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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

7. बाहरी अच्छे कर्मों और स्वभाव में परिवर्तनों के बीच अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

स्वभाव का परिवर्तन क्या है? तुम्हें सत्य का प्रेमी होना चाहिए, जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए, और अपने भीतर उपस्थित शैतानी विष से स्वयं के शुद्धिकरण के लिए सभी तरह की पीड़ाओं और परिशोधन का अनुभव करना चाहिए। इसे स्वभाव में परिवर्तन कहा जाता है। ... परमेश्वर के घर में जिस स्वभाव के परिवर्तन के बारे में बात की जाती है, उसका मतलब है कि एक व्यक्ति, क्योंकि वह सत्य को प्यार करता है और उसे स्वीकार कर सकता है, अंततः अपने अवज्ञाकारी और परमेश्वर-विरोधी स्वभाव को जान जाता है; वह समझता है कि मनुष्य का दूषण बहुत गहरा है और मनुष्य की व्यर्थता और धोखाधड़ी को समझता है। वह मनुष्य की कमी और दयनीयता को जानता है, और अंत में मनुष्य के स्वभाव और सार को समझ पाता है। यह सब जानते हुए, वह स्वयं को पूरी तरह अस्वीकार और त्याग कर सकता है, परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है, और प्रत्येक चीज़ में सत्य पर चल सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को जानता है और उसका स्वभाव बदल चुका है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से

स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से तुम्हारी प्रकृति में परिवर्तन से सम्बंधित है। प्रकृति कुछ ऐसी चीज़ नहीं है जिसे तुम बाहर के व्यवहारों से देख सको; प्रकृति में लोगों के अस्तित्व का मूल्य और महत्व सीधे ही शामिल हैं। इसमें प्रत्यक्षतः मानव जीवन के मूल्य, आत्मा के भीतर गहराई में रही चीज़ें, और लोगों का सार शामिल हैं। अगर लोग सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते, तो इन पहलुओं में उनमें कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल यदि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है और पूरी तरह से सच्चाई में प्रवेश किया है, यदि उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर उनके मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, यदि चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और यदि वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो सकते हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव बदल गए हैं। ऐसा लग सकता है कि तुम कुछ प्रयास कर रहे हो, तुम कठिनाइयों के सामने लचकदार हो सकते हो, तुम ऊपर से मिली कार्य व्यवस्था को पूरा करने में सक्षम हो सकते हो, या तुम्हें जहाँ भी जाने के लिए कहा जाए तुम वहाँ जा सकते हो, लेकिन ये तुम्हारे कर्मों में केवल छोटे परिवर्तन हैं, और तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन बन जाने के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं। तुम कई रास्तों पर जाने में सक्षम हो सकते हो, और तुम कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो तथा घोर अपमान को सहन करने में सक्षम हो सकते हो; तुम महसूस कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के बहुत करीब हो और पवित्र आत्मा तुम्हारे में काम कर रहा है, लेकिन जब परमेश्वर तुम से कुछ ऐसा करने के लिए अनुरोध करता है जो तुम्हारे विचारों के अनुरूप नहीं है, तो तुम अभी भी प्रस्तुत नहीं होते हो, तुम बहाने ढूँढते हो, और तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करते हो, इस हद तक कि तुम परमेश्वर को दोष देते हो और उसके सामने प्रतिवाद करते हो। यह एक गंभीर समस्या है! यह साबित करता है कि तुम्हारे में अभी भी परमेश्वर का विरोध करने की प्रकृति है और तुम ज़रा भी परिवर्तित नहीं हुए हो।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से " तुम्हारे स्वभाव को बदलने के बारे में तुम्हें क्या पता होना चाहिए" से

