सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (6)

क्या तुम लोगों को याद है कि हमने अपनी पिछली सभा में किस विषय पर संगति की थी? (परमेश्वर ने पहले अपनी अपेक्षा के अनुसार सामान्य मानवता को जीने की तुलना में लोग जिन्हें अच्छे व्यवहार समझते हैं, उनके बीच के अंतरों पर संगति की, और फिर परंपरागत संस्कृति में मनुष्य के नैतिक आचरण पर संगति की और मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में इक्कीस दावों का सारांश दिया।) अपनी पिछली सभा में मैंने दो विषयों पर संगति की थी। पहले, मैंने अच्छे व्यवहार के विषय पर कुछ अतिरिक्त संगति प्रदान की, और फिर मैंने बिना अधिक विस्तार में गए मनुष्य के चरित्र, आचरण और सद्गुण पर थोड़ी सरल, परिचयात्मक संगति की। सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है, इस विषय पर हम पहले ही कई बार संगति कर चुके हैं, और मैंने सत्य के अनुसरण से संबंधित उन सभी अच्छे व्यवहारों पर संगति पूरी कर ली है, जिन्हें उजागर और विश्लेषित करने की आवश्यकता थी। पिछली बार मैंने मनुष्य के नैतिक आचरण से संबंधित कुछ बुनियादी विषयों पर भी थोड़ी संगति की थी। नैतिक आचरण संबंधी इन कथनों का विस्तार से खुलासा या विश्लेषण न करने के बावजूद, हमने मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में विभिन्न दावों के कुछ उदाहरण सूचीबद्ध किए थे—सटीक रूप से कहें तो इक्कीस। ये इक्कीस उदाहरण दरअसल वे विभिन्न कथन हैं, जिन्हें परंपरागत चीनी संस्कृति लोगों के मन में बैठाती है, जिनमें परोपकार, धार्मिकता, औचित्य, बुद्धि और विश्वसनीयता के विचार प्रबल होते हैं। उदाहरण के लिए, हमने मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में उन विभिन्न कहावतों का उल्लेख किया, जो निष्ठा, धार्मिकता, औचित्य और भरोसे के साथ-साथ पुरुषों, महिलाओं, अधिकारियों और बच्चों को कैसे कार्य करना चाहिए, वगैरह से संबंधित हैं। चाहे ये इक्कीस कहावतें व्यापक या सर्वव्यापी हों या नहीं, हर हाल में, वे मूल रूप से उन विभिन्न अपेक्षाओं का सार दर्शाने में सक्षम हैं, जिन्हें परंपरागत चीनी संस्कृति मनुष्य के नैतिक आचरण के संबंध में वैचारिक और वास्तविक दोनों परिप्रेक्ष्यों से सामने रखती है। हमारे द्वारा इन उदाहरणों को सूचीबद्ध किए जाने के बाद, क्या तुम लोगों ने उन पर विचार और संगति की? (हमने अपनी सभाओं के दौरान उन पर थोड़ी संगति की और पाया कि उनमें से कुछ कथनों से सत्य का भ्रम होना आसान है। उदाहरण के लिए, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें,” “मैं अपने दोस्त के लिए गोली खा लूँगा,” और साथ ही, अन्य कहावतों के अलावा, “अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है, उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो।”) अन्य कहावतों में शामिल हैं : “एक बूँद पानी की दया का बदला झरने से चुकाना चाहिए,” “सज्जन का वचन उसका अनुबंध होता है,” “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो, तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो, तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो,” “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो,” “कुएँ का पानी पीते हुए यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि इसे किसने खोदा था,” वगैरह। बारीकी से निरीक्षण करने पर तुम देखोगे कि ज्यादातर लोग अपने आचरण और अपने और दूसरों के नैतिक आचरण के बारे में अपने आकलन का आधार अनिवार्य रूप से नैतिक आचरण के इन कथनों को बनाते हैं। ये चीजें हर व्यक्ति के दिल में कुछ हद तक मौजूद रहती हैं। इसका एक प्राथमिक कारण वह सामाजिक माहौल है जिसमें लोग रहते हैं, और वह शिक्षा है जो वे अपनी सरकारों से प्राप्त करते हैं; दूसरा कारण उन्हें अपने परिवारों से मिली परवरिश और वे परंपराएँ हैं, जो उनके पूर्वजों से चली आ रही हैं। कुछ परिवार अपने बच्चों को सिखाते हैं कि उठाए गए धन को जेब में मत रखो, दूसरे परिवार अपने बच्चों को सिखाते हैं कि उन्हें देशभक्त होना चाहिए और “प्रत्येक व्यक्ति अपने देश के भाग्य के लिए उत्तरदायित्व साझा करता है,” क्योंकि प्रत्येक परिवार अपने देश पर निर्भर है। कुछ परिवार अपने बच्चों को सिखाते हैं, “धन से कभी भ्रष्ट नहीं होना चाहिए, गरीबी से कभी बदल नहीं जाना चाहिए, बल से कभी झुकना नहीं चाहिए,” और उन्हें अपनी जड़ें कभी नहीं भूलनी चाहिए। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को नैतिक आचरण के बारे में सिखाने के लिए स्पष्ट कथनों का उपयोग करते हैं, जबकि अन्य माता-पिता नैतिक आचरण के बारे में अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन अपने बच्चों के लिए एक आदर्श के रूप में काम करते हैं और अगली पीढ़ी को अपने शब्दों और क्रियाकलापों के माध्यम से प्रभावित और शिक्षित करते हुए मिसाल देकर सिखाते हैं। इन शब्दों और क्रियाकलापों में “एक बूँद पानी की दया का बदला झरने से चुकाना चाहिए,” “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ,” “दयालुता का बदला कृतज्ञतापूर्वक लौटाना चाहिए,” और साथ ही “कीचड़ से बेदाग निकला निकलना, साफ लहरों में स्नान करके भी भड़कीला न दिखना” आदि जैसे जोरदार कथन शामिल हो सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को जो सिखाते हैं, उसके तमाम विषय और सार आम तौर पर परंपरागत चीनी संस्कृति द्वारा अपेक्षित नैतिक आचरण के दायरे में आते हैं। पहली बात जो शिक्षक छात्रों को उनके स्कूल पहुँचने पर बताते हैं, यह है कि उन्हें दूसरों के प्रति दयालु होना चाहिए और दूसरों की मदद करने में खुशी पानी चाहिए, उन्हें उठाए गए धन को जेब में नहीं रखना चाहिए, और उन्हें अपने शिक्षकों का सम्मान और उनकी शिक्षाओं का आदर करना चाहिए। जब छात्र प्राचीन चीनी गद्य या प्राचीन काल के नायकों की जीवनियाँ पढ़ते हैं, तो उन्हें सिखाया जाता है कि, “मैं अपने दोस्त के लिए गोली खा लूँगा,” “वफादार प्रजा दो राजाओं की सेवा नहीं कर सकती, अच्छी महिला दो पतियों से शादी नहीं कर सकती,” “कोई कार्य स्वीकार करो और मरते दम तक सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयास करो,” “प्रत्येक व्यक्ति अपने देश के भाग्य के लिए उत्तरदायित्व साझा करता है,” “रास्ते में मिलने वाली खोई हुई वस्तुएँ नहीं लेनी चाहिए,” वगैरह। ये सभी चीजें परंपरागत संस्कृति से आती हैं। राष्ट्र भी इन विचारों की वकालत और प्रचार करते हैं। वास्तव में, राष्ट्रीय शिक्षा कमोबेश उन्हीं चीजों को बढ़ावा देती है, जिन्हें पारिवारिक शिक्षा बढ़ावा देती है—वे सभी परंपरागत संस्कृति के इन्हीं विचारों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। परंपरागत संस्कृति से प्राप्त विचार मूल रूप से मानव-चरित्र, सद्गुण, आचरण आदि से संबंधित सभी अपेक्षाओं में व्याप्त हैं। एक संदर्भ में, वे अपेक्षा करते हैं कि लोग बाहरी तौर पर तहजीब और शिष्टाचार प्रदर्शित करें, वे इस तरह से कार्य और व्यवहार करें जो दूसरों को स्वीकार्य हो, और वे दूसरों को दिखाने के लिए अच्छे व्यवहार और क्रियाकलापों का प्रदर्शन करें जबकि अपने दिल की गहराइयों के अँधेरे पहलुओं को छिपाएँ। दूसरे संदर्भ में, वे उन रवैयों, व्यवहारों और क्रियाकलापों को उन्नत करते हैं, जो इस बात से संबंधित होते हैं कि व्यक्ति कैसे आचरण करता, लोगों से मिलता और मामले सँभालता है; वह अपने दोस्तों और परिवार के साथ कैसे व्यवहार करता है; और विभिन्न प्रकार के लोगों और चीजों को नैतिक आचरण के स्तर पर कैसे लेता है और इस तरह दूसरों से प्रशंसा और सम्मान प्राप्त करता है। परंपरागत संस्कृति लोगों से जो अपेक्षाएँ करती है, वे मूलतः इन्हीं चीजों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। चाहे वे ऐसे विचार हों जिनकी लोग बड़े सामाजिक स्तर पर वकालत करते हैं, या छोटे पैमाने पर, नैतिक आचरण के बारे में वे विचार जिन्हें लोग परिवारों के भीतर बढ़ावा देते और बनाए रखते हैं, और वे अपेक्षाएँ जो लोगों के समक्ष उनके आचरण के संबंध में प्रस्तुत की जाती हैं—ये सभी अनिवार्य रूप से इसी दायरे में आती हैं। इसलिए, लोगों के बीच, चाहे परंपरागत चीनी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृतियों सहित अन्य देशों की परंपरागत संस्कृतियाँ, नैतिक आचरण के बारे में इन तमाम विचारों में ऐसी चीजें शामिल हैं जिन्हें लोग हासिल कर सकते हैं और जिनके बारे में सोच सकते हैं; ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग अपने जमीर और विवेक के आधार पर कार्यान्वित कर सकते हैं। कम से कम, कुछ लोग ऐसे हैं जो खुद से अपेक्षित कुछ नैतिक आचरण को पूरा कर सकते हैं। ये अपेक्षाएँ केवल लोगों के नैतिक चरित्र, मिजाज और प्राथमिकताओं के दायरे तक ही सीमित हैं। अगर तुम्हें मुझ पर यकीन न आए, तो मैं तुम्हें बारीकी से यह देखने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ कि लोगों के नैतिक आचरण से संबंधित इनमें से कौन-सी अपेक्षाएँ उनके भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करती है। इनमें से कौन-सी अपेक्षा इस तथ्य पर ध्यान देती है कि लोग सत्य से विमुख हैं, सत्य को नापसंद करते हैं और अपने सार में ही परमेश्वर का विरोध करते हैं? इनमें से किन अपेक्षाओं का सत्य से कोई लेना-देना है? इनमें से कौन-सी अपेक्षाएँ सत्य के स्तर तक पहुँच सकती हैं? (इनमें से कोई नहीं।) चाहे व्यक्ति इन अपेक्षाओं को कैसे भी देखे, इनमें से कोई भी सत्य के स्तर तक नहीं पहुँच सकती। इनमें से किसी का भी सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, इनमें से किसी का भी उससे रत्ती भर भी संबंध नहीं है। अब तक, जो लोग लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास करते आ रहे हैं, जिनके पास कुछ अनुभव है और जो थोड़ा-बहुत सत्य समझते हैं, उनके पास इस मामले की बस थोड़ी-सी सच्ची समझ होगी; लेकिन अधिकांश लोग अभी भी केवल धर्म-सिद्धांत ही समझते हैं और सिद्धांत के रूप में ही इस विचार से सहमत होते हैं, जबकि सत्य को सही मायने में समझने के स्तर तक पहुँचने में विफल रहते हैं। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि अधिकांश लोग परंपरागत संस्कृति के इन नियमों की तुलना परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं से करने पर केवल यह समझ पाते हैं कि परंपरागत संस्कृति के ये पहलू सत्य के अनुरूप और सत्य से संबंधित नहीं हैं। वे मौखिक रूप से पूरी तरह स्वीकार सकते हैं कि इन चीजों का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अपने दिल की गहराइयों में वे जिनकी अभिलाषा करते हैं, जिनका अनुमोदन करते हैं, जिन्हें प्राथमिकता देते हैं और जिन्हें आसानी से स्वीकारते हैं, वे अनिवार्य रूप से ये विचार ही हैं जो मानवजाति की परंपरागत संस्कृति से निकले हैं, जिनमें से कुछ ऐसी चीजें हैं जिनकी उनका देश वकालत करता और जिन्हें बढ़ावा देता है। लोग उन्हें सकारात्मक चीजें मानते हैं या उनसे सत्य की तरह पेश आते हैं। क्या यही मामला नहीं है? (हाँ, है।) जैसा कि तुम देख सकते हो, परंपरागत संस्कृति के इन पहलुओं ने मनुष्य के दिल में गहरी जड़ें जमा ली हैं, और इन्हें थोड़े समय के भीतर मिटाया और उखाड़ा नहीं जा सकता।

हालाँकि मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में हमारे द्वारा सूचीबद्ध इक्कीस अपेक्षाएँ परंपरागत चीनी संस्कृति का सिर्फ एक हिस्सा हैं, फिर भी कुछ हद तक वे उन सभी अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं, जो परंपरागत चीनी संस्कृति ने मनुष्य के नैतिक आचरण के संबंध में सामने रखी हैं। इन इक्कीस दावों में से प्रत्येक को मनुष्य एक सकारात्मक चीज, उत्कृष्ट और सही चीज मानता है, और लोगों का विश्वास है कि ये दावे उन्हें गरिमा के साथ जीने में सक्षम बनाते हैं, और यह एक प्रकार का नैतिक आचरण है जो प्रशंसा और सम्मान के योग्य है। फिलहाल हम उठाए गए धन को जेब में न रखने या दूसरों की मदद करने में खुशी पाने जैसी अपेक्षाकृत सतही कहावतों को किनारे रख देंगे और इनके बजाय उस नैतिक आचरण के बारे में बात करेंगे जिसका मनुष्य विशेष रूप से अत्यधिक सम्मान करता है और जिसे उत्कृष्ट मानता है। उदाहरण के लिए, यह कहावत लो : “धन से कभी भ्रष्ट नहीं होना चाहिए, गरीबी से कभी बदल नहीं जाना चाहिए, बल से कभी झुकना नहीं चाहिए,”—इस कथन का सार प्रस्तुत करने का सबसे सरल तरीका यह है कि व्यक्ति को अपनी जड़ें नहीं भूलनी चाहिए। अगर व्यक्ति में यह नैतिक आचरण है, तो सभी सोचेंगे कि उसका व्यक्तित्व कितना महान है, और वह सचमुच “कीचड़ से बेदाग निकला है, साफ लहरों में स्नान करके भी भड़कीला नहीं दिखा है।” लोग इसे बहुत सम्मान देते हैं। इस तथ्य का कि लोग इसे बहुत सम्मान देते हैं, मतलब यह है कि वे वास्तव में इस तरह के कथन को स्वीकारते हैं और इससे सहमत हैं। और निस्संदेह, वे उन लोगों की भी बहुत प्रशंसा करते हैं, जो इस नैतिक आचरण को अमल में ला सकते हैं। ऐसे बहुत-से लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन फिर भी परंपरागत संस्कृति द्वारा प्रचारित इन चीजों को वास्तव में स्वीकारते हैं और उन अच्छे व्यवहारों को अभ्यास में लाने के इच्छुक रहते हैं। ये लोग सत्य नहीं समझते : वे सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है एक अच्छा इंसान बनना, दूसरे लोगों की मदद करना, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना, दूसरे लोगों को कभी धोखा न देना या नुकसान न पहुँचाना, सांसारिक चीजों के पीछे न भागना और धन या सुख का लालची न होना। अपने दिलों में वे सभी सहमत हैं कि “धन से कभी भ्रष्ट नहीं होना चाहिए, गरीबी से कभी बदल नहीं जाना चाहिए, बल से कभी झुकना नहीं चाहिए” कथन सही है। कुछ लोग कहेंगे : “अगर परमेश्वर में विश्वास करने से पहले व्यक्ति ‘धन से कभी भ्रष्ट नहीं होना चाहिए, गरीबी से कभी बदल नहीं जाना चाहिए, बल से कभी झुकना नहीं चाहिए’ जैसे नैतिक आचरण का पहले से ही पालन करता है, अगर वह एक महान, दयालु व्यक्ति है जो अपनी जड़ें नहीं भूलता, तो आस्था में शामिल होने के बाद वह जल्दी से परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में सक्षम होगा। ऐसे लोगों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना आसान है—वे उसके आशीष प्राप्त कर सकते हैं।” कई लोग जब दूसरों का मूल्यांकन करते और उन्हें देखते हैं, तो वे उनके सार को परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर नहीं देखते; इसके बजाय वे लोगों के नैतिक आचरण के बारे में परंपरागत संस्कृति की अपेक्षाओं के अनुसार उनका मूल्यांकन करते और उन्हें देखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य से, क्या इस बात की संभावना नहीं है कि जो लोग सत्य नहीं समझते, वे उन चीजों को सत्य समझने की भूल करेंगे, जिन्हें मनुष्य अच्छी और सही मानता है? क्या उनके द्वारा उन लोगों को, जिन्हें मनुष्य अच्छा मानता है, वैसा ही मानने की संभावना नहीं है, जिन्हें परमेश्वर अच्छा मानता है? लोग हमेशा अपने विचार परमेश्वर पर थोपना चाहते हैं—ऐसा करके, क्या वे सैद्धांतिक त्रुटि नहीं करते? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव को नाराज नहीं करता? (करता है।) यह एक बहुत गंभीर समस्या है। अगर लोगों में वास्तव में विवेक हो, तो उन्हें उन मामलों में, जिन्हें वे समझ नहीं सकते, सत्य खोजना चाहिए, उन्हें परमेश्वर की इच्छा समझनी शुरू करनी चाहिए और लापरवाही से ढेर सारी बकवास नहीं झाड़नी चाहिए। मनुष्य के मूल्यांकन के लिए परमेश्वर के मानकों और सिद्धांतों में क्या इस आशय की कोई पंक्ति है : “जो अपनी जड़ें नहीं भूलते, वे अच्छे लोग होते हैं और उनमें अच्छे व्यक्ति के लक्षण होते हैं”? क्या परमेश्वर ने कभी ऐसा कुछ कहा है? (नहीं।) परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो विशिष्ट अपेक्षाएँ रखी हैं, उनमें क्या उसने कभी कहा है, “अगर तुम गरीब हो, तो तुम्हें चोरी नहीं करनी चाहिए। अगर तुम अमीर हो, तो तुम्हें कामुक नहीं होना चाहिए। जब तुम्हें दादागिरी या धमकियों का सामना करना पड़े, तो तुम्हें कभी भी झुकना नहीं चाहिए”? क्या परमेश्वर के वचनों में ऐसी अपेक्षाएँ हैं? (नहीं।) वास्तव में, उनमें ऐसी अपेक्षाएँ नहीं हैं। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि “धन से कभी भ्रष्ट नहीं होना चाहिए, गरीबी से कभी बदल नहीं जाना चाहिए, बल से कभी झुकना नहीं चाहिए” कथन मनुष्य द्वारा बोला गया है—यह मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है, यह सत्य के साथ असंगत है, और यह मूलभूत रूप से सत्य के समान नहीं है। परमेश्वर ने कभी यह अपेक्षा नहीं की है कि सृजित प्राणी अपनी जड़ें न भूलें। अपनी जड़ें न भूलने का क्या मतलब है? मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ : अगर तुम्हारे पूर्वज किसान थे, तो तुम्हें हमेशा उनकी यादें सँजोकर रखनी चाहिए। अगर तुम्हारे पूर्वज किसी शिल्प-कार्य में संलग्न थे, तो तुम्हें उस शिल्प का अभ्यास बनाए रखना होगा और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना होगा। यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर में विश्वास करना शुरू कर देते हो, तब भी तुम इन चीजों को नहीं भूल सकते—तुम उन पूर्वजों से प्राप्त शिक्षाएँ या शिल्प या कोई भी चीज नहीं भूल सकते। अगर तुम्हारे पूर्वज भिखारी थे, तो तुम्हें वे लाठियाँ सँभालकर रखनी चाहिए, जिनका इस्तेमाल वे कुत्तों को भगाने के लिए करते थे। अगर पूर्वजों को कभी भूसी और जंगली पौधों के सहारे जीवित रहना पड़ा हो, तो उनके वंशजों को भी भूसी और जंगली पौधे खाने की कोशिश करनी चाहिए—यह वर्तमान की खुशियों का आनंद लेने के लिए अतीत के दुख को याद करना है, यह अपनी जड़ें न भूलना है। तुम्हारे पूर्वजों ने जो कुछ किया, तुम्हें उसे कायम रखना चाहिए। तुम अपने पूर्वजों को सिर्फ इसलिए नहीं भूल सकते कि तुम पढ़े-लिखे हो और तुम्हारे पास रुतबा है। चीनी लोग इन चीजों को लेकर सबसे ज्यादा सतर्क होते हैं। अपने दिल में उन्हें ऐसा लगता है कि केवल उन लोगों में ही जमीर और विवेक होता है, जो अपनी जड़ें नहीं भूलते, और केवल ऐसे लोग ही ईमानदारी से व्यवहार कर सकते और गरिमा के साथ जी सकते हैं। क्या यह दृष्टिकोण सही है? क्या परमेश्वर के वचनों में ऐसा कुछ है? (नहीं।) परमेश्वर ने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा है। इस उदाहरण से हम देख सकते हैं कि भले ही किसी सद्गुण के क्षेत्र को अत्यधिक आदर दिया जा सकता है और मनुष्य उसकी आकांक्षा कर सकता है, और भले ही यह एक सकारात्मक चीज जैसा लग सकता है, कुछ ऐसा जो मनुष्य के नैतिक आचरण को नियंत्रित कर सकता है और लोगों को बुराई और भ्रष्टता के मार्ग पर चलने से रोक सकता है, और भले ही इसे लोगों के बीच प्रसारित किया जाता है और उन सभी के द्वारा इसे एक सकारात्मक चीज के रूप में स्वीकारा जाता है, लेकिन अगर तुम इसकी तुलना परमेश्वर के वचनों और सत्य से करो, तो तुम देखोगे कि परंपरागत संस्कृति के ये दावे और विचार पूरी तरह से बेतुके हैं। तुम देखोगे कि वे उल्लेख करने लायक भी नहीं हैं, कि उनका सत्य से थोड़ा-सा भी संबंध नहीं है, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसकी इच्छा से भी दूर हैं। इन विचारों और दृष्टिकोणों की वकालत करके और मनुष्य के नैतिक आचरण के संबंध में विभिन्न कथनों को आगे बढ़ाकर लोग मौलिक और अनूठा होने का दिखावा करने, अपनी महानता और सत्यता पर इतराने और लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए मनुष्य की सोच के दायरे का अतिक्रमण करने वाली कुछ चीजों का उपयोग करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे। पूरब हो या पश्चिम, सभी लोग मूलतः एक-जैसा ही सोचते हैं। मनुष्य के नैतिक आचरण के संबंध में लोग जिन अपेक्षाओं की वकालत कर उन्हें सामने रखते हैं, उनके विचार और शुरुआती बिंदु, और उन अपेक्षाओं के जरिये वे जो लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, वे सभी अनिवार्यत: एक जैसे ही हैं। भले ही पश्चिम के लोगों में “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ,” और “एक बूँद पानी की दया का बदला झरने से चुकाना चाहिए,” जैसे विशिष्ट विचार और दृष्टिकोण नहीं होते, जिन पर पूरब के लोग जोर देते हैं, और भले ही उनके पास परंपरागत चीनी संस्कृति जैसी स्पष्ट कहावतें भी नहीं होतीं, फिर भी उनकी अपनी परंपरागत संस्कृति इन्हीं विचारों से भरी हुई है। हालाँकि जिन चीजों पर हम संगति कर रहे हैं और जिनके बारे में बोल रहे हैं, वे कुछ हद तक परंपरागत चीनी संस्कृति से संबंधित हैं, और सार में, नैतिक आचरण के बारे में ये दावे और अपेक्षाएँ समस्त भ्रष्ट मानवजाति के प्रमुख विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

