प्रश्न 2: हालांकि प्रभु में विश्वास करने वाले यह जानते हैं कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर थे, लेकिन बहुत कम लोग ही देहधारण के सत्य को समझते हैं। जब प्रभु लौटकर आते हैं, तब अगर वे प्रभु यीशु की तरह ही प्रकट होते हैं और मनुष्य का पुत्र बनकर कार्य करते हैं, तो वास्तव में लोगों के पास प्रभु यीशु को पहचानने और उनकी वापसी का स्वागत करने का कोई रास्ता नहीं होगा। वास्तव में देहधारण क्या है? देहधारण का सार क्या है?

उत्तर:

देहधारी परमेश्वर क्या है और देहधारी परमेश्वर का सार क्या है, इसके संबंध में कहा जा सकता हैकि यह सत्य का एक ऐसा रहस्य है जिसे प्रभु के विश्वासी समझने में असफल रहते हैं। हज़ारों सालों से विश्वासियों के ये जानने के बावजूद कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर हैं, कोई भी न जान सका कि देहधारी परमेश्वर और उनका सार क्या है। सिर्फ़ अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के आगमन के बाद ही, सत्य के यह रहस्य मानवजाति के सामने प्रकट हुआ है।

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देहधारण, शरीर रूपी वस्त्र में परमेश्वर का आत्मा है, यानी, पवित्रात्मा सामान्य मानवता और सामान्य मानवीय सोच के साथ शरीर रूप में साकार हुआ है, और इस तरह वो लोगों के बीच काम करने और बोलने वाले एक साधारण और सामान्य आदमी बन गया है। इस शरीर में सामान्य मानवता है, लेकिन इसमें पूर्ण दिव्यता भी है। हालांकि बाहरी स्वरूप में उनका शरीर साधारण और सामान्य प्रतीत होता है, फिर भी वे परमेश्वर का कार्य करने में सक्षम है, परमेश्वर की वाणी को व्यक्त कर सकते हैं, और मानवता का मार्गदर्शन और बचाव कर सकते हैं। यह इस कारण है क्‍योंकि उनमें पूर्ण दिव्यता है। पूर्ण दिव्यता का मतलब है कि परमेश्वर की आत्मा में ये सारे गुण समाहित हैं—परमेश्वर का निहित स्वभाव, परमेश्वर का पवित्र और धार्मिक सार, वह सब जो परमेश्वर में है और वे जो हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धिमत्‍ता, और परमेश्वर का अधिकार एवं सामर्थ्य—ये सारे गुण शरीर में प्रकट हुए हैं। यह शरीर मसीह है, ये व्यावहारिक परमेश्वर हैं जो यहाँ अपना कार्य करने और मनुष्य को बचाने आए हैं। अपने बाहरी स्वरूप में, मसीह एक साधारण और सामान्य मनुष्य के पुत्र हैं, मगर वे हम सृजित मनुष्यों से काफ़ी अलग हैं। मनुष्य की रचना में केवल मानवता होती है, उसमें दिव्य सार का लेशमात्र भी अंश नहीं होता है। हालांकि, मसीह में न केवल सामान्य मानवता है; बल्कि इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें पूर्ण दिव्यता है। इस प्रकार, उनमें परमेश्वर का सार है, वे पूरी तरह से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, स्वयं परमेश्वर के रूप में सारे सत्‍य व्यक्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के स्वभाव को और वह सब व्यक्त कर सकते हैं जो परमेश्वर का स्वरूप है, और हमें सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान कर सकते हैं। कोई भी सृजित मनुष्य ऐसी विशेषताओं से समर्थ नहीं है। मसीह काम करते और बोलते हैं, परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त करते हैं, और वह सब स्पष्ट करते हैं जो परमेश्वर में और उनके शरीर में है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे कैसे परमेश्वर के वचन को व्यक्त करते हैं और कैसे परमेश्वर का कार्य करते हैं, वे हमेशा सामान्य मानवता के दायरे में ऐसा करते हैं। उनके पास एक सामान्य शरीर है, उनके बारे में कुछ भी अलौकिक नहीं है। इससे साबित होता है कि परमेश्वर शरीर धारण कर आए हैं, वे पहले ही एक साधारण मनुष्य बन चुके हैं। इस साधारण और सामान्य शरीर ने "वचन देह में प्रकट होता है" के तथ्य को पूर्ण किया है। वे परमेश्वर का व्यावहारिक देहधारण हैं। क्योंकि मसीह में पूर्ण दिव्यता है, वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, सत्य को व्यक्त कर सकते हैं, और मनुष्य जाति को बचा सकते हैं। क्योंकि मसीह के पास पूर्ण दिव्यता है, वे न केवल परमेश्वर के वचनों को प्रसारित या प्रेषित कर सकता है, बल्कि परमेश्वर के वचनों को सीधे-सीधे व्यक्त भी कर सकता है। वे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर, मनुष्य को आपूर्ति करते हुए, सींचते हुए, और चरवाहा बनकर, पूरी मानव जाति का मार्गदर्शन करते हुए, सत्‍य व्यक्त कर सकते हैं। सिर्फ इसलिए कि मसीह के पास पूर्ण दिव्यता है, यह साबित करने के लिए काफी है कि उनमें परमेश्वर की पहचान एवं सार है। इसीलिए हम ये कह सकते हैं कि वे परमेश्वर का देहधारण, स्‍वयं व्यावहारिक परमेश्वर हैं।

