जीवन में प्रवेश 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 374

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त वस्तुओं का मुखिया, अपने सिंहासन से अपने राजसी सामर्थ्य को संभालता है। वह समस्त ब्रह्माण्ड और सब वस्तुओं पर राज करता और सारी पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन करता है। हम हर क्षण उसके समीप होंगे, और एकांत में उसके सम्मुख आयेंगे, एक पल भी नहीं खोएँगे और हर समय कुछ न कुछ सीखेंगे। हमारे इर्द-गिर्द का वातावरण, लोग, बातें व वस्तुएं, सब उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी हाल में अपने दिल में शिकायतों को आने मत दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अपना अनुग्रह प्रदान न करेगा। जब रोग आता है तो यह परमेश्वर का प्रेम ही है और इसके पीछे निश्चित ही उसके भले अभिप्राय होते हैं। भले तुम्हारा शरीर पीड़ा सहे लेकिन शैतान का विचार मन में न लाओ। बीमारियों के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश ना हो, खोजते रहो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें अपनी ज्योति से रोशन करेगा। अय्यूब का विश्वास कैसा था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वसामर्थी चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परन्तु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। अगर तुम्हारी एक भी सांस बाकी है तो परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

पुनरुत्थित मसीह का जीवन हमारे भीतर है। निस्संदेह, परमेश्वर के समक्ष हममें विश्वास की कमी है : परमेश्वर हम में सच्चा विश्वास जगाये। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दुष्टों और शैतान को शर्मिन्दा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वह सब बातों को दूर कर सर्वत्र शान्ति बहाल करते हैं। विश्वास लकड़ी के इकलौते लट्ठे के पुल की तरह है : जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से लिपटे रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो खुद का त्याग करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मजबूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो यह इसलिए है की शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे। शैतान अपने विचारों को हम तक पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने प्रकाश से रोशन करे, शैतान के जहर से हमें अपने आप को शुद्ध करने के लिए, हमें हर पल परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी आत्माओं में परमेश्वर के निकट आने के लिए अभ्यास करना चाहिए। अपने सम्पूर्ण जीवन पर हमें परमेश्वर को अधिकार देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 375

हमारे आस-पास परिवेशों का उठना आत्मा में हमारी वापसी को बढ़ाता है। एक कठोर दिल से काम मत करो, इस बात की अवहेलना मत करो कि पवित्र आत्मा चिंतित है या नहीं, चालाक बनने की कोशिश न करो और बेपरवाह तथा आत्म-तुष्ट न बनो, या अपनी कठिनाइयों को न बढ़ाओ; केवल एक ही चीज़ जो तुम्हें करनी है वह है भाव और सच्चाई में परमेश्वर की आराधना करना। तुम परमेश्वर के वचनों को पीछे छोड़ नहीं सकते, या उन्हें अनसुना नहीं कर सकते; तुम्हें उन्हें सावधानी से समझना चाहिए, अपनी प्रार्थना पढ़ने को दोहराना चाहिए, और वचनों के भीतर निहित जीवन को आत्मसात करना चाहिए। उन्हें पचाने के लिए समय दिए बिना, भेड़िये की तरह उन्हें व्यर्थ में निगलते न रहो। क्या तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करते हो? किसी बड़े बच्चे की तरह शेखी न बघारो और जब भी कोई बात घटित हो, तो सब कुछ गड़बड़ न कर डालो। तुम्हें हर दिन, हर घंटे में आध्यात्मिक जीवन से सम्बंधित अपनी भावना का अभ्यास करना चाहिए, एक पल के लिए भी आराम न करो। तुम्हारी आत्मा कुशाग्र होनी चाहिए। चाहे कोई भी आये या कुछ भी तुम पर पड़े, अगर तुम परमेश्वर के सामने आते हो, तो तुम्हारे पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा। तुम्हें प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहिए, बिना लापरवाही के उनके वचनों को समझना चाहिए, अधिक प्रयास करना चाहिए, इसे विस्तारपूर्वक बिलकुल सही तरीके से प्राप्त करना चाहिए और स्वयं को पूरी सच्चाई से लैस करना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को गलत समझने से बच सको। तुम्हें अपने अनुभव की सीमा को विस्तृत करना चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने पर ध्यान देना चाहिए। अनुभव के माध्यम से तुम परमेश्वर के बारे में अधिक निश्चित हो पाओगे; अनुभव के बिना, यह कहना कि तुम उसके बारे में निश्चित हो, केवल खोखले शब्द होंगे। हमें अपने दिमाग में स्पष्ट होना चाहिए! जागो! अब और ढील न करो; यदि तुम एक लापरवाह तरीक़े से चीज़ों से निपटते हो और प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हो, तो तुम वास्तव में बिलकुल अंधे हो। तुम्हें पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देना चाहिए, पवित्र आत्मा की आवाज़ को सावधानीपूर्वक सुनना चाहिए, परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने कानों को खोलना चाहिए, जो भी समय बचा है उसे संजोना चाहिए और जो भी कीमत हो, उसका भुगतान करना चाहिए। अगर तुम्हारे पास फौलाद हो तो इसका इस्तेमाल वहाँ करो जहाँ इसका महत्व हो जैसे कि एक मजबूत तलवार बनाने में; महत्वपूर्ण बात पर अच्छी पकड़ बनाओ और परमेश्वर के वचनों का पालन करने पर ध्यान दो। परमेश्वर के वचनों को छोड़ने के बाद चाहे तुम बाहर से कितना भी अच्छा करो, इसका कोई लाभ नहीं है। केवल बातें बनाकर अभ्यास करना परमेश्वर के लिए अस्वीकार्य होता है—परिवर्तन तुम्हारे व्यवहार, स्वभाव, विश्वास, साहस और अंतर्दृष्टि के माध्यम से आना चाहिए।

वो समय इतना करीब है! चाहे दुनिया की चीज़ें कितनी भी अच्छी हों, उन सभी को किनारे करना होगा। अनेक कठिनाइयाँ और ख़तरे हमें डरा नहीं सकते हैं, न ही टूटता आकाश हमें अभिभूत कर सकता है। इस तरह के संकल्प के बिना तुम्हारे लिए एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बनना बहुत कठिन होगा। जो लोग बुझदिल हैं और जीवन से चिपके रहते हैं, वे परमेश्वर के सामने खड़े होने के योग्य नहीं हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक व्यावहारिक परमेश्वर है। चाहे हम कितने भी अज्ञानी हों, वह अभी भी हम पर दया करेगा, उसके हाथ निश्चित रूप से हमें बचाएँगे और वह हमें अब भी परिपूर्ण कर देगा। जब तक हमारे पास एक ऐसा दिल है जो वास्तव में परमेश्वर को चाहता हो, जब तक हम ध्यानपूर्वक अनुपालन करते हैं और निराश नहीं होते हैं, और हम एक तात्कालिक आवश्यकता की भावना के साथ खोज करते हैं, तब तक वह बिल्कुल हममें से किसी के साथ भी अन्याय नहीं करेगा, वह निश्चित रूप से हममें जिसकी कमी है उसे पूरा कर देगा, और वह हमें संतुष्ट करेगा—यह सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर की दया है।

अगर कोई पेटू और आलसी है, एक संतृप्त, निष्क्रिय जीवन जीता है और हर चीज़ के प्रति बेपरवाह है, तो उसके लिए नुकसान से बचना मुश्किल होगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर सभी चीज़ों और घटनाओं पर वर्चस्व रखता है! जब तक हमारे दिल आशा से हर वक्त उसकी ओर देखते हैं और हम आत्मा में प्रवेश करते हैं और उसके साथ सहभागिता करते हैं, तब तक वह हमें उन सभी चीज़ों को दिखाएगा जिन्हें हम चाहते हैं और उसकी इच्छा का हमारे सामने प्रकट होना निश्चित है; तब हमारे दिल आनंद और शांति में होंगे, और पूर्ण स्पष्टता के साथ स्थिर होंगे। उसके वचनों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना अत्यंत महत्वपूर्ण है; उसकी इच्छा को समझने और उसके वचनों पर निर्भर रहकर जीने में सक्षम होना—केवल यही सच्चा अनुभव है।

केवल परमेश्वर के वचनों को समझने से परमेश्वर के वचनों की सच्चाई हमारे अंदर प्रवेश करने, और हमारा जीवन बनने में, सक्षम होगी। किसी भी व्यावहारिक अनुभव के बिना, तुम कैसे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होगे? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारा स्वभाव बदल नहीं पाएगा।

पवित्र आत्मा का काम अब बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता है! यदि तुम ध्यानपूर्वक पालन नहीं करते हो और प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करते हो, तो पवित्र आत्मा की द्रुत गति के साथ कदम बनाए रखना मुश्किल होगा। जल्दी करो और सम्पूर्ण परिवर्तन ले आओ अन्यथा तुम शैतान के पैरों तले कुचले जाओगे और उस आग और गंधक की झील में प्रवेश करोगे जिससे बचने को कोई रास्ता नहीं है। जाओ, यथाशक्ति अपनी सर्वोत्तम खोज करो ताकि तुम किनारे न कर दिए जाओ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 7' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 376

मैं तुझे याद दिलाना चाहता हूँ कि तू मेरे वचन पर थोड़ा भी अस्पष्ट नहीं हो सकता है और कोई भी लापरवाही अस्वीकार्य है। तुझे इस पर ध्यान देना चाहिए और इसका पालन करना चाहिए और मेरे इरादों के अनुसार चीज़ों को करना चाहिए। तुझे सदैव सतर्क रहना चाहिए और तेरा कभी भी ऐसा स्वभाव नहीं होना चाहिए जो अहंकारी और आत्म-तुष्ट हो, और तुझे अपने भीतर रहने वाले प्राकृतिक पुराने स्वभाव को दूर करने के लिए सदैव मुझ पर भरोसा करना चाहिए। तुझे सदैव मेरे सामने सामान्य स्थिति को बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए, और एक स्थिर स्वभाव रखना चाहिए। तेरी सोच शांत और स्पष्ट होनी चाहिए और यह किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज़ से डोलनी या नियंत्रित होनी नहीं चाहिए। तुझे मेरी उपस्थिति में सदैव शांत रहना चाहिए और सदैव मेरे साथ निरंतर निकटता और सहभागिता बनाए रखनी चाहिए। मेरे लिए अपनी गवाही में तुझे अवश्य ताक़त और रीढ़ दिखानी चाहिए, और अडिग रहना चाहिए। उठ और मेरे वास्ते बोल और डर मत कि दूसरे लोग क्या कहते हैं। मेरे इरादों को संतुष्ट करने पर ध्यान केंद्रित कर और दूसरों के द्वारा नियंत्रित मत हो। जो मैं तेरे लिए प्रकट करता हूँ, वह मेरे इरादों के अनुसार किया जाना चाहिए और उसमें विलंब नहीं किया जा सकता है। तू अंदर कैसा महसूस करता है? क्या तू असहज है? तू समझ जाएगा। तू मेरे लिए बात करने को खड़े होने और मेरी ज़िम्मेदारी की ओर विचार करने में असमर्थ क्यों है? तू छोटे-छोटे षड़यंत्र रचने में व्यस्त रहता है, लेकिन मैं इन सब को बिल्कुल साफ़-साफ़ देखता हूँ। मैं तेरा सहारा और तेरी ढाल हूँ, और सब कुछ मेरे हाथों में है, तो तुझे किस बात का डर है? क्या यह ज़रूरत से ज़्यादा भावुक होना नहीं है? तुझे तुरंत भावनाओं को अलग कर देना चाहिए; मैं भावनाओं पर विचार नहीं करता हूँ और मैं धार्मिकता का प्रयोग करता हूँ। यदि तेरे माता-पिता कुछ भी ऐसा करते हैं जो कलीसिया के किसी लाभ का नहीं है, तो वे बच कर नहीं निकल सकते हैं! मेरे इरादे तेरे लिए प्रकट कर दिए गए हैं और तुझे उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसके बजाए, तुझे अपना पूरा ध्यान उन पर लगाना चाहिए और पूरे मनोयोग से उनका पालन करने के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए। मैं सदैव तुझे अपने हाथों में रखूँगा। डरपोक मत बन और अपने पति या पत्नी के द्वारा नियंत्रित मत हो; तू मेरी इच्छा पूरी करने में सहयोगी बन।

आस्था रख! विश्वास रख! मैं तेरा सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। यह कुछ ऐसा है जो तुझे कुछ-कुछ महसूस हो सकता है, लेकिन तुझे अभी भी सतर्क रहना होगा। कलीसिया की ख़ातिर, मेरी इच्छा के लिए और मेरे प्रबंधन के वास्ते, तुझे पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए, और सभी रहस्य और परिणाम तुझे स्पष्ट रूप से दिखाए जाएँगे। इसमें कोई और विलंब नहीं होगा और दिन ख़त्म हो रहे हैं। तो तू क्या करेगा? तुझे अपने जीवन में बढ़ने और परिपक्व होने का प्रयास कैसे करना चाहिए? तू अपने आप को मेरे लिए जल्दी से कैसे उपयोगी बनाएगा? तू मेरी इच्छा कैसे पूरी करेगा? ऐसा करने के लिए मेरे साथ पूरी तरह से विचारमग्न होने और गहरी संगति करने की आवश्यकता है। मुझ पर भरोसा कर, मुझ पर विश्वास कर, कभी भी लापरवाह न बन, और मेरे मार्गदर्शन के अनुसार चीज़ों को करने में सक्षम बन। सत्य पूरी तरह से सुसज्जित होना चाहिए और तुझे इसे अक्सर खाना और पीना चाहिए। इससे पहले कि हर सत्य को स्पष्ट रूप से समझा जा सके, इस पर अवश्य अमल किया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 9' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 377

तुम्हें इससे या उससे भयभीत नहीं होना चाहिए; चाहे तुम्हें कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करना पड़े, तुम किसी भी चीज से बाधित हुए बिना, मेरे सम्मुख स्थिर रहने के काबिल हो, ताकि मेरी इच्छा बेरोक-टोक पूरी हो सके। यह तुम्हारा कर्तव्य है; अन्यथा मैं तुम पर क्रोधित हो जाऊँगा और अपने हाथ से मैं...। और तुम अनंत मानसिक पीड़ा भोगोगे। तुम्हें सबकुछ सहना होगा; मेरे लिए तुम्हें अपनी हर चीज़ का त्याग करना होगा, और मेरा अनुसरण करने के लिए सबकुछ करना होगा, अपना सर्वस्व व्यय करने के लिए तैयार रहना होगा। अब वह समय है जब मैं तुम्हें परखूंगा: क्या तुम अपनी निष्ठा मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम ईमानदारी से मार्ग के अंत तक मेरे पीछे चलोगे? डरो मत; मेरी सहायता के होते हुए कौन इस मार्ग में बाधा डाल सकता है? यह स्मरण रखो! इस बात को भूलो मत! जो कुछ घटित होता है वह मेरी नेक इच्छा से होता है और सबकुछ मेरी निगाह में है। क्या तुम्हारा हर शब्द व कार्य मेरे वचन के अनुसार हो सकता है? जब तुम्हारी अग्नि परीक्षा होती है, तब क्या तुम घुटने टेक कर पुकारोगे? या दुबक कर आगे बढ़ने में असमर्थ होगे?

तुम में मेरी हिम्मत होनी चाहिए, जब उन रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए जो विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। तुम्हें मेरी खातिर किसी भी अन्धकार की शक्ति से हार नहीं माननी चाहिए। पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर भरोसा रखो; शैतान के किसी भी षडयंत्र को काबिज़ न होने दो। अपने हृदय को मेरे सम्मुख रखने हेतु पूरा प्रयास करो, मैं तुम्हें आराम दूंगा, तुम्हें शान्ति और आनंद प्रदान करूँगा। दूसरों के सामने एक विशेष मार्गी होने का प्रयास मत करो; क्या मुझे संतुष्ट करना तुम्हारे लिए अधिक मूल्य और महत्व नहीं रखता? मुझे संतुष्ट करने से क्या तुम और भी अनंत और जीवनपर्यंत शान्ति या आनंद से नहीं भर जाओगे? तुम्हारी आज की तकलीफ़ें बताती हैं कि तुम्हारी आशीष भविष्य में कितनी बड़ी होगी; वे अवर्णनीय हैं। तुम्हें जो आशीष प्राप्त होगी, वे कितनी बड़ी होंगी, ये तुम नहीं जानते, तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। आज वह साकार हो गयी, बिल्कुल वास्तविक! यह बहुत दूर नहीं है—तुम उसे देख सकते हो? इसका अंतिम अंश भी मुझमें है; आगे का मार्ग कितना रोशन है! अपने आंसू पोंछो, तथा दुःख और दर्द महसूस मत करो। सब-कुछ मेरे हाथों से व्यवस्थित किया जाता है, और मेरा लक्ष्य यह है कि तुम्हें जल्द विजेता बनाऊं और तुम्हें अपने साथ महिमा में ले चलूँ। तुम्हारे साथ जो कुछ होता है, उसके अनुरूप तुम्हें आभारी होना चाहिए और भरपूर स्तुति करनी चाहिए इससे मुझे गहरी संतुष्टि मिलेगी।

मसीह का सर्वोत्कृष्ट जीवन पहले ही प्रकट हो चुका है; ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे तुम डरो। शैतान हमारे पैरों के नीचे हैं, और उनका समय अधिक लंबा नहीं होगा। जागो! की अनैतिकता के संसार को त्यागो; मृत्यु के गर्त से खुद को स्वतंत्र करो! चाहे कुछ भी हो जाए, मेरे प्रति निष्ठावान रहो, और बहादुरी से आगे बढ़ो; मैं तुम्हारी शक्ति की चट्टान हूँ, इसलिए मुझ पर भरोसा रखो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 10' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 378

यदि तुम्हारा स्वभाव अस्थिर है—हवा या बारिश की तरह तुनकमिज़ाज, यदि तुम लगातार आगे नहीं बढ़ सकते, तो मेरी छड़ी तुमसे दूर नहीं होगी। जब तुम्हारे साथ व्यवहार किया जाए, परिस्थिति जितनी ही प्रतिकूल हो और जितना ज़्यादा तुमको सताया जाए, उतना ही परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम बढ़ता है, और तुम दुनिया से लिपटना बंद कर देते हो। अन्य किसी रास्ते के बिना, तुम मेरे पास आते हो, और तुम अपनी ताकत और अपना आत्मविश्वास दुबारा हासिल करते हो। फिर भी, आसान परिस्थितियों में, तुम भ्रमित बने रहोगे। तुम को सकारात्मक रूप से प्रवेश करना होगा, और सक्रिय होना होगा, निष्क्रिय नहीं। तुम किसी भी स्थिति में किसी भी व्यक्ति या वस्तु के द्वारा विचलित न होगे, और तुमको किसी के भी शब्दों से प्रभावित नहीं होना है। तुम्हारे पास एक स्थिर स्वभाव होना चाहिए, और चाहे लोग जो भी कहें, तुम फ़ौरन वह करोगे जिसे तुम सच जानते हो। तुम्हारे अंदर मेरे वचन सदैव कार्यरत रहें, चाहे तुम्हारे सामने कोई भी हो; तुमको मेरे लिए अपनी गवाही में दृढ़ और मेरे भार के प्रति विचारशील रहना होगा। तुमको भ्रमित नहीं होना है, बिना अपनी सोच-बूझ के लोगों के साथ अंधाधुंध सहमत होते हुए, बल्कि इसके बजाय तुम में खड़े होकर उन बातों का विरोध करने का साहस होना चाहिए जो मेरी ओर से नहीं आतीं। यदि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि कुछ गलत है, फिर भी चुप रहते हो, तो तुम वो नहीं जो सच्चाई का अभ्यास करता है। यदि तुम जानते हो कि कुछ गलत है और तुम विषय को घुमा देते हो, लेकिन शैतान तुम्हारा रास्ता रोकता है—तुम किसी भी प्रभाव के बिना बोलते हो और अंत तक टिके रहने में असमर्थ हो जाते हो—तो तुम्हारे दिल में अभी भी डर बैठा हुआ है, और क्या तुम्हारा दिल अब भी शैतान से आते विचारों से भरा हुआ नहीं है?

