जीवन में प्रवेश 3

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 444

आत्मा के विवरण को कैसे समझा जा सकता है? पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे कार्य करता है? शैतान मनुष्य में कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं मनुष्य में कैसे कार्य करती हैं? इसके प्रकटीकरण क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, क्या यह पवित्र आत्मा की ओर से आता है और तुम्हें उसे मानना चाहिए या ठुकरा देना चाहिए? लोगों के वास्तविक अभ्यास में मनुष्य की इच्छा से बहुत कुछ उत्पन्न होता है फिर भी लोगों को हमेशा लगता है कि यह आत्मा की ओर से आता है। कुछ चीज़ें दुष्ट आत्माओं की ओर से आती हैं, परंतु फिर भी लोग सोचते हैं कि यह पवित्र आत्मा से आई हैं और कभी-कभी पवित्र आत्मा भीतर से लोगों का मार्गदर्शन करता है, फिर भी लोग डर जाते हैं कि ऐसा मार्गदर्शन शैतान की ओर से आता है और इसलिए आज्ञा मानने का साहस नहीं करते, जबकि वास्तविकता में वह मार्गदर्शन पवित्र आत्मा का प्रबोधन होता है। इस प्रकार, इनमें भेद किये बिना, व्यावहारिक अनुभव में इसका अनुभव करने का कोई तरीक़ा नहीं है; भेद किए बिना जीवन प्राप्त करने का कोई तरीक़ा नहीं है। पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं कैसे कार्य करती हैं? मनुष्य की इच्छा से क्या आता है? और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और उसके प्रबोधन से क्या पैदा होता है? यदि तुम मनुष्य के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के स्वरूपों को समझ लेते हो, तब तुम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन और अपने व्यावहारिक अनुभवों में अपना ज्ञान बढ़ा पाओगे और अंतर कर पाओगे; तुम परमेश्वर को जान पाओगे, तुम शैतान को समझ और पहचान पाने में समर्थ होगे; तुम अपनी आज्ञाकारिता या अनुसरण को लेकर उलझन में नहीं रहोगे, और तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसके विचार स्पष्ट हैं और जो पवित्र आत्मा के कार्य का पालन करता है।

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय मार्गदर्शन और सकारात्मक प्रबोधन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता। यह उनको सांत्वना देता है, उन्हें विश्वास और संकल्प देता है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाते हैं; वो निष्क्रिय या बाध्य नहीं होते, बल्कि अपनी पहल पर काम करते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग प्रसन्न और सहर्ष प्रस्तुत होते हैं, आज्ञा मानने को तैयार होते हैं और स्वयं को विनम्र रखने में प्रसन्न होते हैं। यद्यपि वे भीतर से दुखी और दुर्बल होते हैं, उनमें सहयोग करने का संकल्प होता है; वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मानने में सक्षम होते हैं और मानवीय इच्छा से कलंकित नहीं होते हैं, मनुष्य की सोच से कलंकित नहीं होते हैं और निश्चित रूप से वे मनुष्य की आकांक्षाओं और प्रेरणाओं से कलंकित नहीं होते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो भीतर से वे विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन हैं, वे परमेश्वर के प्रेम और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को जीते हैं; वे ऐसी चीज़ों से आनंदित होते हैं, जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं और उन चीज़ों से घृणा करते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मानवता होती है और वे निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं और मानवता के अधीन होते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, उनकी स्थिति और भी बेहतर हो जाती है और उनकी मानवता और अधिक सामान्य हो जाती है और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएं सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रुकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों में प्रबोधन और मार्गदर्शन को कार्यान्वित करता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है, तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता और उन्हें प्रबुद्ध करता है। वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें प्रबुद्ध करता है। पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनका जीवन सामान्य आध्यात्मिक हो, तो वे पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन होते हैं। ऐसी स्थिति में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो उनमें विश्वास आता है; जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटितहोता है, तो वे निष्क्रिय नहीं होते; और घटित होती हुई चीज़ों से सबक़ लेने में समर्थ होते हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि वो सीखें। वे निष्क्रिय या कमज़ोर नहीं होते और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

पवित्र आत्मा के कार्य से क्या प्रभाव प्राप्त होते हैं? तुम मूर्ख हो सकते हो और तुम विवेकहीन हो सकते हो, परंतु पवित्र आत्मा को बस तुम्हारे भीतर कार्य करना है और तुम्हारे भीतर विश्वास उत्पन्न हो जाएगा और तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर से जितना भी प्रेम करो कम ही होगा। चाहे सामने कितनी ही मुश्किलें हों, तुम सहयोग के लिए तैयार होगे। तुम्हारे साथ घटनाएँ होंगी और यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या शैतान की ओर से, परंतु तुम प्रतीक्षा कर पाओगे और न तो निष्क्रिय होगे और न ही बेपरवाह। यह पवित्र आत्मा का सामान्य कार्य है। जब पवित्र आत्मा तुम्हारे अंदर कार्य करता है, तब भी तुम वास्तविक कठिनाइयों का सामना करते हो : कभी-कभी तुम्हारे आँसू निकल आएंगे और कभी-कभी ऐसी बातें होंगी, जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते, परंतु यह सब पवित्र आत्मा के साधारण कार्य का एक चरण है। हालाँकि तुमने उन कठिनाइयों पर काबू नहीं पाया और उस समय तुम कमज़ोर थे और शिकायतों से भरे थे, फिर भी बाद में तुम पूरे विश्वास के साथ परमेश्वर से प्रेम कर पाये। तुम्हारी निष्क्रियता तुम्हें सामान्य अनुभव प्राप्त करने से नहीं रोक सकती और इसकी परवाह किए बिना कि लोग क्या कहते हैं और कैसे हमला करते हैं, तुम परमेश्वर से प्रेम कर पाते हो। प्रार्थना के दौरान तुम हमेशा महसूस करते हो कि अतीत में तुम परमेश्वर के बहुत ऋणी थे और जब भी तुम इस तरह की चीज़ों का फिर सामना करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने और देह-सुख का त्याग करने का संकल्प लेते हो। यह सामर्थ्य दिखाता है कि तुम्हारे भीतर पवित्र आत्मा का कार्य है। यह पवित्र आत्मा के कार्य की सामान्य अवस्था है।

शैतान की ओर से कौन-सा कार्य आता है? शैतान से आने वाले काम में, लोगों के भीतर के दृश्य अस्पष्ट होते हैं; लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती है, उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणाएं गलत होती हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, फिर भी उनके भीतर सदैव आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं और ये दोषारोपण और विचार उनमें निरंतर व्यवधान का कारण बनते हैं, उनके जीवन के विकास को सीमित कर देते हैं और सामान्य स्थिति में परमेश्वर के समक्ष आने से रोक देते हैं। कहने का अर्थ है कि जैसे ही लोगों में शैतान का कार्य आरंभ होता है, तो उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते। ऐसे लोगों को पता नहीं होता कि वे स्वयं के साथ क्या करें—जब वे लोगों को इकट्ठा होते देखते हैं, वे भाग जाना चाहते हैं और जब दूसरे प्रार्थना करते हैं तो वे अपनी आँखें बंद नहीं रख पाते। दुष्ट आत्माओं का कार्य मनुष्य और परमेश्वर के बीच का सामान्य संबंध बर्बाद कर देता है और लोगों के पिछले दर्शनों या उनके जीवन प्रवेश के पिछले मार्ग को उलट देता है; अपने हृदयों में वे कभी परमेश्वर के क़रीब नहीं आ सकते, ऐसी बातें हमेशा होती रहती हैं, जो उनमें बाधा पैदा करती हैं और उन्हें बंधन में बांध देती हैं। उनके हृदय शांति प्राप्त नहीं कर पाते और उनमें परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति नहीं बचती, और उनकी आत्माएं पतन की ओर जाने लगती हैं। शैतान के कार्य के प्रकटीकरण ऐसे हैं। शैतान के कार्य के प्रकटीकरण हैं : अपने स्थान पर डटे रह पाने और गवाही दे पाने में असमर्थ होना, यह तुम्हें ऐसा व्यक्ति बना देता है जो परमेश्वर के समक्ष दोषी है और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठा नहीं रखता। जब शैतान हस्तक्षेप करता है, तुम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम और वफ़ादारी खो देते हो, तुम्हारा परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध खत्म हो जाता है, तुम सत्य या स्वयं के सुधार का अनुसरण नहीं करते, तुम पीछे हटने लगते हो और निष्क्रिय बन जाते हो, तुम स्वयं को आसक्त कर लेते हो, तुम पाप के फैलाव को खुली छूट दे देते हो और पाप से घृणा नहीं करते; इससे बढ़कर, शैतान का हस्तक्षेप तुम्हें स्वच्छंद बना देता है, इसकी वजह से तुम्हारे भीतर से परमेश्वर का स्पर्श हट जाता है और तुम्हें परमेश्वर के बारे में शिकायत करने और उसका विरोध करने को प्रेरित करता है, जिससे तुम परमेश्वर पर सवाल उठाते हो; तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को त्याग देने का खतरा भी होता है। यह सब शैतान की ओर से आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 445

जब तुम्हारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तुम यह फ़र्क कैसे कर पाते हो कि यह पवित्र आत्मा के कार्य से आता है या शैतान के कार्य से? जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य होती हैं, तो उनके आध्यात्मिक जीवन और दैहिक जीवन भी सामान्य होते हैं, उनका विवेक सामान्य और व्यवस्थित होता है। जब वो इस दशा में होते हैं, जो वे अपने भीतर अनुभव करते या जान पाते हैं, उसके विषय में कहा जा सकता है कि वह पवित्र आत्मा के स्पर्श से आया है (जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो अंतर्दृष्टि रखना या कुछ सरल ज्ञान रखना, या कुछ चीज़ों में विश्वासयोग्य बने रहना, या कुछ चीज़ों में परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य रखना—यह सब पवित्र आत्मा से आता है)। मनुष्य में पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य है; मनुष्य इसको महसूस करने के असमर्थ है और यह स्वयं मनुष्य द्वारा ही आता प्रतीत होता है—परंतु वास्तव में यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। दिन-प्रतिदिन के जीवन में पवित्र आत्मा प्रत्येक में बड़े और छोटे रूप में कार्य करता है और यह इस कार्य की सीमा है, जो बदलती रहती है। कुछ लोगों की काबिलियत अच्छी होती है और वे बातों को जल्दी समझ लेते हैं और उनमें पवित्र आत्मा का प्रबोधन विशेष रूप से अधिक होता है। इस बीच, कुछ लोगों की काबिलियतकम होती है और उन्हें बातों को समझने में अधिक समय लगता है, परंतु पवित्र आत्मा उन्हें भीतर से स्पर्श करता है और वे भी परमेश्वर के प्रति निष्ठा को प्राप्त कर पाते हैं—पवित्र आत्मा उन सबमें कार्य करता है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग परमेश्वर का विरोध नहीं करते या परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं करते, ऐसे कार्य नहीं करते, जो परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा डालें और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते, तो उनमें से प्रत्येक में परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम सीमा तक काम करता है; वह उन्हें स्पर्श करता है, प्रबुद्ध करता है, उन्हें विश्वास प्रदान करता है, सामर्थ्य देता है और सक्रिय रूप से प्रवेश करने के लिए बढ़ाता है, आलसी नहीं बनने देता या देह के आनंद लेने का लालच नहीं करने देता, सत्य के अभ्यास को तैयार करता है और परमेश्वर के वचनों की चाहत रखने वाला बनाता है। यह सब ऐसा कार्य है, जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है।

जब लोगों की अवस्था सामान्य नहीं होती, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए जाते हैं, इसकी अधिक आशंका होती है कि वे अपने मन में शिकायत करें, उनकी प्रेरणाएं ग़लत होती हैं, वे आलसी होते हैं, वे देह में आसक्त रहते हैं और उनके हृदय सत्य के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं। यह सब कुछ शैतान की ओर से आता है। जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य नहीं होतीं, जब वे भीतर से अंधकारमय होते हैं और अपना सामान्य विवेक खो देते हैं, पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए होते हैं और अपने भीतर परमेश्वर को महसूस करने के योग्य नहीं होते, यही वह समय होता है जब शैतान उनके भीतर कार्य करता है। यदि लोगों के भीतर सदैव सामर्थ्य रहे और सदैव परमेश्वर से प्रेम करें, तो सामान्यतः जब उनके साथ चीज़ें घटित होती हैं, तो वे चीज़ें पवित्र आत्मा की ओर से आती हैं और वे जिससे मिलते हैं, वह मुलाकात परमेश्वर के प्रबंधनों का नतीजा होता है। कहने का अर्थ है कि जब तुम्हारी परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं, जब तुम पवित्र आत्मा के महान कार्य में होते हो, तो शैतान के लिए तुम्हें डगमगाना असंभव हो जाता है। इस बुनियाद पर यह कहा जा सकता है कि सब कुछ पवित्र आत्मा की ओर से आता है और यद्यपि तुम्हारे मन में ग़लत विचार हो सकते हैं, तुम उनको त्यागने में सक्षम होते हो और उनका अनुसरण नहीं करते। यह सब पवित्र आत्मा के कार्य से आता है। किन परिस्थितियों में शैतान हस्तक्षेप करता है? जब तुम्हारी परिस्थितियां सामान्य न हों, जब तुम्हें परमेश्वर का स्पर्श न मिला हो और तुम परमेश्वर के कार्य से रहित हो, जब तुम भीतर से सूखे और बंजर हो, जब परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए तुम्हें कुछ समझ न आए और जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ और पियो पर प्रबुद्ध या रौशन न हो तो ऐसे समय पर शैतान के लिए तुम्हारे भीतर कार्य करना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए हो और तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तो तुम्हारे साथ बहुत सी चीज़ें घटित होती हैं, जो शैतान के लालच से आती हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, शैतान भी उसी दौरान कार्य कर रहा होता है। पवित्र आत्मा मनुष्य के अंतर्मन को स्पर्श करता है, जबकि उसी समय शैतान मनुष्य में हस्तक्षेप करता है। हालाँकि ऐसी स्थिति में पवित्र आत्मा का कार्य अग्रणी स्थान ले लेता है, और जिन लोगों की स्थितियां सामान्य होती हैं, वे विजय प्राप्त करते हैं; यह शैतान के कार्य के ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य की विजय है। जबकि पवित्र आत्मा कार्य करता है, तब भी लोगों में एक भ्रष्ट स्वभाव मौजूद रहता है; हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य के दौरान, लोगों के लिए अपने विद्रोह, प्रेरणाओं और मिलावटों की खोज करना और पहचानना आसान हो जाता है। केवल तभी लोगों को पछतावा महसूस होता है और वे प्रायश्चित करने को तैयार होते हैं। इस तरह, उनके विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे परमेश्वर के कार्य के भीतर त्याग दिए जाते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है; जब वह लोगों में कार्य करता है, तब भी उन्हें कठिनाइयां होती हैं, वे तब भी रोते हैं, तब भी दुःख उठाते हैं, तब भी वे कमज़ोर होते हैं और तब भी बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जो उनके लिए अस्पष्ट हों, फिर भी ऐसी स्थिति में वे स्वयं को पीछे हटने से रोक सकते हैं और परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं और यद्यपि वे रोते हैं और व्याकुल रहते हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की प्रशंसा करने का सामर्थ्य होता है; पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है और उसमें थोड़ा-सा भी अलौकिक नहीं होता। अधिकांश लोग सोचते हैं कि जैसे ही पवित्र आत्मा कार्य करना आरंभ करता है, वैसे ही लोगों की दशा बदल जाती है और जो चीज़ें उनके लिए ज़रूरी होती हैं, वे हटा ली जाती हैं। ऐसे विश्वास भ्रामक होते हैं। जब पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर कार्य करता है, तो मनुष्य की निष्क्रिय बातें उसमें बनी रहती हैं और उसका आध्यात्मिक कद वही रहता है, लेकिन वह पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबोधन प्राप्त कर लेता है और इसलिए उसकी दशा और अधिक सक्रिय हो जाती है, उसके भीतर की स्थितियां सामान्य हो जाती हैं और वह शीघ्रता से बदल जाता है। लोगों के वास्तविक अनुभवों में प्राथमिक रूप से या तो वे पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं या शैतान के कार्य का और यदि वे इन अवस्थाओं को समझने में सक्षम नहीं होते और इनमें भेद नहीं कर पाते, तो वास्तविक अनुभवों में प्रवेश का तो सवाल ही नहीं उठता, स्वभाव में बदलाव की तो बात ही दूर है। इस प्रकार, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की कुँजी ऐसी चीज़ों को समझना ही है; इस रूप में, उनके लिए यह अनुभव करना सहज होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 446

पवित्र आत्मा का कार्य सकारात्मक उन्नति है, जबकि शैतान का कार्य है पीछे हटना, नकारात्मकता, विद्रोह, परमेश्वर के के प्रति प्रतिरोध, परमेश्वर में विश्वास की कमी, भजनों को गाने तक की अनिच्छा और अपना कर्तव्य निभाने में बहुत कमज़ोर होना। वह सब कुछ जो पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उपजता है, वह काफ़ी स्वाभाविक होता है; यह तुम पर थोपा नहीं जाता। यदि तुम इसका अनुसरण करते हो, तो तुम्हें शांति मिलेगी; और यदि तुम ऐसा नहीं करते, फिर बाद में तुम्हें फटकारा जाएगा। पवित्र आत्मा के प्रबोधन के बाद तुम जो भी करते हो, उसमें कोई हस्तक्षेप या रोक नहीं होगी; तुम स्वतंत्र होगे, तुम्हारे कार्यों में अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम किन्हीं अंकुशों के अधीन नहीं होगे बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। शैतान का कार्य तुमसे बहुत-सी बातों में व्यवधान पैदा कराता है; यह तुम्हें प्रार्थना करने से विमुख करता है, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में बहुत आलसी बनाता है, कलीसिया का जीवन जीने से विमुख करता है, और यह आध्यात्मिक जीवन से दूर कर देता है। पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारे दैनिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता और तुम्हारे सामान्य आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता। तुम बहुत-सी चीज़ों को उसी क्षण पहचानने में असमर्थ रहते हो, जब वे घटित होती हैं; फिर भी कुछ दिन बाद, तुम्हारा हृदय अधिक उज्ज्वल तथा मन अधिक स्पष्ट हो जाता है। तुम्हें आत्मा की चीज़ों के बारे में कुछ समझ आने लगती है और धीरे-धीरे तुम पहचान सकते हो कि कोई विचार परमेश्वर से आया है या शैतान की ओर से। कुछ बातें तुमसे परमेश्वर का विरोध करवाती हैं और परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करवाती हैं, या परमेश्वर के वचनों को कार्य में लाने से तुम्हें रोकती हैं; ये सभी बातें शैतान की ओर से आती हैं। कुछ बातें स्पष्ट नहीं होतीं और उस समय तुम नहीं बता सकते कि वे क्या हैं; बाद में, तुम उनके प्रकटीकरणों को देख पाते हो, तत्पश्चात विवेक का इस्तेमाल कर पाते हो। अगर तुम स्पष्ट रूप से बता सकते हो कि कौन-सी बातें शैतान की ओर से आती हैं और कौन-सी पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होती हैं, तो तुम अपने अनुभवों में आसानी से नहीं भटकोगे। कभी-कभी जब तुम्हारी स्थिति अच्छी नहीं होती, तो तुम्हें ऐसे विचार आते हैं, जो तुम्हें तुम्हारी निष्क्रिय अवस्था से बाहर निकालते हैं। यह दिखाता है कि जब तुम्हारी स्थिति प्रतिकूल होती है, तब भी तुम्हारे कुछ विचार पवित्र आत्मा से आ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि जब तुम निष्क्रिय होते हो, तो तुम्हारे सारे विचार शैतान के भेजे हुए हों; यदि यह सच होता, तो तुम सकारात्मक अवस्था की ओर कब मुड़ पाते? कुछ समय तक निष्क्रिय रहने के बाद, पवित्र आत्मा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने का अवसर देता है; वह तुम्हें स्पर्श करता है और तुम्हें तुम्हारी निष्क्रिय अवस्था से बाहर लाता है।

यह जानना कि पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और शैतान का कार्य क्या है, तुम इनकी तुलना अपने अनुभवों के दौरान अपनी स्वयं की दशा से और अपने अनुभवों के साथ कर सकते हो और इस तरह तुम्हारे अनुभवों में सिद्धांत से संबंधित और अधिक सत्य होंगे। सिद्धांत के बारे में इन बातों को समझकर, तुम अपनी वास्तविक दशा नियंत्रित कर पाओगे, तुम लोगों एवं घटनाओं में अंतर कर पाओगे और तुम्हें पवित्र आत्मा का कार्य पाने के लिए बहुत अधिक प्रयास नहीं करने होंगे। निःसंदेह, यह तुम्हारी प्रेरणाओं के सही होने और तुम्हारी खोजने और अभ्यास करने की तत्परता पर निर्भर है। इस प्रकार की भाषा—वह भाषा जो सिद्धांतों से संबंधित है—तुम्हारे अनुभवों में दिखनी चाहिए। इसके बिना तुम्हारे अनुभव शैतान के व्यवधानों और मूर्खतापूर्ण ज्ञान से भरपूर होंगे। यदि तुम यह नहीं समझते कि पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है, तो तुम यह भी नहीं समझ सकते कि कैसे प्रवेश करें और यदि तुम यह नहीं समझते कि शैतान कैसे कार्य करता है, तो तुम यह भी नहीं समझते कि तुम्हें अपने हर क़दम पर कैसे सावधान रहना है। लोगों को समझना चाहिए कि कैसे पवित्र आत्मा कार्य करता है और कैसे शैतान कार्य करता है; यह लोगों के अनुभवों के अपरिहार्य अंग है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 447

सामान्य मानवता में कौन-से पहलू शामिल हैं? अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक, और चरित्र। यदि तुम इनमें से प्रत्येक पहलू में सामान्यता प्राप्त कर सकते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक के मुताबिक हो जाएगी। तुममें एक सामान्य इंसान से समरूपताहोनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर केविश्वासी की तरह लगनाचाहिए। तुम्हें बहुत अधिक हासिल नहीं करना है या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है; तुम्हें बस एक सामान्य इंसान बनना है जिसके पास सामान्य व्यक्ति की समझ हो, जो चीज़ों को समझने में सक्षम हो, और जो कम से कम एक सामान्य इंसान की तरह दिखाई दे। यह पर्याप्त होगा। आज तुमसे अपेक्षित हर चीज़ तुम्हारी क्षमताओं के भीतर है और किसी भी तरह से तुमसे कुछ ऐसा करवाने के लिए नहीं है जो करने में तुम सक्षम नहीं हो। कोई अनुपयोगी वचन या अनुपयोगी कार्य तुम पर नहीं किया जाएगा। तुम्हारे जीवन में व्यक्त या प्रकट हुई समस्त कुरूपता का अवश्य त्याग कर दिया जाना चाहिए। तुम लोगों को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और तुम लोग शैतान के ज़हर से भरे हुए हो। तुमसे केवल इस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा पाने के लिए कहा जाता है। तुमसे कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति, या एक प्रसिद्ध या महान व्यक्ति बनने के लिए नहीं कहा जाता। इसका कोई अर्थ नहीं है। जो कार्य तुम लोगों पर किया जाता है वह उसके अनुसार होता है जो तुम लोगों में अंतर्निहित है। मैं लोगों से जो अपेक्षा करता हूँ उसकी सीमाएँ होती हैं। यदि तुमने उस तरीके और लहजे से अभ्यास किया है जिसमें बुद्धिजीवी बात करते हैं तो इससे काम नहीं चलेगा; तुम इसे नहीं कर पाओगे। तुम लोगों की क्षमता के हिसाब से तुम्हें कम से कम बुद्धिमानी और कुशलता के साथ बोलने में सक्षम होना चाहिए और चीज़ों को स्पष्ट रूप से और समझ में आने वाले ढंग से बताना चाहिए। अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए बस इतने की ज़रूरत है। कम से कम, यदि तुम अंतर्दृष्टि और समझ प्राप्त कर लेते हो, तो यह पर्याप्त है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है स्वयं के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करना। तुम्हें उस कुरूपता को अवश्य त्याग देना चाहिए जो तुममें व्यक्त होती है। यदि तुमने इन्हें त्यागा नहीं है, तो परम समझ और परम अंतर्दृष्टि की बात कैसे कर सकते हो? यह देखते हुए कि युग बदल गया है, बहुत से लोगों में विनम्रता या धैर्य का अभाव है, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। ये लोग कितनेबेहूदा हैं! क्या उनमें रत्ती भर भी सामान्य मानवता है? क्या उनके पास कोई बताने लायक गवाही है? उनके पास किसी भी तरह की कोई अंतर्दृष्टि और समझ नहीं है। निस्सन्देह, लोगों के व्यवहार के कुछ पहलुओं को, जो पथभ्रष्ट और गलत हैं, सही किए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, लोगों के अतीत का कठोर आध्यात्मिक जीवन और उनका संवेदनशून्य और मूर्खतापूर्ण रूप—इन सभी चीजों को बदलना होगा। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें स्वच्छंद होने दिया जाए या शरीर में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो वह बोलने दिया जाए। तुम्हें लापरवाही से नहीं बोलना चाहिए। एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना और बोलना-चालना सुसंगति से बोलना है, जब तुम्हारा आशय "हाँ" होता है तो "हाँ" बोलना, "नहीं" आशय होने पर "नहीं" बोलना। तथ्यों के मुताबिक रहो और उचित तरीके से बोलो। कपट मत करो, झूठ मत बोलो। स्वभाव में बदलाव के संबंध में सामान्य व्यक्ति जिन सीमाओं तक पहुँच सकता है, उन्हें अवश्य समझना चाहिए। अन्यथा तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्षमता को बढ़ाना परमेश्वर द्वारा उद्धार पाने के लिए है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 448

मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग "औसत दर्जे के" माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं? यदि कोई मनुष्य अपने आपको परमेश्वर कहता है, मगर अपनी दिव्यता व्यक्त करने, स्वयं परमेश्वर का कार्य करने या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है, तो वह नि:संदेह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है, और परमेश्वर जो सहज रूप से प्राप्त कर सकता है, वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है, जो उसके द्वारा सहज रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता, और वह सृजित प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है। इतना ही नहीं, वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर द्वारा ध्यान रखे जाने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने के योग्य भी नहीं है। कई लोग जो परमेश्वर का भरोसा खो चुके हैं, परमेश्वर का अनुग्रह भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने कुकर्मों से घृणा नहीं करते, बल्कि ढिठाई से इस बात का प्रचार भी करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है, और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व तक से इनकार कर देते हैं। इस प्रकार की विद्रोहशीलता रखने वाले लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के पात्र कैसे हो सकते हैं? जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे परमेश्वर के विरुद्ध अत्यधिक विद्रोही और उसके अत्यधिक ऋणी होते हैं, फिर भी वे पलट जाते हैं और हमलावर होकर कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। इस तरह के मनुष्य पूर्ण बनाए जाने लायक कैसे हो सकते हैं? क्या यह हटा दिए जाने और दंडित किए जाने की ओर नहीं ले जाता? जो लोग परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे पहले से ही सर्वाधिक जघन्य अपराधों के दोषी हैं, जिसके लिए मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी वे परमेश्वर के साथ बहस करने और उसके साथ अपनी बराबरी करने की धृष्टता करते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का क्या महत्व है? जब लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में विफल होते हैं, तो उन्हें अपराध और कृतज्ञता महसूस करनी चाहिए; उन्हें अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए, और इससे भी अधिक, उन्हें परमेश्वर को अपना जीवन अर्पित कर देना चाहिए। केवल तभी वे सृजित प्राणी होते हैं, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं का आनंद लेने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य हैं। और तुम लोगों में से अधिकतर क्या हैं? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हो, जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपना कर्तव्य किस तरह निभाया है? क्या तुमने, अपने जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है, जिसे करने के लिए तुम लोगों से कहा गया था? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों को मुझसे कुछ ज्यादा नहीं मिला है? क्या तुम लोग विचार कर सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और उस सबका क्या हुआ, जो मैंने तुम लोगों को दिया है और तुम लोगों के लिए किया है? क्या तुम लोगों ने यह सब माप लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आकलन और तुलना उस जरा-से विवेक के साथ कर ली है, जो तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैने तुम लोगों को दिया है? मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिलकुल असफल हो गए हो? तुम लोगों को सृजित प्राणी कैसे माना जा सकता है? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि तुम क्या व्यक्त कर रहे हो और क्या जी रहे हो? तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रहे हो, पर तुम परमेश्वर की सहनशीलता और भरपूर अनुग्रह प्राप्त करना चाहते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो कुछ नहीं माँगते और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम जैसे मामूली लोग स्वर्ग के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनंत सज़ा ही तुम लोगों को अपने जीवन में मिलेगी! यदि तुम लोग मेरे प्रति विश्वसनीय नहीं हो सकते, तो तुम लोगों के भाग्य में दु:ख ही होगा। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते, तो तुम्हारा परिणाम दंड होगा। राज्य के समस्त अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है, जिसके तुम काबिल हो और जो तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 449

वे अज्ञानी और घमंडी लोग न केवल पूरी कोशिश नहीं करते, बल्कि वे अपना कर्तव्य भी नहीं निभाते, बस वे अनुग्रह के लिए अपने हाथ पसार देते हैं, मानो वे जो माँगते हैं, उसके योग्य हों। और यदि वे वह प्राप्त नहीं कर पाते, जो वे माँगते हैं, तो वे और भी कम विश्वासपात्र बन जाते हैं। ऐसे लोगों को सही कैसे माना जा सकता है? तुम लोग कमजोर क्षमता के और विवेकशून्य हो; प्रबंधन के कार्य के दौरान तुम लोगों को जो कर्तव्य पूरा करना चाहिए, उसे करने में तुम पूर्णतः अक्षम हो। तुम लोगों का महत्व पहले ही तेजी से घट चुका है। अपने साथ ऐसा उपकार करने का बदला चुकाने की तुम्हारी विफलता पहले ही चरम विद्रोह का कृत्य है, जो तुम्हारी निंदा करने के लिए पर्याप्त है और तुम्हारी कायरता, अक्षमता, अधमता और अनुपयुक्तता प्रदर्शित करता है। कौन-सी चीज़ तुम्हें अपने हाथ पसारे रखने का अधिकार देती है? तुम लोगों का मेरे कार्य में थोड़ी-सी भी सहायता करने में अक्षम होना, वफ़ादार होने में अक्षम होना, और मेरे लिए गवाही देने में अक्षम होना तुम्हारे कुकर्म और असफलताएँ हैं, इसके बावजूद तुम लोग मुझ पर आक्रमण करते हो, मेरे बारे में झूठी बातें करते हो, और शिकायत करते हो कि मैं अधर्मी हूँ। क्या यही तुम्हारी निष्ठा है? क्या यही तुम्हारा प्रेम है? इससे अधिक तुम लोग और क्या कर सकते हो? जो भी कार्य किया गया है, उसमें तुम लोगों ने क्या योगदान दिया है? तुमने खुद को कितना खपाया किया है? तुम लोगों को कोई दोष न देकर मैंने पहले ही बड़ी सहनशीलता दिखाई है, फिर भी तुम लोग बेशर्मी से मुझसे बहाने बनाते हो और निजी तौर पर मेरी शिकायत करते हो। क्या तुम लोगों में मानवता का हलका-सा भी निशान है? यद्यपि मनुष्य का कर्तव्य उसके मन और उसकी अवधारणाओं से दूषित है, फिर भी तुम्हें अपना कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए और अपनी वफादारी दिखानी चाहिए। मनुष्य के कार्य में अशुद्धताएँ उसकी क्षमता की समस्या हैं, जबकि, यदि मनुष्य अपना कर्तव्य पूरा नहीं करता, तो यह उसकी विद्रोहशीलता दर्शाता है। मनुष्य के कर्तव्य और वह धन्य है या शापित, इनके बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, जो प्रतिफल, स्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है। धन्य होना उसे कहते हैं, जब कोई पूर्ण बनाया जाता है और न्याय का अनुभव करने के बाद वह परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेता है। शापित होना उसे कहते हैं, जब ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता, ऐसा तब होता है जब उन्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुभव नहीं होता, बल्कि उन्हें दंडित किया जाता है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें धन्य किया जाता है या शापित, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल धन्य होने के लिए नहीं करना चाहिए, और तुम्हें शापित होने के भय से अपना कार्य करने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज़ है, जो उसे करनी ही चाहिए, और यदि वह अपना कर्तव्य करने में अक्षम है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है। अपना कर्तव्य पूरा करने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कार्य करने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को प्राप्त करोगे, और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य बेमन से करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, और अपना कर्तव्य पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं, जो अपरिवर्तित रहते हैं और शापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 450

अगर तुम्हें परमेश्वर के काम का ज्ञान नहीं है, तो तुम्हें यह नहीं पता होगा कि परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करना है। अगर तुम परमेश्वर के काम के सिद्धांतों को नहीं जानते और इस बात से अनजान हो कि शैतान मनुष्य पर कैसे काम करता है, तो तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। मात्र उत्साह भरा अनुसरण तुम्हें वे परिणाम नहीं पाने देगा, जिनकी माँग परमेश्वर करता है। अनुभव करने का यह तरीका लॉरेंस के तरीके के समान है : किसी तरह का कोई फर्क न करना और केवल अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना, इन बातों से पूरी तरह से अनजान रहना कि शैतान का क्या काम है, पवित्र आत्मा का क्या काम है, परमेश्वर की उपस्थिति के बिना मनुष्य किस स्थिति में होता है, और किस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाना चाहता है। विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हुए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए, वर्तमान में परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें, परमेश्वर के स्वभाव को कैसे जानें, और परमेश्वर की दया, उसकी महिमा और धार्मिकता किन लोगों, परिस्थितियों और युग पर निर्देशित की जाती हैं—वह इनमें से किसी में अंतर नहीं करता। अगर लोगों के पास अपने अनुभवों के लिए नींव के रूप में अनेक दर्शन नहीं हैं, तो जीवन नामुमकिन है, और अनुभव उससे भी ज्यादा नामुमकिन; वे मूर्खतापूर्ण ढंग से किसी के भी प्रति समर्पित होते रहते हैं और सब-कुछ सहते रहते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाया जाना बहुत मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि अगर तुम्हारे पास उपर्युक्त में से कोई दर्शन नहीं है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि तुम महामूर्ख हो, नमक के खंभे के समान, जो हमेशा इजराइल में खड़ा रहता है। ऐसे लोग बेकार और निकम्मे हैं! कुछ लोग केवल आँख मूँदकर समर्पण कर देते हैं, वे हमेशा अपने आपको जानते हैं और नए मामलों से निपटने के लिए हमेशा आचार-व्यवहार के अपने ही तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या उल्लेख के भी योग्य न होने वाले तुच्छ मामलों से निपटने के लिए "बुद्धि" का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग विवेकहीन होते हैं, मानो उनका स्वभाव ही चुने जाने से इनकार कर देने वाला हो, और वे हमेशा एक जैसे रहते हैं, कभी नहीं बदलते। ऐसे लोग मूर्ख होते हैं, जिनके पास थोड़ा भी विवेक नहीं होता। वे कभी भी परिस्थितियों या विभिन्न लोगों के लिए उपयुक्त उपाय करने की कोशिश नहीं करते। ऐसे लोगों के पास अनुभव नहीं है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो स्वयं के ज्ञान से इतने बँधे हुए हैं कि जब उनका बुरी आत्माओं के काम से जुड़े लोगों से सामना होता है, तो वे अपना सिर झुका लेते हैं और पाप स्वीकार कर लेते हैं, खड़े होकर उनकी निंदा करने का साहस नहीं करते। और जब उनका ज़ाहिर तौर पर पवित्र आत्मा के कार्य से सामना होता है, तो वे उसका पालन करने की हिम्मत नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर के हाथों में हैं, और उनमें खड़े होकर उनका विरोध करने का ज़रा-सा भी साहस नहीं होता। ऐसे लोग परमेश्वर पर अपमान लाते हैं, और वे उसके लिए भारी बोझ सहन कर पाने में बिलकुल असमर्थ हैं। ऐसे मूर्ख किसी प्रकार का भेद नहीं करते। अनुभव करने के इस तरह के तरीके को इसलिए त्याग दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की दृष्टि में असमर्थनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अनुभव पर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 451

वर्तमान धारा में उन सभी के पास, जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर है। चाहे वे युवा हों या वृद्ध, जब तक वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और श्रद्धा रखते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके भिन्न-भिन्न कार्यों के अनुसार पूर्ण करता है। जब तक तुम अपनी पूरी शक्ति लगाते हो और परमेश्वर के कार्य के लिए प्रस्तुत रहते हो, तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो। वर्तमान में तुम लोगों में से कोई भी पूर्ण नहीं है। कभी तुम एक प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हो, और कभी तुम दो कार्य कर सकते हो। जब तक तुम अपने आपको परमेश्वर के लिए खपाने की पूरी कोशिश करते हो, तब तक तुम अंतत: परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे।

युवा लोगों के पास कम जीवन-दर्शन हैं, और उनमें बुद्धि और अंतर्दृष्टि की कमी है। परमेश्वर मनुष्य की बुद्धि और अंतर्दृष्टि को पूर्ण करने के लिए आता है। उसका वचन उनकी कमियाँ पूरी करता है। फिर भी, युवा लोगों का स्वभाव चंचल होता है, और उसे परमेश्वर द्वारा रूपांतरित किया जाना आवश्यक है। युवा लोगों में धार्मिक विचार और जीवन-दर्शन कम होते हैं; वे हर चीज़ के बारे में सरल ढंग से सोचते हैं, और उनके विचार जटिल नहीं होते। यह उनकी मनुष्यता का अंग है, जिसने अभी तक आकार नहीं लिया है, और यह एक सराहनीय अंग है; किंतु युवा लोग अबोध हैं और उनमें विवेक की कमी है। यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की आवश्यकता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने से तुम लोग विवेक विकसित करने में सक्षम होगे। तुम अनेक आध्यात्मिक चीज़ें स्पष्ट रूप से समझने में सक्षम होगे, और धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाओगे, जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए उपयुक्त हो। वृद्ध भाई-बहनों के पास भी करने के लिए अपने काम हैं, और परमेश्वर ने उन्हें त्यागा नहीं है। वृद्ध भाई-बहनों में भी वांछनीय और अवांछनीय दोनों पहलू हैं। उनके पास अधिक जीवन-दर्शन और अधिक धार्मिक विचार होते हैं। अपने कार्यों में वे कई कठोर परंपराओं का पालन करते हैं, वे नियमों के शौकीन होते हैं जिन्हें वे यंत्रवत् और लचीलेपन के बिना लागू करते हैं। यह एक अवांछनीय पहलू है। किंतु ये वृद्ध भाई और बहन हर परिस्थिति में शांत और दृढ़ बने रहते हैं; उनके स्वभाव स्थिर होते हैं, और वे अप्रत्याशित और अस्थिर मनोदशाओं वाले नहीं होते। वे चीज़ों को स्वीकार करने में धीमे हो सकते हैं, पर यह कोई बड़ा दोष नहीं है। जब तक तुम लोग समर्पित हो सकते हो; जब तक तुम परमेश्वर के वर्तमान वचनों को स्वीकार कर सकते हो और उनकी छानबीन नहीं करते; जब तक तुम केवल समर्पण और अनुसरण से ताल्लुक रखते हो, और परमेश्वर के वचनों पर कभी कोई निर्णय नहीं देते या उनके बारे में कोई अन्य बुरे विचार नहीं रखते; जब तक तुम उसके वचनों को स्वीकार करते हो और उन्हें अभ्यास में लाते हो—तब तक, ये शर्तें पूरी करने पर तुम पूर्ण किए जा सकते हो।

तुम युवा भाई-बहन हो या वृद्ध, तुम जानते हो कि तुम्हें क्या कार्य करना है। जो अपनी युवावस्था में हैं, वे अभिमानी नहीं हैं; जो वृद्ध हैं, वे निष्क्रिय नहीं हैं और न ही वे पीछे हटते हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे के सामर्थ्य का उपयोग करने में सक्षम हैं, और वे बिना किसी पूर्वाग्रह के एक-दूसरे की सेवा कर सकते हैं। युवा और वृद्ध भाई-बहनों के बीच मित्रता का एक पुल बन गया है, और परमेश्वर के प्रेम के कारण तुम लोग एक-दूसरे को बेहतर समझने में सक्षम हो। युवा भाई-बहन वृद्ध भाई-बहनों को हेय दृष्टि से नहीं देखते, और वृद्ध भाई-बहन दंभी नहीं हैं : क्या यह एक सामंजस्यपूर्ण साझेदारी नहीं है? यदि तुम सभी का यही संकल्प हो, तो तुम लोगों की पीढ़ी में परमेश्वर की इच्छा निश्चित रूप से पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 452

तुम्हें भविष्य में आशीष दिया जाएगा या शाप, इसका निर्णय तुम्हारे आज के कार्य और व्यवहार के आधार पर किया जाएगा। यदि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाना है, तो यह बिलकुल अभी होना चाहिए, इसी युग में; भविष्य में दूसरा कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर तुम लोगों को सच में अभी पूर्ण करना चाहता है, और यह बस कहने की बात नहीं है। भविष्य में चाहे कोई भी परीक्षण तुम पर आकर पड़े, चाहे कैसी भी घटनाएँ घटें, या तुम्हें कैसी भी आपदाओं का सामना करना पड़े, परमेश्वर तुम लोगों को पूर्ण करना चाहता है; यह एक निश्चित और निर्विवाद तथ्य है। इसे कहाँ देखा जा सकता है? इसे इस तथ्य में देखा जा सकता है कि युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर के वचन ने ऐसी महान ऊँचाई कभी प्राप्त नहीं की, जैसी आज प्राप्त की है। यह उच्चतम क्षेत्र में प्रविष्ट हो चुका है, और पूरी मानवजाति पर पवित्र आत्मा का कार्य आज बेमिसाल है। पिछली पीढ़ियों में से शायद ही किसी ने ऐसा अनुभव किया होगा; यहाँ तक कि यीशु के युग में भी आज के प्रकाशन विद्यमान नहीं थे। तुम लोगों से बोले गए वचन, तुम्हारी समझ और तुम्हारे अनुभव, सब एक नए शिखर पर पहुँच गए हैं। तुम लोग परीक्षणों और ताड़नाओं के मध्य से हटते नहीं हो, और यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर के कार्य ने एक अभूतपूर्व वैभव प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य कर सकता है, न ही यह कोई ऐसी बात है जिसे मनुष्य बनाए रखता है; बल्कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य की अनेक वास्तविकताओं से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करना चाहता है, और वह निश्चित रूप से तुम लोगों को पूर्ण करने में सक्षम है। यदि तुम लोगों में यह अंतर्दृष्टि है और तुम यह नई खोज करते हो, तो तुम यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा नहीं करोगे, बल्कि तुम सब परमेश्वर को इसी युग में स्वयं को पूर्ण करने दोगे। इसलिए, तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना अधिकतम प्रयास करना चाहिए, कोई प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सको।

अब तुम्हें नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पहले, हर उस चीज़ को अलग रख दो और उसकी उपेक्षा करो, जो तुम्हें नकारात्मक महसूस कराए। जब तुम कामकाज सँभाल रहे होते हो, तो ऐसे दिल से सँभालो, जो खोज करता हो और सावधानी से आगे बढ़ता हो, ऐसा दिल जो परमेश्वर के प्रति समर्पित होता हो। जब कभी तुम लोगों को अपने भीतर किसी कमजोरी का पता चले, पर तुम उसे खुद पर काबू न पाने दो, और उसके बावजूद तुम वे कार्य करो, जो तुम्हें करने चाहिए, तो तुमने एक सकारात्मक कदम आगे बढ़ा लिया। उदाहरण के लिए, तुम वृद्ध भाई-बहनों की धार्मिक धारणाएँ हैं, फिर भी तुम प्रार्थना कर सकते हो, समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के वचन खा-पी सकते हो, और भजन गा सकते हो...। दूसरे शब्दों में, तुम जो कुछ भी करने में सक्षम हो, जो कोई भी कार्य तुम कर सकते हो, तुम्हें अपनी पूरी शक्ति के साथ उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। निष्क्रियता से प्रतीक्षा न करो। अपने कर्तव्य के निर्वहन में परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम होना पहला कदम है। फिर, एक बार जब तुम सत्य को समझने में सक्षम हो जाओगे और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश हासिल कर लोगे, तब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा चुके होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 453

प्रत्येक व्यक्ति, जिसने संकल्प लिया है, परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परंतु यह अवश्य है कि जो परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखते हैं और परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य और पात्र हैं। मैंने तुम लोगों में यह पाया है : बहुत-से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के लिए सुसमाचार का उत्साहपूर्वक प्रसार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, इत्यादि, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है। यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल हाथ में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रसार करना और पश्चात्ताप तथा पाप स्वीकार करवाकर लोगों को बचाना है। बहुत-से धार्मिक अधिकारी हैं, जो सोचते हैं कि सेमिनरी में उन्नत अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद चैपलों में उपदेश देना और बाइबल के धर्मग्रंथ को पढ़कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है। इतना ही नहीं, गरीब इलाकों में ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बीमार लोगों की चंगाई करना और अपने भाई-बहनों में से दुष्टात्माओं को निकालना है, या उनके लिए प्रार्थना करना या उनकी सेवा करना है। तुम लोगों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, और साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाकर कार्य करना है। कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बनाना, और अपने संपूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है। बहुत कम लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं, जितने कि आकाश में तारे, किंतु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—दयनीय रूप से कम है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, क्योंकि तुम लोग "परमेश्वर की सेवा" वाक्यांश के सार को नहीं समझते, और यह बात तो बहुत ही कम समझते हो कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे की जाए। लोगों को यह समझने की तत्काल आवश्यकता है कि वास्तव में परमेश्वर की किस प्रकार की सेवा उसकी इच्छा के सामंजस्य में हो सकती है।

यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने की योग्यता रखते हैं। तुम लोगों को कम से कम इस ज्ञान से लैस अवश्य होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य जानने चाहिए, और उस कार्य को भी जानना चाहिए, जिसे परमेश्वर यहाँ और अभी करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोगों को पहले प्रवेश पाना चाहिए और पहले परमेश्वर की आज्ञा प्राप्त करनी चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव कर लोगे, और जब तुम वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग परमेश्वर की सेवा करते हो, तब वह तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोलता है, और तुम्हें अपने कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने और उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करोगे, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गंभीर और वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और अपने भाई-बहनों को आपूर्ति प्रदान करने में सक्षम हो जाएँगे, ताकि तुम लोग अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल यह परिणाम प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने योग्य बन पाओगे और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे।

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावना पर कोई विचार नहीं करते : यहाँ तक कि जब उनके पास कोई संभावना नहीं होती, और उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं होता, तब भी वे हमेशा एक प्रेमपूर्ण हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमज़ोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 454

यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि उसने अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखा। इसलिए वह परमेश्वर का अंतरंग—स्वयं परमेश्वर भी था, एक ऐसी बात, जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह स्वयं परमेश्वर था, जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी। मैंने इसका उल्लेख मुद्दे को उदहारण के साथ समझाने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए किया है।) वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिलकुल केंद्र में रखने में समर्थ था, और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा जानने का प्रयास करता था। उसने प्रार्थना की और कहा : "परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो, उसे पूरा कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किंतु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके, जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें करना चाहता है।" यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की जरा-सी भी इच्छा नहीं थी; एक सामर्थ्यवान ताक़त उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी, जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा करते हुए पापमय देह के सदृश बन गया। वह मृत्यु एवं अधोलोक की बेड़ियों से मुक्त हो गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपना सामर्थ्य खो दिया और उससे परास्त हो गए। वह तेंतीस वर्षों तक जीवित रहा, और इस पूरे समय उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार किए बिना और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। अत:, उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य और उसका पात्र बन गया। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना बड़ा कार्य इसलिए दिया, क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह की इच्छाओं से मुँह मोड़ सकते हो, तो परमेश्वर अपने महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तें पूरी कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम परमेश्वर की इच्छा और आदेश पूरे कर रहे हो, और केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो? आज, जबकि तुम यह तक नहीं समझते कि परमेश्वर की सेवा कैसे की जाए, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते? इस बारे में विचार करो : तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या अपनी? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इससे क्या तुम परमेश्वर का तिरस्कार नहीं करते? मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, ताकि तुम लोग जान सको कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा करने के लिए कौन-सी शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं। यदि तुम लोग अपना हृदय परमेश्वर को नहीं देते, यदि तुम लोग यीशु की तरह परमेश्वर की इच्छा पर पूरा ध्यान नहीं देते, तो तुम लोगों पर परमेश्वर द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता, और अंतत: परमेश्वर द्वारा तुम्हारा न्याय किया जाएगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति अपनी सेवा में, तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देने का इरादा रखते हो और उसके साथ हमेशा लापरवाही से व्यवहार करते हो। संक्षेप में, किसी भी अन्य चीज़ की परवाह किए बिना, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम्हारा निर्मम न्याय किया जाएगा। तुम लोगों को, परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ उठाते हुए, पहले बिना विभाजित वफादारी के अपना हृदय परमेश्वर को देना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो या लोगों के सामने, तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर उन्मुख होना चाहिए, और तुम्हें यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प लेना चाहिए। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ, जो उसके हृदय के अनुकूल हो। यदि तुम वाकई परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और अपनी सेवा को उसकी इच्छा के अनुरूप बनाना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वास के बारे में अपना पूर्व दृष्टिकोण बदलना चाहिए, और परमेश्वर की सेवा के अपने पुराने ढंग में बदलाव लाना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हें अधिक से अधिक पूर्ण बनाया जा सके। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें त्यागेगा नहीं, और पतरस के समान, तुम उन लोगों के साथ अगली पंक्ति में होगे, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम्हारा अंत यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 455

संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं की इच्छा को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर की सेवा अपनी भलाई के लिए करते हो, तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो। इसके अलावा, तुम हमेशा सोचते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, वो परमेश्वर को पसंद है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो, उनसे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा तुम्हें और भी अधिक ज़िद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, तुम्हारे मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे नियम बन जाएँगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर और तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार तुम्हारी सेवा से प्राप्त अनुभवों पर आधारित होंगे। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह दुनिया में जीने का मनुष्य का जीवन-दर्शन है। इस तरह के लोगों को फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि वे कभी भी जागते और पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह विरोधी बन जाएँगे जो अंत के दिनों में लोगों को धोखा देते हैं। झूठे मसीह और मसीह विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, यदि वे अपने चरित्र का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय बहिष्कृत कर दिए जाने के ख़तरे में होते हैं। जो दूसरों के दिलों को जीतने, उन्हें व्याख्यान देने और नियंत्रित करने तथा ऊंचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, पद के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—उनका परमेश्वर के सामने पतन हो जाएगा। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते और अपनी योग्यताओं पर इतराते पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्णता प्रदान नहीं करेगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती है। लोग हमेशा पुराने से चिपके रहते हैं। वे अतीत की धारणाओं और अतीत की हर चीज़ से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे पूरे जीवन को विफल कर देंगी। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा, थोड़ी-सी भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की "सेवा" में शहीद हो जाओ। इसके विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 456

आज से, परमेश्वर विधिवत् रूप से उन्हें पूर्ण बनाएगा जिनकी कोई धार्मिक धारणाएँ नहीं हैं, जो अपनी पुरानी अस्मिताओं को एक ओर रखने के लिए तैयार हैं, और जो एक सरल-हृदय से परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं। वह उन्हें पूर्ण बनाएगा जो परमेश्वर के वचन की लालसा करते हैं। ऐसे लोगों को तैयार हो जाना चाहिए और परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए। परमेश्वर में अनंत विपुलता और असीम बुद्धि है। उसके अद्भुत कार्य और बहुमूल्य वचन अधिक से अधिक लोगों द्वारा उनका आनंद लिए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपनी वर्तमान स्थिति में, जो धार्मिक धारणाओं वाले लोग हैं, जो वरिष्ठता ओढ़ लेते हैं, और जो स्वयं को एक ओर नहीं रख सकते हैं, उन्हें इन नयी चीज़ों को स्वीकार करना मुश्किल लगता है। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का कोई अवसर नहीं है। यदि कोई व्यक्ति आज्ञापालन करने के लिए कृतसंकल्प नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का प्यासा नहीं है, तो वह इन नयी बातों को ग्रहण करने में असमर्थ रहेगा; वह बस और भी ज़्यादा विद्रोही, और भी ज़्यादा चालाक बनता जाएगा, और इस प्रकार गलत मार्ग पर पहुँच जाएगा। अब अपना कार्य करने में, परमेश्वर और अधिक लोगों को ऊँचा उठाएगा जो उससे सच्चा प्यार करते हैं और नये प्रकाश को स्वीकार कर सकते हैं। वह उन धार्मिक अधिकारियों की पूरी तरह से छोटा बना देगा जो अपनी वरिष्ठता का घमंड करते हैं। जो ज़िद के साथ परिवर्तन का विरोध करते हैं, वह उनमें से एक को भी नहीं चाहता है। क्या तुम इन लोगों में से एक बनना चाहते हो? क्या तुम अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अपनी सेवा देते हो, या तुम वह करते हो जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है? यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें स्वयं के लिए अवश्य जानना चाहिए। क्या तुम एक धार्मिक अधिकारी हो, अथवा क्या तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए गए एक नवजात शिशु हो? तुम्हारी कितनी सेवा की पवित्र आत्मा के द्वारा प्रशंसा की जाती है? इसमें से कितनी बातें परमेश्वर याद रखने की परवाह भी नहीं करेगा? कई वर्षों की सेवा के बाद, तुम्हारा जीवन कितना परिवर्तित हुआ है? क्या तुम इन सबके बारे में स्पष्ट हो? यदि तुम्हारे पास सच्चा विश्वास है, तो तुम अपनी पहले की पुरानी धार्मिक धारणाओं को छोड़ दोगे, और परमेश्वर की नए सिरे से बेहतर ढंग से सेवा करोगे। उठ खड़े होने के लिए अभी बहुत देरी नहीं हुई है। पुरानी धार्मिक धारणाएँ व्यक्ति के पूरे जीवन को जकड़ सकती हैं। व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया गया अनुभव उसे परमेश्वर से भटका सकता है और चीज़ों को अपने तरीके से करवा सकता है। यदि तुम इन चीज़ों को एक तरफ़ नहीं रखते हो, तो ये तुम्हारे जीवन की उन्नति में बाधा बन जाएँगी। परमेश्वर सदैव उन्हें पूर्ण बनाता है जो उसकी सेवा करते हैं और उन्हें आसानी से बहिष्कृत नहीं करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को सच में स्वीकार करते हो, यदि तुम अपने पुराने धार्मिक तौर-तरीकों और नियमों को एक ओर रख सकते हो, और पुरानी धार्मिक धारणाओं को आज परमेश्वर के वचन के मापदंड के रूप में उपयोग करना बंद कर सकते हो, केवल तभी तुम्हारे लिए एक अच्छा भविष्य होगा। किन्तु यदि तुम पुरानी चीज़ों से चिपके रहते हो, यदि तुम उन्हें अभी भी संजो कर रखते हो, तो तुम्हें किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता। परमेश्वर इस तरह के लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है। यदि तुम वास्तव में पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तब तुम्हें पहले की हर चीज़ को पूरी तरह से त्यागने के लिए कृतसंकल्प अवश्य होना चाहिए। भले ही पहले जो किया गया था वह सही था, भले ही वह परमेश्वर का कार्य था, तब भी तुम्हें इसे एक ओर करने और इससे चिपके रहना बंद करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। भले ही यह स्पष्ट रूप से पवित्र आत्मा का कार्य था, प्रत्यक्ष रूप से पवित्र आत्मा द्वारा किया गया था, तब भी आज तुम्हें इसे अवश्य एक ओर कर देना चाहिए। तुम्हें इसे पकड़े नहीं रहना चाहिए। परमेश्वर यही अपेक्षा करता है। हर चीज़ का नवीकरण किया जाना चाहिए। परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के कार्य में, वह उन पुरानी बातों का कोई संदर्भ नहीं देता है जो पहले हुईं थीं, और वह पुराने इतिहास को नहीं खोदता है। परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है। वह अतीत के अपने स्वयं के वचनों से भी नहीं चिपकता है, जिससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर किन्हीं नियमों का पालन नहीं करता है। इसलिए, एक मनुष्य के रूप में, यदि तुम सदैव अतीत की बातों से चिपके रहते हो, उन्हें जाने नहीं देते हो, और उन्हें नियमबद्ध तरीके से कठोरता से लागू करते हो, जबकि परमेश्वर उस तरीके से अब और कार्य नहीं कर रहा है जिससे उसने पहले किया था, तो क्या तुम्हारे वचन और कार्य विध्वंसकारी नहीं हैं? क्या तुम परमेश्वर के शत्रु नहीं बन गए हो? क्या तुम इन पुरानी बातों में अपने पूरे जीवन को विध्वंस और नष्ट होने देना चाहते हो? ये पुरानी बातें तुम्हें ऐसा व्यक्ति बना देती हैं जो परमेश्वर के कार्य में बाधा डालता है। क्या तुम इस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहते हो? यदि तुम सच में ऐसा नहीं चाहते हो, तो जो तुम कर रहे हो उसे तुरंत रोक दो और मुड़ जाओ; सब कुछ पुन: आरंभ करो। परमेश्वर तुम्हारी अतीत की सेवाओं को याद नहीं रखेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 457

कार्य के संबंध में, मनुष्य का विश्वास है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना ही कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किंतु यह अत्यधिक एकतरफा है; परमेश्वर इंसान से जो माँगता है, वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर दौड़ना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और पोषण से जुड़ा है। कई भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पित कार्य परमेश्वर द्वारा की गई माँग के साथ असंगत है। इसलिए, मनुष्य को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और ठीक इसी कारण से मनुष्य का प्रवेश भी काफ़ी एकतरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करने से अपने प्रवेश की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि तुम लोग अनुभव के हर पहलू से बेहतर ढंग से गुज़र सको। यही है वह, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और साथ ही मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और इसे सभी लोगों को समझना चाहिए। कहा जा सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। कई वर्षों से परमेश्वर की सेवा और मनुष्य की सेवकाई करने वालों ने कार्य करने और उपदेश देने को ही प्रवेश मान लिया है, और किसी ने भी अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव को महत्वपूर्ण प्रवेश के रूप में नहीं लिया है। इसके बजाय, उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त प्रबुद्धता को दूसरों को सिखाने के लिए पूँजी के रूप में लिया है। उपदेश देते समय उन पर बहुत ज़िम्मेदारी होती है और वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हैं, और इसके माध्यम से वे पवित्र आत्मा की वाणी को प्रकाशित कर रहे हैं। इस समय, जो लोग कार्य करते हैं, वे आत्मसंतोष से भर जाते हैं, मानो पवित्र आत्मा का कार्य उनका व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन गया हो; उन्हें लगता है कि उनके द्वारा बोले गए सभी वचन उनके स्वयं के हैं, लेकिन फिर मानो उनका स्वयं का अनुभव उतना स्पष्ट नहीं होता, जितना उन्होंने वर्णन किया होता है। और तो और, बोलने से पहले उन्हें पता भी नहीं होता कि क्या बोलना है, किंतु जब पवित्र आत्मा उनमें कार्य करता है, तो उनके वचन अनवरत रूप से धाराप्रवाह बह निकलते हैं। एक बार जब तुम इस तरह उपदेश दे लेते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद उतना छोटा नहीं है, जितना तुम मानते थे, और उस स्थिति में, जब पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कई बार कार्य कर लेता है, तो तुम यह निश्चित कर लेते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही आध्यात्मिक कद है और ग़लत ढंग से यह मान लेते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा स्वयं का प्रवेश और तुम्हारा स्वयं का अस्तित्व है। जब तुम लगातार इस तरह अनुभव करते हो, तो तुम अपने स्वयं के प्रवेश के बारे में सुस्त हो जाते हो, अनजाने ही आलस्य में फिसल जाते हो, और अपने स्वयं के प्रवेश को महत्व देना बंद कर देते हो। इसलिए, दूसरों की सेवकाई करते समय तुम्हें अपने आध्यात्मिक कद और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करना चाहिए। यह तुम्हारे प्रवेश को बेहतर तरीके से सुगम बना सकता है और तुम्हारे अनुभव को लाभ पहुँचा सकता है। जब मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य को अपना व्यक्तिगत अनुभव मान लेता है, तो यह भ्रष्टता का स्रोत बन जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, तुम लोग जो भी कर्तव्य करो, तुम लोगों को अपने प्रवेश को एक महत्वपूर्ण सबक समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 458

व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा पूरी करने, परमेश्वर के हृदय के अनुरूप लोगों को उसके सामने लेकर आने, मनुष्य को परमेश्वर के समक्ष लाने, और मनुष्य को पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से परिचित कराने के लिए कार्य करता है, और इस प्रकार वह परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूरा करता है। इसलिए, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य के सार पर पूरी तरह से स्पष्ट रहो। ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसका परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है, हर मनुष्य परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य है, अर्थात्, हर एक के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। किंतु एक बात का तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए : जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर दिया गया होता है, किंतु मनुष्य द्वारा जो कहा और जाना जाता है, वह पूर्णतः मनुष्य का आध्यात्मिक कद नहीं होता। तुम लोग बस यही कर सकते हो, कि अपने कार्य के दौरान बेहतर ढंग से अपनी कमियों के बारे में जानो, और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त करो। इस प्रकार, तुम लोग अपने कार्य के दौरान बेहतर प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होगे। यदि मनुष्य परमेश्वर से प्राप्त मार्गदर्शन को अपना स्वयं का प्रवेश और अपने में अंतर्निहित चीज़ समझता है, तो मनुष्य के आध्यात्मिक कद के विकसित होने की कोई संभावना नहीं है। पवित्र आत्मा मनुष्य में जो प्रबुद्धता गढ़ता है, वह तब घटित होता है जब मनुष्य एक सामान्य स्थिति में होता है; ऐसे समय पर, मनुष्य प्रायः स्वयं को प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता को अपना वास्तविक अध्यात्मिक कद समझने की ग़लती कर बैठता है, क्योंकि जिस रूप में पवित्र आत्मा प्रबुद्ध करता है, वह अत्यंत सामान्य होता है, और वह मनुष्य के भीतर जो अंतर्निहित है, उसका उपयोग करता है। जब लोग कार्य करते और बोलते हैं, या जब वे प्रार्थना या अपनी आध्यात्मिक भक्ति कर रहे होते हैं, तो एक सत्य अचानक उन पर स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन वास्तव में, मनुष्य जो देखता है, वह केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रबुद्धता होती है (स्वाभाविक रूप से यह प्रबुद्धता मनुष्य के सहयोग से जुड़ी है) और वह मनुष्य का सच्चा आध्यात्मिक कद प्रस्तुत नहीं करती। अनुभव की एक अवधि के बाद, जिसमें मनुष्य कुछ कठिनाइयों और परीक्षणों का सामना करता है, ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद प्रत्यक्ष हो जाता है। केवल तभी मनुष्य को पता चलता है कि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत बड़ा नहीं है, और मनुष्य का स्वार्थ, व्यक्तिगत हित और लालच सब उभर आते हैं। केवल इस तरह के अनुभवों के कई चक्रों के बाद ही कई ऐसे लोग, जो अपनी आत्माओं के भीतर जाग गए होते हैं, महसूस करते हैं कि अतीत में जो उन्होंने अनुभव किया था, वह उनकी अपनी वास्तविकता नहीं थी, बल्कि पवित्र आत्मा से प्राप्त एक क्षणिक रोशनी थी, और मनुष्य को केवल यह रोशनी प्राप्त हुई थी। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को सत्य को समझने के लिए प्रबुद्ध करता है, तो ऐसा प्रायः स्पष्ट और विशिष्ट तरीके से होता है, यह समझाए बिना कि चीज़ें किस तरह घटित हुई हैं या किस ओर जा रही हैं। अर्थात्, इस प्रकाशन में मनुष्य की कठिनाइयों को शामिल करने के बजाय वह सत्य को सीधे प्रकट करता है। जब मनुष्य प्रवेश की प्रक्रिया में कठिनाइयों का सामना करता है, और फिर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता को शामिल करता है, तो यह मनुष्य का वास्तविक अनुभव बन जाता है। ... इसलिए, जब तुम लोगों को पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त हो, तो उसी समय तुम्हें, यह देखते हुए कि वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और तुम लोगों का प्रवेश क्या है, और साथ ही अपने प्रवेश में पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल करते हुए, तुम लोगों को अपने प्रवेश पर और अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि तुम लोग पवित्र आत्मा द्वारा अन्य अनेक तरीकों से पूर्ण बनाए जा सको और पवित्र आत्मा के कार्य का सार तुम लोगों में गढ़ा जा सके। पवित्र आत्मा के कार्य के अपने अनुभव के दौरान तुम लोग पवित्र आत्मा को और साथ ही स्वयं को भी जान जाओगे, और इतना ही नहीं, क्या पता गहन कष्टों के कितने दौरों के बीच तुम लोग परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध विकसित कर लोगे, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच का संबंध दिन-ब-दिन घनिष्ठ होता जाएगा। काट-छाँट और शुद्धिकरण की असंख्य घटनाओं के बाद तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्यार विकसित हो जाएगा। यही कारण है कि तुम लोगों को यह महसूस करना चाहिए कि कष्ट, दंड और क्लेशों से डरना नहीं है; डरने की बात तो केवल पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना किंतु प्रवेश न करना है। जब परमेश्वर का कार्य पूरा होने का दिन आएगा, तो तुम लोगों का परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा; भले ही तुमने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया होगा, किंतु तुम लोग पवित्र आत्मा को नहीं जान पाए होगे या तुम लोगों ने स्वयं प्रवेश नहीं किया होगा। पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य में गढ़ी गयी प्रबुद्धता मनुष्य के जुनून को बनाए रखने के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य के प्रवेश के लिए एक मार्ग खोलने के लिए है, और साथ ही मनुष्य को पवित्र आत्मा को जानने देने और इस बिंदु से परमेश्वर के लिए श्रद्धा और भक्ति की भावनाएँ विकसित करने के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 459

उन लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होता है, जो काट-छाँट, निपटे जाने, न्याय और ताड़ना से होकर गुज़र चुके होते हैं, और उनके कार्य की अभिव्यक्ति भी कहीं अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने की अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हैं, वे काफी बड़ी गलतियाँ करते हैं। अपूर्ण लोगों के कार्य में उनकी स्वाभाविकता बहुत अधिक अभिव्यक्त होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की क्षमता कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे भी परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट, निपटे जाने और न्याय से गुज़रना ही चाहिए। यदि वह ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रा है, तो उसका कार्य, चाहे कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न किया गया हो, सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता, वह हमेशा उसकी अपनी स्वाभाविकता और मानवीय भलाई का परिणाम होता है। काट-छाँट, निपटे जाने और न्याय से होकर गुज़र चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट, निपटारा और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे मानव-देह और विचारों के सिवाय और कुछ भी व्यक्त नहीं करते, जिनमें बहुत सारी मानव-बुद्धि और जन्मजात प्रतिभा मिली होती है। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर के कार्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग ऐसे लोगों का अनुसरण करते हैं, वे अपनी जन्मजात क्षमता द्वारा उनके सामने लाए जाते हैं। चूँकि वे मनुष्य की अंतर्दृष्टि और अनुभव को बहुत अधिक व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग कटे हुए और उससे बहुत भटके हुए होते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला पाता, बल्कि वह उन्हें मनुष्य के सामने ले आता है। इसलिए, जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को क्रियान्वित करने योग्य नहीं हैं। योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है। अपूर्ण लोगों के कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है; उसमें बहुत अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई होती है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है—जिसके साथ वे पैदा हुए हैं। वह निपटे जाने के बाद का जीवन या रूपांतरित किए जाने के बाद की वास्तविकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्हें सहारा कैसे दे सकता हैं, जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का जीवन मूलत: उसकी जन्मजात बुद्धि या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धि या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सटीक अपेक्षाओं से काफी दूर होती है। यदि किसी मनुष्य को पूर्ण नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट नहीं की गई है और उससे निपटा नहीं गया है, तो उसकी अभिव्यक्ति और सत्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतर होगा; उसकी अभिव्यक्ति में उसकी कल्पना और एकतरफा अनुभव जैसी अस्पष्ट चीज़ों का मिश्रण होगा। इतना ही नहीं, वह कैसे भी कार्य क्यों न करे, लोग यही महसूस करते हैं कि उसमें ऐसा कोई समग्र लक्ष्य और ऐसा कोई सत्य नहीं है, जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। लोगों से जो अपेक्षाएँ की जाती हैं, उनमें से अधिकांश उनकी योग्यता से परे होती हैं, मानो वे मचान पर बैठने के लिए मजबूर की जा रही बतख़ें हों। यह मनुष्य की इच्छा का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी धारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने की प्रवृत्ति के साथ पैदा नहीं होता, न ही उसमें सीधे तौर पर सत्य को समझने की प्रवृत्ति होती है। उसमें मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव जोड़ दो—जब इस प्रकार का स्वाभाविक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे व्यवधान नहीं उत्पन्न होते? परंतु जो मनुष्य पूर्ण किया जा चुका है, उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए, और उसके पास अपने भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, जिससे उसके कार्य की अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें पहले से कम हो जाती हैं, और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अधिक करीब पहुँच जाता है। इस प्रकार, उसका काम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वह वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध कर देते हैं। मनुष्य के पास समृद्ध कल्पना और उचित तर्क होते हैं, और उसके पास मामलों से निपटने का लंबा अनुभव होता है। यदि मनुष्य के ये पहलू काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुज़रते, तो वे सभी कार्य की बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सटीकता के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता, विशेषकर अपूर्ण लोगों का कार्य।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 460

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

तुम प्रमुख मुद्दों को समझने और बहुत-सी चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो पाते हो या नहीं, यह तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर करता है। जिस तरीके से तुम अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम अन्य लोगों की अगुआई भी करते हो। यदि तुम शब्द और सिद्धांत ही समझते हो, तो तुम दूसरों को भी शब्द और सिद्धांत समझने के लिए ही प्रेरित करोगे। तुम जिस तरीके से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम दूसरों को परमेश्वर के कथनों की वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए उनकी अगुआई करोगे। यदि तुम बहुत-से सत्यों को समझते हो और परमेश्वर के वचनों से कई चीज़ों में स्पष्ट रूप से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हो, तो तुम दूसरों को भी बहुत-से सत्य समझाने के लिए उनका नेतृत्व कर पाने में सक्षम हो, और जिन लोगों का तुम नेतृत्व कर रहे हो, उन्हें दर्शनों की स्पष्ट समझ होगी। यदि तुम अलौकिक भावनाओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम जिन लोगों का नेतृत्व करते हो, वे भी वैसा ही करेंगे। यदि तुम अभ्यास की उपेक्षा करते हो और उसके बजाय चर्चा पर ज़ोर देते हो, तो जिन लोगों का तुम नेतृत्व करते हो, वे भी बिना कोई अभ्यास किए, या बिना अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन लाए, चर्चा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे; वे बिना किसी सत्य का अभ्यास किए, केवल सतही तौर पर उत्साहित होंगे। सभी लोग दूसरों को वही देते हैं, जो उनके पास होता है। व्यक्ति जिस प्रकार का होता है, उसी से वह मार्ग निर्धारित होता है, जिस पर वह दूसरों का मार्गदर्शन करता है, और साथ ही उन लोगों का प्रकार भी, जिनका वह नेतृत्व करता है। परमेश्वर के उपयोग हेतु वास्तव में उपयुक्त होने के लिए, तुम्हारे भीतर न केवल आकांक्षा होनी चाहिए, बल्कि तुम्हें बड़ी मात्रा में परमेश्वर की प्रबुद्धता, परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन, परमेश्वर द्वारा निपटाए जाने का अनुभव, और उसके वचनों के शुद्धिकरण की भी आवश्यकता है। एक नींव के रूप में इसके साथ, साधारण समय में, तुम लोगों को अपने अवलोकनों, विचारों, चिंतनों और निष्कर्षों पर ध्यान देना चाहिए, और तदनुसार आत्मसात या उन्मूलन करने में संलग्न होना चाहिए। ये सभी तुम लोगों के वास्तविकता में प्रवेश करने के रास्ते हैं, और इनमें से प्रत्येक अनिवार्य है। परमेश्वर इसी तरह काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य करने की पद्धति में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे पास हर दिन उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर हो सकते हैं। और किसी भी समय, चाहे तुम्हारा वातावरण कठोर हो या अनुकूल, चाहे तुम्हारी परीक्षा ली जा रही हो या तुम्हें प्रलोभन दिया जा रहा हो, चाहे तुम काम कर रहे हो या नहीं कर रहे हो, चाहे तुम एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हो या किसी समूह के अंग के रूप में, तुम्हें हमेशा परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर मिलेंगे और तुम उनमें से किसी एक को भी कभी नहीं चूकोगे। तुम उन सभी को खोज पाने में सक्षम होगे—और इस तरह तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का रहस्य पा लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 461

