकी कृपा पर बने रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है। जब शैतान तुम्हें लुभाता है तो तुम्हें यह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम की ताकत भी उतनी ही अधिक होगी; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़-निश्चय होगा, और तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर को प्रेम करने में बिताए गए जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अगर मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है तो वह शोक से रहित होगा। यद्यपि ऐसा समय भी होता है जब तुम्हारी देह निर्बल पड़ जाती है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम्हें घेर लेती हैं, ऐसे समय में तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा के भीतर तुम राहत महसूस करोगे, और एक निश्चितता का अनुभव करोगे, महसूस करोगे कि तुम्हारे पास कुछ है जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो। इस तरह, तुम कई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम अपनी यंत्रणा के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; बल्कि तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना, संगति करना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सारे लोग, सारी वस्तुएँ और चीजें जो परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन चीजों पर भी तुम दृष्टि डालते हो वे सब तुम्हारे लिए दुःखद होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुखद नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम स्वाधीन नहीं बल्कि पतित होगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कि तुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत ही अन्यायपूर्ण है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का बहुत सामर्थ्य देंगे। परमेश्वर द्वारा कही गई सारी बातें मनुष्य पूरी कर सकता है, और वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम है—वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम का प्रयोग करना है; समय की परवाह किए बिना—तब भी जब दूसरे लोग सामर्थ्यहीन हैं—तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक आध्यात्मिक कद है। तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना बड़ा है, इस पर कि क्या तुम परीक्षण किए जाने पर अडिग खड़े रह सकते हो, क्या तुम किसी खास परिस्थिति में होने पर कमजोर पड़ जाते हो, और क्या तुम स्थिर रह सकते हो जब तुम्हारे भाई और बहन तुम्हें ठुकरा देते हैं; इन बातों का परिणाम तुम्हें दिखाएगा कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कैसा है। परमेश्वर के अधिकांश कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य से प्रेम करता है, बस मनुष्य की आत्मा की आँखों का पूरी तरह से खुलना अभी बाक़ी है, और वह परमेश्वर के अधिकांश कार्य को, और परमेश्वर की इच्छा को, और उन बहुत से कार्यों को देखने में असमर्थ है जो परमेश्वर के प्रेम से जुड़े हैं; मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम बहुत कम है। तुमने इस पूरे समय के दौरान परमेश्वर पर विश्वास किया है, और आज परमेश्वर ने बच निकलने के सारे मार्ग बंद कर दिए हैं। वास्तव में कहें तो, तुम्हारे पास सही मार्ग अपनाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, उस सही मार्ग को जिस पर तुम्हें परमेश्वर द्वारा अपने कठोर न्याय और सर्वोच्च उद्धार के माध्यम लाया गया है। मुश्किलों और शोधन का अनुभव करने के बाद ही मनुष्य जान पाता है कि परमेश्वर प्रेमयुक्त है। आज तक इसका अनुभव करने के बाद कहा जा सकता है कि मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता के एक भाग को जान गया है—परंतु यह अभी भी अपर्याप्त है, क्योंकि मनुष्य में बहुत सारी कमियाँ हैं। उसे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों का और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित कष्टों के शोधन का और अधिक अनुभव करना आवश्यक है। केवल तभी मनुष्य का जीवन स्वभाव बदल सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 507

तुम सभी परीक्षण और शुद्धिकरण के बीच हो। शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद लोग परमेश्वर को सच्ची स्तुति अर्पित कर पाते हैं, और शुद्धिकरण के दौरान वे यह देख सकते हैं कि उनमें बहुत कमी है। जितना बड़ा तुम्हारा शुद्धिकरण होता है, उतना ही अधिक तुम देह-सुख त्याग सकते हो; जितना बड़ा लोगों का शुद्धिकरण होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम होता है। तुम लोगों को यह बात समझनी चाहिए। लोगों का शुद्धिकरण क्यों किया जाना चाहिए? इसका लक्ष्य क्या परिणाम प्राप्त करना है? मनुष्य में परमेश्वर के शुद्धिकरण के कार्य का क्या अर्थ है? यदि तुम सच में परमेश्वर को खोजते हो, तो एक ख़ास बिंदु तक उसके शुद्धिकरण का अनुभव कर लेने पर तुम महसूस करोगे कि यह बहुत अच्छा और अत्यंत आवश्यक है। शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शुद्धिकरण को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने उस हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, जो उससे प्रेम करता है, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है, और मैं चाहता हूँ कि तू अपना और अधिक प्रेम मेरे भीतर निवेश कर।" यह शुद्धिकरण के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम का नींव के रूप में प्रयोग करो, तो शुद्धिकरण तुम्हें परमेश्वर के और निकट ला सकता है और तुम्हें परमेश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ बना सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर पर चढ़ा दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शुद्धिकरण के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर को नकारना या त्यागना असंभव होगा। इस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले से अधिक घनिष्ठ और पहले से अधिक सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा समागम पहले से अधिक नियमित हो जाएगा। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रकाश में और अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम पर आ पड़ेंगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर की गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। परमेश्वर की गवाही देकर तुम सच में उससे प्रेम करोगे, और ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर दोगे; तुम परमेश्वर के गवाह होगे, और परमेश्वर के प्रिय व्यक्ति होगे। वह प्रेम, जिसने शुद्धिकरण का अनुभव किया हो, मज़बूत होता है, कमज़ोर नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कब और कैसे तुम्हें अपने परीक्षणों का भागी बनाता है, तुम इस बात की चिंता नहीं करोगे कि तुम जीओगे या मरोगे, तुम ख़ुशी-ख़ुशी परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग दोगे, और परमेश्वर के लिए कोई भी बात ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लोगे—इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा, और तुम्हारा विश्वास वास्तविक होगा। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 508

यदि लोग शैतान के प्रभाव में आ जाते हैं, तो उनके भीतर परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं रहता, और उनके पिछले दर्शन, प्रेम और संकल्प लुप्त हो जाते हैं। लोग महसूस किया करते थे कि उनसे परमेश्वर के लिए दुःख उठाना अपेक्षित है, परंतु आज वे ऐसा करना निंदनीय समझते हैं, और उनके पास शिकायतों की कोई कमी नहीं होती। यह शैतान का कार्य है; इस बात का संकेत कि मनुष्य शैतान के अधिकार-क्षेत्र में गिर चुका है। यदि तुम्हारे सामने यह स्थिति आ जाए, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और जितनी जल्दी हो सके, उसे उलट देना चाहिए—यह तुम्हें शैतान के हमलों से बचाएगा। कड़वे शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य बड़ी आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपनी इच्छा जगानी चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शुद्धिकरण करे, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और उसके साथ समागम की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतने ही अधिक नकारात्मक तुम बन जाओगे और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हारे लिए अपना कार्य करना आवश्यक होता है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से पूरा न करो, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने में परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम से अधिक किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है, या यह कि तुमने ख़राब किया है—तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम दंभी नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो : "हे परमेश्वर! मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मुझे सहन करें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा अंत:करण शुद्ध हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ, और यद्यपि मैं मूढ़ और मूर्ख हूँ, और मुझमें क्षमता की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू मनोहर है, और मैं वह सब-कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।" जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम उमड़ पड़ता है, और तुम अपने हृदय में बहुत अधिक राहत महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। जब तुम इसका अनुभव करोगे, तो तुम दो बार असफल होगे और एक बार सफल होगे, या पाँच बार असफल होगे और दो बार सफल होगे, और जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तो केवल असफलता के बीच ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को देख पाओगे और खोज पाओगे कि तुममें क्या कमी है। जब तुम अगली बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हो, तो तुम्हें अपने आपको सावधान करना चाहिए, अपने क़दमों को संतुलित करना चाहिए, और अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। धीरे-धीरे तुम ऐसी परिस्थितियों में विजय प्राप्त करने की योग्यता विकसित कर लोगे। जब ऐसा होता है, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं। जब तुम देखते हो कि तुम इस बार सफल रहे हो, तो तुम भीतर से आभारी रहोगे, और जब तुम प्रार्थना करोगे, तो तुम परमेश्वर को महसूस कर पाओगे, और यह भी कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति ने तुम्हें छोड़ा नहीं है—केवल तभी तुम जानोगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर कैसे कार्य करता है। इस प्रकार से किया जाने वाला अभ्यास तुम्हें अनुभव करने का मार्ग प्रदान करेगा। यदि तुम सत्य को अभ्यास में नहीं लाओगे, तो तुम अपने भीतर पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित रहोगे। परंतु यदि तुम चीज़ों का, जैसी वे हैं, उसी रूप में सामना करते हुए सत्य को अभ्यास में लाते हो, तो भले ही तुम भीतर से आहत हो, फिर भी पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ रहेगा, उसके बाद जब तुम प्रार्थना करोगे तो परमेश्वर की उपस्थिति महसूस कर पाओगे, तुममें परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का सामर्थ्य होगा, और अपने भाइयों और बहनों के साथ समागम के दौरान तुम्हारे अंत:करण पर कोई बोझ नहीं होगा, और तुम शांति महसूस करोगे, और इस तरह से तुम वह प्रकाश में ला पाओगे, जो तुमने किया है। दूसरे चाहे कुछ भी कहें, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रख पाओगे, तुम दूसरों द्वारा विवश नहीं किए जाओगे, तुम सब चीज़ों से ऊपर उठ जाओगे—और इसमें तुम दर्शा पाओगे कि तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कारगर रहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 509

परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की यातना उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से गुजरने और इस कदम पर निर्भर रहने के माध्यम से ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे। शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया और वह कई दर्दनाक अग्निपरीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शुद्धिकरण परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम एक तरह से परमेश्वर से प्रेम करने के अपने संकल्प के कारण रख पाया; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शुद्धिकरण और पीड़ा के कारण था, जिसमें से वह होकर गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक और ऐसी चीज़ बन गई, जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शुद्धिकरण की पीड़ा से नहीं गुजरते, तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और मूलत: परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदय में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, और भले ही उनके विचार पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित और मानवीय विचारों से रहित प्रतीत होते हैं, परंतु जब उनके विचार परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं, तो वह ऐसे विचारों को प्रशंसा या आशीष नहीं देता। यहाँ तक कि जब लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे उन सबको जान जाते हैं—तो इसे भी परमेश्वर से प्रेम करने का संकेत नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शुद्धिकरण से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शुद्धिकरण के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ जान सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उपयुक्त रूप से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय भ्रष्टता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी से हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, और कि वे शुद्धिकरण के दौरान अधिक कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 510

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का व्यवहार देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शुद्धिकरण, और साथ ही उसके न्याय, व्यवहार और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी तरह से परमेश्वर उन लोगों में शुद्धिकरण का कार्य करता है, जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर को पाने की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शुद्धिकरण से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य के समान स्वभाव रखना असंभव है, और इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शुद्धिकरण या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी पूर्ण नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शुद्धिकरण कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शुद्धिकरण के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धर्मी स्वभाव स्पष्ट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक वास्तविक काट-छाँट और व्यवहार प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से वह मनुष्य को अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान देता है, और उसे परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा और शुद्ध प्रेम प्राप्त करने देता है। शुद्धिकरण का कार्य करने में परमेश्वर के ये लक्ष्य हैं। उस समस्त कार्य के, जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, अपने लक्ष्य और अपना अर्थ होता है; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता, और न ही वह ऐसा कार्य करता है, जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शुद्धिकरण का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना है। बल्कि इसका अर्थ है शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना, और उसके पूरे जीवन को बदलना। शुद्धिकरण मनुष्य की वास्तविक परीक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का एक रूप है, और केवल शुद्धिकरण के दौरान ही उसका प्रेम अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 511

यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें अवश्य परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए, सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें उन बातों को अवश्य समझना चाहिए जिनका तुम्हें अनुभव करना चाहिए। यदि तुम केवल व्यवहार किए जाने, अनुशासित किए जाने और न्याय का ही अनुभव करते हो, यदि तुम केवल परमेश्वर का आनन्द लेने में ही समर्थ हो, परन्तु जब परमेश्वर तुम्हें अनुशासित कर रहा हो या तुम्हारे साथ निपट रहा हो तब तुम उसका अनुभव करने में असमर्थ हो, तो यह स्वीकार्य नहीं है। शायद शुद्धिकरण के इस उदाहरण में तुम अपनी स्थिति बनाए रखने में समर्थ हो, तब भी यह पर्याप्त नहीं है, तुम्हें अवश्य आगे बढ़ते रहना चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने का पाठ कभी रुकता नहीं है, और इसका कोई अंत नहीं है। लोग परमेश्वर पर विश्वास करने की बात को बहुत ही साधारण समझते हैं, परन्तु एक बार जब उन्हें कुछ व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो जाता है, तो उन्हें एहसास होता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना, उतना आसान नहीं है जितना लोग कल्पना करते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक मनुष्य का शुद्धिकरण होगा, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होगा, और परमेश्वर की शक्ति उसमें उतनी ही अधिक प्रकट होगी। इसके विपरीत, मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होगी। एक व्यक्ति का शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा जितनी अधिक यातना वो सहता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होगा एवं परमेश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक सच्चा होगा, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहन होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि जो शुद्धि पाते हुए अत्यधिक दर्द सहते हैं, जिनके साथ काफी निपटारा तथा अनुशासन का व्यवहार किया जाता है, और तुम देखोगे कि यही लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं तीक्ष्ण ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने निपटारा किए जाने का अनुभव नहीं किया है, जिनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और जो केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने निपटारा किए जाने का अनुभव किया है और अनुशासित किए गए हैं, तो वे परमेश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने और तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ होता है, और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार कार्य नहीं किया, तो उसका कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चुनेगा और प्राप्त करेगा, वह उन्हें अंत के दिनों में पूर्ण बनाएगा; इसमें असाधारण महत्व है। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धि के बारे में समझने में तुम लोग समर्थ होते हो और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर की 6,000 साल की प्रबंधन योजना का अंत हो जाएगा। क्या यह इतनी आसानी से समाप्त हो सकती है? एक बार जब वह मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो क्या उसका कार्य पूरा हो जाएगा? क्या यह इतना आसान हो सकता है? लोग वास्तव में कल्पना करते हैं कि यह इतना ही सरल है, परन्तु परमेश्वर जो करता है वह इतना आसान नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम परमेश्वर के कार्य के कौन-से भागका उल्लेख करते हो, मनुष्य के लिए सब कुछ अथाह है। यदि तुम इसे मापने के योग्य होते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाता। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अथाह है; यह तुम्हारी धारणाओं से पूरी तरह विपरीत है, और यह तुम्हारी धारणाओं से जितना ज़्यादा असंगत होता है, उतना ही ज़्यादा यह दर्शाता है कि परमेश्वर का कार्य अर्थपूर्ण है; यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज, तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और तुम्हें यह जितना अधिक अद्भुत महसूस होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। यदि उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और बेपरवाही से कार्य किए होते, और उसके बाद कुछ नहीं किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य के महत्व को देखने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है; और इसलिए ऐसी कठिनाईयों से गुज़रना तुम लोगों के लिए सर्वथा आवश्यक है। आज, तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु बाद में तुम सचमुच में परमेश्वर के कार्यों को देखने में सक्षम होगे, और अंततः तुम कहोगे : "परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!" तुम्हारे हृदय में ये वचन होंगे। कुछ समय के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद (सेवा करने वालों की परीक्षा और ताड़ना का समय), अंततः कुछ लोगों ने कहा : "परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!" यह तथ्य कि वे "वास्तव में कठिन" इन शब्दों का प्रयोग करते हैं दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? इस कारण तुम कहोगे : "परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है! वह बहुत प्यारा है!" यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रने के बाद, तुम ऐसे शब्दों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने स्वयं में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है। एक दिन, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने के लिए विदेश में होते हो और कोई तुमसे पूछता है : "परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास कैसा चल रहा है?" तो तुम यह कहने में सक्षम होगे : "परमेश्वर के कार्य बहुत ही अद्भुत हैं!" वे महसूस करेंगे कि तुम्हारे वचन वास्तविक अनुभवों के बारे में बोलते हैं। यही वास्तव में गवाही देना है। तुम कहोगे कि परमेश्वर का कार्य बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण है, और तुममें उसके कार्य ने वास्तव में तुम्हें आश्वस्त कर दिया है और तुम्हारे हृदय को जीत लिया है। तुम हमेशा उससे प्रेम करोगे क्योंकि वह मानवजाति के प्रेम के लिए कहीं अधिक योग्य है! यदि तुम इन चीज़ों से बातचीत कर सकते हो, तो तुम मनुष्यों के हृदयों को द्रवित कर सकते हो। यह सब कुछ गवाही देना है। यदि तुम एक ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम हो, लोगों को द्रवित कर उनकी आँखों में आँसू लाने में सक्षम हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वास्तव में ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से प्रेम करता है क्योंकि तुम परमेश्वर को प्रेम करने की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे माध्यम से, परमेश्वर के कार्यों की गवाही दी जा सकती है। तुम्हारी गवाही के कारण, अन्य लोग परमेश्वर के कार्यों की खोज करते हैं, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, और वे जिस भी माहौल का अनुभव करें, उसमें वे दृढ़ रहने में समर्थ होंगे। केवल इस प्रकार से गवाही देना ही वास्तविक रूप से गवाही देना है, और बिलकुल यही अभी तुम से अपेक्षित है। तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य बहुत ही अधिक मूल्यवान है और लोगों के द्वारा सँजो कर रखे जाने योग्य है, कि परमेश्वर बहुत ही बहुमूल्य है और अत्यधिक भरपूर है; वह न केवल बात कर सकता है, बल्कि वह लोगों का न्याय भी कर सकता है, उनके हृदयों को शुद्ध कर सकता है, उन तक आनंद ला सकता है और उन्हें प्राप्त कर सकता है, उन्हें जीत सकता है, और उन्हें पूर्ण बना सकता है। अपने अनुभव के द्वारा तुम देखोगे कि परमेश्वर बहुत ही प्यार करने लायक है। तो अब तुम परमेश्वर को कितना प्रेम करते हो? क्या तुम अपने हृदय से इन बातों को वास्तव में कह सकते हो? जब तुम अपने हृदय की गहराइयों से इन वचनों को व्यक्त करने में सक्षम होगे तो तुम गवाही देने में सक्षम हो जाओगे। एक बार तुम्हारा अनुभव इस स्तर तक पहुँच जाए, तो तुम ईश्वर के लिए गवाह होने में समर्थ हो जाओगे, और काबिल हो जाओगे। यदि तुम अपने अनुभव में इस स्तर तक नहीं पहुँचते हो, तो तुम तब भी बहुत दूर होगे। शुद्धिकरण में लोगों द्वारा कमजोरियों का प्रदर्शन सामान्य बात है, परन्तु शुद्धिकरण के पश्चात् तुम्हें यह कहने में समर्थ होना चाहिए : "परमेश्वर अपने कार्य में बहुत बुद्धिमान है!" यदि तुम वास्तव में एक व्यवहारिक पहचान प्राप्त करने में सक्षम हो, तो यह कुछ ऐसा बन जाएगा जिसे तुम सँजोते हो, और तुम्हारे अनुभव का मूल्य होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 512

