933 मनुष्य को परमेश्वर की रचनाओं को संजोकर रखना चाहिए

1

ईश्वर इंसान को मालिक बनाए सब चीजों का करने दे प्रबंधन उनका।

पर इंसान ईश्वर की रचना को संभाल न पाता।

इंसान ने सबकुछ बर्बाद किया।

इंसान ने पर्वत काट दिए, समंदर पाट दिए।

मैदानों को रेगिस्तान बना दिया, ईश्वर की रची हुई, सुंदरता की जगह पर,

उद्योग लगा दिया, सबकुछ तबाह कर दिया।

नदियाँ अब नदियाँ नहीं रहीं, समंदर अब समंदर नहीं रहे।

इंसान का रवैया ऐसा होना चाहिए चीज़ों के प्रति:

उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे, कुशलता से उनका इस्तेमाल करे।

बाकी रचना से इंसान अलग न रह सके।

इसलिए इंसान उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे।

2

एक बार इंसान अगर ईश-रचना के संतुलन को,

प्राकृतिक परिवेश, उसके नियमों को तोड़ दे,

तो उसकी मौत का, आपदा का दिन दूर नहीं।

वो दिन आ रहा है, ये लाज़मी है।

वो दिन जब आएगा, तो इंसान ईश्वर की बनायी

चीज़ों के मूल्य को, उनके महत्व को जानेगा।

जहाँ समय पर हवा और बारिश आए, वहाँ रहना जैसे स्वर्ग में रहना है।

मगर इंसान इस आशीष को न समझे।

मगर जब वो इसे गँवा देगा, तो जानेगा ये सब कितना दुर्लभ और कीमती है।

इंसान का रवैया ऐसा होना चाहिए चीज़ों के प्रति:

उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे, कुशलता से उनका इस्तेमाल करे।

बाकी रचना से इंसान अलग न रह सके।

इसलिए इंसान उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे।

3

एक बार सब चला गया तो क्या ईश्वर की इच्छा

बिना उसे वापस पा सकता इंसान?

क्या रास्ता है इंसान के पास? रोक दो बर्बादी!

तब परिवेश फिर ख़ुद को संतुलित कर लेगा।

इस बर्बादी को रोक दो, इस लूट को और तबाही को रोक दो।

ऐसा करने से ईश्वर-रचित हर चीज़ बहाल हो जाएगी।

ऐसा न करने पर, धरती के हर जीवन

के लिए परिवेश और भी ख़राब हो जाएगा,

वक्त के साथ बर्बादी और तेज़ होगी।

इंसान का रवैया ऐसा होना चाहिए चीज़ों के प्रति:

उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे, कुशलता से उनका इस्तेमाल करे।

बाकी रचना से इंसान अलग न रह सके।

इसलिए इंसान उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे।

इसलिए इंसान उन्हें संजोए, उनकी रक्षा करे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII' से रूपांतरित

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