जीवन में प्रवेश 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 374

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त पदार्थों का मुखिया, अपने सिंहासन से अपनी राजसी शक्ति का निर्वहन करता है। वह समस्त ब्रह्माण्ड और सब वस्तुओं पर राज और सम्पूर्ण पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन करता है। हम हर क्षण उसके समीप होंगे, और एकांत में उसके सम्मुख आयेंगे, एक पल भी नहीं खोयेंगे और हर समय कुछ न कुछ सीखेंगे। हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण से लेकर लोग, विभिन्न मामले और वस्तुएँ, सबकुछ उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी वजह से अपने दिल में शिकायतें मत पनपने दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अनुग्रह प्रदान नहीं करेगा। बीमारी का होना परमेश्वर का प्रेम ही है और निश्चित ही उसमें उसके नेक इरादे निहित होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम्हारे शरीर को कुछ पीड़ा सहनी पड़े, लेकिन कोई भी शैतानी विचार मन में मत लाओ। बीमारी के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश न हो, खोजते रहो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें अपने प्रकाश से रोशन करेगा। अय्यूब का विश्वास कैसा था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परन्तु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। जब तक तुम्हारी एक भी सांस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

पुनरुत्थित मसीह का जीवन हमारे भीतर है। निस्संदेह, परमेश्वर की उपस्थिति में हममें विश्वास की कमी रहती है : परमेश्वर हममें सच्चा विश्वास जगाये। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दुष्टों और शैतान को शर्मिन्दा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे शेष सब बातों को दूर कर सर्वत्र शान्ति बहाल करते हैं। विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मज़बूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे। शैतान अपने विचारों को हम तक पहुँचाने का हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने प्रकाश से रोशन करे, अपने भीतर मौजूद शैतान के ज़हर से छुटकारा पाने के लिए हमें हर पल परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी आत्मा के भीतर यह अभ्यास करना चाहिए कि हम परमेश्वर के निकट आ सकें और हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर का प्रभुत्व होने देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 375

जब भी कोई समस्या आए तो लोगों को सबसे पहले क्या करना चाहिए? उन्हें प्रार्थना करनी चाहिए; प्रार्थना सर्वोपरि है। प्रार्थना दर्शाती है कि तुम पवित्र हो, तुम्हारे हृदय ने परमेश्वर का भय मानना शुरू कर दिया है, तुम परमेश्वर को खोजना जानते हो, तुमने उसे अपने हृदय में जगह दे दी है, और तुम एक पवित्र ईसाई हो। कई पुराने विश्वासी प्रतिदिन एक ही समय पर प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ जाते हैं, वो कभी-कभी इतने लंबे समय तक बैठे रहते हैं कि फिर उठ नहीं पाते। हम इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे कि यह कर्मकांड है या नहीं और वो इससे कुछ हासिल कर सकते हैं या नहीं; मान लेते हैं कि ये वृद्ध भाई-बहन बहुत ही पवित्र हैं, तुम युवा लोगों से कहीं बेहतर और ज्यादा मेहनती हैं। किसी भी समस्या के आने पर सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल बेमन से बड़बड़ करना नहीं है; उससे कोई समस्या हल नहीं होगी। हो सकता है आठ-दस बार प्रार्थना करने पर भी, तुम कुछ हासिल न कर पाओ, लेकिन हतोत्साहित मत हो—तुम्हें प्रार्थना करते रहना चाहिए। जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए, तो पहले प्रार्थना करो, पहले परमेश्वर को बताओ, परमेश्वर को सँभालने दो, परमेश्वर को मदद करने दो, परमेश्वर को अगुआई करने दो और उसे राह दिखाने दो। इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर को पहले स्थान पर रखा है, वह तुम्हारे हृदय में है। कोई समस्या सामने आने पर अगर पहले तुम प्रतिरोध करते हो, क्रोधित हो जाते हो, आगबबूला हो जाते हो—यदि तुम तुरंत, सबसे पहले नकारात्मक हो जाते हो—तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है। जब भी तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। सबसे पहले तुम्हें घुटने टेककर प्रार्थना करनी चाहिए—यह महत्त्वपूर्ण है। प्रार्थना परमेश्वर की उपस्थिति में उसके प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। अगर परमेश्वर तुम्हारे हृदय में नहीं होगा, तो तुम ऐसा नहीं करोगे। कुछ लोग कहते हैं, "मैं प्रार्थना करता हूँ, लेकिन परमेश्वर फिर भी मुझे प्रबुद्ध नहीं करता!" तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। पहले देखो कि प्रार्थना के लिए तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं या नहीं; यदि तुम वास्तव में सत्य की खोज करते हो और अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तो वह किसी मामले में तुम्हें अच्छी तरह प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम समझ सको—संक्षेप में कहें तो परमेश्वर तुम्हें समझा देगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता के बिना तुम अपने आप नहीं समझ सकते : तुममें कुशाग्रता की कमी है, तुम्हारे पास इसके लिए बुद्धि नहीं है, और यह मानव-बुद्धि द्वारा अप्राप्य है। जब तुम समझ जाते हो, तो क्या वह समझ तुम्हारे मन से पैदा होती है? यदि तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध नहीं किए जाते, तो तुम जिस किसी से भी पूछोगे, वह नहीं जानता होगा कि आत्मा के कार्य का क्या अर्थ है या परमेश्वर का क्या अर्थ है; जब स्वयं परमेश्वर तुम्हें इसका अर्थ बताएगा, तभी तुम जान पाओगे। इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना के लिए एक खोजी दृष्टिकोण के साथ जाँच-पड़ताल, और अपने विचार, मत और दृष्टिकोण व्यक्त करने की आवश्यकता होती है—ये चीज़ें उसमें शामिल होनी चाहिए। केवल बेमन से काम करने का कोई परिणाम नहीं होगा, इसलिए तुम्हें प्रबुद्ध न करने के लिए पवित्र आत्मा को दोष न दो। मैंने पाया है कि कुछ लोग परमेश्वर पर अपनी आस्था में, विश्वास तो करते रहते हैं, लेकिन परमेश्वर केवल उनके होंठों पर रहता है। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं रहता, वे आत्मा के कार्य को नकारते हैं, और वे प्रार्थना को भी नकारते हैं; वे केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? वे तब तक विश्वास करते रहते हैं, जब तक कि परमेश्वर उनके विश्वास से पूरी तरह से गायब नहीं हो जाता। विशेष रूप से, ऐसे लोग भी हैं, जो अक्सर सामान्य मामले सँभालते हैं और महसूस करते हैं कि वे बहुत व्यस्त हैं, और अपने समस्त प्रयासों के लिए कुछ प्राप्त नहीं करते। यह लोगों द्वारा परमेश्वर पर अपने विश्वास में सही मार्ग पर न चलने का मामला है। क्या सही मार्ग पर चलना मुश्किल काम नहीं है? बहुत से सिद्धांत समझने के बाद भी वे इस मार्ग पर चलने में विफल रहते हैं और उनके पतन के मार्ग की ओर ही उन्मुख होने की संभावना होती है। इसलिए जब तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो प्रार्थना करने और खोजने में अधिक समय लगाओ—कम से कम इतना तो तुम्हें करना ही चाहिए। परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के इरादों को जानना ही कुंजी है। यदि परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग इस प्रकार अनुभव और अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे, और उनका विश्वास अर्थहीन होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम्हें हर चीज़ सत्य के दृष्टिकोण से ध्यानपूर्वक देखनी ही चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 376

चाहे कोई कितना भी सत्य समझता हो या उसने कितने ही कर्तव्यों को पूरा किया हो, उन कर्तव्यों को पूरा करते समय उसने कितने ही अनुभव किये हों, उसका आध्यात्मिक कद कितना ही बड़ा या छोटा हो या वो किसी भी परिवेश में हो, लेकिन अपने हर काम में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखे और उस पर भरोसा किए बिना उसका काम नहीं चल सकता। यही सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि है। मैं इसे सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि क्यों कहता हूँ? किसी ने बहुत-से सत्य समझ भी लिए हों तो क्या परमेश्वर पर भरोसा किये बिना काम चल सकता है? कुछ लोगों ने, कुछ अधिक समय तक परमेश्वर में आस्था रखकर, कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे कुछ परीक्षणों से भी गुज़रे हैं। उन्हें थोड़ा व्यावहारिक अनुभव हो सकता है, लेकिन वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना है और वे यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखकर उस पर कैसे भरोसा करना है। क्या ऐसे लोगों में बुद्धि होती है? ऐसे लोग सबसे ज़्यादा मूर्ख होते हैं, और खुद को चतुर समझते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते। कुछ लोग कहते हैं, "मैं कई सत्य समझता हूँ और मेरे अंदर सत्य-वास्तविकता है। सैद्धांतिक तरीके से काम करना अच्छा होता है। मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हूँ और मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के करीब कैसे जाना है। क्या इतना पर्याप्त नहीं है कि मैं सत्य पर भरोसा करता हूँ?" सैद्धांतिक रूप से देखा जाए, तो "सत्य पर भरोसा करना" ठीक है। लेकिन कई मौके और स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जिनमें लोगों को यही पता नहीं चलता कि सत्य क्या है, या सत्य सिद्धांत क्या हैं। व्यावहारिक अनुभव वाले लोग यह जानते हैं। उदाहरण के तौर पर, जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो शायद तुम्हें यह पता न हो कि इस मुद्दे से जुड़े हुए सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए या इसे कैसे लागू करना चाहिए। तुम्हें ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए? चाहे तुम्हें कितना भी व्यावहारिक अनुभव हो, तुम्हारे अंदर सभी स्थितियों में सत्य नहीं हो सकता। चाहे तुमने कितने ही वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया हो, चाहे तुमने कितनी ही चीज़ों का अनुभव किया हो, चाहे तुम कितनी ही काट-छाँट, निपटारे और अनुशासन से गुज़रे हो, क्या तुम सत्य के स्रोत हो? कुछ लोगों का कहना है, "मुझे वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक के सभी जाने-माने कथन और अंश याद हैं। मुझे परमेश्वर पर भरोसा करने या परमेश्वर की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। जब समय आएगा, मैं परमेश्वर के इन वचनों पर ही भरोसा करके आराम से काम चला लूँगा।" जिन वचनों को तुमने याद किया है, वे गतिहीन हैं, लेकिन जिन परिवेशों और अवस्थाओं का तुम सामना करते हो, वे गतिशील हैं। वचनों की शाब्दिक समझ रखने और कई आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर लेने का अर्थ सत्य की समझ होना नहीं है, इसका यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि तुम्हें हर स्थिति में परमेश्वर की इच्छा की पूरी समझ है। इस तरह, यहाँ सीखने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सबक है : वो यह है कि लोगों को सभी बातों में परमेश्वर की ओर देखने की ज़रूरत है और ऐसा करके, लोग परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं। परमेश्वर पर भरोसा रखने से ही लोगों को अनुसरण का मार्ग मिलेगा। अन्यथा, तुम सही तरीके से और सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कोई काम कर तो सकते हो, लेकिन यदि तुम परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो, तो तुम जो भी करोगे वह सिर्फ मनुष्य का काम होगा, और यह ज़रूरी नहीं कि वह परमेश्वर को संतुष्ट करे। चूँकि लोगों को सत्य की इतनी उथली समझ होती है, इसलिए संभव है कि वे विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने पर एक ही सत्य का उपयोग करके नियमों का पालन करें और शब्दों और सिद्धांतों से हठपूर्वक चिपके रहें। यह मुमकिन है कि वे कई मामलों को आम तौर पर सत्य सिद्धांतों के अनुरूप पूरा कर लें, लेकिन उसमें परमेश्वर के मार्गदर्शन को या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं देखा जा सकता है। यहाँ पर एक गंभीर समस्या है, वो यह है कि लोग अपने अनुभव और उन्होंने जो नियम समझे हैं उन पर, और कुछ मानवीय कल्पनाओं पर निर्भर रहकर बहुत से काम करते हैं। वे मुश्किल से ही सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर की ओर देखने, उससे प्रार्थना करने, फिर परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन पर भरोसा करके, परमेश्वर की इच्छा को साफ़-साफ़ समझने से प्राप्त होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी बुद्धिमानी परमेश्वर की ओर देखना और सभी बातों में परमेश्वर पर भरोसा करना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 377

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और उसमें निहित हर चीज़ का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम कहते हो कि थोड़े-से अनुभवों के होने का मतलब सत्य का होना है, तो क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? तुम्हारे पास कुछ अनुभव हो सकता है, सत्य के किसी निश्चित पहलू या उसके किसी एक पक्ष से संबंधित प्रकाश हो सकता है, लेकिन तुम दूसरों को हमेशा के लिए इसकी आपूर्ति नहीं कर सकते, इसलिए यह जो प्रकाश तुमने प्राप्त किया है, सत्य नहीं है; यह केवल एक मुकाम है जिस तक लोग पहुँच सकते हैं। यह महज़ उचित अनुभव और उचित समझ है, कुछ वास्तविक अनुभव और सत्य का ज्ञान है, जो इंसान में होना चाहिए। यह रोशनी, प्रबोधन और अनुभवजन्य समझ सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकते; अगर सभी लोग इस सत्य का अनुभव कर भी लेते और अपनी समस्त अनुभवजन्य समझ को एक साथ जोड़ लेते, तो भी वे उस एक सत्य के बराबर नहीं हो सकते थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, "मैं मानव जगत के लिए इस बात को एक कहावत के साथ पूरा करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं जो मुझे प्रेम करता है।" यह सच्चा बयान है; यह जीवन का सच्चा सार है। सभी बातों में यह सबसे गहन है; यह परमेश्वर स्वयं की अभिव्यक्ति है। तुम इसे अनुभव करते रह सकते हो और यदि तुम इसे तीन सालों तक अनुभव करते हो तो तुम्हें इसकी एक सतही समझ प्राप्त होगी; अगर तुम इसे सात या आठ साल तक अनुभव करते हो तो तुम्हें उससे भी अधिक समझ मिलेगी, लेकिन जो भी समझ तुम हासिल करोगे वो कभी भी सत्य के उस एक बयान का स्थान नहीं ले पाएगी। अन्य व्यक्ति, इसका एक-दो साल तक अनुभव करने के बाद, शायद थोड़ी-सी समझ हासिल कर ले, और दस सालों तक अनुभव करने के बाद थोड़ी और गहरी समझ हासिल कर ले, और फिर पूरे जीवनकाल के लिए अनुभव कर ज़्यादा उच्चतर समझ हासिल कर ले—लेकिन यदि तुम दोनों अपने द्वारा हासिल समझ को मिला दो, तो भी—चाहे तुम दोनों के पास कितनी भी समझ, कितने ही अनुभव, कितनी भी अंतर्दृष्टि, कितना भी प्रकाश, या कितने ही उदाहरण हों—ये सब मिलकर सत्य के उस एक कथन का स्थान नहीं ले सकते। दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जीवन हमेशा मनुष्य का जीवन होगा, भले ही तुम्हारी समझ सत्य, परमेश्वर के इरादों, उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हो, लेकिन यह कभी भी सत्य का एक विकल्प नहीं बन पाएगी। यह कहने का अर्थ कि लोगों ने सत्य हासिल कर लिया है, यह है कि उनके पास कुछ वास्तविकता है, और उन्होंने सत्य की कुछ समझ हासिल कर ली है, परमेश्वर के वचनों में कुछ वास्तविक प्रवेश पा लिया है, उन्हें परमेश्वर के वचनों का कुछ वास्तविक अनुभव हो गया है, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में वे सही मार्ग पर हैं। किसी व्यक्ति के जीवन भर के अनुभव के लिए परमेश्वर से केवल एक ही बयान पर्याप्त है; लोग कई जीवनकाल या कई हज़ार वर्षों तक का अनुभव करने के बाद भी पूरी तरह और अच्छी तरह से मात्र एक सत्य का अनुभव भी नहीं कर पाएंगे। यदि लोगों ने कुछ ही सतही वचनों को समझा है और फिर भी वे दावा करते हैं कि उन्होंने सत्य हासिल कर लिया है, तो क्या यह पूरी तरह बकवास नहीं होगी? ...

जब लोग सत्य को समझते हैं, और इसके साथ यों जीते हैं मानो यह उनका जीवन हो, तो इसका तात्पर्य किस तरह के जीवन से है? इसका तात्पर्य, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन कर पाने की उनकी योग्यता से है; इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो उनका जीवनयापन परमेश्वर के वचन-सत्य की नींव पर स्थापित होता है, और वे सत्य के क्षेत्र में जी रहे हैं। लोगों का जीवन सत्य को समझना और अनुभव करना होता, और इस आधार के साथ, उस दायरे से बाहर न जाना; सत्य-जीवन प्राप्त करने की बात करते समय, इसी जीवन की चर्चा की जा रही है। तुम सत्य के साथ इस तरह जी सको मानो यह तुम्हारा जीवन है, इसके लिए ऐसा नहीं है कि जीवन का सत्य तुम्हारे अंदर हो, न ही ये बात है कि अगर सत्य तुम्हारे अंदर जीवन की तरह हो, तो तुम सत्य बन जाते हो, और तुम्हारा आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है, यह तो और भी नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य-जीवन हो। आखिरकार, तुम्हारा जीवन इंसान का जीवन ही है। बात केवल इतनी है कि मनुष्य परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहकर जी सकता है, सत्य का ज्ञान रख सकता है, और इसे गहराई तक समझ सकता है; इस समझ को तुमसे छीना नहीं जा सकता। तुम इन बातों को पूरी तरह से अनुभव करते हो और समझते हो, तुम्हें लगता है कि ये चीजें अच्छी हैं, बहुत कीमती हैं, और तुम उन्हें अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करने लगते हो; साथ ही, तुम इन चीजों पर निर्भर रहते हुए जीते हो, और कोई इसे बदल नहीं सकता : तो, तुम्हारा जीवन यह है। यानी, तुम्हारे जीवन में केवल—समझ, अनुभव और सत्य की अंतर्दृष्टि—यही बातें होती हैं, तुम चाहे कुछ भी करो, तुम अपने जीने का तरीका इन्हीं चीज़ों पर ही आधारित करोगे, और तुम इस दायरे या इन सीमाओं से परे नहीं जाओगे; तुम्हारा जीवन इसी प्रकार का होगा। परमेश्वर के कार्य का अंतिम उद्देश्य यही है कि लोगों को इस तरह का जीवन मिले। लोग सत्य को चाहे जितनी अच्छी तरह से समझ लें, उनका सार तो फिर भी इंसान का सार ही होता है, इसकी तुलना परमेश्वर के सार से बिल्कुल नहीं की जा सकती। क्योंकि सत्य का उनका अनुभव चलता रहता है, इस कारण उनके लिए सत्य को पूरी तरह से जी पाना असंभव है; वे केवल उसी बेहद सीमित सत्य को ही जी सकते हैं जो मनुष्यों के लिए प्राप्य है। तो फिर वे परमेश्वर कैसे बन सकते हैं? ... अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य की अपनी समझ के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास सत्य के किसी पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह अपने आप में सत्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है? बिल्कुल नहीं। क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव और सार का पता लगा सकते हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते। प्रत्येक व्यक्ति के पास सत्य के सिर्फ एक पहलू, एक दायरे का अनुभव होता है; इसे अपने सीमित दायरे में अनुभव करने से, तुम सत्य के विभिन्न पहलुओं को नहीं छू सकते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य के स्रोत और अर्थ में एक बहुत व्यापक क्षेत्र शामिल होता है! कुछ भी इसका खंडन नहीं कर सकता। कुछ लोग कहते हैं, "क्या मेरे अनुभव का ज्ञान कभी खंडित नहीं होगा?" बेशक, नहीं होगा। जो सच्ची समझ परमेश्वर के वचनों के तुम्हारे अनुभव से आती है, वह सत्य के अनुरूप है, उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? सत्य किसी भी वातावरण में तुम्हारा जीवन हो सकता है। यह तुम्हें एक पथ दे सकता है, इसके सहारे तुम जीवित रह सकते हो। हालांकि, लोगों के पास जो चीज़ें हैं, लोगों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है, वो केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है, वो एक अलग दायरे में उपयुक्त नहीं है। किसी व्यक्ति का अनुभव कितना भी गहन हो, लेकिन वो होता बहुत ही सीमित है, किसी व्यक्ति का अनुभव सत्य के दायरे तक कभी नहीं पहुंच सकता। किसी व्यक्ति के प्रकाश और उसकी समझ की तुलना सत्य से कभी नहीं की जा सकती।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 378

