III. अंत के दिनों में न्याय

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 77

मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं, तो उन्होंने शिकायत के बोल बोलने शुरू कर दिए, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया, और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मानवजाति अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से समर्पित होने में असमर्थ है? क्या यह ठीक उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुम्हारे हाथ अन्य सबके हाथों से ऊँचे उठे हुए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुम ऊँची आवाज़ में पुकार रहे थे : "परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! बूढ़े शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर दीन-हीन होकर सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूरा करे!" तुम्हारी पुकार अन्य सबसे ऊँची थीं। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर मनुष्यों का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुआ। फिर उनकी पुकार बंद हो गई और उनका संकल्प टूट गया। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह पाप से ज्यादा गहरी दौड़ रही है, इसे शैतान द्वारा स्थापित किया गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 78

"न्याय" शब्द का जिक्र होने पर संभवत: तुम उन वचनों के बारे में सोचोगे, जो यहोवा ने सभी स्थानों पर कहे थे और फटकार के जो वचन यीशु ने फरीसियों से कहे थे। अपनी समस्त कठोरता के बावजूद, ये वचन परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय नहीं थे; बल्कि वे विभिन्न परिस्थितियों, अर्थात् विभिन्न संदर्भों में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन हैं। ये वचन मसीह द्वारा अंत के दिनों में मनुष्यों का न्याय करते हुए कहे जाने वाले शब्दों से भिन्न हैं। अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है। अगर तुम इन सत्यों को महत्वपूर्ण नहीं समझते, अगर तुम सिवाय इसके कुछ नहीं समझते कि इनसे कैसे बचा जाए, या किस तरह कोई ऐसा नया तरीका ढूँढ़ा जाए जिनमें ये शामिल न हों, तो मैं कहूँगा कि तुम घोर पापी हो। अगर तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी तुम सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते, न ही उस मार्ग से प्यार करते हो, जो परमेश्वर के निकट लाता है, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो, जो महान श्वेत सिंहासन से भागता है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा, जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। ऐसे मनुष्य और भी अधिक कठोर दंड पाएँगे। जो लोग न्याय किए जाने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आते हैं, और इसके अलावा शुद्ध किए जा चुके हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। बेशक, यह कुछ ऐसा है, जो भविष्य से संबंधित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 79

न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। चूँकि न्याय सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना है, इसलिए परमेश्वर के अभी भी मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होने का सवाल ही नहीं उठता। अर्थात्, अंत के दिनों में मसीह दुनिया भर के लोगों को सिखाने के लिए और उन्हें सभी सच्चाइयों का ज्ञान कराने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है। कई लोगों में परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में बुरी भावना है, क्योंकि लोगों को यह बात मानने में कठिनाई होती है कि परमेश्वर न्याय का कार्य करने के लिए देह धारण करेगा। फिर भी, मुझे तुम्हें यह अवश्य बताना होगा कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत आगे तक जाता है, और मनुष्य के मन के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता है। क्योंकि लोग पृथ्वी पर मात्र कीड़े-मकौड़े हैं, जबकि परमेश्वर सर्वोच्च है जो ब्रह्मांड में समाया हुआ है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्डे के सदृश है, जो केवल कीड़े-मकोड़ों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का परिणाम है। लोग हमेशा परमेश्वर के साथ संघर्ष करने की कोशिश करते हैं, जिसके बारे में मैं कहता हूँ कि यह स्वत: स्पष्ट है कि अंत में कौन हारेगा। मैं तुम सबको समझा रहा हूँ कि अपने आपको स्वर्ण से अधिक मूल्यवान मत समझो। जब दूसरे लोग परमेश्वर का न्याय स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं? तुम दूसरों से कितने ऊँचे हो? अगर दूसरे लोग सत्य के आगे सिर झुका सकते हैं, तो तुम भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते? परमेश्वर के कार्य का वेग अबाध है। वह सिर्फ़ तुम्हारे द्वारा दिए गए "सहयोग" के कारण न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और तुम इतने अच्छे अवसर के हाथ से निकल जाने पर पछतावे से भर जाओगे। अगर तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है, तो फिर आकाश में स्थित उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा खुद पर "न्याय पारित किए जाने" की प्रतीक्षा करो! तुम्हें अवश्य पता होना चाहिए कि सभी इजराइलियों ने यीशु को ठुकराया और अस्वीकार किया था, और फिर भी यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य फिर भी पूरे ब्रह्मांड और पृथ्वी के के छोरों तक फैल गया। क्या यह परमेश्वर द्वारा बहुत पहले बनाई गई वास्तविकता नहीं है? अगर तुम अभी भी यीशु द्वारा स्वयं को स्वर्ग में ले जाए जाने का इंतज़ार कर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निर्जीव काष्ठ के बेकार टुकड़े हो।[क] यीशु तुम जैसे किसी भी झूठे विश्वासी को स्वीकार नहीं करेगा, जो सत्य के प्रति निष्ठाहीन है और केवल आशीष चाहता है। इसके विपरीत, वह तुम्हें हज़ारों वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

फुटनोट :

क. निर्जीव काष्ठ का टुकड़ा : एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—"सहायता से परे"।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 80

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 81

परमेश्वर किसी भी युग में अपने कार्य को दोहराता नहीं है। चूँकि अंत के दिन आ गए हैं, इसलिए वह उस कार्य को करेगा, जो वह अंत के दिनों में करता है, और अंत के दिनों के अपने संपूर्ण स्वभाव को प्रकट करेगा। अंत के दिनों के बारे में बात करना एक पृथक् युग को संदर्भित करता है, वह युग जिसमें यीशु ने कहा था कि तुम लोग अवश्य ही आपदा का सामना करोगे, और भूकंपों, अकालों और महामारियों का सामना करोगे, जो यह दर्शाएँगे कि यह एक नया युग है, और अब अनुग्रह का युग नहीं है। मान लो अगर, जैसा कि लोग कहते हैं, परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनशील हो, उसका स्वभाव हमेशा करुणामय और प्रेममय हो, वह मनुष्य से ऐसे ही प्यार करे जैसे वह स्वयं से करता है, और वह हर मनुष्य को उद्धार प्रदान करे और कभी भी मनुष्य से नफ़रत न करे, तो क्या उसका कार्य कभी समाप्त हो पाएगा? जब यीशु आया और उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो सभी पापियों के लिए स्वयं को बलिदान करके और स्वयं को वेदी पर चढ़ाकर उसने छुटकारे का कार्य पहले ही पूरा कर लिया था और अनुग्रह के युग को समाप्त कर दिया था। तो उस युग के कार्य को अंत के दिनों में दोहराने का क्या मतलब होता? क्या वही कार्य करना यीशु के कार्य को नकारना नहीं होगा? यदि परमेश्वर ने इस चरण में आकर सलीब पर चढ़ने का कार्य न किया होता, बल्कि वह प्रेममय और करुणामय ही बना रहता, तो क्या वह युग का अंत करने में समर्थ होता? क्या एक प्रेममय और करुणामय परमेश्वर युग का समापन करने में समर्थ होता? युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, ताकि वह सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय कर सके और उन लोगों को पूर्ण बना सके, जो सच्चे दिल से उसे प्यार करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ें उनके प्रकार के अनुसार अलग की जाएँगी और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाएँगी। यही वह क्षण है, जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को उजागर करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाता है, जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और समस्त मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार अलग किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँ। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपांतरित कर सकता है और उसे पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित कर सकता है। इसलिए, इसी तरह का स्वभाव युग के महत्व के साथ व्याप्त होता है, और प्रत्येक नए युग के कार्य की खातिर उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने और निरर्थक ढंग से प्रकट करता है। मान लो अगर, अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर असीम करुणा बरसाता रहता और उससे प्रेम करता रहता, उसे धार्मिक न्याय के अधीन करने के बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाता रहता, और उसे माफ़ करता रहता, चाहे उसके पाप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उसे रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के अधीन न करता : तो फिर परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का समापन कब होता? कब इस तरह का कोई स्वभाव सही मंज़िल की ओर मानवजाति की अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, एक ऐसे न्यायाधीश को लो, जो हमेशा प्रेममय है, एक उदार चेहरे और सौम्य हृदय वाला न्यायाधीश। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता है, और वह उनके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता है, चाहे वे कोई भी हों। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय पर पहुँचने में सक्षम होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार पृथक् कर सकता है और उन्हें एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 82

देह में उसका कार्य बहुत सार्थक है, यह कार्य के सम्बन्ध में कहा जाता है, और अंततः देहधारी परमेश्वर ही कार्य का समापन करता है, पवित्रात्मा नहीं। कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर किसी अनजान समय पृथ्वी पर आकर लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह व्यक्तिगत रूप से संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, एक-एक करके सबकी परीक्षा लेगा, कोई भी नहीं छूटेगा। जो लोग इस ढंग से सोचते हैं, वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर एक-एक करके मनुष्य का न्याय नहीं करता, एक-एक करके उनकी परीक्षा नहीं लेता; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या पूरी मनुष्यजाति का सार समान नहीं है? न्याय किया जाता है इंसान के भ्रष्ट सार का, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसानी सार का, और इंसान के सारे पापों का। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता। न्याय का कार्य निरूपक है, और किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता। बल्कि यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करके, इस कार्य का उपयोग संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है, जिसके बाद यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य ऐसा ही है। परमेश्वर किसी व्यक्ति-विशेष या लोगों के किसी समूह-विशेष का न्याय नहीं करता, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है—उदाहरण के लिए, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या उसके प्रति मनुष्य का अनादर, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान इत्यादि। जिसका न्याय किया जाता है वो है इंसान का परमेश्वर-विरोधी सार, और यह कार्य अंत के दिनों का विजय-कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिनकी गवाही इंसान देता है, वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसकी कल्पना इंसान के द्वारा अतीत में की गई थी। देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और उसका कार्य, उसका वचन और उसका समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि उसके कार्य का दायरा सीमित है, और उसमें सीधे तौर पर संपूर्ण विश्व शामिल नहीं है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—यह कार्य केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए नहीं, न ही यह थोड़े-से लोगों के लिए है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य के दायरे में संपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है, फिर भी यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे में उस कार्य को समाप्त कर लेगा तो उसके बाद, वह तुरन्त ही इस कार्य को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी तरह से फैला देगा जैसे यीशु के पुनरूत्थान और आरोहण के बाद उसका सुसमाचार सारी दुनिया में फैल गया था। चाहे यह पवित्रात्मा का कार्य हो या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे में किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों में, परमेश्वर देहधारी रूप में प्रकट होकर अपना कार्य करता है, और देहधारी परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। चाहे वह आत्मा हो या देह, जो न्याय का कार्य करता है वही ऐसा परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके कार्य के आधार पर परिभाषित किया जाता है, न कि उसके बाहरी रंग-रूप या दूसरी बातों के आधार पर। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, लेकिन कोई भी देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता। इंसान चाहे कुछ भी सोचे, मगर तथ्य आखिरकार तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि "कार्य परमेश्वर द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।" यह बकवास है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय और कोई नहीं कर सकता। चूँकि इस कार्य को पहले ही पूरा किया जा चुका है, इसलिए इस कार्य के बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रकट नहीं होगा; अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण प्रबंधन के समस्त कार्य का समापन कर लिया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान की आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, इसलिए न्याय का कार्य आध्यात्मिक संसार में कार्यान्वित नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 83

मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता। इसके अतिरिक्त, ऐसे कार्य को स्वीकार करना मनुष्य के लिए कठिन होता है, क्योंकि पवित्रात्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है, और इस वजह से, प्रभाव तत्काल नहीं होते, और मनुष्य परमेश्वर के अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को साफ-साफ देखने में बिलकुल भी सक्षम नहीं होता। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। मनुष्य के समान सामान्य मानवता धारण करने वाला बन कर ही, देह में प्रकट परमेश्वर सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसकी असाधारणता का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। पवित्रात्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि पवित्रात्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य की समस्त अवज्ञा का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी पवित्रात्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए पवित्रात्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। अपने प्रति मनुष्य की धारणाओं और विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति की सारी अवज्ञा का खुलासा करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। देहधारी परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में, मनुष्य विरोध से आज्ञाकारिता की ओर, उत्पीड़न से स्वीकृति की ओर, धारणा से ज्ञान की ओर, और तिरस्कार से प्रेम की ओर प्रगति करता है—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह पवित्रात्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य महानतम और बेहद गंभीर कार्य है, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अति महत्वपूर्ण भाग देहधारण के कार्य के दो चरण हैं। इंसान की भयंकर भ्रष्टता देहधारी परमेश्वर के कार्य में एक बड़ी बाधा है। विशेष रूप से, अंत के दिनों के लोगों पर किया गया कार्य बहुत ही कठिन है, परिवेश शत्रुतापूर्ण है, और हर प्रकार के लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है। फिर भी इस कार्य के अंत में, यह बिना किसी त्रुटि के उचित प्रभाव ही प्राप्त करेगा; यह देह के कार्य का प्रभाव है, और यह प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक प्रेरक है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का समापन देह में किया जाएगा, और इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा ही पूरा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे निर्णायक कार्य देह में किया जाता है, और मनुष्य का उद्धार व्यक्तिगत रूप से देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए। हर इंसान को यही लगता है कि देहधारी परमेश्वर इंसान से संबंधित नहीं है, जबकि सच्चाई यह है कि देह पूरी मनुष्यजाति की नियति और अस्तित्व से सम्बन्धित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 84

आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि तुम्हारी निंदा इसलिए की जाती है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह इसलिए निंदा करता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके, और, इसके अलावा, तुम अपनी कीमत जान सको, और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न हैसियत के हो, कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुममें जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है, उसके माध्यम से वह अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट करना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं है, और तुम आगे जारी रखने में सक्षम तो बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का परिणाम स्पष्ट करे—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए होगा; इसका प्रयोजन विशुद्ध रूप से उन लोगों को पूर्ण बनाना—पूरी तरह से—और उन्हें अपने प्रभुत्व की अधीनता में लाना है, जो उससे प्रेम करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनके पुराने शैतानी स्वभाव से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उनसे जीवन की तलाश करवाकर उन्हें बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और जीवन की तलाश करना ऐसी चीज़ है, जिसे उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य को करना ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में प्रेम, करुणा और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उन्हें अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वे अपने हृदय परमेश्वर को दे सकें। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार एक सौदा करके किया जाता है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पित होता है और उसके लिए अच्छा करने और उसे महिमामंडित करने का प्रयत्न करता है। यह मानवजाति के लिए परमेश्वर की अभिलाषा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम प्रेम और करुणा दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों को दिया गया उद्धार अंतिम दिनों के समय में प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किए जाने के दौरान घटित होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्दय मार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम मार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे कुछ वचन ही हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे फिर भी कुछ शिक्षाप्रद वचन ही हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज़ उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शुद्धिकरण और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किया जा रहा हो या मनुष्य की श्रेणियाँ प्रकट की जा रही हों, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है, जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है, और निर्मम शुद्धिकरण उन्हें निर्मल बनाने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या ताड़ना, दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज तुम्हारे लिए उद्धार धार्मिक न्याय के ज़रिए लाया जाता है, और यह तुम लोगों में से प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा उपकरण है। इसके अतिरिक्त, निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है—और ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुमने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम, मांस और रक्त के पापी प्राणी आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह क्यों बनता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम पूर्णत: नश्वर प्राणियों को दंडित करने का काम एक वचन भर कहने से ही न हो जाता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 85

यद्यपि मेरे वचन कठोर हो सकते हैं, किंतु वे सब मनुष्य के उद्धार के लिए कहे जाते हैं, क्योंकि मैं केवल वचन बोल रहा हूँ, मनुष्य की देह को दंडित नहीं कर रहा हूँ। इन वचनों के कारण मनुष्य प्रकाश में रह पाता है, यह जान पाता है कि प्रकाश मौजूद है, यह जान पाता है कि प्रकाश अनमोल है, और, इससे भी बढ़कर, यह जान पाता है कि ये वचन उसके लिए कितने फायदेमंद हैं, साथ ही यह भी जान पाता है कि परमेश्वर उद्धार है। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत-से वचन कहे हैं, लेकिन वे जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं, वह तुम्हारे साथ किया नहीं गया है। मैं अपना काम करने और अपने वचन बोलने के लिए आया हूँ, मेरे वचन सख्त हो सकते हैं, लेकिन वे तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरे ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बचाना है; मैं अपने वचनों का उपयोग मनुष्य को बचाने के लिए कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य अपने वचनों से मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर इसलिए हैं, ताकि मेरे कार्य में परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल ऐसे कार्य से ही मनुष्य खुद को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव से दूर हो सकता है। वचनों के कार्य की सबसे बड़ी सार्थकता यह है लोग सत्य को समझकर उसे अभ्यास में लाएँ, अपने स्वभाव में बदलाव लाएँ, खुद को जानें और परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करें। वचनों को बोलकर कार्य करने से ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच संवाद संभव हो सकता है, केवल वचन ही सत्य की व्याख्या कर सकते हैं। इस तरह से काम करना मनुष्य को जीतने का सबसे अच्छा साधन है; वचनों को बोलने के अलावा कोई भी अन्य विधि लोगों को सत्य और परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ देने में सक्षम नहीं है। इसलिए, अपने कार्य के अंतिम चरण में परमेश्वर वे सभी सत्य और रहस्य खोलने के लिए मनुष्य से बात करता है, जिन्हें वे अभी तक नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर से सच्चा मार्ग और जीवन प्राप्त कर सकें और ऐसा करके उसकी इच्छा पूरी कर सकें। मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उसे परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में सक्षम बनाना है, और ऐसा उनका उद्धार करने के लिए किया जाता है। इसलिए, मनुष्य का उद्धार करते समय, परमेश्वर उसे दंड देने का काम नहीं करता। मनुष्य के उद्धार के समय परमेश्वर न तो बुरे को दंडित करता है, न अच्छे को पुरस्कृत करता है, और न ही वह विभिन्न प्रकार के लोगों की मंज़िल प्रकट करता है। बल्कि, अपने कार्य के अंतिम चरण के पूरा होने के बाद ही वह बुरे को दंडित और अच्छे को पुरस्कृत करने का काम करेगा, और केवल तभी वह सभी प्रकार के लोगों के अंत को भी प्रकट करेगा। दंडित केवल वही लोग किए जाएँगे, जिन्हें बचाया जाना संभव नहीं है, जबकि बचाया केवल उन्हीं लोगों को जाएगा, जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय उसका उद्धार प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य किया जा रहा होगा, उस समय यथासंभव हर उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जिसे बचाया जा सकता है, और उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला पाएँगे—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो पाएँगे—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोल देगा, जिन्हें वे नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर की इच्छा और स्वयं से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ सकें, और अपने अंदर परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की पूर्वापेक्षाएँ पैदा करके अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकें। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, अगर लोग थोड़े विद्रोही हो जाएँ, तो वह उन्हें दंडित नहीं करता; क्योंकि यह उद्धार के कार्य का समय है। यदि विद्रोही ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा; हर व्यक्ति दंडित होकर रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उन्हें स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने देना है; यह उन्हें इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और अवहेलना, और साथ ही अपनी अवज्ञा भी उजागर करेंगे। फिर भी, वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अलग कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने का अनुसरण और अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज़्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। वचनों द्वारा जीते जाने के लिए प्रस्तुत प्रत्येक व्यक्ति के पास उद्धार के लिए पर्याप्त अवसर होगा; उद्धार के समय परमेश्वर इन लोगों के प्रति परम उदारता दिखाएगा। दूसरे शब्दों में, उनके प्रति परम सहनशीलता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, तो वह उन्हें मृत्युदंड नहीं देना चाहता; बल्कि, वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें दर-किनार कर देता है। कुछ लोगों को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है, जिसे बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें मारने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का प्रयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 86

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 87

परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा पूरी होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल हैं, और वह मनुष्य को प्राथमिक रूप से न्याय द्वारा पूर्ण बनाता है। कुछ लोग नहीं समझते और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, "यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे पूर्ण बनाया जा सकता है?" ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञा को शापित करता है और वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय द्वारा वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पापमय और शैतान की है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना की पात्र है। इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों से उसका सामना और हर प्रकार का शोधन परम आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है।

परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों से यह देखा जा सकता है कि उसने मनुष्य की देह को पहले ही दोषी ठहरा दिया है। क्या ये वचन फिर शाप के वचन नहीं हैं? परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के असली रंग को प्रकट करते हैं, और ऐसे प्रकाशनों द्वारा उसका न्याय किया जाता है, और जब वह देखता है कि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ है, तो वह अपने भीतर शोक और ग्लानि अनुभव करता है, वह महसूस करता है कि वह परमेश्वर का बहुत ऋणी है, और परमेश्वर की इच्छा के लिए अपर्याप्त है। ऐसा समय भी होता है जब पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से अनुशासित करता है, और यह अनुशासन परमेश्वर के न्याय से आता है; ऐसा समय भी होता है जब परमेश्वर तुम्हारा तिरस्कार करता है और अपना चेहरा तुमसे छुपा लेता है, जब वह कोई ध्यान नहीं देता, और तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करता, और तुम्हें शुद्ध करने के लिए बिना आवाज के तुम्हें ताड़ना देता है। मनुष्य में परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से अपने धार्मिक स्वभाव को स्पष्ट करने के लिए होता है। मनुष्य अंततः कैसी गवाही परमेश्वर के बारे में देता है? वह गवाही देता है कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, उसके स्वभाव में धार्मिकता, क्रोध, ताड़ना और न्याय शामिल हैं; मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही देता है। परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि आतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है कि तुम जागृत हो जाओ, तुम अपने भीतर की कमियों को जान सको और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और अपना धार्मिक स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 88

अपनी पारंपरिक धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर का प्रेम मनुष्य की निर्बलता के लिए उसका अनुग्रह, दया और सहानुभूति है। यद्यपि ये बातें भी परमेश्वर का प्रेम हैं, परंतु वे अत्यधिक एक-तरफ़ा हैं, और वे प्राथमिक माध्यम नहीं हैं जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता है। कुछ लोग बीमारी के कारण परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं और यह बीमारी तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुग्रह है; इसके बिना तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते तो तुम यहाँ तक नहीं पहुँच पाते—और इस प्रकार यह अनुग्रह भी परमेश्वर का प्रेम है। यीशु में विश्वास करने के समय लोगों ने ऐसा बहुत कुछ किया जो परमेश्वर को नापसंद था क्योंकि उन्होंने सत्य को नहीं समझा, फिर भी परमेश्वर में दया और प्रेम है, और वह मनुष्य को यहाँ तक ले आया है, और यद्यपि मनुष्य कुछ नहीं समझता, फिर भी परमेश्वर मनुष्य को अनुमति देता है कि वह उसका अनुसरण करे, और इससे बढ़कर वह मनुष्य को वर्तमान समय तक ले आया है। क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? जो परमेश्वर के स्वभाव में प्रकट है वह परमेश्वर का प्रेम है—यह बिलकुल सही है! जब कलीसिया का निर्माण अपने चरम पर पहुँच गया तो परमेश्वर ने सेवाकर्ताओं के कार्य का चरण किया और मनुष्य को अथाह कुण्ड में डाल दिया। सेवाकर्ताओं के समय के सभी वचन शाप थे: तुम्हारी देह के शाप, तुम्हारे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के शाप, और तुमसे जुड़ी उन चीजों के शाप जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं करतीं। उस कदम पर परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य भव्य रूप में प्रकट हुआ, जिसके ठीक बाद परमेश्वर ने ताड़ना के कार्य का कदम उठाया, और उसके बाद मृत्यु का परीक्षण आया। ऐसे कार्य में, मनुष्य ने परमेश्वर के क्रोध, भव्यता, न्याय, और ताड़ना को देखा, परंतु साथ ही उसने परमेश्वर के अनुग्रह, उसके प्रेम और दया को भी देखा; जो कुछ भी परमेश्वर ने किया, और वह सब जो उसके स्वभाव के रूप में प्रकट हुआ, वह मनुष्य के प्रति उसका प्रेम था, और जो कुछ परमेश्वर ने किया वह मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। उसने ऐसा मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए किया, और उसने मनुष्य के आध्यात्मिक कद के अनुसार उसकी जरूरतें पूरी कीं। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता तो मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आने में असमर्थ होता, और परमेश्वर के सच्चेचेहरे को देखने का उसके पास कोई तरीका नहीं होता। जब से मनुष्य ने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरंभ किया, तब से आज तक परमेश्वर ने मनुष्य के आध्यात्मिक कद के अनुसार धीरे-धीरे उसकी जरूरतें पूरी की हैं, जिससे मनुष्य आंतरिक रूप से धीरे-धीरे उसको जान गया है। वर्तमान समय तक पहुँचने पर ही मनुष्य अनुभव करता है कि परमेश्वर का न्याय कितना अद्भुत है। सृष्टि के समय से लेकर आज तक, सेवाकर्ताओं के कार्य का कदम, शाप के कार्य की पहली घटना थी। मनुष्य को अथाह कुण्ड में भेजकर शापित किया गया था। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो आज मनुष्य के पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं होता; यह केवल शाप के द्वारा ही था कि मनुष्य आधिकारिक रूप से परमेश्वर के स्वभाव को देख पाया। सेवाकर्ताओं के परीक्षण के माध्यम से मनुष्य को उजागर किया गया। उसने देखा कि उसकी वफ़ादारी स्वीकार्य नहीं थी, उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था, वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ था, और हर समय परमेश्वर को संतुष्ट करने के उसके दावे शब्दों से बढ़कर कुछ नहीं थे। यद्यपि सेवाकर्ताओं के कार्य के कदम में परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, फिर भी अब पीछे मुड़कर देखें तो परमेश्वर के कार्य का वह कदम अद्भुत था: यह मनुष्य के लिए एक बड़ा निर्णायक मोड़ और उसके जीवन स्वभाव में बड़ा बदलाव लेकर आया। सेवाकर्ताओं के समय से पहले मनुष्य जीवन के अनुसरण, परमेश्वर में विश्वास करने के अर्थ, या परमेश्वर के कार्य की बुद्धि के बारे में कुछ नहीं समझता था, और न ही उसने यह समझा कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य को परख सकता है। सेवाकर्ताओं के समय से लेकर आज तक, मनुष्य देखता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है—यह मनुष्य के लिए अथाह है। अपने दिमाग में वह यह कल्पना करने में असमर्थ है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, और वह यह भी देखता है कि उसका आध्यात्मिक कद कितना छोटा है और वह बहुत हद तक अवज्ञाकारी है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, तो वह एक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए था, और उसने मनुष्य को मार नहीं डाला। यद्यपि उसने मनुष्य को शापित किया, उसने ऐसा वचनों के द्वारा किया, और उसके शाप वास्तव में मनुष्य पर नहीं पड़े, क्योंकि जिसे परमेश्वर ने शापित किया वह मनुष्य की अवज्ञा थी, इसलिए उसके शापों के वचन भी मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए थे। चाहे परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर की विकृतियों के परिष्कार के लिए किया जाता है। इस माध्यम से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य में जिस चीज़ की कमी होती है उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे यह कठोर शब्द हों, न्याय हो या ताड़ना हो—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिलकुल उचित होता है। युगों-युगों में कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों के भीतर कार्य करता है ताकि तुम उसकी बुद्धि को सराहो। यद्यपि तुम लोगों ने अपने भीतर कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय स्थिर और शांत महसूस करते हैं; यह तुम्हारे लिए आशीष है कि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद ले सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम भविष्य में क्या प्राप्त कर सकते हो, आज अपने भीतर परमेश्वर के जिस कार्य को तुम देखते हो, वह प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और उसके शोधन का अनुभव नहीं करता, तो उसके कार्यकलाप और उसका उत्साह सदैव सतही रहेंगे, और उसका स्वभाव सदैव अपरिवर्तित रहेगा। क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जा सकता है? यद्यपि आज भी मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है जो काफी अहंकारी और दंभी है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले की तुलना में बहुत ज्यादा स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर का व्यवहार तुम्हें बचाने के लिए है, और हो सकता है कि यद्यपि तुम इस समय कुछ पीड़ा महसूस करो, फिर भी एक ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आएगा। उस समय, तुम पीछे मुड़कर देखने पर पाओगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण है और उस समय तुम परमेश्वर की इच्छा को सही मायने में समझ पाओगे। आज कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, परंतु यह वास्तविकता नहीं है, वास्तव में वे झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि वर्तमान में उन्हें अभी यह समझना शेष है कि क्या परमेश्वर की इच्छा मनुष्य को बचाने की है या मनुष्य को शाप देने की है। शायद तुम इसे अभी स्पष्ट नहीं देख सकते, परंतु एक दिन आएगा जब तुम देखोगे कि परमेश्वर की महिमा का दिन आ गया है, और परमेश्वर से प्रेम करना कितना अर्थपूर्ण है, जिससे तुम मानवीय जीवन को जान सकोगे, और तुम्हारी देह परमेश्वर-प्रेम की दुनिया में रहेगी, तुम्हारी आत्मा स्वतंत्र कर दी जाएगी, तुम्हारा जीवन आनंदमय हो जाएगा, और तुम सदैव परमेश्वर के समीप रहोगे और उस पर भरोसा करोगे। उस समय, तुम सही मायने में जान जाओगे कि परमेश्वर का कार्य आज कितना मूल्यवान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 89

