946 परमेश्वर का रोष उसके धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति है

1

ईश्वर का रोष उसकी धार्मिकता का एक पहलू है,

पर वो अपने लक्ष्य पर विचारे, सिद्धांतों पर कायम रहे।

ईश्वर जल्दी रोष न करे, उतावलेपन से क्रोध, प्रताप न दिखाए।

इंसानी गुस्से से अलग, नियंत्रित, नपा-तुला है उसका रोष।

ईश्वर का रोष, सच्चा इज़हार है उसके धार्मिक

स्वभाव का, जो प्रकट करे उसके पवित्र सार को।

2

ईश्वर का रोष न दिखाए उसकी मनोदशा को,

न दिखाए उसके पूरे रोष को, जैसा शायद इंसान समझे।

ऐसा नहीं कि ईश्वर पूरा रोष, इसलिए निकाले, कि वो अपने मिज़ाज को

काबू न कर सके, या उसका रोष पहुँच गया है चरम पर जो निकलना चाहिए।

ईश्वर का रोष, सच्चा इज़हार है उसके धार्मिक

स्वभाव का, जो प्रकट करे उसके पवित्र सार को।

3

ईश्वर का रोष कोई अपमान न सहे,

उसके रोष का सिद्धांत है, कारणों में भेद वह कर सके।

पर भ्रष्ट इंसान ऐसा न कर सके।

इंसान गुस्से में भड़के, आवेश में आए, पापों को बचाने के लिए सब करे।

इंसान ये हरकतें करे अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए।

इंसान की हरकतें मलिन हैं।

उनमें षड्यंत्र, भ्रष्टता है,

भरी साज़िश और दुष्टता चाहतें, महत्वाकांक्षाएँ भरी हैं।

ईश्वर का रोष, सच्चा इज़हार है उसके धार्मिक

स्वभाव का, जो प्रकट करे उसके पवित्र सार को।

4

जब दुष्टता का मुकाबला न्याय से हो,

तब इंसान न्याय का बचाव करने को गुस्सा न करे।

अगर न्याय पर ख़तरा हो, या हमला हो,

तो इंसान अनदेखी करे, बचकर निकले।

पर जब दुष्ट ताकतों से उसका सामना हो,

तो इंसान सेवा और ख़ुशामद करे।

इंसान का आवेश दुष्ट का बचाव है,

जो दिखाये इंसान की दुष्टता बेकाबू है।

ईश्वर का रोष, सच्चा इज़हार है उसके धार्मिक

स्वभाव का, जो प्रकट करे उसके पवित्र सार को।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से रूपांतरित

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