यदि तुम सत्य को व्यवहार में लाना और उसे समझना चाहते हो, तो सबसे पहले अपने सामने आने वाली कठिनाइयों और अपने आसपास घटने वाली चीज़ों का सार समझो, समझो कि इन मुद्दों के साथ क्या समस्याएँ हैं, साथ ही इस बात को भी समझो कि वो सत्य के किस पहलू से संबंधित हैं। इन चीज़ों की तलाश करो और उसके बाद अपनी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर सत्य की खोज करो। इस तरह, जैसे-जैसे तुम अनुभव प्राप्त करोगे, वैसे-वैसे तुम अपने साथ होने वाली हर चीज़ में परमेश्वर का हाथ देखने लगोगे, और यह भी जानने लगोगे कि वह क्या करना चाहता है और तुममें कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। शायद तुम्हें कभी ऐसा न लगता हो कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ हो रहा है, वह परमेश्वर में विश्वास और सत्य से जुड़ा है, और बस अपने आप से कहो, "इससे निपटने का मेरा अपना तरीका है; मुझे सत्य की या परमेश्वर के वचनों की आवश्यकता नहीं है। जब मैं सभाओं में भाग लूँगा, या जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढूँगा, या अपना कर्तव्य निभाऊँगा, तो मैं अपनी जाँच सत्य और परमेश्वर के वचनों से तुलना करके करूँगा।" अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे जीवन में होने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों का, जैसे परिवार, काम-काज, विवाह और तुम्हारे भविष्य से संबंधित विभिन्न चीज़ों का, सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और तुम उन्हें मानवीय तरीकों से हल करते हो, अगर तुम्हारे अनुभव करने का यही तरीका है, तो तुम्हें सत्य कभी प्राप्त नहीं होगा; तुम कभी यह नहीं समझ पाओगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर क्या करना चाहता है या वह कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। सत्य का अनुसरण करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसका एक सरल पक्ष है, और इसका एक जटिल पक्ष भी है। सरल शब्दों में, हमें अपने आसपास होने वाली हर चीज़ में सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। एक बार जब तुम ऐसा करना शुरू कर दोगे, तो तुम यह देखोगे कि तुम्हें परमेश्वर पर अपने विश्वास में कितना सत्य हासिल करना चाहिए और उसका कितना अनुसरण करना चाहिए, तुम जानोगे कि सत्य बहुत वास्तविक है और सत्य ही जीवन है। यह सच नहीं है कि केवल परमेश्वर की सेवा करने वालों और कलीसिया के अगुआओं को ही सब-कुछ सत्य के अनुसार करने की आवश्यकता होती है, साधारण अनुयायियों को नहीं; यदि ऐसा होता, तो परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में कोई बड़ा अर्थ नहीं होता। क्या अब तुम लोगों के पास सत्य के अनुसरण का मार्ग है? सत्य का अनुसरण करते हुए पहला काम क्या करना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और संगति सुनने में ज्यादा समय बिताना चाहिए। जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो ज्यादा प्रार्थना करो, ज्यादा खोजो। जब तुम लोग अधिक सत्य से युक्त हो जाओगे, जीवन-प्रवेश पा लोगे, और तुम्हारा कद आध्यात्मिक हो जाएगा, तो तुम लोग कुछ वास्तविक कर पाओगे, कुछ काम हाथ में ले पाओगे, और इस तरह कुछ परीक्षणों और प्रलोभनों के माध्यम से सफलता पाने में सक्षम हो पाओगे। उस समय तुम महसूस करोगे कि तुमने वास्तव में कुछ सत्य समझ और पा लिए हैं, और तुम जानोगे कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन ही लोगों की आवश्यकता हैं, उन्हें ही हासिल करना चाहिए, और वही दुनिया में एकमात्र सत्य हैं, जो लोगों को जीवन दे सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 379

बहुत से लोग यह पहले कह चुके हैं : "मैं सारे सत्य समझता हूँ, मैं तो बस उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाता।" यह वाक्य मूल समस्या को उजागर करता है, जो लोगों की प्रकृति की भी समस्या है। अगर किसी की प्रकृति सत्य से नफरत करने की है तो वो सत्य को कभी नहीं अपनाएगा। जो लोग सत्य से नफरत करते हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ फिज़ूल की इच्छाएँ भी पाले रहेंगे; कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या करते हैं, उसमें उनके अपने इरादे हमेशा मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है और वे घर लौटकर नहीं जा सकते, वे ऐसी इच्छा करते हैं : "मैं अभी घर नहीं जा सकता। लेकिन एक दिन, परमेश्वर मुझे एक बेहतर घर देगा। वह मुझे व्यर्थ में दुख नहीं झेलने देगा।" या वो सोचते हैं, "मैं चाहे कहीं भी रहूँ, वह मुझे भोजन देगा। परमेश्वर मुझे बंद गली में नहीं ले जायेगा। अगर उसने ऐसा किया तो वह गलत होगा।" क्या लोगों के मन में ये विचार नहीं आते? कुछ लोग सोचते हैं, "मैं परमेश्वर के लिए स्वयं को इतना खपाता हूँ, इसलिए उसे मुझे सत्ताधारी अधिकारियों के हाथों में नहीं सौंपना चाहिए। मैंने बहुत त्याग किया है और मैं ईमानदारी से सत्य की खोज में हूँ, इसलिए परमेश्वर को मुझे आशीष देना ही चाहिये; हम परमेश्वर के दिन के आने का कितना इंतजार करते हैं, ताकि परमेश्वर का दिन शीघ्र आए और वो हमारी इच्छाएँ पूरी करे।" लोग परमेश्वर से हमेशा अनावश्यक मांग करते हैं और सोचते हैं : हमने ऐसा किया है, इसलिए परमेश्वर को ऐसा-ऐसा करना चाहिए; हमने कुछ चीजें हासिल की हैं, इसलिए परमेश्वर को हमें कुछ इनाम देना चाहिए और हमें आशीर्वाद वगैरह देना चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जब वे दूसरों को आराम से अपना परिवार छोड़कर परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हुए देखते हैं, तो उनमें हीनभावना आती है और वे सोचते हैं : "दूसरों ने न जाने कब से अपना घर छोड़ रखा है, वे इस पर कैसे काबू पा लेते हैं? मैं कभी इस पर काबू क्यों नहीं पा सकता? मैं अपना परिवार, और अपने बच्चों को क्यों नहीं छोड़ पाता? परमेश्वर उनके प्रति दयालु है, मेरे प्रति क्यों नहीं? पवित्र आत्मा मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं करता? परमेश्वर मेरे साथ क्यों नहीं है?" यह क्या स्थिति है? लोग बहुत अविवेकी होते हैं। वे सत्य को अभ्यास में नहीं लाते; बल्कि वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं। उनका अपना कोई प्रयास नही होता, न ही ऐसा कुछ होता है जो उन्हें प्राप्त करना चाहिए। उन्होंने व्यक्तिगत पसंद का और उस मार्ग का त्याग कर दिया होता है जिस पर उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा परमेश्वर से ऐसा करने या वैसा करने की मांग करते रहते हैं, और चाहते हैं कि परमेश्वर आँख बंद करके उन पर दया करे, उन पर अनुग्रह करे, उनका मार्गदर्शन करे और उन्हें आनंद दे। वे सोचते हैं, "मैंने अपना घर छोड़ दिया है, मैंने बहुत त्याग किया है, मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ और मैंने इतना दुख सहा है। इसलिए परमेश्वर को मुझ पर अनुग्रह करना चाहिए, कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मुझे घर की याद न आए, मुझे परिवार का त्याग करने का संकल्प देना चाहिए और मुझे और शक्तिशाली बनाना चाहिए। मैं इतना कमजोर क्यों हूँ? दूसरे इतने शक्तिशाली क्यों हैं? परमेश्वर को मुझे शक्तिशाली बनाना चाहिए।" "दूसरे लोग घर जा सकते हैं; तो मुझे क्यों सताया जाता है, मैं घर क्यों नहीं जा सकता? परमेश्वर मुझ पर कोई अनुग्रह नहीं कर रहा।" इन लोगों की सारी बातें अविवेकपूर्ण होती हैं, इसमें सत्य तो और भी नहीं होता। लोगों की शिकायतें कैसे पैदा होती हैं? ऐसे विचार मनुष्य के भीतर से उजागर होते हैं और वे पूरी तरह से उसकी प्रकृति के प्रतिनिधि होते हैं। अगर तुम इन चीज़ों को अपने अंदर से नहीं निकालोगे, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना भी बड़ा हो, सत्य की तुम्हारी समझ कितनी भी अधिक हो, तुम कभी भी आश्वस्त नहीं हो सकते कि तुम उन पर टिक पाओगे। तुम कभी भी परमेश्वर की निंदा करके उसे धोखा दे सकते हो, तुम किसी भी समय और किसी भी जगह सत्य के मार्ग का त्याग कर सकते हो। ऐसा बड़ी आसानी से हो सकता है। क्या तुम्हें ये अब स्पष्ट दिखायी दे रहा है? लोगों को उन बातों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए जो उनकी प्रकृति किसी भी समय प्रकट कर सकती है; उन्हें ध्यानपूर्वक इस समस्या का समाधान करना चाहिए। सत्य की तुलनात्मक रूप से अच्छी समझ वाले लोग, कभी-कभी इस बारे में थोड़े जागरूक होते हैं। जब उन्हें समस्या का पता चलता है तो वे गहराई से आत्मनिरीक्षण और चिंतन कर सकते हैं। हालांकि, कभी कभी उन्हें समस्या की जानकारी नहीं होती, इसीलिए वे कुछ नहीं कर पाते। तब वे केवल इंतजार ही कर सकते हैं कि परमेश्वर भेद खोले या उनके सामने तथ्य उजागर करे। कभी-कभार विचारहीन लोगों को इस बात का पता होता है, लेकिन यह कहकर वे खुद को बहलाते रहते हैं, "सभी लोग ऐसे ही होते हैं, इसलिए इसका कुछ भी मतलब नहीं है। परमेश्वर मुझे माफ़ कर देगा; वो याद नहीं रखेगा। यह सामान्य बात है।" लोगों को जो चुनना चाहिये और जो करना चाहिये, उसे वे न तो करते हैं और न ही उसे हासिल करते हैं। वे सब बेवकूफ़ और बेहद निष्क्रिय होते हैं, और बहुत ही मोहताज होते हैं, यहाँ तक कि निरंकुश सोच में लिप्त रहते हैं, "यदि परमेश्वर हमें एक दिन पूरी तरह से बदल दे, तो फिर हम निष्क्रिय नहीं रहेंगे। फिर हम सही ढंग से आगे बढ़ सकते हैं। फिर परमेश्वर को हमारे लिए इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं होगी।" अब तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए। जिस मार्ग पर तुम चलने वाले हो, वह तुम्हारी अपनी पसंद का होना चाहिए; हर व्यक्ति का चयन बहुत महत्वपूर्ण है। तुम इस बात का पता लगा सकते हो, तो जब बात आत्म-संयम की आती है तब तुम कितने शक्तिशाली हो? जब अपनी इच्छाओं को त्यागने की बात आती है तब तुम कितने शक्तिशाली होते हो? यह सत्य का अभ्यास करने की पूर्व शर्त है और मुख्य तत्व है। जब कभी तुम्हारा सामना किसी मामले से हो और तुम्हें पता हो कि उससे सत्य के अनुरूप कैसे हल करना है, तो तुम उस मामले में तभी आगे बढ़ पाओगे जब तुम इस बात को लेकर स्पष्ट हो कि तुम्हें क्या विकल्प चुनना चाहिए और किस पर अमल करना चाहिए। यदि तुम अपनी दशा में सही और गलत का पता लगा सकते हो, लेकिन फिर भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाते हो और मात्र अपने भ्रमित तरीके से आगे बढ़ रहे हो, तब तुम न तो कभी भी कोई प्रगति कर पाओगे और न ही तुम्हें किसी सफलता का अनुभव हासिल होगा। यदि तुम जीवन-प्रवेश को लेकर गंभीर नहीं हो, तो तुम अपने आपको रोक रहे हो, और इससे यही साबित होता है कि तुम्हें सत्य से प्रेम नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल अपनी खुद की परिस्थितियों को समझ कर तुम सही रास्ते पर चल सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 380

जो लोग सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें गलती का एहसास होता है। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करते हो और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, तब तू परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करेगा। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य-वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है। यदि तू हमेशा देह के अनुसार जीता है, हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करता है, तो ऐसे व्यक्ति में सत्य-वास्तविकता नहीं होती। यह परमेश्वर को लज्जित करने का चिह्न है। तुम कहते हो, "मैंने कुछ नहीं किया; मैंने परमेश्वर को कैसे लज्जित किया है?" तुम्हारे विचारों और ख्यालों में, तुम्हारे कार्यों के पीछे के इरादों, लक्ष्यों और मंशाओं में, और तुमने जो किया है उनके परिणामों में—हर तरीके से तुम शैतान को संतुष्ट कर रहे हो, उसके उपहास के पात्र बनकर उसे अपनी गुप्त बातें बता रहे हो जिसका वो तुम्हारे विरुद्ध इस्तेमाल कर सकता है। एक ईसाई के तौर पर तुम्हारे पास जो गवाही होनी चाहिए, वो दूर-दूर तक भी नहीं है। तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का नाम बदनाम करते हो और तुम्हारे पास सच्ची गवाही नहीं है। क्या परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए कृत्यों को याद रखेगा? अंत में, परमेश्वर तुम्हारे कृत्यों और कर्तव्य के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेगा? क्या उसका कोई नतीजा नहीं निकलना चाहिए, किसी प्रकार का कोई वक्तव्य नहीं आना चाहिए? बाइबल में, प्रभु यीशु कहता है, "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।'" प्रभु यीशु ने ऐसा क्यों कहा? जो लोग बीमारों को चंगा करते हैं और परमेश्वर के नाम पर दुष्टात्माओं को निकालते हैं, जो परमेश्वर के नाम पर उपदेश देने के लिए यात्रा करते हैं, वे कुकर्मी क्यों हो गए हैं? ये कुकर्मी कौन हैं? क्या ये वो लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते? वे सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। वे परमेश्वर के लिए चीजों का त्याग भी करते हैं, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाकर कर्तव्य निभाते हैं। लेकिन अपना कर्तव्य निभाते समय उनमें भक्ति और गवाही का अभाव होता है, इसलिए यह दुष्टता करना बन गया है। इसलिए प्रभु यीशु कहता है, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।"

वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों का न्याय अच्छे या बुरे के रूप में किया जाता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपने विचारों, अभिव्यक्तियों और कार्यों में तुममें सत्य को व्यवहार में लाने और सत्य-वास्तविकता को जीने की गवाही है या नहीं। यदि तुम्हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो इसमें कोई शक नहीं कि तुम कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को किस नज़र से देखता है? तुम्हारे विचार और बाहरी कर्म परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हरा पाते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और ऐसे निशानों से भरे पड़े हैं जिनसे परमेश्वर शर्मिंदा होता है। तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे रहे, न ही तुम परमेश्वर के लिये अपने आपको खपा रहे हो, तुम परमेश्वर के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे; बल्कि तुम अपने फ़ायदे के लिये काम कर रहे हो। "अपने फ़ायदे के लिए" से क्या अभिप्राय है? शैतान के लिये काम करना। इसलिये, अंत में परमेश्वर यही कहेगा, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।" परमेश्वर की नज़र में तुमने अच्छे कर्म नहीं किये हैं, बल्कि तुम्हारा व्यवहार दुष्टों वाला हो गया है। तुम्हें पुरस्कार नहीं दिया जाएगा और परमेश्वर तुम्हें याद नहीं रखेगा। क्या यह पूरी तरह से व्यर्थ नहीं है? अपने कर्तव्य को निभाने वालो, चाहे तुम सत्य को कितनी भी गहराई से क्यों न समझो, यदि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना चाहते हो, तो अभ्यास का सबसे सरल तरीका यह है कि तुम जो भी काम करो, उसमें परमेश्वर के घर के हित के बारे में सोचो, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं, इरादों, सम्मान और हैसियत को त्याग दो। परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखो—तुम्हें कम से कम यह तो करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य करने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपने कर्तव्य को पूरा करना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों का, परमेश्वर के हितों का, उसके कार्य का ध्यान रखना चाहिए, और इन विचारों को पहला स्थान देना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि जब तुम इसे इन चरणों में बाँट देते हो और कुछ समझौता कर लेते हो तो यह थोड़ा आसान हो जाता है? यदि तुम ऐसा कुछ समय के लिए कर लो, तो तुम यह अनुभव करने लगोगे कि परमेश्वर को संतुष्ट करना मुश्किल नहीं है। इसके साथ ही, यदि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा सको, अपने दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा कर सको, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं और इरादों को त्याग सको, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रख सको, और परमेश्वर तथा उसके घर के हितों को सर्वोपरि रख सको, तो इस तरह से कुछ समय अनुभव करने के बाद, तुम पाओगे कि यह जीने का एक अच्छा तरीका है। नीच या निकम्मा व्यक्ति बने बिना, यह सरलता और नेकी से जीना है, न्यायसंगत और सम्मानित ढंग से जीना है, एक संकुचित मन वाले या ओछे व्यक्ति की तरह नहीं। तुम पाओगे कि किसी व्यक्ति को ऐसे ही जीना और काम करना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को पूरा करने की तुम्हारी इच्छा घटती चली जाएगी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 381

अधिकांश लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष ज़ोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ निश्चित परिवर्तन आते हैं। परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करने के बाद वे दूसरों के साथ वाद-विवाद करना, लोगों को अपमानित करना और उनके साथ लड़ना-झगड़ना, धूम्रपान और मद्यपान करना, कोई भी सार्वजनिक संपत्ति—चाहे वह एक कील या लकड़ी का तख्ता ही क्यों न हो—चुराना बंद कर देते हैं, और वे इस सीमा तक जाते हैं कि जब भी उन्हें नुकसान उठाने पड़ते हैं या उनके साथ गलत बर्ताव किया जाता है, वे उसे अदालतों में नहीं ले जाते। निस्संदेह, उनके व्यवहार में कुछ परिवर्तन ज़रूर आते हैं। चूँकि, एक बार परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, सच्चा मार्ग स्वीकार करना लोगों को विशेष रूप से अच्छा महसूस करवाता है, और चूँकि अब उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य के अनुग्रह का स्वाद भी चख लिया है, वे विशेष रूप से उत्साहित हैं, और यहाँ तक कि कुछ भी ऐसा नहीं होता है जिसका वे त्याग नहीं कर सकते या जिसे वे सहन नहीं कर सकते। लेकिन फिर भी तीन, पांच, दस या तीस साल तक विश्वास करने के बाद, जीवन-स्वभावों में कोई परिवर्तन न होने के कारण, वे पुराने तौर-तरीके फिर से अपना लेते हैं; उनका अहंकार और घमंड बढ़कर और अधिक मुखर हो जाता है, वे सत्ता और मुनाफे के लिए होड़ करना शुरू कर देते हैं, वे कलीसिया के धन के लिए ललचाते हैं, वे स्वयं अपने हितसाधन के लिए कुछ भी करते हैं, वे रुतबे और सुख-सुविधाओं के लिए लालायित रहते हैं, और वे परमेश्वर के घर के परजीवी बन गए हैं। खासकर अगुआओं के रूप में सेवा करने वाले अधिकांश व्यक्तियों को लोगों द्वारा त्याग दिया जाता है। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? महज व्यवाहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनके पतित पक्ष स्वयं को दिखाएंगे। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है। पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या अस्थायी दयालुता दिखाना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है; मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ होते हैं। एक व्यक्ति का व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उसका जीवन है, उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही जीवन का, साथ ही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्मनिष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य ढंग से उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यवहारात्मक परिवर्तन क्षणिक भ्रम के अलावा कुछ नहीं हैं; वे जोशो-ख़रोश का प्रस्फुटन हैं। उन्हें जीवन की अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 382

