IV. देहधारण

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 99

देहधारण का अर्थ यह है कि परमेश्वर देह में प्रकट होता है, और वह अपनी सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करने आता है। इसलिए, परमेश्वर को देहधारी होने के लिए, सबसे पहले देह बनना होगा, सामान्य मानवता वाली देह; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रह कर कार्य करता है, परमेश्वर अपने वास्तविक सार में देहधारी बन जाता है, एक मनुष्य बन जाता है। उसके देहधारी जीवन और कार्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला उसका वह जीवन है जो उसने अपनी सेवकाई प्रारम्भ करने से पहले जीया। वह मानव जीवन की सामान्य नैतिकताओं और व्यवस्थाओं का पालन करते हुए, मानव जीवन की सामान्य आवश्यकताओं (भोजन, कपड़े, आवास, निद्रा), सामान्य मानवीय कमज़ोरियों और सामान्य मानवीय भावनाओं के साथ, पूरी तरह से सामान्य मानवता में, एक सामान्य मानव परिवार में रहता है। दूसरे शब्दों में, इस पहले चरण के दौरान वह सभी मानवीय क्रियाकलापों में शामिल होते हुए, गैर-दिव्य, पूरी तरह से सामान्य मानवता में रहता है। दूसरा चरण वह जीवन है जो वह अपनी सेवकाई को आरम्भ करने के बाद जीता है। वह अभी भी, अलौकिक शक्ति के किसी भी बाहरी संकेत को प्रकट नहीं करते हुए, एक सामान्य मानव आवरण के साथ, सामान्य मानवता में रहता है। फिर भी वह अपनी सेवकाई के वास्ते ही विशुद्ध रूप से जीता है, और इस दौरान उसकी सामान्य मानवता पूरी तरह से उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को करने में लगी रहती है; क्योंकि तब तक उसकी सामान्य मानवता उसकी सेवकाई के कार्य को करने में समर्थ होने की स्थिति तक परिपक्व हो जाती है। इसलिए उसके जीवन का दूसरा चरण अपनी सामान्य मानवता में अपनी सेवकाई को करना है, एक सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता का जीवन दोनों है। अपने जीवन के प्रथम चरण में वह पूरी तरह से साधारण मानवता का जीवन जीता है उसका कारण यह है कि उसकी मानवता अभी तक दिव्य कार्य की समग्रता के बराबर नहीं है, अभी तक वह परिपक्व नहीं हुई है; केवल जब उसकी मानवता परिपक्व हो जाती है, उसकी सेवकाई को सहारा प्रदान करने के योग्य बन जाती है, तभी वह अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता है। चूँकि उसे एक देह के रूप में बढ़ने और परिपक्व होने की आवश्यकता है, इसलिए उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन है, जबकि दूसरे चरण में, क्योंकि उसकी मानवता उसके कार्य का दायित्व लेने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम है, इसलिए अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का एक जीवन है। यदि अपने जन्म के समय से ही देहधारी परमेश्वर, अलौकिक संकेतों और चमत्कारों को दिखाते हुए, गंभीरता से अपनी सेवकाई आरम्भ कर देता, तो उसमें कोई भी दैहिक सार नहीं होता। इसलिए, उसकी मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में है; मानवता के बिना कोई भी देह नहीं हो सकती है, और मानवता के बिना कोई व्यक्ति मानव नहीं होता है। इस तरह से, परमेश्वर के देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण की अंतर्भूत सम्पत्ति है। ऐसा कहना कि "जब परमेश्वर देहधारण करता है तो वह पूरी तरह से दिव्य होता है, मानव बिल्कुल नहीं होता है" ईशनिंदा है, क्योंकि इस वक्तव्य का कोई अस्तित्व है ही नहीं, एक ऐसा दृष्टिकोण जो देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यहाँ तक कि उसके अपनी सेवकाई को आरम्भ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह अभी भी बाह्य मानवीय आवरण के साथ अपनी दिव्यता में रहता है; यह सिर्फ़ इतना ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एक मात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य का अभिकर्ता उसमें रहने वाली दिव्यता है। कार्य में यह उसकी दिव्यता है न कि उसकी मानवता, फिर भी यह उसकी मानवता में छिपी हुई एक दिव्यता है; उसका कार्य सार रूप में उसकी सम्पूर्ण दिव्यता के द्वारा किया जाता है, न कि उसकी मानवता के द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाला उसका देह है। कोई व्यक्ति ऐसा कह सकता है कि वह मनुष्य है और परमेश्वर भी है, क्योंकि परमेश्वर, एक मानव आवरण वाला और मानवीय सार वाला बल्कि परमेश्वर के सार वाला भी, देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है। क्योंकि वह परमेश्वर के सार वाला एक मनुष्य है, वह किसी भी सृजन किए गए मानव से ऊपर है, किसी भी ऐसे मनुष्य से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। और इसलिए, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी के बीच, उन सभी के बीच जो मानवता को धारण करते हैं, केवल वही देहधारी परमेश्वर स्वयं है—अन्य सभी सृजन किए गए मानव हैं। यद्यपि उन सब में मानवता है, किन्तु सृजन किए गए मानव में और कुछ नहीं केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न हैः अपनी देह में उसमें न केवल मानवता है बल्कि इससे महत्वपूर्ण दिव्यता है। उसकी मानवता उसकी देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को समझना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं है जैसी होने की लोग कल्पना करते हैं, लोगों के लिए इसे देखना बहुत ही कठिन है। यहाँ तक कि आज भी लोगों के लिए देहधारी परमेश्वर के सच्चे सार की थाह पाना बहुत कठिन है। इसके बारे में मेरे द्वारा इतने विस्तार से बताने के बाद भी, मैं अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह अभी भी एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, इसलिए उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन परमेश्वर स्वयं, पृथ्वी पर परमेश्वर स्वयं कहलाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 100

पृथ्वी पर यीशु ने जो जीवन जिया वह देह में एक सामान्य जीवन था। उसने अपने देह का सामान्य जीवन जिया। उसके अधिकार—अपना कार्य करना और अपने वचन बोलना, या बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना, ऐसे असाधारण कार्य करना—ने ज़्यादातर स्वयं को तब तक प्रकट नहीं किया जब तक उसने अपनी सेवकाई आरम्भ नहीं की। उसका जीवन उनतीस वर्ष की उम्र से पहले, उसके अपनी सेवकाई आरम्भ करने से पहले, इस बात का पर्याप्त प्रमाण था कि वह एक सामान्य देह वाला था। इस कारण से और क्योंकि उसने अभी तक अपनी सेवकाई को करना आरम्भ नहीं किया था, लोगों को उसमें कुछ भी दिव्य नहीं दिखाई दिया, एक सामान्य मानव, एक सामान्य मनुष्य से अधिक कुछ नहीं दिखाई दिया—ठीक जैसे कि उस समय कुछ लोग उसे यूसुफ के पुत्र के रूप में मानते थे। लोगों ने सोचा कि वह एक सामान्य मनुष्य का पुत्र है, उसके पास यह बताने का कोई तरीका नहीं था कि वह देहधारी परमेश्वर का देह है; यहाँ तक कि जब, अपनी सेवकाई को करने के दौरान, उसने कई अचम्भे किए, तब भी अधिकांश लोगों ने कहा कि वह यूसुफ का पुत्र है, क्योंकि सामान्य मानवता के बाह्य आवरण वाला वह मसीह था। उसकी सामान्य मानवता और कार्य दोनों, यह सिद्ध करते हुए कि परमेश्वर पूरी तरह से देह में आया है, जो कि एक बहुत ही साधारण मनुष्य बन गया है, पहले देहधारण के महत्व को पूर्ण करने के लिए अस्तित्व में थे। यह कि कार्य करने से पहले उसकी सामान्य मानवता थी यह इस बात का प्रमाण था कि वह एक साधारण देह था; और यह कि उसने बाद में भी कार्य किया इस बात ने भी यह प्रमाणित किया कि वह एक साधारण देह था, क्योंकि उसने सामान्य मानवता में, संकेत और चमत्कार किए, बीमार को चंगा किया और दुष्टात्माओं को देह में से निकाला। वह चमत्कारों को कर सका उसका कारण यह था कि उसके देह ने परमेश्वर के अधिकार को धारण किया था, ऐसा देह था जिसमें परमेश्वर का आत्मा आच्छादित था। वह परमेश्वर के आत्मा के कारण इस अधिकार से सम्पन्न था, और इसका अर्थ यह नहीं है कि वह देह नहीं था। बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना वह कार्य था जो उसे अपनी सेवकाई में करने की आवश्यकता थी, उसकी मानवता में छिपी दिव्यता की अभिव्यक्ति थी, और इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि उसने कौन से संकेत दिखाए या उसने अपने अधिकार को किस प्रकार से प्रदर्शित किया, वह तब भी सामान्य मानवता में रहा और तब भी एक सामान्य देह था। उस स्थिति तक कि वह सलीब पर मरने के बाद पुनर्जीवित हुआ था, तो वह एक सामान्य देह के भीतर रहा। अनुग्रह प्रदान करना, बीमार को चंगा करना, और दुष्टात्माओं को निकालना, ये सब उसकी सेवकाई का हिस्सा थे, ऐसे कार्य थे जो उसके सामान्य देह में किए गए थे। क्रूस पर जाने से पहले, इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या कर रहा है, वह कभी भी अपने सामान्य मानव देह से अलग नहीं हुआ। वह परमेश्वर स्वयं था, परमेश्वर का ही कार्य कर रहा था, फिर भी क्योंकि वह परमेश्वर का देहधारी देह था, उसने खाना खाया और कपड़े पहने, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ थी, उसमें सामान्य मानवीय तर्क-शक्ति और सामान्य मानवीय मन था। यह सब इस बात का प्रमाण था कि वह एक सामान्य मनुष्य था, न कि कोई अलौकिक। उसका कार्य परमेश्वर के पहले देहधारण के कार्य को पूर्ण करना, और पहले देहधारण की सेवकाई को पूरा करना था। देहधारण का महत्व यह है कि वह साधारण, सामान्य मनुष्य परमेश्वर स्वयं के कार्यों को करता है; अर्थात्, कि परमेश्वर अपने दिव्य कार्य को मानवता में करता है और उसके द्वारा शैतान को परास्त करता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; जो कार्य वह देह में करता है वह पवित्रात्मा का कार्य होता है, जो देह में प्राप्त होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर को छोड़कर कोई भी अन्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूर्ण नहीं कर सकता है; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानवता—और कोई अन्य नहीं—दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। यदि, उसके पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले परमेश्वर में सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जैसे ही उसने जन्म लिया था वह अचम्भे कर सकता, यदि जैसे ही उसने बोलना आरम्भ किया वह स्वर्ग की भाषा बोल सकता, यदि जिस क्षण उसने सबसे पहले पृथ्वी पर कदम रखा वह सभी संसारिक मामलों को समझ सकता, हर व्यक्ति के विचारों और इरादों को समझ सकता—इस प्रकार का मनुष्य एक सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसे देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि ऐसा मामला मसीह के साथ होता, तो परमेश्वर के देहधारण का अर्थ और सार खो गए होते। उसके पास सामान्य मानवता है, इससे सिद्ध होता है कि वह देह में देहधारी परमेश्वरहै; यह तथ्य कि वह एक सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से होकर गुज़रता है प्रदर्शित करता है कि वह एक सामान्य देह है; और इसके अलावा, उसका कार्य इस बात का पर्याप्त सबूत है कि वह परमेश्वर का वचन है, देह बना परमेश्वर का आत्मा है। कार्य की आवश्यकताओं की वजह से परमेश्वर देहधारी बनता है; दूसरे शब्दों में, कार्य का यह चरण देह में पूर्ण किए जाने, सामान्य मानवता में पूर्ण किए जाने की आवश्यकता थी। यही "वचन का देहधारी होना" के लिए, "वचन का देह में प्रकट होना" के लिए पूर्वापेक्षा है, और परमेश्वर के दो देहधारणों के पीछे की सच्ची कहानी है। लोगों का यह मानना हो सकता है कि यीशु का सम्पूर्ण जीवन चमत्कारों से भरा था, कि पृथ्वी पर अपने कार्य की समाप्ति तक उसने सामान्य मानवता को प्रकट नहीं किया, कि उसमें सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ या कमज़ोरियाँ या मानवीय भावनाएँ नहीं थीं, उसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओँ की या सामान्य मानवीय विचारों को ग्रहण करने की ज़रूरत नहीं थी। वे उसके पास केवल एक अतिमानवीय मन, एक सर्वोत्त्कृष्ट मानवता होने की कल्पना करते हैं। वे मानते हैं कि चूँकि वह परमेश्वर है, इसलिए उसे उस तरह से रहना और सोचना नहीं चाहिए जैसे सामान्य मानव रहते और सोचते हैं, कि केवल कोई सामान्य व्यक्ति, एक वास्तविक इंसान, ही सामान्य मानव विचारों को सोच सकता और एक सामान्य मानवीय जीवन जी सकता है। ये सभी मनुष्य के विचार, और मनुष्य की अवधारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के कार्य के वास्तविक इरादों के प्रतिकूल चलते हैं। सामान्य मानव सोच, सामान्य मानव सूझ-बूझ और साधारण मानवता को बनाए रखती है; सामान्य मानवता देह के सामान्य प्रकार्यों को बनाए रखती है; और देह के सामान्य प्रकार्य देह के सामान्य जीवन को इसकी समग्रता में बनाए रखते हैं। केवल ऐसे देह में कार्य करने के द्वारा ही परमेश्वर अपने देहधारण के उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है। यदि देहधारी परमेश्वर केवल देह के बाहरी आवरण को ही धारण किए रहता, किन्तु सामान्य मानव विचारों को नहीं सोचता, तो उसका देह मानवीय सूझ-बूझ को धारण नहीं करता, वास्तविक मानवता को तो बिल्कुल भी धारण नहीं करता। कैसे, बिना मानवता वाला, इस प्रकार का देह, उस सेवकाई को पूर्ण कर सकता है जिसे देहधारी परमेश्वर को करना चाहिए? सामान्य मन मानव जीवन के सभी पहलुओं को बनाए रखता है; बिना सामान्य मन के, कोई व्यक्ति मानव नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जो सामान्य विचारों को नहीं सोचता है वह मानसिक रूप से बीमार है। एक मसीह जिसमें कोई भी मानवता नहीं बल्कि केवल दिव्यता है उसे परमेश्वर का देहधारी देह नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर के देहधारी देह में कैसे कोई सामान्य मानवता नहीं हो सकती है? क्या ऐसा कहना ईशनिंदा नहीं होगी कि मसीह में कोई मानवता नहीं है? सभी क्रियाकलाप जिसमें सामान्य मानव शामिल होते हैं एक सामान्य मानव मन की कार्यशीलता पर भरोसा करते हैं। इसके बिना, मानव पथभ्रष्ट की तरह का व्यवहार करते; वे यहाँ तक कि सफेद और काले, अच्छे और बुरे के मध्य अंतर बताने में भी असमर्थ होते, और उनमें कोई भी मानवीय आचारनीति और नैतिक सिद्धांत नहीं होते। इसी प्रकार से, यदि देहधारी परमेश्वर ने एक सामान्य मानव के रूप में नहीं सोचा होता, तो वह एक प्रमाणिक देह, एक सामान्य देह नहीं होता। इस प्रकार का गैर-विचारशील देह दिव्य कार्य को धारण करने में समर्थ नहीं होता। वह सामान्य देह की गतिविधियों में शामिल होने में सामान्य रूप से समर्थ नहीं होता, पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ-साथ रहने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं होता। और इसलिए परमेश्वर के देहधारण का महत्व, परमेश्वर का देह में आने का वास्तविक सार समाप्त हो गया होता। परमेश्वर के देहधारण की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को बनाए रखती है। कोई व्यक्ति कह सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि यह देह एक सामान्य मानव मन धारण नहीं करती, तो परमेश्वर देह में कार्य नहीं कर सकता था और जो उसे देह में करने की आवश्यकता थी वह कभी भी सम्पन्न नहीं हो सकता था। यद्यपि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य मानवीय मन रखता है, किन्तु उसका कार्य मानव विचार के द्वारा अपमिश्रित नहीं होता है; वह इस पूर्वशर्त के अधीन सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य को अपने हाथ में लेता है, कि वह मानवता को मन के साथ धारण करता है, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाने के द्वारा। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसके देह के विचार कितने उत्कृष्ट हैं, उसके कार्य पर तर्क या सोच का ठप्पा नहीं लगता है। दूसरे शब्दों में, उसके कार्य की कल्पना उसके देह के मन के द्वारा नहीं की जाती है, बल्कि उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करने की आवश्यकता है, और इनमें से किसी की भी कल्पना उसके मस्तिष्क द्वारा नहीं की जाती। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और सलीब पर चढ़ना उसके मानवीय मन के परिणाम नहीं थे, उन्हें किसी भी मानवीय मन वाले मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता था। इसी तरह, आज का जीतने का कार्य ऐसी सेवकाई है जिसे देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु यह किसी मानवीय इच्छा का कार्य नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी दैहिक मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर को अवश्य सामान्य मानव मन से सम्पन्न होना चाहिए, सामान्य मानवता से सम्पन्न होना चाहिए, क्योंकि उसे एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर के कार्य का वास्तविक सार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 101

कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे पूरी तरह से एक साधारण व्यक्ति ही समझते थे। उसकी सर्वथा सामान्य, साधारण मानवता इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने देहधारण किया था, और यह कि अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग था, न कि पवित्रात्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ था, कि परमेश्वर के देहधारण के युग में उसका देह पवित्रात्मा का समस्त कार्य करेगा। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसा देह है जिसमें सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, और मानविक विचार को धारण करते हुए, आत्मा साकार होता है। "साकार होना" का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, पवित्रात्मा का देह बनना; इसे स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब परमेश्वर स्वयं सामान्य मानवता वाली देह में वास करता है, और इसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही है साकार होने या देहधारी होने का अर्थ। अपने पहले देहधारण के दौरान, बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना परमेश्वर के लिए आवश्यक था क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। सम्पूर्ण मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसे दयालु और क्षमाशील होने की आवश्यकता थी। सलीब पर चढ़ने से पहले उसने जो कार्य किया वह बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना था, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और गंदगी से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। क्योंकि यह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करना, उसके द्वारा संकेतों और चमत्कारों को दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे; क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनन्द और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थी। अर्थात् बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु के देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये वे कार्य थे, जिन्हें पवित्रात्मा ने देह में साकार किया था। किन्तु जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, तब वह देह में रह रहा था, वह देह से ऊपर नहीं गया। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि उसने चंगाई का कौन सा कार्य किया, वह तब भी सामान्य मानवता को धारण किए हुए था, तब भी एक सामान्य मानव जीवन जी रहा था। परमेश्वर के देहधारण के युग में देह ने पवित्रात्मा के सभी कार्य किए, मेरा ऐसा कहने का कारण यह है, कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने क्या कार्य किया, उसने यह देह में किया। किन्तु उसके कार्य की वजह से, लोगों ने उसकी देह को पूरी तरह से दैहिक सार रखने वाला नहीं माना, क्योंकि उसका देह चमत्कार कर सकता था, और कुछ विशेष क्षणों में ऐसे कार्य कर सकता था जो देह से ऊपर जाते थे। वास्तव में, ये सब घटनाएँ उसकी सेवकाई आरम्भ करने के बाद हुईं, जैसे कि उसका चालीस दिनों तक परीक्षण किया जाना या पहाड़ पर रूपान्तरित होना। इसलिए यीशु के साथ, परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण नहीं हुआ था, बल्कि केवल आंशिक तौर पर पूर्ण हुआ था। अपने कार्य को आरम्भ करने से पहले उसने देह में जो जीवन जिया वह सर्वथा बिल्कुल सामान्य था। अपना कार्य आरम्भ करने के बाद उसने केवल अपने देह के बाहरी आवरण को बनाए रखा। क्योंकि उसका कार्य दिव्यता की एक अभिव्यक्ति था, इसलिए यह देह के सामान्य कार्यों से बढ़कर था। आख़िरकार, परमेश्वर का देहधारी देह मांस-और-रक्त वाले मानव से भिन्न था। वास्तव में, अपने दैनिक जीवन में, उसे भोजन, कपड़ों, नींद और आश्रय की उसी तरह आवश्यकता थी जैसी किसी भी अन्य को होती है, सभी सामान्य आवश्यकताओं, तर्कसंगत होने और विचार की ज़रूरत थी जैसी कि किसी भी सामान्य इंसान को होती है। लोग उसे अभी भी सामान्य मनुष्य मान रहे थे, सिवाय इसके कि उसने जो कार्य किया वह अलौकिक था। वास्तव में, इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है कि उसने क्या किया, वह एक साधारण और सामान्य मानवता में रहा और जहाँ तक उसने जो कार्य किया उसका विचार विशेष रूप से सामान्य था, उसके विचार, किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य की अपेक्षा, विशेष रूप से अधिक सुस्पष्ट थे। इस प्रकार की सोच और समझ एक देहधारी परमेश्वर के लिए आवश्यक थी, क्योंकि दिव्य कार्य को ऐसी देह के द्वारा व्यक्त किए जाने की आवश्यकता थी जिसकी समझ बहुत ही सामान्य हो और विचार बहुत ही सुस्पष्ट हों—केवल इसी प्रकार से उसका देह दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता था। पूरे साढ़े तैतीस साल के दौरान जो यीशु इस पृथ्वी पर रहा, उसने अपनी सामान्य मानवता को बनाए रखा, किन्तु उसकी इन साढ़े तैतीस साल की सेवकाई के दौरान, लोगों ने सोचा कि वह बहुत ही श्रेष्ठ है, कि वह पहले की अपेक्षा बहुत ही अलौकिक है। वास्तविकता में, यीशु की सामान्य मानवता पहले और बाद में अपरिवर्तित रही; पूरे समय उसकी मानवता एक-सी थी, किन्तु जब उसने अपनी सेवकाई आरम्भ की उससे पहले और उसके बाद के अंतर के कारण, उसकी देह के बारे में दो भिन्न-भिन्न मत उभरे। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या सोचते थे, देहधारी परमेश्वर ने पूरे समय अपनी सामान्य मानवता को बनाए रखा, क्योंकि जबसे परमेश्वर देहधारी हुआ, वह देह में रहा, ऐसा देह जिसकी सामान्य मानवता थी। इसकी परवाह किए बिना कि वह अपनी सेवकाई कर रहा है या नहीं, उसके देह की सामान्य मानवता को मिटाया नहीं जा सकता था, क्योंकि मानवता देह का मूल सार है। इससे पहले कि यीशु अपनी सेवकाई को करता, सभी मानवीय क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए उसका देह पूरी तरह से सामान्य बना रहा; वह जरा-सा भी अलौकिक नज़र नहीं आया, उसने कोई भी अद्भुत संकेत नहीं दिखाए। उस समय वह केवल बहुत ही आम मानव था जो परमेश्वर की आराधना करता था, यद्यपि उसकी खोज अधिक ईमानदार थी, किसी की भी अपेक्षा अधिक ईमानदार थी। इस प्रकार से उसकी सर्वथा सामान्य मानवता ने स्वयं को अभिव्यक्त किया। क्योंकि अपनी सेवकाई को अपनाने से पहले उसने बिल्कुल भी कार्य नहीं किया, इसलिए उसकी पहचान से कोई भी अवगत नहीं था, कोई भी नहीं बता सकता था कि उसका देह अन्य सभी से भिन्न है, क्योंकि उसने एक भी चमत्कार नहीं किया था, स्वयं परमेश्वर के कार्य का अंश-मात्र भी नहीं किया था। हालाँकि, उसके अपनी सेवकाई का कार्य प्रारम्भ करने के बाद, उसने सामान्य मानवता के बाहरी आवरण को बनाए रखा और तब भी सामान्य मानवीय सूझबूझ के साथ जिया, किन्तु क्योंकि उसने परमेश्वर स्वयं के कार्य को करना, मसीह की सेवकाई को अपनाना और उन कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था जिन्हें करने के लिए नश्वर प्राणी, मांस-और-रक्त से बने प्राणी करने में अक्षम थे, इसलिए लोगों ने मान लिया कि उसकी सामान्य मानवता नहीं थी और पूरी तरह से एक सामान्य देह नहीं था बल्कि एक अपूर्ण देह था। उसके द्वारा किए गए कार्य की वजह से लोगों ने कहा कि वह देह में एक परमेश्वर है जिसकी सामान्य मानवता नहीं है। यह एक ग़लत समझ थी, क्योंकि लोगों ने देहधारी परमेश्वर के महत्व को नहीं समझा था। यह गलतफहमी इस तथ्य से उठी थी कि परमेश्वर के द्वारा देह में व्यक्त कार्य दिव्य कार्य था, जो एक देह में व्यक्त हुआ था जिसकी एक सामान्य मानवता थी। परमेश्वर देह में आच्छादित था, वह देह के भीतर रहा, और उसकी मानवता में उसके कार्य ने उसकी मानवता की सामान्यता को धुँधला कर दिया था। इसी कारण से लोगों ने विश्वास कर लिया कि परमेश्वर में मानवता नहीं थी बस दिव्यता थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 102

अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूर्ण नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूर्ण किया जिसे देह में होकर करना परमेश्वर के लिए आवश्यक था। इसलिए, देहधारण के कार्य को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर एक बार पुनः देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और वास्तविकता को जी रहा है, अर्थात्, पूरी सामान्य और साधारण देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे उसने देह में अधूरा छोड़ दिया था। दूसरा देहधारी देह सार रूप में पहले के ही समान है, बल्कि और भी अधिक वास्तविक है, यहाँ तक कि पहले से भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरा देहधारी देह जो पीड़ा सहता है वह पहले वाले से अधिक है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई के परिणामस्वरूप है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसकी देह की सामान्यता और वास्तविकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई को सर्वथा सामान्य और वास्तविक देह में करता है, इसलिए उसके देह को अत्यधिक कठिनाई को सहना होगा। उसका देह जितना अधिक सामान्य और वास्तविक होगा, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, ऐसा देह जो कि बिल्कुल भी अलौकिक नहीं है। क्योंकि उसका देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी अवश्य लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—ये सभी पीड़ाएँ उसके देह की वास्तविकता और सामान्यता से उत्पन्न होती हैं। अपनी सेवकाई को करते समय जिन पीड़ाओं से दोनों देहधारी देह गुज़रे हैं, उनसे कोई भी देहधारी देह के सार को देख सकता है। देह जितना अधिक सामान्य होगा, उसे कार्य करते समय उतनी ही अधिक कठिनाई सहनी होगी; कार्य करने वाला देह जितना अधिक वास्तविक होगा, लोगों की अवधारणाएँ भी उतनी ही अधिक कठोर होती हैं, और उस पर उतने ही अधिक ख़तरों की आशंका होती है। और फिर भी, देह जितना अधिक वास्तविक होता है, और देह जितना अधिक आवश्यकताओं और सामान्य मानवजाति की पूरी भावना को धारण करता है, उतना ही अधिक वह परमेश्वर के कार्य को देह में सँभालने में सक्षम होता है। यह यीशु का देह था जिसे सलीब पर चढ़ाया गया था, उसका देह जिसे उसने पाप बलि के रूप में त्याग दिया था; यह सामान्य मानवता वाले देह के माध्यम से ही था कि उसने शैतान को हराया और सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया। और यह पूरे देह के रूप में ही अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसा देह जो पूरी तरह से सामान्य और वास्तविक है, वही विजय के कार्य को अपनी सम्पूर्णता से कर सकता है और एक सशक्त गवाही बना सकता है। अर्थात्, मनुष्य पर विजय को देह में परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता के माध्यम से प्रभावशाली बनाया जाता है, न कि अलौकिक अचम्भों और प्रकटनों के माध्यम से। इस देहधारी परमेश्वर की सेवकाई बोलना, और इसके द्वारा मनुष्य को जीतना और पूर्ण बनाना है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए पवित्रात्मा का कार्य, देह का कर्तव्य, बोलना और इस के द्वारा मनुष्य को पूरी तरह से जीतना, प्रकट करना, पूर्ण बनाना और हटाना है। और इसलिए, यह विजय के कार्य में है कि देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न किया जाएगा। आरंभिक छुटकारे का कार्य देहधारण के कार्य का आरम्भ मात्र था; विजय का कार्य करने वाला देह देहधारण के समस्त कार्य को पूर्ण करेगा। लिंग रूप में, एक पुरुष और दूसरा महिला होता है; इसमें परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण हो गया है। यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य धारणाओं को दूर करता हैः परमेश्वर पुरुष और महिला दोनों बन सकता है और देहधारी परमेश्वर सार में लिंगहीन है। उसने पुरुष और महिला दोनों को बनाया, और उसके लिए लिंगों के बीच कोई भेद नहीं है। कार्य के इस चरण में परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों को नहीं दिखाता है, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। इसके अलावा इसका कारण यह है कि, देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना नहीं है, बल्कि बोलने के माध्यम से मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारी देह द्वारा धारण की गई पैदाइशी योग्यता वचन बोलना और मनुष्य को जीतना है, न कि बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चमत्कार करना नहीं है, बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरा देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य प्रतीत हुआ। लोग देखते हैं कि परमेश्वर का देहधारण झूठ नहीं है; परन्तु यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, और यद्यपि वे दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, परन्तु वे पूरी तरह से एक ही नहीं हैं। यीशु सामान्य मानवता और साधारण मानवता को धारण करता था, किन्तु उसके साथ कई संकेत और चमत्कार थे। इस देहधारी परमेश्वर में, मानवीय आँखों को कोई भी संकेत या चमत्कार नहीं दिखाई देंगे, न ही बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न ही समुद्र पर चलना, न ही चालीस दिन तक उपवास करना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता है जो यीशु ने किया, इस वजह से नहीं कि उसका देह सार रूप में यीशु से कुछ भी भिन्न है, बल्कि इसलिए किबीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने वास्तविक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चमत्कारों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है। आज तुम जिस देहधारी परमेश्वर को देखते हो वह पूरी तरह से एक देह है, और उसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। वह दूसरों की तरह ही बीमार पड़ता है, उसे ठीक अन्य लोगों के समान ही भोजन और कपड़ों की आवश्यकता होती है। यदि इस बार भी देहधारी परमेश्वर अलौकिक संकेतों और चमत्कारों को दिखाता, यदि वह बीमारों को चंगा करता, दुष्टात्माओं को निकालता, या एक वचन से मार सकता, तो विजय का कार्य किस प्रकार से किया जा सकता था? कार्य को अन्यजाति राष्ट्रों में कैसे फैलाया जा सकता था? बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना अनुग्रह के युग का कार्य था, छुटकारे के कार्य का पहला चरण था, और अब जबकि परमेश्वर ने सलीब से लोगों को बचा लिया है, इसलिए वह उस कार्य को अब और नहीं करता है। यदि अंत के दिनों में यीशु के जैसा ही कोई "परमेश्वर" प्रकट हो जाता, जो बीमार को चंगा करता और दुष्टात्माओं को निकालता, और मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया जाता, तो वह "परमेश्वर", यद्यपि बाइबिल में वर्णित परमेश्वर के समरूप होता और उसे मनुष्य के लिए स्वीकार करना आसान होता, किन्तु अपने सार रूप में, परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं, बल्कि एक दुष्टात्मा द्वारा पहना गया देह होता। क्योंकि जो उसने पहले ही पूरा कर लिया है उसे कभी नहीं दोहराना, यह परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त है। इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण का कार्य पहले देहधारण के कार्य से भिन्न है। अंत के दिनों में, परमेश्वर विजय का कार्य एक सामान्य और साधारण देह में पूरा करता है; वह बीमार को चंगा नहीं करता है, मनुष्य के लिए सलीब पर नहीं चढ़ाया जाएगा, बल्कि केवल देह में वचनों को कहता है, देह में मानव को जीतता है। केवल ऐसा देह ही देहधारी परमेश्वर का देह है; केवल ऐसा देह ही देह में परमेश्वर के कार्य को पूर्ण कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 103

