परमेश्वर की सेवकाई के बारे में वचन

अंश 71

तुम सभी सत्य की दिशा में संघर्ष करना चाहते हो। बीते दिनों में, परमेश्वर के वचनों में सत्य के भिन्न-भिन्न पहलुओं का निचोड़ निकालने में थोड़ा प्रयास किया। इससे कुछ लोगों को मामूली लाभ मिला, जबकि कुछ लोग नियमों के पालन में ही लगे रहे और भटक गए। नतीजतन, उन्होंने सत्य के हर एक पहलू को नियमों के पालन में बदल दिया। जब तुम लोग सत्य का निचोड़ इस तरीके से निकालते हो, तब तुम सत्य के भीतर से दूसरों को जीवन पाने या उनके स्वभाव में बदलाव लाने में मदद नहीं करते हो; बल्कि, तुम उन्हें सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान या धर्म-सिद्धांत के माहिर बना रहे होते हो। यह कुछ ऐसा है मानो वे परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझते हों, जबकि असल में, उन्हें कुछ धर्म-सिद्धांतों और शब्दों में ही महारत प्राप्त होती है; उनके पास सत्य में निहित अर्थ की समझ नहीं होती है। यह ठीक धर्मशास्त्र या बाइबल को पढ़ने जैसा है; बाइबल के कुछ ज्ञान और धर्मशास्त्र के कुछ सिद्धांतों का सारांश निकालने के बाद, लोगों ने सिर्फ बाइबल के कुछ ज्ञान और सिद्धांतों की समझ ही हासिल की है। वे उन शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को बोलने में तो निपुण होते हैं, लेकिन उनके पास कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता। उनके पास अपने भ्रष्ट स्वभाव की कोई समझ नहीं है, उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ तो और भी कम है। कुल मिलाकर, इन्होंने जो हासिल किया है वह सिर्फ कुछ धर्म-सिद्धांत और ज्ञान की बातें हैं; यह तो नियमों का समूह मात्र है। उन्हें व्यावहारिक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। अगर परमेश्वर कोई नया कार्य करता है तो क्या ऐसे लोग उसे अपनाने और उसके प्रति समर्पित होने में समर्थ हो सकते हैं? क्या तुम अपने द्वारा निकाले गए सत्य के निचोड़ से इसका कोई मेल बिठा सकते हो? अगर तुम इसका मिलान कर सकते हो और तुम्हारे पास कुछ समझ भी हो, तो तुमने जो चीजें निचोड़ में निकाली हैं, वे कुछ हद तक व्यावहारिक हैं। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते, तो निचोड़ में निकाली गई वे चीजें बस नियम ही हैं और उनका कोई महत्व नहीं है। ऐसे में, क्या इस तरह सत्य का निचोड़ निकालना सही है? क्या यह सत्य को समझने में लोगों की मदद कर सकता है? अगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, तो ऐसा करना बिल्कुल निरर्थक है। इससे लोग सिर्फ धर्मशास्त्र का अध्ययन ही करते रहते हैं। उन्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य का अनुभव नहीं हो पाता। इसीलिए पुस्तकों का संपादन करते समय कलीसिया में सिद्धांत जरूर होने चाहिए। उन्हें लोगों को सत्य को आसानी से समझाने, उसमे प्रवेश का रास्ता दिखाने और उनके दिलों में रोशनी लाने में मदद करने में सक्षम होना चाहिए। इससे सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाता है। तुम्हें धर्म में मौजूद उन लोगों की तरह नहीं होना है जो बाइबल और धर्मशास्त्र के ज्ञान का विधिवत अध्ययन करते हैं। इससे लोगों को सिर्फ बाइबल के ज्ञान, धार्मिक अनुष्ठानों और नियमों की जानकारी मिलेगी, जो उन्हें एक दायरे में सीमित कर देगी। इसमें लोगों को परमेश्वर के समक्ष लाने की क्षमता नहीं है, ताकि वे सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझ सके। तुम सोचते हो कि सवालों की झड़ी लगाने और फिर उनका जवाब देने से, या मूल बिंदुओं को चिह्नित करने और कुछ वाक्यों में सत्य का सारांश और निचोड़ निकालने से, ये मुद्दे अपने-आप स्पष्ट हो जाएँगे और भाई-बहनों को आसानी से समझ आएँगे। तुम्हें लगता है कि यह सही दृष्टिकोण है। लेकिन, लोग इसे पढ़कर सत्य में निहित अर्थ को समझ नहीं पाएँगे; वे कभी भी इसका वास्तविकता से मेल नहीं बिठा पाएँगे। वे सिर्फ कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों में माहिर हैं। इसलिए इन कामों को करने से अच्छा होगा कि इन्हें किया ही न जाए! ऐसा करना लोगों को ज्ञान के बारे में समझाने और उसमें महारत हासिल करने की दिशा में लाने का एक तरीका है। तुम लोगों को धर्म-सिद्धांत और धर्म की ओर जाने का रास्ता दिखा रहे हो और धर्म-सिद्धांत के संदर्भ में उन्हें परमेश्वर में विश्वास दिलाने और उसका अनुसरण करवाने के लिए प्रेरित कर रहे हो। क्या यही वह रास्ता नहीं है जिस पर पौलुस ने लोगों को परमेश्वर में विश्वास दिलाने की ओर प्रेरित किया? तुम लोगों का सोचना है कि आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत को समझ लेना ही खास महत्व रखता है, और परमेश्वर के वचनों को जानना महत्वपूर्ण नहीं है। यह एक भारी भूल है। ऐसे कई लोग हैं जो इस बात पर ध्यान देते हैं कि वे परमेश्वर के कितने सारे वचन याद कर सकते हैं, कितने सारे धर्म-सिद्धांतों के बारे में बता सकते हैं, और कितने सारे आध्यात्मिक सूत्रों की खोज कर सकते हैं। इसी वजह से तुम लोग हमेशा सत्य के हर पहलू का विधिवत निचोड़ निकालना चाहते हो ताकि हर कोई सुर में सुर मिलाकर बात करे, एक ही धर्म-सिद्धांत का पाठ करे, एक ही ज्ञान सहेजे और एक जैसे नियमों पर चले। यही तुम लोगों का लक्ष्य है। लगता है मानो तुम लोग ऐसा अन्य लोगों को सत्य की बेहतर समझ देने के लिए करते हो, लेकिन यह नहीं जानते हो कि तुम लोगों को परमेश्वर के वचनों के धर्म-सैद्धांतिक नियम बता रहे हो, इससे तो वे सिर्फ परमेश्वर के वचनों की सत्य वास्तविकता से और भी दूर भटक जाएँगे। लोगों को सत्य समझने में सच में मदद करने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के पाठ को वास्तविकता और लोगों की भ्रष्ट दशाओं के साथ जोड़ना होगा। तुम्हें अपने अंदर की समस्याओं पर विचार करना और खुद के भ्रष्ट स्वभावों के बारे में आत्ममंथन करना चाहिए। फिर तुम्हें परमेश्वर के वचनों में सत्य की खोज करके इन समस्याओं को सुधारना चाहिए। यही लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करते हुए उन्हें सत्य समझाने और वास्तविकता में प्रवेश कराने का एकमात्र तरीका है। सिर्फ इसी नतीजे को हासिल करके तुम वास्तव में लोगों को परमेश्वर के समक्ष लाते हो। अगर तुम सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांत, धर्म-सिद्धांत और नियमों के बारे में बात करते हो; अगर तुम्हारा ध्यान सिर्फ इसे निश्चित करने पर केन्द्रित है कि लोगों का व्यवहार अच्छा हो; अगर तुम सिर्फ यही हासिल करना चाहता है कि लोग एक ही बात बोलें और एक ही नियमों का पालन करें, लेकिन तुम उन्हें सत्य की समझ देनें में नाकाम होते हो, और उन्हें खुद को बेहतर ढंग से समझने में मदद नहीं कर पाते हो, ताकि वे पश्चात्ताप कर सकें और अपने में बदलाव ला सकें, तो तुमने जो कुछ भी समझा है, वह सिर्फ शब्द और धर्मसिद्धांत हैं, तुम किसी भी सत्य वास्तविकता को नहीं जानते। अंत में, इस तरीके से परमेश्वर पर विश्वास करके, तुम न सिर्फ सत्य को पाने में नाकाम रहोगे, बल्कि खुद की प्रगति में भी बनोगे और अपने को ही खो दोगे—तुम कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे।

