60. परमेश्वर बहुत धार्मिक है

हाल ही में, कुछ झूठे अगुआ और मसीह-विरोधी कलीसिया के लोगों को धोखा देने लगे हैं, कुछ दुराचारी लोग कलीसिया के जीवन में गड़बड़ी पैदा कर रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता। परमेश्वर धार्मिक है, फिर वह उन मसीह-विरोधियों और दुराचारियों को रोक कर दंड क्यों नहीं दे रहा है? वह इन लोगों को क्यों कलीसिया में अपने चुने हुए लोगों को दबाने और कलीसिया के काम में गड़बड़ी पैदा करने दे रहा है? इस बारे में सभी की क्या राय है?

ऐसे मसले पर मुझे पहले भी बहुत उलझन महसूस हुई है। मेरा ख़याल था कि परमेश्वर धार्मिक है, इसलिए दुराचारियों को तुरंत उनकी करनी का फल मिल जाना चाहिए और परमेश्वर द्वारा दंडित हो जाना चाहिए, ऐसा न होने पर मैं सोचता कि परमेश्वर अधार्मिक है। हम ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योंकि हम परमेश्वर की धार्मिकता को सही मायनों में नहीं समझते। परमेश्वर द्वारा कलीसिया में मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं को प्रकट होने देने के पीछे है उसकी सदिच्छा और उससे भी ज़्यादा उसकी बुद्धिमत्ता। हम सिर्फ़ सत्य को खोज लें, तो परमेश्वर की धार्मिकता को समझ सकेंगे। आओ, बताता हूँ मेरे साथ क्या हुआ।

सितंबर 2012 में, मैं कलीसिया के काम का प्रभारी था, तभी मेरी मुलाक़ात अगुआ यान झुओ से हुई। मुझे पता चला कि वे भाई-बहनों से घर-घर जाकर सुसमाचार का प्रचार करने को कहती रही हैं। यह सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन था। इसलिए मेरे कार्यकारी साथी और मैंने उनसे कहा, "सुसमाचार का प्रचार करते समय हमें परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का पालन करना होगा। आप फिलहाल जो कर रही हैं वह उनके विपरीत है, अगर अविश्वासी या दुराचारी कलीसिया में आ गये, तो इससे परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ी पैदा हो जाएगी। वैसे भी, इस तरह सुसमाचार का प्रचार करना खतरनाक है। अगर किसी ने पुलिस को बुला लिया, तो आप हमारे भाई-बहनों को शेर के मुंह में झोंक चुकी होंगी।" उन्होंने हमारी बात पर ध्यान देना तो दूर, उल्टे इल्ज़ाम थोप दिया कि हम नियमों से चिपके हुए हैं। इसके बाद सभाओं में, वे मुझे और मेरे साझीदार को अक्सर फटकार लगातीं, कहतीं कि हम परमेश्वर के घर के सुसमाचार-कार्य में रुकावट पैदा कर रहे हैं। हम दोनों उसके सामने वाकई लाचार हो गये। उस साल दिसंबर में, यान झुओ के कहे अनुसार हमारे क्षेत्रीय सदस्य सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बाहर गये, और 100 से ज़्यादा लोग गिरफ़्तार कर लिये गये। परमेश्वर के घर के कार्य को यह बहुत बड़ा धक्का था, मगर यान झुओ को ज़रा भी पछतावा नहीं हुआ। मैंने उन्हें एक बार भी अपने अहंकार या बेपरवाही का विश्लेषण करते हुए या गहराई से आत्मचिंतन करते हुए नहीं देखा। नवंबर 2013 तक, मैं कलीसिया में वीडियो बनाने का प्रभारी बन चुका था। मैंने देखा कि वे अभी भी अहंकार के साथ मनमानी कर रही थीं। वे अलग राय व्यक्त करने वाले किसी भी व्यक्ति को डांट लगातीं और उसकी निंदा करतीं। वे लोगों द्वारा समीक्षा के लिए पेश किये गये वीडियो को बार-बार रोक देतीं, जिससे भाई-बहनों को परमेश्वर के घर से सही वक्त पर सुझाव नहीं मिलते या मदद नहीं मिल पाती। मैंने कर्तव्य निभाने में उनकी कमियों की तरफ इशारा करके उन्हें कुछ सुझाव दिये, मगर वे पहले जैसे ही करती रहीं। उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी और कहा कि मैं अहंकारी हूँ। मई 2014 में, उन्होंने मुझे बर्खास्त करवा कर घर वापस भेज दिया। घर पहुँचने के बाद, संयोग से मैंने मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं को समझने के बारे में कुछ सिद्धांत पढ़े। यान झुओ के लगातार एक-जैसे बर्ताव की उनसे तुलना करके, आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि वे सच में कितनी ज़्यादा अहंकारी और दुर्भावनापूर्ण हैं। वे अपने काम में हमेशा अंधाधुंध तानाशाही दिखा रही थीं। उन्होंने भाई-बहनों की बतायी सच्चाई या उनके सुझावों को मंज़ूर नहीं किया, बल्कि इसके बजाय लोगों का दमन कर उनकी निंदा की। क्या उनका बर्ताव यह नहीं दिखाता कि वे सत्य से घृणा करने वाली मसीह-विरोधी हैं? उनके इस बर्ताव को देख कर, मैं हैरान रह गया। साथ काम करते हुए दो साल में, मैंने उनका बर्ताव और नज़रिया देखा था, लेकिन इन सबको मैंने भ्रष्टता की अभिव्यक्ति समझा। मैंने उनकी प्रकृति, उनके सार या जिस राह पर वे चल रही थीं, उसका विश्लेषण करने के लिए कभी भी परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए जब कभी मैं उनके साथ होता, मुझे बस सहनशील होकर सब्र रखना पड़ता, इससे परमेश्वर के घर के कार्य में देरी होने लगी और उस पर बुरा असर पड़ने लगा। मुझे लगा, "अगर यान झुओ कलीसिया की अगुआ बनी रहीं, तो वे परमेश्वर के घर के कार्य में और ज़्यादा गड़बड़ी पैदा करेंगी।" मैंने परमेश्वर के घर से उनकी समस्याओं के बारे में शिकायत करने का फैसला किया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उनकी शिकायत वाली चिट्ठी लिख डाली। चिट्ठी के अंत में, एक आख़िरी बात मैंने जोड़ दी। उस समय मुझे पता था कि एक वीडियो में कुछ समस्याएं हैं, इसलिए मैंने परमेश्वर के घर से इस मामले पर गौर कर उसकी समीक्षा करने का निवेदन किया।