लोगों का व्यवहार अच्छा हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके अंदर सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; लेकिन जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, न ही सिद्धांत सत्य का स्थान ले सकता है। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बनकर देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। जो लोग स्वभाव में परिवर्तन से गुज़रे हैं, उनके बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और कार्य करते समय तो वे सापेक्ष सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता नहीं दिखाते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्म-तुष्टि और दंभ नहीं दिखाते। वे अपनी प्रकट हुई भ्रष्टता में से काफ़ी कुछ समझ-बूझ लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। मनुष्य का क्या स्थान है, कैसे उचित व्यवहार करना है, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना है, क्या कहना और क्या नहीं कहना है, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना है, इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के लोग अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं। जिन लोगों का स्वभाव बदल जाता है, वे वास्तव में एक मनुष्य के समान जीवन जीते हैं, और उनमें सत्य होता है। वे हमेशा सत्य के अनुरूप बोलने और चीज़ों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, सैद्धांतिक रूप से करते हैं; वे किसी व्यक्ति, मामले या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उन सभी का अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य-सिद्धांत को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव सापेक्षिक रूप से स्थिर होता है, वे असंतुलित नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाना है और परमेश्वर की संतुष्टि के लिए कैसे व्यवहार करना है। जिन लोगों के स्वभाव वास्तव में बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि सतही तौर पर स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए क्या किया जाए; परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है, इस पर उन्होंने आंतरिक स्पष्टता पा ली है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसा न लगे कि उन्होंने कुछ बड़ा किया है, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम व्यावहारिक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत सत्य होता है, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और सैद्धांतिक कार्यों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों में सत्य नहीं है, उनके स्वभाव में कोई बिलकुल परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है; यह मुख्य रूप से उन घटनाओं को संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष, परमेश्वर का ज्ञान पा लेने और सत्य समझ लेने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को दूर कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ऐसे लोगों के भीतर जड़ें जमा लेता है, उनका जीवन बन जाता है, और उनके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बनते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव रूपांतरित होता है। स्वभाव में रूपांतरण का मतलब यह नहीं है कि उनका बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हो गया है, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या वे पहले किसी की नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के रूपांतरण में ये अवस्थाएँ और अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि अंदर से उनका जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर का शैतानी विष निकाल दिया गया है, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया है और उनमें से कुछ भी दुनिया के अनुसार नहीं है। ये लोग बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विष को उनके असल रूप में स्पष्टता से देख सकते हैं; उन्होंने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इस तरह उनके जीवन के मूल्य बदल गए हैं, और यह सबसे मौलिक किस्म का रूपांतरण है और स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 383

स्वभाव में रूपांतरण, व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता, न ही यह झूठा बाह्य परिवर्तन होता है, यह एक अस्थायी जोशीला परिवर्तन भी नहीं होता; बल्कि यह स्वभाव का एक सच्चा रूपांतरण है जो व्यवहार में बदलाव लाता है। व्यवहार में आया ऐसा परिवर्तन बाहरी व्यवहार में और कार्यों में परिवर्तन के समान नहीं होता। स्वभाव के रूपांतरण का अर्थ है कि तुमने सत्य को समझा और अनुभव किया है, और सत्य तुम्हारा जीवन बन गया है। अतीत में, तुमने इस मामले के सत्य को समझा तो था, लेकिन तुम इस पर अमल नहीं कर पाए थे; सत्य तुम्हारे लिए मात्र एक ऐसे सिद्धांत की तरह था जो टिकता ही नहीं था। अब चूँकि तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित हो गया है, तुम न केवल सत्य को समझते हो, बल्कि तुम सत्य के अनुसार कार्य भी करते हो। अब तुम उन चीज़ों से जिनके तुम पहले शौकीन थे; जो तुम पहले करना चाहते थे, साथ ही अपनी कल्पनाओं और धारणाओं से छुटकारा पाने में सक्षम हो। अब तुम उन चीज़ों को छोड़ देने में सक्षम हो जिन्हें तुम अतीत में नहीं छोड़ पाते थे। यह स्वभाव का रूपांतरण है और यह तुम्हारे स्वभाव के रूपांतरित होने की प्रक्रिया भी है। सुनने में यह बहुत सरल लगता है, लेकिन वास्तव में, जो व्यक्ति इस प्रक्रिया से गुजर रहा होता है, उसे बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, शरीर पर काबू पाना होता है और शरीर के उन पहलुओं का त्याग करना पड़ता है जो उसकी प्रकृति का अंग हैं। ऐसे व्यक्ति को व्यवहार, काट-छाँट, ताड़ना, न्याय, परीक्षणों और शुद्धिकरण से भी गुज़रना पड़ता है। इन सबका अनुभव करने के बाद ही कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति को समझ सकता है। हालाँकि कुछ समझ होने का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति तुरंत बदल सकता है; इस प्रक्रिया में उसे कठिनाइयाँ भी सहनी होंगी। इसी तरह, क्या किसी चीज़ को समझते ही, तुम उस पर अमल कर सकते हो? तुम उस पर तुरंत अमल नहीं कर सकते। तुम्हारी समझ के बावजूद, लोग तुम्हारी काट-छाँट और निपटारा करते हैं, और परिवेश तुम्हें सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी, लोग इसे झेलने को तैयार नहीं होते और कहते हैं, "मैं इसे उस तरह से क्यों नहीं कर सकता? क्या मुझे इसको इसी तरह से करना होगा?" दूसरों का कहना है, "यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें इसे इसी तरह करना चाहिए। इसे इस तरह से करना सत्य के अनुसार है।" जब लोग एक निश्चित बिंदु तक पहुंचकर कुछ परीक्षणों का अनुभव कर लेते हैं और परमेश्वर की इच्छा और कुछ सत्यों को समझ जाते हैं, तब वे थोड़े खुश होकर सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। शुरू में लोग सत्य पर अमल करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, पूरे समर्पण भाव से कर्तव्यों के निर्वहन को ही लो। तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के प्रति वफादार होने की कुछ समझ है, और तुम उससे जुड़े सत्यों को समझते भी हो, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित कब होगे? नाम और कर्म में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कब करोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है; शायद कुछ लोग तुम्हारे साथ निपटें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी आँखें तुम पर टिकी होंगी, तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम्हीं ने अच्छा काम नहीं किया, कर्तव्यों के निर्वहन में समर्पण की कमी को बर्दाश्त नहीं किया जाता, तुम लापरवाह या अन्यमनस्क नहीं हो सकते। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम अपने बारे में कुछ बातें समझोगे और जानोगे कि तुम बहुत अपवित्र हो, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी अनियंत्रित इच्छाएँ हैं। जब तुम इन चीज़ों के सार को समझ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के समक्ष आकर, उससे प्रार्थना करके सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो; इस तरह तुम अशुद्धियों से मुक्त हो सकते हो। यदि इस तरह अपनी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम बढ़ा सकोगे। किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव जितना शुद्ध किया जाएगा, उसका जीवन स्वभाव उतना ही रूपांतरित होगा।

सार रूप में, अब तुम सच्चे दिल से अपने कर्तव्यों को कितना पूरा कर रहे हो? अपने स्वभाव में रूपांतरण के बाद, तुम सत्य के अनुसार अपने कर्तव्यों को कितनी अच्छी तरह पूरा कर रहे हो? इसकी जाँच करके, तुम जान सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव वास्तव में कितना रूपांतरित हुआ है। स्वभाव में रूपांतरण लाना कोई आसान काम नहीं है; इसका मतलब महज़ व्यवहार में थोड-सा बदलाव लाना और सत्य का थोड़ा ज्ञान हासिल कर लेना, सत्य के हर पहलू के बारे में अपने अनुभव पर थोड़ा बात कर लेना, या थोड़ा-सा बदल जाना, अनुशासित किए जाने के बाद थोड़ा-सा आज्ञाकारी हो जाना नहीं है। ये चीज़ें जीवन स्वभाव में रूपांतरण का अंग नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? भले ही तुम थोड़ा-बहुत बदल गए हो, लेकिन तुम अभी भी सही मायने में सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो। तुम शायद इस तरह से व्यवहार इसलिए करते हो क्योंकि तुम कुछ समय के लिए उपयुक्त परिवेश में और अनुकूल स्थिति में हो या तुम्हारी वर्तमान परिस्थितियों ने तुम्हें इस तरह से व्यवहार करने के लिए मजबूर किया है। साथ ही, जब तुम्हारी मन:स्थिति स्थिर हो और पवित्र आत्मा कार्यरत हो, तो तुम अभ्यास कर पाते हो। यदि तुम अय्यूब की तरह परीक्षणों से गुज़रकर कष्ट उठा रहे होते, या पतरस की तरह जिसे परमेश्वर ने मर जाने के लिए कहा था, क्या तुम यह कह पाते, "अगर तुम्हें जानने के बाद मैं मर भी जाऊं, तो कोई बात नहीं"? स्वभाव में रूपांतरण कोई रातोंरात नहीं होता, और न ही इसका मतलब यह है कि सत्य को समझकर तुम प्रत्येक वातावरण में सत्य को अभ्यास में ला पाओगे। इससे मनुष्य की प्रकृति जुड़ी हुई है। ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे कृत्यों की प्रकृति यह नहीं दर्शाती कि तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। कई लोगों के बाहरी व्यवहार निश्चित प्रकार के होते हैं, जैसे, अपने परिवार और काम-धंधे का त्याग करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाना, इसलिए वो मानते हैं कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन परमेश्वर नहीं मानता कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर तुम्हारे हर काम के पीछे व्यक्तिगत इरादे हों और यह दूषित हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो; तुम्हारा आचरण केवल बाहरी दिखावा है। सच कहें, तो परमेश्वर तुम्हारे आचरण की निंदा करेगा; वह इसकी प्रशंसा नहीं करेगा या इसे याद नहीं रखेगा। इसका आगे विश्लेषण करें तो, तुम दुष्टता कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से देखने पर तो तुम किसी चीज़ में अवरोध या व्यवधान नहीं डाल रहे हो और तुमने वास्तविक क्षति नहीं पहुंचाई है या किसी सत्य का उल्लंघन नहीं किया है। यह न्यायसंगत और उचित लगता है, मगर तुम्हारे कृत्यों का सार दुष्टता करने और परमेश्वर का विरोध करने से संबंधित है। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने कृत्यों के पीछे के अभिप्रायों को देखकर तुम्हें निश्चित करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है, क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस इंसानी नज़रिए पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे कृत्य इंसानी कल्पनाओं और इरादों के अनुरूप हैं या नहीं या वो तुम्हारी रुचि के उपयुक्त हैं या नहीं; ऐसी चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि, यह इस बात पर आधारित है कि परमेश्वर की नज़रों में तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं, तुम्हारे कृत्यों में सत्य-वास्तविकता है या नहीं, और वे उसकी अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आपको मापना ही सही है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब समस्या के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक भागते-दौड़ते हो, तुम लोग जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित नहीं हुआ है, और तुम इस बात को समझ नहीं सकते कि इस रूपांतरण में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? भले ही तुम अधिक समय से परमेश्वर में आस्था रखते आ रहे हो, लेकिन हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में रूपांतरण हासिल करने के सार और उसकी गहराई को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में ज़बर्दस्त दृढ़ता महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के घर में कोई काम कर रहे हो, या सामान्य तौर पर भी, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम्हारा आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होगा, और जब तुम्हारे पास कुछ हद तक अनुभव हो जाएगा, तो तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक अनुभव प्राप्त करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और वास्तव में तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों में कोई सत्यता नहीं थी, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोह, प्रतिरोध और मानवीय व्यवहार से भरी हुई थी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 384

यह मापने में कि लोग परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं या नहीं, मुख्य बात यह देखना है कि वे परमेश्वर से असाधारण माँगें कर रहे हैं या नहीं, और उनके गुप्त अभिप्राय हैं या नहीं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके आज्ञाकारी नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से प्राप्त नहीं कर सकते, सत्य की तलाश नहीं कर सकते, हमेशा अपने व्यक्तिपरक तर्क से बात करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि केवल तुम ही सही हो, और यहाँ तक कि अभी भी परमेश्वर पर संदेह करने में सक्षम हो, तो तुम मुश्किल में रहोगे। ऐसे लोग सबसे घमंडी एवं परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच में आज्ञापालन नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपने ही विचार चुन रहे हो, और अपने विचारों के अनुसार ही कार्य कर रहे हो। इसमें तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, और तुममें आज्ञाकारिता नहीं है। परमेश्वर से माँग करना नासमझी है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँग करने की हिम्मत नहीं करोगे, न ही तुम उससे माँग करने के योग्य होगे, चाहे वे माँगें उचित हों या न हों। अगर तुममें सच्चा विश्वास है, और तुम मानते हो कि वह परमेश्वर है, तो तुम्हारे पास उसकी आराधना करने और उसका आज्ञापालन करने के अलावा कोई विकल्प न होगा। आज न सिर्फ़ लोगों के पास विकल्प है, बल्कि वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर उनके विचारों के अनुसार कार्य करे। वे अपने खुद के विचार चुनते हैं और कहते हैं कि परमेश्वर उनके अनुसार कार्य करे, और वे खुद से यह अपेक्षा नहीं करते कि वे परमेश्वर के विचारों के अनुसार कार्य करें। इसलिए, मनुष्य में कोई सच्चा विश्वास नहीं होता, कोई सारभूत विश्वास नहीं होता, और वे कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा नहीं पा सकते। जब तुम परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम हो जाओगे, तो तुम्हारे सच्चे विश्वास और तुम्हारी आज्ञाकारिता में वृद्धि होगी, और तुम्हारी तार्किक समझ भी अपेक्षाकृत सामान्य हो जाएगी। अक्सर ऐसा होता है कि लोग तर्क करने में जितने अधिक प्रवृत्त होते हैं, और जितना अधिक वे औचित्य बताते हैं, उतना ही अधिक कठिन उनसे निपटना होता है। न केवल उनकी बहुत-सी माँगें होती हैं, बल्कि उंगली पकड़ाओ तो सर पर चढ़ जाते हैं। एक क्षेत्र में संतुष्ट होने पर वे दूसरे क्षेत्र में माँग करने लगते हैं, उन्हें सभी क्षेत्रों में संतुष्ट होना होता है, वरना वे शिकायत करना शुरू कर देते हैं, और खुद से आशा रखना बंद कर देते हैं। बाद में वे कृतज्ञ और पछतावा महसूस करते हैं, फूट-फूटकर रोते हैं और मरना चाहते हैं। इसका क्या फायदा? क्या इससे समस्या हल हो सकती है? और इसलिए, कुछ होने से पहले, तुम्हें अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए—उसके भीतर क्या चीज़ें हैं, तुम क्या पसंद करते हो, और अपनी माँगों से तुम क्या हासिल करना चाहते हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि उनमें कुछ क्षमता और प्रतिभा है, और वे अगुआ बनकर दूसरों से ऊपर उठना चाहते हैं, इसलिए वे माँग करते हैं कि परमेश्वर उनका उपयोग करे। और यदि परमेश्वर उनका उपयोग न करे, तो वे कहते हैं : "परमेश्वर, तुम मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं करते? मेरा खूब उपयोग करो, मैं गारंटी देता हूँ कि मैं तुम्हारे लिए खुद को खपाऊँगा।" क्या ऐसी प्रेरणाएँ सही हैं? परमेश्वर के लिए खुद को खपाना अच्छी बात है, लेकिन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की उनकी इच्छा दूसरे स्थान पर रहती है; जबकि मन ही मन ऐसे लोग हैसियत चाहते हैं—उसी पर उनका ध्यान रहता है। यदि तुम वास्तव में आज्ञापालन करने में सक्षम हो, तो तुम इस बात की परवाह किए बिना कि वह तुम्हारा उपयोग करता है या नहीं, तुम एक चित्त और एक मन से उसका अनुसरण करोगे, और तुम इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारी कोई हैसियत है या नहीं, स्वयं को खपाने में सक्षम होगे। तभी तुममें समझ होगी और तभी तुम परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाले व्यक्ति होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 385

