949 परमेश्वर के क्रोध का प्रतीकात्मक अर्थ

I

दी जाती है चुनौती जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को,

जब धर्मी शक्तियाँ रोकी जाती हैं, इंसान द्वारा अनदेखी की जाती हैं,

तब भेजता है परमेश्वर अपने क्रोध को।

तब भेजता है परमेश्वर अपने क्रोध को।

परमेश्वर के सार के कारण धरा की ताकतें सारी,

जो करती मुकाबला और विरोध परमेश्वर का, बुरी हैं, वे अधर्मी हैं।

वे सारी ताकतें शैतान की हैं और आती उसी से हैं।

चूँकि परमेश्वर धर्मी है, प्रकाश है, पवित्र है,

सभी शैतान की चीज़ें जो दूषित हैं, बुरी हैं,

सभी हो जाएंगी ग़ायब यहां से, यहां से।

ये होगा तब परमेश्वर भेजेगा क्रोध जब अपना।

ये होगा तब परमेश्वर भेजेगा क्रोध जब अपना।


II

रोक दी जाएंगी बुरी शक्तियाँ सारी, भेजेगा परमेश्वर क्रोध जब अपना।

रोक दिये जाएंगे पाप सारे, जो कष्ट दें इंसान को,

भेजेगा परमेश्वर क्रोध जब अपना।

ज्ञात हो जाएंगी बैरी शक्तियाँ सारी,

कर दिया जाएगा उनको अलग और शापित, और शापित।

उखाड़ा जाएगा जड़ से, सज़ा दी जाएगी, जो मददगार हैं शैतान के,

परमेश्वर भेजेगा क्रोध जब अपना।

काम परमेश्वर का बढ़ता जाता है, आती नहीं बाधा कोई।

चलती रहती है नियत समय पर, प्रबंधन योजना परमेश्वर की।

परमेश्वर भेजता है क्रोध जब अपना, ये उसके बाद होता है।

चुना है जिनको परमेश्वर ने, वो शैतान के बवाल और चाल से आज़ाद हैं।

परमेश्वर के अनुयायी पाते हैं पोषण उससे, शान्ति के माहौल में।

परमेश्वर भेजता है क्रोध जब अपना, ये उसके बाद होता है।

परमेश्वर भेजता है क्रोध जब अपना, ये उसके बाद होता है।


III

क्रोध परमेश्वर का कवच है,

जो बुरी ताकतों को, बढ़ने से, बेकाबू होने से रोकता है।

क्रोध परमेश्वर का कवच है,

जो करता है रक्षा उन चीज़ों के अस्तित्व की, जो धर्मी हैं जो सच्ची हैं।

कवच है क्रोध परमेश्वर का, जो करता है रक्षा दमन से, और तबाही से,

उन चीज़ों की जो धर्मी हैं जो सच्ची हैं।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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