401 परमेश्वर में विश्वास का महत्व बहुत गहरा है

1 अब तुम लोगों ने अभी भी परमेश्वर में विश्वास के महत्व की सम्पूर्ण समझ को प्राप्त नहीं किया है। वास्तव में, परमेश्वर में विश्वास का महत्व इतना गहन है कि लोग इसकी थाह पा सकने में असमर्थ हैं। अंत में, लोगों के भीतर की चीज़ें जो शैतान की हैं और उनकी प्रकृति की चीज़ें अवश्य बदलनी चाहिए और सत्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अवश्य बननी चाहिए; केवल इसी तरह कोई व्यक्ति वास्तव में उद्धार प्राप्त कर सकता है। यदि, जैसा कि जब तू धर्म के भीतर था तू किया करता था, तू कुछ सिद्धांतों के वचन झाड़ता या नारे लगाता है, और फिर थोड़े-बहुत अच्छे कर्म करता, थोड़ा और अच्छा व्यवहार करता है और कुछ स्पष्ट पापों को करने से दूर रहता है, तब भी इसका मतलब यह नहीं है कि तूने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रख दिया है।

2 क्या नियमों का पालन कर पाना यह बताता है कि तू सही राह पर चल रहा है? यदि तेरी प्रकृति के भीतर की चीज़ें नहीं बदली हैं, तो अंत में तू तब भी परमेश्वर का विरोध करेगा और उसका अपमान करेगा। यह तेरी सबसे बड़ी समस्या होगी। यदि परमेश्वर में तेरे विश्वास में, तू इस समस्या का समाधान नहीं करता है, तो क्या तुझे बचाया हुआ माना जा सकता है? परमेश्वर ये वचन इसलिए कहता है ताकि तुम अपने हृदय में यह समझ लो कि परमेश्वर में विश्वास को परमेश्वर के वचनों से, परमेश्वर से या सत्य से पृथक नहीं किया जा सकता। तुझे अपने मार्ग को अच्छी तरह से चुनना चाहिए, सत्य में प्रयास लगाना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों में प्रयास लगाना चाहिए। केवल अध-पका ज्ञान, या थोड़ी-बहुत समझ प्राप्त मत कर और फिर यह मत सोच कि तेरा काम हो गया; यदि तू स्वयं को धोखा देता है, तो तू केवल अपने आप को ही नुकसान पहुँचाएगा।

3 लोगों को परमेश्वर के अपने विश्वास से भटकना नहीं चाहिये; अंत में, अगर उनके दिल में परमेश्वर का वास नहीं है, किताब को मात्र हाथ में लेकर ऐसे पढ़ते हैं मानो घुड़सवारी करते हुए फूलों की सराहना कर रहे हों, तब वे नष्ट हो जाते हैं। क्या ये शब्द, "परमेश्वर में इंसान की आस्था को परमेश्वर के वचनों से अलग नहीं किया जा सकता" इन वचनों को कि "परमेश्वर में आस्था को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता" काटते हैं? अगर तुम्हारे दिल में परमेश्वर के वचन नहीं हैं, तो परमेश्वर तुम्हारे दिल में कैसे हो सकता है? अगर तुम परमेश्वर में आस्था रखते हो, मगर तुम्हारे दिल में न तो परमेश्वर का वास है, न उसके वचनों का और न ही तुम्हारे हृदय में उसका मार्गदर्शन है, तो तुम पूरी तरह से नष्ट हो गये। अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार एक छोटी सी चीज़ भी नहीं कर सकते, तो सिद्धांत की किसी बड़ी समस्या का सामना होने पर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर पाने में और भी अधिक असमर्थ होगे। इसका मतलब है कि तुम गवाही नहीं दे सकोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सर्वाधिक जोख़िम उन्हें है जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया है' से रूपांतरित

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