सृजित प्राणी का अपने सृष्टिकर्ता के प्रति जो एकमात्र दृष्टिकोण होना चाहिए, वह है आज्ञाकारिता, ऐसी आज्ञाकारिता जो बेशर्त हो। यह ऐसी चीज़ है, जिसे आज कुछ लोग स्वीकार करने में असमर्थ हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और उसमें सत्य-वास्तविकता नहीं है। अगर तुम्हारी अवस्था ऐसी ही है तो फिर तुम परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाने से बहुत दूर हो। हालाँकि मनुष्य को परमेश्वर के वचन द्वारा पोषण और सिंचन प्रदान किया जाता है, फिर भी मनुष्य वास्तव में एक ही चीज़ की तैयारी कर रहा है। वह अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त, पूर्ण समर्पण करने में सक्षम होना है, जिस बिंदु पर तुम, एक सृजित प्राणी, आवश्यक मानक तक पहुँच गए होगे। कभी-कभी परमेश्वर जानबूझकर ऐसे कार्य करता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाते, जो तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ जाता है, या जो सिद्धांतों तक के ख़िलाफ़ जाता प्रतीत होता है, या इंसानी भावनाओं, इंसानियत या संवेदनाओं के ख़िलाफ़ जाता है, और जिसे तुम स्वीकार नहीं कर पाते या समझ नहीं पाते। इसे तुम किसी भी तरीके से देखो, यह सही नहीं लगता, तुम इसे बिलकुल स्वीकार नहीं कर पाते, और तुम्हें लगता है कि उसने जो किया है, वह बिलकुल अनुचित है। तो इन कामों को करने में परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? यह तुम्हें परखने के लिए है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह कैसे और क्यों करता है, तुम्हें इसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है; तुम्हें बस इतना ही करना है कि अपना यह विश्वास बनाए रखो कि वह सत्य है, और यह पहचानो कि वह तुम्हारा सृजनकर्ता है, तुम्हारा परमेश्वर है। यह सारे सत्यों से ऊँचा है, सारे सांसारिक ज्ञान से ऊँचा है, मनुष्य की तथाकथित नैतिकता, नीति, ज्ञान, शिक्षा, दर्शन या पारंपरिक संस्कृति से ऊँचा है, यहाँ तक कि यह लोगों के बीच स्नेह, मैत्री या तथाकथित प्रेम से भी ऊँचा है—यह अन्य किसी भी चीज़ से ऊँचा है। यदि तुम इसे न समझ पाओ, तो देर-सबेर, तुम्हारे साथ कुछ होने पर, अंतत: पश्चात्ताप करने और परमेश्वर की मनोहरता महसूस करने से पहले और परमेश्वर द्वारा तुम पर किए जाने वाले कार्य का अर्थ समझने से पहले, तुम परमेश्वर से विद्रोह करके भटक सकते हो, या इससे भी बदतर, तुम इसके कारण लड़खड़ाकर गिर सकते हो। ... भले ही लोगों ने परमेश्वर पर कितने ही समय तक विश्वास किया हो, वे कितनी भी दूर तक साथ चले हों, उन्होंने कितना भी काम किया हो और कितने भी कर्तव्य निभाए हों, यह सारा समय उन्हें एक ही चीज़ के लिए तैयार करता रहा है : तुम अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण करने में सक्षम हो जाओ। तो "बेशर्त" का क्या मतलब है? इसका मतलब है, अपने व्यक्तिगत कारणों को नज़रअंदाज़ करना, अपने व्यक्तिपरक तर्कों को नज़रअंदाज़ करना, और किसी भी चीज़ पर कहा-सुनी नहीं करना : तुम एक सृजित प्राणी हो, और तुम योग्य नहीं हो। जब तुम परमेश्वर से कहा-सुनी करते हो, तो तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के सामने अपने को सही ठहराने का प्रयास करते हो, तो एक बार फिर तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के साथ बहस करते हो, जब तुम यह पता लगाने के लिए कि वास्तव में क्या हो रहा है, कारण जानना चाहते हो, यदि तुम पहले समझे बिना आज्ञापालन नहीं कर सकते, और सब-कुछ स्पष्ट हो जाने के बाद ही समर्पण करोगे, तो तुम एक बार फिर गलत स्थिति में हो। जब तुम जिस स्थिति में हो, वह गलत है, तो क्या परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता पूर्ण है? क्या तुम परमेश्वर के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हो जैसा कि किया जाना चाहिए? क्या तुम पूरी सृष्टि के प्रभु के रूप में उसकी आराधना करते हो? नहीं, तुम वैसा व्यवहार नहीं कर रहे, जिसके कारण परमेश्वर तुम्हें नहीं पहचानता। परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण हासिल करने के लिए कौन-सी चीज़ें तुम्हें सक्षम बना सकती हैं? उसका अनुभव कैसे किया जा सकता है? एक ओर, थोड़े विवेक और सामान्य मानवता की समझ की आवश्यकता है; दूसरी ओर, अपने कर्तव्य पूरे करते हुए तुम्हें सत्य के प्रत्येक पहलू को समझना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सको। कभी-कभी मनुष्य की क्षमता कम पड़ जाती है और उसके पास सभी सत्यों को समझने की ताकत या ऊर्जा नहीं होती। लेकिन एक चीज़ है : परिवेश, लोगों, घटनाओं और उन चीज़ों के बावजूद, जो तुम पर आती हैं और जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, तुम्हें हमेशा एक आज्ञाकारी रवैया रखना चाहिए और कारण नहीं पूछना चाहिए। अगर यह रवैया भी तुम्हारी समझ से परे है, और तुम परमेश्वर से सतर्क रहने, उसके बारे में संदेह करने और मन-ही-मन यह सोचने की हद तक भी जा सकते हो कि "मुझे सोचना होगा कि परमेश्वर जो कर रहा है, वह वास्तव में धार्मिक है या नहीं? वे कहते हैं कि परमेश्वर प्रेम है, तो चलो देखते हैं कि वह जो मेरे साथ कर रहा है, उसमें प्रेम है या नहीं, और क्या यह वास्तव में प्रेम ही है?" यदि तुम हमेशा इस बात की जाँच करते हो कि परमेश्वर जो कर रहा है, वह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप है या नहीं, यह देखते हो कि परमेश्वर वही कर रहा है या नहीं जो तुम्हें पसंद है, यहाँ तक कि वह उसका अनुपालन करता है या नहीं जिसे तुम सत्य मानते हो, तो तुम्हारी स्थिति गलत है, इससे तुम्हें परेशानी होगी और इसकी संभावना होगी कि तुम परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर बैठो।

— "मसीह-विरोधियों की प्रकृति और सार को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (II)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 386

असफल होना और कई बार नीचे गिरना कोई बुरी बात नहीं है; न ही उजागर किया जाना कोई बुरी बात है। चाहे तुम्हारा निपटारा किया गया हो, तुम्हें काटा-छाँटा गया हो या उजागर किया गया हो, तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए : उजागर होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी निंदा की जा रही है। उजागर किया जाना अच्छी बात है; यह स्वयं को जानने का सबसे अच्छा अवसर है। यह तुम्हारे जीवन अनुभव को गति दे सकता है। इसके बिना, तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न ही परिस्थिति, और न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ तक पहुँचने में सक्षम होने के लिए कोई प्रासंगिक आधार होगा। यदि तुम्हें अपने अंदर की चीज़ों के बारे में पता चल जाये, तुम्हारे भीतर छिपी उन गहरी बातों के हर पहलू का भी पता चल जाये, जिन्हें पहचानना मुश्किल है और जिनका पता लगाना कठिन है, तो यह अच्छी बात है। स्वयं को सही मायने में जानने में सक्षम होना, तुम्हारे लिए अपने तरीकों में बदलाव कर एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; तुम्हारे लिए यह नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लोगे, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही अनमोल होता है, तुममें सत्य की प्यास जगेगी और तुम वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह कितनी बड़ी बात है! यदि तुम इस अवसर को थाम सको और ईमानदारी से मनन कर सको, तो कभी भी असफल होने या नीचे गिरने पर स्वयं के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, तब तुम नकारात्मकता और कमज़ोरी में भी फिर से खड़े हो सकोगे। एक बार जब तुम इस सीमा को लांघ लोगे, तो फिर तुम एक बड़ा कदम उठा सकोगे और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे।

यदि तुम परमेश्वर के शासन में विश्वास करते हो, तो तुम्हें यह विश्वास करना होगा कि हर दिन जो भी अच्छा-बुरा होता है, वो यूँ ही नहीं होता। ऐसा नहीं है कि कोई जानबूझकर तुम पर सख़्त हो रहा है या तुम पर निशाना साध रहा है; यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित है। परमेश्वर इन चीज़ों को किस लिए आयोजित करता है? यह तुम्हारी वास्तविकता को प्रकट करने के लिए या तुम्हें उजागर करने के लिए नहीं है; तुम्हें उजागर करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तुम्हें पूर्ण बनाना और बचाना है। परमेश्वर ऐसा कैसे करता है? सबसे पहले, वह तुम्हें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव, प्रकृति, सार, तुम्हारे दोषों और कमियों से अवगत कराता है। उन्हें साफ तौर पर समझकर और जानकर ही तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर कर सकते हो। यह परमेश्वर का तुम्हें एक अवसर प्रदान करना है। तुम्हें यह जानना होगा कि इस अवसर को कैसे पाया जाए, और तुम्हें परमेश्वर के साथ लड़ाई में नहीं उलझना है। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है, सदा यह मत सोचो कि चीजें तुम्हारे मन के हिसाब से नहीं हैं; हमेशा उनसे बच निकलने की मत सोचो, परमेश्वर को दोष मत दो या उसे गलत मत समझो। अगर तुम लगातार ऐसा कर रहे हो तो तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और इससे तुम्हारे लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ऐसी कोई भी समस्या आए जिसे तुम समझ न पाओ, तो तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम्हारी आंतरिक स्थिति में एक बदलाव आएगा और तुम अपनी समस्या को हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाओगे। इस तरह तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर पाओगे। जब ऐसा होगा, तो तुम्हारे भीतर सत्य-वास्तविकता गढ़ी जायेगी, और इस तरह से तुम प्रगति करोगे और तुम्हारे जीवन की स्थिति का रूपांतरण होगा। एक बार जब ये बदलाव आएगा और तुममें सत्य-वास्तविकता होगी, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, और आध्यात्मिक कद के साथ जीवन आता है। यदि कोई हमेशा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के आधार पर जीता है, तो फिर चाहे उसमें कितना ही उत्साह या ऊर्जा क्यों न हो, उसे आध्यात्मिक कद, या जीवन धारण करने वाला नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसकी बातों का लहजा कैसा है, परमेश्वर का केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है : तुम्हें बचाना। तुम्हें बचाने से पहले, उसे तुम्हें रूपांतरित करना है, तो तुम थोड़ी-सी पीड़ा कैसे नहीं सह सकते? तुम्हें पीड़ा तो सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हैं। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हारे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तुम खुद को जान सको या फिर सीधे तुम्हारे साथ निपटा जा सके, तुम्हारी काट-छाँट करके तुम्हें उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—अच्छे परिणाम के लिए तुम्हें कुछ दर्द तो सहना होगा। यदि जब भी तुम्हारी काट-छाँट होती है और तुमसे निपटा जाता है और जब भी वह लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, इससे तुम्हारी भावनाएँ जागती हैं और तुम्हारे अंदर जोश पैदा होता है, तो यह सही है, तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा और तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यदि, हर बार काटे-छांटे जाने, निपटारा किए जाने, और हर बार परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परिवेश को ऊपर उठाये जाने पर तुम्हें थोड़ी-भी पीड़ा या असुविधा महसूस नहीं होती और कुछ भी महसूस नहीं होता, यदि तुम परमेश्वर के सामने उसकी इच्छा की तलाश नहीं करते, न प्रार्थना करते हो, न ही सत्य की खोज करते हो, तब तुम वास्तव में बहुत संवेदनहीन हो! यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक संवेदनहीन है, और कभी भी आध्यात्मिक रूप से सचेत नहीं रहता, तो परमेश्वर के पास उस पर कार्य करने का कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर कहेगा, "यह व्यक्ति ज़्यादा ही संवेदनहीन है, और बहुत गहराई से भ्रष्ट किया गया है। मैंने जो कुछ कार्य किए हैं, जो कुछ प्रयास किए हैं, उन्हें देखो; मैंने उस पर बहुत कार्य किया है, फिर भी मैं अभी तक उसके दिल को प्रेरित नहीं कर पाया हूँ, न ही मैं उसकी आत्मा को जगा पाया हूँ। यह व्यक्ति परेशानी में पड़ेगा; इसे बचाना आसान न होगा।" यदि परमेश्वर तुम्हारे लिए विशेष परिवेशों, लोगों, चीज़ों और वस्तुओं की व्यवस्था करता है, यदि वह तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारे साथ व्यवहार करता है और यदि तुम इससे सबक सीखते हो, यदि तुमने परमेश्वर के सामने आना सीख लिया है, तुमने सत्य की तलाश करना सीख लिया है, अनजाने में, प्रबुद्ध और रोशन हुए हो और तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है, यदि तुमने इन परिवेशों में बदलाव का अनुभव किया है, पुरस्कार प्राप्त किए हैं और प्रगति की है, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा की थोड़ी-सी समझ प्राप्त करना शुरू कर देते हो और शिकायत करना बंद कर देते हो, तो इन सबका मतलब यह होगा कि तुम इन परिवेशों के परीक्षण के बीच में अडिग रहे हो, और तुमने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। इस तरह से तुमने इस कठिन परीक्षा को पार कर लिया होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 387

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे। तुम सभी जिनका अनुभव इस क्षेत्र में अभी तक सीमित है, तुम्हारे विचार तुम्हारे कार्य को और अधिक दूषित करेंगे। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम पवित्र आत्मा से आए, अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम अपने विचारों के अनुसार अपना कार्य करते हो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को एक किनारे कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम जानते हो कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारी गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि एक तरह की भावना है जो तुम्हारे भीतर से निकली है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम इस तरह से कार्य क्यों करते हो। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है, अधिकांश लोगों में आम तौर पर यह ऐसे ही घटित होता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोच और चिंतन का परिणाम होते हैं और उनमें उनकी मनमानी और उन विचारों की मिलावट होती है जो इससे जुड़े होते हैं कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आत्म-लाभ ढूँढा जा सकता है, और कौन-से निजी फायदे प्राप्त किए जा सकते हैं; हर इंसानी निर्णय में इन बातों का समावेश होता है। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ। उपयुक्त अगुआ और कर्मी पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बिना थके सत्य खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और सही ढंग से उसकी गवाही देने के लिये व्यक्ति को अपने कार्य में मिलावटी तत्वों व इरादों की जाँच करनी चाहिये, और फिर यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि कार्य इंसानी विचारों से कितना प्रेरित है, और कितना पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उत्पन्न हुआ है, और कितना परमेश्वर के वचन के अनुसार है। तुम्हें निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी की जाँच करते रहना चाहिये। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना तुम्हें परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर ले जाएगा। परमेश्वर के इरादों के अनुरूप उसकी सेवा करने के लिए, अनेक सत्यों का होना आवश्यक है। सत्य को समझकर ही लोग भेद करने के काबिल बनते हैं और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनके अपने विचारों से क्या उत्पन्न होता है और उन चीज़ों को भी पहचान पाते हैं जो उनकी प्रेरणा की ओर संकेत करती हैं। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह भी पहचान पाते हैं कि सत्य के अनुसार कार्य करना क्या होता है। तभी वे जान पाएंगे कि और अधिक शुद्धता से समर्पण कैसे करें। सत्य के बिना लोगों के लिए भेद कर पाना असंभव है। एक नासमझ व्यक्ति शायद आजीवन परमेश्वर पर विश्वास करे, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने का क्या अर्थ होता है या परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ होता है, क्योंकि वह सत्य नहीं समझता; उसके मन में वह विचार ही मौजूद नहीं है। सत्य बेहद निम्न क्षमता के लोगों की पहुँच से बाहर होता है; तुम उनके साथ किसी भी प्रकार से संगति करो, फिर भी वे नहीं समझते। ऐसे लोग संभ्रमित होते हैं। इस प्रकार के संभ्रमित लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; वो छोटी-मोटी सेवा ही कर सकते हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को करने के लिए, इन दो सिद्धांतों को समझना आवश्यक है। ऊपर से दिए गये कार्य के प्रबंधनों का पालन कड़ाई से करना होगा, और पवित्र आत्मा के किसी भी मार्गदर्शन का पालन करने पर ध्यान देना होगा। जब इन दोनों सिद्धांतों को समझ लिया जाएगा, तभी कार्य प्रभावशाली होगा और परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्टि मिलेगीl

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 388

पतरस ने स्वयं को जानने का और यह देखने का प्रयत्न किया था कि परमेश्वर के वचनों के शुद्धिकरण से और परमेश्वर द्वारा उसके लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न परीक्षणों के भीतर उसमें क्या प्रकट हुआ था। जब वह वास्तव में खुद को समझने लगा, तो पतरस को एहसास हुआ कि मनुष्य कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने की दृष्टि से कितने बेकार और अयोग्य हैं, और कि वे परमेश्वर के समक्ष जीने के लायक नहीं है। पतरस तब परमेश्वर के सामने दंडवत हो गया। अंतत:, उसने सोचा, "परमेश्वर को जानना सबसे मूल्यवान है! अगर मैं परमेश्वर को जानने से पहले मर गया, तो यह बहुत दयनीय होगा; मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे अर्थपूर्ण बात है। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, तो वह जीने के योग्य नहीं है, और उसके पास कोई जीवन नहीं है।" जब तक पतरस का अनुभव इस बिंदु तक पहुँचा, तब तक वह अपनी प्रकृति को जान गया था और उसने उसकी अपेक्षाकृत अच्छी समझ हासिल कर ली थी। हालाँकि वह शायद इसे उतनी अच्छी तरह नहीं समझा पाता जितनी स्पष्टता के साथ आजकल लोग समझाने में सक्षम होंगे, लेकिन वह निस्संदेह इस स्थिति में पहुँच गया था। इसलिए, जीवन की खोज करने और परमेश्वर से पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों के भीतर से अपने स्वभाव की गहरी समझ प्राप्त करने, और साथ ही अपनी प्रकृति के पहलुओं को समझने और शब्दों में उसका सटीक रूप से वर्णन करने, स्पष्ट और सादे ढंग से बोलने की ज़रूरत है। सही मायने में खुद को जानना यही है और फिर तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर लोगे। यदि तुम्हारा ज्ञान इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है, फिर भी तुम खुद को समझने का दावा करते हो और कहते हो कि तुमने जीवन प्राप्त कर लिया है, तो क्या तुम केवल डींग नहीं मार रहे हो? तुम खुद को नहीं जानते, और न ही तुम यह जानते हो कि तुम परमेश्वर के सामने क्या हो, तुमने वास्तव में एक इंसान होने के मानक पूरे कर लिए हैं या नहीं, या तुम्हारे भीतर अभी भी कितने शैतानी तत्त्व हैं। तुम अभी भी इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम किससे संबंधित हो, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान नहीं है—फिर परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास विवेक कैसे हो सकता है? जब पतरस जीवन की खोज कर रहा था, तो उसने खुद को समझने और अपने परीक्षणों के दौरान अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित किया, और उसने परमेश्वर को जानने का प्रयास किया, और अंत में उसने सोचा, "लोगों को जीवन में परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करनी चाहिए; उसे जानना सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। अगर मैं परमेश्वर को नहीं जानता, तो मरने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी। परमेश्वर को जान लेने के बाद, अगर वह मुझे मरने देता है, तो भी मैं ऐसा करने में सर्वाधिक कृतज्ञ महसूस करूँगा; मैं ज़रा भी शिकायत नहीं करूँगा, और मेरा पूरा जीवन सफल हो चुका होगा।" पतरस समझ का यह स्तर हासिल करने या इस बिंदु पर पहुँचने में परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के तुरंत बाद ही सक्षम नहीं हो गया था; पहले उसे बहुत परीक्षणों से गुज़रना पड़ा था। परमेश्वर को जानने का मूल्य समझ सकने से पहले उसके अनुभव को एक निश्चित मील-पत्थर तक पहुँचना पड़ा था, और उसे खुद को पूरी तरह से समझना पड़ा था। इसलिए, पतरस ने जो मार्ग अपनाया, वह जीवन पाने और पूर्ण किए जाने का मार्ग था; उसका विशिष्ट अभ्यास मुख्य रूप से इसी पहलू पर केंद्रित था।