जो कार्य अब किया जा रहा है, वह लोगों से अपने पूर्वज शैतान का त्याग करवाने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना और लोगों को जीवन का सार समझने में सक्षम बनाना है। ये बार-बार के न्याय लोगों के हृदयों को बेध देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्य से संबंधित होता है और उनके हृदयों को घायल करने के लिए होता है, ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ, और मानवजाति को भी जान जाएँ, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। जितना अधिक मनुष्य इस प्रकार की ताड़ना और न्याय प्राप्त करता है, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इन अत्यधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक गहराई से धोखा खाए हुए लोगों की आत्माओं को जगाना इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य है। मनुष्य के पास कोई आत्मा नहीं है, अर्थात् उसकी आत्मा बहुत पहले ही मर गई और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि परमेश्वर है, और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की अतल खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः कैसे जान सकता है कि वह पृथ्वी पर इस गंदे नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि उसका यह सड़ा हुआ शव शैतान की भ्रष्टता के माध्यम से मृत्यु के अधोलोक में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि पृथ्वी पर प्रत्येक चीज़ मानवजाति द्वारा बहुत पहले ही इतनी बरबाद कर दी गई है कि अब सुधारी नहीं जा सकती? और वह संभवतः कैसे जान सकता है कि आज स्रष्टा पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट लोगों के एक समूह की तलाश कर रहा है, जिसे वह बचा सके? मनुष्य द्वारा हर संभव शुद्धिकरण और न्याय का अनुभव करने के बाद भी, उसकी सुस्त चेतना मुश्किल से ही हिलती-डुलती है और वास्तव में लगभग प्रतिक्रियाहीन रहती है। मानवजाति कितनी पतित है! और यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, फिर भी वह मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है। यदि इस तरह से लोगों का न्याय न हो, तो कोई भी परिणाम नहीं निकलेगा और लोगों को दुःख की अतल खाई से बचाना नितांत असंभव होगा। यदि यह कार्य न हो, तो लोगों का अधोलोक से बाहर निकलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। पतन की गहराइयों में डूब चुके तुम लोगों को बचाने के लिए तुम्हें सख़्ती से पुकारने, तुम्हारा सख़्ती से न्याय करने की आवश्यकता है; केवल तभी तुम लोगों के जमे हुए हृदयों को जगाना संभव होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 90

परमेश्वर ने सबसे पिछड़े और मलिन स्थान पर देहधारण किया, और केवल इसी तरह से परमेश्वर अपने पवित्र और धार्मिक स्वभाव की समग्रता को साफ तौर पर दिखा सकता है। और उसका धार्मिक स्वभाव किसके ज़रिये दिखाया जाता है? वह तब दिखाया जाता है, जब वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है, जब वह शैतान का न्याय करता है, जब वह पाप से घृणा करता है, और जब वह उन शत्रुओं से नफरत करता है जो उसका विरोध और उससे विद्रोह करते हैं। मेरे आज के वचन मनुष्य के पापों का न्याय करने के लिए, मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए और मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शाप देने के लिए हैं। मनुष्य की कुटिलता और छल, उसके शब्द और कर्म—जो भी परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हैं, उनका न्याय होना चाहिए, और मनुष्य की अवज्ञाकारिता की पाप के रूप में निंदा होनी चाहिए। उसके वचन न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वह मनुष्य की अधार्मिकता के न्याय का, मनुष्य की विद्रोहशीलता की निंदा का, मनुष्य के कुरूप चेहरों के खुलासे का इस्तेमाल अपने धार्मिक स्वभाव को अभिव्यक्त करने के लिए करता है। पवित्रता उसके धार्मिक स्वभाव का निरूपण है, और दरअसल, परमेश्वर की पवित्रता वास्तव में उसका धार्मिक स्वभाव है। तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव आज के वचनों के प्रसंग हैं—मैं उनका इस्तेमाल बोलने, न्याय करने और विजय-कार्य संपन्न करने के लिए करता हूँ। मात्र यही असली कार्य है, और मात्र यही परमेश्वर की पवित्रता को जगमगाता है। अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव का कोई निशान नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, न ही वह तुम्हें अपना धार्मिक स्वभाव दिखाएगा। चूँकि तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है, इसलिए परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं, और इसी के ज़रिये उसकी पवित्रता दिखाई जाती है। अगर परमेश्वर देखता कि मनुष्य की मलिनता और विद्रोहशीलता बहुत भयंकर हैं, लेकिन वह न तो बोलता, न तुम्हारा न्याय करता, न तुम्हारी अधार्मिकता के लिए तुम्हें ताड़ना देता, तो इससे यह साबित हो जाता कि वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसे पाप से कोई घृणा न होती; वह मनुष्य जितना ही मलिन होता। आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने अपनी निष्ठा और मानवीयता खो दी है और तुम दुनिया की सबसे मलिन जगह पर पैदा हुए सूअर की तरह बन गए हो, और यही वजह है कि मैं तुम लोगों का न्याय करता हूँ और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इसी न्याय की वजह से तुम लोग यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, और कि परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है। चूँकि वह मनुष्य की विद्रोहशीलता देखकर अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट कर सकता है, और चूँकि मनुष्य की मलिनता देखकर वह अपनी पवित्रता प्रकट कर सकता है, अत: यह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और प्राचीन है, और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों के साथ कीचड़ में लोट-पोट करता है, और उसके बारे में कुछ भी पवित्र नहीं है, और उसके पास कोई धार्मिक स्वभाव नहीं है, तो वह मनुष्य के अधर्म का न्याय करने के लिए योग्य नहीं है, और न ही वह मनुष्य के न्याय को कार्यान्वित करने के योग्य है। अगर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का न्याय करता, तो क्या यह उनका स्वयं को थप्पड़ मारने जैसा नहीं होता? एक-जैसे मलिन व्यक्ति एक-दूसरे का न्याय करने के हकदार कैसे हो सकते हैं? केवल स्वयं पवित्र परमेश्वर ही पूरी मलिन मानव-जाति का न्याय करने में सक्षम है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के पापों का न्याय कैसे कर सकता है? एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के पाप कैसे देख सकता है, और वह इन पापों की निंदा करने का पात्र कैसे हो सकता है? अगर परमेश्वर मनुष्य के पापों का न्याय करने का पात्र न होता, तो वह स्वयं धार्मिक परमेश्वर कैसे हो सकता था? जब लोगों के भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं, तो लोगों का न्याय करने के लिए परमेश्वर बोलता है, और केवल तभी लोग देखते हैं कि वह पवित्र है। जब वह मनुष्य के पापों के कारण उनका न्याय करता है और उन्हें ताड़ना देता है, मनुष्य के पापों को उजागर करता है, तो कोई भी मनुष्य या चीज़ इस न्याय से बच नहीं सकती; जो कुछ भी मलिन है, वह उसका न्याय करता है, और केवल इसी तरह से उसके स्वभाव को धार्मिक कहा जा सकता है। अगर इससे अलग कुछ होता, तो यह कैसे कहा जा सकता कि तुम लोग नाम और तथ्य दोनों से विषमता हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 91

