IV. देहधारण

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 99

"देहधारण" परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, परमेश्वर को देहधारी होने के लिए, सबसे पहले देह बनना होता है, सामान्य मानवता वाला देह; यह सबसे मौलिक आवश्यकता है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रह कर कार्य करता है, परमेश्वर अपने वास्तविक सार में देहधारी बन जाता है, वह मनुष्य बन जाता है। उसके देहधारी जीवन और कार्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वह जीवन है जो वह सेवकाई प्रारम्भ करने से पहले जीता है। वह एकदम सामान्य मानवता में रहता है, सामान्य मानवीय परिवार में रहकर, जीवन की सामान्य नैतिकताओं और व्यवस्थाओं का पालन करता है, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं, (भोजन, कपड़ा, आवास, निद्रा), उसमें सामान्य मानवीय कमज़ोरियाँ और सामान्य मानवीय भावनाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, इस पहले चरण में वह सभी मानवीय क्रियाकलापों में शामिल होते हुए, बिना दिव्यता के, पूरी तरह से सामान्य मानवता में रहता है। दूसरा चरण वह जीवन है जो वह अपनी सेवकाई को आरंभ करने के बाद जीता है। वह इस अवधि में भी, सामान्य मानव-आवरण के साथ, सामान्य मानवता में रहता है, और किसी तरह की अलौकिकता का कोई संकेत नहीं देता। फिर भी वह पूरी तरह से अपनी सेवकाई के लिए ही जीता है, और इस दौरान उसकी सामान्य मानवता पूरी तरह से उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को करने में लगी रहती है, क्योंकि तब तक उसकी सामान्य मानवता उसकी सेवकाई के कार्य को करने में सक्षम होने की स्थिति तक परिपक्व हो चुकी होती है। तो उसके जीवन का दूसरा चरण सामान्य मानवता में अपनी सेवकाई को करना है, जब यह सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। अपने जीवन के प्रथम चरण में वह पूरी तरह से साधारण मानवता का जीवन क्यों जीता है, उसका कारण यह है कि उसकी मानवता अभी तक दिव्य कार्य की समग्रता को संभालने लायक नहीं हो पायी है, अभी तक वह परिपक्व नहीं हुई है; जब उसकी मानवता परिपक्व हो जाती है, उसकी सेवकाई को सहारा प्रदान करने के योग्य बन जाती है, तभी वह जो सेवकाई उसे करनी चाहिए, उसकी शुरूआत कर सकता है। चूँकि उसे देह के रूप में विकसित होकर परिपक्व होने की आवश्यकता होती है, इसलिए उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन होता है, जबकि दूसरे चरण में, क्योंकि उसकी मानवता उसके कार्य का दायित्व लेने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम होती है, अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। यदि अपने जन्म के समय से ही देहधारी परमेश्वर, अलौकिक संकेतों और चमत्कारों को दिखाते हुए, गंभीरता से अपनी सेवकाई आरंभ कर देता, तो उसमें कोई भी दैहिक सार नहीं होता। इसलिए, उसकी मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में है; मानवता के बिना कोई देह नहीं हो सकता, और मानवता के बिना कोई व्यक्ति मानव नहीं होता। इस तरह, परमेश्वर के देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण की अंतर्भूत सम्पत्ति है। ऐसा कहना कि "जब परमेश्वर देहधारण करता है तो वह पूरी तरह से दिव्य होता है, मानव बिल्कुल नहीं होता," ईशनिंदा है, क्योंकि इस वक्तव्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है, और यह देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपनी सेवकाई आरंभ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह बाह्य मानवीय आवरण के साथ ही अपनी दिव्यता में रहता है; बात सिर्फ़ इतनी ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एकमात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य की अभिकर्ता उसकी मानवता में रहने वाली दिव्यता है। कार्य उसकी दिव्यता करती है, न कि उसकी मानवता, मगर यह दिव्यता उसकी मानवता में छिपी रहती है; सार रूप में, उसका कार्य उसकी संपूर्ण दिव्यता द्वारा ही किया जाता है, न कि उसकी मानवता द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाला उसका देह है। कह सकते हैं कि वह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, क्योंकि परमेश्वर, मानवीय आवरण और मानवीय सार के साथ, देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है, लेकिन उसमें परमेश्वर का सार भी होता है। चूँकि वह परमेश्वर के सार वाला मनुष्य है इसलिए वह सभी सृजित मानवों से ऊपर है, ऐसे किसी भी मनुष्य से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। तो, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी लोगों में, सभी मानवता धारियों में, एकमात्र वही देहधारी स्वयं परमेश्वर है—अन्य सभी सृजित मानव हैं। यद्यपि उन सभी में मानवता है, किन्तु सृजित मानव में केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न है : उसके देह में न केवल मानवता है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसमें दिव्यता भी है। उसकी मानवता उसके देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को देख पाना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं होती जैसी लोग कल्पना करते हैं, इसलिए लोगों के लिए इसे देख पाना बहुत कठिन होता है। आज भी, लोगों के लिए देहधारी परमेश्वर के सच्चे सार की थाह पाना बहुत कठिन है। इसके बारे में इतने विस्तार से बताने के बाद भी, मुझे लगता है कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, इसलिए उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन स्वयं परमेश्वर, पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर कहलाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 100

पृथ्वी पर यीशु ने जो जीवन जिया वह देह में एक सामान्य जीवन था। उसने अपने देह का सामान्य जीवन जिया। अपना कार्य करना, वचन बोलना, या बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना, ऐसे असाधारण कार्य करने के उसके अधिकार ने स्वयं को तब तक प्रकट नहीं किया जब तक कि उसने अपनी सेवकाई आरंभ नहीं की। उनतीस वर्ष की उम्र से पहले, अपनी सेवकाई आरंभ करने से पहले उसका जीवन, इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वह बस एक सामान्य देह था। इस कारण से और क्योंकि उसने अभी तक अपनी सेवकाई आरंभ नहीं की थी, लोगों को उसमें कुछ भी दिव्य नहीं दिखाई दिया, एक सामान्य मानव, एक सामान्य मनुष्य से अधिक कुछ नहीं दिखाई दिया—ठीक जैसे कि उस समय कुछ लोग उसे यूसुफ का पुत्र ही मानते थे। लोगों को लगता था कि वह एक सामान्य मनुष्य का पुत्र है, उनके पास यह बताने का कोई तरीका नहीं था कि वह देहधारी परमेश्वर का देह है; यहाँ तक कि जब, अपनी सेवकाई करने के दौरान, उसने कई चमत्कार किए, तब भी अधिकांश लोगों ने यही कहा कि वह यूसुफ का पुत्र है, क्योंकि वह सामान्य मानवता के बाह्य आवरण वाला मसीह था। उसकी सामान्य मानवता और कार्य दोनों पहले देहधारण की महत्ता को पूर्ण करने के लिए थे, यह सिद्ध करने के लिए थे कि परमेश्वर पूरी तरह से देह में आकर एक अत्यंत साधारण मनुष्य बन गया है। अपना कार्य शुरु करने के पहले की उसकी सामान्य मानवता इस बात का प्रमाण थी कि वह एक साधारण देह था; और बाद में उसके कार्य करने ने भी यह प्रमाणित कर दिया कि वह एक साधारण देह था, क्योंकि उसने सामान्य मानवता द्वारा संकेत और चमत्कार किए, बीमार को चंगा किया और दुष्टात्माओं को देह से बाहर निकाला। वह इसलिए चमत्कार कर सका क्योंकि उसका देह परमेश्वर के अधिकार के युक्त था, परमेश्वर के आत्मा ने उसके देह को धारण किया था। उसके पास यह अधिकार परमेश्वर के आत्मा के कारण था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वह देह नहीं था। उसे अपनी सेवकाई में बीमार को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने का कार्य करना था, यह उसकी मानवता में छिपी दिव्यता की अभिव्यक्ति थी, भले ही उसने कोई भी संकेत दिखाए हों या अपने अधिकार को कैसे भी प्रदर्शित किया हो, लेकिन तब भी वह सामान्य मानवता में रहने वाला सामान्य देह ही था। सलीब पर जान देने से लेकर पुनर्जीवित होने तक, वह सामान्य देह में ही रहा। अनुग्रह प्रदान करना, बीमार को चंगा करना, और दुष्टात्माओं को निकालना, ये सब उसकी सेवकाई का हिस्सा थे, ये सारे कार्य उसके सामान्य देह में किए गए थे। चाहे वह कोई भी कार्य कर रहा हो, लेकिन क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले, वह कभी भी अपने सामान्य मानव देह से अलग नहीं हुआ। वह स्वयं परमेश्वर था, परमेश्वर का अपना कार्य कर रहा था, लेकिन चूँकि वह देहधारी परमेश्वर था, इसलिए वह खाना भी खाता था, कपड़े भी पहनता था, उसकी आवश्यकताएँ सामान्य इंसानों जैसी थीं, उसमें सामान्य मानवीय तर्क-शक्ति और सामान्य मानवीय मन था। यह सब इस बात का प्रमाण है कि वह एक सामान्य मनुष्य था, इससे सिद्ध होता है कि देहधारी परमेश्वर का देह सामान्य मानवता से युक्त देह था, न कि कोई अलौकिक देह। उसका कार्य परमेश्वर के पहले देहधारण के कार्य को पूरा करना था, उस सेवकाई को पूरा करना था जो पहले देहधारण को पूरी करनी चाहिए। देहधारण की महत्ता यह है कि एक साधारण, सामान्य मनुष्य स्वयं परमेश्वर का कार्य करता है; अर्थात्, परमेश्वर मानव देह में अपना दिव्य कार्य करके शैतान को परास्त करता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; देह के द्वारा किया जाने वाला कार्य पवित्रात्मा का कार्य है, जो देह में साकार होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर के देह को छोड़कर अन्य कोई भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूरा नहीं कर सकता; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानवता—अन्य कोई नहीं—दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। यदि, परमेश्वर के पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले उसमें सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जन्म लेते ही वह चमत्कार करने लगता, बोलना आरंभ करते ही वह स्वर्ग की भाषा बोलने लगता, यदि पृथ्वी पर कदम रखते ही सभी सांसारिक मामलों को समझने लगता, हर व्यक्ति के विचारों और इरादों को समझने लगता—तो ऐसे इंसान को सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसे देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि मसीह के साथ ऐसा ही होता, तो परमेश्वर के देहधारण का कोई अर्थ और सार ही नहीं रह जाता। उसका सामान्य मानवता से युक्त होना इस बात को सिद्ध करता है कि वह शरीर में देहधारी हुआ परमेश्वर है; उसका सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से गुज़रना दिखाता है कि वह एक सामान्य देह है; इसके अलावा, उसका कार्य इस बात का पर्याप्त सबूत है कि वह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आत्मा है जिसने देहधारण किया है। अपने कार्य की आवश्यकताओं की वजह से परमेश्वर देहधारी बनता है; दूसरे शब्दों में, कार्य का यह चरण देह में पूरा किया जाना चाहिए, सामान्य मानवता में पूरा किया जाना चाहिए। यही "वचन के देह बनने" के लिए, "वचन के देह में प्रकट होने" के लिए पहली शर्त है, और यही परमेश्वर के दो देहधारणों के पीछे की सच्ची कहानी है। हो सकता है लोग यह मानते हों कि यीशु ने जीवनभर चमत्कार किए, पृथ्वी पर अपने कार्य की समाप्ति तक उसने मानवता का कोई चिह्न प्रकट नहीं किया, उसकी आवश्यकताएँ सामान्य मानव जैसी नहीं थीं, या उसमें मानवीय कमज़ोरियाँ या मानवीय भावनाएँ नहीं थीं, उसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की ज़रूरत नहीं थी या उसे सामान्य मानवीय विचारों पर चिंतन करने की ज़रूरत नहीं थी। वे यही कल्पना करते हैं कि उसका मन अतिमानवीय है, उसके पास श्रेष्ठ मानवता है। वे मानते हैं कि चूँकि वह परमेश्वर है, इसलिए उसे उस तरह से रहना और सोचना नहीं चाहिए जैसे सामान्य मानव रहते और सोचते हैं, कोई सामान्य व्यक्ति, एक वास्तविक इंसान, ही सामान्य मानवीय सोच-विचार रख सकता और एक सामान्य मानवीय जीवन जी सकता है। ये सभी मनुष्य के विचार, और मनुष्य की धारणाएँ हैं, और ये धारणाएँ परमेश्वर के कार्य के वास्तविक इरादों के प्रतिकूल हैं। सामान्य मानव सोच, सामान्य मानव सूझ-बूझ और साधारण मानवता को बनाए रखती है; सामान्य मानवता देह के सामान्य कार्यों को बनाए रखती है; और देह के सामान्य कार्य, देह के सामान्य जीवन को उसकी समग्रता में बनाए रखते हैं। ऐसे देह में कार्य करके ही परमेश्वर अपने देहधारण के उद्देश्य को पूरा कर सकता है। यदि देहधारी परमेश्वर केवल देह के बाहरी आवरण को ही धारण किए रहता, लेकिन उसमें सामान्य मानवीय विचार न आते, तो उसके देह में मानवीय सूझ-बूझ न होती, वास्तविक मानवता तो बिल्कुल न होती। ऐसा मानवता रहित देह, उस सेवकाई को कैसे पूरा कर सकता है जिसे देहधारी परमेश्वर को करना चाहिए? सामान्य मन मानव जीवन के सभी पहलुओं को बनाए रखता है; बिना सामान्य मन के, कोई व्यक्ति मानव नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जो सामान्य ढंग से सोच-विचार नहीं करता, वह मानसिक रूप से बीमार है, और एक मसीह जिसमें मानवता न होकर केवल दिव्यता हो, उसे परमेश्वर का देहधारी शरीर नहीं कहा जा सकता। इसलिए, ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर के देहधारी शरीर में कोई सामान्य मानवता न हो? क्या ऐसा कहना ईशनिंदा नहीं होगी कि मसीह में कोई मानवता नहीं है? ऐसे सभी क्रियाकलाप जिनमें सामान्य मानव शामिल होते हैं एक सामान्य मानव मन की कार्यशीलता के भरोसे होते हैं। इसके बिना, मानव पथभ्रष्ट की तरह व्यवहार करते; यहाँ तक कि वे सफेद और काले, अच्छे और बुरे में अंतर भी न कर पाते; उनमें कोई भी मानवीय आचरण न होता, और नैतिक सिद्धांत न होते। इसी प्रकार से, यदि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य मानव की तरह न सोचता, तो वह एक प्रामाणिक देह, एक सामान्य देह न होता। सोच-विचार न करने वाला ऐसा देह दिव्य कार्य न कर पाता। वह सामान्य रूप से सामान्य देह की गतिविधियों में शामिल न हो पाता, पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ रहने की तो बात ही छोड़ दो। और इस तरह, परमेश्वर के देहधारण की महत्ता, परमेश्वर का देह में आने का वास्तविक सार ही खो गया होता। देहधारी परमेश्वर की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को बनाए रखती है। ऐसा कहा जा सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि इस देह में सामान्य मानवीय मन न होता, तो परमेश्वर देह में कार्य न कर पाता और जो उसे देह में करना था, वह कभी न कर पाता। यद्यपि देहधारी परमेश्वर में एक सामान्य मानवीय मन होता है, किन्तु उसके कार्य में मानवीय विचारों की मिलावट नहीं होती; वह सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करता है जिसमें मन-युक्त मानवता के होने की पूर्वशर्त रहती है, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाने की। उसके देह के विचार कितने भी उत्कृष्ट क्यों न हों, लेकिन उसका कार्य तर्क या सोच से कलंकित नहीं होता। दूसरे शब्दों में, उसके कार्य की कल्पना उसके देह के मन के द्वारा नहीं की जाती, बल्कि वह उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करना है, उसमें से कुछ भी उसके मस्तिष्क की कल्पना नहीं होता। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और क्रूसीकरण उसके मानवीय मन की उपज नहीं थे, उन्हें किसी भी मानवीय मन वाले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसी तरह, आज का विजय-कार्य ऐसी सेवकाई है जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु यह किसी मानवीय इच्छा का कार्य नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी दैहिक मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानव मन होना चाहिए, सामान्य मानवता से संपन्न होना चाहिए, क्योंकि उसे एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर के कार्य का वास्तविक सार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 101

कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे पूरी तरह से एक साधारण व्यक्ति ही समझते थे। उसकी सर्वथा सामान्य, साधारण मानवता इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, और अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि पवित्रात्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है और परमेश्वर के देहधारण के युग में उसका देह पवित्रात्मा का समस्त कार्य करेगा। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसा देह है जिसमें आत्मा साकार हुआ है, जिसमें सामान्य मानवता है, सामान्य बोध है और मानवीय विचार हैं। "साकार होने" का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, आत्मा का देह बनना; इसे और स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब स्वयं परमेश्वर सामान्य मानवता वाले देह में वास करके उसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही साकार होने या देहधारी होने का अर्थ है। अपने पहले देहधारण के दौरान, परमेश्वर के लिए बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना आवश्यक था, क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। पूरी मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसका दयालु और क्षमाशील होना आवश्यक था। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने बीमार को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने का कार्य किया, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और मलिनता से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। चूँकि वह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करके संकेत और चमत्कार दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे—क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनंद और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थीं। अर्थात् बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु के देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये देह में साकार हुए पवित्रात्मा के कार्य थे। किन्तु जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, तब वह देह में रह रहा था, देह से परे नहीं गया था। उसने चंगाई का चाहे कैसा भी कार्य क्यों न किया हो, तब भी उसमें सामान्य मानवता ही थी, तब भी वह एक सामान्य मानव जीवन ही जी रहा था। परमेश्वर के देहधारण के युग में देह ने पवित्रात्मा के सभी कार्य किए, मेरा ऐसा कहने का कारण यह है कि चाहे उसने कोई भी कार्य किया हो, उसने वह कार्य देह में रहकर ही किया था। किन्तु उसके कार्य की वजह से, लोगों ने उसके देह को पूरी तरह से दैहिक सार धारण करने वाला नहीं माना, क्योंकि वह देह चमत्कार कर सकता था, और किसी विशेष समय में ऐसे कार्य कर सकता था जो देह से परे के होते थे। बेशक, ये सारी घटनाएँ उसकी सेवकाई आरंभ करने के बाद हुईं, जैसे कि उसका चालीस दिनों तक उसकी परीक्षा लिया जाना या पहाड़ पर रूपान्तरित होना। तो यीशु के साथ, परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण नहीं हुआ था, बल्कि केवल आंशिक तौर पर पूर्ण हुआ था। अपना कार्य आरंभ करने से पहले उसने देह में जो जीवन जिया वह हर तरह से एकदम सामान्य था। कार्य आरंभ करने के बाद, उसने केवल अपने देह के बाहरी आवरण को बनाए रखा। क्योंकि उसका कार्य दिव्यता की अभिव्यक्ति था, इसलिए यह देह के सामान्य कार्यों से बढ़कर था। आख़िरकार, परमेश्वर का देहधारी देह मांस-और-रक्त वाले मानव से भिन्न था। बेशक, अपने दैनिक जीवन में, उसे भोजन, कपड़ों, नींद और आश्रय की आवश्यकता पड़ती थी, उसे सभी आम ज़रूरत की चीज़ों की आवश्यकता होती थी, उसमें सामान्य मानवीय बोध था, और वह एक आम इंसान की तरह ही सोचता था। उसके अलौकिक कार्य को छोड़कर, लोग अभी भी उसे एक सामान्य मनुष्य ही मान रहे थे। वास्तव में, प्रत्येक कार्य करते हुए वह एक साधारण और सामान्य मानवता में ही जी रहा था और जहाँ तक उसने जो कार्य किया, उसकी बात है, उसकी समझ विशेष रूप से सामान्य थी, उसके विचार, किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य की अपेक्षा, विशेष रूप से अधिक सुस्पष्ट थे। इस प्रकार की सोच और समझ एक देहधारी परमेश्वर के लिए आवश्यक थी, क्योंकि दिव्य कार्य को ऐसे देह के द्वारा व्यक्त किए जाने की आवश्यकता थी जिसकी समझ बहुत ही सामान्य हो और विचार बहुत ही सुस्पष्ट हों—केवल इसी प्रकार से उसका देह दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता था। यीशु ने इस पृथ्वी पर अपने पूरे साढ़े तैतीस साल के वास में, अपनी सामान्य मानवता बनाए रखी, किन्तु उसकी इन साढ़े तैतीस साल की सेवकाई के दौरान, लोगों ने सोचा कि वह सर्वश्रेष्ठ है, पहले की अपेक्षा बहुत ही अलौकिक है। जबकि असलियत में, यीशु की सामान्य मानवता सेवकाई आरंभ करने से पहले और बाद में अपरिवर्तित रही; पूरे समय उसकी मानवता एक-सी थी, किन्तु जब उसने अपनी सेवकाई आरंभ की उससे पहले और उसके बाद के अंतर के कारण, उसके देह को लेकर, दो भिन्न-भिन्न मत उभरे। लोगों की राय कुछ भी रही हो, लेकिन देहधारी परमेश्वर ने पूरी अवधि में, अपनी सामान्य मानवता बनाए रखी, क्योंकि जबसे परमेश्वर देहधारी हुआ था, तब से वह देह में ही रहा, ऐसे देह में जिसमें सामान्य मानवता थी। चाहे वह अपनी सेवकाई कर रहा हो या न कर रहा हो, उसके देह की सामान्य मानवता को मिटाया नहीं जा सकता था, क्योंकि मानवता देह का मूल सार है। अपनी सेवकाई से पहले, सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए यीशु का देह पूरी तरह से सामान्य रहा; वह जरा-सा भी अलौकिक नज़र नहीं आया, उसने कोई भी चमत्कारी संकेत नहीं दिखाए। उस समय, वह केवल एक आम इंसान था जो परमेश्वर की आराधना करता था, भले ही उसका लक्ष्य अधिक ईमानदार था, किसी भी किसी भी व्यक्ति से अधिक निष्ठापूर्ण था। इस प्रकार उसकी सर्वथा सामान्य मानवता ने स्वयं को अभिव्यक्त किया। चूँकि सेवकाई का कार्य शुरू करने से पहले, उसने कोई कार्य नहीं किया था, इसलिए कोई उसे पहचानता नहीं था, कोई नहीं कह सकता था कि उसका देह बाकी लोगों से अलग है, क्योंकि उसने एक भी चमत्कार नहीं किया था, स्वयं परमेश्वर का ज़रा-सा भी कार्य नहीं किया था। लेकिन, सेवकाई का कार्य प्रारंभ करने के बाद, उसने सामान्य मानवता का बाहरी आवरण बनाए रखा और तब भी सामान्य मानवीय सूझबूझ के साथ ही जीता रहा, लेकिन क्योंकि उसने स्वयं परमेश्वर का कार्य करना, मसीह की सेवकाई अपनाना और उन कार्यों को करना आरंभ कर दिया था जिन्हें करने में नश्वर प्राणी, मांस-और-रक्त से बने प्राणी अक्षम थे, इसलिए लोगों ने मान लिया कि उसकी सामान्य मानवता नहीं है, उसका देह पूरी तरह से सामान्य नहीं है बल्कि अपूर्ण देह है। उसके द्वारा किए गए कार्य की वजह से, लोगों ने कहा कि वह देह में परमेश्वर है जिसके पास सामान्य मानवता नहीं है। ऐसी समझ गलत है, क्योंकि लोगों ने देहधारी परमेश्वर की महत्ता को नहीं समझा। यह गलतफहमी इस तथ्य से पैदा हुई थी कि परमेश्वर द्वारा देह में व्यक्त कार्य दिव्य कार्य है, जो ऐसे देह में व्यक्त किया जाता है जिसकी एक सामान्य मानवता है। परमेश्वर देह के आवरण में था, उसका वास देह में था, परमेश्वर की मानवता में उसके कार्य ने उसकी मानवता की सामान्यता को धुँधला कर दिया था। इसी कारण से लोगों ने विश्वास कर लिया कि परमेश्वर में मानवता नहीं है केवल दिव्यता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 102

अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूरा नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूरा किया जिसे परमेश्वर के लिए देह में रहकर करना आवश्यक था। इसलिए, देहधारण के कार्य को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर एक बार फिर देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और वास्तविकता को जी रहा है, अर्थात्, एकदम सामान्य और साधारण देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे उसने देह में अधूरा छोड़ दिया था। दूसरा देहधारण सार रूप में पहले के ही समान है, लेकिन यह अधिक वास्तविक और पहले से भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरा देहधारी देह पहले देहधारण से भी अधिक पीड़ा सहता है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई का परिणाम है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसके देह की सामान्यता और वास्तविकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई का कार्य सर्वथा सामान्य और वास्तविक देह में करता है, इसलिए उसके देह को अत्यधिक कठिनाई सहनी होगी। उसका देह जितना अधिक सामान्य और वास्तविक होगा, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, ऐसा देह जो कि बिल्कुल भी अलौकिक नहीं है। चूँकि उसका देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—और ये सारी पीड़ा उसके देह की वास्तविकता और सामान्यता से उत्पन्न होती है। सेवकाई का कार्य करते समय जिस पीड़ा से दोनों देहधारी देह गुज़रे हैं, उससे देहधारी देह के सार को देखा जा सकता है। देह जितना अधिक सामान्य होगा, उसे कार्य करते समय उतनी ही अधिक कठिनाई सहनी होगी; कार्य करने वाला देह जितना अधिक वास्तविक होता है, लोगों की धारणाएँ भी उतनी ही अधिक कठोर होती हैं, और उस पर आने वाले ख़तरों की आशंका उतनी ही अधिक होती है। फिर भी, देह जितना अधिक वास्तविक होता है, और उसमें सामान्य मानव की जितनी अधिक आवश्यकताएँ और पूर्ण बोध होता है, वह उतना ही अधिक वह परमेश्वर के कार्य को देह में कर पाने में सक्षम होता है। यीशु के देह को सलीब पर चढ़ाया गया था, उसी ने पापबलि के रूप में अपने देह का को दिया था; उसने सामान्य मानवता वाले देह से ही शैतान को हराकर सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया था। और पूरी तरह से देह के रूप में ही परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसा देह जो पूरी तरह से सामान्य और वास्तविक है, अपनी समग्रता में विजय का कार्य करके एक सशक्त गवाही दे सकता है। अर्थात्, देह में परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता के माध्यम से ही मानव पर विजय को प्रभावी बनाया जाता है, न कि अलौकिक चमत्कारों और प्रकटनों के माध्यम से। इस देहधारी परमेश्वर की सेवकाई बोलना, मनुष्य को जीतना और उसे पूर्ण बनाना है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए पवित्रात्मा का कार्य, देह का कर्तव्य, बोलकर मनुष्य को पूरी तरह से जीतना, उजागर करना, पूर्ण बनाना और हटाना है। इसलिए, विजय के कार्य में ही देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न होगा। आरंभिक छुटकारे का कार्य देहधारण के कार्य का आरंभ मात्र था; विजय का कार्य करने वाला देह देहधारण के समस्त कार्य को पूरा करेगा। लिंग रूप में, एक पुरुष है और दूसरा महिला; यह परमेश्वर के देहधारण की महत्ता को पूर्णता देकर, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं को दूर करता है : परमेश्वर पुरुष और महिला दोनों बन सकता है, सार रूप में देहधारी परमेश्वर स्त्रीलिंग या पुल्लिंग नहीं है। उसने पुरुष और महिला दोनों को बनाया है, और उसके लिए कोई लिंगभेद नहीं है। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना नहीं है, बल्कि बोलकर मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारण का सहज गुण वचन बोलना और मनुष्य को जीतना है, न कि बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चमत्कार करना नहीं है, बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरा देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य लगता है। लोग देखते हैं कि परमेश्वर का देहधारण मिथ्या नहीं है; बल्कि यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, हालाँकि दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, फिर भी वे पूरी तरह से एक नहीं हैं। यीशु में सामान्य और साधारण मानवता थी, लेकिन उसमें अनेक संकेत और चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। जबकि इस देहधारी परमेश्वर में, मानवीय आँखों को न तो कोई संकेत दिखाई देगा, और न कोई चमत्कार, न तो बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न तो समुद्र पर चलना दिखाई देगा, न ही चालीस दिन तक उपवास रखना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता जो यीशु ने किया, इसलिए नहीं कि उसका देह सार रूप में यीशु से भिन्न है, बल्कि इसलिए कि बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने वास्तविक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चमत्कारों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है। आज तुम जिस देहधारी परमेश्वर को देखते हो वह पूरी तरह से देह है, और उसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। वह दूसरों की तरह ही बीमार पड़ता है, उसे बाकी लोगों की तरह ही बीमार पड़ता है, उसी तरह उसे भोजन और कपड़ों की आवश्यकता होती है; वह पूरी तरह से देह है। यदि इस बार भी देहधारी परमेश्वर अलौकिक संकेत और चमत्कार दिखाता, बीमारों को चंगा करता, दुष्टात्माओं को निकालता, या एक वचन से मार सकता, तो विजय का कार्य कैसे हो पाता? कार्य को अन्यजाति राष्ट्रों में कैसे फैलाया जा सकता था? बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना अनुग्रह के युग का कार्य था, छुटकारे के कार्य का यह पहला चरण था, और अब जबकि परमेश्वर ने लोगों को सलीब से बचा लिया है, इसलिए अब वह उस कार्य को नहीं करता। यदि अंत के दिनों में यीशु के जैसा ही कोई "परमेश्वर" प्रकट हो जाता, जो बीमार को चंगा करता और दुष्टात्माओं को निकालता, और मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया जाता, तो वह "परमेश्वर", बाइबल में वर्णित परमेश्वर के समरूप तो अवश्य होता और उसे मनुष्य के लिए स्वीकार करना भी आसान होता, लेकिन तब वह अपने सार रूप में, परमेश्वर के आत्मा द्वारा नहीं, बल्कि एक दुष्टात्मा द्वारा धारण किया गया देह होता। क्योंकि जो परमेश्वर ने पहले ही पूरा कर लिया है, उसे कभी नहीं दोहराना, यह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत है। इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण का कार्य पहले देहधारण के कार्य से भिन्न है। अंत के दिनों में, परमेश्वर विजय का कार्य एक सामान्य और साधारण देह में पूरा करता है; वह बीमार को चंगा नहीं करता, उसे मनुष्य के लिए सलीब पर नहीं चढ़ाया जाएगा, बल्कि वह केवल देह में वचन कहता है, देह में मानव को जीतता है। ऐसा देह ही देहधारी परमेश्वर का देह है; ऐसा देह ही देह में परमेश्वर के कार्य को पूर्ण कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 103