एक विजेता क्या है? मसीह के अच्छे सैनिकों को बहादुर होना चाहिए और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने के लिए मुझ पर निर्भर होना चाहिए; उन्हें योद्धा बनने के लिए लड़ना होगा और शैतान का सामना मौत तक करना होगा। तुम को हमेशा जागते रहना चाहिए, और यही कारण है कि मैं तुम को हर क्षण मेरे साथ सक्रिय रूप से सहयोग करने और मेरे करीब आने के लिए कहता हूँ। यदि, किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में, तुम मेरे प्रवचन को सुनने और मेरे वचनों और कार्यों पर ध्यान देने के लिए सक्षम हो, तो तुम डोलोगे नहीं और अपनी जगह पर टिके रहोगे। कुछ भी जो मेरे भीतर से प्राप्त हो, उसे अभ्यास में लाया जा सकता है। मेरे शब्दों में से हर एक तुम्हारी स्थिति की ओर निर्देशित है। वे तुम्हारा दिल भेदते हैं, और यदि तुम अपने मुंह से इनकार भी कर दो, तो भी तुम अपने दिल से इनकार नहीं कर सकते, और यदि तुम मेरे शब्दों की जांच-पड़ताल करते हो, तो तुमसे न्याय किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, मेरे वचन सत्य, जीवन, और मार्ग हैं; वे एक तेज़, दोधारी तलवार हैं, और वे शैतान को पराजित कर सकते हैं। जो लोग समझते हैं और जिनके पास मेरे वचनों का अभ्यास करने के लिए एक रास्ता है, वे धन्य हैं, और जो उनका अभ्यास नहीं करते हैं उनके साथ निश्चय ही न्याय किया जाएगा; यह बहुत व्यवहारिक है। अब, जिनके साथ मेरे द्वारा न्याय किया जाए उनकी श्रेणी में विस्तार हुआ है। मैं केवल उनके साथ न्याय नहीं करूँगा जो मुझे जानते हैं, लेकिन जो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं और जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करने और उसे बाधित करने का अत्यधिक प्रयास करते हैं, उनके साथ भी न्याय होगा। मेरे सामने मेरे नक़्शे-कदम पर चलकर आने वाले सभी लोग यह देखेंगे कि परमेश्वर एक प्रचंड आग हैं! परमेश्वर महिमा हैं! वे अपने निर्णयों को निष्पादित कर रहे हैं, और उन लोगों को मौत की सजा दे रहे हैं। कलीसिया में जो पवित्र आत्मा के कार्य का पालन करने के प्रति ध्यान नहीं देते, जो पवित्र आत्मा के काम को बाधित करते हैं, जो अपनी झूठी शान का प्रदर्शन करते हैं, जो त्रुटिपूर्ण इरादे और लक्ष्य रखते हैं, जो परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने में अपना प्रयास नहीं करते हैं, जो उलझन में या संदिग्ध हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य की जांच-पड़ताल करते हैं—न्याय के वचन किसी भी समय उनके पास पहुँचेंगे। सभी लोगों के कामों को प्रकट किया जाएगा। पवित्र आत्मा लोगों के अंतरतम दिलों का निरीक्षण करता है, इसलिए अनमने न बनें; सावधान और सजग रहें, अंधाधुंध मनमानी न करें। यदि तुम्हारे कार्य मेरे शब्दों का पालन नहीं करते हैं, तो तुमसे न्याय किया जाएगा। नक़ल करने से, दिखावटी होने से, वास्तव में न समझने से काम नहीं चलेगा; तुमको मेरे सामने अक्सर आकर मेरे साथ संवाद करना चाहिए।

जो भी तुम मेरे भीतर से लेते हो, वह तुमको अभ्यास करने का एक मार्ग देगा, और तुम्हारे साथ मेरी शक्तियाँ होंगी, मेरी उपस्थिति होगी, और तुम हमेशा मेरे वचनों में चलोगे, तुम दुनिया में सब कुछ के ऊपर उठोगे, और पुनरुत्थान की शक्ति भी प्राप्त करोगे। यदि तुम्हारे शब्द, तुम्हारा व्यवहार और तुम्हारे कार्यों में मेरे वचन और मेरी उपस्थिति नहीं है, यदि मुझसे दूर होकर तुम अपने ही भीतर रहते हो, अपने ही मन की अवधारणा में बने रहते हो, सिद्धांतों और नियमों में रहते हो, तो यह सबूत है कि तुम पाप पर ध्यान लगाये हो। अन्य शब्दों में, तुम अपने पुराने "मैं" को पकड़ कर रखते हो और तुम ऐसा नहीं होने देते कि दूसरे तुमको चोट या तुम्हारी आत्मा को हानि पहुँचा पायें; ऐसे व्यक्ति की बहुत कम क्षमता है और वह बहुत बेतुका है, ऐसे लोग परमेश्वर की कृपा नहीं देख सकते हैं, न ही परमेश्वर के आशीर्वाद को पहचान सकते हैं। यदि तुम अपना परिहार जारी रखते हो तो कब मुझे अपने भीतर काम करने दोगे? जब मैं बोलना समाप्त करता हूँ, तो तुम सुनते तो हो लेकिन याद नहीं रखते, और जब तुम्हारी समस्याएं वास्तव में बताई जाती हैं तो तुम विशेष रूप से कमजोर बन जाते हो; यह किस तरह का कद है! तुमको मैं कब पूरा करूँगा यदि तुमको सदैव मनाना–फुसलाना पड़े! यदि तुम धक्कों और खरोंचों से डरते हो, तो तुमको फ़ौरन दूसरों को चेतावनी दे देनी चाहिए, "मैं किसी को भी मेरे साथ कोई व्यवहार करने नहीं दूँगा, मैं खुद ही मेरे प्राकृतिक, पुराने स्वभाव से छुटकारा पा सकता हूँ।" तो कोई भी तुम्हारी आलोचना या तुमको स्पर्श नहीं करेगा और तुम किसी अन्य की परवाह किये बिना जो चाहें उसमें विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हो। क्या तुम इस तरह मेरे नक़्शे-कदम पर चल सकते हो? तब यह कहना कि तुम निश्चित हो कि मैं तुम्हारा परमेश्वर और प्रभु हूँ, केवल कोरे शब्द हैं। यदि तुम वास्तव में संदेहरहित हो, तो ये चीजें कोई समस्या न होंगी, और तुमको विश्वास होगा कि यह परमेश्वर का प्रेम है और तुम पर परमेश्वर का आशीर्वाद है। जब मैं बोलता हूं, यह मेरे पुत्रों के लिए है, और इसे धन्यवाद और प्रशंसा के साथ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 12' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 379

लोग आजकल स्वयं को छोड़ नहीं पाते; वे हमेशा सोचते हैं कि वही सही हैं। वे अपनी छोटी-सी दुनिया में फंसे रहते हैं और वे लोग सही किस्म के इंसान नहीं हैं। उनके उद्देश्य और इरादे गलत हैं, और यदि वे इन पर अड़े रहे, तो निश्चित रूप से उनका न्याय किया जाएगा, और गंभीर मामलों में, उन्हें हटा दिया जाएगा। तुम्हें मेरे साथ निरंतर सहभागिता रखने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए, यह नहीं कि जिसके साथ चाहा सहभागिता कर ली, तुम्हें उन लोगों की समझ होनी चाहिए जिनके साथ तुम सहभागिता करते हो और तुम्हें जीवन में आध्यात्मिक मामलों पर सहभागिता करनी चाहिए; तभी तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति कर सकते हो और उनकी कमियों को दूर कर सकते हो। तुम्हें उनसे भाषण देने वाले अंदाज़ में बात नहीं करनी चाहिए; ऐसा दृष्टिकोण रखना मूलत: गलत है। सहभागिता में तुम्हें आध्यात्मिक मामलों की समझ होनी चाहिए। तुम्हारे अंदर बुद्धि होनी चाहिए और तुम्हें यह समझना चाहिए कि लोगों के दिल में क्या है। यदि तुम्हें दूसरों की सेवा करनी है, तो तुम्हें सही व्यक्ति होना चाहिए और तुम्हारे पास जो है उन बातों के साथ तुम्हें सहभागिता करनी चाहिए।

अब महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम मेरे साथ सहभागिता करो, मेरे साथ निकटता से संवाद करो, अपने आप खाओ और पिओ, और परमेश्वर के करीब हो जाओ। जितनी जल्दी हो सके तुम्हें आध्यात्मिक मामलों को समझ लेना चाहिए और तुम्हें साफ तौर पर अपने परिवेश की थाह पा लेनी चाहिए और जान लेना चाहिए कि तुम्हारे आसपास क्या व्यवस्था की गई है। क्या तुम समझ पाते हो कि मैं क्या हूं? यह महत्वपूर्ण है कि तुम अपनी कमियों के आधार पर खाओ और पिओ और मेरे वचन के अनुसार जीवन व्यतीत करो! मेरे हाथों को पहचानो और शिकायत न करो। यदि तुम शिकायत करते हो और अलग हो जाते हो, तो हो सकता है कि तुम परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने का अवसर खो दो। मेरे निकट आना शुरू कर दो : तुम में क्या कमी है, तुम्हें मेरे निकट कैसे आना चाहिए और मेरे दिल को कैसे समझना चाहिए? लोगों के लिए मेरे पास आना मुश्किल होता है क्योंकि वे अपनी इच्छाओं को त्याग नहीं पाते। उनका स्वभाव हमेशा अस्थिर बना रहता है, निरंतर गर्म और फिर ठंडा होता रहता है, और जब उन्हें मिठास का थोड़ा-सा भी स्वाद प्राप्त हो जाता है, तो वे अभिमानी और स्वयं से संतुष्ट हो जाते हैं। कुछ लोग अभी तक नहीं जागे हैं; तुम जो कहते हो, उसमें कितना साकार होता है जो तुम हो? उसमें से कितना आत्म-रक्षा है, उसमें से कितना दूसरों की नकल करना है और उसमें से कितना नियमों का पालन करना रहा है? तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की समझ या बोध इसलिए नहीं है क्योंकि तुम नहीं जानते कि मेरे करीब कैसे आना है। बाहरी तौर पर तो तुम हमेशा चीज़ों पर विचार करते रहते हो, अपनी धारणाओं और अपने मस्तिष्क पर भरोसा करते हो; तुम गुप्त रूप से शोध और तुच्छ साज़िशों में लगे रहते हो, और उन्हें खुले में प्रकट भी नहीं कर पाते हो। इससे पता चलता है कि तुम पवित्र आत्मा के काम को वास्तव में नहीं समझते। यदि तुम वास्तव में समझते हो कि कोई चीज़ परमेश्वर से नहीं आती, तो तुम खड़े होकर उसे अस्वीकार करने की हिम्मत क्यों नहीं करते? कितने हैं जो खड़े होकर मेरे लिए बोल सकें? तुम्हारे अंदर एक मर्द-बच्चे का ज़रा-सा भी साहस नज़र नहीं आता।

जो कुछ भी इस समय व्यवस्थित किया गया है वह तुम लोगों के प्रशिक्षण के उद्देश्य से है, ताकि तुम लोग अपने जीवन में विकास कर सको, अपनी आत्मा को उत्सुक और तीक्ष्ण कर सको, अपनी आध्यात्मिक आंखों को खोल सको और उन चीज़ों को पहचान सको जो परमेश्वर से आती हैं। परमेश्वर से आने वाली हर चीज़ तुम्हें शक्ति और बोझ के साथ सेवा करने और आत्मा में दृढ़ होने में सक्षम बनाती है। जो चीज़ें मुझसे नहीं आतीं वे सब खाली हैं; वे तुम्हें कुछ नहीं देतीं, वे तुम्हारी आत्मा में एक शून्य पैदा कर देती हैं, तुम्हारा विश्वास खत्म कर देती हैं और तुम्हारे और मेरे बीच दूरी पैदा कर देती हैं, जिससे तुम अपने मस्तिष्क में फंस जाते हो। जब तुम आत्मा में जीते हो, तो हर चीज़ को धर्मनिरपेक्ष विश्व से ऊँचा ले जा सकते हो, लेकिन अपने मस्तिष्क में जीने का अर्थ है शैतान द्वारा कब्ज़ा; यह एक बंद गली है। अब यह बहुत सरल है : मुझे अपने दिल से देखो, तुम्हारी आत्मा तुरंत मजबूत हो जाएगी, तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा और मैं हर कदम पर तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा। मेरा वचन हर समय और हर स्थान पर तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कहां या कब, या वातावरण कितना प्रतिकूल है, मैं तुम्हें स्पष्टता से दिखाऊंगा और मेरा दिल तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा, यदि तुम मेरी ओर अपने दिल से देखते हो; इस तरह तुम रास्ते में आगे निकल जाओगे और कभी अपने रास्ते से नहीं भटकोगे। कुछ लोग बाहर से अपना रास्ता खोजने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी अपनी आत्मा के भीतर से ऐसा नहीं करते। वे अक्सर पवित्र आत्मा के काम को समझ नहीं पाते। जब वे अन्य लोगों के साथ सहभागिता करते हैं, तो वे अधिक उलझन में पड़ जाते हैं और उनके पास अनुसरण करने के लिए कोई रास्ता नहीं होता और उन्हें नहीं मालूम होता कि उन्हें क्या करना है। ऐसे लोग नहीं जानते कि उन्हें क्या चीज़ परेशान कर रही है; उनके पास कई चीज़ें हो सकती हैं और वे आंतरिक रूप से परिपूर्ण प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन क्या इसका कोई उपयोग है? क्या तुम्हारे पास वास्तव में अनुसरण करने का कोई मार्ग है? क्या तुम्हारे पास कोई रोशनी और प्रबुद्धता है? क्या तुम्हारे पास कोई नई अंतर्दृष्टि है? क्या तुमने प्रगति की है या पीछे चले गए हो? क्या तुम नई रोशनी के साथ कदम से कदम मिला सकते हो? तुम में आज्ञाकारिता नहीं है; जिस आज्ञाकारिता की बात तुम अक्सर करते हो वह बातों के अलावा कुछ नहीं है। क्या तुमने आज्ञाकारी जीवन जिया है?

मनुष्य की आत्म-धार्मिकता, परितोष, आत्म-संतुष्टि और अहंकार की बाधा कितनी बड़ी है? जब तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाते हो, तो इसका दोषी कौन है? यह देखने के लिए कि तुम एक सही व्यक्ति हो या नहीं, तुम्हें सावधानीपूर्वक स्वयं की जांच करनी चाहिए। क्या तुम्हारे लक्ष्य और इरादे मुझे ध्यान में रखकर बनाए गए हैं? क्या तुम्हारे शब्द और कार्य मेरी उपस्थिति में कहे और किए गए हैं? मैं तुम्हारी सभी सोच और विचारों की जांच करता हूं। क्या तुम दोषी महसूस नहीं करते? तुम दूसरों को झूठा चेहरा दिखाते हो और शांति से आत्म-धार्मिकता का दिखावा करते हो; यह स्वयं के बचाव के लिए किया जाता है। तुम यह अपनी बुराई छुपाने के लिए करते हो, और किसी दूसरे पर उस बुराई को थोपने के तरीकों की तलाश भी करते हो। तुम्हारे दिल में कितना विश्वासघात भरा हुआ है! जो कुछ भी तुमने कहा है उसके बारे में सोचो; क्या अपने फ़ायदे के लिए तुम्हें डर नहीं था कि तुम्हारी अपनी आत्मा को नुकसान पहुंचेगा और इसलिए तुमने शैतान को छुपा लिया, और फिर जबरन अपने भाइयों और बहनों का खाना और पीना उनसे छीन लिया? तुम्हें अपने लिए क्या कहना है? क्या तुम्हें लगता है कि शैतान ने इस बार जो खाना और पीना छीना है, उसकी पूर्ति तुम अगली बार कर सकोगे? इसलिए, अब तुम इसे स्पष्ट रूप से देखते हो, क्या यह ऐसा है जिसकी तुम क्षतिपूर्ति कर सकते हो? क्या तुम खोए हुए समय की पूर्ति कर सकते हो? तुम सबको यह देखने के लिए मेहनत से जांच करनी चाहिए कि आखिर कुछ बैठकों में कोई खाना और पीना क्यों नहीं हुआ था और यह समस्या किसके कारण पैदा हुई थी। जब तक यह स्पष्ट न हो जाए, तब तक तुम्हें एक-एक करके सहभागिता करनी चाहिए। अगर ऐसे व्यक्ति को सख्ती से रोका नहीं गया, तो भाइयों और बहनों को समझ में नहीं आएगा, और यह फिर से होगा। तुम्हारी आध्यात्मिक आंखें बंद हैं; तुम में से कई व्यक्ति अंधे हैं! इसके अलावा, जो लोग देख सकते हैं, वे इस बारे में लापरवाह बने हुए हैं। वे खड़े होकर बोलते नहीं हैं और वे भी अंधे हैं। जो देखते हैं लेकिन बोलते नहीं हैं, वे मूक हैं। यहां कई लोग में विकलांग हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 380

कुछ लोगों को समझ नहीं आता कि सत्य क्या है, जीवन क्या है, मार्ग क्या है, और वे आत्मा को नहीं समझते। वे मेरे वचनों को एक सूत्र से अधिक कुछ नहीं मानते। यह बहुत कठोर है। वे समझते नहीं कि सच्ची कृतज्ञता और प्रशंसा क्या होती है। कुछ लोग महत्वपूर्ण और प्राथमिक बातों को समझने में असमर्थ रहते हैं; वे केवल गौण बातों को समझते हैं। परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा डालने का क्या मतलब है? कलीसिया की इमारत को ध्वस्त करने का क्या मतलब है? पवित्र आत्मा के काम को बाधित करने का क्या मतलब है? शैतान का अनुचर कौन है? इन सत्यों को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए, न कि इन्हें अस्पष्टता के साथ छिपाना चाहिए। इस बार कोई खाना और पीना नहीं हुआ, इसका क्या कारण है? कुछ लोग महसूस करते हैं कि उन्हें आज ज़ोर से परमेश्वर की स्तुति करनी चाहिए, लेकिन उन्हें उसकी प्रशंसा कैसे करनी चाहिए? क्या उन्हें भजन गाकर और नृत्य करके उसकी प्रशंसा करनी चाहिए? क्या अन्य तरीकों की गिनती प्रशंसा में नहीं होती? कुछ लोग इस धारणा के साथ बैठकों में आते हैं कि परमेश्वर की स्तुति करने का तरीका उल्लसित स्तुति है। लोगों की ये धारणाएं हैं, और वे पवित्र आत्मा के काम पर ध्यान नहीं देते हैं; अंतत: परिणाम यह होता है कि उसके बाद भी बाधाएं बनी रहती हैं। इस बैठक में कोई खाना और पीना नहीं था; तुम सभी कहते हो कि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और कलीसिया की गवाही की रक्षा करोगे, वास्तव में तुम में से कौन परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो : क्या तुम उसके बोझ के प्रति विचारशील रहे हो? क्या तुम परमेश्वर के लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम में शैतान के सभी दुष्कर्मों के विरूद्ध लड़ने का साहस है? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रखकर मेरे सत्य की खातिर शैतान का पर्दाफ़ाश कर सकोगे? क्या तुम मेरी इच्छा को स्वयं में पूरा होने दोगे? महत्वपूर्ण समय आने पर क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी इच्छा पूरी करता है? स्वयं से ये सवाल पूछो और अक्सर इनके बारे में सोचो। शैतान के उपहार तुम्हारे अंदर हैं और तुम इसके लिए दोषी हो क्योंकि तुम लोगों को नहीं समझते और तुम शैतान के विष को पहचानने में असफल हो; तुम स्वयं को मृत्यु की ओर ले जा रहे हो। शैतान ने तुम्हें इस हद तक धोखा दिया है कि तुम बुरी तरह से घबरा गए हो; तुम संकीर्णता की शराब के नशे में डूबे हुए हो, तुम दृढ़ दृष्टिकोण बनाए बिना डांवाडोल होते रहते हो, तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं है। तुम ठीक से खाते और पीते नहीं हो, तुम जंगलियों की तरह लड़ते और झगड़ते हो, तुम गलत और सही के बीच का अंतर नहीं जानते और जो भी तुम्हारी अगुवाई करता है तुम उसके पीछे चल पड़ते हो—क्या तुम में कोई सत्य है? कुछ लोग स्वयं की रक्षा करते हैं, यहां तक कि धोखाधड़ी में लिप्त रहते हैं, वे दूसरों के साथ सहभागिता करते हैं, लेकिन यह उन्हें बंद गली में ले जाता है। क्या ये लोग मुझसे अपने इरादे, लक्ष्य, प्रेरणा, और स्रोत प्राप्त करते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम भाइयों और बहनों के खाने और पीने के छिन जाने के लिए उनकी क्षतिपूर्ति कर सकते हो? कुछ लोगों को सहभागिता के लिए ढूंढो और उनसे पूछो; उन्हें स्वयं के लिए बोलने दो : क्या उन्हें कुछ भी प्रदान किया गया है? या उनका पेट गंदे पानी और कचरे से भर दिया गया है और अब उनके पास अनुसरण का कोई रास्ता नहीं है? क्या यह कलीसिया को ध्वस्त नहीं करेगा? भाइयों और बहनों के बीच प्यार कहां है? तुम चुपके से शोध करते हो कि कौन सही है और कौन गलत है, लेकिन तुम कलीसिया के लिए बोझ क्यों नहीं उठाते? आमतौर पर तुम मशहूर कहावतों को चिल्लाने बोलने का काम अच्छी तरह से करते हो, लेकिन जब चीज़ें वास्तव में होती हैं तो तुम उनके बारे में गोलमोल बातें करते हो। कुछ लोग समझते हैं लेकिन केवल चुपचाप फुसफुसाते हैं, जबकि अन्य लोग वह बोलते हैं जो उन्हें समझ आता है, लेकिन कोई और एक शब्द नहीं कहता है। वे नहीं जानते कि परमेश्वर से क्या आता है और शैतान का काम क्या है। जीवन के बारे में तुम लोगों की आंतरिक भावनाएं कहां हैं? तुम पवित्र आत्मा के काम को बिल्कुल नहीं समझ पाते हो और न ही तुम उसे पहचानते हो। तुम्हारे लिए नई चीज़ें स्वीकार करना मुश्किल है। तुम केवल धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष चीज़ें ही स्वीकार करते हो, जो लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती हैं। इसलिए, तुम बुरी तरह से लड़ते हो। पवित्र आत्मा के काम को कितने लोग समझ पाते हैं? कलीसिया के लिए वास्तव में कितने लोगों ने बोझ उठाया है? क्या तुम इसे समझते हो? भजन गायन परमेश्वर की प्रशंसा करने का एक तरीका है, लेकिन तुम परमेश्वर की स्तुति करने के सत्य को स्पष्टता से नहीं समझते और तुम उसकी प्रशंसा करने के तरीके में कठोर हो। क्या यह तुम्हारी अपनी धारणा नहीं है? तुम हमेशा अपने विचारों पर सख्ती से चिपके रहते हो और इस पर ध्यान नहीं देते कि पवित्र आत्मा आज क्या करेगा, यह महसूस नहीं कर पाते हो कि तुम्हारे भाई-बहन क्या महसूस कर रहे हैं, और शांत तरीके से परमेश्वर की इच्छा की खोज नहीं कर पाते हो। तुम आँखें मूंदकर काम करते हो; तुम गाने अच्छे गा सकते हो, लेकिन नतीजा पूरी तरह से अस्तव्यस्त रहता है। क्या यह सचमुच खाना और पीना है? क्या तुम देखते हो कि वास्तव में बाधा कौन उत्पन्न कर रहा है? तुम आत्मा में बिल्कुल नहीं रहते, बल्कि विभिन्न धारणाओं पर कायम रहते हो—आखिर कलीसिया के लिए बोझ उठाने का यह कैसा तरीका है? तुम्हें देखना चाहिए कि पवित्र आत्मा का काम अब और भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यदि तुम अपनी धारणाओं को कसकर पकड़े रहते हो और पवित्र आत्मा के काम का विरोध करते हो, तो क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या यह दीवारों से टकराती हुई और चारों ओर भिनभिनाती हुई मक्खी की तरह नहीं है? यदि तुम इसी तरह से चलते रहे, तो तुम्हें दरकिनार कर दिया जाएगा।

