जीवन में प्रवेश 2

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 406

लोग अपने हृदय से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते और यदि उनका हृदय उसमें नहीं है और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, जो धार्मिक व्यक्तियों का ठेठ व्यवहार है, और वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के घर में सजावट की तरह, फालतू और बेकार। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं करता। ऐसे व्यक्ति में न केवल पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति, सच में, एक चलती-फिरती लाश की तरह है। ऐसे व्यक्तियों में ऐसा कुछ नहीं है, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जा सके, बल्कि इसके विपरीत, उन सभी को शैतान द्वारा हड़पा और गहरा भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को हटा देगा। वर्तमान में, लोगों का इस्तेमाल करते हुए पवित्र आत्मा न सिर्फ़ उनके उन हिस्सों का उपयोग करता है, जो काम करने के लिए वांछित हैं, बल्कि वह उनके अवांछित हिस्सों को भी पूर्ण करता और बदलता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में उँड़ेला जा सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी, और इससे भी बढ़कर, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियाँ दूर किए जाने का अवसर होगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहन प्रवेश प्राप्त कर सकोगे और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल हासिल कर सकोगे; और नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक होगे, और तुम निष्क्रिय नहीं रहोगे, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इस प्रकार, तुम एक सही व्यक्ति बन जाओगे। यह मानते हुए कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम है, इस बात की कुंजी कि तुम पवित्र आत्मा की प्रशंसा प्राप्त करते हो या नहीं, और तुम परमेश्वर को ख़ुश कर पाते हो या नहीं, यह है कि तुम सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हो या नहीं। जब पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति को प्रबुद्ध करता है और उसका उपयोग करता है, तो वह उसे कभी भी नकारात्मक नहीं बनाता, बल्कि हमेशा उसके सक्रिय रूप से प्रगति करने की व्यवस्था करता है। भले ही इस व्यक्ति में कमज़ोरियाँ हों, वह अपना जीवन जीने का तरीका उन कमजोरियों पर आधारित करने से बच सकता है। वह अपने जीवन में विकास में देरी करने से से बच सकता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की अपनी कोशिश जारी रख पाता है। यह एक मानक है। अगर तुम इसे प्राप्त कर सकते हो, तो यह पर्याप्त सबूत है कि तुमने पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ली है। यदि कोई व्यक्ति हमेशा नकारात्मक रहता है, और प्रबुद्धता हासिल करने तथा खुद को जानने के बाद भी नकारात्मक और निष्क्रिय बना रहता है और परमेश्वर के साथ खड़े होने तथा उसके साथ मिलकर कार्य करने में अक्षम रहता है, तो इस किस्म का व्यक्ति केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करता है, लेकिन पवित्र आत्मा उसके साथ नहीं होता। जब कोई व्यक्ति नकारात्मक होता है, तो इसका मतलब है कि उसका हृदय परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाया है और उसकी आत्मा परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित नहीं की गई है। इसे सभी को समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 407

अनुभव से यह देखा जा सकता है कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो लोगों के आध्यात्मिक जीवन से, और उनके जीवन में उनके विकास से संबंधित है। जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहेगा, केवल तभी सत्य की तुम्हारी खोज और तुम्हारे स्वभाव में आए परिवर्तन सफल होंगे। चूँकि तुम परमेश्वर के सामने बोझ से दबे हुए आते हो, और चूँकि तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुममें कई तरह की कमियाँ हैं, कि ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें जानना तुम्हारे लिए जरूरी है, तुम्हें बहुत सारी वास्तविकता का अनुभव करने की आवश्यकता है, और कि तुम्हें परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखना चाहिए—ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग़ में रहती हैं। ऐसा लगता है, मानो वे तुम पर इतना ज़ोर से दबाव डाल रही हों कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया हो, और इस प्रकार तुम्हारा हृदय भारी-भारी महसूस करता हो (हालाँकि तुम नकारात्मक स्थिति में नहीं होते)। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता स्वीकार करने और परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने के योग्य हैं। यह उनके बोझ के कारण है, क्योंकि उनका हृदय भारी-भारी महसूस करता है, और, यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत वे अदा कर चुके हैं और जो पीड़ा उन्होंने झेली है, उसके कारण वे उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के भी नहीं देता। यह उसके धर्मी स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में, अधिकांश लोगों को अभी इस क्षेत्र को हासिल करना बाक़ी है। कम से कम, उनका हृदय अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ना बाक़ी है, और इसलिए उनके जीवन-स्वभाव में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उन्हें अभी भी पवित्र आत्मा का कार्य हासिल करना शेष है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए लोगों को जो मानदंड पूरे करने चाहिए, वे इस प्रकार हैं : उनका हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, वे परमेश्वर के वचनों का दायित्व उठाते हैं, उनके पास तड़पता हुआ हृदय और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और वे अकसर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से तर्कहीन प्रतीत होते हैं और दूसरों के साथ उनके उचित संबंध नहीं होते, हालाँकि वे औचित्य के साथ बोलते हैं, लापरवाही से नहीं बोलते, और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। यह ठीक उसी तरह का व्यक्ति है, जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे "तर्कहीन" व्यक्तियों के, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है, दूसरों के साथ उचित संबंध नहीं होते, और वे बाहरी प्रेम या व्यवहारों को उचित सम्मान नहीं देते, लेकिन जब वे आध्यात्मिक चीज़ों पर संवाद करते हैं, तो वे अपना हृदय पूरी तरह खोल पाने में सक्षम होते हैं और निस्स्वार्थ भाव से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान करते हैं, जो उन्होंने परमेश्वर के सामने अपने वास्तविक अनुभव से हासिल की होती है। इसी प्रकार से वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और उसकी इच्छा पूरी करते हैं। जब दूसरे सभी लोग उनकी निंदा और उपहास कर रहे होते हैं, तो वे बाहर के लोगों, घटनाओं या चीज़ों द्वारा नियंत्रित होने से बचने में सक्षम होते हैं, और फिर भी परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के पास अपनी स्वयं की अनूठी अंतर्दृष्टियाँ होती हैं। दूसरे लोग चाहे कुछ भी करें, उनका हृदय कभी भी परमेश्वर से दूर नहीं जाता। जब दूसरे लोग प्रसन्नतापूर्वक और मज़ाकिया ढंग से बातें कर रहे होते हैं, उनका हृदय तब भी परमेश्वर के समक्ष रहता है, और वे परमेश्वर के वचनों पर विचार करते रहते हैं या उसकी मंशा जानने की कोशिश करते हुए अपने हृदय में परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना करते रहते है। वे दूसरों के साथ उचित संबंध बनाए रखने को महत्व नहीं देते। लगता है, ऐसे व्यक्ति का जीने के लिए कोई दर्शन नहीं होता। बाहर से ऐसा व्यक्ति जीवंत, प्रिय और मासूम होता है, लेकिन उसमें शांति की भावना भी रहती है। परमेश्वर इसी प्रकार के व्यक्ति का उपयोग करता है। जीवन-दर्शन या "सामान्य तर्क" जैसी चीज़ें इस प्रकार के व्यक्ति में काम ही नहीं करतीं; इस प्रकार के व्यक्ति ने अपना पूरा हृदय परमेश्वर के वचनों को समर्पित कर दिया होता है, और लगता है, उसके हृदय में सिर्फ़ परमेश्वर होता है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर "तर्कहीन" व्यक्ति के रूप में देखता है, और ठीक इसी प्रकार के व्यक्ति का परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की पहचान इस प्रकार है : चाहे कोई भी समय या जगह हो, उसका हृदय हमेशा परमेश्वर के समक्ष रहता है, और दूसरे चाहे जितने भी अनैतिक हों, जितने भी वे वासना और देह में लिप्त हों, इस व्यक्ति का हृदय कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ता, और वह भीड़ के पीछे नहीं जाता। केवल इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर द्वारा उपयोग के लिए अनुकूल है, और केवल इसी प्रकार का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किया जाता है। यदि तुम ये चीज़ें प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने और पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य नहीं हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 408

यदि तुम परमेश्वर के साथ उचित संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी उचित संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ उसके संबंध कभी उचित नहीं होंगे; इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। अपने स्वभाव को बदलना अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को अर्पित करने और परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने की प्रक्रिया है। परमेश्वर का कार्य व्यक्ति को सक्रियता से प्रवेश करा सकता है, और साथ ही उसे अपने नकारात्मक पहलुओं के बारे में जानने के बाद उनका परिमार्जन करने में सक्षम भी बना सकता है। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करने के बिंदु पर पहुँचोगे, तो तुम अपनी आत्मा के भीतर हर सूक्ष्म हलचल को महसूस कर पाओगे, और तुम परमेश्वर से प्राप्त हर प्रबुद्धता और रोशनी को जान जाओगे। इस सूत्र को पकड़कर रखोगे, तो तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करोगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष जितना शांत रह पाएगा, तुम्हारी आत्मा उतनी अधिक संवेदनशील और नाज़ुक रहेगी, और उतनी ही अधिक तुम्हारी आत्मा यह महसूस कर पाएगी कि पवित्र आत्मा किस तरह उसे प्रेरित करती है, और तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध और भी अधिक उचित हो जाएगा। लोगों के बीच उचित संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी उचित नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो। तुम्हारे बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में उचित हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर कितने जीवन-दर्शन हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर के नहीं हो—तुम शैतान से आते हो, और अंत में शैतान के पास ही लौट जाओगे। तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो। इन सभी बातों पर तुम्हें ध्यानपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 409

परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने वाले हृदय के साथ पूर्णतया संभव है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना, स्वयं के बारे में योजनाएँ न बनाना, और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; इसका अर्थ है परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर की इच्छा तुम पर प्रकट हो जाती है, तो फिर इस पर अमल करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। सब-कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर निर्मित होता है। परमेश्वर के वचनों को खाओ-पियो, फिर परमेश्वर की आवश्यकताओं को अभ्यास में लाओ, अपने विचार सही करो, और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला या कलीसिया में विघ्न डालने वाला कोई काम मत करो। ऐसा कोई काम मत करो, जो तुम्हारे भाई-बहनों के जीवन को लाभ न पहुँचाए; ऐसी कोई बात मत कहो, जो दूसरों के लिए सहायक न हो, और कोई निंदनीय कार्य न करो। अपने हर कार्य में न्यायसंगत और सम्माननीय रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर कार्य परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित पहले रखने और न्यायपूर्वक कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अपने इरादों पर ग़ौर करो, और अगर तुम यह पाओ कि गलत इरादे पैदा हो गए हैं, तो उनसे मुँह मोड़ लो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करो; इस तरह तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, जो बदले में दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही रखने और अपने कार्यों में नेक होने में सक्षम बनो, और अपनी भावनाओं से संचालित मत होओ, न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करो। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को आचरण करना चाहिए। छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के इरादे और आध्यात्मिक कद प्रकट कर सकती हैं, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना वांछित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ नहीं खोजते या अपनी संभावनाओं पर विचार नहीं करते (देह-सुख के अर्थ में), बल्कि जीवन में प्रवेश करने का बोझ उठाने के बजाय सत्य का अनुसरण करने की पूरी कोशिश करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम कहा जा सकता है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, फिर भी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या अवज्ञाकारी हों—परंतु जब तक तुम्हारे विचार और तुम्हारे इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार सही हैं : तुम किस पर विश्वास करते हो, किसके लिए विश्वास करते हो, और क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अच्छी तरह से अपने विचारों के साथ अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार विकृत हैं, तो बाकी सब-कुछ बेकार है; तुम कितना भी दृढ़ विश्वास क्यों न करो, तुम कुछ प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद ही तुम परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करोगे, जब तुम देह-सुख का त्याग कर दोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, इत्यादि। तुम्हारे कुछ करने की कोई कीमत या महत्त्व है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारे इरादे ठीक और विचार सही हैं? आजकल बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास इस तरह करते हैं, जैसे घड़ी देखने के लिए सिर उठा रहे हों—उनके दृष्टिकोण विकृत होते हैं और उन्हें सफलतापूर्वक सुधारा जाना चाहिए। अगर यह समस्या हल हो गई, तो सब-कुछ सही हो जाएगा; और अगर नहीं हुई, तो सब-कुछ नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग मेरी उपस्थिति में अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु मेरी पीठ पीछे वे केवल मेरा विरोध ही करते हैं। यह छल-कपट और धोखे का प्रदर्शन है, और इस तरह के व्यक्ति शैतान के सेवक हैं; वे परमेश्वर के परीक्षण के लिए आए शैतान के विशिष्ट रूप हैं। तुम केवल तभी एक सही व्यक्ति हो, जब तुम मेरे कार्य और मेरे वचनों के प्रति समर्पित रह सको। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकते हो; जब तक तुम जो करते हो वह परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है और अपने समस्त कार्यों में तुम न्यायसंगत और सम्मानजनक व्यवहार करते हो; जब तुम निंदनीय अथवा दूसरों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य नहीं करते; और जब तुम प्रकाश में रहते हो और शैतान को अपना शोषण नहीं करने देते, तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 410

परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए तुम्हारे इरादों और विचारों का सही होना आवश्यक है; तुम्हें परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित समस्त वातावरण, वह व्यक्ति जिसके लिए परमेश्वर गवाही देता है, और व्यावहारिक परमेश्वर की सही समझ और उनके प्रति व्यवहार का सही तरीका होना आवश्यक है। तुम्हें अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं करना चाहिए, और न ही अपनी क्षुद्र योजनाएँ बनानी चाहिए। तुम जो कुछ भी करो, तुम्हें सत्य को खोजने, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में परमेश्वर के सब कार्यों के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने का अनुसरण करना और जीवन के सही मार्ग में प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर की उपस्थिति में रहना आवश्यक है। हठी मत बनो, शैतान का अनुसरण मत करो, शैतान को अपना काम करने का कोई अवसर मत दो, और शैतान को अपना इस्तेमाल मत करने दो। तुम्हें स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और परमेश्वर को अपने ऊपर शासन करने देना चाहिए।

क्या तुम शैतान के सेवक बनना चाहते हो? क्या तुम शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण इसलिए करते हो ताकि तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सको, या इसलिए कि तुम उसके कार्य की विषमता बन सको? तुम एक अर्थपूर्ण जीवन जीना पसंद करोगे, जिसमें तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सको, या एक निरर्थक और खाली जीवन? तुम परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना पसंद करोगे, या शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना? तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य से भरे जाना पसंद करोगे, या फिर पाप या शैतान से भरे जाना? इन बातों पर ध्यान से विचार करो। अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य की प्रकृति और सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं को सही रूप में त्याग पाओगे, और इरादे के साथ समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों के तथ्य का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई स्थितियों को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई चालों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करके तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सकते हो, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सकते हो। जब तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अभ्यास करते हो, तो अधिकांश मामलों में सफलता देह-सुख का त्याग करने और परमेश्वर के साथ वास्तविक सहयोग करने से मिलेगी। तुम्हें यह समझना चाहिए कि "सहयोगी हृदय के बिना परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करना कठिन है; यदि देह पीड़ा का अनुभव नहीं करती, तो परमेश्वर से आशीषें प्राप्त नहीं होंगी; यदि आत्मा संघर्ष नहीं करती, तो शैतान को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।" यदि तुम इन सिद्धांतों का अभ्यास करो और इन्हें अच्छी तरह से समझ लो, तो परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे विचार सही हो जाएँगे। अपने वर्तमान अभ्यास में तुम लोगों को "भूख शांत करने के लिए रोटी खोजने" की मानसिकता को छोड़ना आवश्यक है; तुम्हें इस मानसिकता को छोड़ना भी आवश्यक है कि "सब-कुछ पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और लोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।" जो भी लोग ऐसा कहते हैं, वे सब यह सोचते हैं, "लोग वह सब कर सकते हैं जो वे करना चाहते हैं, और जब समय आएगा तो पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। लोगों को देह का प्रतिरोध या सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रेरित किया जाए।" ये मत बेतुके हैं। इन परिस्थितियों में पवित्र आत्मा कार्य करने में असमर्थ है। इस प्रकार का दृष्टिकोण पवित्र आत्मा के कार्य के लिए एक बड़ी रुकावट बन जाता है। अकसर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के सहयोग से प्राप्त किया जाता है। जो लोग सहयोग नहीं करते और कृतसंकल्प नहीं होते हैं और फिर भी अपने स्वभाव में बदलाव और पवित्र आत्मा का कार्य तथा परमेश्वर से प्रबोधन और प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं, वे सचमुच उच्छृंखल विचार रखते हैं। इसे "अपने आपको लिप्त करना और शैतान को क्षमा करना" कहा जाता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध नहीं होता। तुम्हें अपने भीतर शैतानी स्वभाव के कई खुलासे और अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़नी चाहिए और अपने द्वारा किए गए ऐसे कार्य तलाशने चाहिए, जो अब परमेश्वर की आवश्यकताओं के खिलाफ जाते हैं। क्या तुम अब शैतान को त्याग सकोगे? तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना चाहिए, और नए जीवन के साथ एक नया व्यक्ति बनना चाहिए। अपने पिछले अपराधों पर ध्यान मत दो; अनुचित रूप से पश्चातापी न बनो; दृढ़ रहकर परमेश्वर के साथ सहयोग करो, और अपने कर्तव्य पूरे करो। इस प्रकार परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 411

यदि इसे पढ़ने के बाद तुम केवल शब्दों को स्वीकार करने का दावा करते हो, और अभी भी तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता, और तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का प्रयास नहीं करते, तो यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम परमेश्वर के साथ अपने संबंध को महत्त्व नहीं देते, तुम्हारे विचार अभी तक सही नहीं हुए हैं, तुम्हारे इरादे परमेश्वर द्वारा तुम्हें प्राप्त किए जाने और उसके लिए महिमा लाने की ओर निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, बल्कि शैतान के षड्यंत्र जारी रहने और तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य पूरे करने के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। ऐसे व्यक्ति अनुचित इरादे और गलत विचार रखते हैं। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर ने क्या कहा है और कैसे कहा है, ऐसे लोग बिलकुल उदासीन रहते हैं और उनमें जरा-सा भी परिवर्तन दिखाई नहीं देता। उनके हृदय में कोई भय अनुभव नहीं होता और वे बेशर्म रहते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति आत्माविहीन मूर्ख होता है। परमेश्वर के हर कथन को पढ़ो और जैसे ही तुम उन्हें समझ जाओ, उन पर अमल करना शुरू कर दो। शायद कुछ अवसरों पर तुम्हारी देह कमज़ोर थी, या तुम विद्रोही थे, या तुमने प्रतिरोध किया; इस बात की परवाह न करो कि अतीत में तुमने किस तरह का व्यवहार किया था, यह कोई बड़ी बात नहीं है, और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकती। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी अवस्था सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी करो, उसे करते हुए बस इस बात पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, कार्य और लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो, और देखो कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर घटनाओं को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते, और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए है। सही स्थिति में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के विचारों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके, ताकि वह अपने वचन के फल तुममें प्रकट कर सके, और तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और प्रकाशित कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य के वर्तमान तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की माँगों के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 412

लोग परमेश्वर के वचनों को जितना अधिक स्वीकार करते हैं, वे उतने ही अधिक प्रबुद्ध होते हैं, परमेश्वर को जानने की उनकी भूख और प्यास उतनी ही बढ़ती है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकारने वाले ही अधिक समृद्ध और गहन अनुभव कर पाने के काबिल होते हैं, केवल उन्हीं लोगों का जीवन तिल के फूलों की तरह खिलता चला जाता है। जीवन का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को इसे ही अपना पूर्णकालिक काम समझना चाहिए; उन्हें लगना चाहिए कि "परमेश्वर के बिना मैं जी नहीं सकता; परमेश्वर के बिना मैं कुछ भी नहीं कर सकता; परमेश्वर के बिना हर चीज़ खोखली है।" उसी तरह, उनमें यह संकल्प होना चाहिए कि "पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बिना मैं कुछ भी नहीं करूँगा, और अगर परमेश्वर के वचनों को पढ़कर कोई प्रभाव नहीं होता, तो मैं कुछ भी करने से उदासीन हूँ।" स्वयं को लिप्त मत करो। जीवन-अनुभव परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन से आते हैं, और वे तुम लोगों के व्यक्तिपरक प्रयासों का क्रिस्टलीकरण हैं। तुम लोगों को अपने आपसे यह माँग करनी चाहिए : "जब जीवन-अनुभव की बात आती है, तो मैं स्वयं को छूट नहीं दे सकता।"