चाहे इस चरण में देहधारी परमेश्वर कठिनाइयों को सह रहा हो या अपनी सेवकाई को कर रहा हो, वह इसे केवल देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए करता है, क्योंकि यह परमेश्वर का अंतिम देहधारण है। परमेश्वर केवल दो बार देहधारण कर सकता है। यह तीसरी बार नहीं हो सकता है। पहला देहधारण पुरुष था; दूसरा स्त्री था, और इसलिए परमेश्वर की देह की छवि मनुष्य के मन में पूर्ण होती है; इसके अलावा, दो देहधारणों ने परमेश्वर के कार्य को देह में पहले ही समाप्त कर लिया है। देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए पहली बार परमेश्वर के देहधारण ने सामान्य मानवता को धारण किया। इस बार वह सामान्य मानवता को भी धारण करता है, किन्तु इस देहधारण का अर्थ भिन्न है: यह अधिक गहरा है, और उसका कार्य अधिक गहन महत्व का है। परमेश्वर के पुनः देहधारी होने का कारण देहधारण के अर्थ को पूरा करना है। जब परमेश्वर इस चरण के कार्य को पूरी तरह से समाप्त कर लेगा, तो देहधारण का सम्पूर्ण अर्थ, अर्थात्, देह में परमेश्वर का कार्य, पूर्ण हो जाएगा, और देह में करने के लिए अब और कार्य बाकी नहीं रह जाएगा। अर्थात्, अब से आगे परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए कभी भी पुनः देहधारण नहीं करेगा। केवल मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए परमेश्वर देहधारण का कार्य करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य को छोड़ कर, देह में आना परमेश्वर के लिए किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। कार्य को करने के लिए देह में आ कर, वह शैतान को दिखाता है कि परमेश्वर एक देह, एक सामान्य व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति है—और फिर भी वह संसार पर विजयी राज कर सकता है, शैतान को परास्त कर सकता है, मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है, मानवजाति को जीत सकता है! शैतान के कार्य का लक्ष्य मानवजाति को भ्रष्ट करना है, जबकि परमेश्वर का लक्ष्य मानवजाति को बचाना है। शैतान मनुष्य को अथाह खाई में फँसाता है, जबकि परमेश्वर उसे इससे बचाता है। शैतान सभी लोगों से अपनी आराधना करवाता है, जबकि परमेश्वर उन्हें अपने प्रभुत्व के अधीन करता है, क्योंकि वह सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है। यह समस्त कार्य परमेश्वर के दो देहधारणों के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उसका देह सार रूप में मानवता और दिव्यता का मिलाप है और सामान्य मानवता को धारण करता है। इसलिए देहधारी परमेश्वर के देह के बिना, परमेश्वर मानवजाति को बचाने के परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता, और अपने देह की सामान्य मानवता के बिना, देह में उसका कार्य परिणाम हासिल नहीं कर सकता। परमेश्वर के देहधारण का सार यह है कि उसे सामान्य मानवता अवश्य धारण करनी चाहिए; क्योंकि अन्यथा होने पर यह देहधारण करने के परमेश्वर के मूल आशय के विपरीत चला जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 104

मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं हुआ। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य को करने का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक सामान्य देह में किया गया है, एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया गया है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी सर्वोत्कृष्ट नहीं है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया, और यह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की पहचान है, एक पूर्ण मानव, एक पूर्ण देह, जो कार्य कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी सर्वोत्कृष्ट नहीं है, एक अति सामान्य व्यक्ति है जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी अद्भुत संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता है, कोई अचम्भे नहीं दिखाता है, बृहद सभा कक्षों में धर्म के बारे में आंतरिक सत्य को उजागर तो बिल्कुल नहीं करता है। दूसरे देहधारी देह का कार्य लोगों को सर्वथा पहले अलग प्रतीत होता है, इतना अधिक कि दोनों में कुछ भी आम नहीं प्रतीत होता है, और पहले के कार्य का कुछ भी इस समय में नहीं देखा जा सकता है। यद्यपि दूसरे देहधारण के देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, जिससे यह सिद्ध नहीं होता है कि उनका स्रोत एक ही और वही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं यह देहों के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरणों पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असम्भव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है, यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही पवित्रात्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं यह उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा व्यक्त किए गए दिव्य कार्य द्वारा तय किया जा सकता है। दूसरा देहधारी देह किसी भी उस कार्य को नहीं करता है जो यीशु ने किया था, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता है, बल्कि प्रत्येक बार वह एक नए मार्ग को खोलता है। दूसरे देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहले देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और पूर्ण बनाना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी नियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदयों में विद्यमान हैं, और उनके हृदयों में से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के स्वयं के कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक केवल एक भाग को देता है, न कि सम्पूर्ण को। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की समझ की सीमित आंतरिक शक्तियों की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण रहता है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को संप्रेषित करना असम्भव है; उसके कार्य का एक चरण परमेश्वर को पूरी तरह से कितना कम व्यक्त कर सकता है? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, और कोई भी उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों के द्वारा ही जान सकता है, न कि उसके शारीरिक आवरण के द्वारा। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है और उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते हैं। केवल इस प्रकार से ही मनुष्य, एक अकेले पहलू तक सीमित न हो कर, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यद्यपि दो देहधारणों के देहों के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देहों का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समरूप है; बात केवल इतनी ही है कि वे कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए अस्तित्व में हैं, और दो विभिन्न युगों में सामने आते हैं। कुछ भी हो, देहधारी परमेश्वर के देह एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करते हैं—यह एक ऐसा सत्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 105

देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण दिव्यता दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पित हैं। मसीह का सार पवित्र आत्मा, अर्थात्, दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा, तथा वह संभवतः कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकता है जो उसके स्वयं के कार्य को नष्ट करता हो, ना वह ऐसे वचन कहेगा जो उसकी स्वयं की इच्छा के विरूद्ध जाते हों। इसलिए, देहधारी परमेश्वर अवश्य ही कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं करेगा जो उसके अपने प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करता हो। यह वह बात है जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना तथा परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य मनुष्य को बचाना है तथा यह परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपने देह में अपने सार का, इस प्रकार एहसास करता है कि उसका देह उसके कार्य का भार उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारी होने के समय के दौरान परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य के द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है, तथा देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केन्द्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिलाया नहीं जा सकता है। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, इसलिए वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, इसलिए वह अपनी देह में उस कार्य को समाप्त करता है जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या वह मसीह हो, दोनों परमेश्वर स्वयं हैं, तथा वह उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए है तथा उस सेवकाई को करता है जो उसे करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 106

परमेश्वर का सार स्वयं अधिकार को काम में लाता है, बल्कि वह पूर्ण रूप से उस अधिकार के प्रति समर्पित होने में सक्षम है जो उसकी ओर से आता है। चाहे वह पवित्र आत्मा का कार्य हो या देह का कार्य हो, दोनों में से किसी का भी एक दूसरे के साथ का टकराव नहीं होता है। परमेश्वर का आत्मा संपूर्ण सृष्टि पर अधिकार रखता है। परमेश्वर के सार वाला देह भी अधिकार सम्पन्न है, परन्तु देह में परमेश्वर उस समस्त कार्य को कर सकता है जो स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के अनुसार होता है। इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया या समझा नहीं जा सकता है। परमेश्वर स्वयं अधिकार है, किन्तु उसका देह उसके अधिकार के प्रति समर्पित हो सकता है। यह इन शब्दों का आन्तरिक अर्थ हैः "मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा का आज्ञापालन करता है।" परमेश्वर पवित्रात्मा है तथा उद्धार का कार्य कर सकता है, जैसे कि परमेश्वर मनुष्य बन सकता है। वैसे भी, परमेश्वर अपना कार्य स्वयं करता है; वह न तो बाधा उत्पन्न करता है न दखल देता है, ऐसा कार्य तो बिल्कुल नहीं करता है जो परस्पर विवादग्रस्त हो, क्योंकि आत्मा तथा देह द्वारा किए गए कार्य का सार एक समान है। चाहे पवित्रात्मा हो या देह, दोनों एक इच्छा को पूरा करने और उसी कार्य को प्रबंधित करने के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि पवित्रात्मा तथा देह की दो असमान विशेषताएँ हैं, किन्तु उनके सार एक ही हैं; दोनों में स्वयं परमेश्वर का सार है, तथा स्वयं परमेश्वर की पहचान है। स्वयं परमेश्वर में अवज्ञा का तत्व नहीं है; उसका सार अच्छा है। वह समस्त सुन्दरता और अच्छाई की और साथ ही समस्त प्रेम की अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि शरीर में भी, परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता है जिससे परमपिता परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन होता हो। यहाँ तक कि अपने जीवन का बलिदान करने की कीमत पर भी, वह सम्पूर्ण हृदय से तैयार रहेगा और कोई अन्य विकल्प नहीं बनाएगा। परमेश्वर के पास आत्मतुष्टि और आत्म-महत्व के, या दंभ या दर्प के कोई तत्व नहीं हैं; उसमें कुटिलता के कोई तत्व नहीं हैं। जो कोई भी अवज्ञा करता है वह शैतान की ओर से आता है; शैतान समस्त कुरूपता तथा दुष्टता का स्रोत है। मनुष्य में शैतान के सदृश विशेषताएँ होने का कारण यह है कि शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट और संसाधित किया गया है। मसीह शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है, अतः उसके पास केवल परमेश्वर की विशेषताएँ हैं तथा शैतान की एक भी नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि कार्य कितना कठिन है या देह कितना निर्बल है, परमेश्वर, जब वह देह में रहता है, कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे स्वयं परमेश्वर का कार्य बाधित होता हो, अवज्ञा में परमपिता परमेश्वर की इच्छा का परित्याग तो बिल्कुल नहीं करेगा। वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा के विपरीत जाने के बजाए शरीर में पीड़ा सह लेगा; यह बिलकुल वैसा ही है जैसा यीशु ने प्रार्थना में कहा, "हे मेरे पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" मनुष्य चुनाव करेगा किन्तु मसीह नहीं करेगा। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है, फिर भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा की तलाश करता है, तथा जो कार्य उसे परमपिता परमेश्वर द्वारा सौंपा गया है उसे देह के दृष्टिकोण से पूरा करता है। यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के लिए अप्राप्य है। जो कुछ शैतान से आता है उसमें परमेश्वर का सार नहीं हो सकता है, वह केवल परमेश्वर की अवज्ञा तथा उसका विरोध करता है। वह पूर्ण रूप से परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर सकता है, परमेश्वर की इच्छा का स्वेच्छा से पालन तो बिल्कुल नहीं करता है। मसीह के अतिरिक्त सभी मनुष्य वह सब कर सकते हैं जो परमेश्वर का विरोध करता है, तथा कोई एक भी प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य का दायित्व नहीं ले सकता है; कोई एक भी परमेश्वर के प्रबंधन के लिए किया जाने वाला अपना कर्तव्य मानने में सक्षम नहीं है। परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना ही मसीह का सार है; परमेश्वर की अवज्ञा शैतान की विशेषता है। ये दोनों विशेषताएँ असंगत हैं, तथा कोई भी जिसके पास शैतान के गुण हैं वह मसीह नहीं कहलाया जा सकता है। मनुष्य परमेश्वर के बदले उसका कार्य इसलिए नहीं कर सकता है क्योंकि मनुष्य में परमेश्वर का कोई भी सार नहीं है। मनुष्य परमेश्वर का कार्य मनुष्य के व्यक्तिगत हितों तथा अपनी भविष्य की संभावनाओं के वास्ते करता है, किन्तु मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए कार्य करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 107

मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होती है। यद्यपि वह देह में हैं, किन्तु उसकी मानवता पूर्ण रूप से देह वाले एक मनुष्य के समान नहीं है। उसका अपना एक अनूठा चरित्र है, और यह भी उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होता है। उसकी दिव्यता में कोई निर्बलता नहीं है; मसीह की निर्बलता उसकी मानवता की निर्बलता को संदर्भित करती है। एक निश्चित सीमा तक, यह निर्बलता उसकी दिव्यता को विवश करती है, किन्तु इस प्रकार की सीमाएँ एक निश्चित दायरे और समय के भीतर हैं, तथा असीम नहीं है। जब उसकी दिव्यता का कार्य करने का समय आता है, तो वह उसकी मानवता की परवाह किए बिना किया जाता है। मसीह की मानवता पूर्णतः उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है। उसके मानवता के साधारण जीवन से अलग, उसकी मानवता की अन्य सभी क्रियाओं पर उसकी दिव्यता का असर होता है, सभी क्रियाएँ दिव्यता द्वारा प्रभावित और निर्देशित होती हैं। यद्यपि मसीह में मानवता है, किन्तु यह उसके दिव्यता के कार्य को बाधित नहीं करती है। ऐसा निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है; यद्यपि दूसरों के सामने उसके आचरण में उसकी मानवता परिपक्व नहीं है, किन्तु यह उसके दिव्यता के सामान्य कार्य को प्रभावित नहीं करती है। जब मैं यह कहता हूँ कि उसकी मानवता भ्रष्ट नहीं हुई है, तब मेरा अभिप्राय यह है कि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्देशित की जा सकती है, और यह कि वह साधारण मनुष्य की तुलना में उच्चतर समझ से सम्पन्न है। उसकी मानवता उसके कार्य में दिव्यता द्वारा निर्देशित होने के लिए सबसे अनुकूल है; उसकी मानवता दिव्यता के कार्य को अभिव्यक्त करने, और साथ ही ऐसे कार्य के प्रति समर्पण करने के योग्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य करता है, वह कभी उस कर्तव्य से आँख नहीं हटाता है जिसे मनुष्य को देह में होते हुए पूरा अवश्य करना चाहिए; वह सच्चे हृदय के साथ स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। उसके पास परमेश्वर का सार है, और उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर की पहचान है। केवल इतना ही है कि वह पृथ्वी पर आया तथा एक सृजित किया हुआ प्राणी बन गया, जिसका बाहरी आवरण सृजन किए हुए प्राणी का है, और अब ऐसी मानवता से सम्पन्न है जैसी उसके पास पहले नहीं थी; वह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। यह स्वयं परमेश्वर का अस्तित्व है तथा मनुष्य के लिए अनुकरणीय है। उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर है। यह उसके देह के परिप्रेक्ष्य से है कि वह परमेश्वर की आराधना करता है; इसलिए, ये वचन "मसीह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करता है" त्रुटिपूर्ण नहीं हैं। वह मनुष्य से जो माँगता है वह निश्चित रूप से उसका स्वयं का अस्तित्व है; जो कुछ भी वह मनुष्य से माँगता है वह उसे उनसे ऐसा माँगने से पहले ही प्राप्त कर चुका है। वह कभी भी दूसरों से माँग नहीं करता है जब वह स्वयं उनसे मुक्त हो जाता है, क्योंकि यह सब उसका अस्तित्व गठित करते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि वह कैसे अपना कार्य संचालित करता है, वह इस प्रकार कार्य नहीं करेगा जो परमेश्वर की अवज्ञा करता हो। चाहे वह मनुष्य से कुछ भी माँगे, कोई भी माँग मनुष्य द्वारा प्राप्य से बढ़कर नहीं होती है। वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर की इच्छापूर्ति करना है तथा उसकी प्रबंधन व्यवस्था के वास्ते है। मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है, इसलिए सभी सृजे गए प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता, अर्थात्, परमेश्वर स्वयं का स्वभाव तथा अस्तित्व है, जो उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही साधारण हो, यह बात अखंडनीय है कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले तथा वह किसी भी प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करें, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है, मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह कैसे भी अपनी दिव्यता के अस्तित्व को प्रकट करे, मनुष्य यह स्वीकार करने में असमर्थ है कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपनी आज्ञाकारिता और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख लोग उतना ही हल्के ढंग से मसीह का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी है जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपनाते हैं, मगर उन "महान लोगों" की ऊँची प्रतिमाओं को आराधना करने के लिए मेज पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा परमेश्वर की अवज्ञा इस तथ्य से आते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा के प्रति और साथ ही मसीह की सामान्य मानवता से समर्पण करता है; इसमें परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा उसकी अवज्ञा का स्रोत निहित है। यदि मसीह के पास न तो उसकी मानवता का भेष होता और न ही सृजन किए गए प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज की होती, बल्कि इसके बजाए अति मानवता से सम्पन्न होता, तब किसी भी मनुष्य में अवज्ञा न होने की संभावना होती। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अदृश्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण इस वजह से है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है तथा उसके पास सृजन किए गए प्राणी की कोई भी विशेषता नहीं है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किन्तु मसीह के प्रति अपमान करने की प्रवृत्ति बनाए रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 108

यद्यपि पृथ्वी पर मसीह परमेश्वर स्वयं के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह सब लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता है। वह सब लोगों को स्वयं का दर्शन कराने नहीं आता है; वह मनुष्य को अनुमति देने आता है कि वह उसका हाथ पकड़कर उसकी अगुवाई में चलें, इस प्रकार नवीन युग में प्रवेश करें। मसीह के देह का कार्य स्वयं परमेश्वर के कार्य, अर्थात्, देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और मनुष्य को समर्थ करने के लिए नहीं है कि वह उसकी देह के सार को पूर्णतः समझे। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह उससे अधिक नहीं करता है जो देह के लिए प्राप्य से अधिक हो। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है, तथा वह मनुष्य पर परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति को प्रकट नहीं करता है। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय नहीं है जैसा कि मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यक्तिगत रूप से वह कार्य करता है जिसे स्वयं परमेश्वर को करना चाहिए, किन्तु वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता है, ना ही वह उत्तेजनापूर्वक अपने स्वयं के कर्मों की घोषणा करता है। बल्कि, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं उनके पास उसकी विशेषताएँ नहीं होती हैं। अभिमानी तथा आत्म-प्रशंसा करने के स्वभाव वाले झूठे मसीहों से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार की देह में वास्तव में मसीह है। जितने अधिक वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीह स्वयं का दिखावा करते हैं, तथा लोगों को धोखा देने के लिये वे और अधिक संकेतों और चमत्कारों को करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों के पास परमेश्वर के गुण नहीं होते हैं; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग नहीं लगता है। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिये देहधारी होता है, मात्र सब मनुष्यों को उसे देखने देने की अनुमति देने के लिए नहीं। बल्कि, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है, तथा जो वह प्रकट करता है उसे अपने सार को प्रमाणित करने की अनुमति देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ द्वारा जब्त नहीं की गई है; यह उसके कार्य तथा उसके सार द्वारा निर्धारित की जाती है। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर का सार है, तथा वह स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह अभी भी, आखिरकार, पवित्रात्मा से भिन्न देह है। वह पवित्रात्मा की विशेषताओं वाला परमेश्वर नहीं है; वह देह के आवरण वाला परमेश्वर है। इसलिए, इस बात की परवाह किए बिना कि वह कितना सामान्य तथा कितना निर्बल है, तथा कैसे भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा को खोजता है, उसकी दिव्यता अखण्डनीय है। देहधारी परमेश्वर में न केवल सामान्य मानवता तथा उसकी निर्बलताएँ विद्यमान रहती हैं; बल्कि उसकी दिव्यता की अद्भुतता तथा अपरिमेयता और साथ ही उसकी देह के सभी कर्म और भी अधिक विद्यमान रहते हैं। इसलिए, वास्तव में तथा व्यवहारिक रूप से मानवता तथा दिव्यता दोनों मसीह में विद्यमान हैं। यह जरा सा भी निस्सार या अलौकिक नहीं है। वह पृथ्वी पर कार्य करने के मुख्य उद्देश्य के साथ आता है; पृथ्वी पर कार्य करने के लिए सामान्य मानवता से सम्पन्न होना अनिवार्य है; अन्यथा, उसकी दिव्यता की शक्ति चाहे कितनी भी महान हो, उसके मूल कार्य का अच्छा सदुपयोग नहीं किया जा सकता है। यद्यपि उसकी मानवता अत्यंत महत्वपूर्ण है, किन्तु यह उसका सार नहीं है। उसका सार दिव्यता है; इसलिए जिस क्षण वह पृथ्वी पर अपनी सेवकाई करना आरंभ करता है उसी क्षण वह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करना आरंभ कर देता है। उसकी मानवता केवल अपनी देह के सामान्य जीवन को बनाए रखने के लिए है ताकि उसकी दिव्यता देह में सामान्य रूप से कार्य कर सके; यह दिव्यता ही है जो पूरी तरह से उसके कार्य को निर्देशित करती है। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो वह अपनी सेवकाई को पूर्ण कर चुका होगा। जिस बात को मनुष्य को जानना चाहिए वह है परमेश्वर के कार्य की सम्पूर्णता, तथा यह उसके कार्य के माध्यम से है कि वह मनुष्य को उसे जानने में सक्षम बनाता है। अपने कार्य के दौरान वह पूर्णतः अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करता है, जो कि एक ऐसा स्वभाव नहीं है जिसे मानवता द्वारा दूषित किया गया हो, या एक ऐसा प्राणी नहीं है जो विचार एवं मानव व्यवहार द्वारा दूषित किया गया हो। जब समय आता है कि उसकी संपूर्ण सेवकाई का अंत आ जाता है, तब तक वह पहले ही उस स्वभाव को उत्तमता से तथा पूर्णतः अभिव्यक्त कर चुका होगा जिसे उसे अभिव्यक्त करना चाहिए। उसका कार्य किसी मनुष्य के द्वारा निर्देशित नहीं होता है; उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति भी बिलकुल स्वतंत्र है, मन के द्वारा नियंत्रित या विचार के द्वारा प्रक्रिया नहीं की जाती है, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट होती है। इसे किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि यदि परिस्थितियाँ कठोर हों या स्थितियाँ आज्ञा नहीं देतीं हों, तब भी वह उचित समय पर अपने स्वभाव को व्यक्त करने में सक्षम है। वह जो मसीह है मसीह के अस्तित्व को व्यक्त करता है, जबकि जो नहीं हैं, उनके पास मसीह का स्वभाव नहीं है। इसलिए, भले ही सभी उसका विरोध करें या उसके प्रति अवधारणाएँ रखें, मनुष्य की अवधारणाओं के आधार पर कोई भी इस बात से इनकार नहीं सकता है कि जिस स्वभाव को मसीह ने अभिव्यक्त किया वह परमेश्वर का है। वे सब जो सच्चे हृदय से मसीह का अनुसरण करते हैं या आशयपूर्वक मसीह को खोजते हैं यह स्वीकार करेंगे कि अपनी दिव्यता की अभिव्यक्ति के आधार पर वह मसीह है। वे कभी भी उसके ऐसे किसी पहलू के आधार पर मसीह को इनकार नहीं करेंगे जो मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है। यद्यपि मनुष्य अत्यंत मूर्ख है, किन्तु सभी जानते हैं कि यथार्थतः मनुष्य की इच्छा क्या है तथा परमेश्वर की ओर से क्या उत्पन्न होता है। यह मात्र इतना ही है कि बहुत से लोग अपनी स्वयं की अभिलाषाओं के कारण जानबूझकर मसीह का विरोध करते हैं। यदि यह कारण न हो, तो किसी एक भी मनुष्य के पास मसीह के अस्तित्व से इनकार करने का कारण नहीं होगा, क्योंकि मसीह द्वारा व्यक्त दिव्यता वास्तव में अस्तित्व में है, तथा उसके कार्य को सबकी नंगी आँखों द्वारा देखा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 109

मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उस कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है, तथा सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है। और इसी प्रकार से उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; उसके स्वाभाविक प्रकाशन का ऐसा कहलाना इस वजह से है कि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा अनेक वर्षों का संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसके अन्दर अंतर्निहित है। मनुष्य उसके कार्य, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी मानवता, तथा उसके संपूर्ण सामान्य मानवता के जीवन से इनकार कर सकता है, किन्तु कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि वह सच्चे हृदय से स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करता है; कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि वह स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पूरी करने के लिए आया है, और कोई भी उस निष्कपटता से इनकार नहीं कर सकता जिससे वह परमपिता परमेश्वर की खोज करता है। यद्यपि उसकी छवि ज्ञानेन्द्रियों के लिए सुखद नहीं है, उसके प्रवचन असाधारण हाव-भाव से सम्पन्न नहीं है, तथा उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, तब भी वह वास्तव में मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक परमपिता के प्रति समर्पण करता है, तथा मृत्यु तक आज्ञाकारी बना रहता है। यह इस कारण है क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस सत्य पर विश्वास करना कठिन है किन्तु वास्तव में इसका अस्तित्व है। जब मसीह की सेवकाई पूर्णतः सम्पन्न हो जाएगी, तो मनुष्य उसके कार्य से देखने में सक्षम हो जाएगा कि उसका स्वभाव तथा अस्तित्व स्वर्ग के परमेश्वर के स्वभाव तथा अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उस समय, उसके संपूर्ण कार्य का कुल योग इस बात की पुष्टि कर सकता है कि वह वास्तव में वही देह है जिसे वचन धारण करता है, और एक मांस और रक्त के मनुष्य के सदृश नहीं है। पृथ्वी पर मसीह के कार्य के प्रत्येक चरण का प्रतिनिधिक महत्व है, किन्तु मनुष्य जो प्रत्येक चरण के वास्तविक कार्य का अनुभव करता है उसके कार्य के महत्व को ग्रहण करने में अक्षम है। ऐसा विशेष रूप से परमेश्वर के द्वारा उसके दूसरे देहधारण में किए गए कार्य के अनेक चरणों के लिए है। अधिकांश वे लोग जिन्होंने मसीह के वचनों को केवल सुना या देखा है मगर जिन्होंने उसे कभी देखा नहीं है उनके पास उसके कार्य की कोई अवधारणाएँ नहीं होती हैं; जो मसीह को देख चुके हैं तथा उसके वचनों को सुन चुके हैं, और साथ ही उसके कार्य का अनुभव कर चुके हैं, वे उसके कार्य को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। क्या यह इस वजह से नहीं है कि मसीह का प्रकटन तथा सामान्य मानवता मनुष्य की अभिरुचि के अनुसार नहीं है? जो मसीह के चले जाने के पश्चात् उसके कार्य को स्वीकार करते हैं उन्हें ऐसी कठिनाईयाँ नहीं आएँगी, क्योंकि वे मात्र उसका कार्य स्वीकार करते हैं तथा मसीह की सामान्य मानवता के संपर्क में नहीं आते हैं। मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपनी अवधारणाओं को छोड़ने में असमर्थ है तथा इसके बजाय कठोरता से उसकी जाँच करता है; ऐसा इस तथ्य के कारण है कि मनुष्य केवल उसके प्रकटन पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तथा उसके कार्य तथा वचनों के आधार पर उसके सार को पहचानने में असमर्थ रहता है। यदि मनुष्य उसके प्रकटन के प्रति अपनी आँखे बंद कर ले या मसीह की मानवता पर चर्चा से बचे, तथा केवल उसकी दिव्यता पर बात करे, जिसके कार्य तथा वचन किसी भी मनुष्य द्वारा अप्राप्य हैं, तो मनुष्य की अवधारणाएँ घट कर आधी रह जाएँगी, यहाँ तक कि इस हद तक कि मनुष्य की समस्त कठिनाईयों का समाधान हो जाएगा। 