क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के बोलने के किन्हीं ढर्रों पर गौर किया है? कुछ लोग इसे ऐसे बताते हैं : परमेश्वर के हरेक प्रवचन की विषय-वस्तु के कई पहलू होते हैं। हर एक अंश और हर एक वाक्य का अर्थ अलग-अलग है। इंसान के लिए इसे न तो याद रखना आसान है, न ही लोगों के लिए इसे समझ पाना। अगर लोग हर एक अंश के मुख्य विचार को संक्षेप में बताना भी चाहें, तो वे नहीं बता पाएँगे। कम काबिलियत वाले लोग परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकते। उनके साथ चाहे जैसी भी संगति करें, फिर भी वे सत्य को समझने में नाकाम होते हैं। परमेश्वर के वचन कोई उपन्यास, गद्य या साहित्यिक रचनाएँ नहीं हैं; वे सत्य हैं, और ऐसी भाषा है जो इंसान को जीवन देता है। इन वचनों को इंसान उन पर सिर्फ चिंतन-मनन करके नहीं समझ सकता है, न ही लोग थोड़े और प्रयास करके उनके भीतर के ढर्रों का सार निकाल सकते हैं। इसीलिए, चाहे तुझे सत्य के किसी भी पहलू के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान रहे, और तुम कुछ साफ-साफ बता भी सको, फिर भी तुम शेखी नहीं बघार सकते, क्योंकि तुम जो समझते हो वह महज आंशिक ज्ञान है। यह महज सतह की खुरचन है, यह समुद्र में एक बूँद-सा है, और परमेश्वर के सच्चे इरादों को समझने के मुकाबले काफी कम पड़ता है। परमेश्वर के हर प्रवचन में सत्य के कई पहलू होते हैं। जैसे कि कोई प्रवचन परमेश्वर के देहधारण के रहस्यों के बारे में बताता है। इसमें देहधारण का अर्थ, देहधारण से पूरा किया जाने वाला कार्य और लोगों के परमेश्वर पर विश्वास करने का तरीका शामिल हैं। इसमें यह भी आ सकता है कि लोग परमेश्वर को कैसे जानें और परमेश्वर से कैसे प्यार करें। इसमें सत्य के कई पहलू शामिल हैं। अगर, तुम यह सोचते हो कि देहधारण के बस कुछ ही अर्थ हैं, जिन्हें कई वाक्यों में समेटा जा सकता है, तो इंसान अपने मन में हमेशा परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ क्यों रखता है? देहधारण का कार्य लोगों पर क्या प्रभाव छोड़ना चाहता है? यह लोगों को परमेश्वर के वचन सुनने और परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम बनाता है। यह इंसान से संवाद करने, इंसान को प्रत्यक्ष रूप से बचाने और उसे परमेश्वर के बारे में जानने में सक्षम करने के लिए किया जाता है। परमेश्वर को जानने के बाद, लोग स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का भय मानने लगते हैं, और उन के लिए परमेश्वर के प्रति समर्पित होना आसान होता है। इसीलिए उसके वचन या सत्य का कोई भी पहलू उतना सरल नहीं जितना तुम सोचते हो। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और दिव्य भाषा को इतना सरल मानते हो, यह सोचते हो कि किसी भी समस्या का हल परमेश्वर के वचनों के एक अंश से ही हो सकता है, तो तुम सत्य को पूरी तरह से नहीं समझते। भले ही तुम्हारी समझ सत्य के अनुरूप हो, फिर भी यह एकतरफा है। परमेश्वर का हर एक प्रवचन कई परिप्रेक्ष्यों से बोला जाता है। परमेश्वर के वचनों का सार-संक्षेप या निचोड़ इंसान नहीं निकाल सकता। उनका निचोड़ निकलने के बाद, तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के वचनों का एक अंश सिर्फ एक ही मसले को हल करता है, जबकि असल में वह अंश कई समस्याओं का समाधान कर सकता है। तुम उसे संक्षिप्त या परिसीमित नहीं कर सकते, क्योंकि सत्य के सभी पहलुओं में कई वास्तविकताएँ छिपी होती हैं। ऐसा क्यों कहा जाता है कि सत्य ही जीवन है, कि लोग इसका आनंद ले सकते हैं, और यह कुछ ऐसा है कि कई जन्मों या सैकड़ों सालों के बाद भी जिसे लोग पूरी तरह अनुभव नहीं कर सकते हैं? अगर तुम सत्य के किसी पहलू या परमेश्वर के वचनों के किसी अंश का निचोड़ निकालते हो, तो तुमने जिस अंश का निचोड़ निकाला है वह एक सूत्र, एक नियम, एक धर्म-सिद्धांत बन जाता है—यह अब सत्य नहीं रह जाता है। भले ही ये परमेश्वर के मूल वचन हैं, एक भी शब्द बदले बिना, अगर तुम उसका इस प्रकार निचोड़ निकालकर व्यवस्थित करते हो, तो वे सत्य नहीं, बल्कि सैद्धांतिक शब्द बन जाते हैं। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों को गुमराह कर धर्म-सिद्धांत की ओर ले जाओगे, तुम अपने धर्म-सिद्धांत के अनुसार उन्हें सोचने, कल्पना करने, समस्याओं पर विचार करने और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के लिए मजबूर करोगे। इसे बार-बार पढ़ने के बाद, लोग सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत को समझ कर उस अंश में एक नियम को खोज निकालेंगे, और उस पहलू को देख नहीं पाएंगे जो सत्य वास्तविकता है। अंत में, तुम लोगों को धर्म-सिद्धांत समझाने और नियमों का पालन कराने के मार्ग पर लेकर जाओगे। वे लोग नहीं जान पाएँगे कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें। वे लोग सिर्फ धर्म-सिद्धांतों को समझेंगे और धर्म-सिद्धांतों की चर्चा करेंगे, लेकिन न तो सत्य समझेंगे और न ही परमेश्वर को जान पाएँगे। उन लोगों के मुँह से जो भी निकलेगा वह सुनने में सुखद और सही धर्म-सिद्धांत जैसा लगेगा, फिर भी उनमें रत्ती-भर वास्तविकता नहीं रहेगी और उनके लिए कोई साध्य मार्ग भी नहीं होगा। वास्तव में ऐसी अगुआई इंसान को बहुत नुकसान पहुँचाती है!

क्या तुम लोगों को पता है कि परमेश्वर की सेवा में इंसान की सबसे बड़ी वर्जना क्या है? कुछ अगुआ और कार्यकर्ता हमेशा अलग दिखना चाहते हैं, बाकी लोगों से आगे रहना और दिखावा करना चाहते हैं और नई-नई तरकीबें ढूँढने में लगे रहना चाहते हैं, ताकि परमेश्वर को दिखा सकें कि वास्तव में वे कितने सक्षम हैं। लेकिन, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। यह काम करने का सबसे मूर्खतापूर्ण तरीका है। क्या यह असल में घमंडी स्वभाव को नहीं दिखाता है? कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, “अगर मैं ऐसा करता हूँ, तो मुझे यकीन है कि इससे परमेश्वर खुश होगा; वह इसे पसंद करेगा। इस बार मैं परमेश्वर को ऐसा करके दिखाऊँगा; यह उसे एक सुखद आश्चर्य देगा।” “सुखद आश्चर्य” से कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे क्या होगा? ऐसे लोग जो करते हैं दूसरे लोग बेतुका समझते हैं। परमेश्वर के घर के कार्य में इनके रहने से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है, बल्कि वे पैसे की बर्बादी हैं—वे परमेश्वर की भेंट को नुकसान पहुँचाते हैं। परमेश्वर की भेंट का उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जाना चाहिए; परमेश्वर की भेंट को बर्बाद करना पाप है। ये लोग अंततः परमेश्वर के स्वभाव का अनादर करते हैं, पवित्र आत्मा उनमें काम करना बंद कर देता है, और उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार, कभी भी आवेग में आकर अपनी मनमर्जी नहीं करनी चाहिए। तुम नतीजे पर क्यों विचार नहीं कर पाते? परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने के कारण जब तुझे हटा दिया जायगा, तो तेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं बचेगा। जाने-अनजाने तेरी मंशा चाहे जो कुछ भी हो, अगर तुम परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा को नहीं समझोगे, तो तुम उसे आसानी से अपमानित कर दोगे और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर बैठोगे; यह ऐसी बात है जिसे लेकर सबको सतर्क रहना चाहिए। परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के उल्लंघन या परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करने पर, अगर यह मामला बेहद गंभीर है, तो परमेश्वर यह विचार नहीं करेगा कि तुमने यह जानबूझकर किया या अनजाने में। ऐसे मामले में तुझे साफ-साफ समझना पड़ेगा। अगर तुम इस मसले को नहीं समझ पाओगे, तो गड़बड़ियाँ पैदा करोगे। परमेश्वर की सेवा में लोग अच्छी प्रगति करना, अच्छी चीजें करना, अच्छी बातें बोलना, अच्छे काम करना, अच्छी बैठकें आयोजित करना और अच्छे अगुआ बनना चाहते हैं। अगर तुम हमेशा ऐसी ऊँची महत्वाकांक्षाएँ रखोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करोगे; जो लोग ऐसा करते है, वे शीघ्र ही मर जाएँगे। अगर तुम परमेश्वर की सेवा में सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ और विवेकशील नहीं रहोगे, तो तुम देर-सबेर उसके स्वभाव का अपमान करोगे। अगर तुम परमेश्वर के स्वभाव का अनादर करोगे, उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करोगे, और ऐसा करके परमेश्वर के खिलाफ पाप करोगे, तो वह यह नहीं देखेगा कि तुमने ऐसा क्यों किया या तुम्हारा इरादा क्या था। ऐसे में क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर अनुचित कार्य करता है? क्या वह इंसान की परवाह नहीं करता है? (नहीं।) क्यों नहीं? क्योंकि तुम अंधे या बहरे नहीं हो, न ही तुम मूर्ख हो। परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश स्पष्ट और प्रत्यक्ष हैं। तुम उन्हें देख और सुन सकते हो। अगर तुम अभी भी उनका उल्लंघन करोगे, तो इसे तुम किस तर्क से इसे सही ठहराओगे? भले ही तुम्हारा ऐसा कोई इरादा न हो, अगर तुम परमेश्वर का अपमान करोगे, तो समय आने पर तुम्हें बर्बादी और दंड का सामना करना ही पड़ेगा। तुम्हारे जो भी हालात रहे हों, क्या उससे कोई फर्क भी पड़ेगा? शैतानी प्रकृति वाले लोग आदतन परमेश्वर के स्वभाव का अनादर कर सकते हैं। किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने या उसके स्वभाव का अनादर करने के लिए चाकू की नोक पर मजबूर नहीं किया जा सकता है; ऐसा कभी होता ही नहीं। बल्कि, यह कुछ ऐसा है जो इंसान की प्रकृति से तय होता है। “परमेश्वर के स्वभाव का अनादर नहीं किया जा सकता।” इस बात में गूढ़ अर्थ छिपे हैं। हालाँकि, परमेश्वर लोगों को उनकी दशा और पृष्ठभूमि के आधार पर दंड देता है। परमेश्वर को जाने बिना उसका अनादर करना एक किस्म की मनोदशा है, जबकि परमेश्वर को अच्छी तरह जानने के बावजूद उसका अनादर करना दूसरी मनोदशा है। कुछ लोग परमेश्वर को अच्छी तरह जानते हुए भी उसका अनादर कर सकते हैं और उन्हें दंडित किया जाएगा। परमेश्वर अपने कार्य के हर चरण में अपने कुछ स्वभावों को व्यक्त करता है। क्या इंसान इसमें से कुछ भी नहीं समझ पाया है? क्या लोग इस बारे में थोड़ा भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर ने अनेक सत्यों के माध्यम से अपने किन स्वभावों को व्यक्त किया है, और लोगों के कौन-से कार्यकलाप और शब्द उसका अनादर करते हैं? और जहाँ तक परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों द्वारा निर्धारित मामलों की बात है—इंसान को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—क्या लोग ये भी नहीं जानते हैं? सत्य और सिद्धांतों से संबंधित कुछ मामलों को लोग पूरी तरह से नहीं समझे सकते क्योंकि उन्होंने उनका अनुभव नहीं किया है; वे उन्हें समझने में असमर्थ हैं। हालाँकि, प्रशासनिक आदेशों के मामले एक निर्धारित दायरे में आते हैं। वे नियम हैं। इंसान इन बातों को आसानी से समझ कर अपना सकता है। उनका अध्ययन करने या समझाने की कोई जरूरत नहीं है। लोग उनके अर्थ को जैसे समझते हैं उसी हिसाब से काम करना उनके लिए काफी है। अगर तुम लापरवाह हो, तुम्हारा दिल परमेश्वर का भय नहीं मानता है, और तुम जान-बूझकर प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो, तो तुम्हें दंड मिलना ही चाहिए!

