825 परमेश्वर सिर्फ़ गवाही देने के लिए मनुष्य को प्रोत्साहित करता है

1 यही कारण है कि मैं तुम लोगों को लेकर अत्यधिक चिंता करता रहता हूँ: जीवन जीने के लिए अकेले छोड़ दिये जायें, तो क्या मनुष्य आज जैसे हैं, उसके तुल्य या उससे बेहतर हो पाएंगे? क्या तुम लोगों की बचकानी कद-काठी तुम लोगों को व्याकुल नहीं करती? क्या तुम लोग सचमुच इस्राएल के चुने हुए लोगों जैसे हो सकते हो-हर समय, केवल और केवल मेरे प्रति निष्ठावान? तुम लोगों में जो उद्घाटित हुआ है, वह अपने माता-पिता से बिछड़े बच्चों का शरारतीपन नहीं है, बल्कि जंगलीपन है जो अपने स्वामियों के चाबुक की पहुँच से बाहर हो चुके जानवरों से फूटकर बाहर आ जाता है। तुम लोगों को अपनी प्रकृति जाननी चाहिए, जो तुम लोगों में समान कमज़ोरी भी है; यह एक रोग है जो तुम लोगों में समान है। इस प्रकार, आज तुम लोगों को मेरा एकमात्र उपदेश यह है कि मेरे प्रति अपनी गवाही पर अडिग रहो। किसी भी परिस्थिति में पुरानी बीमारी को फिर भड़कने न दो। गवाही देना ही वह है, जो सबसे महत्वपूर्ण है—यह मेरे कार्य का मर्म है। तुम लोगों कोमेरे वचन वैसे ही स्वीकार करने चाहिए जैसे मरियम ने यहोवा का प्रकाशन स्वीकार किया था, जो उस तक एक स्वप्न में आया था : विश्वास करके और आज्ञापालन करके। केवल यही पवित्रता की कसौटी पर खरा उतरता है।

2 क्योंकि तुम लोग ही हो जो मेरे वचनों को सबसे अधिक सुनते हो, जिन्हें मेरा सबसे अधिक आशीष प्राप्त है। मैंने तुम लोगों को अपनी समस्त मूल्यवान चीज़ें दे दी हैं, मैंने सब कुछ तुम लोगों को प्रदान कर दिया है, तो भी तुम लोग इस्राएल के लोगों से इतने अत्यधिक भिन्न कद-काठी के हो; तुम बहुत ही अलग-अलग हो। लेकिन उनकी तुलना में, तुम लोगों ने इतना अधिक प्राप्त किया है; जहां वे मेरे प्रकटन की हताशा से प्रतीक्षा करते हैं, तुम लोग मेरे साथ, मेरी उदारता को साझा करते हुए, सुखद दिन बिताते हो। इस भिन्नता को देखते हुए, मेरे ऊपर चीखने-चिल्लाने और मेरे साथ झगड़ा करने और जो मेरा है, उसमें अपने हिस्से की माँग करने का अधिकार तुम लोगों को कौन देता है? क्या तुम लोगों को बहुत नहीं मिला है? मैं तुम लोगों को इतना अधिक देता हूँ, परन्तु बदले में तुम लोग जो मुझे देते हो, वह है हृदयविदारक उदासी और दुष्चिंता और अदम्य रोष और असंतोष। तुम बहुत घृणास्पद हो—तथापि तुम दयनीय भी हो, इसलिए मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि मैं अपना सारा रोष निगल लूँ और तुम लोगों के सामने बार-बार अपनी आपत्तियों को ज़ाहिर करूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से रूपांतरित

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