सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

`

प्रश्न 3: हम सोचते हैं परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। बाइबल से अलग परमेश्वर के कोई वचन और कार्य नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर पर हमारा विश्वास बाइबल पर आधारित होना चाहिए। क्या ये गलत है?

उत्तर: धार्मिक समूह में कई विश्वासियों का मानना है कि: "परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। बाइबल से अलग परमेश्वर के कोई वचन और कार्य नहीं हैं।" क्या ये कहना तथ्यों के अनुरूप है? क्या आपलोग यकीन से कहते हैं कि व्यवस्था के युग में यहोवा द्वारा किया गया हर एक कार्य सम्पूर्ण रूप से बाइबल में दर्ज है? क्या आपलोग वचन दे सकते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के सभी वचन और कार्य सम्पूर्ण रूप से बाइबल में दर्ज हैं? अगर ये नज़रिया तथ्यों के अनुसार न हो तो नतीजा क्या होगा? क्या यह परमेश्वर को लोगों की नज़र में नीचा नहीं दिखायेगा, उन्हें सीमित और उनकी निंदा नहीं करेगा? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित नहीं करता है? हमें पता होना चाहिये कि परमेश्वर ने जब अपने कार्य का हर चरण पूरा कर लिया, तो उसके सालों बाद बाइबल का संकलन उन लोगों ने किया जो परमेश्वर की सेवा करते थे। यकीनी तौर पर उसके कुछ अंश या तो गुम हो गये या हटा दिये गये। ये एक वास्तविकता है। पैगम्बरों के कुछ वचन हैं जो पुराने विधान में दर्ज नहीं हैं, लेकिन उन्हें प्राचीन बाइबल में शामिल किया गया है। नए विधान के, चार सुसमाचारों में प्रभु यीशु के बहुत से वचन दर्ज नहीं हैं। असल में, प्रभु यीशु ने कम से कम तीन साल तक प्रचार और कार्य किया। उन्होंने जो वचन बोले वे बाइबल में दर्ज वचनों से कई गुना अधिक हैं। ये एक तथ्य है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता। जैसे कि बाइबल में कहा गया है: "और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूँ कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे संसार में भी न समातीं" (यूहन्ना 21:25)। प्रेरितों के कुछ पत्र भी बाइबल में दर्ज नहीं हैं। जब प्रभु यीशु लौटेंगे तो उन्हें और अधिक वचन कहने होंगे, और अधिक कार्य करने होंगे। क्या ये सब चीज़ें बाइबल में दर्ज की जा सकती हैं? बाइबल में केवल प्रभु यीशु की वापसी की भविष्यवाणी दर्ज की गई है। उनकी वापसी के बाद के उनके वचन और कार्य नहीं। इसका मतलब यह है कि, बाइबल में दर्ज किये गए परमेश्वर के वचन सीमित हैं। दरअसल ये वचन परमेश्वर की ज़िन्दगी के समुद्र की एक बूंद मात्र हैं, परमेश्वर के जीवन के खरबों भागों में से, सिर्फ दस-हजारवां भाग। इन तथ्यों को देखते हुए, अभी भी लोग कैसे कह सकते हैं कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं? वे कैसे कह सकते हैं कि बाइबल से परे परमेश्वर का कोई वचन और कार्य नहीं है? ऐसे बयान भी मनमाने हैं! ये बिल्कुल भी तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं। कई लोग इस तरह के बयानों से नतीजे निकालते हैं कि परमेश्वर पर मानव की आस्था का आधार बाइबल है। ये निष्कर्ष सही नहीं है। बाइबल के आधार पर मानव का परमेश्वर पर विश्वास सही है, लेकिन एकमात्र बाइबल पर्याप्त नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ पवित्र आत्मा के काम के आधार पर परमेश्वर पर विश्वास के पथ पर चलना है। इस तरह से ही परमेश्वर का अनुमोदन पाया जा सकता है। यदि बाइबल ही एकमात्र आधार है और पवित्र आत्मा का कोई कार्य नहीं है, तो क्या मानव बाइबल की सच्चाई को समझ सकेगा? तो क्या इंसान परमेश्वर को समझ पाएगा? यदि लोगों को परमेश्वर के वचन को समझने में गलती हो जाए और पवित्र आत्मा का ज्ञान न हो, तो क्या यह आसानी से लोगों को गुमराह नहीं करेगा? ये सभी वास्तविक समस्याएं हैं। यदि परमेश्वर के विश्वासियों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, तो वे कभी भी सत्य को हासिल नहीं कर पाएंगे, और न ही वे परमेश्वर को समझ पाएंगे। यदि परमेश्वर के विश्वासियों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, यहां तक कि अगर वो अक्सर बाइबल पढते हैं और उपदेशों को सुनते हैं, तब भी वे सच्चाई को समझ नहीं पायेंगे और वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पायेंगे। इससे पता चलता है कि जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बिना परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं कर पायेंगे।

