972 परमेश्वर निरंतर मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करता है

1 परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा ही मानवजाति के जीवन की अगुवाई की है। चाहे मानवजाति को आशीष देना हो, उन्हें व्यवस्था एवं अपनी आज्ञाएँ देना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियम नियत करना हो, क्या तुम लोग जानते हो कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का इच्छित लक्ष्य क्या है? पहला, क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह मानवजाति की भलाई के लिए है? तुम लोग सोच सकते हो कि यह वाक्य अपेक्षाकृत व्यापक एवं खोखला है, किन्तु विशेष रूप से कहें, तो क्या सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह एक सामान्य जीवन जीने के प्रति मनुष्य की अगुवाई एवं मार्गदर्शन के लिए नहीं है? चाहे यह ऐसा है जिससे मनुष्य उसके नियमों को माने या उसकी व्यवस्था का पालन करे, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का लक्ष्य है कि वह शैतान की आराधना न करे, और शैतान के द्वारा आहत न हो; यही मूलभूत बात है, और यही वह काम है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। यद्यपि उसके पास मनुष्य के लिए योजनाएं एवं इरादे हैं, फिर भी वह खुद के लिए कुछ नहीं करता है। वह जो कुछ भी करता है उसे विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए, मानवजाति को बचाने के लिए, और मानवजाति को गुमराह होने से बचाने के लिए करता है।

2 जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करे? (वह ज्योति चमकाता है।) वह तुम पर एक ज्योति चमकाता है, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है और तुम्‍हें क्या करना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करता है, जब वह तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तो तुम परमेश्वर के मिलनसार स्वभाव, एवं तुम्‍हारे प्रति उसके सम्‍मान को महसूस करते हो, और तुम महसूस करते हो कि वह कितना प्यारा है, और कितना स्नेही है। किन्तु जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तुम्हारा न्याय करता है एवं तुम्हें अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का उपयोग करता है? क्या वह शब्दों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह वातावरण एवं लोगों, मामलों, एवं चीज़ों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) परमेश्वर सौम्यता, प्रेम, कोमलता एवं परवाह करते हुए ऐसे तरीके से कार्य करता है जो विशेष रूप से नपा-तुला और उचित है। उसका तरीका तुम में तीव्र भावनाओं को उत्पन्न नहीं करता है परमेश्वर तुम्हें कभी भी उस किस्म की तीव्र मानसिकता या तीव्र भावनाएं नहीं देता है जो चीज़ों को असहनीय बना देती हैं।

3 परमेश्वर मनुष्य की निरन्तर आपूर्ति के लिए, एवं मनुष्य को सहारा देने के लिए अपने वचनों, अपने सत्‍य एवं अपने जीवन का उपयोग करता है। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, और उसके द्वारा मनुष्य को संजोकर रखने और उसका पोषण करने को, एक या दो वाक्य में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य के डींग हांकने के द्वारा घटित होती है बल्कि यह ऐसी चीज़ है जिसे परमेश्वर वास्तविक तौर पर अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार-तत्व का प्रकाशन है। वह सब कुछ जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, जिसमें परमेश्वर के वचन शामिल हैं, वे विभिन्न तरीके जिनके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को बताता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को स्मरण कराता है, वह जिसकी वह सलाह देता है एवं उत्साहित करता है, यह सब एक सार-तत्व से उत्पन्न होता है: यह सब परमेश्वर की पवित्रता से उत्पन्न होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से रूपांतरित

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