अब तुम लोग किस मार्ग पर चल रहे हो? यदि यह जीवन की तलाश करने, खुद को समझने और परमेश्वर को जानने के मामले में पतरस के समान स्तर का नहीं है, तो तुम पतरस के मार्ग पर नहीं चल रहे हो। इन दिनों, अधिकांश लोग इस तरह की स्थिति में हैं : "आशीष प्राप्त करने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाना होगा और परमेश्वर के लिए कीमत चुकानी होगी। आशीष पाने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग देना चाहिए; मुझे उसके द्वारा सौंपा गया काम पूरा करना चाहिए, और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए।" इस पर आशीष प्राप्त करने का इरादा हावी है, जो अपने आपको पूरी तरह से परमेश्वर से पुरस्कार पाने और मुकुट हासिल करने के उद्देश्य से खपाने का उदाहरण है। ऐसे लोगों के दिल में सत्य नहीं होता, और निश्चित रूप से उनकी समझ केवल सिद्धांत के कुछ शब्दों से युक्त होती है, जिसका वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं दिखावा करते हैं। उनका रास्ता पौलुस का रास्ता है। ऐसे लोगों का विश्वास निरंतर कठिन परिश्रम का कार्य है, और गहराई में उन्हें लगता है कि वे जितना अधिक करेंगे, परमेश्वर के प्रति उनकी निष्ठा उतनी ही अधिक सिद्ध होगी; वे जितना अधिक करेंगे, वह उनसे उतना ही अधिक संतुष्ट होगा; और जितना अधिक वे करेंगे, वे परमेश्वर के सामने मुकुट पाने के लिए उतने ही अधिक योग्य साबित होंगे, और उसके घर में निश्चित रूप से सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करेंगे। वे सोचते हैं कि यदि वे पीड़ा सह सकें, उपदेश दे सकें और मसीह के लिए मर सकें, यदि वे अपने जीवन का त्याग कर सकें, और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए सभी कर्तव्य पूरे कर सकें, तो वे परमेश्वर के सबसे धन्य लोगों में से होंगे—जो सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करते हैं—और फिर उन्हें यकीनन मुकुट प्राप्त हो जाएगा। पौलुस ने भी यही कल्पना की थी और यही चाहा था; वह भी इसी मार्ग पर चला था, और ऐसे ही विचार लेकर उसने परमेश्वर की सेवा करने का काम किया था। क्या इन विचारों और इरादों की उत्पत्ति शैतानी प्रकृति से नहीं होती? यह सांसारिक मनुष्यों की तरह है, जो मानते हैं कि पृथ्वी पर रहते हुए उन्हें ज्ञान की खोज करनी चाहिए, और उसे प्राप्त करने के बाद ही वे भीड़ से अलग दिखायी दे सकते हैं, पदाधिकारी बनकर हैसियत प्राप्त कर सकते हैं; वे सोचते हैं कि जब उनके पास हैसियत हो जाएगी, तो वे अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी कर सकते हैं और अपने घर और व्यवसाय को एक निश्चित मुकाम पर ले जा सकते हैं। क्या सभी अविश्वासी इसी मार्ग पर नहीं चलते? जिन लोगों पर इस शैतानी प्रकृति का वर्चस्व है, वे अपने विश्वास में केवल पौलुस की तरह हो सकते हैं : "मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर सब-कुछ छोड़ देना चाहिए; मुझे उसके समक्ष वफ़ादार होना चाहिए, और अंतत: मुझे सबसे शानदार मुकुट और सबसे बड़ा आशीष मिलेगा।" यह वही रवैया है, जो उन सांसारिक लोगों का होता है, जो सांसारिक चीज़ें पाने की कोशिश करते हैं; वे बिलकुल भी अलग नहीं हैं, और उसी प्रकृति के अधीन हैं। जब लोगों की शैतानी प्रकृति इस प्रकार की होगी, तो दुनिया में वे ज्ञान, हैसियत, शिक्षा प्राप्त करने और भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करेंगे; परमेश्वर के घर में वे खुद को परमेश्वर के लिए खपाने, वफ़ादार होने और अंततः मुकुट और महान आशीष प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। अगर परमेश्वर में विश्वास करने के बाद लोगों में सत्य न हो और वे अपने स्वभाव में बदलाव न लाएँ, तो निश्चित रूप से वे इसी मार्ग पर होंगे। इस वास्तविकता को कोई नहीं नकार सकता, यह एक ऐसा मार्ग है जो पतरस से एकदम विपरीत है। तुम लोग फिलहाल किस मार्ग पर हो? हालाँकि तुमने पौलुस के मार्ग पर चलने की योजना नहीं बनाई होगी, लेकिन तुम्हारी प्रकृति ने यह तय कर दिया है कि तुम उसी मार्ग पर चल रहे हो, और न चाहते हुए भी तुम उसी दिशा में जा रहे हो। हालाँकि तुम पतरस के मार्ग पर चलना चाहते हो, लेकिन अगर तुम्हें यह स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे करना है, तो तुम अनजाने में ही पौलुस के मार्ग पर चल दोगे : स्थिति की यही वास्तविकता है।

इन दिनों वास्तव में पतरस के मार्ग पर कैसे चलना चाहिए? अगर तुम पतरस और पौलुस के मार्गों में अंतर न कर पाओ, या तुम उनसे बिलकुल परिचित नहीं हो, तो तुम पतरस के मार्ग पर चलने का चाहे कितना भी दावा करो, वे सिर्फ खोखले शब्द ही साबित होंगे। तुम्हें पहले तो इस बात का स्पष्ट पता होना चाहिए कि पतरस का मार्ग क्या है और पौलुस का मार्ग क्या है। यदि तुम सचमुच समझते हो कि पतरस का मार्ग ही जीवन का मार्ग है, और वही पूर्णता का एकमात्र मार्ग है, तभी तुम सत्य और उसके मार्ग पर चलने के विशिष्ट तरीकों को जान और समझ पाओगे। यदि तुम पतरस के मार्ग को नहीं समझते, तो तुम्हारे द्वारा लिया गया मार्ग निश्चित रूप से पौलुस का मार्ग होगा, क्योंकि तुम्हारे लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं होगा; तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं होगा। जिन लोगों के अंदर सत्य नहीं है और जिनमें कोई संकल्प नहीं है, उन्हें पतरस के मार्ग पर चलना मुश्किल लगेगा। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने अब तुम्हारे लिए उद्धार और पूर्णता का मार्ग प्रकट कर दिया है। यह परमेश्वर का अनुग्रह और उन्नयन है, और वही पतरस के मार्ग पर तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है। परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के बिना कोई भी पतरस के मार्ग पर नहीं चल पाएगा; पौलुस के विनाशकारी नक्शेकदम पर चलते हुए पौलुस के मार्ग पर आगे बढ़ना ही एकमात्र विकल्प होगा। उस समय पौलुस को यह नहीं लगा कि उस मार्ग पर चलना गलत है; वह पूरी तरह से मानता था कि यह सही है। उसके अंदर सत्य नहीं था, और उसके स्वभाव में कोई बदलाव आया था। वह खुद पर बहुत अधिक विश्वास करता था, और सोचता था कि उस मार्ग पर जाने में कोई समस्या नहीं है। आत्मविश्वास से भरकर और पूरी तरह से आश्वस्त होकर वह आगे बढ़ता रहा। उसे अंत तक होश नहीं आया; फिर भी वो यही सोचता रहा कि उसके लिए जीना ही मसीह है। इस प्रकार, पौलुस अंत तक उसी मार्ग पर चलता रहा, और अंततः जब उसे दंडित किया गया, तब तक उसके लिए सब-कुछ खत्म हो चुका था। पौलुस का मार्ग खुद को जानने का मार्ग नहीं था, स्वभाव में बदलाव लाने की खोज करने की तो बात ही छोड़ो। उसने कभी अपनी प्रकृति का विश्लेषण नहीं किया, न ही उसने इसका कोई ज्ञान प्राप्त किया कि वह क्या है; वह बस इतना जानता था कि वह यीशु के उत्पीड़न में मुख्य अपराधी है। उसे अपनी प्रकृति की थोड़ी-सी भी समझ नहीं थी, और अपना काम खत्म करने के बाद पौलुस को वास्तव में लगा कि वह मसीह है और उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए। पौलुस ने जो काम किया, वह केवल परमेश्वर के लिए प्रदान की गई सेवा थी। हालाँकि पौलुस को पवित्र आत्मा से कुछ प्रकाशन मिले थे, फिर भी व्यक्तिगत रूप से उसमें कोई सत्य या जीवन नहीं था। उसे परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं गया; उसे परमेश्वर द्वारा दंडित किया गया। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस का मार्ग पूर्णता का मार्ग है? वह इसलिए, क्योंकि अपने अभ्यास में पतरस ने जीवन पर, परमेश्वर को जानने का प्रयास करने पर और खुद को जानने पर विशेष बल दिया। परमेश्वर के कार्य के अपने अनुभव से उसने खुद को जाना, मनुष्य की भ्रष्ट अवस्थाओं की समझ हासिल की, अपनी कमियों को जाना, और उस सबसे मूल्यवान चीज़ की खोज की, जिसका लोगों को अनुसरण करना चाहिए। वह परमेश्वर से ईमानदारी से प्रेम कर पाया, उसने जाना कि परमेश्वर का ऋण कैसे चुकाया जाए, उसने कुछ सत्य हासिल किया, उसमें वह वास्तविकता थी जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है। अपने परीक्षणों के दौरान पतरस ने जो कुछ कहा, उन सबसे यह देखा जा सकता है कि वह निस्संदेह परमेश्वर की सबसे अधिक समझ रखने वाला व्यक्ति था। चूँकि उसे परमेश्वर के वचनों से इतना अधिक सत्य समझ में आ गया था, इसलिए उसका मार्ग और अधिक उज्ज्वल और परमेश्वर की इच्छा के और अधिक अनुरूप होता गया। यदि पतरस में यह सत्य न होता, तो उसने जो मार्ग अपनाया, वह इतना सही नहीं हो पाता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 389

पतरस कई वर्षों तक मेरे प्रति निष्ठावान था, किंतु वह कभी बड़बड़ाया नहीं और न ही उसे कोई शिकायत थी; यहाँ तक कि अय्यूब भी उसके बराबर नहीं था, और, युगों-युगों के दौरान सभी संत, पतरस से बहुत कमतर रहे हैं। उसने न केवल मुझे जानने की खोज की, बल्कि उस समय के दौरान मुझे जान भी पाया जब शैतान अपने कपटपूर्ण कुचक्र पूरे कर रहा था। इसके फलस्वरूप पतरस ने कई वर्षों तक सदैव मेरी इच्छा के अनुरूप रहते हुए मेरी सेवा की, और इसी कारण, वह शैतान द्वारा कभी शोषित नहीं किया गया था। पतरस ने अय्यूब की आस्था से सबक सीखे, साथ ही उसकी कमियों को भी स्पष्ट रूप से जाना। यद्यपि अय्यूब अत्यधिक आस्था से परिपूर्ण था, किंतु उसमें आध्यात्मिक क्षेत्र के विषयों के ज्ञान का अभाव था, इसलिए उसने कई वचन कहे जो वास्तविकता से मेल नहीं खाते थे; यह दर्शाता है कि अय्यूब का ज्ञान उथला था, और पूर्णता के अयोग्य था। इसलिए, पतरस ने हमेशा आत्मा की समझ प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया था, और हमेशा आध्यात्मिक क्षेत्र की गतिकी का अवलोकन करने पर ध्यान दिया था। परिणामस्वरूप, वह न केवल मेरी इच्छाओं के बारे में कुछ बातों को सुनिश्चित कर पाया, बल्कि उसे शैतान के कपटपूर्ण कुचक्रों का भी अल्पज्ञान था। इसके कारण, मेरे बारे में उसका ज्ञान युगों-युगों के दौरान किसी भी अन्य की अपेक्षा अधिकाधिक बढ़ता गया।

पतरस के अनुभव से, यह देख पाना कठिन नहीं है कि यदि मानव मुझे जानना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी आत्माओं के भीतर ध्यानपूर्वक सोच-विचार करने पर ध्यान केंद्रित करना ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि तुम बाहर से मेरे प्रति एक निश्चित मात्रा में "समर्पित" रहो; यह चिंता का गौण विषय है। यदि तुम मुझे नहीं जानते हो, तो तुम जिस विश्वास, प्रेम और निष्ठा की बात करते हो वह सब केवल भ्रम हैं, वे व्यर्थ बकवाद हैं, और तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो मेरे सामने बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता है किंतु स्वयं को भी नहीं जानता है। ऐसे में, तुम एक बार फिर शैतान के द्वारा फँसा लिए जाओगे और अपने आपको छुड़ा नहीं पाओगे; तुम तबाही के पुत्र और विनाश की वस्तु बन जाओगे। परंतु यदि तुम मेरे वचनों के प्रति उदासीन और बेपरवाह हो, तो तुम निस्संदेह मेरा विरोध करते हो। यह तथ्य है, और अच्छा होगा कि तुम आध्यात्मिक क्षेत्र के द्वार के आर-पार उन बहुत-सी और भिन्न-भिन्न आत्माओं को देखो जिन्हें मेरे द्वारा ताड़ना दी गई है। उनमें से कौन, मेरे वचनों के सम्मुख आने पर, निष्क्रिय, बेपरवाह और अस्वीकृति से भरा नहीं था? उनमें से कौन मेरे वचनों के बारे में दोषदर्शी नहीं था? उनमें से किसने मेरे वचनों में दोष ढूँढने की कोशिश नहीं की? उनमें से किसने मेरे वचनों का स्वयं को "बचाने" के लिए "रक्षात्मक हथियार" के रूप में उपयोग नहीं किया? उन्होंने मेरे वचनों की विषयवस्तु का उपयोग मुझे जानने के तरीक़े के रूप में नहीं, बल्कि खेलने के लिए मात्र खिलौनों की तरह किया। इसमें, क्या वे सीधे मेरा प्रतिरोध नहीं कर रहे थे? मेरे वचन कौन हैं? मेरा आत्मा कौन है? मैंने इतनी अधिक बार ऐसे प्रश्न तुम लोगों से पूछे हैं, फिर भी क्या कभी तुम लोग थोड़े भी उच्चतर और स्पष्ट हुए हो? क्या तुमने सच में कभी उनका अनुभव किया है? मैं तुम्हें एक बार फिर याद दिलाता हूँ: यदि तुम मेरे वचनों को नहीं जानते हो, न ही उन्हें स्वीकार करते हो, न ही उन्हें अभ्यास में लाते हो, तो तुम अपरिहार्य रूप से मेरी ताड़ना के लक्ष्य बनोगे! तुम निश्चित रूप से शैतान के शिकार बनोगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 8' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 390

यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यद्यपि लोग "परमेश्वर" शब्द और "परमेश्वर का कार्य" जैसे वाक्यांशों से परिचित हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास को लेकर भ्रमित रहते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास करनेको गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर और उसके कार्य को नहीं जानते, तो वे उसके इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं, और उसकी इच्छा पूरी करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं। "परमेश्वर में विश्वास" का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे भी बढ़कर, यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है: इस विश्वास के आधार पर कि सभी वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कार्यों का अनुभव करता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है, परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही "परमेश्वर में विश्वास" कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अकसर बहुत सरल और हल्के रूप में लेते हैं। परमेश्वर में इस तरह विश्वास करने वाले लोग, परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ गँवा चुके हैं और भले ही वे बिलकुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। आज भी ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर में शब्दशः और खोखले सिद्धांत के अनुसार विश्वास करते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर में उनके विश्वास में कोई सार नहीं है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते। फिर भी वे परमेश्वर से सुरक्षा के आशीषों और पर्याप्त अनुग्रह के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ रुकें, अपने हृदय शांत करें और खुद से पूछें: क्या परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो सकती है? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 391

परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद से मनुष्य ने क्या पाया है? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुममें कितना बदलाव आया है? अब तुम सभी यह जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास सिर्फ़ आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नहीं है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर को प्रेम करने के माध्यम से समृद्ध बनाने इत्यादि के लिए है। अपनी वर्तमान स्थिति में जैसा तुम्हारा प्रेम है, यदि तुम परमेश्वर को देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम अपने शिखर पर पहुँच जाए और तुम इससे ज़्यादा और कुछ भी ना माँगो, तुम्हारे द्वारा खोजा जाने वाला यह प्रेम अशुद्ध प्रेम ही है, और यह परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला प्रेम नहीं है। वे लोग जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का उपयोग अपने नीरस जीवन को समृद्ध बनाने और अपने हृदय के खालीपन को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जिन्हें अपना जीवन आसानी से जीने का लालच है, ना कि वे जो सच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम जबरन होता है, यह मानसिक संतुष्टि की खोज में किया जाता है, और परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? इस समय तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकांश का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले ज़िक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथास्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ एक ऐसे फूल की तरह है जो खिलता है पर फल दिए बिना ही मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, एक बार जब तुमने परमेश्वर को इस तरीके से प्रेम कर लिया और यदि तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई नहीं है, तो तुम्हारा पतन हो जाएगा। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ परमेश्वर को प्रेम करने के समय ही प्रेम कर सकते हो लेकिन उसके बाद तुम्हारे जीवन की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता, तो फिर तुम अंधकार के प्रभाव से बचकर नहीं निकल पाओगे, और शैतान के बंधन और चालबाज़ी से खुद को मुक्त नहीं कर पाओगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; आखिरकार, उसकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही रहेंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे, अपने मूल स्थान अर्थात वापस शैतान के पास लौट जाएँगे, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गंधकाश्म से जलती रहती है। परमेश्वर को वे प्राप्त होते हैं, जो शैतान को त्याग देते हैं और उसके अधिकार क्षेत्र से बच निकलते हैं। उन्हें राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिना जाता है। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर को प्राप्त होना चाहते हो? क्या तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो? ये चीज़ें पहले से स्पष्ट होनी चाहिए और आगे किसी भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 392

अतीत में, अनेक लोगों ने घोर महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ परमेश्वर की तलाश की, उनकी तलाश उनकी अपनी आशाओं के अनुरूप थी। इस समय ऐसे मुद्दों को एक तरफ़ रख देते हैं। इस समय सबसे महत्वपूर्ण है, अभ्यास का ऐसा तरीका खोजना जो तुम लोगों में से प्रत्येक को परमेश्वर के सम्मुख सामान्य स्थिति बनाये रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव की बेड़ियों को तोड़ डालने में सक्षम करे, ताकि तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त हो सको और पृथ्वी पर वैसे जियो जैसे परमेश्वर तुमसे चाहता है। केवल इसी तरीके से तुम परमेश्वर के प्रयोजनों को पूरा कर सकते हो। परमेश्वर में विश्वास तो बहुत से लोग करते हैं, फिर भी वे न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे बस दूसरों का अंधानुकरण करते हुए मूर्खतापूर्ण और उलझन भरे तरीके से विश्वास करते हैं, और इसलिए वे कभी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं जी सके हैं; इससे अधिक क्या कहा जाए कि उनके व्यक्तिगत संबंध तक कभी सामान्य नहीं रहे होते, जोकि परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध होने से कहीं छोटी बात है। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएँ और कमियाँ, और ऐसे दूसरे कारण जो परमेश्वर की इच्छा के आड़े आते हैं, अनेक हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य अभी तक परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर नहीं आया है, न ही उसने मानव जीवन के वास्तविक अनुभव में प्रवेश किया है। तो परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर आने का क्या अर्थ है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम हर वक़्त परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रख सकते हो और परमेश्वर के साथ सामान्य रूप से संवाद कर सकते हो, इससे तुम्हें धीरे-धीरे यह पता लगने लगेगा कि मनुष्य में क्या कमी है और परमेश्वर के विषय में गहन ज्ञान होने लगेगा। इसके द्वारा तुम्हारी आत्मा को प्रतिदिन नई अंतर्दृष्टि और प्रबुद्धता प्राप्त होती है; तुम्हारी लालसा बढ़ती है और तुम सत्य में प्रवेश करने की कोशिश करने लगते हो और हर दिन नया प्रकाश और नई समझ लेकर आता है। इस रास्ते के द्वारा, धीरे-धीरे तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो, और अपने जीवन में विकास करने लगते हो। ऐसे लोग सही रास्ते पर आ चुके हैं। अपने वास्तविक अनुभवों का मूल्यांकन करो और तुमने परमेश्वर के विश्वास का जो रास्ता चुना है उसे जाँचो। स्वयं से यह सब पूछो: क्या तुम सही रास्ते पर हो? तुम किन मामलों में शैतान की बेड़ियों और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि अभी तुम्हारा सही रास्ते पर आना बाकी है तो शैतान के साथ तुम्हारे संबंध टूटे नहीं हैं। इस तरह, क्या परमेश्वर के प्रेम की इस तलाश का निष्कर्ष एक ऐसे प्रेम के रूप में होगा जो प्रमाणिक, समर्पित, और शुद्ध हो? यदि मामला यह है तो क्या परमेश्वर को प्रेम करने की तुम्हारी तलाश तुम्हें ऐसे प्रेम तक ले जाएगी जो प्रामाणिक, समर्पित और विशुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और हार्दिक है, फिर भी तुम शैतान की बेड़ियों से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाये हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हो? यदि तुम ऐसी स्थिति प्राप्त करना चाहते हो जहाँ परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम विशुद्ध हो और पूरी तरह परमेश्वर को प्राप्त हो जाना चाहते हो और चाहते हो कि तुम राज्य के लोगों में गिने जाओ, तो तुम्हें पहले खुद को परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर लेकर आना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 393