आज हमने मुख्य रूप से इस बात पर संगति की है कि परंपरागत संस्कृति मनुष्य के नैतिक आचरण से संबंधित अपने दावों और अपेक्षाओं के माध्यम से लोगों पर किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव डालती है। इसे समझने के बाद, लोगों के लिए समझने वाली अगली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सृष्टि के प्रभु, परमेश्वर की मानवजाति के नैतिक व्यवहार के प्रति वास्तव में क्या अपेक्षाएँ हैं, उसने विशेष रूप से क्या कहा है और क्या अपेक्षाएँ सामने रखी हैं। यह बात मनुष्य को अवश्य समझनी चाहिए। हमने अब स्पष्ट रूप से देख लिया है कि परंपरागत संस्कृति परमेश्वर की मनुष्य से की गई अपेक्षाओं या उसके द्वारा बोले गए वचनों की थोड़ी-सी भी गवाही नहीं देती, और लोगों ने इस विषय के संबंध में सत्य नहीं खोजा है। और इसलिए, परंपरागत संस्कृति वह चीज थी जो लोगों ने पहले सीखी और यह उन पर हावी हो गई, यह लोगों के दिलों में प्रवेश कर गई, और इसने हजारों वर्षों से मानवजाति के जीने के तरीके का मार्गदर्शन किया है। यही वह मुख्य तरीका है, जिससे शैतान ने मानवजाति को भ्रष्ट किया है। इस तथ्य को स्पष्ट रूप से पहचानने के बाद, लोगों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण चीज यह समझना है कि सृष्टि के प्रभु ने सृजित मनुष्यों से उनकी मानवता और नैतिकता के संबंध में क्या अपेक्षाएँ की हैं—या, दूसरे शब्दों में, सत्य के इस पहलू के संबंध में क्या मानक हैं। साथ ही, लोगों को यह समझना चाहिए कि इनमें से कौन-से चीज सत्य है : परंपरागत संस्कृति द्वारा की गई अपेक्षाएँ या वह जिसकी परमेश्वर मानवजाति से अपेक्षा करता है। उन्हें समझना चाहिए कि इनमें से कौन-सी चीज लोगों को शुद्ध कर सकती और बचा सकती है, और जीवन में सही मार्ग पर उनका मार्गदर्शन कर सकती है; और इनमें से कौन-सी चीज भ्रांति है, जो लोगों को गुमराह कर नुकसान पहुँचा सकती है और उन्हें गलत रास्ते पर, पाप के जीवन में धकेल सकती है। जब लोगों को यह बात समझ आ जाती है, तो वे पहचान सकते हैं कि मानवजाति से सृष्टि के प्रभु की अपेक्षाएँ बिल्कुल स्वाभाविक और न्यायसंगत हैं, और वे ऐसे सत्य सिद्धांत हैं जिनका लोगों को अभ्यास करना चाहिए। जहाँ तक परंपरागत संस्कृति के नैतिक आचरण और माप के मानकों के बारे में दावों का सवाल है, जो लोगों के सत्य के अनुसरण, और लोगों और चीजों के बारे में उनके विचारों, उनके आचरण और क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं—अगर लोग उन दावों को थोड़ा समझ सकें, और उनकी असलियत जान सकें और यह पहचान सकें कि वे सार में बेतुके हैं, और उन्हें अपने दिल से त्याग दें, तो नैतिक आचरण के संबंध में लोगों की कुछ उलझनें या मुद्दे हल हो सकते हैं। क्या इन चीजों को हल करने से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग में लोगों के सामने आने जाने वाली बाधाओं और कठिनाइयों में काफी हद तक कमी नहीं आएगी? (बिल्कुल आएगी।) जब लोग सत्य नहीं समझते, तो उनके द्वारा नैतिक आचरण के बारे में आम तौर पर स्वीकृत विचारों को सत्य समझने और उनका इस तरह अनुसरण और पालन करने की गलती किए जाने की संभावना होती है, मानो वे सत्य हों। यह लोगों की सत्य को समझने और उसका अभ्यास करने की क्षमता पर, और साथ ही उनके द्वारा स्वभावगत बदलाव हासिल करने के लिए सत्य का अनुसरण करते समय प्राप्त होने वाले परिणामों पर बहुत प्रभाव डालता है। यह ऐसी चीज है, जिसे तुम लोगों में से कोई भी देखना नहीं चाहेगा; बेशक, यह ऐसी चीज है जिसे परमेश्वर भी नहीं देखना चाहता। इसलिए, मनुष्य द्वारा समर्थित नैतिक आचरण के बारे में इन तथाकथित सकारात्मक कथनों, विचारों और दृष्टिकोणों के संबंध में, लोगों को पहले इन्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर स्पष्ट रूप से जानना और समझना चाहिए, और इनके सार की असलियत जाननी चाहिए, और इस प्रकार अपने दिल की गहराइयों में इन चीजों का एक सटीक मूल्यांकन करके स्थान बनाना चाहिए, जिसके बाद वे उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके खोदकर बाहर निकाल सकते हैं और झाड़कर पूरी तरह त्याग सकते हैं। भविष्य में, हर बार जब लोग सत्य के विरोधी उन तथाकथित सकारात्मक कथनों को देखें, तो उन्हें पहले सत्य को चुनना चाहिए, न कि उन कथनों को जिन्हें मनुष्य की धारणाओं के भीतर सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि ये तथाकथित सकारात्मक कथन सिर्फ मनुष्य के विचार हैं, ये वास्तव में सत्य से मेल नहीं खाते। चाहे हम किसी भी कोण से बोल रहे हों, आज इन विषयों पर संगति करने का हमारा मुख्य लक्ष्य सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में लोगों के सामने आने वाली विभिन्न बाधाएँ दूर करना है, खास तौर पर परमेश्वर के वचनों और सत्य की कसौटी के संबंध में लोगों के मन में आने वाली अनिश्चितताएँ दूर करना है। इन अनिश्चितताओं का मतलब यह है कि जब तुम सत्य स्वीकार कर उसका अभ्यास करते हो, तो तुम यह नहीं बता सकते कि कौन-सी चीजें नैतिक आचरण के बारे में कहावतें हैं जिनकी मानवजाति वकालत करती है, और कौन-सी चीजें परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाएँ हैं, और उनमें से कौन सच्चे सिद्धांत और कसौटी हैं। लोगों को इन चीजों के बारे में स्पष्ट नहीं है। ऐसा क्यों है? (क्योंकि वे सत्य नहीं समझते।) एक तरह से, ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्य नहीं समझते। दूसरी तरह से, ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनमें मानवजाति की परंपरागत संस्कृति द्वारा किए गए नैतिक आचरण के दावों की समझ नहीं है और वे अभी भी इन दावों का सार समझ नहीं पाते। अंत में, मन की उलझन भरी स्थिति में, तुम यह निर्धारित कर लोगे कि जो चीजें तुमने पहले सीखीं और जो तुम्हारे दिमाग में जमी हुई हैं, वे सही हैं; तुम यह निर्धारित कर लोगे कि वे चीजें, जिन्हें आम तौर पर सभी सही मानते हैं, सही हैं। और फिर तुम उन चीजों को चुन लोगे, जो तुम्हें पसंद हैं, जिन्हें तुम हासिल कर सकते हो, और जो तुम्हारी रुचि और धारणाओं के अनुरूप हैं; और तुम उन चीजों को इस तरह लोगे, उनसे इस तरह चिपके रहोगे और उनका इस तरह पालन करोगे, मानो वे सत्य हों। और इसके परिणामस्वरूप, लोगों का व्यवहार और आचरण, और साथ ही जिसका वे अनुसरण करते हैं, जिसे चुनते हैं और जिससे चिपके रहते हैं, वे सभी सत्य से पूरी तरह असंबद्ध होंगे—वे सभी मनुष्य के व्यवहारों और उसके द्वारा नैतिकता के प्रदर्शन से संबंधित होंगे जो सत्य के दायरे से बाहर हैं। लोग परंपरागत संस्कृति के इन पहलुओं को ऐसे लेते हैं और उनसे ऐसे चिपके रहते हैं, मानो वे सत्य हों, जबकि मनुष्य के व्यवहार से संबंधित परमेश्वर की अपेक्षाओं से जुड़े सत्यों को किनारे कर अनदेखा कर देते हैं। चाहे व्यक्ति मनुष्य द्वारा अच्छे समझे जाने वाले व्यवहारों में से कितने भी व्यवहार अपनाए, वह कभी परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं करेगा। यह लोगों द्वारा सत्य के दायरे से बाहर की चीजों पर बहुत ज्यादा प्रयास बरबाद करने का मामला है। इसके अलावा, इन चीजों को, जो मनुष्य से उत्पन्न होती हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं, सत्य मानकर लोग पहले ही भटक चुके हैं। लोगों ने परंपरागत संस्कृति के इन पहलुओं को पहले सीखा, और इस प्रकार वे उन पर हावी हो गए; ये चीजें उनके भीतर तमाम तरह के भ्रामक विचारों को जन्म देती हैं, और जब लोग सत्य समझकर उसका अभ्यास करने का प्रयास करते हैं, तो ये उनके लिए बड़ी कठिनाइयाँ और गड़बड़ियाँ पैदा कर देती हैं। सभी लोग मानते हैं कि अगर उनके पास अच्छे व्यवहार हैं, तो परमेश्वर उन्हें स्वीकारेगा, और वे उसके आशीष और वादे प्राप्त करने के योग्य होंगे, लेकिन क्या वे यह दृष्टिकोण और मानसिकता रखने पर परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार सकते हैं? ऐसी मानसिकता लोगों के शुद्धिकरण और उद्धार में कितनी बड़ी बाधा उत्पन्न करती है? क्या ये कल्पनाएँ और धारणाएँ लोगों को परमेश्वर को गलत समझने, उसके प्रति विद्रोह और उसका विरोध करने के लिए प्रेरित नहीं करेंगी? क्या उसके ये परिणाम नहीं होंगे? (बिल्कुल होंगे।) मैंने कमोबेश इस विषय पर संगति का महत्व स्पष्ट कर दिया है, यह सामान्य विचार है।

इसके बाद, हम नैतिक आचरण के बारे में परंपरागत चीनी संस्कृति की विभिन्न कहावतों का एक-एक करके विश्लेषण करेंगे और फिर उनके बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे। इस तरह, सबके पास उनके संबंध में एक बुनियादी पुष्टि और उत्तर होगा, और सभी के पास, कम से कम, इन कहावतों के बारे में अपेक्षाकृत सटीक समझ और दृष्टिकोण होगा। आओ पहली कहावत से शुरू करते हैं : “उठाए गए धन को जेब में मत रखो।” इस कहावत की सटीक व्याख्या क्या होगी? (अगर तुम कोई वस्तु उठाते हो, तो तुम्हें उसे लेकर अपनी होने का दावा नहीं करना चाहिए। यह एक प्रकार की अच्छी नैतिकता और सामाजिक रिवाज को दर्शाता है।) क्या इसे हासिल करना आसान है? (यह अपेक्षाकृत आसान है।) ज्यादातर लोगों के लिए इसे हासिल करना आसान है—अगर तुम कोई चीज उठाते हो, तो चाहे वह कुछ भी हो, तुम्हें उसे अपने पास नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वह किसी और की है। तुम उसे रखने के हकदार नहीं हो और तुम्हें उसे उसके असली मालिक को लौटा देना चाहिए। अगर तुम्हें उसका असली मालिक न मिल पाए, तो तुम्हें उसे अधिकारियों को सौंप देना चाहिए—किसी भी स्थिति में तुम्हें उसे नहीं लेना चाहिए। यह सब दूसरे लोगों की संपत्ति के लिए न ललचाने और दूसरों का फायदा न उठाने की भावना के अनुरूप है। यह मनुष्य के नैतिक व्यवहार के बारे में की गई अपेक्षा है। लोगों के नैतिक व्यवहार के बारे में इस प्रकार की अपेक्षा रखने का क्या उद्देश्य है? जब लोग इस तरह का नैतिक आचरण करते हैं, तो इसका सामाजिक माहौल पर अच्छा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लोगों में ऐसे विचार भरने का उद्देश्य उन्हें दूसरों का फायदा उठाने से रोकना है, जिससे उनका अपना अच्छा नैतिक आचरण बना रहे। अगर प्रत्येक व्यक्ति में इस प्रकार का अच्छा नैतिक आचरण हो, तो सामाजिक माहौल में सुधार होगा, और वह उस स्तर तक पहुँच जाएगा जहाँ “रास्ते में मिलने वाली खोई हुई वस्तुएँ कोई नहीं लेता,” और किसी को रात में अपने दरवाजे बंद करने की जरूरत नहीं होती। इस तरह के सामाजिक माहौल से सार्वजनिक व्यवस्था में सुधार होगा और लोग अधिक शांति से रह सकेंगे। चोरी और डकैतियाँ कम होंगी, लड़ाई-झगड़े और प्रतिशोध में की जाने वाली हत्याएँ कम होंगी; इस तरह के समाज में रहने वाले लोगों में सुरक्षा की भावना होगी और समग्र कल्याण बेहतर होगा। “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” सामाजिक और जीवन संबंधी परिवेश में लोगों के नैतिक आचरण के संबंध में की गई अपेक्षा है। इस अपेक्षा का लक्ष्य सामाजिक माहौल और लोगों के जीवन-परिवेश की रक्षा करना है। क्या इसे हासिल करना आसान है? चाहे लोग इसे हासिल कर सकें या नहीं, मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में यह विचार और अपेक्षा रखने वाले लोगों का लक्ष्य उस आदर्श सामाजिक और जीवन संबंधी परिवेश को साकार करना था, जिसके लिए लोग लालायित रहते हैं। “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का मनुष्य के आचरण की कसौटी से कोई लेना-देना नहीं है—यह महज लोगों के कोई चीज उठाने पर उनके नैतिक आचरण के बारे में की गई अपेक्षा है। इसका मनुष्य के सार से बहुत कम संबंध है। मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में मानवजाति हजारों वर्षों से यह अपेक्षा करती आ रही है। बेशक, जब लोग इस अपेक्षा का पालन करते हैं, तो देश या समाज एक ऐसे दौर का अनुभव कर सकता है, जब अपराध कम होते हैं, और यह उस बिंदु तक भी पहुँच सकता है, जहाँ लोगों को रात में अपने दरवाजे बंद करने की जरूरत नहीं होती, जहाँ रास्ते में मिलने वाली खोई हुई वस्तुएँ कोई नहीं लेता, और जहाँ अधिकांश लोग उठाए गए धन को जेब में नहीं रखते। उस दौर में सामाजिक माहौल, सार्वजनिक व्यवस्था और जीवन-परिवेश सभी अपेक्षाकृत स्थिर और सामंजस्यपूर्ण होंगे, लेकिन यह माहौल और सामाजिक परिवेश केवल अस्थायी रूप से, या एक अवधि के लिए, या एक निश्चित समय के लिए ही बनाए रखा जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग इस प्रकार का नैतिक आचरण केवल कुछ सामाजिक परिवेशों में ही प्राप्त कर सकते या बनाए रख सकते हैं। जैसे ही उनका जीवन-परिवेश बदलता है और पुराना सामाजिक माहौल काम नहीं करता, तो सामाजिक परिवेश, सामाजिक माहौल और सामाजिक रुझानों में बदलावों के साथ-साथ “उठाए गए धन को जेब में न रखने” जैसी नैतिकताओं के भी बदल जाने की संभावना रहती है। देखो कि कैसे सत्ता में आने के बाद बड़े लाल अजगर ने सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए तमाम तरह की कहावतों को बढ़ावा देकर लोगों को गुमराह किया। 80 के दशक में इन बोलों वाला एक लोकप्रिय गीत भी था : “सड़क के किनारे, मैंने जमीन से एक सेंट उठाया, और पुलिस अधिकारी को सौंप दिया। अधिकारी ने सेंट लिया, और स्वीकृति में सिर हिलाया। मैंने खुशी से कहा, ‘बाद में मिलते हैं, सर!’” एक सेंट सौंपने का छोटा-सा मामला भी जाहिर तौर पर उल्लेख करने और गाने लायक था—यह इतना “उत्कृष्ट” सामाजिक सदाचार और व्यवहार था! लेकिन क्या यह सचमुच इतना उत्कृष्ट था? लोग खुद को मिला एक सेंट तो पुलिस अधिकारी को सौंप सकते हैं, लेकिन क्या वे सौ या हजार युआन सौंपेंगे? यह कहना कठिन है। अगर किसी व्यक्ति को कुछ सोना, चाँदी या कीमती चीजें या कोई इससे भी मूल्यवान चीज मिलती है, तो वह अपने लालच को नियंत्रित नहीं कर पाएगा, उसके अंदर का राक्षस बाहर आ जाएगा और वह लोगों को चोट और नुकसान पहुँचाने, दूसरों को आरोपित करके फँसाने में सक्षम हो जाएगा—वह सक्रिय रूप से किसी व्यक्ति से उसका पैसा लूटने, यहाँ तक कि उसकी हत्या करने में भी सक्षम होगा। उस समय, मनुष्य की उत्कृष्ट परंपरागत संस्कृति और परंपरागत नैतिकता में से क्या बचेगा? तब “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” की नैतिक कसौटी कहाँ रहेगी? यह हमें क्या दिखाता है? चाहे लोगों में यह भावना और नैतिक आचरण हो या नहीं, यह अपेक्षा और कहावत ऐसी चीज है, जिसकी लोग कल्पना करते हैं, इच्छा करते हैं और चाहते हैं कि वे इसे साकार और हासिल कर सकें। विशिष्ट सामाजिक संदर्भों में और उपयुक्त परिवेशों के भीतर, जिन लोगों में एक निश्चित मात्रा में जमीर और विवेक होता है, वे स्वयं द्वारा उठाए गए धन को अपनी जेब में न रखने का अभ्यास कर सकते हैं, लेकिन यह केवल एक क्षणिक अच्छा व्यवहार है, यह उनके आचरण या जिंदगी की कसौटी नहीं बन सकता। जैसे ही वह सामाजिक परिवेश और संदर्भ, जिसमें वे लोग रहते हैं, बदलेगा, यह सिद्धांत और मनुष्य की धारणाओं के अनुसार आदर्श नैतिक आचरण लोगों से बहुत दूर हो जाएगा। यह उनकी इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने में सक्षम नहीं होगा, और निस्संदेह, यह उनके बुरे कर्मों को सीमित करने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं होगा। यह महज एक अस्थायी अच्छा व्यवहार और मनुष्य के आदर्शों के अनुसार एक अपेक्षाकृत उत्कृष्ट नैतिक गुण है। जब यह वास्तविकता और स्वार्थ से टकराता है, जब यह लोगों के आदर्शों से टकराता है, तो इस प्रकार की नैतिकता लोगों के व्यवहार को संयमित नहीं कर सकती, या उनके व्यवहार और विचारों का मार्गदर्शन नहीं कर सकती। अंततः, लोग इसके विरुद्ध जाने का निर्णय लेंगे, वे नैतिकता की इस परंपरागत धारणा का उल्लंघन करेंगे और अपने हितों का चयन करेंगे। इसलिए, जब “उठाए गए धन को जेब में न रखने” की नैतिकता की बात आती है, तो लोग स्वयं द्वारा उठाया गया एक सेंट पुलिस को सौंप सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें एक हजार युआन, दस हजार युआन या सोने का सिक्का पड़ा मिल जाए, तो क्या वे फिर भी उसे पुलिस अधिकारी को दे देंगे? वे नहीं दे पाएँगे। जब उस धन को लेने का लाभ उससे अधिक हो जाता है जिसे मनुष्य की नैतिकता हासिल कर सकती है, तो वे उसे पुलिस को नहीं सौंप पाएँगे। वे “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” की नैतिकता को साकार नहीं कर पाएँगे। तो, क्या “उठाए गए धन को जेब में न रखना” व्यक्ति के मानवता-सार को दर्शाता है? वह उसके मानवता-सार को बिल्कुल भी नहीं दर्शा सकता। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मनुष्य के नैतिक आचरण से संबंधित इस अपेक्षा का उपयोग यह आकलन करने के आधार के रूप में नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति में मानवता है या नहीं, और यह मनुष्य के आचरण के लिए कसौटी नहीं बन सकती।

क्या पहले यह देखना कि व्यक्ति उठाए गए धन को जेब में रखता है या नहीं, उसकी नैतिकता और चरित्र का मूल्यांकन करने का सटीक तरीका होगा? (नहीं।) क्यों नहीं? (लोग वास्तव में उस अपेक्षा का पालन करने में असमर्थ हैं। अगर उन्हें थोड़ी-सी धनराशि या कम मूल्य की कोई चीज मिलती है, तो वे उसे सौंपने में सक्षम होंगे, लेकिन अगर वह कोई मूल्यवान चीज हो, तो उनके ऐसा करने की संभावना कम होगी। अगर वह कोई बहुत ही कीमती वस्तु हो, तो उनके उसे सौंपने की संभावना और भी कम होगी—वे उसे किसी भी कीमत पर अपने पास रख सकते हैं।) तुम्हारा मतलब है कि “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” लोगों की मानवता का मूल्यांकन करने की कसौटी नहीं बन सकती, क्योंकि लोग उसे हासिल करने में असमर्थ हैं। ऐसे में, अगर लोग इस अपेक्षा का पालन कर सकें, तो क्या यह उनकी मानवता के मूल्यांकन की कसौटी माना जाएगा? (नहीं, वह नहीं माना जाएगा।) लोगों द्वारा इसका पालन किए जाने के बाद भी इसे लोगों की मानवता के मूल्यांकन की कसौटी क्यों नहीं माना जाएगा? (“उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का पालन करने की व्यक्ति की क्षमता या कमी वास्तव में उसकी मानवता की गुणवत्ता प्रतिबिंबित नहीं करती। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि उसकी मानवता कितनी अच्छी या बुरी है, और यह लोगों की मानवता का मूल्यांकन करने की कसौटी नहीं है।) यह मुद्दे को समझने का एक तरीका है। व्यक्ति द्वारा उठाए गए धन को जेब में न रखने और उसकी मानवता की गुणवत्ता के बीच थोड़ा ही संबंध है। इसलिए, अगर तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से हो, जो वास्तव में उठाए गए धन को जेब में न रखने में सक्षम है, तो तुम लोग उसे कैसे देखोगे? क्या तुम उसे ऐसा व्यक्ति मान सकते हो जिसमें मानवता है, क्या वह एक ईमानदार व्यक्ति और ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के प्रति समर्पित है? क्या तुम उठाए गए धन को जेब में न रखने को मानवता होने के मानक के रूप में वर्गीकृत कर सकते हो? हमें इस मुद्दे पर सहभागिता करनी चाहिए। इसके बारे में कौन बोलेगा? (व्यक्ति की उठाए गए धन को जेब में न रखने की क्षमता उस व्यक्ति के मानवता-सार को परिभाषित करने के लिए अप्रासंगिक है। उनके सार का मूल्यांकन सत्य के अनुसार किया जाता है।) और क्या? (कुछ लोग उठाए गए धन को जेब में न रखने में सक्षम होते हैं, चाहे वह एक बड़ी रकम हो, या वे ऐसे कई अन्य अच्छे कर्म करते हैं, लेकिन उनके अपने लक्ष्य और इरादे होते हैं। वे अपने सराहनीय कार्यों के लिए पुरस्कृत होना और अच्छी प्रतिष्ठा हासिल करना चाहते हैं, इसलिए उनके बाहरी अच्छे व्यवहार उनकी मानवता की गुणवत्ता निर्धारित नहीं कर सकते।) और कुछ? (मान लो, कोई उठाए गए धन को जेब में न रखने में सक्षम है, लेकिन वह सत्य को एक प्रतिरोधी रवैये के साथ लेता है, एक ऐसे रवैये के साथ, जो सत्य से उकता चुका है। अगर हम परमेश्वर के वचनों के आधार पर उसका मूल्यांकन करें, तो पाएँगे कि उसमें मानवता नहीं है। इसलिए, व्यक्ति के पास मानवता है या नहीं, इसका निर्णय करने के लिए इस मानक का उपयोग करना गलत है।) तुममें से कुछ लोग पहले ही समझ चुके हैं कि व्यक्ति में मानवता है या नहीं, इसका मूल्यांकन करने के लिए “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का उपयोग करना गलत है—व्यक्ति में मानवता है या नहीं, इसका मूल्यांकन करने के लिए तुम इसे एक मानक के रूप में उपयोग किए जाने से सहमत नहीं हो। यह दृष्टिकोण सही है। चाहे व्यक्ति उठाए गए धन को जेब में न रखने में सक्षम हो या नहीं, इसका उसके आचरण के सिद्धांतों और उसके द्वारा चुने गए मार्ग से कोई लेना-देना नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? सबसे पहले, जब व्यक्ति उठाए गए धन को जेब में नहीं रखता, तो यह केवल एक क्षणिक व्यवहार दर्शाता है। यह कहना मुश्किल है कि क्या उसने ऐसा इसलिए किया कि जो चीज उसने उठाई थी वह बेकार थी, या इसलिए कि अन्य लोग उसे देख रहे थे और वह उनकी प्रशंसा और सम्मान हासिल करना चाहता था। भले ही उसका कार्य शुद्ध रहा हो, फिर भी यह सिर्फ एक तरह का अच्छा व्यवहार ही है, और इसका उसके अनुसरण और आचरण से कोई लेना-देना नहीं है। अधिक से अधिक इतना ही कहा जा सकता है कि इस व्यक्ति का व्यवहार थोड़ा अच्छा और चरित्र नेक है। भले ही इस व्यवहार को एक नकारात्मक चीज नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसे एक सकारात्मक चीज के रूप में भी वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, और किसी व्यक्ति को यकीनन सिर्फ इसलिए सकारात्मक के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह उठाए गए धन को जेब में नहीं रखता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इसका सत्य से कोई संबंध और परमेश्वर की मनुष्य से की गई अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ लोग कहते हैं : “यह एक सकारात्मक चीज कैसे नहीं हो सकती? ऐसे नेक व्यवहार को सकारात्मक कैसे नहीं माना जा सकता? अगर कोई अनैतिक है और उसमें मानवता की कमी है, तो क्या वह उठाए गए धन को जेब में न रखने में सक्षम होगा?” यह इसे कहने का अनिवार्य रूप से कोई सटीक तरीका नहीं है। शैतान कुछ अच्छे काम करने में भी सक्षम होता है—तो क्या तुम कहोगे कि वह शैतान नहीं है? कुछ राक्षस राजा अपना नाम कमाने और इतिहास में अपनी जगह पक्की करने के लिए एक-दो अच्छे कर्म करते हैं—तो क्या तुम उन्हें अच्छे लोग कहोगे? तुम किसी के द्वारा किए गए एक अच्छे या बुरे काम के आधार पर ही यह निर्धारित नहीं कर सकते कि उसमें मानवता है या नहीं, या उसका चरित्र अच्छा है या बुरा। मूल्यांकन सटीक हो, इसके लिए तुम्हें उसे उसके समग्र आचरण और इस बात पर आधारित करना चाहिए कि उसके विचार और दृष्टिकोण सही हैं या नहीं। अगर कोई व्यक्ति कहीं पड़ी मिली कोई बहुत ही मूल्यवान वस्तु उसके असली मालिक को लौटाने में सक्षम है, तो इससे सिर्फ यह पता चलता है कि वह लालची नहीं है और वह अन्य लोगों की संपत्ति का लालच नहीं करता। उसमें अच्छे नैतिक आचरण का यह पहलू है, लेकिन क्या इसका उसके आचरण और सकारात्मक चीजों के प्रति उसके रवैये से कोई लेना-देना है? (नहीं।) संभव है, कुछ लोग इससे सहमत न हों, वे इस दावे को थोड़ा व्यक्तिपरक और गलत मानेंगे। लेकिन, इस पर एक अलग परिप्रेक्ष्य से विचार करने पर, अगर कोई व्यक्ति कोई उपयोगी चीज खो देता है, तो क्या वह इसके बारे में बहुत चिंतित नहीं होगा? इसलिए, जिस व्यक्ति को वह वस्तु मिलती है, चाहे उसे कुछ भी मिले, वह उसकी नहीं है, इसलिए उसे वह वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए। चाहे वह कोई भौतिक वस्तु हो या धन, चाहे वह मूल्यवान हो या मूल्यहीन, वह उसका नहीं है—तो क्या उस वस्तु को उसके असली मालिक को लौटाना उसका कर्तव्य नहीं है? क्या यही वह चीज नहीं है, जो लोगों को करनी चाहिए? इसे बढ़ावा देने का क्या महत्व है? क्या यह तिल का ताड़ बनाना नहीं है? क्या उठाए गए धन को जेब में न रखने को एक उत्कृष्ट नैतिक गुण मानना और उसे एक ऊँचे, आध्यात्मिक संदर्भ में ऊपर उठाना अतिरंजना नहीं है? क्या यह एक अच्छा व्यवहार अच्छे लोगों के बीच जिक्र करने लायक भी है? बहुत-से व्यवहार इससे भी बेहतर और ऊँचे हैं, इसलिए उठाए गए धन को जेब में न रखना जिक्र करने लायक नहीं है। हालाँकि, अगर तुम भिखारियों और चोरों के बीच इस अच्छे व्यवहार का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार करो, तो यह उचित होगा, और इसका कुछ उपयोग हो सकता है। अगर कोई देश जोर-शोर से यह प्रचार करता है कि “उठाए गए धन को जेब में मत रखो,” तो यह दर्शाता है कि वहाँ के लोग पहले से ही बहुत बुरे हैं, कि देश लुटेरों और चोरों से भर गया है और वह उनसे रक्षा करने में असमर्थ है। इसलिए, समस्या हल करने के लिए इस तरह के व्यवहार को बढ़ावा देना और प्रचारित करना ही उसका एकमात्र सहारा है। दरअसल, यह व्यवहार हमेशा से लोगों का कर्तव्य रहा है। उदाहरण के लिए, अगर किसी को सड़क पर पचास युआन मिलते हैं और वह उन्हें आसानी से उसके असली मालिक को लौटा देता है, तो क्या यह इतना महत्वहीन नहीं है कि इसका जिक्र भी न किया जाए? क्या वाकई इसे सराहने की जरूरत है? क्या तिल का ताड़ बनाना और इस व्यक्ति की प्रशंसा करना, यहाँ तक कि उसके उत्कृष्ट और सम्मानजनक नैतिक आचरण के लिए उसकी सराहना करना सिर्फ इसलिए आवश्यक है कि उसने उस व्यक्ति को धन लौटा दिया, जिसने उसे खो दिया था? क्या खोया हुआ धन उसके असली मालिक को लौटाना सामान्य और स्वाभाविक बात नहीं है? क्या यह एक ऐसी चीज नहीं है, जो सामान्य विवेक वाले व्यक्ति को करनी ही चाहिए? सामाजिक नैतिकताओं को न समझने वाला एक छोटा बच्चा भी ऐसा करने में सक्षम होगा, तो क्या इसे इतनी बड़ी बात बनाना वाकई जरूरी है? क्या यह व्यवहार वास्तव में मनुष्य की नैतिकता के स्तर तक ऊपर उठाने योग्य है? मेरी राय में, इसे इस स्तर तक नहीं उठाया जा सकता, और यह प्रशंसा के योग्य नहीं है। यह सिर्फ एक क्षणिक अच्छा व्यवहार है और इसका बुनियादी स्तर पर वास्तव में एक अच्छा इंसान होने से कोई संबंध नहीं है। उठाए गए धन को जेब में न रखना बहुत मामूली बात है। यह ऐसी चीज है, जिसे कोई भी सामान्य व्यक्ति और मानव-त्वचा धारण करने या मानव-भाषा बोलने वाला हर व्यक्ति करने में सक्षम होना चाहिए। यह ऐसी चीज है, जिसे लोग कर सकते हैं अगर वे कड़ी मेहनत करें, उन्हें इसे सिखाने के लिए किसी शिक्षक या विचारक की जरूरत नहीं है। एक तीन साल का बच्चा भी ऐसा करने में सक्षम है, और फिर भी, विचारकों और शिक्षकों ने इसे मनुष्य के नैतिक आचरण की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता माना है, और ऐसा करके उन्होंने बिना बात के बतंगड़ खड़ा कर दिया है। भले ही “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” ऐसा कथन है, जो मनुष्य के नैतिक आचरण का मूल्यांकन करता है, लेकिन यह मूलभूत रूप से यह मापने के स्तर तक नहीं पहुँचता कि व्यक्ति के पास मानवता या उत्कृष्ट नैतिकता है या नहीं। इसलिए, किसी व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का उपयोग करना गलत और अनुपयुक्त दोनों है।