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 110

जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस में कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को इस बात का निश्चय, कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी, कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है। बाहरी स्वरूप सार का निर्धारण नहीं कर सकता; इतना ही नहीं, परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप कभी नहीं हो सकता। क्या यीशु का बाहरी रूपरंग मनुष्य की धारणाओं के विपरीत नहीं था? क्या उसका चेहरा और पोशाक उसकी वास्तविक पहचान के बारे में कोई सुराग देने में असमर्थ नहीं थे? क्या आरंभिक फरीसियों ने यीशु का ठीक इसीलिए विरोध नहीं किया था, क्योंकि उन्होंने केवल उसके बाहरी स्वरूप को ही देखा, और उसके द्वारा बोले गए वचनों को हृदयंगम नहीं किया? मुझे उम्मीद है कि परमेश्वर के प्रकट होने के आकांक्षी सभी भाई-बहन इतिहास की त्रासदी को नहीं दोहराएँगे। तुम्हें आधुनिक काल के फरीसी नहीं बनना चाहिए और परमेश्वर को फिर से सलीब पर नहीं चढ़ाना चाहिए। तुम्हें सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए कि परमेश्वर के वापस लौटने का स्वागत कैसे किया जाए, और इस बारे में स्पष्ट मन रखना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति कैसे बना जाए, जो सत्य के प्रति समर्पित होता है। यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो यीशु के बादल पर सवार होकर लौटने का इंतजार कर रहा है। हमें अपनी आध्यात्मिक आँखों को मलकर उन्हें साफ़ करना चाहिए और अतिरंजित कल्पना के शब्दों के दलदल में नहीं फँसना चाहिए। हमें परमेश्वर के व्यवहारिक कार्य के बारे में सोचना चाहिए, और परमेश्वर के व्यावहारिक पक्ष पर दृष्टि डालनी चाहिए। खुद को दिवास्वप्नों में बहने या खोने मत दो, सदैव उस दिन के लिए लालायित रहो, जब प्रभु यीशु बादल पर सवार होकर अचानक तुम लोगों के बीच उतरेगा और तुम्हें, जिन्होंने कि उसे कभी जाना या देखा नहीं है, और जो नहीं जानते कि उसकी इच्छा कैसे पूरी करें, ले जाएगा। अधिक व्यावहारिक मामलों पर विचार करना बेहतर है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 111

देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को केवल कुछ लोगों पर ही अभिव्यक्त करता है जो इस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, और सभी प्राणियों पर प्रकट नहीं करता है। वह अपने कार्य के केवल एक चरण को पूरा करने के लिए देह बना, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के वास्ते नहीं। हालाँकि, उसके कार्य को स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए देह में ऐसा करना उसके लिए आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मानवीय दुनिया से चला जाएगा; वह इस बात के भय से लम्बी अवधि तक मनुष्यजाति के बीच बना नहीं रह सकता है कि कहीं आने वाले कार्य के मार्ग में खड़ा न हो जाए। जो कुछ वह भीड़ पर प्रकट करता है वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, और उसकी छवि नहीं है जब वह दूसरी बार देहधारण करता है, क्योंकि परमेश्वर की छवि को केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रदर्शित किया जा सकता है, और उसे उसके देहधारी देह की छवि के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। उसके देह की छवि केवल लोगों की एक सीमित संख्या को, केवल उन्हें ही दिखाई जाती है जो उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है उसे इस तरह गुप्त रूप में किया जाता है। उसी तरह से, यीशु ने जब अपना कार्य किया तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों को ही दिखाया, और अपने आप को कभी भी दूसरी जातियों को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने काम समाप्त कर लिया, तो वह तुरन्त ही मनुष्यों के बीच से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद यह वह, मनुष्य की यह छवि, नहीं था, जिसने स्वयं को मनुष्य को दर्शाया था, बल्कि पवित्र आत्मा था जिसने सीधे तौर पर कार्य को कार्यान्वित किया। एक बार जब परमेश्वर के देह बनने का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाता है, और फिर कभी भी उसके समान कार्य नहीं करता है जो उसने उस समय किया था जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। इस अवधि के दौरान, मनुष्य मुश्किल से ही उसके हाड़-माँस के शरीर की छवि को देखने में समर्थ होता है; वह स्वयं को मनुष्य पर बिल्कुल भी प्रकट नहीं करता है, बल्कि हमेशा छिपा रहता है। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित है। इसे एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। यह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस युग के लिए विशेष है; एक विशेष युग में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और उसके कार्य की सम्पूर्णता का नहीं। इसलिए, परमेश्वर के देह बनने की छवि सभी लोगों को नहीं दिखाई जाएगी। जो कुछ जनसमूह को दिखाया जाता है वह परमेश्वर की धार्मिकता और उसकी सम्पूर्णता में उसका स्वभाव है, बजाए उसके स्वरूप के जब वह दूसरी बार देह बना। यह न तो इकलौती छवि है जो मनुष्य को दिखायी जाती है, और न ही दो संयुक्त छवियाँ हैं। इसलिए, यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर का देहधारी देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए जिसे उसे करने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आता है जो उसे करना चाहिए, लोगों को अपनी छवि दिखाने नहीं आता है। यद्यपि देहधारण के महत्व को परमेश्वर के द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों को नहीं दिखाएगा, न ही वह जैतून के पहाड़ पर चढ़ेगा और सभी लोगों को दिखाई देगा; वह सब जो यहूदियों ने देखा है वह यहूदिया में उसके समय के दौरान की यीशु की तस्वीर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यीशु के देहधारण में उसका कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह यहूदी की छवि में यहूदिया में वापस नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्यजाति राष्ट्र को तो बिल्कुल भी नहीं दिखाएगा, क्योंकि यीशु के देहधारी होने की छवि केवल एक यहूदी की छवि है, न कि मनुष्य के उस पुत्र की छवि है जिसे यूहन्ना ने देखा था। यद्यपि यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर से आएगा, फिर भी वह अन्यजाति राष्ट्रों में स्वयं को मात्र यहूदी की छवि में नहीं दिखाएगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देह बनने का कार्य एक युग का मार्ग प्रशस्त करना है। यह कार्य कुछ वर्षों तक सीमित है, और वह परमेश्वर के आत्मा के समस्त कार्य को पूरा नहीं कर सकता है। इसी तरह से, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। उस समय के दौरान जब यीशु देह में था, वह युग का अंत करने या मनुष्यजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसने सलीब पर चढ़ाया जाना समाप्त कर लिया और अपने कार्य का समापन कर लिया था उसके पश्चात्, वह ऊँचे पर चढ़ा और हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्यजाति देशों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु की अभिव्यक्ति को देखने में असमर्थ थे, किन्तु केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ थे जिसे उन्होंने दीवारों पर चिपकाया था। यह तस्वीर सिर्फ एक ऐसी तस्वीर है जिसे मनुष्य के द्वारा बनाया गया है, और वह छवि नहीं है जो स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य को दिखाई थी। जब से परमेश्वर दो बार देह बना है वह अपने आपको उस छवि में जनसमूह के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। जिस कार्य को वह मनुष्यजाति के बीच करता है वह उन्हें उसके स्वभाव को समझने देने के लिए है। यह सब कुछ भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से मनुष्य को दिखाया जाता है; यह यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम के बजाय, उस स्वभाव के माध्यम से जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से जो उसने किया है, सम्पन्न किया जाता है। अर्थात्, परमेश्वर की छवि को देहधारी छवि के माध्यम से नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर के द्वारा, जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं, कार्यान्वित किए गए कार्य के माध्यम से, मनुष्य को ज्ञात करवाया जाता है; और उसके कार्य के माध्यम से, उसकी छवि को दिखाया जाता है और उसके स्वभाव को ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य का महत्व है जिसे वह देह में करने की इच्छा करता है।

एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह, जनसमूह को अपना स्वरूप देखने देते हुए, अन्यजाति देशों भर में अपना धार्मिक स्वभाव दिखाना शुरू करेगा। वह अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करेगा, और इसके माध्यम से भिन्न-भिन्न श्रेणियों के मनुष्यों के अंत को स्पष्ट करेगा, फलस्वरूप पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़ी सीमा तक विस्तारित नहीं होता है (ठीक वैसे ही जैसे यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया था, और आज मैं केवल तुम लोगों बीच कार्य करता हूँ) उसका कारण है क्योंकि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह केवल एक साधारण और सामान्य देह में एक अल्प समयावधि का कार्य कर रहा है; वह शाश्वतता का कार्य करने या अन्यजाति देशों के लोगों को दिखाई देने के कार्य को करने के लिए इस देहधारी देह का उपयोग नहीं कर रहा है। देह में कार्य को केवल दायरे में सीमित किया जा सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों बीच में कार्य करना), और तब इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से, इसके दायरे को तब विस्तारित किया जा सकता है। वास्तव में, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना है और तब उसके देहधारी देह का कार्य अब और नहीं होगा। क्योंकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और यह विश्व के सभी कोनों तक नहीं फैलता है—इसलिए इसे, यह पूरा नहीं कर सकता है। देह में कार्य के माध्यम से, उसका आत्मा उस कार्य को करता है जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य उद्घाटन की प्रकृति का है जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, यह उसका आत्मा है जो इस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इसके अलावा ऐसा एक बढ़े हुए दायरे में करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 112

परमेश्वर इस पृथ्वी पर जिस कार्य को करने के लिए आता है वह केवल युग की अगुवाई करना, नए युग को आरम्भ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। वह इस पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन के मार्ग को जीने, एक मनुष्य के रूप में स्वयं जीवन के सुखों और दुःखों का अनुभव करने, या अपने हाथ से किसी निश्चित व्यक्ति को सिद्ध बनाने या जब कोई आगे बढ़ता है तो उसकी व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने के लिए नहीं आया है। यह उसका कार्य नहीं है; उसका कार्य केवल एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करना और पुराने युग को समाप्त करना है। अर्थात्, वह व्यक्तिगत रूप से एक युग का मार्ग प्रशस्त करेगा, व्यक्तिगत रूप से अन्य युग का अंत करेगा, और व्यक्तिगत रूप से कार्य करके शैतान को पराजित करेगा। हर बार जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो यह ऐसा है मानो कि वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा हो। सबसे पहले, वह संसार को पराजित करता है और देह में शैतान को जीतता है; वह सारी महिमा का मालिक हो जाता है और दो हज़ार वर्षों के कार्य की समग्रता पर से पर्दा उठता है, और इसे ऐसा बना देता है कि पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पास चलने के लिए एक सही मार्ग और रहने के लिए एक शांति और आनन्द का जीवन हो। हालाँकि, परमेश्वर लम्बे समय तक पृथ्वी पर मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और अंततः मनुष्य के असदृश है। वह एक सामान्य मनुष्य का जीवनकाल नहीं जी सकता है, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता है जो साधारण के अलावा कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने जीवन को बनाए रखने के लिए एक सामान्य मनुष्य की सामान्य मानवता का केवल एक अल्पतम अंश ही है। दूसरे शब्दों में, कैसे परमेश्वर एक परिवार शुरू कर सकता है, उसकी एक आजीविका हो सकती है, और वह पृथ्वी पर बच्चे पैदा कर सकता है? क्या यह उसके लिए एक अपमान नहीं होगा? वह सिर्फ सामान्य तरीके से कार्य करने के उद्देश्य से सामान्य मानवता से संपन्न है, न कि एक सामान्य मनुष्य के समान अपना परिवार और आजीविका रखने में समर्थ होने के लिए। उसकी सामान्य समझ, सामान्य मन, और सामान्य भोजन और उसके देह के वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसमें एक सामान्य मानवता है; इस बात को साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है उसे एक परिवार या एक आजीविका रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक होगा! परमेश्वर का पृथ्वी पर आना वचन का देह बनना है; वह मनुष्य को मात्र अपने वचन को समझने और अपने वचन को देखने दे रहा है, अर्थात्, देह द्वारा किए गए कार्य को मनुष्य को देखने दे रहा है। उसका अभिप्राय यह नहीं है कि लोग उसके देह के साथ एक विशेष तरीके से व्यवहार करें, बल्कि मनुष्य केवल अंत तक आज्ञाकारी बने रहें, अर्थात्, उन सभी वचनों का पालन करें जो उसके मुँह से निकलते हैं, और उस समस्त कार्य के प्रति समर्पित हो जाएँ जिसे वह करता है। वह मात्र देह में कार्य कर रहा है; जानबूझ कर मनुष्य से यह नहीं कह रहा है कि वे उसकी देह की महानता या पवित्रता की सराहना करें, बल्कि वह मनुष्यों को अपने कार्य की बुद्धि और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है जिसका वह प्रयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस कार्य पर ध्यान केन्द्रित करता है जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देह बना और फिर भी वह सामने प्रकट नहीं होता है या अपनी सामान्य मानवता की गवाही नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय केवल उस कार्य को कार्यान्वित करता है जिसे करने की उसकी इच्छा है। इसलिए, जो कुछ तुम लोग देहधारी परमेश्वर से देख सकते हो यही वह है जो वह दिव्यता में है, ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मनुष्य के लिए स्पर्धा करने हेतु कभी भी इस बात की घोषणा नहीं करता है कि मानवीय रूप से वह क्या है। जब मनुष्य मनुष्यों की अगुवाई करता है केवल तभी, उनकी प्रशंसा और उनके द्वारा अधीनता को बेहतर ढंग से प्राप्त करने और फलस्वरूप दूसरों की अगुआई प्राप्त करने के लिए, वह बात करता है कि वह मानवीय रूप में क्या है। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय पाता है (अर्थात्, मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य)। मनुष्य के द्वारा उसकी प्रशंसा किए जाने, या मनुष्य से उसकी आराधना करवाने की कोई संभावना ही नहीं है। जो कुछ भी वह करता है वह उसके प्रति मनुष्य में आदर की भावना या उसकी अगाधता का एक भाव भरना है। मनुष्य को प्रभावित करने की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है। वह तुम लोगों से बस इतना ही चाहता है कि जब एक बार तुम लोगों ने उसके स्वभाव को देख लिया है तो उसका आदर करो। परमेश्वर जो कार्य करता है वह उसका स्वयं का है; इसे उसके स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है, न ही इसे मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना स्वयं का कार्य कर सकता है और मनुष्य की नए जीवन में अगुआई करने के लिए नए युग का सूत्रपात कर सकता है। जो कार्य वह करता है वह मनुष्य को एक नये जीवन को धारण करने और नए युग में प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है। शेष कार्य उन मनुष्यों को सौंप दिया जाता है जो सामान्य मानवता वाले हैं और जिनकी दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है। इसलिए, अनुग्रह के युग में, उसने दो हज़ार वर्षों के कार्य को, देह में अपने तैंतीस वर्षों में से मात्र साढ़े तीन वर्षों में पूरा कर दिया। जब परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो वह हमेशा दो हजार वर्षों के या एक समस्त युग के कार्य को कुछ ही वर्षों के लघुतम समय के भीतर पूरा कर देता है। वह विलंब नहीं करता है, और वह रुकता नहीं है; वह केवल कई वर्षों के काम को घनीभूत कर देता है ताकि यह मात्र कुछ थोड़े से वर्षों में ही पूरा हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वह व्यक्तिगत रूप से करता है वह केवल एक नया मार्ग प्रशस्त करने और नए युग की अगुवाई करने के लिए होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 113

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह किसी भी निर्माण या आंदोलनों में शामिल होने नहीं आता है; वह अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए आता है। हर बार जब वह देह बनता है, तो यह केवल कार्य के किसी चरण को पूरा करने और एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करने के लिए होता है। अब राज्य के युग का आगमन, और प्रशिक्षण की शुरूआत हो चुकी है। कार्य का यह चरण मनुष्य का कार्य नहीं है, यह मनुष्य पर कुछ हद तक कार्य करने के लिए नहीं है; यह केवल परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को पूरा करने के लिए है। जो वह करता है, वो मनुष्य का कार्य नहीं है, यह पृथ्वी को छोड़ने से पहले एक निश्चित अंश तक मनुष्य में कार्य करने के लिए नहीं है; यह उसकी सेवकाई को पूर्ण करने और उस कार्य को समाप्त करने के लिए है जो उसे करना चाहिए, जो कि पृथ्वी पर उसके कार्य के लिए उचित व्यवस्थाएँ करना, परिणामस्वरूप महिमान्वित बन जाना है। देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के समान नहीं है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तब वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने की परवाह करता है। जहाँ तक अन्य मुद्दों की बात है जो उसकी सेवकाई से सम्बन्धित नहीं हैं, तो वह उसमें कोई भाग नहीं लेता, यहाँ तक कि वह उसे अनदेखा कर देता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य के विषय में तो बिलकुल परवाह नहीं करता जो मनुष्य को करना चाहिए। जिस कार्य को वह करता है वह केवल उस युग से सम्बन्धित है जिसमें वह है और उस सेवकाई से सम्बन्धित है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, मानो कि अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हैं। वह एक मनुष्य के रूप में जीवन जीने के बारे में अधिक मूलभूत ज्ञान अर्जित नहीं करता, न तो वह और अधिक सामाजिक कौशल और न ही अन्य कोई बात सीखता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम बातों की ज़रा भी परवाह नहीं करता है जो इंसान में होनी चाहिये और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर में इतनी बातों का अभाव है कि जो बातें इंसान में होनी चाहिये, उन्हें वह अनदेखा कर देता है, और उसे ऐसी बातों की समझ नहीं है। जीवन का सामान्य ज्ञान, और साथ ही व्यवहार के सिद्धान्त और दूसरों के साथ सम्बद्ध होने जैसे मामले मानो उससे कोई संबंध नहीं रखते है। इसके बावजूद, तुम्हें देहधारी परमेश्वर का व्यवहार जरा-सा भी असामान्य नहीं लगेगा। कहने का अभिप्राय है कि उसकी मानवता बस उसके जीवन को एक साधारण इंसान का जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाकर रखती है ताकि वह सही और गलत का फैसला कर सके। लेकिन उसके अंदर उन बातों में से कोई भी बात नहीं है जो सिर्फ़ इंसानों (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिये। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग के लिये है न कि किसी विशेष व्यक्ति या स्थान के लिये, समूचे विश्व के लिये है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धान्त है जिसके द्वारा वह कार्य करता है। इसे किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता, और इंसान की इसमें कोई भूमिका नहीं है। जब भी परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस या यहाँ तक कि सत्तर, अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने के इरादे से नहीं आता जिससे कि इंसान उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करना उस ज्ञान को बिल्कुल भी गहरा नहीं करेगा जो परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य को है; इसके बजाए, यह केवल उसकी अवधारणाओं में वृद्धि करेगा और उसकी अवधारणाओं और विचारों को प्राचीन बना देगा। इसलिए तुम सभी को समझ लेना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। यकीनन तुम लोग मेरे कहे वचनों: "मैं एक साधारण मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ", को समझ गये होगे? क्या तुम लोग इन वचनों: "परमेश्वर पृथ्वी पर एक साधारण मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता है" को भूल गए हो? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग इसका अर्थ जानते हो कि "परमेश्वर एक रचे गए प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर कैसे आ सकता है"? परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस अभिप्राय के साथ नहीं आता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को कलीसिया के एक श्रेष्ठ अगुवे के रूप में विकसित करे। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देह बनना है; हालाँकि, मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किन्तु तुम सब लोगों को यह एहसास करना चाहिए कि परमेश्वर "देह बना वचन" है, न कि अस्थायी रूप से परमेश्वर की भूमिका निभाने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा विकसित किया गया एक देह है। परमेश्वर स्वयं, विकसित नहीं किया गया है, बल्कि "देह बना वचन", है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है। तुम सभी लोग जानते और मानते हो कि परमेश्वर का देहधारण एक वास्तविकता है, लेकिन तुम लोग ऐसी समझ का ढोंग करते हो जो कि वास्तव में तुम्हारी क्षमता के बाहर है। देहधारी परमेश्वर के कार्य से लेकर उसके देह बनने के सार और मायने तक, तुम लोग इन्हें बिल्कुल ग्रहण नहीं कर पाते हो, और बस दूसरों के द्वारा बोले गए वचनों को रटे-रटाये ढंग से दोहराते हो। क्या तुम मानते हो कि देहधारी परमेश्वर वैसा ही है जैसा तुम सोचते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 114

केवल युग की अगुवाई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए परमेश्वर देह बनता है। तुम लोगों को इस बिन्दु को समझना होगा। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किये जाने योग्य नहीं हैं। इससे पहले कि कार्य करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को विकसित होने एवं पूर्ण किये जाने की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता होती है और एक विशेष रूप से उच्च-स्तर की मानवता की आवश्यकता है। मनुष्य को न केवल अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को भी अधिक समझना चाहिए, और इसके अतिरिक्त उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना चाहिए। इंसान के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिये। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के लिए ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों का है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है जो उसे करना चाहिए। (स्वभाविक है कि उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, न कि यूँ ही बेतरतीब तरीके से किया जाता है। और उसका कार्य तब शुरू होता है जब उसकी सेवकाई को पूरा करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता में इनमें से कुछ भी नहीं होता (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता है)। वह अपनी सेवकाई को केवल तब पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी हैसियत कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता है या उसके बारे में उसकी जो भी राय रखता है इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मिसाल के तौर पर, जब यीशु ने अपना काम किया था; तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परन्तु वह अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उसे जो कार्य करना था, उसमें बाधा नहीं डाली। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को स्वीकार या घोषित नहीं किया, और उसने लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक है कि यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; यह वह तरीका भी था जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य उसे खुली आँखों से नहीं पहचान सकता था। यदि मनुष्य पहचान भी लेता, तब भी वह उसके काम में सहायता नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसकी देह को जान जाए; यह कार्य को करने और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए था। इसी कारण से, उसने अपनी पहचान ज्ञात करवाने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने सारा कार्य पूरा कर लिया जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य की समझ में आ गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य पर, न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि इंसान उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, बस अपनी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को करने के लिये आगे बढ़ता जाता है जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता है। जब उसके कार्य के समापन का समय आता है, तब इसे निश्चित रूप से पूरा किया जाएगा। कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता है। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं समझेगा। और जिस इरादे से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उसे समझने में इंसान को बहुत समय लग जाएगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग के कार्य को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक भाग वह है जिसे स्वयं देहधारी परमेश्वर करता है और दूसरा वे वचन हैं जिन्हें स्वयं देहधारी परमेश्वर बोलता है। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से सम्पन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के द्वारा किया जाना शेष रह जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने पहले ही मार्ग प्रशस्त कर दिया है, और अब उस पर मनुष्य को स्वयं चलना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गये लोग इस काम में सफल होंगे। अतः मनुष्य को पता होना चाहिये कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर को सबसे पहले कौन-सा कार्य करना है। उसे समझना चाहिये कि परमेश्वर देहधारी होने के सही मायने क्या हैं और उसे कौन-सा कार्य करना चाहिये। बजाय इसके कि वह परमेश्वर से भी वैसी ही अपेक्षा करे जैसी इंसानों से की जाती है। इसी में इंसान की गलती, अवधारणा और अवज्ञा छिपी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 115

परमेश्वर इसलिये देह धारण नहीं करता कि इंसान उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह में भेद करने की अनुमति देने के लिए नहीं है; न ही मनुष्य के विवेक की योग्यता को प्रशिक्षित करने के लिए परमेश्वर देह बनता है, इस अभिप्राय से तो परमेश्वर ऐसा बिलकुल नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर के देहधारी देह या शरीर की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिले। इसमें से कुछ भी परमेश्वर के देह बनने के पीछे की मूल इच्छा नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निन्दा करने के लिए, जानबूझकर मनुष्य को प्रकट करने के लिए, या चीज़ों को मनुष्य के लिए कठिन बनाने के लिए देहधारण करता है। इनमें से कोई भी परमेश्वर की मूल इच्छा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो कार्य का वह स्वरूप है जो अपरिहार्य होता है। वह अपने और भी महान कार्य और प्रबंधन के कारण ऐसे कार्य करता है न कि उन कारणों से जो इंसान सोचता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल तभी आता है जब उसके कार्य के द्वारा अपेक्षित होता है, और जब आवश्यकता होती है। वह पृथ्वी पर मात्र इधर-उधर देखने के इरादे से नहीं आता है, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतने भारी उत्तरदायित्व को क्यों ग्रहण करेगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? केवल तभी परमेश्वर देह बनता है जब उसे ऐसा करना है, और वह हमेशा एक अद्वितीय महत्व के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ मनुष्य को उसे नज़र भर देखने और उनके ज्ञान के दायरे को बढ़ाने के लिये होता, तो वह यों ही लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन, महान कार्य के लिए आता है, और इसलिये आता है ताकि बहुत से लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए और शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह धारण करता है। इसके अतिरिक्त, समस्त मानवजाति को अपनी ज़िन्दगी किस प्रकार जीनी है, इसमें उनका मार्गदर्शन करने के लिए आता है। इन सबका संबंध उसके प्रबंधन और पूरे विश्व के कार्य से है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बना होता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों नहीं करता? क्या उसके लिये ऐसा करना अत्यधिक आसान नहीं होता? परन्तु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाए वह बसने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान को चुनता है। केवल यह अकेला देह ही अत्यधिक महत्व का है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग के कार्य को भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात करता है। ये तमाम बातें, एक महत्वपूर्ण मामला हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित हैं, और यह कार्य के उस एक चरण के मायने हैं जिसे सम्पन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 116

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को, सीधे तौर पर पवित्रात्मा के साधनों के माध्यम से और आत्मा की पहचान से बचाया नहीं जाता है, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है, और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुँचा नहीं जा सकता है। यदि उसने आत्मा के तरीके से सीधे तौर पर मनुष्य को बचाने का प्रयास किया होता, तो मनुष्य उसके उद्धार को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ होता। यदि परमेश्वर सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण नहीं करता, तो वे इस उद्धार को पाने में असमर्थ होते। क्योंकि मनुष्य किसी भी तरीके से उस तक नहीं पहुँच सकता है, उसी प्रकार जैसे कोई भी मनुष्य यहोवा के बादल के पास नहीं जा सकता था। केवल सृष्टि का एक मनुष्य बनने के द्वारा ही, अर्थात्, अपने वचन को उस देह में, जो वो धारण करने वाला है, रखकर ही, वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी मनुष्यों में पहुँचा सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य स्वयं उसके वचन को सुन सकता है, उसके वचन को देख सकता है, उसके वचन को ग्रहण कर सकता है, और इसके माध्यम से पूरी तरह से बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो कोई भी शरीर युक्त मनुष्य ऐसे बड़े उद्धार को प्राप्त नहीं कर पाता, और न ही एक भी मनुष्य बचाया गया होता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर मनुष्य के बीच काम करता, तो पूरी मानवजाति खत्म हो जाती या शैतान के द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाकर ले जाई गयी होती क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के साथ सम्बद्ध होने में पूरी तरह असमर्थ रहता। प्रथम देहधारण यीशु की देह के माध्यम से मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, अर्थात्, उसने मनुष्य को सलीब से बचाया, परन्तु भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर रह गया था। दूसरा देहधारण अब और पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है परन्तु उन्हें पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिया गया था। इसे इसलिए किया जाता है ताकि जिन्हें क्षमा किया गया उन्हें उनके पापों से दूर किया जा सके और पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके, और वे स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से ही मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र किया जा सकता है। व्यवस्था के युग का अंत के बाद और अनुग्रह के युग के आरम्भ से, परमेश्वर ने उद्धार के अपने कार्य को शुरू किया, जो अंत के दिनों तक चलता है, जब वह विद्रोहशीलता के लिए मनुष्य के न्याय और ताड़ना का कार्य करते हुए मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध कर देगा। केवल तभी वो अपने उद्धार कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में, परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपने कार्य को करने के लिए मात्र दो बार देह बना। ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही मनुष्यों की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरण उद्धार के कार्य हैं। केवल परमेश्वर के देह बनने से ही वह मनुष्य के साथ-साथ रह सकता है, संसार के दुःख का अनुभव कर सकता है, और एक सामान्य देह में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह उस व्यावहारिक तरीके से मनुष्यों को आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें एक सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। देहधारी परमेश्वर की वजह से मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि सीधे तौर पर स्वर्ग से की गई अपनी प्रार्थनाओं से। क्योंकि मनुष्य शरीरी है; मनुष्य परमेश्वर के आत्मा को देखने में असमर्थ है और उस तक पहुँचने में तो बिलकुल भी समर्थ नहीं है। मनुष्य केवल परमेश्वर के देहधारी देह के साथ ही सम्बद्ध हो सकता है; केवल उसके माध्यम से ही मनुष्य सारे तरीकों और सारे सत्यों को समझ सकता है, और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को पापों से पीछा छुड़ाने और मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण देह के साथ परमेश्वर के सभी कार्य समाप्त होंगे और परमेश्वर के देहधारण के अर्थ को पूर्ण किया जायेगा। उसके बाद, देह में परमेश्वर का काम पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद, वह अपने कार्य के लिए पुन: देह नहीं बनेगा। क्योंकि उसका सम्पूर्ण प्रबंधन समाप्त हो जाएगा। अंत के दिनों का, उसका देहधारण अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, और अंत के दिनों में मनुष्यको उनके प्रकार के अनुसार विभाजित कर दिया जाएगा। वह उद्धार का कार्य अब और नहीं करेगा, और न ही वह किसी कार्य को करने के लिए देह में लौटेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 117