जिन्हें आपदा से पहले पूर्ण किया जाता है वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होते हैं। वे मसीह पर निर्भर होकर जीते हैं, वे मसीह की गवाही देते हैं, और वे उसकी जयकार करते हैं। वे मसीह के विजयी मर्द-बच्चे और अच्छे सैनिक होते हैं। इस समय यह महत्वपूर्ण है कि तुम स्वयं को शांत करो, परमेश्वर के पास आओ और उसके साथ सहभागिता करो। यदि तुम परमेश्वर के करीब नहीं आओगे, तो तुम पर शैतान द्वारा कब्ज़ा किए जाने का डर है। यदि तुम मेरे पास आकर मेरे साथ सहभागिता करते हो, तो सभी सत्य तुम्हारे सामने प्रकट किए जाएंगे, और तुम्हारे पास अपने जीवन और कार्यों को करने का एक मानक होगा। चूँकि तुम मेरे नज़दीक हो, मेरे वचन कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे, न ही तुम कभी जीवन में अपने वचनों से भटकोगे; शैतान के पास तुम्हारा फ़ायदा उठाने का कोई रास्ता नहीं होगा, बल्कि वह शर्मिंदा होगा और हारकर भाग जाएगा। यदि तुम बाहरी तौर पर देखकर यह जानना चाहो कि तुम्हारे अंदर क्या कमी है, तो कई बार तुम्हें कुछ मिल जाएगा, लेकिन इसमें से अधिकतर ऐसे नियम और ऐसी चीज़ें होंगी जिनकी तुम्हें आवश्यकता न हो। तुम्हें अपने आप को छोड़ना होगा, मेरे वचनों को अधिक खाना और पीना होगा और जानना होगा कि मेरे वचनों पर कैसे विचार किया जाए। अगर तुम्हें कुछ समझ में नहीं आए, तो मेरे करीब आओ और अक्सर मेरे साथ सहभागिता करो; इस तरह, तुम जो बातें समझोगे वे वास्तिवक और सत्य होंगी। तुम्हें मेरे करीब आना आरंभ करना होगा। यह महत्वपूर्ण है! अन्यथा, तुम्हें नहीं पता होगा कि कैसे खाना और पीना है। तुम अपने आप नहीं खा और पी सकते; तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 381

अब समय सही में महत्वपूर्ण है। पवित्र आत्मा हमें परमेश्वर के वचनों में ले जाने के लिए कई अलग-अलग तरीकों का उपयोग करता है। तुम्हें सभी सत्यों से लैस होना चाहिए, पवित्र होना चाहिए, मेरे साथ एक सच्ची निकटता और सहयोग रखना चाहिए; तुम्हारे पास चुनने के लिए कोई और विकल्प नहीं है। पवित्र आत्मा का कार्य भावना के बिना है और तुम किस प्रकार के व्यक्ति हो वह इसकी परवाह नहीं करता है। जब तक तुम खोज और अनुसरण करने के लिए तैयार हो—बहाने नहीं बनाते हो, अपने फ़ायदे और नुकसान पर बहस नही करते हो, बल्कि धार्मिकता के लिए भूख और प्यास के साथ खोज करते हो, तो मैं तुम्हें प्रबुद्ध करूंगा। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम कितने मूर्ख और अज्ञानी हो, मुझे ऐसी चीज़ें नहीं दिखाई देती हैं। मैं यह देखता हूं कि सकारात्मक पहलू पर तुम कितनी मेहनत करते हो। यदि तुम फिर भी स्वयं की अवधारणा को ज़ोर-से पकड़कर रखते हो, अपनी छोटी-सी दुनिया में गोल-गोल घूमते हो, तो मुझे लगता है कि तुम ख़तरे में हो...। उत्साह क्या है? त्याग दिए जाने का क्या मतलब है? आज तुम्हें परमेश्वर के सामने कैसे जीना चाहिए? तुम्हें मेरे साथ सक्रियता से सहयोग कैसे करना चाहिए? अपनी अवधारणाओं से छुटकारा पाओ, स्वयं का अवलोकन करो, अपना मुखौटा हटाओ, अपने सच्चे रंगों को स्पष्टता से देखो, अपने आप से घृणा करो, एक ऐसा दिल रखो जो धार्मिकता की खोज भूख और प्यास के साथ करता हो, मानो कि तुम वास्तव में कुछ भी नहीं हो, स्वंय को छोड़ने के लिए तैयार रहो, चीज़ों को करने के अपने सभी तरीकों को रोकने में सक्षम बनो, मेरे सामने अपने आप को शांत करो, अधिक प्रार्थनाएं करो, ईमानदारी से मुझ पर निर्भर रहो, मेरी ओर देखो, और मेरे करीब आने और मेरे साथ साहचर्य करना बंद न करो—यह मुख्य बात है। लोग अक्सर अपने में मग्न हो जाते हैं और परमेश्वर के सामने नहीं रहते हैं।

लोगों के लिए पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की कल्पना करना वास्तव में कठिन है और सब वास्तविकता में प्रवेश करता है; तुम विचारहीन नहीं हो सकते हो। यदि तुम्हारा दिल और मस्तिष्क सही नहीं है, तो तुम्हारे पास बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा। शुरुआत से लेकर अंत तक, तुम्हें हर समय चौकन्ना रहना होगा और लापरवाही से स्वयं को बचा कर रखना होगा। धन्य हैं वे लोग जो लगातार चौकन्ने रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं और मेरे सामने शांत रहते हैं! धन्य हैं वे लोग जो लगातार दिल से मेरी ओर देखते हैं, जो मेरी आवाज़ को निकटता से सुनने पर ध्यान देते हैं, जो मेरे कार्यों पर ध्यान देते हैं और मेरे वचनों को अभ्यास में लाते हैं! सही में कोई देरी नहीं की जा सकती है। सभी प्रकार की विपत्तियां तेज़ी से फैलेंगी, और एक बाढ़ की तरह तुम लोगों को निगलने के लिए अपना क्रूर, खूनी मुंह खोलेंगी। मेरे बेटों! समय आ गया है! अब सोचने के लिए समय नहीं बचा है। एकमात्र तरीका जो तुम लोगों को मेरी सुरक्षा में लाएगा, वह है मेरे सामने वापस आना। तुम्हारे पास मर्द के बच्चे के चरित्र की शक्ति होनी चाहिए, कमज़ोर या निराश न हो; तुम्हें मेरे कदमों के साथ चलना होगा, नई रोशनी से अस्वीकार न करो और जब तुम लोगों को बताया जाए कि कैसे खाना-पीना है, तो तुम्हें सही तरीके से आज्ञा माननी चाहिए और खाना-पीना चाहिए। क्या अभी भी मनमाने ढंग से एक दूसरे के साथ लड़ने या संघर्ष करने के लिए समय है? यदि तुम भरपेट नहीं खाओगे और सत्य से पूरी तरह तैयार नहीं रहोगे, तो क्या तुम युद्ध कर सकते हो? यदि तुम धर्म पर जीत चाहते हो, तो तुम्हें सत्य के साथ पूरी तरह तैयार होना होगा। मेरे वचनों को अधिक खाओ और पिओ और मेरे वचनों पर अधिक विचार करो। तुम्हें मेरे वचनों को स्वतंत्र रूप से खाना और पीना चाहिए और परमेश्वर के करीब आने से आरंभ करना चाहिए। इसे अपने लिए चेतावनी मानो! तुम्हें ध्यान से सुनना चाहिए! जो लोग होशियार हैं वे जल्दी से सच को पहचान जाएंगे! उन सभी चीज़ों को त्याग दो जिन्हें तुम छोड़ने के इच्छुक नहीं हो। मैं तुम्हें एक बार फिर बताता हूं कि ये चीज़ें वास्तव में तुम्हारे जीवन के लिए हानिकारक हैं और इनका कोई लाभ नहीं है! मुझे उम्मीद है कि तुम अपने कार्यों में मुझ पर भरोसा कर पाओगे, अन्यथा आगे का एकमात्र रास्ता मृत्यु का मार्ग होगा, और फिर जीवन के मार्ग की खोज करने के लिए तुम कहां जाओगे? अपने उस दिल को पीछे खींच लो जो बाहरी चीज़ों के साथ व्यस्त रहना पसंद करता है! अपने उस दिल को पीछे खींच लो जो अन्य लोगों की अवज्ञा करता है! यदि तुम्हारा जीवन समझदार नहीं बन सकता और तुम्हें त्याग दिया जाता है, तो क्या तुम्हारे फिसलने का कारण तुम नहीं होगे? पवित्र आत्मा का काम अब वैसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो। यदि तुम अपनी धारणाओं को छोड़ नहीं पाते हो, तो तुम्हें बड़ी हानि सहन करनी होगी। यदि कार्य मनुष्यों की अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए हो, तो क्या तुम्हारी पुरानी प्रकृति और अवधारणाएं प्रकाश में आएंगी? क्या तुम अपने आप को जान सकोगे? हो सकता है कि तुम्हें अभी भी लगता हो कि तुम्हारी कोई अवधारणाएं नहीं हैं, लेकिन इस बार तुम्हारे सभी बदसूरत पहलू स्पष्टता से प्रकाश में आएंगे। सावधानी से अपने आप से पूछो:

क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी आज्ञा का पालन करता है?

क्या तुम अपने आप को छोड़कर मेरे पीछे चलने के लिए इच्छुक और तैयार हो?

क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो साफ़ दिल से मेरा चेहरा खोजता है?

क्या तुम जानते हो कि मेरे साथ कैसे आना है और मेरे साथ कैसे साहचर्य करना है?

क्या तुम मेरे सामने अपने आप को शांत कर सकते हो और मेरी इच्छा तलाश सकते हो?

क्या तुम उन वचनों को अभ्यास में लाते हो जिन्हें मैं तुम्हारे सामने प्रकट करता हूं?

क्या तुम मेरे सामने एक सामान्य स्थिति बनाए रख सकते हो?

क्या तुम शैतान की चालाक योजनाओं को देख पाते हो? क्या तुम उन्हें बेनकाब करने की हिम्मत रखते हो?

तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति कैसे विचारशील हो?

क्या तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो?

तुम पवित्र आत्मा के काम को कैसे समझते हो?

तुम परमेश्वर के परिवार में समन्वय के साथ कैसे सेवा करते हो?

तुम मेरे लिए एक मजबूत गवाही कैसे देते हो?

सत्य के लिए अच्छी लड़ाई तुम कैसे लड़ते हो?

इन सत्यों पर अच्छी तरह से विचार करने के लिए तुम्हें समय लेना होगा। तथ्य यह बात साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि दिन बहुत करीब है। आपदाओं से पहले तुम्हें पूर्ण किया जाना होगा—यह बहुत महत्वपूर्ण बात है जिसे तत्काल हल किया जाना चाहिए! मैं तुम लोगों को पूरा करने की इच्छा रखता हूं, लेकिन मुझे लगता है कि तुम लोग वास्तव में कुछ हद तक बेलगाम हो। तुम में क्षमता है लेकिन तुम इसका सर्वोत्तम उपयोग नहीं करते हो और तुमने सबसे महत्वपूर्ण बातों को नहीं समझा है, बल्कि तुमने केवल मामूली बातों को समझा है। इन बातों पर विचार-विमर्श करने का क्या उपयोग है? क्या यह समय की बर्बादी नहीं है? मैं तुम लोगों पर इस तरह से दयालुता दिखाता हूं लेकिन तुम लोग कोई भी प्रशंसा दिखाने में असफल हो और तुम केवल आपस में लड़ते हो, तो क्या मेरे सभी मेहनती प्रयास बेकार नहीं गए हैं? यदि तुम इस तरह से चलते रहोगे, तो मैं तुम लोगों को मनाने में व्यर्थ में समय नहीं लगाऊंगा! मैं तुम लोगों से कहूंगा कि जब तक तुम लोग सत्य को नहीं समझते हो, तब तक पवित्र आत्मा का कार्य तुमसे खींच लिया जाएगा! तुम लोगों को खाने के लिए अधिक नहीं दिया जाएगा, और तुम लोगों को जो ठीक लगे उस पर विश्वास कर सकते हो। मेरे वचनों को विस्तार से बोला गया है; सुनो या न सुनो, यह तुम लोगों पर निर्भर है। जब ऐसा समय आएगा जब तुम लोग उलझन में रहोगे और तुम लोगों के पास आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं दिखेगा और सच्चे प्रकाश को नहीं देख पाओगे, तो क्या तुम लोग मुझे दोष दोगे? ऐसी अज्ञानता! यदि तुम अपने आप से कसकर चिपके रहोगे और छोड़ने से इनकार कर दोगे, तो परिणाम क्या होना चाहिए? क्या तुम्हारा काम निरर्थक अभ्यास नहीं होगा? आपदाओं के आने पर अलग कर दिया जाना कितना दयनीय है!

अब कलीसिया के निर्माण का महत्वपूर्ण चरण है। यदि तुम मेरे साथ सक्रियता से सहयोग करने में और मेरे सामने तहेदिल से समर्पण करने में असमर्थ रहोगे, यदि तुम सब कुछ त्याग नहीं कर सकोगे, तो तुम्हें हानि का सामना करना होगा; क्या फिर भी तुम्हारे दूसरे इरादे होंगे? मैंने इस प्रकार से तुम लोगों पर उदारता दिखाई है, प्रतीक्षा करते हुए कि तुम लोग पश्चाताप करोगे और फिर से आरंभ करोगे। लेकिन वास्तव में, समय अब इसकी अनुमति नहीं देता है और मुझे अब समग्र स्थिति पर विचार करना होगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना के उद्देश्य के लिए, सब कुछ आगे बढ़ रहा है और मेरे कदम हर दिन, हर घंटे, हर पल आगे बढ़ रहे हैं, और जो लोग मेरे साथ नहीं रह पाएंगे, उन्हें त्याग दिया जाएगा। हर दिन नई रोशनी होती है, हर दिन नए कर्म किए जाते हैं, हर दिन नई चीज़ें होती हैं और जो लोग प्रकाश नहीं देख पा रहे हैं वे अंधे हैं! जो लोग अनुसरण नहीं करेंगे, उन्हें हटा दिया जाएगा...।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 14' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 382

कलीसिया निर्माणाधीन है और शैतान इसे ध्वस्त करने की पूरी कोशिश कर रहा है। यह मेरे निर्माण को किसी भी तरह से नष्ट कर देना चाहता है; इसलिए कलीसिया को तुरंत शुद्ध किया जाना चाहिए। बुराई का ज़रा-सा भी तलछट शेष नहीं रहना चाहिए; कलीसिया को इस ढंग से शुद्ध किया जाना चाहिए ताकि यह निष्कलंक और उतनी ही शुद्ध हो जाए जितनी यह पहले थी। तुम लोगों को जागते रहना चाहिए और हर पल प्रतीक्षा करनी चाहिए, और तुम लोगों को मेरे सामने अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें शैतान की विभिन्न साजिशों और चालाक योजनाओं को पहचानना चाहिए, आत्मा को जानना चाहिए, लोगों को जानना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों, मामलों और चीजों को समझने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हें मेरे वचनों को और अधिक खाना और पीना चाहिए, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें उन्हें अपने आप खाने और पीने में सक्षम होना चाहिए। तुम अपने आप को पूरे सत्य से युक्त करके, मेरे सामने आओ, ताकि मैं तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोल सकूँ और तुम्हें आत्मा के भीतर निहित सभी रहस्यों को देखने का मौका दे सकूँ...। जब कलीसिया अपने निर्माण के चरण में आती है, तो संत युद्ध के लिए कूच करते हैं। शैतान के विभिन्न वीभत्स लक्षण तुम सभी के सामने रखे जाते हैं : क्या तुम रुकते और पीछे हट जाते हो, या तुम मुझ में भरोसा रखकर खड़े हो जाते हो और आगे बढ़ते हो? शैतान के भ्रष्ट और घिनौने लक्षणों को पूरी तरह से उजागर कर दो, कोई भावुकता न रखो और कोई दया मत दिखाओ! मौत तक शैतान से लड़ते रहो! मैं तुम्हारे पीछे हूँ और तुममें एक मर्द बच्चे की भावना होनी चाहिए! शैतान अपनी मौत की पीड़ा में अंतिम प्रहार कर रहा है, लेकिन फिर भी वह मेरे न्याय से बच निकलने में असमर्थ ही रहेगा। शैतान मेरे पैरों तले है और उसे तुम लोगों के पैरों तले भी कुचला जा रहा है—यह सच है!

सभी धार्मिक बाधकों और कलीसिया की इमारत को ध्वस्त करने वालों के प्रति ज़रा-सी भी सहनशीलता नहीं दिखायी जानी चाहिए, बल्कि मैं तुरंत उनका न्याय करूंगा; शैतान का पर्दाफ़ाश किया जाएगा, उसे पैरों तले कुचला जाएगा, उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाएगा और उसके छिपने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जाएगी। सभी तरह के हैवान और भूत निश्चित रूप से मेरे सामने अपना असली रूप प्रकट कर देंगे और मैं उन सभी को अथाह कुंड में डाल दूंगा जिससे वे कभी मुक्त नहीं होंगे; वे सब हमारे पैरों तले होंगे। यदि तुम सच्चाई की खातिर एक अच्छी लड़ाई लड़ना चाहते हो, तो सबसे पहले, शैतान को काम करने का कोई मौका मत दो, और ऐसा करने के लिए तुम्हें एकमत होना पड़ेगा और मिलजुल कर सेवा करनी होगी, अपनी सभी धारणाओं, विचारों, मतों और काम करने के तरीकों को छोड़ना होगा, मेरे भीतर अपने दिल को शांत करना होगा, पवित्र आत्मा की आवाज़ पर ध्यान देना होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति चौकस रहना होगा और परमेश्वर के वचनों का विस्तार से अनुभव करना होगा। तुम्हारी बस एक ही मंशा होनी चाहिए, और वह ये कि मेरी इच्छा पूरी हो। इसके अलावा तुम्हारी और कोई मंशा नहीं होनी चाहिए। तुम्हें पूरे दिल से मेरी ओर देखना चाहिए, मेरे सारे कामों को बारीकी से देखना चाहिए। तुम्हारी आत्मा प्रखर हो और तुम्हारी आँखें खुली हों। आम तौर पर, जिनके इरादे और उद्देश्य सही नहीं होते, और जो दूसरों के द्वारा देखे जाना पसंद करते, जो चीज़ों को करने के लिए उतावले होते हैं, जो बाधा डालने में उद्यत होते हैं, जो धार्मिक सिद्धांतों की झड़ी लगा देते हैं, जो शैतान के अनुचर होते हैं, आदि, ऐसे लोग जब खड़े हो जाते हैं तो वे कलीसिया के लिए कठिनाइयाँ बन जाते हैं, और भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने को व्यर्थ कर देते हैं; अगर तुम इस तरह के लोगों को ढोंग करते हुए पाओ, तो तुरंत उन पर प्रतिबंध लगा दो। यदि वे बार-बार फटकारे जाने पर भी न बदलें, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। यदि वे लोग अपने तौर-तरीक़ों में जिद्दी बनकर अपना बचाव करने लगें और अपने पापों को ढँकने की कोशिश करें, तो कलीसिया को उन्हें तुरंत बहिष्कृत कर देना चाहिए और उनकी चालबाज़ी के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। थोड़ा-सा बचाने की कोशिश में बहुत कुछ न खो देना, और अपनी निगाह मुख्य बातों पर बनाये रखना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 383

ज्यों-ज्यों पवित्र आत्मा का कार्य आगे बढ़ रहा है, परमेश्वर ने एक बार फिर हमें पवित्र आत्मा के कार्य की एक नई पद्धति में प्रवेश कराया है। परिणामस्वरूप, यह अपरिहार्य है कि कुछ लोगों ने मुझे गलत समझा और मुझसे शिकायतें की है। कुछ लोगों ने मेरा प्रतिरोध और मेरा सामना किया है, और मेरी जाँच-पड़ताल की है। हालांकि, मैं अभी भी अनुग्रहपूर्वक तुम लोगों के पश्चाताप करने और सुधरने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। पवित्र आत्मा के कार्य की पद्धति में परिवर्तन का होना परमेश्वर का खुले तौर पर प्रकट होना है। मेरा वचन अपरिवर्तित रहेगा! चूँकि यह तुम हो जिसे मैं बचा रहा हूँ, मैं तुम्‍हें बीच राह पर नहीं छोड़ दूँगा। पर तुम लोगों के अंदर संदेह हैं और तुम लोग खाली हाथ वापस जाना चाहते हो। तुम लोगों में से कुछ आगे बढ़ने से रुक गए हैं जबकि अन्य लोग देख रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ अन्य लोग स्थिति का निष्क्रियता से पालन कर रहे हैं, जबकि कुछ तो बस नकल उतार रहे हैं। तुम लोगों ने सचमुच अपने दिलों को कठोर कर लिया है! मैंने तुम लोगों से जो कुछ कहा, तुमने उसे लेकर अपने अहंकार और घमण्ड में बदल दिया है। इस बारे में और सोचो—यह और कुछ नहीं, बल्कि दया और न्याय के वचनों का तुम सभी पर आ पहुँचना है। पवित्र आत्मा यह देखकर कि तुम लोग वाकई विद्रोही हो, सीधे तौर पर बोलता और विश्लेषण करता है। तुम लोगों को भय होना चाहिए। लापरवाही से या बिना सोचे-विचारे कुछ भी काम न करो। तुम लोग निष्‍प्रभावी, अभिमानी या दुराग्रही न बनो! मेरे वचन पर अमल करने के लिए तुम्‍हें और अधिक ध्यान देना चाहिए, और जहाँ भी तुम जाओ, तुम्हें हर जगह मेरे वचन को जीना चाहिए, ताकि वे वास्तव में तुम्‍हें अंदर से बदल सके तुम मेरा स्वभाव पा सको। ये सच्चे परिणाम हैं।

कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम में एक विशेष उच्‍चता होनी चाहिए, और तुम्‍हें अपने पूरे हृदय से निरंतर खोजना चाहिए, साथ ही तुम्हें पवित्र आत्मा का ताप और शुद्धिकरण प्राप्त करना होगा और एक रूपांतरित व्यक्ति बनना होगा। ऐसी परिस्थितियों में ही कलीसिया का निर्माण किया जा सकता है। पवित्र आत्मा के कार्य ने अब कलीसिया के निर्माण का प्रारंभ करने के लिए तुम लोगों का नेतृत्व किया है। यदि तुम लोग मतिभ्रंश और ढीले-ढाले तरीके से व्यवहार करते रहे, जैसा कि पहले करते थे, तो तुम लोगों से कोई आशा नहीं की जा सकती। तुम्‍हें सभी सच्चाइयों से लैस होना होगा और आध्यात्मिक विवेक रखना होगा, और मेरी बुद्धिमत्‍ता के अनुसार तुम्‍हें उचित मार्ग पर चलना होगा। कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम्‍हें आत्मा के जीवन में जीना होगा और केवल बाहर से दिखावटी तौर पर नक़ल करने से बचना होगा। तुम्‍हारे जीवन में विकास की प्रक्रिया वही प्रक्रिया है जिससे तुम बने होते हो। हालांकि, ध्यान रखो कि जो लोग आध्यात्मिक उपहारों पर निर्भर हैं या जो आध्यात्मिक बातों को समझने में अक्षम हैं या जिनमें व्यावहारिकता की कमी है, और वे लोग भी जो हर समय मेरे साथ संपर्क बनाए रखने में और मेरे पास आने में असमर्थ होते हैं, वे कभी निर्मित नहीं हो सकते हैं। जो लोग अपने मन को अवधारणाओं में तल्लीन रखते हैं या मान्यताओं में जीते हैं, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता, और न ही उन्‍हें जो अपने आवेशों से निर्देशित होते हैं। चाहे परमेश्वर तुम्‍हारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, तुम्‍हें उनके समक्ष पूरी तरह से समर्पण करना होगा। अन्यथा, तुम्‍हारा निर्माण नहीं किया जा सकता। जो लोग अपनी आत्म-महत्ता, आत्म-तुष्टि, अपने अभिमान और संतोष में लीन रहते हैं और जो एहसान जताते या दिखावा करते हैं, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता है। जो लोग दूसरों के साथ ताल-मेल में रह कर सेवा नहीं कर सकते, उनका निर्माण नहीं किया जा सकता। जिनके पास कोई आध्यात्मिक विवेक नहीं है, और जो किसी भी अगुआ का आँखें मूँद कर अनुसरण करते हैं, उन्हें भी नहीं बनाया जा सकता है, और जो लोग मेरे इरादों को समझने में नाकाम रहते हैं और पुरानी परिस्थितियों में जी रहे हैं, उनका भी निर्माण नहीं किया जा सकता। जो लोग नई रोशनी का पालन करने में बहुत धीमे हैं और जिनके पास आधार के रूप में कोई जीवनदृष्टि नहीं है, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता है।

कलीसिया को और किसी विलम्‍ब के बिना बनाया जाना चाहिए, और इसके लिए मैं अति-चिंतित हूँ। तुम्हें सकारात्मक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करके शुरू करना चाहिए, और अपनी सारी शक्ति के साथ खुद को प्रस्तुत करके, निर्माण कि धारा में स्‍वयं को शामिल करना चाहिए। अन्यथा, तुम्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। जो कुछ भी छोड़ देने के योग्‍य है, तुम्‍हें उसका पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए, और जो आत्‍मसात करने योग्‍य है मात्र उसे ही ग्रहण करना चाहिए। तुम्‍हें मेरे वचन की वास्तविकता को जीना चाहिए, और तुम्‍हें सतही और असंगत मामलों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। अपने आप से पूछो, तुमने मेरे वचन में से कितना ग्रहण किया है? तुम मेरे वचन से कितना जीते हो? तुम्‍हें अपने मन में स्पष्ट रहना चाहिए और जल्दबाजी में कुछ भी करने से बचना चाहिए। अन्यथा, यह केवल नुकसान पहुँचाएगा, और तुम्‍हें जीवन में आत्म-विकास करने में मदद नहीं करेगा। तुम्‍हें सत्य को समझना चाहिए, इस पर अमल करना जानना चाहिए, और मेरे वचन को सही मायने में तुम्‍हारा जीवन बनने देना चाहिए। यही इस मामले का मूल है!

चूँकि कलीसिया का निर्माण अब एक महत्वपूर्ण क्षण पर पहुँच गया है, शैतान योजना बना रहा है और इसे ध्वस्त करने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है। तुम लोगों को लापरवाह नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने उत्साह में सावधान और विवेकशील रहना चाहिए। ऐसे विवेक के बिना, तुम लोगों को बड़ा नुकसान होगा। यह कोई तुच्छ बात नहीं है। तुम लोग इसे महत्व की बात मानो। शैतान झूठे दिखावे और नकली चीज़ों को पेश करने में सक्षम है जिनकी सामग्री की गुणवत्ता बहुत भिन्न होती है। लोग इतनी मूर्खता और लापरवाही से व्यवहार करते हैं, और उनमें विवेक की कमी है, जिसका अर्थ है कि तुम लोग हर समय समझदार और शांत नहीं रह सकते हो। तुम लोगों के दिल जाने कहाँ होते हैं। सेवा एक सम्मान और एक नुकसान भी है। यह तुम्‍हें या तो आशीष तक या दुर्भाग्य तक ले जा सकती है। मेरी उपस्थिति में मौन रहो और मेरे वचन के अनुसार जीते रहो, जिससे तुम वास्तव में जागरूक रहोगे और अपने उत्साह में विवेकशील बने रहोगे। जब भी शैतान आएगा, तुम तुरंत उसके सामने अपनी रक्षा करने में सक्षम रहोगे, और उसके आने का पूर्वाभास भी कर लोगे; तुम अपनी आत्‍मा में वाकई बेचैनी महसूस करोगे। शैतान का वर्तमान काम प्रचलित रुझानों के बदलाव के अनुसार बदलता रहता है। जब लोग मतिभ्रंश ढंग से व्यवहार करते हैं और असावधानी बरतते हैं, तो वे बंधन में रहते हैं। तुम्हें हर समय सतर्क रहना होगा और अपनी आँखें खुली रखनी होंगी। अपने स्वयं के लाभ और हानि पर विवाद न करो, या अपने स्वयं के लाभ की ही गणना न करो। बल्कि, मेरी इच्छा पूरी हो इसकी माँग करो।

वस्तुएँ समान दिख सकती हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता भिन्न हो सकती है। इस कारण, तुम्‍हें व्यक्तियों और आत्माओं को भी पहचानना होगा। तुम्‍हें विवेक का अभ्यास करना चाहिए और आध्यात्मिक रूप से स्पष्ट बने रहना चाहिए। जब शैतान का विष प्रकट होगा, तो तुम्हें इसे फ़ौरन पहचानने में समर्थ होना चाहिए। वह परमेश्वर के न्याय की रोशनी से बच नहीं सकता है। आत्‍मा में रहते हुए, तुम लोगों को अपनी आत्मा में पवित्र आत्मा की वाणी गौर से सुनने के प्रति ध्यान देना चाहिए; दूसरों का अंधा अनुकरण न करो या असत्‍य को सत्‍य मान लेने की भूल न करो। कोई भी नेतृत्व करे, उसका यूँ ही पालन न करने लगो, ऐसा न हो कि तुम्‍हें बहुत नुकसान हो जाए। उससे तुमको कैसा महसूस हो रहा है? क्या तुम लोगों ने परिणामों को महसूस किया है? तुम्‍हें बिना सोचे समझे सेवा में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या उसमें अपनी राय नहीं देनी चाहिए, नहीं तो मैं तुम्‍हें गिरा दूँगा। इससे भी बदतर, यदि तुम आज्ञा मानने से इंकार करते हो और अपनी ही बात कहते और मनमानी करते हो, तो मैं तुमको हटा दूँगा! कलीसिया को और अधिक लोगों को बटोरने की ज़रूरत नहीं है; इसे उन लोगों की आवश्यकता है जो परमेश्वर से सच्‍चाई से प्रेम करते हों और वास्तव में मेरे वचन के अनुसार जीते हों। तुम्‍हें अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में पता होना चाहिए। अगर गरीब लोग खुद को धनी समझें तो क्या यह खुद को धोखा देना नहीं है? कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम्‍हें आत्मा का अनुपालन करना चाहिए। आँखें बंद करके कार्य न करो, लेकिन अपने स्थान पर टिके रहो और अपना स्वयं का कार्य पूरा करो। तुम्‍हें अपनी भूमिकाओं से बाहर कदम नहीं उठाना चाहिए, लेकिन अपनी पूरी ताक़त के साथ तुम जो कुछ भी कर सकते हो, उसे पूरा करना चाहिए, और तब मेरा हृदय संतुष्ट होगा। ऐसा नहीं है कि तुम सभी एक ही कार्य में सेवा का योगदान करोगे। बल्कि, तुममें से प्रत्येक को अपनी भूमिका निभानी चाहिए और कलीसिया में अन्य लोगों के साथ मिल कर अपनी-अपनी सेवा को समर्पित करना चाहिए। तुम लोगों की सेवा इधर या उधर भटकनी नहीं चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 19' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 384

पवित्र आत्मा का कार्य अब तुम लोगों को एक नए स्वर्ग और नई पृथ्वी पर ले आया है। सब-कुछ नया किया जा रहा है, सब-कुछ मेरे हाथों में है, सब-कुछ नए सिरे से शुरू हो रहा है! अपनी धारणाओं के कारण लोग इसे समझ पाने में असमर्थ हैं, और उन्हें यह निरर्थक लगता है, लेकिन यह मैं हूँ, जो कार्य कर रहा है, और इसमें मेरी बुद्धिमत्ता निहित है। इसलिए तुम लोगों को केवल अपनी सभी धारणाएँ और विचार छोड़ने, और समर्पण में परमेश्वर के वचन खाने और पीने में दिलचस्पी रखनी चाहिए; किसी तरह का संदेह नहीं रखना चाहिए। चूँकि मैं इस तरह से काम कर रहा हूँ, इसलिए मैं एक पवित्र दायित्व उठाऊँगा। वास्तव में, लोगों को एक विशेष तरीके का होने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, यह परमेश्वर है जो अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करते हुए चमत्कारी चीज़ें कर रहा है। लोग तब तक शेखी नहीं बघार सकते, जब तक वे परमेश्वर के बारे में शेखी नहीं बघारते। अन्यथा तुम नुकसान उठाओगे। परमेश्वर ज़रूरतमंदों को धूल से उठाता है; विनम्र को उच्च बनाया जाना चाहिए। मैं विश्वव्यापी कलीसिया को नियंत्रित करने के लिए, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों को नियंत्रित करने के लिए अपनी बुद्धिमत्ता का उसके सभी रूपों में उपयोग करूँगा, ताकि वे सभी मेरे भीतर हों, और ताकि कलीसिया में उपस्थित तुम सब मेरे सामने समर्पित हो सको। जो लोग पहले आज्ञा नहीं मानते थे, उन्हें अब मेरे सामने आज्ञाकारी होना चाहिए, एक-दूसरे के लिए समर्पित होना चाहिए, एक-दूसरे को सहन करना चाहिए; तुम्हारे जीवन आपस में जुड़े होने चाहिए, और तुम्हें एक-दूसरे से प्यार करना चाहिए, सभी को अपनी कमियों की पूर्ति करने के लिए दूसरों की शक्तियों का उपयोग करना चाहिए, समन्वय के साथ सेवा करनी चाहिए। इस तरह से कलीसिया का निर्माण होगा, और शैतान को शोषण करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। केवल तब मेरी प्रबंधन योजना विफल नहीं होगी। यहाँ मैं तुम लोगों को एक और अनुस्मारक दे दूँ। अपने भीतर इस कारण से गलतफ़हमियाँ उत्पन्न न होने देना, कि ऐसे-ऐसे व्यक्ति का एक खास तरीका है, या वह ऐसे-ऐसे तरीके से कार्य करता है, जिसका परिणाम यह होता है कि तुम अपनी आत्मिक स्थिति में पतित हो जाते हो। जैसा कि मैं देखता हूँ, यह उचित नहीं है, और यह एक बेकार बात है। क्या जिस पर तुम विश्वास करते हो, वह परमेश्वर नहीं है? यह कोई व्यक्ति नहीं है। कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। प्रत्येक अपना कर्तव्य करता है, प्रत्येक अपनी जगह पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक है—और जीवन में परिपक्वता की तलाश करता है। इस प्रकार मैं संतुष्ट हूँगा।

तुम लोगों को केवल मेरे सामने शांतिपूर्ण रहने के बारे में चिंता करनी चाहिए। मेरे साथ घनिष्ठ समागम में रहो, जहाँ तुम्हें समझ न आए वहाँ अधिक जिज्ञासा करो, प्रार्थनाएँ करो, और मेरे समय की प्रतीक्षा करो। सब-कुछ आत्मा से स्पष्ट रूप से देखो। लापरवाही से कार्य न करो, ताकि खुद को भटकने से बचा सको। तुम्हारा मेरे वचनों को खाना और पीना केवल इसी तरह से फलीभूत होगा। मेरे वचनों को अकसर खाओ और पिओ, मैंने जो कहा है उस पर विचार करो, मेरे वचनों के अभ्यास पर ध्यान दो, और मेरे वचनों की वास्तविकता जिओ; यह मुख्य मुद्दा है। कलीसिया के निर्माण की प्रक्रिया जीवन के विकास की प्रक्रिया भी है। यदि तुम्हारे जीवन का विकास रुक जाता है, तो तुम्हारा निर्माण नहीं किया जा सकता। स्वाभाविकता पर, देह पर, उत्साह पर, योगदान पर, योग्यता पर निर्भरता फ़िज़ूल है; तुम कितने भी अच्छे क्यों न हो, अगर तुम इन चीज़ों पर निर्भर रहोगे, तो तुम्हारा निर्माण नहीं किया जाएगा। तुम्हें जीवन के वचनों में जीना चाहिए, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी में जीना चाहिए, अपनी वास्तविक स्थिति जाननी चाहिए, और एक परिवर्तित व्यक्ति बनना चाहिए। तुम्हारी आत्मा में समान अंतर्दृष्टि होनी चाहिए, नई प्रबुद्धता होनी चाहिए, और तुम्हें नई रोशनी के साथ बढ़ते रहने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हें लगातार मेरे करीब आने और मेरे साथ संवाद करने में सक्षम होना चाहिए, दैनिक जीवन के अपने कार्यों को मेरे वचनों पर आधारित करने में सक्षम होना चाहिए, सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीज़ों को मेरे वचनों के आधार पर सही तरह से सँभालने में सक्षम होना चाहिए, और मेरे वचनों को अपना मानक समझना चाहिए और अपने जीवन की सभी गतिविधियों में मेरे स्वभाव को जीना चाहिए।

यदि तुम मेरी इच्छा की थाह पाना और उसका ख्याल रखना चाहते हो, तो तुम्हें मेरे वचनों पर ध्यान देना चाहिए। उतावलेपन से काम मत करो। वह सब जो मुझे स्वीकार नहीं है, उसका बुरा अंत होगा। आशीष केवल उसमें आते हैं, जिसकी मैंने सराहना की है। अगर मैं कहता हूँ, तो वह होगा। अगर मैं आज्ञा देता हूँ, तो वह अटल रहेगा। मुझे क्रोधित करने से बचने के लिए, तुम लोगों को वह बिलकुल नहीं करना चाहिए, जिसकी मैंने अनुमति नहीं दी है। अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम्हें पछताने का भी समय नहीं मिलेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 21' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 385

कलीसिया के निर्माण का समय शैतान के उन्माद की उच्चतम स्थिति पर पहुँचने का समय भी होता है। कुछ लोगों के माध्यम से शैतान अकसर परेशानियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करता है और जो लोग आत्मा को नहीं जानते या जो नए विश्वासी होते हैं, वे ही शैतान की भूमिका को आसानी से निभा सकते हैं। अकसर चूँकि लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं समझते, इसलिए वे मनमाने ढंग से, पूरी तरह से अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार, काम करने के अपने तरीकों से और अपनी धारणाओं के मुताबिक कार्य करते हैं। अपनी ज़बान सँभालो—यह तुम्हारी अपनी सुरक्षा के लिए है। सुनो और अच्छी तरह से पालन करो। कलीसिया समाज से अलग है। तुम्हारे मन में जो भी आए, या जो भी तुम चाहो, वह तुम नहीं कह सकते। यह यहाँ नहीं चलेगा, क्योंकि यह परमेश्वर का घर है। परमेश्वर लोगों के काम करने के तरीक़े को स्वीकार नहीं करता। तुम्हें आत्मा का अनुसरण करते हुए काम करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीना चाहिए, फिर दूसरे लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। पहले तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा करके सभी कठिनाइयों को अपने भीतर हल करना होगा। अपने पतित स्वभाव को खत्म करो और अपनी स्थिति को वास्तव में समझने में सक्षम बनो और यह जानो कि तुम्हें कैसे काम करना चाहिए; जो कुछ भी तुम्हें समझ में न आए, उस पर सहभागिता करते रहो। व्यक्ति का खुद को न जानना अस्वीकार्य है। पहले अपनी बीमारी ठीक करो, और मेरे वचनों को खाने और पीने और उन पर चिंतन के द्वारा, अपना जीवन मेरे वचनों के अनुसार जीओ और अपने कर्म उनके अनुसार करो; चाहे तुम घर पर हो या किसी अन्य जगह पर, तुम्हें परमेश्वर को अपने भीतर शक्ति बरतने की अनुमति देनी चाहिए। शरीर और स्वाभाविकता को त्याग दो। अपने भीतर हमेशा परमेश्वर के वचनों का प्रभुत्व बना रहने दो। यह चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं कि तुम्हारा जीवन बदल नहीं रहा; समय के साथ, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे स्वभाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। पहले तुम चर्चा में रहने के लिए उतावले रहते थे, किसी की आज्ञा नहीं मानते थे या महत्वाकांक्षी, आत्मतुष्ट या दंभी थे—पर तुम धीरे-धीरे इन चीज़ों से छुटकारा पा लोगे। यदि तुम उन्हें अभी छोड़ना चाहते हो, तो यह संभव नहीं है! क्योंकि तुम्हारा पुराना अहं दूसरों को इसे छूने की अनुमति नहीं देगा, इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं। अत: तुम्हें व्यक्तिपरक प्रयास करने होंगे, सकारात्मक और सक्रिय रूप से पवित्र आत्मा के कार्य का अनुपालन करना होगा, परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए अपनी इच्छा-शक्ति का उपयोग करना होगा, और मेरे वचनों को अभ्यास में लाने के लिए तैयार रहना होगा। यदि तुम पाप करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें अनुशासित करेंगे। जब तुम वापस लौटते हो और समझने पर आते हो, तो तुम्हारे भीतर तुरंत सब-कुछ अच्छा हो जाएगा। यदि तुम पक्षपातपूर्ण ढंग से बोलते हो, तो तुम्हें तुरंत भीतर से अनुशासित किया जाएगा। तुम देखते हो कि परमेश्वर इस तरह की चीज़ों में कोई आनंद नहीं लेता, इसलिए यदि तुम तुरंत रुक जाते हो, तो तुम्हें आंतरिक शांति का अनुभव होगा। कुछ नए विश्वासी ऐसे हैं, जो नहीं समझ पाते कि जीवन की भावनाएँ क्या हैं या उन भावनाओं के भीतर कैसे जीना है। कभी-कभी तुम आश्चर्य करते हो कि यद्यपि तुमने कुछ भी नहीं कहा, फिर भी तुम भीतर से इतना बेचैन क्यों महसूस करते हो? ऐसे समय तुम्हारे विचार और तुम्हारा मन ग़लत होते हैं। कभी-कभी तुम्हारे पास अपने स्वयं के विकल्प होते हैं, तुम्हारी अपनी धारणाएँ और मत होते हैं; कभी-कभी तुम दूसरों को अपने से कम समझते हो; कभी-कभी तुम अपनी खुद की स्वार्थपूर्ण गणनाएँ कर लेते हो और प्रार्थना या आत्मावलोकन नहीं करते। इसी कारण तुम अपने भीतर अस्थिर महसूस करते हो। शायद तुम जानते हो कि समस्या क्या है, इसलिए सीधे अपने दिल में परमेश्वर का नाम पुकारो, परमेश्वर के समीप आ जाओ, और तुम फिर से स्वस्थ हो जाओगे। जब तुम्हारा दिल बहुत घबराया हुआ और बेचैन होता है, तो तुम्हें यह बिलकुल नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हें बोलने की अनुमति दे रहा है। नए विश्वासियों को विशेष रूप से इस संबंध में परमेश्वर की आज्ञा मानने पर अच्छी तरह से ध्यान देना चाहिए। परमेश्वर जिन भावनाओं को मनुष्य के अंदर रखता है, वे शांति, खुशी, स्पष्टता और निश्चितता हैं। अकसर ऐसे लोग होते हैं, जो समझ नहीं पाते, जो गड़बड़ी करेंगे और मनमाने ढंग से कार्य करेंगे—ये सभी रुकावटें हैं, इस पर ध्यान दो। यदि तुम इस स्थिति के प्रति प्रवण हो, तो इसे रोकने के लिए तुम्हें कुछ "निवारक दवा" लेनी चाहिए, अन्यथा तुम अवरोध पैदा करोगे और परमेश्वर तुम पर प्रहार करेगा। आत्मतुष्ट मत बनो; अपनी कमियों को दूर करने के लिए दूसरों की ताकत लो, और देखो कि दूसरे परमेश्वर के वचनों से कैसे जीते हैं; और देखो कि उनके जीवन, कार्य और बातचीत अनुकरणीय हैं या नहीं। यदि तुम दूसरों को अपने से कम मानते हो, तो तुम आत्मतुष्ट और दंभी हो और किसी के लिए भी लाभदायक नहीं हो। अब महत्वपूर्ण है जीवन पर ध्यान केंद्रित करना, मेरे वचनों को अधिक खाना-पीना, मेरे वचनों का अनुभव करना, मेरे वचनों को जानना, मेरे वचनों को वास्तव में अपना जीवन बनाना—ये मुख्य बातें हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों से नहीं जी सकता, क्या उसका जीवन परिपक्व हो सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। तुम्हें हर समय मेरे वचनों से जीना चाहिए और मेरे वचनों को जीवन की आचार-संहिता बनाना चाहिए, इससे तुम महसूस करोगे कि उस आचार-संहिता से काम करने से परमेश्वर आनंदित होता है, और अन्य तरीके से काम करने से परमेश्वर नफ़रत करता है; और धीरे-धीरे तुम सही मार्ग पर चलने लगोगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि क्या है, जो परमेश्वर से आता है और क्या है, जो शैतान से आता है। जो परमेश्वर से आता है, वह तुम्हें पहले से अधिक स्पष्टता-युक्त दूरदृष्टि देता है और ईश्वर के पहले से अधिक निकट लाता है; तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सच्चा प्यार साझा करते हो, तुम परमेश्वर के दायित्व-भार के प्रति विचारशीलता दिखाने में सक्षम होते हो, और तुम्हारा दिल परमेश्वर-प्रेमी हो जाता है, जो कभी घटता नहीं है। चलने के लिए तुम्हारे सामने एक मार्ग होता है। जो शैतान से आता है, वह तुम्हारी दूरदृष्टि खोने का कारण बनता है, और जो कुछ तुम्हारे पास पहले होता है, वह सब चला जाता है; तुम परमेश्वर से विमुख हो जाते हो, भाइयों और बहनों के लिए तुम्हारे पास कोई प्यार नहीं होता, और तुम्हारा दिल घृणा से भर जाता है। तुम बेताब हो जाते हो, तुम अब कलीसियाई जीवन नहीं जीना नहीं चाहते, और तुम्हारा दिल अब परमेश्वर-प्रेमी नहीं रहता। यह शैतान का काम है, और दुष्ट आत्माओं द्वारा किए गए काम का परिणाम भी है।