कई धार्मिक पादरी और आध्यात्मिक प्राध्यापक बाइबल समझाने के लिए मनुष्‍य के दिमाग का उपयोग करते हैं, और अंत में सब ऐसे बन जाते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। वे फरीसियों की तरह हैं, जो बाइबल से परिचित थे और उसके कुछ नियमों का पालन भी करते थे, लेकिन परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं था। वे बाहर से धर्मी दिखते थे लेकिन परमेश्वर के लिए ज़रा भी श्रद्धा नहीं थी। जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए अवतरित हुए, तो उन्होंने बाइबल का प्रयोग विरोध के लिए किया और यीशु की निंदा की, और परिणामस्वरूप परमेश्वर ने उन्हें श्राप दिया था। यह किस तरह की समस्या है? क्या परमेश्वर पर मानव का विश्वास केवल बाइबल पर आधारित हो सकता है या नहीं? फरीसियों का कड़वा सबक हमें बताता है कि परमेश्वर पर हमारा विश्वास एकमात्र बाइबल के आधार पर होना पर्याप्त नहीं है, और सबसे महत्वपूर्ण आधार पवित्र आत्मा का कार्य है। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, भले ही लोग कितने ही साल परमेश्वर पर विश्वास करें, कोई फायदा नहीं - उन्हें जीवन की प्राप्ति नहीं होगी। ये एक सत्य है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता। ये दर्शाता है कि ये कथन, परमेश्वर पर विश्वास बाइबल पर आधारित होना चाहिए, बाइबल से अलग होना परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं है, एक गलत और बेतुका दृष्टिकोण है। बाइबल में परमेश्वर के वचन साफ़ तौर पर कहते हैं: "न तो बल से, और न शक्‍ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा, मुझ सेनाओं के यहोवा का यही वचन है" (जकर्याह 4:6)। भजनों में भी वचन हैं: "यदि घर को यहोवा न बनाए, तो उसके बनानेवालों का परिश्रम व्यर्थ होगा: यदि नगर की रक्षा यहोवा न करे, तो रखवाले का जागना व्यर्थ ही होगा" (भजन संहिता 127:1)। ये दोनों ही अंश बाइबल की श्रेष्ठ पंक्तियाँ हैं। आप कह सकते हैं कि सभी विश्वासियों को धर्म-शास्त्र के इन दो अंशों के बारे में पता है। क्या परमेश्वर पर मानव का विश्वास केवल बाइबल पर आधारित हो सकता है या नहीं? उत्तर स्पष्ट होना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास का मुख्य आधार पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर के वास्तविक वचन हैं। यही सत्य और जीवन को पाने का तरीका है। बहुत से लोग बाइबल को समझ नहीं पाते, हमेशा सोचते हैं कि बाइबल में अनन्त जीवन है और बस बाइबल पर टिके रह कर सब कुछ हासिल कर लेंगे। यह एक बेहद बेतुका ख़्याल है। प्रभु यीशु ने पहले कहा है: "तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो; क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:39-40)। "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ: बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)। विश्वासियों को बहुत अच्छी तरह पता होना चाहिए कि परमेश्वर सृष्टि के स्वामी हैं। परमेश्वर सभी चीज़ों के मालिक हैं, हर चीज़ पर उनका प्रभुत्व है, और वो सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत हैं। परमेश्वर में अनन्त बुद्धि और आश्चर्य है। बाइबल केवल परमेश्वर के कार्य का एक ऐतिहासिक अभिलेख है, परमेश्वर के कार्य के प्रथम दो चरणों का साक्ष्य है। बाइबल बाइबल है, परमेश्वर परमेश्वर हैं। बाइबल और परमेश्वर दो अलग चीज़े हैं और इनकी तुलना नहीं की जा सकती। बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती, और इसके अलावा परमेश्वर की जगह मानव की रक्षा नहीं कर सकती। सिर्फ परमेश्वर ही लोगों को बचा सकते हैं! अगर बाइबल मानव को बचा सकती है, तो इस्राएलियों ने तो बाइबल को मज़बूती से थाम रखा है, हजारों सालों से आँखें मूंदकर बाइबल पर भरोसा रखा है और उसकी आराधना की है, तब भी उन्हें मसीहा के आने और उन्हें बचाने की जरूरत क्यों है? अगर बाइबल मानव को बचा सकती है, तो जो फरीसी बाइबल पर टिके हुए थे वे अभी भी प्रभु यीशु की निंदा और विरोध क्यों करते हैं, और परमेश्वर के प्रति दुश्मनी में ईसा-विरोधी बन जाते हैं? यह इस सच को दिखाने के लिए काफी है कि बाइबल इंसान की रक्षा नहीं कर सकती। बाइबल केवल परमेश्वर की एक गवाही है। अगर हम केवल बाइबल से चिपके रहते हैं लेकिन परमेश्वर के कार्यों का पालन नहीं करते, तो हम प्रभु के हाथों मुक्ति नहीं पा सकेंगे। चूंकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, हमें परमेश्वर के कार्यों का पालन करना चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अनुभव और अभ्यास करना चाहिए, ताकि हम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकें, और सत्य और जीवन को पा सकें। इसलिए बाइबल केवल परमेश्वर पर हमारे विश्वास के संदर्भ के रूप में ही काम कर सकती है और एकमात्र आधार नहीं हो सकती। परमेश्वर पर विश्वास परमेश्वर के वास्तविक वचनों और पवित्र आत्मा के कार्य पर आधारित होना चाहिए। यह परमेश्वर पर विश्वास का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। अगर हम इस व्यवहारिक ज्ञान को नहीं समझ पाते हैं तो हम वास्तव में मूर्ख और अज्ञानी हैं। बाइबल को एक प्रतीक के रूप में मानना या प्रभु की जगह बाइबल का प्रयोग करना साफ़ तौर पर परमेश्वर का विरोध और परमेश्वर की निंदा है। यदि हम आँख मूंदकर बाइबल पर विश्वास और उसकी आराधना करते हैं लेकिन प्रभु का गुणगान और आज्ञा-पालन नहीं कर सकते, तो हम सच्चे विश्वासी कैसे हो सकते हैं? हम कपटी फरीसियों से कैसे अलग हैं? ये दर्शाता है कि यदि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन बाइबल की आंतरिक सच्चाई, और बाइबल और परमेश्वर के संबंधों को नहीं समझते, तो हम बड़ी आसानी से सही रास्ते से भटक जायेंगे और गुमराह हो जायेंगे।

चलिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कुछ और अंश पढ़ते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख, और परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और तुम्हें परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों की कोई समझ नहीं देता है। जिस किसी ने भी बाइबल को पढ़ा है वह जानता है कि यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को प्रलेखित करता है। पुराना विधान इस्राएल के इतिहास और सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के अंत तक यहोवा के कार्य का कालक्रम से अभिलेखन करता है। नया विधान पृथ्वी पर यीशु के कार्य को, जो चार सुसमाचारों में है, और साथ की पौलुस के कार्य को भी अभिलिखित करता है; क्या वे ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (4)")।

"यदि तुम व्यवस्था के युग के कार्य को देखने की इच्छा करते हो, और यह देखना चाहते हो कि इज़राइली किस प्रकार यहोवा के मार्ग का अनुसरण करते थे, तो तुम्हें पुराना विधान अवश्य पढ़ना चाहिए; यदि तुम अनुग्रह के युग के कार्य को समझना चाहते हो, तो तुम्हें नया विधान अवश्य पढ़ना चाहिए। किन्तु तुम अंतिम दिनों के कार्य को किस प्रकार देखते हो? तुम्हें आज के परमेश्वर की अगुआई को स्वीकार अवश्य करनी चाहिए, और आज के कार्य में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि यह नया कार्य है, और किसी ने भी पूर्व में इसे बाइबल में दर्ज नहीं किया है। आज, परमेश्वर देहधारी हो चुका है और उसने चीन में अन्य चयनित लोगों को छाँट लिया है। परमेश्वर इन लोगों में कार्य ता है, वह पृथ्वी पर अपने काम को निरन्तर जारी रखता है, और अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखता है। आज का कार्य एक मार्ग है जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला, और एक तरीका है जिसे किसी ने कभी नहीं देखा है। यह वह कार्य है जिसे पहले कभी नहीं किया गया हैयह पृथ्वी पर परमेश्वर का नवीनतम कार्य है। इस प्रकार, ऐसा कार्य जो पहले कभी नहीं किया गया हो वह इतिहास नहीं है, क्योंकि अभी तो अभी है, और इसे अभी अतीत बनना है।" "उस समय से जब बाइबल थी, प्रभु के प्रति लोगों का विश्वास बाइबल के प्रति विश्वास रहा है। यह कहने के बजाए कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने की अपेक्षा की उन्होंने बाइबल पढ़नी आरम्भ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरम्भ कर दिया है; और यह कहने की अपेक्षा कि वे प्रभु के सामने वापस आ गए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने वापस आ गए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो कि यह ईश्वर है, मानो कि यह उनका जीवन रक्त है और इसे खोना अपने जीवन को खोने के समान होगा। लोग बाइबल को परमेश्वर के समान ही ऊँचा देखते हैं, और यहाँ तक कुछ ऐसे भी हैं जो इसे परमेश्वर से भी ऊँचा देखते हैं। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बिना हैं, यदि वे परमेश्वर का एहसास नहीं कर सकते हैं, तो वे जीवन जीते रह सकते हैं - परन्तु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों और कथनों को खो देते हैं, तो यह ऐसा है मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो।" "आख़िरकार, कौन बड़ा हैः परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुसार क्यों होना चहिए? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे बढ़ने का कोई अधिकार नहीं है? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता है और अन्य काम नहीं कर सकता है? यीशु और उनके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त का पालन करना होता और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना होता, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाए उसने पाँव धोए, सिर को ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पीया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं से अनुपस्थित नहीं हैं? यदि यीशु पुराने विधान का सम्मान करता, तो उसने इन सिद्धांतो का अनादर क्यों किया? तुम्हें जानना चाहिए कि पहले कौन आया था, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (1)")।