इन दिनों, कई लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि दूसरों के साथ समन्वय करते समय क्या सबक सीखे जाने चाहिये। मैंने देखा है कि तुम लोगों में से कई लोग दूसरों के साथ सहयोग करते समय बिलकुल सबक नहीं सीख पाते; तुममें से ज़्यादातर लोग अपने ही विचारों से चिपके रहते हैं। कलीसिया में काम करते समय, तुम अपनी बात कहते हो और दूसरे लोग उनकी बातें कहते हैं। एक की बात का दूसरे की बात से कोई संबंध नहीं होता है; दरअसल, तुम लोग बिलकुल भी सहयोग नहीं करते। तुम सभी लोग सिर्फ़ अपने परिज्ञान को बताने या उस "बोझ" को हल्का करने में लगे रहते हो जिसे तुम भीतर ढोते हो और किसी मामूली तरीके से भी जीवन नहीं खोजते हो। ऐसा लगता है कि तुम केवल लापरवाही से काम करते हो, तुम हमेशा यह मानते हो कि कोई और व्यक्ति चाहे जो भी कहता या करता हो, तुम्हें अपने ही चुने मार्ग पर चलना चाहिये। तुम सोचते हो कि चाहे दूसरे लोगों की परिस्थितियां कैसी भी हों, तुम्हें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार सहभागिता करनी चाहिये। तुम दूसरों की क्षमताओं का पता लगाने में सक्षम नहीं हो और ना ही तुम खुद की जाँच करने में सक्षम हो। तुम लोगों की चीज़ों की स्वीकृति वास्तव में गुमराह और गलत है। यह कहा जा सकता है कि अब भी तुम लोग दंभ का काफी प्रदर्शन करते हो, मानो कि तुम्हें वही पुरानी बीमारी फिर से लग गई है। तुम लोग एक दूसरे के साथ इस तरीके से बात नहीं करते हो जिसमें पूरा खुलापन हो, उदाहरण के लिये, किसी कलीसिया में काम करके तुमने किस तरह का परिणाम हासिल किया या तुम्हारी अंतरात्मा की हाल की स्थिति क्या है, वगैरह; तुम लोग ऐसी चीज़ों के बारे में कभी बात ही नहीं करते। तुम लोगों में अपनी धारणाओं को छोड़ने या खुद का त्याग करने जैसे अभ्यासों में बिलकुल भी प्रतिबद्धता नहीं है। अगुवा और कार्यकर्ता सिर्फ़ अपने भाई-बहनों को नकारात्मकता से दूर रखने और कैसे उनसे उत्साहपूर्वक अनुसरण करवाया जाए, इसके बारे में सोचते हैं। हालाँकि तुम सब लोग सोचते हो कि उत्साहपूर्वक अनुसरण करना अपने आप में काफी है और बुनियादी तौर पर तुम्हें इस बात की कोई समझ नहीं है कि स्वयं को जानने और त्यागने का क्या अर्थ है, दूसरों के साथ समन्वय में सेवा करने का क्या अर्थ है यह तो तुम और भी नहीं जानते। तुम बस स्वयं को परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने का इच्छुक बनाने की सोचते हो, पतरस की शैली में जीवन जीने का इच्छुक बनाने की सोचते हो। इन चीज़ों के अलावा, तुम और कुछ भी नहीं सोचते। तुम तो यह भी कहते हो कि दूसरे लोग चाहे जो भी करें, तुम आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करोगे और दूसरे लोग चाहे जैसे भी हों, तुम स्वयं परमेश्वर द्वारा पूर्णता की खोज करोगे, और ऐसा करना ही काफ़ी होगा। हालाँकि, सच तो यह है कि तुम्हारी इच्छाशक्ति को किसी भी तरह वास्तविकता में ठोस अभिव्यक्ति नहीं मिली है। क्या तुम लोग आजकल इसी तरह का व्यवहार नहीं करते हो? तुम लोगों में से हर कोई खुद की समझ से चिपका हुआ है और तुम सभी चाहते हो कि तुम्हें पूर्ण किया जाये। मैं देख रहा हूँ कि तुम लोगों ने काफ़ी लंबे समय से सेवा की है, लेकिन कोई प्रगति नहीं की; खास तौर पर, सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने के इस सबक में, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है! कलीसियाओं में जाते हुए तुम अपने ही तरीके से बात करते हो और दूसरे लोग उनके तरीके से बात करते हैं। सद्भावनापूर्ण सहयोग तो शायद ही कभी होता है और तुम्हारे अधीन सेवा करने वाले अनुयायियों के बारे में तो यह बात और भी सच है। कहने का मतलब है कि तुम लोगों में से शायद ही कोई इस बात को समझता है कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है या परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिये। तुम लोग उलझन में हो और इस तरह के सबकों को छोटी-मोटी बात मानते हो। कई लोग तो ऐसे भी हैं जो न केवल सत्य के इस पहलू का अभ्यास करने में विफल रहते हैं, बल्कि जान-बूझकर गलती भी करते हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों ने कई सालों तक सेवा की है वे भी एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्यंत्र करते हैं और ईर्ष्यालु और प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं; हर व्यक्ति अपने से ही मतलब रखता है और वे ज़रा-भी सहयोग नहीं करते। क्या ये सारी चीज़ें तुम लोगों की वास्तविक कद-काठी को नहीं दर्शाती हैं? हर रोज़ साथ मिलकर सेवा करने वाले तुम लोग उन इस्राएलियों की तरह हो जो हर दिन मंदिर जाकर सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं की सेवा करते थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हो, बिलकुल नहीं जानते कि समन्वय या सेवा कैसे करनी है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 462

आज तुम लोगों से—सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा करना—उस सेवा के समान है जिसकी अपेक्षा यहोवा इस्राएलियों से करता था : अन्यथा, सेवा करना बंद कर दो। चूँकि तुम ऐसे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तुम्हें कम से कम अपनी सेवा में वफ़ादारी और समर्पण में सक्षम होना चाहिये। साथ ही, तुम्हें एक व्यावहारिक तरीके से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिये। खास तौर पर, तुम में से उन लोगों के लिये जो कलीसिया में काम करते हैं, क्या तुम्हारे अधीन काम करने वाले भाई-बहनों में से कोई भी तुम लोगों से निपटने की हिम्मत कर पाता है? क्या कोई भी तुम्हारे सामने तुम्हारी गलतियों के बारे में तुम्हें बताने की हिम्मत कर पाता है? तुम लोग बाकी सभी लोगों के ऊपर खड़े हो; तुम राजाओं की तरह शासन करते हो! तुम लोग तो इस तरह के व्यवहारिक सबकों का अध्ययन भी नहीं करते हो, न ही इनमें प्रवेश करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो! वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुवाई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, "मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करना चाहिये।" इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, "मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपनी बात करो और मैं अपनी बात करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश की बात करूँगा।" तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिये या तुम बस लापरवाही से काम करते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुम में से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग साथ मिलकर समन्वय करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?" या तुम लोग शायद कहो, "इस पहलू के संबंध में तेरा अनुभव मुझसे अधिक है; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?" क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जान-बूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुम में से कोई भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं होता। हर व्यक्ति अपने अंदरूनी विचारों को एक दूसरे से छिपा रहा होता है, दूसरे पक्ष को गलत इरादे से देखता है और हमेशा सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिये उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजागर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिलकुल भी शर्म नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 463

क्या तू "हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव" को ठोस ढंग से ऐसी भाषा में बता सकता है जो उपयुक्त तरीके से युग की सार्थकता को व्यक्त करे? क्या तू, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का वर्णन विस्तार से कर सकता है? क्या तू स्पष्ट एवं सटीक ढंग से परमेश्वर के स्वभाव की गवाही दे सकता है? तू उन दयनीय, बेचारे और धार्मिकता के भूखे-प्यासे धर्मनिष्ठ विश्वासियों के साथ, जो तेरी देखरेख की आस लगाए बैठे हैं, अपने दर्शनों और अनुभवों को कैसे बांटेगा? किस प्रकार के लोग तेरी देखरेख की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू सोच सकता है? क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें टूटते तारे जैसी रोशनी के लिए कितनी ललक है जो अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर-बितर कर दे, जिन्होंने वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आस लगाए बैठे हैं और कैसे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, भयंकर कष्ट सहते, रिहाई से नाउम्मीद ये लोग, अंधकार में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएँ बेहद बदकिस्मत हैं, जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है। सदियों से ये इसी स्थिति में क्रूर बधंनों और अवरुद्ध इतिहास में जकड़े हुए हैं। उनकी कराहने की आवाज किसने सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति को विष देकर पीड़ित किया गया है। यद्यपि मनुष्य आज तक जीवित है, लेकिन कौन यह जान सकता था कि उसे लंबे समय से दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि शिकार हुए लोगों में से तू भी एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपना सारा ज़ोर लगाने को तैयार नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धर्म-परायण, परमेश्वर-सेवी जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का संकल्प और विश्वास है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 464

लोग मुझ पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे मेरे लिए गवाही देने में असमर्थ हैं, न ही वे मेरे द्वारा अपना परिचय देने से पहले मेरी गवाही दे सकते हैं। लोग केवल यह देखते हैं कि मैं सभी प्राणियों और सभी पवित्र मनुष्यों से श्रेष्ठ हूँ, और यह देखते हैं कि मैं जो करता हूँ, उसे मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता। इसलिए, यहूदियों से लेकर आज के लोगों तक, जिन्होंने भी मेरे गौरवशाली कर्मों को देखा है, वे मेरे प्रति जिज्ञासा से भर जाते हैं, फिर भी, एक भी प्राणी अपने मुँह से मेरी गवाही नहीं दे सकता। केवल मेरे पिता ने मेरी गवाही दी थी और सभी प्राणियों के बीच मेरे लिए मार्ग बनाया था। अगर उसने गवाही न दी होती, तो चाहे मैं जैसा भी काम करता, मनुष्य कभी नहीं जान पाता कि मैं सृष्टि का प्रभु हूँ, क्योंकि मनुष्य केवल मुझसे लेना ही जानता है और मेरे कार्य के परिणामस्वरूप मुझ पर विश्वास नहीं करता। मनुष्य मुझे केवल इसीलिए जानता है, क्योंकि मैं निर्दोष हूँ और किसी भी तरह से पापी नहीं हूँ, क्योंकि मैं अनेक रहस्यों को स्पष्ट कर सकता हूँ, क्योंकि मैं भीड़ से ऊपर हूँ, या क्योंकि मनुष्य ने मुझसे बहुत लाभ प्राप्त किया है, फिर भी कुछ ही लोग हैं, जो यह विश्वास करते हैं कि मैं सृष्टि का प्रभु हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य नहीं जानता कि वह मुझ पर क्यों विश्वास करता है; वह मुझ पर विश्वास करने का प्रयोजन या महत्व नहीं जानता। मनुष्य में वास्तविकता की कमी है, इतनी कि मुश्किल से ही वह मेरी गवाही देने के लायक है। तुम लोगों के पास सच्चा विश्वास बहुत ही कम है और तुम लोगों ने बहुत ही कम ग्रहण किया है, इसलिए तुम लोगों के पास बहुत ही कम गवाही है। इतना ही नहीं, तुम लोग बहुत कम समझते हो और तुम सबमें बहुत कमी है, इतनी कि तुम लोग मेरे कर्मों की गवाही देने के लगभग नाकाबिल हो। तुम लोगों का संकल्प सचमुच विचारणीय है, लेकिन क्या तुम लोग निश्चित हो कि तुम परमेश्वर के सार की सफलतापूर्वक गवाही दे सकते हो? जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया और देखा है, वह हर युग के संतों और पैगंबरों के अनुभवों से बढ़कर है, लेकिन क्या तुम लोग अतीत के इन संतों और पैगंबरों के वचनों से बड़ी गवाही देने में सक्षम हो? अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अत: उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो चुने हुए लोगों, इजरायलियों को भी कभी नहीं मिला। उचित तो यही है कि तुम लोग मेरे लिए गवाही दो, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। इसे मैंने पहले से नियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने केवल मेरे सत्य, मेरे मार्ग और मेरे जीवन को ही प्राप्त नहीं किया है, अपितु मेरी उस दृष्टि और प्रकटीकरण को भी प्राप्त किया है, जो यूहन्ना को प्राप्त दृष्टि और प्रकटीकरण से भी बड़ा है। तुम लोग कई और रहस्य समझते हो, और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को अधिक स्वीकार किया है और मेरे धर्मी स्वभाव को अधिक जाना है। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 465

अब क्या तुम सच में जानते हो कि तुम मुझ पर क्यों विश्वास करते हो? क्या तुम सच में मेरे कार्य के उद्देश्य और महत्व को जानते हो? क्या तुम सच में अपने कर्तव्य को जानते हो? क्या तुम सच में मेरी गवाही को जानते हो? अगर तुम मुझमें मात्र विश्वास करते हो, और तुममें मेरी महिमा या गवाही नहीं पाई जाती, तो मैंने तुम्हें बहुत पहले ही खारिज कर दिया है। जहाँ तक सब-कुछ जानने वालों का सवाल हैं, वे मेरी आँख के और भी ज्यादा काँटे हैं, और मेरे घर में वे मेरे रास्ते की अड़चनों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वे गेहूँ जैसी दिखने वाली मोठ घास हैं, जिसे मेरे कार्य से पूरी तरह से पछोर दिया जाना चाहिए, वे किसी काम के नहीं हैं, वे बेकार हैं; मैंने लंबे समय से उनसे घृणा की है। अकसर मेरा प्रकोप उन पर टूटता है, जिनके पास गवाही नहीं है, और मेरी लाठी कभी उन पर से नहीं हटती। मैंने बहुत पहले ही उन्हें दुष्ट के हाथों में दे दिया है; वे मेरे आशीषों से वंचित हैं। जब दिन आएगा, उनका दंड मूर्ख स्त्रियों के दंड से भी कहीं ज़्यादा पीड़ादायक होगा। आज मैं केवल वही काम करता हूँ, जो मेरा कर्तव्य है; मैं सारे गेहूँ को उस मोठ घास के साथ गठरियों में बाँधूँगा। आज मेरा यही कार्य है। पछोरने के समय वह सारी मोठ घास मेरे द्वारा पछोर दी जाएगी, और फिर गेहूँ के दानों को भंडार-गृह में इकट्ठा किया जाएगा, और पछोरी गई उस मोठ घास को जलाकर राख कर देने के लिए आग में डाल दिया जाएगा। अब मेरा कार्य मात्र सभी मनुष्यों को एक गठरी में बाँधना है, अर्थात् उन सभी को पूरी तरह से जीतना है। तब सभी मनुष्यों के अंत को प्रकट करने के लिए मैं पछोरना शुरू करूँगा। अतः तुम्हें जानना ही होगा कि अब तुम मुझे कैसे संतुष्ट कर सकते हो और तुम्हें किस तरह मेरे प्रति विश्वास में सही पथ पर आना चाहिए। अब मैं तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और आज्ञाकारिता में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारे विश्वास का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना, और किसी और के प्रति नहीं, और अंत तक आज्ञाकारी बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और आज्ञाकारी कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और आज्ञाकारी बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेतकी तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना हगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 466

यद्यपि तुम लोगों का विश्वास बहुत सच्चा है, फिर भी तुम लोगों में से कोई भी मेरा पूर्ण विवरण दे पाने में समर्थ नहीं है कोई भी उन सारे तथ्यों की पूर्ण गवाही नहीं दे सकता जिन्हें तुम देखते हो। इसके बारे में सोचो: आज तुममें से ज्यादातर लोग अपने कर्तव्यों में लापरवाह हैं, शरीर का अनुसरण कर रहे हैं, शरीर को तृप्त कर रहे हैं, और लालचपूर्वक शरीर का आनंद ले रहे हैं। तुम लोगों के पास सत्य बहुत कम है। तो फिर तुम लोग उस सबकी गवाही कैसे दे सकते हो जो तुम लोगों ने देखा है? क्या तुम लोग सचमुच आश्वस्त हो कि तुम लोग मेरे गवाह बन सकते हो? यदि ऐसा एक दिन आता है जब तुम उस सबकी गवाही देने में असमर्थ हो जो तुमने आज देखा है, तो तुम सृजित प्राणी के कार्यकलाप गंवा चुके होगे, और तुम्हारे अस्तित्व का ज़रा-भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। तुम एक मनुष्य होने के लायक नहीं होगे। यह कहा जा सकता है कि तुम मानव नहीं रहोगे! मैंने तुम लोगों पर अथाह कार्य किया है, परन्तु चूंकि फिलहाल तुम न कुछ सीख रहे हो, न कुछ जानते हो, और तुम्हारा परिश्रम अकारथ है, इसलिए जब मेरे लिए अपने कार्य का विस्तार करने का समय होगा, तब तुम बस शून्य में ताकोगे, तुम्हारे मुँह से आवाज़ न निकलेगी और सर्वथा बेकार हो जाओगे। क्या यह तुम्हें सदा के लिए पापी नहीं बना देगा? जब वह समय आएगा, क्या तुम सबसे अधिक पछतावा महसूस नहीं करोगे? क्या तुम उदासी में नहीं डूब जाओगे? आज का मेरा सारा कार्य बेकारी और ऊब के कारण नहीं, बल्कि भविष्य के मेरे कार्य की नींव रखने के लिए किया जाता है। ऐसा नहीं है कि मैं बंद गली में हूँ और मुझे कुछ नया सोचने की जरूरत है। मैं जो कार्य करता हूँ, उसे तुम्हें समझना चाहिए; यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे सड़क पर खेल रहे किसी बच्चे द्वारा नहीं किया गया है, बल्कि यह ऐसा कार्य है जो मेरे पिता के प्रतिनिधित्व में किया जाता है। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि यह केवल मैं नहीं हूँ जो स्वयं यह सब कर रहा है; बल्कि, मैं अपने पिता का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। इस बीच, तुम लोगों की भूमिका केवल दृढ़ता से अनुसरण, आज्ञापालन, परिवर्तन करने और गवाही देने की है। तुम लोगों को समझना चाहिए कि तुम लोगों को मुझमें विश्वास क्यों करना चाहिए; यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है जो तुम लोगों में से प्रत्येक को समझना चाहिए। मेरे पिता ने अपनी महिमा के वास्ते तुम सब लोगों को उसी क्षण मेरे लिए पूर्वनियत कर दिया था, जिस क्षण उसने इस संसार की सृष्टि की थी। मेरे कार्य के वास्ते, और उसकी महिमा के वास्ते उसने तुम लोगों को पूर्वनियत किया था। यह मेरे पिता के कारण ही है कि तुम लोग मुझ में विश्वास करते हो; यह मेरे पिता द्वारा पूर्वनियत करने के कारण ही है कि तुम मेरा अनुसरण करते हो। इसमें से कुछ भी तुम लोगों का अपना चुनाव नहीं है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग यह समझो कि तुम्हीं वे लोग हो जिन्हें मेरे लिए गवाही देने के उद्देश्य से मेरे पिता ने मुझे प्रदान किया है। चूंकि उसने तुम लोगों को मुझे दिया है, इसलिए तुम लोगों को उन तरीकों का पालन करना चाहिए, जो मैं तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, साथ ही उन तरीकों और वचनों का भी, जो मैं तुम लोगों को सिखाता हूँ, क्योंकि मेरे तरीकों का पालन करना तुम लोगों का कर्तव्य है। यह मुझ में तुम्हारे विश्वास का मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ: तुम मात्र वे लोग हो, जिन्हें मेरे पिता ने मेरे तरीकों का पालन करने के लिए मुझे प्रदान किया है। हालाँकि, तुम लोग सिर्फ़ मुझ में विश्वास करते हो; तुम लोग मेरे नहीं हो क्योंकि तुम लोग इस्राएली परिवार के नहीं हो, और इसके बजाय प्राचीन साँप जैसे हो। मैं तुम लोगों से सिर्फ़ इतना करने को कह रहा हूँ कि मेरे लिए गवाही दो, परन्तु आज तुम लोगों को मेरे तौर-तरीकों के अनुसार चलना ही चाहिए। यह सब भविष्य की गवाही के वास्ते है। यदि तुम लोग केवल उन लोगों की तरह कार्य करते हो जो मेरे तरीकों को सुनते हैं, तो तुम्हारा कोई मूल्य नहीं होगा और मेरे पिता द्वारा तुम लोगों को मुझे प्रदान किए जाने का महत्त्व व्यर्थ हो जायेगा। तुम लोगों को जो बताने पर मैं जोर दे रहा हूँ, वह यह है: तुम्हें मेरे तरीकों पर चलना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 467

पवित्र आत्मा वर्तमान समय में कलीसिया के भीतर किस प्रकार से कार्य कर रहा है? क्या तुम्हें इस प्रश्न की कोई ठोस समझ है? तुम्हारे भाइयों और बहनों की सबसे बड़ी कठिनाइयाँ क्या हैं? उनमें सबसे अधिक किस चीज की कमी है? वर्तमान में, कुछ लोग परीक्षणों से गुज़रने पर नकारात्मक हो जाते हैं, और उनमें से कुछ तो शिकायत भी करते हैं। अन्य लोग अब आगे नहीं बढ़ रहे हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बोलना समाप्त कर दिया है। लोगों ने परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। वे स्वतंत्र रूप से नहीं जी सकते, और वे अपना आध्यात्मिक जीवन नहीं बनाए रख सकते। कुछ लोग साथ-साथ अनुसरण करते हैं और ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, और जब परमेश्वर बोलता है तब अभ्यास करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब परमेश्वर नहीं बोलता, तो वे और आगे नहीं बढ़ते। लोगों ने अभी भी परमेश्वर की इच्छा को अपने दिल में नहीं समझा है और उनमें परमेश्वर के लिए स्वत:स्फूर्त प्रेम नहीं है; अतीत में उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण इसलिए किया था, क्योंकि वे मजबूर थे। अब कुछ लोग हैं, जो परमेश्वर के कार्य से थक गए हैं। क्या ऐसे लोग खतरे में नहीं हैं? बहुत सारे लोग सिर्फ निभाने की स्थिति में रहते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं, पर वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं, और उनमें अब वह सहज प्रवृत्ति नहीं है जो उनमें कभी थी। अधिकतर लोग शुद्धिकरण और पूर्ण बनाने के परमेश्वर के कार्य में रुचि नहीं रखते, और वास्तव में यह ऐसा है, मानो वे लगातार किसी अंत:प्रेरणा से रहित हों। जब वे पापों के वशीभूत हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस नहीं करते, न ही उनमें पश्चात्ताप अनुभव करने की जागरूकता होती है। वे सत्य की खोज नहीं करते और न ही कलीसिया को छोड़ते हैं, इसके बजाय वे केवल अस्थायी सुख ढूँढ़ते हैं। ये लोग मूर्ख हैं, एकदम मूढ़! समय आने पर वे बहिष्कृत कर दिए जाएँगे, और किसी एक को भी नहीं बचाया जाएगा! क्या तुम्हें लगता है कि यदि किसी को एक बार बचाया गया है, तो उसे हमेशा बचाया जाएगा? यह विश्वास शुद्ध धोखा है! जो लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, उन सभी को ताड़ना दी जाएगी। अधिकतर लोगों की जीवन में प्रवेश करने में, दर्शनों में, या सत्य का अभ्यास करने में बिलकुल भी रुचि नहीं है। वे प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, और वे अधिक गहराई से प्रवेश करने का प्रयास तो निश्चित रूप से नहीं करते। क्या वे स्वयं को बरबाद नहीं कर रहे? अभी कुछ लोग हैं, जिनकी स्थितियाँ लगातार बेहतर हो रही हैं। पवित्र आत्मा जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक आत्मविश्वास उनमें आता है, और जितना अधिक वे अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के कार्य के गहन रहस्य का अनुभव करते हैं। जितना गहरे वे प्रवेश करते हैं, उतना ही अधिक वे समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और वे अपने भीतर स्थिर और प्रबुद्ध महसूस करते हैं। उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। ये ही वे लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कुछ लोग कहते हैं : "यद्यपि परमेश्वर की ओर से कोई नए वचन नहीं हैं, फिर भी मुझे सत्य में और गहरे जाने का प्रयास करना चाहिए, मुझे अपने वास्तविक अनुभव में हर चीज के बारे में ईमानदार होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए।" इस तरह के व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यद्यपि परमेश्वर अपना चेहरा नहीं दिखाता और हर एक व्यक्ति से छिपा रहता है, और यद्यपि वह एक भी वचन नहीं बोलता और कई बार लोग कुछ आंतरिक शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं, फिर भी परमेश्वर ने लोगों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। यदि कोई व्यक्ति उस सत्य को बरकरार नहीं रख सकता, जिसका उसे पालन करना चाहिए, तो उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। शुद्धिकरण की अवधि के दौरान, परमेश्वर के स्वयं को नहीं दिखाने के दौरान, यदि तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास नहीं होता और तुम डरकर दुबक जाते हो, यदि तुम उसके वचनों का अनुभव करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, तो तुम परमेश्वर के कार्य से भाग रहे होते हो। बाद में, तुम उन लोगों में से एक होगे, जिनका बहिष्कार किया जाता है। जो लोग परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, वे संभवतः उसके गवाह के रूप में खड़े नहीं हो सकते। जो लोग परमेश्वर के लिए गवाही देने और उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं, वे सभी पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करने की अपनी अंत:प्रेरणा पर निर्भर हैं। परमेश्वर द्वारा लोगों में किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग हेतु उपयुक्त बनाने के लिए है। अभी तुम सभी जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह है रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना कि कोई नई चीज़ या रुझान है या नहीं, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे, क्योंकि वे उनके कार्य से थक गए हैं। वे केवल उन वचनों को सुनना चाहते हैं, जो वह आशीष देने के लिए बोलता है, और वे उसके न्याय और ताड़ना के वचनों को सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह जानबूझकर मानवजाति पर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, जो मनुष्य को जीवन देता है, और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।