सभी मनुष्यों के साथ एक आम समस्या यह है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला पाते। ऐसा इसलिए है कि एक तरफ वे इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो दूसरी तरफ, उनकी सूझ-बूझ बहुत अपर्याप्त है; वे दैनिक जीवन की बहुत सारी कठिनाइयों के असली स्वरूप को देख नहीं पाते और नहीं जानते कि समुचित अभ्यास कैसे करें। चूँकि लोगों के अनुभव बहुत सतही हैं, उनकी क्षमता बेहद कमज़ोर है, सत्य की उनकी समझ सीमित है और वे दैनिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल करने में असमर्थ हैं। वे सिर्फ़ दिखावटी आस्था रखते हैं, और परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में अंगीकार करने में असमर्थ हैं। तात्पर्य यह कि परमेश्वर परमेश्वर है, जीवन जीवन है, और मानो उनके जीवन के साथ परमेश्वर का कोई संबंध ही नहीं। ऐसा ही सभी सोचते हैं। इस तरह, यथार्थ में परमेश्वर में केवल विश्वास करने से ही वे परमेश्वर की पहुंच में नहीं आ जाते, और न ही उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर के वचन को पूरी अभिव्यक्ति नहीं मिली है, बल्कि उसके वचन को ग्रहण करने की लोगों की क्षमता ही बेहद सीमित है। कहा जा सकता है कि प्रायः कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल इरादों के अनुरूप नहीं चलता, बल्कि परमेश्वर में उनका विश्वास उनके अपने इरादों, पूर्व से चली आ रही उनकी अपनी धार्मिक अवधारणाओं, और कार्य करने के उनके अपने तरीकों पर आधारित होता है। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो परमेश्वर के वचन को स्वीकार कर स्वयं में बदलाव लाते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे अपनी ग़लत धारणाओं के साथ डटे रहते हैं। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, तो वे धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर ऐसा करते हैं, और उनका जीवन तथा दूसरों के साथ उनका व्यवहार पूरी तरह उनके अपने जीवन-दर्शन से संचालित होता है। कहा जा सकता है कि दस लोगों में से नौ के साथ ऐसा ही है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद कोई अलग योजना बनाते हैं और एक नई शुरुआत करते हैं। मानवजाति परमेश्वर के वचन को सत्य मानने में असफल रही है, या उसे सत्य के रूप में स्वीकार कर अभ्यास में नहीं ला सकी है।

उदाहरण के लिए, यीशु में विश्वास को ही लें। चाहे किसी ने अभी-अभी विश्वास करना शुरू किया हो या एक लम्बे समय से विश्वास करता आ रहा हो, इन सभी ने बस अपने भीतर मौजूद गुणों का उपयोग और प्राप्त क्षमताओं का प्रदर्शन किया। लोगों ने ये तीन शब्द "परमेश्वर में विश्वास" बस अपने जीवन में जोड़ लिए, लेकिन अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया, और परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा भी नहीं बढ़ा। उनकी तलाश न उत्साह से परिपूर्ण थी और न उदासीन। लोगों ने यह नहीं कहा कि वे अपने विश्वास को छोड़ देंगे, मगर उन्होंने अपना सब कुछ परमेश्वर को समर्पित भी नहीं किया। उन्होंने कभी परमेश्वर से सचुमच प्रेम किया ही नहीं, न ही कभी उसकी आज्ञा का पालन किया। परमेश्वर में उनका विश्वास असली और नकली का सम्मिश्रण था। अपने विश्वास के प्रति उनकी एक आंख खुली रही तो दूसरी बंद। वे अपने विश्वास को अभ्यास में लाने के प्रति गंभीर नहीं रहे। वे असमंजस की ऐसी ही स्थिति में बने रहे, और अंत में उन्हें एक संभ्रमित मौत का सामना करना पड़ा। इन सबके क्या मायने हैं? आज, व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम्हें सही रास्ते पर कदम रखना होगा। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो तो तुम्हें सिर्फ़ परमेश्वर के आशीष की ही कामना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश भी करनी चाहिए। परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता प्राप्त कर और अपनी व्यक्तिगत खोज के माध्यम से, तुम उसके वचनों को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में सच्ची समझ विकसित कर सकते हो, और तुम परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्रेम अपने हृदयतल से आता महसूस कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम बेहद सच्चा हो, और इसे कोई नष्ट नहीं कर सके या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सके, तब तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सही रास्ते पर हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और अब कोई भी दूसरी चीज तुम पर कब्जा नहीं कर सकती है। तुम अपने अनुभव, चुकाए गए मूल्य, और परमेश्वर के कार्य के माध्यम से, परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीने लग जाते हो। तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर जब मुक्त हो जाते हो, केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य की खोज की कोशिश करनी चाहिए। यह हर एक व्यक्ति का कर्तव्य है। किसी को भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दुविधा में नहीं रह सकते, और न ही इसे हल्के में ले सकते हो। तुम्हें हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके लिए सब कुछ करना चाहिए। जब तुम कुछ बोलते या करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। ऐसा करने से ही तुम परमेश्वर के हृदय को पा सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 394

परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में लोगों का सबसे बड़ा दोष यह है कि उनका विश्वास केवल शाब्दिक होता है, और परमेश्वर उनके रोजमर्रा के जीवन से पूरी तरह अनुपस्थित होता है। दरअसल सभी लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं होता। परमेश्वर से बहुत सारी प्रार्थनाएँ लोग अपने मुख से तो करते हैं, किन्तु उनके हृदय में परमेश्वर के लिए जगह बहुत थोड़ी होती है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और इन परीक्षाओं से गुजरते हुए स्वयं को पहचान ले। अन्यथा, मानवजाति प्रधान दूत की वंशज बन जाएगी, और निरंतर और भ्रष्ट होती जाएगी। परमेश्वर में अपने विश्वास की प्रक्रिया में, हर व्यक्ति अपने बहुत सारे व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ता चलता है, जैसे-जैसे वह परमेश्वर के निरंतर शुद्धिकरण से गुजरता है। अन्यथा, परमेश्वर के पास किसी भी व्यक्ति को उपयोग में लाने का कोई रास्ता नहीं होगा, और न ही वह लोगों के लिए अपेक्षित कार्य ही कर पाएगा। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है, और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य को उसके जीवन में अपनी उपस्थिति का बोध कराता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, मैं कहता हूं कि परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग कहते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम केवल स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो, और सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते, तो यह भी एक प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर का नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके ही उसे जाना जा सकता है : यह अंतिम लक्ष्य है, मनुष्य की तलाश का अंतिम लक्ष्य। तुम्हें परमेश्वर के वचन को जीने का प्रयास करना चाहिए ताकि अपने अभ्यास में तुम्हें उनकी अनुभूति हो सके। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। यदि तुम इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस क्षेत्र में, बहुत सारे लोग ज्ञान के बारे में बहुत सारी बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं और अपना संपूर्ण जीवन नष्ट कर देने और बुढ़ापे तक अपने जीवन की निरर्थकता के कारण वे स्वयं से घृणा करने लग जाते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, मधुमक्खी की तरह दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत के कगार पर पहुँचने के बाद ही वे अंतत: देख पाते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे गवाह नहीं हैं, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य की खोज क्यों नहीं करते जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, व्यक्ति अगर थोड़ा भी प्रयास करे तो बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिनमें वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है और इस तरह परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर पाता। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर भटकता रहता है और अंत में उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। यही कारण है कि मनुष्य निरंतर समस्याओं और कठिनाइयों से घिरा रहता है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह का भ्रष्ट हो जाना नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कदम उठाना चाहिए। खुद को धोखा मत दो—ऐसा करने से क्या फायदा? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और लाभ तथा प्रसिद्धि के लिए संघर्ष कर तुम क्या प्राप्त कर लोगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 395

अब तुम लोगों को परमेश्वर के जन बनने की कोशिश करनी है, और तुम सब इस पूरे प्रवेश को सही रास्ते पर शुरू करोगे। परमेश्वर के जन होने का अर्थ है, राज्य के युग में प्रवेश करना। आज तुम आधिकारिक तौर पर राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश शुरू कर रहे हो और तुम लोगों के भावी जीवन अब पहले की तरह सुस्त और लापरवाह नहीं रहेंगे; इस तरह जीते हुए परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक हासिल करना असंभव है। यदि तुम्हें यह तत्काल करने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती, तो यह दिखाता है कि तुम खुद को सुधारने की कोई आकांक्षा नहीं रखते, तुम्हारा अनुसरण अव्यवस्थित और भ्रमित है और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हो। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का अर्थ है, परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत—क्या तुम इस तरह का प्रशिक्षण स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन में जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आएँगेऔर तुम्हारी परीक्षा लेंगे, तब तुम क्या करोगे? और जब सभी तरह के तथ्यों से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम क्या करोगे? अतीत में तुम्हारा ध्यान जीवन पर केंद्रित नहीं था; आज तुम्हें जीवन की वास्तविकता में अवश्य प्रवेश करना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। यही है जो राज्य के लोगों द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। वो सभी जो परमेश्वर के लोग हैं, उनके पास जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनीचाहिए। परमेश्वर राज्य के लोगों से यही अपेक्षा रखता है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ अपेक्षाएं इस प्रकार हैं:

1. उन्हें परमेश्वर के आदेशों को अवश्य स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ है, उन्हें आखिरी दिनों के परमेश्वर के कार्य के दौरान कहे गए सभी वचन स्वीकार करने होंगे।

2. उन्हें राज्य के प्रशिक्षण में अवश्य प्रवेश करना होगा।

3. उन्हें प्रयास करना होगा कि परमेश्वर उनके दिलों को स्पर्श करे। जब तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख होजाता है और तुम्हारा जीवन सामान्य रूप से आध्यात्मिक होता है, तो तुम स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के प्रेम की देख-रेख और उसकी सुरक्षा में जिओगे। जब तुम परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहते हो, तभी तुम परमेश्वर के होते हो।

4. उन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त होना होगा।

5. उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना होगा।

ये पाँचबातें तुम सबके लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के इच्छुकनहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहींकरूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा पर चलने में सक्षम होंगे होगे। आज तुम सभी परमेश्वर के आदेश स्वीकार करना शुरू करो और राज्य के लोग बनने की कोशिश करो और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानक हासिल करने का प्रयास करो। यह प्रवेश का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँचआदेशों को स्वीकार करना होगा और यदि तुम ऐसाकर पाने में सक्षम रहे, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक होंगे और परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा महान उपयोग करेगा। आज जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह हैराज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश में आध्यात्मिक जीवन शामिल है। इससे पहले आध्यात्मिक जीवन की कोई बात नहीं होती थी लेकिन आज, जैसे ही तुम राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू करते हो, तुम आधिकारिक तौर पर आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 396

आध्यात्मिक जीवन किस तरह का जीवन है? आध्यात्मिक जीवन वह है, जिसमें तुम्हारा मन पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुका होता है और परमेश्वर के प्रेम के प्रति सचेत रहने में सक्षम हो जाता है। यह वह है, जिसमें तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो और तुम्हारे मन में और कुछ भी नहीं होता और तुम आज परमेश्वर की इच्छा समझ सकते हो और अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए पवित्र आत्मा के प्रकाश से मार्गदर्शन प्राप्त करते हो। मनुष्य और परमेश्वर के बीच ऐसा जीवन आध्यात्मिक जीवन है। यदि तुम आज के प्रकाश का अनुसरण करने में असमर्थ हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक दूरी शुरू हो गई है-हो सकता है कि यह संबंध शायद टूट भी चुका हो—और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन से रहित हो गए हो। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध आज परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने की नींव पर बनता है। क्या तुम्हारा जीवन सामान्य आध्यात्मिक जीवन है? क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है? यदि तुम आज पवित्र आत्मा के प्रकाश का अनुसरण कर सकते हो और परमेश्वर की इच्छा को उसके वचनों के भीतर समझ सकते हो और इन वचनों में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम वह व्यक्ति हो, जो पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण करता है। यदि तुम पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण नहीं करते, तो तुम निस्संदेह सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। जो खुद को सुधारने की इच्छा नहीं रखते, पवित्र आत्मा के उनके भीतर काम करने की कोई संभावना नहीं है, और नतीजतन ऐसे लोग कभी अपनी ताकत को नहीं जगा पाते और हमेशा निष्क्रिय रहते हैं। क्या तुम आज पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के प्रवाह में हो? क्या तुम निष्क्रिय स्थिति से बाहर निकल आए हो? वो सभी जो परमेश्वर के वचनों में विश्वास करते हैं, जो परमेश्वर के कार्य को आधार के रूप में लेते हैं और आज पवित्र आत्मा के प्रकाश का अनुसरण करते हैं—वे सभी पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचन निस्संदेह सच्चे और सही हैं, और यदि तुम्हारा परमेश्वर के वचनों में विश्वास है, चाहे वह जो भी कहे, तो तुम वह व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के कार्य में प्रवेश की पूरी कोशिश करता है और इस तरह तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हो।

पवित्र आत्मा के प्रवाह में प्रवेशके लिए तुम्हारा परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध होना आवश्यक है और तुम्हें सबसे पहले अपनी निष्क्रिय स्थिति से छुटकारा पाना होगा। कुछ लोग हमेशा भीड़ के पीछे चलते हैं और उनके दिल परमेश्वर से बहुत दूर भटकजाता है; ऐसे लोगों को खुद को सुधारने की कोई इच्छा नहीं होती और जिन मानकों का वे अनुसरण करते है, वे काफ़ी निम्न होतेहैं। केवल परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना ही परमेश्वर की इच्छा है। कुछ लोग ऐसे हैं, जो परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए केवल अपने अंत:करण का उपयोग करते हैं, लेकिन इससे परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं होती; जितने तुम्हारे मानक ऊँचेहोंगे, उतने ही वो परमेश्वर की इच्छा के साथ सामंजस्य में होंगे। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो सामान्य है और जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करता है, परमेश्वर के जन बनने के लिए राज्य में प्रवेश करना ही तुम सबका असली भविष्य है और यह ऐसा जीवन है, जो अत्यंत मूल्यवान और महत्वपूर्ण है; कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। मैं यह क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वो देह के लिए जीते हैं और वो शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम लोग परमेश्वर के लिए जीते हो और परमेश्वर की इच्छा पर चलने के लिए जीवित हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारे जीवन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। केवल इसी समूह के लोग, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन जीने में सक्षम हैं: पृथ्वी पर और कोई इतना मूल्यवान और सार्थकजीवन नहीं जी सकता। क्योंकि तुम परमेश्वर द्वारा चुने और पाले-पोसे गए हो और इसके अलावा, तुम सबके लिए परमेश्वर के प्रेम के कारण तुम लोगों ने सच्चे जीवन को समझ लिया है और यह जानते हो कि ऐसा जीवन कैसे जीना है, जो अत्यंत मूल्यवान हो। ऐसा इसलिए नहीं कि तुम सबका अनुसरण उत्तम है, बल्कि यह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; यह परमेश्वर ही था, जिसने तम्हारी आत्माओं की आँखें खोलीं, और यह परमेश्वर की आत्मा ही थी, जिसने तुम्हारे दिलों को छू लिया और इस प्रकार तुम सभी को परमेश्वर के सामने आने का सौभाग्य प्रदान किया। यदि परमेश्वर की आत्मा ने तुम्हें प्रबुद्ध न किया होता, तो परमेश्वर के बारे में क्या सुंदर है, यह देखने में तुम असमर्थ होते, न ही तुम्हारे लिए परमेश्वर से प्रेम करना संभव होता। यह पूरी तरह से परमेश्वर की आत्मा द्वारा लोगों के दिलों को छू लेने के कारण ही है कि उनके दिल परमेश्वर उन्मुख हो चुके हैं। कभी-कभी, जब तुम परमेश्वर के वचनों का आनंद ले रहे होते हो, तुम्हारी आत्मा द्रवित हो जाती है और तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम किए बिना नहीं रह सकते, कि तुम्हारे भीतर काफ़ी ताकत है और ऐसा कुछ नहीं जिसे तुम छोड़ नहीं सकते। यदि तुम ऐसा महसूस करते हो, तो परमेश्वर की आत्मा ने तुम्हें स्पर्श कर लिया है, और तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुका है और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे: "हे परमेश्वर! हम वास्तव में तुम्हारे द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए हैं। तुम्हारी महिमा में मुझे गौरव मिलता है, और तुम्हारे लोगों में से एक होना मुझे महिमामयलगता है। तुम्हारी इच्छा पर चलने के लिए मैं कुछ भी व्यय कर दूंगा और कुछ भी दे दूंगा और अपने सभी वर्ष और पूरे जीवन के प्रयासों को तुम्हें समर्पित कर दूंगा।" जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति अनंत प्रेम और सच्ची आज्ञाकारिता होगी। क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव हुआ है? यदि लोगों को अक्सर परमेश्वर की आत्मा द्वारा छुआ जाता है, तो वो अपनी प्रार्थनाओं में खुद को परमेश्वर के प्रति विशेष रूप से समर्पित करने के इच्छुकहोते हैं: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारी महिमा का दिन देखना चाहता हूँ, और तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ—तुम्हारे लिए जीने के मुकाबले कुछ भी ज्यादा योग्य या सार्थक नहीं है और मेरी शैतान और देह के लिए जीने की ज़रा भी इच्छा नहीं है। तुम आज मुझे तुम्हारे लिए जीने हेतु सक्षम बनाकर मुझे ऊपर उठाओबड़ा करो।" जब तुमने इस तरह प्रार्थना की है, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम परमेश्वर को अपना दिल दिए बिना नहीं रह सकते, कि तुम्हें परमेश्वर को पाना चाहिए और तुम जब तक जीवित हो, परमेश्वर को पाए बिना मर जाने से नफ़रत करोगे। ऐसी प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारे भीतर एक अक्षय ताकत आएगी और तुम नहीं जान पाओगे कि यह कहां से आती है; तुम्हारे हृदय के अंदर असीम शक्ति होगी और तुम्हें आभास होगा कि परमेश्वर बहुत सुंदर है, और वह प्रेम करने के योग्य है। यह तब होगा जब तुम परमेश्वर द्वारा छू लिए जा चुके होंगे। जिन सभी लोगों को इस तरह का अनुभव हुआ है, वो सभी परमेश्वर द्वारा छू लिए गए हैं। जिन लोगों को परमेश्वर अक्सर स्पर्श करता है, उनके जीवन में परिवर्तन होते हैं, वो अपने संकल्प को बनाने में सक्षम होते हैं और परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए तैयार होते हैं, उनके दिल में परमेश्वर के लिए प्रेम अधिक मज़बूत होता है, उनके दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख होचुके होते हैं, उन्हें परिवार, दुनिया, उलझनों या अपने भविष्य की कोई परवाह नहीं होती और वो परमेश्वर के लिए जीवन भर के प्रयासों को समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं। वे सभी जिन्हें परमेश्वर कीआत्मा ने छुआ है, वो ऐसे लोग होते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आशा रखते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 397