अब यह एक निर्णायक क्षण है। तुम्हें अंतिम पाली तक अपने पद पर तैनात रहना होगा, अच्छे और बुरे में भेद करने के लिए अपनी आत्मा की आँखों को साफ़ करना होगा, और कलीसिया के निर्माण में अपना समस्त प्रयास लगाना होगा। शैतान के अनुचरों, धार्मिक गड़बड़ियों और बुरी आत्माओं के काम को दूर हटाओ। कलीसिया को शुद्ध करो, मेरी इच्छा अबाध रूप से पूरी होने दो, और सच में, आपदाओं के पूर्व के इस बहुत छोटे-से समय में मैं तुम सबको यथाशीघ्र पूर्ण कर दूँगा, और तुम्हें महिमा में ले आऊँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 22' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 386

जब तुम देखो कि समय भाग रहा है और पवित्र आत्मा का काम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, जिससे तुम्हें ऐसे महान आशीष प्राप्त होते हैं और ब्रह्मांड के राजा, चमकते हुए सूर्य, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का स्वागत करने का तुम्हें अवसर मिलता है—यह सब मेरा अनुग्रह और दया है। ऐसा और क्या है जो तुम्हें मेरे प्यार से दूर कर सके? सावधानी से विचार करो, बचने की कोशिश न करो, हर पल मेरे सामने शांति से प्रतीक्षा करो और हमेशा बाहर न भटको। तुम्हारा दिल मेरे दिल के करीब रहना चाहिए, और चाहे कुछ हो जाए, कुछ भी आँख मूंदकर या मनमाने ढंग से कार्य न करो। तुम्हें मेरी इच्छा को जानना चाहिए, जो कुछ भी मैं चाहूं वही करो और जो मैं नहीं चाहता उसे त्यागने के लिए दृढ़ रहो। तुम्हें अपनी भावनाओं के आधार पर कार्य नहीं करना चाहिए, बल्कि मेरी तरह धार्मिकता का अभ्यास करो; अपनी भावनाओं के अनुसार काम मत करो, यहां तक कि अपने माता-पिता के प्रति भी नहीं। जो सत्य के अनुरूप न हो, उसका त्याग कर दो, शुद्ध हृदय से तुम स्वयं को मुझे अर्पित कर दो और खुद को मेरे लिए खपाओ, किसी भी व्यक्ति, पदार्थ या वस्तु के नियंत्रण में न रहो; अगर यह मेरी इच्छा के अनुरूप हो, तभी मेरे वचनों के अनुसार इसका अभ्यास करो। डरो मत, क्योंकि मेरे हाथ तुम्हें सहारा देते हैं, और मैं तुम्हें सभी दुष्टों से दूर रखूँगा। तुम्हें अपने दिल की रक्षा करनी चाहिए, हमेशा मेरे भीतर रहना चाहिए; क्योंकि तुम्हारा जीवनयापन स्वयं मुझ पर निर्भर है। यदि तुम मुझे छोड़ दोगे तो तुम तुरंत मुरझा जाओगे।

तुम्हें पता होना चाहिए कि ये अंत के दिन हैं। दुष्ट शैतान, दहाड़ते हुए शेर की तरह घूम रहा है और ऐसे लोगों की तलाश कर रहा है जिन्हें वह फाड़ खाये। सभी तरह की महामारियाँ घटित हो रही हैं और कई प्रकार की बुरी आत्माएं उपस्थित हैं। केवल मैं ही सच्चा परमेश्वर हूं; केवल मैं ही तुम्हारा आश्रय हूं। अब तुम केवल मेरे गुप्त स्थान पर, केवल मुझमें छिपने के अलावा कुछ नहीं कर सकते, और तुम पर आपदाएं नहीं आएंगी और कोई भी आफ़त तुम्हारे घर के पास नहीं पहुंचेगी। तुम्हें अधिक बार मेरे अधिक निकट आना चाहिए, मेरे गुप्त स्थान में मेरे साथ सहभागिता करनी चाहिए; अन्य लोगों के साथ ढीलेपन से सहभागिता मत करो। तुम्हें मेरे वचनों में निहित अर्थ को समझना चाहिए—मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें सहभागिता की अनुमति नहीं है, केवल इतना कि अभी भी तुम्हारे अंदर विवेक नहीं है। इस समय, दुष्ट आत्माओं का काम अनियंत्रित रूप से चल रहा है। वे तुम्हें सहभागिता देने के लिए हर प्रकार के लोगों का इस्तेमाल करती हैं। उनके शब्द बहुत सुखद लगते हैं, लेकिन उनके भीतर विष भरा है। वे चीनी में लिपटी बंदूक की गोलियां हैं और इससे पहले कि तुम्हें समझ में आए, वे अपना विष तुम्हारे भीतर प्रवेश कर देंगी। तुम्हें पता होना चाहिए कि आज अधिकांश लोग अस्थिर हैं, मानो वे नशे में हों। जब तुम अपने जीवन की कठिनाइयों के बारे में दूसरों के साथ सहभागिता करते हो, तो वे तुम्हें केवल नियम और सिद्धांत बताते हैं, और यह मेरे साथ सीधे सहभागिता के समान लाभदायक नहीं है। मेरे पास आओ और पूरी तरह से अपने भीतर की पुरानी चीज़ें बाहर निकाल दो; अपना दिल मेरे सामने खोलो, मेरा दिल निश्चित रूप से तुम्हारे लिए प्रकट होगा। तुम्हारा दिल मेरे सामने एकाग्रचित्त होना चाहिए। आलसी मत बनो, बल्कि अक्सर मेरे करीब आओ—तुम्हारे जीवन के विकास के लिए यह सबसे तेज़ तरीका है। तुम्हें मेरे भीतर रहना चाहिए और मैं तुम्हारे भीतर रहूंगा, मैं तुम्हारे भीतर राजा की तरह रहूँगा, सभी चीज़ों में तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा, और राज्य का एक हिस्सा तुम्हारा होगा।

अपने आप को इसलिए कम मत समझो क्योंकि तुम कम उम्र हो; तुम्हें अपने आप को मुझे अर्पित कर देना चाहिए। मैं यह नहीं देखता कि लोग सतही तौर पर कैसे दिखते हैं या उनकी उम्र कितनी है। मैं केवल यह देखता हूं कि वे मुझे ईमानदारी से प्यार करते हैं या नहीं, वे मेरे मार्ग का पालन करते हैं या नहीं, और अन्य सभी चीज़ों को अनदेखा करके सत्य का अभ्यास करते हैं या नहीं। यह चिंता न करो कि कल कैसा होगा या भविष्य कैसा रहेगा। अगर तुम हर दिन को जीने के लिए मुझ पर निर्भर रहोगे, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हारी अगुवाई करूंगा। इसी विचार पर टिके न रहो "मेरा जीवन बहुत छोटा है, मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता," यह शैतान द्वारा भेजा गया विचार है। तुम्हें हर समय मेरे निकट आने के लिए केवल अपने दिल का उपयोग करना है, मार्ग के अंत तक मेरा अनुसरण करना है। जब तुम फटकार और चेतावनी के मेरे वचनों को सुनो, तो तुम तुरंत आगे बढ़ो; बिना रुके मेरे करीब आओ, झुंड से कदम मिलाकर चलो और अपनी नज़रें आगे रखो। मेरी उपस्थिति में, तुम्हें पूरे दिल और आत्मा से अपने परमेश्वर से प्यार करना चाहिए। सेवा के मार्ग पर मेरे वचनों पर और अधिक विचार करो। सत्य का अभ्यास करते समय तुम्हारा दिल कमज़ोर नहीं होना चाहिए, मज़बूत दिल के बनो, मर्द के बच्चे का संकल्प और हिम्मत रखो; एक शक्तिशाली हृदय रखो। यदि तुम मुझसे प्यार करना चाहते हो, तो तुम्हें उन सभी चीज़ों के साथ मुझे संतुष्ट करना चाहिए जो मैं तुम में करना चाहता हूं। यदि तुम मेरा अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम्हें वो सब छोड़ देना चाहिए जो भी तुम्हारे पास है, तुम जिसे भी प्यार करते हो; तुम्हें मेरे सामने विनम्रता से, एक सरल मन से समर्पण कर देना चाहिए, लापरवाही से शोध या विचार न करो; बल्कि पवित्र आत्मा के काम के साथ बने रहो।

यहां मैं तुम्हें एक सलाह दूंगा : मैं जो भी प्रबुद्धता तुम्हें देता हूँ, उसे निश्चित तौर पर तुम्हें मज़बूती से पकड़कर रखना है और उसका अभ्यास करना है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 28' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 387

जागो, भाइयो! जागो, बहनो! मेरे दिन में विलंब नहीं किया जाएगा; समय जीवन है, और समय को कब्जे में लेना जीवन बचाना है! समय बहुत दूर नहीं है! यदि तुम लोग विद्यालय में प्रवेश के लिए परीक्षा देते हो और उत्तीर्ण नहीं होते हो, तो तुम लोग फिर से कोशिश कर सकते हो और परीक्षा के लिए याद कर सकते हो। हालाँकि, मेरे दिन में ऐसा कोई विलंब नहीं होगा। याद रखो! याद रखो! मैं इन अच्छे वचनों के साथ आग्रह करता हूँ। दुनिया का अंत तुम लोगों की नज़रों के बिल्कुल सामने प्रकट होता है, बड़ी आपदाएँ तेजी से निकट आती हैं; क्या तुम लोगों का जीवन महत्वपूर्ण है या तुम लोगों का सोना, खाना, पीना, और कपड़े पहनना महत्वपूर्ण है? इन चीज़ों को समझने का तुम लोगों का समय आ गया है। अब और संदेह में मत रहो और निश्चित होने में संकोच मत करो!

मानवजाति कितनी दयनीय! कितनी अभागी! कितनी अंधी! कितनी क्रूर है! तुम लोग वास्तव में मेरे वचनों को अनसुना करते हो—क्या मैं व्यर्थ में तुम लोगों से बात कर रहा हूँ? तुम लोग अभी भी बहुत बेपरवाह हो, क्यों? ऐसा क्यों है? क्या तुम लोगों ने इस बारे में पहले कभी नहीं सोचा है? मैं इन बातों को किनके लिए कहता हूँ? मुझ पर विश्वास करो! मैं तुम लोगों का उद्धारकर्ता हूँ! मैं तुम लोगों का एकमात्र सर्वशक्तिमान हूँ! नज़र रखो! नज़र रखो! गँवाया हुआ समय फिर कभी नहीं आएगा, यह याद रखो! धरती पर कहीं भी ऐसी जगह नहीं है जहाँ तुम लोग उस दवा को खरीद सको जो पछतावे को शांत करेगी! तो मैं तुम लोगों से यह कैसे कहूँ? क्या मेरा वचन तुम लोगों द्वारा सावधानीपूर्वक सोच-विचार और बार-बार मनन किए जाने योग्य नहीं है? तुम लोग मेरे वचनों के मामले में बहुत लापरवाह हो और अपने जीवन के मामले में बहुत गैर-ज़िम्मेदार हो; मैं इसे कैसे सहन कर सकता हूँ? मैं कैसे सह सकता हूँ?

क्यों, इस पूरे समय में, तुम लोगों के बीच एक उचित कलीसिया जीवन उत्पन्न होने में असमर्थ रहा है? ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों में विश्वास की कमी है, तुम लोग कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं हो, तुम लोग अपने आप को अर्पित करने के इच्छुक नहीं हो, और मेरे सामने अपने आप को व्यय करने के इच्छुक नहीं हो। जागो, मेरे पुत्रो! मुझ पर विश्वास करो, मेरे पुत्रो! मेरे प्यारो, मेरे हृदय में जो है उस पर तुम लोग विचार करने में असमर्थ क्यों हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 30' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 388

कलीसिया में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के बारे में इतने भारी संदेहों से मत भरो। कलीसिया के निर्माण के दौरान गलतियाँ होना अपरिहार्य है, लेकिन जब तुम्हारे सामने समस्याएँ आएँ, तो घबराओ मत; बल्कि शांत और स्थिर रहो। क्या मैंने तुम लोगों को पहले ही नहीं बता दिया है? अकसर मेरे सामने आओ और प्रार्थना करो, और मैं तुम्हें अपने इरादे स्पष्ट रूप से दिखाऊँगा। कलीसिया मेरा दिल है और यह मेरा अंतिम प्रयोजन है, इसलिए मैं कैसे इसे प्यार नहीं कर सकता? डरो मत—जब कलीसिया में इस तरह की चीज़ें होती हैं, तो वे मेरी अनुमति से होती हैं। खड़े होकर मेरी ओर से बोलो। विश्वास रखो कि सभी चीज़ों और मामलों को मेरे सिंहासन की अनुमति है और उनमें मेरे इरादे निहित हैं। यदि तुम अनियंत्रित तरीके से सहभागिता जारी रखोगे, तो समस्याएँ होंगी। क्या तुमने परिणामों के बारे में सोचा है? यह उसी तरह की चीज़ है, जिसका लाभ शैतान उठाएगा। मेरे पास अकसर आओ। मैं स्पष्ट रूप से बोलूँगा : यदि तुम मेरे समक्ष आए बिना कुछ करने जा रहे हो, तो यह न सोचना कि तुम उसे पूरा कर पाओगे। तुम्हीं लोगों ने मुझे इस स्थिति के लिए मजबूर किया है।

निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे लिए चीज़ें स्पष्ट कर दूँगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है; कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएँ, है न? आज हर किसी को कठोर परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्यार करने वाला तुम लोगों का दिल मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं होगा। यदि ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त भी हों, तो भी सभी को इनसे गुज़रना होगा; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की कठिनाई हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी। परीक्षण मेरे आशीष हैं, और तुममें से कितने मेरे सामने आकर घुटनों के बल गिड़गिड़ाकर मेरे आशीष माँगते हैं? बेवकूफ़ बच्चे! तुम्हें हमेशा लगता है कि कुछ मांगलिक वचन ही मेरा आशीष होते हैं, किंतु तुम्हें यह नहीं लगता कि कड़वाहट भी मेरे आशीषों में से एक है। जो लोग मेरी कड़वाहट में हिस्सा बँटाते हैं, वे निश्चित रूप से मेरी मिठास में भी हिस्सा बँटाएँगे। यह मेरा वादा है और तुम लोगों को मेरा आशीष है। मेरे वचनों को खाने-पीने और उनका आनंद लेने में संकोच न करो। जब अँधेरा छँटता है, रोशनी हो जाती है। भोर होने से पहले अँधेरा सबसे घना होता है; उसके बाद धीरे-धीरे उजाला होता है, और तब सूर्य उदित होता है। डरपोक या कायर मत बनो। आज मैं अपने पुत्रों का समर्थन करता हूँ और उनके लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता हूँ।

जब कलीसिया के काम की बात आती है, तो हमेशा अपने उत्तरदायित्व से मुँह मत मोड़ो। यदि तुम मामले को ईमानदारी से मेरे पास लाओगे, तो तुम्हें कोई राह मिल जाएगी। जब ऐसी कोई मामूली समस्या उत्पन्न होती है, तो क्या तुम डर जाते हो और घबरा जाते हो, और तुम्हें समझ नहीं आता कि क्या करूँ? मैंने कई बार कहा है, "अकसर मेरे पास आओ!" क्या तुम लोगों ने ईमानदारी से उन चीज़ों का अभ्यास किया है, जो मैं तुम्हें करने के लिए कहता हूँ? तुमने मेरे वचनों पर कितनी बार विचार किया है? अगर तुमने ऐसा नहीं किया है, तो तुम्हारे पास कोई स्पष्ट अंतर्दृष्टि नहीं है। क्या यह तुम्हारी अपनी करनी नहीं है? तुम दूसरों को दोष देते हो, लेकिन उसके बजाय तुम अपने आप से नफ़रत महसूस क्यों नहीं करते? तुम चीज़ें ख़राब कर देते हो और फिर लापरवाह और असावधान हो जाते हो; तुम्हें मेरे वचनों पर ध्यान देना चाहिए।

आज्ञाकारी और विनम्र व्यक्ति महान आशीष प्राप्त करेंगे। कलीसिया में मेरी गवाही में दृढ़ रहो, सत्य पर टिके रहो; सही सही है और गलत गलत है। काले और सफ़ेद के बीच भ्रमित मत होओ। तुम शैतान के साथ युद्ध करोगे और तुम्हें उसे पूरी तरह से हराना होगा, ताकि वह फिर कभी न उभरे। मेरी गवाही की रक्षा के लिए तुम्हें अपना सब-कुछ देना होगा। यह तुम लोगों के कार्यों का लक्ष्य होगा—इसे मत भूलना। लेकिन अभी तुम लोगों में विश्वास की और चीज़ों में अंतर करने की क्षमता में कमी है और तुम हमेशा मेरे वचनों और इरादों को समझने में असमर्थ रहते हो। फिर भी, चिंता मत करो; हर चीज़ मेरे चरणों के अनुसार आगे बढ़ती है और चिंता केवल परेशानी पैदा करती है। मेरे समक्ष अधिक समय बिताओ और भोजन और कपड़ों को महत्त्व न दो, जो केवल भौतिक शरीर के लिए हैं। अकसर मेरे इरादों का पता लगाओ, और मैं स्पष्ट रूप से तुम्हें दिखाऊँगा कि वे क्या हैं। धीरे-धीरे तुम्हें हर चीज़ में मेरा इरादा दिखाई देगा, क्योंकि हर इंसान के लिए मेरे पास एक निर्बाध मार्ग होगा। इससे मेरे दिल को संतुष्टि मिलेगी और तुम लोग हमेशा के लिए मुझसे आशीष प्राप्त करोगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 41' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 389

पतरस कई वर्षों तक मेरे प्रति वफ़ादार था, मगर वह कभी भी भुनभुनाया नहीं या उसका हृदय कभी भी शिकायती नहीं था, और यहाँ तक कि अय्यूब भी उसके बराबर नहीं था। युगों के दौरान सभी संत भी उससे बहुत छोटे पड़े हैं। उसने न केवल मेरे बारे में ज्ञान की खोज की, बल्कि उसने मुझे उस दौरान जाना जब शैतान अपनी कपटपूर्ण योजनाओं को चला रहा था। यह कई वर्षों की सेवा का कारण बना जो मेरे स्वयं के हृदय के अनुसार थी, जिसके परिणामस्वरूप उसे शैतान द्वारा कभी भी शोषित नहीं किया गया था। पतरस, अय्यूब के विश्वास को अमल में लाया, मगर वह उसकी कमियों को भी स्पष्ट रूप से महसूस करता था। यद्यपि अय्यूब महान विश्वास वाला था, किन्तु उसके पास आध्यात्मिक क्षेत्र के मामलों में ज्ञान का अभाव था, और इस तरह उसने कई वचन कहे जो कि वास्तविकता के अनुरूप नहीं थे; यह दर्शाता है कि उसका ज्ञान अभी भी उथला था, और पूर्ण बनाए जाने योग्य नहीं था। और इसलिए, पतरस हमेशा आत्मा की समझ को पाने की ताक में रहता था, और हमेशा आध्यात्मिक क्षेत्र की गतिशीलता को देखने पर ध्यान केन्द्रित करता था। परिणामस्वरूप, वह न केवल मेरी इच्छाओं के बारे में कुछ पता लगाने में सक्षम था, बल्कि शैतान की धोखेबाज योजनाओं को भी थोड़ा-थोड़ा समझने में सक्षम था, और इसलिए मेरे बारे में उसका ज्ञान युगों-युगों के दौरान किसी भी अन्य की अपेक्षा अधिक था।

पतरस के अनुभवों से यह देखना कठिन नहीं है कि यदि मनुष्य मुझे जानना चाहता है, तो उसे आत्मा में मनन पर सावधानीपूर्वक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मैं नहीं कहता हूँ कि तुम बाह्य तौर पर अधिक मात्रा में मेरे प्रति समर्पित हो जाओ; यह गौण चिंता का विषय है। यदि तुम मुझे नहीं जानते हो, तो समस्त विश्वास, प्रेम और निष्ठा जिसकी तुम बात करते हो वे केवल भ्रम हैं, वे व्यर्थ बकवाद हैं, और तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो मेरे सामने बड़ा घमण्ड करता है परन्तु स्वयं को नहीं जानता है, और इसलिए तुम एक बार फिर शैतान के द्वारा फँसा लिए जाओगे और अपने आपको छुड़ाने में असमर्थ हो जाओगे; तुम तबाही के पुत्र बन जाओगे, और विनाश की वस्तु बन जाओगे। परन्तु यदि तुम मेरे वचनों के प्रति उदासीन और उनकी परवाह नहीं करने वाले हो, तो तुम निस्संदेह मेरा विरोध करते हो। यह सत्य है, और तुम बहुत-सी और विभिन्न आत्माओं को जिन्हें मेरे द्वारा ताड़ना दी जाती है आध्यात्मिक क्षेत्र के द्वार के माध्यम से देख कर अच्छा करोगे। उनमें से कौन निष्क्रिय, लापरवाह और मेरे वचनों से असहमत नहीं थे? उनमें से कौन मेरे वचनों के प्रति दोषदर्शी नहीं थे? उनमें से किसने मेरे वचनों में दोष ढूँढने की कोशिश नहीं की? उनमें से किसने स्वयं को बचाने के लिए मेरे वचनों का एक रक्षात्मक हथियार की तरह उपयोग नहीं किया? उन्होंने मेरे वचनों के माध्यम से मेरे बारे में ज्ञान को नहीं खोजा, बल्कि खेलने मात्र के लिए खिलौनों की तरह उनका उपयोग किया। इसमें, क्या उन्होंने सीधे मेरा विरोध नहीं किया? मेरे वचन कौन हैं? मेरा आत्मा कौन है? कितनी ही बार मैंने ऐसे वचनों को तुम लोगों के समक्ष रखा है, फिर भी क्या कभी भी तुम लोगों के दृष्टिबोध उच्चतर और स्पष्ट रहे हैं? क्या तुम लोगों का अनुभव कभी वास्तविक रहा है? मैं तुम लोगों को एक बार फिर से याद दिलाता हूँ: यदि तुम लोग मेरे वचनों को नहीं जानते हो, उन्हें स्वीकार नहीं करते हो, और उन्हें अभ्यास में नहीं लाते हो, तो तुम अपरिहार्य रूप से मेरी ताड़ना का लक्ष्य बन जाओगे! तुम निश्चित रूप से शैतान के शिकार बन जाओगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 8' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 390

