अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में रूपांतरण को संदर्भित करती है। किसी व्यक्ति की प्रकृति को बाहरी व्यवहारों से नहीं देखा जा सकता; उसका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व का मूल्य और महत्व से है। अर्थात इसमें जीवन के बारे में व्यक्ति का दृष्टिकोण और उसके मूल्य, उसका सार और उसकी आत्मा के भीतर गहराई में स्थित चीज़ेंशामिल हैं। अगर एकव्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो उसके इन पहलुओं में कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल यदि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह अनुभव किया है और पूरी तरह से सत्य में प्रवेश किया है, यदि उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, यदि चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और यदि वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो गए हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव बदल गए हैं। ऐसा लग सकता है कि तुम कुछ प्रयास कर रहे हो, तुम कठिनाई के सामने लचीले हो सकते हो, तुम ऊपर से मिली कार्य व्यवस्थाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकते हो, या तुम्हें जहाँ भी जाने के लिए कहा जाए तुम वहाँ जा सकते हो, लेकिन ये व्यवहार के केवल बहुत ही छोटे परिवर्तन हैं, और तुम्हारे स्वभाव के परिवर्तन के तौर पर गिने नहीं जा सकते हैं। तुम कई रास्तों पर जाने में सक्षम हो सकते हो, तुम कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो और घोर अपमान को सहन करने में सक्षम हो सकते हो; तुम महसूस कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के बहुत करीब हो और पवित्र आत्मा तुम्हारे में काम कर रहा है, लेकिन जब परमेश्वर तुम से कुछ ऐसा करने के लिए अनुरोध करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो तुम शायद अभी भी समर्पित नहीं हो पाओ, बल्कि तुम शायद बहाने ढूँढने लगो, तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध कर सकते हो, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की आलोचना और उसके ख़िलाफ़ विरोध करते हो। यह एक गंभीर समस्या होगी! यह साबित करता है कि तुममें अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने की प्रकृति है और तुम ज़रा भी परिवर्तित नहीं हुए हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

लोग अच्छी तरह से व्यवहार कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, और सिद्धांत सत्य के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता। जिन लोगों ने अपने स्वभाव परिवर्तन का अनुभव किया है, वे इससे अलग हैं। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में बदलाव का अनुभव किया है उन्होने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाओं को प्रकट किया जाता है, तो वे विवेकी बन सकते हैं और देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। स्वभाव में परिवर्तन के बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और जब चीज़ों को पूरा किया जाता है, तो वे सत्य का आपेक्षिक सटीकता के साथ अभ्यास करते हैं और उनकी भ्रष्टता अक्सर प्रकट नहीं होती है। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है वे ख़ासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्म-तुष्टि और दंभ नहीं दिखाते हैं। जो भ्रष्टता प्रकट की जाती है उसमें से वे काफ़ी कुछ समझ-बूझ लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता है। मनुष्य का क्या स्थान है, कैसे उचित व्यवहार करना है, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना है, क्या कहना और क्या नहीं कहना है, और किन लोगों के साथ क्या कहना और क्या करना है, इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। यही कारण है कि ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के लोग अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं। जो लोग अपने स्वभाव को बदलते हैं, वे वास्तव में एक मनुष्य के समान जीवन जीते हैं, और वे सत्य धारण करते हैं। वे हमेशा चीज़ों को सत्य के अनुरूप देखने और कहने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं उसमें सैद्धांतिक होते हैं; वे किसी व्यक्ति, मामले या चीज़ के प्रभाव के अधीन नहीं होते, और उन सभी के पास अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य के सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनके स्वभाव सापेक्षिक रूप से स्थिर होते हैं, वे असंतुलित नहीं होते, और चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्य को सही ढंग से करना है और कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए काम करना है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि सतही तौर पर स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए क्या किया जाए—उनमें आंतरिक स्पष्टता होती है कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसे न लगें कि वे कुछ बहुत अच्छा कर चुके हैं, लेकिन जो कुछ भी वे करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और