कभी-कभी, जब तुम असामान्य परिस्थितियों में होते हो, तो परमेश्वर की उपस्थिति को गँवा देते हो और जब प्रार्थना करते हो तो परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते। ऐसे वक्त डर लगना सामान्य बात है। तुम्हें तुरंत खोज शुरू कर देनी चाहिए। अगर तुम नहीं करोगे, तो परमेश्वर तुमसे अलग हो जाएगा और तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाओगे—इतना ही नहीं, एक-दो दिन, यहाँ तक कि एक-दो महीनों के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की उपस्थिति से वंचित रहोगे। इन हालात में, तुम बेहद सुन्न हो जाते हो और एक बार फिर से इस हद तक शैतान के बंदी बन जाते हो कि तुम हर तरह के कुकर्म करने लगते हो। तुम धन का लालच करते हो, अपने भाई-बहनों को धोखा देते हो, फिल्में और वीडियो देखते हो, जुआ खेलते हो, यहाँ तक कि बिना किसी अनुशासन के सिगरेट और शराब पीते हो। तुम्हारा दिल परमेश्वर से बहुत दूर चला जाता है, तुम गुप्त रूप से अपने रास्ते पर चल देते हो और मनमर्ज़ी से परमेश्वर के कार्य पर अपना फैसला सुना देते हो। कुछ मामलों में लोग इस हद तक गिर जाते हैं कि यौन प्रकृति के पाप करते समय न तो उन्हें कोई शर्म आती है और न ही उन्हें घबराहट महसूस होती है। पवित्र आत्मा ने इस प्रकार के व्यक्ति का त्याग कर दिया है; दरअसल, काफी समय से ऐसे व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य नदारद रहा है। ऐसे व्यक्ति को लगातार भ्रष्टता में और अधिक डूबते हुए देखा जा सकता है, क्योंकि बुराई के हाथ निरंतर फैलते जाते हैं। अंत में, वह इस मार्ग के अस्तित्व को नकार देता है और जब वो पाप करता है तो शैतान द्वारा उसे बंदी बना लिया जाता है। अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है, किंतु पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है, तो ऐसी स्थिति में होना पहले ही खतरनाक होता है। जब तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति को महसूस भी न कर सको, तब तुम मौत के कगार पर हो। अगर तुम प्रायश्चित न करो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के पास लौट चुके होगे, और तुम उन व्यक्तियों में होगे, जिन्हें मिटा दिया गया है। इसलिए, जब तुम्हें पता चलता है कि तुम ऐसी स्थिति में हो, जहाँ केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है (तुम पाप नहीं करते, तुम अपने आपको रोक लेते हो और तुम परमेश्वर के घोर प्रतिरोध में कुछ नहीं करते), लेकिन तुममें पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है (तुम प्रार्थना करते हुए प्रेरित महसूस नहीं करते, जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें स्पष्टत: न तो प्रबोधन हासिल होता है, न ही प्रकाशन, तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बारे में उदासीन होते हो, तुम्हारे जीवन में कभी कोई विकास नहीं होता और तुम लंबे समय से महान प्रकाशन से वंचित रहे हो)—ऐसे समय तुम्हें अधिक सतर्क रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को लिप्त नहीं रखना चाहिए, तुम्हें अपने चरित्र की लगाम को और अधिक ढीला नहीं छोड़ना चाहिए। पवित्र आत्मा की उपस्थिति किसी भी समय गायब हो सकती है। इसीलिए ऐसी स्थिति बहुत ही खतरनाक होती है। अगर तुम अपने को इस तरह की स्थिति में पाओ, तो यथाशीघ्र तुम्हें चीज़ों को पलटने का प्रयास करना चाहिए। पहले, तुम्हें प्रायश्चित की प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर से कहना चाहिए कि वह एक बार और तुम पर करुणा करे। अधिक गंभीरता से प्रार्थना करो, और परमेश्वर के और अधिक वचनों को खाने-पीने के लिए अपने दिल को शांत करो। इस आधार के साथ, तुम्हें प्रार्थना में और अधिक समय लगाना चाहिए; गाने, प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने प्रयासों को दुगुना कर दो। जब तुम सबसे कमज़ोर होते हो, तो उस समय शैतान तुम्हारे दिल पर बड़ी आसानी से कब्ज़ा कर लेता है। जब ऐसा होता है, तो तुम्हारा दिल परमेश्वर से लेकर शैतान को लौटा दिया जाता है, जिसके बाद तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाते हो। ऐसे समय, पवित्र आत्मा के कार्य को पुन: प्राप्त करना और भी मुश्किल होता है। बेहतर है कि जब तक पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तभी पवित्र आत्मा के कार्य की खोज कर ली जाए, जिससे परमेश्वर तुम्हें अपना प्रबोधन और अधिक प्रदान करेगा है और तुम्हारा त्याग नहीं करेगा। प्रार्थना करना, भजन गाना, सेवा-कार्य करना और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना—ये सब इसलिए किया जाता है ताकि शैतान को अपना काम करने का अवसर न मिले, और पवित्र आत्मा तुममें अपना कार्य कर सके। अगर तुम इस तरह से पवित्र आत्मा के कार्य को पुन: प्राप्त नहीं करते, अगर तुम बस प्रतीक्षा करते रहते हो, तो पवित्र आत्मा की उपस्थिति को गँवा देने के बाद पवित्र आत्मा के कार्य को पुन: प्राप्त करना आसान नहीं होगा, जब तक कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें विशेष रूप से प्रेरित न किया हो, या खास तौर से तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित न किया हो। तब भी, तुम्हारी स्थिति महज़ एक-दो दिनों में बहाल नहीं हो जाती; कभी-कभी तो बिना बहाली के छ्ह-छह महीने निकल जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोग अपने साथ काफी नरमी बरतते हैं, सामान्य तरीके से चीज़ों का अनुभव लेने में सक्षम नहीं होते और इस तरह उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाता है। अगर तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पुन: प्राप्त कर भी लो, तो भी परमेश्वर का वर्तमान कार्य शायद तुम्हें ज्यादा स्पष्ट न हो, क्योंकि तुम अपने जीवन-अनुभव में बहुत पीछे छूट चुके हो, मानो तुम दस हज़ार मील पीछे रह गए हो। क्या यह भयानक बात नहीं है? लेकिन मैं ऐसे लोगों से कहता हूँ कि प्रायश्चित करने में अभी भी देर नहीं हुई है, लेकिन एक शर्त है : तुम्हें अधिक मेहनत करनी होगी और आलस्य से बचना होगा। अगर दूसरे लोग दिन में पाँच बार प्रार्थना करते हैं, तो तुम्हें दस बार प्रार्थना करनी होगी; अगर अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को दिन में दो घंटे खाते और पीते हैं, तो तुम्हें ऐसा चार या छह घंटे करना होगा; और अगर अन्य लोग दो घंटे भजन सुनते हैं, तो तुम्हें कम से कम आधा दिन भजन सुनने होंगे। जब तक कि तुम प्रेरित न हो जाओ और तुम्हारा दिल परमेश्वर के पास लौट न आए, तब तक तुम परमेश्वर के सामने शांत रहो और परमेश्वर के प्रेम का विचार करो और परमेश्वर से दूर रहने का साहस न करो—तभी तुम्हारा अभ्यास फलीभूत होगा; तभी तुम अपनी पिछली, सामान्य स्थिति को बहाल कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 413

तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी होने के मार्ग पर बहुत ही कम चले हो, और तुम लोगों का सही मार्ग पर प्रवेश करना अभी बाकी है, अतः तुम लोग परमेश्वर के मानक को प्राप्त करने से अभी भी दूर हो। इस समय, तुम लोगों का आध्यात्मिक कद उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। तुम लोगों की योग्यता और भ्रष्ट प्रकृति के कारण, तुम लोग हमेशा परमेश्वर के कार्य के साथ लापरवाही से पेश आते हो और इसे गंभीरता से नहीं लेते। यह तुम लोगों की सबसे बड़ी खामी है। तुम लोगों में से निश्चय ही ऐसा कोई भी नहीं है जो वह मार्ग सुनिश्चित कर सके जिस पर पवित्र आत्मा चलता है; तुममें से अधिकांश इसे नहीं समझते और इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। इतना ही नहीं, तुम लोगों में से अधिकांश इस विषय पर कोई ध्यान भी नहीं देते, इसे गंभीरता से लेने की बात तो दूर रही। यदि तुम लोग इसी तरह से व्यवहार करते रहोगे और पवित्र आत्मा के कार्य से अनजान रह कर जीते रहोगे, तो परमेश्वर के विश्वासी के रूप में जो मार्ग तुम लोग चुनते हो वह निरर्थक होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के प्रयास में जितना हो सके वो सब कुछ नहीं करते हो, और इसलिए भी क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के साथ अच्छी तरह से सहयोग नहीं करते। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने तुम पर कार्य नहीं किया है, या कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें प्रेरित नहीं किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम इतने लापरवाह हो कि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते। अब तुम्हें इसी समय चीजों को बदलना होगा और पवित्र आत्मा जिस मार्ग पर लोगों की अगुआई करता है उस मार्ग पर चलना होगा। आज का मुख्य विषय यही है। "पवित्र आत्मा की अगुआई वाला मार्ग"—इसका अर्थ है आत्मा में प्रबुद्धता को प्राप्त करना, परमेश्वर के वचनों का ज्ञान प्राप्त करना, आगे के मार्ग के विषय में स्पष्टता प्राप्त करना कदम-दर-कदम सत्य में प्रवेश करना और परमेश्वर का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना। पवित्र आत्मा की अगुआई वाला मार्ग मुख्यतः वो मार्ग है जो परमेश्वर के वचनों की स्पष्ट समझ देता हो, जो भटकाव और गलत धारणाओं से मुक्त हो, और जो लोग उस मार्ग पर चलते हैं वे सीधे चलते जाते हैं। इसे प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को परमेश्वर के साथ तालमेल बनाकर कार्य करने, अभ्यास का सही मार्ग को ढूँढने और पवित्र आत्मा की अगुवाई वाले मार्ग पर चलने की आवश्यकता होगी। इसमें मनुष्य की ओर से सहयोग शामिल है, अर्थात् : परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुम्हें क्या करना है और परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करने के लिए तुम लोगों को कैसा आचरण करना है।

पवित्र आत्मा की अगुवाई वाले मार्ग पर चलना काफी जटिल प्रतीत हो सकता है, परंतु इस मार्ग के बारे में बिलकुल स्पष्ट होने पर तुम पाओगे कि यह प्रक्रिया बहुत सरल है। तथ्य यह है कि लोग वह सब कुछ करने में सक्षम हैं जिनकी अपेक्षा परमेश्वर उनसे करता है—यह ऐसा नहीं है कि वह सूअर को उड़ना सिखाने की कोशिश कर रहा है। सभी परिस्थितियों में, परमेश्वर लोगों की समस्याओं का निदान करने और उनकी चिंताओं को दूर करने का प्रयास करता है। तुम सबको यह समझना आवश्यक है; परमेश्वर को गलत न समझो। पवित्र आत्मा जिस मार्ग पर चलता है उस पर परमेश्वर के वचन के अनुसार लोगों की अगुआई होती है। जैसा कि पहले बताया गया है, तुम लोगों को अपना हृदय परमेश्वर को देना आवश्यक है। यह पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के लिए पहली आवश्यकता है। सही मार्ग पर प्रवेश करने के लिए तुम्हें यह करना ही होगा। किस प्रकार कोई इंसान समझ-बूझकर अपना हृदय परमेश्वर को देता है? अपने दैनिक जीवन में, जब तुम लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और उससे प्रार्थना करते हो, तो तुम लोग इसे बड़ी लापरवाही से करते हो—तुम लोग काम करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। क्या इसे परमेश्वर को अपना हृदय देना कहा जा सकता है? तुम लोग परिवार के मामलों के बारे में या देह-सुख की सोच में डूबे रहते हो; तुम लोग हमेशा दुविधा में रहते हो। क्या इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करना समझा जा सकता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा हृदय हमेशा बाहरी विषयों से ग्रस्त रहता है, और यह परमेश्वर की ओर लौट नहीं पाता है। यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, "वे सब लोग जो मेरे साथ सांमजस्य में होकर कार्य करते हैं, मैं उन्हें दुगुना प्रतिफल दूंगा।" तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, तुम शायद इस कोशिश में ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त न कर पाओ, परंतु तुम्हें अपने आपको नकारात्मकता में पीछे हटने या लड़खड़ाने नहीं देना है—तुम्हें कठिन परिश्रम करते रहना है! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा इस बोझ को उठाएगा। उसके बाद, तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के द्वारा अपने अंतरतम के सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट करो, उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी न छुपाओ, थोडा-सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने व्यक्त करो; अगर कोई बात तुम्हारे मन में है तो वह बोलने से बिलकुल न हिचको। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर उतना ही अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुम इस प्रकार का आध्यात्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से ओझल न होने दो, बल्कि इसे अपने जीवन की बड़ी महत्ता की वस्तु मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो कि तुम्हारा हृदय हमेशा से परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 414

परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का होना आवश्यक है, जो कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और वास्तविकता में प्रवेश करने का आधार है। क्या तुम सबकी प्रार्थनाओं परमेश्वर के समीप आने, भजन-गायन, स्तुति, ध्यान और परमेश्वर के वचनों पर मनन-चिंतन का समस्त अभ्यास "सामान्य आध्यात्मिक जीवन" के बराबर है? ऐसा नहीं लगता कि तुम लोगों में से कोई भी इसका उत्तर जानता है। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक नया और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, सभी सिर्फ नियम-पालन हैं, जो प्रचलन में है उसके साथ बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के नियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन नियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये नियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यवहारिक काम पूरा करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग नियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर नियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर के सामने जिया जाने वाला जीवन है। प्रार्थना करते समय, एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से वह पवित्र आत्मा के प्रबोधन की तलाश कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से लोग उसके मौजूदा कार्य के बारे में अधिक स्पष्ट और अधिक गहन समझ प्राप्त कर सकते हैं। वे अभ्यास का एक नया मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं, और वे पुराने मार्ग से चिपके नहीं रहेंगे; जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह सब जीवन में विकास हासिल करने के लिए होगा। जहाँ तक प्रार्थना की बात है, वह कुछ अच्छे लगने वाले शब्द बोलना या यह बताने के लिए तुम परमेश्वर के कितने ऋणी हो, उसके सामने फूट-फूटकर रोना नहीं है; बल्कि इसके बजाय इसका उद्देश्य, आत्मा के उपयोग में अपने आपको प्रशिक्षित करना है, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत होने देना है, सभी मामलों में परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना है, ताकि व्यक्ति का हृदय प्रतिदिन नई रोशनी की ओर आकर्षित हो सके, और वह निष्क्रिय या आलसी न हो और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने के सही मार्ग पर कदम रखे। आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन वे यह सब सत्य का अनुसरण करने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं। यहीं पर वे भटक जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी प्राप्त करने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए अपनी पुरानी धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो प्राप्त करते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे आज का प्रकाश प्राप्त कर ही नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दागदार हैं; नए खोल में लिपटे वही पुराने अभ्यास हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुवाआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें, और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं, अगर तुम अभी भी ईर्ष्यालु हो और बाहरी मामलों में ही उलझे हुए हो, अभी भी तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के वास्ते उसके सामने लाने के लिए एक शांत हृदय नहीं है तो तुम कुछ भी नहीं प्राप्त करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और किसी नई समझ को पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नया प्रकाश प्राप्त करते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 415

सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए एक व्यक्ति को प्रतिदिन नई रोशनी प्राप्त करने और परमेश्वर के वचनों की समझ का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। एक व्यक्ति को सत्य स्पष्ट रूप से देखना चाहिए, सभी मामलों में अभ्यास का मार्ग तलाशना चाहिए, प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से नए प्रश्नों की खोज करनी चाहिए, और अपनी कमियों का एहसास करना चाहिए, ताकि उसके पास लालसा और प्रयास करने वाला हृदय हो सके जो उसके पूरे अस्तित्व को प्रेरित करे, वह हर समय परमेश्वर के सामने शांत रह सके और पीछे छूट जाने से बहुत भयभीत हो। इस तरह के लालायित और खोजी हृदय वाला व्यक्ति, जो लगातार प्रवेश पाने का इच्छुक है, वह आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग पर है। जो लोग पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं, जो बेहतर करने की इच्छा रखते हैं, जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए प्रयास करने को तैयार हैं, जो परमेश्वर के वचनों की गहरी समझ के लिए लालायित हैं, जो अलौकिक का अनुसरण नहीं करते, बल्कि वास्तविक कीमत का भुगतान करते हैं, वास्तव में परमेश्वर की इच्छा की परवाह करते हैं, वास्तव में प्रवेश प्राप्त करते हैं ताकि उनके अनुभव अधिक विशुद्ध और वास्तविक हों, जो खोखले वचनों और सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करते या अलौकिकता को महसूस करने का प्रयास नही करते हैं, जो किसी महान व्यक्तित्व की आराधना नहीं करते हैं—ये वे लोग हैं जिन्होंने एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर लिया है। वे जो कुछ भी करते हैं, उसका उद्देश्य जीवन में और अधिक विकास प्राप्त करना और स्वयं को आत्मा में ताज़ा और जीवंत बनाना है और वे हमेशा सक्रिय रूप से प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। बिना एहसास किए ही वे सत्य को समझने लगते हैं और वास्तविकता में प्रवेश करते हैं। सामान्य आध्यात्मिक जीवन वाले लोग प्रतिदिन आत्मा की मुक्ति और स्वतंत्रता पाते हैं और वे परमेश्वर की संतुष्टि के अनुसार उसके वचनों का स्वतंत्र रूप से अभ्यास कर सकते हैं। इन लोगों के लिए, प्रार्थना कोई औपचारिकता या प्रक्रिया नहीं है; वे प्रतिदिन नई रोशनी के साथ तालमेल रखने में सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए, लोग परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करते हैं और उनका हृदय परमेश्वर के सामने वास्तव में शांत हो सकता है और उन्हें कोई परेशान नहीं कर सकता है। कोई भी व्यक्ति, घटना या वस्तु उनके सामान्य आध्यात्मिक जीवन को बाधित नहीं कर सकती है। इस तरह के प्रशिक्षण का उद्देश्य परिणाम प्राप्त करना है; इसका उद्देश्य लोगों से नियमों का पालन करवाना नहीं है। यह अभ्यास नियम-पालन के बारे में नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन में विकास को बढ़ाने के बारे में है। यदि तुम इस अभ्यास को केवल नियमों के पालन के रूप में देखते हो, तो तुम्हारा जीवन कभी नहीं बदलेगा। हो सकता है कि तुम उसी अभ्यास में लगे हुए हो जिसमें दूसरे लगे हुए हैं, लेकिन ऐसा करते हुए तुम तो पवित्र आत्मा की धारा से निकाल दिये जाते हो जबकि अन्य लोग अंततः पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल रखने में सक्षम हो जाते हैं। क्या तुम खुद को धोखा नहीं दे रहे हो? इन वचनों का उद्देश्य लोगों को परमेश्वर के आगे उनके हृदयों को शांत करने देना है, उनके हृदयों को परमेश्वर की ओर मोड़ने देना है, ताकि उनमें परमेश्वर का काम बिना बाधा के हो और फलीभूत हो सके। केवल तभी लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 416

तुम लोग अपने दैनिक जीवन में प्रार्थना को कोई महत्व नहीं देते। मनुष्य प्रार्थना की उपेक्षा करता है। मनुष्य बेमन से परमेश्वर के सामने लापरवाही से प्रार्थना किया करता था। किसी भी व्यक्ति ने कभी भी पूरे हृदय से व समर्पण भाव से परमेश्वर के सामने स्वयं को प्रस्तुत नहीं किया और परमेश्वर की सच्चे मन से प्रार्थना नहीं की। मुसीबत आने पर ही मनुष्य ने परमेश्वर से प्रार्थना की। इस पूरे समय में, क्या तुमने कभी परमेश्वर से सच में प्रार्थना की है? क्या कभी ऐसा समय आया है, जब तुम परमेश्वर के सामने इसलिए रोए, क्योंकि तुम दुखी थे? क्या कोई ऐसा समय आया है, जब तुमने उसके सामने खुद को जाना हो? क्या तुमने कभी परमेश्वर से दिल से प्रार्थना की है? प्रार्थना अभ्यास के माध्यम से आती है : यदि तुम आमतौर पर घर पर प्रार्थना नहीं करते, तो तुम कलीसिया में तुम प्रार्थना कर पाओ, यह संभव ही नहीं है, और यदि तुम छोटी सभाओं में भी जाकर सामान्यतः प्रार्थना नहीं करते, तो तुम बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में असमर्थ होगे। यदि तुम नियमित रूप से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर चिंतन नहीं करते, तो प्रार्थना के समय तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं होगा, और अगर तुम प्रार्थना करते भी हो, तो तुम्हारे केवल होंठ बुदबुदाएंगे; वह सच्ची प्रार्थना नहीं होगी।

सच्ची प्रार्थना क्या है? प्रार्थना परमेश्वर को यह बताना है कि तुम्हारे हृदय में क्या है, परमेश्वर की इच्छा को समझकर उससे बात करना है, परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके साथ संवाद करना है, स्वयं को विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना है, यह महसूस करना है कि वह तुम्हारे सामने है, और यह विश्वास करना है कि तुम्हें उससे कुछ कहना है। तुम्हें लगेगा कि तुम्हारा हृदय प्रकाश से भर गया है और तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर कितना प्यारा है। तुम विशेष रूप से प्रेरित महसूस करते हो, और तुम्हारी बातें सुनकर तुम्हारे भाइयों और बहनों को संतुष्टि मिलती है। उन्हें लगेगा कि जो शब्द तुम बोल रहे हो, वे उनके मन की बात है, उन्हें लगेगा कि जो वे कहना चाहते हैं, उसी बात को तुम अपने शब्दों के माध्यम से कह रहे हो। यही सच्ची प्रार्थना है। एक बार जब तुम सच्चे मन से प्रार्थना करने लगोगे, तुम्हारा दिल शांत हो जाएगा और संतुष्टि का एहसास होगा। परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति बढ़ सकती है, और तुम महसूस करोगे कि जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक मूल्यवान या अर्थपूर्ण और कुछ नहीं है। इससे साबित होता है कि तुम्हारी प्रार्थना प्रभावी रही है। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?

और प्रार्थना की विषयवस्तु के बारे में क्या खयाल है? तुम्हारी प्रार्थना तुम्हारे हृदय की सच्ची अवस्था और पवित्र आत्मा के कार्य के अनुरूप धीरे-धीरे बढ़नी चाहिए; तुम परमेश्वर से उसकी इच्छा और मनुष्य से क्या अपेक्षा रखता है, इसके अनुसार उसके साथ संवाद करते हो। जब तुम प्रार्थना का अभ्यास शुरू करो, तो सबसे पहले अपना हृदय परमेश्वर को दे दो। परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास न करो—केवल अपने हृदय में ही परमेश्वर से बात करने की कोशिश करो। जब तुम परमेश्वर के समक्ष आते हो, तो इस तरह बोलो : "हे परमेश्वर, आज ही मुझे एहसास हुआ कि मैं तुम्हारी अवज्ञा करता था। मैं वास्तव में भ्रष्ट और नीच हूँ। मैं केवल अपना जीवन बर्बाद करता रहा हूँ। आज से मैं तुम्हारे लिए जीऊँगा। मैं एक अर्थपूर्ण जीवन जीऊँगा और तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। तुम्हारा आत्मा मुझे लगातार रोशन और प्रबुद्ध करता हुआ हमेशा मेरे अंदर काम करे। मुझे अपने सामने मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देने दो। शैतान को हमारे भीतर प्रकाशित तुम्हारी महिमा, तुम्हारी गवाही और तुम्हारी विजय का प्रमाण देखने दो।" जब तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। इस तरह से प्रार्थना करने के बाद तुम्हारा हृदय परमेश्वर के ज्यादा करीब हो जाएगा, और यदि तुम अकसर इस तरह से प्रार्थना कर सको, तो पवित्र आत्मा तुममें अनिवार्य रूप से काम करेगा। यदि तुम हमेशा इस तरह से परमेश्वर को पुकारोगे, और उसके सामने अपना संकल्प करोगे, तो एक दिन आएगा परमेश्वर के सामने जब तुम्हारा संकल्प स्वीकृत हो जाएगा, जब तुम्हारा हृदय और तुम्हारा पूरा अस्तित्व परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिया जायेगा, और तुम अंततः उसके द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे। तुम लोगों के लिए प्रार्थना का अत्यधिक महत्व है। जब तुम प्रार्थना करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर द्वारा प्रेरित होगा, और तुम्हें तब परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत मिलेगी। यदि तुम हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम पूरे खुले हृदय से परमेश्वर से संवाद नहीं करते, तो परमेश्वर के पास तुममें कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि प्रार्थना करने और अपने हृदय की बात कहने के बाद, परमेश्वर के आत्मा ने अपना काम शुरू नहीं किया है, और तुम्हें कोई प्रेरणा नहीं मिली है, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे हृदय में ईमानदारी की कमी है, तुम्हारे शब्द असत्य और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करने के बाद तुम्हें संतुष्टि का एहसास हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और परमेश्वर का आत्मा तुममें काम कर रहा है। परमेश्वर के सामने सेवा करने वाले के तौर पर तुम प्रार्थना से रहित नहीं हो सकते। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद को ऐसी चीज़ के रूप में देखते हो, जो सार्थक और मूल्यवान है, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? कोई भी परमेश्वर के साथ संवाद किए बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में जीते हो, शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना तुम अँधेरे के प्रभाव में रहते हो। मुझे आशा है कि तुम सब भाई-बहन हर दिन सच्ची प्रार्थना करने में सक्षम हो। यह नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने के बारे में है। क्या तुम सुबह की प्रार्थनाएँ करने और परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के लिए, अपनी थोड़ी-सी नींद का त्याग करने को तैयार हो? यदि तुम शुद्ध हृदय से प्रार्थना करते हो और इस तरह परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम उसे अधिक स्वीकार्य होगे। यदि हर सुबह तुम ऐसा करते हो, यदि हर दिन तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने का अभ्यास करते हो, उससे संवाद और उससे जुडने की कोशिश करते हो, तो निश्चित रूप से परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान बढ़ेगा, और तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में अधिक सक्षम हो पाओगे। तुम कहते हो : "हे परमेश्वर! मैं अपना कर्तव्य पूरा करने को तैयार हूँ। केवल तुम्हें ही मैं अपने पूरा अस्तित्व समर्पित करता हूँ, ताकि तुम हममें महिमामंडित हो सको, ताकि तुम हमारे इस समूह द्वारादी गई गवाही का आनंद ले सको। मैं तुमसे हममें कार्य करने की विनती करता हूँ, ताकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करने और तुम्हें संतुष्ट करने और तुम्हारा अपने लक्ष्य के रूप में अनुसरण करने में सक्षम हो सकूँ।" जैसे ही तुम यह दायित्व उठाते हो, परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा। तुम्हें केवल अपने फायदे के लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और उससे प्यार करने के लिए भी तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। यह सबसे सच्ची तरह की प्रार्थना है। क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करने के लिए प्रार्थना करता है?