इस चरण में देहधारी परमेश्वर चाहे कठिनाइयाँ सह रहा हो या सेवकाई कर रहा हो, वह ऐसा केवल देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए करता है, क्योंकि यह परमेश्वर का अंतिम देहधारण है। परमेश्वर केवल दो बार देहधारण कर सकता है। ऐसा तीसरी बार नहीं हो सकता। पहला देहधारण पुरुष था; दूसरा स्त्री, तो मनुष्य के मन में परमेश्वर की देह की छवि पूरी हो चुकी है; इसके अलावा, दोनों देहधारण ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को देह में समाप्त कर लिया है। पहली बार, देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए परमेश्वर के देहधारण ने सामान्य मानवता धारण की। इस बार उसने सामान्य मानवता भी धारण की है, किन्तु इस देहधारण का अर्थ भिन्न है : यह अधिक गहरा है, और उसका कार्य अधिक गहन महत्ता का है। परमेश्वर के पुनः देहधारी होने का कारण देहधारण के अर्थ को पूरा करना है। जब परमेश्वर इस चरण के कार्य को पूरी तरह से समाप्त कर लेगा, तो देहधारण का संपूर्ण अर्थ, अर्थात्, देह में परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, और फिर देह में करने के लिए और कार्य बाकी नहीं रह जाएगा। अर्थात्, अब से परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए फिर कभी देहधारण नहीं करेगा। केवल मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए ही परमेश्वर देहधारण करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य के अलावा किसी और कारण से देह में आना परमेश्वर के लिए किसी भी तरह से सामान्य बात नहीं है। कार्य करने के लिए देह में आ कर, वह शैतान को दिखाता है कि परमेश्वर देह है, एक सामान्य, एक साधारण व्यक्ति है—और फिर भी वह संसार पर विजयी शासन कर सकता है, शैतान को परास्त कर सकता है, मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है, मानवजाति को जीत सकता है! शैतान के कार्य का लक्ष्य मानवजाति को भ्रष्ट करना है, जबकि परमेश्वर का लक्ष्य मानवजाति को बचाना है। शैतान मनुष्य को अथाह कुंड में फँसाता है, जबकि परमेश्वर उसे इससे बचाता है। शैतान सभी लोगों से अपनी आराधना करवाता है, जबकि परमेश्वर उन्हें अपने प्रभुत्व के अधीन करता है, क्योंकि वह संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है। यह समस्त कार्य परमेश्वर के दो देहधारणों द्वारा पूरा किया जाता है। उसका देह सार रूप में मानवता और दिव्यता का मिलाप है और उसमें सामान्य मानवता है। इसलिए देहधारी परमेश्वर के देह के बिना, परमेश्वर मानवजाति को नहीं बचा सकता, और देह की सामान्य मानवता के बिना, देह में उसका कार्य परिणाम हासिल नहीं कर सकता। परमेश्वर के देहधारण का सार यह है कि उसमें सामान्य मानवता होनी चाहिए; इसके इतर कुछ भी होने पर यह देहधारण करने के परमेश्वर के मूल आशय के विपरीत चला जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 104

मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं बना था। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक सामान्य देह में किया जाता है; यह एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया जाता है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी सर्वोत्कृष्ट नहीं होती। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया है; और वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की है, एक पूर्ण मानव, एक पूर्ण देह की, जो कार्य को कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी सर्वोत्कृष्ट नहीं है, एक अति सामान्य व्यक्ति जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी अद्भुत संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता है, वृहद सभाकक्षों में धर्म के बारे में आंतरिक सत्य को तो उजागर बिल्कुल नहीं करता। लोगों को दूसरे देहधारी देह का कार्य पहले वाले से एकदम अलग प्रतीत होता है, इतना अलग कि दोनों में कुछ भी समान नहीं दिखता, और इस बार पहले वाले के कार्य का थोड़ा-भी अंश नहीं देखा जा सकता। यद्यपि दूसरे देहधारण के देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनका स्रोत एक ही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं, यह दोनों देह के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरण पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असंभव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही पवित्रात्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं, इस बात को उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए दिव्य कार्य से तय किया जा सकता है। दूसरा देहधारी देह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता जिसे यीशु कर चुका है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि हर बार वह एक नया मार्ग खोलता है। दूसरे देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहले देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और पूर्ण बनाना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी नियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदय में विद्यमान हैं, और उनके हृदय से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के अपने कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक चरण केवल एक भाग का ज्ञान देता है, न कि संपूर्ण का। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की समझ के सीमित गुणों की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को संप्रेषित करना असंभव है; इसके अलावा, परमेश्वर के कार्य का एक चरण परमेश्वर को पूरी तरह से कैसे व्यक्त कर सकता है? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों से ही जाना जा सकता है, न कि उसके दैहिक आवरण से। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है। उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते। केवल इसी प्रकार से मनुष्य, एक अकेले पहलू तक सीमित न होकर, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यद्यपि दोनों देहधारण के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देह का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समान है; बात केवल इतनी ही है कि उनका अस्तित्व कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए है, और वे दो अलग-अलग युग में आते हैं। कुछ भी हो, देहधारी परमेश्वर के देह एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करते हैं—यह एक ऐसा सत्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 105

देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है; वह आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण दिव्यता दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियां बनाए रखती है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य अभ्यास में लाती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार पवित्र आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा और वह संभवतः कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकता, जो उसके स्वयं के कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह ऐसे वचन कहेगा, जो उसकी स्वयं की इच्छा के विरुद्ध जाते हों। इसलिए, देहधारी परमेश्वर कभी भी कोई ऐसा कार्य बिल्कुल नहीं करेगा, जो उसके अपने प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करता हो। यह वह बात है, जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना और परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य भी मनुष्य को बचाना है तथा परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपने देह में अपने सार का, इस प्रकार अहसास करता है कि उसकी देह उसके कार्य का भार उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारण के समय परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है और देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केंद्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिलाया नहीं जा सकता। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, वह अपनी देह में वह कार्य पूरा करता है, जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या चाहे वह मसीह हो, दोनों स्वयं परमेश्वर हैं और वह उस कार्य को करता है, जो उसे करना चाहिए और उस सेवकाई को करता है, जो उसे करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 106

परमेश्वर का सार ही अधिकार को काम में लाता है, लेकिन वह पूर्ण रूप से उस अधिकार के प्रति समर्पित हो पाता है, जो उसकी ओर से आता है। चाहे वह पवित्र आत्मा का कार्य हो या देह का, दोनों का एक दूसरे से टकराव नहीं होता। परमेश्वर का आत्मा संपूर्ण सृष्टि पर अधिकार रखता है। परमेश्वर के सार वाली देह भी अधिकार संपन्न है, पर देह में परमेश्वर वह सब कार्य कर सकता है, जिससे स्वर्गिक पिता की इच्छा का आज्ञा पालन होता है। इसे किसी मनुष्य द्वारा प्राप्त किया या समझा नहीं जा सकता। परमेश्वर स्वयं अधिकार है, पर उसकी देह उसके अधिकार के प्रति समर्पित हो सकती है। जब यह कहा जाता है तो इसमें निहित होता हैः "मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा का आज्ञापालन करता है।" परमेश्वर आत्मा है और उद्धार का कार्य कर सकता है, जैसे परमेश्वर मनुष्य बन सकता है। किसी भी क़ीमत पर, परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है; वह न तो बाधा उत्पन्न करता है न दखल देता है, ऐसे कार्य का अभ्यास तो नहीं ही करता, जो परस्पर विपरीत हो क्योंकि आत्मा और देह द्वारा किए गए कार्य का सार एक समान है। चाहे आत्मा हो या देह, दोनों एक इच्छा को पूरा करने और उसी कार्य को प्रबंधित करने के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि आत्मा और देह की दो भिन्न विशेषताएं हैं, किंतु उनके सार एक ही हैं; दोनों में स्वयं परमेश्वर का सार है और स्वयं परमेश्वर की पहचान है। स्वयं परमेश्वर में अवज्ञा के तत्व नहीं होते; उसका सार अच्छा है। वह समस्त सुंदरता और अच्छाई की और साथ ही समस्त प्रेम की अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि देह में भी परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता, जिससे परमपिता परमेश्वर की अवज्ञा होती हो। यहाँ तक कि अपने जीवन का बलिदान करने की क़ीमत पर भी वह ऐसा करने को पूरे मन से तैयार रहेगा और कोई विकल्प नहीं बनाएगा। परमेश्वर में आत्मतुष्टि और ख़ुदगर्ज़ी के या दंभ या घमंड के तत्व नहीं हैं; उसमें कुटिलता के कोई तत्व नहीं हैं। जो कोई भी परमेश्वर की अवज्ञा करता है, वह शैतान से आता है; शैतान समस्त कुरूपता तथा दुष्टता का स्रोत है। मनुष्य में शैतान के सदृश विशेषताएं होने का कारण यह है कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट और संसाधित किया गया है। मसीह को शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है, अतः उसके पास केवल परमेश्वर की विशेषताएं हैं तथा शैतान की एक भी विशेषता नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि कार्य कितना कठिन है या देह कितनी निर्बल, परमेश्वर जब वह देह में रहता है, कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेगा, जिससे स्वयं परमेश्वर का कार्य बाधित होता हो, अवज्ञा में परमपिता परमेश्वर की इच्छा का त्याग तो बिल्कुल नहीं करेगा। वह देह में पीड़ा सह लेगा, मगर परमपिता परमेश्वर की इच्छा के विपरीत नहीं जाएगा; यह वैसा है, जैसा यीशु ने प्रार्थना में कहा, "पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" लोग अपने चुनाव करते हैं, किंतु मसीह नहीं करता। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है, फिर भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा की तलाश करता है और देह के दृष्टिकोण से वह पूरा करता है, जो उसे परमपिता परमेश्वर द्वारा सौंपा गया है। यह कुछ ऐसा है, जो मनुष्य हासिल नहीं कर सकता। जो कुछ शैतान से आता है, उसमें परमेश्वर का सार नहीं हो सकता; उसमें केवल परमेश्वर की अवज्ञा और उसका विरोध हो सकता है। वह पूर्ण रूप से परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर सकता, स्वेच्छा से परमेश्वर की इच्छा का पालन तो दूर की बात है। मसीह के अलावा सभी पुरुष ऐसा कर सकते हैं, जिससे परमेश्वर का विरोध होता हो, और एक भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को सीधे नहीं कर सकता; एक भी परमेश्वर के प्रबंधन को अपने कर्तव्य के रूप में मानने में सक्षम नहीं है। मसीह का सार परमपिता परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना है; परमेश्वर की अवज्ञा शैतान की विशेषता है। ये दोनों विशेषताएं असंगत हैं और कोई भी जिसमें शैतान के गुण हैं, मसीह नहीं कहलाया जा सकता। मनुष्य परमेश्वर के बदले उसका कार्य नहीं कर सकता, इसका कारण है कि मनुष्य में परमेश्वर का कोई भी सार नहीं है। मनुष्य परमेश्वर का कार्य मनुष्य के व्यक्तिगत हितों और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते करता है, किंतु मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए कार्य करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 107

मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होती है। यद्यपि वह देह में है, किंतु उसकी मानवता पूर्ण रूप से देह वाले एक मनुष्य के समान नहीं है। उसका अपना अनूठा चरित्र है और यह भी उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होता है। उसकी दिव्यता में कोई निर्बलता नहीं है; मसीह की निर्बलता उसकी मानवता से संबंधित है। एक निश्चित सीमा तक, यह निर्बलता उसकी दिव्यता को विवश करती है, पर इस प्रकार की सीमाएं एक निश्चित दायरे और समय के भीतर होती हैं और असीम नहीं हैं। जब उसकी दिव्यता का कार्य क्रियान्वित करने का समय आता है, तो वह उसकी मानवता की परवाह किए बिना किया जाता है। मसीह की मानवता पूर्णतः उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है। उसके मानवता के साधारण जीवन से अलग, उसकी मानवता के अन्य सभी काम उसकी दिव्यता द्वारा प्रेरित, प्रभावित और निर्देशित होते हैं। यद्यपि मसीह में मानवता है, पर इससे उसकी दिव्यता का कार्य बाधित नहीं होता और ऐसा ठीक इसलिए है क्योंकि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित है; हालांकि उसकी मानवता दूसरों के साथ आचरण में परिपक्व नहीं है, इससे उसकी दिव्यता का सामान्य कार्य प्रभावित नहीं होता। जब मैं यह कहता हूँ कि उसकी मानवता भ्रष्ट नहीं हुई है, तब मेरा मतलब है कि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्देशित की जा सकती है और यह कि वह साधारण मनुष्य की तुलना में उच्चतर समझ से संपन्न है। उसकी मानवता उसके कार्य में दिव्यता द्वारा निर्देशित होने के लिए सबसे अनुकूल है; उसकी मानवता दिव्यता के कार्य को अभिव्यक्त करने के लिए सबसे अनुकूल है और साथ ही ऐसे कार्य के प्रति समर्पण करने के सबसे योग्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य करता है, वह कभी उस कर्तव्य से नज़र नहीं हटाता, जिसे मनुष्य को देह में होते हुए पूरा करना चाहिए; वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। उसमें परमेश्वर का सार है और उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर की पहचान है। केवल इतना है कि वह पृथ्वी पर आया है और एक सृजित किया प्राणी बन गया है, जिसका बाहरी आवरण सृजन किए प्राणी का है और अब ऐसी मानवता से संपन्न है, जो पहले उसके पास नहीं थी; वह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है; यह स्वयं परमेश्वर का अस्तित्व है तथा मनुष्य उसका अनुकरण नहीं कर सकता। उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर है। देह के परिप्रेक्ष्य से वह परमेश्वर की आराधना करता है; इसलिए, ये वचन "मसीह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करता है" त्रुटिपूर्ण नहीं हैं। वह मनुष्य से जो माँगता है, वह ठीक-ठीक उसका स्वयं का अस्तित्व है; मनुष्य से कुछ भी माँगने से पहले वह उसे पहले ही प्राप्त कर चुका होता है। वह कभी भी दूसरों से माँग नहीं करता जबकि वह स्वयं उनसे मुक्त है, क्योंकि इन सबसे उसका अस्तित्व गठित होता है। इस बात की परवाह किए बिना कि वह कैसे अपना कार्य क्रियान्वित करता है, वह इस प्रकार कार्य नहीं करेगा, जिससे परमेश्वर की अवज्ञा हो। चाहे वह मनुष्य से कुछ भी माँगे, कोई भी माँग मनुष्य द्वारा प्राप्य से बढ़कर नहीं होती। वह जो कुछ करता है, वह परमेश्वर की इच्छा पर चलता है और उसके प्रबंधन के वास्ते है। मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है; इसलिए सभी सृजित प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता है, यानी परमेश्वर का स्वयं का अस्तित्व और स्वभाव उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही साधारण हो, इससे इनकार नहीं हो सकता कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले और किसी भी तरह परमेश्वर की इच्छा का आज्ञा पालन करे, यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है। मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह किसी भी तरह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त और प्रकट करे, मनुष्य यह स्वीकार करने में असमर्थ है कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपनी आज्ञाकारिता और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख मनुष्य मसीह को उतना ही हल्के ढंग से लेते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं, जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपना लेते हैं, फिर भी उन "महान लोगों" की शानदार प्रतिमाओं को आराधना के लिए मेज़ पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रतिरोध और अवज्ञा इस तथ्य से जन्मता है कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा, साथ ही मसीह की सामान्य मानवता से समर्पण कराता है; यह परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध और उसकी अवज्ञा का स्रोत है। यदि मसीह न तो अपनी मानवता का भेष रखता, न ही सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज करता, बल्कि इसके बजाय अति मानवता से संपन्न होता, तो किसी मनुष्य में अवज्ञा करने की संभावना न होती। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अदृश्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है, न ही उसमें सृजित प्राणी की एक भी विशेषता है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किंतु मसीह के प्रति तिरस्कार का रवैया रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 108

यद्यपि पृथ्वी पर मसीह, स्वयं परमेश्वर के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, पर वह सभी मनुष्यों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता। वह सब लोगों को अपना दर्शन कराने नहीं आता; वह मनुष्य को अपने हाथ की अगुआई में चलने की अनुमति देने आता है, और इस प्रकार मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। मसीह की देह का काम स्वयं परमेश्वर के कार्य के लिए है, यानी देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और अपनी देह के सार को पूर्णत: मनुष्य को समझाने में समर्थ करने के लिए नहीं है। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह कुछ ऐसा नहीं करता, जो देह के लिए प्राप्य से परे हो। चाहे वह जैसे कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है और वह मनुष्य के सामने परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति प्रकट नहीं करता। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय नहीं है, जैसा मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और व्यक्तिगत रूप से वह कार्य करता है, जिसे स्वयं परमेश्वर को करना चाहिए, वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता, न ही वह उत्तेजनापूर्वक अपने स्वयं के कर्मों की घोषणा करता है। इसके बजाय, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं, उनमें उसकी विशेषताएं नहीं हैं। अभिमानी और ख़ुद की बढ़ाई के स्वभाव वाले उन झूठे मसीहों से तुलना में यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में किस प्रकार की देह में मसीह है। जितने वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीह स्वयं का दिखावा करते हैं और उतना ही लोगों को धोखा देने के लिये वे ऐसे संकेत और चमत्कार करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों में परमेश्वर के गुण नहीं होते; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग़ नहीं लगता। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिए देहधारी बनता है, न कि महज़ मनुष्यों को उसे देखने की अनुमति देने के लिए। इसके बजाय, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है और जो वह प्रकट करता है, उसे अपना सार प्रमाणित करने देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ से ज़ब्त नहीं की गई थी; यह उसके कार्य और उसके सार से निर्धारित होती है। यद्यपि उसमें स्वयं परमेश्वर का सार है और स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में समर्थ है, किंतु वह अभी भी अंतत: आत्मा से भिन्न देह है। वह आत्मा की विशेषताओं वाला परमेश्वर नहीं है; वह देह के आवरण वाला परमेश्वर है। इसलिए, चाहे वह जितना सामान्य और जितना निर्बल हो और जैसे भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा को खोजे, उसकी दिव्यता से इनकार नहीं किया जा सकता। देहधारी परमेश्वर में न केवल सामान्य मानवता और उसकी कमज़ोरियां विद्यमान रहती हैं; उसमें उसकी दिव्यता की अद्भुतता और अथाहपन के साथ ही देह में उसके सभी कर्म विद्यमान रहते हैं। इसलिए, वास्तव में तथा व्यावहारिक रूप से मानवता तथा दिव्यता दोनों मसीह में मौजूद हैं। यह ज़रा भी निस्सार या अलौकिक नहीं है। वह पृथ्वी पर कार्य करने के मुख्य उद्देश्य से आता है; पृथ्वी पर कार्य करने के लिए सामान्य मानवता से संपन्न होना अनिवार्य है; अन्यथा, उसकी दिव्यता की शक्ति चाहे जितनी महान हो, उसके मूल कार्य का सदुपयोग नहीं हो सकता। यद्यपि उसकी मानवता अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु यह उसका सार नहीं है। उसका सार दिव्यता है; इसलिए जिस क्षण वह पृथ्वी पर अपनी सेवकाई आरंभ करता है, उसी क्षण वह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करना आरंभ कर देता है। उसकी मानवता केवल अपनी देह के सामान्य जीवन को बनाए रखने के लिए होती है ताकि उसकी दिव्यता देह में सामान्य रूप से कार्य क्रियान्वित कर सके; यह दिव्यता ही है, जो पूरी तरह उसके कार्य को निर्देशित करती है। जब वह अपना कार्य समाप्त करेगा, तो वह अपनी सेवकाई को पूर्ण कर चुका होगा। जो मनुष्य को जानना चाहिए, वह है परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता और अपने कार्य के ज़रिए वह मनुष्य को उसे जानने में सक्षम बनाता है। अपने कार्य के दौरान वह पूर्णतः अपनी दिव्यता के होने को अभिव्यक्त करता है, जो ऐसा स्वभाव नहीं है, जिसे मानवता दूषित कर पाए, या ऐसा होना नहीं है, जो विचार एवं मानव व्यवहार द्वारा दूषित किया गया हो। जब समय आता है कि उसकी संपूर्ण सेवकाई का अंत आ गया है, वह पहले ही उस स्वभाव को उत्तमता से और पूर्णतः अभिव्यक्त कर चुका होगा, जो उसे अभिव्यक्त करना चाहिए। उसका कार्य किसी मनुष्य के निर्देशों पर नहीं होता; उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति भी काफ़ी स्वतंत्र है और मन द्वारा नियंत्रित या विचार द्वारा संसाधित नहीं की जाती, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट होती है। यह ऐसा है, जिसे कोई मनुष्य हासिल नहीं कर सकता। यहाँ तक कि यदि परिस्थितियाँ कठोर हों या स्थितियाँ आज्ञा न देतीं हों, तब भी वह उचित समय पर अपने स्वभाव को व्यक्त करने में सक्षम है। जो मसीह है, मसीह के होने को अभिव्यक्त करता है, जबकि जो नहीं हैं, उनमें मसीह का स्वभाव नहीं है। इसलिए, भले ही सभी उसका विरोध करें या उसके प्रति धारणाएं रखें, मनुष्य की धारणाओं के आधार पर कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि मसीह का अभिव्यक्त किया हुआ स्वभाव परमेश्वर का है। वे सब जो सच्चे हृदय से मसीह का अनुसरण करते हैं, या इस आशय से परमेश्वर को खोजते हैं, यह मानेंगे कि अपनी दिव्यता की अभिव्यक्ति के आधार पर वह मसीह है। वे कभी भी ऐसे किसी पहलू के आधार पर मसीह को इनकार नहीं करेंगे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है। यद्यपि मनुष्य अत्यंत मूर्ख है, किंतु सभी जानते हैं कि मनुष्य की इच्छा क्या है और परमेश्वर से क्या उत्पन्न होता है। मात्र इतना है कि बहुत से लोग अपनी स्वयं की इच्छाओं के कारण जानबूझकर मसीह का विरोध करते हैं। यदि ऐसा न हो, तो एक भी मनुष्य के पास मसीह के अस्तित्व से इनकार करने का कारण नहीं होगा, क्योंकि मसीह द्वारा अभिव्यक्त दिव्यता वास्तव में अस्तित्व में है और उसके कार्य को सबकी नंगी आँखों द्वारा देखा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 109

मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उस कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है, जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है और सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित होता है। और इसी प्रकार उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; इसे मैं उसका "प्राकृतिक प्रकाशन" कहता हूँ क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा कई वर्षों का संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसमें अंतर्निहित है। मनुष्य उसके कार्य, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी मानवता, और सामान्य मानवता के उसके संपूर्ण जीवन से इनकार कर सकता है, किंतु कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि वह सच्चे हृदय से स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करता है; कोई इनकार नहीं कर सकता है कि वह स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पूरी करने के लिए आया है, और कोई उस निष्कपटता से इनकार नहीं कर सकता, जिससे वह परमपिता परमेश्वर की खोज करता है। यद्यपि उसकी छवि इंद्रियों के लिए सुखद नहीं, उसके प्रवचन असाधारण हाव-भाव से संपन्न नहीं हैं और उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा मनुष्य कल्पना करता है, वास्तव में वह मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक परमपिता के प्रति समर्पण करता है और मृत्यु तक आज्ञाकारी बना रहता है। यह इसलिए क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस सत्य पर विश्वास करना कठिन है किंतु यह एक तथ्य है। जब मसीह की सेवकाई पूर्णतः संपन्न हो गई है, तो मनुष्य उसके कार्य से देखने में सक्षम होगा कि उसका स्वभाव और उसका अस्तित्व स्वर्ग के परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उस समय, उसके संपूर्ण कार्य का कुल योग इसकी पुष्टि कर सकता है कि वह वास्तव में वही देह है, जिसे वचन धारण करता है, और एक हाड़-मांस के मनुष्य के सदृश नहीं है। पृथ्वी पर मसीह के कार्य के प्रत्येक चरण का प्रतिनिधिक महत्व है, किंतु मनुष्य जो प्रत्येक चरण के वास्तविक कार्य का अनुभव करता है, उसके कार्य के महत्व को ग्रहण करने में अक्षम है। ऐसा विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा अपने दूसरे देहधारण में किए गए कार्य के अनेक चरणों के लिए है। अधिकांशत: वे जिन्होंने मसीह के वचनों को केवल सुना या देखा है, मगर जिन्होंने उसे कभी देखा नहीं है, उनके पास उसके कार्य की कोई धारणाएं नहीं होतीं; जो मसीह को देख चुके हैं और उसके वचनों को सुना है और साथ ही उसके कार्य का अनुभव किया है, वे उसके कार्य को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। क्या यह इस वजह से नहीं है कि मसीह का प्रकटन और सामान्य मानवता मनुष्य की अभिरुचि के अनुसार नहीं है? जो मसीह के चले जाने के बाद उसके कार्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें ऐसी कठिनाइयां नहीं आएँगी, क्योंकि वे मात्र उसका कार्य स्वीकार करते हैं और मसीह की सामान्य मानवता के संपर्क में नहीं आते। मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएं छोड़ने में असमर्थ है तथा इसके बजाय कठोरता से उसकी पड़ताल करता है; ऐसा इस तथ्य के कारण है कि मनुष्य केवल उसके प्रकटन पर अपना ध्यान केंद्रित करता है तथा उसके कार्य तथा वचनों के आधार पर उसके सार को पहचानने में असमर्थ रहता है। यदि मनुष्य उसके प्रकटन के प्रति अपनी आँखें बंद कर ले या मसीह की मानवता पर चर्चा से बचे और केवल उसकी दिव्यता की बात करे, जिसके कार्य तथा वचन किसी भी मनुष्य द्वारा अप्राप्य हैं, तो मनुष्य की धारणाएं घटकर आधी रह जाएँगी, इस हद तक कि मनुष्य की समस्त कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 110

जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। इसे ऐसे कहें, व्यक्ति को इस बात का निश्चय कि यह देहधारी परमेश्वर है या नहीं और कि यह सही मार्ग है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी कि यह देहधारी परमेश्वर की देह है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है। बाहरी स्वरूप सार का निर्धारण नहीं कर सकता; इतना ही नहीं, परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं हो सकता। क्या यीशु का बाहरी रूपरंग मनुष्य की अवधारणाओं के विपरीत नहीं था? क्या उसका चेहरा और पोशाक उसकी वास्तविक पहचान के बारे में कोई सुराग देने में असमर्थ नहीं थे? क्या आरंभिक फरीसियों ने यीशु का ठीक इसीलिए विरोध नहीं किया था क्योंकि उन्होंने केवल उसके बाहरी स्वरूप को ही देखा, और उसके द्वारा बोले गए वचनों को हृदयंगम नहीं किया? मुझे उम्मीद है कि परमेश्वर के प्रकटन के आकांक्षी सभी भाई-बहन इतिहास की त्रासदी को नहीं दोहराएँगे। तुम्हें आधुनिक काल के फरीसी नहीं बनना चाहिए और परमेश्वर को फिर से सलीब पर नहीं चढ़ाना चाहिए। तुम्हें सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए कि परमेश्वर की वापसी का स्वागत कैसे किया जाए और तुम्हारे मस्तिष्क में यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति कैसे बना जाए, जो सत्य के प्रति समर्पित होता है। यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो यीशु के बादल पर सवार होकर लौटने का इंतजार कर रहा है। हमें अपनी आध्यात्मिक आँखों को मलकर उन्हें साफ़ करना चाहिए और अतिरंजित कल्पना के शब्दों के दलदल में नहीं फँसना चाहिए। हमें परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य के बारे में सोचना चाहिए और परमेश्वर के व्यावहारिक पक्ष पर दृष्टि डालनी चाहिए। खुद को दिवास्वप्नों में बहने या खोने मत दो, सदैव उस दिन के लिए लालायित रहो, जब प्रभु यीशु बादल पर सवार होकर अचानक तुम लोगों के बीच उतरेगा और तुम्हें, जिन्होंने उसे कभी जाना या देखा नहीं और जो नहीं जानते कि उसकी इच्छा कैसे पूरी करें, ले जाएगा। अधिक व्यावहारिक मामलों पर विचार करना बेहतर है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 111

देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को सभी प्राणियों के बजाय केवल लोगों के उस हिस्से पर ही अभिव्यक्त करता है, जो उस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं, जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। वह केवल अपने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देह बनता है, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के लिए नहीं। चूँकि उसका कार्य स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए उसका देह में ऐसा करना आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मनुष्य की दुनिया से चला जाएगा; वह इस डर से लंबी अवधि तक मानव-जाति के बीच बना नहीं रह सकता, कि कहीं वह आगामी कार्य के मार्ग में बाधा न बन जाए। जो कुछ वह जनसाधारण पर प्रकट करता है, वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, अपने दो बार के देहधारणों की छवि नहीं, क्योंकि परमेश्वर की छवि केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रदर्शित की जा सकती है, और उसे उसके देह की छवि से बदला नहीं जा सकता। उसके देह की छवि केवल लोगों की एक सीमित संख्या को, केवल उन लोगों को ही दिखाई जाती है, जो तब उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है, वह इस तरह गुप्त रूप से किया जा रहा है। इसी तरह से, यीशु ने जब अपना कार्य किया, तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों को ही दिखाया, और अपने आप को कभी भी किसी दूसरे देश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने अपना काम समाप्त कर लिया, तो वह तुरंत ही मनुष्यों के बीच से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद वह मनुष्य की उस छवि में नहीं रहा, जिसने स्वयं को मनुष्य को दर्शाया था, बल्कि वह पवित्र आत्मा था, जिसने सीधे तौर पर कार्य किया। एक बार जब देहधारी बने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाता है, और फिर कभी उस तरह का कार्य नहीं करता, जो उसने तब किया था, जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। इस अवधि के दौरान मनुष्य मुश्किल से ही उसके हाड़-मांस के शरीर की छवि को देखने में समर्थ होता है; वह स्वयं को मनुष्य पर बिलकुल भी प्रकट नहीं करता, बल्कि हमेशा छिपा रहता है। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित होता है। वह एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। वह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और वह विशेषकर उस युग का होता है; वह एक युग-विशेष में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, उसके कार्य की संपूर्णता का नहीं। इसलिए, देहधारी बने परमेश्वर की छवि सभी लोगों को नहीं दिखाई जाती। जनसाधारण को जो दिखाया जाता है, वह परमेश्वर की धार्मिकता और अपनी संपूर्णता में उसका स्वभाव होता है, न कि उसकी उस समय की छवि, जब वह दो बार देह बना। यह न तो एकल छवि है जो मनुष्य को दिखाई जाती है, और न ही दो छवियाँ संयुक्त हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि देहधारी परमेश्वर का देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए, जिसे करना उसके लिए आवश्यक है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आता है जो उसे करना चाहिए, लोगों को अपनी छवि दिखाने नहीं आता। यद्यपि देहधारण का अर्थ परमेश्वर द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा, जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों को नहीं दिखाएगा, न ही वह जैतून के पहाड़ पर चढ़ेगा और सभी लोगों को दिखाई देगा; वह जो यहूदियों ने देखा है, वह यहूदिया में अपने समय के दौरान की यीशु की तसवीर है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपने देहधारण में यीशु का कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह यहूदी की छवि में वापस यहूदिया नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्यजाति राष्ट्र को तो बिलकुल भी नहीं दिखाएगा, क्योंकि यीशु के देहधारी होने की छवि केवल एक यहूदी की छवि है, मनुष्य के उस पुत्र की छवि नहीं है, जिसे यूहन्ना ने देखा था। यद्यपि यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर आएगा, फिर भी वह अन्यजाति राष्ट्रों में स्वयं को मात्र यहूदी की छवि में नहीं दिखाएगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देह बनने का कार्य एक युग का सूत्रपात करना है। यह कार्य कुछ वर्षों तक सीमित है, और वह परमेश्वर के आत्मा का समस्त कार्य पूरा नहीं कर सकता। इसी तरह से, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की उस छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। उस अवधि के दौरान, जब यीशु देह में था, वह युग का अंत करने या मानवजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तब वह ऊँचे पर चढ़ गया और उसने हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्यजाति देशों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु की अभिव्यक्ति को देखने में असमर्थ हो गए, वे केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ रहे, जिसे उन्होंने दीवार पर चिपकाया था। यह तसवीर सिर्फ मनुष्य द्वारा बनाई गई तसवीर है, न कि वह छवि, जो स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य को दिखाई थी। परमेश्वर अपने आपको खुलकर अपने दो बार देह बनने की छवि में जनसाधारण को नहीं दिखाएगा। जो कार्य वह मनुष्यों के बीच करता है, वह इसलिए करता है ताकि वे उसके स्वभाव को समझ सकें। यह सब मनुष्य को भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से दिखाया जाता है; यह उस स्वभाव के माध्यम से, जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से, जो उसने किया है, संपन्न किया जाता है, यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम से नहीं। अर्थात्, मनुष्य को परमेश्वर की छवि देहधारी छवि के माध्यम से नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर के द्वारा, जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं, किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाई जाती है; और उसके कार्य के माध्यम से उसकी छवि दिखाई जाती है और उसका स्वभाव ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य का अर्थ है, जिसे वह देह में करना चाहता है।

एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह जनसाधारण को अपना स्वरूप देखने की अनुमति देते हुए समस्त अन्यजाति देशों में अपना धार्मिक स्वभाव दिखाना शुरू करेगा। वह अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करेगा, और इसके माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के मनुष्यों का अंत स्पष्ट करेगा, और इस प्रकार पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़ी सीमा तक विस्तारित नहीं होता (जैसे कि यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया, और आज मैं केवल तुम लोगों बीच कार्य करता हूँ), जिसका कारण यह है कि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह एक साधारण और सामान्य देह में केवल एक अल्पावधि का कार्य करता है; वह इस धारित देह का उपयोग शाश्वतता का कार्य करने या अन्यजाति देशों के लोगों को दिखाई देने का कार्य करने के लिए नहीं करता। देह में किए जाने वाले कार्य को केवल दायरे में सीमित किया जा सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों के बीच कार्य करना), और फिर, इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से, इसके दायरे को तब विस्तारित किया जा सकता है। बेशक, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और तब वह उसके द्वारा धारित देह का कार्य नहीं होगा। चूँकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और वह विश्व के समस्त कोनों तक नहीं फैलता—इसलिए वह इसे पूरा नहीं कर सकता। देह में कार्य के माध्यम से उसका आत्मा उस कार्य को करता है, जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य शुरुआती प्रकृति का होता है, जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, उसका आत्मा उस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इतना ही नहीं, ऐसा वह एक बढ़े हुए दायरे में करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 112

परमेश्वर इस पृथ्वी पर जिस कार्य को करने के लिए आता है, वह केवल युग की अगुआई करना, नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। वह पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन जीने, स्वयं मानव-जगत के जीवन के सुख-दुःख का अनुभव करने, या किसी व्यक्ति-विशेष को अपने हाथ से पूर्ण बनाने या किसी व्यक्ति-विशेष को व्यक्तिगत रूप से बढ़ते हुए देखने के लिए नहीं आया है। यह उसका कार्य नहीं है; उसका कार्य केवल एक नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। अर्थात्, वह व्यक्तिगत रूप से एक युग का आरंभ करेगा, व्यक्तिगत रूप से दूसरे युग का अंत करेगा, और व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करके शैतान को पराजित करेगा। हर बार जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो यह ऐसा होता है मानो वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा हो। सबसे पहले, वह विश्व को जीतता है और देह में रहते हुए शैतान पर विजय प्राप्त करता है; वह सारी महिमा का मालिक हो जाता है और दो हज़ार वर्षों के कार्य की समग्रता पर से पर्दा उठाता है, और उसे ऐसा बना देता है कि पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पास चलने के लिए एक सही मार्ग और जीने के लिए एक शांतिपूर्ण और आनंदमय जीवन हो। किंतु, परमेश्वर लंबे समय तक मनुष्य के साथ पृथ्वी पर नहीं रह सकता, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और अंततः मनुष्य के समान नहीं है। वह एक सामान्य मनुष्य का जीवनकाल नहीं जी सकता, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता, जो साधारण के अलावा कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने मानव-जीवन को बनाए रखने के लिए एक सामान्य मनुष्य की सामान्य मनुष्यता का केवल एक अल्पतम अंश ही है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पृथ्वी पर कैसे एक परिवार शुरू कर सकता है, कैसे आजीविका अपना सकता है, और कैसे बच्चों की परवरिश कर सकता है? क्या यह उसके लिए अपमानजनक नहीं होगा? वह सिर्फ सामान्य तरीके से कार्य करने के उद्देश्य से सामान्य मानवता से संपन्न है, न कि एक सामान्य मनुष्य के समान अपना परिवार और आजीविका रखने में समर्थ होने के लिए। उसकी सामान्य समझ, सामान्य मन और उसके देह के सामान्य भोजन और वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसमें एक सामान्य मानवता है; यह साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है, उसे परिवार या आजीविका रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक होगा! परमेश्वर का पृथ्वी पर आना वचन का देह बनना है; वह मनुष्य को मात्र अपने वचन को समझने और अपने वचन को देखने दे रहा है, अर्थात्, मनुष्य को देह द्वारा किए गए कार्य को देखने दे रहा है। उसका यह इरादा नहीं है कि लोग उसके देह के साथ एक निश्चित तरीके से व्यवहार करें, बल्कि केवल यह है कि मनुष्य अंत तक आज्ञाकारी बने रहें, अर्थात्, उसके मुँह से निकलने वाले सभी वचनों का पालन करें, और उसके द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्य के प्रति समर्पित हो जाएँ। वह मात्र देह में कार्य कर रहा है; जानबूझकर मनुष्य से यह नहीं कह रहा कि वे उसके देह की महानता या पवित्रता की सराहना करें, बल्कि वह मनुष्य को अपने कार्य की बुद्धि और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है, जिसका वह प्रयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता, और केवल उस कार्य पर ध्यान केंद्रित करता है, जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देह बना और फिर भी वह अपनी सामान्य मानवता का प्रचार नहीं करता या उसकी गवाही नहीं देता, बल्कि इसके बजाय केवल उस कार्य को करता है, जिसे वह करना चाहता है। इसलिए, जो कुछ तुम लोग देहधारी परमेश्वर में देख सकते हो, वह उसका दिव्य स्वरूप है; इसका कारण यह है कि वह अपने मानवीय स्वरूप का ढिंढोरा नहीं पीटता, जिससे कि मनुष्य उसका अनुकरण करे। केवल जब मनुष्य लोगों की अगुआई करता है, तभी वह अपने मानवीय स्वरूप के बारे में बोलता है, ताकि वह उनकी प्रशंसा और समर्पण बेहतर ढंग से पा सके और इसके फलस्वरूप दूसरों की अगुआई प्राप्त कर सके। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य (अर्थात् मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य) के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; मनुष्य द्वारा उसकी प्रशंसा किए जाने या मनुष्य से अपनी आराधना करवाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जो कुछ भी वह करता है, वह अपने प्रति मनुष्य में आदर की भावना या अपनी अगाधता का भाव भरना है। मनुष्य को प्रभावित करने की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है; वह तुम लोगों से बस इतना ही चाहता है कि जब एक बार तुम लोग उसके स्वभाव को देख लो, तो उसका आदर करो। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह उसका अपना कार्य है; उसे उसके बजाय मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, न ही उसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है और मनुष्य की नए जीवन में अगुआई करने के लिए उसे नए युग में ले जा सकता है। जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य को एक नया जीवन धारण करने और नए युग में प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है। शेष कार्य उन लोगों को सौंप दिया जाता है, जो सामान्य मानवता वाले हैं और जिनकी दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है। इसलिए, अनुग्रह के युग में उसने दो हज़ार वर्षों के कार्य को देह में अपने तेंतीस वर्षों में से मात्र साढ़े तीन वर्षों में पूरा कर दिया। जब परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो वह हमेशा दो हजार वर्षों के या एक समस्त युग के कार्य को कुछ ही वर्षों के लघुतम समय के भीतर पूरा कर देता है। वह विलंब नहीं करता, और वह रुकता नहीं है; वह बस कई वर्षों के काम को घनीभूत कर देता है, ताकि वह मात्र कुछ थोड़े-से वर्षों में ही पूरा हो जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस कार्य को वह व्यक्तिगत रूप से करता है, वह पूर्णत: एक नया मार्ग प्रशस्त करने और एक नए युग की अगुआई करने के लिए होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 113

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह किसी निर्माण या आंदोलनों में शामिल होने नहीं आता, बल्कि अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए आता है। हर बार जब वह देह बनता है, तो यह केवल कार्य के किसी चरण को पूरा करने और एक नए युग का सूत्रपात करने के लिए होता है। अब राज्य के युग का आगमन हो चुका है, और राज्य के लिए प्रशिक्षण की शुरुआत भी। कार्य का यह चरण मनुष्य का कार्य नहीं है, और यह एक खास हद तक मनुष्य को आकार देने के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को पूरा करने के लिए है। जो वह करता है, वह मनुष्य का कार्य नहीं है, यह पृथ्वी को छोड़ने से पहले एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने हेतु मनुष्य को आकार देने के लिए नहीं है; यह उसकी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को समाप्त करने के लिए है, जो उसे करना चाहिए, जो पृथ्वी पर उसके कार्य के लिए उचित व्यवस्थाएँ करना और परिणामस्वरूप महिमान्वित हो जाना है। देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के कार्य के समान नहीं है, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तो वह केवल अपनी सेवकाई पूरी करने की परवाह करता है। जहाँ तक उसकी सेवकाई से संबंध न रखने वाले अन्य समस्त मुद्दों की बात है, वह उनमें कोई भाग नहीं लेता, यहाँ तक कि वह उनसे आँख मूँद लेता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य की बिलकुल परवाह नहीं करता, जो मनुष्य को करना चाहिए। वह जो कार्य करता है, वह केवल उस युग से संबंधित होता है जिसमें वह होता है, और उस सेवकाई से संबंधित होता है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, मानो अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हों। वह स्वयं को एक मनुष्य के रूप में जीने से संबंधित अधिक मूलभूत ज्ञान से सुसज्जित नहीं करता, न ही वह अधिक सामाजिक कौशल सीखता है और न ही खुद को ऐसी अन्य किसी चीज़ से लैस करता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम चीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं करता जो इंसान में होनी चाहिए, और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर इतना अपूर्ण है कि जो बातें मनुष्य में होनी चाहिए, वह उनकी तरफ भी कोई ध्यान नहीं देता, और उसे ऐसी बातों की कोई समझ नहीं है। जीवन के बारे में सामान्य ज्ञान और साथ ही व्यक्तिगत आचरण को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत और दूसरों के साथ बातचीत जैसे मामले मानो उससे कोई संबंध नहीं रखते। लेकिन तुम देहधारी परमेश्वर में असामान्यता का जरा-सा भी संकेत नहीं पा सकते। कहने का अभिप्राय यह है कि उसकी मानवता केवल एक सामान्य व्यक्ति के रूप में उसके जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाए रखती है और उसे सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करती है। लेकिन उसके अंदर ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जो सिर्फ़ मनुष्य (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिए। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग की ओर निर्देशित होता है, न कि किसी एक व्यक्ति या स्थान के लिए, वह समूचे ब्रह्मांड के लिए निर्देशित होता है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा वह कार्य करता है। कोई इसे बदल नहीं सकता, और मनुष्य के पास इसमें शामिल होने का कोई उपाय नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस यहाँ तक कि सत्तर या अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने का उसका कोई इरादा नहीं होता, जिससे कि मनुष्य उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करने से परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य का ज्ञान बिलकुल भी गहरा नहीं होगा; इसके बजाय, यह केवल उसकी धारणाओं में वृद्धि ही करेगा और उसकी धारणाओं और विचारों को पुख्ता ही बनाएगा। इसलिए तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। निश्चित रूप से तुम लोग मेरे इन वचनों को समझने से चूक नहीं सकते, जो मैंने तुम लोगों से कहे थे : "मैं एक सामान्य मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ"। क्या तुम लोग इन वचनों को भूल गए हो : "परमेश्वर पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता"? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग इसका अर्थ जानते हो कि "परमेश्वर एक सृजित प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर कैसे आ सकता है?" परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस इरादे के साथ नहीं आता कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को एक ऐसे श्रेष्ठ मानव के रूप में विकसित करे, जो कलीसिया की अगुआई करेगा। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देह बनना है; हालाँकि मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किंतु तुम सब लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर "देह बना वचन" है, न कि उस समय के लिए परमेश्वर की भूमिका निभाने हेतु पवित्र आत्मा द्वारा विकसित किया गया एक देह। स्वयं परमेश्वर विकसित किया गया उत्पाद नहीं है, बल्कि देह बना वचन है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है। तुम सब जानते और मानते हो कि परमेश्वर का देहधारण एक तथ्यामक सत्य है, लेकिन तुम लोग ऐसा अभिनय करते हो, मानो तुम इसे समझते हो। देहधारी परमेश्वर के कार्य से लेकर उसके देहधारण के महत्व और सार तक, तुम लोग इन्हें ज़रा-भी समझने में समर्थ नहीं हो, और स्मृति से वचनों को धाराप्रवाह बोलने में दूसरों का अनुसरण करते हो। क्या तुम मानते हो कि देहधारी परमेश्वर वैसा ही है, जैसी तुम कल्पना करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 114

परमेश्वर केवल युग की अगुआई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए देह बनता है। तुम लोगों के लिए इस बिंदु को समझना आवश्यक है। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किए जाने योग्य नहीं हैं। कार्य करने के लिए उपयोग किए जा सकने से पूर्व मनुष्य को लंबी अवधि तक विकसित और पूर्ण किए जाने की आवश्यकता होती है, और इसके लिए एक विशेष रूप से उच्च स्तर की मानवता अपेक्षित होती है। मनुष्य को न केवल अपना सामान्य मानवता के बोध को बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के साथ अपने व्यवहार के अनेक सिद्धांतों और नियमों को भी समझने चाहिए, और इतना ही नहीं, उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिक ज्ञान का और अधिक अध्ययन करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। मनुष्य के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिए। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के मामले में ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही वह मनुष्य का कार्य है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है, जो उसे करना चाहिए। (स्वाभाविक रूप से उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, आकस्मिक या ऐच्छिक ढंग से नहीं, और वह तब शुरू होता है, जब उसकी सेवकाई पूरी करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता, अर्थात्, उसकी मानवता इनमें से किसी से युक्त नहीं होती (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता)। वह अपनी सेवकाई तभी पूरी करता है, जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी स्थिति कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है, जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता हो या उसके बारे में जो भी राय रखता हो, इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए, जब यीशु ने अपना काम किया था, तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परंतु वह अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उसे उस कार्य को करने में बाधा नहीं डाली, जो उसे करना था। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को स्वीकार या घोषित नहीं किया, और बस लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक रूप से यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; बल्कि वह तरीका भी था, जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य के पास उसे खुली आँखों से पहचानने का कोई तरीका नहीं था। और यदि मनुष्य उसे पहचान भी लेता, तो भी वह उसके काम में सहायता कर पाने में सक्षम न होता। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसके देह को जान जाए; बल्कि अपना कार्य और अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए हुआ था। इस कारण से, उसने अपनी पहचान सार्वजनिक करने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने वह सारा कार्य पूरा कर लिया, जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य पर स्पष्ट हो गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य पर, और न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि मनुष्य उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, वह बस अपनी सेवकाई पूरी करने और वह कार्य करने के लिए आगे बढ़ता जाता है, जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता। जब उसके कार्य के समापन का समय आएगा, तब वह अवश्य ही पूरा और समाप्त किया जाएगा, और कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि पूरी तरह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाएगा। और जिस इरादे से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उसे समझने में मनुष्य को बहुत समय लगेगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग का कार्य दो भागों में विभाजित है। एक भाग में स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन शामिल हैं। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से संपन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग उन लोगों द्वारा किया जाना शेष रह जाता है, जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर पहले ही मार्ग प्रशस्त कर चुका है, और अब मनुष्य को उस पर स्वयं चलने की आवश्यकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग उस कार्य को आगे बढ़ाते हैं। अतः मनुष्य को पता होना चाहिए कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर द्वारा प्राथमिक रूप से किए जाने वाले कार्य में क्या अपरिहार्य है, और उसे समझना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने का महत्व क्या है और उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य क्या है, और परमेश्वर से वैसी माँगें नहीं करनी चाहिए, जैसी मनुष्य से की जाती हैं। इसी में मनुष्य की गलती, उसकी धारणा और अवज्ञा छिपी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 115

परमेश्वर इस आशय से देह धारण नहीं करता कि मनुष्य उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर के देह और मनुष्य के देह के अंतर पहचाने; न ही वह मनुष्य के विवेक की शक्तियों को प्रशिक्षित करने के लिए देह बनता है, और इस अभिप्राय से तो बिलकुल नहीं बनता कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा धारित देह की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिले। इसमें से कोई भी परमेश्वर के देह बनने का मूल उद्देश्य नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निंदा करने के लिए देह धारण करता है, न ही जानबूझकर मनुष्य को उजागर करने के लिए, और न ही उसके लिए चीज़ों को कठिन बनाने के लिए। इनमें से कोई भी परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह कार्य का एक अपरिहार्य रूप होता है। वह अपने महत्तर कार्य और महत्तर प्रबंधन की खातिर ऐसा करता है, न कि उन कारणों से, जिनकी मनुष्य कल्पना करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपने कार्य की अपेक्षाओं और जैसी आवश्यकता है उसके अनुसार आता है। वह पृथ्वी पर मात्र इधर-उधर देखने के इरादे से नहीं आता, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतना भारी बोझ क्यों उठाएगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? परमेश्वर केवल तभी देह बनता है, जब उसे बनना होता है, और वह हमेशा एक विशिष्ट अर्थ के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ इसलिए होता कि मनुष्य उसे देखे और अपने अनुभव का क्षितिज व्यापक करे, तो वह निश्चित ही इतने हल्केपन से लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने महत्तर कार्य के लिए, और इस उद्देश्य से आता है, कि अधिक लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए आता है, वह शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देहधारण करता है। इसके अतिरिक्त, वह जीवन जीने में समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करने के लिए आता है। यह सब उसके प्रबंधन से संबंध रखता है, और यह पूरे ब्रह्मांड के कार्य से संबंध रखता है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बनता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों न करता? क्या यह अत्यधिक आसान न होता? परंतु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाय वह रहने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान चुनता है। बस यह अकेला देह ही काफी अर्थपूर्ण है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग का कार्य भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात दोनों करता है। यह सब एक महत्वपूर्ण मामला है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है, और यह सब कार्य के उस एक चरण के मायने हैं, जिसे संपन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 116

परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सीधे पवित्रात्मा की पद्धति और पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं बचाया जाता, क्योंकि उसके पवित्रात्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न ही देखा जा सकता है, और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। यदि उसने पवित्रात्मा के दृष्टिकोण के उपयोग द्वारा सीधे तौर पर मनुष्य को बचाने का प्रयास किया होता, तो मनुष्य उसके उद्धार को प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता, तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उस तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं है, बहुत हद तक वैसे ही जैसे कोई मनुष्य यहोवा के बादल के पास नहीं जा सकता था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, अर्थात् अपने वचन को उस देह में, जो वह बनने वाला है, रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में ढाल सकता है, जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को देख और सुन सकता है, और इससे भी बढ़कर, उसके वचन को ग्रहण कर सकता है, और इसके माध्यम से पूरी तरह से बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो कोई भी देह और रक्त से युक्त मनुष्य ऐसे बड़े उद्धार को प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया गया होता। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों के बीच सीधे तौर पर काम करता, तो पूरी मानवजाति खत्म हो जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाकर ले जाई गई होती। प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, उसे यीशु की देह के माध्यम से छुटकारा देने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु भ्रष्ट शैतानी स्वभाव फिर भी मनुष्य के भीतर रह गया। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है, जिन्हें पाप से छुटकारा दिया गया था। इसे इसलिए किया जा रहा है, ताकि जिन्हें क्षमा किया गया था, उन्हें उनके पापों से मुक्त किया जा सके और पूरी तरह से शुद्ध बनाया जा सके, और वे एक परिवर्तित स्वभाव प्राप्त करके शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य को पूरी तरह से पवित्र किया जा सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार का कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों तक जारी है, जब वह मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करते हुए मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध कर देगा। केवल तभी परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देह बना। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही मनुष्यों के जीवन में उनकी अगुआई करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देह बनकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के दुःख का अनुभव कर सकता है, और एक सामान्य देह में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह मनुष्यों को उस व्यावहारिक मार्ग की आपूर्ति कर सकता है, जिसकी उन्हें एक सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। क्योंकि शरीरी होने के कारण मनुष्य के पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, और उस तक पहुँचने का उपाय तो बिलकुल भी नहीं है। मनुष्य केवल परमेश्वर के देहधारी स्वरूप के संपर्क में ही आ सकता है, और केवल इस माध्यम से ही सभी मार्गों और सभी सत्यों को समझने में सक्षम हो सकता है, और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकता है। दूसरा देहधारण मनुष्य का पापों से पीछा छुड़ाने और उसे पूरी तरह से पवित्र करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा। उसके बाद देह में परमेश्वर का काम पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद वह अपने कार्य के लिए तीसरी बार देह नहीं बनेगा, क्योंकि उसका संपूर्ण प्रबंधन समाप्त हो गया होगा। अंत के दिनों के उसके देहधारण ने अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा, और अंत के दिनों में मनुष्यों को प्रकार के अनुसार विभाजित कर दिया गया होगा। वह तब उद्धार का कार्य नहीं करेगा और न ही कोई कार्य को करने के लिए देह में लौटेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 117