इसके व्यावहारिक परिणाम होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके पास निश्चित रूप से बहुत सच्चाई होती है—इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोणों और कार्यों में उनके उसूलों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों के पास सच्चाई नहीं है, उनके स्वभाव में बिल्कुल कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है। यह मुख्य रूप से उसे संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष परमेश्वर का ज्ञान पाने और सत्य समझने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को शुद्ध कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य लोगों के भीतर जड़ जमा लेता है, उसका जीवन बन जाता है, और उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बन जाते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव बदल जाता है। स्वभाव में परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि उनके बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हैं, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या कि वे पहले किसी की भी नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के परिवर्तन में ये अवस्थाएँ और अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि उनका आंतरिक जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर के कुछ शैतानी विष हटा दिए जाते हैं, उनके दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गये हैं, और इनमें से कुछ भी सांसारिक चीज़ों के जैसा नहीं है। वह स्पष्ट रूप से बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विषों को देखता है; उसने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इससे उसके जीवन के मूल्य बदल गए हैं—यह सबसे मौलिक परिवर्तन है और यही स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

धर्म के दायरे में, बहुत से लोग सारा जीवन अत्यंत कष्ट भोगते हैं, अपने शरीर को वश में करते और अपना क्रूस उठाते हैं, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस तक पीड़ा भी सहते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़े से दूर रखते हैं, और केवल पीड़ा पर ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में कर पाते हैं और देहसुख का त्याग पाते हैं। पीड़ा सहन करने की उनकी भावना सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी धारणाओं, अपने उनके मानसिक रवैये, और निश्चय ही वास्तव में उनके पुराने स्वभाव का ज़रा-भी निपटारा नहीं किया गया है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक निराकार, अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनके सकारात्मक प्रकृति से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न ही उसकी इच्छा जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं और पीड़ा सहते हैं। विवेकपूर्ण कार्य करने पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करे। उन्हें इसका ज्ञान उससे भी कम है कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं वह परमेश्वर की अपनी मूल छवि नहीं है, बल्कि दन्तकथाओं का ढका-छिपा एक परमेश्वर है, उन्हीं की कल्पना की एक उपज, जिसके बारे में उन्होंने बस सुन रखा है, या जो लेखों में पाया जाता है। फिर वे अपनी ज्वलंत कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर के लिए पीड़ित होने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य को अपने ऊपर ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अयथार्थ है, ऐसी कि इनमें से लगभग कोई भी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं है। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा भुगतते हों, सेवा पर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शुद्धिकरण और उसकी सिद्धता से नहीं गुज़रे हैं, और न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। यहां तक कि अगर वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते भी हैं, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं है। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से उसके बारे में जानते हैं। इसलिए, उनकी सेवा आँख बंद कर बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे कौन स्वीकृति देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि पतरस, जिसने यीशु को देखा था, वह भी नहीं जानता था कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे करनी है। अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही, वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह के निपटान या काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह नहीं? जिन सभी लोगों ने न्याय नहीं प्राप्त किया है, जिनकी काट-छाँट और जिनका निपटारा नहीं किया गया है, जो नहीं बदले हैं—क्या ये वे नहीं जिन पर विजय प्राप्ति अधूरी है? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और तुम्हें वास्तव में थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम लोग कभी भी अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं प्राप्त करोगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना, तुम पर विजय प्राप्ति नहीं हो सकती। परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका फिर उन लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : इसका मूल्य अत्यंत अल्प होगा! वे जो करते हैं उसमें अल्प गवाही होती है, ठीक इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ है! वे जीवनभर कष्ट भोगते हैं और स्वयं को कैद किए रहते हैं; वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं और अपना क्रूस उठाते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम और अस्वीकार करती है और वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। भले ही वे अंत तक आज्ञा का पालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी धारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव निर्मित ज्ञान और मानवीय विचारों में से किसी से भी निपटा नहीं गया। इनमें कोई नई समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी समझ का थोड़ा-सा हिस्सा भी सही या सटीक नहीं है। उन्होंने परमेश्वर की इच्छा को गलत समझा है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? तुमने परमेश्वर के बारे में अतीत में जो भी समझा हो, यदि तुम उसे आज भी बनाए रखो और चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी धारणाओं और विचारों पर आधारित रखना जारी रखो, अर्थात्, तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान नहीं है और तुम परमेश्वर की वास्तविक छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहे हो, और यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच को पर आधारित है और अब भी मानवीय कल्पनाओं और विचारों से पैदा हुई है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। आज, मैं यह सब कुछ तुम से इसलिए कह रहा हूँ ताकि तुम्हें पता चले, और यह ज्ञान तुम्हें एक सटीक और नई समझ प्राप्त करने की ओर ले जाए। मैं यह इसलिए भी कह रहा रहा हूँ ताकि तुम लोगों के भीतर बसी पुरानी धारणाएं और समझने के पुराने तरीक़े मिट जाएं, और तुम एक नया ज्ञान प्राप्त कर सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों खाते और पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफ़ी बदलाव आएगा। यदि तुम एक आज्ञाकारी हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर सकते हो, तो तुम्हारी पुरानी मानसाकिता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई में बदल जाए, तो तुम्हारा व्यवहार भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह से तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्षित हो जाएगी, और अधिक से अधिक परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम हो जाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ, और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक धारणाओं को बदल सकते हो, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह परिणाम, और इससे कुछ भी कम नहीं, तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; यह वह परिवर्तन है जो लोगों में होता है। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में, तुम केवल अपने शरीर को क़ाबू में रखना और कष्ट और पीड़ा भुगतना जानते हो, और तुम्हें यह नहीं पता कि वह सही है या गलत, तुम्हें यह तो बिलकुल भी पता नहीं कि किसके लिए ऐसा कर रहे हो, तो इस तरह के अभ्यास द्वारा कैसे परिवर्तन लाया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (3)' से उद्धृत

जब कभी भी ऐसे धार्मिक लोग जमा होते हैं, तो वे पूछते हैं, "बहन, आजकल कैसा चल रहा है?" तो संभव है कि वह ये उत्तर दे, "मैं परमेश्वर की कृतज्ञ हूँ, लेकिन मैं उसकी इच्छा पूरी नहीं कर पाती हूँ।" दूसरी संभव है कि कहे, "मैं भी परमेश्वर की कृतज्ञ हूँ और उसे संतुष्ट नहीं कर पाती।" ये कुछ वाक्य और शब्द ही उनके हृदय की गहराई में मौजूद अधम चीजों को व्यक्त कर देते हैं; ऐसी बातें अत्यधिक घृणित और अत्यंत अरुचिकर होती हैं। ऐसे लोगों की प्रकृति परमेश्वर से उलट होती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान देते हैं वे वही बोलते हैं जो उनके दिल में होता है, और संगति में अपना दिल खोल देते हैं। ऐसे लोग न तो किसी झूठी कवायद में शामिल नहीं होते हैं, न झूठा शिष्टाचार दिखाते हैं, न खोखली हँसी-खुशी का प्रदर्शन करते हैं। वे हमेशा स्पष्ट होते हैं और किसी सांसारिक नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोगों में, समझ के निपट अभाव की हद तक, दिखावे की आदत होती है। जब कोई गाता है, तो वह नाचने लगते हैं, वो समझ ही नहीं पाते कि उनका खेल पहले ही खत्म हो चुका है। ऐसे लोग धर्मपरायण या सम्माननीय नहीं होते, बहुत ही तुच्छ होते हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब कुछ लोग आध्यात्मिक जीवन के बारे में संगति करते हैं, तो यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने की बात नहीं करते, फिर भी वे अपने हृदय में उसके प्रति सच्चा प्रेम रखते हैं। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कृतज्ञता का दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो, न कि किसी मनुष्य के प्रति। इस बारे में लगातार दूसरों को बताने का क्या फायदा है? तुम्हें वास्तविकता में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को।

इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों में जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, और वे आत्मिक हैं, किन्तु सच में वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज़ तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर नापसंद और अस्वीकार करता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज़्यादा पाखंडी बन जाओगे।, जितने ज़्यादा पाखंडी बनोगे, उतने ही ज़्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से हटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धार्मिक दुनिया में, बहुत से भक्त कहते हैं, "हम प्रभु यीशु में अपने विश्वास के कारण बदल गए हैं। हम प्रभु के लिए खुद को खपाने में, काम करने में, कारावास सहन करने में सक्षम हैं, और उसके नाम को अस्वीकार नहीं करते हैं। हम कई गुणकारी चीजें करने, भले कार्य के लिए धन देने, दान करने और गरीबों की सहायता करने में सक्षम हैं। ये बड़े बदलाव हैं! इसलिए हम स्वर्ग के राज्य में ले जाये जाने के योग्य हैं।" तुम इन शब्दों के बारे में क्या सोचते हो? (वे गलत हैं।) इन शब्दों के बारे में क्या तुममें कोई विवेक है? शुद्ध किये जाने का क्या मतलब है? क्या तुम्हें लगता है कि यदि तुम्हारा व्यवहार बदल गया है और तुम अच्छे कर्म करते हो, तो तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है? कोई कहता है, "मैंने सब कुछ दरकिनार कर दिया है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए, मैंने अपनी नौकरी, अपना परिवार और देह की इच्छाओं को भी दरकिनार कर दिया। क्या यह शुद्ध किये जाने के बराबर है?" यदि तुमने यह सब किया भी है, तो यह ठोस प्रमाण नहीं है कि तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है। तो, मुख्य बात क्या है? तुम किस पहलू में ऐसी शुद्धता प्राप्त कर सकते हो जिसे असल शुद्धता माना जा सकता है? परमेश्वर का विरोध करने वाले शैतानी स्वभाव की शुद्धता ही सच्ची शुद्धता है। उस शैतानी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं? सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं, एक व्यक्ति का अहंकार, दम्भ, आत्मतुष्टता और आत्म-गौरव, साथ ही साथ उसका टेढ़ापन, विश्वासघात, झूठ बोलना, धोखाधड़ी और पाखंड। जब ये शैतानी स्वभाव किसी का हिस्सा नहीं रह जाते हैं, तो उसे वास्तव में शुद्ध कर दिया गया है। कहा जाता है कि मनुष्य के शैतानी स्वभाव की 12 महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसे कि, स्वयं को सबसे सम्मानजनक मानना; खुद से अनुकूल लोगों को बढ़ने देना और अपना विरोध करने वालों का नाश होने देना; केवल परमेश्वर को ही अपने आप से बेहतर मानना, किसी और के सामने न झुकना, किसी और के प्रति आदर न रखना; एक बार सत्ता पाने के बाद अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाना; सत्ता का उपयोग करने वाला एकमात्र इन्सान बनने और सभी चीजों का स्वामी बनने की चाह रखना, और अपने आप सब कुछ तय करने की चाह रखना। ये सभी अभिव्यक्तियाँ शैतानी स्वभाव हैं। कोई व्यक्ति अपने जीवन स्वभाव में बदलाव का अनुभव कर पाए, इससे पहले इन शैतानी स्वभावों को शुद्ध किया जाना ज़रूरी है। किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव एक पुनर्जन्म है, क्योंकि उसका सार बदल गया है। इससे पहले, जब उसे सत्ता दी गई, तो वह अपना स्वतंत्र राज्य बनाने में सक्षम था। अब, जब उसे सत्ता दी जाती है, तो वह परमेश्वर की सेवा करता है, परमेश्वर की गवाही देता है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सेवक बन जाता है। क्या यह वास्तविक परिवर्तन नहीं है? इससे पहले, सभी स्थितियों में वह खुद का दिखावा करता था और चाहता था कि अन्य लोग उसके बारे में श्रेष्ठ सोचें और उसकी आराधना करें। अब, वह हर जगह परमेश्वर की गवाही देता है, और खुद का दिखावा नहीं करता।चाहे लोग उससे कैसे भी व्यवहार करें, उसे वह ठीक लगता है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसके बारे में कैसी टिप्पणी करते हैं, उसे वह ठीक लगता है। उसे इसकी कोई परवाह नहीं होती है। वह केवल परमेश्वर को उत्कृष्टता देना चाहता है, परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहता है, दूसरों को परमेश्वर की समझ प्राप्त करने में मदद करना चाहता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में दूसरों की पालन करने में मदद करना चाहता है। क्या यह जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? "मैं भाई-बहनों के साथ प्रेम से व्यवहार करूँगा। मैं सभी परिस्थितियों में दूसरों के प्रति करुणामय रहूँगा। मैं अपने बारे में नहीं सोचूंगा और दूसरों को लाभ प्रदान करूँगा। मैं दूसरों को उनकी जिंदगी में आगे बढ़ने में मदद करूँगा और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करूंगा। मैं दूसरों की सत्य समझने में और सत्य प्राप्त करने में मदद करूँगा।" दूसरों को स्वयं के समान प्यार करने का यही मतलब है! जब शैतान की बात आती है, तो तुम इसे समझ सकते हो, सिद्धांत बना सकते हो, इसके साथ एक सीमांकन रेखा खींच सकते हो और शैतान की बुराइयों को पूरी तरह से प्रकट कर सकते हो ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसके नुकसान से बचाया जा सके। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करना है, और यह दूसरों को और भी अधिक स्वयं के समान प्यार करना है। इसके अतिरिक्त, तुम्हें उससे प्यार करना चाहिए जिससे परमेश्वर प्यार करता है और उससे नफरत करनी चाहिए जिससे परमेश्वर घृणा करता है। परमेश्वर मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करता है। इसका मतलब है कि हमें भी मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करनी है। हमें परमेश्वर की तरफ खड़ा होना चाहिए। हम उनके साथ समझौता नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर किससे प्यार करता है? परमेश्वर उनसे प्यार करता है जिन्हें वह बचाना और आशीष देना चाहता है। इन लोगों के लिए, हमें जिम्मेदार होना चाहिए, उनके साथ प्यार से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सहायता, नेतृत्व और समर्थन प्रदान करना चाहिए। क्या यह किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? इसके अतिरिक्त, जब तुमने कुछ अपराध या गलतियाँ की हैं, या कोई काम करने में सिद्धांतों की उपेक्षा की है, तो तुम भाई-बहनों की आलोचना, उलाहना, व्यवहार और कांट-छांट स्वीकार कर सकते हो; तुम इन सभी चीजों से उचित व्यवहार कर सकते हो और उन्हें परमेश्वर से प्राप्त कर सकते हो, घृणा त्याग सकते हो, और अपने भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हो। क्या यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है?

क्या एक व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, जिसकी धार्मिक जगत में चर्चा है, जीवन स्वभाव में बदलाव का प्रतिनिधित्व कर सकता है? सभी कहते हैं कि नहीं कर सकता। ऐसा क्यों है? मुख्य कारण यह है कि वह अभी भी परमेश्वर का विरोध करता है। यह बिल्कुल फरीसियों जैसा है जो बाहर से बड़े भक्त थे। वे अक्सर प्रार्थना करते थे, पवित्रशास्त्र को समझाते थे और व्यवस्था के नियमों का बहुत अच्छे से पालन करते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहरी रूप से, वे निंदा से परे थे। लोग कोई भी दोष निकालने में असमर्थ थे। हालाँकि, वे अभी भी मसीह का विरोध करने और निंदा करने में सक्षम क्यों थे? यह क्या इशारा करता है? चाहे लोग कितने भी अच्छे प्रतीत हों, अगर उनके पास सत्य नहीं है और इस प्रकार वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं तो वे अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करेंगे। बाहरी रूप से, वे बहुत अच्छे थे, लेकिन यह जीवन स्वभाव में बदलाव के रूप में क्यों नहीं गिना जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका भ्रष्ट स्वभाव ज़रा भी नहीं बदला था और वे अभी भी घमंडी, दम्भी और विशेष रूप से आत्म-तुष्ट थे। वे अपने ज्ञान और सिद्धांतों में विश्वास करते थे और मानते थे कि उनकी शास्त्रों की समझ सर्वोत्तम है। उनका मानना था कि वे सबकुछ समझ गए थे और वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर थे। यही कारण है कि जब प्रभु यीशु प्रचार कर रहा था और अपना कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसका विरोध किया और निंदा की। यही कारण है कि जब धार्मिक जगत ने सुनता है कि अंत के दिनों के मसीह ने सारा सत्य व्यक्त किया है, तो वे उसकी निंदा करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि यह सच है। उन्होंने किस तरह की गलती की? बाहरी रूप से, वे इतने बड़े बदलाव से होकर गुज़रे, तो यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी परमेश्वर का विरोध करने में सक्षम थे? यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी मसीह के प्रति पागलों के समान शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने में सक्षम थे? यह किस तरह की समस्या है? क्या कोई व्यक्ति जो मसीह का विरोध करता है और प्रतिरोध करता है वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? क्या परमेश्वर उन लोगों को राज्य में ला सकता है जो मसीह के दुश्मन हैं? परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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4. भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन: परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को, सीधे तौर पर पवित्रात्मा के साधनों के माध्यम से और आत्मा की पहचान से बचाया नहीं...

प्रस्तावना

यद्यपि बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, किंतु कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने का क्या अर्थ है, और परमेश्वर की...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश

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