240 मुझे परमेश्वर के प्रेम ने बचाया

1 बरसों तक प्रभु में आस्था रखने के बावजूद, मैं धार्मिक सिद्धांतों, धारणाओं और कल्पनाओं में ही जीती रही, न तो मुझे प्रभु के वचनों का अनुभव लेना आता था और न ही मुझे उसके सामने समर्पण के अर्थ का कुछ पता था। बस बाइबल संबंधी ज्ञान और सिद्धांत बघार कर ही मैं सोचती थी कि मुझे सत्य का ज्ञान हो गया था। जबकि प्रभु के लिए मेरा खपना और कष्ट सहना केवल आशीष पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए ही था। जब शैतान की दुष्ट शक्तियों की बात आई, तो मैंने उनके सामने बस समर्पण कर दिया और भले-बुरे में पहचान करने का कोई प्रयास नहीं किया; यहां तक कि मैंने शैतानी शासक की ओर से परमेश्वर से आशीष पाने के लिए प्रार्थना और विनती भी की। मैं सचमुच मूर्ख, अहंकारी और अंधी थी। अगर परमेश्वर हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने की खातिर अंत के दिनों में देहधारण न करता, तो हम बेहद भ्रष्ट लोग पाप में ही घिरे जूझते रहते। हम अंत के दिनों में उद्धार पाने लायक कैसे हो सकते थे?

2 परमेश्वर के न्याय के आगमन के कारण ही मैं अपनी भ्रष्टता का असली चेहरा साफ तौर पर देख पाई। मैं परमेश्वर में अपनी आस्था में केवल उसके साथ सौदेबाजी करना ही जानती थी; मैंने उसे कभी भी सच्चे दिल से नहीं चाहा था। परीक्षणों और शुद्धिकरण से सामना होने पर मैंने सत्य की खोज नहीं की थी, मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत करने और भुनभुनाने की हद तक चली गई थी। यह देखकर कि उसका कार्य मेरी धारणा के अनुरूप नहीं है, मैं उस पर संदेह तक करने लगी थी, उसकी आलोचना और निंदा करने लगी थी। परमेश्वर में अपनी आस्था के दौरान, मैंने उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं पहचाना था और उसके प्रति किसी भी तरह का कोई भय या समर्पण नहीं दिखाया था। सच्चाई यह थी कि मैं बहुत ही ज्यादा अवज्ञाकारी और प्रतिरोधी थी। मेरा बदसूरत चेहरा उजागर हो गया था। अब मैं परमेश्वर के न्याय का आनंद लेती हूं और मेरी भ्रष्टता भी दूर हो रही है, यह सब उसके प्रेम और करुणा के कारण है। मेरे जैसा भ्रष्ट इंसान परमेश्वर का उद्धार पाकर उसके प्रेम के प्रति कृतज्ञ क्यों न होगा? अंत के दिनों में न्याय और सत्य प्राप्त करना मेरा सबसे बड़ा आशीष है। परमेश्वर के प्रेम के कारण ही मैंने उद्धार पाया है। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद करती हूं और उसकी स्तुति करती हूँ। केवल परमेश्वर ही मनुष्य को सबसे अधिक प्रेम करता है।

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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