“उठाए गए धन को जेब में मत रखो” नैतिक आचरण के बारे में परंपरागत संस्कृति की सबसे सतही अपेक्षा है। भले ही सभी मानव-समाजों ने इस प्रकार के विचार को बढ़ावा दिया और सिखाया है, क्योंकि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव हैं, और मनुष्य की बुरी प्रवृत्तियों की प्रबलता के कारण, भले ही लोग कुछ समय के लिए “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का अभ्यास कर सकते हों या उनमें इस प्रकार का अच्छा नैतिक आचरण हो, इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि लोगों के भ्रष्ट स्वभाव लगातार उनके विचारों और व्यवहारों पर, और साथ ही उनके आचरण और अनुसरण पर भी हावी हो रहे हैं और उन्हें नियंत्रित कर रहे हैं। अच्छे नैतिक आचरण के क्षणिक उदाहरणों का व्यक्ति के अनुसरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, और वे निश्चित रूप से व्यक्ति द्वारा बुरी प्रवृत्तियों की खुशामद, प्रशंसा और अनुपालन किए जाने को नहीं बदल सकते। क्या यही मामला नहीं है? (बिल्कुल है।) तो, वह गीत जो लोग अतीत में गाते थे, “सड़क के किनारे, मैंने जमीन से एक सेंट उठाया,” अब एक नर्सरी की कविता से ज्यादा कुछ नहीं है। वह एक याद बन गया है। लोग उठाए गए धन को जेब में न रखने के बुनियादी अच्छे व्यवहार का भी पालन नहीं कर सकते। लोग अच्छे नैतिक आचरण को बढ़ावा देकर मनुष्य के अनुसरणों और भ्रष्ट स्वभावों को बदलना चाहते हैं और मनुष्य की अधोगति और समाज के दिन-ब-दिन होते पतन को रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे अंततः इन उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहे हैं। “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का नैतिक सिद्धांत सिर्फ मनुष्य की आदर्श दुनिया में ही मौजूद हो सकता है। लोग इस नैतिकता को एक प्रकार के आदर्श के रूप में, एक बेहतर दुनिया की आकांक्षा के रूप में देखते हैं। यह नैतिकता मनुष्य की आध्यात्मिक दुनिया के भीतर मौजूद है। यह एक प्रकार की आशा है, जिसे मनुष्य भविष्य की दुनिया से रखता है, लेकिन यह मानव-जीवन की वास्तविकता और लोगों की वास्तविक मानवता के साथ असंगत है। यह मनुष्य के आचरण के सिद्धांतों और उन मार्गों के विपरीत है जिन पर लोग चलते हैं, और साथ ही उसके भी विपरीत है जिसका वे अनुसरण करते हैं और जो उनमें होना और जो उन्हें हासिल करना चाहिए। यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियों और उद्गारों, और अंतर्वैयक्तिक संबंधों और मामलों को सँभालने के सिद्धांतों के साथ असंगत है। इसलिए, प्राचीन काल से लेकर आज तक, मनुष्य के नैतिक आचरण को परखने का यह मानक हमेशा अमान्य रहा है। मनुष्य द्वारा प्रचारित “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का यह विचार और दृष्टिकोण विशेष रूप से निरर्थक है और अधिकांश लोग इसे अनदेखा करते हैं, क्योंकि यह उनके आचरण या उनके अनुसरणों की दिशा नहीं बदल सकता, और यह निश्चित रूप से लोगों की भ्रष्टता, स्वार्थपरता, खुदगर्जी या बुराई की ओर बढ़ने की उनकी बढ़ती प्रवृत्ति को नहीं बदल सकता। “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” की यह सबसे सतही अपेक्षा एक मनोरंजक, व्यंग्यपूर्ण मजाक बन चुकी है। अब तो बच्चे भी नहीं गाना चाहते, “सड़क के किनारे, मैंने जमीन से एक सेंट उठाया”—इसका दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। भ्रष्ट राजनेताओं से भरी दुनिया में यह गाना बेहद व्यंग्यात्मक बन गया है। वास्तविकता, जिससे लोग अच्छी तरह से अवगत हैं, यह है कि व्यक्ति खोया हुआ एक सेंट तो पुलिस को सौंप सकता है, लेकिन अगर वह दस लाख युआन या एक करोड़ युआन उठाता है, तो वे सीधे उसकी जेब में चले जाएँगे। इस घटना से हम देख सकते हैं कि मनुष्यों में नैतिक आचरण से संबंधित इस अपेक्षा को बढ़ावा देने के लोगों के प्रयास विफल रहे हैं। इसका मतलब यह है कि लोग बुनियादी अच्छे व्यवहार का अभ्यास करने में भी असमर्थ हैं। बुनियादी अच्छे व्यवहार का अभ्यास करने में असमर्थ होने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि लोग उन बुनियादी चीजों का भी अभ्यास करने में असमर्थ हैं, जो उन्हें करना चाहिए—जैसे कि उठाई गई चीज, जो किसी और की है, न लेना। इसके अलावा, जब लोग कुछ गलत करते हैं, तो वे उसके बारे में एक भी सच्चा शब्द नहीं बोलेंगे, वे अपना गलत काम स्वीकारने के बजाय मर जाना पसंद करेंगे। वे झूठ न बोलने जैसी बुनियादी बात पर भी अमल नहीं कर सकते, इसलिए वे निश्चित रूप से नैतिकता के बारे में बात करने लायक नहीं हैं। वे जमीर और विवेक तक नहीं रखना चाहते, तो वे नैतिकता के बारे में कैसे बात कर सकते हैं? अधिकारी और अधिकार-संपन्न लोग दूसरे लोगों से अधिक लाभ ऐंठने और झटकने के साथ ही, जो चीजें उनकी नहीं हैं, उन्हें हथियाने के तरीकों के बारे में सोचने में अपना दिमाग लड़ाते हैं। यहाँ तक कि कानून भी उन्हें नहीं रोक सकता—ऐसा क्यों है? मनुष्य इस स्तर तक कैसे आ गया है? यह सब लोगों के भ्रष्ट शैतानी स्वभावों और उन पर उनकी शैतानी प्रकृति के नियंत्रण और वर्चस्व के कारण है, जो तमाम तरह के कपटी, हानिकारक व्यवहारों को जन्म देता है। ये पाखंडी लोग “जन-सेवा” की आड़ में कई घृणित और शर्मनाक काम करते हैं। क्या उनमें शर्म की सारी भावना समाप्त नहीं हो गई है? आजकल बहुत सारे पाखंडी लोग हैं। ऐसी दुनिया में, जहाँ बुरे लोग निरंकुश हो गए हैं और अच्छे लोगों पर अत्याचार किया जाता है, “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” जैसा सिद्धांत लोगों के भ्रष्ट स्वभावों पर लगाम लगाने में एकदम असमर्थ है, और वह उनके प्रकृति-सार या उस मार्ग को नहीं बदल सकता, जिस पर वे चलते हैं।

क्या तुम लोग वे चीजें समझ गए हो, जो मैंने “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” विषय पर इस संगति में कही हैं? भ्रष्ट मनुष्यों के लिए इस कहावत का क्या अर्थ है? व्यक्ति को इस नैतिकता को कैसे समझना चाहिए? (“उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का लोगों के आचरण या उस मार्ग से कोई संबंध नहीं, जिस पर वे चलते हैं। यह उस मार्ग को नहीं बदल सकता, जिस पर मनुष्य चलता है।) यह सही है, लोगों का “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” कहावत के आधार पर व्यक्ति की मानवता का मूल्यांकन करना उपयुक्त नहीं है। इस कहावत का उपयोग व्यक्ति की मानवता को मापने के लिए नहीं किया जा सकता, और किसी के आचार-विचार को मापने के लिए इसका उपयोग करना भी गलत है। यह मनुष्य के क्षणिक व्यवहार से अधिक कुछ नहीं है। इसका उपयोग व्यक्ति के सार का मूल्यांकन करने के लिए बिल्कुल नहीं किया जा सकता। जिन लोगों ने नैतिक आचरण के बारे में “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” कहावत प्रस्तावित की—वे तथाकथित विचारक और शिक्षक—आदर्शवादी हैं। वे मनुष्य की मानवता या सार नहीं समझते, और वे यह भी नहीं समझते कि मनुष्य किस हद तक चरित्रहीन और भ्रष्ट हो गया है। इसलिए, नैतिक आचरण के बारे में उनके द्वारा प्रतिपादित यह कहावत बहुत ही खोखली है, बिल्कुल अव्यावहारिक है, और मनुष्य की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है। नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत का मनुष्य के सार से या लोगों द्वारा दिखाए जाने वाले विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों से, या उन धारणाओं, विचारों और व्यवहारों से, जिन्हें लोग भ्रष्ट स्वभावों के वर्चस्व के दौरान उत्पन्न कर सकते हैं, थोड़ा-सा भी संबंध नहीं है। यह एक बात है। दूसरी बात यह है कि उठाए गए धन को जेब में न रखना एक ऐसी चीज है, जो सामान्य इंसान को करनी ही चाहिए। उदाहरण के लिए, तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया और तुम्हारा पालन-पोषण किया, लेकिन जब तुम अबोध और अपरिपक्व ही थे, तब तुम बस अपने माता-पिता से ही भोजन और कपड़े माँगा करते थे। लेकिन जब तुम परिपक्व हो गए और तुम्हें चीजों की बेहतर समझ हो गई, तो तुम स्वाभाविक रूप से अपने माता-पिता से बहुत प्यार करना, उन्हें चिंतित या क्रोधित करने से बचना, उनके काम का बोझ या पीड़ा न बढ़ाने की कोशिश करना और वह सब-कुछ करना सीख गए, जो तुम खुद कर सकते थे। तुम स्वाभाविक रूप से इन चीजों को समझ गए और किसी को तुम्हें सिखाने की जरूरत नहीं पड़ी। तुम एक इंसान हो, तुम्हारे पास जमीर और विवेक है, इसलिए तुम ये चीजें करने में सक्षम हो और तुम्हें इन्हें करना ही चाहिए—इसमें से कोई चीज उल्लेख करने लायक भी नहीं है। “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” को उत्कृष्ट नैतिक चरित्र के स्तर तक ऊपर उठाकर लोग तिल का ताड़ बना रहे हैं और चीजों को बहुत खींच रहे हैं; इस व्यवहार को उस तरह से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए, क्या ऐसा नहीं है? (ऐसा ही है।) इससे क्या सीखा जा सकता है? सामान्य मानवता के दायरे के भीतर वह करना, जो व्यक्ति को करना चाहिए और जो वह करने में सक्षम है, उस व्यक्ति में सामान्य मानवता होने का संकेत है। इसका मतलब यह है कि अगर व्यक्ति में सामान्य विवेक है, तो वह वे काम कर सकता है जिनके बारे में सामान्य मानवता वाले लोग सोचते होंगे और महसूस करते होंगे कि उन्हें करने चाहिए—क्या यह बहुत सामान्य घटना नहीं है? अगर तुम कुछ ऐसा करते हो, जिसे सामान्य मानवता वाला कोई भी व्यक्ति करने में सक्षम है, तो क्या इसे वास्तव में अच्छा नैतिक आचरण कहा जा सकता है? क्या इसे प्रोत्साहित करना जरूरी है? (नहीं, जरूरी नहीं है।) क्या इसे वास्तव में उत्कृष्ट मानवता माना जाता है? क्या इसे मानवता होना माना जाता है? (नहीं, ऐसा नहीं माना जाता।) ऐसे व्यवहार प्रदर्शित करने से कोई व्यक्ति मानवता से युक्त होने के स्तर तक उन्नत नहीं हो जाता। अगर तुम कहते हो कि किसी व्यक्ति में मानवता है, तो इसका मतलब यह है कि जिस परिप्रेक्ष्य और रुख से वह समस्याओं को देखता है, वह अपेक्षाकृत सकारात्मक और सक्रिय है, और ऐसे ही समस्याओं से निपटने के उसके उपाय और तरीके भी हैं। सकारात्मकता और सक्रियता का संकेतक क्या है? उस व्यक्ति में जमीर और शर्म की भावना होगी। सकारात्मकता और सक्रियता का एक और संकेतक न्याय की भावना है। हो सकता है कि इस व्यक्ति में कुछ बुरी आदतें हों, जैसे देर से सोना और जागना, खाना खाने में नखरे करना, या तेज स्वाद वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना, लेकिन इन बुरी आदतों के अलावा, उसमें कुछ अच्छे गुण भी होंगे। जब उसके आचरण और क्रियाकलापों की बात आती है, तो उसमें सिद्धांत और सीमाएँ होंगी; उसमें शर्म और न्याय की भावना होगी; और उसमें सकारात्मक लक्षण ज्यादा और नकारात्मक लक्षण कम होंगे। अगर वह सत्य स्वीकार कर उसका अभ्यास कर सके, तो यह और भी बेहतर होगा और उसके लिए सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना आसान होगा। इसके विपरीत, अगर व्यक्ति बुराई से प्रेम करता है; प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा चाहता है; पैसे से प्यार करता है; विलासिता का जीवन जीना पसंद करता है; और सुख-सुविधा की तलाश में अपना समय बरबाद करने में आनंद लेता है, तो जिस परिप्रेक्ष्य से वह लोगों और चीजों को देखता है, और जीवन और मूल्य-व्यवस्था पर उसका दृष्टिकोण नकारात्मक और अंधकारमय होगा, और उसमें शर्म और न्याय की भावना का अभाव होगा। इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता नहीं होगी, और उसके लिए सत्य स्वीकारना या परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करना निश्चित रूप से आसान नहीं होगा। लोगों के मूल्यांकन का यह एक सरल सिद्धांत है। व्यक्ति के नैतिक आचरण का मूल्यांकन कोई ऐसा मानक नहीं है, जिससे यह मापा जा सके कि उसमें मानवता है या नहीं। यह मूल्यांकन करने के लिए कि कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, तुम्हें उसका मूल्यांकन उसकी मानवता के आधार पर करना चाहिए, न कि उसके नैतिक आचरण के आधार पर। नैतिक आचरण सतही होता है और वह व्यक्ति के सामाजिक माहौल, पृष्ठभूमि और परिवेश से प्रभावित होता है। कुछ नजरिये और अभिव्यक्तियाँ लगातार बदलती रहती हैं, इसलिए व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता सिर्फ उसके नैतिक आचरण के आधार पर निर्धारित करना कठिन है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति सामाजिक शिष्टाचार का बहुत सम्मान कर सकता है, और जहाँ भी जाता है, नियमों का पालन करता है। वह अपने हर काम में संयम दिखा सकता है, सरकारी कानूनों का पालन कर सकता है और सार्वजनिक रूप से हंगामा करने या अन्य लोगों के हितों का उल्लंघन करने से बच सकता है। वह आदरपूर्ण और मददगार भी हो सकता है और युवाओं और बुजुर्गों की देखभाल भी कर सकता है। क्या इस तथ्य का कि इस व्यक्ति में इतने सारे अच्छे लक्षण हैं, यह मतलब है कि वह सामान्य मानवता को जी रहा है और वह एक अच्छा इंसान है? (ऐसा नहीं है।) व्यक्ति “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का बहुत अच्छी तरह अभ्यास कर सकता है, वह लगातार इस नैतिकता का पालन कर सकता है जिसे मानवजाति बढ़ावा देती है और जिसकी वकालत करती है, लेकिन उसकी मानवता कैसी है? यह तथ्य कि वह उठाए गए धन को जेब में न रखने का अभ्यास करता है, उसकी मानवता के बारे में कुछ नहीं कहता—इस नैतिक आचरण का उपयोग यह मूल्यांकन करने के लिए नहीं किया जा सकता कि उसकी मानवता अच्छी है या बुरी। अब उसकी मानवता कैसे मापी जाए? तुम्हें उसे इस नैतिक आचरण की पैकेजिंग से मुक्त करना होगा, और उन व्यवहारों और नैतिक आचरण को हटाना होगा जिन्हें मनुष्य अच्छा मानता है, और ये न्यूनतम चीजें हैं जिन्हें सामान्य मानवता वाला कोई भी व्यक्ति प्राप्त करने में सक्षम है। उसके बाद, उसकी सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ देखो, जैसे कि उसके आचरण के सिद्धांत, और वे सीमाएँ जिन्हें वह अपने आचरण में पार नहीं करेगा, और साथ ही सत्य और परमेश्वर के प्रति उसका रवैया भी। उसके मानवता-सार और उसकी आंतरिक प्रकृति को देखने का यही एकमात्र तरीका है। लोगों को इस तरह से देखना अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ और सटीक है। इस नैतिकता : “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” पर हमारी चर्चा के लिए यह काफी होगा। क्या तुम सभी इस संगति को समझ गए हो? (हाँ।) मुझे अक्सर चिंता होती है कि मैंने जो कहा है, उसे तुम लोगों ने वास्तव में नहीं समझा है, कि तुम इसके बारे में सिर्फ थोड़ा-सा सिद्धांत ही समझते हो, लेकिन अभी भी इसके सार से संबंधित हिस्सों को नहीं समझते। इसलिए, मैं इतना ही कर सकता हूँ कि इस विचार पर थोड़ा और विस्तार से बोलूँ। मैं तभी सहज महसूस करूँगा, जब मुझे यह एहसास होगा कि तुम लोग समझ गए हो। मैं कैसे बता सकता हूँ कि तुम समझ गए हो? जब मैं तुम लोगों के चेहरों पर खुशी की झलक देखता हूँ, तो तुम शायद मेरे कहे को समझ गए होते हो। अगर मैं इसे हासिल कर सकूँ, तो इस विषय पर थोड़ा और बोलना सार्थक होगा।