है, कि तुम एक ऐसे व्यक्ति बनो जो बिलकुल ठीक से व्यवहार करता हो, या कानून को मानने वाला हो, या कोई ऐसा व्यक्ति जो स्वयं के लिए सोचने या अपने दिमाग का उपयोग करने में ही असमर्थ हो। लोग सोचते थे कि परमेश्वर में विश्वास से आने वाले स्वभाव के परिवर्तनों का मतलब था एक शालीन व्यक्ति होना, कि इसका अर्थ था बाहरी रूप से कुछ मानवीय सदृशता का होना, अच्छी तरह से बड़ा किया जाना, और धैर्यपूर्ण, या पवित्र या प्रेमपूर्ण प्रतीत होना, और दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार होना और धर्मार्थी बनना। संक्षेप में, इसका मतलब था एक इस प्रकार का भला व्यक्ति बन जाना जो उनकी धारणाओं और कल्पनाओं में विद्यमान था। यह दुनिया के उन लोगों के होने के बराबर है जो कहते हैं, "यदि तुम अमीर हो, तो तुम्हें गरीबों या भिखारियों को दान देना चाहिए।" ... इस प्रकार, बहुत से लोग मानते थे कि परमेश्वर में विश्वास का मतलब किसी व्यक्ति के बाहरी व्यवहार, सोच और क्रियाओं में थोड़े बदलावों से कुछ ज़्यादा नहीं था और कुछ लोग तो ऐसे भी थे जो मानते थे कि परमेश्वर में विश्वास का अर्थ था बहुत कठिनाई का सामना करना, अच्छा भोजन नहीं खाना, और अच्छे कपड़े नहीं पहनना। उदाहरण के लिए, पश्चिम में एक कैथलिक नन या ईसाई साध्वी थी (कैथलिक पंथ भी एक धर्म है; नन या ईसाई साध्वियों के लिए, यह एक तरह का विश्वास भी है), जो मानती थी कि परमेश्वर में विश्वास का अर्थ था अपने सारे जीवन में अधिक कष्ट उठाना, और अच्छा भोजन कम खाना, अपने जीवन में स्वयं को बहुत-सी सुन्दर चीज़ों का आनंद लेने की अनुमति न देना, और जब भी अपने पास धन हो तो गरीब या जरूरतमंद लोगों को दे देना—या फिर, और अधिक भले काम करना, लोगों के प्रति अधिक धर्मार्थी होना, और दूसरों के लिए अधिक सहायक होना। पूरे जीवन में उसने कष्टों को झेलने के अलावा और कुछ भी नहीं किया, और खुद को कभी अच्छा भोजन करने या अच्छे कपड़े पहनने नहीं दिया। जब उसका निधन हुआ, उसने कुछ भी ऐसा नहीं पहना था जो दो डॉलर से अधिक की लागत का हो; उसके दैनिक जीवन का खर्च भी चंद डॉलर से अधिक न था। उसकी कहानी शायद दुनिया भर में एक सामान्य या प्रमुख समाचार के रूप में प्रकट हुई थी। और यह क्या दर्शाता है? मानव जाति की नजरों में, केवल इस तरह का कोई व्यक्ति ही एक अच्छा और दयालु व्यक्ति है, केवल वे ही उन लोगों में से हैं, जो धार्मिक समुदाय के अनुसार भली चीज़ें और दयापूर्ण कर्म करते हैं, केवल वे ही बदले हैं, और उन्हें वास्तव में परमेश्वर में विश्वास है। और इसलिए यह संभव है कि तुम इससे भिन्न नहीं हो: तुम निश्चित रूप से मानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करना और निष्ठा रखना एक अच्छा व्यक्ति होने से सम्बंधित है। और किस तरह का व्यक्ति? कोई ऐसा व्यक्ति जो दूसरों के साथ लड़ता नहीं है, या उन्हें शाप नहीं देता है, या अपशब्द नहीं बोलता है, जो बुरे काम नहीं करता है, कोई जो ऐसा दिखता है जैसे कि वह परमेश्वर में विश्वास करता हो; इसके अलावा, कुछ ऐसे भी हैं, जो कहते हैं कि व्यक्ति ऐसा हो जो परमेश्वर को महिमा दिलाए। ... परमेश्वर मनुष्य को बचाने की इच्छा रखता है, उसने कई वचन कहे हैं, और बहुत कार्य किया है—तो वह क्या चाहता है कि लोग कैसे बनें? वह चाहता है कि लोगों के विचार सच्चाई के द्वारा निर्देशित हों, और वे अपने जीवन सच्चाई के आदर्शों के अनुसार जिएँ। वह यह नहीं चाहता कि तुम एक कठपुतली की तरह विचारशून्य हो जाओ, वह यह तो और भी नहीं चाहता है कि तुम शाक-सब्जी की तरह सम-भावी बन जाओ, और कोई भी सामान्य भावनाओं से रहित हो जाओ। इसके बजाय, वह चाहता है कि तुम एक सामान्य व्यक्ति बनो जो उसे प्यार करे जिसे वह पसंद करता है, और उससे नफरत करे जिसे वह नापसंद करता है, जो उसमें आनंदित हो जो उसे प्रसन्न करता है, और उसे तिरस्कृत और अस्वीकार करे जिससे वह घृणा करता है। ... मैं यह इसी वजह से कहता हूँ कि तुम नहीं जानते कि स्वभाव में बदलाव का क्या अर्थ है। तुम केवल अपने व्यवहार में, अपने बाहरी कार्य-कलाप