7. बाहरी अच्छे कर्मों और स्वभाव में परिवर्तनों के बीच अंतर
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
स्वभाव में रूपांतरण मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में रूपांतरण को संदर्भित करता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति की चीजों को बाहरी व्यवहारों से नहीं महसूस किया जा सकता। उनका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व की कीमत और महत्व से, जीवन के बारे में उनके दृष्टिकोण और उनके मूल्यों से है, उनमें लोगों की आत्मा की गहराई में स्थित चीजें और उनका सार शामिल हैं। अगर एक व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो वह इन पहलुओं में किसी भी रूपांतरण का अनुभव नहीं करेगा। केवल परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह अनुभव करने, पूरी तरह से सत्य में प्रवेश करने, अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदलने, चीजों को लेकर अपने विचारों को परमेश्वर के वचनों के अनुरूप करने, और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित और निष्ठावान होने पर ही कहा जा सकता है कि व्यक्ति का स्वभाव रूपांतरित हो गया है। वर्तमान में, अपने कर्तव्य का पालन करते हुए तुम कुछ प्रयास करते और कठिनाई के सामने मजबूत प्रतीत हो सकते हो, तुम ऊपरवाले से मिली कार्य व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करने में सक्षम हो सकते हो, या तुम्हें जहाँ भी जाने के लिए कहा जाए वहाँ जाने में समर्थ हो सकते हो। ऊपर से ऐसा लग सकता है कि तुम कुछ हद तक आज्ञाकारी हो, लेकिन अगर कुछ ऐसा हो जाता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप न हो, तो तुम्हारा विद्रोह सामने आ जाता है। उदाहरण के लिए, तुम अपनी काट-छाँट किए जाने के प्रति समर्पित नहीं होते, और जब कोई प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा आ पड़ती है तब तो तुम और भी कम समर्पित होते हो; तुम परमेश्वर को लेकर शिकायत करने का दुस्साहस भी करते हो। इसलिए, बाहर से वह थोड़ा-सा समर्पण और बदलाव, बस व्यवहार में एक छोटा-सा बदलाव है। थोड़ा-सा बदलाव तो है, लेकिन यह तुम्हारे स्वभाव के रूपांतरण के रूप में गिने जाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तुम कई रास्तों पर चलने में सक्षम हो सकते हो, कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो, और बहुत अपमान सह सकते हो; तुम खुद को परमेश्वर के बहुत करीब महसूस कर सकते हो, और पवित्र आत्मा तुम पर कुछ काम कर सकता है। लेकिन, जब परमेश्वर तुमसे कुछ ऐसा करने के लिए कहता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो शायद तुम अभी भी समर्पण न करो, बल्कि, हो सकता है तुम बहाने ढूंढ़ने लगो, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करो, और गंभीर अवसरों पर सवाल-जवाब कर उसके खिलाफ लड़ने तक लगो। यह एक गंभीर समस्या होगी! यह दिखाएगा कि तुममें अभी भी परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रकृति है, तुम वास्तव में सत्य नहीं समझते, और तुम्हारे जीवन-स्वभाव में बिल्कुल भी बदलाव नहीं आया है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए
यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में कई अच्छाइयाँ हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें सत्य वास्तविकताएं हैं। केवल सत्य का अभ्यास करने और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने से ही तुम सत्य वास्तविकताएँ धारण कर सकते हो। केवल परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से ही तुम सत्य वास्तविकताएँ धारण कर सकते हो। कुछ लोगों में उत्साह होता है, वे सिद्धांत बोल सकते हैं, विनियमों का पालन करते हैं और कई अच्छी चीजें करते हैं, लेकिन उनके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उनमें थोड़ी-सी मानवता है। यह जरूरी नहीं कि जो लोग सिद्धांत बोल सकते हों और हमेशा विनियमों का पालन करते हों, वे सत्य का अभ्यास भी करते हों। भले ही वे जो कुछ कहते हैं वह सही होता है और ऐसा लगता है यह समस्या-मुक्त है, लेकिन सत्य के सार से संबंधित मामलों में उनके पास कहने को कुछ नहीं होता। इसलिए, कोई कितने भी सिद्धांत बोले, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे सत्य की समझ है, वह चाहे कितना भी सिद्धांत समझता हो, कोई समस्या नहीं सुलझा सकता। धार्मिक सिद्धांतकार बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन अंत में, उन सभी का पतन हो जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त संपूर्ण सत्य नहीं स्वीकारते। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य सिद्धांत के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो उनसे प्रकट होती है। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बनकर देह से विद्रोह कर सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन इसी तरह से दिखता है। जिन लोगों का स्वभाव बदल चुका है, उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप से समझ लिया है और कार्य करते समय तो वे काफी सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता प्रकट नहीं करते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्मतुष्टता और अहंकार प्रकट नहीं करते। वे अपनी प्रकट हुई भ्रष्टता की असलियत जान लेते हैं और उसका भेद पहचान लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। उन्हें कौन-सा स्थान लेना चाहिए और कौन-सी चीजें करनी चाहिए जो तर्कसंगत हों, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए, क्या कहना और क्या नहीं कहना चाहिए, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना चाहिए—इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इस प्रकार जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं और सही मायनों में ऐसे लोग ही मानव के समान जीवन जीते हैं। क्योंकि उन्हें सत्य की समझ होती है, वे हमेशा सत्य के अनुरूप बोलने और चीज़ों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, सैद्धांतिक रूप से करते हैं; वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उन सभी का अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव काफी स्थिर होता है, वे भावनात्मक रूप से अस्थिर नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभाना है और परमेश्वर की संतुष्टि के लिए कैसे व्यवहार करना है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि बाहरी तौर पर ऐसा क्या करना चाहिए ताकि दूसरे उनके बारे में अच्छा सोचें; परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है, इस बारे में उन्होंने आंतरिक स्पष्टता पा ली है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसा न लगे कि उन्होंने कोई महत्वपूर्ण काम किया है, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम व्यावहारिक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत-सी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और उनके कार्यकलाप के सिद्धांतों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन स्वभाव में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं हुआ होता है। स्वभाव में परिवर्तन कैसे लाया जाता है? मनुष्यों को शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और परमेश्वर का प्रतिरोध करना ही उनकी प्रकृति है। जिन लोगों की प्रकृति परमेश्वर का प्रतिरोध करना है और जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, परमेश्वर उन सभी को अपने प्रति समर्पण करने और भय मानने वाला बनाकर बचा लेता है। स्वभाव में बदलाव युक्त व्यक्ति होने का यही अर्थ है। कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो या उसके पास कितने भी भ्रष्ट स्वभाव हों, अगर वह सत्य स्वीकार सकता है, परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार सकता है, विभिन्न परीक्षण और शोधन स्वीकार सकता है, तो उसमें परमेश्वर की सच्ची समझ होगी, और साथ ही, वह स्पष्ट रूप से अपने प्रकृति-सार को भी देख पाएगा। जब वह स्वयं को वास्तव में जान लेगा, तो उसे स्वयं से और शैतान से घृणा हो जाएगी, और वह शैतान से विद्रोह करने को तैयार हो जाएगा और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करने लगेगा। जब किसी व्यक्ति में यह संकल्प आ जाता है तो वह सत्य का अनुसरण कर सकता है। यदि लोगों को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो, यदि उनका शैतानी स्वभाव शुद्ध कर दिया जाए, और परमेश्वर के वचन उनके भीतर जड़ें जमा लेते हैं, और वे उनका जीवन और अस्तित्व का आधार बन जाते हैं, यदि वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीते हैं, पूरी तरह से बदलकर नए इंसान बन गए हैं—तो उसे उनके जीवन-स्वभाव में बदलाव माना जाता है। स्वभाव में बदलाव का मतलब परिपक्व और अनुभवी मानवता नहीं है, न ही यह है कि लोगों का बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में कोमल हो गया है, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब समझदारी से बोलते हैं, या वे पहले किसी की नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात थोड़ा-बहुत सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के परिवर्तन में ये लक्षण शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि अंदर से उनका जीवन बदल गया है। यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के वचनों और सत्य ने उनमें अंदर जड़ें जमा ली हैं, उन पर उनका शासन हो