जो कुछ मनुष्यों ने अब प्राप्त किया है—आज की अपनी कद-काठी, ज्ञान, प्रेम, वफादारी, आज्ञाकारिता, और अंतर्दृष्टि—वे ऐसे परिणाम हैं जिन्हें वचन के न्याय के माध्यम से प्राप्त किया गया है। यह कि तुम वफादारी रखने में और आज के दिन तक खड़े रहने में समर्थ हो यह वचन के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है। बहुत कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है; वे रहस्य हैं और अद्भुत बातें हैं। इसलिए, बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज के दिन परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्होंने ऐसा किया है और वे सूक्ष्म परीक्षण करने या कुछ और कहने का जोखिम नहीं उठाते हैं; मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के द्वारा न्याय के अधीन औंधे मुँह पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे तौर पर बात करता, तो वे सब उस वाणी के प्रति समर्पित हो जाते, प्रकाशन के वचनों के बिना नीचे गिर जाते, बिलकुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर लगातार इसी तरीके से काम करता रहा, तो मनुष्य वचन के द्वारा न्याय के माध्यम से अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ नहीं होता। केवल देह बनने के माध्यम से ही वह व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को सभी के कानों तक पहुँचा सकता है ताकि वे सभी जिनके पास कान हैं उसके वचनों को सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय के कार्य को प्राप्त कर सकें। उसके वचन के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम सिर्फ यही है, पवित्रात्मा का प्रकटन नहीं जो मनुष्य को भयभीत करके समर्पण करवाता है। केवल ऐसे ही व्यावहारिक और असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव को, जो अनेक वर्षों से भीतर गहराई में छिपा हुआ है, पूरी तरह से प्रकट किया जा सकता है ताकि मनुष्य उसे पहचान सके और उसे बदलवा सके। यह देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य है; वह वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणामों को प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक तरीके से बोलता है और न्याय को निष्पादित करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार है और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। इसे देहधारी परमेश्वर के अधिकार को, वचन के कार्य के द्वारा प्राप्त किए गए परिणामों को, और इस बात को प्रकट करने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है; वह वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपने अधिकार को प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसका देह एक साधारण और सामान्य मानवता का बाहरी रूप है, फिर भी ये उसके वचन से प्राप्त हुए परिणाम हैं जो मनुष्य को दिखाते हैं कि परमेश्वर अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह परमेश्वर स्वयं है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से सभी मनुष्यों को दिखाया जाता है कि वह परमेश्वर स्वयं है, कि वह परमेश्वर स्वयं है जो देह बन गया है, कि किसी के भी द्वारा उसका अपमान नहीं किया जा सकता है, और कि कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय से बढ़कर नहीं हो सकता है, और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर प्रबल नहीं हो सकती। मनुष्य उसके प्रति पूर्णतः समर्पण करता है क्योंकि वही देह बना वचन है, और उसके अधिकार, और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण समर्पण करता है। उसके देहधारी देह द्वारा लाया गया कार्य ही वह अधिकार है जिसे वह धारण करता है। वह देहधारी हो गया क्योंकि देह भी अधिकार धारण कर सकता है, और वह एक व्यावहारिक तरीके से मनुष्यों के बीच इस प्रकार का कार्य करने में सक्षम है जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। ऐसा कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए किसी भी कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक वास्तविक है जो सारे अधिकार को धारण करता है, और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका देहधारी देह व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है; उसकी देह का बाहरी रूप कोई अधिकार धारण नहीं करता है और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुँचा जा सकता है। जबकि उसका सार अधिकार को वहन करता है, किन्तु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है, तो मनुष्य उसके अधिकार के अस्तित्व का पता लगाने में असमर्थ होता है; यह उसके वास्तविक प्रकृति के कार्य के लिए और भी अधिक अनुकूल है। और इस प्रकार के सभी कार्य परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं। भले ही कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता है कि परमेश्वर अधिकार रखता या यह नहीं देखता है कि परमेश्वर का अपमान नहीं किया जाना चाहिए या परमेश्वर के कोप को नहीं देखता है, फिर भी वो अपने छिपे हुए अधिकार और कोप और सार्वजनिक भाषण के माध्यम से, अपने वचनों के अभीष्ट परिणामों को प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज़ के लहजे, भाषण की कठोरता, और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से, मनुष्य सर्वथा आश्वस्त हो जाता है। इस तरह से, मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण करता है, जिसके पास प्रतीत होता है कि कोई अधिकार नहीं है, और इससे मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण का एक और महत्व है: अधिक वास्तविक रूप से बोलना और अपने वचनों को मनुष्य पर प्रभाव डालने देना ताकि वे परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य के गवाह बनें। अतः यह कार्य, यदि देहधारण के माध्यम से नहीं किया जाए, तो थोड़े से भी परिणामों को प्राप्त नहीं करेगा और पापियों का पूरी तरह से उद्धार करने में समर्थ नहीं होगा। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो वह पवित्रात्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अमूर्त है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए मनुष्य और परमेश्वर दो अलग-अलग संसारों से सम्बन्धित हैं, और स्वभाव में भिन्न हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है, और उनके बीच कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, मनुष्य आत्मा नहीं बन सकता है। ऐसा होने के कारण, परमेश्वर के आत्मा को सृजित प्राणियों में से एक बनना ही चाहिए और अपना मूल काम करना चाहिए। परमेश्वर सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ सकता है और सृष्टि का एक मनुष्य बनकर, कार्य करने और मनुष्य के बीच रहने के लिए अपने आपको विनम्र भी कर सकता है, परन्तु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर नहीं चढ़ सकता है और पवित्रात्मा नहीं बन सकता है और वह निम्नतम स्थान में तो बिलकुल भी नहीं उतर सकता है। इसलिए, अपने कार्य को करने के लिए परमेश्वर को देह अवश्य बनना चाहिए। उसी प्रकार, प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दे सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा को मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ाया जाना सम्भव नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से देह बन सकता था, परन्तु मनुष्य परमेश्वर द्वारा तैयार की गयी पापबलि को लेने के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वर्ग में चढ़ नहीं सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य को इस उद्धार को लेने के लिए स्वर्ग में चढ़ने देने की बजाए, यही सम्भव था कि परमेश्वर से स्वर्ग और पृथ्वी के बीच इधर-उधर आने-जाने का आग्रह किया जाये, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था और स्वर्ग पर चढ़ नहीं सकता था, और पापबलि को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था जिसे मनुष्य के द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तब ऐसा करना नितान्त आवश्यक होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न किया जा सकता, तो वो देहधारी होने के अनादर को सहन नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 118

परमेश्वर देहधारी इसलिए बना क्योंकि उसके कार्य का लक्ष्य शैतान की आत्मा, या कोई अभौतिक चीज़ नहीं, बल्कि मनुष्य है, जो माँस से बना है और जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। ऐसा निश्चित रूप से मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर देने की वजह से है कि परमेश्वर ने हाड़-माँस के मनुष्य को अपने कार्य का लक्ष्य बनाया है; इसके अतिरिक्त, क्योंकि मनुष्य भ्रष्टता का लक्ष्य है, इसलिए उसने उद्धार के अपने कार्य के समस्त चरणों के दौरान मनुष्य को अपने कार्य का एकमात्र लक्ष्य बनाया है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, और वह हाड़-माँस तथा लहू से बना है, और एकमात्र परमेश्वर ही है जो मनुष्य को बचा सकता है। इस तरह से, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए ऐसा देह बनना होगा जो मनुष्य के समान ही गुणों को धारण करता हो, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभावों को प्राप्त कर सके। परमेश्वर को अपने कार्य को ठीक तरह से करने के लिए निश्चित रूप से इसलिए देहधारण करना होगा क्योंकि मनुष्य हाड़-माँस से बना है, और पाप पर विजय पाने में या स्वयं को शरीर से वंचित करने में अक्षम है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का सार और उसकी पहचान, मनुष्य के सार और उसकी पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप-रंग मनुष्य के समान है, उसके पास किसी सामान्य व्यक्ति का रूप-रंग है, और वह एक सामान्य व्यक्ति का जीवन जीता है, और जो लोग उसे देखते हैं वे उसे किसी सामान्य व्यक्ति से भिन्न नहीं समझ सकते हैं। यह सामान्य रूप-रंग और सामान्य मानवता उसके सामान्य मानवता में अपने दिव्य कार्य को करने के लिए पर्याप्त है। उसका देह उसे सामान्य मानवता में अपना कार्य करने देता है, और मनुष्य के बीच अपने कार्य को करने में उसकी सहायता करता है, और, इसके अतिरिक्त, सामान्य मानवता मनुष्य के बीच उद्धार के कार्य को कार्यान्वित करने में उसकी सहायता करती है। यद्यपि उसकी सामान्य मानवता ने मनुष्य के बीच में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसके सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभदायक है। यद्यपि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं करते हैं, तब भी उसका कार्य प्रभावशाली हो सकता है, और इन प्रभावों को उसकी सामान्य मानवता के कारण प्राप्त किया जाता है। इस बारे में कोई सन्देह नहीं है। देह में उसके कार्य से, मनुष्य उसकी सामान्य मानवता के बारे में उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के बीच मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसके कार्य के द्वारा पूरी तरह से निगल लिया जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने प्राप्त किया है, कहने का तात्पर्य है कि, वह ज्ञान जो मनुष्य को उसके बारे में है, मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक है। वह जिस कार्य को देह में करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसका देह हाड़-माँस के मनुष्य के असदृश है; यद्यपि बाहरी आवरण एक समान है, फिर भी सार एक जैसा नहीं है। उसका देह परमेश्वर के बारे में मनुष्यों के बीच कई धारणाओं को उत्पन्न करता है, फिर भी उसका देह मनुष्य को अधिक ज्ञान भी अर्जित करने दे सकता है, और वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकता है जो वैसा ही बाहरी आवरण धारण करता है। क्योंकि वह मात्र एक मनुष्य नहीं है, बल्कि मनुष्य के बाहरी आवरण वाला परमेश्वर है, और कोई भी पूरी तरह से उसकी गहराई को माप नहीं सकता है और उसे समझ नहीं सकता है। एक अदृश्य और अस्पृश्य परमेश्वर का सभी के द्वारा प्रेम और स्वागत किया जाता है। यदि परमेश्वर बस एक पवित्रात्मा हो जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, तो परमेश्वर पर विश्वास करना मनुष्य के लिए बहुत आसान है। मनुष्य अपनी कल्पना को बेलगाम कर सकता है, और अपने आपको प्रसन्न करने तथा अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी आकृति को परमेश्वर की आकृति के रूप में चुन सकता है। इस तरह से, मनुष्य बिना किसी शक के ऐसा कुछ भी कर सकता है जो उसका स्वयं का परमेश्वर उससे करवाना चाहता है, और जो वो अत्यधिक पसंद करता है। इसके अलावा, मनुष्य मानता है कि उसकी अपेक्षा परमेश्वर के प्रति कोई भी उससे अधिक भरोसेमंद और भक्त नहीं है, और यह कि बाकी सब अन्य जातियों के कुत्ते हैं, तथा परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि यही वह है जो उन लोगों के द्वारा खोजा जाता है जिनका विश्वास परमेश्वर में अस्पष्ट है और सिद्धान्तों पर आधारित है; जो कुछ वे खोजते हैं वह सब थोड़ी बहुत विभिन्नता के साथ करीब-करीब एक जैसा ही है। मात्र इतना ही है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वर की छवियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, मगर उनका सार वास्तव में एक ही होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 119

भ्रष्ट मनुष्य की आवश्यकताएँ ही वह एकमात्र कारण है कि देहधारी परमेश्वर देह में आया है। यह मनुष्य की आवश्यकताओं की वजह से है परन्तु परमेश्वर की आवश्यकताओं के कारण नहीं, और परमेश्वर के समस्त बलिदान और कष्ट मनुष्यजाति के वास्ते हैं, और स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए नहीं हैं। परमेश्वर के लिए कुछ भला-बुरा या प्रतिफल नहीं है; वह भविष्य की कोई उपज नहीं, बल्कि जो मूल रूप से उसके प्रति बकाया था वह प्राप्त करेगा। जो सब कुछ वह मनुष्यजाति के लिए करता और बलिदान करता है यह इसलिए नहीं है कि वह बड़ा प्रतिफल प्राप्त कर सके, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मनुष्यजाति के वास्ते है। यद्यपि देह में परमेश्वर के कार्य में अनेक अकल्पनीय मुश्किलें शामिल होती हैं, फिर भी जिन प्रभावों को वह अंततः प्राप्त करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी कठिनाईयाँ अपरिहार्य हैं, और देह पवित्रात्मा के समान ही बड़ी पहचान को धारण नहीं कर सकता है, पवित्रात्मा के समान ही अलौकिक कर्मों को कार्यान्वित नहीं कर सकता है, वह पवित्रात्मा के समान ही अधिकार तो बिल्कुल भी धारण नहीं कर सकता है। फिर भी इस मामूली देह के द्वारा किए गए कार्य का सार पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, और यह देह स्वयं ही समस्त मानवजाति की आवश्यकताओं का उत्तर है। क्योंकि जिन्हें बचाया जाना है उनके लिए, पवित्रात्मा का उपयोगिता मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्नतर है: पवित्रात्मा का कार्य संपूर्ण विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों और महासागरों को ढकने में समर्थ है, मगर देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ उसका सम्पर्क है। इसके अलावा, स्पर्श-गम्य रूप वाले परमेश्वर के देह को मनुष्य के द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकता है, और मनुष्य पर परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का और अधिक गंभीर प्रभाव छोड़ सकता है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है, इसकी थाह पाना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, और यहाँ तक कि उनके लिए उसे देख पाना और भी अधिक मुश्किल है, और इसलिए वे मात्र खोखली कल्पनाओं पर ही भरोसा रख सकते हैं। हालाँकि, देह का कार्य सामान्य, और वास्तविकता पर आधारित है, और समृद्ध बुद्धि धारण किए हुए है, और ऐसा तथ्य है जिसे मनुष्य की भौतिक आँख के द्वारा देखा जा सकता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य की बुद्धि का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर सकता है, और उसे अपनी ढेर सारी कल्पना को काम में लगाने की आवश्यकता नहीं है। यह देह में परमेश्वर के कार्य की परिशुद्धता और उसका वास्तविक मूल्य है। पवित्रात्मा केवल उन कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और जिनकी कल्पना करना उसके लिए कठिन हैं, उदाहरण के लिए पवित्रात्मा की प्रबुद्धता, पवित्रात्मा द्वारा हृदय स्पर्श करना, और आत्मा का मार्गदर्शन, परन्तु मनुष्य के लिए जिसके पास एक मस्तिष्क है, ये कोई स्पष्ट अर्थ प्रदान नहीं करते हैं। वे केवल हृदय स्पर्शी, या एक विस्तृत अर्थ प्रदान करते हैं, और वचनों से कोई निर्देश नहीं दे सकते हैं। हालाँकि, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत भिन्न होता है: इसमें वचनों का परिशुद्ध मार्गदर्शन होता है, स्पष्ट इच्छा होती है, और उसमें स्पष्ट अपेक्षित लक्ष्य होते हैं। और इसलिए मनुष्य को अँधेरे में यहाँ-वहाँ टटोलने, या अपनी कल्पना को काम में लाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिलकुल भी आवश्यकता नहीं होती है। यह देह में किए गए कार्य की स्पष्टता है, और पवित्रात्मा के कार्य से इसकी बड़ी भिन्नता है। पवित्रात्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे तक उपयुक्त होता है, और देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। देह का कार्य मनुष्य को पवित्रात्मा के कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक सटीक और आवश्यक लक्ष्य तथा कहीं अधिक वास्तविक, मूल्यवान ज्ञान प्रदान करता है। जो कार्य भ्रष्ट मनुष्य के लिए सबसे अधिक मूल्य रखता है यह वह है जो परिशुद्ध वचनों, खोज करने के लिए स्पष्ट लक्ष्यों को प्रदान करता है, और जिसे देखा या स्पर्श किया जा सकता है। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त है, और केवल वास्तविक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और दूषित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पूर्व के भ्रष्ट और दुष्ट स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि पवित्रात्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार है, फिर भी इस तरह के कार्य को केवल उसके देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि पवित्रात्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावशाली होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्‍य है। यद्यपि अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, फिर भी जब वह अपने कार्य को पूरा करेगा, तो जो लोग उसके विरोधी हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि इसके विपरीत उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुकूल हैं और उससे अवियोज्य हैं। वह मनुष्य के लिए देह में किए गए उसके कार्य के महत्व को मनुष्य को ज्ञात करवाएगा, और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को जानेगा, मनुष्य के जीवन की प्रगति के लिए उसके वास्तविक मूल्य को जानेगा, और, इसके अतिरिक्त, यह जानेगा कि यह देह जीवन का एक जीवन्त स्रोत बन जाएगा जिससे अलग होने की बात को मानव सहन नहीं कर सकता है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर की पहचान और पद से मेल खाने से कहीं दूर है, और मनुष्य को परमेश्वर की वास्तविक हैसियत से असंगत प्रतीत होता है, फिर भी यह देह, जो परमेश्वर की असली छवि को, या परमेश्वर की सच्ची पहचान को धारण नहीं करता है, उस कार्य को कर सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। परमेश्वर के देहधारण का असली महत्व और मूल्य ऐसा ही है, और यही वह महत्व और मूल्य है जिसे सराहने और स्वीकार करने में मनुष्य असमर्थ है। यद्यपि सभी मनुष्य परमेश्वर के आत्मा का आदर करते हैं और परमेश्वर के देह का तिरस्कार करते हैं, फिर भी इस बात पर ध्यान न देते हुए कि वे किस प्रकार सोचते या देखते हैं, देह का वास्तविक महत्व और मूल्य पवित्रात्मा से बहुत बढ़कर है। निस्संदेह, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के सम्बन्ध में है। हर कोई जो सत्य की खोज करता है और परमेश्वर के प्रकटन की लालसा करता है उसके लिए, पवित्रात्मा का कार्य केवल हृदय स्पर्श या प्रकाशन, और अद्भुतता की समझ प्रदान कर सकता है जो अवर्णनीय तथा अकल्पनीय है, और एक समझ प्रदान कर सकता है कि यह महान, ज्ञानातीत, और प्रशंसनीय है, मगर सभी के लिए अलभ्य और अप्राप्य भी है। मनुष्य और परमेश्वर का आत्मा एक दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो कि उनके बीच एक बड़ी दूरी हो, और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते हैं, मानो कि मनुष्य और परमेश्वर किसी अदृश्य विभाजन के द्वारा पृथक किए गए हों। वास्तव में, यह पवित्रात्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक मायाजाल है, जो इसलिए है क्योंकि पवित्रात्मा और मनुष्य दोनों एक ही प्रकार के नहीं हैं, और पवित्रात्मा तथा मनुष्य एक ही संसार में कभी भी सहअस्तित्व में नहीं रहेंगे, और क्योंकि पवित्रात्मा मनुष्य की किसी भी चीज़ को धारण नहीं करता है। इसलिए मनुष्य को पवित्रात्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पवित्रात्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता है जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता होती है। देह का कार्य मनुष्य को खोज करने के लिए वास्तविक लक्ष्य, स्पष्ट वचन, और एक समझ प्रदान करता है कि परमेश्वर वास्तविक और सामान्य है, यह कि वह दीन और साधारण है। यद्यपि मनुष्य उसका भय मान सकता है, फिर भी अधिकांश लोगों के लिए उससे सम्बन्ध रखना आसान है: मनुष्य उसके चेहरे को देख सकता है, और उसकी आवाज़ को सुन सकता है, और मनुष्य को उसे दूर से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह मनुष्य को सुगम्य, दूर या अथाह नहीं, बल्कि दृश्य और स्पर्शगम्य महसूस होता है, क्योंकि यह देह मनुष्य के समान इसी संसार में है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 120

जो देह में जीवन बिताते हैं उन सभी के लिए, अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए खोज हेतु लक्ष्यों की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वास्तविक कर्मों और वास्तविक चेहरे को देखना आवश्यक बनाता है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर के देहधारी देह के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, और दोनों को सिर्फ साधारण और वास्तविक देह के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण ज़रूरी है, और इसीलिए संपूर्ण भ्रष्ट मनुष्यजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अस्पष्ट और अलौकिक परमेश्वरों की छवियों को उनके हृदयों से दूर अवश्य हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करें, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभाव को अवश्य पहचानना चाहिए। यदि केवल मनुष्य लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वरों की छवियों को हटाने का कार्य करता है, तो वह उपयुक्त प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वर की छवियों को केवल वचनों से उजागर, दूर किया, या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता है। ऐसा करके, अंततः गहराई से जड़ जमाई हुई इन चीज़ों को लोगों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल इन अस्पष्ट और अलौकिक चीज़ों को व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की सच्ची छवि से बदल कर, और लोगों को धीरे-धीरे इन्हें ज्ञात करवा कर ही, उचित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य एहसास करता है कि जिस परमेश्वर को वह पिछले समयों में खोजता था वह अस्पष्ट और अलौकिक है। जो इस प्रभाव को प्राप्त कर सकता है वह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई नहीं है, किसी निश्चित व्यक्ति की शिक्षाएँ तो बिलकुल भी नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की शिक्षाएँ हैं। मनुष्य की धारणाएँ तब प्रकट हो जाती हैं जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर की साधारणता और वास्तविकता मनुष्य की कल्पना में अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वर के विपरीत है। मनुष्य की मूल धारणाओं को केवल देहधारी परमेश्वर से उनके वैषम्य के माध्यम से ही प्रकट किया जा सकता है। देहधारी परमेश्वर से तुलना के बिना, मनुष्य की धारणाओं को प्रकट नहीं किया जा सकता था; दूसरे शब्दों में, वास्तविकता के वैषम्य के बिना अस्पष्ट चीज़ों को प्रकट नहीं किया जा सकता था। इस कार्य को करने के लिए कोई भी वचनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी वचनों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना स्वयं का कार्य कर सकता है, और कोई अन्य उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता है। भले ही मनुष्य की भाषा कितनी ही समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की वास्तविकता और साधारणता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने अस्तित्व को पूरी तरह से प्रकट करे, केवल तभी मनुष्य और अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है, और केवल तभी उसे और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। यह प्रभाव किसी भी हाड़-माँस वाले मनुष्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। निस्संदेह, परमेश्वर का आत्मा भी इस प्रभाव को प्राप्त करने में असमर्थ है। परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है, परन्तु इस कार्य को सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है, इसके बजाए, इसे केवल उस देह के द्वारा किया जा सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा पहनता है, अर्थात् देहधारी परमेश्वर के देह के द्वारा किया जा सकता है। यह देह मनुष्य है और परमेश्वर भी है, एक सामान्य मानवता को धारण किए हुए मनुष्य है और दिव्यता धारण किए हुए परमेश्वर भी है। और इसलिए, यद्यपि यह देह परमेश्वर का आत्मा नहीं है, और पवित्रात्मा से बिल्कुल भिन्न है, फिर भी वह अभी भी स्वयं देहधारी परमेश्वर है जो मनुष्य को बचाता है, जो पवित्रात्मा है और देह भी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसे किस नाम के द्वारा पुकारा जाता है, अंततोगत्वा यह अभी भी स्वयं परमेश्वर है जो मनुष्यजाति को बचाता है। क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह से अविभाज्य है, और देह का कार्य भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है; बस इतना ही है कि इस कार्य को पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं किया जाता है, बल्कि देह की पहचान का उपयोग करके किया गया है। जिस कार्य को सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा किए जाने की आवश्यकता है उसमें देहधारण की आवश्यकता नहीं है, और जिस कार्य को करने के लिए देह की आवश्यकता है उसे पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता है, और केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही किया जा सकता है। यही वह है जिसकी आवश्यकता इस कार्य के लिए है, और यही वह है जिसकी भ्रष्ट मनुष्य को आवश्यकता होती है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में, केवल एक ही चरण को सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा सम्पन्न किया गया था, और शेष दो चरणों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, और पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया गया है। पवित्रात्मा के द्वारा किए गए व्यवस्था के युग के कार्य में मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल नहीं था, और न ही इसका परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान से कोई सम्बन्ध था। हालाँकि, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में परमेश्वर के देह के कार्य में, मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान शामिल है, और उद्धार के कार्य का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा है। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की और अधिक आवश्यकता है, और उसे देहधारी परमेश्वर के प्रत्यक्ष कार्य की और अधिक आवश्यकता है। मनुष्यजाति को आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसका भरण पोषण करे, उसकी सिंचाई करे, उसका पोषण करे, उसका न्याय करे और उसे ताड़ना दे, और उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा और बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देह में प्रकट परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, मनुष्य का चरवाहा, मनुष्य की वास्तविक विद्यमान सहायता बन सकता है, और यह सब आज और बीते समयों में देहधारण की आवश्यकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 121

मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और वह परमेश्वर के सभी जीवधारियों में सबसे ऊपर है, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से उद्धार की आवश्यकता है। परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, न कि शैतान, और जिसे बचाया जाएगा वह मनुष्य की देह, और मनुष्य की आत्मा है, और शैतान नहीं। परमेश्वर का सर्वनाश का लक्ष्य शैतान है, मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य है, और मनुष्य के देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, इसलिए जिसे सबसे पहले बचाया जाना है वह मनुष्य का देह ही होगा। मनुष्य की देह को बहुत ज़्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह कुछ ऐसा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करता है, जो यहाँ तक कि खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध करता है और उसके अस्तित्व को भी नकारता है। यह भ्रष्ट देह मात्र दुःसाध्य है, और देह के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने और उसे परिवर्तित करने की तुलना में कुछ भी अधिक कठिन नहीं है। शैतान परेशानियाँ खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह के भीतर आता है, और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने और परमेश्वर की योजना को बाधित करने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है, और इस प्रकार मनुष्य शैतान, और परमेश्वर का शत्रु बन गया है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पानी होगी। यही कारण है कि परमेश्वर चुनौती के लिए उठता है, और उस कार्य को करने के लिए देह में आता है जो उसने करने का इरादा किया है, और शैतान के साथ लड़ता है। उसका उद्देश्य मनुष्यजाति का उद्धार, जिसे भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान की पराजय और उसका सर्वनाश है, जो उसके विरुद्ध विद्रोह करता है। वह मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के माध्यम से शैतान को पराजित करता है, और उसी के साथ भ्रष्ट मनुष्यजाति का उद्धार करता है। इस प्रकार, यह एक ऐसा कार्य है जो एक ही समय में दो लक्ष्यों को प्राप्त करता है। वह देह में होकर कार्य करता है, देह में होकर बात करता है, और मनुष्य के साथ बेहतर ढंग से संलग्न होने, और बेहतर ढंग से मनुष्य पर विजय पाने के लिए, देह में होकर समस्त कार्यों की शुरुआत करता है। अंतिम बार जब परमेश्वर देहधारण करेगा, तो अंत के दिनों के उसके कार्य को देह में पूरा किया जाएगा। वह सभी मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करेगा, अपने सम्पूर्ण प्रबंधन को समाप्त करेगा, और साथ ही देह में अपने समस्त कार्य को भी समाप्त करेगा। पृथ्वी पर उसके सभी कार्य के समाप्त हो जाने के पश्चात्, वह पूरी तरह से विजयी हो जाएगा। देह में कार्य करते हुए, परमेश्वर ने मनुष्यजाति को पूरी तरह से जीत लिया होगा, और मनुष्यजाति को पूर्ण रूप से अर्जित कर लिया होगा। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका समस्त प्रबंधन समापन की ओर आ चुका होगा? जब परमेश्वर देह में अपने कार्य का समापन करता है, तो चूँकि उसने शैतान को पूरी तरह से हरा दिया है और विजयी हुआ है, इसलिए शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने का अब और कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर के प्रथम देहधारण का कार्य छुटकारा और मनुष्य के पापों की क्षमा था। अब यह मनुष्यजाति को जीतने और पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य है, ताकि शैतान के पास अपने कार्य को करने का अब और कोई मार्ग न हो, और वह पूरी तरह से हार चुका हो, और परमेश्वर पूरी तरह से विजयी हो चुका हो। यह देह का कार्य है, और वह कार्य है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 122

परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के शुरूआती कार्य को सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा किया गया था, और देह के द्वारा नहीं। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अंतिम कार्य देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, और पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जाता है। मध्यवर्ती चरण का छुटकारे का कार्य भी देह में परमेश्वर के द्वारा किया गया था। समस्त प्रबंधन कार्य के दौरान, सबसे महत्वपूर्ण कार्य शैतान के प्रभाव से मनुष्य का उद्धार है। मुख्य कार्य भ्रष्ट मनुष्य पर सम्पूर्ण विजय है, इस प्रकार जीते गए मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का मूल आदर फिर से पुनः-स्थापित करना, और उसे एक सामान्य जीवन, कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर को एक प्राणी का सामान्य जीवन प्राप्त करने देना है। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रबंधन कार्य का मर्म है। उद्धार के कार्य के तीन चरणों में, व्यवस्था के युग का प्रथम चरण प्रबंधन कार्य के मर्म से काफी दूर था; इसमें उद्धार के कार्य का केवल हल्का सा आभास था, और यह शैतान के अधिकार क्षेत्र से मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य का आरम्भ नहीं था। कार्य का पहला चरण सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा किया गया था क्योंकि, व्यवस्था के अन्तर्गत, मनुष्य केवल व्यवस्था का पालन करना जानता था, और उसके पास और अधिक सत्य नहीं था, और क्योंकि व्यवस्था के युग का कार्य मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तनों को शायद ही शामिल करता था, और यह उस कार्य से तो बिलकुल भी सम्बन्धित नहीं था कि किस प्रकार मनुष्य को शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचाया जाए। इस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने कार्य के इस अत्यंत साधारण चरण को पूरा किया था जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से सम्बन्धित नहीं था। इस चरण के कार्य के प्रबंधन के मर्म से थोड़ा सा सम्बन्ध था, और इसका मनुष्य के उद्धार के आधिकारिक कार्य से कोई बड़ा सहसम्बन्ध नहीं था, और इसलिए इसमें परमेश्वर को अपने कार्य को व्यक्तिगत रूप से करने के लिए देह धारण करने की आवश्यकता नहीं थी। पवित्रात्मा के द्वारा किया गया कार्य अंतर्निहित और अथाह है, और यह मनुष्य के लिए भयावह और अगम्य है; पवित्रात्मा उद्धार के कार्य को सीधे तौर पर करने के लिए उपयुक्त नहीं है, और मनुष्य को सीधे तौर पर जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त नहीं है। मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है पवित्रात्मा के कार्य को ऐसे उपमार्ग में रूपान्तरित करना जो मनुष्य के करीब हो, कहने का तात्पर्य है कि, जो मनुष्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है वह यह है कि परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए एक साधारण, सामान्य व्यक्ति बन जाए। इसके लिए आवश्यक है कि पवित्रात्मा के कार्य का स्थान लेने के लिए परमेश्वर देहधारण करे, और मनुष्य के लिए, कार्य करने हेतु परमेश्वर के लिए कोई और अधिक उपयुक्त मार्ग नहीं है। कार्य के इन तीन चरणों में से, दो चरणों को देह के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, और ये दो चरण प्रबंधन कार्य की मुख्य अवस्थाएँ हैं। दो देहधारण परस्पर पूरक हैं और एक दूसरे को सिद्ध करते हैं। परमेश्वर के देहधारण के प्रथम चरण ने द्वितीय चरण के लिए नींव डाली थी, ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दो देहधारण पूर्णता का गठन करते हैं, और एक दूसरे से असंगत नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इन दो चरणों को परमेश्वर के द्वारा अपनी देहधारी पहचान में कार्यान्वित किया जाता है क्योंकि वे समस्त प्रबंधन के कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लगभग ऐसा कहा जा सकता है कि, परमेश्वर के दो देहधारणों के कार्य के बिना, समस्त प्रबंधन कार्य थम गया होता, और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य और कुछ नहीं बल्कि खोखली बात होती। यह कार्य महत्वपूर्ण है या नहीं यह मनुष्यजाति की आवश्यकताओं, और मनुष्यजाति की कलुषता की वास्तविकता, और शैतान की अवज्ञा की गंभीरता और कार्य में उसके व्यवधान पर आधारित है। कार्य करने में समर्थ सही व्यक्ति को कार्यकर्ता द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति, और कार्य के महत्व पर निर्दिष्ट किया जाता है। जब इस कार्य के महत्व की बात आती है, इस सम्बन्ध में कि कार्य के कौन से तरीके को अपनाया जाए—परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया गया कार्य, या देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य, या मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य—जिसे पहले निष्काषित किया जाना है वह मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य है, और, कार्य की प्रकृति, और पवित्रात्मा के कार्य बनाम देह के कार्य की प्रकृति के आधार पर, अंततः यह निर्णय लिया जाता है कि पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य की अपेक्षा देह के द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के लिए अधिक लाभदायक है, और अधिक लाभ प्रदान करता है। यह उस समय परमेश्वर का विचार है कि वह निर्णय ले कि कार्य पवित्रात्मा के द्वारा किया गया था या देह के द्वारा। कार्य के प्रत्येक चरण का एक महत्व और आधार होता है। वे आधारहीन कल्पनाएँ नहीं हैं, न ही उन्हें मनमाने ढंग से कार्यान्वित किया जाता है; उनमें एक निश्चित बुद्धि होती है। परमेश्वर के समस्त कार्य के पीछे की सच्चाई ऐसी ही है। विशेष रूप से, ऐसे बड़े कार्य में परमेश्वर की और भी अधिक योजना है क्योंकि देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच में कार्य कर रहा है। और इसलिए, परमेश्वर की बुद्धि और उसके अस्तित्व की समग्रता कार्य में उसकी प्रत्येक क्रिया, विचार, और मत में प्रतिबिम्बित होती हैं; यह परमेश्वर का अस्तित्व ही है जो अत्यधिक ठोस और सुव्यवस्थित है। इन गूढ़ विचारों और मतों की कल्पना करना मनुष्य के लिए कठिन है, और इन पर विश्वास करना मनुष्य के लिए कठिन है, और, इसके अतिरिक्त, इन्हें जानना मनुष्य के लिए कठिन है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य सामान्य सिद्धान्त के अनुसार होता है, जो मनुष्य के लिए अत्यंत संतोषजनक होता है। फिर भी परमेश्वर के कार्य की तुलना में, इसमें बस एक बहुत बड़ी असमानता दिखाई देती है; यद्यपि परमेश्वर के कर्म महान होते हैं और परमेश्वर का कार्य शानदार स्तर का होता है, फिर भी उनके पीछे अनेक सूक्ष्म और सटीक योजनाएँ और व्यवस्थाएँ होती हैं जो मनुष्य के लिए अकल्पनीय हैं। उसके कार्य का प्रत्येक चरण न केवल सिद्धान्त के अनुसार होता है, बल्कि अनेक चीज़ों से युक्त होता है जिन्हें मानवीय भाषा में स्पष्टता से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, और ये ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं। इस पर ध्यान दिए बिना कि यह पवित्रात्मा का कार्य है या देहधारी परमेश्वर का कार्य है, प्रत्येक उसके कार्य की योजनाओं से युक्त है। वह आधारहीन तरीके से कार्य नहीं करता है, और मामूली कार्य नहीं करता है। जब पवित्रात्मा सीधे तौर पर कार्य करता है तो यह उसके लक्ष्यों के साथ होता है, और जब वह कार्य करने के लिए मनुष्य बनता है (कहने का तात्पर्य है कि, जब वह अपने बाहरी आवरण को रूपान्तरित करता है), तो यह और भी अधिक उसके उद्देश्य के साथ होता है। अन्यथा क्यों वह तत्परता से अपनी पहचान को बदलेगा? अन्यथा क्यों वह तत्परता से ऐसा व्यक्ति बनेगा जिसे निकृष्ट माना जाता है और जिसे उत्पीड़ित किया जाता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 123

देह के उसके कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, जिसे कार्य के सम्बन्ध में कहा गया है, और वह एकमात्र जो अंततः कार्य का समापन करता है वह देहधारी परमेश्वर है, और पवित्रात्मा नहीं है। कुछ लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर किसी भी समय पृथ्वी पर आ सकता है और लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, किसी को छोड़े बिना एक-एक करके उनकी परीक्षा लेगा। जो इस तरह से सोचते हैं वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते हैं। परमेश्वर एक-एक करके मनुष्य का न्याय नहीं करता है, और एक-एक करके मनुष्य की परीक्षा नहीं लेता है; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या मनुष्य का सार पूरी तरह से समान नहीं है? जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य का भ्रष्ट सार है, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया मनुष्य का सार, और मनुष्य के समस्त पाप हैं। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता है। न्याय का कार्य प्रतिनिधिक है, और किसी निश्चित व्यक्ति के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता है। इसके बजाए, यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करने के द्वारा, देह में प्रकट परमेश्वर अपने कार्य का उपयोग संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है, जिसके पश्चात् यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य भी इस प्रकार ही है। परमेश्वर किसी निश्चित किस्म के व्यक्ति या लोगों के किसी निश्चित समूह का न्याय नहीं करता है, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है—उदाहरण के लिए, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या उसके विरुद्ध मनुष्य का अनादर, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान, इत्यादि। जिसका न्याय किया जाता है वह परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध का सार है, और यह कार्य अंत के दिनों के विजय का कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिसकी गवाही मनुष्य के द्वारा दी जाती है वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसकी बीते समयों के दौरान मनुष्य के द्वारा कल्पना की गई थी। देहधारी परमेश्वर के द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और उसका कार्य, वचन, और समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि उसके कार्य का दायरा सीमित है, और सीधे तौर पर संपूर्ण विश्व को शामिल नहीं करता है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—न केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए, न ही कम संख्या के लोगों के लिए। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य का दायरा संपूर्ण विश्व को शामिल नहीं करता है, फिर भी यह संपूर्ण विश्व के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे के भीतर उस कार्य का समापन कर लेता है उसके पश्चात्, वह तुरन्त ही इस कार्य को संपूर्ण विश्व में उसी तरह से फैला देगा जैसे कि यीशु के पुनरूत्थान और आरोहण के पश्चात् उसका सुसमाचार सारी दुनिया में फैल गया था। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि यह पवित्रात्मा का कार्य है या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे के भीतर कार्यान्वित किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण विश्व के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों के दौरान, परमेश्वर अपनी देहधारी पहचान का उपयोग करते हुए अपने कार्य को करने के लिए प्रकट होता है, और देह में प्रकट परमेश्वर वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि वह पवित्रात्मा है या देह, जो न्याय का कार्य करता है वही ऐसा परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके कार्य के आधार पर परिभाषित किया जाता है, और उसके बाहरी रंग-रूप तथा विभिन्न अन्य कारकों के अनुसार इसे परिभाषित नहीं किया जाता है। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, फिर भी कोई देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता है। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि मनुष्य इस बारे में क्या सोचता है, तथ्य, आखिरकार, तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि "कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।" यह बकवास है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय किसी के भी द्वारा नहीं किया जा सकता है। चूँकि इस कार्य को पहले से ही पूरा किया जा चुका है, इसलिए इस कार्य के बाद मनुष्य के बारे में परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रकट नहीं होगा; अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर ने पहले से ही संपूर्ण प्रबंधन के समस्त कार्य का समापन कर लिया है, और परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान का आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, न्याय का कार्य आध्यात्मिक संसार में कार्यान्वित नहीं किया जाता है, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 124

मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर की तुलना में कोई भी अधिक उपयुक्त और योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाता, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता। इसके अतिरिक्त, ऐसे कार्य को स्वीकार करना मनुष्य के लिए कठिन होता, क्योंकि पवित्रात्मा मनुष्य के आमने-सामने आने में असमर्थ है, और इस वजह से, प्रभाव तत्काल नहीं होते, और मनुष्य परमेश्वर के अपमान नहीं किए जाने योग्य स्वभाव को साफ-साफ देखने में बिलकुल भी सक्षम नहीं होता। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करता है केवल तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। मनुष्य के समान सामान्य मानवता को धारण करने वाला बन कर, देह में प्रकट परमेश्वर सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यह उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसकी असाधारणता का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उस स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने के लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाता, तो यह शैतान पर विजय नहीं होता। पवित्रात्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजयी है। यदि पवित्रात्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य की समस्त अवज्ञा का न्याय करने में सक्षम नहीं होता, और मनुष्य की समस्त अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर सकता था। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के पास कभी भी पवित्रात्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही है, और इसलिए पवित्रात्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते हैं। उसके प्रति मनुष्य की धारणाओं और विरोध का न्याय करने के माध्यम से, वह मनुष्यजाति की समस्त अवज्ञा का खुलासा करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट हैं। और इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता है, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देह में प्रकट परमेश्वर को मनुष्य के द्वारा देखा और छुआ जा सकता है, और देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। देहधारी परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में, मनुष्य विरोध से आज्ञाकारिता की ओर, प्रताड़ना से स्वीकृति की ओर, धारणा से ज्ञान की ओर, और तिरस्कार से प्रेम की ओर प्रगति करता है। ये देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव हैं। मनुष्य को केवल परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति के माध्यम से ही बचाया जाता है, मनुष्य केवल परमेश्वर के मुँह के वचनों के माध्यम से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर के द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, और पवित्रात्मा के रूप में अपनी पहचान में परमेश्वर का कार्य नहीं है। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य महानतम कार्य है, और अति गंभीर कार्य है, और परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अति महत्वपूर्ण भाग देहधारण के कार्य के दो चरण हैं। मनुष्य की गहन भ्रष्टता देहधारी परमेश्वर के कार्य में एक बड़ी बाधा है। विशेष रूप से, अंत के दिनों के लोगों पर कार्यान्वित किया गया कार्य बहुत ही कठिन है, और परिवेश शत्रुतापूर्ण है, और हर प्रकार के लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है। फिर भी इस कार्य के अंत में, यह बिना किसी त्रुटि के तब भी उचित प्रभाव को प्राप्त करेगा; यह देह के कार्य का प्रभाव है, और यह प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक प्रेरक है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का समापन देह में किया जाएगा, और इसे देहधारी परमेश्वर के द्वारा अवश्य पूरा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे निर्णायक कार्य देह में किया जाता है, और मनुष्य का उद्धार व्यक्तिगत रूप से देहधारी परमेश्वर के द्वारा अवश्य कार्यान्वित किया जाना चाहिए। यद्यपि संपूर्ण मनुष्यजाति को यह महसूस होता है कि देहधारी परमेश्वर मनुष्य से असंबंधित है, फिर भी वास्तव में यह देह संपूर्ण मनुष्यजाति के भाग्य और अस्तित्व से सम्बन्धित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 125

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण संपूर्ण मनुष्यजाति के वास्ते है, और सम्पूर्ण मनुष्यजाति की ओर निर्देशित है। यद्यपि यह देह में उसका कार्य है, फिर भी यह अभी भी सम्पूर्ण मनुष्यजाति की ओर निर्देशित है; वह संपूर्ण मनुष्यजाति का परमेश्वर है, वह सभी सृजित और गैर-सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। यद्यपि देह में उसका कार्य एक सीमित दायरे के भीतर है, और इस कार्य का लक्ष्य भी सीमित है, फिर भी हर बार जब वह अपना कार्य करने के लिए देह धारण करता है तो वह अपने कार्य का एक लक्ष्य चुनता है जो अत्यंत प्रतिनिधिक होता है; वह सामान्य और मामूली लोगों के समूह को नहीं चुनता है जिस पर कार्य किया जाए, बल्कि इसके बजाए अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में ऐसे लोगों के समूह को चुनता है जो देह में उसके कार्य के प्रतिनिधि होने में समर्थ हों। ऐसे लोगों के समूह को इसलिए चुना जाता है क्योंकि देह में उसके कार्य का दायरा सीमित होता है, और इसे विशेष रूप से उसके देहधारी देह के लिए तैयार किया जाता है, और इसे विशेष रूप से देह में उसके कार्य के लिए चुना जाता है। परमेश्वर का अपने कार्य के लक्ष्यों का चयन बेबुनियाद नहीं होता है, बल्कि सिद्धान्त के अनुसार होता हैः कार्य का लक्ष्य देहधारी परमेश्वर के कार्य के लिए अवश्य लाभदायक होना चाहिए, और उसे सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व करने में अवश्य सक्षम होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यीशु के व्यक्तिगत छुटकारे को स्वीकार करने के द्वारा यहूदी सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ थे, और देहधारी परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने के द्वारा चीनी लोग सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं। सम्पूर्ण मनुष्यजाति के यहूदियों के प्रतिनिधित्व का एक आधार है, और परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने में सम्पूर्ण मनुष्यजाति के चीनियों के प्रतिनिधित्व का भी एक आधार है। यहूदियों के बीच किए गए छुटकारे के कार्य से अधिक कोई भी चीज़ छुटकारे के महत्व को प्रकट नहीं करती है, और चीनी लोगों के बीच विजय के कार्य से अधिक कोई भी चीज़ विजय के कार्य की सम्पूर्णता और सफलता को प्रकट नहीं करती है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन लोगों के एक छोटे से समूह पर ही लक्षित प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में, इस छोटे समूह के बीच उसका कार्य संपूर्ण विश्व का कार्य है, और उसका वचन समस्त मनुष्यजाति की ओर निर्देशित है। देह में उसका कार्य समाप्त हो जाने के बाद, जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उस कार्य को फैलाना शुरू कर देंगे जो उसने उनके बीच किया है। देह में किए गए उसके कार्य के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वह उन लोगों के लिए परिशुद्ध वचनों और उपदेशों को, और मनुष्यजाति के लिए अपनी विशिष्ट इच्छा को छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, जिससे बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा को अत्यधिक परिशुद्धता से और वस्तुतः उन लोगों तक पहुँचा सकते हैं जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। मनुष्यों के बीच केवल देहधारी परमेश्वर का कार्य ही सचमुच में परमेश्वर के अस्तित्व और मनुष्य के साथ उसके रहने के तथ्य को पूरा करता है। केवल यह कार्य ही परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य की गवाही देने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग को अन्त पर लाता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही अस्पष्ट परमेश्वर में मनुष्यजाति के विश्वास का भी समापन करता है। विशेष रूप से, अंतिम देहधारी परमेश्वर का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुखद है। वह केवल व्यवस्था और सिद्धान्त के युग का ही अन्त नहीं करता है; बल्कि अधिक महत्वपूर्ण ढंग से, वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो वास्तविक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य को क्रियान्वित करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था और प्रबंधन कार्य को अन्त पर लाता है, और जो हज़ारों वर्षों से छिपा हुआ रहा है। वह अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, वह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर के चेहरे को खोजने की इच्छा करती थी परन्तु वह ऐसा करने में असमर्थ थी, वह उस युग का अन्त करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और संपूर्ण मनुष्यजाति की एक नए युग में पूरी तरह से अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। जब परमेश्वर अपने देह में कार्य करता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उन चीज़ों को खोजते और टटोलते नहीं हैं जो विद्यमान और अविद्यमान दोनों प्रतीत होती हैं, और अस्पष्ट परमेश्वर की इच्छा का अन्दाज़ा लगाना बन्द कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उस कार्य को सभी धर्मों और पंथों में आगे बढ़ाएँगे जो उसने देह में किया है, और वे उसके सभी वचनों को संपूर्ण मनुष्यजाति के कानों के लिए कहेंगे। वह सब जो उन लोगों के द्वारा सुना जाता है जो उसके सुसमाचार को प्राप्त करते हैं वह उसके कार्य के तथ्य होंगे, ऐसी चीज़ें होंगीं जो मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखी और सुनी गई होंगी, और तथ्य होंगे और अफ़वाह नहीं होगी। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनसे वह उस कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे औजार हैं जिन्हें वह उस कार्य को फैलाने में उपयोग करता है। तथ्यों के अस्तित्व के बिना, उसका सुसमाचार सभी देशों और सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; तथ्यों के बिना किन्तु केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के साथ, वह संपूर्ण विश्व पर विजय पाने के कार्य को करने में कभी भी समर्थ नहीं होगा। पवित्रात्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य, और अदृश्य है, और पवित्रात्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के किसी और प्रमाण या तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के सच्चे चेहरे को कभी नहीं देखेगा, और वह हमेशा ऐसे अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करेगा जो अस्तित्व में नहीं है। मनुष्य कभी भी परमेश्वर के मुख को नहीं देखेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों को कभी सुन पाएगा। मनुष्य की कल्पनाएँ, आखिरकार, खोखली होती हैं, और परमेश्वर के सच्चे चेहरे का स्थान नहीं ले सकती हैं; मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं किया जा सकता है। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। यही सबसे आदर्श तरीका है जिसमें परमेश्वर मनुष्य के लिए प्रकट होता है, जिसमें मनुष्य परमेश्वर को देखता है और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने लगता है, और इसे किसी गैर-देहधारी परमेश्वर के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के द्वारा इस चरण तक अपने कार्य को कार्यान्वित करने के बाद, उसके कार्य ने पहले से ही इष्टतम प्रभाव प्राप्त कर लिया है, और पूरी तरह सफल रहा है। देह में परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य ने पहले से ही उसके संपूर्ण प्रबंधन के कार्य का नब्बे प्रतिशत पूरा कर लिया है। इस देह ने उसके समस्त कार्य को एक बेहतर शुरूआत, और उसके समस्त कार्य के लिए एक सार प्रदान किया है, और उसके समस्त कार्य की घोषणा की है, और इस समस्त कार्य के लिए पूरी तरह से अंतिम भरपाई की है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के कार्य के चौथे चरण को करने के लिए और कोई अन्य देहधारी परमेश्वर नहीं होगा, और परमेश्वर के तीसरे देहधारण का अब और चमत्कारी कार्य नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 126

देह में परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण संपूर्ण युग के उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य के काम की तरह किसी निश्चित समय अवधि का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। और इसलिए उसके अंतिम देहधारण के कार्य के अन्त का यह अर्थ नहीं है कि उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो गया है, क्योंकि देह में उसका कार्य संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और केवल उसी समयावधि का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता है जिसमें वह देह में कार्य करता है। बस इतना ही है कि वह उस दौरान समूचे युग के अपने कार्य को पूरा करता है जब वह देह में होता है, उसके पश्चात् यह सभी स्थानों में फैल जाता है। देहधारी परमेश्वर के अपनी सेवकाई को पूरा करने के बाद, वह अपने भविष्य के कार्य को उन्हें सौंप देगा जो उसका अनुसरण करते हैं। इस तरह, संपूर्ण युग का उसका कार्य अखंडित रूप से किया जाएगा। देहधारण के संपूर्ण युग का कार्य केवल तभी पूर्ण माना जाएगा जब एक बार यह संपूर्ण विश्व में पूर्णतया फैल जाएगा। देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नये विशेष युग का आरम्भ करता है, और जो लोग उसके कार्य को निरन्तर जारी रखते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें उसके द्वारा उपयोग किया जाता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के भीतर होता है, और वह इस दायरे के परे जाने में असमर्थ होता है। यदि देहधारी परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए नहीं आए, तो मनुष्य पुराने युग का समापन करने और नए विशेष युग की शुरुआत करने में समर्थ नहीं है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से संभव है, और परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही आकर उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, और उसके अलावा, कोई भी उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता है। निस्संदेह, मैं जिस बारे में बात करता हूँ वह देधारण के कार्य के सम्बन्ध में है। यह देहधारी परमेश्वर पहले कार्य के एक कदम को कार्यान्वित करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, जिसके पश्चात् वह और अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है। कार्य का लक्ष्य मनुष्य पर विजय है। एक लिहाज से, परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, जिसके अतिरिक्त वह और भी अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, और इसलिए मनुष्य उसके बारे में और भी अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित कर लेता है। वह सिर्फ उन मनुष्यों के बीच विजय का कार्य करता है जिनकी उसके प्रति असंख्य धारणाएँ होती हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि वे किस प्रकार उससे व्यवहार करते हैं, जब एक बार वह अपनी सेवकाई को पूरा कर लेता है, तो सभी मनुष्य उसके प्रभुत्व के अधीन हो चुके होंगे। इस कार्य का तथ्य न केवल चीनी लोगों के बीच प्रतिबिम्बित होता है, बल्कि यह इस बात का प्रतिनिधित्व करता है कि किस प्रकार सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीत लिया जाएगा। जो प्रभाव इन लोगों पर प्राप्त होते हैं ये उन प्रभावों के एक अग्रदूत हैं जो संपूर्ण मनुष्यजाति पर प्राप्त किए जाएँगे, और उस कार्य के प्रभाव जिन्हें वह भविष्य में करेगा, वे इन लोगों पर प्रभावों को और भी तेजी से बढ़ा देंगे। देह में प्रकट परमेश्वर का कार्य किसी बड़ी धूमधाम को शामिल नहीं करता है, न ही यह धुँधलेपन में घिरा होता है। यह यथार्थ और वास्तविक होता है, और यह ऐसा कार्य है जिसमें एक और एक दो के बराबर होते हैं। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है, न ही यह किसी को धोखा देता है। जो कुछ लोग देखते हैं वे वास्तविक और विशुद्ध चीजें हैं, और जो कुछ मनुष्य प्राप्त करता है वह वास्तविक सत्य और ज्ञान है। जब कार्य समाप्त होगा, तब मनुष्य के पास परमेश्वर के बारे में नया ज्ञान होगा, और जो लोग सचमुच में परमेश्वर को खोजते हैं उनके पास उसके बारे में अब और कोई धारणाएँ नहीं होंगीं। यह सिर्फ चीनी लोगों पर उसके कार्य का प्रभाव नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीतने में उसके कार्य के प्रभाव को भी दर्शाता है, क्योंकि इस देह, और इस देह के कार्य, तथा इस देह की हर एक चीज़ की तुलना में कोई भी चीज़ सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय पाने के कार्य के लिए अधिक लाभदायक नहीं है। वे आज उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं, और भविष्य में उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। यह देह संपूर्ण मनुष्यजाति को जीत लेगा और संपूर्ण मनुष्यजाति को प्राप्त कर लेगा। ऐसा कोई बेहतर कार्य नहीं है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर को देखेगी, और परमेश्वर का आज्ञापालन करेगी, तथा परमेश्वर को जानेगी। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र एक सीमित दायरे को दर्शाता है, और जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह किसी निश्चित व्यक्ति से बात नहीं करता है, परन्तु सम्पूर्ण मनुष्यजाति से, और उन सभी लोगों से बात करता है जो उसके वचनों को स्वीकार करते हैं। जिस अन्त की वह घोषणा करता है वह सभी मनुष्यों का अन्त है, और सिर्फ किसी निश्चित व्यक्ति का अन्त नहीं है। वह किसी के साथ भी विशेष व्यवहार नहीं करता है, न ही किसी को सताता है, और वह सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिए कार्य करता है, और उससे बात करता है। और इस प्रकार इस देहधारी परमेश्वर ने संपूर्ण मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार पहले से ही वर्गीकृत कर दिया है, संपूर्ण मनुष्यजाति का पहले से ही न्याय कर दिया है, संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए पहले से ही उपयुक्त मंज़िल की व्यवस्था कर दी है। यद्यपि परमेश्वर सिर्फ चीन में ही अपना कार्य करता है, फिर भी, वास्तव में, उसने तो पहले से ही सम्पूर्ण विश्व के कार्य का संकल्प कर लिया है। अपने कथनों और अपनी व्यवस्थाओं को कदम दर कदम करने से पहले वह तब तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता है जब तक उसका कार्य समस्त मनुष्यजाति में फैल न जाए। क्या यह बहुत देर नहीं हो जाएगी? अब वह भविष्य के कार्य को अग्रिम में पूरा करने में पूरी तरह से समर्थ है। क्योंकि एकमात्र वह जो कार्य कर रहा है वह देहधारी परमेश्वर है, वह सीमित दायरे के भीतर असीमित कार्य कर रहा है, और उसके पश्चात् वह मनुष्य से उस कर्तव्य का पालन करवाएगा जो मनुष्य को करना चाहिए; यह उसके कार्य का सिद्धान्त है। वह केवल थोड़े समय के लिए ही मनुष्य के साथ रह सकता है, और संपूर्ण युग के कार्य के समाप्त होने तक मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह ऐसा परमेश्वर है जो अग्रिम में ही अपने भविष्य के कार्य की भविष्यवाणी करता है। उसके पश्चात्, वह अपने वचनों के द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करेगा, और मनुष्यजाति उसके वचनों के अनुसार उसके कदम दर कदम कार्य में प्रवेश करेगी। कोई भी बच कर नहीं भागेगा, और सभी को इसके अनुसार अभ्यास करना होगा। इसलिए, भविष्य में युग को उसके वचनों के अनुसार मार्गदर्शन दिया जाएगा, और पवित्रात्मा के द्वारा मार्गदर्शन नहीं दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 127

मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भष्ट किया गया है, और बिल्कुल अन्धा कर दिया गया है, और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर किस लिए व्यक्तिगत रूप से देह में कार्य करता है उसका अत्यंत मौलिक कारण है क्योंकि उसके उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, जो हाड़-माँस का है, और क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मनुष्य पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस तरह, देहधारी परमेश्वर का कार्य आवश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है, और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, और परमेश्वर के द्वारा हराये जाने का लक्ष्य बन गया है। इस तरह से, शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य पृथ्वी पर घटित होता है, और शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर को अवश्य मनुष्य बनना होगा। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में अपना कार्य कर रहा होता है, और आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर वास्तविक बनाता है। एकमात्र जिस पर विजय पायी जाती है वह मनुष्य है, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी है, वह जिसे पराजित किया गया है वह शैतान का मूर्त रूप है (निस्संदेह, यह भी मनुष्य ही है), जो परमेश्वर से शत्रुता में है, और एकमात्र जिसे अन्ततः बचाया जाता है वह भी मनुष्य ही है। इस तरह से, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि ऐसा मनुष्य बने जिसके पास एक प्राणी का बाहरी आवरण हो, ताकि वह उस मनुष्य पर विजय पाते हुए, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी है और उसके समान ही बाहरी आवरण धारण किए हुए है, और उस मनुष्य को बचाते हुए जो उसके समान ही बाहरी आवरण वाला है और जिसे शैतान के द्वारा नुकसान पहुँचाया गया है, शैतान के साथ वास्तविक युद्ध करने में समर्थ है। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, जिसे उसके द्वारा सृजित किया गया था। इसलिए उसे अवश्य मनुष्य बनना ही होगा, और इस तरह, उसका कार्य अधिक आसान हो जाता है। वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और, उसके अतिरिक्त, मनुष्य को बचाने में समर्थ है। यद्यपि यह देह सामान्य और वास्तविक है, फिर भी यह आम देह नहीं है: यह ऐसी देह नहीं है जो केवल मानवीय हो, परन्तु ऐसी देह है जो मानवीय और दिव्य दोनों है। यह मनुष्य से उसका अन्तर है, और परमेश्वर की पहचान का चिह्न है। केवल ऐसी देह ही वह काम कर सकता है जिसे वह करने का इरादा करता है, और देह में परमेश्वर की सेवकाई को पूरा कर सकता है, और मनुष्यों के बीच में अपने कार्य को पूरी तरह से पूर्ण कर सकता है। यदि यह ऐसा नहीं होता, तो मनुष्यों के बीच उसका कार्य हमेशा खोखला और त्रुटिपूर्ण होता। यद्यपि परमेश्वर शैतान की आत्मा के साथ युद्ध कर सकता है और विजयी होकर उभर सकता है, फिर भी भ्रष्ट हो चुके मनुष्य की पुरानी प्रकृति का समाधान कभी नहीं किया जा सकता है, और ऐसे लोग जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं और उसका विरोध करते हैं वे कभी भी उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं हो सकते हैं, कहने का तात्पर्य है कि, वह कभी भी मनुष्यजाति को जीत नहीं सकता है, और संपूर्ण मनुष्यजाति को दोबारा कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि पृथ्वी पर उसके कार्य का समाधान नहीं किया जा सकता है, तो उसके प्रबन्धन को कभी भी समाप्ति तक नहीं लाया जाएगा, और संपूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यदि परमेश्वर अपने सभी प्राणियों के साथ विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकता है, तब ऐसे प्रबंधन के कार्य का कभी भी कोई परिणाम नहीं होगा, और फलस्वरूप परमेश्वर की महिमा विलुप्त हो जाएगी। यद्यपि उसकी देह के पास कोई अधिकार नहीं है, फिर भी जिस कार्य को वह करता है उसने अपने प्रभाव को प्राप्त कर लिया होगा। यह उसके कार्य का अनिवार्य निर्देशन है। इस बात पर ध्य़ान दिए बिना कि उसकी देह अधिकार को धारण करता है या नहीं, अगर वह स्वयं परमेश्वर के कार्य को करने में समर्थ है, तो वह स्वयं परमेश्वर है। इस बात की परवाह किए बिना कि यह देह कितना सामान्य और साधारण है, वह उस कार्य को कर सकता है जो उसे करना चाहिए, क्योंकि यह देह परमेश्वर है और मात्र एक मनुष्य नहीं है। यह देह उस कार्य को कर सकता है जिसे मनुष्य नहीं कर सकता है उसका कारण है-क्योंकि उसका आंतरिक सार किसी भी मनुष्य के असदृश है, और वह मनुष्य को बचा सकता है और क्योंकि उसकी पहचान किसी भी मनुष्य से भिन्न है। यह देह मनुष्यजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह मनुष्य है और उससे भी बढ़कर परमेश्वर है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जिसे हाड़-माँस का कोई सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता है, और क्योंकि वह भ्रष्ट मनुष्य को बचा सकता है, जो पृथ्वी पर उसके साथ मिलकर रहता है। यद्यपि वह मनुष्य के समरूप है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी मूल्यवान व्यक्ति की तुलना में मनुष्यजाति के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता है, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक सक्षम है, और मनुष्यजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक समर्थ है। परिणामस्वरूप, यद्यपि यह देह सामान्य और साधारण है, फिर भी मनुष्यजाति के प्रति उसका योगदान और मनुष्यजाति के अस्तित्व के प्रति उसका महत्व उसे अत्यंत बहुमूल्य बना देता है, और इस देह का वास्तविक मूल्य और महत्व किसी भी मनुष्य के लिए अथाह है। यद्यपि यह देह सीधे तौर पर शैतान को नष्ट नहीं कर सकता है, फिर भी वह मनुष्यजाति को जीतने और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, और अपने प्रभुत्व के अधीन शैतान से पूरी तरह से समर्पण करवा सकता है। परमेश्वर इसलिए देह धारण करता है ताकि वह शैतान को हरा सके और वह मनुष्यजाति को बचाने में समर्थ है। वह सीधे तौर पर शैतान को नष्ट नहीं करता है, बल्कि मनुष्यजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है, को जीतने का कार्य करने के लिए देह बनता है। इस तरह से, वह सभी प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही देने में समर्थ होता है, और वह भ्रष्ट किए गए मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने में समर्थ होता है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की तुलना में देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय अधिक बड़ी गवाही देती है, तथा यह और अधिक विश्वास दिलाने वाली बात है। देह में प्रकट परमेश्वर सृजनकर्ता को जानने में मनुष्य की बेहतर ढंग से सहायता करने में समर्थ है, और प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही देने में समर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 128

परमेश्वर मनुष्य के बीच अपने कार्य को करने, मनुष्य पर स्वयं को व्यक्तिगत रूप से प्रकट करने और उसे देखने हेतु मनुष्य को अनुमति देने के लिए पृथ्वी पर आया है; क्या यह कोई साधारण मामला है? यह वास्तव में कुछ है! यह ऐसा नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है कि परमेश्वर आ गया है ताकि मनुष्य उसकी ओर देख सके, ताकि मनुष्य समझ सके कि परमेश्वर वास्तविक है और अस्पष्ट या खोखला नहीं है, और यह कि परमेश्वर उत्कृष्ट है किन्तु विनम्र भी है। क्या यह इतना सरल हो सकता है? यह निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है, और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाने का इरादा करता है, यह कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण अवश्य करना चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए फायदेमंद है। शैतान को हराने के लिए परमेश्वर के दो देहधारी देह अस्तित्व में रहे हैं, और मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने के लिए भी अस्तित्व में रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है वह केवल परमेश्वर ही हो सकता है, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या परमेश्वर का देहधारी देह। संक्षेप में, वह जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है वे स्वर्गदूत नहीं हो सकते हैं, मनुष्य तो बिलकुल नहीं हो सकता है जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। ऐसा करने में स्वर्गदूत निर्बल हैं, और मनुष्य तो और भी अधिक अशक्त है। वैसे तो, यदि परमेश्वर मनुष्य के जीवन पर कार्य करना चाहता है, यदि वह व्यक्तिगत रूप में पृथ्वी पर आकर मनुष्य को बचाना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा, अर्थात्, उसे व्यक्तिगत रूप से देह को पहनना होगा, और अपनी अंतर्निहित पहचान तथा उस कार्य के साथ जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, मनुष्य के बीच आना होगा और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य को बचाना होगा। यदि नहीं तो, यदि यह परमेश्वर का आत्मा या मनुष्य होता जिसने इस कार्य को किया था, तो यह युद्ध अपने प्रभावों को प्राप्त करने में हमेशा के लिए असफल हो जाता, और कभी समाप्त नहीं होता। जब परमेश्वर मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से शैतान के साथ युद्ध करने के लिए देह बनता है केवल तभी मनुष्य के पास उद्धार का एक अवसर होता है। इसके अतिरिक्त, केवल तभी शैतान लज्जित होता है, और निष्पादित करने के लिए उसके पास कोई अवसर या कोई योजना नहीं बचती है। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा अप्राप्य है, और किसी दैहिक मनुष्य के द्वारा परमेश्वर की ओर से इसे किया जाना तो और भी अधिक असमर्थ है, क्योंकि जिस कार्य को वह करता है वह मनुष्य के जीवन के वास्ते है, और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए है। यदि मनुष्य इस युद्ध में भाग लेता, तो वह खस्ताहाल अवस्था में भाग जाता, और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने में बस असमर्थ होता। वह सलीब से मनुष्य को बचाने में, या संपूर्ण विद्रोही मनुष्यजाति पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ होता, लेकिन थोड़ा सा पुराना कार्य करने में सक्षम होता जो सिद्धान्तों से परे नहीं जाता हो, या कोई और कार्य करने में सक्षम होता जो शैतान की पराजय से असम्बद्ध हो। तो क्यों परेशान होना? उस कार्य का क्या महत्व है जो मनुष्यजाति को प्राप्त न कर सकता हो, और शैतान को तो बिलकुल पराजित न कर सकता हो? और इसलिए, शैतान के साथ युद्ध केवल स्वयं परमेश्वर के द्वारा ही कार्यान्वित किया जा सकता है, और इसे मनुष्य के द्वारा किया जाना पूरी तरह से असंभव है। मनुष्य का कर्तव्य-आज्ञा पालन करना और अनुसरण करना है, क्योंकि मनुष्य धरती और स्वर्ग के सृजन के समान कार्य करने में असमर्थ है, इसके अतिरिक्त, न ही वह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य कार्यान्वित कर सकता है। मनुष्य केवल स्वयं परमेश्वर की अगुआई के तहत ही सृजनकर्ता को संतुष्ट कर सकता है, जिसके माध्यम से शैतान पराजित होता है; केवल यही वह एकमात्र कार्य है जो मनुष्य कर सकता है। और इसलिए, हर बार जब एक नया युद्ध आरम्भ होता है, कहने का तात्पर्य है कि, हर बार जब नए युग का कार्य शुरू होता है, तो इस कार्य को स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जिसके माध्यम से वह सम्पूर्ण युग की अगुवाई करता है, और सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करता है। प्रत्येक नए युग की भोर शैतान के साथ युद्ध में एक ऩई शुरुआत है, जिसके माध्यम से मनुष्य एक अधिक नए, अधिक सुन्दर क्षेत्र और एक नए युग में प्रवेश करता है जिसकी अगुवाई परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से की जाती है। मनुष्य सभी चीज़ों का स्वामी है, किन्तु ऐसे लोग जिन्हें प्राप्त कर लिया गया है वे शैतान के साथ सारी लड़ाइयों के परिणाम बन जाएँगे। शैतान सभी चीज़ों का भ्रष्टकर्ता है, सभी लड़ाइयों के अन्त में वह हारने वाला है, और वह ऐसा भी है जिसे इन लड़ाइयों के बाद दण्डित किया जाएगा। परमेश्वर, मनुष्य और शैतान के बीच, केवल शैतान ही वह है जिससे घृणा की जाएगी और जिसे ठुकरा दिया जाएगा। जिन्हें शैतान के द्वारा प्राप्त किया जाता है किन्तु परमेश्वर के द्वारा वापस नहीं लिया जाता है, इसी बीच, ऐसे लोग बन जाते हैं जो शैतान की ओर से सज़ा प्राप्त करेंगे। इन तीनों में से, सभी चीज़ों के द्वारा केवल परमेश्वर की ही आराधना की जानी चाहिए। जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया था किन्तु परमेश्वर के द्वारा वापस ले लिया जाता है और जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं, इसी बीच, ऐसे लोग बन जाते हैं जो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करेंगे और परमेश्वर की ओर से दुष्ट लोगों का न्याय करेंगे। परमेश्वर निश्चित रूप से विजयी होगा और शैतान निश्चित रूप से पराजित होगा, किन्तु मनुष्यों के बीच ऐसे लोग हैं जो जीतेंगे और ऐसे लोग हैं जो हारेंगे। जो विजय प्राप्त करेंगे वे विजेता के साथ होंगे; और जो हारेंगे वे हारने वाले के साथ होंगे; यह प्रकार के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, यह परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य का अंतिम परिणाम है, यह परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य का लक्ष्य भी है, और यह कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर की प्रबधंन योजना के मुख्य कार्य का केन्द्रीय भाग मनुष्यजाति के उद्धार पर केन्द्रित है, और परमेश्वर मुख्य रूप से अपने केन्द्रीय भाग के वास्ते, इस कार्य के वास्ते, और शैतान को पराजित करने के उद्देश्य से देह बनता है। पहली बार जब परमेश्वर देह बना तो वह भी शैतान को पराजित करने के लिए था: वह व्यक्तिगत रूप से देह बना, और, प्रथम युद्ध के कार्य को पूरा करने के लिए, जो कि मनुष्यजाति के छुटकारे का कार्य था, उसे व्यक्तिगत रूप से सलीब पर कीलों से जड़ दिया गया था। उसी प्रकार, कार्य के इस चरण को भी परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जो मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए, और व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को बोलने और मनुष्य को उसे देखने देने के लिए देह बना है। निस्संदेह, यह अपरिहार्य है कि वह मार्ग में साथ-साथ कुछ अन्य कार्य भी करता है, किन्तु जिस मुख्य कारण से वह अपने कार्य को व्यक्तिगत रूप से कार्यान्वित करता है वह है शैतान को हराना, सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय पाना, और इन लोगों को प्राप्त करना। और इसलिए, देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में महत्वपूर्ण है! यदि उसका उद्देश्य मनुष्य को केवल यह दिखाना होता कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, और यह कि परमेश्वर वास्तविक है, यदि यह मात्र इस कार्य को करने के वास्ते होता, तो देह बनने की कोई आवश्यकता नहीं होती। भले ही परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया होता, तब भी वह अपनी विनम्रता और गंभीरता, अपनी महानता और पवित्रता को सीधे मनुष्य पर प्रकट कर सकता था, किन्तु ऐसी चीज़ों का मनुष्यजाति के प्रबधंन के कार्य से कोई लेना देना नहीं है। ये मनुष्य को बचाने या उसे पूर्ण करने में असमर्थ हैं, और ये शैतान को तो पराजित बिलकुल नहीं कर सकती हैं। यदि शैतान की पराजय में केवल पवित्रात्मा ही शामिल होता है जो किसी आत्मा से युद्ध करता, तो ऐसे कार्य का और भी कम व्यावहारिक मूल्य होता; यह मनुष्य को प्राप्त करने में असमर्थ होता और मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं को बर्बाद कर देता। अपने आप में, आज परमेश्वर के कार्य का गहन महत्व है। यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि मनुष्य उसे देख सके, या कि मनुष्य की आँखों को खोला जा सके, या उसे थोड़ी सी गतिशीलता और प्रोत्साहन प्रदान किया जा सके; ऐसे कार्य का कोई महत्व नहीं है। यदि तुम केवल इस प्रकार के ज्ञान के बारे में ही बोल सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के देहधारण के सच्चे महत्व को नहीं जानते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 129

परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण का एक व्यवहारिक महत्व है। जब यीशु का आगमन हुआ, वह पुरुष था, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर स्त्री है। इससे, तुम देख सकते हो कि परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए पुरुष और स्त्री दोनों का सृजन किया और वह लिंग के बारे में कोई भी भेदभाव नहीं करता है। जब उसका आत्मा आगमन करता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वह देह उसका ही प्रतिनिधित्व करता है। चाहे यह पुरुष हो या स्त्री, दोनों ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि यह उसका देहधारी शरीर है। यदि यीशु एक स्त्री के रूप में आ जाता और प्रकट हो जाता, दूसरे शब्दों में, यदि पवित्र आत्मा के द्वारा एक शिशु कन्या का, न कि एक लड़के का, गर्भधारण किया गया होता, तब भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। यदि ऐसी बात होती तो, कार्य का यह स्तर एक पुरुष के द्वारा पूरा किया जाता और तब भी वह कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। दोनों ही चरणों में किया गया कार्य महत्वपूर्ण है; कोई भी कार्य दोहराया नहीं जाता है या एक-दूसरे का विरोध नहीं करता है। अपने कार्य के समय में, यीशु को इकलौता पुत्र कहा गया, "पुत्र" पुरुष लिंग का संकेत करता है। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो कि यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग के बारे में कोई भी भेदभाव नहीं करता है। उसका कार्य वैसे ही होता है जैसी वह इच्छा करता है और किसी प्रतिबंध के अधीन नहीं है, विशेषकर यह स्वतंत्र है, परन्तु प्रत्येक चरण का एक व्यवहारिक महत्व होता है। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और कहने की आवश्यकता नहीं कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम बार है। वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह स्वयं कार्य करने के लिए देह धारण नहीं करता जिसे मनुष्य देखे, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही अवधारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है और कि एक स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि सभी पुरुष को स्त्री पर अधिकार रखने वाला मानते थे। वे मानते थे कि कोई भी स्त्री अधिकार को धारण नहीं कर सकती है, सिर्फ पुरुष ही धारण कर सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मालिक है और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। अतीत में जब ऐसा कहा गया था कि पुरुष स्त्री का मालिक है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था, न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा द्वारा सृजन किया गया था। निस्संदेह, एक स्त्री को अपने पति की आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह से एक पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना अवश्य सीखना चाहिए। यही वे नियम और आदेश हैं जो यहोवा के द्वारा निर्धारित किए गए हैं जिनका पालन मानवजाति के द्वारा पृथ्वी पर अपने जीवन में किया जाना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, "तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" यह सिर्फ इसलिए कहा गया था ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व के अधीन सामान्य जीवन जी सके, ताकि मानवजाति के जीवन की संरचना हो और उसका जीवनक्रम व्यवस्थित रहे। इसलिए, यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, परन्तु ये सब मात्र पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों के सन्दर्भ में थे न कि देहधारी परमेश्वर की देह के सन्दर्भ में। परमेश्वर अपनी ही सृष्टि के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा सृजन की गई मानवजाति के लिए ही थे; ये नियम पुरुष और स्त्री के लिए निर्धारित किए गए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानव जाति का सृजन किया, तो उसने पुरुष और स्त्री दोनों को बनाया; इसलिए, उसका देहधारी शरीर का भी पुरुष या स्त्री में भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर तय नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार था जब उसने सबसे पहले मानवजाति की रचना की थी। अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। यदि मनुष्य उन वचनों को जो यहोवा के द्वारा आदम और हव्वा से कहे गए थे जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था, परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसे कि उसे करना चाहिए था? क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री बनना गलत है, तो क्या जब परमेश्वर ने स्त्री की रचना की तो यह एक बड़ी गलती नहीं रही होती? यदि मनुष्य अब भी मानता है कि परमेश्वर का स्त्री देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया और इसलिए अपनी पत्नी से प्रेम नहीं कर पाया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसी कि वर्तमान देहधारण की है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु के बारे में राय बनाने के लिए यहोवा के द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु के बारे में उस पुरुष के हिसाब से राय बनाते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम वर्तमान देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से राय नहीं बना सकते हो जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह अनुचित है! यदि तुम ऐसी राय बनाते हो, तो यह तुम्हारे विवेक के अभाव को साबित करता है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से सम्बंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था। उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचें कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। वे दोनों पूरी तरह से असम्बंधित है, और भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा नहीं हो सकता है कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मालिक है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह परमेश्वर स्वयं है, वह न सिर्फ स्त्री का मालिक है बल्कि पुरुष का भी मालिक है। वह सभी प्राणियों का प्रभु और सभी प्राणियों का मालिक है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मालिक का प्रतीक होना कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु एक पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम कैसे कह सकते हो कि वह एक ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा यीशु के भीतर आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट कर सकता था जिसे छला गया था? क्या वर्तमान में देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता है क्योंकि यह स्त्री थी जो सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि "स्त्री हमेशा पुरुष की आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त या प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है?" अतीत में तुम नहीं समझे; क्या तुम अब भी परमेश्वर के कार्य की, विशेषकर परमेश्वर के देहधारी शरीर की ईशनिंदा कर सकते हो? यदि तुम यह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो, तो अच्छा होगा कि तुम अपनी जुबान पर लगाम लगाओ, ऐसा न हो कि तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता प्रकट हो जाए और तुम्हारी कुरूपता उजागर हो जाए। यह मत सोचो कि तुम सब कुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबन्धन योजना के एक हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम क्यों इतनी ढिठाई से पेश आते हो? तुम्हारी मात्र जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए अपर्याप्त है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और जो कुछ सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचनात्मक न बनो और दोष मत ढूँढो। चाहे तुम कितने भी अभिमानी हो, फिर भी तुम चींटी से भी कम एक प्राणी हो! तुम्हारे पेट में जो कुछ भी है वह एक चींटी के पेट में जो है उससे भी कम है! यह मत सोचो कि क्योंकि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, इसलिए तुम बेलगाम ढंग से हाथ नचाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हो। क्या तुम्हारे अनुभव और तुम्हारी वरिष्ठता उन वचनों के परिणामस्वरूप नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत के द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम मेरे देहधारण को देखते हो, और परिणामस्वरूप तुम्हारी ऐसी समृद्ध धारणाएँ हो जाती हैं, जिनसे अनगिनत अवधारणाएँ आती हैं। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं हैं, तुम्हारे अंदर इतनी धारणाएँ नहीं होती। क्या तुम्हारी अवधारणाएँ इससे नहीं उभरी हैं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करते, तो तुम देहधारण के बारे में क्या जानते? क्या यह पहले देहधारण के तुम्हारे ज्ञान के कारण नहीं है कि तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण के बारे में राय बनाते हो? तुम्हें एक आज्ञाकारी अनुयायी बनने के बजाय क्यों इसकी जाँच करनी चाहिए? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें अध्ययन करने की अनुमति देंगे? तुम्हारा अपने परिवार के इतिहास का अध्ययन करना ठीक है, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के "परिवार के इतिहास" का अध्ययन करते हो, तो आज का परमेश्वर तुम्हें यह करने की अनुमति कैसे दे सकता है? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम अपने ऊपर अवमानना को नहीं लाते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 130

यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देहों का कोई सम्बंध नहीं है, किन्तु हमारी पवित्रात्माएँ एक ही हैं; यद्यपि हम जो करते हैं और जिस कार्य को हम वहन करते हैं वे एक ही नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम समान हैं; हमारी देहें भिन्न रूप धारण करती हैं, और यह ऐसा युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकता के कारण है; हमारी सेवकाई सदृश्य नहीं है, इसलिए जो कार्य हम लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और प्राप्त करता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनकी देहों के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और यद्यपि वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे थे, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु उनके आत्मा एक हैं। यद्यपि उनकी देहें किसी भी तरीके से रक्त या देह का सम्बंध साझा नहीं करती हैं, किन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर का देहधारण हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं, यद्यपि वे एक ही व्यक्ति के वंशज या सामान्य मानव भाषा (एक पुरुष था जिसने यहूदियों की भाषा बोली और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है) को साझा नहीं करते हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद भी वे एक ही आत्मा हैं, उनका सार एक ही है, उनके देहों के बाहरी आवरणों के बीच बिल्कुल भी पूर्ण समानताएँ नहीं है। वे मात्र एक ही मानजाति को साझा करते हैं, परन्तु उनके देहों का प्रकटन और जन्म समान नहीं हैं। इनका उनके अपने-अपने कार्य या मनुष्य के पास उनके बारे में जो ज्ञान है उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि, आखिरकार, वे एक ही आत्मा हैं और कोई भी उन्हें अलग नहीं कर सकता है। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं हैं, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्माओं के द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य देते हैं और उनके देह को अलग-अलग रक्त-संबंध से जोड़ते हैं। उसी तरह, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, वैसे ही जैसे कि यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है। वे एक ही आत्मा हैं। ठीक वैसे ही जैसे आज का देहधारी परमेश्वर और यीशु हैं। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं हैं; वे एक ही हैं; क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। वह दया और करुणा का, और साथ ही धर्मी न्याय का और मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य पर श्राप लाने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता है? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है? 

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 131

परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड और ऊपर के राज्य में महानतम है, तो क्या वह देह की छवि का उपयोग करके स्वयं को पूरी तरह से समझा सकता है? परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को करने के लिए देह के वस्त्र पहनता है। देह की इस छवि का कोई विशेष अर्थ नहीं है, यह युगों के गुज़रने से कोई संबंध नहीं रखती, और न ही इसका परमेश्वर के स्वभाव से कुछ लेना-देना है। यीशु ने अपनी छवि को क्यों नहीं बना रहने दिया? क्यों उसने मनुष्य को अपनी छवि चित्रित नहीं करने दी, ताकि उसे बाद की पीढ़ियों को सौंपा जा सकता? क्यों उसने लोगों को यह स्वीकार नहीं करने दिया कि उसकी छवि परमेश्वर की छवि है? यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि में बनाई गई थी, किंतु फिर भी क्या मनुष्य की छवि के लिए परमेश्वर की उत्कृष्ट छवि का प्रतिनिधित्व करना संभव रहा होता? जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो वह स्वर्ग से मात्र एक विशेष देह में अवरोहण करता है। यह उसका आत्मा है, जो देह में अवरोहण करता है, जिसके माध्यम से वह पवित्रात्मा का कार्य करता है। यह पवित्रात्मा ही है जो देह में व्यक्त होता है, और यह पवित्रात्मा ही है जो देह में अपना कार्य करता है। देह में किया गया कार्य पूरी तरह से पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है, और देह कार्य के वास्ते होता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देह की छवि स्वयं परमेश्वर की वास्तविक छवि का स्थानापन्न होती है; परमेश्वर के देह बनने का उद्देश्य और अर्थ यह नहीं है। वह केवल इसलिए देहधारी बनता है, ताकि पवित्रात्मा को रहने के लिए ऐसी जगह मिल सके, जो उसकी कार्य-प्रणाली के लिए उपयुक्त हो, जिससे देह में उसका कार्य बेहतर ढंग से हो सके, ताकि लोग उसके कर्म देख सकें, उसका स्वभाव समझ सकें, उसके वचन सुन सकें, और उसके कार्य का चमत्कार जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किंतु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसकी छवि उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करती है; यह केवल मनुष्य की एक धारणा है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के मुख्य पहलू उसका नाम, उसका कार्य, उसका स्वभाव और उसका लिंग हैं। इस युग में उसके प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। केवल उस समय के उसके कार्य के वास्ते होने से, देह में उसके प्रकटन का उसके प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है। फिर भी, देहधारी परमेश्वर के लिए कोई विशेष छवि नहीं रखना असंभव है, और इसलिए वह अपनी छवि निश्चित करने के लिए उपयुक्त परिवार चुनता है। यदि परमेश्वर के प्रकटन का प्रातिनिधिक अर्थ होता, तो उसके चेहरे जैसी विशेषताओं से संपन्न सभी व्यक्ति भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते। क्या यह एक गंभीर त्रुटि नहीं होती? यीशु का चित्र मनुष्य द्वारा चित्रित किया गया था, ताकि मनुष्य उसकी आराधना कर सके। उस समय पवित्रात्मा ने कोई विशेष निर्देश नहीं दिए, और इसलिए मनुष्य ने आज तक उस कल्पित चित्र को आगे बढ़ाया। वास्तव में, परमेश्वर के मूल इरादे के अनुसार, मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए था। यह केवल मनुष्य का उत्साह है, जिसके कारण आज तक यीशु का चित्र बचा रहा है। परमेश्वर पवित्रात्मा है, और अंतिम विश्लेषण में उसकी छवि कैसी है, इसे रेखांकित करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। उसकी छवि का केवल उसके स्वभाव द्वारा ही प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। जहाँ तक उसकी नाक, उसके मुँह, उसकी आँखों और उसके बालों के रूप-रंग की बात है, इन्हें रेखांकित करना तुम्हारी क्षमता से परे है। जब यूहन्ना पर प्रकाशन आया, तो उसने मनुष्य के पुत्र की छवि देखी : उसके मुँह से एक तेज दो-धारी तलवार निकल रही थी, उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं, उसका सिर और बाल श्‍वेत ऊन के समान उज्ज्वल थे, उसके पाँव चमकाए गए काँसे के समान थे, और उसकी छाती के चारों ओर सोने का पटुका बँधा हुआ था। यद्यपि उसके वचन बहुत जीवंत थे, किंतु उसने परमेश्वर की जिस छवि का वर्णन किया, वह किसी सृजित प्राणी की छवि नहीं थी। उसने जो देखा, वह मात्र एक झलक थी, भौतिक जगत में से किसी व्यक्ति की छवि नहीं थी। यूहन्ना ने एक झलक देखी थी, किंतु उसने परमेश्वर की वास्तविक छवि नहीं देखी थी। देहधारी परमेश्वर के देह की छवि एक सृजित प्राणी की छवि होने से परमेश्वर के स्वभाव का समग्रता से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने कहा कि उसने ऐसा अपनी छवि में किया और नर और मादा का सृजन किया। उस समय, उसने कहा कि उसने नर और मादा को परमेश्वर की छवि में बनाया। यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि से मिलती-जुलती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि है। न ही तुम परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से साकार करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर सकते हो, क्योंकि परमेश्वर इतना उत्कृष्ट, इतना महान, इतना अद्भुत और अथाह है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 132