देहधारण के सबसे बड़े रहस्य का इस बात से कोई संबंध नहीं है कि परमेश्वर उत्कृष्ट है या सामान्य मनुष्यों की तरह है। इसके बजाय इसका संबंध इस तथ्य से है कि संपूर्ण दिव्यता इसी सामान्य शरीर में छिपी है। हममें से कोई भी इस छिपी हुई दिव्यता को ढूँढने और देखने में सक्षम नहीं है। ठीक वैसे ही जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आए थे, अगर किसी ने भी उनकी आवाज़ नहीं सुनी होती और उनके वचनों और कार्यों को अनुभव न किया होता, तो कोई भी यह पहचान नहीं पाता कि प्रभु यीशु ही मसीह हैं, परमेश्वर के पुत्र हैं। इसलिए परमेश्वर का देहधारण हम मनुष्यों के बीच गुप्त रूप से देहधारी होने का उनका सबसे अच्‍छा तरीका है। जब प्रभु यीशु आए थे, उनके बाहरी स्वरूप से हममें से कोई भी यह नहीं बता सकता था कि वे ही मसीह, देहधारी परमेश्वर हैं, और हममें से कोई भी उनकी मानवता में छिपी दिव्यता को नहीं देख सकता था। केवल तभी जब प्रभु यीशु ने सत्‍य को व्यक्त किया और मानव जाति के छुटकारे का कार्य किया, कुछ लोगों को यह पता चला कि उनके वचनों में अधिकार और सामर्थ्य था, और केवल तभी उन्होंने उनका अनुसरण करना शुरू किया। केवल तभी जब प्रभु यीशु पुनर्जीवित होने के बाद लोगों के बीच प्रकट हुए, मानवजाति ने विश्वास किया कि वे ही देहधारी मसीहा, परमेश्वर का प्रकटन हैं। अगर उन्होंने सत्‍य व्यक्त ना किया होता और अपना कार्य ना किया होता, तो किसी ने भी उनका अनुसरण नहीं किया होता। अगर उन्होंने इस तथ्य के गवाह बनकर जन्म नहीं लिया होता कि वे ही मसीह, परमेश्वर का प्रकटन हैं, तो कोई भी उन्हें पहचान नहीं पाता। क्योंकि मनुष्य अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में ये मानता है कि अगर वे वाकई देहधारी परमेश्वर हैं, तो उनके शरीर में अलौकिक गुण होने चाहिए, उन्हें एक व्यापक, उत्कृष्ट डीलडौल वाला महामानव होना चाहिए उन्हें न केवल अधिकार और सामर्थ्य के साथ बोलना चाहिए, बल्कि वे जहाँ भी जाते हैं वहाँ संकेत और चमत्कार भी दिखाना चाहिए—देहधारी परमेश्वर कुछ इसी तरह के होने चाहिए। वे सोचते हैं कि किसी अन्य साधारण मनुष्य की तरह, अगर उनका बाहरी स्वरूप साधारण है, और उनमें सामान्य मानवता है, तो वे निश्चित रूप से परमेश्वर का देहधारण नहीं हैं। एक बार फिर से याद करते हैं। जब प्रभु यीशु ने बोलने और कार्य करने के लिए देहधारण किया था, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उन्होंने सत्‍य और परमेश्‍वर की आवाज को कैसे व्यक्त किया, मगर यहूदी मुख्य याजक, शास्त्री और फरीसी उन्हें पहचान नहीं पाये। जब शिष्यों ने प्रभु यीशु के लिए गवाही दी तो उसने यह भी कहा: क्या यह यूसुफ का बेटा नहीं है? क्या यह एक नासरी नहीं है? यहूदी मुख्य याजक, शास्त्री और फरीसी इस तरह से उनके बारे में क्यों बोलते हैं? क्योंकि प्रभु यीशु के बाहरी स्वरूप में सामान्य मानवता थी। वे एक साधारण, औसत इंसान थे, उनका स्वरूप उत्कृष्ट और विशालकाय नहीं था, इसलिए उन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया। असल में, जहाँ तक वे एक देहधारी हैं, उनके पास परिभाषा के अनुसार सामान्य मानवता होनी चाहिए, उन्हें लोगों को यह दिखाना चाहिए कि जिस शरीर रूपी वस्त्र में परमेश्वर ने स्वयं को लपेटा है, वह एक साधारण और सामान्य शरीर है, वह एक सामान्य मनुष्य की तरह लगते हैं। अगर परमेश्वर ने स्वयं को सामान्य मानवता वाले व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक महामानव के शरीर रूपी वस्त्र में लपेटा होता, तो देहधारण का पूरा मतलब ही व्यर्थ हो जाता। इसलिए, मसीह में सामान्य मानवता होनी चाहिए। सिर्फ इसी तरह से यह साबित किया जा सकता है कि वे "वचन देह बन गया" हैं।