परमेश्वर का वर्तमान कार्य लोगों में कुछ शुद्धिकरण लाता है, और जो लोग इस शुद्धिकरण के दौरान मजबूती से खड़े रह सकते हैं, केवल वे ही परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेंगे। भले ही वह स्वयं को कैसे भी छिपाए, न बोलकर या कार्य न करके, तुम फिर भी उत्साह के साथ अनुसरण कर सकते हो। यहाँ तक कि यदि परमेश्वर ने कहा कि वह तुम्हें अस्वीकार कर देगा, तुम फिर भी उसका अनुसरण करोगे। यह परमेश्वर की गवाही में खड़े होना है। यदि परमेश्वर स्वयं को तुमसे छिपाता है और तुम उसका अनुसरण करना बंद कर देते हो, तो क्या यह परमेश्वर की गवाही में खड़े होना है? यदि लोग वास्तव में प्रवेश नहीं करते, तो उनके पास वास्तविक कद-काठी नहीं है, और जब वे वास्तव में किसी महान परीक्षण का सामना करते हैं, तो वे लड़खड़ा जाते हैं। जब परमेश्वर नहीं बोलता, या कुछ ऐसा करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, तो तुम टूट जाते हो। यदि परमेश्वर वर्तमान में तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य कर रहा होता, यदि वह तुम्हारी इच्छा पूरी कर रहा होता और तुम खड़े होने और ऊर्जा के साथ अनुसरण करने में सक्षम होते, तो वह आधार क्या होता, जिस पर तुम जी रहे होते? मैं कहता हूँ कि बहुत लोग उस ढंग से जी रहे हैं, जो पूरी तरह से मानव-जिज्ञासा पर आधारित है! वे सच्चे दिल से खोज बिलकुल नहीं करते। जो लोग सत्य में प्रवेश का प्रयास नहीं करते, बल्कि जीवन में अपनी जिज्ञासा पर भरोसा करते हैं, वे सभी अधम लोग हैं, और खतरे में हैं! परमेश्वर के विभिन्न प्रकार के सभी कार्य मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए हैं। हालाँकि, लोग हमेशा उत्सुक होते हैं, वे सुनी हुई बात के बारे में पूछताछ करना चाहते हैं, वे विदेशों के वर्तमान मामलों के बारे में चिंतित होते हैं—उदाहरण के लिए, वे इस बारे में उत्सुक होते हैं कि इस्राएल में क्या हो रहा है, या मिस्र में कोई भूकंप तो नहीं आया—अपनी स्वार्थी इच्छाएँ पूरी करने के लिए वे हमेशा कुछ नई, अनूठी चीजों की तलाश करते रहते हैं। वे जीवन का अनुसरण नहीं करते, न ही वे पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। वे केवल परमेश्वर के दिन के शीघ्र आगमन की चाह रखते हैं, ताकि उनका सुंदर सपना पूरा हो जाए और उनकी असाधारण इच्छाएँ पूरी हो सकें। इस प्रकार का व्यक्ति व्यावहारिक नहीं होता—वह एक अनुचित परिप्रेक्ष्य वाला व्यक्ति होता है। केवल सत्य की तलाश ही परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की नींव है, और यदि लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, यदि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, तो वे दंड के भागी होंगे। जिन्हें दंडित किया जाना है, वे ऐसे लोग हैं, जिन पर परमेश्वर के कार्य के समय के दौरान पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 468

परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान लोगों को उसके साथ कैसे सहयोग करना चाहिए? परमेश्वर वर्तमान में लोगों की परीक्षा ले रहा है। वह एक वचन भी नहीं बोल रहा; बल्कि स्वयं को छिपा रहा है और लोगों से सीधे संपर्क नहीं कर रहा है। बाहर से ऐसा लगता है, मानो वह कोई कार्य नहीं कर रहा, लेकिन सच्चाई यह है कि वह अभी भी मनुष्य के भीतर कार्य कर रहा है। जीवन में प्रवेश पाने की कोशिश करने वाले हर किसी के पास अपने जीवन की खोज के लिए एक दर्शन होता है, और उसे संदेह नहीं होता, भले ही वह परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से न समझता हो। परीक्षणों से गुजरते हुए, यहाँ तक कि जब तुम नहीं जानते कि परमेश्वर क्या करना चाहता है और वह क्या कार्य निष्पादित करना चाहता है, तब भी तुम्हें पता होना चाहिए कि मानवजाति के लिए परमेश्वर के इरादे हमेशा अच्छे होते हैं। यदि तुम सच्चे दिल से उसका अनुसरण करते हो, तो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा, और अंत में वह निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा, और लोगों को एक उचित मंजिल तक ले जाएगा। भले ही परमेश्वर वर्तमान में लोगों का किसी भी प्रकार से परीक्षण कर रहा हो, एक दिन ऐसा आएगा जब वह लोगों को उचित परिणाम प्रदान करेगा और उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उन्हें उचित प्रतिफल देगा। परमेश्वर लोगों को एक निश्चित बिंदु तक ले जाकर एक तरफ फेंक नहीं देगा और उन्हें अनदेखा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह एक विश्वसनीय परमेश्वर है। इस चरण में पवित्र आत्मा शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है। वह हर एक व्यक्ति को शुद्ध कर रहा है। मृत्यु और ताड़ना के परीक्षणों से युक्त कार्य के चरणों में शुद्धिकरण वचनों के माध्यम से किया गया था। लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए सबसे पहले उसके वर्तमान कार्य को समझना चाहिए और यह भी कि मानवजाति को कैसे सहयोग करना चाहिए। वास्तव में, यह कुछ ऐसा है, जिसे हर किसी को समझना चाहिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या करता है, चाहे वह शुद्धिकरण हो या भले ही वह बोल नहीं रहा हो, परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण मानवजाति की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होता। उसके कार्य का प्रत्येक चरण लोगों की अवधारणाओं को खंड-खंड कर देता है। यह उसका कार्य है। लेकिन तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर का कार्य एक निश्चित चरण में पहुँच गया है, इसलिए चाहे जो हो जाए, वह मानवजाति को मौत के घाट नहीं उतारेगा। वह मानवजाति को वादे और आशीष दोनों देता है, और वे सभी जो उसका अनुसरण करते हैं, उसके आशीष प्राप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन जो अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। यह तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हर एक व्यक्ति की उचित मंजिल होगी। परमेश्वर ने मनुष्यों को सुंदर आकांक्षाएँ प्रदान की हैं, लेकिन यदि वे अनुसरण नहीं करते, तो वे अप्राप्य हैं। तुम्हें अब इसे देखने में सक्षम होना चाहिए—परमेश्वर द्वारा लोगों का शुद्धिकरण और ताड़ना उसका कार्य है, लेकिन लोगों को अपनी तरफ से हर समय अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यावहारिक अनुभव में तुम्हें पहले जानना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएँ और पीएँ; तुम्हें उसके वचनों में यह ढूँढ़ना चाहिए कि तुम्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए और तुम्हारी कमियाँ क्या हैं, तुम्हें अपने व्यावहारिक अनुभव में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के उस भाग को लेना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए, और वैसा करने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना एक पहलू है। उसके अतिरिक्त, कलीसिया का जीवन बनाए रखा जाना चाहिए, तुम्हें एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए, और तुम्हें अपनी सभी वर्तमान अवस्थाओं को परमेश्वर को सौंपने में सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य रहना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन तुम्हारे सामान्य प्रवेश को बनाए रख सकता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन निर्बाध जारी रखना और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही काम है, जो लोगों को करना चाहिए। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है, लेकिन सामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह पूर्ण बनाया जाना है, जबकि एक असामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह एक परीक्षण है। पवित्र आत्मा के शुद्धिकरण के कार्य के वर्तमान चरण में, कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत महान है और कि लोगों को पूरी तरह से शुद्धिकरण की आवश्यकता है, अन्यथा उनकी अध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी हो जाएगी और उनके पास परमेश्वर की इच्छा प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, उनके लिए यह परमेश्वर का अनुसरण न करने और सभाओं में भाग न लेने या परमेश्वर के वचन को न खाने-पीने का एक कारण बन जाता है। परमेश्वर के कार्य में, चाहे वह कुछ भी करे या कोई भी बदलाव लाए, लोगों को एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन की एक आधार-रेखा अवश्य बनाए रखनी चाहिए। शायद तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के इस वर्तमान चरण में शिथिल नहीं हुए हो, लेकिन तुमने अभी भी बहुत-कुछ प्राप्त नहीं किया है, और बहुत अच्छी फसल नहीं काटी है। इस तरह की परिस्थितियों में तुम्हें अभी भी नियमों का पालन करना चाहिए; तुम्हें इन नियमों के अनुसार चलना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन में नुकसान न झेलो और ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करो। यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन असामान्य है, तो तुम परमेश्वर के वर्तमान कार्य को नहीं समझ सकते; बल्कि हमेशा महसूस करते हो कि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, और यद्यपि तुम उसका अनुसरण करने के लिए तैयार होते हो, लेकिन तुममें अंत:प्रेरणा का अभाव रहता है। तो भले ही परमेश्वर वर्तमान में कुछ भी कर रहा हो, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते, तो पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर सकता, और यदि लोगों के पास सहयोग करने वाला दिल नहीं है, तो वे शायद ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अपने अंदर पवित्र आत्मा का कार्य चाहते हो, और यदि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी मूल भक्ति बनाए रखनी चाहिए। अब, तुम्हारे पास गहन समझ, उच्च सिद्धांत, या ऐसी अन्य चीजों का होना आवश्यक नहीं है—बस इतना ही आवश्यक है कि तुम परमेश्वर के वचन को मूल आधार पर बनाए रखो। यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते, तो परमेश्वर उन चीजों को छीन लेगा, जो मूलत: उसकी थीं। अंदर से लोग हमेशा सुविधा के लोभी होते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जो पहले से ही उपलब्ध होता है। वे बिना कोई भी कीमत चुकाए परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये अनावश्यक विचार हैं, जो मनुष्य रखता है। बिना कोई कीमत चुकाए स्वयं जीवन प्राप्त करना—पर क्या कभी कुछ भी इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव चाहता है, तो उसे उसकी कीमत अवश्य चुकानी चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए, जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा, चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। यह ऐसा काम है, जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि तुम इस सबका एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो भी तुम्हें हमेशा इस पर टिके रहना चाहिए, और चाहे परीक्षण कितने भी बड़े हों, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य संबंध को जाने नहीं दे सकते। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया-जीवन को बनाए रखने, और अपने भाइयों और बहनों को कभी न छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले, तब भी तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए। आध्यात्मिक जीवन के लिए यह न्यूनतम अपेक्षा है। हमेशा खोज करने की इच्छा रखना, सहयोग करने का भरसक प्रयास करना, अपनी समस्त ऊर्जा लगा देना—क्या यह किया जा सकता है? यदि लोग इसे आधार के रूप में लें, तो वे विवेक हासिल करने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। तुम्हारी स्वयं की अवस्था सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान है, इन परिस्थितियों में सत्य का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तो परमेश्वर का कार्य कितना भी महान क्यों न हो, और चाहे कोई कितनी भी खूबसूरती से क्यों न बोलता हो, तुम उस पर कोई ध्यान नहीं दोगे। जब व्यक्ति की हालत सामान्य नहीं होती, तो परमेश्वर उसमें कार्य नहीं कर सकता, और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 469

यदि लोगों में आत्मविश्वास नहीं है, तो उनके लिए इस मार्ग पर चलते रहना आसान नहीं है। अब हर कोई देख सकता है कि परमेश्वर का कार्य लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप जरा सा भी नहीं है। परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य किया है और इतने सारे वचनों को कहा है, जो इंसानी अवधारणाओं से पूर्णत: भिन्न हैं। इसलिए लोगों में उस चीज के साथ खड़े होने का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति होनी चाहिए, जिसे वे पहले ही देख चुके हैं और अपने अनुभवों से प्राप्त कर चुके हैं। भले ही परमेश्वर लोगों में कुछ भी कार्य करे, उन्हें वह बनाए रखना चाहिए जो उनके पास है, उन्हें परमेश्वर के सामने ईमानदार होना चाहिए, और उसके प्रति बिलकुल अंत तक समर्पित रहना चाहिए। यह मनुष्य का कर्तव्य है। लोगों को जो करना चाहिए, उसे उन्हें बनाए रखना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसका आज्ञापालन करना और उसके कार्य का अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है—यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना, शुद्धिकरण, और इससे भी बढ़कर, ताड़ना है। परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण ऐसा नहीं रहा है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया है, वह है परमेश्वर के कठोर वचन। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए। हालाँकि उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए आता है। प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए, जो कि उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए उन्हें ऐसा ज़बरदस्त तरीके से करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हें शुद्ध करे, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर से कभी विश्वास नहीं खोते। तुम वह करते हो, जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से इसी की अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने तथा हर पल उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा होता है विजेता। जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर "विजेताओं" के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर "विजेता" होने के रूप में संदर्भित करता है। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हें आशीष दिए जाने पर तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट होता है, लेकिन उसके आशीष न मिलने पर तुम पीछे हट जाते हो, तो क्या यह पवित्रता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह रास्ता सही है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देख लिया है कि स्वयं परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें पूरी तरह से अपना दिल उसे समर्पित कर देना चाहिए। भले ही वह कुछ भी करे, यहाँ तक कि बिलकुल अंत में तुम्हारे लिए एक प्रतिकूल परिणाम ही क्यों न निर्धारित कर दे, अगर तुम फिर भी उसका अनुसरण कर सकते हो, तो यह परमेश्वर के सामने अपनी पवित्रता बनाए रखना है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक देह और एक शुद्ध कुँवारापन अर्पित करने का अर्थ है परमेश्वर के सामने ईमानदार दिल बनाए रखना। मनुष्य के लिए ईमानदारी ही पवित्रता है, और परमेश्वर के प्रति ईमानदार होने में सक्षम होना ही पवित्रता बनाए रखना है। यही वह चीज़ है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम प्रार्थना करो; जब तुम्हें संगति में एक-साथ इकट्ठे होना चाहिए, तो तुम इकट्ठे हो जाओ; जब तुम्हें भजन गाने चाहिए, तो तुम भजन गाओ; और जब तुम्हें शरीर को त्यागना चाहिए, तो तुम शरीर को त्याग दो। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तो तुम उसमें गड़बड़ नहीं करते; जब तुम्हें परीक्षणों का सामना करना पड़ता है, तो तुम मजबूती से खड़े रहते हो। यह परमेश्वर के प्रति भक्ति है। लोगों को जो करना चाहिए, यदि तुम वह बनाए नहीं रखते, तो तुम्हारी पिछली सभी पीड़ाएँ और संकल्प व्यर्थ रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 470

परमेश्वर के कार्य के हर चरण के लिए एक तरीका है, जिसमें लोगों को सहयोग करना चाहिए। परमेश्वर लोगों को शुद्ध करता है, ताकि शुद्धिकरणों से गुज़रने पर उनमें आत्मविश्वास रहे। परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, ताकि उनमें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का आत्मविश्वास हो और वे उसके शुद्धिकरणों को स्वीकार करने और उसके द्वारा निपटान और काँट-छाँट किए जाने के लिए तैयार हो जाएँ। परमेश्वर का आत्मा लोगों में प्रबुद्धता और रोशनी लाने और उनसे परमेश्वर के साथ सहयोग करवाने और अभ्यास करवाने के लिए उनके भीतर कार्य करता है। शुद्धिकरण के दौरान परमेश्वर बात नहीं करता। वह अपनी वाणी नहीं बोलता, फिर भी, ऐसा कार्य है जिसे लोगों को करना चाहिए। तुम्हें वह बनाए रखना चाहिए जो तुम्हारे पास पहले से है, तुम्हें फिर भी परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के निकट होने, और परमेश्वर के सामने गवाही देने में सक्षम होना चाहिए; इस तरह तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे। तुम सबको परमेश्वर के कार्य से स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि लोगों के आत्मविश्वास और प्यार के उसके परीक्षण यह अपेक्षा करते हैं कि वे परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करें, और कि वे परमेश्वर के सामने उसके वचनों का अधिक बार स्वाद लें। यदि परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हें अपनी इच्छा समझाता है, लेकिन फिर भी तुम उसे अभ्यास में बिलकुल नहीं लाते, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाते हो, तब भी तुम्हें उससे प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए, और जब तुम उसके वचनों का स्वाद लेते हो, तो तुम्हें उसके सामने आना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए तथा हताशा या उदासीनता अनुभव करने के किसी भी चिह्न के बिना उसके प्रति विश्वास से भरे होना चाहिए। जो लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे सभाओं के दौरान तो ऊर्जा से भरे होते हैं, लेकिन घर लौटकर अंधकार में गिर जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो एक साथ इकट्ठे भी नहीं होना चाहते। इसलिए तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि वह कौन-सा कर्तव्य है, जिसे लोगों को पूरा करना चाहिए। हो सकता है कि तुम न जानते हो कि परमेश्वर की इच्छा वास्तव में क्या है, लेकिन तुम अपना कर्तव्य कर सकते हो, जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए तब तुम प्रार्थना कर सकते हो, जब तुम्हें सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए तब तुम उसे अभ्यास में ला सकते हो, और तुम वह कर सकते हो जो लोगों को करना चाहिए। तुम अपनी मूल दृष्टि बनाए रख सकते हो। इस तरह, तुम परमेश्वर के कार्य के अगले चरण को स्वीकार करने में अधिक सक्षम होगे। जब परमेश्वर छिपे तरीके से कार्य करता है, तब यदि तुम तलाश नहीं करते, तो यह एक समस्या है। जब वह सभाओं के दौरान बोलता और उपदेश देता है, तो तुम उत्साह से सुनते हो, लेकिन जब वह नहीं बोलता, तो तुममें ऊर्जा की कमी हो जाती है और तुम पीछे हट जाते हो। ऐसा किस तरह का व्यक्ति करता है? वह ऐसा व्यक्ति होता है, जो सिर्फ झुंड के पीछे चलता है। उसके पास कोई उद्देश्य नहीं होता, कोई गवाही नहीं होती, और कोई दर्शन नहीं होता! ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। यदि तुम इस तरह से जारी रखते हो, तो एक दिन जब तुम पर कोई महान परीक्षण आएगा, तो तुम्हें सजा भोगनी पड़ जाएगी। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया में एक दृष्टिकोण का होना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक कदम पर भी शक नहीं करते, यदि तुम मनुष्य का कर्तव्य पूरा करते हो, तुम ईमानदारी के साथ उसे बनाए रखते हो जिसका परमेश्वर ने तुमसे अभ्यास करवाया है, अर्थात् तुम्हें परमेश्वर के उपदेश याद हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि वह वर्तमान में क्या करता है, तुम उसके उपदेशों को भूलते नहीं हो, यदि उसके कार्य के बारे में तुम्हें कोई संदेह नहीं है, तुम अपना दृष्टिकोण कायम रखते हो, अपनी गवाही बनाए रखते हो, और मार्ग के हर चरण में विजय प्राप्त करते हो, तो अंत में तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे और एक विजेता बना दिए जाओगे। यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों के हर चरण में दृढ़तापूर्वक खड़े रहने में सक्षम हो, और तुम अभी भी बिलकुल अंत तक दृढ़तापूर्वक खड़े रह सकते हो, तो तुम एक विजेता हो, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यदि तुम अपने वर्तमान परीक्षणों में दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं रह सकते, तो भविष्य में यह और भी अधिक मुश्किल हो जाएगा। यदि तुम केवल मामूली पीड़ा से ही गुजरते हो और सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो अंतत: तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम खाली हाथ रह जाओगे। कुछ लोग जब यह देखते हैं कि परमेश्वर बोल नहीं रहा, तो अपना प्रयास छोड़ देते हैं, और उनका दिल टूट जाता है। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं है? इस तरह के लोगों में कोई वास्तविकता नहीं होती। जब परमेश्वर बोल रहा होता है, तो वे हमेशा बाहर से व्यस्त और उत्साही दिखते हुए, भाग-दौड़ करते रहते हैं, लेकिन अब जबकि वह बोल नहीं रहा, तो वे तलाश करना बंद कर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति का कोई भविष्य नहीं है। शुद्धिकरण के दौरान, तुम्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रवेश करना चाहिए और जो सबक सीखने चाहिए, उन्हें सीखना चाहिए; जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचन पढ़ते हो, तो तुम्हें अपनी स्वयं की स्थिति की इससे तुलना करनी चाहिए, अपनी कमियों का पता लगाना चाहिए और जानना चाहिए कि तुम्हारे पास सीखने के लिए अभी भी बहुत-से सबक हैं। शुद्धिकरण से गुज़रने पर जितना अधिक ईमानदारी से तुम तलाश करोगे, उतना ही अधिक तुम स्वयं को अपर्याप्त पाओगे। जब तुम शुद्धिकरण का सामना कर रहे होते हो, तो कई मुद्दे तुम्हारे सामने आते हैं; तुम उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तुम शिकायत करते हो, तुम अपने देह-सुख को प्रकट करते हो—केवल इसी तरह से तुम पता लगा सकते हो कि तुम्हारे भीतर बहुत अधिक भ्रष्ट स्वभाव हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 471

अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के लिए असाधारण आत्मविश्वास की आवश्यकता है, अय्यूब से भी अधिक आत्मविश्वास की। आत्मविश्वास के बिना लोग अनुभव प्राप्त करते रहने में सक्षम नहीं होंगे और न ही वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में सक्षम होंगे। जब बड़े परीक्षणों का दिन आएगा, तो कई लोग कलीसियाओं को छोड़ देंगे—कुछ यहाँ, कुछ वहाँ। कुछ ऐसे लोग होंगे, जो पिछले दिनों में अपनी खोज में काफी अच्छा कर रहे थे और यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे अब विश्वास क्यों नहीं करते। बहुत-सी चीजें होंगी, जिन्हें तुम नहीं समझ पाओगे, और परमेश्वर कोई चिह्न या चमत्कार प्रकट नहीं करेगा, न कुछ अलौकिक ही करेगा। यह इस बात को देखने के लिए है कि क्या तुम दृढ़ खड़े रह सकते हो—परमेश्वर लोगों को शुद्ध करने के लिए तथ्यों का उपयोग करता है। तुमने अभी तक बहुत ज्यादा कष्ट नहीं भोगे हैं। भविष्य में जब बड़े परीक्षण आएँगे, तो कुछ जगहों पर कलीसिया में से हर एक व्यक्ति चला जाएगा, और जिन लोगों के साथ तुम्हारा अच्छा संबंध रहा था, वे छोड़ जाएँगे और अपना विश्वास त्याग देंगे। क्या तुम तब मजबूती से खड़े रह पाओगे? अभी तक तुमने जिन परीक्षणों का सामना किया है, वे मामूली परीक्षण रहे हैं, और तुम शायद उनका मुश्किल से सामना कर पाए हो। इस चरण में केवल वचनों के माध्यम से शुद्धिकरण और पूर्ण बनाया जाना शामिल है। अगले चरण में, तुम्हें शुद्ध करने के लिए तुम पर तथ्य आएँगे, और तब तुम संकट के बीच में होगे। एक बार जब यह वास्तव में गंभीर हो जाएगा, तो परमेश्वर तुम्हें जल्दी करने और छोड़ने की सलाह देगा, और धार्मिक लोग तुम्हें अपने साथ चलने के लिए ललचाने का प्रयास करेंगे। यह, यह देखने के लिए है कि क्या तुम मार्ग पर चलते रह सकते हो, और ये सब चीज़ें परीक्षण हैं। वर्तमान परीक्षण मामूली हैं, लेकिन एक दिन आएगा, जब कुछ घर ऐसे होंगे, जहाँ माता-पिता अब और विश्वास नहीं करेंगे और कुछ घर ऐसे होंगे, जहाँ बच्चे अब और विश्वास नहीं करेंगे। क्या तुम जारी रख पाओगे? जितना आगे तुम जाओगे, तुम्हारे परीक्षण उतने बड़े होते जाएँगे। परमेश्वर लोगों की आवश्यकताओं और उनकी कद-काठी के अनुसार उन्हें शुद्ध करने का अपना कार्य करता है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाने के चरण के दौरान यह असंभव है कि लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी—वह केवल कम होगी। केवल इन्हीं शुद्धिकरणों के माध्यम से लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। निपटा जाना, अनुशासित किया जाना, परीक्षण किया जाना, ताड़ना दिया जाना, श्राप दिया जाना—क्या तुम यह सब सहन कर सकते हो? जब तुम किसी ऐसी कलीसिया को देखते हो, जो विशेष रूप से अच्छी स्थिति में है, जिसमें बहनें और भाई सभी महान ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, तो तुम स्वयं को उत्साहित महसूस करते हो। जब वह दिन आता है कि वे सब चले गए होते हैं, उनमें से कुछ अब और विश्वास नहीं करते, कुछ व्यवसाय करने या विवाह करने के लिए चले गए होते हैं और कुछ धर्म में शामिल हो गए होते हैं, तब भी क्या तुम मजबूती से खड़े रह पाओगे? क्या तुम अंदर से अप्रभावित रह पाओगे? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाना इतनी आसान बात नहीं है! वह लोगों को शुद्ध करने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। लोग इन्हें तरीकों के रूप में देखते हैं, लेकिन परमेश्वर के मूल इरादे में ये तरीके बिलकुल भी नहीं हैं, बल्कि तथ्य हैं। अंत में, जब वह लोगों को एक निश्चित बिंदु तक शुद्ध कर लेगा और उनमें कोई शिकायतें नहीं रहेंगी, तो उसके कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा। पवित्र आत्मा का महान कार्य तुम्हें पूर्ण बनाना है, और जब वह कार्य नहीं करता और स्वयं को छिपाता है, तो यह और भी ज्यादा तुम्हें पूर्ण बनाने के उद्देश्य से होता है, और विशेष रूप से इस तरह यह देखा जा सकता है कि क्या लोगों में परमेश्वर के लिए प्यार है, क्या उनका परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। जब परमेश्वर स्पष्ट रूप से बोलता है, तो तुम्हें खोज करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; केवल जब वह छिपा होता है, तभी तुम्हें खोजने और अपना रास्ता महसूस करने की आवश्यकता होती है। तुम्हें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे तुम्हारा भावी परिणाम और तुम्हारी मंजिल कुछ भी हो, तुम्हें अपने आजीवन ज्ञान और परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण कर पाने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, तुम्हें शिकायत करने से बचने में सक्षम होना चाहिए। लोगों के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य करने की एक शर्त है। उनमें प्यास होनी चाहिए और उन्हें खोज करनी चाहिए तथा उन्हें परमेश्वर के कार्यकलापों के बारे में आधे-अधूरे मन वाले या संशययुक्त नहीं होना चाहिए, और उन्हें हर समय अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए; केवल इसी तरह से वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मानवजाति से जो अपेक्षित है, वह है आसाधारण आत्मविश्वास और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आना—केवल अनुभव के माध्यम से ही लोग यह पता कर सकते हैं कि परमेश्वर कितना प्यारा है और पवित्र आत्मा लोगों में कैसे कार्य करता है। यदि तुम अनुभव नहीं करते, यदि तुम उसके माध्यम से अपना रास्ता महसूस नहीं करते, यदि तुम तलाश नहीं करते, तो तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। तुम्हें अपने अनुभवों के माध्यम से अपना रास्ता महसूस करना चाहिए, और केवल अपने अनुभवों के माध्यम से ही तुम परमेश्वर के कार्यों को देख सकते हो और यह पहचान सकते हो कि वह कितना चमत्कारी और अथाह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 472

परमेश्वर तुम्हें सभी प्रकार के झंझावातों, विपत्तियों, कठिनाइयों और अनगिनत असफलताओं और झटकों का अनुभव कराता है, ताकि अंतत: इन सब चीज़ों का अनुभव करने के दौरान तुम्हें पता चल जाए कि परमेश्वर जो कुछ कहता है, वह सब सही है, और कि तुम्हारे विश्वास, धारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, दार्शनिक सिद्धांत, दर्शन, इस संसार में जो कुछ भी तुमने सीखा है और तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें सिखाया है, वह सब ग़लत है। वे तुम्हें जीवन में सही मार्ग पर नहीं ले जा सकते, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के सामने आने में तुम्हारी अगुआई नहीं कर सकते, और तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह विफलता का मार्ग है। परमेश्वर अंतत: तुम्हें इन्हीं बातों का एहसास कराएगा। तुम्हारे लिए यह एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसे तुम्हें उद्धार का अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त करना चाहिए। लेकिन यह परमेश्वर को दुःखी भी करता है : चूँकि लोग विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव के हैं, इसलिए उन्हें इस प्रक्रिया से गुज़रना और इन झटकों का अनुभव करना चाहिए। किंतु यदि कोई सत्य से सचमुच प्यार करता है, यदि वह सचमुच परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का इच्छुक है, यदि वह परमेश्वर के उद्धार की विभिन्न पद्धतियों—उदाहरण के लिए परीक्षण, अनुशासन, न्याय और ताड़ना—को स्वीकार करने के लिए तैयार है, यदि वह यह सब भुगतने के लिए दृढ़संकल्प है, यदि वह यह मूल्य चुकाने के लिए तैयार है, तो परमेश्वर वास्तव में नहीं चाहता कि वह इतने ज़्यादा कष्ट उठाए, न ही वह यह चाहता है कि वह इतने अधिक झटके और विफलताएँ झेले। किंतु लोग बहुत विद्रोही हैं। वे कुटिल मार्ग अपनाना चाहते हैं, वे ये विपत्तियाँ झेलने को तैयार हैं। मनुष्य इसी तरह की चीज़ है, और परमेश्वर के पास मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंपने और उसे विभिन्न स्थितियों में रखकर तैयार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह सभी प्रकार के अनुभव प्राप्त करे और इन स्थितियों से विभिन्न सबक सीखे, और सभी प्रकार की बुरी चीज़ों के सार को पहचाने। इसके उपरांत मनुष्य पीछे मुड़कर देखे और पाए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वह स्वीकार करे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, कि केवल परमेश्वर ही सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है, और केवल परमेश्वर ही मनुष्य से वास्तव में प्रेम करता है, और मनुष्य के लिए परमेश्वर से बेहतर या उससे अधिक उसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है। लोग अंतत: किस सीमा तक तैयार किए जाते हैं? इस सीमा तक कि तुम कहो, "मैंने हर तरह की परिस्थिति का अनुभव किया है, और कोई भी स्थिति, व्यक्ति, विषय या वस्तु नहीं है जो मुझे सत्य को समझा सके, जो मुझे सत्य का आनंद दिला सके, जो मुझे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करा सके। मैं केवल आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर मनुष्य के स्थान पर रह सकता हूँ, एक सृजित प्राणी की स्थिति और कर्तव्य का पालन कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ स्वीकार कर सकता हूँ, और बिना किसी शिकायत या पसंद के, और बिना अपनी माँगों या इच्छाओं के, सृष्टिकर्ता के समक्ष आ सकता हूँ।" जब लोग इस स्तर पर पहुँच जाते हैं, तब वे परमेश्वर के सामने सचमुच शीश झुकाते हैं, और परमेश्वर को उन्हें अनुभव करवाने के लिए किन्हीं और स्थितियों का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो तुम लोग कौन-सा मार्ग अपनाना चाहते हो? कोई भी इंसान अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं में विपत्ति नहीं झेलना चाहता, और कोई भी झटके, विफलता, आपदा, हताशाओं और झंझावातों का अनुभव नहीं करना चाहता। किंतु कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। मनुष्य के भीतर की चीज़ें—उसकी प्रकृति का सार, उसका विद्रोहीपन, उसके विचार और दृष्टिकोण—अत्यधिक जटिल हैं; प्रतिदिन वे तुम्हारे भीतर घुल-मिल और गड्डमड्ड हो जाते हैं, और वे तुम्हें भीतर से मथ देते हैं। तुम सत्य-वास्तविकता में कम ही प्रवेश करते हो, तुम सत्य को कम ही समझते हो, और तुम्हारे भीतर अपने भ्रष्ट स्वभाव, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सार पर विजय पाने की शक्ति का अभाव होता है। इसलिए तुम्हारे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि दूसरा तरीका स्वीकार कर लो : लगातार विफलता और हताशा झेलो, लगातार नीचे गिरो, विपत्तियों के हाथों उछाले और पटके जाओ, कीचड़ में लोटो, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम कहो, "मैं थक गया हूँ, मैं उकता गया हूँ, मैं इस तरह जीना नहीं चाहता। मैं इन विफलताओं से गुजरना नहीं चाहता, मैं आज्ञाकारी बनकर सृष्टिकर्ता के सम्मुख आना चाहता हूँ। मैं परमेश्वर के वचन सुनूँगा, मैं वही करूँगा जो वह कहता है। जीवन में केवल यही सही मार्ग है।" जिस दिन तुम पूरी तरह से हार स्वीकार कर लोगे, केवल उसी दिन तुम परमेश्वर के सामने आओगे। क्या इससे तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ जान पाए? मनुष्य के प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, लेकिन वह इंसान का भला चाहता है। वह तुम्हारे लिए किसी भी परिवेश का निर्माण करे या वह तुमसे कुछ भी करने के लिए कहे, वह हमेशा सर्वोत्तम परिणाम देखना चाहता है। मान लो, तुम्हारे ऊपर कुछ बीतता है और तुम झटकों तथा विफलताओं का सामना करते हो। परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम्हें विफल होता देखे और फिर सोचे कि तुम समाप्त हो चुके हो, कि तुम्हें शैतान ने छीन लिया है, और उस बिंदु से तुम दोबारा कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकोगे, और तुम निराशा में डूब गए हो—परमेश्वर यह परिणाम नहीं देखना चाहता। परमेश्वर क्या देखना चाहता है? तुम इस मामले में भले ही विफल हो गए हो, पर तुम सत्य की तलाश करने, अपनी विफलता का कारण पता करने में समर्थ हो; तुम इस विफलता की सच्चाई स्वीकार करो और इससे कुछ ग्रहण करो, तुम सबक सीखो, तुम महसूस करो कि उस तरह कार्य करना ग़लत था, कि केवल परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना ही सही है। तुम्हें एहसास होता है, "मैं बुरा हूँ और मेरा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है। मुझमें विद्रोहीपन है, परमेश्वर जिन धार्मिक लोगों की बात करता है, मैं उनसे कुछ दूर हूँ, और मेरे अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है।" तुम्हें एक घटना का, मामले के वास्तविक तथ्य का एहसास होता है, और तुम चीज़ों को समझते हो और इस झटके तथा विफलता से उबरकर परिपक्व हो जाते हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। "परिपक्व होने" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ है और तुम उद्धार प्राप्त करने में समर्थ हो। इसका अर्थ है कि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हो, कि तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर कदम रखने के क़रीब आ गए हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। परमेश्वर अच्छे इरादे से काम करता है, और उसके समस्त कार्यों में उसका प्रेम छिपा होता है, जिसे लोग अक्सर समझ नहीं पाते। मनुष्य संकीर्ण और क्षुद्र है, और उसका हृदय सुई के छेद के समान संकीर्ण है; जब परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता या उसे कोई अनुग्रह या आशीष नहीं देता, तो वह परमेश्वर को दोषी ठहराता है। फिर भी परमेश्वर मनुष्य के साथ झगड़ा नहीं करता; वह ऐसा परिवेश निर्मित करता है, जो मनुष्य को यह बताता है कि अनुग्रह और लाभ कैसे प्राप्त किए जाते हैं, मनुष्य के लिए अनुग्रह का क्या अर्थ है, और मनुष्य उससे क्या प्राप्त कर सकता है। मान लो, तुम्हें कोई अच्छी चीज़ खाना पसंद है, जिसे परमेश्वर कहता है कि अधिक मात्रा में खाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है। तुम नहीं सुनते, उसी चीज़ को खाने पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर तुम्हें आराम से खाने देता है। नतीजतन, तुम बीमार हो जाते हो। इसे कई बार अनुभव करने के बाद, तुम्हें समझ में आता है कि परमेश्वर की बात ही सही है, वह जो कुछ कहता है, वह सब सच है, और तुम्हें उसके वचनों के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए। यही सही मार्ग है। और इसलिए ये झटके, विफलताएँ और दुःख, जिनसे लोग गुज़रते हैं, क्या बन जाते हैं? तुम परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को सराहते हो, और तुम यह भी मानते और विश्वास करते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं; परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बढ़ जाता है। कुछ और भी होता है : विफलता के इस दौर का अनुभव करने के माध्यम से तुम परमेश्वर के वचनों की सच्चाई और सटीकता का एहसास करने लगते हो, तुम देखते हो कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, और तुम सत्य का अभ्यास करने का सिद्धांत समझने लगते हो। इसलिए, यह अच्छा है कि लोग विफलता का अनुभव करें—यह कुछ कष्टदायक अवश्य है, किंतु यह उन्हें तैयार करता है। यदि इस प्रकार तैयार होने के परिणामस्वरूप अंतत: तुम परमेश्वर के समक्ष लौट आते हो, उसके वचनों को स्वीकार करते हो, और उन्हें सत्य के रूप में लेते हो, तो इस तरह तैयार होने, झटके और विफलताएँ सहने का अनुभव व्यर्थ नहीं जाता। परमेश्वर यही देखना चाहता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पौलुस की प्रकृति और स्‍वभाव को कैसे पहचाना जाए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 473

तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि वचनों को अब कह दिया गया है: बाद में, तुम बड़े क्लेश और बड़े दुःख से होकर जाओगे! सिद्ध बनना सरल या आसान बात नहीं है। कम से कम तुममें अय्यूब के समान विश्वास होना चाहिए या शायद उसके विश्वास से भी बड़ा विश्वास। तुम्हें जानना चाहिए कि भविष्य में परीक्षाएँ अय्यूब की परीक्षाओं से बड़ी होंगी, और कि तुम्हें फिर भी लम्बे समय की ताड़ना से होकर जाना अवश्य होगा। क्या यह एक सरल बात है? यदि तुम्हारी क्षमता में सुधार नहीं हो सकता, तो समझने की तुम्हारी योग्यता में कमी है, और तुम बहुत कम जानते हो, फिर उस समय तुम्हारे पास कोई साक्षी नहीं होगी, बल्कि तुम उपहास का पात्र बन जाओगे, अर्थात् शैतान के लिए एक खिलौना बन जाओगे। यदि तुम अभी दर्शनों को थामे नहीं रह सकते, तो तुम्हारी कोई नींव नहीं है, और भविष्य में तुम दुत्कार दिए जाओगे! मार्ग का हर भाग चलने के लिए सरल नहीं होता, इसलिए इसे हल्के में न लो। अभी इसे ध्यान से समझो और इस बात की तैयारी करो कि इस मार्ग के अंतिम चरण में उचित रीति से कैसे चलना है। यही वह मार्ग है जिस पर भविष्य में चलना होगा और इसमें सब लोगों को चलना होगा। तुम इस वर्तमान समझ को एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दे सकते, और यह न सोचो कि जो कुछ मैं तुमसे कह रहा हूँ बिलकुल व्यर्थ है। ऐसा दिन आएगा जब तुम इसका सदुपयोग करोगे—शब्दों को व्यर्थ ही नहीं कहा जा सकता। यह अपने आपको तैयार करने का समय है, यह भविष्य का मार्ग तैयार करने का समय है। तुम्हें उस मार्ग को तैयार करना चाहिए जिसमें तुम्हें बाद में चलना है; तुम्हें इस बात के प्रति चिंतित और व्याकुल होना चाहिए कि बाद में तुम कैसे स्थिर खड़े रह पाओगे और भविष्य के मार्ग के लिए कैसे अच्छी तरह से तैयारी कर पाओगे। पेटू और आलसी मत बनो! तुम्हें अपनी जरुरत की सब चीजों को प्राप्त करने हेतु अपने समय का सर्वोत्तम इस्तेमाल करने के लिए सब कुछ करना होगा। मैं तुम्हें सब कुछ दे रहा हूँ ताकि तुम समझ जाओ। तुम लोगों ने अपनी—अपनी आँखों से देखा है कि तीन वर्षों से भी कम समय में मैंने बहुत सी बातें कहीं है और बहुत सा कार्य किया है। इस रीति से कार्य करने का एक पहलू यह है कि लोगों में बहुत घटी है, और दूसरा पहलू यह है कि समय बहुत कम है और इसमें और देरी नहीं की जा सकती। तुम जिस प्रकार से इसकी कल्पना करते हो, उसके आधार पर लोगों को गवाही देने और उपयोग में लाये जाने के पहले पूर्ण आंतरिक स्पष्टता पानी होगी—क्या यह बहुत धीमा नहीं है? अतः मुझे कितनी दूर तुम्हारे साथ चलना होगा? यदि तुम चाहते हो मैं तब तक तुम्हारे साथ चलूँ जब तक कि बूढ़ा न हो जाऊँ, तो यह असंभव है! बड़े क्लेश से होकर जाने के द्वारा सब लोगों के भीतर सच्ची समझ विकसित हो जाएगी। ये कार्य के चरण हैं। एक बार जब तुम उन दर्शनों को समझ लेते हो जो आज पाए जाते हैं और सच्ची क्षमता को प्राप्त कर लेते हो, तो भविष्य में चाहे तुम जैसी भी कठिनाइयों से होकर गुजरो वे तुम पर जयवंत नहीं होंगी—तुम उनका सामना कर पाओगे। जब मैं कार्य के इस अंतिम चरण को पूरा कर लूँगा, और अंतिम वचनों को भी कह लूँगा, तो भविष्य में लोगों को अपने—अपने मार्ग पर चलना होगा। यह पहले कहे वचनों को पूरा करेगा: पवित्र आत्मा के पास हर व्यक्ति के लिए आदेश है और हर व्यक्ति के द्वारा किया जाने वाला कार्य है। भविष्य में, प्रत्येक व्यक्ति पवित्र आत्मा की अगुवाई के द्वारा उस मार्ग पर चलेगा जिस पर उन्हें चलना चाहिए। क्लेश के समय में होकर जाते हुए कौन दूसरों को संभाल पाएगा? हरेक व्यक्ति के अपने दुःख हैं, और हरेक व्यक्ति की अपनी क्षमता है। किसी की क्षमता किसी दूसरे के जैसी नहीं होती। पति अपनी पत्नियों को नहीं संभालेंगे और माता—पिता अपने बच्चों को नहीं संभालेंगे; कोई किसी को नहीं संभाल पाएगा। यह आज के जैसा नहीं है—पारस्परिक संभाल और सहयोग आज भी संभव है। वह हर प्रकार के व्यक्ति का खुलासा किए जाने का समय होगा। कहने का अर्थ यह है कि जब परमेश्वर चरवाहों को मारेगा तो झुंड की भेड़ें तितर—बितर हो जाएँगी, और उस समय तुम लोगों के पास कोई सच्चा अगुवा नहीं होगा। लोगों में फूट पड़ जाएगी—यह आज के जैसा नहीं होगा, जहाँ तुम लोग एक सभा के रूप में एक साथ एकत्रित हो सकते हो। बाद में, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा वे अपने वास्तविक रंग को दिखाएँगे। पति अपनी पत्नियों को बेच देंगे, पत्नियाँ अपने पतियों को बेच देंगी, बच्चे अपने माता—पिता को बेच देंगे, माता—पिता अपने बच्चों को सताएँगे—मानवीय हृदय का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता! केवल यह किया जा सकता है कि एक व्यक्ति उसी को थामे रहे जो उसके पास है, और मार्ग के अंतिम चरण में अच्छी तरह से चले। अभी तुम लोग इसे स्पष्टता से नहीं देखते और तुम सब निकटदर्शी हो। कार्य के इस चरण में से सफलतापूर्वक होकर जाना कोई सरल कार्य नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपने मार्ग के अंतिम दौर में तुम्हें कैसे चलना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 474

अधिकांश लोग अपनी भविष्य की मंज़िल के लिए, या अल्पकालिक आनंद के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। उन लोगों की बात करें जो किसी व्यवहार से नहीं गुज़रे हैं, तो वे स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए, पुरस्कार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे पूर्ण बनाए जाने के लिए, या परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि अधिकांश लोग अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए, या अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। सार्थक जीवन जीने के लिए वे बिरले ही कभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, न ही ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि जब तक मनुष्य जीवित है, उसे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना स्वर्ग द्वारा विहित और पृथ्वी द्वारा अभिस्वीकृत किया गया है, और यह मनुष्य का स्वाभाविक उद्यम है। इस ढंग से, यद्यपि विभिन्न लोग अपने-अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं, फिर भी उनके अनुसरण का उद्देश्य और उसके पीछे की प्रेरणा सब समान होते हैं, और इतना ही नहीं, उनमें से अधिकांश लोगों के लिए उनकी आराधना के विषय बहुत कुछ समान हैं। पिछले कई हज़ार वर्षों के दौरान, बहुत-से विश्वासी मर चुके हैं, और बहुत-से मरकर पुनः जन्म ले चुके हैं। मात्र एक या दो लोग नहीं हैं जो परमेश्वर की खोज करते हैं, न ही एक या दो हज़ार लोग हैं, फिर भी इनमें से अधिकांश लोग भविष्य के लिए स्वयं अपनी संभावनाओं या अपनी उज्ज्वल आशाओं की ख़ातिर अनुसरण करते हैं। वे जो मसीह के प्रति समर्पित हैं, बिरले और बहुत कम हैं। अब भी अनेक समर्पित विश्वासी अपने ही बिछाए जालों में फँसकर मर चुके हैं, और यही नहीं, जो लोग विजेता रहे हैं उनकी संख्या महत्वहीन होने की हद तक कम है। आज भी, लोग अपनी विफलता के कारणों से, या अपनी विजय के रहस्यों से अनजान ही बने हुए हैं। उन लोगों ने जिन पर मसीह का अनुसरण खोजने की धुन सवार है अकस्मात अंतर्दृष्टि का अपना पल अब भी प्राप्त नहीं किया है, वे इन रहस्यों के तल तक नहीं पहुँचे हैं, क्योंकि वे कुछ जानते ही नहीं हैं। यद्यपि वे अपने अनुसरण में कष्टसाध्य प्रयास करते हैं, किंतु वे जिस पथ पर चलते हैं वह विफलता का वही पथ है जिस पर कभी उनके पूर्वज चले थे, और सफलता का पथ नहीं है। इस तरह, वे चाहे जैसे खोज करते हों, क्या वे उस पथ पर नहीं चलते हैं जो अंधकार की ओर ले जाता है? वे जो प्राप्त करते हैं क्या वह कड़वा फल नहीं है? यह पहले से बता पाना काफ़ी कठिन है कि वे लोग जो बीते हुए समयों में सफल रहे लोगों का अनुकरण करते हैं अंततः सौभाग्य पर पहुँचेंगे या दुर्भाग्य पर। ऐसे में, विफल लोगों के पदचिन्हों पर चलकर खोज करने वाले लोगों की कठिनाइयाँ और भी कितनी बदतर हैं? क्या उनकी विफलता की संभावना और भी अधिक नहीं है? उस पथ का भला क्या मूल्य है जिस पर वे चलते हैं? क्या वे अपना समय बर्बाद नहीं कर रहे हैं? संक्षेप में, लोग अपने अनुसरण में सफल हों या विफल, उनके ऐसा करने का एक कारण है, और बात यह नहीं है कि उनकी सफलता या विफलता उनके द्वारा किसी भी मनचाहे ढंग से की गई उनकी खोज से निर्धारित होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 475

परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की सबसे मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसका हृदय ईमानदार हो, और वह स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दे, और सच्चे अर्थ में आज्ञापालन करे। मनुष्य के लिए सबसे कठिन है सच्चे विश्वास के बदले अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह समूचा सत्य प्राप्त कर सकता है, और परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। यह वह है जो उन लोगों द्वारा अप्राप्य है जो विफल रहते हैं, और उन लोगों द्वारा तो और भी अधिक अप्राप्य है जो मसीह को पा नहीं सकते हैं। चूँकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूर्णतः समर्पित करने में निपुण नहीं है; चूँकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के प्रति अपना कर्तव्य निभाने का अनिच्छुक है, चूँकि मनुष्य ने सत्य देखा तो है किंतु उसे अनदेखा करता है और स्वयं अपने पथ पर चलता है, चूँकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ का अनुसरण करते हुए तलाश करता है जो विफल हो चुके हैं, चूँकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग की अवज्ञा करता है, इसलिए मनुष्य हमेशा विफल होता है, हमेशा शैतान के छल-कपट के झाँसे में आ जाता है, और स्वयं अपने जाल में फँस जाता है। चूँकि मनुष्य मसीह को नहीं जानता है, चूँकि मनुष्य सत्य को समझने और अनुभव करने में पारंगत नहीं है, चूँकि मनुष्य पौलुस की बहुत अधिक आराधना के भाव से और स्वर्ग की अत्यधिक लालसा से परिपूर्ण है, चूँकि मनुष्य हमेशा माँग करता रहता है कि मसीह उसकी आज्ञा माने और परमेश्वर को जहाँ-तहाँ आदेश देता रहता है, इसलिए वे महान हस्तियाँ और वे लोग जिन्होंने संसार के उतार-चढ़ावों का अनुभव किया है अब भी नश्वर हैं, और परमेश्वर की ताड़ना के बीच अब भी मरते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे एक दुखद मौत मरते हैं, और उनका यह परिणाम—उनकी मृत्यु—औचित्य से रहित नहीं है। क्या उनकी विफलता स्वर्ग की व्यवस्था के लिए और भी अधिक असहनीय नहीं है? सत्य मनुष्य के संसार से आता है, किंतु मनुष्य के बीच सत्य मसीह द्वारा लाया जाता है। यह मसीह से, अर्थात् स्वयं परमेश्वर से उत्पन्न होता है, और यह कुछ ऐसा नहीं है जिसमें मनुष्य समर्थ हो। फिर भी मसीह सिर्फ़ सत्य प्रदान करता है; वह यह निर्णय लेने के लिए नहीं आता है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण में सफल होगा या नहीं। इस प्रकार इसका अर्थ है कि सत्य में सफलता या विफलता पूर्णतः मनुष्य के अनुसरण पर निर्भर करती है। सत्य में मनुष्य की सफलता या विफलता का मसीह के साथ कभी कोई लेना-देना नहीं रहा है, बल्कि इसके बजाय यह उसके अनुसरण से निर्धारित होती है। मनुष्य की मंज़िल और उसकी सफलता या विफलता परमेश्वर के मत्थे नहीं मढ़ी जा सकती, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उस कर्तव्य से है जो परमेश्वर के सृजित प्राणियों को निभाना चाहिए। अधिकांश लोगों को पौलुस और पतरस के अनुसरण और मंज़िल का थोड़ा-सा ज्ञान अवश्य है, फिर भी लोग पतरस और पौलुस के परिणामों से अधिक कुछ नहीं जानते हैं, और वे पतरस की सफलता के पीछे के रहस्य, और पौलुस को विफलता की ओर ले गई कमियों से अनजान हैं। और इसलिए, यदि तुम लोग उनके अनुसरण का सार अच्छी तरह समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ हो, तो तुम लोगों में से अधिकांश का अनुसरण अब भी विफल हो जाएगा, और यदि तुममें से एक छोटी-सी संख्या सफल भी हो जाती है, तब भी वे पतरस के समकक्ष नहीं होंगे। यदि तुम्हारे अनुसरण का पथ सही पथ है, तो तुम्हारे पास सफलता की आशा है; सत्य का अनुसरण करते हुए तुमने जिस पथ पर क़दम रखा है यदि वह ग़लत पथ है, तो तुम सदा के लिए सफलता के अयोग्य होगे, और वही अंत प्राप्त करोगे जो पौलुस का हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 476

पतरस वह मनुष्य था जिसे पूर्ण बनाया गया था। ताड़ना और न्याय का अनुभव करने, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम प्राप्त करने के बाद ही, उसे पूरी तरह पूर्ण बनाया गया था; वह जिस पथ चला वह पूर्ण किए जाने का पथ था। कहने का तात्पर्य यह है, बिलकुल शुरुआत से ही, पतरस जिस पथ पर चला वह सही पथ था, और परमेश्वर में विश्वास करने के लिए उसकी प्रेरणा सही प्रेरणा थी, और इसलिए वह ऐसा व्यक्ति बना जिसे पूर्ण बनाया गया था और उसने एक नए पथ पर क़दम रखा जिस पर मनुष्य पहले कभी नहीं चला था। परंतु पौलुस शुरुआत से ही जिस पथ पर चला था वह मसीह के विरोध का पथ था, और केवल इसलिए कि पवित्र आत्मा अपने कार्य के लिए उसका उपयोग करना चाहता था, और उसकी सभी प्रतिभाओं और उसके सभी गुणों का लाभ उठाना चाहता था, उसने कई दशकों तक मसीह के लिए कार्य किया। वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, और उसका उपयोग इसलिए नही किया गया था कि यीशु उसकी मानवता को प्रशंसात्मक ढंग से देखता था, बल्कि उसकी प्रतिभाओं के कारण उसका उपयोग किया था। वह यीशु के लिए कार्य कर पाया तो इसलिए कि उसे विवश कर दिया गया था, इसलिए नहीं कि वह ऐसा करते हुए प्रसन्न था। वह ऐसा कार्य कर पाया तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के कारण कर पाया था, और उसने जो कार्य किया वह किसी भी तरह उसके अनुसरण, या उसकी मानवता को नहीं दर्शाता था। पौलुस का कार्य एक सेवक का कार्य दर्शाता था, जिसका तात्पर्य है कि उसने एक प्रेरित का कार्य किया था। हालाँकि पतरस भिन्न था : उसने भी कुछ कार्य किया था, यह पौलुस के कार्य जितना बड़ा नहीं था, किंतु उसने स्वयं अपने प्रवेश का अनुसरण करते हुए कार्य किया था, और उसका कार्य पौलुस के कार्य से भिन्न था। पतरस का कार्य परमेश्वर के एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित की भूमिका में कार्य नहीं किया था, बल्कि परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करते हुए कार्य किया था। पौलुस के कार्य के क्रम में उसका व्यक्तिगत अनुसरण भी निहित था : उसका अनुसरण भविष्य की उसकी आशाओं, और एक अच्छी मंज़िल की उसकी इच्छा से अधिक किसी चीज़ के लिए नहीं था। उसने अपने कार्य के दौरान शुद्धिकरण स्वीकार नहीं किया था, न ही उसने काँट-छाँट और व्यवहार स्वीकार किया था। वह मानता था कि उसने जो कार्य किया वह जब तक परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करता था, और उसने जो कुछ किया वह सब जब तक परमेश्वर को प्रसन्न करता था, तब तक पुरस्कार अंततः उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे—यह सब स्वयं उसके लिए था, और परिवर्तन के अनुसरण के बीच नहीं किया गया था। उसके कार्य में सब कुछ एक सौदा था, इसमें परमेश्वर के सृजित प्राणी का एक भी कर्तव्य या समर्पण निहित नहीं था। अपने कार्य के क्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य दूसरों की सेवा मात्र का था, और उसके स्वभाव में बदलाव लाने में असमर्थ था। पौलुस ने अपना कार्य सीधे, पूर्ण बनाए या निपटे बिना ही किया था, और वह पुरस्कार से प्रेरित था। पतरस भिन्न था : वह ऐसा व्यक्ति था जो काँट-छाँट और व्यवहार से गुज़रा था, और शुद्धिकरण से गुज़रा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य और प्रेरणा पौलुस से कार्य के लक्ष्य और प्रेरणा से मूलतः भिन्न थे। यद्यपि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, किंतु उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुज़रा था, और उसने जिसकी खोज की, वह सत्य, और वास्तविक बदलाव था। उसका कार्य मात्र कार्य करने की ख़ातिर नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, किंतु वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और यद्यपि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, किंतु उसने इसका अनुभव नहीं किया था। पतरस ने बहुत कम कार्य किया तो केवल इसलिए कि पवित्र आत्मा ने उसके माध्यम से अधिक कार्य नहीं किया था। उनके कार्य की मात्रा ने यह निर्धारित नहीं किया कि उन्हें पूर्ण बनाया गया या नहीं बनाया गया; एक का अनुसरण पुरस्कार प्राप्त करने के लिए था, और दूसरे का अनुसरण परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम प्राप्त करने के लिए, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए था, इस हद तक कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए वह प्यारी-सी छवि जी सका था। बाहर से वे भिन्न थे, और इसलिए उनके सार भी भिन्न-भिन्न थे। इस आधार पर कि उन्होंने कितना कार्य किया था, तुम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि उनमें से किसे पूर्ण बनाया गया था। पतरस ने प्रयास किया कि वह ऐसे व्यक्ति की छवि जिए जो परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति बने जो परमेश्वर की आज्ञा मानता था, ऐसा व्यक्ति बने जो व्यवहार और काँट-छाँट स्वीकार करता था, और ऐसा व्यक्ति बने जिसने परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया था। वह परमेश्वर के प्रति अपने को समर्पित करने, अपने को संपूर्णता में परमेश्वर के हाथों में सौंप देने, और मृत्युपर्यंत उसकी आज्ञा मानने में सक्षम था। यह वह था जो उसने करने का संकल्प लिया था, और इतना ही नहीं, यह वह था जिसे उसने प्राप्त किया था। यही वह मूलभूत कारण था जिससे उसका अंत पौलुस के अंत से अंततः भिन्न था। पवित्र आत्मा ने पतरस में जो कार्य किया था वह उसे पूर्ण बनाना था, और पवित्र आत्मा ने पौलुस में जो कार्य किया था वह उसका उपयोग करना था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी प्रकृतियाँ और अनुसरण के प्रति उनके विचार एक समान नहीं थे। दोनों में पवित्र आत्मा का कार्य था। पतरस ने यह कार्य अपने पर लागू किया था, और इसे दूसरों को भी प्रदान किया था; जबकि पौलुस ने पवित्र आत्मा का समूचा कार्य दूसरों को प्रदान कर दिया था, और इसमें से कुछ भी स्वयं अपने लिए प्राप्त नहीं किया था। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य का इतने अधिक वर्षों तक अनुभव कर चुकने के बाद भी, पौलुस में हुए बदलाव न के बराबर थे। वह अब भी लगभग अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही था, और वह अब भी पहले का पौलुस ही था। बात बस इतनी थी कि कई वर्षों के कार्य की तक़लीफ़ सहने के बाद, उसने सीख लिया था कि कैसे "कार्य करना" है, और सहनशीलता सीख ली थी, किंतु उसकी पुरानी प्रकृति—उसकी अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और स्वार्थलोलुप प्रकृति—अब भी क़ायम थी। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं जानता था, न ही उसने स्वयं को अपने पुराने स्वभाव से मुक्त किया था, और यह उसके कार्य में अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसमें कार्य का अधिक अनुभव मुश्किल से ही था, किंतु इतना थोड़ा-सा अनुभव मात्र उसे बदलने में असमर्थ था और अस्तित्व या उसके अनुसरण के महत्व के बारे में उसके विचारों को नहीं बदल सकता था। हालाँकि उसने मसीह के लिए कई सालों तक कार्य किया था, और प्रभु यीशु को फिर कभी सताया नहीं था, लेकिन उसके हृदय में परमेश्वर के उसके ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं आया था। इसका अर्थ है कि उसने स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए कार्य नहीं किया, बल्कि इसके बजाय वह भविष्य की अपनी मंज़िल के ख़ातिर कार्य करने के लिए बाध्य था। क्योंकि, आरंभ में, उसने मसीह को सताया था, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं हुआ था; वह सहज रूप से विद्रोही था जो जानबूझकर मसीह का विरोध करता था, और ऐसा व्यक्ति जिसे पवित्र आत्मा के कार्य का कोई ज्ञान नहीं था। जब उसका कार्य लगभग समाप्त हो गया था, तब भी वह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और पवित्र आत्मा की इच्छा पर रत्ती भर भी ध्यान दिए बिना, स्वयं अपने चरित्र के अनुसार स्वयं अपनी इच्छा से काम करता था। और इसलिए उसकी प्रकृति मसीह के प्रति शत्रुतापूर्ण थी और सत्य का पालन नहीं करती थी। इस तरह का कोई व्यक्ति, जिसे पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा त्याग दिया गया था, जो पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और जो मसीह का विरोध भी करता था—ऐसे व्यक्ति को कैसे बचाया जा सकता था? मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता है कि उसने कितना कार्य किया है, या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इससे निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है या नहीं, और अनुसरण के प्रति उसके विचार सत्य की अनुरूपता में हैं या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 477

यद्यपि पतरस द्वारा यीशु का अनसुरण प्रारंभ करने के बाद प्राकृतिक प्रकाशन घटित हुए थे, किंतु प्रकृति से वह, बिलकुल आरंभ से ही, ऐसा व्यक्ति था जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होने और मसीह के अनुसरण की तलाश करने का इच्छुक था। पवित्र आत्मा के प्रति उसकी आज्ञाकारिता शुद्ध थी : उसने प्रसिद्धि और सौभाग्य की खोज नहीं की, बल्कि इसके बजाय वह सत्य का अनुपालन करने से प्रेरित था। यद्यपि तीन बार ऐसा हुआ कि पतरस ने यीशु को जानने से इनकार कर दिया था, और यद्यपि उसने प्रभु यीशु को जाँचा-परखा था, किंतु ऐसी हल्की-सी मानवीय कमज़ोरी का उसकी प्रकृति से कोई संबंध नहीं था, इसने उसके भविष्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं किया था, और यह समुचित रूप से सिद्ध नहीं कर सकता है कि उसकी जाँच-परख मसीह-विरोधी का कार्य था। सामान्य मानवीय कमज़ोरी कुछ ऐसी चीज़ है जो संसार के सभी लोगों द्वारा साझा की जाती है—क्या तुम पतरस के ज़रा भी भिन्न होने की अपेक्षा करते हो? क्या पतरस के बारे में लोगों के कुछ निश्चित विचार इसलिए नहीं हैं क्योंकि उसने अनेक मूर्खतापूर्ण ग़लतियाँ की थीं? और क्या लोग पौलुस द्वारा किए गए समस्त कार्य, और उसके द्वारा लिखी गई सभी पत्रियों के कारण उसकी अत्यधिक प्रशंसा नहीं करते हैं? मनुष्य के सार को अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? निश्चय ही जिनमें सच्ची समझ है वे ऐसी कोई महत्वहीन चीज़ समझ सकते हैं? यद्यपि पतरस के दर्दनाक अनुभवों के कई वर्ष बाइबिल में दर्ज़ नहीं किए गए हैं, किंतु इससे यह साबित नहीं होता है कि पतरस को वास्तविक अनुभव नहीं हुए थे, या पतरस को पूर्ण नहीं बनाया गया था। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की पूरी थाह कैसे ले सकता है? बाइबिल के अभिलेख यीशु द्वारा व्यक्तिगत रूप से नहीं चुने गए थे, बल्कि बाद की पीढ़ियों द्वारा संकलित किए गए थे। ऐसा होने से, क्या वह सब जो बाइबिल में दर्ज़ किया गया था मनुष्य के विचारों के अनुसार नहीं चुना गया था? इतना ही नहीं, पतरस और पौलुस के अंत पत्रियों में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं हैं, अतः मनुष्य पतरस और पौलुस को स्वयं अपनी धारणाओं के अनुसार, और स्वयं अपनी वरीयताओं के अनुसार परखता है। और चूँकि पौलुस ने इतना अधिक कार्य किया था, चूँकि उसके "योगदान" इतने बड़े थे, इसलिए उसने जनसमुदाय का भरोसा जीत लिया था। क्या मनुष्य केवल उथली बातों पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करता है? मनुष्य का सार अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? इसके साथ ही, इस बात को देखते हुए कि पौलुस हज़ारों सालों से आराधना का विषय रहा है, भला कौन उसके कार्य को जल्दबाज़ी में नकारने की हिम्मत करेगा? पतरस मात्र एक मछुआरा था, तो उसका योगदान पौलुस के योगदान जितना बड़ा कैसे हो सकता था? उनके द्वारा दिए गए योगदान की दृष्टि से, पौलुस को पतरस से पहले पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, और उसे वह व्यक्ति होना चाहिए था जो परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए बेहतर योग्य था। कौन यह कल्पना कर सकता था कि पौलुस के प्रति अपने बर्ताव में, परमेश्वर ने उससे मात्र उसकी प्रतिभाओं के माध्यम से कार्य करवाया था, जबकि परमेश्वर ने पतरस को पूर्ण बना दिया था। बात निश्चित रूप से यह नहीं है कि प्रभु यीशु ने, बिल्कुल शुरुआत से ही, पतरस और पौलुस के लिए योजनाएँ बना ली थीं : इसके बजाय उन्हें उनकी अंतर्निहित प्रकृतियों के अनुसार पूर्ण बनाया गया था या कार्य में लगाया गया था। और इसलिए, लोग जो देखते हैं वे मनुष्य के बाह्य योगदान मात्र हैं, जबकि परमेश्वर जो देखता है वह मनुष्य का सार है, साथ ही वह पथ है जिसका मनुष्य आरंभ से अनुसरण करता है, और मनुष्य के अनुसरण के पीछे निहित प्रेरणा है। लोग मनुष्य को अपनी धारणाओं के अनुसार, और स्वयं अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार आँकते हैं, फिर भी मनुष्य का निर्णायक अंत उसकी बाहरी चीज़ों के अनुसार निर्धारित नहीं होता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम शुरुआत से जो पथ लेते हो यदि वह सफलता का पथ है, और अनुसरण के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण शुरुआत से ही सही दृष्टिकोण है, तो तुम पतरस के समान हो; तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो यदि वह विफलता का पथ है, तो तुम चाहे जो क़ीमत चुकाओ, तुम्हारा अंत भी वही होगा जो पौलुस का हुआ था। जो भी स्थिति हो, तुम्हारी मंज़िल, और तुम सफल होते हो या विफल होते हो, दोनों तुम्हारे समर्पण और तुम्हारे द्वारा चुकाई गई क़ीमत के बजाय, इससे निर्धारित होते हैं कि तुम जिस पथ की तलाश करते हो वह सही पथ है या नहीं। पतरस और पौलुस के सार, और वे लक्ष्य जिनका उन्होंने अनुसरण किया था, भिन्न-भिन्न थे; मनुष्य इन चीज़ों की खोज कर पाने में असमर्थ है, और केवल परमेश्वर ही इन्हें उनकी संपूर्णता में जान सकता है। क्योंकि परमेश्वर जो देखता है वह मनुष्य का सार है, जबकि मनुष्य स्वयं अपने सार के बारे में कुछ भी नहीं जानता है। मनुष्य, मनुष्य के भीतर के सार या उसकी वास्तविक कद-काठी को देख पाने में असमर्थ है, और इस प्रकार वह पौलुस और पतरस की विफलता और सफलता के कारणों की पहचान करने में असमर्थ है। अधिकांश लोग पौलुस की आराधना क्यों करते हैं और पतरस की क्यों नहीं, तो इसका कारण यह है कि पौलुस को सार्वजनिक कार्य के लिए उपयोग किया गया था, और मनुष्य इस कार्य का बोध कर पाता है, और इसलिए लोग पौलुस की "कार्यसिद्धियों" को स्वीकार करते हैं। इसी समय, पतरस के अनुभव मनुष्य के लिए अदृश्य हैं, और उसने जिसकी तलाश की थी वह मनुष्य के द्वारा अप्राप्य है, और इसलिए पतरस में मनुष्य की कोई रुचि नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 478

पतरस को व्यवहार और शुद्धिकरण का अनुभव करने के माध्यम से पूर्ण बनाया गया था। उसने कहा था, "मुझे हर समय परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना ही चाहिए। मैं जो भी करता हूँ उस सबमें मैं केवल परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की तलाश करता हूँ, और चाहे मुझे ताड़ना मिले, या मेरा न्याय किया जाए, तो भी मैं ऐसा करके प्रसन्न हूँ।" पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया था, और उसका कार्य, वचन, और संपूर्ण जीवन सब परमेश्वर को प्रेम करने के लिए थे। वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्रता की खोज करता था, और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही अधिक बढ़ता गया। इसी समय, पौलुस ने बस बाहरी कार्य ही किया था, और यद्यपि उसने भी कड़ी मेहनत की थी, किंतु उसका परिश्रम अपना कार्य उचित ढंग से करने और इस तरह पुरस्कार पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, तो उसने अपने काम छोड़ दिया होता। पतरस जिस चीज़ की परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर सच्चा प्रेम था, और वह था जो व्यावहारिक था और जिसे प्राप्त किया जा सकता था। उसने इसकी परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, बल्कि इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने और भी कड़ी मेहनत करने की परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य और समर्पण की, और सामान्य लोगों द्वारा अनुभव नहीं किए गए सिद्धांतों की परवाह की थी। वह न तो अपने भीतर गहराई में बदलावों की और न ही परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की परवाह करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर का सच्चा प्रेम और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से निकटतर संबंध पाने के लिए, और व्यावहारिक जीवन यापन करने के लिए थे। पौलुस का कार्य इसलिए किया गया था क्योंकि यह यीशु के द्वारा उसे सौंपा गया था, और उन चीज़ों को पाने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये स्वयं अपने और परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से असंबद्ध थे। उसका कार्य केवल ताड़ना और न्याय से बचने के लिए था। पतरस ने जिसकी खोज की वह शुद्ध प्रेम था, और पौलुस ने जिसकी खोज की वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य का कई वर्षों का अनुभव प्राप्त किया था, और उसे मसीह का व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही स्वयं अपना अथाह ज्ञान भी था। और इसलिए, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धिकरण ने यीशु और जीवन के उसके ज्ञान को उन्नत बना दिया था, और उसका प्रेम बिना शर्त प्रेम था, यह स्वतःस्फूर्त प्रेम था, और उसने बदले में कुछ नहीं माँगा, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्ष काम किया, फिर भी उसने मसीह का अत्यधिक ज्ञान प्राप्त नहीं किया, और स्वयं अपने विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा ही था। उसमें मसीह के प्रति कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और जिस राह पर वह चला निर्णायक कीर्ति पाने के लिए थे। उसने जिसकी खोज की वह श्रेष्ठतम मुकुट था, शुद्धतम प्रेम नहीं। उसने सक्रिय रूप से नहीं, बल्कि निष्क्रिय रूप से खोज की; वह अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहा था, बल्कि पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद अपने अनुसरण में बाध्य था। और इसलिए, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था; यह पतरस था जो परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था जिसने अपना कर्तव्य निभाया था। मनुष्य सोचता है कि उन सभी को जो परमेश्वर के लिए कोई न कोई योगदान देते हैं पुरस्कार मिलना चाहिए, और योगदान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर की कृपा प्राप्त होनी चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेन-देन से संबंधित है, और वह परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की सक्रिय रूप से खोज नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता की जितनी अधिक खोज करते हैं, जिसका अर्थ परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की खोज करना भी है, उतनी ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह माँग करना है कि मनुष्य अपना मूल कर्तव्य और हैसियत पुनः प्राप्त करे। मनुष्य परमेश्वर का सृजित प्राणी है और इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से कोई भी माँग करके अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से अधिक कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस और पौलुस की मंज़िलों को, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि परमेश्वर के सृजित प्राणियों के रूप में वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसकी उन्होंने शुरुआत से खोज की थी, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या अन्य लोगों का आँकलन क्या था। और इसलिए, परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही परमेश्वर के सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और विवेकहीन लालसाओं से कलंकित है, तो प्राप्त किया गया प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होगा। यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार का अनुसरण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 479