में, और अपने स्वभाव और चरित्र में स्वयं की सीमाएँ निर्धारित कर देते हो। इस तरह से तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करना तुम्हारे लिए असंभव होगा। परमेश्वर के वचनों में यह कहाँ कहा गया है कि, "तुम्हें अपनी सीमाएँ निर्धारित करनी चाहिए, तुम्हें अपने शब्दों का ध्यान रखना चाहिए, अपनी भावनाओं को संयमित रखना चाहिए और अपने क्रोध को नियंत्रण में रखना चाहिए, तुम्हें अपनी प्राकृतिक पहचान का प्रदर्शन करने से सावधान रहना चाहिए, और तुम जो कपड़े खरीदते और पहनते हो, उनमें संयम रखना चाहिए"? क्या उसने कभी ऐसा कहा है? अगर कहीं ऐसी बातों का संदर्भ हो भी, तो वे बातें उसके वचनों का मूल बिंदु नहीं होती हैं, न ही वे वो मुख्य सच्चाइयाँ होती हैं जो लोगों के स्वभाव में बदलाव लाती हैं। परमेश्वर के अधिकांश वचन मनुष्य के भ्रष्ट सार की बात करते हैं, मनुष्य के भ्रष्ट सार को किस तरह पहचानना है इसकी बात करते है, वे यह बताते हैं कि मनुष्य कैसे अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर सकता है, कैसे वह अपने भ्रष्ट सार को सचमुच जान सकता है और कैसे वह अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त होकर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य कर सकता है और कोई ऐसा व्यक्ति बन सकता है जो परमेश्वर के दिल के मुताबिक हो, और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करता हो। यदि तुम इसे समझते हो, तो क्या तुम अभी भी अपने प्रयासों को बाहरी कार्यों में रखोगे? क्या तुम अभी भी ऐसे सतही मामलों में खुद को गाँठों की तरह उलझाये रखोगे? इस प्रकार, यदि तुम स्वभाव में परिवर्तन के अर्थ को नहीं समझते हो, तो तुम स्वभाव में परिवर्तनों के सार तक नहीं पहुँचोगे, और कभी भी अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त नहीं करोगे। विशेष रूप से, जो अभी-अभी धर्म से आए हैं वे अब भी पूरी तरह से अपने मन और परिप्रेक्ष्य में धार्मिक समारोह और धार्मिक सोच और दृष्टिकोणों से परमेश्वर के विश्वास के प्रति तबदील नहीं हुए हैं; वे अभी भी आध्यात्मिक, पवित्र और धीर होने की कोशिश करते हैं, कुछ ऐसा व्यक्ति होने की कोशिश करते हैं जो कि स्वाभाविक रूप से अच्छा हो, जो भलाई करना और दूसरों को देना पसंद करता हो। यह बिल्कुल गलत है! यदि तुम उस व्यक्ति की तरह होने का अनुसरण करते हो, तो तुम परमेश्वर के द्वारा कभी भी प्रशंसित न होगे। 

"मसीह के प्रवचनों के अभिलेख" में "स्वभाव के परिवर्तन क्या हैं और स्वभाव के परिवर्तनों का मार्ग" से

अधिकांश लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष जोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में परिवर्तन होते हैं। परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, वे दूसरों के साथ बहस करना बंद कर देते हैं, वे लोगों से लड़ना और उन्हें अपमानित करना बंद कर देते हैं, वे धूम्रपान करना और शराब पीना छोड़ देते हैं, वे किसी भी सार्वजनिक संपत्ति की चोरी नहीं करते-चाहे वह एक कील या लकड़ी का एक टुकड़ा ही क्यों न हो-और यहाँ तक कि जब उन्हें कुछ नुकसान होता है या उनके साथ कुछ गलत होता है, वे इसे अदालतों में नहीं ले जाते। निश्चय ही, कुछ बदलाव उनके व्यवहार में होते हैं। क्योंकि, परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, सच्चे मार्ग को स्वीकार करना उन्हें विशेष रूप से अच्छा लगता है, और चूँकि उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य के अनुग्रह को भी चख लिया है, वे विशेष रूप से उत्साहित हैं, और यहाँ तक ​​कि कुछ भी ऐसा नहीं होता है जिसका वे त्याग नहीं कर सकते या जिसे वे कर नहीं सकते। फिर भी, तीन, पांच, दस या तीस साल के लिए विश्वास करने के बाद-चूँकि उनके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, अंत में वे पुराने तरीकों में लौट आते हैं, उनका अहंकार और दंभ बढ़ जाते हैं, और वे सत्ता और मुनाफे के लिए लड़ना शुरू करते हैं, वे चर्च के धन का लालच करते हैं, वे कुछ भी करते हैं जो उनके अपने हित के लिए होता है, वे पदवी और सुख चाहते हैं, और वे परमेश्वर के घर के परजीवी बन जाते हैं। विशेष रूप से, अधिकांश नेता बिगड़ जाते हैं। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? जो परिवर्तन व्यवहार से अधिक किसी बात में नहीं होते, वे देर तक नहीं टिकते हैं। अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनका दुष्ट पक्ष स्वयं को दिखाएगा। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य के साथ मिलकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छा बनना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा काम करना आसान है, मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे काम किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ हैं। उनका व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उनका जीवन है, उनका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल वही जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जीवन का और किसी के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकती। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार के साथ सजाने के लिए नहीं होता-परमेश्वर का कार्य लोगों के स्वभाव को बदलने के लिए, उन्हें नए लोगों में पुनर्जीवित करने के लिए होता है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के लिए हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता और निष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करने के समान नहीं है, और यह मसीह के साथ सुसंगत होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं—वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सच्चाई पर आधारित नहीं होते हैं, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में आश्रित तो और भी कम होते हैं। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करते हैं, या वे सच्चाई का अभ्यास करते हैं। व्यावहारिक परिवर्तन क्षणिक भ्रम हैं, वे पुरजोशी की अभिव्यक्ति हैं, और वे जीवन की अभिव्यक्ति नहीं हैं।... लोग अच्छी तरह से व्यवहार कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास सच्चाई है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; जो लोग सच्चाई से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, और सिद्धांत सत्य के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता।... कुछ नए विश्वासियों ने, परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, लौकिक संसार को पीछे छोड़ दिया है; जब वे अविश्वासियों से मिलते हैं तो वे कुछ नहीं बोलते हैं, और वे शायद ही कभी अपने रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं, और अविश्वासियों का कहना होता है, "यह व्यक्ति सचमुच बदल चुका है।" इसलिए वे सोचते हैं, "मेरा स्वभाव सचमुच बदल गया है- अविश्वासियों ने कहा है कि मैं बदल गया हूँ।" सच कहें तो, क्या उनके स्वभाव में वास्तव में बदलाव आया है? नहीं आया है। ये केवल बाह्य परिवर्तन हैं। उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, और उनकी पुरानी प्रकृति उनके भीतर बनी हुई है, पूरी तरह अछूती रही है। कभी-कभी, लोग पवित्र आत्मा के कार्य की वजह से उत्साह की गिरफ़्त में आ जाते हैं; कुछ बाहरी परिवर्तन होते हैं, और वे कुछ अच्छे कर्म करते हैं। लेकिन यह स्वभाव में परिवर्तन के बराबर नहीं है। तुम बिना सच्चाई के हो, चीजों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण नहीं बदला है, यहाँ तक ​​कि यह अविश्वासी लोगों से भी अलग नहीं है, और जीवन के बारे में तुम्हारे मूल्य और दृष्टिकोण नहीं बदले हैं। तुम्हारे पास एक ऐसा हृदय भी नहीं है जो परमेश्वर का सम्मान करे, जो कि न्यूनतम है जिसे तुम्हारे पास होना चाहिए। तुम्हारे स्वभाव में बदलाव हुआ ही नहीं है।

"मसीह के प्रवचनों के अभिलेख" में "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर" से

