885 मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर का अथक परिश्रम भरा कार्य

1 कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिसका उन्होंने अनुभव किया है? परमेश्वर हमेशा मनुष्य को ताड़ित एवं अनुशासित नहीं करता है, न ही वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाता है। बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति का, भिन्न-भिन्न तरीकों से, उनके विभिन्न चरणों में और उनके भिन्न-भिन्न स्‍तरों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीज़ें और बड़ी क़ीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत या इन चीज़ों के बारे में जिन्हें परमेश्वर करता है कुछ भी महसूस नहीं करता है, फिर भी वह जो कुछ करता है उसे वास्तविकता में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है।

2 परमेश्वर का प्रेम सच्चा हैः परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा से बचता है, जबकि मनुष्य की दुर्बलता के प्रति, परमेश्वर समय-समय पर अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और उनके भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, मनुष्य को प्रबुद्ध करना एवं उसका मार्गदर्शन करना ये सब मानवजाति को सत्य के सार को और भी अधिक जानने देते हैं, और उत्तरोत्तर यह जानने देते हैं कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्‍या है, और कैसे आगे के मार्ग पर चलना है।

3 ये तरीके जिन्हें वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है मनुष्य के हृदय को निरन्तर जागृत करने, मनुष्य की आत्मा को जागृत करने, मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि वे कहाँ से आए हैं, कौन उनका मार्गदर्शन कर रहा है, उनकी सहायता कर रहा है, उनका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को अब तक जीवित रहने दिया है; वे मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि सृष्टिकर्ता कौन है, उन्हें किसकी आराधना करनी चाहिए, उन्हें किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता है, इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान लेता है, परमेश्वर के हृदय को समझ लेता है, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ लेता है।

4 जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब वे एक पतित जीवन एवं भ्रष्ट स्वभाव को अब और जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर की संतुष्टि में सत्य की खोज करने की इच्छा करते हैं। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो वे शैतान के साथ स्पष्ट रूप से सम्बन्ध तोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, शैतान के द्वारा अब और हानि नहीं पहुँचाए जाते है, उसके द्वारा अब और नियंत्रित नहीं होते या मूर्ख नहीं बनाए जाते हैं। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के कार्य में और उसके वचनों में सकारात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय और बुराई को त्यागने को प्राप्त करता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से रूपांतरित

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