चिट्ठी पूरी हो गयी थी, मैं बस भेजने ही वाला था कि मन में कुछ दूसरे विचार उठने लगे। सोचा, "मैंने अगुआ को पहले भी सुझाव दिये हैं, और कर्तव्य निभाने की उनकी समस्याओं की ओर इशारा किया है, लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आया और उन्होंने मुझे घर भेज दिया। अब मैं अपना कर्तव्य भी नहीं निभा सकता। अगर मैं उनकी समस्याओं के बारे में शिकायत वाली यह चिट्ठी भेज दूं, और संयोग से वे कहीं उसे पढ़ लें, तो वे मुझ पर अगुआओं और कर्मियों पर हमला करने का इल्ज़ाम लगा देंगी, तब मेरा क्या हाल होगा? इसे भूल जाना ही ठीक है। वैसे भी दरवाज़े से बाहर हूँ, तो क्यों नाहक खलबली मचाऊँ।" मगर तभी मैंने सोचा : "परमेश्वर ने आज मुझे यह समझने का रास्ता दिखाया है कि यान झुओ मसीह-विरोधियों के रास्ते पर चल रही हैं। अगर मैं इसकी शिकायत न करूं, तो इससे परमेश्वर के घर के कार्य और भाई-बहनों पर बुरा असर पडेगा। फिर क्या मैं शैतान का मददगार और दुराचारी नहीं बन जाऊंगा?" मेरे मन में कशमकश पैदा हो गया, एक तरफ परमेश्वर के घर के हित और भाई-बहन के हित थे, और दूसरी तरफ मेरे अपने भविष्य की संभावनाएं। समझ नहीं पाया कि क्या करूं। कुछ दिनों तक, मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करता रहा, सही रास्ता दिखाने की विनती करता रहा। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "तू सिद्ध बनाया जा सके, इसके लिए तेरे पास आकांक्षाएँ और साहस अवश्य होना चाहिए, और तुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि तू असमर्थ है। क्या सत्य की भी अपनी पसंदीदा चीज़ें होती हैं? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? यदि तू सत्य के पीछे पीछे चलता है, तो क्या यह तुझे अभीभूत कर सकता है? यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा रहता है, तो क्या यह तुझे मार कर नीचे गिरा देगा? यदि यह सचमुच में तेरी आकांक्षा है कि तू जीवन का अनुसरण करे, तो क्या जीवन तुझसे बच कर निकल जाएगा? यदि तेरे पास सत्य नहीं है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि सत्य तुझे नज़रंदाज़ करता है, बल्कि इसलिए है क्योंकि तू सत्य से दूर रहता है; यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि न्याय के साथ कुछ न कुछ गड़बड़ी है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तू विश्वास करता है कि यह तथ्यों से अलग है; कई सालों तक जीवन का पीछा करते हुए भी यदि तूने जीवन प्राप्त नहीं किया है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि जीवन के पास तेरे लिए कोई सद्विचार नहीं है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तेरे पास जीवन के लिए कोई सद्विचार नहीं है, और तूने जीवन को स्वयं से दूर कर दिया है; यदि तू ज्योति में जीता है, लेकिन ज्योति को पाने में असमर्थ रहा है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि ज्योति तुझे प्रकाशित करने में असमर्थ है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तूने ज्योति के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया, और इसलिए ज्योति तेरे पास से खामोशी से चली गई है। यदि तू अनुसरण नहीं करता है, तो केवल यह कहा जा सकता है कि तू फालतू कचरा है, तेरे जीवन में साहस बिल्कुल नहीं है, और तेरे पास अंधकार की ताकतों का विरोध करने के लिए हौसला नहीं है। तू बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर है! तू शैतान की उन ताकतों से बचने में असमर्थ है जो तुझे जकड़ लेती हैं, तू केवल इस प्रकार का सकुशल और सुरक्षित जीवन जीना और अपनी अज्ञानता में मरना चाहता है। जो तुझे हासिल करना चाहिए वह है विजय पा लिए जाने का तेरा अनुसरण; यह तेरा परम कर्तव्य है। यदि तू इस बात से संतुष्ट है कि तुझ पर विजय पा ली गयी है, तो तू ज्योति की अस्तित्व को दूर हटा देता है। तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए" (वचन देह में प्रकट होता है)। इस अंश को पढ़ कर मुझे विश्वास और शक्ति मिली। "हाँ", मैंने सोचा, "मैं इस काली ताकत को मुझे हराने नहीं दूंगा।" मैं पहले कभी यान झुओ को नहीं समझ पाया था। लेकिन अब परमेश्वर ने चीज़ों को ठीक कर दिया था, इसलिए मैं उनकी प्रकृति, उनके सार, और उनके रास्ते को समझ पाया। मुझे पक्के इरादे के साथ शिकायत कर देनी चाहिए थी, लेकिन मैंने अपने भविष्य की संभावनाओं की खातिर शैतान के इस फ़लसफ़े को मान लिया, "चीजों को प्रवाहित होने दें यदि वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करती हों।" मुझे समझ आया कि मैं कितना स्वार्थी हूँ, मुझमें विवेक और समझ है ही नहीं। मैंने परमेश्वर में विश्वास रखने और परमेश्वर के वचनों के पोषण और सिंचन का आनंद लेने के अपने तमाम वर्षों को याद किया। फिर भी इस अहम घड़ी में, मैं अपने हितों की रक्षा करने के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज़ और परमेश्वर के घर की अनदेखी कर रहा था। मैं कितना कृतघ्न, नीच और घिनौना इंसान हूँ! ऐसा एहसास होने पर मैंने सोचा : "मुझे अंतरात्मा की आवाज़ और न्याय की समझ के साथ काम करना चाहिए, सत्य का अभ्यास