मैंने “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” विषय पर अपनी संगति कमोबेश पूरी कर ली है। भले ही मैंने तुम्हें सीधे तौर पर यह नहीं बताया है कि यह नैतिकता सत्य से कैसे टकराती है, या इसे सत्य के स्तर तक क्यों नहीं उठाया जा सकता, या परमेश्वर लोगों के व्यवहार और नैतिक आचरण के बारे में क्या अपेक्षा रखता है, फिर भी क्या मैंने इन सभी चीजों को शामिल नहीं किया है? (किया है।) क्या परमेश्वर का घर “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” जैसी नैतिकताओं को बढ़ावा देता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर का घर इस कहावत को कैसे देखता है? तुम लोग अपनी समझ साझा कर सकते हो। (“उठाए गए धन को जेब में मत रखो” एक ऐसी चीज है जिसका सामान्य मानवता वाले किसी भी व्यक्ति को पालन करना चाहिए, इसलिए इसे बढ़ावा देने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही, “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” सिर्फ मनुष्य की नैतिकता की एक अभिव्यक्ति है, इसका लोगों के आचरण के सिद्धांतों से, अपने अनुसरणों के बारे में उनके विचारों से, उन रास्तों से जिन पर वे चलते हैं, या उनकी मानवता की गुणवत्ता से कोई संबंध नहीं है।) क्या नैतिक आचरण मानवता का संकेत है? (यह मानवता का संकेत नहीं है। नैतिक आचरण के कुछ पहलू ऐसी चीजें हैं जो सामान्य मानवता वाले लोगों के पास होनी चाहिए।) जब परमेश्वर का घर मानवता और लोगों को पहचानने के बारे में बात करता है, तो वह सत्य के अनुसरण के प्रमुख संदर्भ में ऐसा करता है। सामान्य रूप से कहूँ, तो परमेश्वर का घर यह मूल्यांकन नहीं करेगा कि व्यक्ति का नैतिक आचरण कैसा है—कम से कम, परमेश्वर का घर यह मूल्यांकन नहीं करेगा कि क्या व्यक्ति इस कहावत का पालन करने में सक्षम है : “उठाए गए धन को जेब में मत रखो।” परमेश्वर का घर इसकी जाँच नहीं करेगा। इसके बजाय, परमेश्वर का घर उस व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता की जाँच करेगा, कि वह सकारात्मक चीजों और सत्य से प्रेम करता है या नहीं, और सत्य और परमेश्वर के प्रति उसका रवैया किस प्रकार का है। हो सकता है, धर्मनिरपेक्ष समाज में रहते हुए व्यक्ति उठाए गए धन को जेब में न रखे, लेकिन अगर वह विश्वासी बनने के बाद परमेश्वर के घर के हितों की बिल्कुल भी रक्षा नहीं करता—अगर वह प्रबंधन करने का मौका दिए जाने पर भेंटें चुराने, उन्हें बरबाद करने, यहाँ तक कि बेचने में भी सक्षम है—अगर वह तमाम तरह की बुरी चीजें करने में सक्षम है, तो वह क्या है? (एक बुरा व्यक्ति।) समस्या उत्पन्न होने पर वह कभी परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा के लिए अपना रुख जाहिर नहीं करता। क्या ऐसे लोग नहीं हैं? (हैं।) तो, क्या उनकी मानवता का मूल्यांकन करने के लिए “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” कहावत का उपयोग करना उपयुक्त होगा? यह उपयुक्त नहीं होगा। कुछ लोग कहते हैं : “वे अच्छे इंसान हुआ करते थे। उनका नैतिक चरित्र उत्तम था और सभी लोग उनका अनुमोदन करते थे। तो परमेश्वर के घर में आने के बाद वे बदल क्यों गए?” क्या वे सचमुच बदल गए? सच तो यह है कि वे बदले नहीं। उनमें थोड़ा नैतिक आचरण और अच्छा व्यवहार था, लेकिन इसे छोड़कर, यही हमेशा उनका मानवता-सार था—जो बिल्कुल भी नहीं बदला है। वे जहाँ भी जाते हैं, हमेशा इसी तरह से आचरण करते हैं। बात बस इतनी-सी है कि पहले लोग उनकी मानवता परखने के लिए सत्य का उपयोग करने के बजाय नैतिक आचरण की कसौटी पर उनका मूल्यांकन करते थे। लोगों को लगता है कि उनमें किसी तरह का बदलाव आया है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ है। कुछ लोग कहते हैं, “वे पहले ऐसे नहीं थे।” वे पहले ऐसे इसलिए नहीं थे, क्योंकि उन्हें पहले ऐसी स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा था और उन्होंने खुद को पहले इस तरह के परिवेश में नहीं पाया था। इसके अलावा, लोग सत्य नहीं समझते थे और उन्हें पहचानने में असमर्थ थे। लोगों द्वारा दूसरों को उनके मानवता-सार के बजाय उनके एक अच्छे व्यवहार के आधार पर देखने और परखने का अंतिम परिणाम क्या होता है? न सिर्फ लोग दूसरों को स्पष्ट रूप से देखने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे दूसरों के बाहरी अच्छे नैतिक आचरण के धोखे में आकर गुमराह भी हो जाएँगे। जब लोग दूसरों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, तो वे गलत लोगों पर भरोसा करेंगे, उन्हें बढ़ावा देंगे और नियुक्त करेंगे, और वे दूसरे लोगों द्वारा गुमराह किए जाएँगे और धोखा खाएँगे। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता लोगों को चुनते और नियुक्त करते समय अक्सर यह गलती करते हैं। वे ऐसे लोगों के धोखे में आ जाते हैं, जिनमें बाहरी तौर पर कुछ अच्छे व्यवहार और अच्छा नैतिक आचरण होता है, और उनके लिए महत्वपूर्ण कार्य संभालने या कुछ महत्वपूर्ण वस्तुएँ रखने की व्यवस्था कर देते हैं। नतीजतन, कुछ गलत हो जाता है और इससे परमेश्वर के घर को कुछ नुकसान उठाना पड़ता है। कुछ गलत क्यों हुआ? यह गलत इसलिए हुआ, क्योंकि अगुआ और कार्यकर्ता इन लोगों का प्रकृति-सार नहीं समझ पाए। वे उनका प्रकृति-सार समझने में असमर्थ क्यों रहे? क्योंकि ये अगुआ और कार्यकर्ता सत्य नहीं समझते, और वे लोगों का मूल्यांकन करने और उन्हें समझने में सक्षम नहीं हैं। वे लोगों के प्रकृति-सार को नहीं समझ सकते, और वे नहीं जानते कि लोगों का परमेश्वर, सत्य और परमेश्वर के घर के हितों के प्रति किस तरह का रवैया है। ऐसा क्यों है? क्योंकि ये अगुआ और कार्यकर्ता लोगों और चीजों को गलत परिप्रेक्ष्य से देखते हैं। वे लोगों को सिर्फ मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर देखते हैं, वे उनके सार को परमेश्वर के वचनों और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार नहीं देखते—इसके बजाय, वे लोगों को उनके नैतिक आचरण, बाहरी व्यवहार और अभिव्यक्तियों के आधार पर देखते हैं। चूँकि लोगों के बारे में उनके विचारों में सिद्धांतों का अभाव है, इसलिए उन्होंने गलत लोगों पर भरोसा किया, गलत लोगों को नियुक्त किया, और नतीजतन वे धोखा खा गए, ठगे गए और उन लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए, और अंततः परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान हुआ। ये लोगों को समझने या उनकी असलियत पहचानने में असमर्थ होने के परिणाम हैं। इसलिए, जब कोई सत्य का अनुसरण करना चाहता है, तो उसे पहला सबक यह सीखना चाहिए कि लोगों को कैसे पहचाना और देखा जाए—इस सबक को सीखने में लंबा समय लगता है, और यह उन सबसे बुनियादी सबकों में से एक है जिन्हें लोगों को सीखना चाहिए। अगर तुम किसी व्यक्ति को स्पष्ट रूप से देखना चाहते हो और उसे पहचानना सीखना चाहते हो, तो तुम्हें पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर लोगों का मूल्यांकन करने के लिए किन मानकों का उपयोग करता है, कौन-से भ्रामक विचार और दृष्टिकोण लोगों के दूसरों को देखने और उनका मूल्यांकन करने के तरीके को नियंत्रित करते और उन पर हावी होते हैं, और क्या वे उन मानकों से टकराते हैं जिनका उपयोग परमेश्वर लोगों का मूल्यांकन करने के लिए करता है, और वे कैसे टकराते हैं। क्या वे तरीके और कसौटियाँ, जिनके जरिये तुम लोगों का मूल्यांकन करते हो, परमेश्वर की अपेक्षाओं पर आधारित हैं? क्या वे परमेश्वर के वचनों पर आधारित हैं? क्या उनका सत्य में कोई आधार है? अगर नहीं, और तुम दूसरों का मूल्यांकन करने के लिए पूरी तरह से अपने अनुभवों और कल्पनाओं पर भरोसा करते हो, या अगर तुम इस हद तक जाते हो कि अपने मूल्यांकन समाज के भीतर प्रचारित सामाजिक नैतिकताओं पर या उस पर आधारित करते हो जो तुम अपनी दोनों आँखों से देखते हो, तो वह व्यक्ति, जिसे तुम पहचानने की कोशिश कर रहे हो, तुम्हारे लिए अस्पष्ट रहेगा। तुम उसकी असलियत समझ पाने में सक्षम नहीं होगे। अगर तुम उन पर भरोसा करके उन्हें कर्तव्य सौंपते हो, तो तुम एक निश्चित स्तर का जोखिम उठा रहे होगे, और अनिवार्य रूप से, ऐसी संभावना है कि इससे परमेश्वर की भेंटों, कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन-प्रवेश को नुकसान पहुँचेगा। अगर तुम सत्य का अनुसरण करना चाहते हो, तो लोगों को पहचानना पहला सबक है, जो तुम्हें अवश्य सीखना चाहिए। बेशक, यह सत्य के उन सबसे बुनियादी पहलुओं में से भी एक है, जो लोगों में होने चाहिए। लोगों को पहचानना सीखना आज की संगति के विषय का अभिन्न हिस्सा है। तुम्हें मनुष्य के अच्छे नैतिक आचरण और गुणों के साथ-साथ उन चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए जो सामान्य मानवता वाले व्यक्ति में होनी चाहिए। इन दो चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होना बहुत महत्वपूर्ण है। सिर्फ तभी तुम किसी व्यक्ति के सार को पहचानने और सटीक रूप से समझने, और अंततः यह निर्धारित करने में सक्षम होगे कि किसमें मानवता है और किसमें नहीं। इन चीजों को समझने के लिए पहले व्यक्ति को किस चीज से सुसज्जित होना चाहिए? व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों के साथ-साथ सत्य के इस पहलू को भी समझना चाहिए, और उस बिंदु तक पहुँचना चाहिए जहाँ वह लोगों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार, सत्य को अपनी कसौटी मानकर देखता है। क्या यह वही सत्य-सिद्धांत नहीं है, जिसका अभ्यास सत्य का अनुसरण करते समय व्यक्ति को करना चाहिए और जो उसमें होना चाहिए? (बिल्कुल।) इसलिए, हमारे लिए इन विषयों पर संगति करना अनिवार्य है।

मैंने अभी पहली कहावत, “उठाए गए धन को जेब में मत रखो,” पर संगति की, जो स्पष्ट रूप से एक प्रकार का मानवीय नैतिक आचरण है। यह एक प्रकार का नैतिक चरित्र और क्षणिक व्यवहार है, जो लोगों पर अच्छा प्रभाव डालता है, लेकिन दुर्भाग्य से, यह उस मानक के रूप में काम नहीं कर सकता, जिसके द्वारा यह मूल्यांकन किया जा सके कि व्यक्ति के पास मानवता है या नहीं। दूसरी कहावत, “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ,” भी वैसी ही है। इस कथन के शब्दों के आधार पर, यह स्पष्ट है कि यह भी ऐसी ही चीज है, जिसे लोग पसंद करते हैं और एक अच्छा व्यवहार मानते हैं। इस अच्छे व्यवहार को प्रदर्शित करने वाले लोगों को अच्छे नैतिक आचरण और उत्कृष्ट चरित्र वाले लोगों के रूप में अत्यधिक सम्मान दिया जाता है—संक्षेप में, उन्हें ऐसे लोगों के रूप में लिया जाता है, जो दूसरों की मदद करने में खुशी पाते हैं और उत्कृष्ट नैतिक चरित्र रखते हैं। “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” में कुछ “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” जैसी ही समानताएँ हैं। यह भी एक अच्छा व्यवहार है, जो लोगों में कुछ सामाजिक परिवेशों के भीतर उत्पन्न होता है। “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” का शाब्दिक अर्थ है दूसरे लोगों की मदद करने में खुशी पाना। इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों की मदद करना व्यक्ति का कर्तव्य है—कहावत यह नहीं है कि “दूसरों की मदद करना तुम्हारी जिम्मेदारी है”—बल्कि यह है कि “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ।” इससे हम देख सकते हैं कि क्या चीज लोगों को दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करती है। वे ऐसा दूसरे लोगों की खातिर नहीं, बल्कि अपने लिए करते हैं। लोग चिंता और पीड़ा से भरे हुए हैं, इसलिए वे दूसरों को ढूँढ़ते हैं जिन्हें मदद की जरूरत है और उन्हें दान और सहायता प्रदान करते हैं; वे मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं और जो भी अच्छी चीजें करने में सक्षम होते हैं, करते हैं, ताकि खुश, प्रसन्न, शांत और आनंदित महसूस कर सकें और अपने जीवन में अर्थ भर सकें, जिससे कि वे इतने खोखले और पीड़ित महसूस न करें—वे अपने दिल और दिमाग के दायरे को शुद्ध कर ऊँचा उठाने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपना नैतिक आचरण सुधारते हैं। यह कैसा व्यवहार है? अगर तुम इस स्पष्टीकरण के परिप्रेक्ष्य से उन लोगों को देखो, जो दूसरों की मदद करने में खुशी पाते हैं, तो वे अच्छे लोग नहीं हैं। कम से कम, वे अपनी नैतिकता, जमीर या मानवता से वह कार्य करने के लिए, जो उन्हें करना चाहिए, या अपनी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पूरी करने के लिए प्रेरित नहीं होते; बल्कि वे आनंद, आध्यात्मिक सांत्वना, भावनात्मक सुख प्राप्त करने और खुशी से जीने के लिए लोगों की मदद करते हैं। इस प्रकार के नैतिक आचरण के बारे में क्या राय बनानी चाहिए? अगर तुम इसकी प्रकृति देखो, तो यह “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” से भी बदतर है। कम से कम “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” का कोई स्वार्थी पहलू नहीं है। फिर इसके बारे में क्या खयाल है : “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ”? “खुशी” शब्द दर्शाता है कि इस व्यवहार में स्वार्थ और घटिया इरादों के तत्त्व शामिल हैं। यह लोगों की खातिर या निस्स्वार्थ प्रस्ताव के रूप में उनकी मदद करने से संबंधित नहीं है, बल्कि यह अपनी खुशी की खातिर किया जाता है। यह कतई प्रोत्साहित करने लायक नहीं है। उदाहरण के लिए, मान लो, तुम किसी बुजुर्ग व्यक्ति को मुख्य सड़क पर गिरते हुए देखते हो और मन ही मन सोचते हो : “मैं इन दिनों उदास महसूस कर रहा हूँ। इस बुजुर्ग व्यक्ति का गिरना एक बड़ा अवसर है—मैं दूसरों की मदद करने में खुशी पाने जा रहा हूँ!” तुम जाकर बुजुर्ग व्यक्ति की मदद करते हो, और जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है, तो वह तुम्हारी प्रशंसा करते हुए कहता है : “तुम वाकई एक अच्छे इंसान हो, बेटे। सुरक्षित और प्रसन्न रहो और दीर्घायु हो!” वह तुम पर इन मधुर वचनों की वर्षा करता है, जिन्हें सुनने के बाद तुम्हारी सारी चिंताएँ दूर हो जाती हैं और तुम प्रसन्न हो जाते हो। तुम्हें लगता है कि लोगों की मदद करना अच्छा है, और तुम अपने खाली समय में सड़कों पर जाकर गिरने वाले किसी भी व्यक्ति को उसके पैरों पर खड़े होने में मदद करने का संकल्प लेते हो। लोग इस प्रकार की सोच के प्रभाव में कुछ अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, और मानव-समाज ने इसे दूसरों की मदद करने में खुशी पाने की अच्छी परंपरा और उस महान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले एक प्रकार के उत्कृष्ट नैतिक चरित्र के रूप में वर्गीकृत किया है। दूसरों की मदद करने में खुशी पाने का उप-संदर्भ यह है कि मदद करने वाले आम तौर पर खुद को नैतिकता का शिखर मानते हैं। वे खुद को महान परोपकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और जितनी अधिक लोग उनकी प्रशंसा करते हैं, उतना ही वे दूसरों की मदद करने, दान देने और उनके लिए और अधिक करने के इच्छुक होते हैं। यह नायक और मानवता का रक्षक बनने की उनकी इच्छा और साथ ही दूसरों के लिए अपने जरूरी होने से एक प्रकार की संतुष्टि प्राप्त करने की उनकी इच्छा भी पूरी करता है। क्या सभी मनुष्य अपना जरूरी होना महसूस नहीं करना चाहते? जब लोग दूसरों के लिए अपना जरूरी होना महसूस करते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे विशेष रूप से उपयोगी हैं और उनका जीवन सार्थक है। क्या यह महज एक तरह का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास नहीं है? ध्यान आकर्षित करना ही एकमात्र ऐसी चीज है जो लोगों को खुशी देती है—यह उनके जीने का तरीका है। दरअसल, दूसरों की मदद करने में खुशी पाने के मामले को हम चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखें, यह मनुष्य की नैतिकता के मूल्यांकन का कोई मानक नहीं है। अक्सर, दूसरों की मदद करने में खुशी पाने के लिए वास्तव में सिर्फ थोड़े से प्रयास की आवश्यकता होती है। अगर तुम ऐसा करने के इच्छुक होते हो, तो तुम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी कर लोगे; अगर तुम ऐसा करने के इच्छुक नहीं होते, तो कोई तुम्हें जिम्मेदार नहीं ठहराएगा और तुम सार्वजनिक निंदा के पात्र नहीं बनोगे। जब उन अच्छे व्यवहारों की बात आती है जिनकी मनुष्य सराहना करता है, तो व्यक्ति उनका अभ्यास करना या वैसा करने से बचना चुन सकता है, दोनों ही विकल्प ठीक हैं। लोगों को इस कहावत से बाध्य करने या उन्हें यह सीखने के लिए विवश करने की जरूरत नहीं कि “दूसरों की मदद करने में खुशी” कैसे पाएँ, क्योंकि यह अपने आप में एक क्षणिक अच्छा व्यवहार है। चाहे कोई व्यक्ति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने की इच्छा से प्रेरित हो या नागरिक-गुण की भावना से इस अच्छे व्यवहार का अभ्यास करता हो, अंतिम परिणाम क्या होगा? वह बस एक अच्छा इंसान बनने और इस एक उदाहरण में लेई फेंग की भावना को मूर्त रूप देने की अपनी इच्छा पूरी कर रहा होगा; ऐसा करने से वह कुछ खुशी और सुकून पाएगा, और इस तरह अपनी सोच का दायरा ऊँचे स्तर पर ले जाएगा। बस, इतना ही। उसके कार्य का यही सार है। तो, इस संगति से पहले “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” कहावत के बारे में तुम लोगों की क्या समझ थी? (मैं पहले इसके पीछे के स्वार्थपूर्ण और घृणित इरादे नहीं पहचान पाया था।) एक परिदृश्य लो, जिसमें कुछ करना तुम्हारा कर्तव्य है, एक जिम्मेदारी जिससे तुम्हें बचना नहीं चाहिए, ऐसी चीज जो काफी कठिन है, और तुम्हें उसे पूरा करने के लिए थोड़ा कष्ट सहना होगा, कुछ चीजें त्यागनी होंगी और एक कीमत चुकानी होगी, लेकिन तुम फिर भी यह जिम्मेदारी पूरी करने में सक्षम हो। इसे करते हुए तुम उतना प्रसन्न महसूस नहीं करोगे, और कीमत चुकाने और यह जिम्मेदारी पूरी करने के बाद तुम्हारे श्रम के परिणाम तुम्हें कोई खुशी या सुकून नहीं देंगे, लेकिन चूँकि यह तुम्हारी जिम्मेदारी और कर्तव्य था, तुमने फिर भी इसे निभाया। अगर हम इसकी तुलना दूसरों की मदद करने में खुशी पाने से करें, तो कौन अधिक मानवता प्रदर्शित करता है? (अपनी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य पूरे करने वाले लोगों में अधिक मानवता होती है।) दूसरों की मदद करने में खुशी पाना कोई जिम्मेदारी पूरी करना नहीं है—यह सिर्फ लोगों के नैतिक आचरण और सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर एक अपेक्षा है, जो कुछ सामाजिक संदर्भों में मौजूद रहती है; यह लोकप्रिय राय, सामाजिक नैतिकताओं, या यहाँ तक कि किसी देश के कानूनों से आती है, और यह व्यक्ति में नैतिकताओं के होने या न होने और उसकी मानवता की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के काम आती है। दूसरे शब्दों में, “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” सिर्फ एक कहावत है जो लोगों के व्यवहार को सीमित करती है, जिसे मानव-समाज ने मनुष्य की सोच के दायरे को ऊँचा उठाने के लिए आगे रखा है। ऐसी कहावत का उपयोग सिर्फ लोगों से कुछ अच्छे व्यवहारों का अभ्यास कराने के लिए किया जाता है, और उन अच्छे व्यवहारों के मूल्यांकन के मानक सामाजिक नैतिकताएँ, सार्वजनिक राय, यहाँ तक कि कानून भी हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम सार्वजनिक स्थान पर किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जिसे मदद की जरूरत है और तुम पहले व्यक्ति हो जिसे उसकी मदद करने जाना चाहिए, लेकिन तुम नहीं जाते, तो दूसरे तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे? वे तुममें शिष्टाचार की कमी होने को लेकर तुम्हें फटकारेंगे—क्या जनमत से हमारा यही तात्पर्य नहीं है? (हाँ, यही है।) तो फिर सामाजिक नैतिकताएँ क्या हैं? वे वो सकारात्मक और उर्ध्वमुखी चीजें और आदतें हैं जिन्हें समाज बढ़ावा देता और प्रोत्साहित करता है। स्वाभाविक रूप से, उनमें कई विशिष्ट अपेक्षाएँ शामिल हैं, उदाहरण के लिए : कमजोर लोगों का समर्थन करना, दूसरों के कठिनाइयों का सामना करने पर मदद के लिए हाथ बढ़ाना, और सिर्फ हाथ पर हाथ धरे न बैठे रहना। लोगों से ऐसे नैतिक आचरण का अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती है, यही सामाजिक नैतिकताएँ होने का अर्थ है। अगर तुम किसी को पीड़ित देखते हो और इससे आँखें मूँद लेते हो, उसे अनदेखा कर देते हो और कुछ नहीं करते, तो तुममें सामाजिक नैतिकताओं की कमी है। तो, कानून मनुष्य के नैतिक आचरण से क्या अपेक्षा करता है? चीन इस संबंध में एक विशेष मामला है : चीनी कानून में सामाजिक जिम्मेदारियों और सामाजिक नैतिकताओं के संबंध में कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं। लोग इन चीजों के बारे में अपने पारिवारिक लालन-पालन, स्कूली शिक्षा, और जो कुछ वे समाज से सुनते और देखते हैं, उसके माध्यम से थोड़ा-बहुत सीखते हैं। इसके विपरीत, पश्चिमी देशों में ये चीजें कानून में निहित हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम देखते हो कि कोई सड़क पर गिर गया है, तो कम से कम तुम्हें उसके पास जाकर पूछना चाहिए, “क्या तुम ठीक हो? क्या तुम्हें मदद की जरूरत है?” अगर वह व्यक्ति उत्तर देता है, “मैं ठीक हूँ, धन्यवाद,” तो तुम्हें उसकी मदद करने की जरूरत नहीं है, तुमसे वह जिम्मेदारी निभाना अपेक्षित नहीं है। अगर वह कहता है, “मुझे मदद की जरूरत है,” तो तुम्हें उसकी मदद करनी होगी। अगर तुम उसकी मदद नहीं करते, तो तुम्हें कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह एक विशेष अपेक्षा है, जो कुछ देशों ने लोगों के नैतिक आचरण के संबंध में रखी है; वे अपने कानूनों में स्पष्ट व्यवस्थाओं के माध्यम से लोगों से यह अपेक्षा रखते हैं। जनमत, सामाजिक नैतिकताओं, और यहाँ तक कि कानून के अनुसार भी लोगों के नैतिक आचरण से की गई ये अपेक्षाएँ सिर्फ लोगों के व्यवहार तक ही सीमित हैं, और ये बुनियादी व्यवहारगत कसौटियाँ वे मानक हैं जिनके द्वारा व्यक्ति के नैतिक आचरण का मूल्यांकन किया जाता है। सतही तौर पर, ये नैतिक मानक लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करते प्रतीत होते हैं—दूसरे शब्दों में, लोगों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं—लेकिन अपने सार में, वे लोगों की आंतरिक गुणवत्ता का मूल्यांकन कर रहे होते हैं। चाहे जनमत हो, सामाजिक नैतिकताएँ हो या कानून, ये चीजें सिर्फ उन चीजों को मापती या उनके बारे में अपेक्षाएँ रखती हैं जो लोग करते हैं, और ये माप और अपेक्षाएँ लोगों के व्यवहार तक ही सीमित हैं। वे व्यक्ति की गुणवत्ता और नैतिक आचरण का मूल्यांकन उसके व्यवहार के आधार पर करती हैं—यही उनके मूल्यांकन का दायरा है। यही इस कथन की प्रकृति है : “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ।” जब दूसरों की मदद करने में खुशी पाने की बात आती है, तो पश्चिमी देश कानून की व्यवस्थाओं के माध्यम से लोगों से अपेक्षाएँ रखते हैं, जबकि चीन में इन विचारों से लोगों को शिक्षित और अनुकूलित करने के लिए परंपरागत संस्कृति का उपयोग किया जाता है। हालाँकि पूरब और पश्चिम के बीच यह अंतर है, फिर भी प्रकृति में वे समान हैं—दोनों ही लोगों के व्यवहार और नैतिकता को संयमित और विनियमित करने के लिए कहावतों का उपयोग करते हैं। लेकिन, चाहे पश्चिमी देशों के कानून हों या पूरब की परंपरागत संस्कृति, ये सभी मनुष्य के व्यवहार और नैतिक आचरण से की गई अपेक्षाएँ और विनियम हैं, और ये कसौटियाँ सिर्फ लोगों के व्यवहार और नैतिक आचरण को नियंत्रित करती हैं—लेकिन क्या इनमें से कोई भी मनुष्य की मानवता को लक्ष्य बनाती है? जो नियम सिर्फ यह निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति को कौन-से व्यवहार करने चाहिए, क्या उनका उपयोग उसकी मानवता के मूल्यांकन के लिए मानकों के रूप में किया जा सकता है? (नहीं।) अगर हम “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” कहावत को देखें, तो कुछ बुरे लोग दूसरों की मदद करने में खुशी पाने में सक्षम होते हैं, लेकिन वे अपने इरादों और लक्ष्यों से प्रेरित होते हैं। जब शैतान कोई छोटा-मोटा अच्छा कर्म करते हैं, तो ऐसा करने में उनके इरादे और लक्ष्य होने की संभावना और भी अधिक होती है। क्या तुम लोगों को लगता है कि दूसरों की मदद करने में खुशी पाने वाला हर व्यक्ति सत्य का प्रेमी होता है जिसमें न्याय की भावना होती है? उन लोगों को लो, जो चीन में कथित रूप से दूसरों की मदद करने में खुशी पाते हैं, जैसे शूरवीर लोग, या वे लोग जो अमीरों से लूटकर गरीबों को दे देते हैं, या वे जो अक्सर कमजोर वर्गों और विकलांगों की सहायता के लिए आगे आते हैं, इत्यादि—क्या उन सबमें मानवता होती है? क्या वे सभी सकारात्मक चीजें पसंद करते हैं और उनमें न्याय की भावना होती है? (नहीं।) ज्यादा से ज्यादा, वे न्यायसंगत लोग हैं, जिनका चरित्र अपेक्षाकृत बेहतर है। चूँकि वे दूसरों की मदद करने में खुशी पाने की इस भावना से नियंत्रित होते हैं, इसलिए वे कई अच्छे कर्म करते हैं, जो उन्हें खुशी और सुकून देते हैं और उन्हें पूरी तरह से खुशी की भावना का आनंद लेने देते हैं, लेकिन ऐसे व्यवहारों का अभ्यास करने का मतलब यह नहीं कि उनमें मानवता है, क्योंकि उनकी आस्था और जो कुछ वे आध्यात्मिक स्तर पर करते हैं, दोनों अस्पष्ट होते हैं, वे अज्ञात परिवर्तनशील वस्तुएँ हैं। तो, क्या उन्हें इस अच्छे नैतिक आचरण के आधार पर मानवता और जमीर वाले लोग माना जा सकता है? (नहीं।) कमजोर वर्गों और विकलांगों की सहायता करने वाली, फाउंडेशन और कल्याण एजेंसियों जैसी कुछ संस्थाएँ, जो कथित रूप से दूसरों की मदद करने में खुशी पाती हैं, ज्यादा से ज्यादा, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का कुछ हिस्सा पूरा कर रही होती हैं। वे जनता की नजरों में अपनी छवि सुधारने, अपनी पहुँच बढ़ाने और दूसरों की मदद करने में खुशी पाने की मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए ये चीजें करती हैं—यह बिल्कुल भी यह दर्शाने के स्तर तक नहीं पहुँचता कि उनमें “मानवता है।” इसके अलावा, जिन लोगों की मदद करने में वे खुशी पाते हैं, क्या उन्हें वाकई मदद की जरूरत होती है? क्या दूसरों की मदद करने में खुशी पाना अपने आप में उचित है? आवश्यक रूप से नहीं। अगर तुम लंबे समय तक पूरे समाज में होने वाली विभिन्न छोटी-बड़ी घटनाओं का सर्वेक्षण करो, तो तुम देखोगे कि उनमें से कुछ तो पूरी तरह से लोगों के दूसरों की मदद करने में खुशी पाने का मामला है, जबकि लोगों के दूसरों की मदद करने में खुशी पाने के कई अन्य उदाहरणों में समाज के और भी अनकहे रहस्य और काले पहलू छिपे हैं। जो भी हो, दूसरों की मदद करने में खुशी पाने के पीछे इरादे और लक्ष्य होते हैं, चाहे वह प्रसिद्ध होना और बाकी लोगों से ऊपर उठना हो या सामाजिक नैतिकताओं का पालन करना और कानून न तोड़ना या बड़े पैमाने पर समाज से ज्यादा सकारात्मक मूल्यांकन प्राप्त करना। चाहे व्यक्ति इसे जैसे भी देखे, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सिर्फ मनुष्य के बाहरी व्यवहारों में से एक है और ज्यादा से ज्यादा यह एक प्रकार का अच्छा नैतिक आचरण है। इसका उस सामान्य मानवता से कोई लेना-देना नहीं है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है। जो लोग दूसरों की मदद करने में खुशी पाने में सक्षम हैं, वे कोई वास्तविक महत्वाकांक्षा न रखने वाले औसत लोग हो सकते हैं, या वे समाज में प्रमुख व्यक्ति हो सकते हैं; वे अपेक्षाकृत दयालु लोग हो सकते हैं, लेकिन वे हृदय से दुर्भावनापूर्ण भी हो सकते हैं। वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हो सकते हैं, और सभी लोग क्षणिक रूप से इस व्यवहार का अभ्यास करने में सक्षम हैं। इसलिए, नैतिक आचरण के बारे में यह कथन, “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ,” निश्चित रूप से लोगों की मानवता का मूल्यांकन करने का मानक होने लायक नहीं है।

“दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ”—नैतिक आचरण के बारे में यह कहावत वास्तव में लोगों की मानवता का सार नहीं दर्शाती, और लोगों के प्रकृति-सार से इसका बहुत कम संबंध है। इसलिए, किसी की मानवता की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए इसका उपयोग करना अनुचित है। तो, किसी की मानवता का मूल्यांकन करने का उचित तरीका क्या है? कम से कम, जिस व्यक्ति में मानवता है, उसे किसी की मदद करने या अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने या न करने का निर्णय इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि ऐसा करने से उसे खुशी महसूस होगी या नहीं; इसके बजाय, उसका निर्णय उसके जमीर और विवेक पर आधारित होना चाहिए, और उसे इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि उसे क्या हासिल होगा, या उस व्यक्ति की मदद करने से उसे क्या परिणाम प्राप्त होंगे, या भविष्य में उस पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है। उसे इनमें से किसी भी चीज पर विचार नहीं करना चाहिए, और उसे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए, दूसरों की मदद करनी चाहिए और दूसरों को पीड़ा अनुभव करने से बचाना चाहिए। उसे बिना किसी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य के, शुद्ध तरीके से लोगों की मदद करनी चाहिए—जिस व्यक्ति में वास्तव में मानवता है, वह यही करेगा। अगर दूसरों की मदद करने में व्यक्ति का लक्ष्य खुद को खुश करना या अपने लिए अच्छी प्रतिष्ठा बनाना है, तो इसमें एक स्वार्थपूर्ण और निम्न गुणवत्ता है—जिन लोगों में वास्तव में जमीर और विवेक है, वे इस तरह से कार्य नहीं करेंगे। जिन लोगों में दूसरों के प्रति सच्चा प्यार होता है, वे सिर्फ एक निश्चित ढंग से महसूस करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए कार्य नहीं करते, बल्कि वे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने और दूसरों की मदद करने के लिए यथाशक्ति सब-कुछ करने के मकसद से ऐसा करते हैं। वे इनाम पाने के लिए लोगों की मदद नहीं करते और उनका कोई अन्य इरादा या मकसद नहीं होता। भले ही इस तरह से कार्य करना कठिन हो सकता है, और भले ही दूसरे उनकी आलोचना कर सकते हैं, या यहाँ तक कि उन्हें थोड़े खतरे का भी सामना करना पड़ सकता है, फिर भी वे मानते हैं कि यह वह कर्तव्य है जिसे लोगों को पूरा करना चाहिए, कि यह लोगों की जिम्मेदारी है, और अगर वे इस तरह कार्य नहीं करते तो वे दूसरों और परमेश्वर के प्रति अपना कर्ज नहीं चुका पाएँगे और उन्हें जीवन भर पछताना पड़ेगा। इस प्रकार, वे बिना किसी हिचकिचाहट के आगे बढ़ते हैं, भरसक प्रयास करते हैं, स्वर्ग की इच्छा का पालन करते हैं और अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं। चाहे दूसरे उनका कैसे भी मूल्यांकन करें, या दूसरे उनके प्रति कृतज्ञता दिखाएँ या नहीं और उनका सम्मान करें या नहीं, अगर वे उस व्यक्ति की मदद करने के लिए वह सब कर पाते हैं जो उन्हें करने की जरूरत है, और पूरे दिल से ऐसा कर पाते हैं, तो वे संतुष्ट महसूस करेंगे। जो लोग इस तरह से कार्य करने में सक्षम हैं, उनमें जमीर और विवेक है, उनमें मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं, न कि सिर्फ एक प्रकार का व्यवहार, जो नैतिक चरित्र और नैतिक आचरण के दायरे तक सीमित है। दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सिर्फ एक प्रकार का व्यवहार है और कभी-कभी यह सिर्फ एक ऐसा व्यवहार होता है जो कुछ विशिष्ट संदर्भों में उत्पन्न होता है; व्यक्ति का इस प्रकार के क्षणिक व्यवहार में संलग्न होने का निर्णय उसकी मनोदशा, भावनाओं, सामाजिक परिवेश और साथ ही तात्कालिक संदर्भ और उस तरह से कार्य करने से हो सकने वाले फायदों या कमियों के आधार पर लिया गया होता है। मानवता वाले लोग दूसरों की मदद करते समय इन बातों पर विचार नहीं करते—वे न्याय के ऐसे मानक के आधार पर अपना निर्णय लेते हैं जो ज्यादा सकारात्मक और सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप होता है। कभी-कभी वे तब भी लोगों की मदद करने में सक्षम होते हैं, जब ऐसा करना नैतिकता के मानकों के विपरीत और विरुद्ध होता है। नैतिकता की कसौटियाँ, विचार और दृष्टिकोण सिर्फ लोगों के क्षणिक व्यवहार को रोक सकते हैं। और ये व्यवहार अच्छे हैं या बुरे, यह व्यक्ति की मनोदशा, भावनाओं, उनके भीतर की अच्छाई और बुराई, और उनके क्षणिक अच्छे या बुरे इरादों के आधार पर बदल जाएगा; स्वाभाविक रूप से, सामाजिक माहौल और परिवेश का भी इस पर प्रभाव पड़ेगा। इन व्यवहारों के भीतर अनेक अशुद्धियाँ हैं; ये सब सतही व्यवहार हैं, और लोग इनका इस्तेमाल करके यह निर्णय नहीं कर सकते कि किसी व्यक्ति में मानवता है या नहीं। इसके विपरीत, व्यक्ति में मानवता है या नहीं, इसका निर्णय उसके मानवता-सार, वह किसका अनुसरण करता है, जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण और उसकी मूल्य-व्यवस्था, जिस मार्ग पर वह चलता है, और उसके आचरण और क्रियाकलापों के आधार पर करना कहीं ज्यादा सटीक और व्यावहारिक है। मुझे बताओ, सत्य के अनुरूप क्या है : मानवता के मूल्यांकन के आधार या नैतिक आचरण के मूल्यांकन के आधार? नैतिक आचरण के मूल्यांकन के मानक सत्य के अनुरूप हैं, या यह मूल्यांकन करने के मानक कि व्यक्ति में मानवता है या नहीं? इनमें से कौन-सा मानक सत्य के अनुरूप है? वास्तव में, यह मूल्यांकन करने के मानक कि व्यक्ति में मानवता है या नहीं, सत्य के अनुरूप हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है। लोगों के नैतिक आचरण का मूल्यांकन करने के लिए उपयोग की जाने वाली चीजें कसौटी के रूप में काम क्यों नहीं कर सकतीं, इसका कारण यह है कि वे अस्थिर हैं। वे कई अशुद्धियों से भरी हुई हैं, जैसे कि लोगों के लेन-देन, रुचियाँ, प्राथमिकताएँ, अनुसरण, भावनाएँ, बुरे विचार, भ्रष्ट स्वभाव इत्यादि। उनके भीतर बहुत सारी गलतियाँ और अशुद्धियाँ हैं—वे सीधी-सच्ची नहीं हैं। इसलिए, वे लोगों को परखने की कसौटी के रूप में काम नहीं कर सकतीं। वे उन तमाम तरह की चीजों से, जो शैतान मनुष्य में डालता है, और उन अतिरिक्त स्थितियों से भरी हुई हैं, जो मनुष्य के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के कारण उत्पन्न होती हैं, और इस तरह, वे सत्य नहीं हैं। संक्षेप में, चाहे लोग नैतिक आचरण की इन कसौटियों को पूरा करना सरल मानें या कठिन, या चाहे लोग उन्हें उच्च मूल्य का मानें या निम्न या औसत मूल्य का, हर हाल में वे सब सिर्फ कहावतें हैं, जो लोगों के व्यवहार को संयमित और नियंत्रित करती हैं। वे सिर्फ मनुष्य की नैतिक गुणवत्ता के स्तर तक ऊपर उठती हैं; उनका परमेश्वर की इस अपेक्षा से थोड़ा-सा भी संबंध नहीं है कि व्यक्ति की मानवता का आकलन करने के लिए सत्य का उपयोग किया जाए। उनमें वे सबसे बुनियादी मानक भी शामिल नहीं हैं, जो मानवता वाले लोगों में होने चाहिए और जो उन्हें पूरे करना चाहिए; वे उन सभी चीजों से कम रह जाती हैं। दूसरों को देखते समय लोग सिर्फ उनके नैतिक आचरण के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं; वे अन्य लोगों को पूरी तरह से परंपरागत संस्कृति की अपेक्षाओं के अनुसार देखते और उनका मूल्यांकन करते हैं। परमेश्वर लोगों को सिर्फ उनके नैतिक आचरण के प्रदर्शन के आधार पर नहीं देखता—वह उनके मानवता-सार पर ध्यान केंद्रित करता है। व्यक्ति के मानवता-सार में क्या शामिल है? उसकी प्राथमिकताएँ, चीजों के बारे में उसके विचार, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण और उसकी मूल्य-व्यवस्था, वह किसका अनुसरण करता है, क्या उसमें न्याय की भावना है, क्या वह सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, सत्य स्वीकारने और उसके प्रति समर्पित होने की उसकी क्षमता, वह मार्ग जो वह चुनता है, इत्यादि। व्यक्ति के मानवता-सार का आकलन इन चीजों के अनुसार करना सटीक है। यह दूसरों की मदद करने में खुशी पाने के विषय पर मेरी संगति का कमोबेश समापन करता है। नैतिक आचरण के बारे में इन दो अपेक्षाओं पर इस संगति के माध्यम से क्या अब तुम्हें नैतिक आचरण का मूल्यांकन करने के तरीके, और साथ ही लोगों का मूल्यांकन करने के परमेश्वर के मानकों और मनुष्य जिस नैतिक आचरण के बारे में बात करता है उनके बीच अंतर को लेकर विवेक के बुनियादी सिद्धांतों की समझ है? (हाँ।)

मैंने अभी परंपरागत संस्कृति द्वारा मनुष्य के नैतिक आचरण पर रखी गई दो माँगों के बारे में संगति की है, “उठाए हुए पैसे जेब में मत रखो,” और “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ।” इन दो कहावतों पर मेरी संगति से तुम लोगों ने क्या सीखा है? (मैंने सीखा कि लोगों का नैतिक आचरण उनकी मानवता के सार से जुड़ा नहीं है। ज्यादा से ज्यादा, इस तरह का नैतिक आचरण प्रदर्शित करने वाले लोगों में अपनी नैतिकता की गुणवत्ता के संदर्भ में कुछ अच्छे व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ होती हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उनमें मानवता है या वे इंसान की तरह जीते हैं। मुझे इस मुद्दे की कुछ हद तक स्पष्ट समझ प्राप्त हुई है।) अच्छे नैतिक आचरण का प्रदर्शन करने वाले लोगों में मानवता होना अनिवार्य नहीं—सभी इसे पहचान सकते हैं, और बेशक, चीजें ऐसी ही हैं। सभी लोग समाज की बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हैं और वे सभी धीरे-धीरे अपना जमीर और विवेक खो चुके हैं—कुछ ही लोग इंसानों की तरह जी पाते हैं। क्या हर वह व्यक्ति, जिसने कभी फुटपाथ पर मिला एक सिक्का तक पुलिस को सौंप दिया था, अच्छा इंसान बन गया? आवश्यक रूप से नहीं। जिनकी कभी नायक के रूप में प्रशंसा की जाती थी, उनका बाद में क्या हश्र हुआ? अपने हृदय में सभी लोग इन प्रश्नों के उत्तर जानते हैं। सामाजिक नैतिकता के उन आदर्श लोगों और भव्य परोपकारियों का क्या हुआ, जो अक्सर दूसरों की मदद करने में खुशी पाया करते थे, जो लाल फूलों से सुशोभित किए जाते थे और जिन्हें मनुष्य सराहता था? उनमें से अधिकांश लोग अच्छे नहीं निकले। उन्होंने मशहूर होने के लिए जानबूझकर कुछ अच्छे काम किए। वास्तव में, उनका अधिकांश वास्तविक व्यवहार, जीवन और चरित्र बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। एकमात्र चीज, जिसमें वे वास्तव में अच्छे हैं, वह है चापलूसी और चाटुकारिता। जब वे अपने लाल फूलों और सामाजिक नैतिकता के आदर्श होने का सतही मुलम्मा उतार देते हैं, तो उन्हें यह भी नहीं पता होता कि आचरण कैसे करना है या उन्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। यहाँ क्या समस्या है? क्या वे समाज द्वारा दिए गए “नैतिक आदर्श” के ताज के कारण फँस नहीं गए हैं? वे वास्तव में नहीं जानते कि वे क्या हैं—उनकी इतनी ज्यादा चापलूसी की गई है कि वे खुद को बहुत महान समझने लगे हैं और अब सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकते। अंत में, वे यह भी नहीं जानते कि कैसे जीना है, उनका दिन-प्रतिदिन का जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है, और कुछ को शराब की लत लग जाती है, वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं। निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं, जो इस श्रेणी में आते हैं। वे हमेशा एक भावना का पीछा करते रहते हैं, नायक और मिसाल बनने, प्रसिद्ध होने या नैतिक उत्कृष्टता के शिखर होने की कामना करते हैं। वे कभी वास्तविक दुनिया में नहीं लौट सकते; वास्तविक जीवन की दैनिक आवश्यकताएँ उनके लिए परेशानी और पीड़ा का एक सतत स्रोत होती हैं। वे नहीं जानते कि इस दर्द से कैसे छुटकारा पाया जाए या जीवन में सही मार्ग कैसे चुना जाए। रोमांच की तलाश में कुछ लोग नशे की ओर मुड़ जाते हैं, जबकि दूसरे लोग खोखलेपन की भावनाओं से बचने के लिए अपनी जिंदगी खत्म करने का विकल्प चुन लेते हैं। उनमें से कुछ, जो आत्महत्या नहीं करते, अक्सर अवसाद से मर जाते हैं। क्या इसके कई उदाहरण नहीं हैं? (हैं।) परंपरागत संस्कृति लोगों को इसी तरह की क्षति पहुँचाती है। यह न सिर्फ लोगों को मानवता की सटीक समझ प्राप्त नहीं करने देती, न ही उन्हें उस मार्ग पर ले जाती है जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए—यही नहीं—यह वास्तव में उन्हें भटकाती है, उन्हें भ्रम और कल्पना के क्षेत्र की ओर ले जाती है। यह लोगों को नुकसान पहुँचाती है और काफी गहरे तरीके से पहुँचाती है। कुछ लोग कह सकते हैं : “यह सभी मामलों में सच नहीं है! हमारा सब-कुछ बिल्कुल अच्छा चल रहा है, है न?” क्या यह तथ्य कि तुम लोग अभी अच्छे हाल में हो, सिर्फ परमेश्वर की सुरक्षा का परिणाम नहीं है? सिर्फ इसलिए कि परमेश्वर ने तुम लोगों को चुना और तुम लोगों को उसकी सुरक्षा प्राप्त है, तुम इतने भाग्यशाली रहे कि तुमने उसका कार्य स्वीकारा, और तुम उसके वचन पढ़ सकते हो, सभाओं में भाग ले सकते हो, संगति का आदान-प्रदान कर सकते हो और यहाँ अपना कर्तव्य निभा सकते हो; यह सिर्फ उसकी सुरक्षा के कारण है कि तुम एक सामान्य इंसान का जीवन जी सकते हो और अपने दैनिक जीवन के सभी पहलुओं से निपटने के लिए सामान्य विवेक रख सकते हो। हालाँकि, यह निर्विवाद है कि तुम लोगों के दिमाग की गहराइयों में अभी भी ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं : “उठाए हुए पैसे जेब में मत रखो” और “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ।” साथ ही, तुम लोग अभी भी मनुष्य से आने वाले इन वैचारिक और नैतिक मानदंडों की कैद में हो। मैं यह क्यों कहता हूँ कि तुम लोग इन चीजों की कैद में हो? क्योंकि तुम लोग जीवन में जो मार्ग चुनते हो; तुम्हारे क्रियाकलापों और आचरण के सिद्धांत और दिशा; और वे सभी सिद्धांत, तरीके और मानदंड जिनके द्वारा तुम लोगों और चीजों को देखते हो; इत्यादि, अभी भी अलग-अलग सीमा तक इन वैचारिक और नैतिक मानदंडों से प्रभावित हैं, यहाँ तक कि उनसे बँधे हुए और नियंत्रित भी हैं। जबकि परमेश्वर के वचन और सत्य अभी भी लोगों और चीजों के बारे में तुम लोगों के विचारों, और तुम्हारे आचरण और क्रियाकलापों का आधार और मानदंड नहीं बन पाए हैं। अभी तक, तुम लोगों ने जीवन में सिर्फ सही दिशा चुनी है और तुम लोगों में सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलने की इच्छा, आकांक्षा और आशा है। लेकिन वास्तव में, तुम लोगों में से अधिकांश इस मार्ग पर बिल्कुल भी कदम नहीं रखा है—दूसरे शब्दों में, तुम लोगों ने अभी तक उस सही मार्ग पर कदम तक नहीं रखा है, जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है। कुछ लोग कहेंगे : “अगर हमने सही मार्ग पर कदम नहीं रखा है, तो हम फिर भी अपने कर्तव्य पूरे करने में सक्षम क्यों हैं?” यह मनुष्य के चुनाव, सहयोग, जमीर और इच्छा का परिणाम है। अभी, तुम परमेश्वर की माँगों के साथ सहयोग कर रहे हो और सुधरने की पूरी कोशिश कर रहे हो, लेकिन सिर्फ इसलिए कि तुम सुधरने की कोशिश कर रहे हो, इसका यह मतलब नहीं कि तुम पहले ही सत्य के अनुसरण के मार्ग पर कदम रख चुके हो। इसका एक कारण यह है कि तुम लोग अभी भी उन विचारों से प्रभावित हो, जो परंपरागत संस्कृति ने तुम लोगों के मन में बैठाए हैं। उदाहरण के लिए, मुझे इन कथनों के बारे में संगति कर इन्हें उजागर करते सुनने के बाद तुम लोगों को इन कथनों के सार की अच्छी समझ हो सकती है, “उठाए हुए पैसे जेब में मत रखो,” और “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ,” लेकिन कुछ ही दिनों में तुम अपना मन बदल सकते हो। तुम सोचने लग सकते हो : “‘उठाए हुए पैसे जेब में मत रखो’ में ऐसा क्या बुरा है? मैं ऐसे लोगों को पसंद करता हूँ, जो उठाए हुए पैसे जेब में नहीं रखते। कम से कम वे लालची नहीं हैं। ‘दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ’ में क्या गलत है? कम से कम, जब तुम्हें जरूरत हो, तब तुम ऐसे व्यक्ति पर भरोसा कर सकते हो, जो तुम्हारी मदद के लिए हाथ बढ़ाता है। यह एक अच्छी बात है और यह ऐसी चीज है, जिसकी हर किसी को जरूरत पड़ती है! इसके अलावा, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो, लोगों का दूसरों की मदद करने में खुशी पाना एक अच्छी, सकारात्मक चीज है। यह हमारा आवश्यक कर्तव्य है और इसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए!” देखो, जागने के कुछ ही दिनों बाद, एक रात की नींद भी तुम्हें बदलने के लिए पर्याप्त होगी; यह तुम्हें वापस वहीं भेज देगी जहाँ तुम पहले थे, और तुम्हें एक बार फिर परंपरागत संस्कृति की कैद में लौटा देगी। दूसरे शब्दों में, तुम्हारे मन की गहराइयों में दर्ज ये चीजें समय-समय पर तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों को, और साथ ही तुम्हारे द्वारा चुने गए मार्गों को भी प्रभावित करती हैं। और अनिवार्य रूप से, जब वे तुम्हें प्रभावित कर रही होती हैं, तब वे तुम्हें लगातार पीछे खींच भी रही होती हैं, तुम्हें जीवन में सही मार्ग पर कदम रखने, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने, और जीवन में वह मार्ग अपनाने की अपनी इच्छा पूरी करने से रोक भी रही होती हैं, जहाँ परमेश्वर के वचन तुम्हारा आधार और सत्य तुम्हारी कसौटी हो। भले ही तुम इस मार्ग पर चलने के लिए बहुत इच्छुक हो, भले ही तुम ऐसा करने के लिए लालायित हो, और इसके बारे में चिंतित महसूस करो, और अपने दिन इसके लिए सोचने और योजना बनाने, संकल्प लेने और प्रार्थना करने में बिताओ, तो भी चीजें वैसी नहीं होंगी, जैसी तुम चाहते हो। इसका कारण यह है कि परंपरागत संस्कृति के ये पहलू तुम्हारे दिल की गहराइयों में बहुत गहराई तक जड़ें जमाए हुए हैं। कुछ लोग कह सकते हैं : “यह सही नहीं है! तुम कहते हो कि परंपरागत संस्कृति लोगों के दिलों में बहुत गहराई तक जड़ें जमाए हुए है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह सच है। मैं अभी सिर्फ बीसेक वर्ष का हूँ, सत्तर या अस्सी वर्ष का नहीं, तो ये चीजें मेरे दिल में पहले से ही गहरी जड़ें कैसे जमाए हो सकती हैं?” मैं यह क्यों कहता हूँ कि ये विचार पहले से ही तुम्हारे दिलों में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं? इसके बारे में सोचो : अपनी शुरुआती यादों के समय से ही तुम क्या हमेशा एक नेक इंसान बनने की आकांक्षा नहीं रखते थे, भले ही तुम्हारे माता-पिता ने तुममें ऐसे विचार न डाले हों? उदाहरण के लिए, अधिकांश लोग फिल्में देखना और नायकों के बारे में उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं, और वे इन कहानियों में पीड़ितों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते हैं, जबकि खलनायकों और दूसरे लोगों को चोट पहुँचाने वाले क्रूर पात्रों से घृणा करते हैं। जब तुम इस प्रकार की पृष्ठभूमि में बड़े होते हो, तो तुम अनजाने ही वे चीजें स्वीकार लेते हो, जिन पर सामान्य समाज सामूहिक रूप से सहमत होता है। तो, तुमने वे चीजें क्यों स्वीकारीं? क्योंकि लोग सत्य धारण किए हुए पैदा नहीं होते और उनमें चीजों को समझने की जन्मजात क्षमता नहीं होती। तुममें यह प्रवृत्ति नहीं है—मनुष्यों में जो प्रवृत्ति होती है, वह कुछ अच्छी, सकारात्मक और सक्रिय चीजों को पसंद करने की अंतर्निहित प्रवृत्ति है। ये सक्रिय और सकारात्मक चीजें तुमसे बेहतर करने, एक अच्छा, वीर और महान व्यक्ति बनने की आकांक्षा रखवाती हैं। जब तुम सार्वजनिक राय और सामाजिक नैतिकताओं से उपजी कहावतों के संपर्क में आते हो, तो ये चीजें धीरे-धीरे तुम्हारे दिल में आकार लेने लगती हैं। जब परंपरागत संस्कृति की नैतिकता से आने वाले कथन तुम्हारे मन में आकर तुम्हारी आंतरिक दुनिया में प्रवेश करते हैं, तो वे तुम्हारे दिल में जड़ें जमा लेते हैं और तुम्हारे जीवन पर हावी होने लगते हैं। जब ऐसा होता है, तो तुम इन चीजों को नहीं समझते, इनका विरोध नहीं करते या इन्हें नकारते नहीं, इसके बजाय तुम गहराई से महसूस करते हो कि तुम्हें उनकी जरूरत है। तुम्हारा पहला कदम इन कहावतों को बढ़ावा देना होता है। ऐसा क्यों होता है? चूँकि ये कहावतें लोगों की रुचियों और धारणाओं के बहुत अनुकूल होती हैं, इसलिए वे लोगों की आध्यात्मिक दुनिया की जरूरतों के अनुरूप होती हैं। नतीजतन, तुम इन कथनों को स्वाभाविक रूप से स्वीकार लेते हो और उनसे बिल्कुल भी सावधान नहीं रहते। धीरे-धीरे, अपने पारिवारिक लालन-पालन, स्कूली शिक्षा और समाज के अनुकूलन और शिक्षण के साथ-साथ अपनी कल्पनाओं के माध्यम से तुम गहराई से आश्वस्त हो जाते हो कि ये कहावतें सकारात्मक चीजें हैं। समय के शोधन के माध्यम से, और जैसे-जैसे तुम धीरे-धीरे बड़े होते जाते हो, तुम तमाम तरह के संदर्भों और स्थितियों में इन कहावतों का पालन करने का प्रयास करते हो, और इन चीजों का पालन करते हो, जिन्हें मनुष्य सहज रूप से पसंद करते और अच्छा मानते हैं। वे तेजी से तुम्हारे भीतर आकार ले लेती हैं और तुम्हारे भीतर ज्यादा से ज्यादा मोरचेबंदी कर लेती हैं। साथ ही, ये चीजें जीवन के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और तुम्हारे द्वारा अनुसरण किए जाने वाले लक्ष्यों पर हावी हो जाती हैं और वे मानक बन जाती हैं जिनके द्वारा तुम लोगों और चीजों का आकलन करते हो। जब परंपरागत संस्कृति की ये कहावतें लोगों के भीतर आकार ले लेती हैं, तो वे बुनियादी स्थितियाँ जो उन्हें परमेश्वर और सत्य का विरोध करने के लिए प्रेरित करती हैं, निर्मित हो जाती हैं; यह ऐसा है, मानो लोग ऐसा करने के लिए अपने कारण और अपना आधार ढूँढ़ लेते हों। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों के भ्रष्ट स्वभाव और उनका सार उजागर करता है और उन पर ताड़ना और न्याय की वर्षा करता है, तो लोग उसके बारे में तमाम तरह की धारणाएँ बना लेते हैं। वे सोचते हैं : “लोग अक्सर कहते हैं, ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो, तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों को उजागर करते हो, तो उनकी कमियाँ उजागर मत करो,’ और ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें,’ तो परमेश्वर वैसा कैसे बोल सकता है? क्या वह सचमुच परमेश्वर है? परमेश्वर इस तरह से नहीं बोलेगा—उसे नैतिकता से काम लेना चाहिए और लोगों से सौम्य स्वर में बात करनी चाहिए, बुद्ध के स्वर में, जो सभी मनुष्यों को पीड़ा से मुक्ति दिलाता है, बोधिसत्व के स्वर में। परमेश्वर ऐसा ही होता है—बेहद सौम्य और भव्य हस्ती।” विचारों, दृष्टिकोणों और धारणाओं की यह शृंखला लगातार बढ़ती मात्रा में तुम्हारे हृदय से निकलती रहती है, और अंततः, तुम इसे और सहन नहीं कर पाते और न चाहते हुए भी परमेश्वर के प्रति विद्रोह और उसका विरोध करने के लिए कुछ करते हो। इस तरह, तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से बरबाद हो जाते हो। इससे हम देख सकते हैं कि चाहे तुम्हारी उम्र कितनी भी हो, अगर तुमने परंपरागत संस्कृति की शिक्षा प्राप्त की है और तुम एक वयस्क की मानसिक क्षमता रखते हो, तो तुम्हारा दिल परंपरागत संस्कृति की नैतिकता के इन पहलुओं से भरा रहेगा और वे धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर मोरचेबंदी कर लेंगे। वे पहले ही तुम पर हावी हो चुके हैं और तुम पहले ही कई वर्षों से इन चीजों के अनुसार जीते रहे हो। तुम्हारे जीवन और तुम्हारी प्रकृति पर लंबे समय से परंपरागत संस्कृति की नैतिकता के इन पहलुओं द्वारा कब्जा किया जा चुका है। उदाहरण के लिए, पाँच-छह साल की उम्र से तुमने दूसरों की मदद करने में खुशी पाना और उठाए हुए पैसे जेब में न रखना सीख लिया है। इन चीजों ने तुम्हें प्रभावित किया और तुम्हारे व्यवहार करने के तरीके को पूरी तरह से निर्धारित किया। अब, एक मध्यम आयु-वर्ग के व्यक्ति के रूप में, तुम पहले ही कई वर्षों से इन चीजों के अनुसार जी चुके हो; इसका मतलब यह है कि तुम उन मानकों से बहुत दूर हो, जिनकी माँग परमेश्वर मनुष्य से करता है। जबसे तुमने परंपरागत संस्कृति द्वारा प्रचारित नैतिक आचरण संबंधी ये कहावतें स्वीकार की हैं, तबसे तुम परमेश्वर की माँगों से और भी ज्यादा भटक गए हो। तुम्हारे मानवता के मानकों और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानवता के मानकों के बीच का अंतर और भी बड़ा हो गया है। नतीजतन, तुम परमेश्वर से और भी ज्यादा दूर भटक गए हो। क्या ऐसा नही है? इन वचनों पर विचार करने में समय लगाओ।