"बाइबल में हज़ारों वर्षों का मानव-इतिहास दर्ज है और लोग बाइबल को इस हद तक परमेश्वर जैसा मानते हैं कि अंतिम दिनों में उन्होंने बाइबल को परमेश्वर का दर्जा दे दिया है। इस तरह की चीज़ें परमेश्वर को सचमुच पसंद नहीं आतीं। इसलिए अपने फ़ुर्सत के समय में, उसे अंदर की कहानी और बाइबल का स्रोत स्पष्ट करना पड़ा। वरना, बाइबल फिर से लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान ले लेती और लोग बाइबल के वचनों के आधार पर ही परमेश्वर के कार्यों की निंदा करते और उन कार्यों का आकलन करते। परमेश्वर का बाइबल के सार-तत्व, उसकी संरचना और उसकी कमियों का स्पष्टीकरण उसके अस्तित्व को नकारना बिल्कुल नहीं है, न ही बाइबल की निंदा करना है। बल्कि, उसका उद्देश्य एक तर्कसंगत और उपयुक्त स्पष्टीकरण देना है, ताकि बाइबल की मौलिक छवि को पुन: स्थापित किया जा सके, और लोगों के मन में बाइबल को लेकर जो भ्रम हैं उन्हें दूर किया जा सके, ताकि उसके प्रति लोग अपना सही दृष्टिकोण बनाएं, उसकी आराधना न करें, और गुम न हो जाएं लोग गलती से बाइबल में अपने अंध-विश्वास को, परमेश्वर में विश्वास और उसकी आराधना मान बैठते हैं, और इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि और दुर्बल बिंदुओं का सामना करने तक का साहस नहीं जुटा पाते। ...यदि लोग बाइबल के जाल से नहीं निकल पाए तो वे कभी भी परमेश्वर के समक्ष नहीं आ पाएंगे। यदि वे परमेश्वर के समक्ष आना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी किसी भी चीज़ को मन से निकालना पड़ेगा जो परमेश्वर का स्थान ले सकती हो इस तरह परमेश्वर संतुष्ट हो जाएगा। हालांकि यहाँ परमेश्वर ने मात्र बाइबल को स्पष्ट किया है, लेकिन न भूलें कि बाइबल के अलावा भी ऐसी अनेक त्रुटिपूर्ण चीज़ें हैं, लोग वाकई जिनकी आराधना करते हैं, और जो चीज़ें वाकई परमेश्वर की ओर से आती हैं, उनकी आराधना नहीं करते। परमेश्वर बाइबल का उपयोग मात्र मिसाल के तौर पर करता है ताकि लोग फिर से गलत रास्ते पर बहुत दूर तक न चले जाएं और जब परमेश्वर में विश्वास और उसके वचनों को ग्रहण करने की बात आए तो वे दुविधा में पड़ जाएं" (वचन देह में प्रकट होता है के भाग दो के परिचय)।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से साफ़ तौर पर उजागर हो गया है कि बाइबल परमेश्वर का साक्ष्य मात्र है, परमेश्वर द्वारा प्रथम दो चरणों में किये गये कार्यों का अभिलेख है। बाइबल की कीमत और एहमियत परमेश्वर द्वारा किये गये प्रथम दो चरणों के कार्य उनके वचनों के रूप में अभिलिखित हैं। इसे पूरी मानवजाति बाइबल में परमेश्वर के वचनों के रूप में देख सकती है, कि परमेश्वर ने किस प्रकार सभी चीज़ों की रचना की, उसने कैसे मानवजाति को रचा, उसने कैसे मानवजाति का मार्गदर्शन किया, और कैसे मानवजाति का उद्धार किया, किस प्रकार वह परमेश्वर को समझने में लोगों की मदद कर रहा है। बाइबल में दिये गये अभिलेखों के कारण ही बहुत से लोग परमेश्वर से जुड़े हैं। उन्होंने सिर्फ यही स्वीकार नहीं किया कि परमेश्वर ने सभी चीजों की रचना की है, बल्कि उनमें परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के पदचिन्हों को खोजने की भूख भी है। ये सभी लाभ और उपदेश बाइबल ने मानवजाति को दिए हैं, और बाइबल की महत्ता भी बताई है। लेकिन परमेश्वर का कार्य हमेशा प्रगतिशील रहा है। केवल प्रथम दो चरणों के कार्य पूर्ण करने से मानवजाति को बचाने का उद्देश्य पूरा नहीं होता। परमेश्वर की प्रबंधन योजना तीन चरणों में कार्य करना है। अगर हम महज़ बाइबल से चिपके रहते हैं लेकिन