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हम यह साफ तौर पर देखते हैं कि देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता होनी चाहिए, अन्यथा, वे परमेश्वर का अवतार नहीं होंगे। बाहरी स्वरूप में, देहधारी परमेश्वर एक साधारण और सामान्य व्यक्ति की तरह दिखाई देते हैं, और उनकी मानवता के बारे में कुछ भी अलौकिक नहीं है। इसलिए, अगर हम हमारी अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके मसीह को मापें, तो हम कभी भी मसीह को समझ या स्वीकार नहीं कर पाएंगे। अधिक से अधिक हम सिर्फ यही समझ पाएंगे कि वे परमेश्वर द्वारा भेजे गए एक पैगंबर हैं, या ऐसा कोई जिसे परमेश्वर इस्तेमाल करते हैं। अगर हम सही मायनों में मसीह को जानना चाहते हैं, तो हमें उनके वचनों और कार्यों का अध्ययन करना चाहिए ताकि हम यह जान सकें कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं वह परमेश्वर की अपनी आवाज है, अगर उनके कहे वचन परमेश्वर के स्वभाव का स्वरूप हैं और वह सब कुछ है जो परमेश्वर में है और वे जो हैं, और हम यह जान सकें कि क्या उनके कार्य और उनके द्वारा व्यक्त किए गए सत्‍य मानव जाति की रक्षा कर सकते हैं। केवल तभी हम मसीह को जान सकेंगे, उन्‍हें स्वीकार और उनकी आज्ञा का पालन करेंगे। अगर हम सत्‍य की खोज नहीं करेंगे, परमेश्वर के कार्य की जांच-पड़ताल नहीं करेंगे, तो मसीह के वचन सुनने और मसीह के कार्य के तथ्यों को जानने के बाद भी, हम मसीह को जान नहीं पाएंगे। भले ही हम सुबह से लेकर रात तक मसीह के साथ रहें, फिर भी हम उनके साथ एक साधारण मनुष्य की तरह व्यवहार करेंगे और इस तरह मसीह का विरोध और निंदा करेंगे। वास्तव में, मसीह को समझने और स्वीकार करने के लिए, हमें बस परमेश्वर की आवाज को समझना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि वे परमेश्वर का कार्य करते हैं। मगर मसीह के दिव्य सार को जानने के लिए, और इस प्रकार मसीह का सच्चा आज्ञाकारी बनने और व्यावहारिक परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, हमें मसीह के वचनों और कार्य में सत्‍य की खोज करनी होगी, परमेश्वर के स्वभाव को जानना होगा और वह सब जो परमेश्वर में है और वे जो है, परमेश्वर के पवित्र सार, सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धिमत्‍ता को जानना होगा, यह समझना होगा कि परमेश्वर प्रिय हैं और उनके सच्चे इरादों की सराहना करनी होगी। केवल इसी तरीके से हम सही मायनों में मसीह की आज्ञा का पालन कर सकते हैं और अपने ह्रदय के व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना कर सकते हैं।