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि जो तुम संवाद और अनुसरण करते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँभी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों की परमेश्वर द्वारा सराहना नहीं की जाती। वह सेवा जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों से जुदा हो, वह देह और धारणाओं की सेवा है और इसका परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होना असंभव है। यदि लोग धार्मिक धारणाओंमें रहते हैं, तो वो ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल हो और भले ही वो परमेश्वर की सेवा करें, वो अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के घेरे में ही सेवा करते हैं और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते और जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते, वो परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो इच्छाके मुताबिक हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता, जो धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वो धारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा बाधा डालती है और परेशान करती है और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरुद्ध चलती है। इस प्रकार, जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं और वो परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं। "पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण" करने का मतलब है आज परमेश्वर की इच्छा को समझना, परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञापालन करने में सक्षम होना और परमेश्वर के नवीनतम कथनों के अनुसार प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है, जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाहमें है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से परमेश्वर के स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की अवधारणाओं और अवज्ञा को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं। जिन लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य से हटा दिया गया है, वो लोग हैं, जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसे लोग खुलेआम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि परमेश्वर ने नया कार्य किया है और क्योंकि परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वो परमेश्वर का खुलेआम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिसके नतीजे में परमेश्वर उनसे घृणा करता है और उन्हें अस्वीकार कर देता है। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोगों में परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के कार्य की तलाश करने का ज्ञान है, तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रबोधन या परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त नहीं कर सकते; इस प्रकार, लोग परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त कर पाते हैं या नहीं, यह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर करता है, यह उनके अनुसरण पर निर्भर करता है और यह उनके इरादोंपर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 398

वो सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों का पालन करने में सक्षम हैं। इस बात से कोई फ़र्कनहीं पड़ता कि वो कैसे हुआ करते थे या उनके भीतर पवित्र आत्मा कैसे कार्य कियाकरती थी—जिन्होंने परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त किया है, वो सबसे अधिक धन्य हैं और जो लोग आज नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर पाते, हटा दिए जाते हैं। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी स्वीकार करने में सक्षम हैं और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जान लेते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को पवित्र कुँवारी होना चाहिए? एक पवित्र कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य की तलाश करने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी धारणाओं को भुलाकर परमेश्वर के आज के कार्य का अनुसरण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोग, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर द्वारा युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किए जा चुके थे और वो सभी लोगों में सबसे अधिक धन्य हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज़ सुनते हो और परमेश्वर की उपस्थिति का दर्शन करते हो और इस तरह समस्त स्वर्ग और पृथ्वी परऔर सारे युगों में, कोई भी तुम लोगों, लोगों के इस समूह से अधिक धन्य नहीं रहा है। यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण है, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण और चयन के कारण और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; अगर परमेश्वर ने बात न की होती और अपने वचन नहीं कहे होते, तो क्या तुम लोगों की परिस्थितियाँ वैसी होतीं जैसी आज हैं? इस प्रकार, सभी महिमा और प्रशंसा परमेश्वर की हो क्योंकि यह सब इसलिए है क्योंकि परमेश्वर तुम्हेंऊपर उठाता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए क्या तुम अभी भी निष्क्रिय रह पाओगे? क्या तुम्हारी शक्ति अभी भी ऊपर उठने लायक नहीं होगी?

तुम्हारा परमेश्वर केन्याय, ताड़ना, प्रहार और शब्द-शोधन को स्वीकार करने में सक्षम होना और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, युगों से पहले ही परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित कर दिया था और इस प्रकार जब तुम्हें ताड़ना दी जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है और तुम्हें जो आशीर्वाद दिए गए हैं, उन्हें कोई नहीं ले सकता और जो तुम लोगों को दिया गया है, वह कोई भी नहीं ले जा सकता। धार्मिकलोग तुम लोगों के साथ तुलना में नहीं ठहर सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं है और तुम धार्मिक सिद्धांतों से सुसज्जित नहीं हो, पर चूँकि परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर कार्य किया है, तुमने सारे युगों में अन्य किसी से ज़्यादा प्राप्त किया है—और इसलिए यह तुम्हारा सबसे बड़ा आशीर्वाद है। इस कारण तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और अधिक समर्पित और अधिक निष्ठावान होना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें ऊपर उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को बढ़ाना चाहिए, और परमेश्वर के आदेश स्वीकार करने के लिए अपने आध्यात्मिक कद को तैयार रखना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर द्वारा दी गई जगह परदृढ़ खड़ा होना चाहिए, परमेश्वर के लोगों में से एक बनने की कोशिश करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा प्राप्त होना और अंततः परमेश्वर की एक गौरवपूर्ण गवाही बनना चाहिए। क्या ये संकल्प तुम्हारे पास हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 399

पवित्र आत्मा के वचन आज पवित्र आत्मा के कार्य का गतिविज्ञान हैं और इस दौरान पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य का निरंतर प्रबोधन, पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति है। और आज पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति क्या है? यह आज परमेश्वर के कार्य और एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में लोगों का नेतृत्व करना है। सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के कई चरण हैं:

1. सबसे पहले, तुम्हें अपने मन को परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के अतीत के वचनों का अनुसरण नहीं करना चाहिए और न तो उनका अध्ययन करना चाहिए और न आज के वचनों से उनकी तुलना करनी चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूरी तरह से परमेश्वर के वर्तमान वचनों में अपना मन लगाना चाहिए। अगर ऐसे लोग हैं, जो अभी भी अतीत काल में परमेश्वर के वचन, आध्यात्मिक किताबें या दूसरे प्रवचनों के विवरण पढ़ना चाहते हैं, जो आज पवित्र आत्मा के वचनों का पालन नहीं करते, तो वो सभी लोगों में सबसे अधिक मूर्ख हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। यदि तुम आज पवित्र आत्मा का प्रकाश स्वीकार करना चाहतेहो, तो फिर अपने मन को आज परमेश्वर के कथनों में लगाओ। यह पहली चीज़ है, जो तुम्हें हासिल करनी है।

2. तुम्हें आज परमेश्वर के बोले गए शब्दों के आधार पर प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करना और परमेश्वर से संवाद करना चाहिए और परमेश्वर के समक्ष अपने संकल्प करने चाहिए, इसकी स्थापना करते हुए कि तुम किन मानकों को पूरा करने की कोशिश करना चाहते हो।

3. पवित्र आत्मा के आज के कार्य की नींव पर तुम्हें सच्चाई में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। अतीत के पुराने कथनों और सिद्धांतों को मत थामे रहो।

4. तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने की और परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने की कोशिशकरनी चाहिए।

5. जिस पथ पर आज पवित्र आत्मा चलती है, तुम्हें उसी पथ पर प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए।

और तुम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने की कोशिश कैसे करते हो? अत्यंत महत्वपूर्ण है परमेश्वर के वर्तमान वचनों में जीना और परमेश्वर की अपेक्षाओं की नींव पर प्रार्थना करना। इस तरह प्रार्थना कर चुकने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करना निश्चित है। यदि तुम आज परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव के आधार पर कोशिशनहीं करते, तो यह व्यर्थ है। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं तुम्हारा बहुत ऋणी हूँ; मैं बहुत ही अवज्ञाकारी हूँ और तुम्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकता। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बचा लो, मैं अंत तक तुम्हारी सेवा करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारे लिए मर जाना चाहता हूँ। तुम मुझे न्याय और ताड़ना देते हो और मुझे कोई शिकायत नहीं है; मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं मर जाने लायक हूँ ताकि मेरी मृत्यु में सभी लोग तुम्हारा धार्मिक स्वभाव देख सकें।" जब तुम इस तरह अपने दिल से प्रार्थना करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी सुनेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; यदि तुम आज पवित्र आत्मा के वचनों के आधारपर प्रार्थना नहीं करते, तो पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें छूने की कोई संभावना नहीं है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और आज परमेश्वर जो करना चाहते हैं, उसके अनुसार प्रार्थना करते हो, तो तुम कहोगे "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे आदेशों को स्वीकार करना चाहता हूँ और तुम्हारे आदेशों के प्रति निष्ठा रखना चाहता हूँ, और मैं अपना पूरा जीवन तुम्हारी महिमा को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ ताकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमेश्वर के लोगों के मानकों तक पहुँच सके। काश मेरा दिल तुम्हारे स्पर्श को पा ले। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी आत्मा सदैव मेरा प्रबोधन करे ताकि मैं जो कुछ भी करूँ वह शैतान को शर्मिंदा करे ताकि मैं अंततः तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया जाऊँ।" यदि तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, परमेश्वर की इच्छा के आसपास केंद्रित रहकर, तो पवित्र आत्मा अपरिहार्य रूप से तुम में कार्य करेगी। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं में कितने शब्द हैं—कुंजी यह है कि तुम परमेश्वर की इच्छा समझते हो या नहीं। तुम सभी के पास निम्नलिखित अनुभव हो सकता है: कभी-कभी किसीसभा में प्रार्थना करते समय, पवित्र आत्मा के कार्य का गति-सिद्धांत अपने चरम बिंदु तक पहुँच जाता है, जिससे सभी की ताकत बढ़ती है। परमेश्वर के सामने पश्चाताप से अभिभूत होकर कुछ लोग फूट-फूटकर रोते हैं और प्रार्थना करते हुए आँसू बहाते हैं, तो कुछ लोग अपना संकल्प दिखाते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त होने वाला प्रभाव ऐसा है। आज यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों में पूरी तरह अपना मन लगाएँ। उन शब्दों पर ध्यान न दो, जो पहले बोले गए थे; यदि तुम अभी भी उसे थामे रहोगे जो पहले आया था, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करेगी। क्या तुम देखते हो कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

क्या तुम सब उस मार्ग को जानते हो, जिस पर पवित्र आत्मा आज चलतीहै? ऊपर दी गई विभिन्न बातें वो हैं, जो पवित्र आत्मा द्वारा आज और भविष्य में पूरी की जानी हैं; यही वो मार्ग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा ने अपनाया है और यही वह प्रवेश है जिसका मनुष्य को अनुसरण करना चाहिए। जीवन में तुम्हारे प्रवेश में, कम से कम तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए तड़पनाचाहिए, तुम्हें सच्चाई में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है और तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख होना शुरू हो चुका है।

जीवन में प्रवेश का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना मन लगाना है और दूसरा कदम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है, जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करने से मिलना है? यह है एक गहरे सत्य के लिए तड़प, खोज और अन्वेषण करना और सकारात्मक तरीके से परमेश्वर के साथ सहयोग के लिए सक्षमहोना। आज तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, जिसका अर्थ है कि तुम्हारी खोज, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों से तुम्हारे समागम का एक उद्देश्य है और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करते हो—केवल यही है परमेश्वर के साथ सहयोग करना। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न प्रार्थना करते हो और न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे भीतर सहयोग का अंश तक नहीं और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं: "सब कुछ परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया तो मनुष्य कैसे कर सकता था?" परमेश्वर का कार्य सामान्य है और ज़रा भी अलौकिक नहीं है और यह केवल तुम्हारी सक्रिय खोज के माध्यम से ही पवित्र आत्मा कार्य करती है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के लिए कार्य करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग द्वारा परमेश्वर का स्पर्श हासिल करने की तलाश कर सकते हो? प्रार्थना के माध्यम से और परमेश्वर के करीब आकर। मगर याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, यह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर खड़ा होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर द्वारा अक्सर छू लिए जाते हो, तो तुम शरीर के गुलाम नहीं बनते: पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बेड़ियों में बांधने में असमर्थ रहते हैं और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 400

परमेश्वर ने मनुष्य को पूर्णता प्रदान करने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे जिस दृष्टिकोण से भी बोलता हो, सारी बातें लोगों को संपूर्ण बनाने के लिए हैं। आत्मा के दृष्टिकोण से बोले गये वचन समझने में लोगों को कठिनाई होती है और उन्हें उनपर अमल करने का मार्ग नहीं मिलता, क्योंकि मनुष्य की ग्राह्यता सीमित है। परमेश्वर के कार्य के विभिन्न प्रभाव होते हैं और उसके कार्य के प्रत्येक चरण का एक उद्देश्य है। साथ ही उसे अनिवार्यतः अलग-अलग दृष्टिकोण से बात करनी होगी, क्योंकि ऐसा करने पर ही वह मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। यदि वह केवल पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से अपनी बात बोले, तो परमेश्वर के इस चरण के कार्य का पूरा होना संभव नहीं होगा। उसके बात करने के ढंग से तुम जान सकते हो कि वह लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिये दृढ़-संकल्पित है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें पहला कदम क्या उठाना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के काम के बारे में जानना चाहिए। अब परमेश्वर के कार्यों में नए-नए साधनों का उपयोग किया जा रहा है, युग रूपांतरित हो गया है, परमेश्वर के काम करने का तरीका भी बदल गया है, और उसके बोलने का ढंग अलग है। वर्तमान में न केवल परमेश्वर के कार्य के साधन बदले हैं, बल्कि युग भी बदल गया है। अभी राज्य का युग है और यह परमेश्वर से प्रेम करने का युग भी है। यह सहस्राब्दिक राज्य के युग—जो कि वचन का युग भी है—का पूर्वदर्शन है, अर्थात वह युग जिसमें परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए बहुत सारे तरीकों से बोलता है और मनुष्य को आपूरित करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण से बोलता है। जैसे-जैसे समय सहस्राब्दिक राज्य के युग में बदलेगा, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिये वचन का उपयोग करना आरंभ करेगा, मनुष्य को जीवन की वास्तविकता में प्रवेश के योग्य बनाएगा और उन्हें सही मार्ग पर लाएगा। मनुष्य ने परमेश्वर के कार्य के बहुत से चरणों का अनुभव किया है और यह देखा है कि परमेश्वर का कार्य बिना बदले नहीं रहता। बल्कि यह कार्य लगातार विकसित और गहरा होता जाता है। लोगों द्वारा इतने लंबे समय तक अनुभव करने के बाद, परमेश्वर के कार्य ने निरंतर परिक्रमा की है और उसमें बार-बार बदलाव आया है। हालाँकि परिवर्तन चाहे जितना भी हो, वह मानवजाति तक उद्धार लाने के परमेश्वर के उद्देश्य से कभी नहीं भटकता है। दस हजार परिवर्तनों से गुजरने के बाद भी वह अपने मूल उद्देश्य से कभी नहीं भटकता है। परमेश्वर के कार्य करने का तरीका चाहे जैसे भी बदले, यह काम कभी सत्य या जीवन से अलग नहीं होता। कार्य करने की विधि में परिवर्तन में केवल कार्य के प्रारूप और परमेश्वर के बोलने के दृष्टिकोण में परिवर्तन शामिल हैं, उसके कार्य के केन्द्रीय उद्देश्य में परिवर्तन नहीं आया है। बोलने के स्वर और कार्य के माध्यम या साधनों में परिवर्तन का उद्देश्य कार्य में प्रभावशीलता लाना है। आवाज़ के स्तर पर परिवर्तन का अर्थ कार्य के उद्देश्य या सिद्धांत में परिवर्तन नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखने में मनुष्य का मूल उद्देश्य जीवन की तलाश है। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो परंतु जीवन या सत्य या परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, तब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास नहीं है! और क्या यह उचित है कि तुम अभी भी राज्य में राजा बनने के लिये प्रवेश करना चाहते हो? जीवन की खोज द्वारा परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम को प्राप्त करना ही वास्तविकता है; सत्य की तलाश और सत्य का अभ्यास―यह सब वास्तविकता है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए और इन वचनों का अनुभव करते हुए, तुम वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करोगे। यही सच्चे अर्थ में अनुसरण करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 401

अभी राज्य का युग है। तुमने इस नए युग में प्रवेश किया है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुमने वास्तव में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं और उसके वचन तुम्हारे जीवन की वास्तविकता बन चुके हैं या नहीं। परमेश्वर का वचन सभी को बताया गया है ताकि सभी लोग अंत में, वचन के संसार में जिएँ और परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से प्रबुद्ध और रोशन कर देगा। यदि इस दौरान, तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ने में लापरवाह हो और उसके वचन में तुम्हारी रुचि नहीं है तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी स्थिति में गड़बड़ी है। यदि तुम वचन के युग में प्रवेश करने में असमर्थ हो तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करता है; यदि तुम इस युग में प्रवेश कर चुके हो तो वह तुम में अपना काम करेगा। पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए तुम वचन के युग की शुरुआत में क्या कर सकते हो? इस युग में, और तुम लोगों के बीच परमेश्वर इन तथ्यों को पूरा करेगा : कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जिएगा, सत्य को अभ्यास में लाएगा और ईमानदारीपूर्वक परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचन को नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में ग्रहण करेंगे, उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति आदर होगा; और परमेश्वर के वचन का अभ्यास करके लोग परमेश्वर के साथ मिलकर राजसी शक्तियों का उपयोग करेंगे। यही कार्य परमेश्वर को संपन्न करना है। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? ऐसे बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे एक-दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन पढ़ना आवश्यक है, और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना काफी है। यही अहसास पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रदान करता है, और इसी प्रकार वह मनुष्य को प्रेरित करना शुरू करता है। अर्थात पवित्र आत्मा वचन के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि वे परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। यदि परमेश्वर के वचन को केवल एक दिन भी बिना खाए-पिए तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, तुम्हें यह असह्य लगता हो, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे विमुख नहीं हुआ है। तब तुम इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम्हें कोई अंतर महसूस न हो या तुम्हें प्यास महसूस न हो, तुम थोड़ा भी विचलित महसूस न करो तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुमसे विमुख हो चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है और तुम उन लोगों में से हो जो पीछे छूट गए हैं। परमेश्वर मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए वचन का उपयोग करता है; तुम जब वचन को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, यदि अच्छा महसूस नहीं होता है, तब तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।" यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह तुम लोगों को इस सत्य का अनुभव कराएगा। ऐसा कैसे होता था कि प्राचीन समय में लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सब मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है, उन्हें पूर्ण बनाया जाता है और तब अंत में राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्य को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्य को ज्योति और अभ्यास का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। यदि तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं छोड़ते तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने का कार्य कर पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 402

जीवन की खोज कोई जल्दबाजी की चीज़ नहीं है; जीवन में विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होता है। देहधारी यीशु को क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में तेंतीस वर्ष और छः माह लगे, तो मनुष्य को शुद्ध करने और उसका जीवन रूपांतरित करने की बात करना कितना सटीक होगा, जो कि अतिशय मुश्किल कार्य है? एक सामान्य व्यक्ति बनाना, जो परमेश्वर को अभिव्यक्त करता हो, आसान काम नहीं है। यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देश में जन्मे लोगों के लिए और भी कठिन है, जिनकी क्षमता कम है, जिन्हें लंबे समय से परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिए परिणाम पाने के लिए जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिए कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, परमेश्वर के वचनों में ज्ञान, अंर्तदृष्टि, परख और बुद्धि को विकसित करते हुए। और इसके द्वारा तुम बदल जाओगे और तुम्हें महसूस भी नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और पढ़ने का सिद्धांत बना लो, उसे जानने लगो, अनुभव करने लगो, अमल में लाने लगो तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम परिपक्वता हासिल कर लोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित स्थिति तक पहुंच जाओगे तो तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता का सहयोग या आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें जान लेना चाहिए कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति क्या है, तुम जिनपर अमल कर सकते हो, अमल करो और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले मत बनो। केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस समय इस बारे में चिन्ता मत करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार मत करो। परमेश्वर के वचन जब तुम्हारे सामने आएँ तो केवल उन्हें खाओ-पीओ, परमेश्वर निश्चित ही तुम्हें पूरा करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक नियम है। आँखें मूंद करके यह न करो, बल्कि एक ओर उन शब्दों को खोजो जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए, अर्थात उन्हें जिनका संबंध दर्शन से है, और दूसरी ओर उसे खोजो जिस पर वास्तव में तुम्हें अमल करना चाहिए, अर्थात, जिसमें तुम्हें प्रवेश करना चाहिए। एक पहलू ज्ञान का है और दूसरा उसमें प्रवेश करने का। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम उसे समझ लेते हो जिसे तुम्हें जानना चाहिए और जिस पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लोगे कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाया और पिया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 403