जो कुछ मनुष्य ने अब प्राप्त किया है—अपनी वर्तमान कद-काठी, ज्ञान, प्रेम, वफादारी, आज्ञाकारिता और अंतर्दृष्टि—ये ऐसे परिणाम हैं, जिन्हें वचन के न्याय के माध्यम से प्राप्त किया गया है। तुम जो वफादारी रखने में और आज तक खड़े रहने में समर्थ हो, यह वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है, और इसमें बहुत-कुछ ऐसा है, जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, और वे रहस्य और चमत्कार हैं। इसलिए बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे अनजाने ही पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं, और वे जाँच करने या कुछ और कहने का उपक्रम नहीं करते; मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के न्याय के अधीन दंडवत् पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे बात करता, तो समस्त मानवजाति उस वाणी के प्रति समर्पित हो जाती, प्रकाशन के वचनों के बिना नीचे गिर जाती, बिलकुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर इसी तरीके से काम करता रहता, तो मनुष्य वचन के न्याय के माध्यम से अपनी भ्रष्टता को जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ न होता। केवल देह बनकर ही परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को हर मनुष्य के कानों तक पहुँचा सकता है, ताकि वे सभी, जिनके पास कान हैं, उसके वचनों को सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय के कार्य को प्राप्त कर सकें। मनुष्य को समर्पण हेतु डराने के लिए पवित्रात्मा के प्रकटन के बजाय यह केवल उसके वचन के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है। केवल इस व्यावहारिक और असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव को, जो अनेक वर्षों से उसके भीतर गहराई में छिपा हुआ है, पूरी तरह से उजागर किया जा सकता है, ताकि मनुष्य उसे पहचान सके और बदलवा सके। ये सब चीज़ें देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य हैं, जिसमें वह एक व्यावहारिक तरीके से बोलकर और न्याय करके वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणाम प्राप्त करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार है और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। इसे देहधारी परमेश्वर के अधिकार को ज्ञात करवाने के लिए, वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किए गए परिणाम ज्ञात करवाने के लिए, और यह ज्ञात करवाने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है और वह वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपना अधिकार प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसका देह एक साधारण और सामान्य मनुष्य का बाहरी रूप है, किंतु उसके वचन से प्राप्त परिणाम मनुष्य को दिखाते हैं कि वह अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह स्वयं परमेश्वर है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से सभी मनुष्यों को दिखाया जाता है कि वह स्वयं परमेश्वर है, कि वह देह बना स्वयं परमेश्वर है, कि किसी के भी द्वारा उसे नाराज़ नहीं किया जाना चाहिए, और कि कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय के परे नहीं हो सकता और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर हावी नहीं हो सकती। मनुष्य उसके देह बना वचन होने के कारण, उसके अधिकार के कारण और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण उसके प्रति पूर्णत: समर्पण करता है। उसके द्वारा धारित देह के द्वारा लाया गया कार्य ही उसका अधिकार है। उसके देह धारण करने का कारण यह है कि देह के पास भी अधिकार हो सकता है, और वह एक व्यावहारिक तरीके से मनुष्यों के बीच इस प्रकार कार्य करने में सक्षम है, जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। यह कार्य परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किए जाने वाले कार्य से कहीं अधिक वास्तविक है, जिसमें समस्त अधिकार है, और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर द्वारा धारित देह एक व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है। उसके देह का बाहरी रूप कोई अधिकार नहीं रखता, और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुँचा जा सकता है, जबकि उसका सार अधिकार वहन करता है, किंतु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है, तो मनुष्य उसके अधिकार के अस्तित्व का पता लगाने में असमर्थ होता है; इससे उसे एक व्यावहारिक प्रकृति का कार्य करने में आसानी होती है। यह समस्त व्यावहारिक कार्य परिणाम प्राप्त कर सकता है। भले ही कोई मनुष्य यह एहसास न करता हो कि परमेश्वर अधिकार रखता है, या यह न देखता हो कि परमेश्वर को नाराज़ नहीं किया जाना चाहिए, या परमेश्वर का कोप न देखता हो, फिर भी वह अपने छिपे हुए अधिकार, अपने छिपे हुए कोप और उन वचनों के माध्यम से, जिन्हें वह खुलकर बोलता है, अपने वचनों के अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज़ के लहजे, उसकी वाणी की कठोरता और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से मनुष्य पूरी तरह से आश्वस्त हो जाता है। इस तरह से, मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण कर देता है, जिसके पास प्रकट रूप में कोई अधिकार नहीं है, जिससे मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण के महत्व का का एक और पहलू है : अधिक यथार्थपरक ढंग से बोलना और अपने वचनों की वास्तविकता को मनुष्य पर प्रभाव डालने देना, ताकि मनुष्य परमेश्वर के वचन का सामर्थ्य देख सके। अतः यदि यह कार्य देहधारण के माध्यम से न किया जाता, तो यह मामूली परिणाम भी प्राप्त न करता और पापियों को पूरी तरह से बचाने में सक्षम न होता। यदि परमेश्वर देह न बना होता, तो वह पवित्रात्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अमूर्त दोनों है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए वह और परमेश्वर दो अलग-अलग दुनिया के हैं और अलग-अलग प्रकृति के हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है, और उनके बीच संबंध स्थापित किए जाने का कोई उपाय ही नहीं है, और इसका तो जिक्र ही क्या करना कि मनुष्य आत्मा नहीं बन सकता। ऐसा होने के कारण, अपना मूल काम करने के लिए परमेश्वर के आत्मा को एक सृजित प्राणी बनना आवश्यक है। परमेश्वर दोनों काम कर सकता है, वह सबसे ऊँचे स्थान पर भी चढ़ सकता है और मनुष्यों के बीच कार्य करने और उनके बीच रहने के लिए अपने आपको विनम्र भी कर सकता है, किंतु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर नहीं चढ़ सकता और पवित्रात्मा नहीं बन सकता, और वह निम्नतम स्थान में तो बिलकुल भी नहीं उतर सकता। इसीलिए अपना कार्य करने हेतु परमेश्वर का देह बनना आवश्यक है। इसी प्रकार, प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दे सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा के पास मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए सीधे देह बन सकता था, किंतु मनुष्य परमेश्वर द्वारा अपने लिए तैयार की गई पापबलि लेने के लिए सीधे स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य द्वारा इस उद्धार को लेने के लिए स्वर्ग में आरोहण करने के बजाय, यही संभव था कि परमेश्वर से कुछ बार स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आने-जाने का आग्रह किया जाए, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था, और इससे भी बढ़कर, वह स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था, और पापबलि तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था, जिसे मनुष्य द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तब यह परम आवश्यकता के कारण होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे संपन्न किया जा सकता, तो वह देहधारी होने का अनादर सहन न करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 118

परमेश्वर इसलिए देहधारी बना क्योंकि उसके कार्य का लक्ष्य शैतान की आत्मा, या कोई अमूर्त चीज़ नहीं, बल्कि मनुष्य है, जो हाड़-माँस का बना है और जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। चूँकि इंसान की देह को भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिए परमेश्वर ने हाड़-माँस के मनुष्य को अपने कार्य का लक्ष्य बनाया है; इसके अतिरिक्त, चूँकि मनुष्य भ्रष्टता का लक्ष्य है, इसलिए परमेश्वर ने उद्धार-कार्य के समस्त चरणों के दौरान मनुष्य को अपने कार्य का एकमात्र लक्ष्य बनाया है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, हाड़-माँस और लहू से बना है, और एकमात्र परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकता है। इस तरह, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए ऐसा देह बनना होगा जिसमें मनुष्य के समान ही गुण हों, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभाव पैदा कर सके। परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए इसलिए देहधारण करना होगा क्योंकि मनुष्य हाड़-माँस से बना है और वह न तो पाप पर विजय पा सकता है और न ही स्वयं को शरीर से अलग कर सकता है। हालाँकि देहधारी परमेश्वर का सार और उसकी पहचान, मनुष्य के सार और पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप-रंग तो मनुष्य के समान ही है; उसका रूप-रंग किसी सामान्य व्यक्ति जैसा है, वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही जीवन जीता है, देखने वाले उसमें और किसी सामान्य व्यक्ति में भेद नहीं कर सकते। यह सामान्य रूप-रंग और सामान्य मानवता उसके लिए सामान्य मानवता में अपना दिव्य कार्य करने हेतु पर्याप्त हैं। इस देह से वह सामान्य मानवता में अपना कार्य कर सकता है, यह देह इंसानों के बीच कार्य करने में उसकी सहायता करता है। इसके अतिरिक्त, सामान्य मानवता इंसानों के बीच उद्धार-कार्य को कार्यान्वित करने में उसकी सहायता करती है। हालाँकि उसकी सामान्य मानवता ने लोगों में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसके सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभदायक है। हालाँकि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं करते, तब भी उसका कार्य परिणाम हासिल कर सकता है, और ये परिणाम उसकी सामान्य मानवता के कारण प्राप्त होते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। देह में उसके कार्य से, मनुष्य उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के बीच उसकी सामान्य मानवता को लेकर मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसका कार्य पूरी तरह से निगल जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने प्राप्त किया है, यानी वह ज्ञान जो मनुष्य को उसके बारे में है, मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। वह देह में जो कार्य करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसका देह हाड़-माँस के इंसान की तरह नहीं है; हालाँकि उनका बाहरी आवरण एक जैसा है, फिर भी सार एक जैसा नहीं है। उसका देह परमेश्वर के बारे में लोगों के बीच कई तरह की धारणाओं को जन्म देता है, फिर भी उसका देह मनुष्य को अधिक ज्ञान भी अर्जित करने दे सकता है, और वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकता है जिसका बाहरी आवरण समान ही है। क्योंकि वह मात्र एक मनुष्य नहीं है, बल्कि मनुष्य जैसे बाहरी आवरण वाला परमेश्वर है, कोई भी पूरी तरह से उसकी गहराई को न तो माप सकता है और न ही उसे समझ सकता है। सभी लोग एक अदृश्य और अस्पृश्य परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसका स्वागत करते हैं। यदि परमेश्वर मात्र एक अदृश्य आत्मा हो, तो परमेश्वर पर विश्वास करना इंसान के लिए बहुत आसान हो जाता है। लोग जैसी चाहे कल्पना कर सकते हैं, अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी आकृति को परमेश्वर की आकृति के रूप में चुन सकते हैं। इस तरह से, लोग बेहिचक वह सब कर सकते हैं जो उनके परमेश्वर को पसंद हो और जो वह उनसे करवाना चाहता हो, इसके अलावा, लोग मानते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनसे ज़्यादा निष्ठावान भक्त और कोई नहीं है, बाकी सब तो अन्य जातियों के कुत्ते हैं, और परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि इसे वे लोग खोजते हैं जिनकी परमेश्वर में आस्था अस्पष्ट और सिद्धान्तों पर आधारित होती है; ऐसे लोगों की खोज कमोबेश एक-सी ही होती है। बात केवल इतनी ही है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वर की छवि अलग-अलग होती हैं, उसके बावजूद उनका सार वास्तव में एक ही होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 119

भ्रष्ट इंसान की आवश्यकताओं के कारण ही देहधारी परमेश्वर देह में आया है। परमेश्वर के समस्त बलिदान और कष्ट मनुष्य की आवश्यकताओं की वजह से हैं, न कि परमेश्वर की आवश्यकताओं के कारण, न ही वे स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए हैं। परमेश्वर के लिए कोई फायदे-नुकसान या प्रतिफल नहीं हैं; परमेश्वर को भविष्य में कोई लाभ नहीं मिलने वाला, बल्कि जो मूल रूप से उसके प्रति बकाया था वह बस वही प्राप्त करेगा। वह इंसान के लिए जो कुछ करता और त्यागता है, इसलिए नहीं है कि वह कोई बड़ा प्रतिफल प्राप्त कर सके, बल्कि यह पूरी तरह इंसान के लिए ही है। हालाँकि देह में परमेश्वर के कार्य से अनेक अकल्पनीय मुश्किलें जुड़ी हैं, फिर भी जिन प्रभावों को वह अंततः प्राप्त करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी कठिनाइयाँ अपरिहार्य हैं, देह वही पहचान धारण नहीं कर सकता जो पवित्रात्मा की होती है, वह आत्मा की तरह अलौकिक कार्य नहीं कर सकता, उसमें आत्मा के समान अधिकार होने का तो सवाल ही नहीं। फिर भी इस मामूली देह के द्वारा किए गए कार्य का सार पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, और यह स्वयं देह ही है जो समस्त मानवजाति की आवश्यकताओं का उत्तर है। क्योंकि जिन्हें बचाया जाना है उनके लिए, पवित्रात्मा का उपयोगिता मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्न है: पवित्रात्मा का कार्य संपूर्ण विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों और महासागरों को समाविष्ट करने में सक्षम है, मगर देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ वो सम्पर्क में आता है। इसके अलावा, स्पर्श-गम्य रूप वाले परमेश्वर के देह को मनुष्य के द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकता है, तथा मनुष्य पर परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का और अधिक गंभीर प्रभाव छोड़ सकता है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है; इसकी थाह पाना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, उनके लिए उसे देख पाना तो और भी मुश्किल है। इसलिए वे मात्र खोखली कल्पनाओं पर ही भरोसा कर सकते हैं। लेकिन देह का कार्य सामान्य है और वास्तविकता पर आधारित है, उसकी बुद्धि कुशाग्र है, और एक ऐसी सच्चाई है जिसे इंसान अपनी आँखों से देख सकता है; इंसान परमेश्वर के कार्य की बुद्धि का अनुभव व्यक्तिगत रूप से कर सकता है, उसके लिए उसे अपनी कल्पना के घौड़े दौड़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य की सटीकता और उसका वास्तविक मूल्य है। पवित्रात्मा केवल उन्हीं कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और जिसकी कल्पना करना उसके लिए कठिन है, उदाहरण के लिए पवित्रात्मा की प्रबुद्धता, पवित्रात्मा का प्रेरित करना, और पवित्रात्मा का मार्गदर्शन, लेकिन समझदार इंसान को इनका कोई स्पष्ट अर्थ समझ में नहीं आता। वे केवल एक चलता-फिरता या एक मोटा-मोटा अर्थ प्रदान करते हैं, और शब्दों से कोई निर्देश नहीं दे पाते। जबकि, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत भिन्न होता है: इसमें वचनों का सटीक मार्गदर्शन होता है, स्पष्ट इच्छा होती है, और उसमें स्पष्ट अपेक्षित लक्ष्य होते हैं। इसलिए इंसान को अँधेरे में भटकने या अपनी कल्पना का उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिलकुल भी आवश्यकता नहीं होती। देह में किया गया कार्य बहुत स्पष्ट होता है, और पवित्रात्मा के कार्य से काफी अलग होता है। पवित्रात्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे में ही उपयुक्त होता है, यह देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। देह का कार्य मनुष्य को पवित्रात्मा के कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक सटीक और आवश्यक लक्ष्य तथा कहीं अधिक वास्तविक, मूल्यवान ज्ञान प्रदान करता है। भ्रष्ट मनुष्य के लिए सबसे अधिक मूल्य रखने वाला कार्य वो है जो सटीक वचन, अनुसरण के लिए स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जिसे देखा या स्पर्श किया जा सके। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल वास्तविक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और दूषित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पूर्व के भ्रष्ट और पथभ्रष्ट स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि पवित्रात्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार ही है, फिर भी इस तरह के कार्य को केवल उसके देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि पवित्रात्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावशाली होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्‍य है। यद्यपि अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, फिर भी जब वह अपना कार्य पूरा करेगा, तो जो लोग उसके विरोधी हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुकूल हैं और उससे अभिन्न हैं। मनुष्य के लिए देह में उसने जो कार्य किया है उसके महत्व को वह मनुष्य को ज्ञात करवाएगा, और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को मनुष्य जानेगा, मनुष्य के जीवन के विकास के लिए उसके वास्तविक मूल्य को जानेगा, और इसके अतिरिक्त, यह जानेगा कि यह देह जीवन का एक जीवंत स्रोत बन जाएगा जिससे अलग होने की बात को मानव सहन नहीं कर सकता। हालाँकि देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर की पहचान और रुतबे से बिल्कुल मेल नहीं खाता, और मनुष्य को परमेश्वर की वास्तविक हैसियत से असंगत प्रतीत होता है, फिर भी यह देह, जो परमेश्वर की असली छवि या परमेश्वर की सच्ची पहचान नहीं दर्शाता, वह कार्य कर सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। ये हैं परमेश्वर के देहधारण के असली मायने और मूल्य, इस महत्व और मूल्य को इंसान न तो समझ पाता है और न ही स्वीकार कर पाता है। यद्यपि सभी लोग परमेश्वर के आत्मा का आदर करते हैं और परमेश्वर के देह का तिरस्कार करते हैं, फिर भी इस बात पर ध्यान न देते हुए कि वे क्या सोचते या देखते हैं, देह के वास्तविक मायने और मूल्य पवित्रात्मा से बहुत बढ़कर हैं। निस्संदेह, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के संबंध में है। चूँकि हर कोई जो सत्य की खोज करता है और परमेश्वर के प्रकटन की लालसा रखता है, उसके लिए पवित्रात्मा का कार्य केवल दिल को छू सकता या प्रेरणा प्रदान कर सकता है, अद्भुतता की समझ प्रदान कर सकता है जो बताती है कि यह अवर्णनीय और अकल्पनीय है, और एक बोध प्रदान कर सकता है जो बताता है कि यह महान, ज्ञानातीत, और प्रशंसनीय है, मगर सभी के लिए अलभ्य और अप्राप्य भी है। मनुष्य और परमेश्वर का आत्मा एक-दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो उनके बीच बहुत दूरी हो, और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते, मानो मनुष्य और परमेश्वर किसी अदृश्य विभाजन रेखा द्वारा अलग कर दिए गए हों। वास्तव में, यह पवित्रात्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक मायाजाल है, जो इसलिए है क्योंकि पवित्रात्मा और मनुष्य दोनों एक ही प्रकार के नहीं हैं, दोनों एक ही संसार में कभी साथ नहीं रह सकते, और क्योंकि पवित्रात्मा में मनुष्य का कुछ भी नहीं है। इसलिए मनुष्य को पवित्रात्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पवित्रात्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है। देह का कार्य मनुष्य को खोज करने के लिए वास्तविक लक्ष्य, स्पष्ट वचन, और यह समझ प्रदान करता है कि परमेश्वर वास्तविक, सामान्य, विनम्र और साधारण है। यद्यपि मनुष्य उसका भय मान सकता है, फिर भी अधिकांश लोगों के लिए उससे सम्बन्ध रखना आसान है : मनुष्य उसका चेहरा देख सकता है, उसकी आवाज़ सुन सकता है, इंसान को उसे दूर से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह इंसान को सुगम्य लगता है, दूर या अथाह नहीं, बल्कि दृश्य और स्पर्शगम्य महसूस होता है, क्योंकि यह देह मनुष्य के समान इसी संसार में है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 120

जो लोग देह में जीवन बिताते हैं उन सभी के लिए, अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए ऐसे लक्ष्यों की आवश्यकता होती है जिनका अनुसरण किया जा सके, और परमेश्वर को जानने के लिए आवश्यक है परमेश्वर के वास्तविक कर्मों एवं वास्तविक चेहरे को देखना। दोनों को सिर्फ परमेश्वर के देहधारी रूप से ही प्राप्त किया जा सकता है, दोनों को सिर्फ साधारण और वास्तविक देह से ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण ज़रूरी है, और इसीलिए पूरी तरह से भ्रष्ट मनुष्यजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अस्पष्ट और अलौकिक परमेश्वरों की छवि को उनके हृदय से दूर हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करें, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभाव को पहचानना चाहिए। यदि लोगों के हृदय से अस्पष्ट परमेश्वरों की छवि को हटाने का कार्य केवल मनुष्य करे, तो वह उपयुक्त प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के हृदय से अस्पष्ट परमेश्वर की छवि को केवल वचनों से उजागर, दूर या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता। ऐसा करने से, अंततः इन गहरी समाई चीज़ों को लोगों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल इन अस्पष्ट और अलौकिक चीज़ों की जगह व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की सच्ची छवि को रख कर, और लोगों को धीरे-धीरे इन्हें ज्ञात करवा कर ही उचित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को एहसास होता है कि जिस परमेश्वर को वह पहले से खोजता रहा है वह अस्पष्ट और अलौकिक है। पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई इस प्रभाव को प्राप्त नहीं कर सकती, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि देहधारी परमेश्वर की शिक्षाएँ ऐसा कर सकती हैं। मनुष्य की धारणाएँ तब उजागर होती हैं जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और वास्तविकता मनुष्य की कल्पना के अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वर से विपरीत हैं। मनुष्य की मूल धारणाएँ तो तभी उजागर हो सकती हैं जब उनकी देहधारी परमेश्वर से तुलना की जाये। देहधारी परमेश्वर से तुलना के बिना, मनुष्य की धारणाओं को उजागर नहीं किया जा सकता; दूसरे शब्दों में, वास्तविकता की विषमता के बिना अस्पष्ट चीज़ों को उजागर नहीं किया जा सकता। इस कार्य को करने के लिए कोई भी वचनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी वचनों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है, अन्य कोई उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता। मनुष्य की भाषा कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने स्वरूप को पूरी तरह से प्रकट करे, तभी मनुष्य अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। इस प्रभाव को कोई हाड़-माँस का इंसान प्राप्त नहीं कर सकता। निस्संदेह, परमेश्वर का आत्मा भी इस प्रभाव को प्राप्त करने में असमर्थ है। परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है, परन्तु इस कार्य को सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा सकता; इसे केवल उस देह के द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा पहनता है, अर्थात् देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है। यह देह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, यह एक सामान्य मानवता धारण किए हुए मनुष्य है और दिव्यता धारण किए हुए परमेश्वर भी है। और इसलिए, हालाँकि यह देह परमेश्वर का आत्मा नहीं है, और पवित्रात्मा से बिल्कुल भिन्न है, फिर भी वह देहधारी स्वयं परमेश्वर है जो मनुष्य को बचाता है, जो पवित्रात्मा है और देह भी है। उसे किसी भी नाम से पुकारो, आखिर वह है स्वयं परमेश्वर ही जो मनुष्यजाति को बचाता है। क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह से अविभाज्य है, और देह का कार्य भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है; अंतर बस इतना ही है कि इस कार्य को पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं किया जाता, बल्कि देह की पहचान का उपयोग करके किया जाता है। सीधे तौर पर पवित्रात्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य में देहधारण की आवश्यकता नहीं होती, और जिस कार्य को करने के लिए देह की आवश्यकता होती है उसे पवित्रात्मा द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है। इस कार्य के लिए इसी की आवश्यकता होती है, और भ्रष्ट इंसान को भी इसी की आवश्यकता है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में, पवित्रात्मा द्वारा केवल एक ही चरण सीधे तौर पर सम्पन्न किया गया था, और शेष दो चरणों को देहधारी परमेश्वर द्वारा सम्पन्न किया जाता है, न कि सीधे पवित्रात्मा द्वारा। पवित्रात्मा द्वारा व्यवस्था के युग में किए गए कार्य में मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल नहीं था, और न ही इसका परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान से कोई सम्बन्ध था। हालाँकि, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में परमेश्वर के देह के कार्य में, मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान शामिल है, और उद्धार के कार्य का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा है। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार और प्रत्यक्ष कार्य की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को इस बात की आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसे समर्थन दे, उसका सिंचन और पोषण करे, उसका न्याय करे, उसे ताड़ना दे। उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देह में प्रकट परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, उसका चरवाहा, उसकी हर वक्त मौजूद सहायता बन सकता है, और यह सब वर्तमान और अतीत दोनों के ही देहधारण की आवश्यकताएँ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 121

मनुष्य को शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, मनुष्य ही परमेश्वर के जीवधारियों में श्रेष्ठतम है, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है। परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, शैतान नहीं, और जिसे बचाया जाएगा वह मनुष्य की देह और आत्मा है, शैतान नहीं। शैतान परमेश्वर के विनाश का लक्ष्य है और मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य है। मनुष्य के देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, इसलिए सबसे पहले मनुष्य की देह को ही बचाया जाएगा। मनुष्य की देह को इतना ज़्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है कि वह परमेश्वर का इस हद तक विरोध करती है कि वह खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध कर बैठती है और उसके अस्तित्व को ही नकारती है। यह भ्रष्ट देह बेहद अड़ियल है, देह के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने और उसे परिवर्तित करने से ज़्यादा कठिन और कुछ भी नहीं। शैतान परेशानियाँ खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह में आता है, और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने और उसकी योजना को बाधित करने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। इस प्रकार इंसान शैतान बनकर परमेश्वर का शत्रु हो गया है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पानी होगी। इसी चुनौती से निपटने के लिए परमेश्वर जो कार्य करने का इरादा रखता है, उसकी खातिर देह में आता है और शैतान के साथ युद्ध करता है। उसका उद्देश्य भ्रष्ट मनुष्य का उद्धार, शैतान की पराजय और उसका विनाश है, जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। परमेश्वर मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के माध्यम से शैतान को पराजित करता है, और साथ ही भ्रष्ट मनुष्यजाति को भी बचाता है। इस प्रकार, यह एक ऐसा कार्य है जो एक ही समय में दो लक्ष्यों को प्राप्त करता है। इंसान के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने और उस पर विजय पाने के लिए वह देह में रहकर कार्य करता है, देह में रहकर बात करता है और देह में रहकर समस्त कार्यों की शुरुआत करता है। अंतिम बार जब परमेश्वर देहधारण करेगा, तो अंत के दिनों के उसके कार्य को देह में पूरा किया जाएगा। वह सभी मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करेगा, अपने सम्पूर्ण प्रबंधन को समाप्त करेगा, और साथ ही देह में अपने समस्त कार्यों को भी पूरा करेगा। पृथ्वी पर उसके सभी कार्यों के समाप्त हो जाने के बाद, वह पूरी तरह से विजयी हो जाएगा। देह में कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्यजाति को पूरी तरह से जीत लेगा और उसे प्राप्त कर लेगा। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका समस्त प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा? शैतान को पूरी तरह से हराने और विजयी होने के बाद, जब परमेश्वर देह में अपने कार्य का समापन करेगा, तो शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने का फिर और कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर के प्रथम देहधारण का कार्य छुटकारा और मनुष्य के पापों को क्षमा करना था। अब यह मनुष्यजाति को जीतने और पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य है, ताकि शैतान के पास अपना कार्य करने का कोई मार्ग न बचेगा, और वह पूरी तरह से हार चुका होगा, और परमेश्वर पूरी तरह से विजयी हो चुका होगा। यह देह का कार्य है, और स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 122

परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के शुरुआती कार्य को सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा किया गया था, देह के द्वारा नहीं। लेकिन, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अंतिम कार्य देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाता है, पवित्रात्मा द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जाता। मध्यवर्ती चरण का छुटकारे का कार्य भी देह में परमेश्वर के द्वारा किया गया था। समस्त प्रबंधन कार्य के दौरान, सबसे महत्वपूर्ण कार्य शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचाना है। मुख्य कार्य भ्रष्ट मनुष्य पर सम्पूर्ण विजय है, इस प्रकार जीते गए मनुष्य के हृदय में परमेश्वर के प्रति मूल श्रद्धा बहाल करना, और उसे एक सामान्य जीवन, यानी परमेश्वर के एक प्राणी का सामान्य जीवन प्राप्त करने देना है। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रबंधन कार्य का मूल है। उद्धार के कार्य के तीन चरणों में, व्यवस्था के युग का प्रथम चरण प्रबंधन कार्य के मूल से काफी दूर था; इसमें उद्धार के कार्य का केवल हल्का-सा आभास था, यह शैतान के अधिकार क्षेत्र से मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य का आरम्भ नहीं था। कार्य का पहला चरण सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा किया गया था क्योंकि, व्यवस्था के अन्तर्गत, मनुष्य केवल व्यवस्था का पालन करना जानता था, उसके अंदर अधिक सत्य नहीं था, और चूँकि व्यवस्था के युग के कार्य में मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करना शामिल नहीं था, वह मनुष्य को शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बचाने के कार्य से तो और भी संबंधित नहीं था। इस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने कार्य के इस अत्यंत सरल चरण को पूरा किया था जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं था। प्रबंधन के मूल से इस चरण के कार्य का कोई संबंध नहीं था, इसका मनुष्य के उद्धार के आधिकारिक कार्य से कोई बड़ा संबंध नहीं था, और इसलिए निजी तौर पर इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को देहधारण करने की आवश्यकता नहीं थी। पवित्रात्मा द्वारा किया गया कार्य अप्रत्यक्ष और अथाह है, यह मनुष्य के लिए भयावह और अगम्य है; पवित्रात्मा उद्धार के कार्य को करने और मनुष्य को सीधे तौर पर जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त नहीं है। मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है पवित्रात्मा के कार्य को ऐसे उपमार्ग में रूपान्तरित करना जो मनुष्य के करीब हो, यानी जो मनुष्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है वह यह है कि परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए एक साधारण, सामान्य व्यक्ति बन जाए। इसके लिए आवश्यक है कि पवित्रात्मा के कार्य का स्थान लेने के लिए परमेश्वर देहधारण करे, और मनुष्य के लिए, कार्य करने हेतु परमेश्वर के पास इससे अधिक उपयुक्त मार्ग नहीं है। कार्य के इन तीन चरणों में से, दो चरणों को देह के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, और ये दो चरण प्रबंधन कार्य की मुख्य अवस्थाएँ हैं। दो देहधारण परस्पर पूरक हैं और एक दूसरे की बढ़िया ढंग से अनुपूर्ति भी करते हैं। परमेश्वर के देहधारण के प्रथम चरण ने द्वितीय चरण की नींव डाली, ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दोनों देहधारण एक पूर्ण इकाई बनाते हैं, और एक-दूसरे से असंगत नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इन दो चरणों को परमेश्वर द्वारा अपनी देहधारी पहचान में कार्यान्वित किया जाता है क्योंकि वे समस्त प्रबंधन के कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लगभग ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दो देहधारणों के कार्य के बिना, समस्त प्रबंधन कार्य थम गया होता, और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य खोखली बातों के सिवाय और कुछ न होता। यह कार्य महत्वपूर्ण है या नहीं, यह मनुष्यजाति की आवश्यकताओं, उसकी कलुषता की वास्तविकता, शैतान की अवज्ञा की गंभीरता और कार्य में उसके व्यवधान पर आधारित है। कार्य करने में सक्षम सही व्यक्ति को कार्यकर्ता द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति, और कार्य के महत्व पर निर्दिष्ट किया जाता है। जब इस कार्य के महत्व की बात आती है कि इस सम्बन्ध में कार्य के कौन से तरीके को अपनाया जाए—परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया गया कार्य, या देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य, या मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य—तो सबसे पहले इंसान के माध्यम से किए गए कार्य को हटाया जाता है, और फिर कार्य की प्रकृति, पवित्रात्मा के कार्य की प्रकृति बनाम देह के कार्य की प्रकृति के आधार पर, अंततः यह निर्णय लिया जाता है कि पवित्रात्मा द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य की अपेक्षा देह के द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के लिए अधिक लाभदायक है और अधिक लाभ प्रदान करता है। जब परमेश्वर ने यह निर्णय लिया कि कार्य पवित्रात्मा के द्वारा किया जाएगा या देह के द्वारा तो उस समय परमेश्वर के मन में यह विचार आया था। कार्य के प्रत्येक चरण का एक अर्थ और एक आधार होता है। वे आधारहीन कल्पनाएँ नहीं होतीं, न ही उन्हें मनमाने ढंग से कार्यान्वित किया जाता है; उनमें एक विशेष बुद्धि होती है। परमेश्वर के समस्त कार्य के पीछे की यह सच्चाई है। विशेष रूप से, ऐसे बड़े कार्य में परमेश्वर की और भी बड़ी योजना होती है क्योंकि देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों के बीच में कार्य कर रहा है। इसलिए, प्रत्येक क्रिया, विचार और मत में परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वरूप की समग्रता प्रतिबिम्बित होती है; यह परमेश्वर का बेहद मूर्त और सुव्यवस्थित स्वरूप है। इंसान के लिए इन गूढ़ विचारों और मतों की कल्पना करना और उन पर विश्वास करना बेहद कठिन है और इन्हें जानना तो और भी कठिन है। इंसान जो काम करता है, वह सामान्य सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, जो उसके लिए अत्यंत संतोषजनक होता है। लेकिन परमेश्वर के कार्य की तुलना में, इसमें बहुत बड़ी असमानता दिखाई देती है; हालाँकि परमेश्वर के कर्म महान होते हैं और उसके कार्य भव्य पैमाने पर होते हैं, फिर भी उनके पीछे अनेक सूक्ष्म और सटीक योजनाएँ और व्यवस्थाएँ होती हैं जो मनुष्य के लिए अकल्पनीय हैं। उसके कार्य का प्रत्येक चरण न केवल सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, बल्कि प्रत्येक चरण में अनेक ऐसी चीज़ें होती हैं जिन्हें मानवीय भाषा में स्पष्टता से व्यक्त नहीं किया जा सकता, और ये चीज़ें इंसान के लिए अदृश्य होती हैं। यह कार्य चाहे पवित्रात्मा का हो या देहधारी परमेश्वर का, प्रत्येक में उसके कार्य की योजनाएँ निहित हैं, वह बिना किसी आधार के कार्य नहीं करता, और निरर्थक कार्य नहीं करता। जब पवित्रात्मा सीधे तौर पर कार्य करता है तो वह उसके लक्ष्यों के अनुसार होता है, और जब वह कार्य करने के लिए मनुष्य बनता है (यानी जब वह अपने बाहरी आवरण को रूपान्तरित करता है), तो उसमें उसका उद्देश्य और भी ज़्यादा निहित होता है। अन्यथा वह इतनी तत्परता से अपनी पहचान क्यों बदलेगा? वह इतनी तत्परता से ऐसा व्यक्ति क्यों बनेगा जिसे निकृष्ट माना जाता है और जिसे यातना दी जाती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 123

देह में उसका कार्य बहुत सार्थक है, यह कार्य के सम्बन्ध में कहा जाता है, और अंततः देहधारी परमेश्वर ही कार्य का समापन करता है, पवित्रात्मा नहीं। कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर किसी अनजान समय पृथ्वी पर आकर लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह व्यक्तिगत रूप से संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, एक-एक करके सबकी परीक्षा लेगा, कोई भी नहीं छूटेगा। जो लोग इस ढंग से सोचते हैं, वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर एक-एक करके मनुष्य का न्याय नहीं करता, एक-एक करके उनकी परीक्षा नहीं लेता; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या पूरी मनुष्यजाति का सार समान नहीं है? न्याय किया जाता है इंसान के भ्रष्ट सार का, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसानी सार का, और इंसान के सारे पापों का। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता। न्याय का कार्य निरूपक है, और किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता। बल्कि यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करके, इस कार्य का उपयोग संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है, जिसके बाद यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य ऐसा ही है। परमेश्वर किसी व्यक्ति-विशेष या लोगों के किसी समूह-विशेष का न्याय नहीं करता, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है—उदाहरण के लिए, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या उसके प्रति मनुष्य का अनादर, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान इत्यादि। जिसका न्याय किया जाता है वो है इंसान का परमेश्वर-विरोधी सार, और यह कार्य अंत के दिनों का विजय-कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिनकी गवाही इंसान देता है, वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसकी कल्पना इंसान के द्वारा अतीत में की गई थी। देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और उसका कार्य, उसका वचन और उसका समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि उसके कार्य का दायरा सीमित है, और उसमें सीधे तौर पर संपूर्ण विश्व शामिल नहीं है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—यह कार्य केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए नहीं, न ही यह थोड़े-से लोगों के लिए है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य के दायरे में संपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है, फिर भी यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे में उस कार्य को समाप्त कर लेगा तो उसके बाद, वह तुरन्त ही इस कार्य को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी तरह से फैला देगा जैसे यीशु के पुनरूत्थान और आरोहण के बाद उसका सुसमाचार सारी दुनिया में फैल गया था। चाहे यह पवित्रात्मा का कार्य हो या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे में किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों में, परमेश्वर देहधारी रूप में प्रकट होकर अपना कार्य करता है, और देहधारी परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। चाहे वह आत्मा हो या देह, जो न्याय का कार्य करता है वही ऐसा परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके कार्य के आधार पर परिभाषित किया जाता है, न कि उसके बाहरी रंग-रूप या दूसरी बातों के आधार पर। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, लेकिन कोई भी देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता। इंसान चाहे कुछ भी सोचे, मगर तथ्य आखिरकार तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि "कार्य परमेश्वर द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।" यह बकवास है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय और कोई नहीं कर सकता। चूँकि इस कार्य को पहले ही पूरा किया जा चुका है, इसलिए इस कार्य के बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रकट नहीं होगा; अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण प्रबंधन के समस्त कार्य का समापन कर लिया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान की आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, इसलिए न्याय का कार्य आध्यात्मिक संसार में कार्यान्वित नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 124

मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता। इसके अतिरिक्त, ऐसे कार्य को स्वीकार करना मनुष्य के लिए कठिन होता है, क्योंकि पवित्रात्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है, और इस वजह से, प्रभाव तत्काल नहीं होते, और मनुष्य परमेश्वर के अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को साफ-साफ देखने में बिलकुल भी सक्षम नहीं होता। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। मनुष्य के समान सामान्य मानवता धारण करने वाला बन कर ही, देह में प्रकट परमेश्वर सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसकी असाधारणता का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। पवित्रात्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि पवित्रात्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य की समस्त अवज्ञा का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी पवित्रात्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए पवित्रात्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। अपने प्रति मनुष्य की धारणाओं और विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति की सारी अवज्ञा का खुलासा करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को पवित्रात्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। देहधारी परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में, मनुष्य विरोध से आज्ञाकारिता की ओर, उत्पीड़न से स्वीकृति की ओर, धारणा से ज्ञान की ओर, और तिरस्कार से प्रेम की ओर प्रगति करता है—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह पवित्रात्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य महानतम और बेहद गंभीर कार्य है, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अति महत्वपूर्ण भाग देहधारण के कार्य के दो चरण हैं। इंसान की भयंकर भ्रष्टता देहधारी परमेश्वर के कार्य में एक बड़ी बाधा है। विशेष रूप से, अंत के दिनों के लोगों पर किया गया कार्य बहुत ही कठिन है, परिवेश शत्रुतापूर्ण है, और हर प्रकार के लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है। फिर भी इस कार्य के अंत में, यह बिना किसी त्रुटि के उचित प्रभाव ही प्राप्त करेगा; यह देह के कार्य का प्रभाव है, और यह प्रभाव पवित्रात्मा के कार्य की तुलना में अधिक प्रेरक है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का समापन देह में किया जाएगा, और इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा ही पूरा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे निर्णायक कार्य देह में किया जाता है, और मनुष्य का उद्धार व्यक्तिगत रूप से देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए। हर इंसान को यही लगता है कि देहधारी परमेश्वर इंसान से संबंधित नहीं है, जबकि सच्चाई यह है कि देह पूरी मनुष्यजाति की नियति और अस्तित्व से सम्बन्धित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 125

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का कार्यान्वयन पूरी मनुष्यजाति के लिए किया जाता है, और उसका लक्ष्य मानवजाति ही है। यद्यपि उसका कार्य देह में है, फिर भी यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिये है; वह संपूर्ण मनुष्यजाति का परमेश्वर है, वह सभी सृजित और गैर-सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। यद्यपि देह में उसका कार्य एक सीमित दायरे के भीतर है, और इस कार्य का लक्ष्य भी सीमित है, लेकिन जब भी वह कार्य करने के लिए देहधारण करता है तो कार्य का एक लक्ष्य चुनता है जो अत्यंत निरूपक होता है; वह अपने कार्य के लिए सामान्य और मामूली लोगों के समूह को नहीं चुनता, बल्कि कार्य के लक्ष्य के रूप में ऐसे लोगों के समूह को चुनता है जो देह में उसके कार्य के प्रतिनिधि होने में सक्षम हों। वह ऐसे लोगों के समूह को इसलिए चुनता है क्योंकि देह में उसके कार्य का दायरा सीमित होता है, और इसे विशेष रूप से उसके देह के लिए तैयार किया गया है, और इसे विशेष रूप से देह में उसके कार्य के लिए चुना गया है। परमेश्वर का अपने कार्य के लक्ष्यों का चयन बेबुनियाद नहीं होता, बल्कि सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है : कार्य का लक्ष्य देहधारी परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक होना चाहिए, और उसे सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व करने लायक होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यीशु के व्यक्तिगत छुटकारे को स्वीकार करने में यहूदी सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, और देहधारी परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने में चीनी लोग सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यहूदियों द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यजाति के प्रतिनिधित्व का एक आधार है, और परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने में चीनियों द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यजाति के प्रतिनिधित्व का भी एक आधार है। यहूदियों के बीच किए गए छुटकारे के कार्य से अधिक और कोई चीज़ छुटकारे के महत्व को प्रकट नहीं करती, और चीनी लोगों के बीच किए जा रहे विजय-कार्य से अधिक अन्य कोई भी चीज़ विजय-कार्य की सम्पूर्णता और सफलता को प्रकट नहीं करती। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन लोगों के एक छोटे से समूह पर ही लक्षित प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में, इस छोटे समूह के बीच उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्य है, और उसका वचन समस्त मनुष्यजाति के लिए है। देह में उसका कार्य समाप्त हो जाने के बाद, जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे उस कार्य को फैलाना शुरू कर देंगे जो उसने उनके बीच किया है। देह में उसके कार्य के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वह उन लोगों के लिए सटीक वचन, उपदेश और मनुष्यजाति के लिए अपनी विशिष्ट इच्छा को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा को अत्यधिक सटीकता से, ठोस तरीके से उन लोगों तक पहुँचा सकें जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। मनुष्यों के बीच केवल देहधारी परमेश्वर का कार्य ही सही अर्थों में परमेश्वर के मनुष्य के साथ रहने और उसके साथ जीने के सच को पूरा करता है। केवल यही कार्य परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य की गवाही देने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग का अंत करता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही वह अज्ञात परमेश्वर में मनुष्यजाति के विश्वास करने के युग को भी समाप्त करता है। विशेष रूप से, अंतिम देहधारी परमेश्वर का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुंदर है। वह केवल व्यवस्था और सिद्धान्त के युग का ही अंत नहीं करता; बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो वास्तविक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य का खुलासा करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया और प्रबंधन कार्य को अंजाम तक पहुँचाता है, और जिसने हज़ारों वर्षों तक खुद को छिपा कर रखा है। वह अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, वह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर का चेहरा खोजना तो चाहती थी मगर खोज नहीं पायी, वह उस युग का अंत करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और एक पूर्णतया नए युग में संपूर्ण मनुष्यजाति की अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। जब परमेश्वर अपने देह में कार्य करता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे उन चीज़ों को खोजते और टटोलते नहीं हैं जो विद्यमान और अविद्यमान दोनों प्रतीत होती हैं, और वे अस्पष्ट परमेश्वर की इच्छा का अंदाज़ा लगाना बंद कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उसके द्वारा देह में किए गए कार्य को सभी धर्मों और पंथों में आगे बढ़ाएँगे, और वे उसके सभी वचनों को संपूर्ण मनुष्यजाति के कानों तक पहुँचाएँगे। उसके सुसमाचार को प्राप्त करने वाले जो सुनेंगे, वे उसके कार्य के तथ्य होंगे, ऐसी चीज़ें होंगी जो मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखी और सुनी गई होंगी, और तथ्य होंगे, अफ़वाह नहीं। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनसे वह कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे साधन भी हैं जिन्हें वह कार्य को फैलाने में उपयोग करता है। बिना तथ्यों के उसका सुसमाचार सभी देशों और सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; बिना तथ्यों के केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के सहारे, वह कभी भी संपूर्ण ब्रह्माण्ड पर विजय नहीं पा सकेगा। पवित्रात्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य और अदृश्य है, और पवित्रात्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के किसी और प्रमाण या तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के असली चेहरे को कभी नहीं देख पाएगा, वह हमेशा ऐसे अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करेगा जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। मनुष्य कभी भी परमेश्वर के मुख को नहीं देखेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों को कभी सुन पाएगा। आखिर, मनुष्य की कल्पनाएँ खोखली होती हैं, वे परमेश्वर के असली चेहरे का स्थान कभी नहीं ले सकतीं; मनुष्य परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं कर सकता। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। परमेश्वर के लिए मनुष्य के सामने प्रकट होने का यही सबसे आदर्श तरीका है, जिसमें मनुष्य परमेश्वर को देखता है और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने लगता है। इसे कोई गैर-देहधारी परमेश्वर संपन्न नहीं कर सकता। इस चरण तक अपने कार्य को कार्यान्वित कर लेने के बाद, परमेश्वर के कार्य ने पहले ही इष्टतम प्रभाव प्राप्त कर लिया है, और पूरी तरह सफल रहा है। देह में परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य ने पहले ही उसके संपूर्ण प्रबंधन के कार्य का नब्बे प्रतिशत पूरा कर लिया है। इस देह ने उसके समस्त कार्य को एक बेहतर शुरूआत और एक संक्षिप्त रूप प्रदान किया है, उसके समस्त कार्य की घोषणा की है, और इस समस्त कार्य के लिए पूरी तरह से अंतिम भरपाई की है। इसके बाद, परमेश्वर के कार्य के चौथे चरण को करने के लिए अन्य कोई देहधारी परमेश्वर नहीं होगा, और परमेश्वर के तीसरे देहधारण का कभी कोई चमत्कारी कार्य नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 126

देह में परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण संपूर्ण युग के उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, मनुष्य के काम की तरह किसी समय-विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए उसके अंतिम देहधारण के कार्य के अन्त का यह अर्थ नहीं है कि उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो गया है, क्योंकि देह में उसका कार्य संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और केवल उसी समयावधि का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता है जिसमें वह देह में कार्य करता है। बात बस इतनी है कि जब वह देह में होता है तब उस दौरान समूचे युग के अपने कार्य को पूरा करता है, उसके पश्चात् यह सभी स्थानों में फैल जाता है। देहधारी परमेश्वर अपनी सेवकाई को पूरा करने के बाद, अपने भविष्य के कार्य को उन्हें सौंप देगा जो उसका अनुसरण करते हैं। इस तरह, संपूर्ण युग का उसका कार्य अखंड रूप से चलता रहेगा। देहधारण के संपूर्ण युग का कार्य केवल तभी पूर्ण माना जाएगा जब यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड में पूरी तरह से फैल जाएगा। देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नये विशेष युग का आरम्भ करता है, और उसके कार्य को जारी रखने वाले वे लोग हैं जिनका उपयोग परमेश्वर करता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के भीतर होता है, वह इस दायरे के परे नहीं जा सकता। यदि देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए न आता, तो मनुष्य पुराने युग को समाप्त कर, नए युग की शुरुआत नहीं कर पाता। मनुष्य द्वारा किया गया कार्य मात्र उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से करना संभव है, वह परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता। केवल देहधारी परमेश्वर ही आकर उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, उसके अलावा, इस कार्य को उसकी ओर से और कोई नहीं कर सकता। निस्संदेह, मैं देहधारण के कार्य के सम्बन्ध के बारे में बात कर रहा हूँ। यह देहधारी परमेश्वर पहले कार्य के एक कदम को कार्यान्वित करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, उसके बाद वह और कार्य करता है, वह भी मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता। कार्य का लक्ष्य मनुष्य पर विजय पाना है। एक लिहाज से, परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, जिसके अतिरिक्त वह और भी अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, और इसलिए मनुष्य उसके बारे में और भी अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपना लेता है। वह उन लोगों के बीच विजय-कार्य करता है जिनकी उसके प्रति अनेक धारणाएँ होती हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि वे किस प्रकार उससे व्यवहार करते हैं, एक बार जब वह अपनी सेवकाई पूरी कर लेगा, तो सभी लोग उसके प्रभुत्व में आ चुके होंगे। इस कार्य का तथ्य न केवल चीनी लोगों के बीच प्रतिबिम्बित होता है, बल्कि यह इस बात का प्रतिनिधित्व भी करता है कि किस प्रकार सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीता जाएगा। इन लोगों पर हासिल किए गए प्रभाव उन प्रभावों के अग्रगामी हैं जो संपूर्ण मनुष्यजाति पर प्राप्त किए जाएँगे, और जो कार्य वह भविष्य में करेगा उसके प्रभाव, इन लोगों पर प्रभावों से भी कहीं बढ़कर होंगे। देहधारी परमेश्वर के कार्य में कोई तामझाम नहीं होता, न ही यह धुँधलेपन में घिरा होता है। यह असली और वास्तविक होता है, और यह ऐसा कार्य है जिसमें एक और एक दो होते हैं। यह न तो किसी से छिपा होता है, न ही किसी को धोखा देता है। लोग वास्तविक और विशुद्ध चीजें देखते हैं, वास्तविक सत्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं। कार्य समाप्त होने पर, इंसान के पास परमेश्वर के बारे में नया ज्ञान होगा, और जो लोग सच्चे खोजी हैं, उनके अंदर उसके बारे में कोई धारणाएँ नहीं होंगी। यह सिर्फ चीनी लोगों पर उसके कार्य का प्रभाव नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीतने में उसके कार्य के प्रभाव को भी दर्शाता है, क्योंकि इस देह, इस देह के कार्य, और इस देह की हर एक चीज़ की तुलना में कोई भी चीज़ सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय पाने के कार्य के लिए अधिक लाभदायक नहीं है। वे आज उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं, और भविष्य में भी उसके कार्य के लिए लाभदायक होंगे। यह देह संपूर्ण मनुष्यजाति को जीत लेगा और उसे प्राप्त कर लेगा। ऐसा कोई बेहतर कार्य नहीं है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर को देखे, उसका आज्ञापालन करे और उसे जाने। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र एक सीमित दायरे को दर्शाता है, और जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह किसी व्यक्ति-विशेष से बात नहीं करता, बल्कि उन सारे लोगों से बात करता है जो उसके वचनों को स्वीकार करते हैं। वह जिस अन्त की घोषणा करता है वह पूरी मानवजाति का अन्त है, सिर्फ किसी व्यक्ति-विशेष का अन्त नहीं है। वह किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता, न ही किसी को सताता है, वह सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिए कार्य करता है और उससे बात करता है। इस देहधारी परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया है, उसका न्याय कर दिया है, और उपयुक्त मंज़िल की व्यवस्था कर दी है। भले ही परमेश्वर सिर्फ चीन में ही कार्य करता है, लेकिन वास्तव में, उसने तो पहले से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का समाधान कर चुका है। अपने कथनों और व्यवस्थाओं को चरणबद्ध तरीके से कार्यांवित करने से पहले, वह इसकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि उसका कार्य समस्त मनुष्यजाति में फैल जाए। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? अब वह भविष्य के कार्य को पहले से ही पूरा कर सकता है। क्योंकि जो कार्य कर रहा है वही एकमात्र देहधारी परमेश्वर है, वह सीमित दायरे में असीमित कार्य कर रहा है, उसके बाद वह इंसान से वह काम करवाएगा जो इंसान को करना चाहिए; यह उसके कार्य का सिद्धान्त है। वह इंसान के साथ केवल थोड़े समय तक ही रह सकता है, वह उसके साथ पूरे युग का कार्य समाप्त होने तक नहीं रह सकता। चूँकि वह परमेश्वर है इसलिए पहले ही अपने भविष्य के कार्य की भविष्यवाणी कर देता है। उसके बाद, वह अपने वचनों से पूरी मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करेगा, और मनुष्यजाति उसके वचनों के अनुसार उसके चरणबद्ध कार्य में प्रवेश करेगी। कोई भी बच नहीं पाएगा, सभी को इसके अनुसार अभ्यास करना होगा। इस तरह भविष्य में उसके वचन युग का मार्गदर्शन करेंगे, पवित्रात्मा नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 127

मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भष्ट कर दिया गया है, उसे एकदम अन्धा करके बुरी तरह से नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर देह में आकर निजी तौर पर कार्य इसलिए करता है क्योंकि उसके उद्धार का लक्ष्य हाड़-माँस का इंसान है, और इसलिए भी क्योंकि परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने के लिए शैतान भी मनुष्य की देह का उपयोग करता है। दरअसल, शैतान के साथ युद्ध इंसान पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, इंसान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस तरह, देहधारी परमेश्वर का कार्य आवश्यक है। शैतान के हाथों भ्रष्ट होकर इंसान शैतान का मूर्त रूप बन गया है, परमेश्वर के हाथों हराये जाने का लक्ष्य बन गया है। इस तरह, पृथ्वी पर शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य किया जाता है। इसलिए शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर का मनुष्य बनना आवश्यक है। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पायी जाती है वो इंसान है, वो इंसान जो उसके प्रति अवज्ञाकारी है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है) जो उससे शत्रुता रखता है, और अंतत: जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इस तरह, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजन का हो, ताकि वह शैतान से वास्तविक युद्ध कर सके, समान बाहरी आवरण धारण किए हुए अपने प्रति अवज्ञाकारी और शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाये गये इंसान पर विजय पा सके, उसे बचा सके। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, मनुष्य बनकर उसका कार्य कहीं ज़्यादा आसान हो जाता है। वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और मनुष्य को बचाने में समर्थ है। हालाँकि यह देह सामान्य और वास्तविक है, फिर भी यह मामूली देह नहीं है : यह ऐसी देह नहीं है जो केवल मानवीय हो, बल्कि ऐसी देह है जो मानवीय और दिव्य दोनों है। यही उसमें और मनुष्य में अन्तर है, और यही परमेश्वर की पहचान का चिह्न है। ऐसे ही देह से वह अपेक्षित कार्य कर सकता है, देह में परमेश्वर की सेवकाई को पूरा कर सकता है, और मनुष्यों के बीच में अपने कार्य को पूर्ण कर सकता है। यदि यह ऐसा नहीं होता, तो मनुष्यों के बीच उसका कार्य हमेशा खोखला और त्रुटिपूर्ण होता। यद्यपि परमेश्वर शैतान की आत्मा के साथ युद्ध कर सकता है और विजयी हो सकता है, फिर भी भ्रष्ट हो चुके मनुष्य की पुरानी प्रकृति का समाधान कभी नहीं किया जा सकता, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं और उसका विरोध करते हैं, वे कभी भी उसके प्रभुत्व में नहीं आ सकते, यानी वह कभी भी मनुष्यजाति को जीत कर उसे प्राप्त नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी पर उसके कार्य का समाधान न हो, तो उसका प्रबन्धन कभी समाप्त नहीं होगा, और संपूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगी। यदि परमेश्वर अपने सभी प्राणियों के साथ विश्राम में प्रवेश नहीं कर सके तो ऐसे प्रबंधन-कार्य का कभी भी कोई परिणाम नहीं होगा, और फलस्वरूप परमेश्वर की महिमा विलुप्त हो जाएगी। यद्यपि उसके देह के पास कोई अधिकार नहीं है, फिर भी उसका कार्य अपना प्रभाव प्राप्त कर लेगा। यह उसके कार्य की अनिवार्य दिशा है। उसके देह में अधिकार हो या न हो, अगर वह स्वयं परमेश्वर का कार्य कर पाता है, तो वह स्वयं परमेश्वर है। यह देह कितना भी सामान्य और साधारण क्यों न हो, वह वो कार्य कर सकता है जिसे उसे करना चाहिए, क्योंकि यह देह परमेश्वर है, मात्र मनुष्य नहीं है। यह देह उस कार्य को कर सकता है जिसे मनुष्य नहीं कर सकता क्योंकि उसका आंतरिक सार इंसान से अलग है, वह इंसान को इसलिए बचा सकता है क्योंकि उसकी पहचान किसी भी इंसान से अलग है। यह देह इंसान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि वह इंसान है और उससे भी बढ़कर वह परमेश्वर है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जिसे हाड़-माँस का कोई सामान्य इंसान नहीं कर सकता, क्योंकि वह भ्रष्ट इंसान को बचा सकता है, जो पृथ्वी पर उसके साथ मिलकर रहता है। हालाँकि वह इंसान जैसा ही है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी मूल्यवान व्यक्ति की तुलना में मनुष्यजाति के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक सक्षम है, और मनुष्यजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक समर्थ है। परिणामस्वरूप, यद्यपि यह देह सामान्य और साधारण है, लेकिन मनुष्यजाति के प्रति उसका योगदान और मनुष्यजाति के अस्तित्व के प्रति उसके मायने उसे अत्यंत बहुमूल्य बना देते हैं। इस देह का वास्तविक मूल्य और मायने किसी भी इंसान के लिए विशाल हैं। यद्यपि यह देह सीधे तौर पर शैतान को नष्ट नहीं कर सकता, फिर भी वह मनुष्यजाति को जीतने और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, शैतान को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में ला सकता है। चूँकि परमेश्वर देहधारी है, वह शैतान को हरा कर इंसान को बचा सकता है। वह सीधे तौर पर शैतान को नष्ट नहीं करता, बल्कि जिस मनुष्यजाति को शैतान ने भ्रष्ट किया है, उसे जीतने का कार्य करने के लिए वह देह बनता है। इस तरह से, वह अपने प्राणियों के बीच बेहतर ढंग से गवाही दे सकता है, और वह भ्रष्ट हुए इंसान को बेहतर ढंग से बचा सकता है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की तुलना में देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय अधिक बड़ी गवाही देती है और ज़्यादा प्रेरक है। देहधारी परमेश्वर सृजनकर्ता को जानने में मनुष्य की बेहतर ढंग से सहायता कर सकता है, और अपने प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 128