अब तुम्हें किसका अनुसरण करना चाहिए? क्या तुम परमेश्वर के कार्य के लिए गवाही देने में समर्थ हो, क्या तुम परमेश्वर की गवाही और एक अभिव्यंजना बन सकते हो, और क्या तुम उसके द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य हो—ये वो बातें हैं जिन्हें तुम्हें खोजना चाहिए। परमेश्वर ने तुम में वास्तव में कितना काम किया है? तुमने कितना देखा है, तुमने कितना स्पर्श किया है? तुमने कितना अनुभव किया है और चखा है? चाहे परमेश्वर ने तुम्हारी परीक्षा ली हो, तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या तुम्हें अनुशासित किया हो, उसके व्यवहार और उसके कार्य तुम में किए गए हैं। परन्तु परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर के द्वारा परिपूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करने का उत्सुक है, क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो? क्या तुम अपने व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन को जी सकते हो? क्या तुम अपने स्वयं के व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से दूसरों का भरण पोषण करने, और परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के वास्ते अपना पूरा जीवन खपाने में सक्षम हो? परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देने हेतु तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और तुम्हारे द्वारा चुकाई गयी कीमत पर निर्भर होना होगा। केवल इसी तरह तुम उसकी इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्यों की गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? यदि तुम उसके नाम, और इससे भी अधिक, उसके कार्यों की गवाही देने में समर्थ हो, और साथ ही उस छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपने लोगों से अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाह हो। तुम वास्तव में, परमेश्वर के लिए किस प्रकार गवाही देते हो? परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास और लालसा करते हुए तुम ऐसा करते हो, अपने शब्दों के माध्यम से गवाही देने, लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानने और देखने देने और उसके क्रियाकलापों को देखने देने के द्वारा ऐसा करते हो—यदि तुम वास्तव में यह सब कुछ खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। यदि तुम बस परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना और अंत में धन्य किए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें खोज करनी चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, उसे कैसे संतुष्ट करें जब वह अपनी इच्छा को तुम्हारे सामने प्रकट करता है, और तलाश करनी चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और वह कैसे तुम्हें अनुशासित करता और तुमसे निपटता है, इसके लिए कैसे गवाही देनी है। अब तुम्हें इन सभी बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार सिर्फ इसलिए है कि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद उसकी महिमा को साझा कर सको, तो यह फिर भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता है। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी माँगों को संतुष्ट करने और एक व्यावहारिक तरीके से उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे वो कष्ट सहना हो या रोना और दुखित होना, तुम्हें अपने अभ्यास में इन सभी चीज़ों को अनुभव अवश्य करना चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं। वास्तव में अभी वह क्या है जो तुम्हें कष्ट सहने और पूर्णता तलाशने के लिए मजबूर करता है? क्या तुम्हारा वर्तमान कष्ट सच में परमेश्वर को प्रेम करने और उसके लिए गवाही देने के वास्ते है? या यह देह के आशीषों के लिए, भविष्य की तुम्हारी संभावनाओं और नियति के लिए है? खोज करने के तुम्हारे सभी इरादे, प्रेरणाएँ और तुम्हारे द्वारा अनुगमन किए जाने वाले लक्ष्य अवश्य सही किए जाने चाहिए और यह तुम्हारी स्वयं की इच्छा से मार्गदर्शित नहीं किए जा सकते। यदि एक व्यक्ति आशीषें प्राप्त करने और सामर्थ्य में शासन करने के लिए पूर्णता की तलाश करता है, जबकि दूसरा परमेश्वर को संतुष्ट करने, परमेश्वर के कार्य की व्यवहारिक गवाही देने के लिए पूर्ण बनाए जाने की खातिर प्रयास करता है, प्रयास के इन दोनों माध्यमों में से तुम किसे चुनोगे? यदि तुम पहले वाले को चुनते हो, तो तुम अभी भी परमेश्वर के मानकों से बहुत दूर होगे। मैंने पहले कहा है कि मेरे कार्य ब्रह्माण्ड भर में मुक्त रूप से जाने जाएंगे और मैं ब्रह्माण्ड पर एक सम्राट के रूप में शासन करूँगा। दूसरी ओर, जो तुम लोगों को सौंपा गया है वह है परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाह बनना, न कि राजा बनना और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में दिखाई देना। परमेश्वर के कर्मों को समस्त ब्रह्माण्ड को और आकाश को भर देने दो। हर एक को उन्हें देखने दो और उन्हें स्वीकार करने दो। ये वचन परमेश्वर स्वयं के सम्बन्ध में कहे जाते हैं और मानवजाति को जो करना चाहिए वह है परमेश्वर के लिए गवाही देना। अब तुम परमेश्वर के बारे में कितना जानते हो? तुम परमेश्वर के बारे में कितनी गवाही दे सकते हो? परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाने का उद्देश्य क्या है? एक बार जब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ जाते हो, तो तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति किस प्रकार से विचारशीलता दिखानी चाहिए? यदि तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो और जो तुम जीते हो उसके माध्यम से परमेश्वर के कार्य के लिए गवाह बनने को तैयार हो, यदि तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो कुछ भी बहुत कठिन नहीं है। लोगों को अब सिर्फ आस्था की आवश्यकता है। यदि तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो किसी भी नकारात्मकता, निष्क्रियता, आलस्य और देह की धारणाओं, जीने के दर्शनों, विद्रोही स्वभाव, भावनाओं इत्यादि को त्याग देना आसान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 513