अंश 72

अगुआ के रूप में कार्य करने वाले लोगों को काम पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देना नहीं चाहिए या सदैव अपने रुतबे पर ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहिए, न ही उन्हें अपने लिए उच्च मानक तय कर फिर हर किसी की समस्याएँ हल करने के लिए हर संभव तरीका सोचने में लगे रहना चाहिए ताकि हर कोई यह जान ले : “मैं अगुआ हूँ, मेरे पास यह पद है, यह रुतबा है, और मेरे पास भी यह गुण है, यह योग्यता है। और चूँकि मैं तुम्हारी अगुआई कर सकता हूँ, इसलिए मैं तुम्हारा पोषण भी कर सकता हूँ।” यह परेशानी की बात है कि वे ऐसे शब्द बोल पा रहे हैं। यह किस तरह से परेशानी भरा है? यदि तुम्हारा रुझान गलत है और यदि तुम्हारे पास अपने मामले संभालने को लेकर कोई सिद्धांत नहीं है, तो फिर तुम जो कुछ भी करते हो वह गलत होगा और भटकाव पैदा करेगा। यदि तुम्हारी प्रेरणा गलत है, तो तुम जो कुछ भी करते हो वह गलत होगा। सत्य की खोज करने, सत्य को समझने, दिव्य-दर्शनों के सत्य के सार को समझने, और सिद्धांतों के इस पहलू में महारत पाने पर ध्यान केन्द्रित करो—यही सही है। अगर तुम अपने पर मुसीबतें आने पर या समस्याओं से निपटते हुए इन सीमाओं को नहीं लाँघते हो तो तुम दूसरों की मदद करने और उनकी कठिनाइयाँ हल करने में सक्षम रहोगे, और तुम एक योग्य अगुआ बनोगे। लेकिन, यदि तुम कुछ सिद्धांत ही समझते हो और केवल उन्हें ही ओढ़े रहते हो, उपदेश अधिक सुनते हो, और अगुआई करने के लिए कुछ और वचन और साहित्य रट लेते हो, और यदि तुम किसी व्यक्ति की समस्याएँ हल करने के प्रयास में सिर्फ कुछ सिद्धांत, वचन और साहित्य पेश कर पाते हो, और परिणामस्वरूप, उसकी किसी भी समस्या को हल नहीं करते हो, तो फिर तुम्हारे पास अगुआ होने की वास्तविकता नहीं है, और तुम सिर्फ एक खाली ढांचा हो। यह किस तरह का अगुआ है? (झूठा अगुआ।) यह झूठा अगुआ है। तुम वास्तविक कार्य करने में असमर्थ हो। भले ही कोई किसी झूठे अगुआ को उजागर न करे और उसके बारे में सूचना न दे, लेकिन ऐसे में कलीसिया में परमेश्वर के चुने हुए लोगों का जीवन प्रगति नहीं करेगा, समस्याएँ इकट्ठी होती जाएँगी, और झूठे अगुआ को दोष अपने सिर पर लेना पड़ेगा और पद छोड़ना पड़ेगा। यदि तुम एक झूठे अगुआ हो, तो तुम्हारा पद चाहे कितना ही ऊँचा हो, तुम झूठे अगुआ ही रहोगे। अब, तुम चाहे वास्तविक कार्य कर सकते हो या नहीं और तुम झूठे अगुआ हो या नहीं—ये सबसे महत्वपूर्ण बातें नहीं हैं। तो, सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? अब तुम्हें जल्दी से सत्य का अनुसरण और जीवन में प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। एक बार जब तुम जीवन प्रवेश कर लेते हो, अपना स्वभाव बदल लेते हो, परमेश्वर की इच्छा समझ लेते हो, और अपनी गलत दशाएँ दूर करने में सक्षम हो जाते हो, तो तुम्हारे लिए दूसरों की समस्याएँ हल करना आसान हो जाएगा। एक बार जब तुमने सत्य समझ लिया और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया, तो क्या तुम्हें तब भी यह डर होगा कि तुम दूसरों की समस्याएँ हल नहीं कर सकते? तुम्हें यह चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि तुम अच्छी तरह से अगुआई कर सकते हो या नहीं। यदि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है, तो तुम स्वाभाविक रूप से अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने और वास्तविक समस्याएँ हल करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हें यह अच्छी तरह समझ लेना होगा। यदि तुम इसे अच्छी तरह से नहीं समझते हो, और एक अगुआ के रूप में हमेशा अपने रुतबे की रक्षा करना चाहते हो, और यदि परमेश्वर के चुने हुए लोगों के दिलों में अपनी अच्छी छवि बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा इरादा गलत है, और तुम अपने आप कलंक लेकर असफल हो जाओगे। यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से प्रेम करता है और अपने जीवन प्रवेश पर ध्यान केन्द्रित करता है, और तुम अपनी मानवीय महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और गलत खोजों को छोड़ देते हो, और इन चीजों से विवश नहीं होते हो, तो तुम सत्य का अनुसरण करने में सक्षम रहोगे, और तुम समय के साथ सहज रूप से सत्य के प्रत्येक पहलू को समझने में सक्षम हो जाओगे। इस तरह, जब दूसरों की मदद करने की बात आएगी तो तुम मगन होकर यह काम करोगे और तुम्हें इसमें कोई कठिनाई नहीं होगी। इसलिए, तुमको अपने रुतबे की रक्षा नहीं करनी चाहिए। यह एक खाली ढाँचा है। यह बेकार है। इससे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा, और यह तुम्हें सत्य को समझने में भी सहायता नहीं करेगा। यही नहीं, इसके कारण तुम कई गलतियाँ कर सकते हो और गुमराह भी हो सकते हो। भ्रष्ट मानवजाति के लिए रुतबा एक जाल है। लेकिन कोई भी इस बाधा से बच नहीं सकता है, सभी को इससे गुजरना होगा, यह सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि तुम इसे कैसे निपटते हो। यदि तुम मानवीय तरीकों से निपटते हो, तो तुम अपने आप को रोकने या अपनी इच्छाएँ त्यागने में सक्षम नहीं होगे। इसे केवल सत्य का उपयोग करके हल किया जा सकता है। सत्य इस समस्या को हल कर सकता है। यदि तुम सत्य की खोज कर सकते हो, तो तुम इस समस्या को जड़ से खत्म कर सकते हो। यदि तुम इस कठिनाई को हल करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं कर सकते, यदि तुम केवल स्वयं को रोक रहे हो और चीजों के खिलाफ लड़ रहे हो—अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों, अपने ख्यालों से लड़ रहे हो, और हमेशा इसी तरह उनके खिलाफ लड़ रहे हो—तो यह क्या तरीका है? यह नकारात्मक और निष्क्रिय दृष्टिकोण है। तुम्हें इसे हल करने के लिए सकारात्मक तरीकों का उपयोग करना चाहिए, अर्थात्, तुम्हें इसे सत्य के जरिए हल करना चाहिए, और इस मामले को अच्छी तरह से समझना चाहिए। सबसे पहले उन विभिन्न दृष्टिकोणों को देखो जिसका उपयोग मसीह-विरोधी और झूठे अगुआ प्रतिष्ठा, लाभ और रुतबे की तलाश करने और अपने घमंड और गर्व की रक्षा करने के लिए करते हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से देखने के बाद, तुम महसूस करोगे : “ओह, कितना शर्मनाक है, सच में शर्मनाक! क्या मैं भी उन दृष्टिकोणों का उपयोग करता हूँ?” फिर, तुम आत्म-चिंतन करने लगोगे और जल्द ही तुमको एहसास होगा : “ओह, मैं भी कई ऐसे दृष्टिकोण अपनाता हूँ, मैं उन मसीह-विरोधियों और झूठे अगुआओं से इतना अलग नहीं हूँ।” तुम्हारे दिल में कुछ पछतावा होगा, और तुम सबक लेने के संकल्प के साथ कहोगे, “मैं अब और अपना रुतबा बचाकर यह बेशर्मी नहीं दिखा सकता”। ऐसी बातों पर ध्यान मत दो कि दूसरे लोग तुम्हारा सम्मान करते हैं या नहीं, तुम दूसरों की कितनी समस्याएँ हल कर सकते हो, कोई तुम्हारी बात सुनता है या नहीं, या तुम्हारे लिए कितने लोगों के दिल में जगह है। यदि ऐसी बातें हमेशा तुम्हारे हृदय में रहेंगी, तो तुम व्यथित और विचलित रहोगे और तुम्हारे पास सत्य के अनुसरण के लिए कम समय बचेगा। तुमने अपनी सीमित-सी ताकत और कीमती समय को प्रतिष्ठा, लाभ और रुतबा पाने की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करने में लगा दिया। लिहाजा, तुमने सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया है। यद्यपि तुमने रुतबा प्राप्त कर लिया है और तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी हो गई हैं, फिर भी तुमने जीवन में प्रवेश नहीं किया है और तुमने पवित्रात्मा के कार्य को खो दिया है। इसका अंतिम परिणाम क्या होगा? तुम्हें बाहर निकाल कर दंडित कर दिया जाएगा। ऐसा क्यों होता है? तुमने गलत रास्ता चुना। यदि तुम पोलुस की हद तक जा चुके हो, तो तुम्हें अंत में दंडित किया जाएगा। लेकिन यदि तुम पोलुस की हद तक नहीं गए हो और समय पर अपना मार्ग बदल लेते हो, तो छुटकारे के लिए गुंजाइश बची है, और अभी भी उद्धार की आशा है।