परमेश्वर मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने, मनुष्य पर स्वयं को व्यक्तिगत रूप से प्रकट करने और उसे स्वयं को देखने देने के लिए पृथ्वी पर आया है; क्या यह कोई साधारण मामला है? यह वास्तव में सरल नहीं है! यह ऐसा नहीं है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है : कि परमेश्वर आ गया है, इसलिए मनुष्य उसकी ओर देख सकता है, ताकि मनुष्य समझ सके कि परमेश्वर वास्तविक है और अस्पष्ट या खोखला नहीं है, और कि परमेश्वर उच्च है किंतु विनम्र भी है। क्या यह इतना सरल हो सकता है? यह ठीक इसलिए है, क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है, और इसलिए भी कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण करनी चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए लाभदायक है। परमेश्वर के दो देहधारी रूप शैतान को हराने के लिए, और मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने के लिए भी, अस्तित्व में रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है, वह केवल परमेश्वर ही हो सकता है, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या परमेश्वर का देहधारी रूप। संक्षेप में, शैतान के साथ युद्ध करने वाले स्वर्गदूत नहीं हो सकते, और वह मनुष्य तो बिलकुल नहीं हो सकता, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यह युद्ध लड़ने में स्वर्गदूत निर्बल हैं, और मनुष्य तो और भी अधिक अशक्त है। इसलिए, यदि परमेश्वर मनुष्य के जीवन में कार्य करना चाहता है, यदि वह मनुष्य को बचाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पृथ्वी पर आना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से देह बनना होगा—अर्थात् उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा, और अपनी अंतर्निहित पहचान तथा उस कार्य के साथ, जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, मनुष्य के बीच आना होगा और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य को बचाना होगा। अन्यथा, यदि वह परमेश्वर का आत्मा या मनुष्य होता, जो यह कार्य करता, तो इस युद्ध से कभी कुछ न निकलता, और यह कभी समाप्त न होता। जब परमेश्वर मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से शैतान के साथ युद्ध करने के लिए देह बनता है, केवल तभी मनुष्य के पास उद्धार का एक अवसर होता है। इसके अतिरिक्त, केवल तभी शैतान लज्जित होता है, और उसके पास लाभ उठाने के लिए कोई अवसर नहीं होता या कार्यान्वत करने के लिए कोई योजना नहीं बचती। देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा अप्राप्य है, और परमेश्वर की ओर से किसी दैहिक मनुष्य द्वारा उसे किया जाना तो और भी अधिक असंभव है, क्योंकि जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य के जीवन के वास्ते और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए है। यदि मनुष्य इस युद्ध में भाग लेता, तो उसकी दुर्गति हो जाती और वह भाग जाता, और अपने भ्रष्ट स्वभाव को बदलने में एकदम असमर्थ रहता। वह सलीब से मनुष्य को बचाने या संपूर्ण विद्रोही मानव-जाति पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ होता, केवल थोड़ा-सा पुराना कार्य करने में सक्षम होता जो सिद्धांतों से परे नहीं जाता, या कोई और कार्य, जिसका शैतान की पराजय से कोई संबंध नहीं है। तो परेशान क्यों हुआ जाए? उस कार्य का क्या महत्व है, जो मानव-जाति को प्राप्त न कर सकता हो, और शैतान को पराजित तो बिलकुल न कर सकता हो? और इसलिए, शैतान के साथ युद्ध केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है, और इसे मनुष्य द्वारा किया जाना पूरी तरह से असंभव होगा। मनुष्य का कर्तव्य आज्ञापालन करना और अनुसरण करना है, क्योंकि मनुष्य स्वर्ग और धरती के सृजन के समान कार्य करने में असमर्थ है, इसके अतिरिक्त, न ही वह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य कर सकता है। मनुष्य केवल स्वयं परमेश्वर की अगुआई के तहत ही सृजनकर्ता को संतुष्ट कर सकता है, जिसके माध्यम से शैतान पराजित होता है; केवल यही वह एकमात्र कार्य है जो मनुष्य कर सकता है। और इसलिए, हर बार जब एक नया युद्ध आरंभ होता है, अर्थात् हर बार जब नए युग का कार्य शुरू होता है, तो इस कार्य को स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जिसके माध्यम से वह संपूर्ण युग की अगुआई करता है, और संपूर्ण मानव-जाति के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करता है। प्रत्येक नए युग की भोर शैतान के साथ युद्ध में एक नई शुरुआत है, जिसके माध्यम से मनुष्य एक अधिक नए, अधिक सुंदर क्षेत्र और एक नए युग में प्रवेश करता है, जिसकी अगुआई परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से की जाती है। मनुष्य सभी चीज़ों का स्वामी है, किंतु वे लोग, जिन्हें प्राप्त कर लिया गया है, शैतान के साथ सारे युद्धों के परिणाम बन जाएँगे। शैतान सभी चीज़ों को भ्रष्ट करने वाला है, वह सभी युद्धों के अंत में हारने वाला है, और वह इन युद्धों के बाद दंडित किया जाने वाला भी है। परमेश्वर, मनुष्य और शैतान में से केवल शैतान ही है, जिससे घृणा की जाएगी और जिसे ठुकरा दिया जाएगा। इस बीच, शैतान द्वारा प्राप्त किए गए और परमेश्वर द्वारा वापस न लिए गए लोग शैतान की ओर से सज़ा प्राप्त करने वाले बन जाएँगे। इन तीनों में से केवल परमेश्वर की ही सही चीज़ों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए। जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया किंतु परमेश्वर द्वारा वापस ले लिया जाता है और जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे इस बीच ऐसे लोग बन जाते हैं, जो परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त करेंगे और परमेश्वर के लिए दुष्ट लोगों का न्याय करेंगे। परमेश्वर निश्चित रूप से विजयी होगा और शैतान निश्चित रूप से पराजित होगा, किंतु मनुष्यों के बीच ऐसे लोग भी हैं, जो जीतेंगे और ऐसे लोग भी हैं, जो हारेंगे। जो जीतेंगे, वे विजेताओं के साथ होंगे और जो हारेंगे, वे हारने वाले के साथ होंगे; यह प्रत्येक का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण है, यह परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का अंतिम परिणाम है, यह परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का लक्ष्य भी है, और यह कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर की प्रबधंन योजना के मुख्य कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार पर केंद्रित है, और परमेश्वर मुख्य रूप से इस केंद्रीय भाग के वास्ते, इस कार्य के वास्ते, और शैतान को पराजित करने के उद्देश्य से देह बनता है। पहली बार परमेश्वर देह बना, तो वह भी शैतान को पराजित करने के लिए था : वह व्यक्तिगत रूप से देह बना, और पहले युद्ध का कार्य पूरा करने के लिए, जो कि मानव-जाति के छुटकारे का कार्य था, उसे व्यक्तिगत रूप से सलीब पर चढ़ा दिया गया। इसी प्रकार, कार्य के इस चरण को भी परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जो मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए, और व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को बोलने और मनुष्य को स्वयं को देखने देने के लिए देह बना है। निस्संदेह, यह अपरिहार्य है कि वह मार्ग में साथ-साथ कुछ अन्य कार्य भी करता है, किंतु जिस मुख्य कारण से वह अपने कार्य को व्यक्तिगत रूप से कार्यान्वित करता है, वह है शैतान को हराना, संपूर्ण मानव-जाति पर विजय पाना, और इन लोगों को प्राप्त करना। इसलिए, देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में सरल नहीं है। यदि उसका उद्देश्य मनुष्य को केवल यह दिखाना होता कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, और यह कि परमेश्वर वास्तविक है, यदि यह मात्र इस कार्य को करने के वास्ते होता, तो देह बनने की कोई आवश्यकता न होती। परमेश्वर ने देहधारण न किया होता, तब भी वह अपनी विनम्रता और गंभीरता, अपनी महानता और पवित्रता सीधे मनुष्य पर प्रकट कर सकता था, किंतु ऐसी चीज़ों का मानव-जाति के प्रबधंन के कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। ये मनुष्य को बचाने या उसे पूर्ण करने में असमर्थ हैं, और ये शैतान को पराजित तो बिलकुल भी नहीं कर सकतीं। यदि शैतान की पराजय में केवल पवित्रात्मा ही शामिल होता, जो किसी आत्मा से युद्ध करता, तो ऐसे कार्य का और भी कम व्यावहारिक मूल्य होता; यह मनुष्य को प्राप्त करने में असमर्थ होता और मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं को बरबाद कर देता। इस प्रकार, आज परमेश्वर के कार्य का गहरा महत्व है। यह केवल इसलिए नहीं है कि मनुष्य उसे देख सके, या कि मनुष्य की आँखें खोली जा सकें, या उसे प्रेरणा और प्रोत्साहन का थोड़ा एहसास कराया जा सके; ऐसे कार्य का कोई महत्व नहीं है। यदि तुम केवल इस प्रकार के ज्ञान के बारे में ही बोल सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के देहधारण के सच्चे महत्व को नहीं जानते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 129

परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यवहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, वह पुरुष था, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर स्त्री है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए पुरुष और स्त्री दोनों का सृजन किया, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करता है; चाहे पुरुष हो या स्त्री, दोनों ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, यदि यह उसका देहधारी शरीर है। यदि यीशु स्त्री के रूप में आ जाता, यानी अगर पवित्र आत्मा ने लड़के के बजाय लड़की के रूप में गर्भधारण किया होता, तब भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। और यदि ऐसा होता, तो कार्य का वर्तमान चरण पुरुष के द्वारा पूरा किया जाता और कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। दोनों में से किसी भी चरण में किया गया कार्य समान रूप से अर्थपूर्ण है; कार्य का कोई भी चरण दोहराया नहीं जाता है या एक-दूसरे का विरोध नहीं करता है। उस समय जब यीशु कार्य कर रहा था, तो उसे इकलौता पुत्र कहा गया, और "पुत्र" का अर्थ है पुरुष लिंग। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग के बारे में कोई भेदभाव नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता, वह स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यवहारिक मायने होते हैं। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और यह स्वत: प्रमाणित है कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम है। वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के लिए देहधारण नहीं करता जिसे मनुष्य देख सके, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही धारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है, किसी स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सारी मानवजाति मानती थी कि पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार होता है। वे मानते थे कि किसी स्त्री के पास अधिकार नहीं हो सकता, अधिकार सिर्फ पुरुष के पास ही हो सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मुखिया होता है, स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। अतीत में जब ऐसा कहा गया कि पुरुष स्त्री का मुखिया है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था—न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा ने रचा था। निस्संदेह, स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना आना चाहिए। ये वे नियम और आदेश हैं जिन्हें यहोवा ने बनाया, जिनका इंसान को धरती पर अपने जीवन में पालन करना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, "तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" उसने यह सिर्फ इसलिए कहा ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व में सामान्य जीवन जी सकें, ताकि मानवजाति के जीवन की एक संरचना हो और वह अपने व्यवस्थित क्रम में ही रहे। इसलिए यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, हालाँकि ये सब पृथ्वी पर रहने वाले प्राणीमात्र के सन्दर्भ में थे, न कि देहधारी परमेश्वर के देह के सन्दर्भ में। परमेश्वर अपनी ही सृष्टि के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा रची गई मानवजाति के लिए थे; पुरुष और स्त्री के लिए उसने ये नियम इसलिए स्थापित किए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने दो प्रकार के मनुष्य बनाए, पुरुष और स्त्री; इसलिए, उसके देहधारी शरीर में पुरुष और स्त्री का भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर तय नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार निर्धारित किया गया जब उसने सबसे पहले मानवजाति की रचना की थी; अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। सर्प द्वारा छले गये आदम और हव्वा से कहे गए यहोवा के वचनों को यदि मनुष्य परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसा कि उसे करना चाहिए था? इस तरह, क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह तब भी अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री होना गलत है, तो क्या परमेश्वर का स्त्री की रचना करना भी भयंकर भूल नहीं थी? यदि लोग अब भी मानते हैं कि परमेश्वर का स्त्री के रूप में देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया जिस कारण वह अपनी पत्नी से प्रेम नहीं कर पाया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसा कि वर्तमान देहधारण है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु के बारे में राय बनाने के लिए यहोवा द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या वे दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु के बारे में उस पुरुष के हिसाब से राय बनाते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम आज के देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से राय नहीं बना सकते जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह तो अनुचित होगा! परमेश्वर को इस प्रकार मापना तुम्हारी विवेकहीनता को साबित करता है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से संबंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था; उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचो कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का था, जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। उन दोनों का कोई संबंध नहीं है, दोनों भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा तो नहीं हो सकता कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मुखिया है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह स्वयं परमेश्वर है, वह न सिर्फ स्त्री का मुखिया है बल्कि पुरुष का भी मुखिया है। वह सभी प्राणियों का प्रभु और सभी प्राणियों का मुखिया है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मुखिया का प्रतीक कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु ऐसा पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा यीशु के भीतर आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट कर सकता था जिसे सर्प द्वारा छला गया था? क्या वर्तमान देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता क्योंकि स्त्री ही सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह बात कह सकते हो कि चूँकि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध होती है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता? क्या तुम अब भी यह कह सकते हो कि "स्त्री हमेशा पुरुष का आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त या प्रत्यक्ष रूप से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती?" अतीत में तो तुम नहीं समझे; क्या तुम अब भी परमेश्वर के कार्य की, विशेषकर परमेश्वर के देहधारी शरीर की निंदा कर सकते हो? यदि तुम यह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो अच्छा होगा कि तुम अपनी जुबान पर लगाम लगाओ, ऐसा न हो कि तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता प्रकट हो जाए और तुम्हारी कुरूपता उजागर हो जाए। यह मत सोचो कि तुम सबकुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबन्धन योजना के हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम इतनी ढिठाई से पेश क्यों आते हो? तुम्हारी जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचक बनकर दोष मत ढूँढो। चाहे तुम कितने भी अभिमानी हो जाओ, फिर भी तुम्हारी औकात चींटी जितनी भी नहीं है! तुम्हारे पेट में उतना भी नहीं है जितना एक चींटी के पेट में होता है! यह मत सोचो चूँकि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, इसलिए तुम बेलगाम ढंग से हाथ नचाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हो। क्या तुम्हारे अनुभव और तुम्हारी वरिष्ठता उन वचनों के परिणामस्वरूप नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम देखते हो कि मैंने देहधारण किया है, और परिणामस्वरूप तुम्हारे अंदर ऐसी प्रचुर अवधारणाएँ हैं, और उनसे निकली अवधारणाओं का कोई अंत नहीं है। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं, तब भी तुम्हारे अंदर इतनी अवधारणाएँ नहीं होतीं; और क्या तुम्हारी अवधारणाएँ इन्हीं से नहीं उभरतीं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करता, तो क्या तुम देहधारण के बारे में जानते? क्या यह पहले देहधारण के तुम्हारे ज्ञान के कारण ही नहीं है कि तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण के बारे में राय बनाते हो? तुम एक आज्ञाकारी अनुयायी बनने के बजाय इसकी जाँच क्यों कर रहे हो? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें खुद की पड़ताल करने देगा? तुम अपने परिवार के इतिहास की जाँच कर सकते हो, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के "परिवार के इतिहास" की जाँच करते हो, तो क्या आज का परमेश्वर तुम्हें ऐसी पड़ताल करने देगा? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम स्वयं तिरस्कार के भागी नहीं बन रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 130

यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारे देह एक-दूसरे से जुड़े नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम समान हैं; हमारे देह भिन्न रूप धारण करते हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं। यद्यपि उनके देह किसी प्रकार के रक्त या भौतिक संबंध साझा नहीं करते, पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारण हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं, यद्यपि वे एक ही व्यक्ति के वंशज या एक ही भाषा (एक पुरुष था जो यहूदियों की भाषा बोलता था और दूसरा शरीर स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलता है) साझा नहीं करते। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए, उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद वे एक ही आत्मा हैं, उनका सार एक ही है, लेकिन उनके देह के बाहरी आवरणों में कोई समानता नहीं है। बस उनकी मानवता समान है, परन्तु जहाँ तक उनके देह के प्रकटन और जन्म की परिस्थितियों की बात है, वे दोनों समान नहीं हैं। इनका उनके अपने-अपने कार्य या मनुष्य के पास उनके बारे में जो ज्ञान है, उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि आखिरकार, वे आत्मा तो एक ही हैं और उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं है, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य देता है और उनके देह को अलग-अलग रक्त-संबंध से जोड़ता है। यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है : वे एक ही आत्मा हैं। उसी तरह, आज के देहधारी परमेश्वर और यीशु में कोई रक्त-संबंध नहीं है, लेकिन वे हैं एक ही, क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। परमेश्वर दया और करुणा का, और साथ ही धार्मिक न्याय का, मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य को श्राप देने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 131

परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड और ऊपर के राज्य में महानतम है, तो क्या वह देह की छवि का उपयोग करके स्वयं को पूरी तरह से समझा सकता है? परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को करने के लिए देह के वस्त्र पहनता है। देह की इस छवि का कोई विशेष अर्थ नहीं है, यह युगों के गुज़रने से कोई संबंध नहीं रखती, और न ही इसका परमेश्वर के स्वभाव से कुछ लेना-देना है। यीशु ने अपनी छवि को क्यों नहीं बना रहने दिया? क्यों उसने मनुष्य को अपनी छवि चित्रित नहीं करने दी, ताकि उसे बाद की पीढ़ियों को सौंपा जा सकता? क्यों उसने लोगों को यह स्वीकार नहीं करने दिया कि उसकी छवि परमेश्वर की छवि है? यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि में बनाई गई थी, किंतु फिर भी क्या मनुष्य की छवि के लिए परमेश्वर की उत्कृष्ट छवि का प्रतिनिधित्व करना संभव रहा होता? जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो वह स्वर्ग से मात्र एक विशेष देह में अवरोहण करता है। यह उसका आत्मा है, जो देह में अवरोहण करता है, जिसके माध्यम से वह पवित्रात्मा का कार्य करता है। यह पवित्रात्मा ही है जो देह में व्यक्त होता है, और यह पवित्रात्मा ही है जो देह में अपना कार्य करता है। देह में किया गया कार्य पूरी तरह से पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है, और देह कार्य के वास्ते होता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देह की छवि स्वयं परमेश्वर की वास्तविक छवि का स्थानापन्न होती है; परमेश्वर के देह बनने का उद्देश्य और अर्थ यह नहीं है। वह केवल इसलिए देहधारी बनता है, ताकि पवित्रात्मा को रहने के लिए ऐसी जगह मिल सके, जो उसकी कार्य-प्रणाली के लिए उपयुक्त हो, जिससे देह में उसका कार्य बेहतर ढंग से हो सके, ताकि लोग उसके कर्म देख सकें, उसका स्वभाव समझ सकें, उसके वचन सुन सकें, और उसके कार्य का चमत्कार जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किंतु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसका प्रकटन उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करता है; यह केवल मनुष्य की एक धारणा है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के मुख्य पहलू उसका नाम, उसका कार्य, उसका स्वभाव और उसका लिंग हैं। इस युग में उसके प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। केवल उस समय के उसके कार्य के वास्ते होने से, देह में उसके प्रकटन का उसके प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है। फिर भी, देहधारी परमेश्वर के लिए कोई विशेष छवि नहीं रखना असंभव है, और इसलिए वह अपनी छवि निश्चित करने के लिए उपयुक्त परिवार चुनता है। यदि परमेश्वर के प्रकटन का प्रातिनिधिक अर्थ होता, तो उसके चेहरे जैसी विशेषताओं से संपन्न सभी व्यक्ति भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते। क्या यह एक गंभीर त्रुटि नहीं होती? यीशु का चित्र मनुष्य द्वारा चित्रित किया गया था, ताकि मनुष्य उसकी आराधना कर सके। उस समय पवित्रात्मा ने कोई विशेष निर्देश नहीं दिए, और इसलिए मनुष्य ने आज तक उस कल्पित चित्र को आगे बढ़ाया। वास्तव में, परमेश्वर के मूल इरादे के अनुसार, मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए था। यह केवल मनुष्य का उत्साह है, जिसके कारण आज तक यीशु का चित्र बचा रहा है। परमेश्वर पवित्रात्मा है, और अंतिम विश्लेषण में उसकी छवि कैसी है, इसे रेखांकित करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। उसकी छवि का केवल उसके स्वभाव द्वारा ही प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। जहाँ तक उसकी नाक, उसके मुँह, उसकी आँखों और उसके बालों के रूप-रंग की बात है, इन्हें रेखांकित करना तुम्हारी क्षमता से परे है। जब यूहन्ना पर प्रकाशन आया, तो उसने मनुष्य के पुत्र की छवि देखी : उसके मुँह से एक तेज दो-धारी तलवार निकल रही थी, उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं, उसका सिर और बाल श्‍वेत ऊन के समान उज्ज्वल थे, उसके पाँव चमकाए गए काँसे के समान थे, और उसकी छाती के चारों ओर सोने का पटुका बँधा हुआ था। यद्यपि उसके वचन बहुत जीवंत थे, किंतु उसने परमेश्वर की जिस छवि का वर्णन किया, वह किसी सृजित प्राणी की छवि नहीं थी। उसने जो देखा, वह मात्र एक झलक थी, भौतिक जगत में से किसी व्यक्ति की छवि नहीं थी। यूहन्ना ने एक झलक देखी थी, किंतु उसने परमेश्वर की वास्तविक छवि नहीं देखी थी। देहधारी परमेश्वर के देह की छवि एक सृजित प्राणी की छवि होने से परमेश्वर के स्वभाव का समग्रता से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने कहा कि उसने ऐसा अपनी छवि में किया और नर और मादा का सृजन किया। उस समय, उसने कहा कि उसने नर और मादा को परमेश्वर की छवि में बनाया। यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि से मिलती-जुलती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि है। न ही तुम परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से साकार करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर सकते हो, क्योंकि परमेश्वर इतना उत्कृष्ट, इतना महान, इतना अद्भुत और अथाह है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 132

इस बार, परमेश्वर कार्य करने आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। इसके अलावा, यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण का देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में तुम ऐसा कुछ नहीं देख सकते जो इसे दूसरों से अलग करता हो, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में पहले कभी नहीं सुना गया। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य के वचनों का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के काम की ज़िम्मेदारी लेता है, और मनुष्यों के समझने के लिये परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को अभिव्यक्त करता है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा—वो रहस्य जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, और नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है। ऐसी साधारण देह अनेक अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। उसके कार्य तुम्हारे लिए गूढ़ हो सकते हैं, परंतु उसके कार्य का संपूर्ण लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते-से लगते हैं, या उसकी ज्वाला-सी धधकती आंखों को नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन का अनुभव नहीं कर सकते, तुम उसके वचनों से सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित है, और जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है; तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर को जानें, उसकी आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करें। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटकर आया है। यद्यपि आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर मनुष्यों के ही समान है, उसकी एक नाक और दो आँखें हैं और वह एक साधारण परमेश्वर है, अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह मनुष्य नहीं होता तो स्वर्ग और पृथ्वी एक अभूतपूर्व बदलाव से होकर गुज़रते; अगर यह मनुष्य नहीं होता तो, स्वर्ग मद्धिम हो जाता, पृथ्वी पर उथल-पुथल हो जाती, समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जीती। परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि यदि अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए नहीं आया होता तो परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सदैव ही कट्टर पापी होते, और तुम हमेशा के लिए लाश बन जाते। तुम सबको यह जानना चाहिये कि यदि यह देह नहीं होता तो समस्त मानवजाति को एक अवश्यंभावी संकट का सामना करना होता, और अंत के दिनों में मानवजाति के लिये परमेश्वर के कठोर दण्ड से बच पाना कठिन होता। यदि इस साधारण शरीर का जन्म नहीं होता तो तुम सबकी दशा ऐसी होती जिसमें तुम लोग जीने में सक्षम न होते हुए जीवन की भीख माँगते और मृत्यु के लिए प्रार्थना करते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सत्य को नहीं पा सकते थे और न ही आज परमेश्वर के सिंहासन के पास आ पाते, बल्कि तुम लोग परमेश्वर से दण्ड पाते क्योंकि तुमने जघन्य पाप किये हैं। क्या तुम सब जानते हो, यदि परमेश्वर का वापस देह में लौटा न होता, तो किसी को भी उद्धार का अवसर नहीं मिलता; और यदि इस देह का आगमन न होता, तो परमेश्वर ने बहुत पहले पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? अब जबकि यह स्पष्ट है, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरी बार के देहधारण को नकार सकते हो? जब तुम लोग इस साधारण मनुष्य से इतने सारे लाभ प्राप्त कर सकते हो, तो तुम लोग उसे प्रसन्नतापर्वूक स्वीकार क्यों नहीं करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 133

परमेश्वर का कार्य ऐसा है जिसे तुम समझ नहीं सकते। यदि तुम न तो पूरी तरह से समझ सकते हो कि तुम्हारा निर्णय सही है या नहीं, और न ही तुम जान सकते हो कि परमेश्वर का कार्य सफल होगा या नहीं, तब तुम अपनी किस्मत क्यों नहीं आज़माते और क्यों नहीं यह देखते हो कि यह साधारण मनुष्य तुम्हारे बड़े काम का है या नहीं और परमेश्वर ने वास्तव में बहुत महान काम किया है या नहीं? हालांकि मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि नूह के दिनों में लोग इस हद तक खाते और पीते थे, विवाहों में लगे रहते थे, कि यह सब देखना परमेश्वर के लिए असहनीय हो गया था, इसलिए उसने समस्त मानवजाति के विनाश के लिये एक बहुत बड़ी बाढ़ भेजी और बस नूह के परिवार के आठ सदस्यों, और सभी प्रकार के पशु-पक्षियों को बचाया। हालाँकि अंत के दिनों में जिन्हें परमेश्वर ने जीवित बचाकर रखा, ये वे लोग हैं जो अंत तक परमेश्वर के स्वामिभक्त रहे हैं। यद्यपि दोनों ही काल बहुत अधिक भ्रष्टाचार के युग थे जो परमेश्वर के लिये असहनीय था, और दोनों ही युगों में मानवजाति का इतना पतन हो चुका था कि उन्होंने यह नकार दिया कि परमेश्वर उनका प्रभु है, फिर भी परमेश्वर ने सिर्फ नूह के समय के सभी लोगों को नष्ट किया। दोनों युगों में मानवजाति ने परमेश्वर को बहुत दुखी किया, फिर भी परमेश्वर ने अंत के दिनों में मनुष्यों के प्रति संयम बरता है। ऐसा क्यों है? क्या तुम सबने कभी इस बात पर विचार नहीं किया? यदि तुम लोग सचमुच नहीं जानते, तो मैं तुम्हें बताता हूँ। अंत के दिनों में मनुष्यों के प्रति परमेश्वर का धीरज धरने का कारण यह नहीं है कि वे नूह के दिनों की तुलना में कमतर भ्रष्ट हैं या उन्होंने परमेश्वर के सामने पश्चाताप किया है और यह कारण तो बिलकुल नहीं है कि परमेश्वर तकनीकी विकास के अत्यंत उन्नत होने के कारण अंत के दिनों में मनुष्यों का सर्वनाश नहीं कर सकता। बल्कि कारण यह है कि अंत के दिनों में परमेश्वर को मनुष्यों के एक समूह में कार्य करना है, और यह कार्य परमेश्वर अपने देहधारण में स्वयं करना चाहता है। साथ ही परमेश्वर इस समूह के एक भाग को अपने उद्धार का पात्र, और अपनी प्रबंधन योजना का परिणाम बनाना चाहता है, और इन लोगों को अगले युग में प्रवेश कराना चाहता है। इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, परमेश्वर ने जो कीमत चुकाई है वह पूरी तरह से अंत के दिनों में उसके देहधारी देह द्वारा किये जाने वाले कार्य की तैयारी में है। जिस तथ्य तक तुम लोग आज पहुँचे हो यह इसी देह के कारण है। क्योंकि परमेश्वर इस देह में जीता है इसीलिए तुम सबके पास जीवित रहने का मौका है। यह सभी उत्तम भाग्य जो तुम सबने पाया है, वह इस साधारण मनुष्य के कारण है। न केवल इतना, बल्कि अंत में समस्त जातियाँ इस साधारण मनुष्य की उपासना करेंगी साथ ही साथ उसे धन्यवाद देंगी और इस मामूली व्यक्ति की आज्ञा का पालन करेंगी, क्योंकि उसके द्वारा लाये गए सत्य, जीवन और मार्ग ने समस्त मानवजाति को बचाया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच के संघर्ष को शांत किया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर और मनुष्यों के के बीच के विचारों के संपर्क का रास्ता खोला है। इसी ने परमेश्वर को और अधिक महान महिमा प्रदान की है। क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह, मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण मनुष्य, मनुष्यों के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता? क्या ऐसा व्यक्ति जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, वह तुम लोगों के प्रेम और अवलंबन के योग्य नहीं हो सकता? यदि तुम लोग उसके मुख से निकले सत्य को नकारते हो, और तुम लोग अपने बीच में उसके अस्तित्व का तिरस्कार करते हो, तो तुम लोगों का अंत में क्या होगा?