इस बार, परमेश्वर कार्य करने आत्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण की देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में दूसरों से अलग कुछ भी नहीं है, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में तुमने पहले कभी नहीं सुना होगा। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य-वचन का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर का काम करती है, और मनुष्यों के जानने के लिये यही परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम परमेश्वर को स्वर्ग में देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग में परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने या समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा, जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह परमेश्वर के राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है। ऐसा साधारण देह असीम, अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। संभव है कि उसके कार्यों को तुम समझ न पाओ, परंतु उसके सभी कामों का लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते से लगते हैं, या उसकी ज्वाला-सी धधकती आंखों को नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन का अनुभव नहीं कर सकते, तुम उसके वचनों में परमेश्वर के क्रोध को सुन सकते हो, और जान सकते हो कि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर दया दिखाता है; तुम परमेश्वर के धार्मिकतायुक्त स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है, और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करना जानें। यही कारण है कि वह देह में लौटकर आया है। यद्यपि आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर मनुष्यों के समान है, उसकी एक नाक और दो आंखें हैं और वह साधारण परमेश्वर है, अंत में परमेश्वर उन्हें दिखाएगा कि इस मनुष्य के अस्तित्व के बिना, स्वर्ग और पृथ्वी एक अभूतपूर्व बदलाव से होकर गुज़रेंगे; इस मनुष्य के अस्तित्व के बिना, स्वर्ग मद्धिम हो जायेगा, पृथ्वी पर संकट छा जायेगा, समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों का शिकार बन जाएगी, परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि अंतिम दिनों में देहधारी परमेश्वर के उद्धार के बिना परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता; इस देह के अस्तित्व के बिना तुम सब सदैव ही पापियों और अपराधियों में प्रमुख और शव समान होते। तुम सबको यह जानना चाहिये कि बिना इस देह के अस्तित्व के समस्त मानवजाति को एक अवश्यंभावी संकट का सामना करना होगा, और अंत के दिनों में मानवजाति के लिये परमेश्वर के कठोर दण्ड से बच पाना कठिन होगा। इस साधारण शरीर के जन्म के बिना तुम सबकी दशा ऐसी होगी जिसमें न जीवन होगा और न मौत आयेगी, तुम लोग चाहे उसकी कितनी भी खोज करो; इस शरीर के अस्तित्व के बिना, तुम सब आज इस सत्य को नहीं पा सकोगे और न परमेश्वर के सिंहासन के पास आ पाओगे। बल्कि तुम सभी परमेश्वर से दण्ड पाओगे क्योंकि तुमने जघन्य पाप किये हैं। क्या तुम सब जानते हो? यदि परमेश्वर का वापस देह में लौटना न हो, तो किसी को भी उद्धार का अवसर नहीं मिलेगा; और यदि इस देह का आगमन न होता, तो उसने बहुत पहले पुराने युग को समाप्त कर दिया होता। इस प्रकार से सोचो, क्या तुम लोग परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण को नकार सकते हो? तुम सब जबकि इस साधारण मनुष्य से बहुत अधिक बड़ा लाभ प्राप्त कर सकते हो, तब तुम लोग उसे स्वीकार करने के लिये तैयार क्यों नहीं हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 133

परमेश्वर का कार्य ऐसा है जिसे तुम समझ नहीं कर सकते। जब तुम यह भी नहीं जान सकते कि क्या तुम्हारा निर्णय सही है, और न ही यह जान सकते हो कि परमेश्वर का कार्य सफल होगा या नहीं, तब तुम किस्मत क्यों नहीं आजमाते, और देखते कि यह साधारण मनुष्य तुम्हारे बड़े काम का है या नहीं और परमेश्वर ने बहुत महान काम किया है या नहीं। हालांकि मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि नूह के दिनों में लोग इस हद तक खाते और पीते थे, विवाह या शादियां करते थे, कि उनके काम परमेश्वर की दृष्टि में इतने असहनीय हो गये थे इसलिए उसने समस्त मानवजाति के विनाश के लिये प्रलय भेजी और नूह के परिवार के आठ प्राणियों, और सभी प्रकार के पक्षियों और पशुओं को बचाया। हालाँकि अंत के दिनों में जिन्हें परमेश्वर ने जीवित बचाकर रखा, ये वे लोग हैं जो अंत तक परमेश्वर के स्वामिभक्त रहे। यद्यपि दोनों ही काल बहुत अधिक भ्रष्टाचार के कारण परमेश्वर के लिये असहनीय थे, और दोनों ही युगों में मानवजाति का इतना पतन हो चुका था कि उन्होंने परमेश्वर को प्रभु के रूप में नकार दिया। नूह के समय में सभी लोग परमेश्वर के द्वारा नष्ट कर दिये गये थे। दोनों युगों में मानवजाति ने परमेश्वर को बहुत दुखी किया, परंतु अंत के दिनों में परमेश्वर ने मनुष्यों के प्रति संयम बरता है। ऐसा क्यों है? क्या तुम सबने कभी इस बात पर विचार नहीं किया? यदि तुम लोग सचमुच नहीं जानते, तो मैं तुम्हें बताता हूं। अंत के दिनों में मनुष्यों के साथ परमेश्वर का धीरज धरने का कारण यह नहीं है कि वे नूह के दिनों की तुलना में कमतर भ्रष्ट हैं या उन्होंने परमेश्वर के सामने पश्चाताप किया है और न ही कारण यह है कि परमेश्वर तकनीकी विकास के कारण अंत के दिनों में मनुष्यों का सर्वनाश नहीं कर सकता। कारण यह है कि अंत के दिनों में परमेश्वर को मनुष्यों के एक समूह में कार्य करना है, और यह कार्य देहधारी परमेश्वर स्वयं करेगा। साथ ही परमेश्वर इस समूह के एक भाग को अपने उद्धार का पात्र बनायेगा, अपनी प्रबंधन योजना का फल, और ऐसे लोगों को अपने साथ वह अगले युग में प्रवेश करायेगा। इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, परमेश्वर ने इसकी जो कीमत चुकाई है, वह सारी अंत के दिनों में अपने देहधारण की तैयारियों के लिये है। आज तुम जहां हो वह इसी देह के कारण है। क्योंकि परमेश्वर इस देह में है इसीलिए तुम सब जीवित हो यह उत्तम भविष्य या भाग्य जो तुम सबने पाया है, वह इस साधारण मनुष्य के कारण है। न केवल इतना, बल्कि अंत में समस्त जातियाँ इस साधारण मनुष्य की उपासना करेंगी साथ ही साथ धन्यवाद देंगी और इस मामूली से व्यक्ति की आज्ञा का पालन करेंगी। क्योंकि उसके द्वारा लाये गए सत्य, जीवन और मार्ग ने समस्त मानवजाति को बचाया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच के संघर्ष को शांत किया है, परमेश्वर और मनुष्यों को निकट ले आया है, और उनके बीच के विचारों के संपर्क का रास्ता खोला है। इसी ने परमेश्वर को और अधिक महान महिमा प्रदान की है, क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह, मसीह कहलाने के उपयुक्त नहीं है? क्या ऐसा साधारण मनुष्य मनुष्यों के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता? क्या ऐसा व्यक्ति जो संकट में मानवजाति की सहायता करता है, वह तुम लोगों के प्रेम और अवलंबन के योग्य नहीं हो सकता? यदि तुम सब उसके मुख से निकले सत्य को नकारो, और तुम लोग अपने बीच में उसके अस्तित्व को अप्रिय जानो, तब तुम सबकी नियति क्या होगी?

अंत के दिनों में परमेश्वर के सभी काम इस साधारण मनुष्य के द्वारा किये जाते हैं। वह तुम्हें सब कुछ प्रदान करेगा और वह तुम्हारे लिये सब कुछ तय कर सकता है। क्या ऐसा व्यक्ति वैसा हो सकता है जैसा तुम सब सोचते हो: एक ऐसा व्यक्ति जो इतना अधिक सादा है कि वह उल्लेख करने योग्य भी नहीं है? क्या उसका सत्य तुम लोगों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? क्या उसके कार्य की गवाही तुम सबको पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? या फिर वह मार्ग जिस पर वह तुम सबकी अगुवाई करता है, इस योग्य नहीं है कि तुम लोग अनुसरण करो? वह कौन-सी बात है कि तुम सब उसके प्रति अरुचि का अनुभव करते हो, और उसे अपने आप से दूर रखते हो और उससे बचकर रहते हो? वही सत्य की अभिव्यक्ति करता है, वही सत्य की आपूर्ति करता है, वही तुम सबकी यात्रा के लिये मार्ग बनाता है। क्या अब भी तुम लोगों को इन सच्चाइयों के भीतर परमेश्वर के कार्य के संकेत नहीं मिल पा रहे? यीशु के कार्य के बिना मानवजाति दुखों से पार नहीं पा सकती थी, परन्तु बिना देहधारण के आज वे कभी परमेश्वर की सराहना नहीं पा सकते या नये युग में प्रवेश नहीं कर सकते। इस साधारण मनुष्य के आगमन के बिना, तुम सबको कभी भी यह अवसर नहीं मिलता या तुम लोग कभी भी इस योग्य नहीं हो सकते कि परमेश्वर के सच्चे मुख का दर्शन कर सको। क्योंकि तुम जैसों को तो बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था, परंतु परमेश्वर ने दूसरी बार परमेश्वर के देहधारण के कारण तुम लोगों को क्षमा किया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर, मैं अंत में इन शब्दों के साथ तुम सब से विदा लेना चाहता हूं: यह साधारण-सा मनुष्य जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। यही वह सबसे बड़ा काम है, जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले से ही कर दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 134

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, व्यक्तित्व और वचन मिलकर ही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तू सिर्फ़ व्यक्तित्व के बारे में जानता है, यदि तू उसकी आदतों, और उसकी शख्सियत के बारे में जानता है, लेकिन तू आत्मा के कार्य या देह में आत्मा के कार्य के बारे में कुछ नहीं जानता है, और व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी जाने बिना, सिर्फ़ आत्मा और वचन पर ध्यान देता है, और केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करता है, तो यह साबित करता है कि तुझे व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है। व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, और उन नियमों और सिद्धांतों को समझना जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है, और परमेश्वर के आत्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसी तरह, इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और उसके द्वारा बोले गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इसलिये, यदि तू व्यावहारिक परमेश्वर को जानना चाहता है, तो तुझे मुख्य रूप से यह जानना है कि परमेश्वर कैसे अपनी मानवीयता में, और अपनी ईश्वरीयता में कार्य करता है; यह सम्बन्ध रखता है आत्मा की अभिव्यक्ति से, जिससे सभी लोगों का जुड़ाव है।

वह कौन सा पहलु है जो आत्मा की अभिव्यक्तियों में शामिल है? कभी-कभी परमेश्वर मानवीयता में कार्य करता है और कभी-कभी ईश्वरीयता में लेकिन कुल मिलाकर, दोनों मामलों में कमान आत्मा के पास होती है। लोगों के भीतर जैसी भी आत्मा होती है उनकी बाहरी अभिव्यक्ति वैसी ही होती है। आत्मा साधारण ढंग से कार्य करता है, लेकिन आत्मा के द्वारा निर्देश के दो भाग होते हैं: एक भाग उसका मानवीयता में कार्य है, जबकि दूसरा उसका ईश्वरीयता के द्वारा कार्य है। यह तुझे अच्छे ढंग से समझ लेना चाहिए। आत्मा का कार्य परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है: जब उसके मानवीय कार्य की आवश्यकता होती है, तो आत्मा इस मानवीय कार्य को निर्देशित करता है; जब उसके ईश्वरीय कार्य की आवश्यकता पड़ती है, तो उसके निष्पादन के लिए सीधे ईश्वरीयता प्रकट होती है। क्योंकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, वह मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में कार्य करता है। मानवीयता में उसका कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और मनुष्य की देह की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने, मनुष्य को और आसानी से अपने साथ जुड़ने, और मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई और सामान्यता देखने के योग्य बनाता है, और उन्हें यह देखने के योग्य बनाता है कि परमेश्वर के आत्मा ने देह धारण किया है और मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ जुड़ता है। ईश्वरीयता में उसका कार्य, लोगों के जीवन की पूर्ति करने, लोगों की हर चीज़ में सकारात्मक पक्ष से अगुवाई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने, और उन्हें वास्तव में आत्मा के देह में प्रकटीकरण को देखने देने के लिए है। मनुष्य के जीवन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईश्वरीयता में परमेश्वर के कार्य और वचनों के द्वारा प्राप्त की जाती है। सिर्फ़ ईश्वरीयता में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करके ही मनुष्य के स्वभाव में बदलाव प्राप्त किया जा सकता है और केवल तभी वे आत्मा में तुष्ट हो सकते हैं; मानवीयता का कार्य इसमें—परमेश्वर का मार्गदर्शन, सहायता, और मानवीयता में पूर्ति—जोड़ा जाये तभी परमेश्वर के कार्य का नतीजा पूरी तरह हासिल किया जा सकता है। व्यावहारिक परमेश्वर जिसके बारे में आज हम बातें करते हैं वो अपनी मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में ही कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकटीकरण के द्वारा उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन, तथा उसके सम्पूर्ण ईश्वरीयता वाले कार्य पूरे होते हैं। उसकी मानवता और ईश्वरीयता मिल कर एक हो जाते हैं, और दोनों के[क] कार्य वचनों के द्वारा पूरे किए जाते हैं; चाहे मानवता में हों या ईश्वरीयता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवीयता में काम करता है, तो वह मानवता की भाषा में बोलता है ताकि मनुष्य उससे जुड़ सके और उसके वचनों को समझ सके। उसके वचन स्पष्ट ढंग से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, इस तरह के कि वे सभी लोगों तक पहुँचाए जा सकें; सुशिक्षित और कम शिक्षित दोनों ही उसके वचनों को स्वीकार करने के योग्य होते हैं। ईश्वरीयता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पूर्ति और जीवन से भरपूर है, उसमें मानवीय अवधारणाओं की मिलावट नहीं है, उसमें मानवीय प्राथमिकताएँ शामिल नहीं हैं, वो किसी भी सामान्य मानवता से बंधनमुक्त और सामान्य मानवीय सीमाओं से परे है, यह कार्य भी देह में किया जाता है, लेकिन यह आत्मा की सीधी अभिव्यक्ति है। यदि लोग परमेश्वर के कार्य को सिर्फ़ उसकी मानवीयता में ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आप को एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों के निपटारे, काट-छाँट, और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि, पवित्र आत्मा के कार्य या उपस्थिति के बिना, वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जायेंगे। इस तरह के रोग और कमियों को केवल ईश्वरीयता के काम के माध्यम से ठीक किया जा सकता है, केवल तभी मनुष्य को सम्पूर्ण बनाया जा सकता है। बहुत लम्बे समय तक निपटारे और काट-छाँट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पूर्ति, सभी कमियों को पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की सभी अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने तथा उनके इरादों और प्रेरणा को खोल कर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना; यही है व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक कार्य। और इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में, तुम्‍हें उसे पहचानते और स्वीकार करते हुए उसकी मानवीयता के सामने समर्पण करना चाहिए और साथ ही साथ, तुम्‍हें ईश्वरीय कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के आत्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके देहधारी शरीर द्वारा किये जाते हैं। अर्थात्, परमेश्वर का आत्मा उसके मानवीय कार्य को निर्देशित करता है और ईश्वरीयता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तुम, परमेश्वर के मानवता में कार्य और संपूर्ण ईश्वरीय कार्य दोनों को देख सकते हो; व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यह असल महत्व है। यदि तुम सचमुच में इसे समझ सकते हो, तो फिर तुम परमेश्वर के सभी अलग-अलग भागों से जुड़ पाओगे; और तुम उसके ईश्वरीयता के कार्य को बहुत ज़्यादा महत्व देना, या उसके मानवता के कार्य के प्रति बहुत नकारात्‍मक होना बंद कर दोगे, और तुम चरम पर नहीं जाओगे, न ही गलत रास्ते पर मुड़ोगे। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसके मानवता के कार्य और ईश्वरीयता के कार्य, आत्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के द्वारा अभिव्‍यक्‍त किये जाते हैं, ताकि लोग देख सकें कि वो जीवंत और सजीव है, तथा असली और वास्तविक है।

परमेश्वर के आत्मा के मानवता में कार्य के परिवर्ती स्तर हैं। मानवता को सिद्ध करके, वो अपनी मानवता को आत्मा का निर्देश प्राप्त करने में समर्थ बनाता है, जिसके बाद उसकी मानवता कलीसियाओं का भरण पोषण और उनकी अगुवाई कर पाती है। परमेश्वर के सामान्य कार्य की यह एक अभिव्यक्ति है। इसलिए, यदि तू परमेश्वर के मानवता में कार्य के सिद्धांतों को अच्छे ढंग से समझ जाता है, तो फिर परमेश्वर के मानवता में कार्य के बारे में तुझमें धारणाएँ बनाने की संभावना नहीं होगी। चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर का आत्मा गलत नहीं हो सकता है। वह सही है और दोष रहित है; वह कुछ भी गलत नहीं करेगा। ईश्वरीय कार्य परमेश्वर की इच्छा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, उसमें मानवता का कोई भी हस्तक्षेप नहीं होता है। यह पूर्णता से होकर नहीं गुजरता, बल्कि सीधे आत्मा से आता है। तो भी, वह ईश्वरीयता में कार्य सिर्फ़ अपनी सामान्य मानवता के कारण कर पाता है; यह थोड़ा भी अलौकिक नहीं है, और किसी सामान्य मनुष्य के द्वारा किया जाता प्रतीत होता है; परमेश्वर के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने का मुख्य कारण परमेश्वर के वचनों को देह के द्वारा प्रकट करना है और देह का उपयोग करके परमेश्वर के आत्मा का कार्य पूरा करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "दोनों हैं" लिखा है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 135

आजकल, व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान बहुत अधिक एक तरफा है, और देह धारण के महत्व के बारे में उनकी समझ अभी भी बहुत कम है। जब परमेश्वर की देह की बात आती है, मनुष्य उसके कार्य और वचनों के माध्यम से देखता है कि परमेश्वर के आत्मा में बहुत कुछ, बड़ी समृद्धि के साथ शामिल है। लेकिन कुछ भी हो, आख़िरकार परमेश्वर की गवाही परमेश्वर के आत्मा से ही आती है: परमेश्वर देह में जो कार्य करता है, वह जिन सिद्धांतों के द्वारा कार्य करता है, वह मानवता में जो करता है और ईश्वरीयता में जो करता है। लोगों को इसका ज्ञान होना ही चाहिए। आज, तुम इस व्यक्तित्व की आराधना कर पाते हो, लेकिन वास्तव में, तुम आत्मा की आराधना कर रहे हो। यह वह न्यूनतम चीज है जिसका ज्ञान लोगों को देहधारी परमेश्वर के संबंध में पता होना चाहिए: देह के माध्यम से आत्मा के तत्व के बारे में जानना, देह में आत्मा के ईश्वरीय कार्य और मानवता के कार्य को जानना, आत्मा द्वारा देह के माध्यम से बोले गए सभी वचनों और कथनों को स्वीकार करना, और देखना कि कैसे परमेश्वर का आत्मा देह को निर्देशित करता है, और कैसे अपनी शक्ति को देह में दर्शाता है। अर्थात्, इस देह के माध्यम से, मनुष्य स्वर्ग के पवित्र आत्मा को जान जाता है, मानव जाति के मध्य में स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने से, संदिग्ध परमेश्वर जो मनुष्य की धारणाओं में होता है लुप्त हो जाता है, लोगों द्वारा व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं की आराधना के कारण परमेश्वर के प्रति उनकी आज्ञाकारिता बढ़ गई है; और परमेश्वर के आत्मा के देह में ईश्वरीय कार्य और मानवीय कार्य के माध्यम से, मनुष्य प्रकाशन और मार्गदर्शन पाता है, और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करता है। आत्मा के देह में आने का केवल यही वास्तविक अर्थ है, और यह मुख्य रूप से इसलिए कि लोग परमेश्वर से जुड़ सकें, परमेश्वर पर आश्रित हो सकें, और परमेश्वर के ज्ञान को पा सकें।

मुख्य रूप से, मनुष्य को व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति क्या रवैया रखना चाहिए? तू देह धारण, वचन के देह में प्रकट होने, परमेश्वर के देह में प्रकट होने, और व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में क्या जानता है? और आज मुख्य रूप से किसके बारे में बात हो रही है? देहधारण, वचन के देह में आने, और परमेश्वर के देह में प्रकट होने को-इन सब मामलों को समझ लिया जाना चाहिए। तुम लोगों के कद और युग के अनुसार, अपने जीवन अनुभवों के दौरान, तुम लोगों को धीरे-धीरे इन मामलों की समझ जाना चाहिए और इनका स्पष्ट ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के वचन को अनुभव करने की प्रक्रिया असल में परमेश्वर के वचनों के देह में प्रकट होने के बारे में जानने की प्रक्रिया के समान है। मनुष्य जितना अधिक परमेश्वर के वचनों को अनुभव करता है, उतना ही अधिक परमेश्वर के आत्मा के बारे में जानता है; परमेश्वर के वचनों के अनुभव के द्वारा, मनुष्य आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझता है और व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं के बारे में जान जाता है। वास्तविकता में, जब परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता और प्राप्त करता है, तो वह उन्हें व्यावहारिक परमेश्वर के कामों के बारे में बता रहा होता है; वह व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य का उपयोग लोगों को देह धारण का असल महत्व दिखाने और यह दिखाने के लिए कर रहा होता है कि परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के सामने वास्तव में प्रकट हुआ है। जब लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं और उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ उन्हें जीत लेती है, व्यावहारिक परमेश्वर के वचन उन्हें बदल देते हैं, और उनके भीतर अपना जीवन डाल देते हैं, उन लोगों को उस चीज से भर देते हैं जो वह है (चाहे वह जो मानवता में है उससे, या जो वह ईश्वरीयता में है उससे), उन लोगों को उसके वचनों के तत्व से भर देते हैं, और लोगों को उसके वचनों कोजीने देते हैं। जब परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है, वह ऐसा मुख्य रूप से व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और कथनों का उपयोग करके करता है ताकि लोगों की कमियों को दूर करे, और उनके विद्रोही स्वभाव का न्याय करे और उन्हें प्रकट करे, जिससे वे वह चीजें प्राप्त कर सकें जिनकी उन्हें जरूरत है, और उन्हें दिखाये कि परमेश्वर उनके बीच आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात, व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य है, प्रत्येक मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाना, उन्हें गंदगी वाली जगह से दूर ले जाना, और उनके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करना। व्यावहारिक परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जाने का सबसे गहरा महत्व उसे एक आदर्श, एक प्रतिमान के तौर पर ले पाने योग्य बनना, और एक सामान्य मानवता को जीना है, और जो कुछ भी वो कहे उसका अभ्यास करते हुए, व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं को बिना किसी विचलन या फिराव के, अभ्यास में लाने योग्य बनना है, और जो कुछ भी वह माँगता है उसे प्राप्त करने योग्य बनना है। इस तरह तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जा चुके होगे। जब तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो तो तुम में केवल पवित्र आत्मा का कार्य ही नहीं होता है; सैद्धांतिक रूप से तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं को जी पाते हो। सिर्फ़ पवित्र आत्मा के कार्य को पा लेने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास जीवन है; मुख्य यह है कि क्या तुम व्यावहारिक परमेश्वर की तुमसे जो अपेक्षा है उसके अनुसार कार्य कर पाते हो या नहीं, जो इससे संबंधित है कि तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जा सकते हो कि नहीं। ये बातें देह में व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य के सबसे महान अर्थ हैं। अर्थात, परमेश्वर सचमुच और वाकई देह में प्रकट हो कर, तथा जीवंत और सजीव होकर, लोगों द्वारा देखे जाकर, देह में आत्मा का काम वास्तव में करके, और देह में लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में काम करके लोगों के समूह को प्राप्त करता है। परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः इसलिए है कि मनुष्य परमेश्वर के असली कार्यों को देख सके, निराकार आत्मा को देह में साकार कर सके, और वह मनुष्य के द्वारा स्पर्श किया और देखा जा सके। इस तरह से, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है वह उसे जी पाएँगे, उसके द्वारा प्राप्त किये जा सकेंगे, और वे उसके हृदय के अनुसार हो पाएँगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर नहीं आता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने के अयोग्य होते; वे खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कार्यों का केवल उपदेश दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्यतः उनके लिए एक प्रतिमान और आदर्श का कार्य करने के लिए आता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है। सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य व्यावहारिक रूप से परमेश्वर को स्पर्श कर सकता, जान और देख सकता है; और केवल इसी ढंग से मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 136

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब सबसे पहली बार उसने देह धारण किया, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया। दूसरी बार भी लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, उसे बहुत कम पहचाना, और एक बार फिर से मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं हैं? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता है, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? और वह कैसे परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हो सकता है? क्या परमेश्वर को प्यार करना, परमेश्वर की सेवा करना, महिमा बढ़ाना—सभी कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि तुम अपने जीवन को इन अवास्तविक, अव्यवहारिक बातों के प्रति समर्पित करते हो, तो क्या तुम व्यर्थ में श्रम नहीं करते हो? जब तुम परमेश्वर को जानते तक नहीं हो तो तुम परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हो? क्या इस प्रकार की खोज अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? कोई परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? परमेश्वर का अंतरंग होने का व्यवहारिक महत्व क्या है? क्या तुम परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हो? क्या तुम देख सकते हो कि पवित्रात्मा कितना महान और उच्च है? किसी अदृश्य, अमूर्त परमेश्वर का अंतरंग होना—क्या यह अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? इस प्रकार की खोज का व्यावहारिक महत्व क्या है? क्या ये सभी कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? तुम जिस चीज की खोज करते हो वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, फिर भी वास्तव में तुम शैतान के छोटे से पालतू कुत्ते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो और अस्तित्वहीन "सभी चीजों के परमेश्वर" की खोज करते हो, जो कि अदृश्य, अमूर्त और तुम्हारी अपनी धारणाओं का है। अस्पष्टता से कहा जाए, तो इस प्रकार का "परमेश्वर" शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह तुम स्वयं हो। तुम अपना स्वयं का ही अंतरंग होने का प्रयास करते हो फिर भी कहते हो कि तुम परमेश्वर का अंतरंग होने की खोज करते हो—क्या यह ईशनिंदा नहीं है? इस प्रकार की खोज का क्या मूल्य है? यदि परमेश्वर का आत्मा देहधारी नहीं होता है, तो परमेश्वर का सार मनुष्य के लिए केवल अदृश्य, अमूर्त जीवन का आत्मा, निराकार और अनाकार है, अभौतिक प्रकार का, अगम्य और अबोधगम्य है। मनुष्य किसी निराकार, चमत्कारिक, अथाह आत्मा से अंतरंग किस प्रकार से हो सकता है? क्या यह एक मज़ाक नहीं है? इस प्रकार के बेतुके तर्क गलत और अव्यावहारिक हैं। सृजन किया हुआ मनुष्य परमेश्वर के आत्मा के लिए अंतर्निहित रूप से भिन्न है, इसलिए ये दोनों किस प्रकार से अंतरंग हो सकते हैं? यदि परमेश्वर का आत्मा देह में साकार नहीं होता, यदि परमेश्वर देहधारी न हुआ होता और उसने एक प्राणी बनकर अपने आपको विनीत न बनाया होता, तो सृजन किया गया मनुष्य अयोग्य और उसका अंतरंग होने में असमर्थ दोनों होता, और उन परमेश्वर के विश्वासियों के अलावा जिनके पास उनकी आत्माओं के स्वर्ग में प्रवेश कर जाने के बाद परमेश्वर का अंतरंग होने का एक अवसर है, अधिकांश लोग परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग होने के योग्य नहीं होते। और यदि मनुष्य देहधारी परमेश्वर के मार्गदर्शन में स्वर्ग में परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करता है, तो क्या वह आश्चर्यजनक ढंग से मूर्ख अमानविक नहीं है? मनुष्य अदृश्य परमेश्वर के प्रति मात्र "भक्ति" का अनुसरण करता है और जिसे देखा जा सकता है उस परमेश्वर पर थोड़ा सा भी ध्यान नहीं देता है, क्योंकि किसी अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है—वह मनुष्य जैसा चाहे वैसा कर सकता है। किन्तु दृश्यमान परमेश्वर का अनुसरण इतना आसान नहीं है। जो मनुष्य एक अज्ञात परमेश्वर को खोजता है वह अवश्य परमेश्वर को प्राप्त करने में असमर्थ है, क्योंकि सभी अज्ञात और अमूर्त वस्तुएँ मनुष्य के द्वारा कल्पना की गई हैं, और मनुष्यों के द्वारा प्राप्त किए जाने में असमर्थ हैं। यदि तुम लोगों के बीच आया हुआ परमेश्वर एक शानदार और उच्च परमेश्वर होता जो तुम लोगों के लिए भी अगम्य होता, तो तुम लोग उसकी इच्छा को कैसे समझ सकते थे? और तुम लोग किस प्रकार से उसे जान और समझ सकते थे? यदि वह केवल उसका अपना कार्य करता, और मनुष्य के साथ उसका कोई भी सामान्य सम्पर्क नहीं होता, या उसमें कोई सामान्य मानवता नहीं होती और वह नश्वर मात्र की पहुँच से बाहर होता, तो, भले ही उसने तुम लोगों के लिए कितना भी अधिक कार्य किया होता किन्तु तुम लोगों का उसके साथ कोई सम्पर्क नहीं होता, और तुम लोग उसे देखने में असमर्थ होते, तो तुम लोग उसे कैसे जान सकते थे? यदि यह इस सामान्य मानवता धारण की हुई देह के लिए नहीं होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के देहधारण के कारण है कि मनुष्य इस देहधारी परमेश्वर का अंतरंग होने के योग्य है। मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग बन जाता है क्योंकि मनुष्य उसके सम्पर्क में आता है, क्योंकि मनुष्य उसके साथ रहता है और उसका साथ बनाए रखता है, और धीरे-धीरे उसे जान जाता है। यदि यह इस तरह से नहीं होता, तो क्या मनुष्य द्वारा अनुसरण किया जाना व्यर्थ नहीं होता? अर्थात्, यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता की वजह से है कि मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग होने में सक्षम है। यह केवल परमेश्वर के देहधारी होने के कारण है कि मनुष्य के पास अपने कर्तव्य को पूरा करने का एक अवसर है, और वास्तविक परमेश्वर की आराधना करने का एक अवसर है। क्या यह सर्वाधिक वास्तविक और व्यवहारिक सत्य नहीं है? अब, क्या तुम अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करते हो? केवल जब परमेश्वर अपने आप को एक निश्चित स्थिति तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह धारण कर लेता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर पवित्रात्मा का हैः मनुष्य कैसे इस पवित्रात्मा का अंतरंग होने के योग्य हो सकता है, जो कि बहुत ही उच्च और अथाह है? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला प्राणी बनता है, तभी मनुष्य उसकी इच्छा को समझ सकता है और वास्तव में उसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मनुष्य की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, इसी संसार में मनुष्य के जैसे रहता है, मनुष्य की रक्षा करता है, उसका मार्गदर्शन करता है, और इसके माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करता है, और अपने द्वारा मनुष्य को उद्धार और अपने आशीषों को प्राप्त करने की अनुमति देता है। इन चीज़ों को प्राप्त करने के बाद, मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में समझता है, और केवल तभी वह परमेश्वर का अंतरंग बन सकता है। केवल यही व्यवहारिक है। यदि परमेश्वर मनुष्य के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो मनुष्य उसका कैसे अंतरंग हो सकता था? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 137