इजराइल में किए गए कार्य में और आज के कार्य में बहुत बड़ा अंतर है। यहोवा ने इजराइलियों के जीवन का मार्गदर्शन किया, तो उस समय इतनी ताड़ना और न्याय नहीं था, क्योंकि उस वक्त लोग दुनियादारी बहुत ही कम समझते थे और उनके स्वभाव थोड़े ही भ्रष्ट थे। तब इजराइली पूरी तरह से यहोवा की आज्ञा का पालन करते थे। जब उसने उन्हें वेदियों का निर्माण करने के लिए कहा, तो उन्होंने जल्दी से वेदियों का निर्माण कर दिया; जब उसने उन्हें याजकों का लिबास पहनने के लिए कहा, तो उन्होंने उसकी आज्ञा का पालन किया। उन दिनों यहोवा भेड़ों के झुंड की देखभाल करने वाले चरवाहे की तरह था, जिसके मार्गदर्शन में भेड़ें हरे-भरे मैदान में घास चरती थीं; यहोवा ने उनकी ज़िंदगी को राह दिखाई, उनके खाने, पहनने, रहने और यात्रा करने में उनकी अगुआई की। वह समय परमेश्वर के स्वभाव को स्पष्ट करने का नहीं था, क्योंकि उस समय मनुष्य नवजात था; कुछ ही लोग थे, जो विद्रोही और विरोधी थे, मनुष्यों में मलिनता अधिक नहीं थी, इसलिए लोग परमेश्वर के स्वभाव के लिए विषमता नहीं बन सकते थे। परमेश्वर की पवित्रता मलिनता की धरती से आए लोगों के माध्यम से ज़ाहिर होती है; आज वह मलिनता की धरती के इन लोगों में दिखने वाली मलिनता का इस्तेमाल कर रहा है, और ऐसा करते समय उसके न्याय में उसका स्वरूप प्रकट होता है। वह न्याय क्यों करता है? वह न्याय के वचन इसलिए बोल पाता है, क्योंकि वह पाप से घृणा करता है; अगर वह मनुष्य की विद्रोहशीलता से घृणा न करता, तो वह इतना क्रोधित कैसे हो सकता था? अगर उसके अंदर चिढ़ न होती, कोई नफरत न होती, अगर वह लोगों की विद्रोहशीलता की ओर कोई ध्यान न देता, तो इससे वह मनुष्य जितना ही मलिन प्रमाणित हो जाता। वह मनुष्य का न्याय और उसकी ताड़ना इसलिए कर सकता है, क्योंकि उसे मलिनता से घृणा है, और जिस मलिनता से वह घृणा करता है, वह उसके अंदर नहीं है। अगर उसके अंदर भी विरोध और विद्रोहशीलता होते, तो वह विरोधी और विद्रोही लोगों से घृणा न करता। अगर अंत के दिनों का कार्य इजराइल में किया गया होता, तो उसका कोई मतलब न होता। अंत के दिनों का कार्य सबसे अंधकारमय और सबसे पिछड़े स्थान चीन में ही क्यों किया जा रहा है? यह सब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता दिखाने के लिए है। संक्षेप में, स्थान जितना अधिक अंधकारमय होता है, परमेश्वर की पवित्रता वहाँ उतनी ही स्पष्टता से दिखाई जा सकती है। दरअसल, यह सब परमेश्वर के कार्य के लिए है। केवल आज तुम लोगों को यह एहसास हुआ है कि परमेश्वर तुम लोगों के बीच रहने के लिए स्वर्ग से धरती पर उतर आया है, जो तुम लोगों की मलिनता और विद्रोहशीलता द्वारा दिखाया गया है, और केवल अब तुम लोग परमेश्वर को जानते हो। क्या यह सबसे बड़ा उत्कर्ष नहीं है? दरअसल, तुम लोग चीन में लोगों का वह समूह हो, जिन्हें चुना गया था। और चूँकि तुम्हें चुना गया था और तुमने परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है, लेकिन चूँकि तुम लोग ऐसे महान अनुग्रह के उपयुक्त नहीं हो, इसलिए इससे साबित होता है कि यह सब तुम लोगों के लिए सर्वोच्च उत्कर्ष है। परमेश्वर तुम लोगों के समक्ष आया है, और उसने तुम लोगों को पूरी समग्रता में अपना पवित्र स्वभाव दिखाया है, उसने तुम लोगों को वह सब दिया है और उन तमाम आशीषों का आनंद लेने दिया है, जिसका तुम आनंद ले सकते थे। तुमने न केवल परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का स्वाद लिया है, बल्कि तुम परमेश्वर के उद्धार का, परमेश्वर के छुटकारे का और परमेश्वर के असीम और अनंत प्रेम का स्वाद भी ले चुके हो। तुम लोगों ने, जो कि सबसे मलिन हो, ऐसे महान अनुग्रह का आनंद लिया है—क्या तुम धन्य नहीं हो? क्या यह परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को ऊपर उठाना नहीं है? तुम लोगों के सबसे निम्न कद हैं; तुम स्वाभाविक तौर पर ऐसे महान आशीष का आनंद उठाने के योग्य नहीं हो, फिर भी परमेश्वर ने तुम्हें अपवाद के रूप में उन्नत किया है। क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? अगर तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा पाए, तो अंतत: तुम्हें अपने आप पर शर्म आएगी, और तुम स्वयं को दंडित करोगे। आज तुम्हें न तो अनुशासित किया गया है, न ही तुम्हें दंड दिया गया है; तुम्हारी देह एकदम सही-सलामत है—लेकिन अंतत: ये वचन तुम्हें शर्मिंदा करेंगे। आज तक मैंने किसी को भी खुले आम ताड़ना नहीं दी है; हो सकता है कि मेरे वचन कठोर हों, लेकिन मैं लोगों से किस तरह पेश आता हूँ? मैं उन्हें सांत्वना देता हूँ, उपदेश देता हूँ और याद दिलाता हूँ। मैं ऐसा किसी और कारण से नहीं, बल्कि तुम लोगों को बचाने के लिए करता हूँ। क्या तुम लोग सचमुच मेरी इच्छा नहीं समझते? मैं जो कुछ भी कहता हूँ, उसे तुम लोगों को समझना चाहिए और उससे प्रेरित होना चाहिए। अब जाकर कई लोग समझने लगे हैं। क्या यह विषमता होने का आशीष नहीं है? क्या विषमता होना सर्वाधिक धन्य चीज़ नहीं है? अंतत:, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने जाओगे, तो तुम लोग यह बात कहोगे : "हम विशिष्ट विषमताएँ हैं।" वे तुमसे पूछेंगे, "तुम्हारे विशिष्ट विषमता होने के क्या मायने हैं?" और तुम कहोगे, "हम परमेश्वर के कार्य और उसके महान सामर्थ्य के लिए विषमता हैं। हमारी विद्रोहशीलता परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकाश में लाती है; हम लोग अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की सेवा में काम आने वाली वस्तुएँ हैं, हम लोग उसके कार्य की लटकन हैं और उसके औज़ार भी हैं।" जब वे सुनेंगे, तो उन्हें कुतूहल होगा। तुम आगे कहोगे : "हम लोग परमेश्वर के पूरे ब्रह्मांड के कार्य की पूर्णता और मानव-जाति पर उसकी विजय के नमूने और प्रतिमान हैं। हम लोग पवित्र हों या मलिन, कुल मिलाकर, हम लोग अभी भी तुमसे अधिक धन्य हैं, क्योंकि हमने परमेश्वर को देखा है, और उसके द्वारा हमें जीते जाने के अवसर के ज़रिये परमेश्वर का महान सामर्थ्य ज़ाहिर होता है; केवल हम लोगों के मलिन और भ्रष्ट होने के कारण ही उसका धार्मिक स्वभाव उभरा है। क्या तुम लोग इस प्रकार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में सक्षम हो? तुम लोग पात्र नहीं हो! यह हमारे लिए परमेश्वर के उत्कर्ष के सिवा कुछ नहीं है! भले ही हम अहंकारी न हों, हम गर्व से परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं, क्योंकि कोई भी इस तरह की महान प्रतिज्ञा प्राप्त नहीं कर सकता, और कोई भी ऐसे महान आशीष का आनंद नहीं ले सकता। हम कृतज्ञ महसूस करते हैं कि हम लोग, जो कि इतने मलिन हैं, परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान विषमता के रूप में कार्य कर सकते हैं।" और जब वे पूछेंगे, "नमूने और प्रतिमान क्या होते हैं?" तो तुम कहोगे, "मानव-जाति में हम लोग सबसे विद्रोही और मलिन हैं; हमें शैतान द्वारा सबसे ज्यादा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, और हमारी देह बेहद पिछड़ी हुई और निम्न है। हम लोग शैतान द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। आज हम जीते जाने के लिए परमेश्वर द्वारा मानव-जाति में से चुने गए पहले मनुष्य हैं, और हमने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अवलोकन किया है और उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त किया है; और हम और अधिक लोगों को जीतने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इस प्रकार हम मानव-जाति के बीच जीते जाने वालों के नमूने और प्रतिमान हैं।" इन शब्दों से बेहतर कोई और गवाही नहीं है, और यह तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ अनुभव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 92

तुम लोगों पर किया गया विजय का कार्य गहनतम अर्थ रखता है : एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को पूर्ण करना है, और इसलिए पूर्ण करना है, ताकि वे विजेताओं का एक समूह बन सकें—पूर्ण किए गए लोगों का प्रथम समूह, अर्थात प्रथम फल। दूसरी ओर, यह सृजित प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने देना, परमेश्वर के पूर्ण और महानतम उद्धार को प्राप्त करने देना और मनुष्य को न केवल उसकी दया और प्रेमपूर्ण करुणा का, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से ताड़ना और न्याय का अनुभव लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए कोई घृणा नहीं है। यहाँ तक कि जो ताड़ना और न्याय तुमने देखे हैं, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम, ऐसा प्रेम जो लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष गवाही देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने की नींव रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाना है, ताकि वे सामान्य लोगों की तरह जी सकें, क्योंकि लोग नहीं जानते कि कैसे जीएँ, और बिना मार्गदर्शन के तुम केवल खोखला जीवन जियोगे; तुम्हारा जीवन मूल्यहीन और निरर्थक होगा, और तुम एक सामान्य व्यक्ति बनने में बिलकुल असमर्थ रहोगे। यह मनुष्य को जीते जाने का गहनतम अर्थ है। तुम लोग मोआब के वंशज हो; तुममें जीते जाने का कार्य किया जाता है, तो वह एक महान उद्धार है। तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है, और क्या ऐसा उद्धार और भी बड़ा नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में लौट सकते हो! यदि तुम इस धारा में रहने और इस न्याय और अमित उद्धार का आनंद लेने, और मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जाने वाले इन सब आशीषों का और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम्हें कुछ कष्ट और शुद्धिकरण सहना पड़ सकता है, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा लोग शुद्ध, और निर्ममतापूर्वक उजागर किए जाते हैं—जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पापों का दंड देना, उनके देह को दंड देना है—फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह को नष्ट करने की सीमा तक नकारने के इरादे से नहीं है। वचन के समस्त गंभीर प्रकटीकरण तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से हैं। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यामिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और निस्संदेह तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम सहते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। इस उद्धार से तुम्हें सुख प्राप्त होना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 93

जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; वैसे, वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवा भी दी थी। हालाँकि जब अंतिम दिन आएगा, तो भी उन्हें अपनी दुष्टता के कारण और अवज्ञा एवं छुटकारा न पाने की योग्यता के परिणामस्वरूप हटाया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी अस्तित्व में नहीं आएँगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पवित्र जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, बुराई करने वाले सभी अंततः नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होगा; बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था, या वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे हैं। पिछले युगों में जिन लोगों ने बुरा किया और जो उद्धार नहीं प्राप्त कर पाए, निःसंदेह वे दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तबसे अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने उनके बीच अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने दुष्टों का नाश नहीं किया होता, बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो प्रत्येक मनुष्य अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होता और परमेश्वर समस्त मानवता को एक बेहतर क्षेत्र में नहीं ला पाता। ऐसा कार्य पूर्ण नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानवता पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इसी तरीक़े से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 94

मेरे पदचिह्न पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के सिरों तक जाते हैं, मेरी आँखें लगातार हर व्यक्ति की जाँच करती हैं, और इससे भी अधिक, मैं ब्रह्मांड को पूरा देखता हूँ। मेरे वचन वास्तव में ब्रह्मांड के हर कोने में कार्य कर रहे हैं। जो कोई भी मेरे लिए सेवा प्रदान नहीं करने का साहस करता है, जो कोई भी मेरे प्रति वफ़ादार नहीं होने का साहस करता है, जो कोई भी मेरे नाम की आलोचना करने का साहस करता है, और जो कोई भी मेरे पुत्रों को बुरा-भला कहने और उनकी बदनामी करने का साहस करता है—जो वास्तव में इन चीज़ों को करने में सक्षम हैं, उन्हें कठोर न्याय से गुज़रना ही होगा। मेरा न्याय अपनी पूरी समग्रता में पड़ेगा, जिसका अर्थ है कि अब न्याय का युग है, और सतर्क अवलोकन से तुम पाओगे कि मेरा न्याय पूरे ब्रह्मांड की दुनिया में फैला हुआ है। निस्संदेह, मेरा घर भी नहीं छूटेगा; जिनके विचार, शब्द और कार्यकलाप मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं, उनका न्याय किया जाएगा। इसे समझो! मेरा न्याय समस्त ब्रह्मांड की दुनिया पर निर्देशित है, लोगों या चीज़ों के एक समूह मात्र पर नहीं। क्या तुम इसे समझ रहे हो? यदि भीतर से तुम अपने विचारों में मुझे लेकर दुविधा में हो, तो अंदर से तुरंत तुम्हारा न्याय किया जाएगा।