परीक्षणों से गुज़रते हुए, लोगों का कमज़ोर होना, या उनके भीतर नकारात्मकता आना, या परमेश्वर की इच्छा पर या अभ्यास के लिए उनके मार्ग पर स्पष्टता का अभाव होना स्वाभाविक है। परन्तु हर हालत में, अय्यूब की ही तरह, तुम्हें परमेश्वर के कार्य पर भरोसा अवश्य होना चाहिए, और परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। यद्यपि अय्यूब कमज़ोर था और अपने जन्म के दिन को धिक्कारता था, उसने इस बात से इनकार नहीं किया कि मनुष्य के जीवन में सभी चीजें यहोवा द्वारा प्रदान की गई थी, और यहोवा ही उन्हें वापस ले सकता है। चाहे उसकी कैसे भी परीक्षा ली गई, उसने अपना विश्वास बनाए रखा। अपने अनुभव में, तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा चाहे जिस भी प्रकार के शुद्धिकरण से गुज़रो, संक्षेप में, परमेश्वर को मानवजाति से जिसकी अपेक्षा है वह है, परमेश्वर में उनका विश्वास और प्रेम। इस तरह से, जिसे वो पूर्ण बनाता है वह है लोगों का विश्वास, प्रेम और अभिलाषाएँ। परमेश्वर लोगों पर पूर्णता का कार्य करता है, जिसे वे देख नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते; इन परिस्थितयों में तुम्हारे विश्वास की आवश्यकता होती है। लोगों के विश्वास की आवश्यकता तब होती है जब किसी चीज को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है, और तुम्हारे विश्वास की तब आवश्यकता होती है जब तुम अपनी स्वयं की धारणाओं को नहीं छोड़ पाते हो। जब तुम परमेश्वर के कार्यों के बारे में स्पष्ट नहीं होते हो, तो आवश्यकता होती है कि तुम विश्वास बनाए रखो और तुम दृढ़ रवैया रखो और गवाह बनो। जब अय्यूब इस स्थिति तक पहुँचा, तो परमेश्वर उसे दिखाई दिया और उससे बोला। अर्थात्, यह केवल तुम्हारे विश्वास के भीतर से ही है कि तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ होगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास है तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनायेगा। विश्वास के बिना, वह ऐसा नहीं कर सकता है। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा जिसको प्राप्त करने की तुम आशा करते हो। यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है और तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वसामर्थ्य को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे पास यह विश्वास होता है कि तुम अपने व्यवहारिक अनुभव में उसके कार्यों को देख सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उस विश्वास के बिना, परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास विश्वास है और तुम परमेश्वर पर संदेह नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, अगर तुम उस पर सच्चा विश्वास करो, केवल तभी वह तुम्हारे अनुभवों में तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन कर देता है, और केवल तभी तुम उसके कार्यों को देख पाओगे। ये सभी चीजें विश्वास के माध्यम से ही प्राप्त की जाती हैं। विश्वास केवल शुद्धिकरण के माध्यम से ही आता है, और शुद्धिकरण की अनुपस्थिति में विश्वास विकसित नहीं हो सकता है। "विश्वास" यह शब्द किस चीज को संदर्भित करता है? विश्वास सच्चा भरोसा है और ईमानदार हृदय है जो मनुष्यों के पास होना चाहिए जब वे किसी चीज़ को देख या छू नहीं सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के विचारों के अनुरूप नहीं होता हो, जब यह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। इसी विश्वास के बारे में मैं बातें करता हूँ। मनुष्यों को कठिनाई और शुद्धिकरण के समय में विश्वास की आवश्यकता होती है, और विश्वास के साथ-साथ शुद्धिकरण आता है; विश्वास और शुद्धिकरण को अलग नहीं किया जा सकता। चाहे परमेश्वर कैसे भी कार्य करे या तुम्हारा परिवेश जैसा भी हो, तुम जीवन का अनुसरण करने में समर्थ होगे और सत्य की खोज करने और परमेश्वर के कार्यों के ज्ञान को तलाशने में समर्थ होगे, और तुममें उसके क्रियाकलापों की समझ होगी और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। ऐसा करना ही सच्चा विश्वास रखना है, ऐसा करना यह दिखाता है कि तुमने परमेश्वर में अपना विश्वास नहीं खोया है। जब तुम शुद्धिकरण द्वारा सत्य का अनुसरण करने में समर्थ हो, तुम सच में परमेश्वर से प्रेम करने में समर्थ हो और उसके बारे में संदेहों को पैदा नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, तुम फिर भी उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम गहराई में उसकी इच्छा की खोज करने में समर्थ होते हो और उसकी इच्छा के बारे में विचारशील होते हो, केवल तभी इसका अर्थ है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। इससे पहले, जब परमेश्वर ने कहा कि तुम एक सम्राट के रूप में शासन करोगे, तो तुमने उससे प्रेम किया, और जब उसने स्वयं को खुलेआम तुम्हें दिखाया, तो तुमने उसका अनुसरण किया। परन्तु अब परमेश्वर छिपा हुआ है, तुम उसे देख नहीं सकते हो, और परेशानियाँ तुम पर आ गई हैं। तो इस समय, क्या तुम परमेश्वर पर आशा छोड़ देते हो? इसलिए हर समय तुम्हें जीवन की खोज अवश्य करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। यही सच्चा विश्वास कहलाता है, और यही सबसे सच्चा और सबसे सुंदर प्रकार का प्रेम है।

पहले ऐसा होता था कि लोग परमेश्वर के सामने अपने सारे संकल्प करते और कहते : "अगर कोई अन्य परमेश्वर से प्रेम नहीं भी करता है, तो भी मुझे अवश्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए।" परन्तु अब, शुद्धिकरण तुम पर पड़ता है। यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, इसलिए तुम परमेश्वर में विश्वास को खो देते हो। क्या यह सच्चा प्रेम है? तुमने अय्यूब के कर्मों के बारे में कई बार पढ़ा है—क्या तुम उनके बारे में भूल गए हो? सच्चा प्रेम केवल विश्वास के भीतर ही आकार ले सकता है। तुम अपने शुद्धिकरण के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम विकसित करते हो, अपने वास्तविक अनुभवों में तुम अपने विश्वास के माध्यम से ही परमेश्वर की इच्छा के बारे में विचारशील हो पाते हो, और विश्वास के माध्यम से तुम अपने देह-सुख को त्याग देते हो और जीवन का अनुसरण करते हो; लोगों को यही करना चाहिए। यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में समर्थ हो सकोगे, परन्तु यदि तुम में विश्वास का अभाव है तो तुम देखने में समर्थ नहीं होगे और तुम उसके कार्यों का अनुभव करने में समर्थ नहीं होगे। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा उपयोग और पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम में हर चीज मौज़ूद अवश्य होनी चाहिए : पीड़ा सहने की इच्छाशक्ति, विश्वास, सहनशीलता, तथा आज्ञाकारिता और साथ ही परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, परमेश्वर की इच्छा की समझ और उसके दुःख के बारे में विचारशीलता प्राप्त करने की योग्यता, इत्यादि। किसी व्यक्ति को पूर्ण बनाना आसान नहीं है, और तुम्हारे द्वारा अनुभव किए गए प्रत्येक शुद्धिकरण में तुम्हारे विश्वास और प्यार की आवश्यकता होती है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो केवल मार्ग पर दौड़ कर आगे चले जाना पर्याप्त नहीं है, न ही केवल स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना ही पर्याप्त है। तुम्हें एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए, जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, बहुत सी चीज़ों से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए। जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीज़ों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 514

जो कोई परमेश्वर की सेवा करता है, उसे न केवल यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वास्ते कैसे कष्ट सहना है, बल्कि उससे भी ज्यादा, उसे यह समझना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन परमेश्वर को प्यार करने का प्रयास करना है। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उपयोग, सिर्फ तुम्हें शुद्ध करने या तुम्हें पीड़ित करने के लिए नहीं है, बल्कि वह तुम्हारा उपयोग इसलिए करता है ताकि तुम उसके कार्यों को जानो, मानव जीवन के सच्चे महत्व को जानो, और विशेष रूप से तुम यह जानो कि परमेश्वर की सेवा करना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना, अनुग्रह का आनन्द लेने के बारे में नहीं है बल्कि उसके प्रति तुम्हारे प्रेम के कारण कष्ट सहने के बारे में है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना का भी आनन्द अवश्य लेना चाहिए; तुम्हें इन सभी चीज़ों का अनुभव अवश्य करना चाहिए। तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता को अपने अंदर अनुभव कर सकते हो, और तुम यह अनुभव भी कर सकते हो कि कैसे परमेश्वर तुम्हारे साथ व्यवहार करता तथा न्याय करता है। इस प्रकार, तुम्हारा अनुभव व्यापक होता है। परमेश्वर ने तुम पर न्याय और ताड़ना का काम किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया है, लेकिन इतना ही नहीं; इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम नकारात्मक और कमज़ोर होते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे लिए चिंता करता है। यह सब तुम्हें यह ज्ञात कराने के लिए है कि मनुष्य के बारे में सब कुछ परमेश्वर के आयोजन के अंतर्गत है। तुम सोच सकते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना कष्ट सहने के बारे में है, या उसके लिए कई चीजें करना है; शायद तुम सोचो कि परमेश्वर में विश्वास का प्रयोजन तुम्हारी देह की शान्ति के लिए है, या इसलिए है कि तुम्हारी ज़िन्दगी में सब कुछ ठीक रहे, या इसलिए कि तुम आराम से रहो, सब कुछ में सहज रहो। परन्तु इनमें से कोई भी ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसे लोगों को परमेश्वर पर अपने विश्वास के साथ जोड़ना चाहिए। यदि तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, और उसकी अद्भुतता और अगाधता, इन सभी बातों को मनुष्यों को अवश्य समझना चाहिए। इस समझ को पा लेने के बाद तुम्हें इसका उपयोग अपने हृदय के व्यक्तिगत अनुरोधों, आशाओँ और धारणाओं से छुटकारा पाने के लिए करना चाहिए। केवल इन्हें दूर करके ही तुम परमेश्वर के द्वारा माँग की गई शर्तों को पूरा कर सकते हो। केवल ऐसा करने के माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना उसे संतुष्ट करने के वास्ते और उस स्वभाव को जीने के लिए है जो वह अपेक्षा करता है, ताकि इन अयोग्य लोगों के समूह के माध्यम से परमेश्वर के कार्यकलाप और उसकी महिमा प्रदर्शित हो सके। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए यही सही दृष्टिकोण है और यह वो लक्ष्य भी है जिसे तुम्हें खोजना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा सही दृष्टिकोण होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने की आवश्यकता है, और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यवहारिक कर्मों को देखने, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यवहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के द्वारा, लोग इस बात की सराहना कर सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है, उनके प्रति उसकी क्या इच्छा है। यह सब लोगों के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करने के लिए है। अपने भीतर की सारी अशुद्धता और अधार्मिकता बाहर निकाल देने, अपने गलत इरादों को निकाल फेंकने, और परमेश्वर में सच्चा विश्वास उत्पन्न करने के बाद—केवल सच्चे विश्वास के साथ ही तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर सकते हो। तुम केवल अपने विश्वास की बुनियाद पर ही परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर सकते हो। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना उसके प्रति प्रेम को प्राप्त कर सकते हो? चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम इसके बारे में नासमझ नहीं हो सकते हो। कुछ लोगों में जोश भर जाता है जैसे ही वे देखते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना उनके लिए आशीषें लाएगा, परन्तु सम्पूर्ण ऊर्जा को खो देते हैं जैसे ही वे देखते हैं कि उन्हें शुद्धिकरणों को सहना पड़ेगा। क्या यह परमेश्वर पर विश्वास करना है? अंतत:, अपने विश्वास में परमेश्वर के सामने तुम्हें पूर्ण और अतिशय आज्ञाकारिता हासिल करनी होगी। तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परन्तु फिर भी उससे माँगें करते हो, तुम्हारी कई धार्मिक अवधारणाएँ हैं जिन्हें तुम छोड़ नहीं सकते हो, तुम्हारे व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें तुम त्याग नहीं सकते हो, और तब भी देह की आशीषों को खोजते हो और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी देह को बचाए, तुम्हारी आत्मा की रक्षा करे—ये सब गलत दृष्टिकोण वाले लोगों के व्यवहार हैं। यद्यपि धार्मिक विश्वास वाले लोगों का परमेश्वर पर विश्वास होता है, तब भी वे अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास नहीं करते हैं, परमेश्वर के बारे में ज्ञान की खोज नहीं करते हैं, और केवल अपने देह के हितों की ही तलाश करते हैं। तुम में से कई लोगों के विश्वास ऐसे हैं जो धार्मिक आस्थाओं की श्रेणी से सम्बन्धित हैं। यह परमेश्वर पर सच्चा विश्वास नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों के पास उसके लिए पीड़ा सहने वाला हृदय और स्वयं को त्याग देने की इच्छा होनी चाहिए। जब तक वे इन दो शर्तों को पूरा नहीं करते हैं तब तक परमेश्वर पर उनका विश्वास मान्य नहीं है, और वे स्वभाव में परिवर्तनों को प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। केवल वे लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर के बारे में ज्ञान की तलाश करते हैं, और जीवन की खोज करते हैं ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 515

