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विश्वास के लिए मुख्य है परमेश्वर के वचनों को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना

I

परमेश्वर पर विश्वास नहीं होना चाहिए

चमत्कारों और संकेतों को देखने के उद्देश्य से,

नहीं होना चाहिए तुम्हारी व्यक्तिगत देह के लिए।

होना चाहिए यह परमेश्वर को जानने की तलाश के लिए,

सर्वोत्तम ढंग से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के लिए।

पतरस की तरह मृत्यु तक परमेश्वर की आज्ञा मानो।

यही वो सब है जो प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

II

परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का उद्देश्य है

परमेश्वर को सही में जानना,

परमेश्वर को संतुष्ट करना।

परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का उद्देश्य है

परमेश्वर का और ज़्यादा ज्ञान पाना।

सिर्फ़ तब कर पाओगे तुम उसकी आज्ञा का पालन, कर पाओगे उसे प्रेम।

यही होना चाहिए परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य।

III

परमेश्वर पर विश्वास का

मतलब है परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की तलाश करना,

परमेश्वर की आज्ञा पूरी तरह मानना।

बिना किसी शिकायत अगर तुम मानते हो परमेश्वर की आज्ञा,

कर सकते हो विचार परमेश्वर की अभिलाषाओं पर,

कर सकते हो प्राप्त पतरस की कद-काठी और शैली,

तब होगे तुम सफल अपने विश्वास में,

प्राप्त किए जाओगे तुम परमेश्वर द्वारा।

अगर तुम सिर्फ़ करते हो कोशिश चमत्कार और संकेत देखने की,

तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का दृष्टिकोण है गलत।

परमेश्वर में विश्वास का मतलब है

उसके वचनों को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना।

उसके वचनों का, उसके मुंह से निकले वचनों का करो अभ्यास।

अपने भीतर करो उसके वचनों का पालन।

यही है परमेश्वर का लक्ष्य प्राप्त करना, करना।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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