644 विषमता का कार्य करना जीवन भर का आशीष है

1

रहते तुम वहाँ जहाँ रहता परमेश्वर रहते उसके साथ इस मलिन देश में,

तो विषमता बन गए हो, बचाए गए हो।

जो ना देहधारी हुआ होता वो, कौन दया करता तुम पर?

कौन परवाह करता तुम नीच लोगों की? कौन परवाह करता तुम्हारी?

जो देहधारी परमेश्वर काम न करता तुम्हारे बीच,

तो कब पाते तुम ऐसा उद्धार जो पाया कभी न किसी ने?

जो परमेश्वर देहधारी ना होता पापों का न्याय और तुम्हारी परवाह करने को,

तो क्या पाताल ना पहुंच गए होते तुम?

विषमता का काम उचित है तुम्हारे लिए

क्योंकि पाया है तुमने उद्धार परमेश्वर के न्याय का इसकी वजह से।

क्या तुम नहीं समझते सच्ची विषमता का काम है आशीष?

तुम महज़ विषमता हो, पर पाते हो उद्धार जो पहले कभी ना मिला।

2

जो परमेश्वर देहधारी ना होता, तुम्हारे बीच विनम्रता से न रहता,

तो उसकी धार्मिकता के लिए विषमता होने का क्या अधिकार तुम्हें होता?

क्या तुम विषमता नहीं इसलिए कि परमेश्वर बना देह

जिससे पा सको तुम महान उद्धार?

परमेश्वर हुआ देहधारी, बचाए जाते हो तुम तभी।

जो देहधारी परमेश्वर तुम्हारे बीच ना रहता,

तो क्या जान पाते तुम कि धरा पर जिंदगी तुम्हारी कुत्ते से बदतर?

क्या जो न्याय और ताड़ना तुमने पाई नहीं इसलिए

क्योंकि तुम हो विषमता उसके देह के काम के लिए?

विषमता का काम उचित है तुम्हारे लिए

क्योंकि पाया है तुमने उद्धार परमेश्वर के न्याय का इसकी वजह से।

क्या तुम नहीं समझते सच्ची विषमता का काम है आशीष?

तुम महज़ विषमता हो, पर पाते हो उद्धार जो पहले कभी ना मिला।

विषमता बनना फ़र्ज़ है तुम्हारा,

भविष्य का अनंत आशीष है हक़दार हो जिसके वो इनाम है।

जो पाते हो तुम वो पल भर का ज्ञान नहीं अनंत जीवन है ये, है ये कृपा बड़ी।

विषमता का काम उचित है तुम्हारे लिए

क्योंकि पाया है तुमने उद्धार परमेश्वर के न्याय का इसकी वजह से।

क्या तुम नहीं समझते सच्ची विषमता का काम है आशीष?

तुम महज़ विषमता हो, पर पाते हो उद्धार जो पहले कभी ना मिला।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है' से रूपांतरित

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