शुद्धिकरण का काम का उद्देश्य मुख्य रूप से लोगों के विश्वास को पूर्ण बनाना है। अंत में यह हासिल होता है कि तुम छोड़ना तो चाहते हो लेकिन, साथ ही तुम ऐसा कर नहीं पाते हो; कुछ लोग लेश-मात्र आशा से भी वंचित होकर भी अपना विश्वास रखने में समर्थ होते हैं; और लोगों को अपने भविष्य के संबंध में अब और कोई भी आशा नहीं होती। केवल इस समय ही परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का समापन होगा। इंसान अभी भी जीवन और मृत्यु के बीच मँडराने के चरण तक नहीं पहुँचे हैं, उन्होंने मृत्यु को नहीं चखा है, इसलिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया ख़त्म नहीं हुई है। यहाँ तक कि जो सेवा करनेवालों के चरण पर थे, उनका भी अतिशय शुद्धिकरण नहीं हुआ। अय्यूब चरम शुद्धिकरण से गुज़रा था और उसके पास भरोसा रहने के लिए कुछ नहीं था। लोगों को भी उस स्थिति तक शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए जहाँ उनके पास कोई उम्मीद नहीं रह जाती है और भरोसा करने के लिए कुछ नहीं होता—केवल यही सच्चा शुद्धिकरण है। सेवा करने वालों के समय के दौरान, अगर तुम्हारा दिल हमेशा परमेश्वर के सामने शांत रहा, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर ने क्या किया और बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे लिए उसकी इच्छा क्या थी, तुमने हमेशा उसकी व्यवस्थाओं का पालन किया, तब मार्ग के अंत में, तुम परमेश्वर ने जो कुछ किया है वो सब कुछ समझ जाओगे। तुम अय्यूब के परीक्षणों से गुजरते हो और इसी समय तुम पतरस के परीक्षणों से भी गुज़रते हो। जब अय्यूब की परीक्षा ली गई, तो उसने गवाही दी, और अंत में उसके सामने यहोवा प्रकट हुआ था। उसके गवाही देने के बाद ही वह परमेश्वर का चेहरा देखने के योग्य हुआ था। यह क्यों कहा जाता है : "मैं गंद की भूमि से छिपता हूँ, लेकिन खुद को पवित्र राज्य को दिखाता हूँ?" इसका मतलब यह है कि जब तुम पवित्र होते हो और गवाही देते हो केवल तभी तुम परमेश्वर का चेहरा देखने का गौरव प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम उसके लिए गवाह नहीं बन सकते हो, तो तुम्हारे पास उसके चेहरे को देखने का गौरव नहीं है। यदि तुम शुद्धिकरण का सामना करने में पीछे हट जाते हो या परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करते हो, इस प्रकार परमेश्वर के लिए गवाह बनने में विफल हो जाते हो और शैतान की हँसी का पात्र बन जाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का प्रकटन प्राप्त नहीं होगा। यदि तुम अय्यूब की तरह हो, जिसने परीक्षणों के बीच अपनी स्वयं की देह को धिक्कारा था और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं की थी, और अपने शब्दों के माध्यम से, शिकायत या पाप किए बिना अपनी स्वयं की देह का तिरस्कार करने में समर्थ था, तो यह गवाह बनना है। जब तुम किसी निश्चित अंश तक शुद्धिकरणों से गुज़रते हो और फिर भी अय्यूब की तरह हो सकते हो, परमेश्वर के सामने सर्वथा आज्ञाकारी और उससे किसी अन्य अपेक्षा या तुम्हारी धारणाओं के बिना, तब परमेश्वर तुम्हें दिखाई देगा। अभी परमेश्वर तुम्हें दिखाई नहीं देता है क्योंकि तुम्हारी अपनी बहुत-सी धारणाएँ हैं, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, स्वार्थी विचार, व्यक्तिगत अपेक्षाएँ और दैहिक हित हैं, और तुम उसका चेहरा देखने के योग्य नहीं हो। यदि तुम परमेश्वर को देखते, तो तुम उसे अपनी स्वयं की धारणाओं से मापते, ऐसा करते हुए उसे सलीब पर चढ़ा दिया जाता। यदि तुम पर कई चीजें आ पड़ती हैं जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, परन्तु फिर भी तुम उन्हें एक ओर करने और इन चीज़ों से परमेश्वर के कार्यों का ज्ञान पाने में समर्थ हो, और शुद्धिकरण के बीच तुम परमेश्वर के प्रति प्यार से भरा अपना हृदय प्रकट करते हो, तो यह गवाह होना है। यदि तुम्हारा घर शांतिपूर्ण है, तुम देह के आराम का आनंद लेते हो, कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं करता है, और कलीसिया में तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा आज्ञापालन करते हैं, तो क्या तुम परमेश्वर के लिए प्यार से भरा अपना हृदय प्रदर्शित कर सकते हो? क्या यह परिस्थिति तुम्हारा शुद्धिकरण कर सकती है? यह केवल शुद्धिकरण के माध्यम से है कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार दर्शाया जा सकता है, और केवल तुम्हारी धारणाओं के विपरीत घटित होने वाली चीज़ों के माध्यम से ही तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो। कई नकारात्मक और विपरीत चीज़ों की सेवा और शैतान के तमाम प्रकटीकरणों—उसके कामों, आरोपों और उसकी बाधाओं और धोखों के माध्यम से परमेश्वर तुम्हें शैतान का भयानक चेहरा साफ़-साफ़ दिखाता है और इस प्रकार शैतान को पहचानने की तुम्हारी क्षमता को पूर्ण बनाता है, ताकि तुम शैतान से नफ़रत करो और उसे त्याग दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 516