यद्यपि बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, किंतु कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने का क्या अर्थ है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यद्यपि लोग "परमेश्वर" शब्द और "परमेश्वर का कार्य" जैसे वाक्यांशों से परिचित हैं, किंतु वे परमेश्वर को नहीं जानते, और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, अपने विश्वास को लेकर भ्रमित रहते हैं। लोग परमेश्वर पर विश्वास करने को गंभीरता से नहीं लेते, और यह पूरी तरह से इसलिए है क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर और उसके कार्य को नहीं जानते, तो वे उसके इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं, और उसकी इच्छा पूरी करने योग्य तो बिलकुल भी नहीं हैं। "परमेश्वर पर विश्वास" का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर पर विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे भी बढ़कर, यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर पर सच्चे विश्वास का अर्थ यह है : इस विश्वास के आधार पर कि परमेश्वर सभी वस्तुओं पर संप्रभुता रखता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कामों का अनुभव करता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है, परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है, और परमेश्वर को जानता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही "परमेश्वर पर विश्वास" कहा जा सकता है। मगर लोग परमेश्वर पर विश्वास को अकसर बहुत सरल और तुच्छ मानते हैं। परमेश्वर पर इस तरह विश्वास करने वाले लोग परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ गँवा चुके हैं, और भले ही वे बिलकुल अंत तक विश्वास करते रहें, लेकिन वे कभी भी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। आज भी ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर में शब्दशः और खोखले सिद्धांतों के अनुसार विश्वास करते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर उनके विश्वास में कोई सार नहीं है, और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते। फिर भी वे परमेश्वर से आशीषों और पर्याप्त अनुग्रह के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ रुकें, अपने हृदय शांत करें, और खुद से पूछें : क्या परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तव में पृथ्वी पर सबसे आसान बात है? क्या परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उस पर विश्वास करने वाले या उस पर विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम होंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 391

वो क्या है जो मनुष्य ने प्राप्त किया है जब उसने सर्वप्रथम परमेश्वर में विश्वास किया? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? अब तुम सभी जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नही है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर को प्रेम करने के माध्यम से सम्पन्न बनाने के लिए है, इत्यादि। जैसा यह है, यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम इसके शिखर पर पहुँचता है और तुम कुछ भी नहीं माँगते, यह "प्रेम" जिसे तुम खोजते हो अभी भी अशुद्ध प्रेम होता है, और परमेश्वर को भाने वाला नहीं होता। वे लोग जो परमेश्वर के लिए प्रेम का उपयोग अपने बोझिल जीवन को सम्पन्न बनाने और अपने हृदय के एक शून्य को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जो अपने जीवन को आसानी से जीना चाहते हैं, ना कि वे जो सचमुच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध होता है, भावनात्मक आनंद की खोज होता है, और परमेश्वर को इस प्रकार के प्रेम की आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? तुम में परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकतर का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले जिक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथापूर्व स्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम एक ऐसा फूल है जो खिलने के बाद फल नहीं देता और मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, तुमने जब एक बार परमेश्वर को इस ढंग से प्रेम कर लिया और तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई ना हो, तो तुम गिर जाओगे। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ प्रेमी परमेश्वर के समय ही प्रेम कर सकते हो और उसके बाद तुम अपने जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं लाते, तो फिर तुम अंधकार में निरंतर घिरते चले जाओगे, तुम बच नहीं पाओगे, और शैतान द्वारा बांधे जाने और मूर्ख बनाये जाने से मुक्त होने में असमर्थ होगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; अंत में, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही होंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे अपने मूल स्थान में वापस लौट जायेंगे, अर्थात, वापस शैतान के पास, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गन्धक से जलती रहती है। जो परमेश्वर के हो चुके हैं, वो वे होते हैं जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसके शासन से बच जाते हैं। ऐसे मनुष्य राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिने जायेंगे। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनने को तैयार हो? तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने के लिए तैयार हो? क्या तुम शैतान के शासन से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो? ऐसी सारी चीज़ें स्पष्ट होनी चाहिए और आगे किसी भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 392

बीते समयों में, अनेक लोग मनुष्य की महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ मनुष्य की आशाओं के लिए आगे बढ़े। अब इन मामलों पर चर्चा नहीं की जाएगी। कुंजी है अभ्यास का ऐसा ढंग खोजना जो तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के सम्मुख एक सामान्य स्थिति बनाये रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव की बेड़ियों को तोड़ डालने में सक्षम करे, ताकि तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त हो सको और पृथ्वी पर वैसे जियो जैसे परमेश्वर तुमसे चाहता है। केवल इसी से परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सकती है। परमेश्वर में विश्वास तो बहुत से लोग करते हैं, फिर भी न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे मूर्खता से विश्वास करते हैं और दूसरों का अंधानुकरण करते हैं, और इसलिए उनके पास कभी भी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं होता; मनुष्य का परमेश्वर के साथ जो सामान्य संबंध है वो होना तो दूर, उनके पास सामान्य व्यक्तिगत संबंध तक नहीं होते। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएं और गलतियां, और दूसरे कारण जो परमेश्वर की इच्छा के आड़े आते हैं बहुत हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य अभी तक परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर नहीं आया है, न ही उसने मनुष्य जीवन के वास्तविक अनुभव में प्रवेश किया है। तो परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर आने का क्या अर्थ है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम सब समय परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रख सकते हो और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के साथ संवाद कर सकते हो, तुम्हें क्रमशः यह पता लगने लगता है कि मनुष्य में क्या कमी है और परमेश्वर के विषय में एक गहरा ज्ञान होने लगता है। इसके द्वारा तुम्हें प्रतिदिन अपनी आत्मा में एक नया दृष्टि बोध और प्रकाश प्राप्त होता है; तुम्हारी लालसा बढ़ती है और तुम सत्य में प्रवेश करने की कोशिश करने लगते हो। हर दिन नया प्रकाश और नई समझ होती है। इस रास्ते के द्वारा, धीरे-धीरे तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो, और तुम्हारा जीवन महान बनता जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति सही रास्ते पर आ चुका होता है। उपरोक्त के मुक़ाबले अपने वास्तविक अनुभवों का मूल्यांकन करो और तुमने परमेश्वर के विश्वास का जो रास्ता चुना है उसे उपरोक्त के मुकाबले जांचो। क्या तुम वह व्यक्ति हो जो सही रास्ते पर आ चुका है? तुम किन मामलों में शैतान की बेड़ियों और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि तुम सही रास्ते पर आ चुके हो तब भी शैतान के साथ तुम्हारे संबंधों का टूटना बाकी है। इस तरह, क्या परमेश्वर के प्रेम की इस तलाश का निष्कर्ष एक ऐसे प्रेम के रूप में होगा जो प्रमाणिक, समर्पित, और शुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और हार्दिक है, फिर भी तुम शैतान की बेड़ियों से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाये हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना रहे हो? यदि तुम परमेश्वर के लिए विशुद्ध प्रेम प्राप्त करना चाहते हो, परमेश्वर को प्राप्त हो जाना चाहते हो और चाहते हो कि तुम राज्य के लोगों में गिने जाओ, तो तुम्हें पहले खुद को परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर स्थित करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 393

एक सामान्य समस्या जो सभी मनुष्यों में पाई जाती है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। एक तथ्य यह है कि मनुष्य मूल्य चुकाने के लिए तैयार नहीं है, और दूसरा यह है कि मनुष्य की सूझ-बूझ बहुत अपर्याप्त है; वह अतीत की उन कई कठिनाइयों की उपेक्षा करने में असमर्थ है जो वास्तविक जीवन में विद्यमान हैं और नहीं जानता है कि कैसे उनका उचित रूप से अभ्यास करे। चूँकि मनुष्य के पास सत्य का बहुत कम अनुभव, कमज़ोर क्षमता, और सत्य की सीमित समझ है, इसलिए वह उन कठिनाइयों को हल करने में असमर्थ है जिनका सामना वह जीवन में करता है। वह परमेश्वर में अपने विश्वास के लिए सिर्फ़ दिखावटी प्रेम कर सकता है, मगर परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में लाने में असमर्थ है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर परमेश्वर है, और जीवन जीवन है, मानो कि मनुष्य का अपने जीवन में परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बंध नहीं है। यही सभी मनुष्य मानते हैं। परमेश्वर में इस तरह का विश्वास उसके द्वारा मनुष्य को वास्तव में प्राप्त किए जाने और पूर्ण बनाए जाने की अनुमति नहीं देगा। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का वचन अधूरा है, बल्कि मनुष्य की उसके वचन को ग्रहण करने की योग्यता अपर्याप्त है। यह कहा जा सकता है कि लगभग कोई भी मनुष्य वैसे कार्यकलाप नहीं करता है जैसा कि मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा अपेक्षा की गई थी। बल्कि, परमेश्वर में उनका विश्वास उनके अपने इरादों, स्थापित धार्मिक अवधारणाओं, और प्रथाओं के आधार पर है। कुछ ही लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के वचन की स्वीकृति के बाद एक रूपांतरण से गुज़रते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे अपनी ग़लत धारणाओं में डटे रहते हैं। जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करता है, तो वह धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर ऐसा करता है, जीने के लिए पूरी तरह से जीवन के अपने स्वयं के दर्शन के आधार पर दूसरों के साथ रहता है और पारस्परिक कर्म करता है। हर दस लोगों में से नौ के बारे में ऐसा ही मामला है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास शुरू करने के बाद एक अन्य योजना बनाते हैं और एक नई शुरुआत करते हैं। कोई भी परमेश्वर के वचन को सत्य के रूप में नहीं मानता है या उसे अभ्यास में नहीं लाता है।

उदाहरण के लिए, यीशु पर विश्वास को लें। चाहे कोई मनुष्य विश्वास में नौसिखिया था या फिर एक लम्बे समय से विश्वास में रहा था, सभी ने बस उन प्रतिभाओं का उपयोग किया जो उनके पास थीं और जो कुछ भी कौशल उनमें थे, उनका प्रदर्शन किया। मनुष्यों ने बस इन्हीं तीन शब्दों "परमेश्वर में विश्वास" को अपने आम जीवन में जोड़ दिया, मगर अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किए, और परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा सा भी नहीं बढ़ा। मनुष्य की तलाश न तो उत्साही थी और न ही निरुत्साही। उसने यह नहीं कहा कि उसने विश्वास नहीं किया, मगर उसने अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित नहीं किया। उसने कभी भी परमेश्वर से सचुमच में प्रेम नहीं किया या परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया। परमेश्वर में उसका विश्वास सच्चा और झूठा दोनों था, उसने आँखें मूँद ली और अपने विश्वास के अभ्यास में ईमानदार नहीं था। वह बिल्कुल शुरू से अपनी मृत्यु के समय तक एक संभ्रम की स्थिति में बना रहा। इसका क्या अर्थ है? आज, तुम्हें सही रास्ते पर नियत अवश्य होना चाहिए क्योंकि तुम व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो। परमेश्वर में विश्वास करके, तुम्हें सिर्फ़ आशीषों को ही नहीं खोजना चाहिए, बल्कि परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रबुद्धता और तुम्हारी स्वयं की खोज के माध्यम से, तुम उसके वचन को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में एक सच्ची समझ को विकसित कर सकते हो, और परमेश्वर के लिए एक सच्चा प्रेम रख सकते हो जो तुम्हारे हृदय से आता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम सबसे अधिक सच्चा है, इतना कि उसके लिए तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट नहीं कर सकता है या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सकता है। तब तुम परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर से संबंध रखते हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और तब दूसरा कोई तुम पर कब्जा नहीं कर सकता है। तुम्हारे अनुभव, तुमने जो मूल्य चुकाया है, और परमेश्वर के कार्य के कारण, तुम परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम को विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दिए जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीते हो। सिर्फ़ जब तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर मुक्त हो जाते हो तभी तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया, समझे जा सकते हो। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य को अवश्य खोजना चाहिए। यह तुम लोगों में से हर एक का कर्तव्य है। किसी को भी चीज़ें जैसी हैं उनसे आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दोहरे मन वाले नहीं हो सकते या इसे हल्के में नहीं मान सकते हो। तुमको हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके वास्ते सब कुछ करना चाहिए। और जब तुम कुछ बोलते या करते हो, तो तुमको परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 394

परमेश्वर में विश्वास करने का मनुष्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका विश्वास सिर्फ़ वचनों में है, और परमेश्वर उसके व्यावहारिक जीवन में कहीं भी विद्यमान नहीं है। वास्तव में, सभी मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर के लिए कई प्रार्थनाएँ मनुष्य के मुख से तो आती हैं, किन्तु परमेश्वर के लिए उसके हृदय में बहुत थोड़ी सी ही जगह है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और अपने आप को परीक्षाओं में जान ले। अन्यथा, सभी मनुष्य प्रधान दूत के वंशज बन जाएँगे, और निरंतर भ्रष्ट बनते चले जाएँगे। परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के दौरान, कई व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ दिए जाते हैं, जैसे-जैसे वह लगातार परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किया जाता है। अन्यथा, कोई भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है, और मनुष्य में उस कार्य को करने का परमेश्वर के पास कोई रास्ता नहीं है जो उसे करना चाहिए। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। सिर्फ़ इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य में अपना जीवन कार्य कर सकता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कह सकता है। जैसे कि परमेश्वर इसे देखता है, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम सिर्फ़ अपने स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो परन्तु सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते हो, तब भी यह प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, काम में मशगूल होकर दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत की कगार पर पहुँचने के बाद वे अंतत: देख पाते हैं कि उनमें सच्ची गवाही की कमी है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिनमें मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा बनी रहती है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 395

अब, तुम लोगों को परमेश्वर की प्रजा बनने की कोशिश करनी है, और तुम सब पूरी प्रविष्टि को सही राह पर शुरू करोगे। परमेश्वर के लोग होने का अर्थ है राज्य के युग में प्रवेश करना। आज, तुम सब आधिकारिक तौर पर राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू कर रहे हो, और तुम लोगों के भावी जीवन अब पहले की तरह सुस्त और लापरवाह नहीं रहेंगे; ऐसे जीवन परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। अगर तुम्हें कोई अत्यावश्यकता महसूस नहीं होती है, तो यह दिखाता है कि तुम खुद को सुधारने की कोई इच्छा नहीं रखते हो, कि तुम्हारा अनुसरण उलझा हुआ और भ्रमित है, और तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हो। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का तात्पर्य है परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत करना—क्या तुम इस तरह के प्रशिक्षण को स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता की एक भावना को महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन के तहत जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आते हैं और तुम्हारी परीक्षा लेते हैं, तब तुम कैसे पेश आओगे? और जब तुम सभी तरह के तथ्यों का सामना करोगे तो तुम क्या करोगे? अतीत में, तुम्हारा ध्यान जीवन पर केन्द्रित नहीं था; आज, तुम्हें जीवन की वास्तविकता में प्रवेश करना होगा, और अपने जीवन के स्वभाव में बदलावों को लाने की कोशिश करनी होगी। यही है जो कि राज्य के लोगों के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। उन सब के पास जो परमेश्वर के लोग हैं जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना चाहिए और उनके जीवन के स्वभाव में परिवर्तनों का अनुसरण करना चाहिए। यही है वह जो राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षा है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ निम्नानुसार हैं:

1. उन्हें परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करना चाहिए, जिसका अर्थ है, उन्हें परमेश्वर के आखिरी दिनों के कार्य के दौरान कहे गए सभी वचनों को स्वीकार करना होगा।

2. उन्हें राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना चाहिए।

3. उन्हें इसका प्रयास करना चाहिए कि परमेश्वर उनके दिलों को स्पर्श करे। जब तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, और तुम्हारे पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन होता है, तो तुम स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के प्रेम की देखभाल और उसके संरक्षण के तहत जिओगे। केवल जब तुम परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हो तभी तुम परमेश्वर के होते हो।

4. वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने चाहिए।

5. उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा का एक प्रत्यक्षीकरण बन जाना चाहिए।

ये पाँच बातें तुम सब के लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं, और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने में सक्षम होगे। आज, तुम सभी परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करना शुरू करो, और राज्य के लोग बनने का और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानकों को हासिल करने का अनुसरण करो। यह प्रविष्टि का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा पूर्ण करना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँच आदेशों को स्वीकार करना होगा, और यदि तुम उन्हें कर पाने में सक्षम होते हो, तो तुम परमेश्वर के दिल का अनुसरण करोगे, और निश्चित रूप से परमेश्वर तुम्हारा महान उपयोग करेगा। आज जो अत्यधिक महत्वपूर्ण है वह है राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश आध्यात्मिक जीवन को सन्निहित करता है। पहले, आध्यात्मिक जीवन की कोई बात नहीं होती थी, लेकिन आज, जैसे ही तुम राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू करते हो, तुम आधिकारिक तौर पर आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 396

आध्यात्मिक जीवन किस तरह का जीवन है? आध्यात्मिक जीवन वह है जिसमें तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ चुका होता है, और परमेश्वर के प्रेम के प्रति सचेत होने में सक्षम हो जाता है। यह वह है जिसमें तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, और तुम्हारे दिल में अन्य कुछ भी नहीं होता है, और तुम परमेश्वर की इच्छा को आज समझ सकते हो, और अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए पवित्र आत्मा के प्रकाश से मार्गदर्शन प्राप्त करते हो। मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक ऐसा जीवन आध्यात्मिक जीवन है। यदि तुम आज के प्रकाश का अनुसरण करने में असमर्थ हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक दूरी शुरू हो गई है-हो सकता है कि यह संबंध शायद टूट भी चुका हो—और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन से रहित हो गए हो। परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बन्ध परमेश्वर के वचनों को आज स्वीकार करने की नींव पर निर्मित किया जाता है। क्या तुम्हारे पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन है? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बन्ध है? क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है? अगर तुम आज पवित्र आत्मा की ज्योति का अनुसरण कर सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा को उसके वचनों के भीतर समझ सकते हो, और इन वचनों में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा की धारा का अनुसरण करता है। यदि तुम पवित्र आत्मा की धारा का अनुसरण नहीं करते हो, तो तुम निस्संदेह कोई वैसे हो जो सच्चाई का अनुसरण नहीं करता है। जो खुद को सुधारने की इच्छा नहीं रखते हैं, पवित्र आत्मा के लिए उनके भीतर काम करने का कोई मौका नहीं है, और नतीजतन, ऐसे लोग अपनी ताकत को कभी भी जगा नहीं सकते हैं, और हमेशा निष्क्रिय रहते हैं। आज, क्या तुम पवित्र आत्मा की धारा का अनुसरण करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा की धारा में हो? क्या तुम एक निष्क्रिय स्थिति से बाहर निकल आये हो? वे सभी जो परमेश्वर के वचनों में विश्वास करते हैं, जो परमेश्वर के कार्य को नींव के रूप में लेते हैं, और पवित्र आत्मा के प्रकाश का आज पालन करते हैं—वे सभी पवित्र आत्मा की धारा में हैं। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचन निस्संदेह सच्चे और सही हैं, और यदि तुम परमेश्वर के वचनों को मानते हो, चाहे वह जो भी कहे, तो तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्य में प्रवेश करता है, और इस तरह तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हो।