करके परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करनी चाहिए।" इसलिए मैंने परमेश्वर से अनेक बार प्रार्थना की, और आखिरकार यह संकल्प लिया : "यह शिकायती चिट्ठी लिखने के जो भी परिणाम हों, मैं अपने हितों की रक्षा करने के लिए शैतान का साथी नहीं बन सकता। मैंने यान झुओ की समस्याएँ देखी हैं, इसलिए मुझे एक पक्का मन बना कर उनके बुरे कर्मों को उजागर करना चाहिए, परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करनी चाहिए।" फिर मैंने शिकायती चिट्ठी परमेश्वर के घर भेज दी। मुझे बड़ी राहत मिली, मेरे दिल को बड़ा सुकून मिला। फिर हर दिन मैं बेचैनी से इंतज़ार करता कि परमेश्वर का घर यान झुओ के हालात की जांच-पड़ताल के लिए किसी को भेजेगा, फिर भाई-बहन समझ सकेंगे कि वह कैसी मसीह-विरोधी है और फिर उसे ठुकरा देंगे। दुर्भाग्य से, इस चिट्ठी के कारण मेरी हालत और भी बदतर हो गयी।

अगस्त 2014 में, कलीसिया फिर से मुझे अपना कर्तव्य निभाने देने को राजी हो गयी। लेकिन अक्तूबर के बीच में एक दिन, ली नाम की एक अगुआ उस अतिथि गृह में आयीं, जहां मैं रहता था। चेहरे पर सख्ती का भाव लिये उन्होंने पूछा, "पहले आपने कोई शिकायती चिट्ठी लिखी थी?" मैंने कहा, ‘हाँ’। नाखुश भाव से उन्होंने कहा, "यान झुओ कलीसिया के कार्य की प्रभारी हैं और मैं अक्सर उनके संपर्क में रहती हूँ। मैंने कभी भी नहीं देखा, न ही सुना कि वे एक झूठी अगुआ या मसीह-विरोधी जैसा व्यवहार करती हैं। आपकी लिखी हुई चिट्ठी अगुआओं और कर्मियों पर वैसे ही किया गया एक हमला है।" उनकी बात सुन कर मुझे यकीन नहीं हुआ। चार महीने इंतज़ार करने के बाद मैंने ऐसे परिणाम की कल्पना नहीं की थी। उनकी यह बात सुनकर भी मैं शांत रहा। मैं जानता था कि यान झुओ के बारे में वह चिट्ठी मैंने तथ्यों और सिद्धांतों के अनुसार लिखी थी। किसी भी हाल में गलत इल्ज़ाम नहीं लगाया था। फिर अगुआ ली ने कहा, "आपकी शिकायती चिट्ठी में किसी वीडियो की जांच का ज़िक्र है, इसलिए परमेश्वर के घर ने जांच-पड़ताल और समीक्षा में दो महीने लगाये। इससे परमेश्वर के घर के कार्य में काफ़ी रुकावट पैदा हुई और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान हुआ।" उन्होंने यह भी कहा कि वरिष्ठ अगुआ भी यही कहते हैं। इन टिप्पणियों से मुझे ज़बरदस्त झटका लगा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी चिट्ठी से परमेश्वर के घर में ऐसी गंभीर रुकावट पैदा हो सकती है, और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान हो सकता है। अगर सब-कुछ उनके कहे अनुसार है, तो मैंने बहुत बुरा काम किया है। एकाएक मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर में ज़रा भी ताक़त नहीं रही, मैं रोये बिना नहीं रह पाया। फिर अगुआ ली ने कहा, "अपनी चीज़ें समेटिए, घर जाइए, और अपनी करतूत पर आत्मचिंतन कीजिए। आत्मचिंतन पूरा हो जाने पर, आप फिर से अपना कर्तव्य निभा सकते हैं।" मैंने घर लौटने के लिए बस पकड़ ली, मेरा दिमाग चकरा रहा था, दिल पर भारी बोझ था। मैंने इतने साल तक परमेश्वर में विश्वास रखा, फिर भी मैं दुराचारी बन गया, जिसने परमेश्वर के घर के कार्य में गंभीर रुकावट पैदा की। मैं खुद को दोष देने लगा, पछतावे में डूब गया, मैं बिल्कुल समझ नहीं पाया कि भविष्य मेरे लिए क्या लेकर आयेगा। मैंने परमेश्वर को पुकारा और उससे अपने दिल को मजबूत करने की विनती की। परमेश्वर मेरा जो भी निपटान करे, मैं उसकी व्यवस्थाओं का पालन करूंगा। मैं परमेश्वर को कभी दोष नहीं दूंगा। प्रार्थना करने के बाद, मैं धीरे-धीरे शांत हुआ। तीन दिन बाद, मैं घर पहुंचा, मैंने ली की बात पर गौर किया, मेरे मन में कुछ सवाल उठने लगे : परमेश्वर के घर में मसीह और सत्य का शासन है, और लोगों से पेश आने सहित उसके हर कार्य के लिए सिद्धांत हैं। वह कभी भी किसी व्यक्ति को उसके अस्थाई व्यवहार के पैमाने पर नहीं देखता। तो फिर मेरे साथ इस तरह पेश आने में ली और दूसरे लोग किन सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं? क्या अगुआ ली की बातें वाकई सच हैं? मैं समझ नहीं पाया, लेकिन मुझे पता था कि सच चाहे जो भी हो, यह सब परमेश्वर की मर्ज़ी से हो रहा है, इसलिए मुझे उसकी व्यवस्थाओं के सामने समर्पण करना होगा। जल्दी ही कलीसिया की एक अगुआ ने मुझे सभाओं के लिए एक समूह का जिम्मा सौंपा। महीने भर से भी ज़्यादा समय के बाद, मुझे अपने ही घर में अपनी माँ के साथ सभाओं में भाग लेने का काम सौंपा गया, और हमें अब अपने कर्तव्य निभाने की इजाज़त नहीं दी गयी। तब मैं जान गया कि हमें निष्कासित किया जा रहा है। इस पूरे समय में मैंने परमेश्वर में विश्वास रखा, लेकिन अब न केवल मुझे घर पर अलग-थलग कर दिया जा रहा था, बल्कि अब मैं अपना कर्तव्य भी नहीं निभा सकता था। मैंने पागलों जैसा महसूस किया। उस दौरान, मैं हर रात सभाओं के और भाई-बहनों के साथ अपना कर्तव्य निभाने के सपने देखता। मेरी नींद खुल जाती, फिर मैं सो नहीं पाता। हर रात बहुत लंबी लगती, बर्दाश्त के बाहर। उन दिनों मेरे साथ मेरी माँ भी कष्ट झेलती। ख़ास तौर से रात को जब मैं उसे परमेश्वर से प्रार्थना करते और रोते हुए देखता, तो खुद को दोष देता और बेहद उदास महसूस करता। लगता मैंने ही उसे यह दुख दिया है। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद से, वो मेरे लिए सबसे दर्दनाक और मुश्किल भरे दिन थे। परमेश्वर से निरंतर प्रार्थना करने के अलावा, मेरे पास अपने दिल के दर्द से छुटकारा पाने का और कोई तरीका ही नहीं था। बाद में मैंने कलीसिया की अपनी अगुआ से पूछा, क्या मैं फिर से अपना कर्तव्य निभाने के लिए जा सकता हूँ। उन्होंने कहा, "आप अभी भी अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं? अगर आप उस तरह आत्मचिंतन नहीं करते जैसे करना चाहिए, तो आपको निष्कासित कर दिया जाएगा!" उनकी यह बात सुनकर मैं बेहद मायूस हो गया। तब मैं जान गया कि अपना कर्तव्य निभाना मेरे लिए ख्याली पुलाव से ज़्यादा कुछ नहीं है। अगुआ हर सप्ताह बैठक के लिए हमारे घर आने लगे, मगर दरअसल वे बस मेरे बारे में जानने के लिए आते, यह देखने के लिए कि क्या मैं नकारात्मकता फैला रहा हूँ या गुट बना रहा हूँ। इसलिए हर बार वे जब मेरे बारे में पूछने आते, तो मैं बेहद उदास हो जाता। कभी-कभार मैं उनसे पूछना चाहता, "आप मेरे साथ इस तरह क्यों पेश आ रहे हैं? मैंने यान झुओ की शिकायत सिद्धांतों के आधार पर की थी। लेकिन उनकी जांच-पड़ताल करने के बजाय आपने मुझे घर में बंद कर दिया है। क्या सत्य का अभ्यास करना ग़लत है?" मैंने वाकई बेचैनी महसूस की। कभी-कभार, मैं सोचता : "सत्य का अभ्यास करके ऐसा क्यों हो गया? मेरा विश्वास है कि परमेश्वर धार्मिक है, लेकिन अब जो हो रहा है उसमें मुझे उसकी धार्मिकता नहीं दिखाई देती।" मैं बड़ी उलझन में था। मैं बिल्कुल थोड़े से गुज़ारा करता, पाप की बातें नहीं करता, न ही परमेश्वर को दोष देता। मैं परमेश्वर से अक्सर प्रार्थना करता, उससे उसकी इच्छा समझने का रास्ता दिखाने की विनती करता, उसे ग़लत नहीं समझता।

उस बेहद मुश्किल और दुखदाई घड़ी में, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े। "लोगों को परमेश्‍वर के धार्मिक स्‍वभाव का ठीक-ठीक किस तरह पता लगाना और समझना चाहिए? जब धार्मिक व्‍यक्ति उसके आशीष प्राप्‍त करता है और जब वह दुष्ट उसके द्वारा शापित होते हैं—ये परमेश्‍वर की धार्मिकता के उदाहरण हैं। क्‍या यह सही है? कहा जाता है कि परमेश्‍वर अच्छाई को पुरस्‍कृत और बुराई को दण्डित है, और वह प्रत्‍येक मनुष्‍य की उसके कर्मों के अनुसार भरपाई करता है। यह सही है, नहीं क्या? लेकिन आजकल जो परमेश्‍वर की आराधना करते हैं वे उसके द्वारा या तो मारे जाते हैं या शापित किए जाते हैं, या कभी धन्य या स्‍वीकार नहीं किए गए; वे उसकी चाहे जितनी आराधना करें, वह उन्हें अनदेखा करता है। परमेश्‍वर दुष्‍टों को न धन्य करता है, न उन्‍हें दण्ड देता है, तब भी वे समृद्ध हैं और उनकी कई संततियाँ हैं, और उनके लिए सब अच्छा ही होता है; वे हर चीज़ में सफल होते हैं। क्‍या यही परमेश्‍वर की धार्मिकता है? परिणामस्वरूप, कुछ लोग कहते हैं, 'परमेश्‍वर धार्मिक नहीं है। हम उसकी आराधना करते हैं, लेकिन उसने हमें कभी धन्य नहीं किया, जबकि उसका प्रतिरोध करने और उसकी आराधना नहीं करने वाले दुष्‍ट लोग, सभी चीज़ों में, अधिक सुखी-संपन्न और हमसे उच्चतर पदों पर हैं। परमेश्‍वर धार्मिक नहीं है!' यह तुम लोगों को क्‍या दर्शाता है? मैंने अभी तुम्‍हें दो उदाहरण दिए। इनमें से कौन-सा परमेश्‍वर की धार्मिकता की बात करता है? कुछ लोग कहते हैं, 'वे दोनों परमेश्‍वर की धार्मिकता को सामने लाते हैं!' वे यह क्‍यों कहते हैं? परमेश्‍वर के स्‍वभाव के बारे में लोगों का ज्ञान त्रुटिपूर्ण है; वह उनके अपने विचारों और दृष्टिकोणों के बीच ही जीवित है, लेन-देन के परिप्रेक्ष्‍य के भीतर, या अच्छाई और बुराई के परिप्रेक्ष्‍य, सही और ग़लत के परिप्रेक्ष्‍य, या तार्किक परिप्रेक्ष्‍य के भीतर। यही वे परिप्रेक्ष्‍य हैं जिन्हें वे परमेश्‍वर के बारे में अपने ज्ञान के बीच ले आते हैं; ऐसे लोग परमेश्‍वर के अनुरूप नहीं है, और उनके द्वारा परमेश्‍वर का प्रतिरोध करना और उसके बारे में शिकायत करना अवश्यंभावी हैं।"

"परमेश्वर वही करेगा जो उसे करना ही चाहिए, और उसका स्‍वभाव धार्मिक है। धार्मिकता किसी भी तरह से न्‍यासंगत या तर्कसंगत नहीं होती; यह समतावाद नहीं है, या तुम्‍हारे द्वारा पूरे किए गए काम के अनुसार तुम्‍हें तुम्‍हारे हक़ का हिस्‍सा आवंटित करने, या तुमने जो भी काम किया हो उसके बदले भुगतान करने, या तुम्‍हारे किए प्रयास के अनुसार तुम्‍हारा देय चुकाने का मामला नहीं है। यह धार्मिकता नहीं है। मान लो कि अय्यूब द्वारा उसकी गवाही देने के बाद परमेश्वर अय्यूब को ख़त्‍म देता : तब भी परमेश्‍वर धार्मिक होता। इसे धार्मिकता क्‍यों कहा जाता है? मानवीय दृष्टिकोण से, अगर कोई चीज़ लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती है, तब उनके लिए यह कहना बहुत आसान हो जाता है कि परमेश्‍वर धार्मिक है; परंतु, अगर वे उस चीज़ को अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं पाते—अगर यह कुछ ऐसा है जिसे वे बूझ नहीं पाते—तो उनके लिए यह कहना मुश्किल होगा कि परमेश्‍वर धार्मिक है। ... परमेश्‍वर का सार धार्मिकता है। यद्यपि वह जो करता है उसे बूझना आसान नहीं है, तब भी वह जो कुछ भी करता है वह सब धार्मिक है; बात सिर्फ़ इतनी है कि लोग समझते नहीं हैं। जब परमेश्‍वर ने पतरस को शैतान के सुपुर्द कर दिया था, तब पतरस की प्रतिक्रिया क्‍या थी? 