अंत के दिनों में परमेश्वर के सभी काम इस साधारण मनुष्य के द्वारा किये जाते हैं। वह तुम्हें सब कुछ प्रदान करेगा और वह तुमसे जुड़ी हर बात तय कर सकेगा। क्या ऐसा व्यक्ति वैसा हो सकता है जैसा तुम लोग सोचते हो : एक ऐसा व्यक्ति जो इतना अधिक साधारण है कि वह उल्लेख करने योग्य भी नहीं है? क्या उसका सत्य तुम लोगों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? क्या उसके कार्य की गवाही तुम लोगों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? या फिर वह मार्ग जिस पर वह तुम्हारी अगुवाई करता है, इस योग्य नहीं है कि तुम लोग उसका अनुसरण करो? सबकुछ कहने करने के बाद वह कौन-सी बात है जिसके कारण तुम लोग उससे घृणा करते हो और उसे अपने आप से दूर रखते हो और उससे बचकर रहते हो? यही व्यक्ति सत्य की अभिव्यक्ति करता है, यह वही व्यक्ति है जो सत्य प्रदान करता है, और यह वही व्यक्ति है जो तम लोगों को अनुसरण करने का मार्ग प्रदान करता है। क्या अब भी तुम लोगों को इन सत्यों के भीतर परमेश्वर के कार्य के संकेत नहीं मिल पा रहे? यीशु के कार्य के बिना मानवजाति सूली से उतर नहीं सकती थी, परन्तु बिना आज के देहधारण के वे लोग कभी परमेश्वर की सराहना नहीं पा सकते या नये युग में प्रवेश नहीं कर सकते जो सूली से उतर गए हैं। इस साधारण मनुष्य के आगमन के बिना, तुम लोगों को कभी भी यह अवसर नहीं मिलता या तुम लोग कभी भी इस योग्य नहीं हो सकते थे कि परमेश्वर के सच्चे मुखमंडल का दर्शन कर सको, क्योंकि तुम लोग ऐसी वस्तु हो जिसे बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। परमेश्वर के द्वितीय देहधारण के आगमन के कारण, परमेश्वर ने तुम लोगों को क्षमा कर दिया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर, मैं अंत में इन वचनों के साथ तुम लोगों से विदा लेना चाहता हूँ : यह साधारण मनुष्य जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। यही वह सबसे बड़ा काम है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले ही कर दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 134

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? पवित्रात्मा, व्यक्ति और वचन स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तुम सिर्फ़ व्यक्ति को जानते हो—यदि तुम उसकी आदतों और उसके व्यक्तित्व को जानते हो—लेकिन पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, या यह नहीं जानते कि पवित्रात्मा देह में क्या करता है, और यदि तुम सिर्फ़ पवित्रात्मा और वचन पर ध्यान देते हो, और केवल पवित्रात्मा के सामने प्रार्थना करते हो, लेकिन व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, तो यह साबित करता है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर को नहीं जानते। व्यावहारिक परमेश्वर संबंधी ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, पवित्रात्मा के कार्य के नियमों और सिद्धांतों को समझना, और परमेश्वर के पवित्रात्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य पवित्रात्मा द्वारा नियंत्रित होता है, और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। इस प्रकार, व्यावहारिक परमेश्वर को जानने के लिए यह जानना सर्वोपरि है कि परमेश्वर मानवता और दिव्यता में कैसे कार्य करता है; जिसके परिणामस्वरूप यह पवित्रात्मा की अभिव्यक्ति से संबंध रखता है, जिससे सभी लोग जुड़ते हैं।

पवित्रात्मा की अभिव्यक्तियों के कौन-से पहलू हैं? परमेश्वर कभी मानवता में कार्य करता है और कभी दिव्यता में—लेकिन दोनों मामलों में नियंत्रक पवित्रात्मा होता है। लोगों के भीतर जैसी आत्मा होती है, वैसी ही उनकी बाहरी अभिव्यक्ति होती है। पवित्रात्मा सामान्य रूप से कार्य करता है, लेकिन पवित्रात्मा द्वारा उसके निर्देशन के दो भाग हैं : एक भाग उसका मानवता में किया जाने वाला कार्य है, और दूसरा उसका दिव्यता के माध्यम से किया जाने वाला कार्य है। यह तुम्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए। पवित्रात्मा का कार्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है : जब उसके मानवीय कार्य की आवश्यकता होती है, तो पवित्रात्मा इस मानवीय कार्य को निर्देशित करता है; और जब उसके दिव्य कार्य की आवश्यकता होती है, तो उसे करने के लिए सीधे दिव्यता प्रकट होती है। चूँकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, इसलिए वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। मानवता में उसका कार्य पवित्रात्मा द्वारा निर्देशित होता है और मनुष्यों की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, परमेश्वर के साथ उनका जुड़ना आसान बनाने के लिए, उन्हें परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता देखने देने के लिए, और उन्हें यह देखने देने के लिए किया जाता है कि परमेश्वर के पवित्रात्मा ने देह धारण किया है और वह मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ जुड़ता है। दिव्यता में उसका कार्य लोगों के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने और हर चीज़ में लोगों की सकारात्मक रूप से अगुआई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने और उन्हें वास्तव में पवित्रात्मा के देह में प्रकटन को देखने देने के लिए किया जाता है। मुख्य रूप से, मनुष्य के जीवन में वृद्धि सीधे दिव्यता में किए गए परमेश्वर के कार्य और वचनों के माध्यम से प्राप्त की जाती है। केवल दिव्यता में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करके ही लोग अपने स्वभाव में बदलाव हासिल कर सकते हैं और केवल तभी वे अपनी आत्मा में संतुष्ट हो सकते हैं; केवल इसमें मानवता में किया जाने वाला कार्य—मानवता में परमेश्वर की चरवाही, सहायता और पोषण—जोड़े जाने पर ही परमेश्वर के कार्य के परिणाम पूरी तरह से हासिल किए जा सकते हैं। आज जिस व्यावहारिक परमेश्वर की बात की जाती है, वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने के माध्यम से उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन और उसका पूर्णत: दिव्य कार्य हासिल किए जाते हैं। उसकी मानवता और दिव्यता संयुक्त रूप से एक हैं, और दोनों का कार्य वचनों के द्वारा पूरा किया जाता है; मानवता में हो या दिव्यता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवता में काम करता है, तो वह मानव की भाषा बोलता है, ताकि लोग उससे जुड़ सकें और उसके वचनों को समझ सकें। उसके वचन स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, ऐसे कि वे सभी लोगों को प्रदान किए जा सकें; लोग सुशिक्षित हों या अल्पशिक्षित, वे सब परमेश्वर के वचनों को प्राप्त कर सकते हैं। दिव्यता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पोषण से भरा होता है, जीवन से भरा होता है, मनुष्य की धारणाओं से दूषित नहीं होता, उसमें मनुष्य की प्राथमिकताएँ शामिल नहीं होतीं, और वह मनुष्य की सीमाओं से रहित होता है, वह किसी सामान्य मानवता के बंधनों से बाहर होता है; वह देह में किया जाता है, लेकिन पवित्रात्मा की सीधी अभिव्यक्ति होता है। यदि लोग केवल परमेश्वर द्वारा मानवता में किए गए कार्य को ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आपको एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे-से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों के व्यवहार, काट-छाँट और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य या उसकी उपस्थिति के बिना वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जाएँगे; केवल दिव्यता के काम के माध्यम से ही इस तरह की बीमारियाँ और कमियाँ दूर की जा सकती हैं, और केवल तभी लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। सतत व्यवहार और काट-छाँट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पोषण, सभी कमियों को पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की हर अवस्था प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने और उनके इरादों और प्रेरणाओं को खोलकर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना। यही है व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक कार्य। इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में तुम्‍हें उसे पहचानते और स्वीकार करते हुए उसकी मानवता के सामने तत्काल समर्पण करना चाहिए, और साथ ही तुम्‍हें उसके दिव्य कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और उनका पालन करना चाहिए। परमेश्वर के देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के पवित्रात्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके द्वारा धारित देह के माध्यम किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का पवित्रात्मा उसके मानवीय कार्य को तत्काल निर्देशित करता है और दिव्यता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तुम परमेश्वर के मानवता में किए गए कार्य और पूर्णत: दिव्य कार्य, दोनों देख सकते हो। व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यह वास्तविक अर्थ है। यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सभी विभिन्न भागों से जुड़ पाओगे; तुम उसके दिव्यता में किए गए कार्य को बहुत ज़्यादा महत्व देना, और उसके मानवता में किए गए कार्य को अनुचित रूप से नकारना बंद कर दोगे, और तुम चरम सीमाओं पर नहीं जाओगे, न ही कोई गलत रास्ता पकड़ोगे। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसका मानवता और दिव्यता का कार्य, पवित्रात्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के माध्यम से अभिव्‍यक्‍त किया जाता है, ताकि लोग देख सकें कि वह जीवंत और सजीव, वास्तविक और सत्य है।

परमेश्वर के पवित्रात्मा के मानवता में किए जाने वाले कार्य के परिवर्ती चरण हैं। मनुष्य को पूर्ण करके वह अपनी मानवता को पवित्रात्मा का निर्देश प्राप्त करने में समर्थ बनाता है, जिसके बाद उसकी मानवता कलीसियाओं को पोषण प्रदान करने और उनकी अगुआई करने में सक्षम होती है। यह परमेश्वर के सामान्य कार्य की एक अभिव्यक्ति है। इसलिए, यदि तुम परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के सिद्धांतों को अच्छी तरह देख पाते हो, तो तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के बारे में धारणाएँ बनाए जाने की संभावना नहीं होगी। चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर का पवित्रात्मा गलत नहीं हो सकता। वह सही और त्रुटिरहित है; वह कुछ भी गलत नहीं करता। दिव्य कार्य परमेश्वर की इच्छा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, उसमें मानवता का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। वह पूर्णता से होकर नहीं गुज़रता, बल्कि सीधे पवित्रात्मा से आता है। फिर भी, यह तथ्य कि वह दिव्यता में कार्य कर सकता है, उसकी सामान्य मानवता के कारण है; यह ज़रा भी अलौकिक नहीं है और किसी सामान्य मनुष्य द्वारा किया जाता प्रतीत होता है। परमेश्वर स्वर्ग से पृथ्वी पर मुख्यत: परमेश्वर के वचनों को देह के माध्यम से व्यक्त करने के लिए, परमेश्वर के पवित्रात्मा का कार्य देह के माध्यम से पूरा करने के लिए आया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 135

आज, व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान बहुत एकतरफा है, और देहधारण के अर्थ के बारे में उनकी समझ अभी भी बहुत कम है। परमेश्वर के देह के साथ, लोग उसके कार्य और वचनों के माध्यम से देखते हैं कि परमेश्वर के पवित्रात्मा में इतना कुछ शामिल है, कि वह इतना समृद्ध है। लेकिन कुछ भी हो, परमेश्वर की गवाही अंतत: परमेश्वर के पवित्रात्मा से आती है : परमेश्वर देह में क्या करता है, वह किन सिद्धांतों के द्वारा कार्य करता है, वह मानवता में क्या करता है, और वह दिव्यता में क्या करता है। लोगों को इसका ज्ञान होना चाहिए। आज, तुम इस व्यक्ति की आराधना करने में सक्षम हो, जबकि वास्तव में तुम पवित्रात्मा की आराधना कर रहे हो, और लोगों को देहधारी परमेश्वर संबंधी अपने ज्ञान में कम से कम यह तो हासिल करना ही चाहिए : देह के माध्यम से पवित्रात्मा के सार को जानना, देह में पवित्रात्मा के दिव्य कार्य और देह में उसके मानवीय कार्य को जानना, पवित्रात्मा द्वारा देह के माध्यम से बोले गए सभी वचनों और कथनों को स्वीकार करना, और यह देखना कि परमेश्वर का पवित्रात्मा कैसे देह को निर्देशित करता है और देह में अपना सामर्थ्य दर्शाता है। अर्थात्, देह के माध्यम से मनुष्य स्वर्ग के पवित्रात्मा को जान जाता है, मनुष्यों के बीच स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकटन ने लोगों की धारणाओं से अज्ञात परमेश्वर को गायब कर दिया है। लोगों द्वारा स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना ने परमेश्वर के प्रति उनकी आज्ञाकारिता बढ़ा दी है, और देह में परमेश्वर के पवित्रात्मा के दिव्य कार्य और देह में उसके मानवीय कार्य के माध्यम से मनुष्य प्रकाशन पाता है और उसकी चरवाही की जाती है, और मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन हासिल किए जाते हैं। पवित्रात्मा के देह में आगमन का यह वास्तविक अर्थ है, जिसका मुख्य प्रयोजन यह है कि लोग परमेश्वर से जुड़ सकें, परमेश्वर पर भरोसा कर सकें, और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकें।

मुख्य रूप से लोगों का व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति क्या रवैया होना चाहिए? तुम देहधारण, वचन के देह में प्रकट होने, परमेश्वर के देह में प्रकट होने और व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में क्या जानते हो? आज चर्चा के मुख्य मुद्दे क्या हैं? देहधारण, वचन का देह में आना और परमेश्वर का देह में प्रकट होना, ये सब वे मुद्दे हैं, जिन्हें समझा जाना चाहिए। अपनी आध्यात्मिक कद-काठी और युग के आधार पर तुम लोगों को ये मुद्दे धीरे-धीरे समझने चाहिए और अपने जीवन-अनुभव में तुम्हें इनका स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए। लोगों द्वारा परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने की प्रक्रिया वही है, जिसके द्वारा वे परमेश्वर के वचनों के देह में प्रकट होने के बारे में जानते हैं। लोग जितना अधिक परमेश्वर के वचनों को अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के पवित्रात्मा को जानते हैं; परमेश्वर के वचनों को समझकर लोग पवित्रात्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझते हैं और स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में जानते हैं। वस्तुत:, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है और उन्हें प्राप्त करता है, तो वह उन्हें व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में जानने दे रहा होता है; वह व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य का उपयोग लोगों को देहधारण का वास्तविक अर्थ दिखाने और यह बताने के लिए कर रहा होता है कि परमेश्वर का पवित्रात्मा मनुष्य के सामने वास्तव में प्रकट हुआ है। जब लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए और पूर्ण बनाए जाते हैं, तो व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ उन्हें जीत लेती हैं, व्यावहारिक परमेश्वर के वचन उन्हें बदल देते हैं, और उनके भीतर उसका अपना जीवन कार्य करता है, वह उन्हें अपने स्वरूप से भर देता है (चाहे उसका स्वरूप मानवता में हो या दिव्यता में), वह उन्हें अपने वचनों के सार से भर देता है, और उन्हें अपने वचनों को जीने के लिए बाध्य कर देता है। जब परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है, तो ऐसा वह मुख्य रूप से व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और कथनों का उपयोग करके करता है, ताकि लोगों की कमियाँ दूर कर सके, और उनके विद्रोही स्वभाव का न्याय कर सके और उसे उजागर कर सके, जिससे वे वो चीजें प्राप्त कर सकें जिनकी उन्हें ज़रूरत है, और उन्हें दिखा सके कि परमेश्वर उनके बीच आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य प्रत्येक मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाना, उन्हें मलिन भूमि से दूर ले जाना, और उनके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करना है। व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का सबसे गहरा अर्थ एक आदर्श और प्रतिमान के रूप में व्यावहारिक परमेश्वर के साथ सामान्य मानवता को जीने योग्य बनना, और जिस भी रूप में वह कहे, उसी रूप में उसका अभ्यास करते हुए, बिना किसी विचलन या विपथन के, व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने और जो वह कहे, उसे प्राप्त करने योग्य बनना है। इस तरह से तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होगे। जब तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो, तो तुम्हारे पास न केवल पवित्र आत्मा का कार्य होता है; बल्कि मुख्य रूप से तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं को जी पाते हो। केवल पवित्र आत्मा के कार्य को पा लेने का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे पास जीवन है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम हो या नहीं, जिसका संबंध इस बात से है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। देह में व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य के ये महानतम अर्थ हैं। कहने का अर्थ यह है कि, परमेश्वर सचमुच और वाकई देह में प्रकट होकर, तथा जीवंत और सजीव होकर, लोगों द्वारा देखा जाकर, देह में पवित्रात्मा का काम वास्तव में करके, और देह में लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में काम करके, लोगों के एक समूह को प्राप्त करता है। परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः मनुष्य को परमेश्वर के असली कार्यों को देखने में सक्षम बनाने, निराकार पवित्रात्मा को देह में साकार रूप प्रदान करने, और लोगों को स्वयं को देखने देने और स्पर्श करने देने के लिए है। इस तरह से, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है, वे उसे जी पाएँगे, उसके द्वारा प्राप्त किए जाएँगे, और वे उसके मनोनुकूल हो जाएँगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर न आया होता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने में असमर्थ होते; वे केवल खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कर्मों का उपदेश ही दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्यतः उन लोगों के लिए एक प्रतिमान और आदर्श का कार्य करने के लिए आया है, जिन्हें उसे प्राप्त करना है; केवल इसी प्रकार लोग वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, स्पर्श कर सकते हैं और देख सकते हैं, और केवल तभी वे सच में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 136

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब वह पहली बार देह बना, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया। फिर, जब वह दूसरी बार देह बना, तो लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया, और पहचाना तो बिलकुल भी नहीं, और उन्होंने एक बार फिर से मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं है? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? कैसे वह परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हो सकता है? क्या परमेश्वर से प्यार करने, परमेश्वर की सेवा करने, और परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के मनुष्य के दावे कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि तुम अपने जीवन को इन अवास्तविक, अव्यावहारिक बातों को समर्पित करते हो, तो क्या तुम व्यर्थ में श्रम नहीं करते हो? तुम परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हो, जब तुम जानते तक नहीं कि परमेश्वर कौन है? क्या इस प्रकार की खोज अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? कोई परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? परमेश्वर का अंतरंग होने के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या तुम परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हो? क्या तुम देख सकते हो कि पवित्रात्मा कितना महान और उच्च है? किसी अदृश्य, अमूर्त परमेश्वर का अंतरंग होना—क्या यह अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? इस प्रकार की खोज के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या यह सब एक कपटपूर्ण झूठ नहीं है? तुम जिस चीज का प्रयास करते हो, वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, पर वास्तव में तुम शैतान के छोटे-से पालतू कुत्ते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, और तुम अस्तित्वहीन "सभी चीजों के परमेश्वर" की खोज करते हो, जो कि अदृश्य, अमूर्त और तुम्हारी अपनी धारणाओं का उत्पाद है। अस्पष्ट रूप से से कहा जाए, तो इस प्रकार का "परमेश्वर" शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह तुम स्वयं हो। तुम अपना स्वयं का ही अंतरंग होने का प्रयास करते हो, फिर भी कहते हो कि तुम परमेश्वर का अंतरंग होने का प्रयास करते हो—क्या यह ईशनिंदा नहीं है? ऐसी खोज का क्या मूल्य है? यदि परमेश्वर का आत्मा देह नहीं बनता, तो परमेश्वर का सार मनुष्य के लिए केवल अदृश्य, अमूर्त जीवन का आत्मा, रूपहीन और निराकार है, अभौतिक प्रकार का, अगम्य और अबोधगम्य है। मनुष्य किसी निराकार, चमत्कारी, अथाह आत्मा का अंतरंग कैसे हो सकता है? क्या यह एक मजाक नहीं है? इस प्रकार के बेतुके तर्क गलत और अव्यावहारिक हैं। सृजित मनुष्य परमेश्वर के आत्मा के लिए अंतर्निहित रूप से भिन्न है, इसलिए ये दोनों अंतरंग कैसे हो सकते हैं? यदि परमेश्वर का आत्मा देह में साकार नहीं होता, यदि परमेश्वर देह न बनता और उसने एक सृजित प्राणी बनकर अपने आपको विनीत न बनाया होता, तो सृजित मनुष्य उसका अंतरंग होने में अयोग्य और असमर्थ दोनों होता, और उन परमेश्वर के विश्वासियों के अलावा, जिनके पास उनकी आत्माओं के स्वर्ग में प्रवेश कर जाने के बाद परमेश्वर का अंतरंग होने का एक अवसर हो सकता है, अधिकतर लोग परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग होने के अयोग्य होते। और यदि लोग देहधारी परमेश्वर के मार्गदर्शन में स्वर्ग में परमेश्वर के अंतरंग होने की इच्छा करते हैं, तो क्या वे आश्चर्यजनक ढंग से मूर्ख अमानव नहीं हैं? लोग केवल अदृश्य परमेश्वर के प्रति "वफ़ादारी" का अनुसरण करते हैं और देखे जा सकने वाले परमेश्वर पर थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं देते, क्योंकि किसी अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है। लोग उसे जिस तरह चाहें, कर सकते हैं। किंतु दृश्यमान परमेश्वर का अनुसरण इतना आसान नहीं है। जो व्यक्ति किसी अज्ञात परमेश्वर को खोजता है, वह परमेश्वर को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ रहता है, क्योंकि सभी अज्ञात और अमूर्त वस्तुएँ मनुष्य द्वारा कल्पित हैं, और मनुष्य उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। यदि तुम लोगों के बीच आया हुआ परमेश्वर एक उच्च और असाधारण परमेश्वर होता, जो तुम लोगों के लिए अगम्य होता, तो तुम लोग उसकी इच्छा को कैसे समझ पाते? और तुम किस तरह उसे जान और समझ पाते? यदि वह केवल अपना कार्य करता, और मनुष्य के साथ उसका कोई भी सामान्य संपर्क न होता, या उसमें कोई सामान्य मानवता नहीं होती और वह मनुष्यों की पहुँच से बाहर होता, तो भले ही उसने तुम लोगों के लिए कितना भी अधिक कार्य किया होता, किंतु तुम लोगों का उसके साथ कोई संपर्क न होता, और तुम लोग उसे देखने में असमर्थ होते, तो तुम लोग उसे कैसे जान सकते थे? यदि यह सामान्य मानवता से युक्त देह का मामला न होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका न होता; यह केवल परमेश्वर के देह बनने के कारण है कि मनुष्य देहधारी परमेश्वर का अंतरंग होने के योग्य है। लोग परमेश्वर के अंतरंग इसलिए हो पाते हैं, क्योंकि वे उसके संपर्क में आते हैं, क्योंकि वे उसके साथ इकट्ठे रहते हैं और उसका साथ बनाए रखते हैं, और इसलिए धीरे-धीरे उसे जान जाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो क्या मनुष्य का अनुसरण व्यर्थ न होता? अर्थात्, यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता की वजह से है कि मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग होने में सक्षम है। यह केवल परमेश्वर के देह बनने के कारण है कि लोगों के पास अपना कर्तव्य पूरा करने का अवसर है, और वास्तविक परमेश्वर की आराधना करने का अवसर है। क्या यह सर्वाधिक वास्तविक और व्यावहारिक सत्य नहीं है? अब, क्या तुम अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करते हो? केवल जब परमेश्वर अपने आपको एक निश्चित बिंदु तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह बनता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर पवित्रात्मा का है : लोग इस पवित्रात्मा के अंतरंग होने के योग्य कैसे हो सकते हैं, जो कि बहुत ही उच्च और अथाह है? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला प्राणी बनता है, तभी लोग उसकी इच्छा को समझ सकते हैं और वास्तव में उसके द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मानवजाति की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, उसी संसार में रहता है जिसमें मानवजाति रहती है, मनुष्यों की रक्षा करता है, उनका मार्गदर्शन करता है, और इसके माध्यम से लोगों को शुद्ध करता है और उन्हें अपना उद्धार और अपने आशीष प्राप्त करने देता है। इन चीज़ों को प्राप्त करने के बाद लोग वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के अंतरंग बन सकते हैं। केवल यही व्यावहारिक है। यदि परमेश्वर लोगों के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो फिर वे उसके अंतरंग कैसे हो सकते थे? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 137