धर्म के दायरे में, बहुत से लोग सारा जीवन निरर्थकता से कष्ट भोगते हैं, अपने शरीर को नियंत्रित करते हुए या अपना बोझ उठाते हुए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस तक पीड़ा सहते हुए! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह में भी उपवास रखते हैं। वे अपने पूर्ण जीवन के दौरान स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़े से दूर रखते हैं, और केवल पीड़ा पर ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में कर पाते हैं और अपने शरीर को त्याग पाते हैं। पीड़ा सहन करने की उनकी भावना सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी धारणाएं, उनका मानसिक रवैया, और वास्तव में उनका पुराना स्वभाव—इनमें से किसी के साथ बिल्कुल भी निपटा नहीं गया है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक निराकार, अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प उनके उत्साह और उनके सकारात्मक स्वभाव से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न ही उसकी इच्छा जानते हैं।. वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हैं और पीड़ा सह रहे हैं। विवेकी बनने पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करती हो। उन्हें इसका ज्ञान उससे भी कम है कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं वह परमेश्वर की अपनी मूल छवि नहीं है, बल्कि एक ऐसा परमेश्वर है जिसे उन्होंने स्वयं बनाया, जिसके बारे में उन्होंने सुना, या एक ऐसा पौराणिक परमेश्वर है जिसके बारे में उन्होंने लेखों में पढ़ा। फिर वे अपनी ज्वलंत कल्पनाओं और अपने परमेश्वरीय हृदयों का उपयोग परमेश्वर के लिए पीड़ित होने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य को अपने ऊपर ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अयथार्थ है, ऐसी कि व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो ऐसा कोई नहीं है जो वास्तव में परमेश्वर की सेवा एक ऐसे तरीके से कर रहा है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करता हो। इससे फर्क नहीं पड़ता कि वे पीड़ा भुगतने को कितने तैयार हों, उनकी सेवा का मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना और उसके शुद्धिकरण और सिद्धता के माध्यम से नहीं गुज़रे हैं, और कोई उन्हें सत्य के साथ आगे नहीं ले गया है। यहां तक कि अगर वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते भी हैं, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं है। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से उसे जानते हैं। इसलिए, उनकी सेवा आँख बंद कर बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे कौन स्वीकार करेगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को अपनी स्वाभाविकता और वे स्वयं क्या पसंद करते हैं उस पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है?… क्या आजकल तुम लोगों की अधिकांश सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह नहीं? जिन सभी लोगों ने न्याय नहीं प्राप्त किया है, जिनकी काँट-छाँट और जिनका निपटारा नहीं किया गया है, जो नहीं बदले हैं—क्या ये वे नहीं जिन पर विजय प्राप्ति अधूरी है।? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं प्राप्त करोगे! दर्शन के बिना और परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ के बिना, तुम एक ऐसे व्यक्ति नहीं बन सकते जिस पर विजय प्राप्त की गई हो। परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका फिर उन लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं—इसका शायद ही कोई मूल्य हो! यह इसलिए है क्योंकि वे जो करते हैं उसकी शायद ही कोई गवाही हो और मैं कहता हूं कि उनकी सेवा व्यर्थ है! अपने जीवनकाल के दौरान, ये लोग कष्ट भोगते हैं, जेल में समय बिताते हैं, और हर पल वे कष्ट सहते हैं, प्यार और दयालुता