730 परमेश्वर का अधिकार जो मानते हैं, उनका भाव ऐसा होना चाहिए

I

इंसान की तकदीर पर, परमेश्वर के अधिकार को, प्रभुत्व को,

कैसे जाने और माने इंसान?

इसी सवाल का सामना, करता है हर इंसान।

जब आए परेशानी तुम्हारी ज़िंदगी में,

कैसे थाह पाओगे, अनुभव करोगे

परमेश्वर के अधिकार को, प्रभुत्व को?

जब इन मसलों को समझ न पाओ, संभाल न पाओ,

और न तुम अनुभव कर पाओ,

तो परमेश्वर के प्रभुत्व और योजना के पालन में,

अपनी इच्छा, अभिलाषा दर्शाने को, कैसा रुख़ अपनाओगे तुम?


II

परमेश्वर के समय का, लोगों का, घटनाओं का,

उसके द्वारा आयोजित चीज़ों का, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार।

परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार,

जिन्हें वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा।

लोगों और चीज़ों के ज़रिये खोजना चाहिये तुम्हें,

कितने दयालु हैं इरादे परमेश्वर के,

समझनी चाहिये सच्चाई उसकी, चलना चाहिये उसकी राह पर,

जानना चाहिये उन नतीजों को, नतीजों को, उपलब्धियों को जानना चाहिये,

जिन्हें वो करना चाहता है इंसान में हासिल।

तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार,

तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा।


III

अधीन हो जाओ, स्वीकार लो परमेश्वर का प्रभुत्व

और तमाम चीज़ें जिनकी, व्यवस्था की है उसने।

जान लो किस तरह नियति पर चलता हुक्म उसका,

जान लो किस तरह इंसान का,

अपने जीवन से पोषण वो करता,

किस तरह सच्चाई को इंसान का जीवन है बनाता।

हर चीज़ परमेश्वर की योजना और प्रभुत्व के अधीन,

चलती कुदरती कानून से।

अगर तुम ठान लो कि परमेश्वर ही राह दिखलाए,

व्यवस्था करे, हर चीज़ तुम्हारे लिये वो ही चलाए,

तो तुम्हें रुकना, खोजना और अधीन होना होगा।

तो तुम्हें रुकना, खोजना और अधीन होना होगा।

जो समर्पित होते हैं उसके आगे उन्हें, यही रवैया अख़्तियार करना होगा।

जिनमें लगन है इस हुनर को पाने की, वही पहुँचेंगे असल सच्चाई पर।

तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार,

तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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