मेरा न्याय सभी आकारों और रूपों में आता है। यह जान लो! मैं ब्रह्मांड की दुनिया का अद्वितीय और बुद्धिमान परमेश्वर हूँ! कुछ भी मेरे सामर्थ्य से परे नहीं है। मेरे सभी न्याय तुम लोगों पर प्रकट किए जाते हैं : यदि तुम अपने विचारों में मुझे लेकर दुविधा में हो, तो एक चेतावनी के रूप में मैं तुम्हें प्रबुद्ध करूँगा। यदि तुम नहीं सुनोगे, तो मैं तुरंत तुम्हें त्याग दूँगा (इसमें मैं अपने नाम पर संदेह करने को नहीं, बल्कि दैहिक सुखों से संबंधित बाहरी व्यवहारों को संदर्भित कर रहा हूँ)। यदि मेरे प्रति तुम्हारे विचार अवज्ञापूर्ण हैं, यदि तुम मुझसे शिकायत करते हो, यदि तुम शैतान के विचारों को बार-बार स्वीकार करते हो, और यदि तुम जीवन की भावनाओं का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारी आत्मा अँधेरे में रहेगी और तुम्हारी देह पीड़ा भुगतेगी। तुम्हें मेरे करीब आना चाहिए। तुम संभवत: केवल एक या दो दिनों में ही अपनी सामान्य स्थिति बहाल करने में असमर्थ रहोगे, और तुम्हारा जीवन स्पष्ट रूप से बहुत पीछे रह जाएगा। जो लोग वाणी से स्वच्छंद हैं, मैं तुम लोगों के मुँह और ज़बान को अनुशासित कर दूँगा और तुम्हारी ज़बान का निपटारा करवा दूँगा। जो लोग कर्म में असंयमित रूप से स्वच्छंद हैं, मैं तुम लोगों को तुम्हारी आत्मा में चेतावनी दूँगा, और जो लोग नहीं सुनेंगे, उन्हें गंभीर रूप से ताड़ना दूँगा। जो लोग खुले आम मेरी आलोचना और अवज्ञा करते हैं, जो वचन या कर्म से अवज्ञा प्रदर्शित करते हैं, मैं उन्हें पूरी तरह से हटा दूँगा और उनका त्याग कर दूँगा, उनके नष्ट होने और उनके उच्चतम आशीषों के खोने का कारण बनूँगा; ये वे लोग हैं, जो चुने जाने के बाद हटा दिए जाएँगे। जो लोग अज्ञानी हैं, अर्थात्, जिनकी दृष्टि स्पष्ट नहीं है, मैं फिर भी उन्हें प्रबुद्ध करूँगा और बचाऊँगा; लेकिन जो लोग सत्य को समझते हैं, परंतु फिर भी उसका अभ्यास नहीं करते, उन्हें पूर्वोक्त नियमों के अनुसार प्रशासित किया जाएगा, चाहे वे अज्ञानी हों या न हों। जहाँ तक उन लोगों की बात है, जिनके इरादे शुरू से ही ग़लत हैं, मैं उन्हें हमेशा के लिए वास्तविकता को समझने में असमर्थ बना दूँगा और अंततः वे धीरे-धीरे, एक-एक करके, समाप्त कर दिए जाएँगे। एक भी नहीं बचेगा, हालाँकि वे अभी मेरी व्यवस्था के अनुसार बने हुए हैं (क्योंकि मैं चीज़ों को जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि व्यवस्थित ढंग से करता हूँ)।

मेरा न्याय पूरी तरह से प्रकट है; यह विभिन्न लोगों को संबोधित करता है, उन सबको अपने उचित स्थान ले लेने चाहिए। मैं लोगों का प्रशासन और न्याय उनके द्वारा तोड़े गए नियमों के अनुसार करूँगा। जहाँ तक उनकी बात है, जो इस नाम में नहीं हैं और जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उन पर केवल एक ही नियम लागू होता है : जो कोई मेरी अवज्ञा करेंगे, मैं तुरंत उनकी आत्मा, जीव और देह ले लूँगा और उन्हें अधोलोक में फेंक दूँगा; जो मेरी अवज्ञा नहीं करते, मैं दूसरा न्याय करने से पहले तुम लोगों के परिपक्व होने की प्रतीक्षा करूँगा। मेरे वचन हर चीज़ पूरी स्पष्टता के साथ समझाते हैं और कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग हर समय उन्हें ध्यान में रखने में सक्षम होगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 67' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 95

अंत के दिन वे होते हैं जब सभी वस्तुएँ जीतने के द्वारा किस्म के अनुसार वर्गीकृत की जाएँगी। जीतना, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाएगा? तुम सब में किया जाने वाला वर्गीकरण का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, समस्त देशों को और सभी लोगों में भी विजय-कार्य किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, वह न्याय किए जाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आएगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसका किस्म के अनुसार वर्गीकरण नहीं किया जाता; प्रत्येक को वर्गीकृत किया जाएगा, क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट आ रहा है और जो भी स्वर्ग में और पृथ्वी पर है, वह अपने अंत पर पहुँच गया है। मनुष्य मानवीय अस्तित्व के अंतिम दिनों से कैसे बच सकता है? और इस प्रकार, तुम सब और कितनी देर तक अपनी अनाज्ञाकारिता के कार्य को जारी रख सकते हो? क्या तुम सब नहीं देखते कि तुम्हारे अन्तिम दिन सन्निकट हैं। वे जो परमेश्वर का सम्मान करते हैं और उसके प्रकट होने की प्रतीक्षा करते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकटन के दिन को कैसे नहीं देख सकते? वे नेकी के लिए अन्तिम पुरस्कार कैसे नहीं प्राप्त कर सकते? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है और फिर आज्ञापालन करता है या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है फिर शापित किया जाता है? क्या तुम न्याय के सिंहासन के समक्ष प्रकाश में जीते हो या तुम अधोलोक के अन्धकार के बीच जीते हो? क्या तुम्हीं साफ तौर पर नहीं जानते हो कि तुम्हारा अंत पुरस्कार पाने का होगा या दंड? क्या तुम बहुत साफ तौर पर एवं गहराई से नहीं समझते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? तो तुम्हारा आचरण और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? आज जब मैं तुम्हें जीतता हूँ, तो क्या मुझे तुम्हें वास्तव में यह बताने की आवश्यकता है कि तुम्हारा आचरण भला है या बुरा? तुमने मेरे लिए कितना त्याग किया है? तुम मेरी आराधना कितनी गहराई से करते हो? क्या तुम स्वयं अच्छी तरह से नहीं जानते कि तुम मेरे प्रति कैसा व्यवहार करते हो? किसी और से ज़्यादा खुद तुम्हें अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि आखिरकार तुम्हारा अन्त क्या होगा! मैं तुम्हें सच कहता हूँ : मैंने ही मनुष्यजाति को सृजा है और मैंने ही तुम्हें सृजा है; परन्तु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया; और न ही मैंने जानबूझकर तुम्हें अपने विरुद्ध किया या मेरा विरोध करने दिया और इस प्रकार तुम्हें दण्डित किया। क्या ये सब विपत्तियाँ और पीड़ाएँ तुमने इसलिए नहीं सहीं हैं, क्योंकि तुम्हारे हृदय अत्यधिक कठोर और तुम्हारा आचरण अत्यधिक घृणित है। अत:, क्या तुम सबने अपना अन्त स्वयं निर्धारित नहीं किया है? क्या तुम अपने हृदय में, इस बात को दूसरों से बेहतर नहीं जानते कि तुम सब का अंत कैसा होगा? मैं लोगों को इसलिए जीतता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें प्रकट करना और तुम्हारा उद्धार करना चाहता हूँ। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में ले जाने के लिए नहीं है। समय आने पर, तुम्हारी समस्त भयानक पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दाँत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इस प्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई ही तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका सर्वोत्तम प्रमाण नहीं है कि तुम्हारा अन्त क्या होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 96

एक गरजदार आवाज़ गूँजती है, पूरे ब्रह्माण्ड को थरथरा देती है। यह इतनी गगनभेदी है कि लोग समय रहते बचकर निकल नहीं पाते हैं। कुछ मारे जाते हैं, कुछ नष्ट हो जाते हैं, और कुछ का न्याय किया जा है। यह सचमुच एक नज़ारा है, कुछ उस तरह का जैसा पहले कभी किसी ने नहीं देखा। ध्यान से सुनो : बिजली कड़कने की गर्जनाओं के साथ रोने की आवाज़ आ रही है। यह आवाज़ अधोलोक से आ रही है, यह नरक से आ रही है। यह विद्रोह के उन पुत्रों की कटु आवाज़ है जिनका मेरे द्वारा न्याय किया गया है। जिन्होंने मेरा कहा ध्यान से नहीं सुना और जो मेरे वचनों को अभ्यास में नहीं लाए, उनका कठोरतापूर्वक न्याय किया गया है और वे मेरे प्रचंड कोप के शाप के भागी बने हैं। मेरी आवाज़ न्याय और कोप है; मैं किसी के भी साथ नरमी नहीं बरतता और किसी के भी प्रति दया नहीं दिखाता हूँ, क्योंकि मैं धार्मिक परमेश्वर स्वयं हूँ, और मैं कोप से युक्त हूँ; मैं ज्वलन, प्रक्षालन, और विनाश से युक्त हूँ। मुझमें कुछ भी छिपा हुआ, या भावुकतापूर्ण नहीं है, बल्कि इसके विपरीत, सब कुछ खुला, धार्मिक, और निष्पक्ष है। चूँकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र पहले ही सिंहासन पर मेरे साथ हैं, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों के ऊपर शासन कर रहे हैं, जो चीज़ें और लोग अन्यायी और अधार्मिक हैं, उनका न्याय किया जाना अब शुरू हो रहा है। मैं एक-एक कर उनकी जाँच-पड़ताल करूँगा, कुछ भी नहीं छोड़ूँगा, और उन्हें पूर्णतः प्रकट करूँगा। चूँकि मेरा न्याय पूरी तरह प्रकट हो गया है और पूरी तरह खोल दिया गया है, और मैंने बिल्कुल कुछ भी छिपाया नहीं है; इसलिए मैं उस सबको निकाल फेंकूँगा जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं है, और उसे अथाह कुंड में अनंत काल के लिए नष्ट हो जाने दूँगा। वहाँ मैं उसे सदा के लिए जलने दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है; यह मेरा खरापन है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता है, और सब मेरी प्रभुता के अधीन होना ही चाहिए।