पर ज़ोर देते हैं, और अपना क्रूस उठाते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम और अस्वीकार करती है और वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। वे अंत तक आज्ञा का पालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति का कोई भी साक्ष्य पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी विचारधारा, धार्मिक प्रथाओं, मानव निर्मित समझों और मानवीय विचारों में से किसी से भी निपटा नहीं गया। इनमें कोई नई समझ नहीं है। परमेश्वर की उनकी समझ का थोड़ा-सा हिस्सा भी सही या सटीक नहीं है। उन्होंने परमेश्वर की इच्छा को गलत समझा है। क्या यह परमेश्वर की सेवा के लिए हो सकता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य (3)" से

जब कभी भी ऐसे धार्मिक लोग जमा होते हैं, वे पूछते हैं, "बहन, इन दिनों तुम कैसी रही हो?" वह उत्तर देती है, "मैं परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ महसूस करती हूँ और कि मैं उसके हृदय की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हूँ।" दूसरी कहती है, "मैं भी परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हूँ और उसे संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।" ये कुछ वाक्य और वचन अकेले ही उनके हृदयों की गहराई की अधम चीजों को व्यक्त करते हैं। ऐसे वचन अत्यधिक घृणित और अत्यंत अरुचिकर हैं। ऐसे मनुष्यों की प्रकृति परमेश्वर का विरोध करती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हैं वे वही संचारित करते हैं जो उनके हृदयों में होता है और संवाद में अपने हृदय को खोल देते हैं। उनमें एक भी झूठा श्रम, कोई शिष्टताएँ या खोखली मधुर बातें नहीं होती है। वे हमेशा स्पष्ट होते हैं और किसी पार्थिव नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनमें, बिना किसी समझ के, बाह्य प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है। जब कोई दूसरा गाता है, तो वह नाचने लगता है, यहाँ तक कि यह समझे बिना कि उसके बरतन का चावल पहले से ही जला हुआ है। लोगों के इस प्रकार के चाल-चलन धार्मिक या सम्माननीय नहीं हैं, और बहुत ही तुच्छ हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ है! कुछ आत्मा में जीवन के मामलों के बारे में संगति के लिए इकट्ठा होते हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने की बात नहीं करते हैं, फिर भी वे अपने हृदयों में उसके प्रति एक सच्चे प्यार को कायम रखते हैं। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कृतज्ञता का दूसरों से कोई लेना देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो, न कि किसी मनुष्य के प्रति। इसलिए इस बारे में लगातार दूसरों से कहना तुम्हारे किस उपयोग का है? तुम्हें अवश्य सच्चाई में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को।

मनुष्य के सतही अच्छे कर्म किस चीज का प्रतिनिधित्व करते हैं? वे देह का प्रतिनिधित्व करते हैं, और यहाँ तक कि बाहरी सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते है, केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते हैं। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, तब भी तुम दूसरे को जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते हो या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए दूसरों को उत्तेजित नहीं कर सकते हो। क्या तुम विश्वास करते हो कि ऐसे कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करेंगे? तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर के हृदय की इच्छा है, कि यह आत्मा की इच्छा है, किन्तु सच में यह बेतुका है! तुम विश्वास करते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम चाहते हो, उसी में परमेश्वर आनंदित होता है। क्या जो तुम्हें अच्छा लगता है, परमेश्वर को अचछा लगने का प्रतिनिधित्व कर सकता है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो तुम्हें अच्छा लगता है निश्चित रूप से यह वही है जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर घृणा करता है और अस्वीकार करता है। यदि तुम कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो। इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना नहीं करते हो, और इसके बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर के हृदय की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारी क्रियाएँ सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम मनुष्यों में सबसे व्यर्थ हो। वह किस तरह का व्यक्ति है जिसके केवल सतही अच्छे कर्म हैं, किन्तु सच्चाई से रहित हैं? ऐसे लोग पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते हो और परिवर्तन नहीं कर सकते हो, तो तुम लोगों के पाखंड के तत्व और भी अधिक बढ़ जाएँगे। पाखंड के तत्व जितना अधिक होते हैं, परमेश्वर के प्रति विरोध उतना ही अधिक होता है, और अंत में, इस तरह के मनुष्य निश्चित रूप से त्यक्त कर दिए जाएँगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर" से

ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों से विश्वास में, तुमने कभी किसी को श्राप नहीं दिया हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी तुम्हारी मसीह के साथ संगति में, तुम सच नहीं बोल सकते हो, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और भयावक हो। यदि तुम खासकर अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया, फिर भी तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ शान्ति से नहीं हो, तब भले ही तुम अपने पड़ोसियों के राहत के लिए अपना सब कुछ भेज दो या अपने पिता, माता और घराने की अच्छी देखभाल की हो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। यदि तुम मनुष्य के अनुरूप हो या कुछ अच्छे काम कर सकते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि अच्छे काम तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और छंटाई स्वीकार नहीं कर सकता, और सभी को मसीह की सरल मानवता को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का दावा करते हो। तुम सबका एैसा विश्वास तुम्हारे ऊपर उचित प्रतिकार लेकर आएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से

मनुष्य की सहभागिता:

जो लोग सत्य से रहित होते हैं वे एक अच्छी मानवता का जीवन जीने के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो कि यह सत्य के ही समान है। क्या तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि अच्छा जीवन जीना सत्य के साथ जीने के अनुरूप है? क्या तुम कह सकते हो कि यह कुछ सकारात्मक है? ठीक है, तुम लोग जो कहते हो: क्या मनुष्य का प्रेम परमेश्वर के प्रेम के समान है? यह नहीं है। कभी-कभी, मनुष्य का प्रेम शैतान का प्रेम होता है, यह एक भावनात्मक प्रेम होता है, ऐसा प्रेम जो किसी की स्वयं की अभिलाषाओं और रुचियों से पैदा होता है। एक सरल उदाहरण देने के लिए: यदि कोई स्वभाव से दुष्ट है, यदि वे दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं, तो वे किस प्रकार का प्रेम करते हैं? वे परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं, बल्कि वे दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं। क्या यह शैतान का प्रेम नहीं है? शैतान का प्रेम सत्य के विरोध में जाता है, यह सत्य के प्रति शत्रुता में है, और यह परमेश्वर का जो स्वभाव है उसके और परमेश्वर के प्रेम के विपरीत है। यह मत सोचो कि प्रेम करना मनुष्यों को अच्छा बनाता है। उनका प्रेम सत्य से रहित है, यह नकारात्मक चीज़ों का प्रेम है, और इसलिए यह शैतान का प्रेम है। क्या उनकी कुछ अच्छाई सत्य के विरोध में नहीं है? कुछ लोगों की अच्छाई सत्य के विरोध में होती है, और इसलिए, भले ही वे दूसरों को अच्छे लोगों के जैसे प्रतीत होते हैं, और सराहनीय और प्रशंसनीय लगते हैं, किन्तु आवश्यक नहीं कि वे परमेश्वर के हृदय के अनुसार