हम सभी समर्थक यह जानते हैं कि प्रभु यीशु ने जिस तरह से उपदेश दिया, जिन शब्दों को उन्होंने व्यक्त किया, स्वर्ग के राज्‍य के जिन रहस्यों को उन्होंने प्रकट किया, और जो मांगें उन्होंने मनुष्यों से की, वे सभी सत्‍य थीं, वे सभी परमेश्वर की अपनी वाणी थी, और वे सभी परमेश्वर के जीवन स्वभाव के स्वरूप और वे सब चीजें थीं जो उनमें हैं और जो उनका अस्तित्‍व हैं। उन्होंने जो चमत्कार किए, जैसे कि बीमार को चंगा करना, दुष्‍ट आत्‍माओं को दूर भगाना, हवा और समुद्र को शांत करना, रोटी के पाँच टुकड़ों और दो मछली से पाँच हजार लोगों को खाना खिलाना, और मरे हुए को ज़िंदा करना, इत्यादि ये सभी परमेश्वर के अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का स्वरूप थे, जिन्हें कोई सृजित प्राणी न तो धारण करता है, न धारण करने के काबिल है। जिन लोगों ने उस समय सत्‍य की खोज की, जैसे पतरस, यूहन्ना, मत्ती और नतनएल, प्रभु यीशु के वचन और कार्य से उनको पहचाना कि वे ही मसीहा हैं जिनके बारे में वादा किया गया था, और इसलिए उन्होंने उनका अनुसरण किया और उनका उद्धार प्राप्त किया। जबकि यहूदी फरीसियों ने, प्रभु यीशु की आवाज सुनने और उन्हें चमत्कार करते हुए देखने के बावजूद, उन्हें सिर्फ एक साधारण व्यक्ति की तरह देखा, जिसके पास कोई सामर्थ्य और महिमा नहीं थी, और इसलिए उन्होंने किसी भी भय के बिना सीधे उनका विरोध करने और उनकी निंदा करने का साहस किया। अंत में उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर टांग कर सबसे बड़ा पाप कर दिया। फरीसियों का सबक गहन चिंतन की मांग करता है! यह साफ तौर पर उनके सत्‍य से घृणा करने और परमेश्वर से नफ़रत करने वाले मसीह-विरोधी स्वभाव को दर्शाता है, और भ्रष्ट मनुष्य की मूर्खता और बेपरवाही का खुलासा करता है। वर्तमान में, देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ठीक प्रभु यीशु की तरह, सामान्य मानवता के भीतर स्वयं परमेश्वर का कार्य करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर वे सारे सत्‍य व्यक्त करते हैं जो भ्रष्ट मनुष्य को बचाए जाने के लिए आवश्यक हैं, और अंत के दिनों में परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए न्याय का कार्य करते हैं। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्य के शैतानी स्वभाव और उनके भ्रष्टाचार के सत्‍य का न्‍याय और उजागर करते हैं, उन्होंने मनुष्य की रक्षा करने की परमेश्वर की छः हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के सभी रहस्यों का भी खुलासा किया है, उन्होंने वह मार्ग बताया है जिसके द्वारा मनुष्य को पापों से मुक्त किया जा सकता है, वह शुद्धकिया जा सकता है और परमेश्वर के द्वारा बचाया जा सकता है। उन्होंने परमेश्वर के अंतर्निहित धार्मिक स्वभाव को, वह सब जो परमेश्वर में है और वे जो हैं, और परमेश्वर का अद्वितीय सामर्थ्य एवं अधिकार को प्रकट किया है...। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार का एक संपूर्ण स्वरूप हैं। इन दिनों, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों ने, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य में परमेश्वर की आवाज को सुना है, परमेश्वर के वचन के स्वरूप को शरीर में देखा है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आकर, परमेश्वर की शुद्धि और पूर्णता प्राप्त की है। धार्मिक जगत के ऐसे लोग जो अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर का इनकार, उनका विरोध और निंदा करते हैं, उन्होंने वही गलती की है जो यहूदी फरीसियों ने की थी, अंत के दिनों के मसीहा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ किसी साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार करना, उन सारी सच्चाइयों की खोज और अध्ययन करने का ज़रा सा भी प्रयास करने की परवाह किए बिना, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने व्यक्त किए हैं, इस तरह उन्होंने एक बार फिर से परमेश्वर को सूली पर टांग दिया और परमेश्वर के स्वभाव को क्रुद्ध किया। जैसा कि देखा जा सकता है, अगर हं अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं पर अड़े रहते हैं, और उन सत्‍यों की खोज और अध्ययन नहीं करते हैं जो मसीह ने व्यक्त किए हैं, तो हम मसीह द्वारा व्यक्त की गयी परमेश्वर की आवाज को पहचान पाने में असमर्थ होंगे, हम मसीह के कार्य को स्वीकार करने और उसका अनुसरण करने में अक्षम होंगे, और अंत के दिनों में कभी भी परमेश्वर का उद्धार प्राप्त नहीं करेंगे। अगर हम देहधारण के सत्‍य को नहीं समझते हैं, तो हम परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने और उसका अनुसरण करने में सक्षम नहीं होंगे, मसीह की निंदा और परमेश्वर का विरोध करेंगे, और हमें परमेश्वर का दंड और अभिशाप भी मिल सकता है। इसलिए, हमारे विश्वास में, परमेश्वर के द्वारा बचाए जाने के लिए, यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है कि हम सत्‍य की खोज करें और देहधारण के रहस्य को समझें!

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 1: तुम यह प्रमाणित करते हो कि परमेश्वर ने देहधारण किया है और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का पुत्र बन चुका है, और फिर भी अधिकांश धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर बादलों के साथ लौटेगा, और वे इसका आधार मुख्यतः बाइबल की इन पंक्तियों पर रखते हैं: "यही यीशु ... जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। और इसके अलावा, धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों ने हमें यह भी निर्देश दिया है कि कोई भी प्रभु यीशु जो बादलों के साथ नहीं आता है, वह झूठा है और उसे छोड़ दिया जाना चाहिए। इसलिए हम निश्चित नहीं हो पा रहे हैं कि यह नज़रिया बाइबल के अनुरूप है या नहीं; इसे सच मान लेना उचित है या नहीं?

अगला: प्रश्न 3: परमेश्वर ने अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का पुत्र बनकर देहधारण क्यों किया है? पुनर्जीवित हुए प्रभु यीशु के आध्यात्मिक शरीर और देहधारी "मनुष्य के पुत्र" के बीच असली अंतर क्या है? यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे हम नहीं समझ पाते हैं—कृपया इसके बारे में सहभागिता करें।

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