अतीत में, तुम्हें नहीं पता था कि प्रार्थना कैसे करनी चाहिए, और तुमने प्रार्थना के मामले की उपेक्षा की। अब तुम्हें प्रार्थना करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए अपने भीतर की ताकत का आह्वान करने में असमर्थ हो, तो तुम प्रार्थना कैसे करते हो? तुम कहते हो: "हे परमेश्वर, मेरा हृदय तुमसे सच्चा प्रेम करने में असमर्थ है। मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास ताकत की कमी है। मैं क्या करूँ? तुम मेरी आध्यात्मिक आँखें खोल दो, तुम्हारा आत्मा मेरे हृदय को प्रेरित करे। इसे ऐसा बना दो कि जब मैं तुम्हारे सामने आऊँ, तो वह सबकुछ फेंक दूँ, जो नकारात्मक है, किसी भी व्यक्ति, विषय या चीज़ से विवश होना छोड़ दूँ, और अपना हृदय तुम्हारे सामने पूरी तरह से खोलकर रख दूँ, और ऐसा कर दो कि मैं अपना संपूर्ण अस्तित्व तुम्हारे सामने अर्पण कर सकूँ। तुम जैसे भी मेरी परीक्षा लो, मैं तैयार हूँ। अब मैं अपनी भविष्य की संभावनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता, और न ही मैं मृत्यु के जुए से बँधा हूँ। ऐसे हृदय के साथ जो तुमसे प्रेम करता है, मैं जीवन के मार्ग की तलाश करना चाहता हूँ। हर बात, हर चीज़—सब तुम्हारे हाथों में है; मेरा भाग्य तुम्हारे हाथों में है और तुमने मेरा पूरा जीवन अपने हाथों में थामा हुआ है। अब मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ, और चाहे तुम मुझे अपने से प्रेम करने दो या न करने दो, चाहे शैतान कितना भी हस्तक्षेप करे, मैं तुमसे प्रेम करने के लिए कृतसंकल्प हूँ।" जब तुम्हारे सामने इस तरह की समस्या आए, तो इस तरह से प्रार्थना करना। यदि तुम हर दिन इस तरह प्रार्थना करोगे, तो धीरे-धीरे परमेश्वर से प्रेम करने की तुम्हारी ताकत बढ़ती जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 417

सच्ची प्रार्थना में कोई कैसे प्रवेश करता है?

प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए, जो परमेश्वर के सामने शांत रहे, और तुम्हारे पास एक ईमानदार हृदय होना चाहिए। तुम सही अर्थों में परमेश्वर के साथ संवाद और प्रार्थना कर रहे हो—तुम्हें प्रीतिकर वचनों से परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्रार्थना उस पर केंद्रित होनी चाहिए, जिसे परमेश्वर अभी संपन्न करना चाहता हो। प्रार्थना करते समय परमेश्वर से तुम्हें अधिक प्रबुद्ध बनाने और रोशन करने के लिए कहो और अपनी वास्तविक अवस्थाओं और अपनी परेशानियाँ उसके सामने रखो, और साथ ही वह संकल्प भी, जो तुमने परमेश्वर के सामने लिया था। प्रार्थना का अर्थ प्रक्रिया का पालन करना नहीं है; उसका अर्थ है सच्चे हृदय से परमेश्वर को खोजना। मांगो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय की रक्षा करे, ताकि तुम्हारा हृदय अकसर उसके सामने शांत हो सके; कि जिस परिवेश में उसने तुम्हें रखा है, उसमें तुम खुद को जान पाओ, खुद से घृणा करो, और खुद को त्याग सको, और इस प्रकार तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य रिश्ता बना पाओ और वास्तव में ऐसे व्यक्ति बन पाओ, जो परमेश्वर से प्रेम करता है।

प्रार्थना का क्या महत्व है?

प्रार्थना उन तरीकों में से एक है, जिनमें मनुष्य परमेश्वर से सहयोग करता है, यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो लोग प्रार्थना नहीं करते, वे मृत लोग हैं जो आत्मा से रहित हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास परमेश्वर द्वारा प्रेरित किए जाने की योग्यता की कमी है। प्रार्थना के बिना सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना असंभव होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बने रहने की बात तो छोड़ ही दो। प्रार्थना से रहित होना परमेश्वर के साथ अपना संबंध तोड़ना है, और उसके बिना परमेश्वर की प्रशंसा पाना असंभव होगा। परमेश्वर के विश्वासी के तौर पर, व्यक्ति जितना अधिक प्रार्थना करता है, अर्थात् व्यक्ति परमेश्वर द्वारा जितना अधिक प्रेरित किया जाता है, उतना ही अधिक वह संकल्प से भर जाएगा और परमेश्वर से नई प्रबुद्धता प्राप्त करने में अधिक सक्षम होगा। नतीजतन, इस तरह के व्यक्ति को पवित्र आत्मा द्वारा बहुत जल्दी पूर्ण बनाया जा सकता है।

प्रार्थना का उद्देश्य क्या प्रभाव हासिल करना है?

लोग प्रार्थना का अभ्यास करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन प्रार्थना का प्रभावी होना कोई सरल बात नहीं है। प्रार्थना केवल यन्त्रवत् ढंग से करना, प्रक्रिया का पालन करना, या परमेश्वर के वचनों का पाठ करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और यह दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस स्थिति तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि वह परमेश्वर द्वारा प्रेरित हो सके। यदि प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर चाहता है, और यही नहीं, जो वह माँगता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और फिर इस आधार पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद यदि संकल्प, विश्वास, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग हो, केवल तभी उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी प्रार्थना को परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित किया जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में, संवाद करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय को परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद के चरण में प्रवेश कर चुकी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 418

प्रार्थना के बारे में सबसे बुनियादी ज्ञान:

1. जो भी मन में आए, उसे बिना सोचे-समझे न कहो। तुम्हारे हृदय पर एक दायित्व होना चाहिए, यानी प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास एक उद्देश्य होना चाहिए।

2. प्रार्थना में परमेश्वर के वचन शामिल होने चाहिए; उसे परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए।

3. प्रार्थना करते समय तुम्हें पुरानी या बीती बातों को उसमें नहीं मिलाना चाहिए। तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वर्तमान वचनों से संबंधित होनी चाहिए, और जब तुम प्रार्थना करो, तो परमेश्वर को अपने अंतरतम विचार बताओ।

4. समूह-प्रार्थना एक केंद्र के इर्दगिर्द घूमनी चाहिए, जो आवश्यक रूप से, पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य है।

5. सभी लोगों को मध्यस्थतापरक प्रार्थना सीखनी है। यह परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाने का एक तरीका भी है।

व्यक्ति का प्रार्थना का जीवन, प्रार्थना के महत्व की समझ और प्रार्थना के मूलभूत ज्ञान पर आधारित है। दैनिक जीवन में, बार-बार अपनी कमियों के लिए प्रार्थना करो, जीवन में अपने स्वभाव में बदलाव लाने के लिए प्रार्थना करो, और परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान के आधार पर प्रार्थना करो। प्रत्येक व्यक्ति को प्रार्थना का अपना जीवन स्थापित करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों को जानने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्वर के सामने अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियाँ खोलकर रख दो और तुम जिस ढंग से प्रार्थना करते हो, उसकी चिंता किए बिना अपने वास्तविक स्वरूप में रहो, और सच्ची समझ और परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त करना ही मुख्य बात है। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को कई अलग-अलग तरीकों से प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए। मौन प्रार्थना, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना, परमेश्वर के कार्य को जानना—ये सभी सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक संगति के उद्देश्यपूर्ण कार्य के उदाहरण हैं, जो हमेशा परमेश्वर के सामने व्यक्ति की अवस्थाओं में सुधार करते हैं और व्यक्ति को जीवन में और अधिक प्रगति करने के लिए प्रेरित करते हैं। संक्षेप में, तुम जो कुछ भी करते हो, चाहे वह परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना हो, या चुपचाप प्रार्थना करना हो, या जोर-जोर से घोषणा करना हो, वह तुम्हें परमेश्वर के वचनों, उसके कार्य और जो कुछ वह तुममें हासिल करना चाहता है, उसे स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाने के लिए है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, वह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों तक पहुँचने और अपने जीवन को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए किया जाता है। परमेश्वर की मनुष्य से न्यूनतम अपेक्षा यह है कि मनुष्य अपना हृदय उसके प्रति खोल सके। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है और उसे अपने हृदय की सच्ची बात बताता है, तो परमेश्वर उसमें कार्य करने को तैयार होता है। परमेश्वर मनुष्य के कलुषित हृदय की नहीं, बल्कि शुद्ध और ईमानदार हृदय की चाह रखता है। यदि मनुष्य परमेश्वर से अपने हृदय को खोलकर बात नहीं करता है, तो परमेश्वर उसके हृदय को प्रेरित नहीं करेगा या उसमें कार्य नहीं करेगा। इसलिए, प्रार्थना का मर्म है, अपने हृदय से परमेश्वर से बात करना, अपने आपको उसके सामने पूरी तरह से खोलकर, उसे अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना; केवल तभी परमेश्वर को तुम्हारी प्रार्थनाओं में रुचि होगी, अन्यथा वह तुमसे मुँह मोड़ लेगा। प्रार्थना का न्यूनतम मानदंड यह है कि तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत रखने में सक्षम होना चाहिए, और उसे परमेश्वर से अलग नहीं हटना चाहिए। यह हो सकता है कि इस चरण के दौरान तुम्हें एक नई या उच्च अंतर्दृष्टि प्राप्त न हो, लेकिन फिर तुम्हें यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रार्थना का उपयोग करना चाहिए—तुम्हें पीछे नहीं हटना चाहिए। कम से कम इसे तो तुम्हें प्राप्त करना ही चाहिए। यदि तुम यह भी नहीं कर सकते, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सही रास्ते पर नहीं है। परिणामस्वरूप, तुम्हारे पास पहले जो दृष्टि थी, उसे बनाए रखने में तुम असमर्थ होगे, तुम परमेश्वर में विश्वास खो दोगे, और तुम्हारा संकल्प इसके बाद नष्ट हो जाएगा। तुमने आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है या नहीं, इसका एक चिह्न यह देखना है कि क्या तुम्हारी प्रार्थना सही रास्ते पर है। सभी लोगों को इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए; उन सभी को प्रार्थना में स्वयं को लगातार सजगता से प्रशिक्षित करने का काम करना चाहिए, निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करने के बजाय, सचेत रूप से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। तभी वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश करने वाले लोग होंगे।

जब तुम प्रार्थना करना शुरू करो, तो अत्यधिक महत्वाकाँक्षी बनने की कोशिश मत करो और एक ही झटके में सबकुछ हासिल करने की उम्मीद मत करो। तुम इस बात की उम्मीद रखते हुए अतिशय माँगें नहीं कर सकते कि जैसे ही तुम माँगोगे, तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित कर दिया जाएगा, या कि तुम्हें प्रबुद्धता और रोशनी मिल जाएगी, या कि परमेश्वर तुम पर अनुग्रह बरसा देगा। ऐसा नहीं होगा; परमेश्वर अलौकिक चीजें नहीं करता। परमेश्वर अपने अनुसार लोगों की प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है, और कभी-कभी वह यह देखने के लिए कि तुम उसके प्रति वफ़ादार हो या नहीं, तुम्हारे विश्वास को परखता है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुममें विश्वास, दृढ़ता और संकल्प होना चाहिए। अधिकांश लोग प्रशिक्षित होना शुरू करते ही हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होने में विफल रहते हैं। इससे काम नहीं चलेगा! तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए; तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का एहसास करने और तलाश और खोज करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कभी-कभी तुम्हारे अभ्यास का मार्ग सही नहीं होता, और कभी-कभी तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य और धारणाएँ परमेश्वर के सामने टिक नहीं पातीं, और इसलिए परमेश्वर का आत्मा तुम्हें प्रेरित करने में विफल रहता है। अन्य समय में, परमेश्वर यह देखता है कि तुम वफ़ादार हो या नहीं। संक्षेप में, प्रशिक्षण में तुम्हें ऊँची कीमत चुकानी चाहिए। यदि तुम्हें पता चलता है कि तुम अपने अभ्यास के मार्ग से हट रहे हो, तो तुम अपना प्रार्थना करने का तरीका बदल सकते हो। जब तक तुम सच्चे हृदय से खोज करते हो और प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हो, पवित्र आत्मा तुम्हें निश्चित रूप से इस वास्तविकता में ले जाएगा। कभी-कभी तुम सच्चे हृदय से प्रार्थना करते हो, लेकिन ऐसा महसूस नहीं करते कि तुम विशेष रूप से प्रेरित किए गए हो। ऐसे समय में तुम्हें आस्था पर भरोसा रखना चाहिए, इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं को देख रहा है; तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में दृढ़ रहना चाहिए।

ईमानदार व्यक्ति बनो; अपने हृदय में व्याप्त धोखे से छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो। हर समय प्रार्थना के माध्यम से अपने आपको शुद्ध करो, प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाओ, और तुम्हारा स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। सच्चा आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना का जीवन है—यह एक ऐसा जीवन है, जिसे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने की प्रक्रिया मनुष्य के स्वभाव को बदलने की प्रक्रिया है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित न किया जाने वाला जीवन आध्यात्मिक जीवन नहीं, बल्कि केवल धार्मिक अनुष्ठान का जीवन है। केवल उन्हीं लोगों ने, जो पवित्र आत्मा द्वारा अकसर प्रेरित किए जाते हैं, और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाते हैं, आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है। मनुष्य जब प्रार्थना करता है, तो उसका स्वभाव लगातार बदलता जाता है। परमेश्वर का आत्मा जितना अधिक उसे प्रेरित करता है, वह उतना ही अग्रसक्रिय और आज्ञाकारी बन जाता है। इसलिए, उसका हृदय भी धीरे-धीरे शुद्ध होगा, और उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। ऐसा है सच्ची प्रार्थना का प्रभाव।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 419

परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने से अधिक महत्वपूर्ण कदम कोई नहीं है। यह वह सबक है, जिसमें वर्तमान में सभी लोगों को प्रवेश करने की तत्काल आवश्यकता है। परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने में प्रवेश करने के निम्नलिखित मार्ग हैं :

1. अपने हृदय को बाहरी मामलों से हटा लो, परमेश्वर के समक्ष शांत रहो और अपना एकचित्त ध्यान परमेश्वर से प्रार्थना करने में लगाओ।

2. परमेश्वर के समक्ष शांत हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओ, पीओ और उनका आनंद लो।

3. अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान लगाओ और उस पर चिंतन करो और परमेश्वर के कार्य पर मनन करो।

सर्वप्रथम प्रार्थना के पहलू से आरंभ करो। एकचित्त होकर तथा नियत समय पर प्रार्थना करो। तुम्हारे पास समय की चाहे कितनी भी कमी हो, तुम कार्य में कितने भी व्यस्त हो, या तुम पर कुछ भी क्यों ना बीते, हर दिन सामान्य रूप से प्रार्थना करो, सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते रहोगे, तब तक चाहे तुम्हारा परिवेश कैसा भी क्यों ना हो, तुम्हें बहुत आत्मिक आनंद मिलेगा, और तुम लोगों, घटनाओं या अपने आसपास की चीज़ों से प्रभावित नहीं होगे। जब तुम अपने हृदय में साधारण रूप से परमेश्वर का मनन करते हो, तो बाहर जो कुछ भी होता है, वह तुम्हें परेशान नहीं कर सकता। आध्यात्मिक कद काठी प्राप्त करने का यही अर्थ है। प्रार्थना से आरंभ करो : परमेश्वर के सामने शांति के साथ प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ, उसके वचनों पर मनन करके उनसे प्रकाश पाने का प्रयास करो, अभ्यास करने का मार्ग ढूँढ़ो, परमेश्वर के वचनों को कहने में उसके उद्देश्य को जानो, और उन्हें बिना भटके समझो। साधारणतया, बाहरी चीज़ों से विक्षुब्ध हुए बिना तुम्हारे लिए अपने हृदय में परमेश्वर के निकट आने, परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और उसके वचनों पर चिंतन करने में समर्थ होना सामान्य होना चाहिए। जब तुम्हारा हृदय एक हद तक शांत हो जाएगा, तो चाहे जैसा भी तुम्हारा परिवेश हो, तुम चुपचाप ध्यान लगाने और अपने भीतर परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और वास्तव में परमेश्वर के निकट आने में सक्षम हो जाओगे, जब तक कि अंतत: तुम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँच जाओगे जहाँ तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रशंसा उमड़ने लगे, और यह प्रार्थना करने से भी बेहतर है। तब तुम एक निश्चित आध्यात्मिक कद काठी के हो जाओगे। यदि तुम ऊपर वर्णित अवस्थाओं में होने की स्थिति प्राप्त कर पाते हो, तो यह इस बात का प्रमाण होगा कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष सच में शांत है। यह पहला बुनियादी सबक है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होते हैं, केवल तभी वे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श, प्रबुद्ध और रोशन किए जा सकते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता कर पाते हैं और साथ ही परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पाते हैं। तब वे अपने आध्यात्मिक जीवन में सही राह पर प्रवेश कर चुके होंगे। परमेश्वर के सामने रहने का उनका प्रशिक्षण जब एक निश्चित गहराई तक पहुँच जाता है, और वे अपने आपको त्यागने, अपना तिरस्कार करने और परमेश्वर के वचनों में जीने में समर्थ हो जाते हैं, तब उनके हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं। स्वयं का तिरस्कार करने, स्वयं को कोसने और स्वयं का त्याग करने में समर्थ होना, वह प्रभाव है जो परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त होता है, और लोगों के द्वारा अपने दम पर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करने का अभ्यास वह सबक है, जिसमें लोगों को तत्काल प्रवेश करना चाहिए। कुछ लोगों के लिए, न केवल वे साधारण तौर पर परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ होते हैं, बल्कि वे प्रार्थना करते समय भी अपने हृदय को शांत नहीं रख सकते। यह परमेश्वर के मानकों से बहुत कम है! यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता, तो क्या तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकता, तो किसी के आने से या दूसरों के बात करने पर तुम्हारा ध्यान भंग हो सकता है, और जब दूसरे लोग कार्य करते हैं तो तुम्हारा हृदय दूर खिंच सकता है, ऐसे मामले में तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीते हो। यदि तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है, तो बाहरी दुनिया में होने वाली किसी भी बात से तुम अशांत नहीं होगे, या तुम पर किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकेगा। यदि तुम्हारा इसमें प्रवेश है, तो वे नकारात्मक अवस्थाएँ और समस्त नकारात्मक चीज़ें—मानवीय धारणाएँ, जीवन-दर्शन, लोगों के बीच असामान्य संबंध तथा मत और विचार, इत्यादि—स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी। चूँकि तुम सदा परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर रहे हो, और तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के निकट आ रहा है और हमेशा परमेश्वर के वर्तमान वचनों से घिरा रहता है, इसलिए वे नकारात्मक चीज़ें अनजाने ही तुमसे दूर हो जाएँगी। जब नई और सकारात्मक चीज़ें तुम पर कब्जा करेंगी, तब पुरानी नकारात्मक चीज़ों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, इसलिए उन नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान न दो। तुम्हें उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, परमेश्वर के वचनों को अधिक से अधिक खाने, पीने और उनका आनंद लेने, परमेश्वर की स्तुति में अधिकाधिक भजन गाने, और परमेश्वर को अपने ऊपर कार्य करने का अवसर देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर इस समय मानव-जाति को व्यक्तिगत रूप से सिद्ध बनाना चाहता है, और वह तुम्हारे हृदय को हासिल करना चाहता है; उसका आत्मा तुम्हारे हृदय को प्रेरित करता है, और यदि पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करके तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आ जाते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करोगे। यदि तुम परमेश्वर के वचनों में जीने पर ध्यान देते हो, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने के लिए सत्य के बारे में संगति करने में अधिक संलग्न होते हो, तो वे धार्मिक धारणाएँ और तुम्हारा दंभ और अहम्मन्यता, सब गायब हो जाएँगे, और तुम जान जाओगे कि किस प्रकार अपने आपको परमेश्वर के लिए व्यय करना है, किस प्रकार परमेश्वर से प्रेम करना है, और किस प्रकार उसे संतुष्ट करना है। और बिना तुम्हारे जाने परमेश्वर के लिए असंगत चीज़ें तुम्हारी चेतना में से गायब हो जाएँगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 420

परमेश्वर के वर्तमान वचनों को खाते और पीते हुए उसके वचनों पर चिंतन और प्रार्थना करना परमेश्वर के समक्ष शांत होने की ओर पहला कदम है। यदि तुम सच में परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हो, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी तुम्हारे साथ होगी। समस्त आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त किया जाता है। प्रार्थना करने में तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत अवश्य होना चाहिए, केवल तभी तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो। परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हुए जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, तो तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है, और तुम परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ प्राप्त कर सकते हो। ध्यान और संगति की अपनी सामान्य गतिविधियों में और अपने हृदय में परमेश्वर के निकट होने में जब तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत हो जाओगे, तो तुम परमेश्वर के साथ वास्तविक निकटता का आनंद ले पाओगे, परमेश्वर के प्रेम और उसके कार्य की वास्तविक समझ रख पाओगे, और परमेश्वर के इरादों के संबंध में सच्चा चिंतन और देखभाल दर्शा पाओगे। जितना अधिक तुम साधारणतः परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम रोशन होगे और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को समझ पाओगे, और समझ पाओगे कि तुममें किस चीज़ की कमी है, तुम्हें किसमें प्रवेश करना है, कौन-से कार्य में तुम्हें सेवा करनी चाहिए, और किसमें तुम्हारे दोष निहित हैं। यह सब परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त होता है। यदि तुम परमेश्वर के समक्ष अपनी शांति में सच में गहराई प्राप्त कर लेते हो, तो तुम आत्मा के कुछ रहस्यों को स्पर्श कर पाओगे, यह समझ पाओगे कि वर्तमान में परमेश्वर तुममें क्या कार्य करना चाहता है, परमेश्वर के वचनों को अधिक गहराई से समझ पाओगे, परमेश्वर के वचनों के तत्व, सार और अस्तित्व को समझ पाओगे, और तुम अभ्यास के मार्ग को अधिक स्पष्टता और परिशुद्धता से देख पाओगे। यदि तुम अपनी आत्मा में शांत रहने में पर्याप्त गहराई प्राप्त करने में असफल रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा द्वारा केवल थोड़ा-सा ही प्रेरित किए जाओगे; तुम अंदर से मज़बूत महसूस करोगे और एक निश्चित मात्रा में आनंद और शांति अनुभव करोगे, लेकिन तुम कुछ भी गहराई से नहीं समझोगे। मैंने पहले कहा है : यदि लोग अपना पूरा सामर्थ्य नहीं लगाते हैं, तो उनके लिए मेरी वाणी को सुनना या मेरा चेहरा देखना कठिन होगा। यह परमेश्वर के समक्ष शांति में गहराई प्राप्त करने का इशारा करता है, न कि सतही प्रयास करने का। जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर के समक्ष सच में शांत रह सकता है, वह खुद को समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर पाता है, और परमेश्वर द्वारा कब्जा किए जाने में समर्थ होता है। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से लंपट और स्वछंद हैं। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में समर्थ हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर के समक्ष पवित्र हैं, और जो परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं। केवल परमेश्वर के आगे शांत रहने वाले लोग ही जीवन को महत्व देते हैं, आत्मा में संगति को महत्व देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। जो कोई भी परमेश्वर के आगे शांत रहने को महत्व नहीं देता है और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अभ्यास नहीं करता वह अहंकारी और अल्पज्ञ है, संसार से जुड़ा है और जीवन-रहित है; भले ही वे कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे केवल दिखावटी बात करते हैं। जिन्हें परमेश्वर अंततः सिद्ध बनाता है और पूर्णता देता है, वे लोग हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रह सकते हैं। इसलिए जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं, वे बड़े आशीषों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। जो लोग दिन भर में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए शायद ही समय निकालते हैं, जो पूरी तरह से बाहरी मामलों में लीन रहते हैं और जीवन में प्रवेश को थोड़ा ही महत्व देते हैं—वे सब ढोंगी हैं, जिनके भविष्य में विकास के कोई आसार नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं और जो वास्तव में परमेश्वर से संगति कर सकते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 421

परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करने हेतु उसके समक्ष आने के लिए तुम्हें पहले उसके समक्ष शांत होना होगा। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होगे, केवल तभी वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हें ज्ञान देगा। लोग परमेश्वर के समक्ष जितना अधिक शांत होते हैं, उतना अधिक वे प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर पाते हैं। इस सबके लिए आवश्यक है कि लोगों में भक्ति और विश्वास हो; केवल इसी प्रकार वे सिद्ध बनाए जा सकते हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का बुनियादी सबक परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहना है। यदि तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत होगे, तो केवल तभी तुम्हारा समस्त आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रभावी होगा। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ है, तो तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है, तो चाहे तुम जो कुछ भी करो, तब तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की उपस्थिति में जीता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है और उसके समीप जाता है, तो चाहे तुम कुछ भी करो, इससे साबित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। यदि तुम लोगों से वार्तालाप करते समय, चलते-फिरते समय यह कह पाते हो, "मेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है और बाहरी चीज़ों पर केंद्रित नहीं है, और मैं परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता हूँ," तो तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। ऐसी किसी चीज़ में, जो तुम्हारे हृदय को बाहरी मामलों की तरफ खींचती हो, या ऐसे लोगों के साथ, जो तुम्हारे हृदय को परमेश्वर से अलग करते हों, संलग्न मत हो। जो कुछ भी तुम्हारे हृदय को परमेश्वर के निकट आने से विचलित करता हो, उसे अलग रख दो, या उससे दूर रहो। यह तुम्हारे जीवन के लिए कहीं अधिक लाभदायक है। अभी निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के महान कार्य का समय है, वह समय, जब परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों को सिद्ध बना रहा है। यदि, इस क्षण, तुम परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटेगा। यदि तुम परमेश्वर के अलावा अन्य चीजों का अनुसरण करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने का कोई मार्ग नहीं होगा। जो लोग परमेश्वर से ऐसे कथनों को सुन सकते हैं और फिर भी आज उसके समक्ष शांत रहने में असफल रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं, जो सत्य और परमेश्वर से प्रेम नहीं करते। यदि इस क्षण तुम अपने आपको समर्पित नहीं करोगे, तो तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? अपने आपको समर्पित करना परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है। यही एक वास्तविक बलि होगी। जो कोई भी अब सचमुच अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करता है, वह परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए आश्वस्त किया जाता है। कोई भी चीज़, चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, तुम्हें विक्षुब्ध नहीं कर सकती है; चाहे वह तुम्हारी काट-छाँट करना हो या तुमसे निपटना हो, या चाहे तुम्हें कुंठा या असफलता का सामना करना पड़े, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए। चाहे लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत होना चाहिए। चाहे तुम्हें कैसी भी परिस्थिति का सामना करना पड़े—चाहे तुम विपत्ति, पीड़ा, उत्पीड़न या विभिन्न परीक्षणों से घिर जाओ—तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए; सिद्ध किए जाने के ऐसे ही मार्ग हैं। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, केवल तभी परमेश्वर के वर्तमान वचन तुम्हें स्पष्ट होंगे। तब तुम अधिक सही तरीके से और बिना विचलन के पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबुद्धता का अभ्यास कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों को और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हो, जो तुम्हारी सेवा को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करेंगे, और तुम अधिक परिशुद्धता से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रेरणा को समझ सकते हो, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन रहने के बारे में आश्वस्त हो सकते हो। परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत रहने के ऐसे ही परिणाम प्राप्त होते हैं। जब लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में स्पष्ट नहीं होते, उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं होता, वे परमेश्वर के इरादों को समझने में असफल रहते हैं, या उनमें अभ्यास के सिद्धांतों का अभाव होता है, तो ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि परमेश्वर के समक्ष उनका हृदय शांत नहीं होता। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का उद्देश्य ईमानदार और व्यावहारिक होना, परमेश्वर के वचनों में यथार्थता और पारदर्शिता ढूँढ़ना, और अंततः सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की स्थिति में पहुँचना है।

यदि तुम्हारा हृदय प्रायः परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रहता, तो परमेश्वर के पास तुम्हें सिद्ध करने का कोई साधन नहीं है। संकल्पहीन होना हृदयहीन होने के बराबर है, और हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता; ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि परमेश्वर कितना कार्य करता है, या वह कितना कुछ बोलता है, न ही वह यह जानता है कि अभ्यास कैसे किया जाए। क्या यह व्यक्ति हृदयहीन नहीं है? क्या हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता है? हृदयहीन लोगों को सिद्ध बनाने का परमेश्वर के पास कोई साधन नहीं है—और वे बोझ ढोने वाले जानवरों से भिन्न नहीं हैं। परमेश्वर इतने स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से बोला है, फिर भी तुम्हारा हृदय प्रेरित नहीं होता और तुम परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हो। क्या तुम एक गूँगे जानवर नहीं हो? कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने के अभ्यास में भटक जाते हैं। जब भोजन पकाने का समय होता है, तो वे भोजन नहीं पकाते, जब दैनिक काम-काज का समय होता है, तो वे उन्हें नहीं करते, बल्कि केवल प्रार्थना और ध्यान ही करते रहते हैं। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अर्थ यह नहीं है कि भोजन मत पकाओ या दैनिक काम-काज मत करो, या अपना जीवन मत जीओ; बल्कि, यह सभी सामान्य अवस्थाओं में परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना, और अपने हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान रखना है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो प्रार्थना करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के आगे ठीक तरह से घुटने टेककर झुकना चाहिए; जब तुम दैनिक काम-काज करते हो या भोजन पकाते हो, तो परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करो, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करो, या भजन गाओ। तुम चाहे अपने आपको किसी भी परिस्थिति में पाओ, तुम्हारे पास अभ्यास करने का अपना तरीका होना चाहिए, परमेश्वर के निकट आने के लिए तुम जो कुछ कर सकते हो, तुम्हें करना चाहिए, और परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताक़त से कोशिश करनी चाहिए। जब परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो एकचित्त होकर प्रार्थना करो; और जब परिस्थितियाँ अनुमति न दें, तो अपने हाथों के काम को करते हुए अपने हृदय में परमेश्वर के निकट जाओ। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हो, तो उसके वचनों को खाओ और पीओ; जब तुम प्रार्थना कर सकते हो, तो प्रार्थना करो; जब तुम परमेश्वर का मनन कर सकते हो, तब उसका मनन करो। दूसरे शब्दों में, अपने परिवेश के अनुसार प्रवेश के लिए अपने आपको प्रशिक्षित करने हेतु अपनी पूरी कोशिश करो। कुछ लोग परमेश्वर के समक्ष तभी शांत हो पाते हैं, जब कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जैसे ही कुछ होता है, उनके मन भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत होना नहीं है। इसे अनुभव करने का सही तरीका है : किसी भी परिस्थिति में हमारा हृदय परमेश्वर से दूर न जाए, या बाहरी लोगों, घटनाओं या चीज़ों से विक्षुब्ध महसूस न करे, और केवल तभी कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत होता है। कुछ लोग कहते हैं कि जब वे सभाओं में प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के सामने उनका हृदय शांत रह सकता है, किंतु दूसरों के साथ संगति में वे परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हैं, उनके विचार भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत रहना नहीं है। आज अधिकांश लोग इसी अवस्था में हैं, उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत रहने में असमर्थ हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस क्षेत्र में अपने परिश्रम में अधिक प्रयास अवश्य लगाने चाहिए, जीवन-अनुभव के सही पथ पर कदम-दर-कदम प्रवेश करना चाहिए, और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर चलने की शुरुआत करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 422

परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र अपने कार्य और वचन को तुम लोगों को समझाना या ज्ञात कराना नहीं है। इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की योग्यता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन इंसानी भाषा में लिखे हैं, और वह बड़ी स्पष्टता से बोलता है। मिसाल के तौर पर, तुम इस बात को पूरी तरह से जानने में सक्षम हो कि परमेश्वर तुम्हें क्या बात समझाना और किस पर अमल करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जिसे सूझ-बूझ रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है। विशेषकर, वर्तमान चरण में परमेश्वर जो वचन कह रहा है, वे खासतौर पर स्पष्ट और पारदर्शी हैं, और परमेश्वर ऐसी अनेक बातों की ओर इशारा कर रहा है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है इसके साथ-साथ हर तरह की इंसानी स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। उसके वचन व्यापक हैं और पूरी तरह से स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग बहुत-से मुद्दों को समझते हैं, लेकिन एक चीज़ अभी भी छूट रही है—लोगों का उसके वचनों को अमल में लाना। लोगों को सत्य के हर पहलू का विस्तार से अनुभव करना चाहिए, उसकी छान-बीन और खोज ज़्यादा विस्तार से करनी चाहिए, बजाय इसके कि जो कुछ भी उन्हें उपलब्ध कराया जाए, महज़ उसे आत्मसात करने का इंतज़ार करें; वरना वे परजीवी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को जानते तो हैं, फिर भी उस पर अमल नहीं करते। इस तरह का व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और अंतत: उसे हटा दिया जाएगा। 1990 के पतरस जैसा बनने के लिए तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभव में सच्चा प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में ज़्यादा और कहीं अधिक विशाल प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए सदा अधिक सहायक होगा। अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 423

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है। इसलिए, तुम सत्य के साथ हर जगह जा सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो फिर धार्मिक लोगों की तो छोड़ो, तुम अपने परिवारजनों तक को आश्वस्त करने का भी प्रयास करने की मत सोचना। सत्य के बिना तुम हवा में तैरते हिमकणों की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो, और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना ही सशक्त क्यों न हो, लेकिन वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, दुनिया को झुकाया जा सकता है और पर्वतों-समुद्रों को हिलाया जा सकता है, जबकि सत्य के अभाव में कीड़े-मकौड़े भी शहर की मज़बूत दीवारों को मिट्टी में मिला सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 424

वर्तमान चरण में, पहले सत्य को जानना बेहद महत्वपूर्ण है, फिर उसे अमल में लाना और उसके बाद सत्य के सच्चे अर्थ से स्वयं को समर्थ बनाना। तुम लोगों को इसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों से मात्र अपनी बातों का अनुसरण करवाने का प्रयास करने के बजाय, तुम्हें उनसे अपने अभ्यास का अनुसरण करवाना चाहिए। केवल इसी प्रकार से तुम कुछ सार्थक हासिल कर सकते हो। तुम पर चाहे कोई भी मुसीबत आए, चाहे तुम्हें किसी का भी सामना करना पड़े, अगर तुम्हारे अंदर सत्य है, तो तुम डटे रह पाओगे। परमेश्वर के वचन इंसान को जीवन देते हैं, मृत्यु नहीं। अगर परमेश्वर के वचन पढ़कर भी तुम जीवित नहीं होते बल्कि मुर्दे ही रहते हो, तो तुम्हारे साथ कुछ गड़गबड़ है। अगर कुछ समय के बाद तुम परमेश्वर के काफी वचनों को पढ़ लेते हो और व्यवहारिक उपदेशों को सुन लेते हो, लेकिन तब भी तुम मृत्यु की स्थिति में रहते हो, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम सत्य की कद्र करने वाले इंसान नहीं हो, न ही तुम सत्य के लिए प्रयास करने वाले इंसान हो। अगर तुम लोग सचमुच परमेश्वर को पाने का प्रयास करते, तो तुम लोग सिद्धांतों से लैस होने और लोगों को सिखाने के लिए ऊँचे-ऊँचे सिद्धांतों का इस्तेमाल करने में अपना ध्यान केंद्रित न करते, बल्कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य को अमल में लाने पर ध्यान केंद्रित करते। क्या अब तुम लोगों को इसमें प्रवेश करने का प्रयास नहीं करना चाहिए?

परमेश्वर के पास इंसान में कार्य करने का सीमित समय है, इसलिए अगर तुम उसके साथ सहयोग न करो तो उसका परिणाम क्या हो सकता है? परमेश्वर हमेशा क्यों चाहता है कि एक बार समझ लेने पर तुम लोग उसके वचनों पर अमल करो? वो ऐसा इसलिए चाहता है क्योंकि परमेश्वर ने तुम लोगों के सामने अपने वचनों को प्रकट कर दिया है और तुम लोगों का अगला कदम है उन पर वास्तव में अमल करना। जब तुम उन वचनों पर अमल करोगे, तो परमेश्वर प्रबोधन और मार्गदर्शन का कार्य पूरा करेगा। यह कार्य इसी तरह से किया जाना है। परमेश्वर के वचनों से इंसान का जीवन फलता-फूलता है, उसमें ऐसा कोई तत्व नहीं होता जो इंसान को भटकाए या उसे निष्क्रिय बनाए। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है और उस पर अमल किया है, लेकिन तुमने अभी भी पवित्र आत्मा से कोई कार्य प्राप्त नहीं किया है। तुम्हारे शब्द सिर्फ किसी बच्चे को बेवकूफ बना सकते हैं। अन्य लोगों को शायद न पता लगे कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं, लेकिन क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को पता नहीं चलेगा? ऐसा कैसे है कि लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करते हैं और उन्हें पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त हो जाता है, लेकिन तुम उसके वचनों पर अमल करके भी पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त नहीं करते? क्या परमेश्वर के अंदर भावनाएँ हैं? अगर तुम्हारे इरादे सचमुच सही हैं और तुम सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ होगा। कुछ लोग हमेशा अपना ही झंडा बुलंद रखना चाहते हैं, किन्तु क्यों परमेश्वर उन्हें ऊपर उठकर कलीसिया की अगुवाई नहीं करने देता? कुछ लोग मात्र अपना काम करते हैं और अपने कर्तव्यों को करते हैं, और इससे पहले कि वे इसे जाने, वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है? परमेश्वर इंसान के अंतरतम हृदय की जाँच करता है और जो लोग सत्य का पालन करते हैं उन्हें ऐसा सही इरादों के साथ करना चाहिए। जिन लोगों के इरादे सही नहीं होते, वे दृढ़ नहीं रह पाते। मूलत:, तुम लोगों का लक्ष्य परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर प्रभाव ग्रहण करने देना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों के अपने अभ्यास में वचनों की सच्ची समझ हासिल करना है। शायद परमेश्वर के वचनों को समझने की तुम्हारी क्षमता थोड़ी कच्ची है, लेकिन जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हो, तो वह इस दोष को दूर कर सकता है, तो तुम लोगों को न केवल बहुत-से सत्यों को जानना चाहिए, बल्कि तुम्हें उनका अभ्यास भी करना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण केंद्र-बिंदु है जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यीशु भी ने अपने साढ़े तैंतीस वर्षों में बहुत से अपमान सहे और बहुत कष्ट उठाए। उसने इतने अधिक कष्ट केवल इसलिए उठाए क्योंकि उसने, सत्य पर अमल किया, सभी चीज़ों में वह परमेश्वर की इच्छा पर चला, और केवल परमेश्वर की इच्छा की ही परवाह की। अगर उसने सत्य पर अमल किए बिना उसे जान लिया होता तो वह ये कष्ट न उठाता। अगर यीशु ने यहूदियों की शिक्षाओं का पालन किया होता और फरीसियों का अनुसरण किया होता, तो उसने कष्ट न उठाए होते। तुम यीशु के कर्मों से सीख सकते हो कि इंसान पर परमेश्वर के कार्य की प्रभावशीलता इंसान के सहयोग से ही आती है, यह बात तुम लोगों को समझ लेनी चाहिए। अगर यीशु ने सत्य पर अमल न किया होता, तो क्या उसने वो दुख उठाए होते जो सूली पर उठाए? अगर उसने परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य न किया होता तो क्या वह ऐसी दर्दभरी प्रार्थना कर पाता? इसलिए, तुम लोगों को सत्य के अभ्यास की खातिर कष्ट उठाने चाहिए; इंसान को इस तरह के कष्ट उठाने चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 425

व्यवहार में, आज्ञाओं के पालन को सत्य को अभ्यास में डालने से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, एक व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करना ही चाहिए। सत्य का अभ्यास करते समय, व्यक्ति को आज्ञाओं के सिद्धान्तों का उल्लंघन बिलकुल नहीं करना चाहिए न ही आज्ञाओं के विपरीत जाना चाहिए; परमेश्वर तुमसे जो भी अपेक्षा करे, तुम्हें वो सब करना ही चाहिए। आज्ञाओं का पालन और सत्य का अभ्यास करना परस्पर संबद्ध हैं, विरोधी नहीं। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम आज्ञाओं के सार को बनाए रखने में सक्षम हो जाते हो। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को समझोगे जैसा कि आज्ञाओं में अभिव्यक्त है। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना, परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं, वे परस्पर संबद्ध हैं। आरंभ में, आज्ञाओं का पालन करने के बाद ही इंसान सत्य का अभ्यास कर सकता था और पवित्र आत्मा से ज्ञान प्राप्त कर सकता था, किन्तु यह परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। परमेश्वर बस अच्छा व्यवहार ही नहीं चाहता, वो अपेक्षा करता है कि तुम अपना हृदय परमेश्वर की आराधना करने में लगा दो। तुम्हें कम से कम सतही तौर पर ही सही, आज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। धीरे-धीरे, अनुभव से, परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त करने के बाद, लोग उसके विरुद्ध विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना बंद कर देंगे, और फिर उसके कार्य के विषय में अपने मन में संदेह रखना बंद कर देंगे। यही एक तरीका है जिससे लोग आज्ञाओं के सार का पालन कर सकते हैं। इसलिए, सत्य के अभ्यास के बिना, मात्र आज्ञाओं का पालन करना प्रभावहीन है और इसे परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि तुमने अभी तक वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त नहीं किया है। सत्य के बिना आज्ञाओं का पालन करना केवल सख्ती से नियमों से चिपके रहने के बराबर है। ऐसा करने से, आज्ञाएँ तुम्हारी व्यवस्था बन जाएँगी, जो तुम्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद नहीं करेगा। बल्कि, वे तुम्हारा बोझ बन जाएँगी, और तुम्हें पुराने नियमों की व्यवस्थाओं की तरह मजबूती से बाँध लेंगी, जिससे तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति गँवा दोगे। इसलिए, सत्य का अभ्यास करके ही तुम प्रभावशाली तरीके से आज्ञाओं का पालन कर सकते हो और तुम आज्ञाओं का पालन इसलिए करते हो कि सत्य का अभ्यास कर सको। आज्ञाओं का पालन करने की प्रक्रिया में तुम और भी अधिक सत्य को अभ्यास में लाओगे, और सत्य का अभ्यास करते समय, तुम आज्ञाओं के वास्तविक अर्थ की गहरी समझ हासिल करोगे। मनुष्य आज्ञाओं का पालन करे, परमेश्वर की इस माँग के पीछे का उद्देश्य और अर्थ उससे बस नियमों का पालन करवाना नहीं है, जैसा कि इंसान सोचता है; बल्कि इसका सरोकार उसके जीवन प्रवेश से है। जीवन में तुम्हारे विकास की सीमा से तय होता है कि तुम किस स्तर तक आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो। यद्यपि आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिए होती हैं, फिर भी आज्ञाओं का सार सिर्फ मनुष्य के जीवन के अनुभव से ही प्रकट होता है। अधिकांश लोग मान लेते हैं कि आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने का अर्थ है कि वे "पूरी तरह तैयार हैं, बस अब उठाया जाना बाकी है।" यह निरंकुश विचार है और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है। ऐसी बातें कहने वाले लोग आगे नहीं बढ़ना चाहते, वे देह की लालसा रखते हैं। यह बकवास है! इसका वास्तविकता के साथ तालमेल नहीं है! वास्तव में आज्ञाओं का पालन किये बिना मात्र सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर की इच्छा नहीं है। ऐसा करने वाले अपाहिज होते हैं; वे किसी लंगड़े व्यक्ति के समान होते हैं। नियमों का पालन करने की तरह बस आज्ञाओं का पालन करना, फिर भी सत्य का न होना—यह भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में सक्षम नहीं है; उन लोगों के समान ऐसा करने वाले भी एक प्रकार की अपंगता के शिकार हैं उसी तरह जैसे वे लोग जिनकी एक आँख नहीं है। यह कहा जा सकता है कि यदि तुम आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करते हो और व्यवहारिक परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारे पास सत्य होगा; तुलनात्मक रूप से, तुमने वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त कर लिया होगा। यदि तुम उस सत्य का अभ्यास करते हो, जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए, तो तुम आज्ञाओं का पालन भी करोगे, ये दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना दो पद्धतियाँ हैं, दोनों ही व्यक्ति के जीवन के अनुभव का अभिन्न अंग हैं। व्यक्ति के अनुभव में आज्ञाओं का पालन और सत्य के अभ्यास का एकीकरण सम्मिलित होना चाहिए, विभाजन नहीं। हालाँकि इन दोनों चीज़ों के बीच में विभिन्नताएँ और संबंध दोनों हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 426