परमेश्वर पर विश्वास करने वालों की चाहे जो समस्याएँ हों, चाहे वे रुतबा, प्रतिष्ठा, लाभ और धन की खोज हो, या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करनी हों, हर हाल में सभी समस्याएँ सत्य की खोज के माध्यम से हल की जानी चाहिए। कोई भी समस्या सत्य से किनारा करके नहीं निकल नहीं सकती। कोई भी मामला सत्य से अलग नहीं है। जैसे ही कोई व्यक्ति परमेश्वर पर अपने विश्वास के सत्य से भटक जाता है, उसका विश्वास खोखला हो जाता है। किसी और चीज को पाने की कोशिश करना बेकार है। कुछ लोग केवल असरदार और शानदार कर्तव्य निभाने से संतुष्ट रहते हैं, जिससे दूसरे लोग उन्हें सराहें और ईर्ष्या महसूस करें। क्या यह सार्थक है? यह तुम्हारा अंतिम अंत नहीं है, न ही यह तुम्हारा अंतिम पुरस्कार है, और यह निश्चित रूप से तुम्हारा गंतव्य नहीं है। इसलिए तुम चाहे जो कर्तव्य निभाओ, यह केवल अस्थायी है, चिरस्थायी नहीं। यह ऐसा कोई मानपत्र या पुरस्कार नहीं है जो परमेश्वर ने तुम्हें दे दिया हो। आखिरकार, लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं है कि वे कौन-सा कर्तव्य निभाते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर है कि वे सत्य को समझ और हासिल कर सकते हैं या नहीं, और अंत में, वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं या नहीं, खुद को उसकी व्यवस्था की दया पर छोड़ सकते हैं या नहीं, अपने भविष्य और नियति पर कोई ध्यान न देकर एक योग्य सृजित प्राणी बन सकते हैं या नहीं। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, और ये वे मानक हैं जिनका उपयोग वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए करता है। ये मानक अपरिवर्तनीय हैं, और यह तुम्हें याद रखना चाहिए। इन मानकों को अपने मन में अंकित कर लो, और किसी अवास्तविक चीज को पाने की कोशिश करने के लिए कोई दूसरा मार्ग ढूँढ़ने की मत सोचो। उद्धार पाने की इच्छा रखने वाले सभी लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और मानक हमेशा के लिए अपरिवर्तनशील हैं। वे वैसे ही रहते हैं, फिर चाहे तुम कोई भी क्यों न हो। तुम केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करके उद्धार पा सकते हो। अगर तुम अस्पष्ट चीजों को पाने की कोशिश करने के लिए कोई और मार्ग खोजते हो, और कल्पना करते हो कि तुम भाग्य से सफल हो जाओगे, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसे धोखा देता है, और तुम निस्संदेह परमेश्वर से शाप और दंड पाओगे।