पवित्र आत्मा की धारा में प्रवेश करने के लिए तुम्हारे पास परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बन्ध होना चाहिए, और तुम्हें सबसे पहले अपनी निष्क्रिय स्थिति से छुटकारा पाना होगा। कुछ लोग हमेशा बहुमत के पीछे चलते हैं, और उनके दिल परमेश्वर से बहुत दूर भटक गए हैं; ऐसे लोगों को खुद को सुधारने की कोई इच्छा नहीं होती है, और जिन मानकों का वे अनुसरण करते है, वे बहुत निम्न हैं। केवल परमेश्वर से प्रेम करना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त हो जाने का अनुसरण करना ही परमेश्वर की इच्छा है। कुछ लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए केवल अपने ज़मीर का उपयोग करते हैं, लेकिन यह परमेश्वर की इच्छाओं पर खरा नहीं उतरता है; तुम्हारे अनुसरण के मानक जितने उच्चतर होंगे, परमेश्वर की इच्छा के तुम उतने ही अधिक सामंजस्य में रहोगे। एक ऐसे व्यक्ति की तरह जो सामान्य हो, और जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करता हो, परमेश्वर के लोगों में से एक बनने के लिए राज्य में प्रवेश करना तुम सभी का असली भविष्य है, और यह एक ऐसा जीवन है जो अत्यंत मूल्य और महत्व का है, कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। मैं यह क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं वे देह के लिए जीते हैं, और वे शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम सब परमेश्वर के लिए जीते हो, और परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए जीवित रहते हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम सभी का जीवन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। केवल इसी समूह के लोग, जिन सभी को परमेश्वर द्वारा चुना गया है, अत्यधिक महत्वपूर्ण जीवन जीने में सक्षम हैं: पृथ्वी पर और कोई भी ऐसे मूल्य और अर्थ वाला जीवन नहीं जी सकता है। क्योंकि तुम सब परमेश्वर द्वारा चुने गए हो, और परमेश्वर द्वारा पाले-पोसे गए हो, और इसके अलावा, तुम सब के लिए परमेश्वर के प्रेम के कारण, तुम लोगों ने सच्चे जीवन को समझ लिया है, और यह जानते हो कि कैसे एक ऐसा जीवन जीना है जो अत्यंत मूल्य का हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि तुम सब का अनुसरण उत्तम है, बल्कि यह परमेश्वर की कृपा के कारण है; यह परमेश्वर ही था जिसने तुम आत्माओं की आँखें खोलीं, और यह परमेश्वर का आत्मा ही था जिसने तुम सब के दिलों को छू लिया, तुम सभी को उसके सामने आने का सौभाग्य प्रदान करते हुए। यदि परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हें प्रबुद्ध नहीं किया होता, तो तुम परमेश्वर के बारे में क्या सुंदर है यह देखने में असमर्थ होते, न ही तुम्हारे लिए परमेश्वर से प्रेम करना संभव होता। यह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा के द्वारा लोगों के दिलों को छू लेने के कारण ही है कि उनके दिल परमेश्वर की ओर मुड़ चुके हैं। कभी-कभी, जब तुम परमेश्वर के वचनों का आनंद ले रहे होते हो, तुम्हारी आत्मा द्रवित हो जाती है, और तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम किये बिना नहीं रह सकते, तुम्हारे भीतर बड़ी ताकत है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे तुम दूर नहीं कर सकते। यदि तुम ऐसा महसूस करते हो, तो परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हें स्पर्श कर लिया है, और तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ चुका है, और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे: "हे परमेश्वर! हम वास्तव में तुम्हारे द्वारा पूर्वनिर्धारित किये गए और चुने गए हैं। तुम्हारी महिमा मुझे गौरव देती है, और तुम्हारे अपनों में से एक होना मुझे गौरवशाली लगता है। तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए मैं कुछ भी लगा दूँगा और कुछ भी दे दूँगा, अपने सभी वर्षों को और पूरे जीवन के प्रयासों को तुम्हें समर्पित कर दूँगा।" जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति अनंत प्रेम होगा और सच्ची आज्ञाकारिता होगी। क्या तुम्हें कभी भी ऐसा एक अनुभव हुआ है? यदि लोगों को अक्सर परमेश्वर के आत्मा द्वारा छुआ जाता है, तो वे अपनी प्रार्थनाओं में खुद को परमेश्वर के प्रति विशेष रूप से समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारी महिमा का दिन देखना चाहता हूँ, और मैं तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ—तुम्हारे लिए जीने के मुकाबले और कुछ भी ज्यादा योग्य या सार्थक नहीं है, और मुझे शैतान और देह के लिए जीने की थोड़ी-सी भी इच्छा नहीं है। तुम मुझे आज अपने लिए जीने की खातिर सक्षम बनाकर जागृत कर लो।" जब तुम इस तरह से प्रार्थना कर लेते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को अपना दिल दिए बिना नहीं रह सकते, कि तुम्हें परमेश्वर को प्राप्त करना ही होगा, और तुम जीते-जी परमेश्वर को पा लेने के बिना ही मर जाने से नफरत करोगे। ऐसी प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारे भीतर एक अक्षय ताकत होगी, और तुम नहीं जान पाओगे कि यह कहाँ से आती है; तुम्हारे हृदय के अंदर एक असीम शक्ति होगी, और तुम्हें एक आभास होगा कि परमेश्वर बहुत मनोहर है, और वह प्रेम करने के योग्य है। यह तब होता है जब तुम परमेश्वर द्वारा छू लिए जाओगे। क्योंकि जिन सभी लोगों को इस तरह का अनुभव हुआ है, वे सभी परमेश्वर के द्वारा छू लिए गए हैं। जिन लोगों को परमेश्वर अक्सर छूता है, उनके जीवन में परिवर्तन हो जाते हैं, वे अपने संकल्प को बनाने में सक्षम हो जाते हैं और परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए तैयार होते हैं, उनके दिल में परमेश्वर के लिए प्रेम अधिक मजबूत होता है, उनके दिल पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ चुके होते हैं, उन्हें परिवार, दुनिया, उलझनों, या अपने भविष्य की कोई परवाह नहीं होती, और वे परमेश्वर के लिए जीवन भर के प्रयासों को समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं। वे सभी जिन्हें परमेश्वर के आत्मा ने छुआ है, वे ऐसे लोग होते हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, और जो परमेश्वर द्वारा परिपूर्ण किये जाने की आशा रखते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 397

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छापूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आस-पास ही केन्द्रित होना चाहिए। यदि तुम्हारे समागम और अनुसरण परमेश्वर के वचनों के आसपास केन्द्रित नहीं होते हैं, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो, और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से वंचित हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिन्हों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता है, और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वे भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक बड़ी बाधा होंगी। वे सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के नक़्शेकदम पर चलते थे, फिर भी वे आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं, और जो परमेश्वर के नक्शेकदम पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँ कहीं भी ले जाए वे उसका अनुसरण करते ही हैं—वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है, और चाहे वे कितना भी काम करें, या उनकी पीड़ा कितनी भी बड़ी हो, या वे कितनी ही भाग-दौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं है, और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज, जो लोग परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वे पवित्र आत्मा की धारा में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वे पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, और परमेश्वर की सराहना ऐसे लोगों के लिए नहीं है। वह सेवा जो पवित्र आत्मा की वर्तमान उक्तियों से विभाजित हो, वह देह की और धारणाओं की सेवा है, और यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होने में असमर्थ है। यदि लोग धार्मिक अवधारणाओं में रहते हैं, तो वे ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के लिए उपयुक्त हो, और भले ही वे परमेश्वर की सेवा करें, वे अपनी कल्पना और अवधारणाओं के घेरे में सेवा करते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके दिल के मुताबिक हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता है जो कि धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वे अवधारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा दखल देती है और परेशान करती है, और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरूद्ध चलती है। इस प्रकार जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं, और वे परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं। "पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण" करने का मतलब है आज परमेश्वर की इच्छा को समझना, परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञापालन करने में सक्षम होना, और परमेश्वर के नवीनतम कथनों के अनुसार प्रवेश करना। केवल ऐसा व्यक्ति ही है जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा की धारा में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने के लिए सक्षम हैं, बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से परमेश्वर के स्वभाव को भी जान सकते हैं, और मनुष्य की अवधारणाओं और अवज्ञा को, मनुष्य के प्रकृति और सार को भी, परमेश्वर के नवीनतम कार्य से जान सकते हैं; इसके अलावा, वे अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं, और जो वास्तव में सही राह को हासिल कर चुके हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य से हटा दिए गए हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसे लोग खुले आम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं कि परमेश्वर ने नया कार्य किया है, और परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर का खुले आम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिससे वे स्वयं के लिए परमेश्वर की घृणा और अस्वीकृति उत्पन्न करते हैं। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोग स्वेच्छापूर्वक परमेश्वर के कार्य का अनुसरण कर पाते हैं और परमेश्वर के कार्य की तलाश कर सकते हैं, तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वे पवित्र आत्मा के प्रबोधन या परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं; इस प्रकार, लोगों को परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त होता है या नहीं, यह परमेश्वर की कृपा पर निर्भर करता है, यह उनके अनुसरण पर निर्भर करता है, और यह उनके इरादों पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 398

वे सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा की वर्तमान उक्तियों का पालन करने में सक्षम हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे थे, या उनके भीतर पवित्र आत्मा कैसे कार्य किया करता था—जिन्होंने नवीनतम कार्य को प्राप्त किया है वे सबसे अधिक धन्य हैं, और जो लोग आज के नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर सकते हैं, वे हटा दिए जाते हैं। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी को स्वीकार करने में सक्षम हैं, और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जान लेते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को शुद्ध कुँवारी होना चाहिए? एक शुद्ध कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य की तलाश करने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी अवधारणाओं को दूर करने और परमेश्वर के आज के कार्य का अनुसरण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोगों को, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर ने युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किया था, और वे सभी लोगों में सबसे अधिक धन्य हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज सुनते हो, और परमेश्वर की उपस्थिति का दर्शन करते हो, और इस तरह, समस्त स्वर्ग और पृथ्वी में, और सारे युगों में, कोई भी तुम सब से, लोगों के इस समूह से, अधिक धन्य नहीं है। यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण है, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण और चयन के कारण, और परमेश्वर की कृपा के कारण है; अगर परमेश्वर ने बात नहीं की होती और अपने वचनों को नहीं कहा होता, तो क्या तुम लोगों की परिस्थितियाँ वैसी होतीं जैसी कि आज हैं? इस प्रकार, सभी महिमा और प्रशंसा परमेश्वर की हो, क्योंकि यह सब इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने तुम लोगों को उठाया है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, क्या तुम अभी भी निष्क्रिय हो सकोगे? क्या तुम्हारी शक्ति अभी भी उठने में असमर्थ होगी?

तुम्हारा परमेश्वर के शब्दों के न्याय, ताड़ना, प्रहार, और शुद्धिकरण को स्वीकार करने में सक्षम होना, और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, समय की शुरुआत में परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था, और इस प्रकार जब तुम्हें प्रताड़ित किया जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है, और तुम सब के भीतर जो आशीर्वाद दिए गए हैं उन्हें कोई भी दूर नहीं कर सकता है, और जो सब तुम सभी को दिया गया है वह कोई भी छीन कर नहीं ले जा सकता है। धर्म के लोग तुम सब के साथ तुलना में ठहर नहीं सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं हैं, और तुम सब धार्मिक सिद्धांत से लैस नहीं हो, परन्तु चूँकि परमेश्वर ने तुम सभी के भीतर कार्य किया है, तुम लोगों ने सारे युगों में अन्य किसी से भी ज्यादा लाभ पाया है—और इसलिए यह तुम लोगों का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। इस वजह से, तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक समर्पित होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति और भी अधिक निष्ठावान। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को संभालना होगा, और परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करने के लिए अपने कद को तैयार करना होगा। परमेश्वर द्वारा दी गई जगह में तुम्हें दृढ़ खड़ा होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का अनुसरण करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा विजित होना चाहिए और अंततः परमेश्वर का एक गौरवपूर्ण गवाही बनना चाहिए। क्या ये संकल्प तुम्हारे पास हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त होगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 399

आज पवित्र आत्मा के वचन पवित्र आत्मा के कार्य का गतिविज्ञान हैं और इसके दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य का निरंतर प्रबोधन, पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति है। और आज पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति क्या है? यह आज परमेश्वर के कार्य और एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में दर्ज होने में लोगों का नेतृत्व करना है। सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के कई चरण हैं:

1. सबसे पहले, तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में उड़ेल देना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के अतीत के वचनों का अनुसरण नहीं करना चाहिए, और न तो उनका अध्ययन करना चाहिए और न ही आज के वचनों से उनकी तुलना करनी चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूरी तरह से परमेश्वर के वर्तमान वचनों में अपना दिल उड़ेल देना चाहिए। अगर ऐसे लोग हैं जो अभी भी अतीत काल के परमेश्वर के वचन, आध्यात्मिक किताबें, या प्रचार-प्रसार के अन्य विवरणों को पढ़ना चाहते हैं, जो आज पवित्र आत्मा के वचनों का पालन नहीं करते हैं, तो वे सभी लोगों में सबसे अधिक मूर्ख हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। यदि तुम आज पवित्र आत्मा का प्रकाश स्वीकार करने के लिए तैयार हो, तो फिर अपने दिल को आज परमेश्वर की उक्तियों में उड़ेल दो। यह पहली चीज़ है जो तुम्हें हासिल करनी है।

2. तुम जिन मानकों की पूर्ति का अनुसरण करना चाहते हो, उनकी स्थापना करते हुए, तुम्हें आज परमेश्वर की ओर से कहे गए वचनों की नींव पर प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करना और परमेश्वर के साथ समागम करना चाहिए, और परमेश्वर के सामने अपने संकल्पों को तय करना चाहिए।

3. पवित्र आत्मा के आज के कार्य की नींव पर तुम्हें सच्चाई में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। अतीत की पुरानी उक्तियों और सिद्धांतों को थामे न रहो।

4. तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किये जाने की और परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने की खोज करनी चाहिए।

5. जिस पथ पर आज पवित्र आत्मा चलता है, उसी पथ में प्रवेश करने का अनुसरण करना चाहिए।

और तुम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किये जाने की खोज कैसे करोगे? जो अत्यंत महत्वपूर्ण है वह है परमेश्वर के वर्तमान वचनों में जीना और परमेश्वर की अपेक्षाओं की नींव पर प्रार्थना करना। इस तरह से प्रार्थना कर चुकने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करना निश्चित है। यदि तुम आज परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव के आधार पर खोज नहीं करते हो, तो यह व्यर्थ है। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, और कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ, और मैं तुम्हारा बहुत ऋणी हूँ; मैं बहुत ही अवज्ञाकारी हूँ, और तुम्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकता। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बचा लो, मैं अंत तक तुम्हारी बहुत सेवा करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारे लिए मर जाना चाहता हूँ। तुम मुझे न्याय और ताड़ना देते हो, और मुझे कोई शिकायत नहीं है; मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं मर जाने के योग्य हूँ, ताकि मेरी मृत्यु में सभी लोग तुम्हारा धर्मी स्वभाव देख सकें।" जब तुम इस तरह से अपने दिल से प्रार्थना करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें सुनेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; यदि तुम आज पवित्र आत्मा के वचनों की नींव पर प्रार्थना नहीं करते हो, तो पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें छूने की कोई संभावना नहीं है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और आज परमेश्वर जो करना चाहते हैं, उसके अनुसार प्रार्थना करते हो, तो तुम कहोगे "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे आदेशों को स्वीकार करना चाहता हूँ और तुम्हारे आदेशों के प्रति निष्ठा रखना चाहता हूँ, और मैं अपना पूरा जीवन तुम्हारी महिमा को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ, ताकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमेश्वर के लोगों के मानकों तक पहुंच सकें। काश मेरा दिल तुम्हारे स्पर्श को पा ले। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा आत्मा सदैव मेरा प्रबोधन करे, ताकि मैं जो कुछ भी करूँ वह शैतान को शर्मिंदा करे, ताकि मैं अंततः तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया जा सकूँ।" यदि तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, परमेश्वर की इच्छा के आसपास केंद्रित रह कर, तो पवित्र आत्मा अपरिहार्य रूप से तुम में काम करेगा। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं में कितने शब्द हैं—कुंजी यह है कि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझते हो या नहीं। तुम सभी के पास निम्न-लिखित अनुभव हो सकता है: कभी-कभी, एक सभा में प्रार्थना करते समय, पवित्र आत्मा के कार्य का गति-सिद्धांत अपने चरम बिंदु तक पहुंच जाता है, जिससे सभी की ताकत बढ़ती है। कुछ लोग कस के बिलखते हैं और प्रार्थना करते समय आँसुओं से रोते हैं, परमेश्वर के सामने पश्चाताप से अभिभूत होकर, तो कुछ लोग अपना संकल्प दिखाते हैं, और प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त होने वाला प्रभाव ऐसा है। आज, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों में अपने दिलों को पूरी तरह से उड़ेल दें। उन शब्दों पर ध्यान न दो जो पहले बोले गए थे; यदि तुम अभी भी उसे थामे रहोगे जो कि पहले आया था, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करेगा। क्या तुम देख रहे हो कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

क्या तुम सब उस मार्ग को जानते हो जिस पर पवित्र आत्मा आज चला है? ऊपर दी गयी विभिन्न बातें वो हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा आज और भविष्य में पूरी की जानी हैं; यही वह मार्ग है जो पवित्र आत्मा ने लिया है, और यही वह प्रवेश है जो मनुष्य द्वारा अनुसरित किया जाना चाहिए। जीवन में तुम्हारे प्रवेश में, कम से कम तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में उड़ेल देना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारे दिल को परमेश्वर के लिए तरसना चाहिए, तुम्हें सच्चाई में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है, और तुम्हारा दिल परमेश्वर की ओर मुड़ना शुरू कर चुका है।

जीवन में प्रवेश करने का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना दिल उड़ेल देना है, और दूसरा कदम पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किये जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किये जाने को स्वीकार करने से प्राप्त किया जाना है? एक अधिक गहन सत्य की खोज करना, जांच करना, उसके लिए तरसना और सकारात्मक व्यवहार के रूप में परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए सक्षम होना। आज तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, जिसका अर्थ है कि तुम्हारी खोज, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों के सम्बन्ध में तुम्हारे समागम का एक उद्देश्य है, और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करते हो—केवल यही है परमेश्वर के साथ सहयोग करना। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न ही प्रार्थना करते हो या न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे पास कोई भी सहयोग नहीं है, और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका कि एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं: "सब कुछ परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया, तो मनुष्य कैसे कर सकता था?" परमेश्वर का कार्य सामान्य है, और ज़रा भी अलौकिक नहीं है, और यह केवल तुम्हारी सक्रिय खोज के माध्यम से ही है कि पवित्र आत्मा कार्य करता है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए, और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते हो, और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के लिए काम करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग द्वारा परमेश्वर के स्पर्श को हासिल करने की तलाश करोगे? प्रार्थना के माध्यम से, और परमेश्वर के करीब आकर। परन्तु याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, इसे परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर द्वारा अक्सर छु लिए जाते हो, तो तुम शरीर के गुलाम नहीं बनते: पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बेड़ियों से बाँधने में असमर्थ होते हैं, और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो आज़ादी के क्षेत्र में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 400

परमेश्वर ने निश्चय ही मनुष्यों को पूर्ण करने का निर्णय कर लिया है। वह चाहे किसी भी दृष्टिकोण से कहे, सब बातें इन लोगों को पूर्ण बनाने के लिये हैं। आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गये वचन मनुष्यों के समझने में कठिन होते हैं और मनुष्यों को उन पर अमल करने का मार्ग नहीं मिलता, क्योंकि मनुष्य की ग्रहण करने की क्षमता सीमित है। परमेश्वर के कार्य के विभिन्न प्रभाव होते हैं और उसके कार्य के प्रत्येक चरण का एक उद्देश्य है। साथ ही मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिये उसे अलग-अलग दृष्टिकोण से बात करनी होगी। यदि वह केवल पवित्रात्मा के ही दृष्टिकोण से बातचीत करे, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा नहीं हो सकता है। उसके बात करने के ढंग से तुम जान सकते हो कि वह इस जनसमूह के लोगों को पूर्ण करने के लिये दृढ़ संकल्पित है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें पहला कदम क्या लेना चाहिये? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के काम के बारे में जानना चाहिये। अब नये-नये साधनों का परमेश्वर के कार्यों में उपयोग किया जा रहा है, युग रूपांतरित हो गया है, परमेश्वर जिस तरह से काम करता है वो भी बदल गया है और परमेश्वर के बोलने का ढंग भी अलग है। वर्तमान में न केवल परमेश्वर के कार्य के साधन बदले हैं, बल्कि युग भी बदल गया है। अभी राज्य का युग है और यह परमेश्वर से प्रेम करने का युग भी है। यह सहस्राब्दिक राज्य के युग—जो कि वचन का युग भी है—का पूर्वदर्शन है, अर्थात वह युग जिसमें परमेश्वर मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिए बहुत तरीकों से बोलता है और मनुष्य को आपूर्ति करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है। जैसे-जैसे समय सहस्राब्दिक राज्य के युग में बदलेगा, परमेश्वर मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिये वचन का उपयोग करना आरंभ करेगा, मनुष्यों को जीवन की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिये योग्य बनायेगा और सही मार्ग पर उनकी अगुवाई करेगा। मनुष्यों ने परमेश्वर के कार्य के बहुत से चरणों का अनुभव किया है और यह देखा है कि परमेश्वर का कार्य बिना बदले नहीं रहता। बल्कि यह कार्य लगातार बढ़ता और गहरा होता जाता है। लोगों द्वारा इतने लंबे समय तक अनुभव करने के बाद, परमेश्वर का कार्य बदला है और बार-बार बदल रहा है। परंतु परिवर्तन चाहे जितना भी हो, वह मनुष्यों तक उद्धार लाने के परमेश्वर के उद्देश्य से कभी नहीं भटकता है। यहां तक कि दस हजार परिवर्तनों के बाद भी उसका मूल उद्देश्य नहीं बदला। परमेश्वर के कार्य करने का तरीका चाहे जैसे भी बदले। यह काम कभी सत्य या जीवन से अलग नहीं होता। जिन साधनों से काम किया जाता है, उनसे भी केवल कार्य के प्रारूप और बोलने के तरीके या दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है, उसके कार्य के केन्द्रीय उद्देश्य में परिवर्तन नहीं आया है। बोलने के स्वर और कार्य के माध्यम या साधनों में परिवर्तन का उद्देश्य कार्य में प्रभावशीलता लाना है। आवाज़ के स्तर पर परिवर्तन का अर्थ कार्य के उद्देश्य या सिद्धांत में परिवर्तन करना नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखने में मनुष्य का मूल उद्देश्य जीवन खोजना है। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो परंतु जीवन या सत्य या परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, तब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास नहीं है! तुम अभी भी राज्य में राजा बनने के लिये प्रवेश करना चाहते हो—क्या यह वास्तविक है? जीवन खोजने के द्वारा परमेश्वर के लिये सच्चे प्रेम को प्राप्त करना ही वास्तविकता है; सत्य का अनुसरण करना और सत्य पर अमल करना सब वास्तविकता है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय उसके वचनों का अनुभव करो; ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करोगे। यही वास्तव में सच्चा अनुसरण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 401