हों, वे नकारात्मक व्यक्ति हो सकते हैं। क्या यह सही नही है? इस कारण, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे भ्रष्ट व्यक्ति लोगों को भले या बुरे प्रतीत होते हैं, परमेश्वर के लिये वे सभी शैतान के हैं, वे सभी शैतानी स्वभाव से संपन्न हैं, वे सभी भ्रष्ट हैं, और वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुता में हैं। आओ, हम कुछ उदाहरण उद्धृत करें: कैसे, तुम लोग कहते हो, धार्मिक लोग मसीह को सलीब पर चढ़ा सके थे? और जब उन्होंने मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया, तो उनकी अभिप्रेरणाएँ क्या थीं? क्या वे मानते थे कि उनकी प्रेरणाएँ गलत थीं? उन्होंने सोचा कि वे परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो रहे थे, कि वे परमेश्वर के कार्य को सँभाल रहे थे, वे अपनी गवाही में दृढ़ता से खड़े थे—फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में वे उसका विरोध कर रहे थे, और उसके शत्रु थे। इसके बारे में तुम क्या सोचते हो? आज, धार्मिक समुदाय अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की निंदा करता है, उन्होंने एक बार फिर मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया है, और वे अपने दिमाग में वे सोचते हैं कि वे परमेश्वर के काम को सँभाल रहे हैं, परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो रहे हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुता में नहीं है। वे सोचते हैं कि केवल वे ही परमेश्वर से प्रेम करते हैं, कि केवल वे ही परमेश्वर के प्रति सबसे अधिक वफ़ादार हैं। क्या वे ऐसा नहीं सोचते हैं? इसलिएर, भ्रष्ट लोगों के लिए, इस तरह से सोचने और करने में, वे जो कर रहे हैं, वह सही है, और पूरी तरह से सही है—फिर भी, परमेश्वर के लिए, वे निर्विवादित रूप से उसके प्रति विरोध में है, वे उसके शत्रु हैं। तुम इसकी कैसे व्याख्या करते हो? क्या अच्छा मनुष्य होने का अर्थ है कि लोग परमेश्वर के हृदय के अनुसार हैं? क्या इसका अर्थ है कि वे धार्मिक हैं? क्या इसका अर्थ है कि वे परमेश्वर के अनुकूल हैं? और इस प्रकार, सत्य के बिना, क्या लोग परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हैं? सत्य के बिना, क्या वे परमेश्वर के विरोध में नहीं है? इसलिए, क्या लोगों की अच्छाई सकारात्मक है या नकारात्मक? अधिकांश मामलों में, लोगों की अच्छाई नकारात्मक होती है, क्योंकि वह अत्यंत अशुद्ध होती है, और इसे शैतान के विष द्वारा दूषित कर दिया गया है, और इसमें सत्य के बारे में कुछ भी नहीं है। और इसलिए, जबकि उनकी "अभिप्रेरणाएँ" अच्छी होती हैं, तब भी यह आवश्यक नहीं कि वे अपने कार्यों में सत्य को अभ्यास में ला रहे हों, और वे परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, और परमेश्वर के प्रति प्रचंड शत्रुता में हो सकते हैं; इस बात का पूरा साक्ष्य धार्मिक समुदाय के परमेश्वर के विरुद्ध विरोध और विद्रोह में, और उनके द्वारा दूसरी बार मसीह को सलीब पर चढ़ाने में पाया जाता है। ... इस प्रकार, जब लोग "जीवन जीते” हैं, जब वे "सही चीजें” करते हैं और "अच्छे कर्म" करते हैं, तो ये बातें आवश्यक रूप में सत्य के अनुरूप नहीं होती हैं; उनके कुछ कार्य परमेश्वर का विरोध करते हैं, और यहाँ तक कि उन्हें बुरे, या विकृत या परमेश्वर के साथ विश्वासघात के रूप में भी कहा जा सकता है। अब तुम इन बातों को स्पष्ट रूप में देखते हो, हाँ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग किसी चीज के कितना भी अच्छा होने की कल्पना करते हैं, इसका यह अर्थ नहीं कि वे सत्य या वास्तविकता को धारण करते हैं; केवल सत्य को अभ्यास में लाना करना ही वास्तविकता को धारण करना है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (VI)" में "'केवल सत्य का अभ्यास करना ही वास्तविकता से सम्पन्न होना है' परमेश्वर के इन वचनों से सम्बन्धित संगति और प्रवचन" से

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