946 परमेश्वर का क्रोध उसके धार्मिक स्वभाव का प्रदर्शन है

1 यद्यपि परमेश्वर के क्रोध का उंडेला जाना उसके धर्मी स्वभाव के प्रदर्शन का एक पहलू है, फ़िर भी अपने लक्ष्य के प्रति परमेश्वर का क्रोध बिल्कुल भी विवेकशून्य या सिद्धान्तविहीन नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर क्रोध करने में बिल्कुल भी उतावलापन नहीं दिखाता है, न ही वह अपने क्रोध और प्रताप को अविवेकपूर्ण रूप से प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का क्रोध विशेष रूप से नियन्त्रित और और नपा-तुला होता है; इसकी तुलना मनुष्य के क्रोध से आग बबूला होने या अपने गुस्से को प्रकट करने से बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का प्रदर्शन या उसे प्रकट करना बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर का क्रोध गुस्से का बहुत बड़ा विस्फोट नहीं है जैसा मनुष्य इसे समझता है। परमेश्वर अपने क्रोध को इसलिए नहीं प्रकट करता है क्योंकि वह अपने मिजाज़ पर काबू करने में समर्थ नहीं है या इसलिए कि उसका क्रोध उबलने पर आ पहुंचा है और उसे बाहर निकालना ही होगा। इसके विपरीत, उसका क्रोध उसके धर्मी स्वभाव का एक प्रदर्शन है और उसके धर्मी स्वभाव की एक विशुद्ध अभिव्यक्ति है; यह उसके पवित्र सार का एक सांकेतिक प्रकाशन है।

2 परमेश्वर क्रोध है, और किसी भी गुनाह के प्रति सहनशील नहीं है—कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि परमेश्वर का क्रोध विभिन्न कारणों के बीच अन्तर नहीं करता है या यह सिद्धान्तविहीन है; यह भ्रष्ट मनुष्य ही है जिसके पास सिद्धान्तविहीनता, और बिना सोचे समझे, विभिन्न कारणों के बीच अन्तर न करने वाले क्रोध को ज़ाहिर करने पर एक व्यापक एकाधिकार है। पाप के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए मनुष्य क्रोध में आगबबूला होगा और अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगा, ये कार्य वे तरीके हैं जिसके तहत मनुष्य अपने असंतोष को प्रकट करता है। ये कार्य अशुद्धता से लबालब भरे हुए हैं; वे छल कपट और साजिशों से लबालब भरे हुए हैं; वे मनुष्य की भ्रष्टता और बुराई से लबालब भरे हुए हैं; उससे कहीं बढ़कर, वे मनुष्य की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब भरे हुए हैं। जब न्याय दुष्टता से मुकाबला करता है, तो मनुष्य न्याय के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए क्रोध से आगबबूला नहीं होता है; उसके विपरीत, जब न्याय की शक्तियों को धमकाया, सताया और उन पर आक्रमण किया जाता है, तब मनुष्य का स्वभाव नज़रअंदाज़ करने, टालने या मुंह फेरने वाला होता है। फ़िर भी, दुष्ट शक्तियों से मुकाबला करते समय, मनुष्य का रवैया सेवा करने और मक्खन लगाने वाला होता है। इसलिए, मनुष्य का क्रोध निकालना दुष्ट शक्तियों के लिए बच निकलने का मार्ग है, और देहयुक्त मनुष्य के बुरे आचरण का प्रदर्शन है जो अनियंत्रित एवं रोका न जा सकनेवाला है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से रूपांतरित

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