आओ, अब नैतिक आचरण से संबंधित अगली कहावत पर संगति करते हैं—“अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो”—इस कहावत का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हें खुद से सख्त अपेक्षाएँ करनी चाहिए और दूसरे लोगों के साथ नरमी बरतनी चाहिए, ताकि वे देख सकें कि तुम कितने उदार और दरियादिल हो। तो, लोगों को ऐसा क्यों करना चाहिए? यह क्या हासिल करने के लिए है? क्या यह करने योग्य है? क्या यह वाकई लोगों की मानवता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है? इसे करने के लिए तुम्हें बहुत समझौता करना होगा! तुम्हें इच्छाओं और अपेक्षाओं से मुक्त होना चाहिए, खुद से कम आनंद महसूस करने, थोड़ा ज्यादा कष्ट उठाने, ज्यादा कीमत चुकाने और ज्यादा काम करने की अपेक्षा करनी चाहिए, ताकि दूसरों को खुद को थकाने की जरूरत न पड़े। और अगर दूसरे लोग ठिनठिनाते हैं, शिकायत करते हैं या खराब प्रदर्शन करते हैं, तो तुम्हें उनसे बहुत ज्यादा माँग नहीं करनी चाहिए—थोड़ा ऊपर नीचे चलता है। लोग मानते हैं कि यह उत्कृष्ट नैतिकताओं का चिह्न है—लेकिन यह मुझे झूठा क्यों लगता है? क्या यह झूठा नहीं है? (है।) सामान्य परिस्थितियों में, एक साधारण व्यक्ति की मानवता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति खुद के प्रति सहिष्णु और दूसरों के प्रति सख्त होना है। यह एक तथ्य है। लोग अन्य सबकी समस्याएँ समझ सकते हैं—“यह व्यक्ति अहंकारी है! वह व्यक्ति बुरा है! यह स्वार्थी है! वह अपना कर्तव्य निभाने के प्रति अनमना रहता है! यह व्यक्ति बहुत आलसी है!”—जबकि अपने बारे में वह सोचता है : “अगर मैं थोड़ा आलसी हूँ, तो क्या हुआ। मैं अच्छी काबिलियत वाला हूँ। भले ही मैं आलसी हूँ, लेकिन दूसरों से बेहतर काम करता हूँ!” वे दूसरों में दोष ढूँढ़ते और मीनमेख निकालना पसंद करते हैं, लेकिन अपने साथ वे, जहाँ भी संभव हो, सहिष्णु और अनुकूल होते हैं। क्या यह उनकी मानवता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति नहीं है? (है।) अगर लोगों से “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु” होने के विचार पर खरा उतरने की अपेक्षा की जाती है, तो उन्हें किस पीड़ा से गुजरना होगा? क्या वे सचमुच इसे सहन कर सकते हैं? कितने लोग ऐसा करने में कामयाब होंगे? (कोई नहीं।) और ऐसा क्यों है? (लोग प्रकृति से स्वार्थी होते हैं। वे इस सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हैं कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।”) वाकई, मनुष्य जन्मजात स्वार्थी है, वह एक स्वार्थी प्राणी है और इस शैतानी फलसफे के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध है : “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” लोग सोचते हैं कि जब चीजें उन पर आ पड़ें, तब उनके लिए स्वार्थी न होना और वह न करना जो वे अपने लिए सही समझते हैं, विनाशकारी और अप्राकृतिक होगा। लोग यही मानते हैं और वे इसी तरह कार्य करते हैं। अगर लोगों से यह अपेक्षा की जाए कि वे स्वार्थी न हों, खुद से सख्त अपेक्षाएँ करें, और दूसरों से फायदा उठाने के बजाय स्वेच्छा से हार जाएँ, तो क्या यह एक व्यावहारिक अपेक्षा है? अगर लोगों से अपेक्षा की जाए कि कोई उनका शोषण करे तो वे खुशी से कहें, “तुम मेरा शोषण कर रहे हो, लेकिन मैं इससे नाराज नहीं हो रहा। मैं एक सहिष्णु व्यक्ति हूँ, मैं तुम्हारी बुराई या तुमसे बदला लेने की कोशिश नहीं करूँगा, और अगर तुमने अभी तक मेरा पर्याप्त शोषण नहीं किया है, तो बेझिझक जारी रखो”—क्या यह एक व्यावहारिक अपेक्षा है? कितने लोग ऐसा करने में कामयाब हो सकेंगे? क्या भ्रष्ट मनुष्य सामान्य रूप से इसी तरह व्यवहार करता है? जाहिर है, ऐसा होना असंगत है। ऐसा क्यों है? क्योंकि भ्रष्ट स्वभाव वाले लोग, खासकर स्वार्थी और मतलबी लोग, अपने ही हितों के लिए संघर्ष करते हैं, और दूसरों के बारे में सोचने से उन्हें बिल्कुल भी संतुष्टि महसूस नहीं होगी। इसलिए यह घटना, अगर घटती भी है तो, एक असंगति है। “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो”—नैतिक आचरण के बारे में यह दावा स्पष्ट रूप से केवल एक अपेक्षा है, जो तथ्यों या मानवता से मेल नहीं खाती, जो मानवता को न समझने वाले सामाजिक नैतिकतावादियों द्वारा मनुष्य पर थोपी जाती है। यह चूहे को यह कहने जैसा है कि उसे बिल बनाने की अनुमति नहीं है या बिल्ली से यह कहने जैसा है कि उसे चूहे पकड़ने की अनुमति नहीं है। क्या इस तरह की अपेक्षा करना सही है? (नहीं। यह मानवता के नियमों की अवहेलना करता है।) यह अपेक्षा स्पष्ट रूप से वास्तविकता के अनुरूप नहीं है और बहुत खोखली है। यह अपेक्षा करने वाले लोग क्या खुद इसका पालन करने में सक्षम हैं? (नहीं।) वे दूसरों से उस अपेक्षा का पालन करने की उम्मीद करते हैं, जिसे वे खुद पूरा नहीं कर सकते—यहाँ समस्या क्या है? क्या यह थोड़ा गैर-जिम्मेदाराना नहीं है? कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि वे गैर-जिम्मेदार हैं और बकवास करते हैं। अब, इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए, इस समस्या की प्रकृति क्या है? (पाखंड।) सही कहा, यह पाखंड का एक उदाहरण है। स्पष्ट रूप से वे खुद इस अपेक्षा का पालन नहीं कर सकते, फिर भी वे खुद को इतना सहिष्णु, बड़े दिल वाले और इतने उच्च नैतिक आचरण वाले होने का दावा करते हैं—क्या यह निरा पाखंड नहीं है? चाहे तुम इसे कैसे भी गढ़ो, यह एक खोखली कहावत है जिसमें एक निश्चित झूठ है, इसलिए हम इसे एक पाखंडी कहावत ही कहेंगे। यह उस तरह की कहावतों के समान है, जिन्हें फरीसियों ने प्रचारित किया था; इसके पीछे एक गुप्त मकसद है, जो स्पष्ट रूप से दिखावा करना, खुद को एक उत्कृष्ट नैतिक आचरण वाले व्यक्ति के रूप में चित्रित करना, और एक आदर्श और उत्कृष्ट नैतिक आचरण के प्रतिमान के रूप में दूसरों की प्रशंसा पाना है। तो, किस तरह के लोग अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनने में सक्षम हैं? क्या शिक्षक और डॉक्टर इस कहावत का पालन करने में सक्षम हैं? क्या कन्फ्यूशियस, मेंसियस और लाओजी जैसे तथाकथित प्रसिद्ध लोग, महान लोग और संत इस कहावत का पालन करने में सक्षम थे? (नहीं।) संक्षेप में, चाहे मनुष्य द्वारा प्रचारित यह कहावत कितनी भी हास्यास्पद हो, या यह अपेक्षा तर्कसंगत हो या नहीं, यह अंततः लोगों के नैतिक चरित्र और व्यवहार को लेकर की गई एक अपेक्षा ही है। कम से कम, लोग इस अपेक्षा का पालन करने को तैयार नहीं हैं और उनके लिए इसका अभ्यास करना आसान नहीं है, क्योंकि यह उन मानकों के विपरीत है जिन्हें मनुष्य की सामान्य मानवता प्राप्त करने में सक्षम है। लेकिन, हर हाल में, यह फिर भी मनुष्य के नैतिक आचरण के बारे में एक मानक और अपेक्षा है, जिसे परंपरागत संस्कृति द्वारा बढ़ावा दिया जाता है। भले ही “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” एक खोखला वाक्यांश है जिसका पालन बहुत कम लोग कर सकते हैं, फिर भी यह “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” और “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” जैसा ही है—इसका अभ्यास करने वाले लोग चाहे जो मकसद या इरादे रखते हों, या अगर कोई इसका अभ्यास करने में सक्षम भी हो—हर हाल में, सिर्फ इस तथ्य के आधार कि इस अपेक्षा को बढ़ावा देने वाले लोग खुद को नैतिकता के शिखर पर रखते हैं, क्या यह उन्हें अहंकारी और आत्मतुष्ट, और कुछ हद तक असामान्य विवेक वाले नहीं बनाता? अगर तुम उनसे पूछो कि क्या वे “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” कहावत का पालन कर सकते हैं, तो वे कहेंगे, “बेशक!” और फिर भी, जब उन्हें वास्तव में इसका पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वे ऐसा नहीं कर पाएँगे। वे इसका पालन क्यों नहीं कर पाएँगे? क्योंकि उनमें एक अहंकारी, शैतानी स्वभाव है। जब दूसरे लोग उनके साथ हैसियत, ताकत, प्रतिष्ठा और लाभ के लिए होड़ कर रहे हों, तो उनसे इस नैतिकता का पालन करने के लिए कहो और देखो कि क्या वे ऐसा कर सकते हैं। वे ऐसा करने में असमर्थ ही होंगे, यहाँ तक कि वे तुम्हारे प्रति शत्रुतापूर्ण भी हो जाएँगे। अगर तुम उनसे पूछो, “तुम इस कहावत का प्रचार क्यों करते हो, जबकि तुम खुद भी इसका पालन नहीं कर सकते? तुम फिर भी दूसरों से इसके अनुरूप होने की अपेक्षा क्यों करते हो? क्या यह तुम्हारा पाखंड नहीं है?” तो क्या वे इसे स्वीकारेंगे? अगर तुम उन्हें उजागर करते हो, तो वे इसे नहीं स्वीकारेंगे—चाहे तुम उन्हें कैसे भी उजागर करो, वे इसे या अपनी गलती नहीं स्वीकारेंगे—यह दर्शाता है कि वे अच्छे लोग नहीं हैं। यह तथ्य कि अपनी अपेक्षाओं का खुद भी पालन करने में असमर्थ होने के बावजूद वे उच्च नैतिक लहजा अपनाते हैं, यह दर्शाता है कि उन्हें बड़े धोखेबाज और पाखंडी ठीक ही कहा जाता है।

“उठाए गए धन को जेब में मत रखो” और “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” कहावतों की तरह ही “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” भी उन माँगों में से एक है, जो परंपरागत संस्कृति लोगों के नैतिक आचरण के संबंध में करती है। इसी तरह, चाहे कोई व्यक्ति इस नैतिक आचरण को प्राप्त या इसका अभ्यास कर सकता हो या नहीं, फिर भी यह उनकी मानवता मापने का मानक या प्रतिमान नहीं है। हो सकता है, तुम वाकई अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनने में सक्षम हो और खुद के लिए विशेष रूप से उच्च मानक रखते हो। हो सकता है, तुम बहुत साफ-सुथरे हो और बिना स्वार्थी हुए और बिना अपने हितों की परवाह किए हमेशा दूसरों के बारे में सोचते हो और उनके प्रति सम्मान दिखाते हो। हो सकता है, तुम विशेष रूप से उदार और निस्स्वार्थ प्रतीत होते हो, और सामाजिक उत्तरदायित्व और सामाजिक नैतिकताएँ रखते हो। हो सकता है, तुम्हारा उच्च व्यक्तित्व और गुण तुम्हारे करीबी लोगों और उनके देखने के लिए हो, जिनसे तुम मिलते और बातचीत करते हो। हो सकता है, तुम्हारा व्यवहार कभी भी दूसरों को तुम्हें दोष देने या तुम्हारी आलोचना करने का कोई कारण न दे, बल्कि अत्यधिक प्रशंसा और सराहना प्राप्त कराए। हो सकता है, लोग तुम्हें ऐसा व्यक्ति समझें, जो वाकई अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु है। लेकिन ये बाहरी व्यवहार से ज्यादा कुछ नहीं हैं। क्या तुम्हारे दिल की गहराई में मौजूद विचार और इच्छाएँ इन बाहरी व्यवहारों, इन कार्यों के अनुरूप हैं जो तुम बाहरी तौर पर जीते हो? जवाब है नहीं, वे उनके अनुरूप नहीं हैं। तुम्हारे इस तरह से कार्य कर पाने का कारण यह है कि इसके पीछे एक मकसद है। वह मकसद आखिर क्या है? क्या तुम उस मकसद का सार्वजनिक होना सहन कर सकते हो? निश्चित रूप से नहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मकसद ऐसी चीज है जिसका उल्लेख नहीं किया जा सकता, ऐसी चीज जो अंधकारपूर्ण और बुरी है। अब, यह मकसद अवर्णनीय और बुरा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि लोगों की मानवता उनके भ्रष्ट स्वभावों से नियंत्रित और संचालित होती है। मानवता के तमाम विचारों पर, चाहे लोग उन्हें शब्दों में व्यक्त करें या उड़ेलें, निर्विवाद रूप से उनके भ्रष्ट स्वभाव हावी होते और नियंत्रण रखते हैं और उनमें फेरबदल करते हैं। नतीजतन, लोगों के तमाम मकसद और इरादे भयावह और बुरे होते हैं। चाहे लोग अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बन पाएँ या नहीं, या वे बाहरी तौर पर इस नैतिकता को पूरी तरह से व्यक्त करें या नहीं, यह अपरिहार्य है कि इस नैतिकता का उनकी मानवता पर कोई नियंत्रण या प्रभाव नहीं होगा। तो, लोगों की मानवता को क्या नियंत्रित करता है? वे उनके भ्रष्ट स्वभाव हैं, वह उनका मानवता-सार है जो “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” की नैतिकता के नीचे छिपा रहता है—यही उनकी वास्तविक प्रकृति है। किसी व्यक्ति की असली प्रकृति उसका मानवता-सार होती है। और उसके मानवता-सार में क्या-क्या शामिल होता है? इसमें मुख्य रूप से उनकी प्राथमिकताएँ, उनके अनुसरण, जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण और उनकी मूल्य-व्यवस्था, और साथ ही सत्य और परमेश्वर के प्रति उनका रवैया इत्यादि शामिल रहते हैं। सिर्फ ये चीजें ही वास्तव में लोगों का मानवता-सार दर्शाती हैं। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जो लोग खुद से “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु” होने की नैतिकता पूरी करने की अपेक्षा करते हैं, वे हैसियत के प्रति आसक्त हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव से संचालित होने के कारण वे दूसरों की नजरों में लोगों के बीच प्रतिष्ठा, सामाजिक ख्याति और हैसियत के पीछे दौड़े बिना नहीं रह पाते। ये सभी चीजें उनकी हैसियत पाने की इच्छा से संबंधित हैं, और उनके अच्छे नैतिक आचरण की आड़ में इनके पीछे दौड़ा जाता है। और उनके ये अनुसरण कहाँ से आते हैं? वे पूरी तरह से उनके भ्रष्ट स्वभावों से आते और प्रेरित होते हैं। इसलिए, चाहे कुछ भी हो, चाहे कोई “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु” होने की नैतिकता पूरी करता हो या नहीं, और चाहे वह ऐसा पूर्णता के साथ करता हो या नहीं, यह उनका मानवता-सार बिल्कुल नहीं बदल सकता। इसका निहितार्थ यह है कि यह किसी भी तरह से जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण या उनकी मूल्य-प्रणाली नहीं बदल सकता, या तमाम लोगों, घटनाओं और चीजों पर उनके रवैये और दृष्टिकोण निर्देशित नहीं कर सकता। क्या ऐसा नहीं है? (है।) जितना ज्यादा कोई व्यक्ति अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति सहिष्णु होने में सक्षम होता है, उतना ही वह दिखावा करने में, खुद को छिपाने में, और दूसरों को अच्छे व्यवहार और मनभावन शब्दों से गुमराह करने में बेहतर होता है, और उतना ही ज्यादा वह प्रकृति से कपटी और दुष्ट होता है। जितना ज्यादा वह इस प्रकार का व्यक्ति होता है, हैसियत और ताकत के प्रति उसका प्रेम और अनुसरण उतना ही गहरा होता जाता है। उसका बाहरी नैतिक आचरण कितना भी महान, गौरवशाली और सही क्यों न प्रतीत होता हो, और लोगों के लिए उसे देखना कितना भी सुखद क्यों न हो, उसके दिल की गहराइयों में मौजूद अनकहा अनुसरण, और साथ ही उसका प्रकृति-सार, यहाँ तक कि उसकी महत्वाकांक्षाएँ भी किसी भी समय उसके भीतर से फूटकर बाहर आ सकती हैं। इसलिए, उसका आचरण कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह उसके आंतरिक मानवता-सार या उसकी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ नहीं छिपा सकता। वह उसके भयानक प्रकृति-सार को नहीं छिपा सकता, जो सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करता और सत्य से विमुख होता और घृणा करता है। जैसा कि इन तथ्यों से पता चलता है, “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” कहावत बहुत बेतुकी है—यह उन महत्वाकांक्षी किस्म के लोगों को उजागर करती है, जो ऐसी कहावतों और व्यवहारों का उपयोग अपनी उन महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को ढकने के लिए करने का प्रयास करते हैं, जिनके बारे में वे बोल नहीं सकते। तुम लोग इसकी तुलना कलीसिया के कुछ मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों से कर सकते हो। कलीसिया के भीतर अपनी हैसियत और ताकत सुदृढ़ करने और अन्य सदस्यों के बीच बेहतर प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए, वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं, वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर अपने काम और परिवारों को भी त्याग सकते हैं और अपना सब-कुछ बेच भी सकते हैं। कुछ मामलों में, परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर उनके द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतें और उठाया जाने वाला कष्ट एक औसत व्यक्ति की सहनशक्ति से भी ज्यादा होता है; अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए वे अत्यधिक आत्म-त्याग की भावना साकार करने में सक्षम रहते हैं। फिर भी, चाहे वे कितना भी कष्ट सहें या चाहे कोई भी कीमत चुकाएँ, उनमें से कोई भी परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करता, न ही वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं। जिस लक्ष्य का वे अनुसरण करते हैं, वह सिर्फ हैसियत, ताकत और परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करना है। वे जो कुछ भी करते हैं, उसका सत्य से रत्ती भर भी संबंध नहीं होता। चाहे वे अपने प्रति कितने भी सख्त और दूसरों के प्रति कितने भी सहिष्णु हों, उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? परमेश्वर उनके बारे में क्या सोचेगा? क्या वह उनके बाहरी अच्छे व्यवहारों के आधार पर, जिन्हें वे जीते हैं, उनका परिणाम निर्धारित करेगा? निश्चित रूप से नहीं। लोग इन व्यवहारों और अभिव्यक्तियों के आधार पर दूसरों को देखते और उनका आकलन करते हैं, और चूँकि वे अन्य लोगों का सार नहीं समझ पाते, इसलिए वे अंततः उनके द्वारा धोखा खाते हैं। लेकिन परमेश्वर कभी मनुष्य से धोखा नहीं खाता। वह इसलिए लोगों के नैतिक आचरण की सराहना बिल्कुल नहीं करेगा और उन्हें याद नहीं रखेगा कि वे अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनने में सक्षम थे। इसके बजाय, वह उनकी महत्वाकांक्षाओं और हैसियत की खोज में उनके द्वारा अपनाए गए मार्गों के लिए उनकी निंदा करेगा। इसलिए, सत्य का अनुसरण करने वालों को लोगों के मूल्यांकन की इस कसौटी की समझ होनी चाहिए। उन्हें इस बेतुके मानक को पूरी तरह से नकार कर त्याग देना चाहिए और लोगों को परमेश्वर के वचनों और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार पहचानना चाहिए। उन्हें मुख्य रूप से यह देखना चाहिए कि व्यक्ति सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है या नहीं, वह सत्य स्वीकारने में सक्षम है या नहीं और वह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सकता है या नहीं, और साथ ही वह मार्ग भी देखना चाहिए, जिसे वह चुनता और जिस पर वह चलता है, और इन चीजों के आधार पर यह वर्गीकृत करना चाहिए कि वह किस प्रकार का व्यक्ति है और उसमें किस तरह की मानवता है। जब लोग “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” के मानक के आधार पर दूसरों का मूल्यांकन करते हैं, तो भटकाव और त्रुटियाँ उत्पन्न होना बहुत आसान है। अगर तुम मनुष्य से आए सिद्धांतों और कहावतों के आधार पर व्यक्ति को गलत तरीके से पहचानते और देखते हो, तो तुम उस मामले में सत्य का उल्लंघन और परमेश्वर का विरोध कर रहे होगे। ऐसा क्यों है? इसका कारण यह है कि लोगों के बारे में तुम्हारे विचारों का आधार गलत, और परमेश्वर के वचनों और सत्य के साथ असंगत होगा—यहाँ तक कि वह उनके विरुद्ध और विपरीत भी हो सकता है। परमेश्वर नैतिक आचरण से संबंधित इस कथन के आधार पर लोगों की मानवता का मूल्यांकन नहीं करता, “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो,” इसलिए अगर तुम फिर भी इस कसौटी के अनुसार लोगों की नैतिकता का आकलन करने और यह निर्धारित करने पर जोर देते हो कि वे किस तरह के व्यक्ति हैं, तो तुमने सत्य-सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन किया है, और तुम त्रुटियाँ करने, और कुछ गलतियाँ और भूलें करने के लिए बाध्य हो। क्या ऐसा नही है? (ऐसा ही है।) जब लोग इन चीजों को समझ लेते हैं, तो उनके पास कम से कम उस आधार, सिद्धांतों और कसौटी की एक निश्चित स्तर की समझ होगी, जिनके द्वारा परमेश्वर लोगों और चीजों को देखता है—तुम्हें कम से कम इन चीजों के प्रति परमेश्वर के नजरिये की समझ और कदर होगी। तो, अपने परिप्रेक्ष्य में बारे में तुम्हारा क्या विचार है? तुम्हें कम से कम यह जानना चाहिए कि किसी व्यक्ति को देखने का सही आधार क्या है और लोगों को देखने की कौन-सी कसौटी सत्य और वास्तविक तथ्यों के अनुरूप है, जिससे बिल्कुल भी कोई त्रुटि या भूल नहीं होगी। अगर तुम वास्तव में इन मामलों पर स्पष्ट हो जाते हो, तो तुम्हें परंपरागत संस्कृति के इन पहलुओं के साथ-साथ मनुष्य के विभिन्न कथनों, सिद्धांतों और अन्य लोगों को देखने के तरीकों की समझ हो जाएगी, और तुम परंपरागत संस्कृति के इन पहलुओं और मनुष्य से आने वाली तमाम विभिन्न कहावतों और विचारों को पूरी तरह से त्यागने में सक्षम हो जाओगे। इस तरह, तुम लोगों को सत्य-सिद्धांतों के आधार पर देखोगे और समझोगे, और कुछ हद तक, तुम परमेश्वर के अनुकूल होगे, और तुम उससे विद्रोह नहीं करोगे, उसका विरोध नहीं करोगे या उससे असहमत नहीं होगे। जैसे-जैसे तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के साथ अनुकूलता प्राप्त करते हो, वैसे-वैसे तुम लोगों और चीजों के सार को लेकर एक स्पष्ट अंतर्दृष्टि विकसित करोगे और इसकी पुष्टि तुम्हें परमेश्वर के वचनों में मिलेगी। तुम देखोगे कि मनुष्य को उजागर करने वाले परमेश्वर के विभिन्न कथन और मानवजाति के बारे में उसके निरूपण और परिभाषाएँ बिल्कुल सही हैं और वे सभी सत्य हैं। निस्संदेह, जैसे-जैसे तुम इसकी पुष्टि पाओगे, वैसे-वैसे तुम परमेश्वर और उसके वचनों के बारे में अधिकाधिक आस्था और ज्ञान प्राप्त करोगे, और तुम ज्यादा से ज्यादा निश्चित हो जाओगे कि परमेश्वर के वचन सत्य और वास्तविकता हैं, जिन्हें मनुष्य को जीना चाहिए। क्या यही वह चीज नहीं है, जो सत्य स्वीकारने और प्राप्त करने की प्रक्रिया में शामिल है? (हाँ, यही है।) यह सत्य स्वीकारने और प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