अंश 73

स्वयं के कर्तव्यों को ठीक से पूर्ण करने हेतु और जो कार्य परमेश्वर ने उन्हें सौंपे हैं उन्हें अच्छे से निभाने हेतु, अगुआओं व कर्मियों को सर्वप्रथम परमेश्वर की इच्छा को जानना होगा। उन्हें अपने कार्यभार के आमाप-परिमाप से ध्यान हटाकर इस तरह सोचना होगा कि उन्होंने जीवन में प्रवेश किया है कि नहीं और स्वयं के स्वभाव में परिवर्तन किया है कि नहीं। परमेश्वर को अगुआओं व कर्मियों से ऐसी ही अपेक्षा है। क्या अब तुम लोग स्वभाव में बदलाव को सच में समझ गए हो? स्वभाव में बदलाव से क्या अभिप्राय है? क्या तुम व्यवहार में बदलाव व स्वभाव में बदलाव का अंतर पहचान सकते हो? किन दशाओं में माना जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन स्वभाव में बदलाव आ गया है, व कौन-सी दशाओं में यह बदलाव सिर्फ बाहरी व्यवहार में ही होता है? व्यक्ति के ऊपरी बर्ताव में परिवर्तन और व्यक्ति की अंदरूनी जिंदगी में परिवर्तन में फर्क क्या होता है? क्या तुममें से कोई मुझे यह फर्क बता सकता है? तुम देखते हो कि एक व्यक्ति बहुत ही उत्साह से, भाग-दौड़ कर रहा है, कलीसिया के कामों में लगा हुआ है, अपना वक्त दे रहा है, यह देखकर तुम कहते हो : “अमुक व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है!” तुम देखते हो कि एक महिला ने अपना घर-परिवार छोड़ दिया है, काम-धंधा छोड़ दिया है, तब तुम कहते हो : “इस महिला के स्वभाव में परिवर्तन आ चुका है!” तुम्हें लगता है कि अगर इन लोगों के स्वभाव में परिवर्तन नहीं हुआ होता, तो वे इस तरह का त्याग नहीं कर पाते। तुममें से ज्यादातर लोगों का दूसरों को देखने का नजरिया यही है, मगर क्या इस तरह का नजरिया ठीक है? कुछ ऐसे भी हैं जो इससे भी ज्यादा बेढंगी बाते करते हैं; जब कोई ऐसा व्यक्ति जिसने अपने घर-परिवार, काम-धंधे को तिलांजलि दे रखी है, उन्हें नजर आता है, तो वे कहते हैं : “यह इंसान परमेश्वर का सच्चा प्रेमी है!” एक दिन तुम कहते हो कि अमुक इंसान परमेश्वर का प्रेमी है, दूसरे दिन तुम कहते हो कि कोई दूसरा इंसान परमेश्वर का प्रेमी है। अगर कोई लगातार कई दिनों से प्रवचन दे रहा हो, तो तुम कहते हो : “इस व्यक्ति ने परमेश्वर को जान लिया है। इस व्यक्ति ने सत्य पा लिया है। नहीं तो यह व्यक्ति इतना सब कुछ कैसे कह पाता?” तुम लोगों का दृष्टिकोण ऐसा ही है ना? बेशक तुममें से ज्यादातर का लोगों और चीजों देखने का नजरिया ऐसा ही होता है। तुम सदैव ताज पहनाकर दूसरों को सम्मान देते हो, उनकी चाटुकारिता में लगे रहते हो। एक दिन अमुक व्यक्ति की ताजपोशी करते हो क्योंकि उसे परमेश्वर से प्यार है, दूसरे दिन किसी अन्य व्यक्ति की ताजपोशी करते हो क्योंकि वह परमेश्वर को जानता है, क्योंकि वह परमेश्वर के प्रति आस्थावान है। तुम लोगों को दूसरों की ताजपोशी करने में “महारत” हासिल है। रोजाना लोगों की ताजपोशी करके उन्हें सम्मान देते और उनकी चाटुकारिता करते हो, इससे उनका घाटा ही होता है, इसके बावजूद भी तुम्हें इससे गर्व की अनुभूति होती है। तुम लोग ऐसे तरीकों से औरों की सराहना कर उन्हें घमंडी बना देते हो। जिन लोगों की तारीफ इस प्रकार से की जाती है वे मन-ही-मन सोचते हैं, “मेरे अंदर परिवर्तन आ गया है, मैं मुकुट पाने का अधिकारी बन गया हूँ, मुझे पक्के तौर पर स्वर्ग के राज्य में दाखिला मिल जाएगा!” पौलुस जैसे कुछ व्यक्ति इससे भी खराब हालात में हैं, वे हमेशा यही बताते रहते हैं कि उन्होंने क्या-क्या तकलीफें सही हैं, कब-कब गवाहियाँ दी हैं। परमेश्वर की इच्छा के बारे मे तनिक भी सोचे बगैर, अपनी तारीफ करने में लगे रहते हैं। वे अपनी धारणाओं और प्राथमिकताओं के अनुसार बात करते हैं। यह साफ तौर पर पता होने के बावजूद भी कि उनके निज स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है, वे अन्य लोगों से बोलते हैं कि वे भी उनके अनुसार ही काम करें, इसका नतीजा यह होता है कि जो लोग परमेश्वर में आस्था तो रखते हैं पर विवेकहीन होते हैं—और खासकर जो ऐसे लोगों को पूजते हैं—उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ता है और वे रास्ते से भटक जाते हैं। उन्होंने अभी भी परमेश्वर पर विश्वास करने के सही रास्ते पर चलना शुरू नहीं किया है, मात्र जोश में आकर परमेश्वर के खातिर खुद को खपा रहे हैं और कष्ट भुगत रहे हैं। वे गिरफ्तार किए गए और जेल में डाले गए लेकिन किसी को न धोखा दिया न यहूदा बने—इस कारण वे सोचने लगे कि वे अपनी गवाही पर मजबूती से कायम हैं और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लायक बन चुके हैं। वे इस जरा-से अनुभव को एक गवाही मानकर हर स्थान पर इसका दिखावा करते हैं। क्या यह लोगों को धोखा देने के लिए खुद का दिखावा नहीं है? बहुत-से लोग इस प्रकार की “गवाही” देते हैं, और इसकी वजह से कितने लोग गुमराह हुए हैं? क्या ऐसे लोगों को विजेता मानना बेतुका नहीं है? क्या तुम्हें मालूम है कि परमेश्वर लोगों को किस तरह से देखता है? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट है कि असली विजेता कौन होता है? इस तरीके से झूठी गवाही देना परमेश्वर द्वारा शापित है। तुमने इस तरह से कितने गलत कर्म किए हैं? तुम न तो तुम दूसरों को जीवन दे सकते हो, न ही दूसरों की अवस्था का विश्लेषण कर सकते हो। तुम मात्र लोगों को मुकुट पहना सकते हो और परिणामस्वरूप, उन्हें विनाश की ओर धकेल सकते हो। क्या तुम्हें पता नहीं कि एक भ्रष्ट व्यक्ति तारीफ नहीं झेल सकता? यदि कोई उनकी तारीफ नहीं भी करे, तब भी वे बहुत ही गर्व महसूस करते हैं, अहंकार में जीते हैं। परन्तु लोगों से तारीफ पाकर क्या वे और शीघ्र नहीं मर जाते? तुम लोगों को नहीं पता कि परमेश्वर से प्रेम करने, परमेश्वर को जानने और ईमानदारी से स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाने का मतलब क्या है। तुम्हें इनमें से कोई भी बात समझ नहीं आती। तुम चीजों के केवल बाहरी रूप को देखते हो और फिर अन्य लोगों के बारे में फैसला सुनाते हो, लोगों को मुकुट पहनाते हो और उनकी चापलूसी करते हो, और इस तरह कई लोगों को राह से भरमाकर उनका नुकसान करते हो—और यह काम तुम प्रायः करते हो। तुमसे इस प्रकार तारीफ सुनकर कई लोग सही रास्ते से भटक चुके हैं और गिर चुके हैं। हो सकता है वे वापस उठ जाएँ, लेकिन उन्होंने अपने जीवन के विकास में बहुत देरी कर दी है, और वे पहले ही खामियाजा भुगत चुके हैं। ज्यादातर लोग अभी भी परमेश्वर पर विश्वास रखने की उचित राह पर नहीं चल रहे हैं और सत्य का अनुसरण नहीं कर पा रहे हैं, और वे अपने आप के बारे में भी बहुत कम ही जानते हैं। अगर उनकी इस तरीके से तारीफ की जाती है, तो वे अपने आप में संतुष्ट हो जाएँगे, खुश हो जाएँगे और, यह महसूस करते हुए कि वे परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर पहले से ही चल रहे हैं और उनके पास थोड़ी सत्य वास्तविकताएँ हैं, वे अपने तौर-तरीकों पर अड़े रहेंगे। वे अपने भाषण में और साहसी हो जाएँगे, कलीसिया में लोगों को डांटेंगे और एक निरंकुश व्यक्ति जैसा बर्ताव करेंगे। क्या तुम इस तरीके से काम करके लोगों को हानि नहीं पहुँचा रहे हो, उनका नाश नहीं कर रहे हो? किस तरह के लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं? जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं उन्हें पतरस जैसा होना चाहिए, उन्हें पूर्ण बनाया जाना चाहिए, और परमेश्वर का प्रेम प्राप्त करने हेतु उन्हें रास्ते के अंतिम छोर तक परमेश्वर का अनुगमन करना चाहिए। परमेश्वर लोगों के दिलों में बहुत अंदर तक झाँकता है, और केवल परमेश्वर ही यह निर्णय कर सकता है कि कौन उससे प्रेम करता है। लोगों के लिए खुद इसे स्पष्ट रूप से देख पाना आसान नहीं है, फिर वे अन्य लोगों के बारे में निर्णय कैसे कर सकते हैं? केवल परमेश्वर ही यह जानता है कि कौन लोग उससे सच्चा प्रेम करते हैं। चाहे लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय ही क्यों न हो, फिर भी वे यह कहने की हिम्मत नहीं कर सकते कि वे खुद परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हैं। परमेश्वर ने कहा कि पतरस परमेश्वर से प्रेम करने वाला व्यक्ति था, लेकिन पतरस ने ऐसा खुद कभी नहीं कहा। तो फिर, परमेश्वर से प्रेम करना क्या कोई ऐसी चीज है जिसे लेकर कोई यूँ ही डींगें हाँक सकता है? परमेश्वर से प्रेम करना मनुष्य का कर्तव्य है, अतः हृदय में परमेश्वर के प्रति तनिक प्रेम उत्पन्न होते ही इसके बारे में डींगें हाँकना गलत है। यह और भी अधिक तर्कहीन बात है कि तुम खुद तो परमेश्वर से प्रेम करते नहीं हो मगर दूसरों की यह कहकर प्रशंसा करते हो कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यह पागलपन है। कौन व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करता है यह केवल परमेश्वर ही जानता है, और सिर्फ वही बता सकता है कि कौन ऐसा है। अगर कोई व्यक्ति अपने मुँह से ऐसे शब्द कह रहा है तो वह गलत स्थान पर है। तुम परमेश्वर का स्थान ले रहे हो, लोगों की तारीफ कर रहे हो, चापलूसी कर रहे हो—यह सब किसकी ओर से कर रहे हो? परमेश्वर लोगों की चापलूसी तो कतई नहीं करता, न ही उनकी तारीफ करता है। पतरस को पूर्ण बनाने के बाद, परमेश्वर ने उसका उपयोग एक आदर्श के रूप में तब तक नहीं किया जब तक परमेश्वर ने अंत के दिनों का कार्य नहीं किया। उस समय तक, परमेश्वर ने दूसरों लोगों से यह कभी नहीं कहा : “पतरस परमेश्वर से प्रेम करता है।” परमेश्वर ने ऐसी बातें तभी कहीं जब उसने इस चरण का कार्य किया, उसने पतरस को उन लोगों के लिए एक आदर्श व उदाहरण के रूप में स्थापित किया जो परमेश्वर के न्याय का अनुभव करते हैं और अंत के दिनों में परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं। परमेश्वर जो भी करता है उसका कुछ अभिप्राय होता है। लोगों का मनमाने ढंग से यह कहना कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर का प्रेमी है, कितना तर्कहीन है! यह बहुत ही हास्यास्पद है। पहली बात तो, ये लोग गलत स्थान पर खड़े है। दूसरी बात, यह कोई इस तरह का मामला नहीं है जिसका निर्णय लोग स्वयं कर सकें। दूसरों की चाटुकारिता करने का क्या अर्थ है? इसका अभिप्राय है दूसरे लोगों को भ्रम में डालना, उनके साथ धोखाधड़ी करना और क्षति पहुँचाना। तीसरी बात, इसके वस्तुनिष्ठ प्रभाव के संबंध में, इस तरह का बर्ताव न केवल दूसरों को उचित रास्ते पर ले जाने में अक्षम है, अपितु यह उनके जीवन प्रवेश में भी व्यवधान डालता है व उनके जीवन के लिए भी हानिकारक है। अगर तुम हमेशा कहते रहते हो कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करता है, चीजें त्याग सकता है, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान है, तो क्या हर कोई उसके बाह्य कार्यों की नकल नहीं करेगा? न केवल तुमने अन्य लोगों को उचित राह नहीं दिखाई, बल्कि तुमने बहुतों को बाहरी कार्यों पर ही ध्यान केंद्रित करने को भी प्रोत्साहित किया है, ताकि वे अनजाने में पौलुस के रास्ते का अनुगमन करते हुए, बदले में मुकुट पाने के लिए सिर्फ इन बाहरी क्रिया-कलापों पर ही विश्वास करते रहें। क्या इसका यह प्रभाव नहीं होता है? जब तुम ये शब्द कहते हो, तो क्या तुम्हें इन परेशानियों की जानकारी होती है? तुम कहाँ खड़े हो? तुम्हारी भूमिका क्या है? तुम्हारे बोले हुए शब्दों का वास्तविक असर क्या होता है? यह आखिरकार अन्य लोगों को किस राह पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता है? यह किस सीमा तक हानि पहुँचा सकता है? जब लोग इस तरीके से कार्य करते हैं तो इनके परिणाम बहुत गंभीर होते हैं।

