530 परमेश्वर के लिए मनुष्य का हठ और बार-बार वही अपराध करना सबसे घृणित है

I

किस ताकत की वजह से लोग मुझे जान नहीं पाते हैं?

क्यों मुझे खुद से दूर रखते,

कभी मेरी इच्छा का पालन नहीं करते हैं?

क्यों पीठ पीछे मेरा विरोध वो करते हैं?

क्या यही है उनकी निष्ठा?

क्या यही है उनका प्यार?

क्या यही है उनकी निष्ठा?

क्या यही है उनका प्यार?

इंसानी फ़ितरत सदा एक सी रहती है।

उनके मन की बातें मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं।

मैं इंसानों से ये नहीं चाहता हूँ।

उनके हठ और बार-बार

एक ही पाप करने से नफ़रत करता हूँ।


II

क्यों कभी इन्सान पछताते नहीं,

पछतावा कर नया जन्म लेते नहीं?

क्यों कीचड़ पसंद है उन्हें,

साफ़ जगह पर रहना नहीं चाहते हैं?

क्या मेरा व्यवहार गलत है?

क्या मैंने उन्हें गलत राह दिखाई है?

क्या मैं उन्हें सीधे नर्क ले जा रहा हूँ?

इंसानी फ़ितरत सदा एक सी रहती है।

उनके मन की बातें मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं,

मैं इंसानों से ये नहीं चाहता हूँ।

उनके हठ और बार-बार

एक ही पाप करने से नफ़रत करता हूँ।


III

"नर्क" पसंद है लोगों को।

रोशनी आती है तो वे अंधे हो जाते हैं,

क्योंकि उनके पास है जो वो नर्क से आता है,

पर वे नहीं जानते हैं ये:

"नारकीय आशीषों" का आनंद लेते हैं,

उन्हें सीने से लगाते हैं।

मैं उनसे "जीने का स्त्रोत" ले लूँगा,

ये सोच के डरते हैं।

लोग मुझसे डरते हैं

इसलिए, जब मैं धरती पर आता हूँ,

वे मुझसे दूर रहते हैं।

वे खुद पर मुसीबत नहीं लाना चाहते,

सुखी पारिवारिक जीवन, सांसारिक "खुशियाँ",

यही उनकी पसंद है।

इंसानी फ़ितरत सदा एक सी रहती है।

उनके मन की बातें मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं,

मैं इंसानों से ये नहीं चाहता हूँ।

उनके हठ और बार-बार

एक ही पाप करने से नफ़रत करता हूँ।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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