नए युग में आज्ञाओं की घोषणा उस तथ्य की एक गवाही है कि इस धारा के सभी लोग, वे सभी जो आज परमेश्वर की वाणी को सुनते हैं, एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। यह परमेश्वर के कार्य के लिए एक नई शुरुआत है, साथ ही यह परमेश्वर की छः हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना के कार्य के अंतिम भाग का आरम्भ भी है। नए युग की आज्ञाएँ इस बात की प्रतीक हैं कि परमेश्वर और मनुष्य नए स्वर्ग और नई पृथ्वी के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं, और जैसे यहोवा ने इस्रालियों के बीच कार्य किया था और यीशु ने यहूदियों के बीच कार्य किया था, वैसे ही परमेश्वर पृथ्वी पर और अधिक व्यवहारिक कार्य तथा और अधिक बड़े काम करेगा। ये इस बात की भी प्रतीक हैं कि लोगों का यह समूह परमेश्वर से और अधिक एवं और बड़े आदेश प्राप्त करेगा, तथा परमेश्वर से व्यवहारिक तरीके से आपूर्ति, पोषण, सहारा, देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करेगा, उसे परमेश्वर के द्वारा और अधिक व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा, परमेश्वर के वचन द्वारा उससे निपटा जाएगा, तोड़ा जाएगा और परिशुद्ध किया जाएगा। नए युग की आज्ञाओं का अर्थ बहुत गहरा है। उनसे संकेत मिलता है कि परमेश्वर वास्तव में पृथ्वी पर प्रकट होगा, जहाँ से वह देह में अपनी सम्पूर्ण महिमा को प्रकट करते हुए समूचे विश्व को जीत लेगा। वे यह भी संकेत करती हैं कि व्यवहारिक परमेश्वर अपने चुने हुए सभी लोगों को पूर्ण बनाने के लिए, पृथ्वी पर और भी अधिक व्यवहारिक कार्य करने जा रहा है। इसके अलावा, परमेश्वर पृथ्वी पर वचनों से सब कुछ निष्पादित करेगा और उस आज्ञप्ति को प्रकट करेगा कि "देहधारी परमेश्वर सबसे ऊँचा उठकर आवर्धित होगा, और सभी लोग एवं सभी देश परमेश्वर—जो महान है—उसकी आराधना करने के लिए घुटनों के बल बैठेंगे।" हालाँकि नए युग की आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन करने के लिए हैं, भले ही ऐसा करना मनुष्य का कर्तव्य और उसका दायित्व है, लेकिन वे जिस अर्थ का प्रतिनिधित्व करती हैं, वो इतना अगाध है कि उसे एक या दो शब्दों में पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यहोवा और यीशु के द्वारा घोषित की गईं पुराने नियमों की व्यवस्थाओं और नए नियमों के अध्यादेशों का स्थान नए युग की आज्ञाओं ने ले लिया। यह एक गहरी शिक्षा है, यह उतना सरल विषय नहीं है जितना लोग सोचते हैं। नए युग की आज्ञाओं में व्यवहारिक अर्थ का एक पहलू है : वे अनुग्रह के युग और राज्य के युग के बीच एक अंतराफलक की भूमिका निभाते हैं। नए युग की आज्ञाएँ पुराने युग की प्रथाओं और अध्यादेशों को समाप्त करती हैं, साथ ही यीशु के युग की और उससे पहले की सभी प्रथाओं को भी समाप्त करती हैं। वे मनुष्य को अधिक व्यवहारिक परमेश्वर की उपस्थिति में लाती हैं, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूर्णता प्राप्त करना शुरू करने देती हैं; वे पूर्ण बनाए जाने के मार्ग का आरम्भ हैं। इसलिए, नए युग की आज्ञाओं के प्रति तुम लोगों का रवैया सही होना चाहिए, और उनका अनुसरण लापरवाही से नहीं करना चाहिए, न ही उनका तिरस्कार करना चाहिए। नए युग की आज्ञाएँ एक बिंदु विशेष पर जोर देती हैं : वो यह कि मनुष्य आज के व्यवहारिक स्वयं परमेश्वर की आराधना करेगा, जिसमें आत्मा के सार के प्रति और अधिक व्यवहारिक रूप से समर्पित होना शामिल है। आज्ञाएँ उस सिद्धान्त पर भी जोर देती हैं जिसके द्वारा धार्मिकता के सूर्य के रूप में प्रकट होने के बाद परमेश्वर, मनुष्य का न्याय करेगा कि वे दोषी हैं या धार्मिक। आज्ञाएँ अभ्यास में लाने की अपेक्षा समझने में अधिक आसान हैं। इससे यह देखा जा सकता है कि यदि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाना चाहता है, तो उसे ऐसा अपने वचनों और मार्गदर्शन से करना होगा, मनुष्य केवल अपनी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता से पूर्णता हासिल नहीं कर सकता। मनुष्य नए युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है या नहीं, इस बात का संबंध इंसान के व्यवहारिक परमेश्वर के ज्ञान से है। इसलिए, तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो या नहीं, यह ऐसा प्रश्न नहीं है जिसका समाधान कुछ ही दिनों में कर लिया जायेगा। यह सीखने के लिए एक गहरा सबक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 427

सत्य का अभ्यास ऐसा मार्ग है जिससे मनुष्य जीवन में उन्नति कर सकता है। यदि तुम लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास केवल सिद्धान्त रह जायेगा और तुम लोगों के पास कोई वास्तविक जीवन नहीं होगा। सत्य मनुष्य के आध्यात्मिक कद का प्रतीक है। तुम सत्य का अभ्यास करते हो या नहीं, इसका संबंध इस बात से है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है या नहीं। यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो धार्मिक होने का अभिनय मत करो, या यदि तुम देह की भावनाओं और उसकी देखभाल में लिप्त होते हो, तो तुम आज्ञाओं के पालन करने से बहुत दूर हो। यह गहनतम सबक है। प्रत्येक युग में, लोगों के प्रवेश करने के लिए और समझने के लिए बहुत से सत्य होते हैं, किन्तु प्रत्येक युग में अलग-अलग आज्ञाएँ भी होती हैं जो उस सत्य के साथ होती हैं। लोग जिस सत्य का अभ्यास करते हैं और आज्ञाओं का पालन करते हैं वह एक युग विशेष से संबंधित होता है। प्रत्येक युग के अपने सत्य होते हैं जिनका अभ्यास किया जाना चाहिए और ऐसी आज्ञाएँ होती हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। हालाँकि, परमेश्वर द्वारा घोषित विभिन्न आज्ञाओं के आधार पर, अर्थात्, विभिन्न युगों के आधार पर, मनुष्य के द्वारा सत्य के अभ्यास का लक्ष्य और प्रभाव आनुपातिक रूप में भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि आज्ञाएँ सत्य की सहायता के लिए हैं और सत्य आज्ञाओं को बनाए रखने के लिए विद्यमान रहता है। यदि केवल सत्य हो, तो कहने को परमेश्वर के कार्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा। लेकिन, आज्ञाओं का हवाला देकर, मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य में रुझान की सीमाओं को पहचान सकता है और मनुष्य उस युग को जान सकता है जिसमें परमेश्वर कार्य करता है। धर्म में, बहुत से लोग हैं जो उसी सत्य का अभ्यास कर सकते हैं जिसका अभ्यास व्यवस्था के युग के मनुष्य के द्वारा किया गया था। लेकिन, उसके पास नये युग की आज्ञाएँ नहीं हैं, न ही वह नये युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है। वह अभी भी पुरानी रीति का पालन करता है और आदिम मानव बना हुआ है। उसके पास कार्य करने की नयी पद्धतियां नहीं हैं और वह नए युग की आज्ञाओं को नहीं देख सकता। इस तरह, उसमें परमेश्वर का कार्य नहीं होता। यह ऐसा है मानो उनके पास बस अंडे का खाली खोल है; यदि उसके अंदर कोई चूज़ा नहीं है तो उसमें कोई आत्मा नहीं है। अधिक सटीकता से कहा जाये तो, उसमें कोई जीवन नहीं है। ऐसे लोगों ने अभी नए युग में प्रवेश नहीं किया है और वे कई कदम पीछे रह गए हैं। इसलिए, पुराने युगों के सत्यों का होना लेकिन नए युग की आज्ञाओं का न होना बेकार है। तुम लोगों में से अनेक लोग आज के सत्य का अभ्यास करते हैं किन्तु उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करते। तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, और जिस सत्य का तुम अभ्यास करते हो वह बेकार और निरर्थक होगा और परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा। सत्य का अभ्यास, पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की पद्धतियों के मानदंडों के अंतर्गत किया जाना चाहिए; इसे आज के व्यवहारिक परमेश्वर की वाणी की प्रतिक्रिया में किया जाना चाहिए। इसके बिना हर चीज़ बेकार है, जैसे बाँस की टोकरी से पानी निकालने की कोशिश करना। यह नए युग की आज्ञाओं की घोषणा का व्यवहारिक अर्थ भी है। अगर लोगों को आज्ञाओं के अनुसार चलना है, तो बिना किसी असमंजस के उन्हें कम से कम उस व्यवहारिक परमेश्वर के बारे में तो जानना ही चाहिए जो देह में प्रकट होता है। दूसरे शब्दों में, लोगों को आज्ञाओं का पालन करने के सिद्धांत समझने चाहिए। आज्ञाओं के अनुसार चलने का अर्थ, अव्यवस्थित या मनमाने ढंग से उनका पालन करना नहीं है, बल्कि एक आधार, एक उद्देश्य और सिद्धांतों के साथ उनका पालन करना है। जो पहली चीज़ तुम्हें हासिल करनी चाहिए वह यह है कि तुम्हारी दृष्टि स्पष्ट हो। यदि तुम्हारे पास वर्तमान समय में पवित्र आत्मा के कार्य की पूरी समझ है और यदि तुम आज के कार्य की रीति में प्रवेश करते हो, तो तुम स्वाभाविक रूप से आज्ञाओं का पालन करने के सार की स्पष्ट समझ पा लोगे। यदि वह दिन आता है जब तुम नये युग की आज्ञाओं के सार को जान जाते हो और तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो, तो उस समय तुम पूर्ण किए जा चुके होगे। सत्य का अभ्यास करने और आज्ञाओं के पालन करने का यही व्यवहारिक महत्व है। तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किस प्रकार नए युग की आज्ञाओं के सार को समझते हो। पवित्र आत्मा का कार्य मनुष्य के सामने निरन्तर प्रकट होगा और परमेश्वर मनुष्य से अधिकाधिक अपेक्षा करेगा। इसलिए, वे सत्य जिनका मनुष्य वास्तव में अभ्यास करता है उनकी संख्या और बढ़ जाएगी तथा वे बड़े हो जाएँगे एवं आज्ञाओं का पालन करने के प्रभाव और अधिक गहरे हो जाएँगे। इसलिए, तुम लोगों को उसी समय सत्य का अभ्यास करना चाहिए और आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। किसी को भी इस मामले को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए; इस नए युग में नए सत्य और नई आज्ञाओं को एक ही समय में आरम्भ होने देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 428

बहुत लोग अभ्यास के बारे में थोड़ी बात कर सकते हैं और वे अपने व्यक्तिगत विचारों के बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन इसमें से अधिकांश दूसरों के वचनों से प्राप्त होने वाला प्रकाश होता है। इसमें उनके अपने व्यक्तिगत अभ्यासों से कुछ भी शामिल नहीं होता, न ही इसमें ऐसा कुछ शामिल होता है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से देखा हो। मैं पहले इस मुद्दे की चीर-फाड़ कर चुका हूँ; यह मत सोचो कि मुझे कुछ पता नहीं है। तुम केवल कागज़ी शेर हो, और बात तुम शैतान पर विजय पाने, विजय के साक्ष्य वहन करने और परमेश्वर की छवि को जीने की करते हो? यह सब बकवास है! क्या तुम्हें लगता है कि आज परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचन तुम्हारी सराहना पाने के लिए हैं? मुँह से तुम अपने पुराने स्वभाव को त्यागने और सत्य का अभ्यास करने की बात करते हो, और तुम्हारे हाथ दूसरे कर्म कर रहे हैं और तुम्हारा हृदय दूसरी योजनाओं की साजिश कर रहा है—तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम्हारा हृदय और तुम्हारे हाथ एक क्यों नहीं हैं? इतने सारे उपदेश खोखले शब्द हो गए हैं; क्या यह हृदय तोड़ने वाली बात नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास करने में असमर्थ हो, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने अभी तक पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश नहीं किया है, तुम्हारे अंदर अभी तक पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ है, और तुम्हें अभी तक उसका मार्गदर्शन नहीं मिला है। यदि तुम कहते हो कि तुम केवल परमेश्वर के वचन को समझने में समर्थ हो, लेकिन उसका अभ्यास करने में समर्थ नहीं हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम नहीं करता। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को बचाने के लिए नहीं आता। यीशु को जब पापियों, गरीबों और सभी विनम्र लोगों को बचाने के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, तो उसे बहुत पीड़ा हुई थी। उसके सलीब पर चढ़ने की प्रक्रिया ने पापबलि का काम किया था। यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम्हें जितनी जल्दी हो सके, चले जाना चाहिए; एक मुफ्तखोर के रूप में परमेश्वर के घर में पड़े मत रहो। बहुत-से लोग तो स्वयं को ऐसी चीज़ें करने से रोकने में भी कठिनाई महसूस करते हैं, जो स्पष्टत: परमेश्वर का विरोध करती हैं। क्या वे मृत्यु नहीं माँग रहे हैं? वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की बात कैसे कर सकते हैं? क्या उनमें परमेश्वर का चेहरा देखने की धृष्टता होगी? वह भोजन करना, जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करता है; कुटिल चीज़ें करना, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं; दुर्भावनापूर्ण, कपटी और षड्यंत्रकारी बनना, तब भी जबकि परमेश्वर तुम्हें अपने द्वारा दिए गए आशीषों का आनंद लेने देता है—क्या तुम उन्हें प्राप्त करते हुए अपने हाथों को जलता हुआ महसूस नहीं करते? क्या तुम अपने चेहरे को शर्म से लाल होता महसूस नहीं करते? परमेश्वर के विरोध में कुछ करने के बाद, "दुष्ट बनने" के लिए षड्यंत्र रचने के बाद, क्या तुम्हें डर नहीं लगता? यदि तुम्हें कुछ महसूस नहीं होता, तो तुम किसी भविष्य के बारे में बात कैसे कर सकते हो? तुम्हारे लिए पहले से ही कोई भविष्य नहीं था, तो अभी भी तुम्हारी और बड़ी अपेक्षाएँ क्या हो सकती हैं? यदि तुम कोई बेशर्मी की बात करते हो और कोई धिक्कार महसूस नहीं करते, और तुम्हारे ह्रदय में कोई जागरूकता नहीं है, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम परमेश्वर द्वारा पहले ही त्यागे जा चुके हो? मज़ा लेते हुए और अनर्गल ढंग से बोलना और कार्य करना तुम्हारी प्रकृति बन गया है; तुम इस तरह कैसे कभी परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो? क्या तुम दुनिया भर में चल पाने में सक्षम होगे? तुम पर कौन विश्वास करेगा? जो लोग तुम्हारी सच्ची प्रकृति को जानते हैं, वे तुमसे दूरी बनाए रखेंगे। क्या यह परमेश्वर का दंड नहीं है? कुल मिलाकर, अगर केवल बात होती है और कोई अभ्यास नहीं होता, तो कोई विकास नहीं होता। यद्यपि तुम्हारे बोलते समय पवित्र आत्मा तुम पर कार्य कर रहा हो सकता है, किंतु यदि तुम अभ्यास नहीं करते, तो पवित्र आत्मा कार्य करना बंद कर देगा। यदि तुम इसी तरह से करते रहे, तो भविष्य के बारे में या अपना पूरा अस्तित्व परमेश्वर के कार्य को सौंपने के बारे में कोई बात कैसे हो सकती है? तुम केवल अपना पूरा अस्तित्व सौंपने की बात कर सकते हो, लेकिन तुमने अपना सच्चा प्यार परमेश्वर को नहीं दिया है। उसे तुमसे केवल मौखिक भक्ति मिलती है, उसे तुम्हारा सत्य का अभ्यास करने का इरादा नहीं मिलता। क्या यह तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद हो सकता है? यदि तुम ऐसा ही करते रहे, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कब बनाए जाओगे? क्या तुम अपने अंधकारमय और विषादपूर्ण भविष्य के बारे में चिंता महसूस नहीं करते? क्या तुम्हें नहीं लगता कि परमेश्वर ने तुममें आशा खो दी है? क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर अधिक और नए लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है? क्या पुरानी चीज़ें कायम रह सकती हैं? तुम आज परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं दे रहे हो : क्या तुम कल की प्रतीक्षा कर रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 429

परमेश्वर के वचनों को मानते हुए स्थिरता के साथ उनकी व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; बातें इतनी भी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता है या नहीं, यह इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम क्या कहते हो; अपितु यह इस पर आधारित है कि तुम किसे जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। तुम्हारे अंदर लम्बे समय तक परीक्षा को सहने की क्षमता होनी चाहिए, और तुम्हें उस समानता को जीने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; बल्कि यह तुम में स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होना चाहिए। तभी तुम में वस्तुतः वास्तविकता होगी और तुम जीवन प्राप्त करोगे। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं: सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, यह पूरी तरह से उसकी समझ के विपरीत है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं खाएँगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को दरकिनार कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ होती हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुज़रता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब मनुष्य का परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों को लेकर सन्देहों से सचमुच मुक्त हो? जब तुम पर कोई बड़ा परीक्षण आयेगा तो क्या तुम दृढ़ रह सकोगे? कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है "मैं गारंटी देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?" कौन दृढ़तापूर्वक कहने की हिम्मत कर सकता है, "हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?" यह ठीक वैसे ही है जैसे जब पतरस का परीक्षण हुआ : वह हमेशा सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी कमी नहीं थी; यह सबसे बड़ी कठिनाई है, जिसका सामना प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं कुछ स्थानों पर जाऊँ, या कुछ भाइयों और बहनों से भेंट करूँ, तो तुम सब निश्चित रूप से अपने ज्ञान के विषय में बहुत कुछ कह पाओगे, और ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंदर कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुम से पूछूँ : "क्या तुम वास्तव में तय कर सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?" तुम निश्चित रूप से उत्तर दोगे : "बिना किसी सन्देह के, यह कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा ही किया जा रहा है।" एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे दोगे, तो तुम में थोड़ा-सा भी सन्देह नहीं होगा बल्कि तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे होगे, यह सोचकर कि तुम ने थोड़ी-सी वास्तविकता प्राप्त कर ली है। जो लोग बातों को इस रीति से समझते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनमें बहुत कम वास्तविकता होती है; जो व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षणों में उतना ही कम स्थिर रह पाता है। धिक्कार है उन पर जो अहंकारी और दंभी होते हैं, और धिक्कार है उन्हें जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे लोग बातें करने में कुशल होते हैं, परन्तु अपनी बातों पर अमल करने में ऐसे लोग बहुत ही खराब होते हैं। छोटी-सी भी समस्या नज़र आते ही ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती; उनके पास मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से ऊपर हैं और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं जिनकी परमेश्वर अभी अपेक्षा करता है। मुझे उनसे अधिक घृणा होती है जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और जिनमें कोई वास्तविकता नहीं होती। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भयंकर हैं, यदि तुम अपने मन में थोड़-सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो जब तुम ही अकेले बचते हो, तब यह माना जाएगा कि तुम्हारे पास सच्ची समझ है और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता है। अगर जिधर हवा बहती है यदि तुम भी उधर ही बह जाते हो, तुम भीड़ के पीछे जाते हो और वही कहते हो जो अन्य लोग कह रहे हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितनी उत्तम रीति से बातें करते हो, यह इस बात का प्रमाण नहीं होगा कि तुम में वास्तविकता है। इसलिए मैं तुम्हें परामर्श देता हूँ कि निरर्थक शब्द बोलने में जल्दबाज़ी न करो। क्या तुम जानते हो परमेश्वर क्या करने वाला है? दूसरे पतरस जैसा व्यवहार मत करो, नहीं तो स्वयं को लज्जित करोगे और तुम अपनी प्रतिष्ठा को बनाए नहीं रख पाओगे—यह किसी का कुछ भला नहीं करता है। अधिकतर व्यक्तियों का कोई असल आध्यात्मिक कद नहीं होता। हालाँकि परमेश्वर ने बहुत-से कार्य किये हैं, परन्तु उसने लोगों पर वास्तविकता प्रकट नहीं की है; यदि सही-सही कहें तो, परमेश्वर ने कभी किसी को व्यक्तिगत रूप से ताड़ना नहीं दी है। कुछ लोगों को ऐसे परीक्षणों के ज़रिए उजागर किया गया है, उनके पापी हाथ यह सोचकर दूर-दूर तक पहुँच रहे थे कि परमेश्वर का फायदा उठाना आसान है, वे जो चाहे कर सकते हैं। चूँकि वे इस प्रकार के परीक्षण का भी सामना करने के योग्य नहीं हैं, अधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षणों का तो सवाल ही नहीं उठता है, वास्तविकता के होने का भी सवाल नहीं उठता। क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं है? वास्तविकता रखना ऐसा कुछ नहीं है जिसमें जालसाजी की जा सके, और न ही यह ऐसा कुछ है, जिसे तुम जान कर प्राप्त कर सकते हो। यह तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद पर निर्भर है, और यह इस बात पर भी निर्भर है कि तुम समस्त परीक्षणों का सामना करने के योग्य हो या नहीं। क्या तुम समझते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 430

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन में प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? राज्य के अच्छे सैनिक उन लोगों के समूह के रूप में प्रशिक्षित नहीं होते जो मात्र वास्तविकता की बातें करते हैं या डींगें मारते हैं; बल्कि वे हर समय परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, ताकि किसी भी असफलता को सामने पाकर वे झुके बिना लगातार परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकें और वे फिर से संसार में न जाएँ। इसी वास्तविकता के विषय में परमेश्वर बात करता है; और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसके कोई वास्तविक मायने नहीं हैं। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके। वह वास्तविकता जिसे मनुष्य समझता है, बहुत ही छिछली है, इसका कोई मूल्य नहीं है, यह परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकती। यह अत्यधिक तुच्छ है और उल्लेख किए जाने के योग्य तक नहीं है। इसमें बहुत कमी है और यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से बहुत ही दूर है। तुममें से प्रत्येक व्यक्ति की यह देखने के लिए एक बड़ी जाँच होगी कि तुम में से कौन मात्र अपनी समझ के विषय में बात करना जानता है परन्तु मार्ग नहीं दिखा पाता, और यह देखने के लिए कि तुम में से कौन अनुपयोगी कूड़ा-करकट है। इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना; मात्र अभ्यास के मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारी समझ कोई मार्ग है, तो इसके अनुसार जो कहना है मुक्त रूप से कहो; यदि यह मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ और बात करना बन्द कर दो! जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है। तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को जलाने के लिए समझदारी की बातें करते हो। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? अगर अनुभव करने के बाद तुम समझदारी की बातें करोगे तो तुम्हें डींगें मारने वाला नहीं कहा जायेगा, अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे जो घमण्ड की बातें करता रहता है। तुम्हारे वास्तविक अनुभव में ऐसी अनेक बातें हैं जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते और तुम अपनी देह से विद्रोह नहीं कर सकते; तुम हमेशा वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, कभी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करते, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की हिम्मत है। तुम बेशर्म हो! तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ की बात करने की हिमाकत करते हो—तुम कितने ढीठ हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के अभ्यस्त हो चुके हो। जब कभी भी तुम बात करना चाहते हो तो तुम सरलता से ऐसा कर लेते हो और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम साज-सज्जा में डूब जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम मनुष्यों को मूर्ख बना सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्यों को पता नहीं होता और न ही उनमें पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारा समर्थन करें, तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुम में वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और तुम इसे सह नहीं पाओगे। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? "उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो; अभी से अभ्यास आरम्भ करना सर्वोत्तम है।" क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसे बिल्कुल नहीं समझते? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 431