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह केवल दिव्यता के भीतर अपना कार्य करता है, जो वही कार्य है जो स्वर्गिक पवित्रात्मा ने देहधारी परमेश्वर को सौंपा है। जब वह आता हैतब वह, भिन्न-भिन्न साधनों से और भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से अपने कथनों को वाणी देने के लिए, समूची धरती पर बोलता है। वह मुख्य रूप से मनुष्य की आपूर्ति करने और मनुष्य को सिखाने को अपने लक्ष्यों और कार्यकारी सिद्धांत के रूप में देखता है, और वह लोगों के अंतर्वैयक्तिक संबंधों या उनके जीवन के विवरणों जैसी चीज़ों की चिंता नहीं करता है। उसकी मुख्य सेवकाई पवित्रात्मा के लिए बोलना है। अर्थात, जब परमेश्वर का आत्मा इंद्रियगोचर रूप से देह में प्रकट होता है, तब वह केवल मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और सत्य विमोचित करता है। वह मनुष्य के कार्य में स्वयं को नहीं उलझाता है, जिसका तात्पर्य यह है कि वह मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है। मानव दिव्य कार्य नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर मानव कार्य में भाग नहीं लेता है। इन सारे वर्षों में जबसे परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए इस धरती पर आया है, उसने सदैव लोगों के माध्यम से कार्य किया है। परंतु इन लोगों को देहधारी परमेश्वर नहीं माना जा सकता है—उन्हें केवल ऐसे मनुष्य माना जा सकता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। इस बीच, आज का परमेश्वर, पवित्रात्मा की वाणी को आगे भेजते हुए और पवित्रात्मा की ओर से कार्य करते हुए, दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से सीधे बात कर सकता है। इसी प्रकार, वे सब जिनका परमेश्वर ने युगों-युगों के दौरान उपयोग किया है, दैहिक शरीर के भीतर कार्यरत परमेश्वर के आत्मा के दृष्टांत हैं—तो उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा जा सकता है? परंतु आज का परमेश्वर देह में सीधे कार्यरत परमेश्वर का आत्मा भी है, और यीशु भी देह में कार्यरत परमेश्वर का आत्मा था; उन दोनों को परमेश्वर कहा जाता है। तो अंतर क्या है? वे सब लोग जिनका परमेश्वर ने युगों-युगों के दौरान उपयोग किया है, सामान्य विचार और तर्क में समर्थ हैं। उन सभी ने मानव आचरण के सिद्धांतों को समझ लिया है। उनके सामान्य मानवीय विचार हैं और वे उन सभी चीज़ों से युक्त रहे हैं जिनसे सामान्य लोगों को युक्त होना चाहिए। उनमें से अधिकांश के पास असाधारण प्रतिभा और जन्मजात बुद्धिमानी है। इन लोगों पर कार्य करते हुए, परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं को सान पर चढ़ाता है, जो उनकी परमेश्वर-प्रदत्त प्रतिभाएँ हैं। परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं को अमल में लाता है, परमेश्वर की सेवा में उनकी शक्तियों का उपयोग करता है। फिर भी परमेश्वर का सार सूझ या विचारों से रहित है और मानव अभिप्रायों की मिलावट से विहीन है, यहाँ तक कि उससे भी विहीन है जिससे सामान्य मानव युक्त हैं। कहने का तात्पर्य है कि वह मानव आचरण के सिद्धांतों से परिचित तक नहीं है। ऐसा ही होता है जब आज का परमेश्वर पृथ्वी पर आता है। उसका कार्य और उसके वचन मानव अभिप्रायों या मानव विचार से मिलावटरहित होते हैं, किंतु वे पवित्रात्मा के अभिप्रायों की सीधी अभिव्यक्ति हैं, और वह सीधे परमेश्वर की ओर से कार्य करता है। इसका अर्थ है कि पवित्रात्मा सीधे बात करता है, अर्थात, दिव्यता सीधे कार्य करती है, मनुष्य के अभिप्रायों का रत्ती भर भी मिश्रण किए बिना। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर सीधे दिव्यता का मूर्त रूप है, मानवीय सोच या विचार से रहित है, और मानव आचरण के सिद्धांतों की उसे कोई समझ ही नहीं है। यदि केवल दिव्यता ही कार्यरत होती (अर्थात् यदि केवल परमेश्वर स्वयं कार्यरत होता), तो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य करने का कोई रास्ता नहीं होता। इसलिए जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, उसके पास लोगों की एक छोटी-सी संख्या होनी ही चाहिए जिनका उपयोग वह मानवता के भीतर कार्य करने के लिए करता है, उस कार्य के साथ-साथ जो वह दिव्यता में करता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने दिव्य कार्य की पुष्टि के लिए मानव कार्य का उपयोग करता है। यदि वह ऐसा न करे, तो दिव्य कार्य से सीधे जुड़ने का कोई रास्ता मनुष्य के पास नहीं होगा। ऐसा ही यीशु और उसके अनुयायियों के साथ था। संसार में अपने समय के दौरान, यीशु ने पुरानी व्यवस्था को समूल समाप्त किया और नयी आज्ञाएँ स्थापित कीं। उसने बहुत-से वचन भी कहे। यह सारा कार्य दिव्यता में किया गया था। पतरस, पौलुस और युहन्ना जैसे अन्य सभी ने अपने बाद के कार्य यीशु के वचनों की नींव पर स्थापित किए। कहने का तात्पर्य है कि उस युग में परमेश्वर ने अपना कार्य आरंभ किया, और अनुग्रह के युग के आरंभ का सूत्रपात किया; अर्थात्, उसने पुराने युग को समाप्त करके, नया युग आरंभ किया, और साथ ही "परमेश्वर ही आरंभ और अंत है" वचनों को भी साकार किया। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को दिव्य कार्य की नींव पर ही मानव कार्य करना चाहिए। एक बार जब यीशु ने वह सब कुछ कह दिया जो उसे कहने की आवश्यकता थी और पृथ्वी पर अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह मनुष्य को छोड़कर चला गया। इसके बाद, सभी लोगों ने, कार्य करते हुए, उसके वचनों में व्यक्त सिद्धांतों के अनुसार ऐसा ही किया, और उसके द्वारा बोले गए सत्यों के अनुसार अभ्यास किया। इन सभी लोगों ने यीशु के लिए कार्य किया। यदि यीशु अकेले ही कार्य कर रहा होता, तो उसने चाहे जितने वचन बोले होते, तब भी लोगों के पास उसके वचनों के साथ जुड़ने के कोई साधन नहीं होते, क्योंकि वह दिव्यता में कार्य कर रहा था और केवल दिव्यता के वचन ही बोल सकता था, और वह चीज़ों को उस बिंदु तक नहीं समझा सकता था जहाँ सामान्य लोग उसके वचन समझ सकते थे। और इसलिए उसे प्रेरित और नबी रखने पड़े जो उसके कार्य की अनुपूर्ति करने के लिए उसके बाद आए। यही वह सिद्धांत है जिससे देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करता है—बोलने के लिए और कार्य करने के लिए देहधारी शरीर का उपयोग, ताकि दिव्यता का कार्य पूरा किया जा सके, और फिर अपने कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर के अपने हृदय के अनुरूप कुछ, या शायद अधिक, लोगों का उपयोग करना। अर्थात्, परमेश्वर मानवता में चरवाही करने और सिंचाई करने के लिए अपने हृदय के अनुरूप लोगों का उपयोग करता है ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें।

जब परमेश्वर देहधारी हुआ तब यदि वह केवल दिव्यता का कार्य करता, और उसके साथ सामंजस्य बनाकर कार्य करने के लिए उसके हृदय के अनुरूप लोग नहीं होते, तो मनुष्य परमेश्वर की इच्छा समझने या परमेश्वर के साथ जुड़ने में असमर्थ होता। परमेश्वर को अपना कार्य पूरा करने, कलीसियाओं की देख-रेख और उनकी चरवाही करने के लिए ऐसे सामान्य लोगों का उपयोग करना ही होता है जो उसके हृदय के अनुरूप हों, ताकि मनुष्य की संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ और उसका मस्तिष्क कल्पना करने का जो स्तर प्राप्त करने में सक्षम हैं उसे प्राप्त किया जा सके। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर दिव्यता के भीतर जो कार्य करता है उसका "रूपांतर" करने के लिए अपने हृदय के अनुरूप लोगों की छोटी-सी संख्या का उपयोग करता है, ताकि इसे खोला जा सके—और दिव्य भाषा को मानव भाषा में बदला जा सके, ताकि सभी लोग इसे बूझ और समझ सकें। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो कोई भी परमेश्वर की दिव्य भाषा नहीं समझ पाता, क्योंकि परमेश्वर के हृदय के अनुरूप लोग अंततः छोटी-सी अल्पसंख्या में ही हैं, और मनुष्य की बूझने की क्षमता कमज़ोर है। यही कारण है कि परमेश्वर केवल देहधारी शरीर में कार्य करते समय यह तरीक़ा चुनता है। यदि केवल दिव्य कार्य ही होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने और उसके साथ जुड़ने का कोई तरीक़ा नहीं होता, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की भाषा नहीं समझता है। मनुष्य यह भाषा केवल परमेश्वर के हृदय के अनुरूप लोगों की मध्यस्थता के माध्यम से ही समझ सकने में समर्थ है, जो उसके वचनों को स्पष्ट करते हैं। तथापि, यदि मानवता के भीतर केवल ऐसे ही लोग कार्यरत होते, तो वह भी केवल मनुष्य का सामान्य जीवन बनाए रख सकता था; यह मनुष्य का स्वभाव नहीं बदल सकता था। परमेश्वर का कार्य एक नया आरंभ बिंदु नहीं हो सकता था; केवल वही पुराने गीत होते, वही पुरानी तुच्छताएँ होतीं। केवल देहधारी परमेश्वर की मध्यस्थता के माध्यम से ही, जो अपने देहधारण की अवधि के दौरान वह सब कहता है जिसे कहने की आवश्यकता है और वह सब करता है जिसे करने की आवश्यकता है, लोग उसके वचनों के अनुसार कार्य और अनुभव करते हैं, केवल इसी प्रकार उनका जीवन स्वभाव बदल पाएगा, और इसी प्रकार वे समय के साथ चल पाएँगे। वह जो दिव्यता के भीतर कार्य करता है परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वे जो मानवता के भीतर कार्य करते हैं परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोग हैं। कहने का तात्पर्य है कि देहधारी परमेश्वर सारभूत रूप से परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों से भिन्न है। देहधारी परमेश्वर दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, जबकि परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोग इसमें समर्थ नहीं हैं। प्रत्येक युग के आरंभ में, परमेश्वर का आत्मा मनुष्य को एक नए आरंभ में ले जाने के लिए व्यक्तिगत रूप से बोलता है और एक नए युग का सूत्रपात करता है। जब परमेश्वर बोलना समाप्त कर देता है, तो इसका अर्थ होता है कि दिव्यता के भीतर उसका कार्य पूरा हो गया है। तत्पश्चात, सभी लोग अपने जीवन अनुभव में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों की अगुआई का अनुसरण करते हैं। उसी तरीक़े से, यह वह चरण भी होता है जिसमें परमेश्वर मनुष्य को नए युग में पहुँचाता है और लोगों को एक नया आरंभ बिंदु देता है—इसी समय देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच अनिवार्य अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 138

परमेश्वर अपनी सामान्य मानवता को पूर्ण करने के लिए पृथ्वी पर नहीं आता है, न ही वह सामान्य मानवता का कार्य करने के लिए आता है। वह केवल सामान्य मानवता में दिव्यता का कार्य करने के लिए आता है। परमेश्वर सामान्य मानवता के बारे में जो कहता है, वह वैसा नहीं जैसा लोग कल्पना करते हैं। मनुष्य "सामान्य मानवता" को पत्नी, या पति, और बेटे और बेटियों के होने के रूप में परिभाषित करता हैं, जो प्रमाण हैं कि कोई व्यक्ति सामान्य व्यक्ति है; परंतु परमेश्वर इसे इस तरह नहीं देखता है। वह सामान्य मानवता को सामान्य मानव विचारों और सामान्य मानव जीवन, और सामान्य लोगों से जन्मे होने के रूप में देखता है। किंतु उसकी सामान्यता में पत्नी या पति, और बच्चे उस तरह शामिल नहीं हैं जिस तरह मनुष्य सामान्यता की बात करता है। अर्थात्, मनुष्य के लिए, परमेश्वर जिस सामान्य मानवता की बात करता है वह वही है जिसे मनुष्य मानवता की अनुपस्थिति मानेगा, जिसमें भावनाओं का लगभग अभाव है और जो दैहिक आवश्यकताओं से कदाचित रहित है, ठीक यीशु की तरह, जिसका केवल बाह्य रूप सामान्य व्यक्ति का था और जिसने सामान्य व्यक्ति का रूप-रंग धारण किया था, किंतु सार रूप में उस सबसे परिपूर्ण नहीं था जिससे सामान्य व्यक्ति को युक्त होना चाहिए। इससे यह देखा जा सकता है कि देहधारी परमेश्वर का सार सामान्य मानवता की संपूर्णता को समाहित नहीं करता, बल्कि उन चीजों के केवल एक भाग को ही समाहित करता है जिनसे लोगों को युक्त होना चाहिए, ताकि वे सामान्य मानव जीवन के नित्यकर्मों को जारी रख सकें और सामान्य मानव तर्क-शक्तियों का उपयोग कर सकें। परंतु इन चीजों का उस सबसे कोई लेना-देना नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य मानवता मानता है। वे वही हैं जिनसे देहधारी परमेश्वर को युक्त होना चाहिए। तथापि, ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि देहधारी परमेश्वर को सामान्य मानवता से युक्त केवल तभी कहा जा सकता है जब उसकी पत्नी, बेटे और बेटियाँ, परिवार हो; वे कहते हैं कि इन चीज़ों के बिना वह सामान्य व्यक्ति नहीं है। तब मैं तुमसे पूछता हूँ, कि "क्या परमेश्वर की कोई पत्नी है? क्या यह संभव है कि परमेश्वर का एक पति हो? क्या परमेश्वर के बच्चे हो सकते हैं?" क्या ये भ्रांतियाँ नहीं हैं? तिस पर भी देहधारी परमेश्वर चट्टानों के बीच दरार से प्रस्फूटित नहीं हो सकता है या आसमान से नीचे नहीं टपक सकता है। वह केवल सामान्य मानव परिवार में ही जन्म ले सकता है। यही कारण है कि उसके माता-पिता और बहनें हैं। यही वे चीज़ें हैं जो देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में होनी चाहिए। यीशु का मामला भी ऐसा ही था; यीशु के पिता और माता, बहनें और भाई थे, और यह सब सामान्य था। परंतु यदि उसकी पत्नी और बेटे और बेटियाँ होतीं, तो उसकी मानवता वह सामान्य मानवता नहीं होती जिससे देहधारी परमेश्वर के युक्त होने का परमेश्वर ने मनोरथ किया था। यदि ऐसी स्थिति होती, तो वह दिव्यता की ओर से कार्य नहीं कर पाता। ठीक इसीलिए कि उसकी पत्नी या बच्चे नहीं थे, और फिर भी वह एक सामान्य परिवार में सामान्य लोगों से जन्मा था, वह दिव्यता का कार्य कर पाने में समर्थ था। इसे और स्पष्ट करने के लिए, परमेश्वर उसे ही सामान्य व्यक्ति मानता है जो सामान्य परिवार में जन्मा व्यक्ति है। केवल ऐसा ही व्यक्ति दिव्यता का कार्य करने की योग्यता से संपन्न है। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति की पत्नी, बच्चे, या पति हैं, तो वह व्यक्ति दिव्यता का कार्य नहीं कर पाएगा, क्योंकि वे केवल उस सामान्य मानवता ये युक्त होंगे जो मनुष्य को चाहिए, किंतु उस सामान्य मानवता से युक्त नहीं होंगे जो परमेश्वर को चाहिए। परमेश्वर द्वारा जो माना जाता है और लोग जो समझते हैं, उसमें प्रायः अत्यधिक भिन्नता होती है, एक-दूसरे से बिलकुल अलग। परमेश्वर के कार्य के इस चरण में बहुत कुछ ऐसा होता है जो लोगों की धारणाओं के विपरीत होता है और उनसे बहुत अधिक भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूर्ण रूप से स्वयं दिव्यता द्वारा अपने हाथों से रचित होता है, जिसमें मानवता सहायक की भूमिका निभाती है। चूँकि परमेश्वर, मनुष्य को इसमें शामिल होने देने के बजाय, अपना कार्य स्वयं करने के लिए पृथ्वी पर आता है, इसलिए वह अपना कार्य करने के लिए देह में (एक अपूर्ण, सामान्य व्यक्ति में) अवतरित होता है। वह मनुष्यजाति को एक नया युग भेंट करने, मानवजाति को अपने कार्य के अगले चरण के बारे में बताने, और लोगों से उसके वचनों में वर्णित मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाने के लिए इस देहधारण का उपयोग करता है। इस प्रकार, देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है; वह मनुष्यजाति को छोड़कर जाने वाला होता है, सामान्य मानवता की देह में अब और निवास नहीं करता है, बल्कि मनुष्य से दूर जाते हुए अपने कार्य के दूसरे भाग की ओर बढ़ जाता है। फिर, अपने हृदय के अनुरूप लोगों का उपयोग करते हुए, वह पृथ्वी पर लोगों के इस समूह के बीच, किंतु उनकी मानवता के भीतर, अपना कार्य जारी रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच अनिवार्य अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 139

देहधारी परमेश्वर हमेशा के लिए मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है क्योंकि परमेश्वर के पास करने के लिए और भी बहुत से कार्य हैं। उसे देह में बाँधा नहीं जा सकता है; उसे वह कार्य करने के लिए जो उसे करना ही चाहिए देह छोड़नी पड़ती है, भले ही वह कार्य वह देह की छवि में करता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह उस समय तक प्रतीक्षा नहीं करता जब तक उसने वह रूप न प्राप्त कर लिया हो जो सामान्य व्यक्ति को मरने या मनुष्यजाति को छोड़कर जाने से पहले प्राप्त करना होता है। उसकी देह की चाहे कुछ भी उम्र हो, जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो वह मनुष्य को छोड़कर चला जाता है। उसके लिए आयु जैसी कोई चीज़ नहीं होती है। वह मानव जीवनकाल के अनुसार अपने दिनों की गिनती नहीं करता है; इसके बजाय, वह अपने कार्य के चरणों के अनुसार देह में अपना जीवन समाप्त करता है। ऐसे लोग हो सकते हैं जो महसूस करते हों कि देह में आने पर, परमेश्वर की एक निश्चित सीमा तक उम्र बढ़नी ही चाहिए, उसे वयस्क होना ही चाहिए, वृद्धावस्था तक पहुँचना ही चाहिए, और केवल तभी छोड़कर जाना चाहिए जब उसका शरीर जवाब देने लगे। यह मनुष्य की कल्पना है; परमेश्वर इस प्रकार कार्य नहीं करता है। वह देह में केवल वह कार्य करने के लिए आता है जो उसे करना ही होता है, और वह सामान्य मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता है, जिसमें वह माता-पिता से जन्म ले, बड़ा हो, परिवार बनाए और जीविका आरंभ करे, बच्चे प्राप्त करे और उन्हें पाले-पोसे, या जीवन के उतार-चढ़ावों का अनुभव करे—वह सब जो एक सामान्य मनुष्य की गतिविधियाँ होती हैं। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो वह एक देह धारण किए हुए परमेश्वर का आत्मा होता है, जो देह में आता है, किंतु परमेश्वर सामान्य मानव का जीवन नहीं जीता है। वह केवल अपनी प्रबंधन योजना का एक भाग संपन्न करने के लिए आता है। उसके पश्चात वह मनुष्यजाति को छोड़कर चला जाता है। जब वह देह में आता हैतो परमेश्वर का आत्मा देह की सामान्य मानवता को पूर्ण नहीं करता है। बल्कि, परमेश्वर के पूर्वनिर्धारित समय पर, दिव्यता सीधे अपना कार्य करती है। फिर, वह सब करने के बाद जो उसे करने की आवश्यकता होती है और अपनी सेवकाई पूरी तरह पूर्ण करने के पश्चात, परमेश्वर की आत्मा का इस चरण का कार्य संपन्न हो जाता है, इसी बिंदु पर देहधारी परमेश्वर का जीवन भी समाप्त हो जाता है, फिर चाहे उसके दैहिक शरीर ने अपने आयुकाल की अवधि जी हो या नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि दैहिक शरीर जीवन की चाहे जिस अवस्था तक पहुँचे, पृथ्वी पर यह चाहे जितने लंबे समय रहे, सब कुछ पवित्रात्मा के कार्य द्वारा निर्णीत किया जाता है। इसका उससे कोई लेना-देना नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य मानवता मानता है। यीशु का ही उदाहरण लो। वह देह में साढ़े तैंतीस साल रहा। मानव शरीर के जीवनकाल के अनुसार, उसे उस आयु में मरना नहीं चाहिए था, और उसे छोड़कर जाना नहीं चाहिए था। परंतु यह परमेश्वर की आत्मा के लिए कोई चिंता का विषय नहीं था। उसका कार्य समाप्त हो गया, तो शरीर ले लिया गया, जो पवित्रात्मा के साथ विलुप्त हो गया। यही वह सिद्धांत है जिससे परमेश्वर देह में कार्य करता है। और इसलिए, यदि सही-सही कहें, तो प्राथमिक महत्व देहधारी परमेश्वर की मानवता का नहीं है। इसे फिर से कहा जाए तो वह पृथ्वी पर सामान्य मानव प्राणी का जीवन जीने के लिए नहीं आता है। वह ऐसा नहीं करता कि पहले सामान्य मानव जीवन स्थापित करे और फिर कार्य करना आरंभ करे। बल्कि, जब तक उसने एक सामान्य मानव परिवार में जन्म ले रखा है, वह दिव्य कार्य कर पाने में सक्षम होता है, ऐसा कार्य जो मनुष्य के मंतव्यों से निष्कलंकित होता है; जो दैहिक नहीं होता है, और जो निश्चित रूप से समाज के तौर-तरीक़े नहीं अपनाता है या मनुष्य के विचारों या धारणाओं में नहीं फँसता है; और, इतना ही नहीं, वह अपना जीवन जीने के लिए मनुष्य के फ़लसफ़ों को नहीं अपनाता है। यही वह कार्य है जो देहधारी परमेश्वर करना चाहता है, और यही उसके देहधारण का व्यावहारिक महत्व है। परमेश्वर देह में आता है तो अन्य तुच्छ प्रक्रियाओं से गुज़रे बिना, प्राथमिक रूप से कार्य का वह चरण करने के लिए आता है जो देह में ही करने की आवश्यकता होती है; और, जहाँ तक सामान्य मनुष्य के अनुभवों की बात है, तो वे उसे नहीं होते हैं। देहधारी परमेश्वर की देह को जो कार्य करने की आवश्यकता होती है उसमें सामान्य मानवीय अनुभव शामिल नहीं होते हैं। इसलिए परमेश्वर देह में आता है तो वह कार्य संपन्न करने के वास्ते आता है जो उसे देह में रहकर ही संपन्न करने की आवश्यकता होती है। बाक़ी चीजों का उससे कोई लेना-देना नहीं होता है; वह अन्य सभी तुच्छ प्रक्रियाओं से नहीं गुज़रता है। एक बार जब उसका कार्य पूरा हो जाता है, तब उसके देहधारण का महत्व भी समाप्त हो जाता है। यह चरण समाप्त करने का अर्थ है कि वह कार्य जो उसे देह में करने की आवश्यकता है समाप्त हो गया है, और उसकी देह की सेवकाई पूरी हो गई है। परंतु वह देह में अनिश्चित काल तक कार्य करता नहीं रह सकता है। उसे कार्य करने के लिए अन्य स्थान पर, देह के बाहर एक स्थान पर, जाना होता है। केवल इसी प्रकार उसका कार्य पूरी तरह किया जा सकता है, और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है। परमेश्वर अपनी मूल योजना के अनुसार कार्य करता है। उसे कौनसा कार्य करने की आवश्यकता है और वह कौनसा कार्य पूरा कर चुका है, यह वह अपने हाथ की हथेली की तरह स्पष्ट रूप से जानता है। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को उस मार्ग पर चलने के लिए ले जाता है जो उसने पहले ही पूर्वनिर्धारित कर दिया है। कोई भी इससे बच नहीं सकता है। केवल वे ही जो परमेश्वर के आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं, विश्राम में प्रवेश कर पाएँगे। हो सकता है कि, बाद के कार्य में, मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए देह में बोल रहा यह परमेश्वर नहीं हो, बल्कि मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर रहा इंद्रियगोचर रूप में पवित्रात्मा हो। केवल तभी मनुष्य ठोस ढँग से परमेश्वर को स्पर्श कर पाएगा, परमेश्वर को देख पाएगा, और उस वास्तविकता में बेहतर प्रवेश कर पाएगा जिसकी परमेश्वर को अपेक्षा है, ताकि उसे व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सके। यही वह कार्य है जिसे परमेश्वर संपन्न करना चाहता है, और जिसकी उसने बहुत पहले योजना बनाई थी। इससे, तुम सब लोगों को वह मार्ग देख पाना चाहिए जिसे तुम लोगों को अपनाना चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच अनिवार्य अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 140

देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए वह मसीह जो लोगों को सत्य दे सकता है परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर का सार धारण करता है, और अपने कार्य में परमेश्वर का स्वभाव और बुद्धि धारण करता है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। वे जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते हैं, धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर मनुष्य के बीच रहकर अपना कार्य करता और पूरा करता है। यह देह किसी भी आम मनुष्य द्वारा उसके बदले धारण नहीं की जा सकती है, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पर्याप्त रूप से संभाल सकती है और परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, और परमेश्वर का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व कर सकती है, और मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है। जो मसीह का भेस धारण करते हैं, उनका देर-सवेर पतन हो जाएगा, क्योंकि वे भले ही मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें मसीह के सार का लेशमात्र भी नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती, बल्कि स्वयं परमेश्वर द्वारा ही इसका उत्तर दिया और निर्णय लिया जा सकता है। इस तरह, यदि तुम जीवन का मार्ग सचमुच खोजना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी पर आकर ही परमेश्वर मनुष्य को जीवन का मार्ग प्रदान करने का कार्य करता है, और तुम्हें स्वीकार करना होगा कि अंत के दिनों के दौरान ही वह मनुष्य को जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए पृथ्वी पर आता है। यह अतीत नहीं है; यह आज हो रहा है।

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लेकर आता है। यह सत्य वह मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यह एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते हो, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। वे लोग जो नियमों से, शब्दों से नियंत्रित होते हैं, और इतिहास की जंजीरों में जकड़े हुए हैं, न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का शाश्वत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास, सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल की बजाय, बस मैला पानी ही है जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। वे जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की गई है, हमेशा के लिए मुर्दे, शैतान के खिलौने, और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की कोशिश करते हो, केवल जड़वत खड़े रहकर चीजों को जस का तस रखने की कोशिश करते हो, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को ख़ारिज़ करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के चरण उमड़ती लहरों और गरजते तूफानों की तरह विशाल और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निठल्ले बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, अपनी नादानी से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? तुम जिस परमेश्वर को थामे हो उसे उस परमेश्वर के रूप में सही कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को ढूँढ़ने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? तुम अपने हाथों में जो थामे हो वे शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं दे सकते। तुम जो शास्त्र पढ़ते हो वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं और ये बुद्धिमत्ता के वचन नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए गहन चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों का बोध नहीं करवाती है? क्या तुम परमेश्वर से अकेले में मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग को सौंप देने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा सुझाव यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—उसकी ओर देखो जो अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।

मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जो लोग जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं सदा के लिए परमेश्वर की घृणा के भागी होंगे। मसीह अंत के दिनों के दौरान राज्य में जाने के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है, और ऐसा कोई नहीं जो उससे कन्नी काटकर जा सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन का पोषण स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम केवल आशीष प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वह उसमें सच्चा विश्वास करने वाले सभी लोगों को जीवन प्रदान कर सके। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और उसका कार्य वह मार्ग है जिसे उन सभी लोगों को अपनाना चाहिए जो नए युग में प्रवेश करेंगे। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और इसकी बजाय उसकी भर्त्सना, निंदा, या यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर करने के लिए अपना कार्य सौंपा है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते हो जो अंत के दिनों के मसीह के द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को जो प्रतिशोध सहना होगा वह सभी के लिए स्वत: स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करोगे, यदि तुम अंत के दिनों के मसीह को ठुकराओगे, तो तुम्हारी ओर से परिणाम भुगतने वाला कोई अन्य नहीं होगा। इतना ही नहीं, इस दिन के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का दूसरा अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने प्रायश्चित का प्रयास भी करते हो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देखोगे। क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, तुम जिसे ठुकरा रहे हो वह कोई अदना प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या परिणाम होंगे? तुमन कोई छोटी-मोटी गलती नहीं, बल्कि एक जघन्य अपराध किया होगा। और इसलिए मैं सभी को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने जहरीले दाँत मत दिखाओ, या छिछोरी आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने नहीं दे सकता, और न ही तुम्हें दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

पिछला: III. अंत के दिनों में न्याय

अगला: V. परमेश्वर के कार्य को जानना

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

अध्याय 8

जब मेरे प्रकाशन अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचेंगे, और जब मेरा न्याय अंत के निकट आएगा, तब यह वह समय होगा जब मेरे सभी लोग प्रकट और पूर्ण बना दिए...

गंतव्य के बारे में

जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से...

अध्याय 9

लोगों की कल्पना में, परमेश्वर परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य हैं। परमेश्वर मनुष्य की भाषा नहीं बोलता, न ही मनुष्य परमेश्वर की भाषा बोल सकते...

मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए

मानवीय दृष्टिकोण से, मोआब के वंशजों को पूर्ण बनाना संभव नहीं है, न ही वे पूर्ण बनाए जाने के योग्य हैं। दूसरी ओर, दाऊद के बच्चों को लेकर...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें