857 मानवजाति के प्रति परमेश्वर की करुणा निरंतर बहती है

तब यहोवा ने कहा, "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?"

1 "सृष्टिकर्ता की दया" कोई खोखला वाक्यांश नहीं है, न ही यह कोई खोखला वादा है; इसमें ठोस सिद्धांत, पद्धतियाँ और उद्देश्य हैं। परमेश्वर सच्चा और वास्तविक है, और वह किसी झूठ या स्वाँग का उपयोग नहीं करता, और इसी तरह उसकी दया मनुष्य को हर समय और हर युग में निरंतर प्रदान की जाती है। फिर भी, आज तक, योना के साथ सृष्टिकर्ता का संवाद इस बारे में उसका एकमात्र, अनन्य मौखिक कथन है कि वह मनुष्य पर दया क्यों करता है, वह मनुष्य पर दया कैसे करता है, वह मनुष्य के प्रति कितना सहनशील है और मनुष्य के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ क्या हैं।

2 इस वार्तालाप के दौरान यहोवा परमेश्वर के संक्षिप्त वचन संपूर्ण मानवजाति के प्रति उसके विचारों को अभिव्यक्त करते हैं; वे मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय के रवैये की सच्ची अभिव्यक्ति हैं, और वे मानवजाति पर प्रचुर मात्रा में दया करने का ठोस सबूत भी हैं। उसकी दया न केवल मनुष्य की वृद्ध पीढ़ियों को प्रदान की जाती है; बल्कि वह मानवजाति के युवा सदस्यों को भी दी जाती है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, जैसा हमेशा से होता आया है। यद्यपि परमेश्वर का कोप कुछ निश्चित जगहों पर और कुछ निश्चित युगों में मानवजाति पर बार-बार उतरता है, किंतु उसकी दया कभी खत्म नहीं हुई है। अपनी दया से वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी का मार्गदर्शन और अगुआई करता है, वह सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी की आपूर्ति एवं पालन-पोषण करता है, क्योंकि मनुष्य के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ कभी नहीं बदलेंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से रूपांतरित

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