तुम लोगों को वे सबक सीखने चाहिए जो अधिक यथार्थवादी हैं। उन ऊँची-ऊँची, खोखली बातों की कोई आवश्यकता नहीं है जिनकी लोग प्रशंसा करते हैं। जब ज्ञान के बारे में चर्चा करने की बात आती है, तब हर व्यक्ति पिछले से बढ़कर है, लेकिन तब भी उनके पास अभ्यास करने का मार्ग नहीं है। कितने लोगों ने अभ्यास के सिद्धांतों को समझ लिया है? कितनों ने वास्तविक सबक सीख लिए हैं? वास्तविकता के बारे में कौन सहभागिता कर सकता है? परमेश्वर के वचनों के ज्ञान की बात कर पाने का यह अर्थ यह नहीं कि तू वास्तविक आध्यात्मिक कद से युक्त है; यह बस इतना ही दिखाता है कि तू जन्म से चतुर था, और तू प्रतिभाशाली है। अगर तू मार्ग नहीं दिखा सकता तो परिणाम कुछ नहीं निकलेगा, और तू निकम्मा इंसान होगा! यदि तू अभ्यास करने के लिए वास्तविक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह सकता तो क्या तू ढोंग नहीं कर रहा है? यदि तू अपने वास्तविक अनुभव दूसरों को नहीं दे सकता है, जिनसे उन्हें सीखने के लिए सबक या अनुसरण के लिए मार्ग मिल सके, तो क्या तू धोखा नहीं दे रहा है? क्या तू पाखंडी नहीं है? तेरा क्या मूल्य है? ऐसा व्यक्ति केवल "समाजवाद के सिद्धांत के आविष्कारक" की भूमिका अदा कर सकता है, "समाजवाद लाने वाले योगदाता" की नहीं। वास्तविकता से रहित होना सत्य से युक्त नहीं होना है। वास्तविकता से रहित होना निकम्मा होना है। वास्तविकता से रहित होना चलती-फिरती लाश होना है। वास्तविकता से रहित होना "मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारक" होना है जिसका कोई संदर्भ मूल्य नहीं होता। मैं तुममें से प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि सिद्धांत के बारे में मुँह बंद करो और कुछ वास्तविक, कुछ सच्ची और ठोस चीज़ के बारे में बात करो; कुछ "आधुनिक कला" का अध्ययन करो, कुछ यथार्थवादी कहो, कुछ वास्तविक योगदान करो, और कुछ समर्पण की भावना रखो। जब तुम बोलो, वास्तविकता का सामना करो; लोगों को प्रसन्न महसूस करवाने या चौंकाकर अपने पर उनका ध्यान दिलाने के लिए अवास्तविक और अतिरंजित वार्ता में लिप्त मत होओ। उसमें मोल कहाँ है? अपने प्रति लोगों से उत्साहपूर्ण बर्ताव करवाने का क्या औचित्य है? अपनी बातचीत में थोड़ा "कलात्मक" बनो, अपने आचरण में थोड़ा और निष्पक्ष बनो, चीज़ों को संभालने के अपने तरीक़े में थोड़ा और तर्कसंगत बनो, तुम जो कहते हो उसमें थोड़ा और व्यवहारिक बनो, अपने हर कार्य से परमेश्वर के घर को लाभ पहुँचाने की सोचो, भावुक होने पर अपनी अंतरात्मा की सुनो, दयालुता का मूल्य घृणा से न चुकाओ या दयालुता के प्रति कृतघ्न न बनो, और पाखंडी मत बनो, कहीं ऐसा न हो कि तुम बुरा प्रभाव बन जाओ। जब तुम परमेश्वर के वचन खाओ और पिओ, तो उन्हें वास्तविकता के साथ अधिक घनिष्ठता से जोड़ो, और जब तुम संगति करो, तब यथार्थवादी चीज़ों के बारे में अधिक बोलो। दूसरों को नीचा न दिखाओ; यह परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करेगा। दूसरों के साथ अपनी बातचीत में थोड़ा अधिक सहिष्णु, थोड़ा अधिक लचीला, थोड़ा अधिक उदार बनो, और "खुले विचारों वाले और उदार-हृदय व्यक्ति"[क] से सीखो। जब तुम्हारे मन में बुरे विचार आएँ, तब देहसुख त्यागने का अधिक अभ्यास करो। जब तुम कार्य कर रहे होते हो, तब यथार्थवादी मार्गों के बारे में अधिक बोलो, और बहुत ऊँचाई पर न चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी बातें लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाएँगी। आनंद कम, योगदान अधिक—अपनी निःस्वार्थ समर्पण की भावना दिखाओ। परमेश्वर के प्रयोजनों के प्रति अधिक विचारशील बनो, अपनी अंतरात्मा की अधिक सुनो, अधिक सचेत बनो और यह न भूलो कि परमेश्वर हर दिन तुम लोगों से कितने धैर्य और गंभीरता से कैसे बात करता है। "पुराने पंचांग" को बार-बार पढ़ो। बार-बार अधिक प्रार्थना और अधिक संगति करो। इतने संभ्रमित होना बंद करो; कुछ अधिक समझ दिखाओ और कुछ अंतर्दृष्टि प्राप्त करो। ज्यों ही तुम्हारा पापी हाथ बढ़े, वापस पीछे खींच लो; इसे इतना आगे जाने ही न दो। किसी काम का नहीं, और परमेश्वर से तुम्हें शापों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए होशियार रहो। अपने हृदय को दूसरों पर तरस खाने दो, और हमेशा हाथ में अस्त्र लेकर टूट मत पड़ो। दूसरों की मदद करने की भावना बनाए रखते हुए, सत्य के ज्ञान के बारे में अधिक संगति और जीवन के बारे में अधिक बात करो। अधिक करो और कम बोलो। अभ्यास में अधिक और अनुसंधान तथा विश्लेषण पर कम ध्यान दो। पवित्र आत्मा द्वारा अपने को अधिक प्रेरित होने दो, और परमेश्वर को तुम्हें पूर्ण करने के अधिक अवसर दो। मानवीय तत्त्वों को अधिक मिटाओ; तुम अब भी चीज़ों को करने के बहुत सारे मानवीय तरीक़ों से युक्त हो, और चीजों को करने का तुम्हारा उथला तरीक़ा और व्यवहार अब भी दूसरों के लिए घृणास्पद है : इनमें से और अधिक मिटा दो। तुम्हारी मनःस्थिति अब भी बहुत घृणास्पद है। इसे सुधारने में अधिक समय लगाओ। तुम लोगों को अब भी बहुत प्रतिष्ठा देते हो; परमेश्वर को अधिक प्रतिष्ठा दो, और इतने अविवेकी न बनो। "मंदिर" हमेशा से परमेश्वर का है, और लोगों को उस पर कब्ज़ा नहीं करना चाहिए। संक्षेप में, धार्मिकता पर अधिक और भावनाओं पर कम ध्यान केंद्रित करो। देहसुख को मिटा देना ही सर्वश्रेष्ठ है; वास्तविकता के बारे में अधिक और ज्ञान के बारे में कम बात करो; मुँह बंद रखना और कुछ न कहना ही सर्वश्रेष्ठ है। अभ्यास के मार्ग की अधिक बात करो, और बेकार की डींगें कम हाँको। सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि इसी समय अभ्यास करना आरंभ कर दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

फुटनोट :

क. प्रधानमंत्री की भावना : प्राचीन चीनी कहावत जिसका प्रयोग खुले विचारों वाले और उदार-हृदय व्यक्ति का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 432

लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उतनी बहुत ऊँची भी नहीं हैं। यदि वे थोड़ा भी प्रयास करें, तो "उत्तीर्ण श्रेणी" प्राप्त कर लेंगे। वास्तव में, सत्य को समझना, जानना, और बूझना सत्य का अभ्यास करने से अधिक जटिल है। सत्य को जानना और बूझना सत्य का अभ्यास करने के बाद आता है; यह वही सोपान और तरीका है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। तुम पालन कैसे नहीं कर सकते? क्या तुम अपने तरीके से चीजें करके पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो? पवित्र आत्मा तुम्हारी इच्छा से कार्य करता है या परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हारी कमियों के आधार पर कार्य करता है? यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो बेकार है। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और वास्तविक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है। इसलिए वास्तविक रूप में विद्यमान समस्याओं की अधिक बात कर। अन्य लोगों के अनुभवों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह मत बरत और उन्हें ऊँचा थामकर रख ताकि दूसरे प्रशंसा कर पाएँ; तुझे अपना विशिष्ट मुक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

यदि तुम जो संगति करते हो वह लोगों को चलने के लिए मार्ग दे सकती है, तो यह तुम्हारे वास्तविकता से युक्त होने के बराबर है। तुम चाहे जो कहो, तुम्हें लोगों को अभ्यास में लाना और उन सभी को एक मार्ग देना चाहिए जिसका वे अनुसरण कर सकें। उन्हें केवल ज्ञान ही मत पाने दो; अधिक महत्वपूर्ण चलने के लिए मार्ग का होना है। लोग परमेश्वर में विश्वास करें, इसके लिए उन्हें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में दिखाए गए मार्ग पर चलना चाहिए। अर्थात, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया पवित्र आत्मा द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने की प्रक्रिया है। तदनुसार, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए जिस पर तुम चल सको, फिर चाहे जो हो, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के मार्ग पर चलना चाहिए। बहुत अधिक पीछे मत छूट जाओ, और बहुत सारी चीज़ों की चिंता में मत पड़ो। यदि तुम बाधाएँ उत्पन्न किए बिना परमेश्वर द्वारा दिखाए मार्ग पर चलते हो, तभी तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग पा सकते हो। यही परमेश्वर के प्रयोजनों के अनुरूप होना और मानवता का कर्तव्य पूरा करना माना जाता है। इस धारा का व्यक्ति होने के नाते, प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करना चाहिए, वह और अधिक करना चाहिए जो लोगों को करना चाहिए, और मनमाने ढंग से काम नहीं करना चाहिए। कार्य कर रहे लोगों को अपने शब्द स्पष्ट करने चाहिए, अनुसरण कर रहे लोगों को कठिनाइयों का सामना करने और आज्ञापालन करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए, सभी को अपनी भूमिका तक सीमित रहना चाहिए और सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कैसे अभ्यास करना है और क्या कार्य पूरा करना है। पवित्र आत्मा द्वारा दिखाया गया मार्ग लो; भटक मत जाना या ग़लती मत करना। तुम्हें आज का कार्य स्पष्ट रूप से देखना चाहिए। तुम लोगों को कार्य करने के आज के साधनों में प्रवेश करने का अभ्यास करना चाहिए। सबसे पहले तुम्हें इसी में प्रवेश करना चाहिए। दूसरी चीज़ों पर और अधिक शब्द बर्बाद मत करो। आज परमेश्वर के घर का कार्य करना तुम लोगों की ज़िम्मेदारी है, आज की कार्य-पद्धति में प्रवेश करना तुम लोगों का कर्तव्य है, और आज के सत्य का अभ्यास करना तुम लोगों का भार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 433

परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है : उसका समस्त कार्य व्यावहारिक है, उसके द्वारा कहे जाने वाले सभी वचन व्यावहारिक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सभी सत्य व्यावहारिक हैं। हर वह चीज़, जो उसका वचन नहीं है, खोखली, अस्तित्वहीन और अनुचित है। आज पवित्र आत्मा परमेश्वर के वचनों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए उपलब्ध है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश करना है, तो उन्हें वास्तविकता को खोजना चाहिए, और वास्तविकता को जानना चाहिए, जिसके बाद उन्हें वास्तविकता का अनुभव करना चाहिए और वास्तविकता को जीना चाहिए। लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उतना ही अधिक वे यह पहचानने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के शब्द वास्तविक हैं या नहीं; लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उनमें धारणाएँ उतनी ही कम होती हैं; लोग वास्तविकता का जितना अधिक अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे वास्तविकता के परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के बंधन से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों के उतना ही अधिक निकट होते हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, वे वो लोग होते हैं जिनमें वास्तविकता होती है, जो वास्तविकता को जानते हैं और जो वास्तविकता का अनुभव करके परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जान गए हैं। तुम परमेश्वर के साथ व्यावहारिक ढंग से जितना अधिक सहयोग करोगे और अपने शरीर को जितना अधिक अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे, और इस तरह तुम्हें परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का उतना ही अधिक ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रह पाओ, तो तुम्हें अभ्यास का वर्तमान मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में अधिक सक्षम हो जाओगे। आज केंद्रबिंदु वास्तविकता है : लोगों में जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और परमेश्वर की इच्छा की उनकी समझ अधिक बड़ी होगी। वास्तविकता सभी शब्दों और वादों पर विजय पा सकती है, यह समस्त सिद्धांतों और विशेषज्ञताओं पर विजय पा सकती है, और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और उसके वचनों के लिए भूखे एवं प्यासे होते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम्हारा जीवन-दर्शन, धार्मिक धारणाएँ एवं प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने से स्वाभाविक रूप से मिट जाएगा। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनके द्वारा अलौकिक चीज़ों की खोज किए जाने की संभावना है, और वे आसानी से छले जाएँगे। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य करने का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।

पवित्र आत्मा तुममें तभी कार्य कर सकता है, जब तुम वास्तव में सीखते हो, वास्तव में खोजते हो, वास्तव में प्रार्थना करते हो, और सत्य की खोज के वास्ते दुःख उठाने को तैयार होते हो। जो सत्य की खोज नहीं करते, उनके पास शब्दों और वादों, और खोखले सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं होता, और जो सत्य से रहित होते हैं, उनमें परमेश्वर के बारे में स्वाभाविक रूप से अनेक धारणाएँ होती हैं। ऐसे लोग परमेश्वर से केवल यही लालसा करते हैं कि वह उनकी भौतिक देह को आध्यात्मिक देह में बदल दे, ताकि वे तीसरे स्वर्ग में आरोहित हो सकें। ये लोग कितने मूर्ख हैं! ऐसी बातें कहने वाले सभी लोगों को परमेश्वर का या वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं होता; ऐसे लोग संभवतः परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं कर सकते, और केवल निष्क्रिय रहकर प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि लोगों को सत्य को समझना है, और सत्य को स्पष्ट रूप से देखना है, और इससे भी बढ़कर, यदि उन्हें सत्य में प्रवेश करना है, और उसे अभ्यास में लाना है, तो उन्हें वास्तव में सीखना चाहिए, वास्तव में खोजना चाहिए, और वास्तव में भूखा एवं प्यासा होना चाहिए। जब तुम भूखे और प्यासे होते हो, जब तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा निश्चित रूप से तुम्हें स्पर्श करेगा और तुम्हारे भीतर कार्य करेगा, वह तुममें और अधिक प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हें वास्तविकता का और अधिक ज्ञान देगा, और तुम्हारे जीवन के लिए और अधिक सहायक होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 434

यदि लोगों को परमेश्वर को जानना है, तो सबसे पहले उन्हें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है, और उन्हें परमेश्वर के वचनों को, देह में परमेश्वर के व्यावहारिक प्रकटन को और परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य को अवश्य जानना चाहिए। यह जानने के बाद ही कि परमेश्वर का समस्त कार्य व्यावहारिक है, तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करने में समर्थ हो सकोगे, और केवल इसी मार्ग से तुम अपने जीवन में वृद्धि हासिल कर सकोगे। जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उन सभी के पास परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने का कोई उपाय नहीं है, वे अपनी धारणाओं में उलझे हुए हैं, अपनी कल्पनाओं में जीते हैं, और इस प्रकार उन्हें परमेश्वर के वचनों का कोई ज्ञान नहीं है। वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान जितना अधिक होता है, तुम परमेश्वर के उतने ही निकट होते हो, और तुम उसके उतने ही अधिक अंतरंग होते हो; और तुम जितना अधिक अस्पष्टता, अमूर्तता तथा वाद की खोज करते हो, तुम परमेश्वर से उतने ही दूर भटक जाओगे, और इसलिए तुम उतना ही अधिक महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचनों को अनुभव करना श्रमसाध्य एवं कठिन है, और तुम प्रवेश करने में अक्षम हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में, और अपने आध्यात्मिक जीवन के सही पथ पर प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले वास्तविकता को जानना और अपने आपको अस्पष्ट एवं अलौकिक चीज़ों से पृथक करना चाहिए, जिसका अर्थ है कि सबसे पहले तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा वास्तव में किस प्रकार तुम्हें प्रबुद्ध करता है और भीतर से किस प्रकार तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। इस तरह, यदि तुम सचमुच मनुष्य के भीतर पवित्र आत्मा के वास्तविक कार्य को समझ सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के सही पथ पर प्रवेश कर चुके होगे।

आज, हर चीज़ वास्तविकता से शुरू होती है। परमेश्वर का कार्य सर्वाधिक वास्तविक है, और लोगों द्वारा स्पर्श किया जा सकता है; लोग उसे अनुभव कर सकते हैं, और प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में बहुत-कुछ अज्ञात और अलौकिक है, जो उन्हें परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानने से रोकता है। इस प्रकार, वे अपने अनुभवों में हमेशा भटक जाते हैं, और हमेशा महसूस करते हैं कि चीज़ें कठिन हैं, और यह सब उनकी धारणाओं के कारण होता है। लोग पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझने में असमर्थ हैं, वे वास्तविकता को नहीं जानते, इसलिए वे प्रवेश के अपने मार्ग में हमेशा नकारात्मक होते हैं। वे परमेश्वर की अपेक्षाओं को दूर से देखते हैं, उन्हें हासिल करने में असमर्थ होते हैं; वे मात्र यह देखते हैं कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं, किंतु प्रवेश का मार्ग नहीं खोज पाते। पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के द्वारा काम करता है : लोगों के सहयोग से, उनके द्वारा सक्रियतापूर्वक परमेश्वर की प्रार्थना करने, उसे खोजने और उसके अधिक निकट आने से परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं, और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि पवित्र आत्मा एकतरफ़ा कार्य करता है, या मनुष्य एकतरफ़ा कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही अधिक बड़ा होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ जुड़कर लोगों का वास्तविक सहयोग ही परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव और सारभूत ज्ञान उत्पन्न कर सकता है। इस तरह अनुभव करके, धीरे-धीरे, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति बनता है। परमेश्वर अलौकिक काम नहीं करता; लोगों की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब-कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रिय रहकर प्रतीक्षा करते हैं, वे न तो परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, और न ही प्रार्थना करते हैं, और पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा मात्र करते रहते हैं। हालाँकि, जिनकी समझ सही है, वे यह मानते हैं : परमेश्वर के कार्यकलाप उतनी ही दूर तक जा सकते हैं, जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझमें परमेश्वर के कार्य का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो परमेश्वर के वचनों को खोजने और उनकी ओर बढ़ने का प्रयत्न करने के लिए मुझे वह सब करना चाहिए, जो मैं कर सकता हूँ; यही है वह, जो मुझे प्राप्त करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 435

तुम कितनी धार्मिक परम्पराओं का पालन करते हो? कितनी बार तुमने परमेश्वर के वचन के खिलाफ विद्रोह किया है और अपने तरीके से चले हो? कितनी बार तुम परमेश्वर के वचनों को इसलिए अभ्यास में लाए हो क्योंकि तुम उसके भार के बारे में सच में विचारशील हो और उसकी इच्छा पूरी करना चाहते हो? परमेश्वर के वचन को समझो और उसे अभ्यास में लाओ। अपने सारे कामकाज में सिद्धांतवादी बनो, इसका अर्थ नियम में बंधना या बेमन से बस दिखावे के लिए ऐसा करना नहीं है; बल्कि, इसका अर्थ सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के वचन में जीवन व्यतीत करना है। केवल इस प्रकार का अभ्यास ही परमेश्वर को संतुष्ट करता है। जो काम परमेश्वर को प्रसन्न करता हो वह कोई नियम नहीं बल्कि सत्य का अभ्यास होता है। कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और पूरी तरह अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु वह बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। अगर कभी इस तरह के हालात पैदा हों, तो वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध जाकर नहीं बोलता है या कार्य नहीं करता। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, जब कोई बात होती है तो वह अपनी बुद्धि से कार्य करता है और अपने सिद्धांतों पर टिका रहता है। इस तरह का व्यक्ति ही सच्ची सेवा कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ज़बानी जमा खर्च करते हैं; दिनभर चिंता में भौंहें चढ़ाए अपना समय गँवाते रहते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछो कि "क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं, कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं को पसंद करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन-सी भलाई हो सकती है? कुछ लोग अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय अपनी अनुग्रहशीलता का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूसी करते हैं। क्या यह तौर-तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए, और एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में जिये। उसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, और वो जहाँ भी जाए, वहीँ गवाही दे; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे अभ्यास दिखावे के लिए करते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटारे और कष्टों से गुज़रना चाहिए। जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर का विश्वास है, वे ऊपरी तौर पर दूसरों से अलग नहीं दिखते, किन्तु उनके कामकाज प्रशंसनीय होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाला इंसान समझा जा सकता है। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंतत:, तुम नियमों और सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक पाखंडी होते हैं।

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इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों में जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, और वे आत्मिक हैं, किन्तु सच में वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज़ तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर नापसंद और अस्वीकार करता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज़्यादा पाखंडी बन जाओगे। जितने ज़्यादा पाखंडी बनोगे, उतने ही ज़्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से हटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 436

एक सामान्य व्यक्ति की समानता को पुनर्स्थापित करने के लिए, अर्थात् सामान्य मनुष्यत्व को प्राप्त करने के लिए लोग केवल अपने शब्दों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। ऐसा करके वे स्वयं को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, और इससे उनके प्रवेश या परिवर्तन को कोई लाभ नहीं पहुँचता। अतः परिवर्तन लाने के लिए लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके अभ्यास करना चाहिए। उन्हें धीरे-धीरे प्रवेश करना चाहिए, थोड़ा-थोड़ा करके खोजना और जांचना चाहिए, सकारात्मकता से प्रवेश करना चाहिए, और सत्य का व्यवहारिक जीवन जीना चाहिए; अर्थात एक संत का जीवन जीना चाहिए। उसके बाद, वास्तविक विषय, वास्तविक घटनाएँ और वास्तविक वातावरण से लोगों को व्यवहारिक प्रशिक्षण मिलता है। लोगों से झूठे दिखावे की अपेक्षा नहीं की जाती; उन्हें वास्तविक वातावरण में प्रशिक्षण पाना है। पहले लोगों को यह पता चलता है कि उनमें क्षमता की कमी है, और फिर वे सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, प्रवेश करते हैं और सामान्य रूप से अभ्यास भी करते हैं; केवल इसी तरीके से वे वास्तविकता को प्राप्त कर सकते हैं, और इसी प्रकार से प्रवेश और भी अधिक तेजी से हो सकता है। लोगों को परिवर्तित करने के लिए, कुछ व्यवहारिकता होनी ही चाहिए; उन्हें वास्तविक विषयों के साथ, वास्तविक घटनाओं के साथ और वास्तविक वातावरण में अभ्यास करना चाहिए। क्या कोई केवल कलीसियाई जीवन पर निर्भर रहकर सच्चा प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है? क्या लोग इस तरह वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? नहीं! यदि लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करने में असमर्थ हैं, तो वह कार्य करने और जीवन जीने के पुराने तरीकों को बदलने में भी असमर्थ हैं। यह पूरी तरह से लोगों के आलस्य या उनकी अत्यधिक निर्भरता के कारण ही नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य में जीवन जीने की क्षमता नहीं है, और इससे भी बढ़कर, उनमें परमेश्वर के सामान्य मनुष्य की समानता के स्तर की समझ नहीं है। अतीत में, लोग हमेशा बात करते थे, बोलते थे, संवाद करते थे, यहाँ तक की वे "वक्ता" भी बन गए थे; लेकिन फिर भी उनमें से किसी ने भी जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश नहीं की; इसके बजाय, वे आँख मूंदकर गहन सिद्धांतों को खोजते रहे। अतः, आज के लोगों को अपने जीवन में परमेश्वर में विश्वास रखने के इस धार्मिक तरीके को बदलना चाहिए। उन्हें एक घटना, एक चीज़, एक व्यक्ति पर ध्यान देते हुए अभ्यास करना चाहिए। उन्हें यह काम पूरे ध्यान से करना चाहिए—तभी वे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में बदलाव उनके सार में बदलाव से आरंभ होता है। कार्य का लक्ष्य लोगों का सार, उनका जीवन, उनका आलस्य, निर्भरता, और दासत्व होना चाहिए, केवल इस तरीके से वे परिवर्तित हो सकते हैं।