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह दिव्यता के भीतर केवल अपना कार्य करता है। यही कार्य स्वर्गिक पवित्रात्मा ने देहधारी परमेश्वर को सौंपा है। जब वह आता है, तो वह हर जगह केवल बातें करने के लिए, अपने कथनों को भिन्न-भिन्न तरीकों से और भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से कहने के लिए जाता है। वह अपने लक्ष्यों और कार्य करने के सिद्धांत के रूप में मुख्यतः मनुष्य को आपूर्ति करने और सिखाने को लेता है और वह स्वयं किसी के पारस्परिक संबंधों या लोगों के जीवन के विवरण जैसी बातों के विषय में चिंता नहीं करता है। पवित्रात्मा के लिए बोलना उसकी मुख्य सेवकाई है। जब परमेश्वर का आत्मा मूर्त रूप से देह में प्रकट होता है, तो वह केवल मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और सत्य को प्रकाशित करता है। वह मनुष्य के कार्य में शामिल नहीं होता है, जिसका अर्थ है कि वह मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है। मनुष्य दिव्य कार्य नहीं कर सकता है, और परमेश्वर मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है। परमेश्वर के अपना कार्य करने के लिए धरती पर आने के बाद के सभी वर्षों में, उसने हमेशा लोगों के माध्यम से कार्य किया है। परन्तु इन लोगों को देहधारी परमेश्वर नहीं माना जा सकता है; उन्हें केवल परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोग माना जा सकता है। परन्तु आज का परमेश्वर, आत्मा की आवाज़ को आगे बढ़ाते हुए और पवित्रात्मा की ओर से कार्य करते हुए, दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से सीधे बात कर सकता है। विभिन्न युगों में परमेश्वर ने जिन सभी लोगों का उपयोग किया है, वे परमेश्वर के आत्मा के एक दैहिक शरीर में कार्य करने के ऐसे ही उदाहरण हैं, तो वे परमेश्वर क्यों नहीं कहे जा सकते हैं? बल्कि आज का परमेश्वर भी परमेश्वर का आत्मा है जो सीधा देह में कार्य कर रहा है, और यीशु भी परमेश्वर का आत्मा था जो कि देह में कार्य कर रहा था; ये दोनों परमेश्वर कहलाते हैं। तो फिर फ़र्क क्या है? विभिन्न युगों में, वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने उपयोग किया है, सामान्य तरीके से सोचने और तर्क करने में सक्षम हैं। वे सभी मानव आचरण के सिद्धांतों को जानते हैं। उनके पास सामान्य मानव विचार हैं और वे उन सभी चीज़ों से सुसज्जित हैं जो साधारण लोगों के पास होनी चाहिए। उनमें से अधिकतर लोगों के पास असाधारण प्रतिभा और सहज ज्ञान है। उन लोगों पर कार्य करने में, परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं का उपयोग करता है, जो कि उनमें परमेश्वर द्वारा दी गई प्रतिभाएँ हैं। परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर की सेवा में उनकी शक्तियों का उपयोग करके उनकी प्रतिभाओं से काम लेता है। हालाँकि, परमेश्वर का सार विचार-मुक्त और सोच-मुक्त है, उसमें मनुष्य के इरादों की मिलावट नहीं है और यहाँ तक कि उसमें उन बातों का भी अभाव है जो सामान्य मनुष्य में होते हैं। कहने का अर्थ है कि परमेश्वर मानव आचरण के सिद्धांतों का भी जानकार नहीं है। जब आज का परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब ऐसा ही होता है। उसका कार्य और उसके वचन मनुष्य के इरादों या मनुष्य के विचार की मिलावट से रहित होते हैं, किन्तु वे पवित्रात्मा के इरादों की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं, और वह सीधे परमेश्वर की ओर से कार्य करता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य के इरादों के जरा-सा भी मिश्रण के बगैर पवित्रात्मा सीधे बोलता है, अर्थात दिव्यता सीधे कार्य करती है। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर सीधे दिव्यता का मूर्त रूप है, वह मनुष्य की सोच या विचार से रहित है, और मानव आचरण के सिद्धांतों की कोई समझ नहीं रखता है। यदि केवल दिव्यता कार्य कर रही होती (अर्थात् यदि केवल परमेश्वर स्वयं कार्य कर रहा होता), तो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य किए जाने का कोई तरीका नहीं होता। इसलिए जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, उसे थोड़ी सी संख्या में लोग रखने ही पड़ते हैं, जिन्हें वह उस कार्य के साथ मानवता में कार्य करने के लिए उपयोग करता है जिसे परमेश्वर दिव्यता में करता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने दिव्य कार्य का समर्थन करने के लिए मनुष्य के कार्य का उपयोग करता है। अन्यथा, दिव्य कार्य के सीधे संपर्क में आने के लिए मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं होगा। यीशु और उसके अनुयायियों के साथ ऐसा ही था। दुनिया में अपने समय के दौरान यीशु ने पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया था और नयी आज्ञाओं की व्यवस्था की थी। उसने बहुत से वचन भी कहे थे। यह सब कार्य दिव्यता में किया गया था। पतरस, पौलुस और युहन्ना जैसे अन्य सभी लोगों ने अपने बाद के कार्य को यीशु के वचनों की बुनियाद पर पूरा किया। अर्थात्, उस युग में परमेश्वर अपना कार्य आरंभ कर रहा था, अनुग्रह के युग के आरंभ का सूत्रपात कर रहा था; अर्थात्, पुराने युग को समाप्त करके, और "परमेश्वर ही आरम्भ और अंत है" वचनों को पूरा करके, वह एक नए युग को लाया। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को दिव्य कार्य की बुनियाद पर मानवीय कार्य करना चाहिए। यीशु ने जब वह सब कुछ कह दिया जो उसे कहने की आवश्यकता थी और पृथ्वी पर अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह मनुष्यों के बीच से प्रस्थान कर गया। इसके बाद, सभी लोगों ने कार्य करने में, उसके वचनों में व्यक्त सिद्धांतों के अनुसार वैसा ही किया, और उसके द्वारा बोले गए सत्य के अनुसार अभ्यास किया। ये सभी यीशु के लिए कार्य करने वाले लोग थे। यदि यीशु अकेले ही कार्य कर रहा होता, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने कितने वचन बोले थे, तब भी लोग उसके वचनों के संपर्क में आने में समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह दिव्यता में कार्य कर रहा था और केवल दिव्यता के वचन ही बोल सकता था। वह चीज़ों को उस स्तर तक नहीं समझा सकता था जहाँ साधारण लोग उसके वचनों को समझ सकते थे। इसलिए उसे प्रेरित और नबी रखने पड़े जो उसके बाद में उसके कार्य को पूरा करने के लिए आए। यही वह सिद्धांत है कि जिससे देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करता है—वह वचन बोलने और कार्य करने के लिए देहधारी शरीर का उपयोग करता है ताकि दिव्यता के कार्य को पूरा कर सके, और फिर अपने कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर की अपनी पसंद के कुछ या अधिक लोगों का उपयोग करता है। अर्थात्, मानवता में चरवाही करने और सींचने का कार्य करने के लिए परमेश्वर अपने समान विचार वाले लोगों का उपयोग करता है ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें।

यदि देह में आकर, परमेश्वर अपने साथ परमेश्वर के समान विचार वाले कुछ अतिरिक्त लोगों को लिए बिना केवल दिव्यता का कार्य करता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर की इच्छा को समझने या परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई तरीका नहीं होता। अपने कार्य को पूरा करने, कलीसियाओं की देख-रेख करने और उनकी चरवाही करने, उस स्तर तक पहुँचने के लिए जहाँ मनुष्य की संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ, उसका मस्तिष्क विनती करने में सक्षम है, परमेश्वर को अपने समान विचार वाले सामान्य लोगों का उपयोग अवश्य करना होगा। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर उस कार्य की "व्याख्या" करने के लिए, जिसे वह अपनी दिव्यता में करता है, अपने समान विचार वाले लोगों की थोड़ी सी संख्या का उपयोग करता है, ताकि इसे प्रकट किया जा सके, अर्थात्, दिव्य भाषा को मानव भाषा में परिवर्तित किया जा सके, इसे ऐसा बनाया जा सके ताकि सभी लोग इसे समझ-बूझ सकें। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो कोई भी परमेश्वर की दिव्य भाषा को नहीं समझ पाता, क्योंकि परमेश्वर के समान विचार वाले लोगों की संख्या अंततः थोड़ी सी ही है, और मनुष्य की समझने की क्षमता कमज़ोर है। यही कारण है कि परमेश्वर केवल देहधारी शरीर में कार्य करते समय इस तरीके को चुनता है। यदि केवल दिव्य कार्य ही होता, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर को जानने और उसके संपर्क में आने का कोई तरीका नहीं होता, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की भाषा को नहीं समझता है। मनुष्य इस भाषा को केवल उन्हीं लोगों की एजेंसी के माध्यम से समझ सकने में समर्थ है जिनके विचार परमेश्वर के समान हैं और जो उसके वचनों को स्पष्ट करते हैं। हालाँकि, यदि मानवजाति के भीतर कार्य करने वाले केवल ऐसे ही लोग होते, तो वह केवल मनुष्य के सामान्य जीवन को ही बनाए रख सकता था, यह मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित नहीं कर सकता था। तब परमेश्वर का कार्य एक नया शुरुआती बिन्दु नहीं होता; वहाँ केवल वही पुराने गीत होते, वही पुरानी मामूली बातें होती। केवल देहधारी परमेश्वर की एजेंसी के माध्यम से ही, जो अपने देहधारण की अवधि के दौरान वह सब कुछ कहता है जो कहे जाने की आवश्यकता है और वह सब कुछ करता है जो किए जाने की आवश्यकता है, जिसके बाद लोग उसके वचनों के अनुसार कार्य करते हैं और अनुभव करते हैं, केवल इस प्रकार से ही उनका जीवन स्वभाव बदलने में समर्थ होता है और वे समय के साथ चलने में समर्थ हो जाएँगे। जो कोई दिव्यता में कार्य करता है वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि जो मानवता के भीतर कार्य करते हैं वे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए लोग हैं। अर्थात्, देहधारी परमेश्वर उन लोगों से मौलिक रूप से भिन्न है जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं। देहधारी परमेश्वर दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, जबकि परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग समर्थ नहीं हैं। प्रत्येक युग के आरंभ में, नया युग शुरू करने के लिए और मनुष्य को एक नई शुरुआत में लाने के लिए परमेश्वर का आत्मा व्यक्तिगत रूप से बोलता है। जब वह वचन बोलना पूरा कर लेता है, तो यह प्रकट करता है कि परमेश्वर की दिव्यता के भीतर उसका कार्य पूरा हो गया है। उसके बाद, सभी लोग अपने जीवन अनुभव में प्रवेश करने के लिए उन लोगों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। उसी तरीके से, यही वह चरण भी है जिसमें परमेश्वर मनुष्य को नए युग में लाता है और हर किसी को एक आरंभिक स्थिति देता है। इसके साथ ही, देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 138

परमेश्वर पृथ्वी पर अपनी सामान्य मानवता को पूर्ण करने के लिए नहीं आता है। वह सामान्य मानवता का कार्य करने के लिए नहीं आता है, बल्कि सामान्य मानवता में केवल दिव्यता का कार्य करने के लिए आता है। परमेश्वर जिस सामान्य मानवता के बारे में बात करता है, यह वह मानवता नहीं है जिसकी मनुष्य कल्पना करता है। मनुष्य "सामान्य मानवता" को जिस रूप में परिभाषित करता है उसमें एक पत्नी, या एक पति, बेटे और बेटियों का होना ज़रूरी है। ये इस बात के साक्ष्य हैं कि कोई व्यक्ति एक सामान्य व्यक्ति है। परन्तु परमेश्वर इसे इस तरह से नहीं देखता है। वह सामान्य मानवता को सामान्य मानव विचारों और सामान्य मानव जीवन वाली और सामान्य लोगों से जन्म लेने वाली मानवता के रूप में देखता है। किन्तु उसकी सामान्यता में उस तरह से एक पत्नी, या एक पति और बच्चे शामिल नहीं होते हैं, जैसे कि मनुष्य सामान्यता को समझता है। अर्थात्, मनुष्य के लिए, सामान्य मानवता जिसके बारे में परमेश्वर बोलता है, वह है जिसे मनुष्य मानवता की अनुपस्थिति मानेगा, भावनाओं का लगभग अभाव और प्रकट रूप से दैहिक आवश्यकताओँ से विहीन, ठीक यीशु की तरह, जिसका केवल बाह्य स्वरूप एक सामान्य व्यक्ति का था और जिसने एक सामान्य व्यक्ति का रूप-रंग धारण कर लिया था, किन्तु सार रूप में उसके पास वह सब नहीं था जो एक सामान्य व्यक्ति के पास होना चाहिए। इससे यह देखा जा सकता है कि देहधारी परमेश्वर का सार सामान्य मानवता की सम्पूर्णता को नहीं, बल्कि सामान्य मानव जीवन के नित्य-कर्मों में सहयोग देने और तर्क करने की सामान्य मानव सामर्थ्य को बनाए रखने के लिए, उन चीजों के केवल एक भाग को ही समाहित करता है जो लोगों में मौजूद होना चाहिए। परन्तु इन चीजों का उस बात से कोई लेना-देना नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य मानवता समझता है। ये वही चीजें हैं जो देहधारी परमेश्वर को धारण करनी चाहिए। हालाँकि, ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि देहधारी परमेश्वर को सामान्य मानवता धारण करने वाला केवल तभी कहा जा सकता है जब उसके पास एक पत्नी, बेटे-बेटियाँ, और एक परिवार हो। उनका कहना है कि इन चीजों के बिना वह एक सामान्य व्यक्ति नहीं है। तब मैं तुम से पूछता हूँ, कि "क्या परमेश्वर की कोई पत्नी है? क्या यह संभव है कि परमेश्वर का एक पति हो? क्या परमेश्वर के बच्चे हो सकते हैं?" क्या ये भ्रांतियाँ नहीं हैं? हालाँकि, देहधारी परमेश्वर चट्टानों के बीच की दरार से निकल कर नहीं आ सकता है, या आसमान से नीचे नहीं गिर सकता है। वह केवल एक सामान्य मानव परिवार में ही जन्म ले सकता है। यही कारण है कि उसके माता-पिता और बहनें हैं। यही वे चीज़ें हैं जो एक देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के पास होनी चाहिए। यीशु के साथ ऐसा ही मामला था। यीशु के पिता और माता, बहनें और भाई थे। यह सब सामान्य था। किन्तु यदि उसकी कोई पत्नी और बेटे-बेटियाँ होतीं तो उसकी वह सामान्य मानवता नहीं होती जो परमेश्वर चाहता था कि एक देहधारी परमेश्वर के पास हो। यदि ऐसा मामला होता, तो वह दिव्यता की ओर से कार्य करने में समर्थ नहीं होता। यह निश्चित रूप से इसलिए था क्योंकि उसकी कोई पत्नी या बच्चे नहीं थे, और फिर भी उसका जन्म एक सामान्य परिवार में, सामान्य लोगों के द्वारा हुआ था, और वह दिव्यता के कार्य को पूरा करने में समर्थ था। इसे और स्पष्ट करने के लिए, परमेश्वर जिसे एक सामान्य व्यक्ति समझता है, वह एक सामान्य परिवार में जन्मा हुआ व्यक्ति है। केवल इस तरह का व्यक्ति ही दिव्यता के कार्य को करने के योग्य है। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति के पत्नी, बच्चे, या पति हैं तो वह दिव्यता के कार्य को करने में समर्थ नहीं होगा, क्योंकि उसके पास केवल सामान्य मानवता होगी जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, किन्तु वह सामान्य मानवता नहीं होगी जिसकी परमेश्वर को आवश्यकता है। जो परमेश्वर विचार करता है कि होना चाहिए और जो लोग समझते हैं, उसमें प्रायः बहुत अधिक भिन्नता होती है, मीलों का अंतर होता है। परमेश्वर के कार्य के इस चरण में ऐसा बहुत कुछ है जो लोगों की अवधारणाओं के विपरीत चलता है और उससे बहुत भिन्न होता है। कोई कह सकता है कि परमेश्वर के कार्य के इस चरण में मानवता द्वारा एक सहायक भूमिका निभाए जाने के साथ, पूर्ण रूप से दिव्यता के व्यावहारिक और क्रियाशील कार्य शामिल हैं। क्योंकि परमेश्वर पृथ्वी पर अपने कार्य में मनुष्य को हाथ लगाने की अनुमति देने के बजाय अपना कार्य स्वयं करने के लिए आता है, यही कारण है कि वह अपना कार्य करने के लिए स्वयं देहधारण (एक अपूर्ण, सामान्य व्यक्ति में) करता है। वह मानवजाति को एक नया युग देने, मानवजाति को अपने कार्य के अगले कदम के बारे में बताने और उसके वचनों में बताए गए मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की बात कहने के लिए इस देहधारण का उपयोग करता है। इसके साथ ही, परमेश्वर देह के अपने कार्य को समाप्त करता है, और वह सामान्य मानवता की देह में अब और न रहते हुए, बल्कि इसके बजाय अपने कार्य के दूसरे भाग में आगे बढ़ने के लिए मानव जाति से दूर जाने वाला है। फिर अपने समान विचार वाले मनुष्यों का उपयोग करके, वह लोगों के इस समूह के बीच, किन्तु उनकी मानवता में, अपने कार्य को पृथ्वी पर जारी रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 139

देहधारी परमेश्वर हमेशा के लिए मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है, क्योंकि परमेश्वर के पास करने के लिए और बहुत से कार्य हैं। उसे देह में बाँधा नहीं जा सकता है; उसे जो कार्य करने की आवश्यकता है, वह करने के लिए उसे देह छोड़नी है, यद्यपि वह देह की छवि में ही उस कार्य को करता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह उस स्वरूप तक पहुँचने की प्रतीक्षा नहीं करता है जो एक सामान्य व्यक्ति को मरने या मानवजाति को छोड़ कर जाने से पहले प्राप्त करना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसकी देह कितने वर्ष की है, जब उसका कार्य ख़त्म हो जाता है, तो वह चला जाता है और मनुष्य को छोड़ देता है। उसके लिए उम्र जैसी कोई चीज़ नहीं है। वह मानव जीवन काल के अनुसार अपने दिन नहीं गिनता है; इसके बजाय, अपने कार्य के चरण के अनुसार वह देह का अपना जीवन समाप्त करता है। कुछ लोग यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर को देह में आने पर एक निश्चित अवस्था तक अवश्य पहुंचना चाहिए, वयस्क होना चाहिए, वृद्धावस्था तक पहुँचना चाहिए, और केवल तभी छोड़ कर जाना चाहिए जब उसका शरीर कार्य करना बंद कर दे। यह मनुष्य की कल्पना है; परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता है। वह देह में केवल उसी कार्य को करने के लिए आता है जो उसके द्वारा किया जाना अपेक्षित है, न कि माता-पिता से जन्मे हुए एक सामान्य मनुष्य की तरह जीवन जीने, बड़े होने, परिवार बनाने और जीविका आरंभ करने, बच्चे होने, या जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव करने के लिए—जो एक सामान्य मनुष्य की गतिविधियां हैं। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो परमेश्वर का आत्मा देह को धारण करता है, देह में आता है, किन्तु परमेश्वर एक सामान्य मानव जीवन नहीं जीता है। वह केवल अपनी प्रबंधन योजना के एक भाग को पूरा करने के लिए आता है। उसके बाद वह मानवजाति को छोड़ देगा। जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तो वह देह की सामान्य मानवता को पूर्ण नहीं करता है। बल्कि, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारित समय पर, दिव्यता सीधे कार्य करने के लिए आगे बढ़ती है। तब, वह सब करने जो उसे करने की आवश्यकता है और अपनी सेवकाई को पूरी तरह से पूर्ण करने के बाद, परमेश्वर के आत्मा का इस चरण का कार्य समाप्त हो जाता है, उस समय इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसकी देह ने अपनी आयु की अवधि जी ली है या नहीं, देहधारी परमेश्वर का जीवन भी ख़त्म हो जाता है। कहने का अर्थ है कि दैहिक शरीर जीवन की जिस किसी भी अवस्था तक पहुँचता है, यह पृथ्वी पर जितने समय तक रहता है, सब कुछ पवित्रात्मा के कार्य द्वारा निश्चित किया जाता है। इसका उस बात से कोई संबंध नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य मानवता समझता है। आओ, हम यीशु को एक उदाहरण के रूप में लेते हैं। वह देह में साढ़े तैंतीस साल तक रहा। मनुष्य के शरीर की जीवन अवधि के अनुसार, उसे उस उम्र में नहीं मरना चाहिए था और उसे छोड़ कर नहीं जाना चाहिए था। किन्तु परमेश्वर के आत्मा के लिए यह जरा सी भी चिंता का विषय नहीं था। उसका कार्य ख़त्म हो जाने पर पवित्रात्मा के साथ-साथ ओझल होते हुए, शरीर को अलग कर दिया गया था। यही वह सिद्धांत है जिससे परमेश्वर देह में कार्य करता है। इसलिए, यदि ईमानदारी से कहा जाए, तो देहधारी परमेश्वर की मानवता प्राथमिक महत्व की नहीं है। एक बार फिर से कहें तो, वह पृथ्वी पर सामान्य मानव जीवन जीने के लिए नहीं आता है। वह ऐसा नहीं करता है कि पहले एक सामान्य मानव जीवन को स्थापित करे, फिर कार्य करना शुरू करे। बल्कि, जब तक वह एक सामान्य मानव परिवार में जन्म लेता है, वह दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, कार्य जो कि मनुष्य के इरादे से कलंकित नहीं है; जो दैहिक नहीं है, और जो निश्चित रूप से समाज के तौर-तरीकों को नहीं अपनाता है या जिसमें मनुष्य के विचार व धारणाएँ शामिल नहीं होते, और इसके अलावा, उसमें जीने के लिए मनुष्य के जीवन दर्शन शामिन नहीं होते हैं। यही वह कार्य है जो देहधारी परमेश्वर करना चाहता है और यही उसके देहधारण का व्यावहारिक महत्व है। परमेश्वर देह में, अन्य मामूली प्रक्रियाओं से गुज़रे बिना, मुख्य रूप से अपने कार्य के उस एक चरण को करने के लिए आता है जिसे देह में करने की आवश्यकता है, और जहाँ तक सामान्य मनुष्य के अनुभवों की बात है, वे उसे नहीं होते हैं। वह कार्य जो देहधारी परमेश्वर की देह को करने की आवश्यकता है, उसमें सामान्य मनुष्य के अनुभव शामिल नहीं होते हैं। इसलिए, परमेश्वर देह में उस कार्य को पूरा करने के वास्ते आता है जो उसे देह में रहकर पूरा करने की आवश्यकता है। बाकी किसी और बात से उसका कोई संबंध नहीं है। वह ऐसी बहुत सी मामूली प्रक्रियाओं से नहीं गुज़रता है। एक बार जब उसका कार्य पूरा हो जाता है, तो उसके देहधारण का महत्व भी समाप्त हो जाता है। इस चरण को समाप्त करने का अर्थ है कि उसे जिस कार्य को देह में करने की आवश्यकता है, वह समाप्त हो गया है, और उसकी देह की सेवकाई पूरी हो गई है। किन्तु वह अनिश्चित काल तक देह में कार्य नहीं करता रह सकता है। उसे कार्य करने के लिए किसी अन्य जगह, देह के बाहर किसी जगह पर आगे बढ़ना है। केवल इस तरह से ही उसका कार्य पूरी तरह से पूर्ण हो सकता है और बेहतर ढंग से विस्तार कर सकता है। परमेश्वर अपनी मूल योजना के अनुसार कार्य करता है। उसे कौन सा कार्य करने की आवश्यकता है और वह कौन सा कार्य पूरा कर चुका है, इस बारे में वह इतनी स्पष्टता से जानता है जितना वह अपने हाथ की हथेली को जानता है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति की उस रास्ते पर चलने में अगुवाई करता है जो उसने पहले से ही पूर्व-निर्धारित कर दिया है। इससे कोई भी बच कर नहीं निकल सकता है। जो लोग परमेश्वर के आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ होंगे। ऐसा हो सकता है कि बाद के कार्य में, मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए परमेश्वर देह में नहीं बोल रहा होगा, बल्कि एक मूर्त रूप वाला पवित्रात्मा मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर रहा होगा। केवल तभी मनुष्य परमेश्वर को वस्तुतः स्पर्श करने, परमेश्वर को देखने, और पूरी तरह से उस वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ होगा जिसकी परमेश्वर को आवश्यकता है, ताकि उसे व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया जाए। यही वह कार्य है जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, जिसकी उसने लंबे समय से योजना बनाई हुई है। इससे, तुम सभी लोगों को उस मार्ग को देखना चाहिए जिस पर तुम लोगों को चलना है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 140

देहधारी परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर के सार को धारण किए है, और अपने कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और बुद्धि को धारण करता है, और ये चीजें मनुष्य के लिये अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, फिर भी परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे सभी धोखेबाज़ हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर अपना कार्य पूरा करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से वहन कर सकता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकता है। देर-सवेर, मसीह का भेष धारण करने वालों का पतन होगा, क्योंकि वे भले ही मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें किंचितमात्र भी मसीह का सार नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य के द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती है, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा इसका उत्तर दिया और निर्णय लिया जा सकता है। इस प्रकार, यदि तुम वास्तव में जीवन का मार्ग खोजने के इच्छुक हो, तो पहले तुम्हें यह मानना होगा कि पृथ्वी पर आगमन करने के द्वारा ही वह मनुष्यों को जीवन प्रदान करता है, और अंत के दिनों में वह पृथ्वी पर मनुष्यों को जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए आता है। यह अतीत नहीं है; यह आज हो रहा है।

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनंत मार्ग प्रदान करता है। ये सत्य वो मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एकमात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, शाब्दिक अर्थों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन जल की अपेक्षा, उनके पास मैला पानी है जिससे हज़ारों सालों से लोग चिपके हुए हैं। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल शांत ठहर कर चीज़ों को वैसा ही बनाए रखने की कोशिश में लगे रहोगे जैसी वे हैं, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला कैसे माना जा सकता है? और तुम जिस परमेश्वर को थामे हो उसे उस परमेश्वर के रूप में न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को ढूँढ़ने में तुम्हारी अगुवाई कैसे कर सकते हैं? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम हैं। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिह्वा को सम्पन्न बना सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करने में मदद कर सकते हैं, ये वो मार्ग तो बिल्कुल ही नहीं हैं जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हें विचार-मंथन का कारण नहीं देती? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के लिए खुद ही योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है, उसकी ओर देखो जो अब अंत के दिनों में मनुष्यों को बचाने का कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, न कभी जीवन प्राप्त कर सकते हो।

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद लोग हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा घृणित समझे जाएंगे। अंत के दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का प्रवेशद्वार है, उससे होकर गए बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना ही चाहिए और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन के प्रावधान को स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम अनंत समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे। क्योंकि यह मसीह ही स्वयं पवित्र आत्मा और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना कार्य सौंपा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अंत के दिनों के मसीह के द्वारा जो भी कार्य किया गया है यदि उसे तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। जो प्रतिकार पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को सहना होगा वह सभी के लिए स्वत:-स्पष्ट है। मैं यह भी कहता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों के मसीह का विरोध करोगे और उसे ठुकराओगे, तो ऐसा कोई भी नहीं है जो तुम्हारे लिए इसका नतीजा भुगत लेगा। इसके अलावा, आज के बाद से फिर कभी तुम्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम खुद की गलती पर प्रायश्चित करने की कोशिश भी करते हो, तो भी तुम कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। क्योंकि तुम जिसका विरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, जिसको ठुकरा रहे हो वह क्षुद्र प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम इसके परिणामों के बारे में जानते हो? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं बल्कि एक बहुत ही जघन्य अपराध किया होगा। इसलिए मैं प्रत्येक को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने ज़हरीले दाँत मत दिखाओ, या लापरवाही से आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुमको जीवन दिला सकता है और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें नया जन्म पाने या फिर से परमेश्वर का चेहरा देखने की अनुमति नहीं दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

पिछला: III. अंत के दिनों में न्याय

अगला: V. परमेश्वर के कार्य को जानना

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

अध्याय 17

मेरी आवाज़ चारों दिशाओं एवं सम्पूर्ण पृथ्वी को रोशन करते हुए, गर्जना के समान निकलती है, और गर्जना और चमकती हुई बिजली के बीच, मानवजाति मार...

देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम...

वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं

सभी मनुष्य यीशु के सच्चे रूप को देखने और उसके साथ रहने की इच्छा करते हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि भाइयों या बहनों में से एक भी ऐसा नहीं है...

तीन चेतावनियाँ

परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम लोगों को सभी बातों में परमेश्वर के अलावा और किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और सभी बातों में उसकी...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-सूची

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें