248 परमेश्वर का सच्चा प्रेम

1

कितनी ही बार, मैं नकारात्मक हुआ हूँ और रोया हूँ क्योंकि मैंने प्रतिष्ठा और रुतबा गँवा दिया।

कितनी ही बार, परीक्षणों ने उजागर किया कि मैं सिर्फ़ अपने उज्ज्वल भविष्य की चिंता करता हूँ, और मैं दुःख से अभिभूत हो गया।

कितनी ही बार, मैंने अड़ियल और विद्रोही तेवर अपनाए, परमेश्वर के न्याय से पीछा छुड़ाने का प्रयास किया, लेकिन मेरी अंतरात्मा ने मुझे धिक्कारा नहीं।

कितनी ही बार, मैंने प्रायश्चित करने का संकल्प लिया, फिर भी मैंने जानबूझकर बुरे काम किए, और मैंने अपने भीतर के पाप को स्वेच्छाचारी होने दिया।

हे परमेश्वर, तुम्हारे वचनों का न्याय मेरी कुरूप आत्मा को बेपर्दा करता है,

मैं अपनी भ्रष्टता के सत्य को साफ़ तौर पर देखता हूँ और मुझे कहीं मुँह छिपाने की जगह नहीं मिलती।


2

मैं मान चुका था कि मुझे बचाना संभव नहीं है, लेकिन तुम्हारे वचनों ने मेरी गलतफ़हमी दूर कर दी।

कितनी ही बार, मैं शैतान के प्रलोभनों में पड़ा, लेकिन तुमने गुप्त रूप से मेरी निगरानी की और मेरी रक्षा की।

कितनी ही बार, मैंने गलतफ़हमियाँ पालीं और तुम्हारा विरोध किया, लेकिन तुमने हमेशा मेरे साथ नरमी बरती और धैर्य दिखाया।

तुमने कभी मेरे द्वारा किए गए अपराधों को याद नहीं रखा, और तुमने मुझे पश्चाताप का मौका दिया।

हे परमेश्वर, मैं कितना तुच्छ और निम्न हूँ, फिर भी तुम हर वक्त मेरी परवाह करते हो।

अगर मैं अभी भी तुम्हारे प्यार का प्रतिदान न दे पाऊँ तो मैं इंसान कहलाने लायक कैसे हो सकता हूँ?


3

तुम्हारे न्याय, परीक्षण, फटकार और अनुशासन का अनुभव करके, मैं अंतत: तुम्हारे प्रेम को जान गया हूँ।

हालाँकि मैं परिशोधन की भयंकर पीड़ा सहता हूँ, फिर भी मेरा भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध किया जा रहा है।

सत्य का अभ्यास करके, तुम्हारा आज्ञापालन करके और तुम्हारे समक्ष रहकर, मैं विश्राम और शांति महसूस करता हूँ।

एक ईमानदार व्यक्ति बनने में जो परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, मुझे बेहद ख़ुशी होती है।

हे परमेश्वर, तुम्हारा न्याय प्रेम है, इसने मुझे तुम्हारे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम बनाया है।

मैंने तुम्हारे सच्चे प्यार का अनुभव किया है, मैं तुम से हमेशा प्यार करना और तुम्हारा आज्ञापालन करना चाहता हूँ।

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