यद्यपि कलीसियाई जीवन कुछ क्षेत्रों में परिणाम ला सकता है, परंतु कुंजी अभी भी यही है कि वास्तविक जीवन लोगों को परिवर्तित कर सकता है। इंसान की पुरानी प्रकृति वास्तविक जीवन के बिना परिवर्तित नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में यीशु के कार्य को लो। जब यीशु ने पुराने नियमों को हटाकर नए युग की आज्ञाएँ स्थापित कीं, तो उसने वास्तविक जीवन के असल उदाहरणों का इस्तेमाल किया। जब यीशु अपने चेलों को सब्त के दिन गेहूँ के खेत से होते हुए ले जा रहा था, तो उसके चेलों ने भूख लगने पर गेहूं की बालें तोड़कर खाईं। फरीसियों ने यह देखा तो वे बोले कि उन्होंने सब्त का पालन नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को सब्त के दिन गड्ढे में गिरे बछड़ों को बचाने की अनुमति भी नहीं है, उनका कहना था कि सब्त के दिन कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए। यीशु ने नए युग की आज्ञाओं को धीरे-धीरे लागू करने के लिए इन घटनाओं का प्रयोग किया। उस समय, लोगों को समझाने और परिवर्तित करने के लिए उसने बहुत से व्यवहारिक विषयों का प्रयोग किया। पवित्र आत्मा इसी सिद्धांत से कार्य करता है, और केवल यही तरीका है जो लोगों को बदल सकता है। व्यवहारिक विषयों के ज्ञान के बिना, लोग केवल सैद्धांतिक और बौद्धिक समझ ही प्राप्त कर सकते हैं—यह परिवर्तन का प्रभावी तरीका नहीं है। तो इंसान प्रशिक्षण से बुद्धि और अंतर्दृष्टि कैसे प्राप्त कर सकता है? क्या लोग केवल सुनकर, पढ़कर और अपने ज्ञान को बढ़ाकर बुद्धि और अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है? लोगों को वास्तविक जीवन में समझना और अनुभव करना चाहिए! अतः इंसान को प्रशिक्षण लेना चाहिए और उसे वास्तविक जीवन से हटना नहीं चाहिए। लोगों को विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और भिन्न पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए : शैक्षणिक स्तर, अभिव्यक्ति, चीजों को देखने की योग्यता, विवेक, परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता, व्यवहारिक ज्ञान, मनुष्यजाति के नियम, और मनुष्यजाति से संबंधित अन्य बातें वो चीज़ें हैं जिनसे लोगों को परिपूर्ण होना चाहिए। समझ प्राप्त करने के बाद लोगों को प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए, तभी परिवर्तन किया जा सकता है। यदि किसी ने समझ प्राप्त कर ली है परंतु फिर भी वह अभ्यास की उपेक्षा करता है, तो परिवर्तन कैसे हो सकता है? लोग बहुत कुछ समझते हैं, परंतु वह वास्तविकता को नहीं जीते; इसलिए उनके पास परमेश्वर के वचनों की केवल थोड़ी-सी मूलभूत समझ होती है। तुम केवल आंशिक रूप से प्रबुद्ध हुए हो; तुमने पवित्र आत्मा से केवल थोड़ा-सा प्रकाशन पाया है, फिर भी वास्तविक जीवन में तुम्हारा प्रवेश नहीं हुआ है, या शायद तुम प्रवेश की परवाह भी नहीं करते इस प्रकार, तुम्हारा परिवर्तन कम हो गया है। इतने लंबे समय के बाद, लोग बहुत कुछ समझते हैं। वे सिद्धांतों के अपने ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, परंतु उनका बाहरी स्वभाव वैसा ही रहता है, और उनकी मूल क्षमता पहले जैसी ही बनी रहती है, थोड़ी सी भी आगे नहीं बढ़ती। यदि ऐसा है तो तुम अंततः कब प्रवेश करोगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 437

कलीसियाई जीवन केवल इस प्रकार का जीवन है जहाँ लोग परमेश्वर के वचनों का स्वाद लेने के लिए एकत्र होते हैं, और यह किसी व्यक्ति के जीवन का एक छोटा-सा भाग ही होता है। यदि लोगों का वास्तविक जीवन भी कलीसियाई जीवन जैसा हो पाता, जिसमें सामान्य आत्मिक जीवन भी शामिल हो, जहाँ परमेश्वर के वचनों का सामान्य तरीके से स्वाद लिया जाए, सामान्य तरीके से प्रार्थना की जाए और परमेश्वर के निकट रहा जाए, एक ऐसा वास्तविक जीवन जिया जाए जहाँ सबकुछ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, एक ऐसा वास्तविक जीवन जिया जाए जहाँ सब कुछ सत्य के अनुसार हो, प्रार्थना करने का और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, भक्तिगीत गाने और नृत्य का अभ्यास करने का वास्तविक जीवन जिया जाए, तो ऐसा जीवन ही लोगों को परमेश्वर के वचनों के जीवन में लेकर आएगा। अधिकाँश लोग केवल अपने कलीसियाई जीवन के कुछ घंटों पर ही ध्यान देते हैं, और वे उन घंटों से बाहर अपने जीवन की "सुधि" नहीं रखते, मानो उससे उनको कोई लेना-देना न हो। ऐसे भी कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, भजन गाते या प्रार्थना करते समय ही संतों के जीवन में प्रवेश करते हैं, उसके बाद वे उस समय से बाहर अपने पुराने व्यक्तित्व में लौट जाते हैं। इस तरह का जीवन लोगों को बदल नहीं सकता उन्हें परमेश्वर को जानने तो बिलकुल नहीं दे सकता। परमेश्वर पर विश्वास करने में, यदि लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन की चाहत रखते हैं, तो उन्हें अपने आपको वास्तविक जीवन से अलग नहीं करना चाहिए। नियमित परिवर्तन को प्राप्त करने से पहले तुम्हें वास्तविक जीवन में स्वयं को जानने की, स्वयं को त्यागने की, सत्य का अभ्यास करने की, और साथ ही सब बातों में सिद्धांतों, व्यवहारिक ज्ञान और हर बात में अपने आचरण के नियमों को समझने की आवश्यकता है। यदि तुम केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ही ध्यान देते हो, और वास्तविकता की गहराई में प्रवेश किए बिना, वास्तविक जीवन में प्रवेश किये बिना धार्मिक अनुष्ठानों के बीच ही जीते हो, तो तुम कभी भी वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे, तुम कभी स्वयं को, सत्य को या परमेश्वर को नहीं जान पाओगे, और तुम सदैव अंधे और अज्ञानी ही बने रहोगे। लोगों को बचाने का परमेश्वर का कार्य उन्हें छोटी अवधि के बाद सामान्य मानवीय जीवन जीने देने के लिए नहीं है, न ही यह उनकी त्रुटिपूर्ण धारणाओं और सिद्धांतों को परिवर्तित करने के लिए है। बल्कि, परमेश्वर का उद्देश्य लोगों के पुराने स्वभावों को बदलना है, उनके जीवन के पुराने तरीकों की समग्रता को बदलना है, और उनकी सारी पुरानी विचारधाराओं और उनके मानसिक दृष्टिकोण को बदलना है। केवल कलीसियाई जीवन पर ध्यान देने से मनुष्य के जीवन की पुरानी आदतें या लंबे समय तक वे जिस तरीके से जिए हैं, वे नहीं बदलेंगे। कुछ भी हो, लोगों को वास्तविक जीवन से अलग नहीं होना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन जिएँ; वे वास्तविक जीवन में सत्य को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन में; वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न कि केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इंसान को सबकुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर में विश्वास रखने में, लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करके खुद को न जान पाएँ, और वे वास्तविक जीवन में सामान्य इंसानियत को न जी पाएँ, तो वे विफल हो जाएँगे। जो लोग परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते, वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं, परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति को जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु सिद्धांतों को जीते हैं। जो लोग वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परंतु वे उसके द्वारा घृणित और अस्वीकृत माने जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, अवज्ञाकारिता, और अज्ञानता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक स्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और इससे ही तुम अपनी दशा को सचमुच समझ सकते हो और स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त कर सकते हो।

अब जबकि लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से आरंभ हो चुकी है, इसलिए तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करना चाहिए। अतः परिवर्तन पाने के लिए तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश से आरंभ करना चाहिए और थोड़ा-थोड़ा करके परिवर्तित होना चाहिए। यदि तुम सामान्य मानवीय जीवन को नजरअंदाज करते हो और केवल आत्मिक विषयों के बारे में बात करते हो, तो चीज़ें शुष्क और सपाट हो जाती हैं; वे बनावटी हो जाती हैं, तो फिर लोग कैसे परिवर्तित हो सकते हैं? अब तुम्हें अभ्यास करने के लिए वास्तविक जीवन में प्रवेश करने को कहा जाता है, ताकि तुम सच्चे अनुभव में प्रवेश करने की नींव को स्थापित करो। लोगों को जो करना चाहिए यह उसका एक पहलू है। पवित्र आत्मा का कार्य मुख्य रूप से मार्गदर्शन करना है, जबकि बाकी कार्य लोगों के अभ्यास और प्रवेश पर निर्भर करता है। प्रत्येक व्यक्ति इस रीति से विभिन्न मार्गों से वास्तविक जीवन में प्रवेश कर सकता है, जिससे कि वह परमेश्वर को वास्तविक जीवन में ला सके और वास्तविक सामान्य मनुष्यत्व को जी सके। केवल यही अर्थपूर्ण जीवन है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 438

पहले यह कहा जाता था कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना और पवित्र आत्मा का कार्य पाना भिन्न-भिन्न हैं। पवित्र आत्मा की उपस्थिति होने की सामान्य अवस्था सामान्य विचारों, सामान्य विवेक और सामान्य मानवता होने में व्यक्त होती है। व्यक्ति का चरित्र वैसा ही रहेगा, जैसा वह हुआ करता था, किंतु उसके भीतर शांति होगी, और बाह्य रूप से उनमें संत की शिष्टता होगी। वे ऐसे ही होंगे, जब पवित्र आत्मा उनके साथ होता है। जब किसी के पास पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है, तो उसकी सोच सामान्य होती है। जब वे भूखे होते हैं तो वे खाना चाहते हैं, जब वे प्यासे होते हैं तो वे पानी पीना चाहते हैं। ... सामान्य मानवता की ये अभिव्यक्तियाँ पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता नहीं हैं, यह लोगों की सामान्य सोच और पवित्र आत्मा की उपस्थिति होने की सामान्य अवस्था है। कुछ लोग गलती से यह मानते हैं कि जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है, उन्हें भूख नहीं लगती, उन्हें थकान महसूस नहीं होती, और वे परिवार के बारे में सोचते प्रतीत नहीं होते, उन्होंने अपने आप को देह से लगभग पूरी तरह से अलग कर लिया होता है। वास्तव में, जितना अधिक पवित्र आत्मा लोगों के साथ होता है, उतना अधिक वे सामान्य होते हैं। वे परमेश्वर के लिए कष्ट उठाना और चीज़ों को त्यागना, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना जानते हैं; इसके अलावा, वे भोजन और वस्त्रों पर विचार करते हैं। दूसरे शब्दों में, उन्होंने सामान्य मानवता का ऐसा कुछ नहीं खोया होता, जो मनुष्य के पास होना चाहिए और जैसा उन्हें होना चाहिए, इसके बजाय, उनमें विवेक विशेष रूप से होता है। कभी-कभी वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं और परमेश्वर के कार्य पर विचार करते हैं; उनके हृदय में विश्वास होता है और वे सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक होते हैं। बेशक, पवित्र आत्मा का कार्य इसी बुनियाद पर आधारित है। यदि लोग सामान्य सोच से रहित हैं, तो उनके पास कोई विवेक नहीं है—यह एक सामान्य अवस्था नहीं है। जब लोगों की सोच सामान्य होती है और पवित्र आत्मा उनके साथ होता है, तो उनमें निश्चित रूप से एक सामान्य व्यक्ति का विवेक होता है, और इसलिए, उनकी अवस्था सामान्य होती है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, पवित्र आत्मा का कार्य कभी-कभार होता है, जबकि पवित्र आत्मा की उपस्थिति लगभग सतत रहती है। जब तक लोगों का विवेक और सोच सामान्य रहते हैं, और जब तक उनकी अवस्थाएँ सामान्य होती हैं, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से उनके साथ होता है। जब लोगों का विवेक और सोच सामान्य नहीं होते, तो उनकी मानवता सामान्य नहीं होती। यदि इस पल पवित्र आत्मा का कार्य तुममें है, तो पवित्र आत्मा भी निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा। किंतु यदि पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर निश्चित रूप से कार्य कर रहा है, क्योंकि पवित्र आत्मा विशेष समयों पर कार्य करता है। पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना केवल लोगों के सामान्य अस्तित्व को बनाए रख सकता है, किंतु पवित्र आत्मा केवल निश्चित समयों पर ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कोई अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो जब तुम कलीसिया को सिंचन और आपूर्ति प्रदान करते हो, तब पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध करेगा, जो दूसरों के लिए शिक्षाप्रद होंगे और जो तुम्हारे भाइयों-बहनों की कुछ व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकते है—ऐसे समय पर पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कभी-कभी जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी रहे होते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध कर देता है, जो तुम्हारे अनुभवों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक होते हैं, जो तुम्हें अपनी खुद की अवस्थाओं का अधिक ज्ञान प्राप्त करने देते हैं; यह भी पवित्र आत्मा का कार्य है। कभी-कभी, जैसे मैं बोलता हूँ, तुम लोग सुनते हो, और मेरे वचनों से अपनी अवस्थाओं को मापने में सक्षम होते हो, और कभी-कभी तुम द्रवित या प्रेरित हो जाते हो; यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य रहता है, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। यह पूर्णत: अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब भी ऐसे समय होते हैं जब उसे भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए—मनुष्यों की तो बात ही छोड़ दो। जो लोग बुरी आत्माओं से ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब-कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से रहित होते हैं, यातना सहने में सक्षम होते हैं और जरा-सी भी थकान महसूस नहीं करते, मानो वे देहातीत हो चुके हों। क्या यह नितांत अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्माओं का कार्य अलौकिक है और कोई मनुष्य ऐसी चीजें प्राप्त नहीं कर सकता। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है, वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं : वे कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, उनकी आस्था बहुत बड़ी है, और वे कमज़ोरी का मामूली-सा भी चिह्न प्रदर्शित नहीं करते! वास्तव में, ये सब दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्तियाँ है। क्योंकि सामान्य लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है, जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 439

अपनी गवाही में अडिग रहने का क्या अर्थ है? कुछ लोग कहते हैं कि वे बस वैसे ही अनुसरण करते हैं, जैसे अब करते हैं और इस चिंता में नहीं पड़ते कि वे जीवन प्राप्त करने में सक्षम हैं या नहीं; वे जीवन की खोज नहीं करते किंतु वे पीछे भी नहीं हटते। वे केवल यह स्वीकार करते हैं कि कार्य का यह चरण परमेश्वर द्वारा किया जा रहा है। क्या यह अपनी गवाही में विफल होना नहीं है? ऐसे लोग जीत लिए जाने की गवाही तक नहीं देते। जो लोग जीते जा चुके हैं, वे अन्य सभी की परवाह किए बिना अनुसरण करते हैं और जीवन की खोज करने में सक्षम होते हैं। वे न केवल व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हैं, बल्कि परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन करना भी जानते हैं। ऐसे हैं वे लोग, जो गवाही देते हैं। जो लोग गवाही नहीं देते, उन्होंने कभी जीवन की खोज नहीं की है और वे अभी भी अस्पष्टता के साथ अनुसरण कर रहे हैं। तुम अनुसरण कर सकते हो, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम जीते जा चुके हो, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर के आज के कार्य की कोई समझ नहीं है। जीते जाने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं। सभी अनुसरण करने वाले जीते नहीं गए हैं, क्योंकि अपने हृदय में तुम इस बारे में कुछ भी नहीं समझते कि तुम्हें आज के परमेश्वर का अनुसरण क्यों करना चाहिए, न ही तुम यह जानते हो कि तुम आज की स्थिति तक कैसे पहुँचे हो, किसने आज तक तुम्हें सहारा दिया है। परमेश्वर में विश्वास का कुछ लोगों का अभ्यास हमेशा कुंद और भ्रांत होता है; इस प्रकार, अनुसरण करने का आवश्यक रूप से यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे पास गवाही है। सच्ची गवाही वास्तव में क्या है? यहाँ कही गई गवाही के दो हिस्से हैं : एक तो जीत लिए जाने की गवाही, और दूसरी पूर्ण बना दिए जाने की गवाही (जो स्वाभाविक रूप से भविष्य के अधिक बड़े परीक्षणों और क्लेशों के बाद की गवाही होगी)। दूसरे शब्दों में, यदि तुम क्लेशों और परीक्षणों के दौरान अडिग रहने में सक्षम हो, तो तुमने दूसरे कदम की गवाही दे दी होगी। आज जो महत्वपूर्ण है, वह है गवाही का पहला कदम : ताड़ना और न्याय के परीक्षणों की हर घटना के दौरान अडिग रहने में सक्षम होना। यह जीत लिए जाने की गवाही है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह जीत का समय है। (तुम्हें पता होना चाहिए कि अब पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का समय है; पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर का मुख्य कार्य पृथ्वी पर अपना अनुसरण करने वाले लोगों के समूह को न्याय और ताड़ना के माध्यम से जीतना है)। तुम जीत लिए जाने की गवाही देने में सक्षम हो या नहीं, यह न केवल इस बात पर निर्भर करता है कि तुम बिल्कुल अंत तक अनुसरण कर सकते हो या नहीं, बल्कि, इससे भी महत्वपूर्ण रूप से यह इस बात पर निर्भर करता है कि जब तुम परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव करते हो, तो तुम परमेश्वर के ताड़ना और न्याय की सच्ची समझ प्राप्त करने में सक्षम होते हो या नहीं, और इस बात पर कि तुम इस समस्त कार्य को वास्तव में समझते हो या नहीं। बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने मात्र से तुम आगे बढ़ने में सफल नहीं हो जाओगे। तुम्हें ताड़ना और न्याय की हर घटना के दौरान स्वेच्छा से समर्पण करने में सक्षम होना चाहिए, कार्य के हर उस चरण को, जिसका तुम अनुभव करते हो, वास्तव में समझने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान प्राप्त करने और उसका आज्ञापालन करने में सक्षम होना चाहिए। यह जीत लिए जाने की परम गवाही है, जो तुम्हारे द्वारा दी जानी अपेक्षित है। जीत लिए जाने की गवाही मुख्य रूप से परमेश्वर के देहधारण के बारे में तुम्हारे ज्ञान को दर्शाती है। महत्त्वपूर्ण रूप से, इस कदम की गवाही परमेश्वर के देहधारण के लिए है। दुनिया के लोगों या सामर्थ्यवान व्यक्तियों के सामने तुम क्या करते या कहते हो, यह मायने नहीं रखता; सबसे बढ़कर जो मायने रखता है, वह यह है कि तुम परमेश्वर के मुँह से निकले सभी वचनों और उसके समस्त कार्य का पालन करने में सक्षम हो या नहीं। इसलिए, इस कदम की गवाही शैतान सहित परमेश्वर के सभी दुश्मनों—राक्षसों और विरोधियों पर निर्देशित है, जो विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर दूसरी बार देहधारण करेगा तथा और भी बड़े कार्य करने के लिए आएगा, और इसके अतिरिक्त, जो परमेश्वर के देह में वापस आने के तथ्य पर विश्वास नहीं करते। दूसरे शब्दों में, यह सभी मसीह-विरोधियों—उन सभी शत्रुओं पर निर्देशित है, जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते।

परमेश्वर के बारे में सोचना और परमेश्वर के लिए तड़पना यह साबित नहीं करता कि तुम परमेश्वर द्वारा जीते जा चुके हो; यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम यह मानते हो या नहीं कि वह देह बना हुआ वचन है, तुम यह मानते हो या नहीं कि वचन देह बन गया है, और तुम यह मानते हो या नहीं कि पवित्रात्मा वचन बन गया है और वचन देह में प्रकट हुआ है। यही प्रमुख गवाही है। यह मायने नहीं रखता कि तुम किस तरह से अनुसरण करते हो, न ही यह कि तुम अपने आप को कैसे खपाते हो; महत्वपूर्ण यह है कि तुम इस सामान्य मानवता से यह पता लगाने में सक्षम हो या नहीं कि वचन देह बन गया है और सत्य का आत्मा देह में साकार हुआ है—कि समस्त सत्य, मार्ग और जीवन देह में आ गया है, परमेश्वर के आत्मा का वास्तव में पृथ्वी पर आगमन हो गया है और आत्मा देह में आ गया है। यद्यपि, सतही तौर पर, यह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण से भिन्न प्रतीत होता है, किंतु इस कार्य से तुम और अधिक स्पष्टता से देखने में सक्षम होते हो कि पवित्रात्मा पहले ही देह में साकार हो गया है, और इसके अतिरिक्त, वचन देह बन गया है, और वचन देह में प्रकट हो गया है। तुम इन वचनों का वास्तविक अर्थ समझने में सक्षम हो : "आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था।" इसके अलावा, तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि आज का वचन परमेश्वर है, और देखना चाहिए कि वचन देह बनता है। यह सर्वोत्तम गवाही है, जो तुम दे सकते हो। यह साबित करता है कि तुम्हें परमेश्वर के देहधारण का सच्चा ज्ञान है—तुम न केवल उसे जानने में सक्षम हो, बल्कि यह भी जानते हो कि जिस मार्ग पर तुम आज चलते हो, वह जीवन का मार्ग है, और सत्य का मार्ग है। कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल "वचन परमेश्वर के साथ था" का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण ठीक-ठीक "वचन देह बनता है" के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, "वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था", को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि "आरंभ में वचन था"। कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों के सामर्थ्य और उसके अधिकार को और भी अधिक स्पष्ट करता है, और मनुष्य को परमेश्वर के सभी तरीके देखने—उसके सभी वचनों को सुनने का अवसर देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को कैसे जानते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए। चूँकि यह दूसरे देहधारण का कार्य है—और यह आख़िरी बार है जब परमेश्वर देह बना है—यह देहधारण के अर्थ को सर्वथा पूरा कर देता है, देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को पूरी तरह से कार्यान्वित और प्रकट करता है, और परमेश्वर के देह में होने के युग का अंत करता है। इसलिए तुम्हें देहधारण के अर्थ को अवश्य जानना चाहिए। यह मायने नहीं रखता कि तुम कितनी भाग-दौड़ करते हो, या तुम अन्य बाहरी मामलों को कितनी अच्छी तरह से पूरा करते हो; जो मायने रखता है, वह यह है कि तुम वास्तव में देहधारी परमेश्वर के सामने समर्पण करने और अपना पूरा अस्तित्व परमेश्वर को अर्पित करने, और उसके मुँह से निकलने वाले सभी वचनों का पालन करने में सक्षम हो या नहीं। यही है, जो तुम्हें करना चाहिए, और जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए।