सत्य का अनुसरण करने का लक्ष्य सत्य को अपना जीवन स्वीकारना है। जब लोग सत्य स्वीकारने में सक्षम होते हैं, तो उनकी आंतरिक मानवता और जीवन धीरे-धीरे बदलना शुरू हो जाता है, और अंत में, यह परिवर्तन उनका पुरस्कार होता है। अतीत में, तुम लोगों और चीजों को परंपरागत संस्कृति के अनुसार देखते थे, लेकिन अब तुमने जान लिया है कि यह गलत था, और अब तुम चीजों को उस परिप्रेक्ष्य से नहीं देखोगे, या परंपरागत संस्कृति जो निर्देशित करती है, उसके आधार पर किसी व्यक्ति को नहीं देखोगे। तो अब तुम लोगों और चीजों को किस आधार पर देखोगे? अगर तुम नहीं जानते, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी भी सत्य नहीं स्वीकारा है। अगर तुम पहले ही जानते हो कि किन सत्य-सिद्धांतों के अनुसार तुम्हें लोगों और चीजों को देखना चाहिए, अगर तुम अपना आधार, मार्ग, कसौटी और अपने सिद्धांत सटीक और स्पष्ट रूप से बता सकते हो, और अगर तुम उन सत्य-सिद्धांतों के अनुसार लोगों को पहचान और देख भी सकते हो, तो सत्य पहले ही तुम्हारे भीतर काम करना शुरू कर चुका है, वह तुम्हारे विचारों का मार्गदर्शन कर रहा है और उस परिप्रेक्ष्य पर हावी हो रहा है जिससे तुम लोगों और चीजों को देखते हो। इससे साबित होता है कि सत्य पहले ही तुममें जड़ें जमा चुका है और तुम्हारा जीवन बन गया है। तो, सत्य का तुम पर पड़ने वाला प्रभाव अंततः तुम्हारी किस तरह सहायता करेगा? क्या सत्य तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले आचरण, तुम्हारे द्वारा चुने जाने वाले मार्ग और जीवन में तुम्हारी दिशा को प्रभावित नहीं करेगा? (हाँ, करेगा।) अगर वह इस बात को प्रभावित करने में सक्षम है कि तुम कैसे आचरण करते हो और किस मार्ग पर चलते हो, तो क्या वह परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते को प्रभावित नहीं करेगा? (बिल्कुल करेगा।) सत्य द्वारा परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते को प्रभावित करने से क्या परिणाम आएगा? तुम उसके और करीब हो जाओगे या और दूर चले जाओगे? (मैं परमेश्वर के और करीब हो जाऊँगा।) तुम निश्चित रूप से उसके और करीब हो जाओगे। जब तुम परमेश्वर के और करीब हो जाओगे, तो तुम उसका अनुसरण करने और उसके सामने झुकने के ज्यादा इच्छुक होगे, या संदेहों और गलतफहमियों से परेशान होकर अनिच्छा से उसके अस्तित्व पर विश्वास करोगे? (मैं परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके सामने झुकने को तैयार रहूँगा।) यह निश्चित है। अब, तुम यह इच्छा कैसे प्राप्त करोगे? तुम्हें अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों की पुष्टि मिलेगी; सत्य तुममें काम करना शुरू कर देगा और तुम्हें इसकी पुष्टि मिल जाएगी। सभी चीजों के खुलने की प्रक्रिया में, तुम्हारे भीतर इन सभी चीजों के छिपे हुए स्रोत की पुष्टि हो जाएगी और तुम पाओगे कि यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुरूप है। तुम सत्यापित करोगे कि परमेश्वर के समस्त वचन सत्य हैं, और इससे परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बढ़ेगी। परमेश्वर में तुम्हारी आस्था जितनी ज्यादा होगी, उसके साथ तुम्हारा रिश्ता उतना ही ज्यादा सामान्य हो जाएगा, तुम एक सृजित प्राणी के रूप में कार्य करने के अधिकाधिक इच्छुक होगे और परमेश्वर को अपना संप्रभु मानने के भी इच्छुक होंगे। परमेश्वर के प्रति समर्पित होने वाले तुम्हारे हिस्सों की संख्या में वृद्धि होगी। अपने रिश्ते में होने वाले इस सुधार के बारे में तुम क्या सोचते हो? यह बढ़िया है न? यह एक अच्छे और सकारात्मक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। तो फिर, खराब और घातक विकास प्रक्रिया के क्या परिणाम होंगे? (परमेश्वर के अस्तित्व में मेरी आस्था अधिकाधिक कमजोर हो जाएगी और मेरे मन में परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ और संदेह होंगे।) कम से कम, ये परिणाम तो जरूर होंगे। तुम्हें किसी भी मामले में पुष्टि प्राप्त नहीं होगी, और तुम न सिर्फ अपनी आस्था में सत्य प्राप्त करने में विफल रहोगे, बल्कि तुम तमाम तरह की धारणाएँ भी बना लोगे—तुम परमेश्वर को गलत समझोगे, उसका तिरस्कार करोगे और उससे सावधान रहोगे, और अंततः तुम उसे नकार दोगे। अगर तुम अपने हृदय में परमेश्वर को नकारते हो, तो क्या तुम फिर भी उसका अनुसरण कर पाओगे? (नहीं।) अब तुम उसका अनुसरण नहीं करना चाहोगे। इसके बाद क्या होगा? परमेश्वर जो करता और कहता है, उसमें तुम्हारी रुचि खत्म हो जाएगी। जब परमेश्वर कहेगा, “मानवजाति का अंत निकट है,” तो तुम उत्तर दोगे, “मुझे तो ऐसा नहीं लगता!” तुम उस पर विश्वास नहीं करोगे। जब परमेश्वर कहेगा, “सत्य का अनुसरण करने के बाद तुम्हें एक अच्छी मंजिल मिलेगी,” तो तुम उत्तर दोगे, “वह अच्छी मंजिल कहाँ है, जिसकी तुम बात करते हो? मुझे तो नहीं दिखती!” तुम्हें इसमें कोई रुचि नहीं होगी। जब परमेश्वर कहेगा, “तुम्हें एक सच्चे सृजित प्राणी की तरह कार्य करना चाहिए,” तो तुम उत्तर दोगे, “क्या एक सच्चे सृजित प्राणी की तरह कार्य करने का कोई लाभ है? मैं इससे कितने आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? क्या ऐसा करने से मैं सचमुच आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? क्या इसका संबंध आशीष प्राप्त करने से है?” जब परमेश्वर कहेगा, “तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारनी चाहिए और उसके प्रति समर्पित होना चाहिए!” तुम उत्तर दोगे, “कैसी संप्रभुता? मैं परमेश्वर की संप्रभुता महसूस क्यों नहीं कर पाता? अगर परमेश्वर वास्तव में संप्रभु है, तो उसने मुझे गरीबी में क्यों रहने दिया? उसने मुझे बीमार क्यों पड़ने दिया? अगर परमेश्वर संप्रभु है, तो मेरे लिए चीजें हमेशा इतनी कठिन क्यों होती हैं?” तुम्हारा हृदय शिकायतों से भरा होगा और तुम परमेश्वर की किसी भी बात पर विश्वास नहीं करोगे। यह परमेश्वर में तुम्हारी सच्ची आस्था की कमी प्रदर्शित करेगा। और इसीलिए, विभिन्न समस्याओं का सामना करते समय तुम बिना जरा-से भी समर्पण के सिर्फ शिकायत करोगे। इसी तरह तुम इस घातक परिणाम पर पहुँचोगे। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि परमेश्वर संप्रभु है, तो उसे बीमारी से उबरने में मेरी तुरंत मदद करनी चाहिए। मैं जो कुछ भी चाहता हूँ, वह सब हासिल करने में उसे मेरी मदद करनी चाहिए। मेरा जीवन अब असुविधाओं और कष्टों से क्यों भर गया है?” उन्होंने परमेश्वर में अपनी आस्था खो दी है और उनमें उस अस्पष्ट आस्था का जरा-सा भी निशान नहीं रह गया है, जो कभी उनमें थी—वह पूरी तरह से गायब हो गई है। यह इन सबका घातक परिणाम और बुरा नतीजा है। क्या तुम लोग इस बिंदु तक पहुँचना चाहते हो? (नहीं।) तुम इस स्तर तक गिरने से कैसे बच सकते हो? जब सत्य की बात आती है, तो तुम्हें प्रयास करना चाहिए—इस सब की कुंजी और मार्ग सत्य और परमेश्वर के वचनों में निहित है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य की बात आने पर अनजाने ही प्रयास करते हो, तो तुम उस मार्ग को ज्यादा स्पष्ट रूप से देखना शुरू कर दोगे, जो परमेश्वर ने तुम्हें सिखाया और जिस पर उसने तुम्हारा मार्गदर्शन किया है, और तुम उन लोगों, घटनाओं और चीजों का सार देखोगे, जिनकी परमेश्वर व्यवस्था करता है। इस अनुभव के हर चरण के माध्यम से तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के वचनों के भीतर लोगों और चीजों को देखने और आचरण और कार्य करने के सिद्धांत और आधार खोजोगे। सत्य स्वीकारने और समझने से तुम उन लोगों, घटनाओं और चीजों में अभ्यास के सिद्धांत और मार्ग पाओगे, जिनका तुम सामना करते हो। अगर तुम इन मार्गों के अनुसार अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर के वचन तुममें प्रवेश करके तुम्हारा जीवन बन जाएँगे और अनजाने ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के अधीन रहना शुरू कर दोगे। जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के अधीन रहते हो, तो तुम अनजाने ही लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखना सीख जाओगे, और चीजों को उचित रुख, परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण से देखोगे; चीजों पर तुम्हारे विचारों के परिणाम परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुरूप होंगे और वे तुम्हें परमेश्वर के और करीब जाने और सत्य के लिए और ज्यादा प्यासे होने देंगे। लेकिन अगर तुम सत्य का अनुसरण या सत्य के संबंध में प्रयास नहीं करते और अगर तुम सत्य में कोई रुचि नहीं रखते, तो यह कहना मुश्किल है कि तुम अंततः किस बिंदु तक पहुँचोगे। अंततः, सबसे खराब संभावित परिणाम तब होता है, जब लोग परमेश्वर के कार्य देखने या उसकी संप्रभुता महसूस करने में विफल रहते हैं, चाहे वे उसमें विश्वास करने की कैसे भी कोशिश करें; ऐसा तब होता है, जब वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि समझने में विफल रहते हैं, चाहे वे कितनी भी चीजों का अनुभव करें। ऐसे मामलों में, लोग सिर्फ यह स्वीकारेंगे कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन सत्य हैं, लेकिन उन्हें अपने बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं दिखेगी, वे यह तो बिल्कुल भी नहीं देखेंगे कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है, और उन्हें हमेशा यह महसूस होगा कि परमेश्वर में उनकी आस्था धुँधली है। यह दर्शाता है कि उन्हें सत्य या परमेश्वर का उद्धार प्राप्त नहीं हुआ और वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इससे तीसरी कहावत : “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो” पर मेरी संगति समाप्त होती है।

नैतिक आचरण के बारे में चौथा कथन क्या है? (बुराई का बदला भलाई से चुकाओ।) जब लोग बुराई का बदला भलाई से चुकाते हैं, तो क्या वे कुछ इरादे रखते हैं? क्या वे अपने लिए चीजें आसान बनाने के लिए एक कदम पीछे नहीं हट रहे होते? क्या यह चीजों से निपटने का एक समाधानकारी तरीका नहीं है? लोग प्रतिशोध के कभी न खत्म होने वाले चक्र में नहीं फँसना चाहते, वे चीजों को सुचारु रूप से चलाना चाहते हैं ताकि वे थोड़ा और शांति से जी सकें। किसी व्यक्ति का जीवन खास लंबा नहीं होता, और चाहे वह सौ साल जिए या कई सौ साल, उसे अपना जीवन छोटा ही लगता है। पूरे दिन वह बदले और हत्या के विचारों से घिरा रहता है, उसकी आंतरिक दुनिया उथल-पुथल से भरी होती है और वह दुखी जीवन जीता है। इसलिए, वह ज्यादा खुशहाल, ज्यादा आनंदमय जीवन जीने और अपने साथ सही तरह से पेश आने का तरीका खोजने की कोशिश करता है—जो कि बुराई का बदला भलाई से चुकाना है। यह अपरिहार्य है कि लोग अपने जीवन के दौरान एक-दूसरे को अपमानित करेंगे और एक-दूसरे के षड्यंत्रों का शिकार होंगे, वे हमेशा प्रतिशोधी और कटु भावनाओं से त्रस्त रहते हैं और काफी खराब जीवन जीते हैं, इसलिए सामाजिक माहौल और सामाजिक स्थिरता और एकता की खातिर इसे अपनी प्रेरणा के रूप में लेकर नैतिकतावादी दुनिया में इस नैतिक कसौटी को बढ़ावा देते हैं। वे लोगों को आगाह करते हैं कि वे बुराई का बदला बुराई से न चुकाएँ, घृणा और हत्या से दूर रहें, और इसके बजाय वे लोगों से आग्रह करते हैं कि बुराई का बदला भलाई से चुकाना सीखें। वे कहते हैं कि भले ही किसी ने अतीत में तुम्हें नुकसान पहुँचाया हो, फिर भी तुम्हें उससे बदला नहीं लेना चाहिए, बल्कि उसकी मदद करनी चाहिए, उसके पिछले गलत काम भूल जाने चाहिए, उसके साथ सामान्य रूप से बातचीत करनी चाहिए और धीरे-धीरे उसे सुधारना चाहिए, अपने बीच शत्रुता कम करनी चाहिए, और सौहार्दपूर्ण संबंध हासिल करना चाहिए। क्या इससे समाज में समग्र रूप से समरसता नहीं आएगी? वे कहते हैं कि चाहे जिसने भी तुम्हें अपमानित किया हो, चाहे वह परिवार का कोई सदस्य हो या दोस्त, पड़ोसी या सहकर्मी, तुम्हें उसकी बुराई का बदला भलाई से चुकाना चाहिए और द्वेष रखने से बचना चाहिए। उनका दावा है कि अगर सभी ऐसा करने में सक्षम हो जाएँ, तो यह वैसा ही होगा जैसा लोग कहते हैं : “अगर सभी थोड़ा-सा प्रेम दें, तो दुनिया एक अद्भुत जगह बन जाएगी।” क्या ये दावे कल्पनाओं पर आधारित नहीं हैं? एक अद्भुत जगह? मिसाल के तौर पर! जरा नजर डालो कि वह कौन है जो इस दुनिया को चलाता है और वह कौन है जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है। नैतिक आचरण के बारे में यह कथन, “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ,” वास्तव में क्या बदलाव ला सकता है? यह कुछ नहीं बदल सकता। दूसरे कथनों की तरह ही यह कथन भी लोगों की नैतिक गुणवत्ता को लेकर कुछ अपेक्षाएँ रखता है या उन पर कुछ विनियम लागू करता है। इसके लिए आवश्यक है कि वे दूसरे लोगों से घृणा और हत्या वाले व्यवहार का सामना होने पर घृणा और हत्या का सहारा लेने से बचें, और जो लोग उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं उनके साथ शांति से, संतुलित स्वभाव के साथ व्यवहार करें, और उस शत्रुता और हत्या की भावना को शांत करने और रक्तपात की मात्रा कम करने के लिए अपने नैतिक आचरण का उपयोग करें। बेशक, नैतिक आचरण के बारे में यह कहावत कुछ हद तक लोगों पर प्रभावी है; यह शत्रुता और आक्रोश को शांत कर सकती है और बदले की भावना से होने वाली हत्याएँ कुछ हद तक कम कर सकती है; और इसका सामाजिक माहौल, सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव पर कुछ हद तक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन इस कहावत के उस प्रभाव के लिए क्या पूर्व-शर्तें हैं? सामाजिक परिवेश के संदर्भ में इसकी महत्वपूर्ण पूर्व-शर्ते हैं। एक तो वह सामान्य विवेक और आकलन है, जो लोगों में होता है। लोग सोचते हैं : “यह व्यक्ति, जिससे मैं बदला लेना चाहता हूँ, मुझसे ज्यादा ताकतवर है या कम? अगर मैं इससे बदला लूँ, तो क्या मैं अपना लक्ष्य हासिल कर पाऊँगा? अगर मैं अपना बदला लेकर उसे मार डालता हूँ, तो कहीं मैं अपने मौत के परवाने पर हस्ताक्षर तो नहीं कर दूँगा?” वे पहले परिणामों का आकलन करते हैं। चीजों पर विचार करने के बाद ज्यादातर लोगों को एहसास होता है : “उसके लोगों से अच्छे संबंध हैं, उसका बहुत ज्यादा सामाजिक प्रभाव है और वह शातिर और क्रूर है, इसलिए भले ही उसने मुझे नुकसान पहुँचाया है, पर मैं उससे बदला नहीं ले सकता। मुझे चुपचाप अपमान का घूँट पी लेना चाहिए। लेकिन अगर मुझे इस जीवन में कभी उससे बदला लेने का मौका मिला, तो मैं बदला लूँगा।” जैसी कि लोकप्रिय कहावतें हैं, “जो बदला नहीं लेता, वह मर्द नहीं होता” और “एक सज्जन कभी भी अपना बदला ले सकता है।” लोग अभी भी सांसारिक लेनदेनों के लिए इस तरह के फलसफे अपनाए हुए हैं। सांसारिक लेनदेनों के लिए बुराई का बदला भलाई से चुकाने के फलसफे को लोग एक संदर्भ में इसलिए अपनाते हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर सामाजिक परिवेश और मनुष्य की गहरी भ्रष्टता से जुड़ा है—यह लोगों की धारणाओं और उनके विवेक के निर्णयों के कारण उत्पन्न हुआ है। जब ज्यादातर लोग इस तरह की स्थितियों का सामना करते हैं, तो वे सिर्फ चुपचाप अपमान का घूँट पी सकते हैं, और अपनी नफरत और प्रतिशोध एक तरफ रखकर, बाहरी तौर पर बुराई का बदला भलाई से चुकाने का अभ्यास करते हैं। लोगों द्वारा सांसारिक लेनदेनों के लिए इस फलसफे को अपनाए जाने का दूसरा कारण यह है कि कुछ मामलों में इसमें शामिल दोनों पक्षों के बीच शक्ति का एक बड़ा असंतुलन होता है, इसलिए पीड़ित पक्ष बदला लेने की हिम्मत नहीं करता और वह बुराई का बदला भलाई से चुकाने के लिए मजबूर होता है, क्योंकि वह और कुछ नहीं कर सकता। अगर वह बदला लेने लगे, तो अपने पूरे परिवार का जीवन खतरे में डाल सकता है, जिसके परिणाम अकल्पनीय हैं। ऐसे में लोग अपमान का घूँट पीकर रह जाना ही बेहतर समझते हैं। लेकिन, क्या ऐसा करके उन्होंने अपने आक्रोश पर काबू पा लिया होता है? क्या कोई भी व्यक्ति गिले-शिकवे भूलने में सक्षम है? (नहीं।) खासकर बहुत गंभीर शिकायतों के मामलों में, उदाहरण के लिए, जब किसी ने तुम्हारे करीबी रिश्तेदारों की हत्या कर दी हो और तुम्हारा परिवार बर्बाद कर दिया हो, और तुम्हारा नाम बदनाम कर दिया हो, जिससे तुम्हारे भीतर उसके प्रति गहरी दुश्मनी पैदा हो गई हो—कोई भी इस तरह की शिकायत भूल नहीं सकता। यह मानवता का एक हिस्सा है और ऐसी चीज है, जिस पर मानवता काबू नहीं पा सकती। ऐसी स्थितियों में लोगों में सहज रूप से घृणा की भावना विकसित हो जाती है—यह बिल्कुल सामान्य है। चाहे वह क्रोध के कारण उत्पन्न हो या सहज प्रवृत्ति के कारण या फिर जमीर के कारण, हर हाल में यह एक सामान्य प्रतिक्रिया है। यहाँ तक कि कुत्ते भी उन लोगों के करीब आ जाते हैं, जो उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और नियमित रूप से उन्हें खाना खिलाते हैं या उनकी मदद करते हैं, और वे उन पर भरोसा करना शुरू कर देते हैं, जबकि वे उन लोगों से घृणा करते हैं जो उनके साथ गाली-गलौज और दुर्व्यवहार करते हैं—और इतना ही नहीं, वे उन लोगों से भी घृणा करते हैं जिनमें से उनके साथ गाली-गलौज और दुर्व्यवहार करने वाले की-सी गंध आती है या जो उन जैसे लगते हैं। देखो, कुत्तों तक में यह प्रवृत्ति होती है, लोगों का तो कहना ही क्या! यह देखते हुए कि लोगों का दिमाग जानवरों की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल होता है, बदले वाली हत्या या अन्यायपूर्ण व्यवहार का सामना करने पर उनके लिए शत्रुता महसूस करना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन, कई वजहों से और विशेष परिस्थितियों के कारण, लोगों को अक्सर रियायतें देने और अपमान का घूँट पीने, और अस्थायी रूप से चीजें सहने के लिए मजबूर किया जाता है—लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे बुराई का बदला भलाई से देना चाहते हैं या वैसा करने में सक्षम हैं। मैंने अभी जो कहा है, वह मानवता के परिप्रेक्ष्य और मनुष्य की सहज प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। अगर अब हम इसे समाज के बारे में वस्तुनिष्ठ तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से देखें—अगर कोई बुराई का बदला भलाई से नहीं चुकाता, बल्कि बदला लेकर हत्या कर देता है, तो इसके परिणाम क्या होंगे? उन्हें कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा, उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है, जेल की सजा दी जा सकती है और संभवतः मौत की सजा भी हो सकती है। इसके आधार पर, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि चाहे मानवता के परिप्रेक्ष्य से हो या समाज और कानून की प्रतिबंधात्मक शक्ति से, जब लोगों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार होता है और बदले की भावना से हत्या कर दी जाती है, तो कोई भी व्यक्ति अपने मन से या अपने दिल की गहराइयों से नफरत निकालने में सक्षम नहीं होता। मौखिक हमले करने, ताने मारने या उपहास करने जैसे छोटे-मोटे नुकसानों के शिकार होने पर भी लोग बुराई का बदला भलाई से चुकाने में असमर्थ रहते हैं। क्या बुराई का बदला भलाई से चुकाने की क्षमता मानवता की सामान्य अभिव्यक्ति है? (नहीं।) फिर, जब किसी व्यक्ति को धमकाया जा रहा हो या नुकसान पहुँचाया जा रहा हो, तो उसकी मानवता कम से कम क्या चाहती और माँगती है? क्या कोई भी व्यक्ति खुशी-खुशी कहेगा : “आगे बढ़ो और मुझे धमकाओ! तुम ताकतवर और बुरे इंसान हो, तुम जैसे चाहो मुझे धमका सकते हो, और मैं तुम्हारी बुराई का बदला भलाई से चुकाऊँगा। तुम्हें मेरे नेक चरित्र और नैतिकता का सशक्त बोध होगा और मैं निश्चित रूप से तुमसे बदला नहीं लूँगा या तुम्हारे बारे में कोई राय नहीं बनाऊँगा। मैं तुम पर क्रोधित नहीं होऊँगा—मैं इन सबको सिर्फ एक मजाक के रूप में लूँगा। चाहे तुम्हारे द्वारा कही गई बातें मेरे चरित्र का कितना भी अपमान करें, मेरे गौरव को कितनी भी ठेस पहुँचाएँ या मेरे हितों का कितना भी नुकसान करें, यह सब ठीक है और तुम्हें बेझिझक जो भी कहना हो, कह दो।” क्या ऐसे लोग मौजूद हैं? (नहीं।) कोई भी वास्तव में अपनी शिकायतें भूलने में सक्षम नहीं है—अगर वह बदला लेने के लिए अपने दुश्मन की हत्या किए बिना कुछ समय तक रह सकता है, तो वह पहले ही अच्छा कर रहा है। इसलिए, कोई भी वास्तव में बुराई का बदला भलाई से चुकाने में सक्षम नहीं है, और अगर लोग इस नैतिक आचरण का अभ्यास करते भी हैं, तो ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्हें उस समय की विशिष्ट परिस्थितियों की बाध्यताओं के कारण उस तरह से कार्य करने के लिए मजबूर किया गया होगा, या इसलिए कि पूरी घटना वास्तव में मनगढ़ंत और काल्पनिक रही होगी। सामान्य परिस्थितियों में, जब लोग गंभीर उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं, तो वे द्वेष रखेंगे और प्रतिशोधी हो जाएँगे। एकमात्र परिस्थिति, जिसमें शायद कोई व्यक्ति अपनी घृणा से अवगत न हो पाए या उस पर प्रतिक्रिया न दे पाए, यह होगी कि वह घृणा बहुत ज्यादा हो और उसे इतना गंभीर झटका लगा हो कि वह अपनी याददाश्त या बुद्धि खो बैठा हो। लेकिन जिस भी व्यक्ति में सामान्य मानवता और विवेक है, वह नहीं चाहेगा कि उसके साथ अपमान, भेदभाव, निंदा, जगहँसाई, ताने, मजाक, नुकसान आदि का व्यवहार किया जाए, या कोई इस हद तक चला जाए कि उसके चरित्र और गरिमा को रौंद डाले और उसका अनादर करे; कोई भी व्यक्ति ऐसे लोगों को झूठे मन से नैतिक आचरण के साथ बदला चुकाकर प्रसन्न नहीं होगा, जिन्होंने पहले उसका अपमान किया हो या उसे नुकसान पहुँचाया हो—कोई भी ऐसा करने में सक्षम नहीं है। इस तरह, बुराई का बदला भलाई से चुकाने के नैतिक आचरण से संबंधित यह दावा भ्रष्ट मानवजाति को बहुत कमजोर, जोशरहित, खोखला और अर्थहीन प्रतीत होता है।