अधिकांश लोग मेरे कथनों को अनदेखा करते हैं, यह सोचकर कि वचन तो बस वचन हैं और तथ्य तो तथ्य हैं। वे अंधे हैं! क्या वे नहीं जानते हैं कि मैं निष्ठावान परमेश्वर स्वयं हूँ? मेरे वचन और तथ्य एक साथ घटित होते हैं। क्या सचमुच ऐसा नहीं है? लोग मेरे वचनों को बूझते ही नहीं, और केवल वे ही सच में समझते हैं जो प्रबुद्ध किए गए हैं। यह तथ्य है। लोग ज्यों ही मेरे वचनों को देखते हैं, वे बुरी तरह भयभीत हो जाते हैं, और छिपने के लिए घबराहट में चारों तरफ भागने लगते हैं। यह तब और अधिक होता है जब मेरा न्याय बरसता है। जब मैंने सभी चीज़ों का सृजन किया, जब मैं दुनिया को नष्ट करता हूँ, और जब मैं ज्येष्ठ पुत्रों को पूरा करता हूँ—तब ये सारी चीज़ें मेरे मुख से निकले एक ही वचन से संपन्न होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरा वचन अपने आप में अधिकार है; यह न्याय है। कहा जा सकता है कि यह व्यक्तित्व जो मैं हूँ, यही न्याय, और प्रताप है; यह अकाट्य तथ्य है। यह मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं का एक पहलू है; यह मात्र एक तरीक़ा है जिससे मैं लोगों का न्याय करता हूँ। मेरी नज़रों में, सारे लोगों, सारे मामलों, और सारी चीज़ों सहित सब कुछ मेरे हाथों में और मेरे न्याय के अधीन है। कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ अंधाधुंध या मनमाने ढंग से व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करती है, और सब कुछ मेरे कहे वचनों के अनुसार संपन्न होना ही चाहिए। मनुष्य की धारणाओं के भीतर, हर कोई मैं जो व्यक्तित्व हूँ, उस व्यक्तित्व के वचनों पर विश्वास करता है। जब मेरा आत्मा बोलता है, हर कोई संशय से भरा जाता है। लोगों को मेरी सर्वशक्तिमत्ता का रत्ती भर ज्ञान नहीं है, यहाँ तक कि वे मेरे विरुद्ध अभियोग भी लगाते हैं। अब मैं तुझे बताता हूँ, जो भी मेरे वचनों पर संदेह करते हैं, जो भी मेरे वचन का तिरस्कार करते हैं, यही वे हैं जो नष्ट कर दिए जाएँगे; वे विनाश के शाश्वत पुत्र हैं। इससे देखा जा सकता है कि बहुत कम हैं जो ज्येष्ठ पुत्र हैं, क्योंकि मैं इसी तरह कार्य करता हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, मैं एक अंगुली भी हिलाए बिना सब कुछ संपन्न करता हूँ: मैं बस अपने वचनों का प्रयोग करता हूँ। यही वह है जहाँ मेरी सर्वशक्तिमत्ता निहित है। मेरे वचनों में, कोई भी मेरे कहे के स्रोत और उद्देश्य का पता नहीं लगा सकता है। लोग यह नहीं कर सकते, और वे तभी कुछ कर सकते हैं जब वे मेरे मार्गदर्शन में रहें, और मेरी धार्मिकता के अनुसार, मेरी इच्छा के अनुरूप सब कुछ करें, जिससे मेरा परिवार धार्मिकता और शांति प्राप्त करे, सदा के लिए जीवित रहे, और अनंतकाल तक दृढ़ और अटल रहे।

मेरा न्याय हरेक तक पहुँचता है, मेरी प्रशासनिक आज्ञाएँ हरेक को स्पर्श करती हैं, और मेरे वचन तथा मेरा व्यक्तित्व हरेक पर प्रकट किया जाता है। यह मेरे आत्मा के महान कार्य का समय है (इस समय वे जिन्हें धन्य किया जाएगा और वे जो दुर्भाग्य झेलेंगे, एक दूसरे से अलग किए जाते हैं)। मेरे वचनों के निकलते ही, मैंने उन लोगों को अलग कर दिया जिन्हें धन्य किया जाएगा और साथ ही उन्हें भी जो दुर्भाग्य झेलेंगे। यह सब शीशे की तरह साफ़ है, और मैं एक नज़र में यह सब देख सकता हूँ। (मैं यह अपनी मानवता के संबंध में कह रहा हूँ; इसलिए ये वचन मेरे प्रारब्ध और चयन का खंडन नहीं करते।) मैं पहाड़ों और नदियों और सारी चीज़ों के बीच फिरता हूँ, ब्रह्माण्ड के अंतरिक्षों में चारों ओर, प्रत्येक स्थान को ध्यान से देखता और स्वच्छकरता हूँ, जिससे मेरे वचनों के परिणामस्वरूप उन सब अस्वच्छ ठिकानों और कामुक भूमियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और वे भस्म होकर शून्यता में विलीन हो जाएँगी। मेरे लिए, सब कुछ आसान है। यदि अभी वह समय होता जो मैंने दुनिया को नष्ट करने के लिए पूर्वनिर्धारित किया था, तो मैं मात्र एक वचन के कथन के साथ इसे निगल सकता था। लेकिन अभी वह समय नहीं है। इससे पहले कि मैं यह कार्य करूँ, सब-कुछ तैयार होना चाहिए, ताकि मेरी योजना बाधित न हो और मेरे प्रबंधन में खलल न पड़े। मैं जानता हूँ कि इसे यथोचित ढंग से कैसे करना है : मेरे पास मेरी बुद्धि है, और मेरे पास मेरी अपनी व्यवस्थाएँ हैं। लोगों को एक अंगुली भी नहीं हिलानी चाहिए; उन्हें सावधान रहना चाहिए कि मेरे हाथों मारे न जाएँ। यह मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं का पहले ही ज़िक्र कर चुका है। इसमें मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं की कठोरता, और साथ ही उनके पीछे निहित सिद्धांतों को देखा जा सकता है, जिनके दो पहलू हैं : एक ओर, मैं उन सभी को मार देता हूँ जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं होते और मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं; दूसरी ओर, अपने कोप में मैं उन सभी को शाप देता हूँ जो मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं। ये दोनों पहलू अपरिहार्य हैं और मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं के पीछे के कार्यकारी सिद्धांत हैं। चाहे कोई कितना भी वफ़ादार क्यों न हो, प्रत्येक को भावना से रहित होकर, इन्हीं दो सिद्धांतों के अनुसार, संभाला जाता है। यह मेरी धार्मिकता, मेरा प्रताप, और मेरा कोप दिखाने के लिए पर्याप्त है, जो सभी पार्थिव चीज़ों, सभी सांसारिक चीज़ों और उन सभी चीज़ों को भस्म कर देगा जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं। मेरे वचनों में रहस्य हैं जो छिपे रहते हैं, और मेरे वचनों में ऐसे रहस्य भी हैं जो प्रकट कर दिए गए हैं। इस तरह, मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, और मानव मन में, मेरे वचन सदा के लिए अबूझ हैं, और मेरा हृदय सदा के लिए अज्ञेय है। अर्थात, मुझे मनुष्यों को उनकी धारणाओं और सोच से बाहर निकालना ही होगा। यह मेरी प्रबंधन योजना का सबसे महत्वपूर्ण अंश है। मुझे अपने ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करने और उन कामों को पूरा करने के लिए जिन्हें मैं करना चाहता हूँ, इसे इस तरह से करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 103' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 97

सिय्योन! ख़ुशी मनाओ! सिय्योन! गाओ-बजाओ! मैं जीतकर लौटा हूँ, मैं विजयी होकर लौटा हूँ! सभी लोगो! जल्दी से सही ढंग से पंक्तिबद्ध हो जाओ! सृष्टि की सभी चीज़ो! अब रुक जाओ, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व पूरे ब्रह्मांड के सामने है और दुनिया के पूर्व में प्रकट हो रहा है! कौन आराधना में घुटने नहीं टेकने का साहस करता है? कौन मुझे सच्चा परमेश्वर नहीं कहने का साहस करता है? कौन श्रद्धा से नहीं देखने का साहस करता है? कौन स्तुति नहीं करने का साहस करता है? कौन ख़ुशी नहीं मनाने का साहस करता है? मेरे लोग मेरी आवाज सुनेंगे, और मेरे पुत्र मेरे राज्य में जीवित रहेंगे! पर्वत, नदियाँ और सभी चीज़ें निरंतर जयजयकार करेंगी, और बिना रुके छलाँग लगाएँगी। इस समय कोई पीछे हटने का साहस नहीं करेगा, और कोई भी प्रतिरोध में उठने का साहस नहीं करेगा। यह मेरा अद्भुत कर्म है, और इससे भी बढ़कर, यह मेरा महान सामर्थ्य है! मैं अपने आपको सबसे उनके हृदयों में सम्मानित करवाऊँगा और इससे भी बढ़कर, मैं सबसे अपनी स्तुति करवाऊँगा। यह मेरी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का अंतिम उद्देश्य है, और यही मैंने नियत किया है। एक भी व्यक्ति, वस्तु या घटना मेरे प्रतिरोध में उठने या मेरा विरोध करने का साहस नहीं करती। मेरे सभी लोग मेरे पर्वत पर (दूसरे शब्दों में, उस दुनिया में, जिसे मैं बाद में बनाऊँगा) चले जाएँगे और वे मेरे सामने समर्पण करेंगे, क्योंकि मुझमें प्रताप और न्याय है, और मैं अधिकार रखता हूँ। (इसका आशय तब से है, जब मैं शरीर में होता हूँ। मेरे पास देह में भी अधिकार है, किंतु चूँकि देह में समय और स्थान की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने पूरी महिमा प्राप्त कर ली है। यद्यपि मैं देह में ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करता हूँ, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है। केवल जब मैं सिय्योन लौटूँगा और अपना रूप बदलूँगा, तभी यह कहा जा सकेगा कि मैं अधिकार रखता हूँ—अर्थात् यह कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है।) मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। मेरे मुँह के वचनों से सब नष्ट हो जाएँगे, और मेरे मुँह के वचनों से सब अस्तित्व में आ जाएँगे और पूर्ण बनाए जाएँगे। ऐसा महान मेरा सामर्थ्य है और ऐसा मेरा अधिकार है। चूँकि मैं सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से परिपूर्ण हूँ, इसलिए कोई व्यक्ति मुझे बाधित करने का साहस नहीं कर सकता। मैंने पहले ही हर चीज़ पर विजय प्राप्त कर ली है, और मैंने विद्रोह के सभी पुत्रों पर जीत हासिल कर ली है। मैं सिय्योन लौटने के लिए अपने ज्येष्ठ पुत्रों को अपने साथ ले जा रहा हूँ। मैं अकेला सिय्योन नहीं लौट रहा हूँ। इसलिए सभी मेरे ज्येष्ठ पुत्रों को देखेंगे और इस प्रकार अपने हृदय में मेरे लिए श्रद्धा का भाव विकसित करेंगे। ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करने का यही मेरा उद्देश्य है, और दुनिया के निर्माण के समय से ही यह मेरी योजना रही है।

जब सब-कुछ तैयार हो जाएगा, तो वह मेरे सिय्योन लौटने का दिन होगा, और वह दिन सभी लोगों द्वारा मनाया जाएगा। जब मैं सिय्योन लौटूँगा, तो पृथ्वी पर सभी चीज़ें चुप हो जाएँगी, और पृथ्वी पर सब शांत होगा। जब मैं सिय्योन लौट जाऊँगा, तो हर चीज़ पुन: अपने मूल रूप में आ जाएगी। फिर मैं सिय्योन में अपना कार्य शुरू करूँगा। मैं दुष्टों को दंड दूँगा और अच्छे लोगों को इनाम दूँगा, और मैं अपनी धार्मिकता को लागू करूँगा और अपने न्याय को कार्यान्वित करूँगा। मैं हर चीज़ पूरी करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करूँगा, और सभी लोगों और सभी चीज़ों को अपने ताड़ना देने वाले हाथ का अनुभव करवाऊँगा, और मैं सभी लोगों को अपनी पूरी महिमा, अपनी पूरी बुद्धि, अपनी पूरी उदारता दिखवाऊँगा। कोई भी व्यक्ति आलोचना करने के लिए उठने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें पूरी होती हैं, और यहाँ, हर आदमी मेरी पूरी गरिमा देखे और मेरी पूरी जीत का स्वाद ले, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें अभिव्यक्त होती हैं। इससे मेरे महान सामर्थ्य और मेरे अधिकार को देखना संभव है। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करेगा, और कोई मुझे बाधित करने का साहस नहीं करेगा। मुझमें सब खुला हुआ है। कौन कुछ छिपाने का साहस करेगा? मैं निश्चित रूप से उस व्यक्ति पर दया नहीं दिखाऊँगा! ऐसे अभागों को मेरी गंभीर सजा मिलनी चाहिए और ऐसे बदमाशों को मेरी नजरों से दूर कर दिया जाना चाहिए। मैं ज़रा-सी भी दया न दिखाते हुए और उनकी भावनाओं का ज़रा भी ध्यान न रखते हुए, उन पर लोहे की छड़ी से शासन करूँगा और मैं उनका न्याय करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करूँगा, क्योंकि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो भावना से रहित है और प्रतापी है और जिसका अपमान नहीं किया जा सकता। सभी को यह समझना और देखना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि "बिना कारण या तर्क" के मेरे द्वारा मार डाले और नष्ट कर दिए जाएँ, क्योंकि मेरी छड़ी उन सभी को मार डालेगी, जो मुझे अपमानित करते हैं। मुझे इस बात की परवाह नहीं वे मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं को जानते हैं या नहीं; इसका मेरे लिए कोई महत्व नहीं होगा, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व किसी के भी द्वारा अपमानित किया जाना बरदाश्त नहीं करता। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि मैं एक शेर हूँ; जिस किसी को भी छूता हूँ, उसे मार डालता हूँ। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि अब यह कहना कि मैं करुणा और प्रेम का परमेश्वर हूँ, मेरी निंदा करना है। सारांश यह कि मैं मेमना नहीं, बल्कि शेर हूँ। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करता; जो कोई मेरा अपमान करेगा, मैं बिना दया के तुरंत उसे मृत्युदंड दूँगा! यह मेरा स्वभाव दिखाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, अंतिम युग में लोगों का एक बड़ा समूह पीछे हट जाएगा, और यह लोगों के लिए सहना मुश्किल होगा, लेकिन जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं आराम से और खुश हूँ और मैं इसे कठिन कार्य बिलकुल नहीं समझता। ऐसा मेरा स्वभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 120' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 98

राज्य में, सृष्टि की असंख्य चीज़ें पुनर्जीवित होना और अपनी जीवन शक्ति फिर से प्राप्त करना आरम्भ करती हैं। पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण, एक तथा दूसरी भूमि के बीच सीमाएँ भी खिसकने लगती हैं। मैं भविष्यवाणी कर चुका हूँ कि जब ज़मीन को ज़मीन से अलग किया जाता है, और जब ज़मीन ज़मीन से जुड़ती है, यही वह समय होगा जब मैं सारे राष्ट्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। इस समय, मैं सारी सृष्टि को फिर नया करूँगा और समस्त ब्रह्माण्ड को पुनर्विभाजित करूँगा, इस प्रकार पूरे ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित करूँगा, और पुराने को नए में रूपान्तरित कर दूँगा—यह मेरी योजना है और ये मेरे कार्य हैं। जब संसार के सभी राष्ट्र और लोग मेरे सिंहासन के सामने लौटेंगे, तब मैं स्वर्ग का सारी वदान्यता लेकर इसे मानव संसार को सौंप दूँगा, जिससे, मेरी बदौलत, वह संसार बेजोड़ वदान्यता से लबालब भर जाएगा। किन्तु जब तक पुराने संसार का अस्तित्व बना रहता है, मैं अपना प्रचण्ड रोष इसके राष्ट्रों के ऊपर पूरी ज़ोर से बरसाऊंगा, समूचे ब्रह्माण्ड में खुलेआम अपनी प्रशासनिक आज्ञाएँ लागू करूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करेगा, उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे।

जैसे-जैसे मेरी आवाज़ की तीव्रता गहरी होती जाती है, मैं ब्रह्माण्ड की दशा का भी अवलोकन करता हूँ। मेरे वचनों के माध्यम से, सृष्टि की असंख्य चीज़ें बिल्कुल नई बना दी जाती हैं। स्वर्ग बदलता है, और पृथ्वी भी बदलती है। मानवता अपने मूल रूप में उजागर होती है और, धीरे-धीरे, प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रकार के अनुसार पृथक कर दिया जाता है और वह एकाएक अपने परिवारों के आलिंगन में वापस जाने का अपना रास्ता खोज लेता है। इससे मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी। मैं व्यवधान से मुक्त हूँ, और, अलक्षित रूप से, मेरा महा कार्य संपन्न होता है, और सृष्टि की सभी असंख्य चीज़ें रूपान्तरित हो गई हैं। जब मैंने संसार की सृष्टि की थी, मैंने सभी चीज़ों को उनकी किस्म के अनुसार ढाला था, रूपाकृतियों वाली सभी चीज़ों को उनकी किस्म के अनुसार एक साथ रखा था। मेरी प्रबन्धन योजना का अंत ज्यों-ज्यों नज़दीक आएगा, मैं सृष्टि की पूर्व दशा बहाल कर दूँगा, मैं प्रत्येक चीज़ को पूर्णतः बदलते हुए हर चीज़ को उसी प्रकार बहाल कर दूँगा जैसी वह मूलतः थी, जिससे हर चीज़ मेरी योजना के आलिंगन में लौट आएगी। समय आ चुका है! मेरी योजना का अंतिम चरण संपन्न होने वाला है। आह, पुराना अस्वच्छ संसार! तू पक्का मेरे वचनों के अधीन आएगा! तू पक्का मेरी योजना के द्वारा अस्तित्वहीन हो जाएगा! आह, सृष्टि की अनगिनत चीज़ो! तुम सब मेरे वचनों के भीतर नया जीवन प्राप्त करोगी—तुम्हारे पास तुम्हारा सार्वभौम प्रभु होगा! आह, शुद्ध और निष्कलंक नये संसार! तू पक्का मेरी महिमा के भीतर पुनर्जीवित होगा! आह, सिय्योन पर्वत! अब और मौन मत रह। मैं विजयोल्लास के साथ लौट आया हूँ! सृष्टि के बीच से, मैं समूची पृथ्वी को बारीक़ी से देखता हूँ। पृथ्वी पर मानवजाति ने नए जीवन की शुरुआत की है, और नई आशा जीत ली है। आह, मेरे लोगो! ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग मेरे प्रकाश के भीतर पुनर्जीवित न हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग मेरे मार्गदर्शन के अधीन आनन्द से न उछलो? भूमि उल्लास से चिल्ला रही है, समुद्र उल्लासपूर्ण हंसी से उफन रहे हैं! आह, पुनर्जीवित इस्राएल! मेरे द्वारा पूर्वनियत किए जाने की वजह से तुम कैसे गर्व महसूस नहीं कर सकते हो? कौन रोया है? किसने विलाप किया है? पहले का इस्राएल समाप्त हो गया है, और आज के इस्राएल का उदय हुआ है, जो संसार में सीधा और बहुत ऊँचा खड़ा है, और समस्त मानवता के हृदय में तनकर डटा हुआ है। आज का इस्राएल मेरे लोगों के माध्यम से अस्तित्व का स्रोत निश्चित रूप से प्राप्त करेगा! आह, घृणास्पद मिस्र! निश्चित रूप से तू अब भी मेरे विरुद्ध खड़ा तो नहीं है? तू कैसे मेरी दया का लाभ उठा सकता है और मेरी ताड़ना से बचने की कोशिश कर सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तू मेरी ताड़ना के के दायरे में विद्यमान न हो? वे सभी जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, निश्चय ही अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, और वे सभी जो मेरे विरुद्ध खड़े हैं, निश्चय ही अनन्त काल तक मेरे द्वारा ताड़ित किए जाएँगे। क्योंकि मैं एक ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ, मनुष्यों ने जो किया है, उस सबके लिए उन्हें हल्के में नहीं छोडूँगा। मैं पूरी पृथ्वी पर निगरानी रखूँगा, और धार्मिकता, प्रताप, कोप और ताड़ना के साथ संसार के पूर्व में प्रकट होते हुए, मानवजाति के असंख्य समुदायों के समक्ष स्वयं को उजागर करूँगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 26' से उद्धृत

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