अगर परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में किये गये कार्यों को नकार देते हैं जो कि बाइबल से परे हैं, तो यह एक बहुत बड़ी हानि होगी! परमेश्वर का मानवजाति की शुद्धि, रक्षा और परिपूर्णता का कार्य उसके द्वारा अंत के दिनों में किये गये न्याय के कार्य पर ही आधारित है। "इसीलिए अंत के दिनों में परमेश्वर ने जो सत्य कहा है" हमारे शुद्धिकरण, मुक्ति और स्वर्ग के साम्राज्य में प्रवेश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। प्रभु यीशु ने यह भविष्यवाणी क्यों की, कि जब वे वापिस आएंगे, तो वो सभी जो उन्हें स्वीकार करते हैं उनके साथ रात्रि-भोजन में शामिल होंगे? प्रभु ने कहा: "धन्य वे हैं, जो मेम्ने के विवाह के भोज में बुलाए गए हैं" (प्रकाशितवाक्य 19:9)। "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर, उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। हम सभी को ये बात साफ़ है कि इस विवाह-भोज का मतलब है कि परमेश्वर सच में इंसान को अपना लेंगे और उसे पूर्ण बना देंगे, उसे अपने साथ एक मन का बना लेंगे और फिर वो उनसे कभी जुदा नहीं होगा। इसीलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों में मानव की शुद्धि और बचाव के सत्य को दर्शाया। वो सभी जो परमेश्वर की आवाज़ को सुनकर उनको स्वीकार करते हैं और उनका अनुसरण करते हैं, वे सभी बुद्धिमान कुंवारियां हैं। मेमने की शादी की दावत में शामिल होने के लिए सिंहासन के सामने उन सभी का स्वर्गारोहण होता है, और वे परमेश्वर के सिंहासन से बहते जीवन के अमृत का आनन्द पाते हैं। परमेश्वर के द्वारा अंत के दिनों में किये गये न्याय और शुद्धिकरण को पाकर, वे परिवर्तन प्राप्त करने के लिए पापों से छुटकारा पायेंगे, और परमेश्वर द्वारा विजयी बनाए जाएंगे। ये बहुत ख़ुशकिस्मत लोग हैं, और ये ही लोग अनन्त जीवन को प्राप्त करेंगे और स्वर्ग के साम्राज्य में प्रवेश करेंगे। अगर लोग केवल बाइबल के आधार पर परमेश्वर में अपना विश्वास रखते हैं और बाइबल के पत्रों और धार्मिक नियमों में फंसे रहते हैं, परमेश्वर के पहले दो चरणों के कार्य से चिपके रहकर एक ही स्थान पर कदमताल करते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के कार्य के पहले कदम से ही त्याग दिया जाना और निकाल देना दिया जाना आसान हो जाएगा, और वे अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा शुद्ध किये जाने, बचाए जाने और पूर्ण किये जाने का मौका खो देंगे। यह उन्हें पूरी तरह परमेश्वर के उद्धार के कार्य से अलग करता है। उनके सभी प्रयास शून्य हो जायेंगे और वे परमेश्वर द्वारा हटा दिए जायेंगे। परमेश्वर की नज़रों में, ये सब वे लोग हैं जिन्होंने उन्हें धोखा दिया है। वे सभी अविश्वासी हैं जो दुष्टों के साथ जुड़े हैं। अंत में, वे सभी पुराने फरीसियों की तरह ही हैं, जो परमेश्वर द्वारा दण्डित और शापित हुए क्योंकि वे हठपूर्वक पुराने नियमों पर अड़े हुए थे, और प्रभु यीशु का विरोध और निंदा करते थे। जैसे कि प्रभु यीशु ने कहा: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की? और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला? और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए? तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना: हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:21-23)। जाहिर है, ये उन लोगों का परिणाम होगा जो बाइबल की बातों पर अड़े रहते हैं और परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने से मना करते हैं।

चलिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पर एक और नज़र डालें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आया, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान किया। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एकमात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी हो। जो लोग नियमों, संदेशों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन जाएंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो उसे उस परमेश्वर के रूप में जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता, कैसे उचित ठहरा सकते हो? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? और वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो संदेश हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करा सकें, ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हारे विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आपको परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूं, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")।

"बेड़ियों को तोड़ो और भागो" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला:प्रश्न 2: पौलुस ने तीमुथियुस 2 में साफ़तौर पर कहा था कि "पूरी बाइबल परमेश्वर से प्रेरित है" और बाइबल के सारे वचन परमेश्वर के वचन हैं। हम पौलुस के वचनों के अनुसार चल रहे हैं। यह गलत कैसे हो सकता है?

अगला:प्रश्न 4: मैंने सुना कि आप लोगों ने इस बात का प्रमाण दिया है कि देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने लाखों वचन कहे हैं और परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए अपना न्याय का कार्य पूरा किया है। लेकिन यह साफ़ तौर पर बाइबल से आगे निकल जाता है। इसका कारण यह है कि पादरी और नेतागण अक्सर हमसे कहा करते थे कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। परमेश्वर का कोई भी वचन और कार्य बाइबल से बाहर नहीं है। प्रभु यीशु का उद्धार कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। अंत में दिनों में प्रभु की वापसी विश्वासियों को सीधे स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए होगी। इस प्रकार, हमेशा से हमारा यह मानना रहा है प्रभु में विश्वास बाइबल के आधार पर होना चाहिए। जब तक हम बाइबल की बातों पर कायम रहते हैं, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और शाश्‍वत जीवन पाने में सफल होंगे। बाइबल से दूर जाना प्रभु के रास्ते को छोड़ देना है। यह उनका विरोध करना और उनको धोखा देना है। सभी धार्मिक पादरी और एल्डर्स ऐसा ही सोचते हैं। इसमें गलत क्या हो सकता है?

शायद आपको पसंद आये