अगर हम इसे सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के परिप्रेक्ष्य से देखें, तो चाहे व्यक्ति कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो, और चाहे वह दुष्ट व्यक्ति हो या अपेक्षाकृत अच्छी मानवता वाला व्यक्ति, वे सभी आशा करते हैं कि दूसरे उनके साथ अच्छी तरह से और बुनियादी स्तर के सम्मान के साथ व्यवहार करेंगे। अगर कोई बिना किसी कारण के तुम्हारी चापलूसी और खुशामद करना शुरू कर दे, तो क्या इससे तुम्हें खुशी मिलेगी? क्या तुम उसे पसंद करोगे? (नहीं।) तुम उसे पसंद क्यों नहीं करोगे? क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगेगा, जैसे तुम्हें मूर्ख बनाया जा रहा हो? तुम सोचोगे : “क्या मैं तुम्हें तीन साल का बच्चा लगता हूँ? मैं यह समझने में कैसे असफल हो रहा हूँ कि तुम्हें मुझसे ये बातें कहने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है? क्या मैं उतना ही अच्छा हूँ, जितना तुम कहते हो? क्या मैंने उनमें से कोई भी चीज की? यह सब मूर्खतापूर्ण चापलूसी किसलिए है? तुम्हें खुद से घृणा कैसे नहीं होती?” लोग चापलूसी के शब्द सुनना पसंद नहीं करते और इसे एक तरह का अपमान समझते हैं। सम्मान की एक आधार-रेखा के अलावा, लोग और कैसे चाहते हैं कि दूसरे उनके साथ व्यवहार करें? (ईमानदारी के साथ।) लोगों से दूसरों के साथ ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए कहना असंभव होगा—अगर वे दूसरों को धमकाने से बचते हैं, तो यह पहले ही काफी अच्छा है। लोगों से एक-दूसरे को धमकाने से बचने के लिए कहना तुलनात्मक रूप से एक वस्तुनिष्ठ माँग है। लोग आशा करते हैं कि दूसरे उनका सम्मान करेंगे, उन्हें धमकाएँगे नहीं और, सबसे महत्वपूर्ण बात, उनके साथ उचित व्यवहार करेंगे। वे आशा करते हैं कि उनके कमजोर होने पर दूसरे उन्हें परेशान नहीं करेंगे, या उनकी गलतियाँ उजागर होने पर उन्हें बहिष्कृत नहीं करेंगे, या लगातार उनकी चापलूसी और खुशामद नहीं करेंगे। लोगों को इस तरह के व्यवहार घृणित लगते हैं और वे सिर्फ यह चाहते हैं कि उनके साथ उचित व्यवहार किया जाए—क्या ऐसा ही नहीं है? दूसरों के साथ उचित व्यवहार करना मनुष्य की दुनिया और उसकी सोच के दायरे में एक अपेक्षाकृत सकारात्मक आदर्श है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? इसके बारे में सोचो : सभी लोग बाओ झेंग को क्यों पसंद करते हैं? लोग मामलों का फैसला करते हुए बाओ झेंग के चित्रण देखना पसंद करते हैं, भले ही ये मामले काल्पनिक और पूरी तरह से मनगढ़ंत हों। लोग फिर भी उनका आनंद क्यों लेते हैं? वे फिर भी उन्हें देखने के इच्छुक क्यों होते हैं? क्योंकि, अपनी आदर्श दुनिया में, अपनी सोच के दायरे में और अपने दिल की गहराइयों में वे सभी एक सकारात्मक और थोड़ी बेहतर दुनिया की कामना करते हैं। वे चाहते हैं कि मनुष्य एक अपेक्षाकृत निष्पक्ष और न्यायपूर्ण सामाजिक परिवेश में, एक ऐसी दुनिया में रह सके, जिसमें हर किसी को इसकी गारंटी मिले। इस तरह, कम से कम, जब तुम्हें बुरी ताकतों द्वारा परेशान किया जाता है, तो एक ऐसी जगह होगी जहाँ न्याय बरकरार रहेगा, जहाँ तुम अपनी शिकायतें दर्ज करवा सकते हो, जहाँ तुम्हें शिकायत करने का अधिकार होगा, और अंततः, जहाँ तुम्हारे द्वारा सहे गए अन्याय पर कुछ प्रकाश डाला जाएगा। इस समाज और मानवजाति में एक ऐसी जगह होगी जहाँ तुम खुद को निरपराध साबित कर सकते हो, और निरंतर अपमान झेलने या शिकायतों का भार उठाने से खुद को बचा सकते हो। क्या यह मनुष्य का आदर्श समाज नहीं है? क्या हर व्यक्ति इसी की लालसा नहीं करता? (हाँ, बिल्कुल।) यह हर व्यक्ति का सपना है। लोग आशा करते हैं कि उनके साथ उचित व्यवहार किया जाएगा—वे किसी अनुचित व्यवहार के पात्र नहीं बनना चाहते, या यह नहीं चाहते कि अपने साथ गलत व्यवहार किए जाने पर उनके पास शिकायत करने के लिए कोई जगह ही न हो, और उन्हें यह बहुत तकलीफदेह लगता है। यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के नैतिक आचरण पर रखा गया “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” का मानक और अपेक्षा वास्तविक जीवन में मानवजाति की भ्रष्टता की वास्तविकता से बहुत दूर है। और इसलिए, मनुष्य के नैतिक आचरण से की गई यह अपेक्षा मनुष्य के प्रति विचारशील नहीं है, और यह वस्तुनिष्ठ तथ्य और वास्तविक जीवन से बहुत दूर है। यह उन आदर्शवादियों द्वारा प्रस्तावित कथन है जिन्हें ऐसे वंचित लोगों की आंतरिक दुनिया की कोई समझ नहीं है जिनके साथ अन्याय हुआ है और जिन्हें अपमानित किया गया है—इन आदर्शवादियों को इस बात का कोई एहसास नहीं है कि इन लोगों के साथ किस हद तक अन्याय हुआ है और उनकी गरिमा और चरित्र का कितना अपमान हुआ है, यहाँ तक कि उनकी अपनी निजी सुरक्षा भी कितनी खतरे में पड़ गई है। वे इन वास्तविकताओं को नहीं समझते और फिर भी ऐसी बातें कहते हुए अपेक्षा करते हैं कि ये पीड़ित अपने हमलावरों के साथ सामंजस्य बैठा लें और उनसे बदला लेने से बचें : “तुम्हारा जन्म दुर्व्यवहार किए जाने के लिए ही हुआ है और तुम्हें अपनी नियति स्वीकार लेनी चाहिए। तुम समाज के सबसे निचले वर्ग में पैदा हुए हो और तुम गुलामों वाली चीज से बने हो। तुम दूसरों द्वारा शासित होने के लिए पैदा हुए हो—तुम्हें उन लोगों से बदला नहीं लेना चाहिए जो तुम्हें नुकसान पहुँचाते हैं, इसके बजाय तुम्हें बुराई का बदला भलाई से चुकाना चाहिए। तुम्हें सामाजिक माहौल और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए और अपनी सकारात्मक ऊर्जा और अपना सर्वोत्तम नैतिक आचरण प्रदर्शित करके समाज में योगदान देना चाहिए।” यह सब समाज के उच्च सोपानकों और शासक वर्गों द्वारा निम्न वर्गों के शोषण को माफ करने, उन्हें यह सुविधा प्रदान करने और उनकी ओर से वंचितों के दिलों और भावनाओं को शांत करने के लिए स्पष्ट रूप से कहा गया है। क्या ऐसी बातें कहने का यही उद्देश्य नहीं है? (हाँ, बिल्कुल।) अगर प्रत्येक देश की कानूनी और सामाजिक व्यवस्थाएँ, और प्रत्येक जाति और कबीले की व्यवस्थाएँ और विनियम निष्पक्ष होते और सख्ती से लागू किए जाते, तो क्या फिर भी मानवता के नियमों के विपरीत चलने वाली इस पक्षपातपूर्ण कहावत को बढ़ावा देना आवश्यक होता? यह आवश्यक न होता। “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” कहावत स्पष्ट रूप से सिर्फ शासक वर्गों और उन बुरे लोगों के लिए एक अवसर और सुविधा के रूप में प्रचारित की गई है, जिनके पास वंचितों का शोषण करने और उन्हें रौंदने का अधिकार और शक्ति है। साथ ही, वंचित वर्गों को दिलासा देने और उन्हें अमीरों, कुलीनों और शासक वर्ग से बदला लेने या उनके प्रति शत्रुतापूर्ण होने से रोकने के लिए ये तथाकथित विचारक और शिक्षक खुद को नैतिक श्रेष्ठता के शिखर पर स्थापित करते हैं, इस कहावत का इस आवश्यकता के बहाने प्रचार करते हैं कि सभी लोग अच्छे नैतिक आचरण का अभ्यास करें। क्या इससे समाज के भीतर और ज्यादा अंतर्विरोध पैदा नहीं होते? जितना ज्यादा तुम लोगों को दबाते हो, समाज उतना ही ज्यादा अन्यायपूर्ण साबित होता है। अगर समाज वास्तव में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण होता, तो क्या फिर भी इस कहावत का उपयोग करके लोगों के नैतिक आचरण का आकलन करना और उससे अपेक्षाएँ रखना आवश्यक होता? यह स्पष्ट रूप से इस तथ्य के कारण है कि समाज में या मानवजाति के बीच कोई न्याय नहीं है। अगर कुकर्मी कानून द्वारा दंडित किए जा सकते, या अगर धनवान और शक्तिशाली लोग भी कानून के प्रति जवाबदेह होते, तो “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” कहावत अमान्य होती और मौजूद ही न होती। कितने आम लोग किसी अधिकारी को नुकसान पहुँचा पाएँगे? कितने गरीब लोग अमीरों का नुकसान कर पाएँगे? इसे हासिल करना उनके लिए कठिन होगा। इस तरह, “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” कहावत के लक्ष्य स्पष्ट रूप से आम लोग, गरीब और निम्न वर्ग हैं—यह एक अनैतिक और अन्यायपूर्ण कहावत है। उदाहरण के लिए, अगर तुम यह अपेक्षा करो कि कोई सरकारी अधिकारी बुराई का बदला भलाई से चुकाए, तो वह तुमसे कहेगा : “मुझे किस बुराई का बदला चुकाना है? कौन मुझसे उलझने की हिम्मत करेगा? कौन मुझे अपमानित करने का साहस करेगा? कौन मुझे ‘नहीं’ कहने का साहस करेगा? जो कोई भी मुझे नहीं कहेगा, मैं उसे मार डालूँगा—मैं उसके पूरे परिवार और उसके सभी रिश्तेदारों को खत्म कर दूँगा!” देखो, अधिकारियों को किसी बुराई का बदला नहीं चुकाना है, इसलिए “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” कहावत उनके लिए अस्तित्व में ही नहीं है। अगर तुम उनसे कहो : “तुम्हें बुराई का बदला भलाई से चुकाने के इस नैतिक आचरण का अभ्यास करना चाहिए, तुममें यह नैतिक आचरण होना चाहिए,” तो वे उत्तर देंगे : “जरूर, मैं ऐसा कर सकता हूँ।” यह पूरी तरह से एक भ्रामक झूठ है। हर हाल में, “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” अनिवार्य रूप से सामाजिक नैतिकतावादियों द्वारा निम्न वर्गों को दिलासा देने के एक तरीके के रूप में प्रचारित एक कहावत भर है, और इससे भी बढ़कर, यह एक ऐसी कहावत है जिसे निम्न वर्गों को गुलाम बनाने के लिए प्रचारित किया जाता है। इसे शासक वर्ग के अधिकार को और ज्यादा स्थिर करने, शासक वर्ग का पक्ष लेने और निम्न वर्गों की दासता कायम रखने के लिए प्रचारित किया जाता है, ताकि पीढ़ियों तक गुलाम रहने पर भी वे शिकायत न करें। इससे हम देख सकते हैं कि इस तरह के समाज में कानून और व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण हैं; इस तरह का समाज सत्य द्वारा नियंत्रित नहीं होता, वह सत्य, न्याय या धार्मिकता द्वारा शासित नहीं होता। इसके बजाय, वह मनुष्य की बुराई और ताकत द्वारा नियंत्रित होता है, चाहे अधिकारियों के रूप में कोई भी काम करे। अगर आम लोग अधिकारियों के रूप में काम करते, तो भी स्थिति बिल्कुल ऐसी ही होती। यही इस सामाजिक व्यवस्था का सार है। “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” इस तथ्य को उजागर करता है। इस वाक्यांश में स्पष्ट रूप से एक निश्चित राजनीतिक गुण है—यह शासक वर्गों के वर्चस्व और निम्न वर्गों की दासता सुदृढ़ करने के लिए मनुष्य के नैतिक आचरण को लेकर की गई एक अपेक्षा है।

न सिर्फ यह अपेक्षा कि लोग बुराई का बदला भलाई से चुकाएँ, मानवता की सामान्य जरूरतों या अपेक्षाओं या मानवता के चरित्र और गरिमा के अनुरूप नहीं है, बल्कि स्वाभाविक रूप से, यह व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता के मूल्यांकन के लिए उचित मानक तो बिल्कुल भी नहीं है। यह अपेक्षा वास्तविक मानवता से अब तक दूर है; बात सिर्फ इतनी नहीं है कि यह अप्राप्य है, बल्कि इसे कभी प्रचारित ही नहीं किया जाना चाहिए था। यह शासक वर्ग द्वारा जनता पर अपना शासन और नियंत्रण मजबूत करने के लिए लागू की गई एक कहावत और अपनाई गई रणनीति मात्र है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने कभी इस तरह की कहावत को बढ़ावा नहीं दिया है, चाहे व्यवस्था के युग में हो या फिर अनुग्रह के युग में या फिर राज्य के वर्तमान युग में, और परमेश्वर ने कभी लोगों की मानवता की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के आधार के रूप में इस तरह की पद्धति, कहावत या अपेक्षा का उपयोग नहीं किया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि चाहे कोई नैतिक हो या अनैतिक, और चाहे उसका नैतिक आचरण कितना भी अच्छा या बुरा क्यों न हो, परमेश्वर सिर्फ उसके सार पर विचार करता है—नैतिक आचरण से संबंधित ये कहावतें परमेश्वर के दायरे में मौजूद ही नहीं हैं। इस तरह, नैतिक आचरण से संबंधित “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” कहावत परमेश्वर के घर में अमान्य है और विश्लेषण के योग्य भी नहीं है। चाहे तुम बुराई का बदला भलाई से चुकाओ, या बुराई का बदला प्रतिशोध से चुकाओ, परमेश्वर में विश्वास करने वालों को “बुराई का बदला चुकाने” के मामले को कैसे देखना चाहिए? उन्हें इस मामले को किस रवैये और दृष्टिकोण से देखना और लेना चाहिए? अगर कोई कलीसिया में बुरा कार्य करता है, तो उस व्यक्ति से निपटने के लिए परमेश्वर के घर के अपने प्रशासनिक आदेश और सिद्धांत हैं—किसी को पीड़ित के लिए प्रतिशोध लेने या अन्याय से उसका बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। परमेश्वर के घर में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है और कलीसिया स्वाभाविक रूप से सिद्धांतों के अनुसार समस्या को सँभाल लेगी। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे लोग देख सकते हैं और जिसका सामना कर सकते हैं। इसे बहुत स्पष्ट और सटीक रूप से कहें, तो : लोगों को सँभालने के लिए कलीसिया के पास सिद्धांत हैं और परमेश्वर के घर के पास प्रशासनिक आदेश हैं। तो फिर परमेश्वर के बारे में क्या खयाल है? जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, जो व्यक्ति बुरा करेगा, उसे तदनुसार दंडित किया जाएगा, और परमेश्वर तय करेगा कि उसे कब और कैसे दंडित किया जाए। परमेश्वर के दंड के सिद्धांत उसके स्वभाव और सार से बिल्कुल अविभाज्य हैं। परमेश्वर के पास धार्मिक और ऐसा स्वभाव है जिसका अपमान नहीं किया जा सकता, उसमें प्रताप और क्रोध है, और जो भी बुराई करते हैं, उन्हें तदनुसार दंडित किया जाएगा। यह मनुष्य के नियमों से कहीं ज्यादा उत्कृष्ट है, यह मानवता और सभी धर्मनिरपेक्ष कानूनों से बढ़कर है। यह न केवल निष्पक्ष, उचित और मानवता की इच्छाओं के अनुरूप है, बल्कि इसके लिए हर किसी की प्रशंसा और पुष्टि की भी आवश्यकता नहीं है। इसके लिए तुम्हें नैतिक श्रेष्ठता के शिखर से मामलों का मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं है। जब परमेश्वर ये चीजें करता है, तो उसके अपने सिद्धांत होते हैं और ऐसा समय होता है। इसे परमेश्वर पर छोड़ देना चाहिए कि वह जैसा चाहे वैसा करे, और लोगों को इसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। “बुराई का बदला चुकाने” के मामले में परमेश्वर लोगों से क्या चाहता है? यही कि वे उतावलेपन से दूसरे लोगों पर कार्रवाई न करें या उनसे बदला न लें। अगर कोई तुम्हें अपमानित करता है, परेशान करता है, यहाँ तक कि तुम्हें नुकसान भी पहुँचाना चाहता है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या ऐसी चीजों से निपटने के लिए कोई सिद्धांत हैं? (हाँ, हैं।) इन चीजों के लिए परमेश्वर के वचनों और सत्य में समाधान, सिद्धांत और आधार हैं। अन्य किसी भी चीज के बावजूद, नैतिक आचरण से संबंधित कहावत, “बुराई का बदला भलाई से चुकाओ” लोगों की मानवता की गुणवत्ता आँकने का कोई मानक भी नहीं है। ज्यादा से ज्यादा, अगर कोई बुराई का बदला भलाई से चुकाने में सक्षम है, तो यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत सहिष्णु, सरल, अच्छी प्रकृति वाला और उदार व्यक्ति है, वह क्षुद्र नहीं है, और उसमें कामचलाऊ नैतिक आचरण है। लेकिन, क्या इस एक कहावत के आधार पर इस व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता का मूल्यांकन और निर्णय किया जा सकता है? नहीं, बिल्कुल नहीं। व्यक्ति को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वह किस चीज का अनुसरण करता है, किस मार्ग पर चलता है, सत्य और सकारात्मक चीजों के प्रति उसका क्या रवैया है, इत्यादि। यह इस बात का सटीक रूप से आकलन करने का एकमात्र तरीका है कि उसमें मानवता है या नहीं।

इससे आज की हमारी संगति समाप्त होती है।

26 मार्च, 2022

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परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन सत्य के अनुसरण के बारे में I न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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