कलीसिया में कुछ अगुआ और कार्यकर्ता अपने अनुभवों के बारे में बातें नहीं कर सकते और गवाही नहीं दे सकते, और समस्याओं का समाधान निकालने के लिए सत्य का प्रयोग नहीं कर पाते। वे हमेशा इस बात की गवाही देते हैं कि उन्होंने किस तरह कष्ट झेले हैं, किस तरह उन्होंने काट-छाँट और निपटान को स्वीकार किया है, किस तरीके से काफी समस्याओं के होते हुए भी वे कभी नकारात्मक नहीं हुए, और कैसे वे अपने कर्तव्यपथ पर चलते रहे। पौलुस के समान, वे हमेशा अपने लिए ही गवाही देते हैं, अपने को ही स्थापित करते रहते हैं, ताकि परमेश्वर के द्वारा चयनित लोग उनकी तारीफ करें, उनका सम्मान करें और उन्हें सम्मानजनक नजरों से देखें। और, जब इस तरह के लोग किसी ऐसे आदमी को देखते हैं जो शब्दों व धर्म-सिद्धांतों को ठीक तरीके से बता सकता है और जो प्रवचन दे सकता है, तो वे उसकी चाटुकारिता करते हैं, और वे पौलुस की तरह के उन अगुआओं और कार्यकर्ताओं की प्रशंसा करते हैं, उनकी वाहवाही करते हैं, और इस तरह से दूसरे लोगों से भी उनकी सराहना करवाते हैं। वे न केवल सिंचन और पोषण का कार्य ठीक तरह से करने में असफल रहते हैं, बल्कि कुछ विनाशकारी और परेशानियाँ पैदा करने वाले कार्यों में भी लिप्त हो जाते हैं जिसके कारण अन्य लोग पौलुस के रास्ते पर चल देते हैं। भूलवश वे हमेशा यह सोचते रहते हैं कि वे खुद काबिल और अच्छे अगुआ हैं, और वे इसके लिए परमेश्वर से इनाम चाहते हैं। क्या तुममें से ज्यादातर लोग इसी अवस्था में नहीं हैं? मात्र शब्दों व धर्म-सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित कर, लोगों को लगातार फटकारते रहने के अपने मौजूदा तरीके के आधार पर, क्या तुम लोगों को सही राह पर ले जा सकते हो? यह आखिरकार उन्हें किस रास्ते पर पहुँचा सकता है? क्या यह उन सभी को पौलुस की राह पर नहीं ले जाएगा? मैं देख पा रहा हूँ कि यह ऐसा ही है, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। यह कहा जा सकता है कि तुम सब पौलुस के जैसे अगुआ हो और दूसरे लोगों को भी पौलुस के रास्ते पर ले जा रहे हो। क्या तुम्हारी अब भी किसी प्रकार का मुकुट पाने की इच्छा है? तुम अपने को भाग्यशाली मानो, अगर तुम्हें इसके लिए दंडित नहीं किया गया। तुम्हारे कार्यों के अनुसार, तुम सब ऐसे लोग बन गए हो जो परमेश्वर के खिलाफ हैं, जो परमेश्वर की सेवा तो करते हैं पर परमेश्वर का विरोध भी करते हैं, और तुमने परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने में दक्षता हासिल कर ली है। अगर तुम इसी रास्ते पर चलते रहोगे, तो आखिर में तुम झूठे चरवाहे, झूठे कार्यकर्ता, झूठे अगुआ और मसीह-विरोधी बन जाओगे। अभी तुम्हारे लिए राज्य के लिए प्रशिक्षण लेने का समय है। यदि तुम सत्य के लिए प्रयत्न नहीं करते हो और केवल कार्य पर ध्यान देते हो, तो तुम अनजाने में पौलुस का रास्ता पकड़ लोगे। इसके अलावा, तुम अपने साथ पौलुस जैसे दूसरे लोगों के समूह को भी लेकर आओगे। तो क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति नहीं बन जाओगे जो परमेश्वर-विरोधी है और परमेश्वर के कार्य में बाधाएँ खड़ी करता है? इसलिए, अगर कोई व्यक्ति जो परमेश्वर की सेवा तो करता है, पर वह उसके लिए गवाही नहीं दे सकता है, या परमेश्वर द्वारा चयनित व्यक्तियों को सही राह पर नहीं ले जा सकता है, तो वह व्यक्ति परमेश्वर का विरोधी है। ये दो ही रास्ते हैं। पतरस का रास्ता सत्य के अनुसरण का, और अंततः, अपने विश्वास में सफल होने का रास्ता है। पौलुस का रास्ता सत्य के अनुसरण का रास्ता नहीं है, यह मात्र आशीर्वाद व पुरस्कार के लिए प्रयत्नरत रहने का रास्ता है। यह असफलता का रास्ता है। आज, पतरस के सफलता के रास्ते पर चलने वाले बहुत ही कम लोग हैं, जबकि पौलुस के असफलता के रास्ते पर चलने वाले लोग बहुत अधिक हैं। यदि तुममें से जो बतौर अगुआ और कार्यकर्ता काम कर रहे हैं वे आरंभ से अंत तक सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, तो तुम सब लोग झूठे अगुआ और झूठे कार्यकर्ता बन जाओगे, और तुम सब लोग मसीह-विरोधी और बुरे लोग बन जाओगे जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। अगर तुम अब से ही सही राह पर आ जाते हो और ईमानदारी से पतरस का रास्ता अपनाते हो, तो तुम अभी भी अच्छे अगुआ और अच्छे कार्यकर्ता बन सकते हो जिनकी परमेश्वर भी प्रशंसा करता है। यदि तुम पूर्ण बनाए जाने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने का प्रयत्न नहीं करते हो, तो तुम खतरे में हो। तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता, तुम्हारे उथले और अपर्याप्त अनुभव, तुम्हारे छोटे आध्यात्मिक कद, और तुम्हारी अपरिपक्वता को ध्यान में रखते हुए, केवल एक काम जो किया जा सकता है वह यह है कि तुम्हारे साथ सत्य पर और संगति की जाए, ताकि तुम सत्य समझ सको परन्तु, तुम सत्य पा सकते हो या नहीं यह तुम्हारे निजी अनुसरण पर ही निर्भर करता है। क्योंकि आज का समय पतरस और पौलुस के समय से बहुत भिन्न है। उन दिनों में, यीशु ने मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ना देने, या मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाने का कार्य नहीं किया था। आज, देहधारी परमेश्वर ने बहुत ही स्पष्ट रूप में सत्य बता दिया है। यदि लोग अब भी पौलुस के रास्ते पर चलते हैं, तो इससे यह पता चलता है कि उन लोगों की स्वीकार करने की क्षमता दोषपूर्ण है, और यह ये भी दर्शाता है कि, पौलुस की तरह ही, ये लोग भी बहुत ही दुष्ट चरित्र के लोग हैं, और बहुत ही अहंकारी स्वभाव के हैं। वह जमाना आज के समय से भिन्न था और उस समय के संदर्भ भी भिन्न थे। आज, परमेश्वर के वचन बहुत ही साफ और स्पष्ट हैं; यह ऐसा है जैसे परमेश्वर ने स्वयं तुम्हें सिखाने के लिए और तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया है, इसलिए यदि तुम अब भी गलत मार्ग पर चलते हो तो यह अक्षम्य है। इसके अलावा, आज, पतरस और पौलुस के दो उदाहरण तुम्हारे सामने हैं, एक उदाहरण सकारात्मक है, दूसरा नकारात्मक। पहला आदर्श है और दूसरा चेतावनी। यदि तुम गलत मार्ग पर चल रहे हो, तो इसका आशय यह है कि तुम्हारा चुनाव गलत है और तुम बहुत दुष्ट हो। तुम्हारे सिवाय दूसरा कोई व्यक्ति इसके लिए दोषी नहीं है। केवल वही व्यक्ति जिसके पास सत्य वास्तविकता है, अन्य लोगों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश करा सकता है, लेकिन जिसके पास सत्य वास्तविकता नहीं है वह दूसरों को केवल भटकाने का कार्य कर सकता है।

अंश 75

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं को दो सिद्धांतों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें कलीसिया के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा परमेश्वर के घर के हित सबसे पहले रखने चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि वे अभी भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हैं, या वे जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हैं और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हैं, तो उनके कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना उन्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं, तो वे कार्य नहीं कर पाएँगे, और यदि वे कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हैं, तो वे कुछ पूरा नहीं कर पाएँगे। कार्य करते समय दो मुख्य सिद्धांत यह हैं जिनका पालन अगुआओं और कार्यकर्ताओ को करना चाहिए : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त कार्य प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों सिद्धांतों को अच्छी तरह से समझ लेंगे, तो वे अपने काम में आसानी से गलतियाँ नहीं करेंगे। कलीसिया का कार्य करने में तुम लोगों का अनुभव अभी भी सीमित है, जब तुम काम करते हो, तो वह बुरी तरह से तुम्हारे विचारों से दूषित होता है। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम पवित्र आत्मा से आए, अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम अपने विचारों के अनुसार अपना कार्य करते हो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को एक किनारे कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम्हें लगता है कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम्हें इस तरह से कार्य क्यों करना चाहिए। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है। ऐसा अक्सर अनुभवी लोगों के साथ होता है। पवित्र आत्मा वह करने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, जो सर्वाधिक उपयुक्त होता है। तुम इस बारे में नहीं सोचते, बल्कि तुम्हारे मन में ऐसा भाव आता है जो तुम्हें यह एहसास कराता है कि इसे करने का यही बेहतरीन तरीका है, और तुम कारण जाने बिना ही उसे उस ढंग से करना पसंद करते हो। यह पवित्र आत्मा से आ सकता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोचने-विचारने का परिणाम होते हैं और उनमें उनका मत शामिल होता है; वे हमेशा यही सोचते हैं कि इससे उन्हें क्या लाभ और फायदा है; इंसान जो भी कार्य करने का निर्णय लेता है, उसमें ये बातें होतीं हैं। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ। उपयुक्त अगुआ और कर्मी ऐसे लोग होते हैं जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य होता है, जो हर पल पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं, जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय रखते हैं, परमेश्वर की इच्छा के प्रति सजग रहते हैं और बिना थके सत्य खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और सही ढंग से उसकी गवाही देने के लिये तुम्हें अक्सर अपनी मंशाओं और अपने कर्तव्य में मिलावटी तत्वों पर आत्मचिंतन करना चाहिए, और फिर यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि कार्य इंसानी विचारों से कितना प्रेरित है, और कितना पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उत्पन्न हुआ है, और कितना परमेश्वर के वचन के अनुसार है। तुम्हें निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी पर विचार करते रहना चाहिये कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना तुम्हें परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर ले जाएगा। परमेश्वर के इरादों के अनुरूप उसकी सेवा करने के लिए, सत्य वास्तविकताओं का होना आवश्यक है। सत्य को समझकर ही लोग भेद करने के काबिल बनते हैं और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनके अपने विचारों से क्या उत्पन्न होता है और इंसानी मंशाओं से क्या उत्पन्न होता है। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह भी पहचान पाते हैं कि सत्य के अनुसार कार्य करना क्या होता है। भेद कर पाने के बाद ही यह सुनिश्चित हो सकता है कि वे सत्य का अभ्यास कर सकते और पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो सकते हैं। सत्य की समझ के बिना लोगों के लिए भेद कर पाना असंभव है। एक नासमझ व्यक्ति शायद आजीवन परमेश्वर पर विश्वास करे, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने का क्या अर्थ होता है या परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ होता है, क्योंकि वह सत्य नहीं समझता; उसके मन में वह विचार ही मौजूद नहीं है। सत्य बेहद निम्न क्षमता के लोगों की पहुँच से बाहर होता है; तुम उनके साथ किसी भी प्रकार से संगति करो, फिर भी वे नहीं समझते। ऐसे लोग संभ्रमित होते हैं। इस प्रकार के संभ्रमित लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; वो छोटी-मोटी सेवा ही कर सकते हैं। अगर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अपने कर्तव्यों को अच्छे से निभाना है, तो उनकी क्षमता बहुत खराब नहीं होनी चाहिए। कम से कम, उनमें आध्यात्मिक चीजों की समझ होनी चाहिए और चीजों को विशुद्ध रूप से समझ-बूझ पाना चाहिए, ताकि वे आसानी से सत्य समझकर उसका अभ्यास कर सकें। कुछ लोगों का अनुभव बहुत उथला होता है, इसलिए कभी-कभी उनकी सत्य की समझ में विचलन होता है और वे गलतियाँ कर बैठते हैं। जब उनकी सत्य की समझ में विचलन होता है, तो वे गलती करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं। जब लोगों की समझ में विचलन होता है, तो वे सत्य का अभ्यास करने योग्य नहीं होते। जब उनकी सत्य की समझ में विचलन होता है, तो संभव है कि वे नियमों का पालन करें और जब वे नियमों का पालन करते हैं, तो गलतियाँ करना आसान होता है और वे सत्य के अभ्यास के योग्य नहीं होते। जब समझ में विचलन होता है, तो मसीह-विरोधियों के हाथों धोखा खाना और उनके द्वारा उपयोग किया जाना भी आसान होता है। इसलिए, समझ में विचलन की वजह से बहुत-सी गलतियाँ हो सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप, वे न केवल अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में असफल हो जाएंगे, वे आसानी से भटक भी सकते हैं, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को हानि पहुँचाता है। किसी का इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने का क्या मूल्य है? वे ऐसे लोग बन गए हैं जो बस कलीसिया के काम को बाधित और अस्तव्यस्त करते हैं। इसके अलावा, इन असफलताओं से सबक सीखना चाहिए। परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को करने के लिए, अगुआ और कार्यकर्ताओं को ये दो सिद्धांत समझने चाहिए : कर्तव्य निभाते समय ऊपर से दिए गये कार्य के प्रबंधनों का पालन कड़ाई से करना होगा, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार पवित्र आत्मा के किसी भी मार्गदर्शन पर ध्यान देना और उसका पालन करना होगा। जब इन दोनों सिद्धांतों को समझ लिया जाएगा, तभी कार्य प्रभावशाली होगा और परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्टि मिलेगी।