गवाही का आखिरी कदम इस बात की गवाही है कि तुम पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो या नहीं—जिसका अर्थ है कि देहधारी परमेश्वर के मुँह से बोले गए सभी वचनों को समझने के बाद तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान हो जाता है और तुम उसके बारे में निश्चित हो जाते हो, तुम परमेश्वर के मुँह से निकले सभी वचनों को जीते हो और वे स्थितियाँ प्राप्त करते हो, जिनके लिए परमेश्वर तुमसे कहता है—पतरस की शैली और अय्यूब की आस्था—ऐसे कि तुम मृत्यु तक आज्ञापालन कर सको, अपने आप को पूरी तरह से उसे सौंप दो, और अंतत: ऐसे व्यक्ति की छवि प्राप्त करो जो मानक पर खरा उतरता हो, अर्थात् ऐसे व्यक्ति की छवि, जिसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद जीता और पूर्ण बनाया जा चुका हो। यही परम गवाही है—जो उस व्यक्ति द्वारा दी जानी ज़रूरी है, जिसे अंतत: पूर्ण बना दिया गया है। ये गवाही के दो कदम हैं, जो तुम लोग को उठाने चाहिए, और ये परस्पर संबंधित हैं, और दोनों में से प्रत्येक अपरिहार्य है। किंतु एक बात तुम्हें अवश्य जाननी चाहिए : आज जिस गवाही की मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ, वह न तो दुनिया के लोगों पर निर्देशित है, न ही किसी एक व्यक्ति पर, बल्कि उस पर है जो मैं तुमसे माँगता हूँ। यह इस बात से मापी जाती है कि तुम मुझे संतुष्ट करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम मेरी उन अपेक्षाओं के मानकों को सर्वथा पूरा करने में समर्थ हो या नहीं, जो मैं तुम लोगों में से प्रत्येक से करता हूँ। यही वह चीज़ है, जिसे तुम लोगों को समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 440

जब तुम थोड़ी सी बाधा या कठिनाई से पीड़ित होते हो, तो ये तुम लोगों के लिए अच्छा है; यदि तुम लोगों को एक मौज करने का समय दिया गया होता, तो तुम लोग बर्बाद हो जाते, और तब तुम्हारी रक्षा कैसे की जाती? आज तुम लोगों को इसलिए सुरक्षा दी जाती है क्योंकि तुम लोगों को दंडित किया जाता है, शाप दिया जाता है, तुम लोगों का न्याय किया जाता है। क्योंकि तुम लोगों ने काफी कष्ट उठाया है इसलिए तुम्हें संरक्षण दिया जाता है। नहीं तो, तुम लोग बहुत समय पहले ही दुराचार में गिर गए होते। यह जानबूझ कर तुम लोगों के लिए चीज़ों को मुश्किल बनाना नहीं है—मनुष्य की प्रकृति को बदलना मुश्किल है, और उनके स्वभाव को बदलना भी ऐसा ही है। आज, तुम लोगों के पास वो समझ भी नहीं है जो पौलुस के पास थी, और न ही तुम लोगों के पास उसका आत्म-बोध है। तुम लोगों की आत्माओं को जगाने के लिए तुम लोगों पर हमेशा दबाव डालना पड़ता है, और तुम लोगों को हमेशा ताड़ना देनी पड़ती है और तुम्हारा न्याय करना पड़ता है। ताड़ना और न्याय ही वह चीज़ हैं जो तुम लोगों के जीवन के लिए सर्वोत्तम हैं। और जब आवश्यक हो, तो तुम पर आ पड़ने वाले तथ्यों की ताड़ना भी होनी ही चाहिए; केवल तभी तुम लोग पूरी तरह से समर्पण करोगे। तुम लोगों की प्रकृतियाँ ऐसी हैं कि ताड़ना और शाप के बिना, तुम लोग अपने सिरों को झुकाने और समर्पण करने के अनिच्छुक होगे। तुम लोगों की आँखों के सामने तथ्यों के बिना, तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा। तुम लोग चरित्र से बहुत नीच और बेकार हो। ताड़ना और न्याय के बिना, तुम लोगों पर विजय प्राप्त करना कठिन होगा, और तुम लोगों की अधार्मिकता और अवज्ञा को जीतना मुश्किल होगा। तुम लोगों का पुराना स्वभाव बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए है। यदि तुम लोगों को सिंहासन पर बिठा दिया जाए, तो तुम लोगों को स्वर्ग की ऊँचाई और पृथ्वी की गहराई के बारे में कोई अंदाज़ न हो, तुम लोग किस ओर जा रहे हो इसके बारे में तो बिल्कुल भी अंदाज़ा न हो। यहाँ तक कि तुम लोगों को यह भी नहीं पता कि तुम सब कहाँ से आए हो, तो तुम लोग सृष्टि के प्रभु को कैसे जान सकते हो? आज की समयोचित ताड़ना और शाप के बिना तुम लोगों के अंतिम दिन बहुत पहले आ चुके होते। तुम लोगों के भाग्य के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं—क्या यह और भी निकटस्थ खतरे की बात नहीं है? इस समयोचित ताड़ना और न्याय के बिना, कौन जाने कि तुम लोग कितने घमंडी हो गए होते, और कौन जाने तुम लोग कितने पथभ्रष्ट हो जाते। इस ताड़ना और न्याय ने तुम लोगों को आज के दिन तक पहुँचाया है, और इन्होंने तुम लोगों के अस्तित्व को संरक्षित रखा है। जिन तरीकों से तुम लोगों के "पिता" को "शिक्षित" किया गया था, यदि उन्हीं तरीकों से तुम लोगों को भी "शिक्षित" किया जाता, तो कौन जाने तुम लोग किस क्षेत्र में प्रवेश करते! तुम लोगों के पास स्वयं को नियंत्रित करने और आत्म-चिंतन करने की बिलकुल कोई योग्यता नहीं है। तुम जैसे लोग, अगर कोई हस्तक्षेप या गड़बड़ी किए बगैर मात्र अनुसरण करें, आज्ञापालन करें, तो मेरे उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। क्या तुम लोगों के लिए बेहतर नहीं होगा कि तुम आज की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करो? तुम लोगों के पास और क्या विकल्प हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (6)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 441

जब तुम स्वयं को जीवन के लिए तैयार कर रहे हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान के विषय में, मानवीय जीवन के विषय में और विशेष रूप से अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के विषय में बातचीत करने के योग्य होना चाहिए। चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारे अंदर ये चीज़ें होनी चाहिए। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बात को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : "मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी स्थिति को जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी क्षमता खराब है, लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के काबिल नहीं हूँ।" तुमने केवल सतह को ही देखा है; और भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीज़ों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम यह चर्चा करते हो कि तुम कितने भ्रष्ट हो, तो ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है। अगर तुम किसी कलीसिया की अगुवाई करते हो, तो तुम्हें भाई-बहनों की स्थितियों को समझने और उस ओर उनका ध्यान दिलाने में समर्थ होना चाहिए। क्या सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा : "तुम अवज्ञाकारी और पिछड़े हुए हो!"? नहीं, तुम्हें खास तौर से बताना चाहिए कि उनकी अवज्ञाकारिता और पिछड़ापन किस प्रकार अभिव्यक्त हो रहा है। तुम्हें उनकी अवज्ञाकारी स्थिति पर, उनके अवज्ञाकारी बर्ताव पर और उनके शैतानी स्वभावों पर बोलना चाहिए, और इन बातों पर इस ढंग से बोलना चाहिए जिससे कि वे तुम्हारे शब्दों की सच्चाई से पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ। अपनी बात रखने के लिए तथ्यों और उदाहरणों का सहारा लो, और उन्हें बताओ कि वे किस तरह विद्रोही व्यवहार से अलग हो सकते हैं, और उन्हें अभ्यास का मार्ग बताओ—यह है लोगों को आश्वस्त करने का तरीका। जो इस तरह से काम करते हैं, वही दूसरों की अगुवाई कर सकते हैं; उन्हीं में सत्य की वास्तविकता होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 442

परमेश्वर की गवाही देना मूलत: परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के ज़रिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। अगर, तुम कहीं भी जाकर चिल्लाओगे : "हमारा परमेश्वर कार्य करने आया है, और उसका कार्य सचमुच व्यवहारिक है! उसने हमें बिना अलौकिक कार्यों के, बिना चमत्कारों और करामातों के प्राप्त कर लिया है!" तो लोग पूछेंगे : "तुम्हारा यह कहने का क्या मतलब है कि वो चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? बिना चमत्कार और करामात दिखाए उसने तुम्हें कैसे जीत लिया?" और तुम कहते हो : "वह बोलता है और उसने बिना चमत्कार और करामात दिखाए, हमें जीत लिया। उसके कामों ने हमें जीत लिया।" आखिरकार, अगर तुम्हारी बातों में सार नहीं है, अगर तुम कोई विशिष्ट बात न बता सको, तो क्या यह सच्ची गवाही है? देहधारी परमेश्वर जब लोगों को जीतता है, तो यह कार्य उसके दिव्य वचन करते हैं। मानवीयता इस कार्य को नहीं कर सकती; इसे कोई नश्वर इंसान नहीं कर सकता, उच्चतम क्षमता वाले लोग भी इस कार्य को नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी दिव्यता किसी भी सृजित प्राणी से ऊँची है। यह लोगों के लिए असाधारण है; आखिरकार, सृष्टिकर्ता सृजित प्राणी से ऊँचा है; सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता से ऊँचा नहीं हो सकता; अगर तुम उससे ऊँचे होते, तो वो तुम्हें जीत नहीं पाता, वह तुम्हें इसलिए ही जीत पाता है क्योंकि वह तुमसे ऊँचा है। जो सारी मानवता को जीत सकता है वह सृष्टिकर्ता है, और अन्य कोई नहीं, केवल वही इस कार्य को कर सकता है। ये वचन "गवाही" हैं—ऐसी गवाही जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीज़ों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के ज़रिए, तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसकी इच्छा को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए। तुम इतना ही कह सकते हो : "हम परमेश्वर को जानते हैं। उसका न्याय और ताड़ना बहुत कठोर हैं। उसके वचन बहुत सख्त हैं; वे धार्मिक और प्रतापी हैं, और कोई इंसान उनका उल्लंघन नहीं कर सकता," लेकिन क्या ये वचन अंतत: इंसान को पोषण देते हैं? लोगों पर इनका प्रभाव क्या होता है? क्या तुम वास्तव में जानते हो कि न्याय और ताड़ना का यह कार्य तुम्हारे लिए सर्वाधिक लाभकारी है? परमेश्वर के न्याय और ताड़ना तुम्हारी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता को उजागर करते हैं, है ना? वे तुम्हारे भीतर की उन गंदी और भ्रष्ट चीजों को साफ़ कर सकते हैं और बाहर निकाल सकते हैं, है न? अगर ताड़ना और न्याय न होते, तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम वास्तव में इस तथ्य को समझते हो कि शैतान ने तुम्हें गंभीरतम बिन्दु तक भ्रष्ट कर दिया है? आज, तुम लोगों को इन चीज़ों से युक्त होना चाहिए और इन चीज़ों को अच्छी तरह जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 443

क्या तुम लोगों को पता है कि फिलहाल तुम्हारे अंदर कौन-सी बातें होनी चाहिए? इसके एक पहलू में कार्य के बारे में दर्शन शामिल है, और दूसरा पहलू है तुम्हारा अभ्यास। तुम्हें इन दोनों पहलुओं को समझना होगा। यदि जीवन में प्रगति करने की तुम्हारी खोज में दर्शनों की कमी है, तो तुम्हारी कोई नींव नहीं होगी। यदि तुम्हारे पास केवल अभ्यास के मार्ग हैं और दर्शन बिल्कुल भी नहीं है, और पूरी प्रबंधन योजना के कार्य की कोई भी समझ नहीं है, तो तुम बेकार हो। तुम्हें उन सत्यों को समझना होगा जिसमें दर्शन शामिल हैं, और जहाँ तक अभ्यास से संबंधित सत्यों का प्रश्न है, तुम्हें उन्हें समझने के बाद अभ्यास के उचित मार्गों की खोज करनी होगी; तुम्हें वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुसार उसमें प्रवेश करना चाहिए। दर्शन नींव हैं, और यदि तुम इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते, तो तुम अंत तक अनुसरण नहीं कर सकोगे। इस तरह अनुभव करना, या तो तुम्हें भटका देगा या तुम्हें नीचे गिराकर विफल कर देगा। तुम्हारे लिए सफल होने का कोई रास्ता नहीं होगा! जिन लोगों की नींव में महान दर्शन नहीं हैं, वे विफल ही होते हैं, सफल नहीं हो सकते। तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते हो! क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर के अनुसरण में क्या शामिल होता है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या है? दर्शनों के बिना, तुम किस मार्ग पर चलोगे? आज के कार्य में, यदि तुम्हारे पास दर्शन नहीं हैं तो तुम किसी भी हाल में पूरे नहीं किए जा सकोगे। तुम किस पर विश्वास करते हो? तुम उसमें आस्था क्यों रखते हो? तुम उसके पीछे क्यों चलते हो? क्या तुम्हें अपना विश्वास कोई खेल लगता है? क्या तुम अपने जीवन के साथ किसी खेल की तरह बर्ताव कर रहे हो? आज का परमेश्वर सबसे महान दर्शन है। उसके बारे में तुम्हें कितना पता है? तुमने उसे कितना देखा है? आज के परमेश्वर को देखने के बाद क्या परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नींव मजबूत है? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम इस उलझन भरे रास्ते पर चलते रहोगे, तुम्हें उद्धार प्राप्त होगा? क्या तुम्हें लगता है कि तुम कीचड़ से भरे पानी में मछली पकड़ सकते हो? क्या यह इतना सरल है? परमेश्वर ने आज जो वचन कहे हैं, उनसे संबंधित कितनी धारणाएं तुमने दरकिनार की हैं? क्या तुम्हारे पास आज के परमेश्वर का कोई दर्शन है? आज के परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है? तुम हमेशा मानते हो कि उसके पीछे चलकर तुम उसे[क] प्राप्त कर सकते हो, उसे देखकर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो, और कोई भी तुम्हें हटा नहीं सकेगा। ऐसा न मान लो कि परमेश्वर के पीछे चलना इतनी आसान बात है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें उसे जानना चाहिए, तुम्हें उसका कार्य पता होना चाहिए, और तुम में उसके वास्ते कठिनाई का सामना करने की इच्छा होनी चाहिए, उसके लिए अपने जीवन का त्याग करने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने की इच्छा होनी चाहिए। तुम्हारे पास यह दर्शन होना चाहिए। अगर तुम्हारे ख़्याल हमेशा अनुग्रह पाने की ओर झुके रहते हैं, तो यह नहीं चलेगा। यह मानकर न चलो कि परमेश्वर यहाँ केवल लोगों के आनंद और केवल उन पर अनुग्रह बरसाने के लिए है। अगर तुम ऐसा सोचते हो तुम गलत होगे! अगर कोई उसका अनुसरण करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाल सकता, संसार की प्रत्येक संपत्ति को त्याग नहीं कर सकता, तो वह अंत तक कदापि अनुसरण नहीं कर पाएगा! तुम्हारे दर्शन तुम्हारी नींव होने चाहिए। अगर किसी दिन तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम तब भी उसका अनुसरण कर पाओगे? तुम अंत तक अनुसरण कर पाओगे या नहीं, इस बात को हल्के में न कहो। बेहतर होगा कि तुम पहले अपनी आँखों को अच्छे से खोलो और देखो कि अभी समय क्या है। भले ही तुम लोग वर्तमान में मंदिर के खंभों की तरह हो, परंतु एक समय आएगा जब ऐसे खंभे कीड़ों द्वारा कुतर दिये जाएंगे जिससे मंदिर ढह जाएगा, क्योंकि फिलहाल तुम लोगों में अनेक दर्शनों की बहुत कमी है। तुम लोग केवल अपने छोटे-से संसार पर ध्यान देते हो, तुम लोगों को नहीं पता कि खोजने का सबसे विश्वसनीय, सबसे उपयुक्त तरीका क्या है। तुम लोग आज के कार्य के दर्शन पर ध्यान नहीं देते, न ही तुम लोग इन बातों को अपने दिल में रखते हो। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि एक दिन परमेश्वर तुम लोगों को एक बहुत अपरिचित जगह में रखेगा? क्या तुम लोग सोच सकते हो जब मैं तुम लोगों से सब कुछ छीन लूँगा, तो तुम लोगों का क्या होगा? क्या उस दिन तुम लोगों की ऊर्जा वैसी ही होगी जैसी आज है? क्या तुम लोगों की आस्था फिर से प्रकट होगी? परमेश्वर के अनुसरण में, तुम लोगों का सबसे बड़ा दर्शन "परमेश्वर" होना चाहिए : यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसके अलावा, यह न मान बैठो कि पवित्र होने के इरादे से सांसारिक मनुष्यों से मेलजोल छोड़कर तुम लोग परमेश्वर का परिवार बन ही जाओगे। इन दिनों में, परमेश्वर स्वयं ही सृष्टि के बीच कार्य कर रहा है; वही लोगों के बीच अपना कार्य करने के लिए आया है—वह अभियान चलाने नहीं आया। तुम लोगों के बीच में, मुट्ठीभर भी ऐसे नहीं हैं जो जानते हों कि आज का कार्य स्वर्ग के परमेश्वर का कार्य है, जिसने देहधारण किया है। यह तुम लोगों को प्रतिभा से भरपूर उत्कृष्ट व्यक्ति बनाने के लिए नहीं है; यह मानवीय जीवन के मायने को जानने में, मनुष्यों की मंज़िल जानने के लिए, और परमेश्वर और उसकी समग्रता को जानने में तुम लोगों की मदद के लिए है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सृष्टिकर्ता के हाथ में सृजन की वस्तु हो। तुम्हें क्या समझना चाहिए, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण कैसे करना चाहिए—क्या ये वे सत्य नहीं हैं जिन्हें तुम्हें समझना चाहिए? क्या ये वे दर्शन नहीं हैं जिन्हें तुम्हें देखना चाहिए?

एक बार जब लोगों को दर्शन हो जाते हैं, तो उनका एक आधार होता है। जब तुम इस आधार पर अभ्यास करोगे, तो प्रवेश करना बहुत आसान होगा। इस तरह, एक बार जब तुम्हारे पास प्रवेश करने का आधार होगा, तो तुम्हें कोई गलतफहमी नहीं होगी, और तुम्हारे लिए प्रवेश करना बहुत आसान होगा। दर्शनों को समझने का, परमेश्वर के कार्य को जानने का यह पहलू महत्वपूर्ण है; तुम लोगों के भंडार में यह होना ही चाहिए। यदि सत्य का यह पहलू तुम्हारे अंदर नहीं है, और तुम केवल अभ्यास के मार्गों के बारे में ही बात करना जानते हो, तो तुम्हारे अंदर बहुत से दोष होंगे। मुझे पता चला है कि तुम लोगों में से कई सत्य के इस पहलू पर बल नहीं देते, और जब तुम इसे सुनते हो तो ऐसा लगता है कि तुम लोग केवल सिद्धांतों और शब्दों को सुन रहे हो। एक दिन तुम हार जाओगे। इन दिनों कुछ ऐसे कुछ कथन हैं जो तुम्हें ठीक से समझ नहीं आते हैं और जिन्हें तुम स्वीकार नहीं करते हो; ऐसे मामलों में तुम्हें धैर्यपूर्वक खोज करनी चाहिए, और वह दिन आएगा जब तुम समझ जाओगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अधिक से अधिक दर्शन-लाभ करो। अगर तुम केवल कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों को ही समझ लो, तो भी यह दर्शनों की ओर ध्यान न देने से बेहतर होगा, और यह किसी भी सिद्धांत को न समझने से बेहतर होगा। यह सभी तुम्हारे प्रवेश के लिए सहायक हैं, और तुम्हारे उन संदेहों को दूर कर देंगे। यह तुम्हारे धारणाओं से भरा होने से बेहतर है। नींव के रूप में इन दर्शनों को रखने से तुम कहीं बेहतर स्थिति में होगे। तुम्हें किसी प्रकार की कोई गलतफहमी नहीं होगी, और तुम सिर उठाकर और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश कर पाओगे। हमेशा इतने भ्रमित और संदेहयुक्त होकर अनुसरण करने का क्या लाभ? क्या यह रेत में मुँह छिपाने जैसा नहीं है? विश्वास के साथ और सिर उठाकर राज्य में प्रवेश करना कितना अच्छा होगा! इतनी गलतफहमियाँ पालने से क्या लाभ? क्या तुम अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हो? एक बार जब तुम्हें यहोवा के कार्य, यीशु के कार्य और कार्य के इस चरण की समझ प्राप्त हो जायेगी, तो तुम्हारे पास एक आधार होगा। इस पल, तुम्हें यह बहुत सरल लग सकता है। कुछ लोग कहते हैं, "जब समय आएगा और पवित्र आत्मा महान कार्य शुरू करेगा, तो मैं इन सभी चीज़ों पर बात कर पाऊँगा। अभी मैं इसलिए समझ नहीं पा रहा हूँ क्योंकि पवित्र आत्मा ने अभी तक मुझे उतना अधिक प्रबुद्ध नहीं किया है।" यह इतना आसान नहीं है; ऐसा कुछ नहीं है कि अगर तुम अभी सत्य[ख] स्वीकार करने के लिए तैयार हो, तो समय आने पर तुम इसका कुशलतापूर्वक उपयोग करोगे। ऐसा होगा आवश्यक नहीं है! तुम मानते हो कि तुम वर्तमान में बहुत अच्छी तरह से तैयार हो, और तुम्हें उन धार्मिक लोगों और महानतम सिद्धांतकारों को जवाब देने में कोई समस्या नहीं होगी, यहां तक कि उन्हें खारिज करने में भी कोई दिक्कत नहीं आएगी। क्या तुम वास्तव में ऐसा कर पाओगे? अपने इस सतही अनुभव के साथ तुम किस समझ की बात कर सकते हो? सत्य से युक्त होकर, सत्य की लड़ाई लड़ते हुए, परमेश्वर के नाम की गवाही देना, ये सब वैसे नहीं हैं जैसा तुम सोचते हो—कि जब तक परमेश्वर कार्य कर रहा है, सब कुछ पूरा हो जाएगा। उस समय तक, शायद तुम कुछ प्रश्नों से स्तब्ध हो जाओ, और फिर तुम अचंभित रह जाओगे। मुख्य बात यह है कि कार्य के इस चरण के बारे में तुम्हारे पास स्पष्ट समझ है या नहीं, और तुम वास्तव में इस बारे में कितना समझते हो। यदि तुम शत्रु शक्तियों पर विजय नहीं पा सकते, या तुम धार्मिक शक्तियों को पराजित नहीं कर सकते, तो फिर क्या तुम बेकार की वस्तु नहीं होगे? तुमने आज के कार्य का अनुभव किया है, इसे अपनी आंखों से देखा है और इसे अपने कानों से सुना है, लेकिन अगर अंत में तुम गवाही न दे पाओ, तो क्या फिर भी तुम्हारी इतनी जुर्रत होगी कि तुम जीवित बने रह सको? तुम किसका सामना कर पाओगे? अभी ऐसा न सोचो कि यह इतना सरल होगा। भविष्य का कार्य उतना सरल नहीं होगा जितनी तुम कल्पना करते हो; सत्य की लड़ाई लड़ना इतना आसान नहीं है, इतना सीधा नहीं है। इस वक्त, तुम्हें तैयार रहने की आवश्यकता है; यदि तुम सत्य से युक्त नहीं हो तो जब समय आएगा और पवित्र आत्मा अलौकिक तरीके से काम नहीं कर रहा होगा, तो तुम भ्रमित हो जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए— भ्रम में अनुसरण मत करो!' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "उसे" शब्द शामिल नहीं है।

ख. मूल पाठ में "सत्य" शब्द शामिल नहीं है।

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