असफलता के, कमजोरी के और नकारात्मकता के समयों के तुम्हारे अनुभव परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परीक्षण कहे जा सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सब कुछ परमेश्वर से आता है, सभी चीजें और घटनाएँ उसके हाथों में हैं। तुम असफल होते हो या तुम कमजोर हो और ठोकर खा जाते हो, ये सब परमेश्वर पर निर्भर करता है और उसकी मुट्ठी में है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, यह तुम्हारा परीक्षण है, और यदि तुम इसे नहीं पहचान सकते हो, तो यह प्रलोभन बन जाएगा। दो प्रकार की अवस्थाएँ हैं, जिन्हें लोगों को पहचानना चाहिए : एक पवित्र आत्मा से आती है, और दूसरी संभवतः शैतान से आती है। एक अवस्था में, पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करता है और तुम्हें स्वयं को जानने, स्वयं का तिरस्कार करने और ख़ुद पर पछतावा करने और परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार रखने में समर्थ होने, उसे संतुष्ट करने पर अपना दिल लगाने देता है। दूसरी अवस्था ऐसी है जिसमें तुम स्वयं को जानते हो, लेकिन तुम नकारात्मक और कमजोर हो। यह कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण है, और यह भी कहा जा सकता है कि यह शैतान का प्रलोभन है। यदि तुम यह जानते हो कि यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार है और अनुभव करते हो कि अब तुम गहराई से उसके ऋणी हो, और यदि अब से तुम उसका कर्ज़ चुकाने का प्रयास करते हो और इस तरह के पतन में अब और नहीं पड़ते हो, यदि तुम उसके वचनों को खाने और पीने में अपना प्रयास लगाते हो, और यदि तुम स्वयं को हमेशा अभावग्रस्त महसूस करते हो, और लालसा का हृदय रखते हो, तो यह परमेश्वर द्वारा परीक्षण है। दुःख समाप्त हो जाने के बाद और तुम एक बार फिर से आगे बढ़ने लगते हो, परमेश्वर तब भी तुम्हारी अगुआई करेगा, तुम्हें रोशन करेगा और तुम्हारा पोषण करेगा। लेकिन यदि तुम इसे नहीं पहचानते हो और तुम नकारात्मक हो, स्वयं को निराशा में छोड़ देते हो, यदि तुम इस तरह से सोचते हो, तो तुम्हारे ऊपर शैतान का प्रलोभन आ चुका होगा। जब अय्यूब परीक्षणों से गुजरा, तो परमेश्वर और शैतान एक-दूसरे के साथ शर्त लगा रहे थे, और परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को पीड़ित करने दिया। यद्यपि यह परमेश्वर था जो अय्यूब का परीक्षण ले रहा था, लेकिन वह वास्तव में शैतान था जो उससे टकराया था। शैतान के लिए, यह अय्यूब को प्रलोभित करना था, लेकिन अय्यूब परमेश्वर की तरफ़ था। यदि ऐसा नहीं होता, तो वह प्रलोभन में पड़ गया होता। जैसे ही लोग प्रलोभन में पड़ते हैं, वे खतरे में पड़ जाते हैं। शुद्धिकरण से गुज़रना परमेश्वर की ओर से एक परीक्षण कहा जा सकता है, लेकिन अगर तुम एक अच्छी अवस्था में नहीं हो, तो इसे शैतान से प्रलोभन कहा जा सकता है। अगर तुम दर्शन के बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो दर्शन के पहलू में शैतान तुम पर दोष लगाएगा और तुम्हारी दृष्टि को बाधित करेगा। इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम प्रलोभन में पड़ जाओगे।

यदि तुम परमेश्वर के काम का अनुभव नहीं करते हो, तो तुम कभी पूर्ण नहीं बनाए जा सकोगे। तुम्हारे अनुभव में, तुम्हें विवरण में भी अवश्य जाना चाहिए। उदाहरण के लिए कौन सी चीज़ें तुम्हारे अंदर धारणाओं और इतने सारे प्रयोजनों को उपजाती हैं और तुम्हारे पास इन समस्याओं को संबोधित करने के लिए किस तरह के उपयुक्त अभ्यास हैं? यदि तुम परमेश्वर के काम का अनुभव कर सकते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारे पास कद-काठी है। यदि ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे पास केवल जोश है, तो यह सही कद-काठी नहीं है और तुम बिलकुल भी दृढ़ नहीं रह पाओगे। केवल जब तुम लोग किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, परमेश्वर के काम का अनुभव और उस पर विचार करने में सक्षम हो जाते हो, जब तुम लोग चरवाहों को छोड़ने में, परमेश्वर पर भरोसा करके स्वतंत्र रूप से जीने में समर्थ हो जाते हो, और परमेश्वर के वास्तविक कार्यों को देखने में सक्षम हो जाते हो, केवल तभी परमेश्वर की इच्छा प्राप्त होगी। अभी, ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं कि कैसे अनुभव करें। जब वे किसी समस्या का सामना करते हैं तो उन्हें पता नहीं होता है कि उसे कैसे सँभालें; वे परमेश्वर के काम का अनुभव नहीं कर सकते हैं, और वे एक आध्यात्मिक जीवन नहीं बिता सकते हैं। तुम्हें परमेश्वर के वचनों और काम को अपने व्यावहारिक जीवन में अवश्य अपनाना चाहिए।

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें एक निश्चित प्रकार की अनुभूति देता है, एक एहसास जिसके कारण तुम अपना आंतरिक आनंद खो देते हो और परमेश्वर की उपस्थिति को खो देते हो, कुछ इस तरह कि तुम अंधकार में डूब जाते हो। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण है। जब कभी भी तुम कुछ करते हो तो गड़बड़ हो जाती है या तुम्हारे सामने कोई अवरोध आ जाता है। यह परमेश्वर का अनुशासन है। कभी, अगर तुम कुछ ऐसा करो जो अनाज्ञाकारी और परमेश्वर के प्रति विद्रोही हो, तो हो सकता है कि दूसरों को इसके बारे में पता न चले, लेकिन परमेश्वर जानता है। वह तुम्हें बचकर जाने नहीं देगा, और वह तुम्हें अनुशासित करेगा। पवित्र आत्मा का काम बहुत ही विस्तृत है। वह लोगों के हर वचन और कार्य को, उनकी हर क्रिया और हरकत को, और उनकी हर सोच और विचार को ध्यानपूर्वक देखता है, ताकि लोग इन चीज़ों के बारे में आंतरिक जागरूकता पा सकें। तुम एक बार कुछ करते हो और वह गड़बड़ हो जाता है, तुम फिर से कुछ करते हो और यह तब भी गड़बड़ हो जाता है, और धीरे-धीरे तुम पवित्र आत्मा के काम को समझ जाओगे। कई बार अनुशासित किए जाने के द्वारा, तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए क्या किया जाए और उसकी इच्छा के अनुरूप क्या नहीं है। अंत में, तुम्हारे भीतर से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का सटीक उत्तर प्राप्त हो जाएगा। कभी-कभी तुम विद्रोही हो जाओगे और तुम्हें भीतर से परमेश्वर द्वारा डाँटा जाएगा। यह सब परमेश्वर के अनुशासन से आता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते हो, यदि तुम उनके काम को महत्वहीन समझते हो, तो वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। तुम परमेश्वर के वचनों को जितनी अधिक गंभीरता से लेते हो, उतना ही अधिक वह तुम्हें रोशन करेगा। अभी, कलीसिया में कुछ लोग हैं जिनका विश्वास अव्यवस्थित और भ्रमित है, और वे बहुत सी अनुचित चीजें करते हैं और अनुशासन के बिना कार्य करते हैं, और इसलिए पवित्र आत्मा का काम उनमें स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सकता है। कुछ लोग पैसे कमाने के लिए अपने कर्तव्यों को पीछे छोड़ देते हैं, और अनुशासित हुए बिना व्यवसाय का संचालन करने चल पड़ते हैं; इस तरह का व्यक्ति और भी अधिक खतरे में है। वर्तमान में न केवल ऐसे लोगों में पवित्र आत्मा का काम नहीं है, बल्कि भविष्य में उन्हें पूर्ण बनाना भी मुश्किल होगा। ऐसे कई लोग हैं जिन पर पवित्र आत्मा का काम नहीं देखा जा सकता है, जिसमें परमेश्वर के अनुशासन को नहीं देखा जा सकता है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की इच्छा के बारे में स्पष्ट नहीं है और जो उसके कार्य को नहीं जानते हैं। जो लोग शुद्धिकरण के बीच स्थिर रह सकते हैं, जो परमेश्वर का पालन करते हैं इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या करता है, कम से कम छोड़ने में तो समर्थ नहीं होते हैं या पतरस ने जो प्राप्त किया उसका 0.1% प्राप्त करते हैं, वे ठीक जा रहे हैं, लेकिन परमेश्वर द्वारा उनके उपयोग के संबंध में उनका कोई मूल्य नहीं है। बहुत से लोग चीज़ों को जल्दी से समझ जाते हैं, उनका परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम होता है वे पतरस के स्तर से पार जा सकते हैं और परमेश्वर उन पर पूर्णता का काम करता है। अनुशासन और प्रबुद्धता ऐसे लोगों को प्राप्त होती है और यदि उनमें कुछ ऐसा होता है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है, तो वे उसे तुरंत त्याग सकते हैं। इस तरह के लोग सोना-चाँदी हैं, मूल्यवान पत्थर हैं—उनका मूल्य बहुत अधिक है! यदि परमेश्वर ने कई तरह के काम किए हैं, लेकिन तुम तब भी रेत की तरह हो, एक पत्थर की तरह हो, तो तुम मूल्यहीन हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 517

बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर का काम शानदार और अथाह है। वह एक समूह के लोगों को पूर्ण बनाएगा और कुछ अन्य को हटा देगा, क्योंकि कलीसिया में सभी प्रकार के लोग हैं—ऐसे लोग हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और ऐसे लोग हैं जो नहीं करते; ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के काम अनुभव करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो नहीं करते; कुछ ऐसे हैं जो कर्तव्य करते हैं और कुछ जो नहीं करते; ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के लिए गवाही देते हैं और कुछ नहीं देते—और उनमें से एक हिस्सा अविश्वासियों और दुष्ट इंसानों का है जो निश्चित ही हटा दिये जाएंगे। यदि तुम स्पष्ट रूप से परमेश्वर के काम को नहीं जानते हो तो तुम नकारात्मक होगे; ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का काम केवल अल्पसंख्या के लोगों में ही देखा जा सकता है। उस समय यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सचमुच परमेश्वर से प्यार करता है और कौन नहीं। जो लोग सचमुच परमेश्वर से प्यार करते हैं, उनके पास पवित्र आत्मा का काम है, जो सचमुच उससे प्यार नहीं करते हैं, वे उसके काम के प्रत्येक चरण के माध्यम से प्रकट किए जाएँगे। वे निष्कासन की वस्तुएँ बन जाएँगे। ये लोग जीतने के कार्य के दौरान प्रकट किए जाएँगे, उनमें पूर्ण बनाए जाने के लिए कोई मूल्य नहीं है। जो पूर्ण बनाए गए हैं, वे पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं, और पतरस की तरह परमेश्वर को प्रेम करने में सक्षम हैं। जिन लोगों को जीत लिया गया है उनके पास सहज प्रेम नहीं है, बल्कि केवल निष्क्रिय प्रेम है, और वे परमेश्वर से प्रेम करके लिए बाध्य हैं। सहज प्रेम व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से प्राप्त समझ के माध्यम से विकसित होता है। यह प्रेम एक व्यक्ति के दिल में भरा होता है और वह उन्हें स्वैच्छिक रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पित करवाता है; परमेश्वर के वचन उनकी नींव बन जाते हैं और वे परमेश्वर के लिए कष्ट सहने में समर्थ हो जाते हैं। निस्सन्देह, ये ऐसी चीज़ें हैं जो उसके पास होती हैं जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा चुका है। यदि तुम केवल जीते जाने के लिए प्रयास करते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते हो; यदि परमेश्वर केवल लोगों को जीतने के माध्यम से ही उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता है, तो सेवा करने वालों का चरण काम ख़त्म कर देगा। लेकिन, लोगों को जीतना परमेश्वर का अंतिम लक्ष्य नहीं है, उसका अंतिम लक्ष्य लोगों को पूर्ण बनाना है। इसलिए बजाय यह कहने के कि यह चरण जीतने का कार्य है, यह कहो कि यह पूर्ण बनाने और निष्कासन करने का कार्य है। कुछ लोगों को पूरी तरह से नहीं जीता जा गया है, और उन्हें जीतने के दौरान, लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया जाएगा। कार्य के इन दोनों खंडों को एक साथ किया जाता है। काम की इतनी लंबी अवधि में भी लोग मार्ग से विचलित नहीं हुए हैं और यह दर्शाता है कि जीतने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है—यह जीत लिए जाने का एक तथ्य है। शुद्धिकरण जीते जाने के वास्ते नहीं हैं, बल्कि वे पूर्ण बनाए जाने के वास्ते हैं। शुद्धिकरणों के बिना, लोगों को पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए शुद्धिकरण बहुत मूल्यवान हैं! आज लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया जा रहा और प्राप्त किया जा रहा है। पहले उल्लेख किए गए सभी दस आशीषों का लक्ष्य वे लोग थे जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है। धरती पर उनकी छवि बदलने के बारे में हर चीज उन पर लक्षित है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है। जिन लोगों को पूर्ण नहीं बनाया गया है वे परमेश्वर के वादों को पाने के योग्य नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 518

परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर को जानना स्वर्ग की व्यवस्था और पृथ्वी का सिद्धांत है और आज—ऐसे युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है—ख़ासतौर पर परमेश्वर को जानने का अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना कुछ ऐसा है, जो परमेश्वर की इच्छा की समझ की नींव पर बनाया जाता है और परमेश्वर की इच्छा को समझने के लिए परमेश्वर का कुछ ज्ञान रखना आवश्यक है। परमेश्वर का यह ज्ञान वह दर्शन है, जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले के पास अवश्य होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। इस ज्ञान के अभाव में, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास खोखले सिद्धांत के बीच, एक अज्ञात स्थिति में मौजूद होगा। भले ही यह परमेश्वर का अनुसरण करने का लोगों का इस तरह का संकल्प हो, तब भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। वो सभी जो इस धारा में कुछ भी प्राप्त नहीं करते, वो हैं जिन्हें हटा दिया जाएगा—वो सभी मुफ़्तखोर हैं। तुम्हें परमेश्वर के कार्य के जिस भी चरण का अनुभव है, तुम्हारे साथ एक शक्तिशाली दर्शन होना चाहिए। अन्यथा, तुम्हारे लिए नए कार्य के हर चरण को स्वीकार करना कठिन होगा क्योंकि परमेश्वर का नया कार्य मनुष्य की कल्पना करने की क्षमता से परे है और उसकी धारणा की सीमाओं से बाहर है। इसलिए मनुष्य की रखवाली के लिए एक चरवाहे के बिना, दर्शनों को संगति में लगाने के लिए एक चरवाहे के बिना, मनुष्य इस नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ है। यदि मनुष्य दर्शन प्राप्त नहीं कर सकता, तो वह परमेश्वर के नए कार्य को भी प्राप्त नहीं कर सकता और यदि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य का पालन नहीं कर सकता, तो मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को समझने में असमर्थ होगा और इसलिए उसे परमेश्वर का कुछ ज्ञान नहीं होगा। इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित करे, उसे परमेश्वर के वचन को अवश्य जानना चाहिए; यानी उसे परमेश्वर की इच्छा अवश्य समझनी चाहिए। केवल इसी तरह से परमेश्वर के वचन को सही-सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्यान्वित किया जा सकता है। यह कुछ ऐसा है कि सच्चाई की तलाश करने वाले हर व्यक्ति के पास अवश्य होना चाहिए और यही वह प्रक्रिया भी है, जिससे परमेश्वर को जानने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को अवश्य गुज़रना चाहिए। परमेश्वर के वचन जानने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है और परमेश्वर के कार्य को जानने की प्रक्रिया है। और इसलिए, दर्शनों को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने का संकेत है बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर की इच्छा जान लेते हैं और परमेश्वर के कार्य से वो जान लेते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है। परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर जाने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर में विश्वास रखने के वास्ते परमेश्वर में विश्वास रखते हो, न कि उसे जानने के वास्ते, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि उस प्रक्रिया के दौरान जिसके ज़रिए मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेता है, तो उसने पूरी तरह परमेश्वर को पा लिया होगा। परमेश्वर दूसरी बार व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह बनने की इतनी हद तक क्यों गया, उसका कारण था कि मनुष्य उसे जानने और देखने में समर्थ हो जाए। परमेश्वर को जानना[क] परमेश्वर के कार्य के समापन पर प्राप्त किया जाने वाला अंतिम प्रभाव है; यह वह अंतिम अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्यजाति से करता है। उसके ऐसा करने का कारण अपनी अंतिम गवाही के वास्ते है; परमेश्वर यह कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह उसकी ओर फिरे। मनुष्य केवल परमेश्वर को जानकर ही परमेश्वर से प्रेम कर सकता है और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना चाहिए। इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कैसे तलाश करता है या वह क्या प्राप्त करने के लिए तलाश करता है, उसे परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। केवल इसी तरह से मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जानकर ही मनुष्य परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रख सकता है और केवल परमेश्वर को जानकर ही वह वास्तव में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रख सकता है और आज्ञापालन कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और श्रद्धा नहीं रख सकते। परमेश्वर को जानने में उसके स्वभाव को जानना, उसकी इच्छा को समझना और यह जानना शामिल है कि वह क्या है। फिर भी इंसान किसी भी पहलू को क्यों न जाने, उसे प्रत्येक के लिए क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है और आज्ञापालन करने की इच्छा की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कोई भी अंत तक अनुसरण करते रहने में समर्थ नहीं होगा। मनुष्य की धारणाओं के साथ परमेश्वर का कार्य भी अनुरूपता में नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है, यह जानना भी मनुष्य के लिए बहुत मुश्किल है और वह सब कुछ भी जो परमेश्वर कहता और करता है, मनुष्य की समझ से परे है: यदि मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करना चाहता है और फिर भी उसकी आज्ञा का पालन करने का अनिच्छुक है, तो मनुष्य को कुछ प्राप्त नहीं होगा। संसार के सृजन से लेकर आज तक परमेश्वर ने बहुत सा कार्य किया है, जो मनुष्य की समझ से परे है, जिसे मनुष्य के लिये स्वीकार करना कठिन रहा है और परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है, जिससे मनुष्य की धारणाओं को ठीक करना मुश्किल हो जाता है। मगर मनुष्य की तमाम कठिनाइयों के कारण उसने अपना कार्य कभी बंद नहीं किया है; बल्कि, उसने कार्य करना और बोलना जारी रखा है और हालांकि बड़ी संख्या में "योद्धाओं" ने हार मान ली है, वह तब भी अपना कार्य कर रहा है और बिना रुकावट वह एक के बाद एक लोगों के ऐसे समूह चुनना जारी रखता है, जो उसके नए कार्य के प्रति समर्पण के इच्छुक हैं। उसमें उन पतित "नायकों" के लिए कोई दया नहीं, बल्कि वह उन लोगों को संजोकर रखता है, जो उसके नए कार्य और वचनों को स्वीकार करते हैं। मगर वह किस हद तक इस तरह क़दम-दर-क़दम कार्य करता है? क्यों वह हमेशा कुछ लोगों को हटा रहा है और दूसरों को चुन रहा है? ऐसा क्यों है कि वह हमेशा ऐसी विधि का उपयोग करता है? उसके कार्य का उद्देश्य मनुष्य को उसे जानने की अनुमति देना और इस प्रकार उसे प्राप्त करना है। उसके कार्य का सिद्धांत है उन लोगों पर कार्य करना, जो आज उसके द्वारा किए जा रहे कार्य के प्रति समर्पण करने में समर्थ हैं, न कि उन लोगों पर कार्य करना, जो उसके द्वारा अतीत में किए गए कार्य के प्रति समर्पण करते हैं और आज उसके द्वारा किए जा रहे कार्य का विरोध करते हैं। इसमें वह कारण निहित है कि क्यों वह इतने सारे लोगों को निकालता आ रहा है।