अभी राज्य का युग है। तुमने इस नये युग में प्रवेश किया है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुमने वास्तव में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं और उसके वचन तुम्हारे जीवन की वास्तविकता बन चुके हैं या नहीं। परमेश्वर का वचन सभी को बताया गया है ताकि सभी लोग अंत में, वचन के संसार में जिएँ और परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से प्रबुद्ध और रोशन कर देगा। यदि इस कालखण्ड के दौरान, तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ने में जल्दबाज और लापरवाह हो और उसके वचन में तुम्हारी रुचि नहीं है तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी स्थिति में कहीं कुछ गड़बड़ है। यदि तुम वचन के युग में प्रवेश करने में असमर्थ हो तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करता है; यदि तुम इस युग में प्रवेश कर चुके हो तो वह तुम में अपना काम करेगा। तुम इस समय क्या कर सकते हो, जबकि वचन के युग का आरंभ हुआ है ताकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सको? इस युग में परमेश्वर इसे तुम्हारे बीच वास्तविकता बनाएगा कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जियेगा, सत्य पर अमल करने योग्य बनेगा और ईमानदारीपूर्वक परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचन को नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में ग्रहण करें, उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति आदर हो और परमेश्वर के वचन पर अमल करके मनुष्य परमेश्वर के साथ मिलकर राज्य करे। परमेश्वर अपने इस कार्य को संपन्न करेगा। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? ऐसे बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे एक दिन या दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन अवश्य पढ़ना चाहिये और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना ही काफी है। यही भाव मनुष्य को पवित्र आत्मा की ओर से मिलता है। इस प्रकार वो मनुष्य को प्रेरित करता है, अर्थात पवित्र आत्मा वचन के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करे। यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना बस एक ही दिन में तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, तुम्हें यह अस्वीकार्य लगता है, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे अलग नहीं हुआ है। तब तुम इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम में कोई भाव पैदा न हो या तुम्हें भूख-प्यास न लगे, तुम द्रवित महसूस न करो तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुम से दूर जा चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है और तुम पीछे छूट गये हो। परमेश्वर मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिये वचन का उपयोग करता है; तुम जब वचन को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, यदि अच्छा महसूस नहीं होता, तब तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।" यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह तुम लोगों को इस सत्य का अनुभव करायेगा। ऐसा कैसे होता था कि प्राचीन समय में लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सब मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है, पूर्ण बनाया जाता है और तब अंत में राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्यों को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्यों को ज्योति और अमल करने का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। यदि तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं छोड़ते तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने का कार्य कर पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 402

जीवन की खोज करते हुये कोई सफल होने के लिये जल्दबाजी नहीं कर सकता, जीवन में उन्नति या विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यवहारिक है और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होता है। यीशु के देहधारण करने के बाद क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में यीशु को 33.5 वर्ष लगे, तो मनुष्य को शुद्ध करने और उसका जीवन रूपांतरित करने के बारे में यह कितना सटीक होगा! यह अत्यंत ही मुश्किल कार्य है। एक सामान्य व्यक्ति बनना, जो परमेश्वर को अभिव्यक्त करता हो, आसान काम नहीं है। यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देश में जन्मे लोगों के लिये और भी कठिन है, जिनकी क्षमता कम है, जिन्हें लंबे समय से परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिये परिणाम पाने के लिये जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिये कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, परमेश्वर के वचनों में तब तुम्हें ज्ञान, अंर्तदृष्टि, परख और बुद्धि प्राप्त होगी। और इनके द्वारा तुम समझ भी नहीं पाओगे परंतु तुम बदलते जाओगे। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और पढ़ने का सिद्धांत बना लो, उसे जानने लगो, अनुभव करने लगो, अमल में लाने लगो तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम उन्नति करने लगोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित स्थिति तक पहुंच जाओगे तो तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता का सहयोग या आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें जान लेना चाहिये कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति क्या है, तुम जिन पर अमल कर सकते हो, अमल करो और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले न बनो। केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस बारे में चिन्ता न करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार न करो। केवल परमेश्वर के वचनों का खान-पान करो, जब वह तुम्हारे सामने आएगा तो यह बात निश्चित है कि परमेश्वर तुम्हें अवश्य पूरा करेगा। हालांकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक नियम है। आंखें मूंद करके यह न करो, बल्कि एक ओर उन शब्दों को खोजो जिन्हें तुम्हें जानना चाहिये, अर्थात उन्हें जिनका संबंध दर्शन से है, और दूसरी ओर उसे खोजो जिस पर वास्तव में तुम्हें अमल करना चाहिए, अर्थात उसे खोजो जिसमें तुम्हें प्रवेश करना चाहिये। एक पहलू ज्ञान का है और दूसरा उसमें प्रवेश करने का है। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम उसे समझ लेते हो जिसे तुम्हें जानना चाहिये और जिस पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लोगे कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाया और पिया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 403

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना वह सिद्धांत है जिसके द्वारा तुम्हें बोलना चाहिये। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तब तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करनी चाहिये, उसी के विषय पर बातचीत करनी चाहिये; इस बारे में बात करो कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, तुम सब उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करते हो तो पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन का संसार को अस्तित्व में लाने के लिए मनुष्य का सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर तुम में अपना काम नहीं कर सकता। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर सकता है। जब भी तुम खाली हो, तो परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ बातें न करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। भले ही तुम्हारी सहभागिता सतही हो, सब ठीक है। यदि सतही नहीं होगी तो गहराई भी नहीं होगी। एक प्रक्रिया है जिससे अवश्य गुजरना होगा। तुम्हारे अभ्यास करने पर तुम पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें दी गई रोशनी को तुम समझ लेते हो और यह भी सीखते हो कि परमेश्वर के वचन को प्रभावशाली रूप में कैसे खाएं-पिएं। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करते हो तभी पवित्र आत्मा का कार्य तुम में होगा।

परमेश्वर के वचन को खाने-पीने के सिद्धांत के दो पहलू हैं: एक का संबंध ज्ञान से है और दूसरे का संबंध प्रवेश करने से है। तुम्हें कौन से वचन जानने चाहिये? तुम्हें दर्शन से जुड़े वचन जानने चाहिये (जैसे कि परमेश्वर का कार्य अब किस युग में प्रवेश कर चुका है, अब परमेश्वर क्या प्राप्त करना चाहता है, देहधारण क्या है और ऐसी अन्य बातें, ये सभी बातें दर्शन से संबंधित हैं)। उस मार्ग के क्या मायने हैं जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिये? यह परमेश्वर के उन वचनों का उल्लेख करता है जिन पर मनुष्य को अमल करना और चलना चाहिये। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के ये दो पहलू हैं। अब से, तुम परमेश्वर के वचन को इसी तरह खाओ-पियो। यदि तुम्हें दर्शन के बारे में वचनों की स्पष्ट समझ है तो सब समय पढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है। मुख्य बात है प्रवेश करने से संबंधित वचनों को अधिक खाना और पीना, जैसे कि किस प्रकार परमेश्वर की ओर अपने हृदय को मोड़ना है, किस प्रकार परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है, कैसे शरीर का परित्याग करना है। यही सब है जिस पर तुम्हें अमल करना है। परमेश्वर के वचन को कैसे खाये-पियें यह जाने बिना असली सहभागिता संभव नहीं है। जब एक बार तुम जान लेते हो कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाएं-पियें और तुम समझ जाते हो कि कुंजी क्या है तो सहभागिता तुम्हारे लिये आसान होगी। जो भी मसले उठेंगे, तुम उनके बारे में सहभागिता कर पाओगे और वास्तविकता को समझ लोगे। बिना वास्तविकता के परमेश्वर के वचन से सहभागिता करने का अर्थ है, तुम यह समझ पाने में असमर्थ हो कि कुंजी क्या है, यह बात दर्शाती है कि तुम परमेश्वर के वचन को खाना-पीना नहीं जानते। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते समय थकान का अनुभव करते हैं। यह दशा सामान्य नहीं है। वास्तव में सामान्य बात यह है कि परमेश्वर का वचन पढ़ते हुए तुम कभी थकते नहीं, सदैव उसकी भूख-प्यास बनी रहती है, तुम सदैव सोचते हो कि परमेश्वर का वचन भला है। और वह व्यक्ति जो सचमुच प्रवेश कर चुका है वह परमेश्वर के वचन को ऐसे ही खाता-पीता है। जब तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर का वचन सचमुच व्यवहारिक है और मनुष्य को इसमें प्रवेश करना ही चाहिये; जब तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिये बहुत ही अधिक सहायक और लाभदायक है, यह मनुष्य को जीवन देता है, यह भावना तुम्हें पवित्र आत्मा देता है, तुम्हारे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किये जाने के माध्यम से। यह बात साबित करती है कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है और परमेश्वर ने तुमसे मुख नहीं मोड़ा है। यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से थक जाते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने या न पढ़ने का कोई परिणाम नहीं होता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनका हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करता, ऐसे लोगों में पूर्ण बनाए जाने की भूख-प्यास नहीं होती और न ही वे इसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुम में परमेश्वर के वचन की प्यास नहीं है तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। अतीत में, परमेश्वर तुमसे कहीं विमुख तो नहीं हो गया है, उसका पता इस बात से चलता था कि तुम्हारे भीतर शांति है या नहीं और तुम आनंद का अनुभव कर रहे हो या नहीं। अब यह इस बात से पता चलता है कि तुममें वचन की प्यास है या नहीं। क्या उसके वचन तुम्हारी वास्तविकता हैं, क्या तुम निष्ठावान हो और क्या तुम वह करने योग्य हो जो तुम परमेश्वर के लिये कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के द्वारा जांचा-परखा जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को सभी मनुष्यों की ओर भेजता है। यदि तुम उसे पढ़ने के लिये तैयार हो तो वह तुम्हें रोशन करेगा, यदि तुम तैयार नहीं हो तो वह तुम्हें रोशन नहीं करेगा। परमेश्वर उन्हें रोशनी देता है जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और परमेश्वर को खोजते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने वचन पढ़ने के बाद भी उन्हें रोशन नहीं किया। परमेश्वर के वचनों को तुमने कैसे पढ़ा था? यदि तुमने उसके वचनों को इस ढंग से पढ़ा जैसे किसी घुड़सवार ने घोड़े पर बैठे-बैठे फूलों को देखा और वास्तविकता को कोई महत्व नहीं दिया तो परमेश्वर कैसे तुम्हें रोशन कर सकता है? कैसे वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखता परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है? यदि तुम परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखते, तब तुम्हारे पास न तो सत्य होगा और न ही वास्तविकता होगी। यदि तुम उसके वचन को संजो कर रखते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास कर पाओगे; और तब ही तुम वास्तविकता को पाओगे। इसलिये स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिये, तुम चाहे व्यस्त हो या न हो, परिस्थितियां विपरीत हों या न हों, चाहे तुम परखे जा रहे हो या नहीं परखे जा रहे हो। कुल मिलाकर परमेश्वर का वचन मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। कोई भी उसके वचन से विमुख नहीं हो सकता, उसके वचन को ऐसे खाना होगा मानो वे दिन में तीन बार भोजन करते हैं। क्या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना और प्राप्त किया जाना इतना आसान हो सकता है? अभी तुम इसे समझो या न समझो, तुम्हारे भीतर परमेश्वर के कार्य को समझने की अंर्तदृष्टि हो या न हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को अधिक से अधिक खाना और पीना चाहिये। यह तत्परता और क्रियाशीलता के साथ प्रवेश करना है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, जिसमें प्रवेश कर सको उस पर अमल करने की तत्परता दिखाओ, तुम जो नहीं कर सकते, उसे कुछ समय के लिये दरकिनार कर दो। आरंभ में हो सकता है, परमेश्वर के बहुत से वचन तुम समझ न पाओ, पर दो या तीन माह बाद या फिर एक वर्ष के बाद तुम समझने लगोगे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिये है क्योंकि परमेश्वर एक या दो दिन में मनुष्य को पूर्ण नहीं कर सकता। अधिकतर समय, जब तुम परमेश्वर का वचन पढ़ते हो, तुम उस समय उसे नहीं समझ पाओगे। उस समय वह तुम्हें लिखित पाठ से अधिक प्रतीत नहीं होगा; केवल कुछ समय के अनुभव के बाद ही तुम उसे समझने योग्य बन जाओगे। परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है इसलिए उसके वचन को खाने-पीने के लिये तुम्हें अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिये। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम समझने लगोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करेगा। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को रोशन करता है, तब अक्सर मुनष्य को उसका ज्ञान नहीं होता। वह तुम्हें रोशन करता है और मार्गदर्शन देता है जब तुम उसके प्यासे होते हो, उसे खोजते हो। पवित्र आत्मा जिस सिद्धांत पर कार्य करता है वह परमेश्वर के वचन पर केंद्रित होता है जिसे तुम खाते और पीते हो। वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं, लापरवाही का और यह विश्वास करते हैं कि वे वचन को पढ़ें या न पढ़ें कुछ फर्क नहीं पड़ता, वे हैं जो वास्तविकता नहीं जानते। उन व्यक्तियों में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा की गई रोशनी दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति बस साथ-साथ चलते हैं, वे बिना उचित योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले लोग हैं, जैसे कि एक दृष्टांत में[क] नैनगुओ थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में, "दृष्टांत में" यह वाक्यांश नहीं है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 404

जब परमेश्वर बोलता है तब तुम्हें तुरंत उसके वचनों को स्वीकार करना और उन्हें खाना और पीना चाहिये। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना समझे, इस विचारधारा को अपनाओ कि तुम वचन को खाने और पीने, उसे जानने और उसके वचन पर अमल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे। तुम्हें यही करना चाहिये। इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारा कद कितना बड़ा हो जायेगा; केवल परमेश्वर के वचन को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करो। इसी तरह से मनुष्यों को परमेश्वर का सहयोग करना चाहिये। तुम्हारा आत्मिक जीवन मुख्यतः उस वास्तविकता में प्रवेश करना है, जहां तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ पीओ और उन पर अमल करो। तुम्हें अन्य किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिये। कलीसिया के अगुवाओं को इस बारे में सभी भाई-बहनों की अगुवाई करने में सक्षम होना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन को कैसे खाएं-पियें। यह सभी कलीसियाई अगुवाओं की जिम्मेवारी है। वे चाहे युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने-पीने को महत्व देना चाहिये और उन वचनों को अपने हृदय में रखना चाहिये। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हो तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर लोगे। आजकल बहुत से हैं जो महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना नहीं रह सकते और समय चाहे जैसा भी हो, वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर का वचन नया है। इसके मायने हैं कि मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ कर रहा है। परमेश्वर मनुष्यों में काम करने और उनकी आपूर्ति करने के लिये वचन का उपयोग करता है। जब सब लोग परमेश्वर के वचन की लालसा और प्यास रखते हैं तो वे परमेश्वर के वचन के संसार में प्रवेश करेंगे।

परमेश्वर बहुत बातें कह चुका है। तुमने कितना ज्ञान पाया है? तुमने कितने में प्रवेश पाया है? यदि कलीसिया के अगुवाओं ने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में अगुवाई नहीं की है तो वे अपने कर्तव्य पालन में चूक गये हैं और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हुये हैं! चाहे तुम्हारी समझ गहन हो या सतही, तुम्हारी समझ के स्तर की परवाह किए बिना, तुम्हें अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि उसके वचनों को कैसे खाया और पीया जाए, तुम्हें उसके वचनों की ओर बहुत ध्यान अवश्य देना चाहिए और उन्हें खाने-पीने के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझना चाहिये। परमेश्वर ने बहुत कुछ कह दिया है। यदि तुम उसके वचन को नहीं खाते-पीते, उसे खोजते नहीं या उस पर अमल नहीं करते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो। क्योंकि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन पर अमल नहीं कर सकते या वास्तविकता उत्पन्न नहीं कर सकते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना, परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह, तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में रहो तो क्या यह विश्वास माना जायेगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास रखना वास्तव में क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, सम्प्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर दोनों तरफ परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार इन्सान को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

वचन के युग अर्थात् सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से वचन की सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से ही तुम परमेश्वर के वचन को जीने में समर्थ हो सकते हो। तुम्हें कुछ स्वाभाविक अनुभव पेश करने होंगे ताकि दूसरे लोग तुम्हारे कायल हो सकें। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं जी सकते तो किसी को भी यकीन नहीं दिलाया जा सकता! परमेश्वर द्वारा उपयोग किये जाने वाले सब लोग वे होते हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए इस वास्तविकता को पेश नहीं कर सकते तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गये हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की प्यास रखता हो? वे जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, वे सत्य के लिये प्यासे हैं और केवल ऐेसे ही लोग परमेश्वर के द्वारा अशीषित हैं। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत-सी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद अन्य अन्य-जाति राष्ट्रों से बातें करेगा, उन तक अपनी वाणी पहुँचाएगा और उन्हें जीतेगा। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किये जायेंगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव घटता है, उसमें इंसानियत का प्रकटन होता है और मनुष्य का विद्रोही स्वभाव भी कम होता है। वचन मनुष्यों में अधिकार के साथ काम करता है और परमेश्वर की ज्योति में मनुष्यों को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करेगा, उसके कार्य का निर्णायक मोड़, सभी कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकता है। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने से, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके और अपने वास्तविक अनुभव से परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 405

मैंने पहले कहा है कि "वे सब, जो संकेत और चमत्कार देखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, त्याग दिए जाएँगे; ये वे लोग नहीं हैं, जो पूर्ण बनाए जाएँगे।" मैंने बहुत-से वचन कहे हैं, फिर भी मनुष्य को इस कार्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है, और इस बिंदु तक आकर, लोग अभी भी संकेतों और चमत्कारों के बारे में पूछते हैं। क्या परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास संकेतों और चमत्कारों की खोज से अधिक कुछ नहीं, या यह जीवन प्राप्त करने के उद्देश्य से है? यीशु ने भी बहुत-से वचन कहे थे और उनमें से कुछ अभी भी पूरे होने शेष हैं। क्या तुम कह सकते हो कि यीशु परमेश्वर नहीं है? परमेश्वर ने गवाही दी कि वह मसीहा और परमेश्वर का प्यारा पुत्र है। क्या तुम इस बात से इनकार कर सकते हो? आज परमेश्वर केवल वचन कहता है, और यदि तुम इसे पूरी तरह से नहीं जानते, तो तुम अडिग नहीं रह सकते। तुम उसमें इसलिए विश्वास करते हो क्योंकि वह परमेश्वर है, या फिर तुम उसमें इस आधार पर विश्वास करते हो कि उसके वचन पूरे होते हैं या नहीं? क्या तुम संकेतों और चमत्कारों पर विश्वास करते हो, या तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो? आज वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता—क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? यदि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे नहीं होते, तो क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? क्या परमेश्वर का सार इस बात से निश्चित होता है कि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे होते हैं या नहीं? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने से पहले सदैव उसके द्वारा कहे गए वचनों के पूरे होने की प्रतीक्षा करते हैं? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि वे परमेश्वर को नहीं जानते? ऐसी धारणाएँ रखने वाले लोग परमेश्वर को नकारते हैं। वे परमेश्वर को मापने के लिए धारणाओं का उपयोग करते हैं; यदि परमेश्वर के वचन पूरे हो जाते हैं तो वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और यदि वचन पूरे नहीं होते तो वे उसमें विश्वास नहीं करते; और वे सदैव संकेतों और चमत्कारों की खोज करते रहते हैं। क्या ये लोग आधुनिक युग के फरीसी नहीं हैं? तुम अडिग रहने में समर्थ हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम वास्तविक परमेश्वर को जानते हो या नहीं—यह महत्वपूर्ण है! परमेश्वर के वचनों की जितनी अधिक वास्तविकता तुममें होगी, परमेश्वर की वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक होगा, और परीक्षणों के दौरान उतना ही अधिक अडिग रहने में तुम समर्थ होगे। जितना अधिक तुम संकेत और चमत्कार देखने पर ध्यान दोगे, उतना ही कम तुम अडिग रहने में समर्थ होगे और परीक्षणों के बीच गिर जाओगे। संकेत और चमत्कार बुनियाद नहीं हैं; केवल परमेश्वर की वास्तविकता ही जीवन है। कुछ लोग उन प्रभावों को नहीं जानते, जो परमेश्वर के कार्य के द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। वे परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज न करते हुए भ्रांति में अपने दिन व्यतीत करते हैं। उनकी खोज का उद्देश्य सदैव परमेश्वर से केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करवाना होता है, और केवल तभी वे अपने विश्वास में गंभीर होते हैं। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर के वचन पूरे होंगे, तो वे जीवन की खोज करेंगे, किंतु यदि उसके वचन पूरे नहीं होते, तब उनके द्वारा जीवन की खोज किए जाने की कोई संभावना नहीं है। मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ संकेत और चमत्कार देखने और स्वर्ग तथा तीसरे स्वर्ग तक आरोहण करने की कोशिश करना है। उनमें से कोई यह नहीं कहता कि परमेश्वर पर उसका विश्वास वास्तविकता में प्रवेश करने की खोज करना, जीवन की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा जीते जाने की खोज करना है। ऐसी खोज का क्या मूल्य है? वे लोग, जो परमेश्वर के ज्ञान और उसकी संतुष्टि की खोज नहीं करते, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और जो ईशनिंदा करते हैं!

क्या अब तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है? क्या संकेत और चमत्कार देखना परमेश्वर पर विश्वास करना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग पर आरोहण करना है? परमेश्वर पर विश्वास ज़रा भी आसान नहीं है। उन धार्मिक अभ्यासों को निकाल दिया जाना चाहिए; रोगियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने का अनुसरण करना, प्रतीकों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना और परमेश्वर के अनुग्रह, शांति और आनंद का अधिक लालच करना, देह के लिए संभावनाओं और आराम की तलाश करना—ये धार्मिक अभ्यास हैं, और ऐसे धार्मिक अभ्यास एक अस्पष्ट प्रकार का विश्वास हैं। आज परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है, ताकि तुम परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सको, उससे प्रेम कर सको, और वह कर्तव्य निभा सको, जिसे परमेश्वर के एक प्राणी द्वारा निभाया जाना चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता का और इस बात का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर कितने आदर के योग्य है, कैसे अपने द्वारा सृजित प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—ये परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की एकदम अनिवार्य चीज़ें हैं। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह-उन्मुख जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है; भ्रष्टता के भीतर जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन के भीतर जीना है; यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह देह की आज्ञाकारिता को नहीं, बल्कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ होना है; यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने देना है, और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इसलिए है, ताकि परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पूर्ण कर सको, और परमेश्वर की योजना संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेत और चमत्कार देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की कोशिश के लिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने, और पतरस के समान मृत्यु तक परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही परमेश्वर में विश्वास करने के मुख्य उद्देश्य हैं। व्यक्ति परमेश्वर के वचन को परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, जिसके बाद ही तुम उसका आज्ञा-पालन कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान के साथ ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और यह वह लक्ष्य है, जिसे मनुष्य को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में रखना चाहिए। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम सदैव संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास कर रहे हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। परमेश्वर का उद्देश्य उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाने और उन्हें अपने भीतर पूरा करने से हासिल किया जाता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि तुम बिना शिकायत किए परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो, परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति विचारशील हो सकते हो, पतरस का आध्यात्मिक कद प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली ग्रहण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुम परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर चुके होगे, और यह इस बात का द्योतक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

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