530 परमेश्वर के लिए मनुष्य का हठ और बार-बार वही अपराध करना सबसे घृणित है

1 मानव प्रकृति अपरिवर्तित रहती है। जो कुछ उनके हृदय में है वह मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं है—यह वह नहीं है जिसकी मुझे आवश्यकता है। मैं जिससे सबसे ज़्यादा घृणा करता हूँ वह मनुष्य का ढीठपन और आदतन अपराधी होना है, किंतु वह कौन-सी शक्ति है जो मानवजाति को लगातार मुझे जानने में विफल होते रहने, हमेशा मुझसे दूरी बनाए रखने, और मेरे सामने कभी मेरी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करने और मेरी पीठ पीछे मेरा विरोध करने के लिए उकसाती है? क्या यही उनकी वफ़ादारी है? क्या यही मेरे प्रति उनका प्रेम है? वे पश्चाताप करके पुनः जन्म क्यों नहीं ले सकते हैं? लोग कीचड़ से मुक्त स्थान के बजाए सदैव दलदल में रहने के इच्छुक क्यों हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने उनके साथ बुरा व्यवहार किया हो? क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने उन्हें ग़लत दिशा दिखाई हो? क्या ऐसा हो सकता है कि मैं उन्हें नरक में ले जा रहा हूँ?

2 हर कोई "नरक" में रहने का इच्छुक है? जब प्रकाश आता है, तो उनकी आँखें तत्काल अंधी हो जाती हैं, क्योंकि उनमें सब कुछ नरक से आता है। फिर भी, लोग इससे अनजान हैं, और बस इन "नारकीय आशीषों" का आनंद लेते हैं। यहाँ तक कि वे उन्हें खज़ाने की तरह अपने सीने से जकड़कर रखते हैं, इस बात से आतंकित कि मैं इन खज़ानों को उनसे छीनकर अलग कर दूँगा, और उन्हें "उनके अस्तित्व की जड़" के बिना छोड़ दूँगा। लोग मुझसे डरते हैं, यही कारण है कि जब मैं पृथ्वी पर आता हूँ तब वे मुझसे बहुत दूर रहते हैं, मेरे करीब आने से नफ़रत करते हैं, क्योंकि वे "अपने ऊपर मुसीबत लाने" के अनिच्छुक होते हैं, बल्कि इसके बजाए परिवार के भीतर समरसता बनाए रखना चाहते हैं ताकि वे "पृथ्वी पर प्रसन्नता" का आनंद ले सकें।

3 मेरे आने के क्षण से ही, उनके घरों से शांति चली जाती है। मेरा इरादा है कि मैं सारे देशों को चकनाचूर कर दूँ, मनुष्य के परिवार की तो बात ही क्या है। मेरी पकड़ से कौन बच सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि जो आशीष प्राप्त करते हैं वे अपनी अनिच्छुकता के बल पर बच सकते हों? क्या कभी ऐसा हो सकता है कि जो ताड़ना झेलते हैं वे अपने भय के बल पर मेरी सहानुभूति प्राप्त कर सकते हों? मेरे समस्त वचनों में, लोगों ने मेरी इच्छा और मेरे कार्यकलाप देखे हैं, किंतु कौन कभी स्वयं अपने विचारों की जकड़न को तोड़कर स्वतंत्र हो सकता है? कौन कभी मेरे वचनों के भीतर से या बाहर से बच निकलने का मार्ग ढूँढ़ सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 27' से रूपांतरित

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