पौलुस द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के सामने प्रदर्शित किया गया था, किंतु जहाँ तक यह बात है कि परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम कितना शुद्ध था और अपने हृदय की गहराई में वह परमेश्वर से कितना प्रेम करता था—तो ये चीज़ें मनुष्य देख नहीं सकता है। मनुष्य केवल वह कार्य देख सकता है जो उसने किया था, जिससे मनुष्य जान जाता है कि उसका पवित्र आत्मा द्वारा निश्चिय ही उपयोग किया गया था, और इसलिए मनुष्य सोचता है कि पौलुस पतरस से बेहतर था, कि उसका कार्य अधिक बड़ा था, क्योंकि वह कलीसियाओं का पोषण कर पाता था। पतरस ने केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर ही निर्भर किया और अपने आकस्मिक कार्य के दौरान बस थोड़े-से लोग ही प्राप्त किए थे। उसकी बस कुछेक ही अल्पज्ञात पत्रियाँ हैं, किंतु कौन जानता है कि उसके हृदय के भीतर गहराई में परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम कितना अधिक था? पौलुस दिन-रात लगातार परमेश्वर के लिए काम करता था : जब तक करने के लिए काम था, उसने वह किया। उसे लगा कि इस तरह वह मुकुट प्राप्त कर पाएगा, और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकेगा, तो भी उसने अपने कार्य के माध्यम से स्वयं को बदलने के तरीक़ों की खोज नहीं की। पतरस के जीवन की ऐसी कोई भी चीज़ जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती थी उसे असहज महसूस करवाती थी। यदि वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती, तो वह ग्लानि से भरा महसूस करता, और ऐसे उपयुक्त रास्ते की तलाश करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए पूरा ज़ोर लगा पाता। अपने जीवन के छोटे से छोटे और महत्वहीन पहलुओं में भी, वह अब भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की स्वयं से अपेक्षा करता था। जब उसके पुराने स्वभाव की बात आती तब भी वह स्वयं से ज़रा भी कम अपेक्षा नहीं करता था, सत्य में अधिक गहराई तक आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में सदैव अत्यधिक कठोर होता था। पौलुस केवल सतही प्रतिष्ठा और रुतबे की खोज करता था। वह मनुष्य के सामने स्वयं का दिखावा करने की चेष्टा करता था, और जीवन प्रवेश में ज़रा भी अधिक गहरी प्रगति करने की तलाश नहीं करता था। वह जिसकी परवाह करता था, वह सिद्धांत था, वास्तविकता नहीं। कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने परमेश्वर के लिए इतना अधिक कार्य किया था, तो उसे परमेश्वर द्वारा याद क्यों नहीं रखा गया? पतरस ने परमेश्वर के लिए बस थोड़ा-सा ही कार्य किया था, और कलीसिया के लिए कोई बड़ा योगदान नहीं दिया था, तो उसे पूर्ण क्यों बनाया गया?" पतरस एक निश्चित बिंदु तक, जिसकी परमेश्वर द्वारा अपेक्षा की जाती थी, परमेश्वर से प्रेम करता था; केवल इस जैसे लोगों की ही गवाही होती है। और पौलुस के विषय में क्या? पौलुस किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता था? क्या तुम जानते हो? पौलुस का कार्य किसके लिए किया गया था? और पतरस का कार्य किसके लिए किया गया था? पतरस ने अधिक कार्य नहीं किया था, लेकिन क्या तुम जानते हो कि उसके हृदय के भीतर गहराई में क्या था? पौलुस का कार्य कलीसियाओं के पोषण, और कलीसियाओं की सहायता से संबंधित था। पतरस ने जो अनुभव किया वे उसके जीवन स्वभाव में हुए परिवर्तन थे; उसने परमेश्वर के प्रति प्रेम अनुभव किया था। अब जब तुम उनके सार में अंतर जानते हो, तब तुम देख सकते हो कि अंततः कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास करता था, और कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास नहीं करता था। उनमें से एक परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करता था, और दूसरा परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम नहीं करता था; एक अपने स्वभाव में परिवर्तनों से गुज़रा था, और दूसरा नहीं गुज़रा था; एक ने विनम्रतापूर्वक सेवा की थी, और आसानी से लोगों के ध्यान में नहीं आता था, और दूसरे की लोगों द्वारा आराधना की जाती थी, और वह महान छवि वाला था; एक पवित्रता की खोज करता था, और दूसरा नहीं करता था, और यद्यपि वह अशुद्ध नहीं था, किंतु वह शुद्ध प्रेम से युक्त नहीं था; एक सच्ची मानवता से युक्त था, और दूसरा नहीं था; एक परमेश्वर के सृजित प्राणी के बोध से युक्त था, और दूसरा नहीं था। ऐसी हैं पतरस और पौलुस के सार की भिन्नताएँ। पतरस जिस पथ पर चला वह सफलता का पथ था, जो सामान्य मानवता की पुनः प्राप्ति और परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पुनः प्राप्ति पाने का पथ भी था। पतरस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सफल हैं। पौलुस जिस पथ पर चला वह विफलता का पथ था, और वह उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो केवल ऊपरी तौर पर स्वयं को समर्पित करते और खपाते हैं, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम नहीं करते हैं। पौलुस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्य से युक्त नहीं हैं। परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करने की चेष्टा की थी, और उस सब की आज्ञा मानने की चेष्टा की थी जो परमेश्वर से आया था। रत्ती भर शिकायत के बिना, वह ताड़ना और न्याय, साथ ही शुद्धिकरण, घोर पीड़ा और अपने जीवन की वंचनाओं को स्वीकार कर पाता था, जिनमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदल नहीं सका था। क्या यह परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम नहीं था? क्या यह परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पूर्ति नहीं थी? चाहे ताड़ना में हो, न्याय में हो, या घोर पीड़ा में हो, तुम मृत्यु पर्यंत आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सदैव सक्षम होते हो, और यह वह है जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना प्राप्त कर सकता है, तो वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को इससे बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता हो। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हो, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ हो। इस तरह, तुमने न केवल परमेश्वर के सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा निंदित भी किया जाएगा, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से युक्त नहीं है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है। तुम केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने की परवाह करते हो, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करते हो। तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, और सृष्टिकर्ता का आज्ञापालन या उससे प्रेम नहीं करते हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से अवज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 480

कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने अत्यधिक मात्रा में कार्य किया था, और उसने कलीसियाओं के लिए बड़े बोझ अपने कंधों पर उठाए थे और उनके लिए इतना अधिक योगदान दिया था। पौलुस की तेरह पत्रियों ने 2,000 वर्षों के अनुग्रह के युग का समर्थन किया था, और उन्हें केवल चार सुसमाचार के पश्चात सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। कौन उसके साथ तुलना कर सकता है? कोई भी यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य के गूढ़ अर्थ समझ नहीं सकता है, जबकि पौलुस की पत्रियाँ जीवन प्रदान करती हैं, और उसने जो कार्य किया था वह कलीसियाओं के लिए लाभकारी था। भला दूसरा कौन ऐसी चीज़ें प्राप्त कर सकता था? और पतरस ने क्या काम किया था?" जब मनुष्य दूसरों को आँकता है, तो वह उनके योगदान के अनुसार उन्हें आँकता है। जब परमेश्वर मनुष्य को आँकता है, तो वह मनुष्य की प्रकृति के अनुसार उन्हें आँकता है। उन लोगों में जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं अपना सार नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपना सार जानता था, जो परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। वह परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपनी अपूर्णताएँ, कमज़ोरियाँ, और अपना भ्रष्ट स्वभाव जानता था, और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने की योग्यता से संपन्न हैं। वे लोग जो नहीं बदलते हैं उन लोगों में आते हैं जो स्वभाविक रूप से पुराने और बेकार हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें ठुकरा चुका है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जानना चाहिए कि तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जैसे पतरस या पौलुस थे। यदि तुम जो खोजते हो उसमें अब भी कोई सत्य नहीं है, और यदि तुम आज भी उतने ही अहंकारी और अभद्र हो जितना पौलुस था, और अब भी उतने ही बकवादी और शेखीबाज हो जितना वह था, तो तुम बिना किसी संदेह के पतित व्यक्ति हो जो विफल होता है। यदि तुम पतरस के समान खोज करते हो, यदि तुम अभ्यासों और सच्चे बदलावों की खोज करते हो, और अहंकारी या उद्दंड नहीं हो, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने की तलाश करते हो, तो तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी होगे जो विजय प्राप्त कर सकता है। पौलुस स्वयं अपना सार या भ्रष्टता नहीं जानता था, वह अपनी अवज्ञाकारिता तो और भी नहीं जानता था। उसने मसीह के प्रति अपनी कुत्सित अवज्ञा का कभी उल्लेख नहीं किया, न ही वह बहुत अधिक पछतावे से भरा था। उसने बस एक स्पष्टीकरण दिया, और, अपने हृदय की गहराई में, उसने परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण नहीं किया था। यद्यपि वह दमिश्क के रास्ते पर गिर पड़ा था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झाँककर नहीं देखा था। वह मात्र काम करते रहने से ही संतुष्ट था, और वह स्वयं को जानने और अपना पुराना स्वभाव बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं मानता था। वह तो बस सत्य बोलकर, स्वयं अपने अंतःकरण के लिए औषधि के रूप में दूसरों को पोषण देकर, और अपने अतीत के पापों के लिए अपने को सांत्वना देने और अपने को माफ़ करने की ख़ातिर यीशु के शिष्यों को अब और न सताकर ही संतुष्ट था। उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भविष्य के मुकुट और क्षणिक कार्य से अधिक कुछ नहीं था, उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भरपूर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य की खोज नहीं की थी, न ही उसने उस सत्य की अधिक गहराई में जाने की खोज की थी जिसे उसने पहले नहीं समझा था। इसलिए स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठ कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना और न्याय स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति या सार के ज्ञान से युक्त था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यासों पर था। यही नहीं, उसने जिसके लिए कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का संकल्प लिया था, न ही यह वह कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव की काँट-छाँट स्वीकार करने के बाद हुआ था। उसने चाहे जिस प्रकार कार्य किया, उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इसलिए उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका मात्र निभाई थी। इस जैसे व्यक्ति के लिए, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य यह, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक रहित था—वह प्रभु यीशु द्वारा स्वीकार किए गए लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसमें यीशु मसीह के लिए प्रेम और आदर समाया था, न ही वह ऐसा व्यक्ति था जो सत्य की खोज करने में पारंगत था, वह ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं था जो देहधारण के रहस्य की खोज करता था। वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जो मिथ्या वाद-विवाद में निपुण था, और जो किसी के भी आगे झुकता नहीं था जो उससे ऊपर थे या जो सत्य से युक्त थे। वह उन लोगों या सत्यों से ईर्ष्या करता था जो उसके विपरीत थे, या उसके प्रति शत्रुतापूर्ण थे, वह उन प्रतिभावान लोगों को प्रमुखता देता था जो बहुत अच्छी छवि प्रस्तुत करते थे और गहन ज्ञान से युक्त थे। वह उन गरीब लोगों से बातचीत करना पसंद नहीं करता था जो सच्चे मार्ग की खोज करते थे और सत्य के अलावा किसी भी चीज़ की परवाह नहीं करते थे, और इसके बजाय उसने धार्मिक संगठनों के वरिष्ठ व्यक्तियों से सरोकार रखा जो केवल सिद्धांतों की बात करते थे, और जो भरपूर ज्ञान से युक्त थे। उसमें पवित्र आत्मा के नए कार्य के प्रति कोई प्रेम नहीं था, और उसने पवित्र आत्मा के नए कार्य की हलचल की परवाह नहीं की। इसके बजाय, उसने उन नियमों और सिद्धांतों की तरफ़दारी की जो सामान्य सत्यों से कहीं अधिक ऊँचे थे। अपने जन्मजात सार और अपनी संपूर्ण खोज में, वह सत्य का अनुसरण करने वाला ईसाई कहलाने योग्य नहीं था, परमेश्वर के घर में वफादार सेवक कहलाने योग्य तो और भी नहीं था, क्योंकि उसका पाखंड बहुत अधिक था, और उसकी अवज्ञाकारिता बहुत विशाल थी। यद्यपि वह प्रभु यीशु के सेवक के रूप में जाना जाता है, किंतु वह स्वर्ग के राज्य के दरवाज़े में प्रवेश करने योग्य बिल्कुल नहीं था, क्योंकि आरंभ से अंत तक उसके कार्यकलापों को धार्मिक नहीं कहा जा सकता है। उसे बस ऐसे मनुष्य के रूप में देखा जा सकता है जो पांखडी था, जिसने अधार्मिकता की थी, किंतु जिसने मसीह के लिए कार्य किया था। यद्यपि उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकता है, फिर भी उसे उपयुक्त रूप से ऐसा मनुष्य कहा जा सकता है जिसने अधार्मिकता की थी। उसने बहुत कार्य किया था, फिर भी उसे उसके द्वारा किए गए कार्य की मात्रा के आधार पर नहीं ही परखा जाना चाहिए, बल्कि केवल उसकी गुणवत्ता और सार के आधार पर ही परखा जाना चाहिए। केवल इसी ढंग से इस मामले की तह तक पहुँचना संभव है। वह हमेशा मानता था : "मैं कार्य करने में सक्षम हूँ, मैं अधिकांश लोगों से बेहतर हूँ; मैं प्रभु के बोझ का उतना ध्यान रखता हूँ जितना कोई और नहीं रखता है, और कोई भी उतनी गहराई से पश्चाताप नहीं करता है जितना मैं करता हूँ, क्योंकि बड़ी ज्योति मेरे ऊपर चमकी थी, और मैं बड़ी ज्योति देख चुका हूँ, और इसलिए मेरा पश्चाताप किसी भी अन्य की अपेक्षा अधिक गहरा है।" यही वह है जो उसने उस समय अपने हृदय के भीतर सोचा था। अपने कार्य के अंत में, पौलुस ने कहा : "मैं लड़ाई लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, और मेरे लिए धर्म का मुकुट रखा हुआ है।" उसकी लड़ाई, कार्य और दौड़ पूरी तरह धार्मिकता के मुकुट के लिए थे, और वह सक्रिय रूप से तेज़ी से आगे नहीं निकला था। यद्यपि वह अपने कार्य में असावधान नहीं था, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उसका कार्य बस उसकी ग़लतियों की भरपाई करने के लिए, और उसके अंतःकरण के आरोपों की क्षतिपूर्ति करने के लिए था। वह बस यथासंभव जल्दी से जल्दी अपना कार्य पूरा करने, अपनी दौड़ समाप्त करने, और अपनी लड़ाई लड़ने की आशा करता था, ताकि वह अपना इच्छित धार्मिकता का मुकुट जल्द से जल्द प्राप्त कर सके। वह जिस चीज़ के लिए लालायित था वह अपने अनुभवों और सच्चे ज्ञान के साथ प्रभु यीशु से मिलना नहीं था, बल्कि यथासंभव जल्द से जल्द अपना कार्य समाप्त करना था, ताकि प्रभु यीशु से मिलने पर वह वे पुरस्कार प्राप्त करेगा जो उसने अपने कार्य से कमाए थे। उसने अपने को आराम देने के लिए, और भविष्य के मुकुट के लिए बदले में एक सौदा करने के लिए अपने कार्य का उपयोग किया था। उसने जिसकी खोज की वह सत्य या परमेश्वर नहीं था, बल्कि केवल मुकुट था। ऐसा अनुसरण मानक स्तर का कैसे हो सकता है? उसकी प्रेरणा, उसका कार्य, उसने जो मूल्य चुकाया, और उसके समस्त प्रयास—उसकी अद्भुत स्वैर कल्पनाएँ उन सबमें व्याप्त थीं, और उसने पूरी तरह स्वयं अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य किया था। उसके कार्य की संपूर्णता में, वह मूल्य चुकाने की रत्ती भर इच्छा नहीं थी जो उसने चुकाया था; वह तो बस सौदा करने में लगा था। उसके प्रयास अपना कर्तव्य निभाने के लिए सहर्ष नहीं किए गए थे, बल्कि सौदे का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए सहर्ष किए गए थे। क्या ऐसे प्रयासों का कोई मूल्य है? कौन ऐसे अशुद्ध प्रयासों की प्रशंसा करेगा? किसे ऐसे प्रयासों में रुचि है? उसका कार्य भविष्य के स्वप्नों से भरा था, अद्भुत योजनाओं से भरा था, और उसमें ऐसा कोई मार्ग नहीं था जिससे मानव स्वभाव को बदला जा सके। उसका बहुत कुछ परोपकार ढोंग था; उसका कार्य जीवन प्रदान नहीं करता था, बल्कि शिष्टता का ढकोसला था; यह सौदा करना था। इस जैसा कार्य मनुष्य को अपने मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति के पथ पर कैसे ले जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 481

पतरस ने जो खोज की थी, वह सब परमेश्वर के हृदय का अनुसरण था। उसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी, और पीड़ा तथा प्रतिकूल परिस्थितियों पर ध्यान दिए बिना वह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का इच्छुक था। परमेश्वर के किसी विश्वासी द्वारा इससे बड़ा कोई अनुसरण नहीं है। पौलुस ने जो खोज की थी, वह उसकी अपनी देह, अपनी अवधारणाओं, और उसकी अपनी योजनाओं तथा षडयंत्रों से कलंकित थी। वह किसी भी तरह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी नहीं था, ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी। परतस ने परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने का प्रयास किया था, और यद्यपि उसने जो कार्य किया वह बड़ा नहीं था, फिर भी उसके अनुसरण के पीछे की प्रेरणा और जिस पथ पर वह चला, सही थे; यद्यपि वह बहुत सारे लोगों को प्राप्त नहीं कर पाया, फिर भी वह सत्य के मार्ग का अनुसरण कर सका था। इसी कारण से कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था। आज, यदि तुम कार्यकर्ता नहीं हो, तब भी तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने और परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश करने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता है तुम्हें उसका पालन कर पाना, और सभी प्रकार के क्लेशों और शुद्धिकरण का अनुभव कर पाना, और यद्यपि तुम कमज़ोर हो, फिर भी तुम्हें अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम कर पाना चाहिए। जो स्वयं अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं वे परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं, और अनुसरण के बारे में ऐसे लोगों का दृष्टिकोण सही होता है। यही वे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को ज़रूरत है। यदि तुमने बहुत सारा कार्य किया है, और दूसरों ने तुम्हारी शिक्षाएँ प्राप्त की हैं, किंतु तुम स्वयं नहीं बदले हो, और कोई गवाही नहीं दी है, या कोई सच्चा अनुभव नहीं लिया है, यहाँ तक कि अपने जीवन के अंत में भी, तुमने जो कुछ किया उसमें से किसी कार्य ने भी गवाही नहीं दी है, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो बदल चुका है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तुम्हारा उपयोग किया था, किंतु जब उसने तुम्हारा उपयोग किया, तब उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग किया था जिसका कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता था, और उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता था। यदि तुम बदलने की कोशिश करते, तो तुम्हें उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। परंतु पवित्र आत्मा इस बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता कि तुम्हें अंततः प्राप्त किया जाएगा या नहीं, और यह तुम्हारे अनुसरण के तरीक़े पर निर्भर करता है। यदि तुम्हारे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं, तो इसलिए क्योंकि अनुसरण के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ग़लत है। यदि तुम्हें कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है, और इसलिए कि तुमने स्वयं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हो। और इसलिए, तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और तुम्हारे व्यक्तिगत प्रवेश से अधिक अत्यावश्यक कुछ भी नहीं है! कुछ लोग अंततः कहेंगे, "मैंने तुम्हारे लिए इतना अधिक कार्य किया है, और मैंने कोई प्रशंसनीय उपलब्धियाँ भले प्राप्त न की हों, फिर भी मैंने पूरी मेहनत से अपने प्रयास किए हैं। क्या तुम मुझे जीवन के फल खाने के लिए बस स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकते?" तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन लोगों को कभी आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरे साथ साँठ-गाँठ करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन की खोज करनी ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो, और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने की कोशिश नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 482

पतरस और पौलुस के सार में अंतर से तुम्हें समझना चाहिए कि वे सब जो जीवन का अनुसरण नहीं करते, व्यर्थ परिश्रम करते हैं! तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और इसलिए अपने ह्रदय में तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना ही चाहिए। तुम्हें अपना भ्रष्ट स्वभाव जरूर छोड़ देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति की खोज अवश्य करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तुम्हें अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए। चूँकि तुम्हें सृजित किया गया था, इसलिए तुम्हें उस प्रभु का आज्ञापालन करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया, क्योंकि तुम्हारा स्वयं अपने ऊपर स्वाभाविक कोई प्रभुत्व नहीं है, और स्वयं अपनी नियति को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पवित्रता और परिवर्तन की खोज करनी चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, और तुम्हें अपने कर्तव्य का अतिक्रमण कदापि नहीं करना चाहिए। यह तुम्हें सिद्धांत के माध्यम से बाध्य करने, या तुम्हें दबाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय यह वह पथ है जिसके माध्यम तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो, और यह उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है—और प्राप्त किया जाना चाहिए—जो धार्मिकता का पालन करते हैं। यदि तुम पतरस और पौलुस के सार की तुलना करो, तो तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हें खोज किस प्रकार करनी चाहिए। पतरस और पौलुस जिन पथों पर चले थे, उनमें से एक पूर्ण बनाए जाने का पथ है, और एक निष्कासन का पथ है; पतरस और पौलुस दो भिन्न-भिन्न पथों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यद्यपि प्रत्येक ने पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त किया था, और प्रत्येक ने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाशन प्राप्त किया था, और प्रत्येक ने वह स्वीकार किया था जो प्रभु यीशु द्वारा उन्हें सौंपा गया था, किंतु प्रत्येक में उत्पन्न फल समान नहीं था : एक ने सचमुच फल उत्पन्न किया था, और दूसरे ने नहीं किया था। उनके सार से, उन्होंने जो कार्य किया उससे, उनके द्वारा बाह्य रूप में जो अभिव्यक्त किया गया उससे, और उनके निर्णायक अंत से, तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हें कौन-सा पथ अपनाना चाहिए, चलने के लिए तुम्हें कौन-सा पथ चुनना चाहिए। वे दो बिल्कुल भिन्न पथों पर चले थे। पौलुस और पतरस, वे प्रत्येक पथ के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण थे, और इसलिए बिल्कुल आरंभ से ही वे इन दो पथों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रदर्शित किए गए थे। पौलुस के अनुभवों के मुख्य बिंदु क्या हैं, और वह सफल क्यों नहीं हुआ? पतरस के अनुभवों के मुख्य बिंदु क्या हैं, और उसने पूर्ण बनाए जाने का अनुभव कैसे किया? यदि तुम उसकी तुलना करो जिसकी उनमें से प्रत्येक ने परवाह की थी, तो तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर ठीक किस प्रकार का व्यक्ति चाहता है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है, किस प्रकार के व्यक्ति को अंततः पूर्ण बनाया जाएगा, और यह भी कि किस प्रकार के व्यक्ति को पूर्ण नहीं बनाया जाएगा; तुम्हें पता चलेगा कि उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा, और उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाएगा—सार के ये मुद्दे पतरस और पौलुस के अनुभवों में देखे जा सकते हैं। परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, और इसलिए वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पित करवाता है; वह सभी चीज़ों पर अधिकार रखेगा, ताकि सभी चीज़ें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, पशुओं, पेड़-पौधों, मानवजाति, पहाड़ तथा नदियों, और झीलों सहित—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। आकाश में और धरती पर सभी चीज़ों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है और सभी को उसके आयोजनों के समक्ष समर्पण करना ही होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सब कुछ पर अधिकार रखता है, और सभी चीज़ों का क्रम और उनकी श्रेणी निर्धारित करता है, जिसमें प्रत्येक को, परमेश्वर की इच्छानुसार, प्रकार के अनुरूप वर्गीकृत किया जाता है, और उनका अपना स्थान प्रदान किया जाता है। चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कोई भी चीज़ परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की सेवा करती हैं, और कोई भी चीज़ परमेश्वर की अवज्ञा करने या परमेश्वर से कोई भी माँग करने की हिम्मत नहीं करती है। इसलिए मनुष्य को भी, परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते, मनुष्य का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। वह सभी चीज़ों का चाहे प्रभु हो या देख-रेख करने वाला हो, सभी चीजों के बीच मनुष्य का कद चाहे जितना ऊँचा हो, तो भी वह परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एक अदना मानव भर है, और महत्वहीन मानव, परमेश्वर के सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं है, और वह कभी परमेश्वर से ऊपर नहीं होगा। परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में, मनुष्य को परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की कोशिश करनी चाहिए, और दूसरे विकल्पों को छोड़ कर परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। वे जो परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करते हैं, उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं ढूँढने चाहिए या वह नहीं ढूँढना चाहिए जिसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से लालायित हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है। यदि तुम जिसकी खोज करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है, और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिसे खोजते हो वह देह के आशीष हैं, और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी अवधारणाओं का सत्य है, और यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी आज्ञाकारी नहीं हो, और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसकी खोज कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या हटा दिया जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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