'तुम जो भी करते हो उसकी थाह तो मनुष्‍य नहीं पा सकता, लेकिन तुम जो भी करते हो उस सब में तुम्‍हारी सदिच्छा समाई है; उस सब में धार्मिकता है। यह कैसे सम्‍भव है कि मैं तुम्‍हारे बुद्धिमान कर्मों की सराहना न करूँ?' आज, तुम्‍हें देखना चाहिए कि परमेश्वर शैतान को इसलिए नष्‍ट नहीं करता ताकि वह मनुष्‍यों को दिखा सके कि शैतान ने उन्‍हें किस तरह भ्रष्‍ट कर दिया है और परमेश्‍वर किस तरह उन्हें बचाता है; अंततः, शैतान ने जिस हद तक लोगों को भ्रष्‍ट कर दिया है उसकी वजह से, वे शैतान द्वारा उन्हें भ्रष्‍ट किए जाने का राक्षसी पाप देखेंगे, और जब परमेश्‍वर शैतान को नष्‍ट करता है, तब वे परमेश्‍वर की धार्मिकता देखेंगे और देखेंगे कि इसमें परमेश्‍वर का स्‍वभाव निहित है। वह सब जो परमेश्‍वर करता है धार्मिक है। हालाँकि वह तुम्‍हारे लिए अज्ञेय हो सकता है, तब भी तुम्‍हें मनमाने ढंग से फ़ैसले नहीं करने चाहिए। अगर तुम्‍हें उसका कोई कृत्‍य अतर्कसंगत प्रतीत होता है, या उसके बारे में तुम्हारी कोई धारणाएँ हैं, और उसकी वजह से तुम कहते हो कि वह धार्मिक नहीं है, तब तुम सर्वाधिक अतर्कसंगत हो रहे हो। तुम देखो कि पतरस ने पाया कि कुछ चीज़ें अबूझ थीं, लेकिन उसे पक्का विश्‍वास था कि परमेश्‍वर की बुद्धिमता विद्यमान थी और उन चीजों में उसकी इच्छा थी। मनुष्‍य हर चीज़ की थाह नहीं पा सकते; इतनी सारी चीज़ें हैं जिन्‍हें वे समझ नहीं सकते। इस तरह, परमेश्‍वर के स्‍वभाव को जानना आसान बात नहीं है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचन अँधेरे में लालटेन की तरह चमक रहे थे, एकाएक मुझे समझ आ गया। मैं परमेश्वर की धार्मिकता को इसलिए नहीं समझ पा रहा हूँ, क्योंकि मैं इसे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का इस्तेमाल करके समझने की कोशिश कर रहा हूँ। जब मैंने उन मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं को परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा पहुंचाते देखा, तो मैंने माना कि सच्चाई के साथ उनकी शिकायत करना एक अच्छा और धार्मिक काम है, जिससे मुझे परमेश्वर की कृपा और सुरक्षा मिलेगी। मैंने सोचा कि उनका तुरंत निपटान होगा, और सिर्फ़ वही परमेश्वर की धार्मिकता है। लेकिन इन समस्याओं के बारे में मेरी शिकायत के बाद भी, वे अपने पदों पर बने रहे और अंधाधुंध तरीके से काम करते रहे, जबकि मेरी आवाज़ को दबा कर मुझे निष्कासित कर दिया गया। तब मुझे परमेश्वर की धार्मिकता पर शक होने लगा। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, आखिरकार मैं समझ पाया कि परमेश्वर का सार धार्मिक है। उसके कर्म हमारी धारणाओं से भले ही मेल न खायें, वे हमेशा उसकी धार्मिकता व्यक्त करते हैं। यह बिल्कुल अय्यूब के परीक्षणों जैसा है। वह परमेश्वर की नज़रों में एक पूर्ण इंसान था, लेकिन परमेश्वर ने उसे शैतान के हाथों सौंप दिया, उसकी सारी संपत्ति और बाल-बच्चे ले लिये। यह परमेश्वर की धार्मिकता थी। अय्यूब ने परमेश्वर का भय माना, बुराई से दूर रहा, उसने परमेश्वर की ज़बरदस्त निष्ठावान गवाही देने के लिए अपनी आस्था पर भरोसा किया। फिर परमेश्वर ने उसे लंबी आयु, ढेर सारी दौलत और बेहतर संतान का भी आशीष दिया। यह भी परमेश्वर की धार्मिकता थी। मान लो, अय्यूब के गवाही देने के बाद, परमेश्वर उसे आशीष नहीं देता, बल्कि इसके बजाय उसे तबाह कर देता। तो वह भी परमेश्वर की धार्मिकता होती। परमेश्वर का सार और स्वभाव मूलतः धार्मिक हैं, इसलिए उसका किया हुआ हर कार्य धार्मिक होता है। फिर मैंने पतरस के बारे में सोचा, जो सैकड़ों परीक्षणों और शुद्धिकरणों से होकर गुज़रा, फिर भी परमेश्वर की धार्मिकता की प्रशंसा करता रहा। वह हर घटना की वजह को नहीं समझ पाया, लेकिन उसे यकीन था कि इन सबके पीछे परमेश्वर की धार्मिकता और बुद्धिमत्ता है। फिर इधर मैं हूँ—मैं परमेश्वर की धार्मिकता को सही मायनों में नहीं समझ पाया, लेकिन सामने दिख रही चीज़ें और परिणाम मेरी धारणाओं से मेल खाते हैं या नहीं, यह देख कर मैंने उसका आकलन किया। जब परमेश्वर के कर्म मेरी धारणाओं से मेल खाते और मुझे लाभ पहुंचाते, तो मैं उसकी धार्मिकता में यकीन करता। लेकिन जब उसने ऐसे हालात पैदा किये जिनसे मुझे लाभ नहीं हुआ, तो यह मान कर कि उसके द्वारा व्यवस्थित चीज़ें अनुचित हैं, मुझे उसकी धार्मिकता पर शक होने लगा। हालांकि मैंने खुले तौर पर परमेश्वर को कभी दोष नहीं दिया, पर मैं मन-ही-मन उसके साथ बहस करता। मैंने जान लिया कि मैं कितना नासमझ हूँ। परमेश्वर अधार्मिक नहीं हो रहा है। मैं ही परमेश्वर को नहीं समझ पाया हूँ। मैं बहुत ज़्यादा स्वार्थी और कपटी हूँ। मैं न सत्य को खोज रहा हूँ, न ही उसके द्वारा मेरे लिए व्यवस्थित हालात से कुछ सीख रहा हूँ। इसके बजाय, मैं अपने भविष्य और हितों के बारे में ही सोच-सोच कर बहस कर रहा हूँ, तो फिर मैं इतना बुरा कैसे न महसूस करता, मैं अँधेरे और पीड़ा में क्यों न डूबता? आखिरकार मैंने परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया। परमेश्वर इन हालात का इस्तेमाल मेरे ग़लत नज़रिये को दुरुस्त करने के लिए कर रहा है, ताकि मैं अब अपनी धारणाओं के जरिये उसकी धार्मिकता को समझने की कोशिश न करूं। मुझे लगा जैसे आखिरकार मैं समझ गया हूँ कि मेरे आसपास क्या हो रहा है। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने और इन हालात में उसे समझने को तैयार हो गया।

फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "अधिकांश लोग परमेश्‍वर के कार्य को नहीं समझते। उसे समझना सचमुच आसान बात नहीं है; सबसे पहले तुम्‍हें जानना चाहिए कि परमेश्‍वर के समूचे कार्य के पीछे एक योजना है और यह सब परमेश्‍वर के समय पर किया जाता है। मनुष्य अनंत काल से थाह पाने में असमर्थ है कि परमेश्‍वर क्‍या और कब करता है; परमेश्‍वर निश्चित समय पर निश्चित कार्य करता है, और वह देरी नहीं करता; कोई उसका कार्य नष्‍ट नहीं कर सकता। अपनी योजना के अनुसार और अपने अभिप्राय के अनुसार कार्य करना, वह सिद्धांत है जिसके अनुसार वह अपना कार्य करता है, और कोई व्‍यक्ति इसे बदल नहीं सकता। इसी में तुम्‍हें परमेश्‍वर का स्‍वभाव देखना चाहिए।" "हर एक कार्य जो परमेश्वर करता है वह आवश्यक होता है, और वह असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि जो कुछ भी वह मनुष्य में करता है वह उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से सम्बन्धित होता है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने जो कार्य अय्यूब में किया वह कुछ अलग नहीं है, भले ही अय्यूब परमेश्वर की नज़रों में सिद्ध और खरा था। दूसरे शब्दों में, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है या किन उपायों के द्वारा वह इसे करता है, भले ही उसकी कीमत, या उसका कुछ भी क्यों न हो, उसके कार्यों का उद्देश्य बदलता नहीं है। उसका उद्देश्य है कि वह मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं, और मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा का काम करे; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर वह सब कुछ करने के लिए है जिसे परमेश्वर मानता है कि ये उसके कदमों के अनुसार सकारात्मक हैं, जो मनुष्य को सक्षम बनाता है ताकि वह परमेश्वर के हृदय को समझे और परमेश्वर के सार को बूझे, और उसे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानने देता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता का परित्याग करना प्राप्त करने देता है—जो भी वह करता है उसमें यह सब परमेश्वर के उद्देश्य का एक पहलू है। अन्य पहलू है कि, क्योंकि शैतान एक विषमता और परमेश्वर के कार्य में काम आने वाली एक वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दे दिया जाता है; यही वह साधन है जिसे परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों के बीच लोगों को शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घिनौनेपन को देखने देने के लिए उपयोग करता है, इस प्रकार लोग को शैतान से घृणा करवाता है और उन्हें वह जानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें धीरे-धीरे स्वयं को शैतान के नियन्त्रण से, और शैतान के आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से स्वतन्त्र होने देती है—जब तक कि, परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं, और शैतान के आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर गए होंगे" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे दिखाया कि वह सिद्धांतों के अनुसार और हमेशा अपने समय से ही कर्म करता है, इन सबके पीछे उसकी धार्मिकता और बुद्धिमत्ता होती है। मैंने कल्पना की थी कि परमेश्वर की धार्मिकता का अर्थ तुरंत प्रतिफल देना है, और दुराचारियों को तुरंत दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन अगर चीज़ें मेरी कल्पना के अनुसार होने लगें, तो फिर परमेश्वर हर किस्म के लोगों को कैसे उजागर करेगा, अपने चुने हुए लोगों को कैसे विवेक हासिल करने देगा? परमेश्वर दरअसल मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं को कलीसिया में उभरने देता है, ताकि वह इन लोगों का इस्तेमाल करके जीवन में आगे बढ़ने में हमारी मदद कर सके, हमें सत्य खोजने और समझ पैदा करने की तरफ़ बढ़ा सके। जब हम सत्य के सिद्धांतों का इस्तेमाल करके इन लोगों को समझने में समर्थ हो जाते हैं, तब हम सत्य को समझ कर उसमें प्रवेश करते हैं। जब ऐसा हो जाता है, तब मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं का प्रयोजन पूरा हो जाता है। हालांकि उस समय कलीसिया में कुछ मसीह-विरोधी और झूठे अगुआ सत्ता के पदों पर आसीन थे, और वे कुछ लोगों पर काबू कर उन्हें धोखा देने के काबिल लगते थे, फिर भी कलीसिया में मसीह और सत्य का ही शासन है, इसलिए देर-सवेर उन्हें उजागर कर दूर कर दिया जाएगा।