अंश 76

कलीसिया में, किस तरह के लोग सर्वाधिक अभिमानी होते हैं? उनका अभिमान कैसे प्रकट होता है? किन मामलों में उनका अभिमान सबसे अधिक बाहर आता है? क्या तुम लोगों को इसकी समझ है? कलीसिया में मौजूद सबसे अधिक अभिमानी लोग वास्तव में दुष्ट और मसीह-विरोधी हैं। उनका अभिमान सामान्य लोगों की तुलना में बहुत आगे निकल जाता है, यहां तक कि तर्कहीन होने की सीमा तक चला जाता है। किन मामलों में यह सबसे आसानी से देखा जा सकता है? उनका अभिमानी स्वभाव सर्वाधिक स्पष्ट तौर पर तब उजागर होता है, जब उनके साथ काट-छांट और निपटारा किया जाता है। इन मसीह-विरोधियों के कुकर्मों की तीव्रता चाहे जितनी भी हो, अगर कोई इनका निपटारा करता है, तो वे क्रोधित हो जाते हैं और कहते हैं : “तुम कौन होते हो मेरी आलोचना करने वाले और मुझे भाषण देने वाले? तुम कितने लोगों की अगुवाई कर सकते हो? क्या तुम धर्मोपदेश दे सकते हो? क्या तुम सत्य पर संगति कर सकते हो? अगर तुम मेरी भूमिका निभाते, तो क्या तुम भी मेरी ही तरह अच्छे नहीं होते!” यह तुम लोगों को कैसा लग रहा है? क्या उनमें सत्य को स्वीकारने की थोड़ी सी भी प्रवृत्ति है? अगर तुम लोगों के साथ भी इसी तरह से काट-छांट और निपटारा किया जाता है, तो यह परेशानी पैदा करता है। यह प्रमाणित करता है कि तुम लोगों में कोई सत्य वास्तविकताएँ नहीं हैं, और तुम्हारे जीवन स्वभाव में बिल्कुल भी परिवर्तन नहीं हुआ है। क्या इस तरह का नितांत भ्रष्ट, वृद्ध व्यक्ति एक अगुआ या कार्यकर्ता बन सकता है? क्या वे परमेश्वर की सेवा करने का कर्तव्य निभा सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं, क्योंकि ऐसे लोग अगुआ और कार्यकर्ता बनने के काबिल भी नहीं होते हैं। अगुआ और कार्यकर्ता बनने के लिए, किसी व्यक्ति के पास, कम से कम कुछ सत्यों को समझने, कुछ वास्तविकताएं धारण करने, और सर्वाधिक बुनियादी स्तर की आज्ञाकारिता का थोड़ा वास्तविक अनुभव होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि जब व्यक्ति के साथ काट-छांट या निपटारा किया जाए, तो वह इसे स्वीकारने में सक्षम हो—केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही अगुआ या कार्यकर्ता बनने के योग्य होता है। अगर किसी व्यक्ति में कोई भी सत्य वास्तविकताएँ नहीं हैं, और जब उसके साथ काट-छांट और निपटारा किया जाता है, तब भी वह तर्क देता और विरोध करता है, और सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, और अगर इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर की सेवकाई करता है, तो तुम लोगों को क्या लगता है कि क्या होगा? इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे परमेश्वर का विरोध करेंगे; वे सत्य पर अमल नहीं करेंगे, भले ही वे किसी भी प्रकार का कार्य क्यों न कर रहे हों, और वे चीजों को सिद्धांतों के अनुसार तो बिल्कुल नहीं संभालेंगे। इसलिए, अगर ऐसे लोग जिनमें कोई भी सत्य वास्तविकता नहीं है, अगुआ या कार्यकर्ताओं की भूमिका लेते हैं, तो वे निश्चित रूप से मसीह-विरोधी मार्ग पर चल पड़ेंगे, और परमेश्वर का विरोध करेंगे। ऐसा क्यों है कि बहुत सारे अगुआ और कार्यकर्ता को अपने थोड़े से कर्तव्य निर्वहन के बाद ही उजागर कर दिए जाते हैं? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि वे प्रतिष्ठा, लाभ, और रुतबे की तलाश में रहते हैं, और परिणामस्वरूप, वे सामान्य तौर पर मसीह-विरोधी मार्ग पर चलना प्रारंभ कर देते हैं। जहां तक तुम लोगों की बात है, अगर तुम लोगों को एक कलीसिया की जिम्मेदारी दी गई और छह महीने तक किसी ने भी जांच नहीं की, तो तुम लोग अंततः गलत राह पर चल पड़ोगे और मनमर्जी करने लगोगे। अगर तुम लोगों को एक साल के लिए आजाद पंछी की तरह छोड़ दिया गया, तो तुम लोग दूसरे लोगों को भी गुमराह करने लगोगे, और वे सभी केवल धर्म-सिद्धातों की कुछ बातों और वाक्यांशों को बोलने पर और यह तुलना करने पर ध्यान देंगे कि कौन किससे बेहतर है। अगर तुम लोगों को दो साल के लिए आजाद पंछी की तरह छोड़ दिया जाए, तो तुम लोग दूसरों को अपने पीछे चलाने लगोगे, लोग तुम्हारा आज्ञापालन करेंगे, परमेश्वर का नहीं, और इस तरह से कलीसिया का पतन हो जाएगा और यह धार्मिक हो जाएगी। इसका कारण क्या है? क्या तुम लोगों ने इस सवाल के बारे में सोचा है? जब कोई व्यक्ति कलीसिया की अगुआई इस तरह से कर रहा होता हो, तो वह किस राह पर चल रहा होता है? मसीह-विरोधियों की राह पर। क्या तुम लोग ऐसे बनोगे? कब तक तुम लोग दूसरों को सत्य का वह थोड़ा सा भाग पहुंचाते रहोगे जिसे तुम लोग अब समझते हो? क्या तुम परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर लोगों की अगुवाई कर सकते हो? अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग बहुत सारे प्रश्न पूछते हैं, तो क्या तुम लोग परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य पर संगति करते हुए उनका उत्तर देने में सक्षम हो पाओगे? अगर तुम सत्य नहीं समझते, और केवल धर्म-सिद्धांत के कुछ शब्द या वाक्यांशों का उपदेश दोगे, तो तुम्हें कुछ बार सुनने के बाद, लोगों का जी भर जाएगा, और जब तुम धर्म-सिद्धांत के शब्दों और वाक्यांशों का उपदेश देना जारी रखते हो, तो वे इससे ऊब जाएंगे, और इसमें अंतर समझने में सक्षम हो जाएंगे—ऐसे मामले में, उन्हें उपदेश क्यों देते रहना? अगर तुम समझदार व्यक्ति हो, तो तुम्हें लोगों को धर्म-सिद्धांत का उपदेश देना बंद कर देना चाहिए, तुम्हें लोगों को ऊंचे पद से भाषण देना बंद कर देना चाहिए, तुम्हें सभी के समान धरातल पर खड़ा होना चाहिए, और उनके साथ मिलकर खाना, पीना, और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए। ये सभी समझदार लोगों के लक्षण हैं। जो खास तौर पर अहंकारी और आत्म-तुष्ट होते हैं, वे आसानी से अपनी समझ खो देते हैं, और दूसरों को धर्म-सिद्धांत के शब्दों और वाक्यांशों का उपदेश देने पर जोर देते हैं, या वे और अधिक गहरे आध्यात्मिक सिद्धांतों की तलाश करने और सीखने का दिखावा करने का प्रयास करते हैं, और इस प्रकार ऐसे लोग बन जाते हैं जो दूसरों को धोखा देते हैं। इस तरह से व्यवहार करना परमेश्वर का विरोध करना है। क्या तुम इस बात पर स्पष्ट हो कि अगर तुम इस तरह से उपदेश देते रहे, तो क्या परिणाम होंगे? क्या तुम्हें स्पष्ट तौर पर पता है कि तुम लोगों की अगुआई करके उन्हें कहां ले जाओगे? यह किस प्रकार की समस्या है, जब तुम मसीह-विरोधी मार्ग पर चलते हो, लोगों को अपने सामने लाते हो, और उनसे अपनी पूजा और आज्ञापालन करवाते हो? क्या तुम परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए परमेश्वर से मुकाबला नहीं कर रहे हो? यह ऐसे लोगों को अपने सामने लाना है, जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करना चाहते थे, परमेश्वर की ओर लौटना चाहते थे, और परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते थे, उनसे अपना आज्ञापालन करवाकर, और उनसे अपनी मर्जी करवाना, और उनसे खुद को परमेश्वर जैसा मनवाना है। और इसका परिणाम क्या होगा? ये लोग वास्तव में बचाए जाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करना चाहते थे, लेकिन अंतत तुमसे धोखा खा गए—न सिर्फ उन्हें बचाया नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें तबाही का सामना करना पड़ेगा और उनका विनाश कर दिया जाएगा। इस तरह से कार्य करके, तुम लोगों को गुमराह कर रहे हो, तुम उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हो, तुम उन लोगों को अपने कब्जे में ले रहे हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। तुम किस अपराध के दोषी हो? तुम उनके साथ ऐसा कैसे कर सकते हो? तुमने नए विश्वासियों को चालाकी से अपने हाथों में में ले लिया, तुमने उन्हें