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना तुम्हारी बातचीत का सिद्धांत होना चाहिए। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत करनी चाहिए, उसके वचन को बातचीत का विषय बनाना चाहिए; बात करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। जबतक तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन के संसार को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर अपना काम नहीं कर पाएगा। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर पाएगा। जब भी तुम कोई दूसरा काम नहीं कर रहे, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ की बातें मत करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। कोई बात नहीं यदि तुम्हारी सहभागिता सतही है। सतह के बिना कोई गहराई नहीं हो सकती। एक प्रक्रिया का होना ज़रूरी है। अपने प्रशिक्षण द्वारा तुम पवित्र आत्मा से प्राप्त रोशनी को समझ लोगे और यह भी जान लोगे कि परमेश्वर के वचन को प्रभावी तरीके से कैसे खाएँ-पिएँ। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करोगे तभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में तुम समर्थ होगे।

परमेश्वर के वचन को खाने-पीने के सिद्धांत के दो पहलू हैं : एक का संबंध ज्ञान से है और दूसरे का संबंध प्रवेश करने से है। तुम्हें कौन से वचन जानने चाहिए? तुम्हें दर्शन से जुड़े वचन जानने चाहिए (जैसे कि परमेश्वर का कार्य अब किस युग में प्रवेश कर चुका है, अब परमेश्वर क्या प्राप्त करना चाहता है, देहधारण क्या है और ऐसी अन्य बातें, ये सभी बातें दर्शन से संबंधित हैं)। उस मार्ग के क्या मायने हैं जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए? यह परमेश्वर के उन वचनों का उल्लेख करता है जिन पर मनुष्य को अमल करना और चलना चाहिए। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के ये दो पहलू हैं। अब से, तुम परमेश्वर के वचन को इसी तरह खाओ-पियो। यदि तुम्हें दर्शन के बारे में वचनों की स्पष्ट समझ है तो सब समय पढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है। मुख्य बात है प्रवेश करने से संबंधित वचनों को अधिक खाना और पीना, जैसे कि किस प्रकार परमेश्वर की ओर अपने हृदय को मोड़ना है, किस प्रकार परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है, कैसे देह का परित्याग करना है। यही सब है जिस पर तुम्हें अमल करना है। परमेश्वर के वचन को कैसे खाए-पिएँ यह जाने बिना असली सहभागिता संभव नहीं है। जब एक बार तुम जान लेते हो कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाए-पिएँ और समझ लेते हो कि कुंजी क्या है तो सहभागिता तुम्हारे लिए आसान होगी। जो भी मामले उठेंगे, तुम उनके बारे में सहभागिता कर पाओगे और वास्तविकता को समझ लोगे। बिना वास्तविकता के परमेश्वर के वचन से सहभागिता करने का अर्थ है, तुम यह समझ पाने में असमर्थ हो कि कुंजी क्या है, यह बात दर्शाती है कि तुम परमेश्वर के वचन को खाना-पीना नहीं जानते। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते समय थकान का अनुभव करते हैं। यह दशा सामान्य नहीं है। वास्तव में सामान्य बात यह है कि परमेश्वर का वचन पढ़ते हुए तुम कभी थकते नहीं, सदैव उसकी भूख-प्यास बनी रहती है, तुम सदैव सोचते हो कि परमेश्वर का वचन भला है। और वह व्यक्ति जो सचमुच प्रवेश कर चुका है वह परमेश्वर के वचन को ऐसे ही खाता-पीता है। जब तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर का वचन सचमुच व्यावहारिक है और मनुष्य को इसमें प्रवेश करना ही चाहिए; जब तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिए बेहद सहायक और लाभदायक है, यह मनुष्य के जीवन के लिए रसद है, यह पवित्र आत्मा है जो तुम्हें ऐसी भावना देता है, और तुम्हें प्रेरित करता है। यह बात साबित करती है कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है और परमेश्वर तुमसे विमुख नहीं हुआ है। यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से थक जाते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने या न पढ़ने का कोई परिणाम नहीं होता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनका हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करता, ऐसे लोगों में पूर्णता के लिए भूख-प्यास नहीं होती और न ही वे इसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुममें परमेश्वर के वचन की प्यास नहीं है तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। अतीत में, परमेश्वर तुमसे कहीं विमुख तो नहीं हो गया, इसका पता इस बात से चलता था कि तुम्हारे भीतर शांति है या नहीं और तुम आनंद का अनुभव कर रहे या नहीं। अब, यह इस बात से पता चलता है कि तुममें वचन की प्यास है या नहीं। क्या उसके वचन तुम्हारी वास्तविकता हैं, क्या तुम निष्ठावान हो और क्या तुम वह करने योग्य हो जो तुम परमेश्वर के लिये कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के द्वारा जाँचा-परखा जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को सभी मनुष्यों की ओर भेजता है। यदि तुम उसे पढ़ने के लिए तैयार हो तो वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, यदि नहीं तो वह तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा। परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करता है जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और परमेश्वर को खोजते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने वचन पढ़ने के बाद भी उन्हें प्रबुद्ध नहीं किया। परमेश्वर के वचनों को तुमने कैसे पढ़ा था? यदि तुमने उसके वचनों को इस ढंग से पढ़ा जैसे किसी घुड़सवार ने घोड़े पर बैठे-बैठे फूलों को देखा और वास्तविकता को कोई महत्व नहीं दिया, तो परमेश्वर कैसे तुम्हें प्रबुद्ध कर सकता है? कैसे वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखता परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है? यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते, तब तुम्हारे पास न तो सत्य होगा और न ही वास्तविकता होगी। यदि तुम उसके वचन को सँजो कर रखते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास कर पाओगे; और तब ही तुम वास्तविकता को पाओगे। इसलिए स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिए, तुम चाहे व्यस्त हो या न हो, परिस्थितियां विपरीत हों या न हों, चाहे तुम परखे जा रहे हो या नहीं परखे जा रहे हो। कुल मिलाकर परमेश्वर का वचन मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। कोई भी उसके वचन से विमुख नहीं हो सकता, उसके वचन को ऐसे खाना होगा जैसे वे दिन में तीन बार भोजन करते हैं। क्या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना और प्राप्त किया जाना इतना आसान हो सकता है? अभी तुम इसे समझो या न समझो, तुम्हारे भीतर परमेश्वर के कार्य को समझने की अंर्तदृष्टि हो या न हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को अधिक से अधिक खाना और पीना चाहिए। यह तत्परता और क्रियाशीलता के साथ प्रवेश करना है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, जिसमें प्रवेश कर सको उस पर अमल करने की तत्परता दिखाओ, तुम जो नहीं कर सकते, उसे कुछ समय के लिए दरकिनार कर दो। आरंभ में हो सकता है, परमेश्वर के बहुत से वचन तुम समझ न पाओ, पर दो या तीन माह बाद या फिर एक वर्ष के बाद तुम समझने लगोगे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर एक या दो दिन में मनुष्य को पूर्ण नहीं कर सकता। अधिकतर समय, जब तुम परमेश्वर का वचन पढ़ते हो, तुम उस समय उसे नहीं समझ पाओगे। उस समय वह तुम्हें लिखित पाठ से अधिक प्रतीत नहीं होगा; केवल कुछ समय के अनुभव के बाद ही तुम उसे समझने योग्य बन जाओगे। परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है इसलिए उसके वचन को खाने-पीने के लिए तुम्हें अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम समझने लगोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रबुद्ध करता है, तब अक्सर मुनुष्य को उसका ज्ञान नहीं होता। वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और मार्गदर्शन देता है जब तुम उसके प्यासे होते हो, उसे खोजते हो। पवित्र आत्मा जिस सिद्धांत पर कार्य करता है वह परमेश्वर के वचन पर केंद्रित होता है जिसे तुम खाते और पीते हो। वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं―अपनी संभ्रमित सोच में यह विश्वास करते हुए कि वे वचन को पढ़ें या न पढ़ें कुछ फर्क नहीं पड़ता―ऐसे लोग हैं जो वास्तविकता नहीं जानते। ऐसे व्यक्ति में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा दी गई प्रबुद्धता दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति बस साथ-साथ चलते हैं, वे बिना उचित योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले लोग हैं, जैसे कि एक नीतिकथा में[क] नैनगुओ थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, "नीतिकथा में" यह वाक्यांश नहीं है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 404

जब परमेश्वर बोलता है तब तुम्हें तुरंत उसके वचनों को ग्रहण करना और उन्हें खाना-पीना चहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना समझते हो, अपना दृष्टिकोण यह रखो कि तुम वचन को खाने और पीने, उसे जानने और उसका अभ्यास करने पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे। तुम्हें यही करना चाहिए। इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा हो जाएगा; केवल परमेश्वर के वचन को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करो। इसी तरह से मनुष्य को परमेश्वर का सहयोग करना चाहिए। तुम्हारा आत्मिक जीवन मुख्यतः उस वास्तविकता में प्रवेश करना है, जहां तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ-पिओ और उनका अभ्यास करो। तुम्हें अन्य किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। कलीसिया के अगुवाओं को इस बारे में सभी भाई-बहनों की अगुवाई करने में सक्षम होना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन को कैसे खाएँ-पिएँ। यह सभी कलीसिया के अगुवाओं की जिम्मेवारी है। वे चाहे युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने-पीने को महत्व देना चाहिए और उन वचनों को अपने हृदय में रखना चाहिए। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हो तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर लोगे। आजकल बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना नहीं रह सकते, और महसूस करते हैं कि समय के निरपेक्ष परमेश्वर का वचन नया है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ कर रहा है। परमेश्वर मनुष्यों में काम करने और उनकी आपूर्ति करने के लिए वचन का उपयोग करता है। जब सभी लोग परमेश्वर के वचन की लालसा और प्यास रखते हैं तो मानवजाति परमेश्वर के वचन के संसार में प्रवेश करती है।

परमेश्वर बहुत सारी बातें कह चुका है। तुम कितना जान पाए हो? तुम उनमें कितना प्रवेश कर पाए हो? यदि कलीसिया के अगुवाओं ने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में अगुवाई नहीं की है तो वे अपने कर्तव्य-पालन में चूक गए हैं और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हुए हैं! चाहे तुम्हारी समझ गहन हो या सतही, तुम्हारी समझ के स्तर की परवाह किए बिना, तुम्हें अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि उसके वचनों को कैसे खाया और पिया जाए, तुम्हें उसके वचनों की ओर बहुत ध्यान अवश्य देना चाहिए और उन्हें खाने-पीने के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझना चाहिए। परमेश्वर ने बहुत कुछ कह दिया है। यदि तुम उसके वचन को नहीं खाते-पीते, उसे खोजते नहीं या उस पर अमल नहीं करते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो। क्योंकि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिए, उसका अनुभव करना चाहिए और उसे जीना चाहिए। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन पर अमल नहीं कर सकते या वास्तविकता उत्पन्न नहीं कर सकते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना "भूख शांत करने के लिए रोटी की खोज" करने जैसा है। बिना किसी वास्तविकता के केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी और सतही मामलों पर बातें करना, परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं है, और तुमने बस परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक से अधिक खाना-पीना चाहिए? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते नहीं और केवल स्वर्ग की ऊँचाई चढ़ना चाहते हो तो क्या यह विश्वास माना जाएगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्य को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाए, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास रखना वास्तव में क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम-से-कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के वचन के अधीन रहना। किसी भी परिस्थिति में तुम उसके वचन से विमुख नहीं होगे। परमेश्वर को जानना और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, संप्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जाएँगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएँगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जाएगा : इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर पूरी तरह परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार मानवजाति को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और उसकी गवाही देने में सक्षम लोग वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता के रूप में अपनाया है।

वचन के युग अर्थात सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से ही तुम परमेश्वर के वचन को जीने में समर्थ होगे। दूसरे लोगों को आश्वस्त करने के लिए तुम्हें कुछ व्यावहारिक अनुभव पेश करने होंगे। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं जी सकते तो किसी को भी यकीन नहीं दिलाया जा सकता! परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी लोग वे हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए इस वास्तविकता को पेश नहीं कर सकते तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गए हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की प्यास रखता हो? जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, उनमें सत्य की प्यास है और केवल ऐेसे ही लोगों को परमेश्वर का अशीष प्राप्त है। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सारी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद वह नास्तिकों के बीच अपनी बात रखता है और उन्हें जीतता है। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किए जाएँगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव में कमी आती है, उसमें इंसानियत का प्रकटन होता है और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव में कमी आती है। वचन मनुष्य में अधिकार के साथ काम करता है और परमेश्वर की ज्योति के भीतर मनुष्य को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करता है, साथ ही उसके कार्य के निर्णायक मोड़, ये सब कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकते हैं। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने से, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके और अपने वास्तविक अनुभव से परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 405

मैंने पहले कहा है कि "वे सब, जो संकेत और चमत्कार देखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, त्याग दिए जाएँगे; ये वे लोग नहीं हैं, जो पूर्ण बनाए जाएँगे।" मैंने बहुत-से वचन कहे हैं, फिर भी मनुष्य को इस कार्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है, और इस बिंदु तक आकर, लोग अभी भी संकेतों और चमत्कारों के बारे में पूछते हैं। क्या परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास संकेतों और चमत्कारों की खोज से अधिक कुछ नहीं, या यह जीवन प्राप्त करने के उद्देश्य से है? यीशु ने भी बहुत-से वचन कहे थे और उनमें से कुछ अभी भी पूरे होने शेष हैं। क्या तुम कह सकते हो कि यीशु परमेश्वर नहीं है? परमेश्वर ने गवाही दी कि वह मसीहा और परमेश्वर का प्यारा पुत्र है। क्या तुम इस बात से इनकार कर सकते हो? आज परमेश्वर केवल वचन कहता है, और यदि तुम इसे पूरी तरह से नहीं जानते, तो तुम अडिग नहीं रह सकते। तुम उसमें इसलिए विश्वास करते हो क्योंकि वह परमेश्वर है, या फिर तुम उसमें इस आधार पर विश्वास करते हो कि उसके वचन पूरे होते हैं या नहीं? क्या तुम संकेतों और चमत्कारों पर विश्वास करते हो, या तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो? आज वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता—क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? यदि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे नहीं होते, तो क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? क्या परमेश्वर का सार इस बात से निश्चित होता है कि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे होते हैं या नहीं? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने से पहले सदैव उसके द्वारा कहे गए वचनों के पूरे होने की प्रतीक्षा करते हैं? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि वे परमेश्वर को नहीं जानते? ऐसी धारणाएँ रखने वाले लोग परमेश्वर को नकारते हैं। वे परमेश्वर को मापने के लिए धारणाओं का उपयोग करते हैं; यदि परमेश्वर के वचन पूरे हो जाते हैं तो वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और यदि वचन पूरे नहीं होते तो वे उसमें विश्वास नहीं करते; और वे सदैव संकेतों और चमत्कारों की खोज करते रहते हैं। क्या ये लोग आधुनिक युग के फरीसी नहीं हैं? तुम अडिग रहने में समर्थ हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम वास्तविक परमेश्वर को जानते हो या नहीं—यह महत्वपूर्ण है! परमेश्वर के वचनों की जितनी अधिक वास्तविकता तुममें होगी, परमेश्वर की वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक होगा, और परीक्षणों के दौरान उतना ही अधिक अडिग रहने में तुम समर्थ होगे। जितना अधिक तुम संकेत और चमत्कार देखने पर ध्यान दोगे, उतना ही कम तुम अडिग रहने में समर्थ होगे और परीक्षणों के बीच गिर जाओगे। संकेत और चमत्कार बुनियाद नहीं हैं; केवल परमेश्वर की वास्तविकता ही जीवन है। कुछ लोग उन प्रभावों को नहीं जानते, जो परमेश्वर के कार्य के द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। वे परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज न करते हुए भ्रांति में अपने दिन व्यतीत करते हैं। उनकी खोज का उद्देश्य सदैव परमेश्वर से केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करवाना होता है, और केवल तभी वे अपने विश्वास में गंभीर होते हैं। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर के वचन पूरे होंगे, तो वे जीवन की खोज करेंगे, किंतु यदि उसके वचन पूरे नहीं होते, तब उनके द्वारा जीवन की खोज किए जाने की कोई संभावना नहीं है। मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ संकेत और चमत्कार देखने और स्वर्ग तथा तीसरे स्वर्ग तक आरोहण करने की कोशिश करना है। उनमें से कोई यह नहीं कहता कि परमेश्वर पर उसका विश्वास वास्तविकता में प्रवेश करने की खोज करना, जीवन की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा जीते जाने की खोज करना है। ऐसी खोज का क्या मूल्य है? वे लोग, जो परमेश्वर के ज्ञान और उसकी संतुष्टि की खोज नहीं करते, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और जो ईशनिंदा करते हैं!

क्या अब तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है? क्या संकेत और चमत्कार देखना परमेश्वर पर विश्वास करना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग पर आरोहण करना है? परमेश्वर पर विश्वास ज़रा भी आसान नहीं है। उन धार्मिक अभ्यासों को निकाल दिया जाना चाहिए; रोगियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने का अनुसरण करना, प्रतीकों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना और परमेश्वर के अनुग्रह, शांति और आनंद का अधिक लालच करना, देह के लिए संभावनाओं और आराम की तलाश करना—ये धार्मिक अभ्यास हैं, और ऐसे धार्मिक अभ्यास एक अस्पष्ट प्रकार का विश्वास हैं। आज परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है, ताकि तुम परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सको, उससे प्रेम कर सको, और वह कर्तव्य निभा सको, जिसे परमेश्वर के एक प्राणी द्वारा निभाया जाना चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता का और इस बात का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर कितने आदर के योग्य है, कैसे अपने द्वारा सृजित प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—ये परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की एकदम अनिवार्य चीज़ें हैं। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह-उन्मुख जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है; भ्रष्टता के भीतर जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन के भीतर जीना है; यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह देह की आज्ञाकारिता को नहीं, बल्कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ होना है; यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने देना है, और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इसलिए है, ताकि परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पर चल सको, और परमेश्वर की योजना संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेत और चमत्कार देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की कोशिश के लिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने, और पतरस के समान मृत्यु तक परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही परमेश्वर में विश्वास करने के मुख्य उद्देश्य हैं। व्यक्ति परमेश्वर के वचन को परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, जिसके बाद ही तुम उसका आज्ञा-पालन कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान के साथ ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और यह वह लक्ष्य है, जिसे मनुष्य को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में रखना चाहिए। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम सदैव संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास कर रहे हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। परमेश्वर का उद्देश्य उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाने और उन्हें अपने भीतर पूरा करने से हासिल किया जाता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि तुम बिना शिकायत किए परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो, परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति विचारशील हो सकते हो, पतरस का आध्यात्मिक कद प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली ग्रहण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुम परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर चुके होगे, और यह इस बात का द्योतक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

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