मुझे यह भी एहसास हो गया कि मसीह-विरोधियों की प्रकृति कितनी कपटी, दुर्भावनापूर्ण और इंसानियत से रहित है। वे सिर्फ़ अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की परवाह करते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों की बिल्कुल भी नहीं। जो कोई भी उनके हितों के आड़े आता है, उनके पाँव का काँटा बन जाता है। वे उस व्यक्ति पर हमला कर उससे बदला लेंगे, तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक उसे ख़त्म न कर दें। उनका बर्ताव ठीक दानव शैतान जैसा होता है। जब तक मसीह-विरोधियों को निकाल नहीं दिया जाएगा, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कलीसिया का जीवन जीने या अपने कर्तव्य निभाने में पल भर का भी चैन नहीं मिलेगा। परमेश्वर ने मेरे साथ ऐसा होने दिया, ताकि मैं इन लोगों के जरिये समझ सकूं कि उन्होंने दूसरों को किस तरह से धोखा देकर नुकसान पहुंचाया है, उनकी प्रकृति और सार को पहचान सकूं, उनकी विधर्मी भ्रांतियों को समझ सकूं, उनके नियंत्रण और धोखे से बच कर निकल सकूं। परमेश्वर यह भी चाहता था कि मैं उनकी ग़लतियों से सीखूं, ताकि मैं गलत रास्ते पर न चलूँ। इन सबने मुझे दिखाया कि परमेश्वर इन हालात की व्यवस्था मुझे बचाने और पूर्ण करने के लिए कर रहा था। जैसे कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है : "कई नकारात्मक और विपरीत चीज़ों की सेवा और शैतान के तमाम प्रकटीकरणों—उसके कामों, आरोपों और उसकी बाधाओं और धोखों के माध्यम से परमेश्वर तुम्हें शैतान का भयानक चेहरा साफ़-साफ़ दिखाता है और इस प्रकार शैतान को पहचानने की तुम्हारी क्षमता को पूर्ण बनाता है, ताकि तुम शैतान से नफ़रत करो और उसे त्याग दो" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि उसने मुझे उसकी मेहनतकश कोशिशों को समझने का रास्ता दिखाया, अँधेरों से बाहर निकलने में मेरी अगुआई की।

जनवरी 2015 में, मैंने यान झुओ की शिकायत करते हुए एक और चिट्ठी लिखी। मैं फिर से हर दिन बेचैनी से इंतज़ार करता कि परमेश्वर के घर से उनकी जांच-पड़ताल करने के लिए किसी को भेजा जाएगा। लेकिन दो महीने गुज़र गये, फिर भी मैं जांच करने के लिए किसी के आने का इंतज़ार ही करता रहा। हमारी कलीसिया की अगुआ बार-बार मुझसे सवाल करने आ जातीं। "क्या आपको परमेश्वर या उसके घर के साथ कोई समस्या है?" उनकी यह बात सुनकर मुझे फ़िक्र होने लगी। मैंने सोचा, "मैंने यह चिट्ठी लिख दी, अब जाने क्या होगा। मुझे पहले ही अलग-थलग कर दिया गया है, अगर और कुछ हो गया, तो मुझे कलीसिया से निकाल बाहर किया जाएगा।" मुझे एकाएक एहसास हुआ कि मुझे परमेश्वर की धार्मिकता पर फिर से शक होने लगा है। मैं जल्दी से परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगा, "प्यारे परमेश्वर, मैं ज़बानी तौर पर तुम्हारी धार्मिकता को स्वीकार करता हूँ, मुझे यकीन है कि परमेश्वर के घर में मसीह और सत्य का शासन है। लेकिन जब समय और तथ्य मेरा इम्तहान लेते हैं, तब मुझे समझ आता है कि मेरी आस्था कितनी हल्की है, मैं अभी भी तुम्हारी धार्मिकता को सही मायनों में नहीं समझ पाया हूँ। मैं अब चाहता हूँ कि अपने हितों को छोड़ दूं और तुम्हारी व्यवस्थाओं के सामने समर्पण कर दूं। मुझे तुम्हारी इच्छा को समझने का रास्ता दिखाओ।" फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, "क्योंकि हर व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम करने की आकांक्षा करता है, कोई सत्य अप्राप्य नहीं है, और कोई न्याय ऐसा नहीं है जिसके लिए वे दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं हो सकते हैं। तुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए? तुझे परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए, और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तेरे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है? सब से बढ़कर, तेरे पास ऐसी आकांक्षा और दृढ़ता होनी चाहिए, और तुझे उन बेहद कमज़ोर दुर्बल प्राणियों के समान नहीं होना चाहिए। तुझे सीखना होगा कि एक अर्थपूर्ण जीवन को कैसे अनुभव किया जाता है, तुझे अर्थपूर्ण सच्चाईयों का अनुभव करना चाहिए, और तुझे अपने आप से लापरवाही के साथ बर्ताव नहीं करना चाहिए। तेरे जाने बिना, तेरा जीवन यों ही गुज़र जाएगा; और उसके बाद, क्या तेरे पास परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तेरे पास पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और अंतरात्मा होनी चाहिए; तेरा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुझे स्वयं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए!" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि वह हमारी सत्य और धार्मिकता की लालसा, और परमेश्वर से प्रेम करने के हमारे संकल्प को पूर्ण करता है। चाहे कैसी भी मुश्किलों, नाकामयाबियों या हमलों से हमारा सामना हो, हम पीछे नहीं हट सकते, बल्कि हमें परमेश्वर और सत्य के लिए जीना चाहिए। हम शैतान की किसी भी ताक़त के आगे झुक नहीं सकते। तभी हम सत्य हासिल करके पूर्ण हो सकते हैं। मुझमें इस प्रकार का संकल्प और इच्छाशक्ति नहीं थी। हालांकि मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करके संकल्प लिया था कि उसके घर के कार्य की रक्षा करूंगा और सत्य का अभ्यास करूंगा, जैसे ही मैंने दुष्ट ताक़तों को सिर उठाते देखा, मैं दबा दिये जाने के डर से पीछे हट गया। मुझे एहसास हो गया कि मैं अभी भी परमेश्वर की धार्मिकता को सही मायनों में नहीं समझ पाया हूँ, और घटनाएं घटने पर मैं सिर्फ़ खुद के बारे में ही सोचता हूँ। फिर मेरे मन में परमेश्वर का एक वचन कौंधा : "दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा" (वचन देह में प्रकट होता है)। "परमेश्वर के वचन ज़रूर पूरे होंगे, और वह जो पूरा करता है सदा के लिए कायम रहता है। हर दुराचारी को परमेश्वर की धार्मिकता का दंड ज़रूर मिलेगा। भले ही इसमें कितना भी समय लगे, या यह चाहे जैसे भी हो, अंत में चीज़ें आखिरकार वैसी ही होंगी जैसे कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है।" इसलिए मैंने सोचा, "मुझे अपनी धारणाओं को छोड़ना होगा, अपने कपटी शैतानी स्वभाव को त्यागना होगा, परमेश्वर के वचनों में विश्वास रखना होगा और यकीन करना होगा कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं शैतान की किसी भी ताक़त के आगे नहीं झुकूंगा!" एक बार यह एहसास हो जाने के बाद, मैंने धीरे-धीरे शांत होकर फ़िक्र करना छोड़ दिया।