अपनी भेड़ें बना लिया, वे सभी तुम्हारी बात सुनते हैं, तुम्हारी आज्ञा मानते हैं, और अपने दिल में, तुम वास्तव में सोचते हो : “मैं अब शक्तिशाली हूँ; इतने सारे लोग मेरी बात सुनते हैं, और कलीसिया मेरे इशारे पर चलती है।” मनुष्य के अंदर मौजूद विश्वासघात की यह प्रकृति अनजाने में तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को नाममात्र का बना देती है, और तब तुम स्वयं कोई धर्म या संप्रदाय बना लेते हो। विभिन्न धर्म और संप्रदाय कैसे उत्पन्न होते हैं? वे इसी तरह से बनते हैं। प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के अगुआओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और बाइबल की उनकी व्याख्या में संदर्भ का अभाव है और वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चलते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और ज्ञान पर भरोसा करते हैं। यदि वे उपदेश देने में पूरी तरह अक्षम होते, तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे धर्म-सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालों का उपयोग कैसे करें। इन चीजों के माध्यम से वे लोगों को धोखा देते हैं और उन्हें अपने सामने ले आते हैं। नाममात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इन अगुआओं का अनुसरण करते हैं। जब वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, “हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के मामले में हमारे अगुआ से परामर्श करना है।” देखो, परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चा मार्ग स्वीकारने की बात आने पर कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुआ क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकारने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? इस तरह के लोग पौलुस जैसे ही हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूं? बाइबल में पौलुस के धर्मपत्र दर्ज हैं और दो हजार वर्षों से प्रचलित होते रहे हैं। अनुग्रह के पूरे युग के दौरान, प्रभु पर विश्वास करने वाले लोग, अक्सर पौलुस के शब्दों को पढ़ते थे और उन्हें अपनी कसौटी मानते थे—कष्ट सहना, अपने शरीर को वश में करना, और अंततः धार्मिकता का ताज हासिल करना...। सभी लोग पौलुस के शब्दों और धर्म-सिद्धातों के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करते थे। इन दो हजार वर्षों में, बहुत से लोगों ने पौलुस का अनुकरण किया है, उसकी पूजा की और उसका अनुसरण किया। उन्होंने पौलुस के वचनों को एक धर्मग्रंथ की तरह माना। उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों की जगह पौलुस के शब्दों को दे दी, और परमेश्वर के वचनों का पालन करने में असफल रहे। क्या यह मार्ग से भटकाव नहीं है? यह बहुत बड़ा भटकाव है। अनुग्रह के युग के दौरान लोगों को परमेश्वर की इच्छा के बारे में कितनी समझ थी? जो लोग उस समय यीशु का अनुसरण करते थे, उनकी संख्या कम थी, और जो लोग उसे जानते थे उनकी संख्या तो और भी कम थी—यहाँ तक कि उसके शिष्य भी उसे सच में नहीं जानते थे। अगर लोगों को बाइबल में थोड़ा-सा प्रकाश दिखता है, तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, और थोड़े-से प्रबोधन को परमेश्वर का ज्ञान तो और भी नहीं समझा जाना चाहिए। सभी लोग अभिमानी और दम्भी हैं, और वे परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हैं। थोड़ा-सा सिद्धांत समझने के बाद, वे अपने दम पर नया काम शुरू कर देते हैं, जिसके कारण कई संप्रदाय बन जाते हैं। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर मानव के साथ बिल्कुल भी सख्त नहीं था। सभी धर्म और संप्रदाय जो यीशु के नाम पर बने थे उनमें कुछ न कुछ पवित्र आत्मा का कार्य था; जब तक इसमें कोई भी दुष्टात्मा नहीं काम कर रही थी, तब तक पवित्र आत्मा किसी भी कलीसिया पर कार्य कर सकता था, ताकि अधिकतर लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने में सक्षम हों। अतीत में, परमेश्वर, लोगों के साथ सख्त नहीं था, भले ही परमेश्वर पर उनका विश्वास सच्चा रहा हो या नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ता था कि वे दूसरों का अनुसरण करते थे, या सत्य का अनुसरण नहीं करते थे, क्योंकि उसने पहले ही यह निर्धारित कर दिया था कि अंतिम चरण में, उसके द्वारा पूर्वनिधार्रित और चुने गए लोगों को उसके सामने आना ही होगा और उसके न्याय को स्वीकारना ही होगा। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारने के बाद, अगर लोग अभी भी दूसरों की उपासना और अनुसरण कर रहे हैं, अगर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि आशीष और ताज पाना चाहते हैं तो यह क्षमा करने योग्य नहीं है। ऐसे लोगों का अंत बिल्कुल पौलुस की तरह ही होगा। मैं अक्सर पौलुस और पतरस के उदाहरण का प्रयोग क्यों करता हूँ? ये दो मार्ग हैं। परमेश्वर पर विश्वास करने वाले या तो पतरस के मार्ग का अनुसरण करें या पौलुस के मार्ग का। केवल ये ही दो मार्ग हैं। चाहे तुम अनुयायी हो या अगुआ, यह दोनों एक समान है। अगर तुम पतरस के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो तुम पौलुस के मार्ग पर चल रहे हो। यह अपरिहार्य है; कोई तीसरा रास्ता नहीं है। वे लोग जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते, जो परमेश्वर को नहीं जानते, जो सत्य को समझना नहीं चाहते, और जो परमेश्वर का पूरी तरह से आज्ञापालन करने में असमर्थ हैं, उनका अंत बिल्कुल पौलुस की ही तरह होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर को जानना नहीं चाहते, या परमेश्वर की इच्छा को समझना नहीं चाहते, और तुम केवल धर्म-सिद्धांत के शब्दों और वाक्यांशों को बोलने और आध्यात्मिक सिद्धांतों का उपदेश देने में सक्षम हो, तो तुम केवल परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हो और उसे धोखा दे सकते हो, क्योंकि मानव की प्रकृति ही परमेश्वर का विरोध करने की है। जो चीजें सत्य से मेल नहीं खातीं वे निश्चित रूप से मनुष्य की इच्छा से उत्पन्न हुई हैं। जो कुछ भी मनुष्य की इच्छा से उत्पन्न होता है, चाहे वह मनुष्य की नजर में अच्छा हो या बुरा, परमेश्वर के कार्य को बाधित करता है। कुछ लोग सोचते हैं कि भले ही वे कुछ मामलों में सत्य के अनुसार कार्य नहीं करते हैं, पर वे कुछ बुरा नहीं कर रहे हैं या परमेश्वर का विरोध नहीं कर रहे हैं। क्या यह सही है? यदि तुम सत्य के अनुसार कार्य नहीं करते हो, तो तुम निश्चित रूप से सत्य का उल्लंघन कर रहे हो, और सत्य का उल्लंघन करना अनिवार्य रूप से परमेश्वर का विरोध करना है; यह बस गंभीरता का एक अलग स्तर है। भले ही तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने वाले व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, परमेश्वर तुमकी सराहना नहीं करेंगे, क्योंकि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, और तुम केवल ऐसे काम करते हो जो सत्य से संबंधित नहीं हैं, और तुम केवल अपनी मर्जी के मुताबिक काम करते हो। भले ही जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते वे कोई बुराई नहीं करते, पर क्या वे अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पा सकेंगे? यदि वे अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा नहीं पा सकते हैं, तो वे अभी भी उन भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार ही जी रहे हैं। भले ही वे परमेश्वर का विरोध करने के लिए कुछ भी न करें, फिर भी वे संभवतः परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर सकते, और परमेश्वर ऐसे लोगों की सराहना नहीं करेगा।

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