परमेश्वर को जानते रहने के लिए पाठ के प्रभावों को एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता: मनुष्य को अनुभव संचित करना, पीड़ा से गुज़रना और सच्चा समर्पण प्राप्त करना चाहिए। सबसे पहले परमेश्वर के कार्य और वचनों से शुरू करें। यह आवश्यक है कि तुम समझो कि परमेश्वर के ज्ञान में क्या शामिल है, इस ज्ञान को कैसे प्राप्त किया जाए और अपने अनुभवों में परमेश्वर को कैसे देखा जाए। यह हर किसी को तब करना चाहिए जब उन्हें परमेश्वर को जानना बाक़ी हो। कोई भी परमेश्वर के कार्य और वचनों को एक ही बार में नहीं समझ सकता और कोई भी अल्प समय के भीतर परमेश्वर की समग्रता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अनुभव की एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को जानने या ईमानदारी से उसका अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसे जानता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक मनुष्य की धारणाओं से अलग होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का ज्ञान नवीकृत और गहरा होता है। यदि परमेश्वर का कार्य हमेशा स्थिर और अपरिवर्तित रहता, तो उसके बारे में मनुष्य को उसके ज्ञान के बारे में अधिक कुछ नहीं पता होता। सृजन और वर्तमान समय के बीच, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया, उसने अनुग्रह के युग के दौरान क्या किया और राज्य के युग के दौरान वह क्या करता है—तुमको इन दर्शनों के बारे में पूर्णतया स्पष्ट होना चाहिए। तुमको परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "परमेश्वर को जानने का कार्य" लिखा है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 519

मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, स्वयं को जान लेता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है और जीवन में विकास की तलाश करता है, यह सब परमेश्वर को जानने के वास्ते करता है। यदि तुम केवल अपने आप को जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से निपटने का प्रयास करते हो, मगर तुम्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य पर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है या इसका कोई ज्ञान नहीं है कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और उसके कर्मों की गवाही कैसे देते हो, तो तुम्हारा यह अनुभव अनर्गल है। यदि तुम सोचते हो कि किसी के जीवन में केवल इसलिए परिपक्वता आई है क्योंकि वह सत्य को व्यवहार में लाने और सहन करने में समर्थ है, तो इसका मतलब है कि तुमने अभी भी जीवन का सच्चा अर्थ या मनुष्य को पूर्ण करने का परमेश्वर का उद्देश्य नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम पश्चाताप कलीसिया (रिपेंटेंस चर्च) या जीवन कलीसिया (लाइफ़ चर्च) के सदस्यों के बीच, धार्मिक कलीसियाओं में होगे, तो तुम कई धर्मपरायण लोगों से मिलोगे, जिनकी प्रार्थनाएं "दर्शनों" से युक्त होती हैं और जो जीवन की अपनी खोज में, स्पर्श किए गए और वचनों द्वारा मार्गदर्शित महसूस करते हैं। इसके अलावा, वो कई मामलों में सहने और स्वयं का त्याग करने और देह द्वारा अगुआई न किए जाने में समर्थ हैं। उस समय, तुम अंतर बताने में समर्थ नहीं होगे: तुम विश्वास करोगे कि वो जो कुछ करते हैं, सही है, जीवन की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है और यह कितनी दयनीय बात है कि जिस नाम में वो विश्वास रखते हैं, वही ग़लत है। क्या ऐसे विचार मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? ऐसा क्यों कहा जाता है कि कई लोगों का कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वो परमेश्वर को नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं है और उनका कोई जीवन नहीं है। यदि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास एक स्थिति तक पहुँच गया है, जहां तुम परमेश्वर के कर्मों, परमेश्वर की वास्तविकता और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह जानने में सक्षम हो, तो तुम सत्य के अधीन हो। यदि तुम परमेश्वर के कार्य और स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारे अनुभव में अभी भी कुछ दोष है। यीशु ने कैसे अपने कार्य के उस चरण को कार्यान्वित किया, कैसे इस चरण को कार्यान्वित किया जा रहा है, कैसे अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने अपना कार्य किया और क्या कार्य किया, कौन सा कार्य इस चरण में किया जा रहा है—यदि तुम्हें इन बातों का पूरी तरह ज्ञान नहीं है, तो तुम कभी भी आश्वस्त महसूस नहीं करोगे और तुम हमेशा असुरक्षित रहोगे। यदि एक अवधि के अनुभव के बाद, तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और उसके हर चरण को जानने में समर्थ हो और यदि तुमने परमेश्वर के वचनों के बोलने में उसके लक्ष्यों का और इस बात का पूरी तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया है और क्यों उसके द्वारा बोले गए इतने सारे वचन पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम साहस के साथ और बिना हिचकिचाए, चिंता और शोधन से मुक्त होकर, आगे के मार्ग पर चल सकते हो। तुम लोगों को देखना चाहिए कि परमेश्वर किन तरीक़ों से अपना इतना अधिक कार्य कर पाता है। वह भिन्न-भिन्न प्रकार के बहुत से वचनों के ज़रिए मनुष्य का शोधन करते और उसकी धारणाओं को रूपांतरित करते हुए अपने बोले गए वचनों का उपयोग करता है। समस्त पीड़ा जो तुम लोगों ने सहन की हैं, सभी शोधन जिनसे तुम लोग गुज़रे हो, जिस व्यवहार को तुम लोगों ने अपने भीतर स्वीकारा है, प्रबुद्धता जो तुम लोगों ने अनुभव की है—ये सभी उन वचनों के ज़रिए प्राप्त किए गए हैं, जो परमेश्वर ने बोले हैं। मनुष्य किस कारण परमेश्वर का अनुसरण करता है? वह परमेश्वर के वचनों की वजह से अनुसरण करता है! परमेश्वर के वचन गहन रूप से रहस्यमय हैं और इसके अलावा वो मनुष्य के हृदय को प्रेरित कर सकते हैं, उसके भीतर दबी चीज़ों को प्रकट कर सकते हैं, उसे अतीत में हुई चीजें ज्ञात करवा सकते हैं और उसे भविष्य में प्रवेश करने दे सकते हैं। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के वचनों की वजह से पीड़ाएं सहता है और उसे परमेश्वर के वचनों की वजह से ही पूर्ण भी बनाया जाता है: केवल इसी समय मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है। इस चरण में मनुष्य को जो करना चाहिए, वह है परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करना और इसकी परवाह किए बिना कि उसे पूर्ण बनाया जाता है या शोधन किया जाता है, जो महत्वपूर्ण है, वह है परमेश्वर के वचन। यह परमेश्वर का कार्य है और यही वह दर्शन भी है, जो आज मनुष्य के जानने योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

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