अप्रैल 2015 के आते-आते मेरे पास अगुआ ली और दूसरे अगुआओं और कर्मियों की चिट्ठियाँ आने लगीं, यह बयाँ करते हुए कि यान झुओ ने किस तरह से उनकी आँखों में धूल झोंकी हैं, और किस तरह उन लोगों ने मुझे बहुत नुकसान पहुंचाया है। उन सबने मुझसे माफी मांगी। अपनी चिट्ठी में, अगुआ ली ने मान लिया, "तुम पर कलीसिया के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाने का इल्ज़ाम वरिष्ठ अगुआओं ने नहीं, यान झुओ ने लगाया था।" तब मैं जान पाया कि यान झुओ ने उसके बारे में शिकायत की मेरी दोनों चिट्ठियाँ पढ़ ली थीं। खुद को बचाने की खातिर वह मुझे निष्कासित करवाने के लिए साक्ष्य तैयार कर रही थी, लेकिन कुछ अगुआओं और कर्मियों ने उसकी समस्याएँ समझ लीं, इसलिए उन्होंने उसकी शिकायत करते हुए परमेश्वर के घर को एक साझा चिट्ठी भेज दी। इन सब चिट्ठियों को पढ़कर, मैंने राहत की गहरी साँस ली। मैं परमेश्वर के सामने घुटनों के बल बैठ कर रोने लगा। उस पल मैंने खुद को परमेश्वर का बहुत ऋणी महसूस किया। मैंने इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा, लेकिन उसकी धार्मिकता को मैंने हमेशा अपनी कल्पना के नज़रिए से ही देखा। जब समस्याएँ खड़ी हुईं, तो मैं अपनी कल्पना से उनका मिलान करने की कोशिश करने लगा, जब इससे काम नहीं बना, तो मैंने परमेश्वर को ग़लत समझ कर उसे दोषी ठहराया। लेकिन उसने मेरी कमज़ोरी और भ्रष्टता को नज़रअंदाज़ किया, और उस दर्दनाक, बर्दाश्त से बाहर के दौर से गुज़रने का मुझे रास्ता दिखाया। इस अनुभव ने मुझे दिखाया कि उन झूठे अगुआओं को समझ कर उनकी शिकायत करने के इस आध्यात्मिक युद्ध का इस्तेमाल परमेश्वर मेरी गुमराह धारणाओं को सुधारने के लिए कर रहा था, और उसने मुझे अपनी धार्मिकता की सच्ची समझ दी। मुझे यह भी एहसास हो गया कि मैं परमेश्वर के हर कार्य को अपनी कल्पना के नज़रिये से ही देख रहा था। मैं दरअसल परमेश्वर का तिरस्कार कर उसे सीमाओं में बाँध रहा था, मैंने उसके स्वभाव का अपमान किया था। इस अनुभव ने मुझे समझाया कि परमेश्वर का सार धार्मिक है। परमेश्वर का हर वचन और कार्य, चाहे वह लोगों की धारणाओं से मेल खाये या नहीं, उसके धार्मिक स्वभाव को प्रकट करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर का धर्मी स्वभाव परमेश्वर का स्वयं का सच्चा सार है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा कुशलता से आकार दिया गया है या लिखा गया है। उसका धर्मी स्वभाव उसका अपना धर्मी स्वभाव है और इसका सृष्टि की किसी भी चीज़ के साथ कोई सम्बन्ध या नाता नहीं है। परमेश्वर स्वयं ही स्वयं परमेश्वर है। वह कभी भी सृष्टि का एक भाग नहीं बन सकता है, और भले ही वह सृजे गए प्राणियों के बीच एक सदस्य बन जाए, फ़िर भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और सार नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानना नहीं है; यह किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझना है। यदि परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य उसी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करता है, जिससे वह किसी वस्तु या व्यक्ति को जानता-समझता है, तो वह परमेश्वर के ज्ञान को हासिल करने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर को जानना, अनुभव या कल्पना पर भरोसा करना नहीं है, और इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए। भले ही तुम्हारे अनुभव और कल्पना कितने ही समृद्ध क्यों न हों, फिर भी वे सीमित ही रहेंगे; और तो और, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती है, और सच्चाई से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो तो तुम कभी भी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता इस प्रकार है: वह सब ग्रहण करो जो परमेश्वर से आता है, फ़िर धीरे-धीरे उसका अनुभव करो और समझो। एक ऐसा दिन आएगा जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण, सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम सचमुच में उसे समझो और जानो" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर का धन्यवाद! मई 2015 में, मसीह-विरोधी यान झुओ को बहुत ज़्यादा दुष्टता करने के कारण कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया। उसके पिछलग्गुओं और संगी-साथियों का भी निपटान किया गया। निष्कासन की सूचना पढ़ कर मैंने अपने दिल की गहराई से महसूस किया कि परमेश्वर सही मायनों में धार्मिक है! परमेश्वर के घर में सत्य और मसीह का शासन है!

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