391 परमेश्वर में आस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता

I

परमेश्वर जो करता है उसे समझने का प्रयास करो,

परमेश्वर के पक्ष में खड़े रहकर,

उसके वचनों के ज़रिये चीज़ों को देखो।

इस तरह नज़रिया तुम्हारा सही होगा।

इस तरह नज़रिया तुम्हारा सही होगा।


II

जो कुछ भी तुम करते हो उसे,

परमेश्वर के संग अपने सामान्य रिश्ते से तौलो।

गर परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य हैं तुम्हारे,

इरादे सही हैं तुम्हारे तो उस काम को करो।

परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य बनाए रखने के लिये,

तुम डर नहीं सकते इस बात से, कहीं नुकसान न हो।

परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते,

होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी

जिसे विश्वास है परमेश्वर में।

यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये,

सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।


III

तुम शैतान को इजाज़त दे नहीं सकते, वो हावी हो तुम पर,

काबू करे तुम्हें, हँसी का पात्र बनाए तुम्हें।

ऐसा इरादा निशानी है कि

परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य हैं तुम्हारे।

देह के लिये नहीं, है ये आत्मा की शांति के लिये।

परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की ख़ातिर,

है ये पवित्र आत्मा के कार्य को पाने के लिये।


IV

सही स्थिति में प्रवेश के लिए,

परमेश्वर के संग रिश्ता तुम्हें मज़बूत बनाना होगा।

परमेश्वर में विश्वास का नज़रिया अपना दुरुस्त करना होगा।

ये परमेश्वर को अनुमति देना है वो प्राप्त करे तुम्हें,

अपने वचनों के फल प्रकट करे तुम में।

परमेश्वर को अनुमति देना कि वो और अधिक प्रबुद्ध करे तुम्हें।

इस तरह सही रीति में प्रवेश करोगे तुम।


V

खाते-पीते रहो परमेश्वर के मौजूदा वचनों को।

पवित्र आत्मा के काम के वर्तमान मार्ग में प्रवेश करो।

पुरानी प्रथाओं और तौर-तरीकों पर चलने के बजाय,

परमेश्वर की आज की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करो।

इस तरह, परमेश्वर के संग होंगे रिश्ते सामान्य तुम्हारे।

और परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर होगे तुम।

परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते,

होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी

जिसे विश्वास है परमेश्वर में।

यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये,

सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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