गया है और वे उनका जीवन बन गए हैं। चीजों पर उनके विचार भी बदल गए हैं। वे असलियत जान सकते हैं कि दुनिया में क्या चल रहा है और मानवजाति के साथ क्या हो रहा है, कैसे शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है, कैसे बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और बड़े लाल अजगर की असलियत जान सकते हैं। वे अपने दिल में बड़े लाल अजगर और शैतान से घृणा कर पाते हैं और वे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़कर उसका अनुसरण करने लगते हैं। इसका अर्थ है कि उनका जीवन स्वभाव बदल गया है और वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं। जीवन स्वभाव में परिवर्तन मौलिक परिवर्तन होता है, जबकि व्यवहार में परिवर्तन सतही होता है। जिन लोगों ने जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर लिया है, उन्हीं लोगों ने सत्य प्राप्त किया है और वही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
धर्म के दायरे में बहुत से लोग सारा जीवन अत्यंत कष्ट भोगते हैं : अपने शरीर को वश में रखते हैं और अपना क्रूस उठाते हैं, यहाँ तक कि मृत्यु के द्वार पहुँचने तक कष्ट झेलना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में करके दैहिक इच्छाओं से विद्रोह कर देते हैं। पीड़ा सहन करने का जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी अवधारणाओं, उनके मानसिक रवैये और निश्चय ही उनके पुराने स्वभाव की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे चरित्र से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं और पीड़ा सहते हैं। विवेक पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं, वह परमेश्वर की अपनी अंतर्निहित छवि नहीं है, बल्कि उनकी कल्पनाओं का एक परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या लेखों में बस उनकी कहानियाँ सुनी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा भुगतते हों, सेवा पर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शुद्धिकरण और उसकी पूर्णता से नहीं गुज़रे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। भले ही वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हों, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे अधूरे ढंग से नहीं जीते गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और तुम्हें वास्तव में थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम कभी भी अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं कर पाओगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना, तुम पर विजय नहीं पाई गई है। फिर परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका उन्हीं लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : उसका कोई मूल्य नहीं होगा! वे जो करते हैं उसमें कोई गवाही नहीं होती, इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ होती है! जीवनभर वे लोग कष्ट भोगते हैं और बंदीगृह में समय बिताते हैं; वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं और हमेशा चुनौतियों का सामना करते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम करती है, नकार देती है और वे हर तरह की कठिनाई का अनुभव करते हैं। हालाँकि वे अंत तक आज्ञापालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी अवधारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव-निर्मित ज्ञान और मानवीय विचारों में से किसी की भी काट-छाँट नहीं हुई होती है। उनमें कोई नई समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी थोड़ी-सी भी समझ सही या सटीक नहीं होती। उन्होंने परमेश्वर के इरादों को गलत समझ लिया होता है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? तुमने परमेश्वर के बारे में अतीत में जो कुछ भी समझा हो, यदि तुम उसे आज भी बनाए रखो और चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, तुम परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी अवधारणाओं और विचारों पर आधारित रखना जारी रखो, अर्थात्, तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान न हो और तुम परमेश्वर की वास्तविक छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहे हो, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच पर आधारित है और अब भी मानवीय कल्पनाओं और अवधारणाओं से पैदा हुई है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। मैं अब जो सारे वचन कहता हूँ, उनका उद्देश्य यह है कि तुम जान सको, और यह ज्ञान तुम्हें एक सटीक और नई समझ की ओर ले जाए; इनका उद्देश्य तुम लोगों के भीतर बसी पुरानी अवधारणाओं और ज्ञान को काटना-छाँटना भी है। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक समर्पित हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्ष्य पर होगी और अधिक से अधिक परमेश्वर के इरादों को पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक अवधारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह परिणाम, और इससे कुछ भी कम नहीं, तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता है; लोगों में यह परिवर्तन होने लगता है। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में, तुम केवल अपने शरीर को काबू में रखना एवं कष्ट और पीड़ा भुगतना जानते हो, और तुम्हें यह भी नहीं पता कि वह सही है या गलत, तुम्हें यह तो बिल्कुल भी पता नहीं होता कि तुम किसके लिए ऐसा कर रहे हो, तो इस तरह के अभ्यास से परिवर्तन कैसे लाया जा सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बस जुबान से परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं; वे अपने दिन चिंता में भौंहें चढ़ाए गुजारते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछते, “क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?” तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में बातें मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं! कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के प्रति आभार की बात करते और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःख भरे आँसुओं को पसंद करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन-सी भलाई हो सकती है? कुछ लोग विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय अनुग्रहशीलता का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितांत शक्तिहीन मेमने की तरह गुलामी करते हैं। क्या यह तौर-तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए, और एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में जिए। उसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, और वो जहाँ भी जाए, उसे वहाँ गवाही देने में समर्थ होना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे अभ्यास दिखावे के लिए करते हैं; उन्हें सबसे पहले काट-छाँट किए और तोड़े जाने की अवधि से गुजरना चाहिए। जिन लोगों के हृदय की गहराई में परमेश्वर का विश्वास है, वे ऊपरी तौर पर दूसरों से अलग नहीं दिखते, किन्तु उनके कामकाज प्रशंसनीय होते हैं। ऐसे व्यक्ति ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंततः, तुम नियमों और सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक शख्सियत होने के साथ ही पाखंडी भी होते हैं। जब कभी भी ऐसे धार्मिक लोग जमा होते हैं, तो वे पूछ सकते हैं, “बहन, आजकल तुम कैसी हो?” संभव है कि बहन उत्तर दे, “मैं महसूस करती हूँ कि मैं परमेश्वर की कर्जदार हूँ और मैं उसके इरादे पूरे नहीं कर पाती।” संभव है कि दूसरी बहन कहे, “मैं भी परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करती हूँ और उसे संतुष्ट नहीं कर पाती।” ये कुछ वाक्य और शब्द ही उनके हृदय की गहराई में मौजूद अधम चीजों को व्यक्त कर देते हैं; ऐसी बातें अत्यधिक घृणित और अत्यंत विरोधी हैं। ऐसे लोगों की प्रकृति परमेश्वर से उलट होती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान देते हैं वे वही बोलते हैं जो उनके दिल में होता है, और संगति में अपना दिल खोल देते हैं। ऐसे लोग न तो एक भी झूठी कवायद में शामिल होते हैं, न झूठा शिष्टाचार दिखाते हैं, न खोखली हँसी-खुशी का प्रदर्शन करते हैं। वे हमेशा स्पष्ट होते हैं और किसी सांसारिक नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोगों में, समझ के निपट अभाव की हद तक, दिखावे की आदत होती है। जब कोई गाता है, तो वह नाचने लगते हैं, वो समझ ही नहीं पाते कि उनका खेल पहले ही खत्म हो चुका है। ऐसे लोग धर्मपरायण या सम्माननीय नहीं होते, वे तो बहुत ही तुच्छ होते हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब कुछ लोग आध्यात्मिक जीवन के बारे में संगति करते हैं, तो यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने की बात नहीं करते, फिर भी वे अपने हृदय की गहराई में उसके प्रति सच्चा प्रेम रखते हैं। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कृतज्ञता का दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो, न कि मनुष्य के प्रति। इस बारे में लगातार दूसरों को बताने का क्या फायदा है? तुम्हें वास्तविकता में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को। इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं को दर्शाते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या उनके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को उद्दीप्त नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारा इस तरीके से कार्य करना परमेश्वर का इरादा है, और तुम्हारे क्रियाकलाप आध्यात्मिक हैं, किन्तु वास्तव में, वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर ठुकराता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर के इरादे पूरे किए जा सकते हैं? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक शख्सियत होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज्यादा पाखंडी बन जाओगे। जितने ज्यादा पाखंडी बनोगे, उतना ही ज्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से निकाल दिए जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए—धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है
संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :
धार्मिक दुनिया में, बहुत से भक्त कहते हैं, “हम प्रभु यीशु में अपने विश्वास के कारण बदल गए हैं। हम प्रभु के लिए खुद को खपाने में, काम करने में, कारावास सहन करने में सक्षम हैं, और उसके नाम को अस्वीकार नहीं करते हैं। हम कई गुणकारी चीजें करने, भले कार्य के लिए धन देने, दान करने और गरीबों की सहायता करने में सक्षम हैं। ये बड़े बदलाव हैं! इसलिए हम स्वर्ग के राज्य में ले जाये जाने के योग्य हैं।” तुम इन शब्दों के बारे में क्या सोचते हो? (वे गलत हैं।) इन शब्दों के बारे में क्या तुममें कोई विवेक है? शुद्ध किये जाने का क्या मतलब है? क्या तुम्हें लगता है कि यदि तुम्हारा व्यवहार बदल गया है और तुम अच्छे कर्म करते हो, तो तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है? कोई कहता है, “मैंने सब कुछ दरकिनार कर दिया है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए, मैंने अपनी नौकरी, अपना परिवार और देह की इच्छाओं को भी दरकिनार कर दिया। क्या यह शुद्ध किये जाने के बराबर है?” यदि तुमने यह सब किया भी है, तो यह ठोस प्रमाण नहीं है कि तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है। तो, मुख्य बात क्या है? तुम किस पहलू में ऐसी शुद्धता प्राप्त कर सकते हो जिसे असल शुद्धता माना जा सकता है? परमेश्वर का विरोध करने वाले शैतानी स्वभाव की शुद्धता ही सच्ची शुद्धता है। उस शैतानी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं? सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं, एक व्यक्ति का अहंकार, दम्भ, आत्मतुष्टता और आत्म-गौरव, साथ ही साथ उसका टेढ़ापन, विश्वासघात, झूठ बोलना, धोखाधड़ी और पाखंड। जब ये शैतानी स्वभाव किसी का हिस्सा नहीं रह जाते हैं, तो उसे वास्तव में शुद्ध कर दिया गया है। कहा जाता है कि मनुष्य के शैतानी स्वभाव की 12 महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसे कि, स्वयं को सबसे सम्मानजनक मानना; खुद से अनुकूल लोगों को बढ़ने देना और अपना विरोध करने वालों का नाश होने देना; केवल परमेश्वर को ही अपने आप से बेहतर मानना, किसी और के सामने न झुकना, किसी और के प्रति आदर न रखना; एक बार सत्ता पाने के बाद अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाना; सत्ता का उपयोग करने वाला एकमात्र इन्सान बनने और सभी चीजों का स्वामी बनने की चाह रखना, और अपने आप सब कुछ तय करने की चाह रखना। ये सभी अभिव्यक्तियाँ शैतानी स्वभाव हैं। कोई व्यक्ति अपने जीवन स्वभाव में बदलाव का अनुभव कर पाए, इससे पहले इन शैतानी स्वभावों को शुद्ध किया जाना ज़रूरी है। किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव एक पुनर्जन्म है, क्योंकि उसका सार बदल गया है। इससे पहले, जब उसे सत्ता दी गई, तो वह अपना स्वतंत्र राज्य बनाने में सक्षम था। अब, जब उसे सत्ता दी जाती है, तो वह परमेश्वर की सेवा करता है, परमेश्वर की गवाही देता है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सेवक बन जाता है। क्या यह वास्तविक परिवर्तन नहीं है? इससे पहले, सभी स्थितियों में वह खुद का दिखावा करता था और चाहता था कि अन्य लोग उसके बारे में श्रेष्ठ सोचें और उसकी आराधना करें। अब, वह हर जगह परमेश्वर की गवाही देता है, और खुद का दिखावा नहीं करता। चाहे लोग उससे कैसे भी व्यवहार करें, उसे वह ठीक लगता है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसके बारे में कैसी टिप्पणी करते हैं, उसे वह ठीक लगता है। उसे इसकी कोई परवाह नहीं होती है। वह केवल परमेश्वर को उत्कृष्टता देना चाहता है, परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहता है, दूसरों को परमेश्वर की समझ प्राप्त करने में मदद करना चाहता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में दूसरों की पालन करने में मदद करना चाहता है। क्या यह जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? “मैं भाई-बहनों के साथ प्रेम से व्यवहार करूँगा। मैं सभी परिस्थितियों में दूसरों के प्रति करुणामय रहूँगा। मैं अपने बारे में नहीं सोचूंगा और दूसरों को लाभ प्रदान करूँगा। मैं दूसरों को उनकी जिंदगी में आगे बढ़ने में मदद करूँगा और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करूंगा। मैं दूसरों की सत्य समझने में और सत्य प्राप्त करने में मदद करूँगा।” दूसरों को स्वयं के समान प्यार करने का यही मतलब है! जब शैतान की बात आती है, तो तुम इसे समझ सकते हो, सिद्धांत बना सकते हो, इसके साथ एक सीमांकन रेखा खींच सकते हो और शैतान की बुराइयों को पूरी तरह से प्रकट कर सकते हो ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसके नुकसान से बचाया जा सके। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करना है, और यह दूसरों को और भी अधिक स्वयं के समान प्यार करना है। इसके अतिरिक्त, तुम्हें उससे प्यार करना चाहिए जिससे परमेश्वर प्यार करता है और उससे नफरत करनी चाहिए जिससे परमेश्वर घृणा करता है। परमेश्वर मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करता है। इसका मतलब है कि हमें भी मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करनी है। हमें परमेश्वर की तरफ खड़ा होना चाहिए। हम उनके साथ समझौता नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर किससे प्यार करता है? परमेश्वर उनसे प्यार करता है जिन्हें वह बचाना और आशीष देना चाहता है। इन लोगों के लिए, हमें जिम्मेदार होना चाहिए, उनके साथ प्यार से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सहायता, नेतृत्व और समर्थन प्रदान करना चाहिए। क्या यह किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? इसके अतिरिक्त, जब तुमने कुछ अपराध या गलतियाँ की हैं, या कोई काम करने में सिद्धांतों की उपेक्षा की है, तो तुम भाई-बहनों की आलोचना, उलाहना, व्यवहार और कांट-छांट स्वीकार कर सकते हो; तुम इन सभी चीजों से उचित व्यवहार कर सकते हो और उन्हें परमेश्वर से प्राप्त कर सकते हो, घृणा त्याग सकते हो, और अपने भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हो। क्या यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है?
क्या एक व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, जिसकी धार्मिक जगत में चर्चा है, जीवन स्वभाव में बदलाव का प्रतिनिधित्व कर सकता है? सभी कहते हैं कि नहीं कर सकता। ऐसा क्यों है? मुख्य कारण यह है कि वह अभी भी परमेश्वर का विरोध करता है। यह बिल्कुल फरीसियों जैसा है जो बाहर से बड़े भक्त थे। वे अक्सर प्रार्थना करते थे, पवित्रशास्त्र को समझाते थे और व्यवस्था के नियमों का बहुत अच्छे से पालन करते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहरी रूप से, वे निंदा से परे थे। लोग कोई भी दोष निकालने में असमर्थ थे। हालाँकि, वे अभी भी मसीह का विरोध करने और निंदा करने में सक्षम क्यों थे? यह क्या इशारा करता है? चाहे लोग कितने भी अच्छे प्रतीत हों, अगर उनके पास सत्य नहीं है और इस प्रकार वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं तो वे अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करेंगे। बाहरी रूप से, वे बहुत अच्छे थे, लेकिन यह जीवन स्वभाव में बदलाव के रूप में क्यों नहीं गिना जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका भ्रष्ट स्वभाव ज़रा भी नहीं बदला था और वे अभी भी घमंडी, दम्भी और विशेष रूप से आत्म-तुष्ट थे। वे अपने ज्ञान और सिद्धांतों में विश्वास करते थे और मानते थे कि उनकी शास्त्रों की समझ सर्वोत्तम है। उनका मानना था कि वे सबकुछ समझ गए थे और वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर थे। यही कारण है कि जब प्रभु यीशु प्रचार कर रहा था और अपना कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसका विरोध किया और निंदा की। यही कारण है कि जब धार्मिक जगत ने सुनता है कि अंत के दिनों के मसीह ने सारा सत्य व्यक्त किया है, तो वे उसकी निंदा करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि यह सच है। उन्होंने किस तरह की गलती की? बाहरी रूप से, वे इतने बड़े बदलाव से होकर गुज़रे, तो यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी परमेश्वर का विरोध करने में सक्षम थे? यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी मसीह के प्रति पागलों के समान शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने में सक्षम थे? यह किस तरह की समस्या है? क्या कोई व्यक्ति जो मसीह का विरोध करता है और प्रतिरोध करता है वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? क्या परमेश्वर उन लोगों को राज्य में ला सकता है जो मसीह के दुश्मन हैं? परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा।
— ‘जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति’ से उद्धृत